अध्याय 2

पहली पुस्तक पर (पिघियस की)

The Bondage and Liberation of the Will · John Calvin

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पहली पुस्तक पर (पिघियस की)

पृष्ठभूमि

दो वर्ष पहले, वॉर्म्स की एक सभा के दौरान, मैंने सुना कि अल्बर्टस पिघियस मेरी शिक्षाओं का खण्डन करने के उद्देश्य से एक रचना तैयार कर रहा है, यद्यपि वह तब तक प्रकाशित नहीं हुई थी। वह अपने मित्रों में डींग मारता था कि उसने ऐसा कुछ लिखा है जो मेरे तर्कों का अन्त कर देगा। परन्तु उसकी पुस्तक जब छपी, तो उसमें निशाना मुख्यतः मार्टिन लूथर और फिलिप मेलांकथन तथा हमारे साझा उद्देश्य के अन्य लोगों पर था, मुझ पर सीधे नहीं। मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि वह समूचे सुधार-आन्दोलन से भिड़ना चाहता था, ताकि सफल होने पर बड़ी विजय मिले, और विफल होने पर अपमान कम हो।

जब अन्ततः उसकी पुस्तक स्वतन्त्र चुनाव मेरे हाथ लगी, तो स्पष्ट हो गया कि उसका मुख्य उद्देश्य संस्थान में दिए गए मेरे तर्कों को उलट देना था। यद्यपि उसने दावा किया कि वह हमारे पूरे आन्दोलन पर आक्रमण कर रहा है, तथापि उसने विशेष रूप से मुझे चुनौती दी, यह मानकर कि मैंने स्वतन्त्र इच्छा के इस विषय पर औरों से अधिक विस्तार से लिखा है।

आरम्भ में, यदि उसका आक्रमण हम सब पर होता, तो मैं अकेले उत्तर देने में हिचकिचाता। मैं नहीं चाहता कि अधिक योग्य लोगों से अपने को ऊपर रखकर मैं अहंकारी दिखाई दूँ। परन्तु अब, जब और किसी से उत्तर की आशा नहीं, और यह देखते हुए कि पिघियस परमेश्वर के सत्य का सार्वजनिक उपहास करने का साहस करता है, मैं खरे सिद्धान्त की रक्षा करने को विवश अनुभव करता हूँ। यद्यपि और भी अधिक विद्वान और समर्थ लोग हैं, फिर भी चूँकि पिघियस ने मुझे सीधे ललकारा है, मैं आगे आ रहा हूँ। मैं यह अपने प्रभु की सामर्थ्य पर और उस आत्मिक कवच पर भरोसा रखकर करता हूँ जो वह देता है, ताकि पिघियस मसीह के एक भी सेवक को हरा देने की डींग न मार सके।

ऐसा प्रतीत होता है कि पिघियस विवाद के लिए मुझे अलग से चुनता है, यद्यपि उसका क्रोध उसके विवेक पर परदा डाल देता है। सम्भव है वह सोचता हो कि मुझे मेरे साथियों के बीच ऊँचा उठाकर वह यह दिखा सकेगा कि वह किसी प्रबल विरोधी से लड़ रहा है। पर वह जो भी सोचे, मुझे उसकी बहुत चिन्ता नहीं। सच्चे सेवक का आदर वाक्पटुता या प्रतिष्ठा में नहीं, वरन् परमेश्वर के सामने शुद्ध विवेक में है, मनुष्यों की प्रशंसा में नहीं।

सम्भव है पिघियस के पास विद्या और वाद-विवाद का कौशल हो, पर उसकी चतुराई भटकी हुई है। उसका अभिमान उसे अन्धा कर देता है, यहाँ तक कि उसे वे बातें दिखाई देती हैं जो हैं ही नहीं। उसकी वाक्पटुता कम विवेकवालों को मोह ले, परन्तु जब उसका मन मूर्खता से धुँधला हो, तब उससे क्या लाभ?

यदि पिघियस सचमुच विद्वानों में सम्मान पाना चाहता है, तो उसे पहले अपनी सोच की स्पष्टता लौटानी होगी। इसके लिए दो उपचार आवश्यक हैं: उसे परमेश्वर के सत्य पर अपने दुर्भावनापूर्ण आक्रमण बन्द करने होंगे और अपने उस अहंकार को त्यागना होगा जिसने उसकी समझ को बिगाड़ दिया है। परन्तु उसके चरित्र की आलोचना करते रहने के बजाय मैं पाठकों को उसकी रचना को सीधे परखने की ओर ले जाऊँगा, जहाँ वे स्वयं देख सकें कि मेरी बातें कितनी सच हैं।

अपनाई जानेवाली पद्धति

पिघियस के तर्कों का उत्तर देने से पहले मुझे स्पष्ट करना है कि मैं इस चर्चा को किस प्रकार करूँगा। पाठक यह आशा न रखें कि मैं उसके लम्बे और बिखरे हुए भाषण का एक-एक बिन्दु करके अनुसरण करूँगा। यदि मैं हर तर्क का विस्तार से उत्तर दूँ, तो यह रचना अत्यधिक लम्बी हो जाएगी। पिघियस कुशल वक्ता है, जो अपने शब्दों से मुद्दों को आडम्बर में दबा देता है और अपने पाठकों को अभिभूत कर देता है। वह यह आशा भी कर सकता है कि उसकी प्रभावशाली वाणी विवेकहीनों की आँखें चौंधिया देगी।

परन्तु मैं उसे शब्दाधिक्य का पुरस्कार जीतने देने में सन्तुष्ट हूँ; मेरे लिए अत्यधिक बोलना भी आत्म-संयम की किसी अन्य कमी जितना ही कष्टप्रद है। यद्यपि वह अपने अलंकृत भाषणों से सीधे-सादे लोगों को छल ले, परन्तु जो सूक्ष्मदर्शी हैं वे उसके शब्दों के पीछे का खोखलापन पहचान लेंगे। इसलिए मेरा लक्ष्य उस “कोहरे” को चीरना है जो वह रचता है, ताकि परमेश्वर का सत्य स्पष्ट रूप से चमके। अत्यधिक लिखकर अपने को और अपने पाठकों को थकाने के बजाय मेरा उद्देश्य उन बातों को उभारना है जो महत्त्व की हैं, उसकी विकृतियों को उघाड़ना और परमेश्वर के सरल सत्य को प्रकट होने देना।

मुझे व्यावहारिक चिन्ताएँ भी विवश करती हैं। समय सीमित है, क्योंकि फ्रैंकफर्ट के मेले में प्रकाशन के लिए इस उत्तर को तैयार करने को मेरे पास केवल दो महीने हैं। पाठक समझ लेंगे कि इन सीमाओं के कारण कुछ बातों को संक्षेप में लिया गया है। यद्यपि कुछ लोग मुझे अधिक समय न लेने के लिए दोष दें, मेरा विश्वास है कि परमेश्वर के सत्य पर आक्रमण होने पर उसकी रक्षा करना मेरा कर्त्तव्य है, जो इस चिन्ता से अधिक भारी है। मेरा उद्देश्य स्पष्टता खोए बिना शीघ्रता से लिखना है, इस भरोसे के साथ कि यह रचना फिर भी अपना प्रयोजन पूरा करेगी।

तुलना की सुविधा के लिए मैं पिघियस की रचना-योजना का अनुसरण करूँगा, परन्तु संक्षिप्तता और सरलता पर ध्यान दूँगा, और उसके अपमानों तथा बढ़ा-चढ़ाकर किए गए आक्रमणों को छोड़ दूँगा। हम पर लगाई गई ये निन्दाएँ न तो मसीह की महिमा को घटाती हैं, न भले लोगों की प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाती हैं, इसलिए मैं शब्दों के युद्ध में नहीं खिंचूँगा। क्रोध और अहंकार से जन्मी पिघियस की बकवास उस सत्य की अपेक्षा, जिसकी हम रक्षा करते हैं, स्वयं उसके विषय में अधिक बताती है।

पिघियस के समर्पण-पत्र पर कैल्विन का उत्तर

आओ, पिघियस ने सादोलेतो को लिखे अपने पत्र में जो कुछ बातें उठाई हैं, उन पर संक्षेप में विचार करें, यद्यपि वे हमारी मुख्य चर्चा के केन्द्र में नहीं हैं। पिघियस इस बात से चकित और क्षुब्ध है कि जर्मनी हमारी शिक्षा की ओर खिंच सका, जिसे वह बेतुका और पिछले युगों की पाखण्डी शिक्षाओं के समान मानता है। वह दावा करता है कि हममें विद्या, वाक्पटुता और पवित्रता का अभाव है, जिन्हें वह अनुयायी खींचने के लिए आवश्यक समझता है।

मेरा उत्तर सरल है: पिघियस यह नहीं देख पाता कि हमारी सफलता परमेश्वर का स्पष्ट कार्य है। हम अपने आप में जितने अयोग्य दिखाई देते हैं, उतना ही अधिक यह प्रकट होता है कि परमेश्वर की सामर्थ्य हमारी निर्बलता के द्वारा कार्य करती है। पिघियस की शिकायत प्रेरितों के आरम्भिक विरोधियों के मुँह से भी उतनी ही सरलता से निकल सकती थी, जिन्होंने उसी प्रकार उनके सन्देश की प्रत्यक्ष निर्बलता को तुच्छ जाना। पौलुस के समान हम भी आनन्द से मानते हैं कि हमारा बल मानवीय कौशल या संरक्षण में नहीं, परमेश्वर के आत्मा में है, जो सत्य को अपनी ही सामर्थ्य से थामे रखता है, हमारी सामर्थ्य से नहीं। पिघियस को इस शिक्षा की प्रभावशीलता पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि पहले परमेश्वर ही ने लूथर के द्वारा बात की, और वही हमारे द्वारा बोलता चला आ रहा है।

पिघियस हममें और प्रेरितों में भेद दिखाने का भी प्रयत्न करता है। यद्यपि व्यक्तिगत कद में हम उनकी बराबरी नहीं कर सकते, फिर भी हमारी शिक्षा उनकी शिक्षा के अनुरूप है। हमने कोई नया सुसमाचार नहीं गढ़ा; हम वही सन्देश सुनाते हैं जो उन्हें मिला और जिसे उन्होंने विश्वासयोग्यता से सिखाया। रोम से हमारे मतभेद प्रायः हमारे इस आग्रह से उपजते हैं कि मसीह, भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों की बात सीधे सुनी जानी चाहिए, जबकि हमारे विरोधी इन वाणियों से ऊपर अपनी ही व्याख्याओं को रखना चाहते हैं।

पिघियस प्रेरितों की आपसी एकता की प्रशंसा करता है, मानो आज हममें ऐसी एकता नहीं है। परन्तु जिस आत्मा ने उन्हें शिक्षा के विषय में एकमत किया, उसी ने सुसमाचार को पुनः स्थापित करने में लगे लोगों में भी एकता उत्पन्न की है। वह प्रेरितों के जीवन में आत्मा की सामर्थी उपस्थिति की भी चर्चा करता है। परन्तु यही आत्मा हमारा भी बल है, क्योंकि हम वही सुसमाचार सिखाते हैं, और संसार को उस सन्देश को सुनने के लिए बुलाते हैं जिसकी उपेक्षा की गई और जो स्मृति से लगभग मिट चुका था।

पच्चीस वर्ष से हमारा लक्ष्य यही रहा है कि इस विवाद का समाधान ऐसे ढंग से हो जिससे मसीह की शिक्षा की महिमा हो, मनुष्यों के प्रयासों की नहीं। यदि यह सिद्ध हो जाए कि हमारी शिक्षा का कोई भाग मसीह और प्रेरितों की शिक्षा के विरुद्ध है, तो हम उसे सुधारने को तैयार हैं। जब लोग हमारे सन्देश के प्रमाण के रूप में नए चमत्कार माँगते हैं, तो वे भूल जाते हैं कि प्रेरितों के चमत्कार सुसमाचार को एक बार सदा के लिए प्रमाणित करने को दिए गए थे। यह आग्रह करना कि नए चिह्नों की आवश्यकता है, मानो सुसमाचार कोई नई वस्तु हो, कृतघ्नता है और निर्लज्जता भी।

पिघियस हम पर छल करने, पवित्रशास्त्र को तोड़ने-मरोड़ने, और यहाँ तक कि अन्यजातियों से भी बुरा जीवन जीने का दोष लगाता है, इस आशा से कि हमारे चरित्र को बदनाम करके हमारी शिक्षाओं को कलंकित करे। परन्तु मैं हर ईमानदार देखनेवाले को आमन्त्रित करता हूँ कि वह स्वयं निर्णय करे। हमारे शब्द कठोर लग सकते हैं, पर वे केवल उन्हीं की ओर निर्देशित हैं जो परमेश्वर के सत्य को खतरा समझते हैं। और किसी शिक्षा के सत्य का न्याय उन लोगों के आचरण से करना अनुचित है जो उसका दुरुपयोग करते हैं।

पिघियस का दावा है कि हमारा कार्य प्रेरितों के कार्य से कठिन है, और एक अर्थ में वह सही है। लूथर और उनके अनुयायियों ने भारी विरोध का सामना किया, जिसमें पोप का प्रबल प्रभाव भी था, जो सेनाओं, धन और व्यापक निष्ठा का स्वामी है। पोप अपने कार्डिनलों, बिशपों और याजकों सहित अपने सारे साम्राज्य को उस सुसमाचार से, जिसकी हम घोषणा करते हैं, संकट में पड़ा देखता है। इसलिए वह अपने सारे साधन ऐसे जुटाता है मानो अपने प्राणों के लिए लड़ रहा हो।

कुछ बातों में हमारी चुनौती प्रेरितों की चुनौती से कठिन है। उनका सामना खुली मूर्तिपूजा से था, जबकि हमें कलीसिया की उस झूठी छवि से जूझना पड़ता है जो परमेश्वर के नाम के नीचे छिपी है। सदियों के अन्धविश्वास और भ्रष्टाचार लोगों के मनों में गहराई से जम गए हैं, और इन भूलों की रक्षा सांसारिक शक्तियाँ करती हैं जो अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए क्रूरता का प्रयोग करने को तैयार हैं।

पिघियस कहता है कि हम निर्भीक हैं, और सचमुच यह दुस्साहस होता यदि हमारा मिशन केवल मानवीय होता। परन्तु हम परमेश्वर के बल पर भरोसा रखते हैं, जैसा पौलुस 2 कुरिन्थियों 10 में हमें स्मरण दिलाता है। यही सामर्थ्य हमें हर उस झूठ को ढा देने योग्य बनाती है जो मसीह के ज्ञान के विरोध में खड़ा होता है। परमेश्वर की अजेय सामर्थ्य पर भरोसा रखकर हम पोप के अधिकार को थामनेवाली सब शक्तियों के सामने दृढ़ खड़े हैं, यह जानते हुए कि हम उसी के सत्य की रक्षा कर रहे हैं।

पिघियस हम पर कलीसिया के इतिहास को नष्ट करने और पूर्वकालीन सन्तों की शिक्षाओं को ठुकराने का दोष लगाता है, यह कहते हुए कि हम ऐसे व्यवहार करते हैं मानो कलीसिया 1,400 वर्ष तक मसीह के बिना रही। पर यह सरासर झूठ है। हम दृढ़ता से मानते हैं कि मसीह सदा अपनी कलीसिया के साथ रहा है, और अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपनी सामर्थ्य और आत्मा से उसे बचाए रखा है। साथ ही, हम मानते हैं कि पवित्रशास्त्र ने स्वयं कलीसिया के भीतर एक व्यापक विद्रोह की पूर्वसूचना दी थी, वह घटना जिसे पौलुस भीतर से मसीह-विरोधी के उदय के रूप में वर्णन करता है, जो परमेश्वर के पवित्रस्थान में बैठकर उसकी अवज्ञा करता है। भ्रष्ट नेतृत्व के प्रभुत्व में कलीसिया की वर्तमान दशा पौलुस की भविष्यवाणी से ठीक मेल खाती है, और परमेश्वर के वचन की सच्चाई की पुष्टि करती है।

आत्मिक अन्धकार के समयों में भी कलीसिया के प्रति मसीह की विश्वासयोग्यता बनी रहती है। यद्यपि संसार भूल से लगभग अन्धा हो गया था, परमेश्वर ने एक बचा हुआ अंश सुरक्षित रखा, और उसी अंश से सत्य का पुनरुज्जीवन उभरा। पिघियस हम पर विश्वासघात का दोष लगा सकता है, पर तथ्य साक्षी देते हैं कि मसीह ने अपनी कलीसिया को कभी नहीं त्यागा, तब भी नहीं जब वह भूल में खोई हुई प्रतीत होती थी।

पिघियस मानता है कि कलीसिया में कुछ कुरीतियाँ घुस आई हैं, फिर भी आग्रह करता है कि वे छोटी हैं और केवल कलीसिया के अगुवों को ही उन्हें सुलझाना चाहिए। वह यह भी कहता है कि हमने कलीसिया इसलिए छोड़ी कि उसके अगुवों की नैतिक विफलताओं से हम विचलित थे। यह आरोप बात के मर्म को पूरी तरह चूक जाता है। आरम्भ में लूथर की आलोचना याजकवर्ग की स्पष्ट कुरीतियों और भ्रष्टाचार पर केन्द्रित थी। फिर भी, इन चिन्ताओं को सुलझाने के बजाय रोम के अगुवों ने शत्रुता से उत्तर दिया, और सुधार को असम्भव बना दिया। लूथर के प्रयासों ने धीरे-धीरे भ्रष्टाचार की गहरी व्याप्ति को प्रकट किया, और दिखाया कि समस्या व्यक्तिगत दुराचार से अधिक थी; वह पोप-पद की पूरी व्यवस्था में जड़ पकड़े हुए थी।

हमारा कभी यह इरादा नहीं था कि केवल व्यक्तिगत आचरण के विषयों पर फूट डालें। हम समझते हैं कि कलीसिया की एकता अनिवार्य है, और नैतिक विफलताएँ, चाहे गम्भीर ही क्यों न हों, फूट को उचित नहीं ठहरातीं। परन्तु जब शिक्षा ही भ्रष्ट हो जाए और अगुवे सुधार से इनकार करें, तब विभाजन अनिवार्य हो जाता है। यदि हमने केवल नैतिक शिकायतों के कारण कलीसिया छोड़ी होती, तो पिघियस का पक्ष बनता। परन्तु विभाजन इसलिए हुआ कि रोमी कलीसिया ने अपनी शिक्षाओं में किसी भी सुधार को सहन नहीं किया। विश्वासयोग्य आलोचना को सहने के बजाय उन्होंने अधर्मी शिक्षाओं के प्रति समर्पण की माँग की, और हमारे पास अलग खड़े होने के सिवा कोई विकल्प न छोड़ा।

हमारा लक्ष्य सदा सच्ची शिक्षा में एकता रहा है, छोटे मतभेदों या व्यक्तिगत शिकायतों के कारण अलगाव नहीं। फिर भी जब कलीसिया का नेतृत्व सत्य को दबाता और सुधार को ठुकराता है, तब विश्वासियों को भ्रष्ट अधिकार के प्रति निष्ठा से ऊपर मसीह के प्रति विश्वासयोग्यता को चुनना होगा।

पिघियस का कहना है कि हमने रोमी कलीसिया से अलगाव केवल उसके याजकों की नैतिक विफलताओं से ठेस खाकर आरम्भ किया। यह बिलकुल सच नहीं है। फूट हमने नहीं डाली, वरन् रोम के अगुवों ने, जिन्होंने सत्य बोलनेवाले हर किसी को निकाल दिया, और विरोध को चुप कराने के लिए अत्याचारी आदेशों और यहाँ तक कि हिंसा का प्रयोग किया। वे हम पर कलीसिया को बाँटने का दोष कैसे लगा सकते हैं, जब हमें सबसे पहले बाहर उन्हीं ने किया?

पिघियस तर्क देता है कि एकता बनाए रखने के लिए हमें चुप रहकर “शान्ति” बनाए रखनी चाहिए थी। परन्तु परमेश्वर के सत्य की उपेक्षा पर टिकी शान्ति कैसी शान्ति है? सच्ची एकता, जैसा पवित्र आत्मा सिखाता है, खरी शिक्षा में जड़ पकड़ती है। रोम की तथाकथित एकता मूर्तिपूजा, अन्धविश्वास और भ्रष्ट शिक्षा पर बनी है। मसीह की सामर्थ्य धुँधली कर दी गई है, उसका अनुग्रह लगभग भुला दिया गया है, और उसके संस्कार मानवीय आविष्कारों से विकृत हो गए हैं।

पिघियस हमें सलाह देता है कि इन बुराइयों को सहकर शान्ति बनाए रखें। परन्तु ऐसी विकृतियों के सामने चुप रहना परमेश्वर की महिमा, मसीह के सुसमाचार, और मसीह द्वारा छुड़ाए गए प्राणों के साथ विश्वासघात होगा। जैसे चोर के निकट आने पर पहरेदार कुत्ता भौंकता है, वैसे ही हम खड़े होकर कुछ न कहें, जबकि कलीसिया लूटी जा रही हो, परमेश्वर की प्रभुता रौंदी जा रही हो, और मसीह का राज्य छीना जा रहा हो, यह हमारे लिए सम्भव नहीं।

पिघियस यह भी तर्क देता है कि हमारे कार्यों ने कुरीतियों को सुलझाने के लिए पास्टरों के अधिकार को दुर्बल कर दिया है। परन्तु वह वास्तविकता की उपेक्षा करता है: कलीसिया में निर्विवाद संकट होने पर भी रोम के अगुवे भ्रष्टाचार को सुलझाने की कोई तत्परता नहीं दिखाते। संसार स्वयं सुधार के लिए पुकार रहा है, फिर भी ये अगुवे टस से मस नहीं होते। वर्तमान स्थिति दिखाती है कि हम बोलते या चुप रहते, वे कुरीतियों को सुलझाने के लिए कुछ न करते।

पिघियस हम पर कलीसिया में उपद्रव करने का दोष लगाता है, परन्तु जैसे एलिय्याह ने राजा अहाब से कहा था, हम उत्तर देते हैं: “इस्राएल को हम नहीं, वरन् तू ने यहोवा की आज्ञाओं को त्यागकर संकट में डाला है” (1 राजा 18:18)। वर्तमान उथल-पुथल के उत्तरदायी हम नहीं हैं; दोष उन पर है जो सत्ता बनाए रखना और मसीह के राज्य का विरोध करना चाहते हैं। पवित्रशास्त्र पहले से बताता है कि वह “अधर्मी” तब तक बना रहेगा जब तक मसीह का आगमन उसे नष्ट न कर दे, और हम परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं कि वह अपने समय में सच्ची शान्ति लाएगा।

पिघियस का दावा है कि यदि हम बाधा न डालते तो रोमी कलीसिया के अगुवे सुधार कर देते। परन्तु यदि यह सच है, तो बार-बार निवेदन करने पर भी उन्होंने ऐसा करने का कोई सच्चा इरादा क्यों नहीं दिखाया? सच्चाई यह है कि वे डरते हैं कि इस जर्जर ढाँचे को, जो पहले ही गिरने के कगार पर है, सुधारने का कोई भी प्रयास उसे उन्हीं के ऊपर गिरा देगा। उनकी प्राथमिकता कलीसिया का स्वास्थ्य नहीं, वरन् अपनी सत्ता को बचाए रखना है, कलीसिया की भावी दशा चाहे जो हो।

पिघियस यह भी विलाप करता है कि हमने कलीसिया के अनुशासन को भंग कर दिया है, मानो पहले कोई सच्चा अनुशासन था ही। रोम के अधीन कलीसिया अव्यवस्था और भ्रष्टाचार से भरी थी। वह प्राचीन कलीसियाई नियमों की डींग मारता है, पर उनकी उपेक्षा ऐसे की गई मानो वे कभी लिखे ही न गए हों। पिघियस का अनुशासन के लोप पर शोक करना हास्यास्पद है, जबकि जो था वह व्यवस्था से अधिक अत्याचार था।

मैं पिघियस को संक्षेप में उत्तर देता हूँ ताकि वास्तविक वाद-विवाद में उतरने से पहले इन भ्रान्तियों को दूर कर दूँ। मैं लूथर के चरित्र पर उसके तुच्छ आक्रमणों का उत्तर नहीं दूँगा, जो खोखले अपमानों से अधिक कुछ नहीं। पिघियस लूथर को “नारकीय राक्षस” कहता है, केवल इसलिए कि लूथर ने, बहुत-से समर्पित विश्वासियों के समान, विवेक के तीव्र संघर्ष अनुभव किए। फिर भी, यदि पिघियस समझता कि विश्वास और पश्चात्ताप से गहरी कुश्ती करने का क्या अर्थ है, तो वह लूथर का उपहास करने के बजाय उसका आदर करता।

हर विश्वासी, विशेषकर विश्वास में सबल, दीनता और परमेश्वर के भय में बढ़ते हुए तीव्र आन्तरिक संघर्ष के समय अनुभव करता है। जैसे याकूब ने परमेश्वर से कुश्ती की और जीवन भर उस संघर्ष का चिह्न लिए रहा, वैसे ही बहुत-से सन्त गहराई से परखे जाते हैं, जिससे वे परमेश्वर के और निकट आते हैं। परन्तु पिघियस जैसे लोग, जिनमें सच्ची श्रद्धा नहीं, इन संघर्षों को तिरस्कार से देखते हैं, मानो वे परियों की कहानियाँ हों।

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