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— पिघियस द्वारा कैल्विन की रचना के उपयोग पर कैल्विन का उत्तर
पिघियस स्वतन्त्र इच्छा पर अपना तर्क परमेश्वर और मनुष्य के ज्ञान को जोड़कर आरम्भ करता है, वही संरचना जो मैंने भी अपने संस्थान में अपनाई, क्योंकि वह शिक्षा के लिए प्रभावी है। जहाँ मैं उसके इस क्रम-विन्यास की सराहना करता हूँ, वहाँ मुझे उसके इस दुस्साहस पर आश्चर्य होता है कि उसने मेरी रचना से सामग्री बिना स्वीकार किए उठा ली, और मेरे विचारों को अपनी पुस्तक में ऐसे डाल दिया मानो वे उसी के हों।
पिघियस सूक्ष्मता से उधार नहीं लेता; वह मेरे शब्दों को ज्यों का त्यों उतार लेता है, कभी-कभी पूरे अंश, और अपनी साहित्यिक चोरी को छिपाने का कोई प्रयत्न नहीं करता। ऐसा लगता है कि वह मान बैठा है कि उसके पाठक, जो उसके प्रति निष्ठा के कारण हमारी रचनाओं से दूर रहते हैं, इस चोरी को पहचान न पाएँगे। यह बेईमानी हर उस व्यक्ति को स्पष्ट दिखाई देगी जो उसके पहले अध्याय की तुलना मेरे संस्थान के पहले अध्याय से, या धर्मी ठहराए जाने पर उसके खण्ड की तुलना मेरे छठे अध्याय से करे। ऐसी तुलना उसके द्वारा मेरे शब्दों के निर्लज्ज उपयोग को प्रकट कर देगी, जिन्हें वह अपनी अन्तर्दृष्टि बताकर दिखाता फिरता है।
इस पर विचार करते हुए मुझे सन्देह होता है कि उसकी यह चोरी केवल आलस्य के कारण नहीं, वरन् इस विश्वास के कारण है कि उसके पाठक हमारे विरुद्ध कही गई किसी भी बात की, ईमानदारी का विचार किए बिना, प्रशंसा करेंगे। उसे उन लोगों में प्रशंसा मिलती है जो हमारी लिखी बातों से दूर रहते हैं और हमारे विरुद्ध आक्रमणों को बिना परखे मान लेते हैं। फिर भी जो सत्य के खोजी हैं, उनके लिए मेरा संस्थान उसकी बेईमानी और कृतघ्नता का साक्षी है। मेरा इस विषय को उठाने का इरादा नहीं था, परन्तु हमारी कथित बुद्धिहीनता के विषय में उसकी अनर्जित डींग ने मुझे इस बात को स्पष्ट करने को विवश कर दिया।
उधार लेने के अतिरिक्त, पिघियस मनुष्य के चुनाव की प्रकृति पर मेरे तर्कों को विकृत भी करता है। उसका मुख्य दावा है कि हम परमेश्वर के न्याय को तभी समझते हैं जब यह मानें कि हमारी इच्छाएँ सचमुच स्वतन्त्र हैं, और हमें भलाई या बुराई चुनने की अनुमति देती हैं। वह हमारी शिक्षाओं का खण्डन करने का प्रयत्न करता है, और अपने आक्रमण मुख्यतः मुझ पर केन्द्रित करता है, उसके शब्दों में “हमारे सम्प्रदाय” के प्रतिनिधि के रूप में, जिसे वह तिरस्कार से कहता है। यही दृष्टिकोण उसकी पहली पुस्तक के अन्त की विशेषता है।
पिघियस का तर्क है कि मनुष्य की इच्छा पर हमारी शिक्षाएँ अविवेकपूर्ण और बेतुकी हैं, और वह लूथर पर यह आरोप लगाता है कि वे लोगों को सामान्य बुद्धि त्यागकर “अन्धविश्वास” अपनाने को कहते हैं। वह लूथर की उस सलाह का उपहास करता है कि शारीरिक तर्क को छोड़ दो, मानो परमेश्वर पर भरोसा रखने के लिए लोगों को अपनी बुद्धि फेंक देनी पड़े। पिघियस इसे बुद्धि का अपमान और प्रेरित पौलुस का खण्डन बताकर आलोचना करता है, जो कहता है कि विश्वास सुनने से आता है। वह यहाँ तक संकेत करता है कि लूथर के मत के अनुसार शिशु और बुद्धिहीन लोग विश्वास के लिए सबसे उपयुक्त होंगे।
परन्तु पिघियस पौलुस की बात का मर्म चूक जाता है। पौलुस सिखाता है कि “शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता”, क्योंकि आत्मिक सत्य केवल परमेश्वर के प्रकाशन से समझे जाते हैं। दूसरे शब्दों में, आत्मिक वास्तविकताओं को समझने में संसारिक बुद्धि सीमित है। पौलुस हमें स्मरण दिलाता है कि “इस संसार का ज्ञान परमेश्वर के निकट मूर्खता है”, और सच्चा ज्ञान तब आरम्भ होता है जब हम परमेश्वर के सामने मानवीय समझ की सीमाओं को पहचानते हैं। पिघियस इसका उपहास कर सकता है, परन्तु पौलुस स्वयं आग्रह करता है कि परमेश्वर का सत्य ग्रहण करने के लिए मानवीय बुद्धि को दीन होना होगा।
स्वतन्त्र इच्छा पर लूथर के विचारों की ओर मुड़ते हुए, पिघियस लूथर की स्थिति को दो आरोपों में समेट देता है: पहला, कि पतन के बाद से मनुष्य की स्वतन्त्र इच्छा में कोई वास्तविक सामर्थ्य नहीं, और दूसरा, कि सब कुछ संयोग के बजाय अनिवार्यता से संचालित होता है। इस आलोचना के अधीन पिघियस का तर्क है कि लूथर का मत लोगों से परमेश्वर का अनुग्रह ग्रहण करने के लिए स्वयं को तैयार करने की क्षमता छीन लेता है, व्यवस्था का पालन असम्भव ठहराता है, और भले कामों को अर्थहीन बना देता है।
उत्तर में, आओ स्पष्ट करें कि लूथर का आशय क्या था। वे भले कामों के मूल्य को नकार नहीं रहे थे, न यह इनकार कर रहे थे कि परमेश्वर उन्हें प्रतिफल देता है। वरन् उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भले काम अपने आप में परमेश्वर के सामने योग्यता अर्जित नहीं करते, परन्तु उसके अनुग्रह के कारण उसे प्रसन्न करते हैं। लूथर उस खतरनाक विश्वास को सुधारना चाहते थे कि भले कामों में उद्धार पाने की अपनी निहित सामर्थ्य है। मानवीय प्रयास पर झूठे भरोसे से सोया हुआ संसार एक सशक्त सन्देश का, एक जगा देनेवाली पुकार का, आवश्यकतामन्द था जो दिखाए कि केवल परमेश्वर की दया ही हमारे कामों को स्वीकार्य बनाती है।
सारांश यह कि लूथर का तर्क था कि भले काम सचमुच धार्मिक होने के लिए परमेश्वर के प्रति सिद्ध प्रेम से निकलने चाहिए, ऐसी सिद्धता जो हम अपने आप प्राप्त नहीं कर सकते। इसका उद्देश्य भले कामों को हतोत्साहित करना नहीं, वरन् हमें स्मरण दिलाना है कि परमेश्वर के निकट उनका मूल्य उसके अनुग्रह से है, उनकी अपनी योग्यता से नहीं।
पिघियस भले कामों में मानवीय अपूर्णता पर हमारी शिक्षाओं पर आपत्ति करता है, यह दावा करते हुए कि यह मत पवित्र आत्मा का अपमान करता है, जो ऐसे कामों को सम्भव बनाता है। परन्तु हमें उसमें भेद करना चाहिए जो मानवीय प्रयास से उत्पन्न होता है और जो आत्मा से है। सन्त भी, जब वे सच्चे मन से परमेश्वर की आज्ञा मानने का प्रयत्न करते हैं, तब भी अपने सारे मन, प्राण और शक्ति से उससे प्रेम करने में चूक जाते हैं, जैसी व्यवस्था आज्ञा देती है। मानवीय निर्बलता का यह अर्थ है कि कोई काम पूरी तरह शुद्ध या निर्दोष नहीं, और परमेश्वर के सिद्ध मापदण्ड से नापने पर सर्वोत्तम काम में भी कोई न कोई दाग दिखाई देता है।
पिघियस आग्रह करता है कि किसी भले काम को छोटी-छोटी अपूर्णताओं के कारण दोषपूर्ण ठहराना अनुचित है। परन्तु जैसे खटास की एक छोटी बूँद दाखरस का स्वाद बिगाड़ सकती है, वैसे ही मामूली दोष भी काम को परमेश्वर के सामने अपूर्ण बना देता है। मूसा की व्यवस्था के अधीन, जो कुछ पवित्र था वह अशुद्धता के सम्पर्क में आने पर अशुद्ध माना जाता था, जो दिखाता है कि मानवीय अपूर्णता उसे भी दूषित करती है जो अन्यथा भला हो सकता है। इसलिए, यद्यपि भले काम उसके अनुग्रह से परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं, वे अपने आप में योग्यतापूर्ण नहीं हैं।
स्वतन्त्र इच्छा के विषय में पिघियस हम पर असंगति का आरोप लगाता है, यह दावा करते हुए कि हम सांसारिक बातों में कुछ स्वतन्त्रता देते हैं पर आत्मिक बातों में नहीं। वह यह भी कहता है कि हम अपनी शिक्षा फैलाने के लिए “छल” का सहारा लेते हैं, और लूथर के विचारों के प्रति हमारे आदर पर प्रश्न उठाता है। परन्तु ये आरोप निराधार हैं। हम लूथर का बहुत आदर करते हैं, और सुसमाचार की पुनःस्थापना में उनके विशाल योगदान को स्वीकार करते हैं। अपनी शिक्षा के विषय में हम अपने मूल सिद्धान्तों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं, भले ही समझ में बढ़ते हुए हम उन्हें स्पष्टता और सुगमता के लिए नए ढंग से व्यक्त करें। अपने सन्देश को दूसरों तक बेहतर पहुँचाने के लिए भाषा को ढालना अपने विश्वासों को बदलना नहीं है।
पिघियस आगे हम पर अस्पष्ट और असंगत होने का आरोप लगाता है, यह जताते हुए कि हम दूसरों को धोखा देने के लिए जटिल भाषा के पीछे छिपते हैं। परन्तु उसका आरोप निराधार है। हमारा लक्ष्य स्पष्टता और सरलता है ताकि मसीह की शिक्षाएँ सब के लिए सुलभ हों, और हमारी तथाकथित “अस्पष्टता” केवल उन्हीं को खटकती है जो समझना नहीं चाहते। पिघियस केवल अलंकार का सहारा लेता है, और बिना आधार के अस्पष्टता के आरोपों से हमें अविश्वसनीय ठहराने का प्रयत्न करता है।
सच तो यह है कि हमारी रचनाएँ ईमानदार पाठकों के लिए पर्याप्त स्पष्ट हैं, और अभिव्यक्ति के भेद शिक्षा के मतभेद को नहीं, वरन् सुसमाचार को इस ढंग से सुनाने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं कि वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे। पिघियस की आलोचनाओं का उद्देश्य उन लोगों में अविश्वास बोना है जो हमारी रचनाएँ वस्तुतः पढ़ते ही नहीं, और उन्हें अनदेखा करना है जो हमारे लेखन से सचमुच परिचित हैं।
पिघियस हमारे साझा विश्वासों की रूपरेखा देने के लिए आरम्भ में मेरे ही शब्दों का प्रयोग करता है, यद्यपि वह व्यक्तिगत भेदों की छिद्रान्वेषी खोज से हमारी सहमति को घटाने का प्रयत्न करता है। वह हम सब का एक साथ विरोध करना चाहता है, पर अपने तर्कों को संगत ढंग से परिभाषित करने में संघर्ष करता है। वह अनिच्छा से हमारी एकता को स्वीकार करता है, फिर भी मेरे विचारों को गलत ढंग से प्रस्तुत और अतिसरल करके हमें अविश्वसनीय ठहराना चाहता है।
पिघियस मुझ पर यह आरोप भी लगाता है कि मैं क्रिसोस्तोम जैसे कलीसियाई पिताओं के कथनों को सन्दर्भ से काटकर उनका अर्थ बदल देता हूँ। परन्तु उसकी आलोचनाएँ निराधार हैं और समझ की कमी दिखाती हैं। वह मूलभूत विश्वासों को ठुकराता है, जैसे वह आन्तरिक संघर्ष जो विश्वासी पवित्रता में बढ़ते हुए अनुभव करते हैं, जो ऐसी वास्तविकता है जो मसीही जीवन जीनेवाले हर किसी को स्पष्ट है।
पिघियस फिर हमारा उपहास करता है कि यदि हम मानते हैं कि विश्वास अन्ततः परमेश्वर का दान है, मानवीय प्रयास का फल नहीं, तो हम प्रचार और शिक्षा क्यों करते हैं। वह तर्क देता है कि यदि विश्वास केवल परमेश्वर के कार्य पर निर्भर है, तो हमारी शिक्षा और उपदेश व्यर्थ हैं। परन्तु यह सोच दर्शाती है कि परमेश्वर साधनों के द्वारा कैसे कार्य करता है, यह वह नहीं समझता। जैसे किसान बीज बोते हैं, यह जानते हुए कि उसे उगाता केवल परमेश्वर है, वैसे ही हम प्रचार करते हैं क्योंकि परमेश्वर सुसमाचार को लोगों के हृदयों में अपनी इच्छा पूरी करने के लिए काम में लाता है। हमारा परिश्रम निष्फल नहीं; वह परमेश्वर के ठहराए हुए साधनों का अंग है।
पवित्रशास्त्र हमें स्मरण दिलाता है कि हमारा प्रतिदिन का भरण-पोषण भी केवल भोजन पर नहीं, वरन् परमेश्वर पर निर्भर है। जब परमेश्वर ने मन्ना दिया, तब वह सिखा रहा था कि “मनुष्य केवल रोटी से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुँह से निकलता है, जीवित रहेगा।” पिघियस तर्क दे सकता है कि हम फिर भी कुछ अंश तक रोटी से जीते हैं, परन्तु सच्चाई यह है कि परमेश्वर की आशीष के बिना भोजन में स्वयं हमें पोषण देने की कोई सामर्थ्य नहीं। परमेश्वर हमें रोटी के साथ या बिना रोटी के थाम सकता है, जो दिखाता है कि केवल उसका विधान ही पर्याप्त है।
इसी प्रकार, प्रेरित पौलुस अपनी तुलना एक माली से करता है, यह कहते हुए कि वह रोपता और सींचता है, परन्तु बढ़ाता केवल परमेश्वर है। यदि हम पौलुस की तरह कहें कि परमेश्वर के बिना हमारा कार्य “कुछ नहीं” है, तो पिघियस हमारा उपहास करेगा कि हम अपना परिश्रम व्यर्थ गँवाते हैं। फिर भी पौलुस स्पष्ट करता है कि उसकी प्रभावशीलता परमेश्वर के आत्मा से है, उसके अपने कौशल या बल से नहीं।
पिघियस का तर्क मुद्दे को चूक जाता है: परमेश्वर ने सुसमाचार को वह साधन ठहराया है जिसके द्वारा उसका आत्मा लोगों को विश्वास में लाता है। हमारी शिक्षा और प्रचार उसके उद्देश्यों की सेवा करते हैं, इसलिए नहीं कि हम विश्वास उत्पन्न करते हैं, वरन् इसलिए कि परमेश्वर ने हमारे शब्दों को अपने अनुग्रह के उपकरण के रूप में काम में लाना चुना है। इसलिए हमारा परिश्रम खोखला या व्यर्थ नहीं; वह परमेश्वर के उस उद्देश्य को पूरा करता है जिसे आशीष देने की उसने प्रतिज्ञा की है।
पिघियस हमारा उपहास यह कहकर करता है कि हम “बिना उद्देश्य या कारण” प्रचार करते हैं, मानो हम अन्धे होकर विवश किए गए हों। परन्तु वह हमारी प्रेरणा को नहीं समझता। हम यह सेवकाई अपनी बुद्धि या संयोग से नहीं करते; वरन् परमेश्वर की उद्देश्यपूर्ण बुलाहट और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य हमें चलाती है।
हमारी बुलाहट पौलुस की बुलाहट के समान है, जो जन्म से जानता था कि वह परमेश्वर के काम के लिए चुना गया है, और आरम्भ करने के लिए परमेश्वर के ठहराए समय की प्रतीक्षा करता रहा। हम प्रचार करते हैं क्योंकि हम पौलुस और ऑगस्टीन की तरह मानते हैं कि यह परमेश्वर की इच्छा है कि हम उसका वचन बाँटें ताकि जो सुनने को तैयार हैं वे विश्वास में आएँ। हम जानते हैं कि परमेश्वर बहुतों तक पहुँचने के लिए मानवीय साधनों को काम में लाता है, यद्यपि वह कुछ को ऐसी सहायता के बिना भी समझ देता है।
यद्यपि हमारा प्रचार विश्वास का साधन हो सकता है, फिर भी जब कभी कोई सचमुच सुनता और मानता है, तो वह अन्ततः परमेश्वर का दान है।
