यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
चौंका देनेवाले प्रश्न
उस हृदय को निरे संसारी और लापरवाह मनुष्य के हृदय के बदले में? उससे पूछिए कि क्या वह इस बात से सन्तुष्ट होगा कि मुड़कर उन सब वस्तुओं को, जिन्हें उसने थाम रखा है, फेंक दे और संसार में लौट जाए? इसमें कौन सन्देह कर सकता है कि उसका उत्तर क्या होगा? वह कहेगा, "मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं नहीं जानता कि मुझ में विश्वास है या नहीं—मुझे निश्चय नहीं कि मुझे अनुग्रह मिला है—परन्तु मेरे भीतर कुछ ऐसा है जिसे मैं छोड़ना नहीं चाहूँगा।" और वह "कुछ" क्या है? मैं आपको बताता हूँ। वह पवित्र आत्मा की गवाही है।
पाठक, इसे भी समझने का प्रयत्न कीजिए। परमेश्वर के पुत्रों के विवेक में पवित्र आत्मा की गवाही होती है। यह पुत्रत्व का एक और चिह्न है।
4. एक बात और मैं जोड़ता हूँ। परमेश्वर के सब पुत्र मसीह के साथ दुःख उठाने में सहभागी होते हैं। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "और यदि सन्तान हैं, तो वारिस भी, वरन् परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, जब कि हम उसके साथ दुःख उठाएँ।" (रोमियों 8:17।)
परमेश्वर की सब सन्तानों को उठाने के लिए एक क्रूस है। उन्हें सुसमाचार के कारण परीक्षाओं, कष्टों और क्लेशों से होकर जाना पड़ता है। उन पर संसार की ओर से परीक्षाएँ आती हैं—शरीर की ओर से परीक्षाएँ—और शैतान की ओर से परीक्षाएँ। उन पर सम्बन्धियों और मित्रों की ओर से भावनाओं की परीक्षाएँ आती हैं—कठोर बातें, कठोर व्यवहार और कठोर निर्णय। चरित्र के विषय में भी उनकी परीक्षाएँ होती हैं—निन्दा, झूठा चित्रण, उपहास, और बुरे उद्देश्यों का संकेत—ये सब प्रायः उन पर घनी वर्षा की तरह बरसते हैं। सांसारिक हित के विषय में भी उन्हें परीक्षाएँ होती हैं। उन्हें प्रायः यह चुनना पड़ता है कि मनुष्य को प्रसन्न करके महिमा खोएँ, या महिमा पाकर मनुष्य को अप्रसन्न करें। उन पर अपने ही हृदय की ओर से परीक्षाएँ आती हैं। सामान्यतः हर एक का अपना शरीर में काँटा होता है—अपना घर का शैतान, जो उसका सबसे बुरा शत्रु है। परमेश्वर के पुत्रों का यही अनुभव है।
उनमें से कुछ अधिक दुःख उठाते हैं और कुछ कम। कुछ एक रीति से दुःख उठाते हैं और कुछ दूसरी रीति से। परमेश्वर एक बुद्धिमान वैद्य की नाईं उनका भाग नापकर देता है, और चूक नहीं सकता। परन्तु मेरा विश्वास है कि परमेश्वर की सन्तानों में से कोई भी बिना क्रूस के स्वर्ग-वाटिका तक नहीं पहुँचा।
दुःख प्रभु के परिवार का आहार है। "क्योंकि प्रभु जिससे प्रेम करता है, उसकी ताड़ना भी करता है।" "यदि तुम ताड़ना बिना रहो, तो तुम तो अवैध सन्तान हो, पुत्र नहीं।" "हमें बड़े क्लेश उठाकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना होगा।" (इब्रानियों 12:6, 8; प्रेरितों के काम 14:22।) जब अध्यक्ष लैटिमर से उसके मकान-मालिक ने कहा कि उस पर कभी कोई कष्ट नहीं आया, तो उसने कहा, "तब तो परमेश्वर यहाँ नहीं हो सकता।"
दुःख उस प्रक्रिया का एक भाग है जिसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र पवित्र किए जाते हैं। उन्हें इसलिए ताड़ना दी जाती है कि वे संसार से छुड़ाए जाएँ और परमेश्वर की पवित्रता के भागी बनें। उनके उद्धार के अगुवे को दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध किया गया, और वे भी उसी रीति से सिद्ध किए जाते हैं। कभी कोई ऐसा महान सन्त नहीं हुआ जिस पर या तो बड़े क्लेश न आए हों या जिसमें बड़ी भ्रष्टताएँ न रही हों। फिलिप मेलैंक्थन ने ठीक कहा था, "जहाँ चिन्ताएँ नहीं, वहाँ सामान्यतः प्रार्थनाएँ भी नहीं होंगी।"
पाठक, इसे भी अपने हृदय में बैठाने का प्रयत्न कीजिए। परमेश्वर के सब पुत्रों को क्रूस उठाना होता है। दुःख उठानेवाले उद्धारकर्ता के चेले भी दुःख उठानेवाले होते हैं। दूल्हा दुःखी पुरुष था। दुल्हन को सुख-विलास में रहनेवाली और शोक से अपरिचित स्त्री नहीं होना चाहिए। धन्य हैं वे जो शोक करते हैं। हम क्रूस के विषय में बुड़बुड़ाएँ नहीं। यह भी पुत्रत्व का एक चिह्न है।
पाठक, मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि जब तक आप में पुत्रत्व के पवित्रशास्त्रीय चिह्न न हों, तब तक कभी यह न मान लें कि आप परमेश्वर के पुत्र हैं। प्रमाणों के बिना पुत्रत्व से सावधान रहिए। मैं फिर कहता हूँ, सावधान रहिए। जब किसी मनुष्य में दिखाने के लिए पवित्र आत्मा की कोई अगुवाई नहीं—बताने के लिए लेपालकपन का कोई आत्मा नहीं—विवेक में पवित्र आत्मा की कोई गवाही नहीं—अनुभव में कोई क्रूस नहीं—तो क्या वह परमेश्वर का पुत्र है? परमेश्वर न करे कि मैं ऐसा कहूँ! उसका धब्बा परमेश्वर की सन्तानों का धब्बा नहीं है। वह महिमा का वारिस नहीं है।
मुझसे यह न कहिए कि आपका बपतिस्मा हुआ है और आपको इंग्लैंड की कलीसिया की प्रश्नोत्तरी सिखाई गई है, इसलिए आप परमेश्वर की सन्तान होंगे। मैं आपसे कहता हूँ कि 'पल्ली का पंजीकरण-बही' जीवन की पुस्तक नहीं है। मैं आपसे कहता हूँ कि प्रार्थना-पुस्तक के विश्वास और प्रेम के द्वारा शैशवावस्था में परमेश्वर की सन्तान कहलाना और नया जन्म पाया हुआ कहा जाना एक बात है—परन्तु सचमुच परमेश्वर की सन्तान होना बिलकुल दूसरी बात है। जाकर उस प्रश्नोत्तरी को फिर से पढ़िए।
वह "पाप के लिए मरना और धार्मिकता के लिए नया जन्म लेना" ही है, जो मनुष्यों को अनुग्रह की सन्तान बनाता है। जब तक आप इन्हें अनुभव से नहीं जानते, तब तक आप परमेश्वर के पुत्र नहीं हैं।
मुझसे यह न कहिए कि आप कलीसिया के सदस्य हैं, इसलिए पुत्र होंगे। मैं उत्तर देता हूँ कि कलीसिया के पुत्र अनिवार्य रूप से परमेश्वर के पुत्र नहीं होते। ऐसा पुत्रत्व रोमियों के आठवें अध्याय का पुत्रत्व नहीं है। वही पुत्रत्व आपके पास होना चाहिए, यदि आपको उद्धार पाना है।
और अब मुझे सन्देह नहीं कि इन पृष्ठों का कोई पाठक जानना चाहेगा कि क्या वह पवित्र आत्मा की गवाही के बिना उद्धार नहीं पा सकता।
मैं उत्तर देता हूँ कि यदि पवित्र आत्मा की गवाही से आपका अर्थ आशा की पूरी निश्चयता है, तो आप निस्सन्देह उसके बिना भी उद्धार पा सकते हैं। परन्तु यदि आप यह जानना चाहते हैं कि क्या कोई मनुष्य उद्धार के किसी भीतरी बोध, या ज्ञान, या आशा के बिना उद्धार पा सकता है, तो मैं उत्तर देता हूँ कि सामान्यतः वह नहीं पा सकता। मैं आपको साफ़ चेतावनी देता हूँ कि परमेश्वर के सामने अपनी दशा के विषय में सारी अनिश्चितता को दूर फेंक दीजिए, और अपने बुलाए जाने को पक्का कर लीजिए। अपनी स्थिति और सम्बन्ध को स्पष्ट कर लीजिए। यह न सोचिए कि सदा सन्देह करते रहने में कोई प्रशंसा की बात है। वह तो पोप के अनुयायी के लिए छोड़ दीजिए। यह भी न सोचिए कि सदा "विवादित भूमि" पर जीना बुद्धिमानी है। प्यूरिटन वृद्ध डॉड ने कहा था, "निश्चयता प्राप्त हो सकती है; और यदि हमने उसे प्राप्त नहीं किया, तो मसीही बनने के बाद से हम अपने सारे जीवन में क्या करते रहे हैं?"
मुझे सन्देह नहीं कि इस पुस्तक को पढ़नेवाले कुछ सच्चे मसीही सोचेंगे कि उनके पुत्रत्व का प्रमाण इतना थोड़ा है कि वह अच्छा नहीं हो सकता, और वे अपने ही विरुद्ध कड़वी बातें लिखेंगे। मैं उन्हें ढाढ़स बँधाने का प्रयत्न करता हूँ। जो भावनाएँ आप में हैं, वे आपको किसने दीं? आपसे पाप से घृणा किसने करवाई? आपको मसीह से प्रेम किसने करवाया? आपको पवित्र होने की लालसा और उसके लिए परिश्रम किसने करवाया? ये भावनाएँ कहाँ से आईं? क्या ये स्वभाव से आईं? स्वाभाविक मनुष्य के हृदय में ऐसी उपज होती ही नहीं। क्या ये शैतान की ओर से आईं? वह तो ऐसी भावनाओं को पूरी तरह दबा देना चाहेगा। ढाढ़स बाँधिए और साहस कीजिए। मत डरिए, और निराश न हो जाइए। आगे बढ़िए और चलते रहिए। आख़िरकार आपके लिए आशा है। यत्न कीजिए। परिश्रम कीजिए। खोजिए। माँगिए। खटखटाइए। पीछे चलते रहिए। आप अवश्य देखेंगे कि आप परमेश्वर के पुत्र हैं।
III. अन्त में मैं आपको सच्चे मसीही के परमेश्वर के साथ सम्बन्ध के विशेषाधिकार दिखाता हूँ।
परमेश्वर की सन्तानों की आशाओं से बढ़कर महिमामय कुछ भी कल्पना नहीं किया जा सकता। इस पुस्तिका के शीर्ष पर जो पवित्रशास्त्र के वचन हैं, उनमें अच्छी और सांत्वना देनेवाली बातों की एक समृद्ध खान है। पौलुस कहता है, "यदि हम सन्तान हैं, तो वारिस भी, बरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, कि जब हम उसके साथ दुख उठाएँ तो उसके साथ महिमा भी पाएँ।" (रोमियों 8:17।)
तो सच्चे मसीही "वारिस" हैं—उन सब के लिये कुछ तैयार किया गया है जो अभी प्रकट होना है।
वे "परमेश्वर के वारिस" हैं। पृथ्वी के धनवानों का वारिस होना भी कुछ बात है। तब राजाओं के राजा का पुत्र और वारिस होना कितनी बड़ी बात है!
वे "मसीह के संगी वारिस" हैं। वे उसके प्रताप में भागी होंगे और उसकी महिमा में सहभागी होंगे। वे उसके साथ महिमा पाएँगे।
और स्मरण रखिए, यह सब 'सन्तानों' के लिये है। अब्राहम ने अपनी सब सन्तानों के लिये प्रबन्ध करने का ध्यान रखा—और परमेश्वर अपनी सन्तानों के लिये प्रबन्ध करने का ध्यान रखता है। उनमें से कोई भी वंचित नहीं किया गया है। कोई भी निकाला नहीं जाएगा। कोई भी काटा नहीं जाएगा। हर एक अपने भाग में खड़ा होगा, और उस दिन उसका हिस्सा होगा जब प्रभु बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाएगा।
पाठक, ज्योति में सन्तों की मीरास का पूरा स्वरूप कौन बता सकता है? उस महिमा का वर्णन कौन कर सकता है जो परमेश्वर की सन्तानों पर अभी प्रकट होनी और उन्हें दी जानी है? शब्द कम पड़ जाते हैं। भाषा अधूरी रह जाती है। मन पूरी तरह कल्पना नहीं कर सकता, और जीभ सिद्धता से कह नहीं सकती—उन बातों को जो सर्वशक्तिमान प्रभु के बेटे-बेटियों पर आनेवाली महिमा में समाई हैं। ओह, प्रेरित यूहन्ना का यह वचन सचमुच सत्य है! "अब तक यह प्रगट नहीं हुआ कि हम क्या कुछ होंगे।" (1 यूहन्ना 3:2।)
स्वयं बाइबल भी इस विषय पर पड़े परदे को केवल थोड़ा ही उठाती है। इससे अधिक वह कर भी कैसे सकती थी? यदि और बताया जाता तो भी हम उसे पूरी रीति से नहीं समझ सकते थे। हमारी प्रकृति अभी बहुत सांसारिक है—हमारी समझ अभी बहुत शारीरिक है कि उससे अधिक को ग्रहण कर सके। बाइबल सामान्यतः इस विषय को 'निषेध के शब्दों में' बताती है, सीधे कथनों में नहीं। वह बताती है कि उस महिमामय मीरास में क्या न होगा, ताकि इस प्रकार हमें कुछ धुँधला विचार मिल सके कि वहाँ क्या होगा। वह कुछ बातों की अनुपस्थिति का चित्र खींचती है, ताकि हम वर्तमान बातों की धन्यता का थोड़ा सा रस पी सकें। वह हमें बताती है कि मीरास अविनाशी, निर्मल और अजर है। वह बताती है कि महिमा का मुकुट कभी मुरझाता नहीं। वह बताती है कि शैतान बाँधा जाएगा, फिर रात न होगी, और फिर शाप न होगा, मृत्यु आग की झील में डाल दी जाएगी, सब आँसू पोंछ दिए जाएँगे, और वहाँ का निवासी फिर न कहेगा, "मैं रोगी हूँ।" और ये सचमुच महिमामय बातें हैं! कोई भ्रष्टता नहीं! कोई मुरझाना नहीं! कोई कुम्हलाना नहीं! कोई शैतान नहीं! पाप का कोई शाप नहीं! कोई शोक नहीं! कोई आँसू नहीं! कोई रोग नहीं! कोई मृत्यु नहीं! निश्चय ही परमेश्वर की सन्तानों का कटोरा उमड़ता रहेगा!
परन्तु पाठक, परमेश्वर के वारिसों पर आनेवाली महिमा के विषय में हमें 'सीधी बातें' भी बताई गई हैं, जिन्हें छिपाकर नहीं रखना चाहिए। उनकी भावी मीरास में बहुत सी मधुर, सुखद और अवर्णनीय सांत्वनाएँ हैं, जिन पर सब सच्चे मसीहियों को विचार करना भला होगा। पवित्रशास्त्र के बहुत से वचनों और अभिव्यक्तियों में थके हुए यात्रियों के लिये बल देनेवाली औषधियाँ हैं, जिन्हें आपको और मुझे आवश्यकता के समय के लिये सँजो रखना चाहिए।
क्या ज्ञान हमें अभी मधुर लगता है? क्या परमेश्वर, मसीह और बाइबल के विषय में जो थोड़ा हम जानते हैं वह हमारी आत्माओं के लिये अनमोल है, और क्या हम और अधिक के लिये तरसते हैं? महिमा में वह हमें पूर्णता से मिलेगा। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "तब मैं वैसा पूरा-पूरा जानूँगा जैसा मैं जाना गया हूँ।" (1 कुरिन्थियों 13:12।) परमेश्वर का धन्यवाद हो, विश्वासियों के बीच फिर कोई मतभेद न रहेगा! एपिस्कोपल और प्रेस्बिटेरियन—कैल्विनवादी और आर्मीनियनवादी—सहस्राब्दिवादी और सहस्राब्दि-विरोधी—स्थापित कलीसिया के मित्र और स्वैच्छिक प्रणाली के मित्र—शिशु बपतिस्मा के समर्थक और वयस्क बपतिस्मा के समर्थक—सब अन्ततः आँख से आँख मिलाकर देखेंगे। पहले की अज्ञानता जाती रहेगी। हम यह देखकर चकित होंगे कि हम कितने बचकाने और अन्धे थे।
क्या पवित्रता हमें अभी मधुर लगती है? क्या पाप हमारे जीवन का बोझ और कड़वाहट है? क्या हम परमेश्वर के स्वरूप के पूर्ण अनुरूप होने के लिये तरसते हैं? महिमा में वह हमें पूर्णता से मिलेगी। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? मसीह ने कलीसिया के लिये अपने आप को दे दिया, "कि उसे एक ऐसी तेजवन्त कलीसिया बनाकर अपने पास खड़ी करे, जिस में न दाग, न झुर्री, न कोई ऐसी बात हो।" (इफिसियों 5:27।) ओह, पाप को सदा के लिये अलविदा कहने की धन्यता! ओह, हम में से सर्वोत्तम भी अभी कितना थोड़ा करता है! ओह, कैसी अवर्णनीय भ्रष्टता हमारे सब उद्देश्यों, सब विचारों, सब शब्दों, सब कामों से तारकोल की तरह चिपकी है! ओह, हम में से कितने नप्ताली की तरह वचनों में तो सुन्दर हैं—परन्तु रूबेन की तरह कर्मों में अस्थिर हैं! परमेश्वर का धन्यवाद हो, यह सब बदल जाएगा!
क्या विश्राम हमें अभी मधुर लगता है? क्या हम पीछा करते हुए भी प्रायः थका हुआ अनुभव करते हैं? क्या हम ऐसे संसार के लिये तरसते हैं जहाँ हमें सदा चौकसी और युद्ध न करना पड़े? महिमा में वह हमें पूर्णता से मिलेगा। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "परमेश्वर के लोगों के लिये सब्त का विश्राम बाकी है।" (इब्रानियों 4:9।) संसार, शरीर और शैतान के साथ प्रतिदिन, प्रतिघण्टे का संघर्ष अन्ततः समाप्त हो जाएगा। शत्रु बाँधा जाएगा। युद्ध समाप्त हो जाएगा। दुष्ट अन्ततः सताना छोड़ देंगे। थके हुए अन्ततः विश्राम पाएँगे। एक बड़ी शान्ति होगी।
क्या सेवा हमें अभी मधुर लगती है? क्या मसीह के लिये काम करना हमें प्रिय लगता है, फिर भी दुर्बल देह के बोझ से हम कराहते हैं? क्या हमारी आत्मा प्रायः तैयार तो है—परन्तु दुर्बल शरीर से बँधी और रुकी हुई है? क्या जब हमें मसीह के नाम से एक कटोरा ठण्डा पानी देने का अवसर मिला तो हमारे हृदय भीतर ही भीतर जल उठे, और क्या हमने यह सोचकर आह भरी कि हम कैसे निकम्मे दास हैं? आइए हम सांत्वना पाएँ। हम महिमा में बिना थकावट के पूर्ण रीति से सेवा कर सकेंगे। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "वे रात-दिन उसके मन्दिर में उसकी सेवा करते हैं।" (प्रकाशितवाक्य 7:15।)
क्या अब तृप्ति हमें सुखद लगती है? क्या हम संसार को खोखला पाते हैं? क्या हम अपने हृदय के हर खाली स्थान और हर दरार के भर जाने की लालसा करते हैं? महिमा में हम इसे पूर्णता से पाएँगे। तब हमें अपने सब मिट्टी के बर्तनों की दरारों पर, अपने सब गुलाबों के काँटों पर, और अपने सब मीठे प्यालों की कड़वी तलछट पर शोक नहीं करना पड़ेगा। तब हम योना के समान मुरझाए हुए कद्दू की बेल पर विलाप नहीं करेंगे। तब हम सुलैमान के समान यह नहीं कहेंगे, "सब कुछ व्यर्थ और मन का कुढ़ना है।" तब हम बूढ़े दाऊद के समान यह नहीं पुकारेंगे, "मैं ने देखा है कि सब पूर्णता की सीमा होती है।" पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "मैं तो जब जागूँगा तब तेरे स्वरूप से सन्तुष्ट हूँगा।" (भजन संहिता 17:15।)
क्या अब पवित्र लोगों की सहभागिता हमें सुखद लगती है? क्या हम अनुभव करते हैं कि हम कभी इतने प्रसन्न नहीं होते जितने तब, जब हम पृथ्वी के उत्तम लोगों के साथ होते हैं? क्या हम उनकी संगति में जैसे अपने घर में होते हैं? महिमा में हम इसे पूर्णता से पाएँगे। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे सब ठोकर के कारणों को और कुकर्म करनेवालों को उसके राज्य में से इकट्ठा करेंगे।" "वह तुरही के बड़े शब्द के साथ अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके चुने हुओं को चारों दिशाओं से इकट्ठा करेंगे।" (मत्ती 13:41; 24:31।) परमेश्वर का धन्यवाद हो! हम उन सब पवित्र लोगों को देखेंगे जिनके विषय में हमने बाइबल में पढ़ा है, और जिनके पदचिह्नों पर चलने का हमने प्रयत्न किया है। हम प्रेरितों, भविष्यद्वक्ताओं, कुलपतियों, शहीदों, धर्म-सुधारकों, मिशनरियों और सेवकों को देखेंगे, जिनके योग्य यह संसार न था। हम उनके मुख देखेंगे जिन्हें हमने पृथ्वी पर मसीह में जाना और प्रेम किया, और जिनके चले जाने पर हमने कड़वे आँसू बहाए। हम उन्हें पहले से कहीं अधिक उज्ज्वल और महिमामय देखेंगे। और सबसे उत्तम यह कि हम उन्हें बिना हड़बड़ी और चिन्ता के देखेंगे, और यह अनुभव किए बिना कि हम केवल फिर बिछड़ने के लिए मिल रहे हैं। महिमा में न मृत्यु है, न बिछोह, न विदा!
क्या अब मसीह की सहभागिता हमें सुखद लगती है? क्या हम उसके नाम को अपने लिए अनमोल पाते हैं? क्या उसके मरते हुए प्रेम का विचार करके हमारे हृदय हमारे भीतर जल उठते हैं? महिमा में हम उसके साथ पूर्ण सहभागिता पाएँगे। "हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।" (1 थिस्सलुनीकियों 4:17।) हम उसके साथ परादीस में होंगे। हम राज्य में उसका मुख देखेंगे। हमारी ये आँखें उन हाथों और पाँवों को निहारेंगी जो कीलों से छेदे गए थे, और उस सिर को जिस पर काँटों का मुकुट पहनाया गया था। जहाँ वह है, वहाँ परमेश्वर के पुत्र होंगे। जब वह आएगा, तो वे उसके साथ आएँगे। जब वह अपनी महिमा में विराजमान होगा, तो वे उसकी बगल में बैठेंगे। सचमुच कैसी धन्य आशा है!
मैं एक मरते हुए संसार में एक मरता हुआ मनुष्य हूँ! मेरे आगे सब कुछ अन्धकारमय है! आनेवाला संसार एक अनजाना बन्दरगाह है! परन्तु मसीह वहाँ है, और यही पर्याप्त है। निश्चय ही यदि पृथ्वी पर विश्वास से उसके पीछे चलने में विश्राम और शान्ति है, तो जब हम उसे आमने-सामने देखेंगे तब कहीं अधिक विश्राम और शान्ति होगी। यदि हमने जंगल में बादल और आग के खम्भे के पीछे चलना अच्छा पाया है, तो प्रतिज्ञा की हुई भूमि में अपने यहोशू के साथ अपने अनन्त भाग में बैठना हम हज़ार गुना अधिक अच्छा पाएँगे।
हे पाठक, यदि तू अभी पुत्रों और वारिसों में नहीं है, तो मुझे अपने सारे हृदय से तुझ पर तरस आता है। तू कितना कुछ खो रहा है! तू कितना कम सच्चा सुख भोग रहा है! तू वहाँ संघर्ष करता जा रहा है, आग में परिश्रम कर रहा है, और केवल सांसारिक उद्देश्यों के लिए अपने आप को थका रहा है—विश्राम ढूँढ़ता है, पर पाता नहीं—छायाओं का पीछा करता है, पर उन्हें कभी पकड़ नहीं पाता—सोचता है कि मैं सुखी क्यों नहीं हूँ, फिर भी कारण देखने से इनकार करता है—भूखा और प्यासा और खाली है, फिर भी अपनी पहुँच के भीतर की भरपूरी के प्रति अन्धा है। काश कि तू बुद्धिमान होता! काश कि तू यीशु की वाणी सुनता और उससे सीखता!
हे पाठक, यदि तू उनमें से है जो पुत्र और वारिस हैं, तो तू आनन्दित और प्रसन्न होने का अधिकारी है। तू "पिलग्रिम्स प्रोग्रेस" के बालक धीरज के समान प्रतीक्षा कर सकता है। तेरी सर्वोत्तम वस्तुएँ अभी आनेवाली हैं। तू बिना कुड़कुड़ाए क्रूस उठा सकता है। तेरा हल्का सा क्लेश तो क्षण भर का है। इस वर्तमान समय के दुःख उस महिमा के सामने कुछ भी नहीं हैं जो हम पर प्रगट होनेवाली है। जब मसीह जो हमारा जीवन है प्रगट होगा, तब तू भी उसके साथ महिमा में प्रगट होगा। तुझे अपराधी और उसकी समृद्धि से डाह करने की आवश्यकता नहीं। सचमुच धनवान तो तू है! मेरी अपनी पल्ली के एक मरते हुए विश्वासी ने ठीक कहा था, "मैं अपने सारे जीवन में कभी इतना धनी नहीं रहा जितना अब हूँ।" जब दाऊद यरूशलेम लौटा, तब तू मपीबोशेत की आत्मा में कह सकता है, "संसार सब कुछ ले ले, मेरा राजा कुशल से फिर आ रहा है।" तू वैसा ही कह सकता है जैसा सिकन्दर ने तब कहा जब उसने अपना सारा धन बाँट दिया और उससे पूछा गया कि अपने लिए क्या रखा, "मेरे पास आशा है।"
तुझे रोग से निराश होने की आवश्यकता नहीं। तेरे शरीर के साथ चाहे जो हो, तेरा अनन्त भाग सुरक्षित है और उसका प्रबन्ध हो चुका है। तू मृत्यु को शान्ति से देख सकता है। वह तेरे और तेरे भाग के बीच एक द्वार खोल देती है।
तू केवल संसार की वस्तुओं पर—बिछोहों और वियोगों पर—हानियों और क्रूसों पर—शोक करने का अधिकारी नहीं है। इकट्ठा होने का दिन तेरे आगे है। तेरा धन हानि की पहुँच से परे है। स्वर्ग प्रतिवर्ष तेरे प्रियजनों से अधिक भरता जा रहा है, और पृथ्वी अधिक खाली होती जा रही है। अपने भाग पर गर्व कर। यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो यह सब तेरा है। "यदि हम सन्तान हैं, तो वारिस भी हैं।"
और अब, हे पाठक, इस विषय को समाप्त करते हुए मुझे तुझसे पूछने दे, तू किसकी सन्तान है? क्या तू स्वभाव की सन्तान है, या अनुग्रह की सन्तान? क्या तू शैतान की सन्तान है, या परमेश्वर की सन्तान? तू एक साथ दोनों नहीं हो सकता। तू कौन है?
हे पाठक, इस प्रश्न को सुलझा ले, क्योंकि अन्त में तुझे इन्हीं दोनों में से एक होकर मरना है। इसे सुलझा ले, हे पाठक, क्योंकि यह सुलझाया जा सकता है, और इसे सन्देह में छोड़ना मूर्खता है। इसे सुलझा ले, क्योंकि समय थोड़ा है, और संसार बूढ़ा होता जा रहा है, और तू तेज़ी से मसीह के न्याय-आसन के निकट पहुँच रहा है। इसे सुलझा ले, क्योंकि मृत्यु निकट है, प्रभु निकट है; और कौन जानता है कि एक दिन क्या लेकर आएगा? काश कि तू तब तक चैन न ले जब तक यह प्रश्न सुलझ न जाए! काश कि तू तब तक सन्तुष्ट न हो जब तक तू यह न कह सके, "मैं नया जन्म पा चुका हूँ। मैं परमेश्वर का पुत्र हूँ।"
पाठक, यदि तू परमेश्वर का पुत्र और वारिस नहीं है, तो मैं तुझसे विनती करता हूँ कि बिना देर किए एक बन जा। क्या तू धनी होना चाहता है? मसीह में अगम्य धन है। क्या तू प्रतिष्ठित होना चाहता है? तू राजा ठहरेगा। क्या तू सुखी होना चाहता है? तुझे ऐसी शान्ति मिलेगी जो समझ से परे है, जिसे संसार कभी दे नहीं सकता और कभी छीन नहीं सकता। अहा, निकल आ, और क्रूस उठा, और मसीह के पीछे हो ले! विचारहीन और संसारी लोगों के बीच से निकल आ, और प्रभु का यह वचन सुन—"मैं तुम्हें ग्रहण करूँगा, और तुम्हारा पिता हूँगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियाँ होगे, सर्वशक्तिमान प्रभु यह कहता है।" (2 कुरिन्थियों 6:18।)
पाठक, यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो मैं तुझसे आग्रह करता हूँ कि अपने पिता के घर के योग्य चाल चल। मैं तुझे गम्भीरता से आदेश देता हूँ कि अपने जीवन में उसका आदर कर—और सबसे बढ़कर उसकी सब आज्ञाओं के पूर्ण पालन और उसकी सब सन्तानों से हार्दिक प्रेम के द्वारा उसका आदर कर। संसार में परमेश्वर की सन्तान और महिमा के वारिस के समान चलने का यत्न कर। लोग तुझमें और तेरे जन्म देनेवाले में पारिवारिक समानता पहचान सकें। स्वर्गीय जीवन जी। ऊपर की वस्तुओं की खोज में रह। ऐसा न दिखे कि तू यहाँ नीचे अपना घोंसला बना रहा है। उस मनुष्य के समान व्यवहार कर जो आँखों से ओझल एक नगर की खोज में है, जिसकी नागरिकता स्वर्ग में है, और जो घर पहुँचने तक अनेक कठिनाइयों में सन्तुष्ट रहने को तैयार है।
जिस भी दशा में तुझे रखा जाए, उसमें परमेश्वर के पुत्र के समान अनुभव करने का यत्न कर। कभी न भूल कि जब तक तू पृथ्वी पर है, तू अपने पिता की भूमि पर है। कभी न भूल कि तेरी सारी दयाएँ और सारे क्रूस पिता के हाथ से ही आते हैं। अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दे। उसमें आनन्दित और प्रसन्न रह। यदि तू राजा का पुत्र है तो फिर तू उदास क्यों रहे? लोग तुझे देखकर यह सन्देह क्यों करें कि परमेश्वर की सन्तान होना सुखद बात है या नहीं?
दूसरों के प्रति परमेश्वर के पुत्र के समान व्यवहार करने का यत्न कर। अपनी पीढ़ी में निर्दोष और अहानिकर बन। अपने सब जान-पहचान के लोगों के बीच मेल करानेवाला बन। अपने बच्चों के लिए सबसे बढ़कर परमेश्वर का पुत्र होना खोज। उनके लिए स्वर्ग में मीरास खोज, उनके लिए और जो कुछ भी करे। कोई मनुष्य अपने बच्चों के लिए उतना अच्छा प्रबन्ध नहीं छोड़ता जितना वह जो उन्हें परमेश्वर के पुत्र और वारिस बनाकर छोड़ जाता है।
यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने मसीही बुलाहट में दृढ़ रह, और और आगे बढ़ता जा। हर एक बोझ को और उस पाप को जो सहज ही उलझा लेता है, उतार फेंकने में सावधान रह। अपनी आँखें यीशु पर स्थिर रख। उसमें बना रह। स्मरण रख कि उसके बिना तू कुछ नहीं कर सकता, और उसके साथ तू सब कुछ कर सकता है। प्रतिदिन जागता और प्रार्थना करता रह। दृढ़ और अटल रह, और प्रभु के काम में सर्वदा बढ़ता जा। अपने मन में यह ठान ले कि चेले के नाम से दिया गया एक कटोरा ठंडा पानी भी अपना प्रतिफल न खोएगा, और हर वर्ष तू घर के उतना ही निकट होता जाता है।
थोड़ा ही समय और, और जो आनेवाला है वह आएगा, और देर न करेगा। तब परमेश्वर के पुत्रों की महिमामय स्वतंत्रता और पूर्ण प्रकाशन होगा। तब संसार मानेगा कि वे ही सचमुच बुद्धिमान थे। तब परमेश्वर के पुत्र अन्त में वयस्क हो जाएँगे। तब वे आशा में वारिस नहीं रहेंगे—वरन् अधिकार में वारिस होंगे। और तब वे अति आनन्द के साथ ये सांत्वना भरे वचन सुनेंगे, "हे मेरे पिता के धन्य लोगो, आओ, उस राज्य के अधिकारी हो जाओ जो जगत की उत्पत्ति से तुम्हारे लिये तैयार किया हुआ है!" (मत्ती 25:34।) निश्चय ही वह दिन सब कुछ की भरपाई कर देगा!
कि इन पन्नों के सब पढ़नेवाले महिमा की इस मीरास का मूल्य पहचानें, और अन्त में उसके अधिकारी पाए जाएँ—यही मेरे हृदय की अभिलाषा और प्रार्थना है।
क्या तेरा उद्धार होगा?
"हे प्रभु, क्या उद्धार पानेवाले थोड़े ही हैं?" उसने उनसे कहा, "सँकरे द्वार से प्रवेश करने का यत्न करो, क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि बहुत से प्रवेश करना चाहेंगे और न कर सकेंगे।" लूका 13:23-24
"सँकरे फाटक से प्रवेश करो, क्योंकि चौड़ा है वह फाटक और सरल है वह मार्ग जो विनाश को पहुँचाता है, और बहुत से हैं जो उससे प्रवेश करते हैं। क्योंकि सँकरा है वह फाटक और कठिन है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है, और थोड़े ही हैं जो उसे पाते हैं।" मत्ती 7:13-14
मैं मान लेता हूँ कि इस पर्चे का हर पढ़नेवाला अपने आप को मसीही कहता है। तू नहीं चाहेगा कि तुझे ईश्वरवादी या अविश्वासी गिना जाए। तू मानता है कि बाइबल सत्य है। उद्धारकर्ता मसीह का जन्म—उद्धारकर्ता मसीह की मृत्यु—उद्धारकर्ता मसीह के द्वारा किया गया उद्धार का प्रबन्ध, ये सब ऐसे तथ्य हैं जिन पर तूने शायद कभी सन्देह नहीं किया। परन्तु अन्त में क्या ऐसा मसीही धर्म तुझे कुछ लाभ देगा? क्या मरते समय यह तेरी आत्मा का कुछ भला करेगा? एक शब्द में—क्या तेरा उद्धार होगा?
हो सकता है तू अभी जवान, स्वस्थ और बलवान हो। शायद जीवन में तू एक दिन भी बीमार नहीं पड़ा, और कमज़ोरी और पीड़ा का अनुभव कैसा होता है यह मुश्किल से जानता हो। तू आनेवाले वर्षों के लिए योजनाएँ बनाता है, और ऐसा लगता है मानो मृत्यु बहुत दूर और आँखों से ओझल है। फिर भी स्मरण रख, मृत्यु कभी-कभी जवानों को उनके जीवन के फूल खिलते ही काट डालती है। परिवार के बलवान और स्वस्थ लोग सदा सबसे अधिक नहीं जीते। तेरा सूर्य तेरे जीवन के दोपहर तक पहुँचने से पहले ही अस्त हो सकता है। थोड़े ही समय में तू एक सँकरे, चुप घर में पड़ा हो सकता है, और तेरी कब्र पर गुलबहार उग रहे हों! और तब विचार कर—क्या तेरा उद्धार होगा?
हो सकता है तू इस संसार में धनी और समृद्ध हो। तेरे पास धन है, और वह सब कुछ जो धन से मिल सकता है। तेरे पास "मान, प्रेम, आज्ञाकारिता, मित्रों के झुण्ड" हैं। परन्तु स्मरण रख, "धन सदा नहीं ठहरता।" तू उसे कुछ ही वर्षों से अधिक नहीं रख सकता। "मनुष्यों के लिये एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है।" (नीतिवचन 27:24; इब्रानियों 9:27।) और तब विचार कर—क्या तेरा उद्धार होगा?
हो सकता है तू गरीब और अभावग्रस्त हो। तेरे पास अपने और अपने परिवार के लिए भोजन और वस्त्र जुटाने भर को भी मुश्किल से होता है। तू अक्सर उन सुख-सुविधाओं के अभाव से व्याकुल रहता है जिन्हें पाना तेरे बस में नहीं। लाज़र के समान तुझे केवल "बुरी वस्तुएँ" ही मिलती दीखती हैं, अच्छी नहीं। फिर भी तू इस विचार से सान्त्वना पाता है कि इस सब का अन्त होगा। एक आनेवाला संसार है, जहाँ गरीबी और अभाव का नाम भी न होगा। तौभी, एक क्षण विचार कर—क्या तेरा उद्धार होगा?
हो सकता है कि तुम्हारा शरीर दुर्बल और रोगी हो। तुम मुश्किल से जानते हो कि पीड़ा से मुक्त होना क्या होता है। तुमने इतने समय से स्वास्थ्य का साथ छोड़ रखा है कि तुम लगभग भूल ही गए हो कि वह कैसा होता है। तुमने प्रायः भोर को कहा है, "भला होता कि सांझ हो जाती," और सांझ को, "भला होता कि भोर हो जाती।" ऐसे दिन भी आते हैं जब थकावट ही के कारण तुम्हें योना के साथ यह पुकार उठने का प्रलोभन होता है, "मेरे लिये जीवित रहने से मरना ही भला है।" (योना 4:3) परन्तु स्मरण रखो, मृत्यु ही सब कुछ नहीं है। कब्र के उस पार कुछ और भी है! और तब सोचो—क्या तुम्हारा उद्धार होगा?
यदि उद्धार पाना सहज बात होती, तो मैं इस पुस्तक में जैसा लिख रहा हूँ वैसा न लिखता। परन्तु क्या ऐसा है? आओ देखें।
यदि उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में संसार के लोगों की साधारण धारणा सही होती, तो मैं लोगों को खोजनेवाले और कठिन प्रश्नों से कष्ट न देता। परन्तु क्या ऐसा है? आओ देखें।
यदि परमेश्वर ने उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में बाइबल में कभी स्पष्ट रूप से न कहा होता, तो मेरा चुप रहना ही उचित होता। परन्तु क्या ऐसा है? आओ देखें।
यदि अनुभव और तथ्य इस बात को संदिग्ध छोड़ देते कि बहुत लोग उद्धार पाएँगे या थोड़े, तो मैं शान्त रह सकता था। परन्तु क्या ऐसा है? आओ देखें।
हमारे सामने के इस विषय पर विचार करते हुए मैं चार बातों की जाँच करने का प्रस्ताव रखता हूँ।
I. मैं समझाऊँगा कि उद्धार पाना क्या है।
II. मैं उन भूलों को बताऊँगा जो उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में संसार में प्रचलित हैं।
III. मैं दिखाऊँगा कि उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में बाइबल क्या कहती है।
IV. मैं उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में कुछ स्पष्ट तथ्य सामने रखूँगा।
इन चारों बातों की शान्त मन से जाँच, ऐसे समय में जब सच्चे धर्म के प्रति लापरवाही व्यापक रूप से फैली हुई है, हमारे प्राणों के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ठहरेगी।
I. सबसे पहले मैं समझाऊँ कि उद्धार पाना क्या है। यह ऐसी बात है जिसे स्पष्ट कर लेना आवश्यक है। जब तक हम इसे न जान लें, हम कोई उन्नति नहीं करेंगे। "उद्धार पाने" से मेरा आशय कुछ और हो सकता है, और तुम्हारा कुछ और। मैं तुम्हें दिखाता हूँ कि बाइबल के अनुसार "उद्धार पाना" क्या है, तब कोई गलतफहमी नहीं रहेगी। उद्धार पाने का अर्थ केवल इतना नहीं कि हम मसीही होने का दावा करें और अपने को मसीही कहें। हमारे पास मसीही धर्म के सारे बाहरी अंग हो सकते हैं, और फिर भी हम अन्त में खोए हुए निकल सकते हैं। हम मसीह की कलीसिया में बपतिस्मा पा सकते हैं—मसीह की मेज़ पर आ सकते हैं—मसीही ज्ञान रख सकते हैं—मसीही स्त्री-पुरुष गिने जा सकते हैं—और फिर भी जीवन भर मरे हुए प्राण बने रह सकते हैं, और अन्त में न्याय के दिन मसीह के बाएँ हाथ पर बकरियों के बीच पाए जा सकते हैं! नहीं—यह उद्धार नहीं है! उद्धार इससे कहीं ऊँची और गहरी बात है। अब वह क्या है?
(क) उद्धार पाने का अर्थ है इस वर्तमान जीवन में उद्धारकर्ता यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा पाप के दोष से छुड़ाया जाना। इसका अर्थ है मसीह के लहू और मध्यस्थता पर विश्वास के द्वारा क्षमा पाना, धर्मी ठहराया जाना, और पाप के हर आरोप से मुक्त होना। जो कोई मन से प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करता है, वह उद्धार पाया हुआ प्राण है। वह नाश नहीं होगा। उसे अनन्त जीवन मिलेगा। यह उद्धार का पहला भाग है, और शेष सब की जड़ है। परन्तु यह सब कुछ नहीं है।
(ख) उद्धार पाने का अर्थ है इस वर्तमान जीवन में नया जन्म पाकर और पवित्र आत्मा के द्वारा पवित्र किए जाकर पाप की सामर्थ्य से छुड़ाया जाना। इसका अर्थ है पवित्र आत्मा के द्वारा हम में नया स्वभाव डाले जाने से पाप, संसार और शैतान के घृणित अधिकार से मुक्त होना। जो कोई इस प्रकार अपने मन की आत्मा में नया किया गया और मन फिराया हुआ है, वह उद्धार पाया हुआ प्राण है। वह नाश नहीं होगा। वह परमेश्वर के महिमामय राज्य में प्रवेश करेगा। यह उद्धार का दूसरा भाग है। परन्तु यह सब कुछ नहीं है।
(ग) उद्धार पाने का अर्थ है न्याय के दिन पाप के सब भयानक परिणामों से छुड़ाया जाना। इसका अर्थ है मसीह में निर्दोष, निष्कलंक, निर्मल और पूर्ण ठहराया जाना, जबकि दूसरे दोषी पाए जाते हैं और सदा के लिये दण्ड पाते हैं। इसका अर्थ है ये सुखद वचन सुनना, "हे मेरे पिता के धन्य लोगो, आओ!" जबकि दूसरे ये भयानक वचन सुनते हैं, "हे श्रापित लोगो, मेरे सामने से चले जाओ!" (मत्ती 25:34, 41) इसका अर्थ है मसीह के द्वारा अपनाया और स्वीकार किया जाना, उसके प्रिय बच्चों और सेवकों में से एक के रूप में, जबकि दूसरे अस्वीकार किए जाते हैं और सदा के लिये त्याग दिए जाते हैं। इसका अर्थ है दुष्टों के भाग से मुक्त घोषित किया जाना—उस कीड़े से जो कभी नहीं मरता, उस आग से जो कभी नहीं बुझती—उस रोने, विलाप करने और दाँत पीसने से जिसका कभी अन्त नहीं होता। इसका अर्थ है मसीह के दूसरे आगमन के दिन धर्मियों के लिये तैयार किया गया प्रतिफल पाना—महिमामय देह—वह राज्य जो अविनाशी है—वह मुकुट जो कभी मुर्झाता नहीं—और वह आनन्द जो सदा सर्वदा का है। यही पूर्ण उद्धार है। यही वह "छुटकारा" है जिसकी बाट जोहने और लालसा रखने की आज्ञा सच्चे मसीहियों को दी गई है। (लूका 21:28) यही उन सब स्त्री-पुरुषों की विरासत है जो विश्वास करते और नया जन्म पाते हैं। विश्वास के द्वारा वे अभी से उद्धार पा चुके हैं। परमेश्वर की दृष्टि में उनका अन्तिम उद्धार पूर्णतः निश्चित बात है। उनके नाम जीवन की पुस्तक में हैं। स्वर्ग में उनके निवास-स्थान अभी से तैयार हैं। फिर भी छुटकारे और उद्धार की एक ऐसी परिपूर्णता है जिसे वे देह में रहते हुए प्राप्त नहीं करते। वे पाप के दोष और सामर्थ्य से तो बचाए गए हैं—परन्तु उसके विरुद्ध जागते और प्रार्थना करते रहने की आवश्यकता से नहीं। वे संसार के भय और प्रेम से तो बचाए गए हैं—परन्तु प्रतिदिन उससे लड़ते रहने की आवश्यकता से नहीं। वे शैतान की सेवा से तो बचाए गए हैं—परन्तु उसके प्रलोभनों से सताए जाने से नहीं। परन्तु जब मसीह आएगा तब विश्वासियों का उद्धार पूर्ण हो जाएगा। वे उसे अभी कली के रूप में पा चुके हैं। तब वे उसे फूल के रूप में देखेंगे।
उद्धार ऐसा है। यह पाप के दोष, सामर्थ्य और परिणामों से छुड़ाया जाना है। यह अभी विश्वास करना और पवित्र किया जाना है, और अन्तिम दिन परमेश्वर के क्रोध से छुड़ाया जाना है। जिसे इस वर्तमान जीवन में पहला भाग मिला है, उसे आनेवाले जीवन में दूसरा भाग निश्चय ही मिलेगा। इसके दोनों भाग एक साथ जुड़े हुए हैं। जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे कोई मनुष्य अलग करने का साहस न करे। कोई यह स्वप्न न देखे कि यदि वह पहले नया जन्म नहीं पाता तो अन्त में उसका उद्धार होगा। और कोई यह सन्देह न करे कि यदि उसने यहाँ नया जन्म पाया है तो आगे उसका उद्धार निश्चित रूप से होगा।
यह कभी न भूला जाए कि सुसमाचार के सेवक का प्रमुख उद्देश्य आत्माओं के उद्धार को आगे बढ़ाना है। मैं इसे एक निश्चित तथ्य के रूप में कहता हूँ कि जो ऐसा अनुभव नहीं करता, वह सच्चा सेवक नहीं है। किसी मनुष्य के अभिषेक की बात न करो! सब कुछ ठीक-ठीक और नियम के अनुसार हुआ हो सकता है। वह काला कोट पहने हो सकता है, और "आदरणीय" कहलाता हो सकता है। परन्तु यदि आत्माओं का उद्धार उसके हृदय की सबसे बड़ी चिन्ता, उसका प्रधान जुनून और उसका सारा ध्यान खींच लेनेवाला विचार नहीं है, तो वह सुसमाचार का सच्चा सेवक नहीं है; वह मज़दूर है, चरवाहा नहीं। मण्डलियों ने उसे बुलाया होगा, पर पवित्र आत्मा ने उसे नहीं बुलाया। अध्यक्षों ने उसे अभिषिक्त किया होगा, पर मसीह ने नहीं।
लोग क्या समझते हैं कि सेवक किस उद्देश्य से भेजे जाते हैं? क्या केवल इसलिए कि वे कलीसिया के विशेष वस्त्र पहनें, आराधना-विधियाँ पढ़ें और कुछ निश्चित संख्या में उपदेश दें? क्या केवल इसलिए कि वे संस्कार सम्पन्न कराएँ और विवाहों तथा अन्त्येष्टियों का संचालन करें? क्या केवल इसलिए कि वे आराम की आजीविका पाएँ और एक सम्मानित पेशे में रहें? कदापि नहीं! हम इनसे भिन्न उद्देश्यों के लिए भेजे गए हैं। हम इसलिए भेजे गए हैं कि लोगों को अन्धकार से ज्योति की ओर और शैतान के अधिकार से परमेश्वर की ओर फेरें। हम इसलिए भेजे गए हैं कि लोगों को आनेवाले क्रोध से भागने के लिए समझाएँ। हम इसलिए भेजे गए हैं कि लोगों को संसार की सेवा से परमेश्वर की सेवा की ओर खींचें, सोए हुओं को जगाएँ, निश्चिन्तों को झकझोरें, और "हर प्रकार से कितनों का उद्धार कराएँ।" (1 कुरिन्थियों 9:22)
यह न सोचो कि जब हमने नियमित आराधनाएँ स्थापित कर दीं और लोगों को उनमें आने के लिए मना लिया, तब सब कुछ हो गया। यह न सोचो कि जब भरी-पूरी मण्डलियाँ इकट्ठी हो गईं, प्रभु की मेज़ पर भीड़ लग गई और धर्मपल्ली की पाठशाला भर गई, तब सब कुछ हो गया। हम लोगों के बीच पवित्र आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य देखना चाहते हैं: पाप का स्पष्ट बोध, मसीह में जीवित विश्वास, हृदय का निश्चित परिवर्तन, संसार से साफ़ अलगाव, और परमेश्वर के साथ पवित्र चाल-चलन। एक शब्द में, हम आत्माओं का उद्धार होते देखना चाहते हैं! और यदि हम इससे कम किसी बात में सन्तुष्ट हो जाएँ, तो हम मूर्ख और ढोंगी हैं, अन्धे के अगुवे अन्धे हैं।
आख़िरकार धर्म रखने का परम उद्देश्य उद्धार पाना ही है। यही वह बड़ा प्रश्न है जिसे हमें अपने विवेक के साथ सुलझाना है। विचार का विषय यह नहीं है कि हम गिरजाघर जाते हैं या प्रार्थनालय, कुछ विधियों और रीतियों का पालन करते हैं, कुछ दिनों को मानते हैं, और धर्म के कुछ निश्चित कर्त्तव्य पूरे करते हैं। विषय यह है कि अन्त में हमारा "उद्धार" होगा या नहीं। इसके बिना हमारे सारे धार्मिक कार्य थकाऊ परिश्रम और व्यर्थ का श्रम हैं।
कभी नहीं, कभी नहीं, हम उद्धार देनेवाले धर्म से कम किसी बात में सन्तुष्ट न हों। निश्चय ही ऐसे धर्म से सन्तुष्ट रहना बचकानी मूर्खता है जो न जीवन में शान्ति देता है, न मृत्यु में आशा, न आनेवाले संसार में महिमा।
II. अब दूसरे स्थान पर मुझे उन भ्रान्तियों की ओर संकेत करने दीजिए जो संसार में उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में आम हैं।
इस विषय में प्रमाण के लिए मुझे दूर जाने की आवश्यकता नहीं। मैं उन बातों की चर्चा करूँगा जिन्हें हर मनुष्य अपनी आँखों से देख और अपने कानों से सुन सकता है।
मैं यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि इस विषय में एक व्यापक भुलावा फैला हुआ है, और यही भुलावा उन सबसे बड़े संकटों में से एक है जिनके सामने हमारी आत्माएँ खड़ी हैं।
(क) तो जब तक लोग जीवित हैं, तब तक वे दूसरों की आत्मिक दशा के विषय में सामान्यतः क्या सोचते हैं? वे अपने सम्बन्धियों, मित्रों, पड़ोसियों और परिचितों की आत्माओं के विषय में क्या सोचते हैं? आइए देखें कि इस प्रश्न का उत्तर कैसे दिया जा सकता है।
वे जानते हैं कि उनके आसपास के सब लोग मरनेवाले हैं और उनका न्याय होगा। वे जानते हैं कि उनकी आत्माएँ हैं जो खोई भी जा सकती हैं और बचाई भी जा सकती हैं। तो प्रत्यक्ष रूप से वे अपना अन्त कैसा समझते हैं?
क्या वे समझते हैं कि उनके आसपास के लोग नरक के संकट में हैं? ऐसा कुछ भी नहीं दिखता कि वे ऐसा समझते हैं। वे साथ खाते-पीते हैं; साथ हँसते, बातें करते, घूमते और काम करते हैं। वे एक-दूसरे से परमेश्वर और अनन्तकाल के विषय में, स्वर्ग और नरक के विषय में शायद ही कभी या कभी नहीं बोलते। मैं हर उस व्यक्ति से पूछता हूँ जो संसार को जानता है, परमेश्वर की दृष्टि में कहिए, क्या ऐसा ही नहीं है?
क्या वे किसी को दुष्ट या अधर्मी मानने देंगे? उसका जीवन-मार्ग चाहे जैसा हो, वे शायद ही कभी मानेंगे। वह विश्रामदिन को तोड़नेवाला हो सकता है; वह बाइबल की उपेक्षा करनेवाला हो सकता है; उसमें सच्चे धर्म का कोई प्रमाण बिलकुल न हो। उसके मित्र प्रायः आपसे कहेंगे, "कोई बात नहीं! भीतर से उसका हृदय अच्छा है, वह कोई घोर दुष्ट मनुष्य नहीं है।"
मैं हर उस व्यक्ति से पूछता हूँ जो संसार को जानता है, परमेश्वर की दृष्टि में कहिए, क्या ऐसा ही नहीं है? और इस सबसे क्या सिद्ध होता है? यह सिद्ध होता है कि लोग अपने आपको यह कहकर बहलाते हैं कि स्वर्ग पहुँचना कोई बहुत कठिन बात नहीं है। यह स्पष्ट सिद्ध करता है कि लोगों की राय में अधिकांश लोगों का उद्धार हो जाएगा।
(ख) परन्तु मरने के बाद दूसरों की आत्मिक दशा के विषय में लोग सामान्यतः क्या सोचते हैं? आइए देखें कि इस प्रश्न का उत्तर कैसे दिया जा सकता है।
यदि वे नास्तिक नहीं हैं तो लोग मानते हैं कि जो मरते हैं वे सब या तो सुख के स्थान में गए हैं या दुःख के स्थान में। और इन दोनों स्थानों में से वे किसे समझते हैं कि इस संसार को छोड़ने पर अधिकांश लोग वहाँ जाते हैं?
मैं बिना किसी खण्डन के भय के कहता हूँ कि इस संसार से विदा हो चुके सब लोगों की दशा के विषय में अच्छा-अच्छा बोलने का एक खेदजनक रूप से सामान्य चलन है। प्रत्यक्षतः इससे बहुत अन्तर नहीं पड़ता कि मनुष्य जीवित रहते कैसा व्यवहार करता रहा। हो सकता है उसने मन फिराव या मसीह में विश्वास का कोई चिह्न न दिखाया हो; वह सुसमाचार में बताई गई उद्धार की योजना से अनजान रहा हो; उसने मन-परिवर्तन या पवित्रीकरण का कोई प्रमाण न दिया हो; वह बिना आत्मा के किसी प्राणी की नाईं जिया और मरा हो। फिर भी जैसे ही यह मनुष्य मरता है, लोग यह कहने का साहस करते हैं कि वह "शायद अपने जीवन के किसी भी समय से अधिक सुखी है।" वे बड़े सन्तोष से आपको बताएँगे कि "वह एक बेहतर संसार में चला गया है।" वे गम्भीरता से सिर हिलाकर कहेंगे कि उन्हें "आशा है वह स्वर्ग में है।" वे बिना भय और काँपे उसके पीछे क़ब्र तक जाएँगे, और बाद में उसकी मृत्यु को "उसके लिए एक धन्य परिवर्तन" कहेंगे। हो सकता है उसके जीवित रहते उन्हें वह पसन्द न रहा हो और वे उसे बुरा मनुष्य समझते रहे हों; पर उसके मरते ही वे अपनी राय पलट देते हैं और कहते हैं कि उन्हें भरोसा है वह स्वर्ग चला गया है! मैं किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं चाहता। मैं तो केवल उससे पूछता हूँ जो संसार को जानता है, क्या यह सच नहीं है?
और इस सबसे क्या प्रमाणित होता है? बस इतना कि यह एक और भयानक प्रमाण है कि लोग यह मानने पर अड़े हुए हैं कि स्वर्ग पहुँचना सरल काम है। लोग यही चाहते हैं कि अधिकांश लोग उद्धार पाएँगे।
(ग) परन्तु फिर, जो सेवक नए नियम के सिद्धान्तों का पूरा प्रचार करते हैं, उनके विषय में लोग सामान्यतः क्या सोचते हैं? आइए देखें कि इस प्रश्न का उत्तर कैसे दिया जा सकता है।
किसी पल्ली में एक ऐसा पादरी भेजिए जो "परमेश्वर की सारी मनसा" बताए, और "कोई लाभदायक बात बिना बताए न छोड़े।" वह ऐसा हो जो विश्वास से धर्मी ठहराए जाने, आत्मा के द्वारा नया जन्म पाने, और जीवन की पवित्रता को स्पष्ट रीति से घोषित करे। वह ऐसा हो जो मन फिराए हुए और मन न फिराए हुए लोगों के बीच स्पष्ट रेखा खींचे, और पापियों तथा सन्तों दोनों को उनका-उनका भाग दे। वह बार-बार नए नियम से सच्चे मसीही के चरित्र का ऐसा सीधा और अकाट्य वर्णन प्रस्तुत करे। वह दिखाए कि जिस मनुष्य में वह चरित्र नहीं है, उसे उद्धार पाने की कोई उचित आशा नहीं हो सकती। वह उस वर्णन को निरन्तर अपने श्रोताओं के विवेक पर दबाए, और बार-बार उन्हें समझाए कि जो कोई आत्मा उस चरित्र के बिना मरेगी वह खो जाएगी। वह यह सब योग्यता और स्नेह के साथ करे, और अन्त में परिणाम क्या होगा?
परिणाम यह होगा कि जहाँ कुछ थोड़े लोग मन फिराकर उद्धार पाएँगे, वहाँ उसके अधिकांश श्रोता उसके सिद्धान्त को ग्रहण नहीं करेंगे और न उस पर विश्वास करेंगे। हो सकता है वे खुलकर उसका विरोध न करें। वे उसका आदर भी करें, और उसे एक गम्भीर, सच्चा, दयालु मनुष्य मानें जिसकी नीयत अच्छी है। परन्तु वे इससे आगे नहीं बढ़ेंगे। वह उन्हें मसीह और उसके प्रेरितों के स्पष्ट वचन दिखाए; वह पद पर पद और अंश पर अंश उद्धृत करे—सब व्यर्थ होगा। उसके अधिकांश श्रोता उसे "बहुत कठोर," "बहुत सख्त" और "बहुत नुक्ताचीन" समझेंगे। वे आपस में कहेंगे कि संसार उतना बुरा नहीं है जितना सेवक सोचता है—और लोग उतने भले नहीं हो सकते जितना सेवक चाहता है—और अन्त में हमें आशा है कि सब ठीक ही रहेगा! मैं सुसमाचार के किसी भी सेवक से, जो कुछ समय से सेवकाई में है, पूछता हूँ कि क्या मैं सच नहीं कह रहा? क्या बातें ऐसी ही नहीं हैं?
और इससे क्या प्रमाणित होता है? बस यह एक और प्रमाण है कि लोग सामान्यतः यह सोचने पर अड़े हैं कि उद्धार कोई बहुत कठिन काम नहीं है, और अन्त में अधिकांश लोग उद्धार पाएँगे।
अब इन सामान्य मतों के लिए लोग हमें कौन-सा ठोस कारण दिखा सकते हैं? वे किस पवित्रशास्त्र के आधार पर यह धारणा बनाते हैं कि उद्धार सरल काम है और अधिकांश लोग उद्धार पाएँगे?
परमेश्वर का कौन-सा प्रकाशन वे हमें दिखा सकते हैं, जिससे हमें सन्तोष हो कि ये मत खरे और सत्य हैं?
उनके पास कुछ नहीं है—सचमुच कुछ भी नहीं। उनके पास पवित्रशास्त्र का एक भी पद नहीं जो ठीक-ठीक समझे जाने पर उनके विचारों का समर्थन करे। उनके पास एक भी ऐसा तर्क नहीं जो जाँच में टिक सके। वे एक-दूसरे की आत्मिक दशा के विषय में मीठी-मीठी बातें इसलिए कहते हैं कि वे यह मानना नहीं चाहते कि खतरा है। वे एक-दूसरे को निश्चिन्त और आत्म-सन्तुष्ट अवस्था में इसलिए पहुँचाते हैं कि अपने विवेक को सुला दें और सब कुछ सुखद बना रहे। वे एक-दूसरे की कब्रों पर "शान्ति, शान्ति" पुकारते हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि ऐसा ही हो, और स्वयं को मनाना चाहते हैं कि ऐसा ही है। निश्चय ही ऐसे खोखले और बिना नींव के मतों के विरुद्ध सुसमाचार का सेवक भली-भाँति विरोध कर सकता है।
सीधा सत्य यह है कि धर्म के विषयों में संसार की राय का कोई मोल नहीं। बैल, घोड़े या खेत के मोल के विषय में, मजदूरी के मूल्य के विषय में, मजदूरी और काम के विषय में, पैसे, कपास, कोयले, लोहे और अनाज के विषय में, कला, विज्ञान और व्यापार के विषय में, रेलों, वाणिज्य, व्यवसाय और राजनीति के विषय में—इन सब बातों में संसार के लोग ठीक राय दे सकते हैं। परन्तु यदि हम जीवन से प्रेम रखते हैं, तो उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली बातों में मनुष्य के निर्णय के पीछे चलने से हमें सावधान रहना चाहिए। "शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उसकी दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं।" (1 कुरिन्थियों 2:14।)
सबसे बढ़कर यह स्मरण रखें कि यदि हम स्वर्ग पहुँचना चाहते हैं तो दूसरों के समान सोचने से कभी काम नहीं चलेगा। निःसन्देह धार्मिक विषयों में "भीड़ के साथ चलना" सरल है। धारा और बहाव के साथ तैरने से हमारा बहुत परिश्रम बचेगा। हम बहुत उपहास से बचेंगे, बहुत अप्रियता से छूटेंगे। परन्तु एक बार सदा के लिए स्मरण रखें कि उद्धार के विषय में संसार की भूलें बहुत और खतरनाक हैं। यदि हम उनके विरुद्ध सावधान न रहें तो हम कभी उद्धार नहीं पाएँगे।
III. अब तीसरे स्थान पर मैं दिखाऊँगा कि उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में बाइबल क्या कहती है।
सत्य और भ्रम की केवल एक ही कसौटी है जिसकी ओर हमें देखना चाहिए। वह कसौटी पवित्रशास्त्र है। जो कुछ वहाँ लिखा है उसे हमें ग्रहण करना और उस पर विश्वास करना चाहिए; और जो पवित्रशास्त्र से प्रमाणित नहीं किया जा सकता, उसे हमें अस्वीकार कर देना चाहिए।
क्या इस लेख का कोई पाठक इससे सहमत हो सकता है? यदि वह सहमत नहीं हो सकता, तो मेरे किसी भी शब्द से उसके प्रभावित होने की आशा कम ही है। यदि वह सहमत हो सकता है, तो वह कुछ क्षण मेरी ओर ध्यान दे, और मैं उसे कुछ गम्भीर बातें बताऊँगा।
तो आइए, एक बात के लिए, पवित्रशास्त्र के केवल एक ही पद को देखें और उसकी भली-भाँति जाँच करें। वह हमें मत्ती 7:13, 14 में मिलेगा। "सकेत फाटक से प्रवेश करो, क्योंकि चौड़ा है वह फाटक और चाकल है वह मार्ग जो विनाश को पहुँचाता है, और बहुतेरे हैं जो उस से प्रवेश करते हैं। क्योंकि सकेत है वह फाटक और सँकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है, और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं।" अब ये हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचन हैं। ये उसी के वचन हैं जो सचमुच परमेश्वर था, और जिसके वचन कभी टलेंगे नहीं। ये उसी के वचन हैं जो जानता था कि मनुष्य के मन में क्या है — जो आनेवाली और बीती हुई बातों को जानता था — जो जानता था कि अन्तिम दिन वह सब लोगों का न्याय करेगा। और इन वचनों का अर्थ क्या है? क्या ये ऐसे वचन हैं जिन्हें इब्रानी या यूनानी भाषा के ज्ञान के बिना कोई समझ नहीं सकता? नहीं — ऐसा नहीं है! क्या ये किसी अन्धकारमय, अपूर्ण भविष्यद्वाणी के समान हैं, जैसे प्रकाशितवाक्य के दर्शन, या यहेजकेल के मन्दिर का वर्णन? नहीं — ऐसा नहीं है! क्या ये कोई गूढ़ रहस्यमय कथन हैं जिनकी थाह कोई मानवीय बुद्धि न ले सके? नहीं — ऐसा नहीं है! ये वचन स्पष्ट, सीधे और असंदिग्ध हैं। किसी भी पढ़ना-लिखना जाननेवाले मज़दूर से पूछ लीजिए, वह भी यही कहेगा। इनका केवल एक ही अर्थ हो सकता है। इनका अर्थ यह है कि बहुत से लोग खो जाएँगे — और थोड़े ही उद्धार पाएँगे।
फिर, दूसरे स्थान पर, आइए हम धर्म के विषय में सम्पूर्ण मानव-इतिहास को देखें, जैसा वह बाइबल में दिया गया है। आइए हम उन सारे चार हज़ार वर्षों पर दृष्टि डालें जिन तक बाइबल का इतिहास फैला है। यदि हम कर सकें तो ऐसा कोई एक समय खोजें जब भक्त लोग बहुत थे और अभक्त लोग थोड़े।
नूह के दिनों में कैसा था? हमें स्पष्ट बताया गया है कि पृथ्वी "उपद्रव से भर गई थी।" मनुष्य के मन के विचार "निरन्तर बुरे ही होते थे।" (उत्पत्ति 6:5, 12।) "सब प्राणियों ने अपनी चाल बिगाड़ ली थी।" अदन की वाटिका का खोना भुला दिया गया था। नूह के मुँह से दी गई परमेश्वर की चेतावनियों का तिरस्कार किया गया। और अन्त में, जब जल-प्रलय संसार पर आया और हर जीवित प्राणी को डुबो दिया, तब केवल आठ प्राणी ही ऐसे थे जिनमें इतना विश्वास था कि शरण के लिये जहाज़ की ओर भागें! तो क्या उन दिनों बहुत लोगों का उद्धार हुआ? बाइबल का कोई भी निष्कपट पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तर क्या होना चाहिए।
अब्राहम, इसहाक और लूत के दिनों में कैसा था? यह प्रत्यक्ष है कि धर्म के विषय में वे बहुत कुछ अकेले ही खड़े थे। जिस परिवार में से वे बुलाए गए थे वह मूर्तिपूजकों का परिवार था। जिन जातियों के बीच वे रहते थे वे घोर अन्धकार और पाप में डूबी हुई थीं। जब सदोम और अमोरा जलाए गए तब उस तराई के चारों नगरों में पाँच धर्मी जन भी नहीं मिले। जब अब्राहम और इसहाक ने अपने पुत्रों के लिये पत्नियाँ ढूँढ़नी चाहीं, तब जिस देश में वे परदेशी होकर रहते थे उसमें कोई ऐसी स्त्री नहीं थी जिसके साथ वे उनका विवाह देखना चाहते। तो क्या उन दिनों बहुत लोगों का उद्धार हुआ? बाइबल का कोई भी निष्कपट पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तर क्या होना चाहिए।
न्यायियों के दिनों में इस्राएल की दशा कैसी थी? कोई भी न्यायियों की पुस्तक पढ़कर मनुष्य की भ्रष्टता के उन दुःखद उदाहरणों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता जो उसमें मिलते हैं। बार-बार हमें बताया जाता है कि लोग परमेश्वर को छोड़कर मूरतों के पीछे चले गए। अत्यन्त स्पष्ट चेतावनियों के होते हुए भी उन्होंने कनानियों के साथ सम्बन्ध जोड़ा और उनके कर्म सीखे। बार-बार हम पढ़ते हैं कि अपने पापों के कारण वे परदेशी राजाओं से सताए गए, और फिर आश्चर्यजनक रीति से छुड़ाए गए। बार-बार हम पढ़ते हैं कि उस छुटकारे को भुला दिया गया और लोग अपने पुराने पापों में लौट गए, जैसे नहलाई हुई सूअरी फिर कीचड़ में लोटने लगती है। तो क्या उन दिनों बहुत लोगों का उद्धार हुआ? बाइबल का कोई भी निष्कपट पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तर क्या होना चाहिए।
राजाओं के दिनों में इस्राएल की दशा कैसी थी? पहले राजा शाऊल से लेकर अन्तिम राजा सिदकिय्याह तक उनका इतिहास पीछे हटने, पतन और मूर्तिपूजा का एक शोकपूर्ण वृत्तान्त है — बीच-बीच में कुछ उज्ज्वल अपवादी कालों को छोड़कर। सबसे अच्छे राजाओं के अधीन भी अविश्वास और अभक्ति का एक बड़ा भण्डार दिखाई देता है, जो कुछ समय तक छिपा रहता था और पहले अनुकूल अवसर पर फूट निकलता था। बार-बार हम देखते हैं कि अत्यन्त उत्साही राजाओं के समय में भी "ऊँचे स्थान नष्ट नहीं किए गए।" ध्यान दीजिए कि दाऊद भी अपने आस-पास की दशा के विषय में कैसा कहता है, "हे यहोवा, बचा ले, क्योंकि भक्त जन नहीं रहे, और विश्वासयोग्य लोग मनुष्यों में से मिट गए हैं।" (भजन संहिता 12:1।) ध्यान दीजिए कि यशायाह यहूदा और यरूशलेम की दशा का वर्णन कैसे करता है, "सारा सिर रोगी है और सारा मन खेदित है। पाँव के तलवे से लेकर सिर तक कहीं भी कुछ आरोग्यता नहीं।" "यदि सेनाओं का यहोवा हमारे लिये थोड़े से लोगों को न बचा रखता, तो हम सदोम के समान हो जाते, और अमोरा के समान ठहरते।" (यशायाह 1:5-9।) ध्यान दीजिए कि यिर्मयाह अपने समय का वर्णन कैसे करता है, "यरूशलेम की सड़कों पर इधर-उधर दौड़कर देखो, और जाँचो और उसके चौकों में खोजकर देखो कि कोई मनुष्य मिलता है कि नहीं, जो न्याय से काम करता और सच्चाई का खोजी हो; और मैं उसका पाप क्षमा करूँगा।" (यिर्मयाह 5:1।) ध्यान दीजिए कि यहेजकेल अपने समय के लोगों के विषय में क्या कहता है, "यहोवा का यह वचन मुझे पहुँचा, कि हे मनुष्य के सन्तान, इस्राएल का घराना मेरे लिये धातु का मैल हो गया है; वे सब भट्ठी के बीच पीतल, रांगा, लोहा और सीसा ही ठहरे; वे चाँदी के मैल ही हैं।" (यहेजकेल 22:17, 18।) देखिए कि वह अपनी भविष्यद्वाणी के सोलहवें और तेईसवें अध्यायों में यहूदा और इस्राएल के राज्यों के विषय में क्या कहता है। तो क्या उन दिनों बहुत लोगों का उद्धार हुआ? बाइबल का कोई भी निष्कपट पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तर क्या होना चाहिए।
जब हमारे प्रभु यीशु मसीह पृथ्वी पर थे तब यहूदियों की दशा कैसी थी? उनकी आत्मिक दशा का सबसे अच्छा वर्णन संत यूहन्ना के ये शब्द हैं, "वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।" (यूहन्ना 1:11।) उसने ऐसा जीवन जिया जैसा स्त्री से जन्मे किसी ने पहले कभी नहीं जिया था — निर्दोष, निष्कलंक, पवित्र जीवन। "वह भलाई करता फिरा।" (प्रेरितों के काम 10:38।) उसने ऐसा प्रचार किया जैसा किसी ने पहले कभी नहीं किया था। उसके शत्रुओं के सिपाहियों ने भी स्वीकार किया, "किसी मनुष्य ने कभी ऐसी बातें नहीं कीं।"
(यूहन्ना 7:46)। उसने अपनी सेवकाई की पुष्टि के लिये आश्चर्यकर्म किए, जिनके विषय में पहली दृष्टि में हम सोच सकते थे कि वे अत्यन्त कठोर मनुष्य को भी मना लेंगे। परन्तु इस सब के होते हुए भी यहूदियों के विशाल बहुमत ने उस पर विश्वास करने से इन्कार किया। हमारे प्रभु के पीछे-पीछे फिलिस्तीन के सब स्थानों में चलो, तो तुम सदा यही कथा पाओगे। उसके पीछे नगर में जाओ, और उसके पीछे जंगल में जाओ; उसके पीछे कफरनहूम और नासरत में जाओ, और उसके पीछे यरूशलेम में जाओ; उसके पीछे शास्त्रियों और फरीसियों के बीच जाओ, और उसके पीछे सदूकियों और हेरोदियों के बीच जाओ—सब जगह तुम उसी परिणाम पर पहुँचोगे। वे चकित हुए—वे चुप हो गए—वे अचम्भे में पड़े—उन्होंने अचरज किया—परन्तु बहुत थोड़े ही चेले बने! जाति के अत्यधिक भाग ने उसके सिद्धान्त को स्वीकार न किया, और अपनी सारी दुष्टता का मुकुट उसे मार डालकर पहनाया। और क्या उन दिनों में बहुतों का उद्धार हुआ? बाइबल का कोई भी ईमानदार पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तर क्या होना चाहिए।
प्रेरितों के दिनों में संसार का क्या हाल था? यदि कभी कोई ऐसा समय था जब सच्चा धर्म फला-फूला, तो वह वही समय था। पवित्र आत्मा ने इतने थोड़े समय में मसीह की भेड़शाला में इतनी आत्माओं को कभी नहीं बुलाया। जब पौलुस और उसके सहकर्मी प्रचारक थे, तब सुसमाचार के प्रचार से जितने लोग मन फिराए उतने कभी नहीं फिराए। फिर भी प्रेरितों के काम से स्पष्ट है कि सच्चे मसीही धर्म के विरोध में "हर जगह लोग बातें करते" थे। (प्रेरितों के काम 28:22)। यह प्रकट है कि हर नगर में, यहाँ तक कि यरूशलेम में भी, सच्चे मसीही थोड़े ही थे। हम प्रेरितों को सब प्रकार के संकटों से गुज़रते हुए पढ़ते हैं—न केवल बाहर के संकट—परन्तु भीतर के संकट भी—न केवल अन्यजातियों की ओर से संकट—परन्तु झूठे भाइयों की ओर से भी। पौलुस जिस किसी नगर में गया, उनमें शायद ही कोई ऐसा हो जहाँ उस पर खुली हिंसा और सताव का खतरा न रहा हो। उसकी कुछ पत्रियों से हम साफ़ देखते हैं कि मसीही कहलानेवाली कलीसियाएँ मिली-जुली मण्डलियाँ थीं, जिनमें बहुत से सड़े हुए सदस्य थे। हम उसे फिलिप्पियों को अपने अनुभव का एक कष्टदायक अंश बताते हुए पाते हैं, "क्योंकि बहुतेरे ऐसे चलते हैं, जिनकी चर्चा मैं ने तुम से बार बार की है और अब भी रो रोकर कहता हूँ, कि वे अपने चाल-चलन से मसीह के क्रूस के बैरी हैं। उनका अन्त विनाश है; उनका ईश्वर पेट है; वे अपनी लज्जा की बातों पर घमण्ड करते हैं, और पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाए रहते हैं।" (फिलिप्पियों 3:18, 19)। और क्या उन दिनों में बहुतों का उद्धार हुआ? बाइबल का कोई भी ईमानदार पाठक
इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह उत्तर क्या होना चाहिए।
मैं इस पुस्तक के हर ईमानदार और निष्पक्ष पाठक से कहता हूँ कि बाइबल की उन शिक्षाओं को भली-भाँति तौले जो मैं ने अभी प्रस्तुत की हैं। निश्चय ही वे गम्भीर और भारी हैं, और गम्भीर ध्यान के योग्य हैं।
कोई यह कहकर उनके बल से बचने की न सोचे कि बाइबल तो केवल यहूदियों की कथा सुनाती है। यह कहकर अपने को तसल्ली देने की न सोचो कि "शायद यहूदी अन्य जातियों से अधिक दुष्ट थे, और अन्य जातियों में सम्भवतः बहुत लोगों का उद्धार हुआ, चाहे यहूदियों में थोड़ों ही का हुआ।" तुम भूल जाते हो कि यह तर्क तुम्हारे ही विरुद्ध जाता है। तुम भूल जाते हो कि यहूदियों को वह ज्योति और वे विशेषाधिकार मिले थे जो अन्यजातियों को नहीं मिले थे, और अपने सब पापों और दोषों के होते हुए भी वे सम्भवतः पृथ्वी की सबसे पवित्र और सबसे नैतिक जाति थे। अश्शूरियों, मिस्रियों, यूनानियों और रोमियों के बीच लोगों की नैतिक दशा के विषय में यह सोचकर भी भय लगता है कि वह कैसी रही होगी। परन्तु इतना हम निश्चय जान सकते हैं कि यदि यहूदियों में बहुत से अभक्त थे, तो अन्यजातियों में उनकी संख्या कहीं अधिक थी। यदि हरे वृक्ष में थोड़ों का उद्धार हुआ, तो हाय, सूखे वृक्ष में कितने और भी थोड़ों का उद्धार हुआ होगा!
सारी बात का सार यह है—उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में बाइबल और संसार के लोग बहुत भिन्न बातें कहते हैं। बाइबल के अनुसार थोड़ों का उद्धार होगा—संसार के लोगों के अनुसार बहुतों का। संसार के लोगों के अनुसार थोड़े ही नरक को जा रहे हैं—बाइबल के अनुसार थोड़े ही स्वर्ग को जा रहे हैं। संसार के लोगों के अनुसार उद्धार एक सरल बात है—बाइबल के अनुसार मार्ग सकरा है और फाटक सकरा है। संसार के लोगों के अनुसार अन्त में बहुत थोड़े लोग स्वर्ग में प्रवेश माँगते हुए पाए जाएँगे जब बहुत देर हो चुकी होगी—बाइबल के अनुसार बहुत से लोग उस दुःखद दशा में होंगे, और व्यर्थ पुकारेंगे, "हे प्रभु, हे प्रभु, हमारे लिये खोल दे।" फिर भी बाइबल कभी ग़लत नहीं निकली। सोर, मिस्र, बाबुल और नीनवे के विषय में सबसे अनहोनी और असम्भव लगनेवाली भविष्यद्वाणियाँ अक्षर-अक्षर पूरी हुई हैं। और जैसे अन्य बातों में, वैसे ही उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में भी होगा। बाइबल बिलकुल सही और संसार के लोग बिलकुल ग़लत प्रमाणित होंगे।
IV. अन्त में मैं उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में कुछ स्पष्ट तथ्य दिखाता हूँ।
मैं इस विषय के इस भाग की ओर विशेष ध्यान दिलाता हूँ। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि लोग अपने को यह कहकर प्रसन्न करते हैं कि संसार अठारह सौ वर्ष पहले की अपेक्षा कहीं अच्छा और समझदार है। हमारे पास कलीसियाएँ हैं, पाठशालाएँ हैं, और पुस्तकें हैं। हमारे पास सभ्यता है, स्वतंत्रता है, और अच्छे कानून हैं। हमारे पास समाज में नैतिकता का वह स्तर है जो कभी प्रचलित स्तर से कहीं ऊँचा है। हमारे पास सुख-सुविधाओं और आनन्द की वे वस्तुएँ पाने की सामर्थ्य है जिनके विषय में हमारे पुरखे कुछ नहीं जानते थे। भाप, गैस, बिजली और रसायन-विज्ञान ने हमारे लिये चमत्कार कर दिखाए हैं। यह सब बिलकुल सच है। मैं इसे देखता हूँ, और धन्यवादी हूँ। परन्तु यह सब इस प्रश्न के महत्त्व को कम नहीं करता—क्या हम में से थोड़ों का उद्धार होगा या बहुतों का?
मुझे पूरा विश्वास है कि इस प्रश्न के महत्त्व की पीड़ादायक रूप से उपेक्षा की जाती है। मुझे निश्चय है कि संसार में अविश्वास और पाप की मात्रा के विषय में अधिकांश लोगों के विचार नितान्त अपर्याप्त और ग़लत हैं। मैं आश्वस्त हूँ कि बहुत ही थोड़े लोग, चाहे सेवक हों या साधारण मसीही, इस बात को कुछ भी समझते हैं कि उद्धार के मार्ग पर कितने कम लोग हैं। मैं इस विषय की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ, और इसलिये मैं इसके विषय में कुछ स्पष्ट तथ्य प्रस्तुत करूँगा।
परन्तु इन तथ्यों के लिए मैं कहाँ जाऊँ? मैं सहज ही उन करोड़ों अन्यजातियों की ओर मुड़ सकता हूँ, जो संसार के अनेक भागों में उसकी आराधना कर रहे हैं जिसे वे जानते तक नहीं। परन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं सहज ही उन करोड़ों मुसलमानों की ओर मुड़ सकता हूँ जो कुरान को बाइबल से अधिक और मक्का के झूठे भविष्यद्वक्ता को मसीह से अधिक आदर देते हैं। परन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं सहज ही उन करोड़ों रोमन कैथोलिकों की ओर मुड़ सकता हूँ जो अपनी परम्पराओं के द्वारा परमेश्वर के वचन को व्यर्थ ठहरा रहे हैं। परन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं अपने निकट की ओर देखूँगा। मैं अपने तथ्य उसी देश से लूँगा जिसमें मैं रहता हूँ, और फिर हर सच्चे पाठक से पूछूँगा कि क्या यह पूर्णतः सत्य नहीं कि थोड़े ही लोग उद्धार पाते हैं।
मैं इन पृष्ठों के किसी भी समझदार पाठक को आमन्त्रित करता हूँ कि वह अपने को आज प्रोटेस्टेंट इंग्लैंड या स्कॉटलैंड की किसी भी पल्ली में कल्पना करे। जो चाहे चुन लीजिए—नगर की पल्ली या देहात की पल्ली, बड़ी पल्ली या छोटी। आइए, हम अपने हाथों में अपने नए नियम लें। आइए, हम इस पल्ली के निवासियों के मसीही होने की परख परिवार-परिवार और मनुष्य-मनुष्य करके करें। जिस किसी के पास सच्चे मसीही होने का नए नियम का प्रमाण न हो, उसे हम एक ओर कर दें। आइए, हम इस जाँच में ईमानदारी और निष्पक्षता से काम लें, और किसी को सच्चा मसीही न मानें जो नए नियम के विश्वास और आचरण के स्तर तक न पहुँचता हो। आइए, हम हर उस मनुष्य को बचाई हुई आत्मा गिनें जिसमें हमें मसीह की कुछ झलक दिखाई दे—सच्चे मन फिराव का कोई प्रमाण, यीशु में उद्धार देनेवाले विश्वास का कोई प्रमाण, सच्ची सुसमाचारीय पवित्रता का कोई प्रमाण। आइए, हम हर उस मनुष्य को अस्वीकार करें जिसमें अत्यन्त उदार दृष्टि से भी हमें ये प्रमाण दिखाई न दें, क्योंकि वह "तराजू में तौला गया और घटी में निकला।" आइए, हम इस छानने की प्रक्रिया को इस देश की किसी भी पल्ली पर लागू करें और देखें कि परिणाम क्या होगा।
(क) सबसे पहले हम पल्ली के उन लोगों को अलग करें जो किसी भी प्रकार के खुले पाप में जी रहे हैं। इनसे मेरा तात्पर्य व्यभिचारियों, परस्त्रीगामियों, झूठों, चोरों, पियक्कड़ों, छल करनेवालों, निन्दकों और अन्धेर करनेवालों से है। इनके विषय में मेरे विचार से कोई मतभेद नहीं हो सकता। बाइबल स्पष्ट कहती है, कि "ऐसे ऐसे काम करनेवाले परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे।" (गलातियों 5:21) अब क्या ये लोग उद्धार पाएँगे? मेरे अपने मन में उत्तर स्पष्ट है—अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।
(ख) इसके बाद हम उन लोगों को अलग करें जो सब्त का उल्लंघन करनेवाले हैं। इस वाक्यांश से मेरा तात्पर्य उनसे है जो सामर्थ्य होते हुए भी आराधना-स्थल में कभी-कभार ही जाते हैं या कभी नहीं जाते; जो सब्त का दिन परमेश्वर को नहीं, अपने आपको देते हैं; जो रविवार को अपनी ही राह पर चलने और अपने ही सुख की खोज करने के सिवा और कुछ नहीं सोचते। वे स्पष्ट दिखा देते हैं कि वे स्वर्ग के योग्य नहीं हैं! स्वर्ग के निवासियों की संगति उन्हें अच्छी न लगेगी। स्वर्ग के कार्य उनके लिए आनन्द नहीं, थकावट होंगे। अब क्या ये लोग उद्धार पाएँगे? मेरे मन में उत्तर स्पष्ट है—अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।
(ग) इसके बाद हम उन सब लोगों को अलग करें जो लापरवाह और विचारहीन अंगीकार करनेवाले हैं। इस वाक्यांश से मेरा तात्पर्य उनसे है जो धर्म की बाहरी विधियों में से बहुतों में उपस्थित तो होते हैं, परन्तु उसके सिद्धान्तों और सार में कोई सच्ची रुचि लेने का चिह्न नहीं दिखाते। उन्हें इसकी थोड़ी ही चिन्ता होती है कि सेवक सुसमाचार का प्रचार करता है या नहीं। उन्हें इसकी थोड़ी ही चिन्ता होती है कि वे अच्छा उपदेश सुनते हैं या नहीं। यदि संसार की सारी बाइबलें जला दी जाएँ तो उन्हें थोड़ी ही चिन्ता होगी। यदि संसद ऐसा कानून बना दे कि कोई प्रार्थना न करे, तो उन्हें थोड़ी ही चिन्ता होगी। संक्षेप में, उनके लिए धर्म "एक ही बात जो अवश्य है" नहीं है। उनका धन पृथ्वी पर है। वे ठीक गल्लियो के समान हैं, जिसके लिए इसका कोई महत्त्व न था कि लोग यहूदी हैं या मसीही—उसने "इन बातों की कुछ भी चिन्ता न की।" (प्रेरितों के काम 18:17) अब क्या ये लोग उद्धार पाएँगे? मेरे अपने मन में उत्तर स्पष्ट है—अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।
(घ) इसके बाद हम उन सबको अलग करें जो कर्मकाण्डी और आत्म-धर्मी हैं। इस वाक्यांश से मेरा तात्पर्य उनसे है जो मसीही धर्म के रीति-रिवाजों के पालन में अपनी नियमितता पर गर्व करते हैं, और परमेश्वर के सामने ग्रहण किए जाने के लिए सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही कामों पर भरोसा रखते हैं। मेरा तात्पर्य उन सबसे है जो अपनी आत्मा को मसीह के काम को छोड़ किसी और काम पर, या मसीह की धार्मिकता को छोड़ किसी और धार्मिकता पर टिकाते हैं। ऐसे लोगों के विषय में प्रेरित पौलुस ने स्पष्ट गवाही दी है, "व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा।" "जो नींव पड़ी है, उसे छोड़ कोई दूसरी नींव नहीं डाल सकता, और वह नींव यीशु मसीह है।" (रोमियों 3:20; 1 कुरिन्थियों 3:11) और क्या हम ऐसे पदों के सामने यह कहने का साहस कर सकते हैं कि ऐसे लोग उद्धार पाएँगे? मेरे अपने मन में उत्तर स्पष्ट है—अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।
(ङ) इसके बाद हम उन सबको अलग करें जो सुसमाचार को सिर से तो जानते हैं, परन्तु हृदय से उसका पालन नहीं करते। ये वे अभागे लोग हैं जिनके पास जीवन का मार्ग देखने की आँखें तो हैं, परन्तु उस पर चलने की इच्छा या साहस नहीं। वे खरी शिक्षा को स्वीकार करते हैं। वे ऐसा प्रचार नहीं सुनेंगे जिसमें वह न हो। परन्तु मनुष्य का भय, या संसार की चिन्ताएँ, या धन का लोभ, या सम्बन्धियों को अप्रसन्न करने का डर, उन्हें निरन्तर पीछे खींचे रखता है। वे साहस के साथ आगे नहीं आएँगे, न क्रूस उठाएँगे, न मनुष्यों के सामने मसीह को मानेंगे। इनके विषय में भी बाइबल स्पष्ट कहती है, "विश्वास, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है।" "जो कोई भलाई करना जानता है और नहीं करता, उसके लिए यह पाप है।" "जो कोई मुझ से और मेरी बातों से लजाएगा, मनुष्य का पुत्र भी जब अपनी, और अपने पिता की, और पवित्र स्वर्गदूतों की महिमा सहित आएगा, तो उस से लजाएगा।" (याकूब 2:17; 4:17; लूका 9:26) क्या हम कहें कि ऐसे लोग उद्धार पाएँगे? मेरे अपने मन में उत्तर स्पष्ट है—अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।
(च) अन्त में, उन सब को अलग कर दें जो पाखण्डी व्यवसायी हैं। इस वाक्यांश से मेरा तात्पर्य उन सब से है जिनका धर्म केवल बातों और ऊँचे दावों में है, और इसके सिवाय कुछ नहीं। ये वे ही हैं जिनके विषय में भविष्यद्वक्ता यहेजकेल कहता है, "वे अपने मुँह से तो बहुत प्रेम दिखाते हैं, परन्तु उनका मन उनके लोभ ही की ओर लगा रहता है।" "वे कहते हैं कि हम परमेश्वर को जानते हैं, पर अपने कामों से उसका इन्कार करते हैं।" "वे भक्ति का भेष तो रखते हैं, पर उस की शक्ति को नहीं मानते।" (यहेजकेल 33:31; तीतुस 1:16; 2 तीमुथियुस 3:5।) वे कलीसिया में सन्त हैं, और सब के सामने बातचीत में भी सन्त हैं। परन्तु वे अकेले में और अपने घरों में सन्त नहीं हैं; और सब से बुरी बात यह कि वे मन में सन्त नहीं हैं। ऐसे लोगों के विषय में कोई विवाद हो ही नहीं सकता। क्या हम कहें कि उनका उद्धार होगा? इसका एक ही उत्तर हो सकता है—अपनी वर्तमान दशा में उनका उद्धार नहीं होगा।
और अब, जिन वर्गों का मैंने वर्णन किया उन्हें अलग कर देने के बाद, मैं किसी भी समझदार, विचारशील पाठक से पूछता हूँ कि इंग्लैंड के किसी भी पल्ली में कितने लोग बचे रहेंगे? किसी पल्ली को भली-भाँति और ईमानदारी से छान लेने के बाद कितने स्त्री-पुरुष बचेंगे जो उद्धार के मार्ग पर हैं? कितने सच्चे मन फिरानेवाले, मसीह में कितने सच्चे विश्वासी, कितने सचमुच पवित्र लोग मिलेंगे? मैं इस पुस्तक के प्रत्येक पाठक के विवेक से कहता हूँ कि परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदारी से उत्तर दे। मैं आप से पूछता हूँ कि बाइबल लेकर वर्णित रीति से किसी पल्ली को छान लेने के बाद क्या आप इस निष्कर्ष के सिवाय किसी और निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि बहुत थोड़े लोग—दुःख की बात है कि बहुत थोड़े लोग—उद्धार के मार्ग पर हैं?
इस निष्कर्ष पर पहुँचना पीड़ादायक है, परन्तु मैं नहीं जानता कि इससे कैसे बचा जाए। यह एक भयानक और भारी विचार है कि इंग्लैंड में इतने कलीसिया के सदस्य हों, और इतने असहमत सम्प्रदायवाले, इतने आसनधारी, और इतने बेंच किराये पर लेनेवाले, इतने श्रोता, और इतने प्रभु-भोज में सहभागी हों—और फिर भी अन्त में इतने थोड़े लोग उद्धार के मार्ग पर हों! परन्तु प्रश्न केवल यह है, क्या यह सच नहीं है? तथ्यों के सामने आँखें मूँद लेना व्यर्थ है। हमारे आसपास जो हो रहा है उसे न देखने का दिखावा करना निष्फल है। बाइबल के कथन और जिस संसार में हम रहते हैं उसके तथ्य, दोनों हमें एक ही निष्कर्ष पर पहुँचाएँगे—बहुत से नाश हो रहे हैं, और थोड़े ही उद्धार पा रहे हैं!
(क) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी इस बात पर विश्वास नहीं करते, क्योंकि वे समझते हैं कि मृत्यु-शय्या पर मन फिराव का बहुत बड़ा भण्डार है। वे अपने आप को यह कहकर बहलाते हैं कि जो बहुत लोग धार्मिक जीवन नहीं जीते, वे भी धार्मिक मृत्यु मरेंगे। वे इस विचार से सान्त्वना लेते हैं कि असंख्य लोग अपनी अन्तिम बीमारी में परमेश्वर की ओर फिरते हैं और ग्यारहवें घण्टे में उद्धार पाते हैं। मैं ऐसे लोगों को केवल इतना स्मरण दिलाऊँगा कि सेवकों का सारा अनुभव इस मत के सर्वथा विरुद्ध है। लोग प्रायः जैसे जीते हैं वैसे ही मरते हैं। सच्चा मन फिराव कभी बहुत देर से नहीं होता, परन्तु जीवन के अन्तिम घण्टों तक टाला हुआ मन फिराव शायद ही कभी सच्चा होता है। मनुष्य का जीवन उसकी आत्मिक दशा का सबसे पक्का प्रमाण है, और यदि जीवन ही साक्षी हैं तो बहुत थोड़े लोगों के उद्धार पाने की सम्भावना है।
(ख) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी इस बात पर विश्वास नहीं करते, क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि यह परमेश्वर की दया के विरुद्ध है। वे उस प्रेम पर ध्यान लगाते हैं जो सुसमाचार पापियों के प्रति प्रकट करता है। वे क्षमा और पापमोचन के उन प्रस्तावों की ओर संकेत करते हैं जो बाइबल में भरे पड़े हैं। वे हम से पूछते हैं कि क्या इस सब के होते हुए भी हम यह मानते हैं कि केवल थोड़े ही लोग उद्धार पाएँगे। मैं उत्तर देता हूँ कि मसीह में परमेश्वर की दया को ऊँचा उठाने में मैं किसी से पीछे नहीं हूँ, परन्तु मैं इस तथ्य के सामने आँखें बन्द नहीं कर सकता कि जब तक यह दया जान-बूझकर ठुकराई जाती है तब तक यह किसी को लाभ नहीं पहुँचाती। मनुष्य के उद्धार के लिये मुझे परमेश्वर की ओर से कुछ भी कमी नहीं दिखती। मुझे स्वर्ग में सब से बड़े पापी के लिये भी स्थान दिखता है। मुझे सब से अधर्मी को ग्रहण करने के लिये मसीह की इच्छा दिखती है। मुझे सब से अधर्मी को नया बनाने के लिये पवित्र आत्मा की सामर्थ्य दिखती है। परन्तु दूसरी ओर मुझे मनुष्य में भयंकर अविश्वास दिखता है—जो कुछ परमेश्वर उसे बाइबल में बताता है उस पर वह विश्वास नहीं करेगा। मुझे मनुष्य में भयंकर घमण्ड दिखता है—वह छोटे बालक की नाईं सुसमाचार को ग्रहण करने के लिये अपना हृदय नहीं झुकाएगा। मुझे मनुष्य में भयंकर आलस्य दिखता है—वह उठकर परमेश्वर को पुकारने का कष्ट नहीं उठाएगा। मुझे मनुष्य में भयंकर सांसारिकता दिखती है—वह समय की उन तुच्छ नाशमान वस्तुओं पर से अपनी पकड़ ढीली नहीं करेगा और अनन्तकाल का विचार नहीं करेगा। संक्षेप में, मैं अपने प्रभु के इन वचनों को निरन्तर पूरा होते देखता हूँ, "तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" (यूहन्ना 5:40), और इसलिये मैं इस दुःखद निष्कर्ष पर पहुँचने को विवश हूँ कि बहुत थोड़े लोगों के उद्धार पाने की सम्भावना है।
(ग) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी इस बात पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि वे संसार में जो बुराई है उसे देखने से इन्कार करते हैं। वे भले लोगों के एक छोटे से घेरे के बीच रहते हैं—उस घेरे के बाहर संसार में जो कुछ हो रहा है उसके विषय में वे बहुत कम जानते हैं। वे हमें बताते हैं कि संसार तेजी से सुधर रहा है और सिद्धता की ओर बढ़ रहा है। वे उँगलियों पर गिनते हैं कि पिछले वर्ष में उन्होंने कितने भले सेवकों को सुना और देखा। वे हमारा ध्यान धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक सभाओं की संख्या की ओर, चन्दे में दिये गये धन की ओर, और निरन्तर बाँटी जा रही बाइबलों और पुस्तिकाओं की ओर दिलाते हैं। वे हम से पूछते हैं कि क्या इस सब के होते हुए भी हम सचमुच यह कहने का साहस करते हैं कि थोड़े ही लोग उद्धार के मार्ग पर हैं। उत्तर में मैं इन भले मानुषों को केवल इतना स्मरण दिलाऊँगा कि संसार में उनके अपने छोटे घेरे के सिवाय और भी लोग हैं, और उन चुने हुए थोड़े लोगों के सिवाय जिन्हें वे अपनी मण्डली में जानते हैं, और भी स्त्री-पुरुष हैं। मैं उनसे विनती करता हूँ कि अपनी आँखें खोलें और वस्तुओं को वैसा ही देखें जैसी वे वास्तव में हैं। मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूँ कि हमारे इस देश में ऐसी बातें हो रही हैं जिनके विषय में वे अभी सुखद अज्ञानता में हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि मुझे जल्दबाजी में दोषी ठहराने से पहले बाइबल लेकर इंग्लैंड की किसी भी पल्ली या मण्डली को छान लें। मैं उनसे कहता हूँ कि यदि वे यह ईमानदारी से करेंगे तो शीघ्र ही पाएँगे कि जब मैं कहता हूँ कि थोड़े ही लोगों के उद्धार पाने की सम्भावना है, तो मैं सत्य से दूर नहीं हूँ।
(घ) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि वे ऐसे सिद्धान्त को अत्यन्त संकीर्ण और बहिष्कारी समझते हैं। मैं इस आरोप का पूर्ण रूप से खण्डन करता हूँ। मैं उन मसीहियों से कोई सहानुभूति नहीं रखता जो अपनी कलीसिया से बाहर हर किसी को दोषी ठहराते हैं और जो हर बात को उनकी आँखों से नहीं देखता, उसके लिए स्वर्ग का द्वार बन्द करते-से जान पड़ते हैं। चाहे वे रोमन कैथोलिक हों, या एपिस्कोपल, या फ्री चर्च के लोग, या बैपटिस्ट, या प्लिमथ ब्रदरेन—जो कोई भी इस प्रकार का काम करता है, मैं उसे संकीर्ण मन का मनुष्य मानता हूँ। मेरी यह इच्छा नहीं कि मैं किसी के लिए भी स्वर्ग का राज्य बन्द कर दूँ। मैं केवल इतना कहता हूँ कि उस राज्य में केवल वे ही प्रवेश करेंगे जो परिवर्तित, विश्वासी और पवित्र आत्माएँ हैं; और मैं केवल इतना ही कहने का साहस करता हूँ कि बाइबल और तथ्य, दोनों मिलकर यह प्रमाणित करते हैं कि ऐसे लोग थोड़े हैं।
(ङ) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी इस बात पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि वे इसे एक निराशाजनक और निर्दयी सिद्धान्त समझते हैं। इस प्रकार के अस्पष्ट, सामान्य कथन करना सरल है। यह दिखाना इतना सरल नहीं कि जो सिद्धान्त पवित्रशास्त्र के अनुसार और सत्य है, वह "निराशाजनक और निर्दयी" कहलाने के योग्य है। मुझे भय है कि एक झूठा प्रेम होता है, जो धर्म की सब दृढ़ बातों को नापसन्द करता है, ऐसा प्रेम जो चाहता है कि किसी के साथ हस्तक्षेप न किया जाए—ऐसा प्रेम जो चाहता है कि हर किसी को उसके पापों में अकेला छोड़ दिया जाए—ऐसा प्रेम जो बिना किसी प्रमाण के मान लेता है कि सब का उद्धार होने वाला है—ऐसा प्रेम जिसे कभी सन्देह नहीं होता कि सब लोग स्वर्ग जा रहे हैं, और जो नरक जैसे किसी स्थान के अस्तित्व को ही नकारता-सा जान पड़ता है। परन्तु ऐसा प्रेम नए नियम का प्रेम नहीं है, और वह इस नाम के योग्य नहीं। मुझे वह प्रेम दीजिए जो हर बात को बाइबल की कसौटी पर परखता है, और ऐसी किसी बात पर न विश्वास करता है, न आशा रखता है जिसे वचन की स्वीकृति न मिली हो। मुझे वह प्रेम दीजिए जिसका वर्णन पौलुस ने कुरिन्थियों को किया है—वह प्रेम जो अन्धा, बहरा और मूर्ख नहीं है—परन्तु जिसके पास देखने के लिए आँखें और परमेश्वर का भय माननेवाले तथा न माननेवाले में भेद करने की समझ है। ऐसा प्रेम "सत्य" को छोड़ और किसी बात से आनन्दित नहीं होगा, और दुःख के साथ मान लेगा कि जब मैं कहता हूँ कि थोड़े ही लोगों के उद्धार पाने की सम्भावना है, तो मैं सत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहता।
(च) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि वे उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में कोई भी राय रखना धृष्टता समझते हैं। परन्तु क्या ये लोग हमसे यह कहने का साहस करेंगे कि बाइबल ने उद्धार पाई हुई आत्माओं के चरित्र के विषय में स्पष्ट रूप से नहीं कहा है? और क्या वे यह कहने का साहस करेंगे कि बाइबल को छोड़ सत्य का कोई और मानक है? निश्चय ही बाइबल के अनुकूल बात कहने में कोई धृष्टता नहीं हो सकती। मैं उनसे साफ़-साफ़ कहता हूँ कि धृष्टता का आरोप मेरे द्वार पर नहीं ठहरता। मैं कहता हूँ कि सच्चा धृष्ट मनुष्य वह है जो, जब बाइबल ने किसी बात को स्पष्ट और असंदिग्ध रूप से कह दिया है, तब भी उसे ग्रहण करने से इनकार करता है।
(छ) अन्त में, मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि वे मेरे कथन को अतिशयोक्तिपूर्ण और अनुचित समझते हैं। वे इसे एक प्रकार की कट्टरता मानते हैं, जो किसी विवेकशील मनुष्य के ध्यान के योग्य नहीं। वे ऐसे कथन करनेवाले सेवकों को निर्बल बुद्धि और सामान्य समझ से रहित लोग समझते हैं। मैं ऐसे आरोपों को अविचलित होकर सह सकता हूँ। मैं इन्हें लगानेवालों से केवल इतना कहता हूँ कि वे मुझे कोई स्पष्ट प्रमाण दिखाएँ कि वे सही हैं और मैं ग़लत। यदि वे दिखा सकें तो दिखाएँ कि ऐसे किसी मनुष्य के स्वर्ग पहुँचने की सम्भावना है जिसका हृदय नया नहीं किया गया, जो यीशु मसीह पर विश्वास नहीं करता, जो आत्मिक मन रखनेवाला और पवित्र मनुष्य नहीं है। यदि वे दिखा सकें तो दिखाएँ कि इस प्रकार के लोग उन लोगों की तुलना में, जो ऐसे नहीं हैं, अधिक संख्या में हैं। एक शब्द में, वे पृथ्वी पर कोई ऐसा स्थान दिखा दें जहाँ के लोगों का अधिकांश भाग भक्तिहीन न हो, और जहाँ सच्चे भक्त एक छोटा झुण्ड न हों। यदि वे ऐसा करें, तो मैं मान लूँगा कि मैंने जो कहा है उस पर विश्वास न करके उन्होंने ठीक ही किया। जब तक वे ऐसा न करें, मुझे इसी दुःखद निष्कर्ष पर दृढ़ रहना होगा—कि थोड़े ही लोगों के उद्धार पाने की सम्भावना है।
और अब इस लेख के विषय का कुछ व्यावहारिक उपयोग करना ही शेष रह गया है। मैंने यथासम्भव स्पष्ट रूप से उद्धार पाए हुए लोगों का चरित्र बताया है। मैंने दिखाया है कि उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में संसार के कैसे कष्टदायक भ्रम हैं। मैंने इस विषय पर बाइबल की साक्षी प्रस्तुत की है। मैंने अपने चारों ओर के संसार से अपने कथनों की पुष्टि में सीधे-सादे तथ्य लिए हैं। प्रभु करे कि ये सब गम्भीर सत्य व्यर्थ ही प्रकट न किए गए हों!
मैं भली-भाँति जानता हूँ कि मैंने इस लेख में बहुत सी ऐसी बातें कही हैं जिनसे ठेस पहुँचने की सम्भावना है। मैं यह जानता हूँ। ऐसा होना ही है। जिस विषय को इसमें उठाया गया है वह इतना गम्भीर और हृदय को जाँचनेवाला है कि वह कुछ लोगों को ठेस पहुँचाए बिना नहीं रह सकता। परन्तु मुझे बहुत समय से यह गहरा विश्वास रहा है कि इस विषय की बहुत शोचनीय उपेक्षा की गई है, और बहुत कम बातें ऐसी हैं जिन्हें उतना कम समझा जाता है जितना खोए हुओं और उद्धार पाए हुओं की तुलनात्मक संख्या को। जो कुछ मैंने लिखा है, इसलिए लिखा है कि मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि यह परमेश्वर का सत्य है। जो कुछ मैंने कहा है, शत्रु के रूप में नहीं, वरन् आत्माओं से प्रेम रखनेवाले के रूप में कहा है। जो तुम्हारे प्राण बचाने के लिए तुम्हें कड़वी दवा देता है, उसे तुम शत्रु नहीं गिनते। जब तुम्हारे घर में आग लगी हो और कोई तुम्हें झकझोर कर नींद से जगा दे, तो उसे तुम शत्रु नहीं गिनते। निश्चय ही तुम मुझे भी इसलिए शत्रु नहीं गिनोगे कि मैं तुम्हारी आत्मा के लाभ के लिए तुम्हें कठोर सत्य बताता हूँ। मैं एक मित्र के रूप में हर उस स्त्री या पुरुष से विनती करता हूँ जिसके हाथ में यह पुस्तक आई है। कुछ क्षण मुझे सह लो, जब मैं कुछ अन्तिम शब्द कहता हूँ जिससे यह सारा विषय तुम्हारे विवेक पर अंकित हो जाए।
(क) क्या थोड़े ही लोग उद्धार पाते हैं? तो क्या तुम उन थोड़ों में से एक होगे? काश कि तुम देख पाते कि उद्धार ही एक अत्यावश्यक वस्तु है! स्वास्थ्य, धन-सम्पत्ति और पदवियाँ अत्यावश्यक वस्तुएँ नहीं हैं। मनुष्य इनके बिना भी स्वर्ग पा सकता है। परन्तु जो मनुष्य उद्धार पाए बिना मरता है, उसका क्या होगा! काश कि तुम देख पाते कि तुम्हें उद्धार अभी, इसी वर्तमान जीवन में चाहिए, और तुम्हें अपनी आत्मा के लिए उसे दृढ़ता से थाम लेना चाहिए! काश कि तुम देख पाते कि "उद्धार पाया हुआ" या "उद्धार न पाया हुआ" होना ही धर्म का सबसे बड़ा प्रश्न है! उच्च कलीसिया या निम्न कलीसिया, कलीसिया का सदस्य या असहमत, ये सब इसकी तुलना में तुच्छ प्रश्न हैं। स्वर्ग पहुँचने के लिए मनुष्य को मसीह के उद्धार में वास्तविक और व्यक्तिगत भागीदारी चाहिए। निश्चय ही यदि तुम उद्धार नहीं पाए हो, तो अन्त में यही अच्छा होगा कि तुम कभी जन्मे ही न होते!
(ख) क्या थोड़े ही लोग उद्धार पाते हैं? तो यदि तुम अब तक उन थोड़ों में से एक नहीं हो, तो बिना देर किए उनमें से एक होने का यत्न करो। मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो और कैसे हो, परन्तु मैं निडर होकर कहता हूँ, मसीह के पास आओ तो तुम उद्धार पाओगे। जो फाटक जीवन की ओर ले जाता है वह सकरा तो है, परन्तु वह मनश्शे और तरसुस के शाऊल को भीतर आने देने के लिए पर्याप्त चौड़ा था, तो तुम्हें क्यों नहीं? जो मार्ग जीवन की ओर ले जाता है वह सकरा तो है, परन्तु उस पर तुम जैसे हज़ारों पापियों के पदचिह्न बने हैं। सबने उसे अच्छा मार्ग पाया है। सब उस पर चलते रहे, और अन्त में सुरक्षित घर पहुँच गए। यीशु मसीह तुम्हें बुलाता है। सुसमाचार की प्रतिज्ञाएँ तुम्हें प्रोत्साहित करती हैं। काश कि तुम बिना देर किए भीतर प्रवेश करने का यत्न करते!
(ग) क्या थोड़े ही लोग उद्धार पाते हैं? तो यदि तुम्हें सन्देह है कि तुम उन थोड़ों में से एक हो या नहीं, तो तुरन्त इस बात को पक्का कर लो, और फिर सन्देह में न रहो। अपनी आत्मिक दशा जानने के लिए कोई कसर न छोड़ो। अस्पष्ट आशाओं और भरोसों से सन्तुष्ट न हो जाओ। गर्म भावनाओं और परमेश्वर के प्रति क्षणिक अभिलाषाओं पर टिके न रहो। अपने बुलाए जाने और चुनाव को निश्चित करने का यत्न करो। मुझे यह कहने की अनुमति दो कि यदि तुम उद्धार के विषय में अनिश्चित रहकर जीने से सन्तुष्ट हो, तो तुम संसार का सबसे पागलपन-भरा जीवन जी रहे हो! नरक की आग तुम्हारे सामने है, और तुम्हें यह निश्चय नहीं कि तुम्हारी आत्मा का उद्धार हुआ है या नहीं। इस संसार को शीघ्र ही छोड़ना होगा, और तुम्हें निश्चय नहीं कि ऊपर के संसार में तुम्हें ग्रहण करने के लिए कोई निवास-स्थान तैयार है या नहीं। न्याय शीघ्र ही आरम्भ होगा, और तुम्हें निश्चय नहीं कि तुम्हारे पक्ष में विनती करने के लिए कोई सहायक है या नहीं। अनन्तकाल शीघ्र ही आरम्भ होगा, और तुम्हें निश्चय नहीं कि तुम परमेश्वर से भेंट करने के लिए तैयार हो या नहीं। आज ही बैठो और उद्धार के विषय का अध्ययन करो! परमेश्वर को तब तक चैन न लेने दो जब तक अनिश्चितता दूर न हो जाए और तुम्हें यह उचित आशा न मिल जाए कि तुम्हारा उद्धार हो चुका है।
(घ) क्या थोड़े ही लोग उद्धार पाते हैं? तो यदि तुम उद्धार पाए हुओं में से एक हो, तो धन्यवादी बनो। परमेश्वर द्वारा चुने और बुलाए गए, जबकि तुम्हारे आस-पास हज़ारों अविश्वास में डूबे हैं; परमेश्वर का राज्य देखनेवाले, जबकि तुम्हारे आस-पास भीड़ की भीड़ पूरी तरह अन्धी है; इस वर्तमान बुरे संसार से छुड़ाए गए, जबकि भीड़ के भीड़ उसके प्रेम और भय से पराजित हैं; पाप को, परमेश्वर को और मसीह को जानना सिखाए गए, जबकि अनेक लोग, जो देखने में तुम्हारे ही समान भले हैं, अज्ञानता और अन्धकार में जीते हैं! अहा, तुम्हारे पास प्रतिदिन परमेश्वर को धन्य कहने और उसकी स्तुति करने का कारण है! पाप का यह बोध, जिसका तुम अब अनुभव करते हो, कहाँ से आया? मसीह के प्रति यह प्रेम, पवित्रता की यह अभिलाषा, धार्मिकता की यह भूख, वचन में यह आनन्द कहाँ से आया? क्या मुफ़्त अनुग्रह ने ही यह नहीं किया, जबकि तुम्हारे यौवन के अनेक साथी अब भी इसके विषय में कुछ नहीं जानते, या अपने पापों में ही काट डाले गए? तुम्हें सचमुच परमेश्वर को धन्य कहना चाहिए! निश्चय ही व्हाइटफ़ील्ड का यह कहना उचित था कि स्वर्ग में सन्तों का एक गीत यह होगा, "हे प्रभु, मैं ही क्यों? तूने मुझे ही क्यों चुना?"
(ङ) क्या थोड़े ही लोग उद्धार पाते हैं? तो यदि तुम उनमें से एक हो, तो यह देखकर आश्चर्य न करो कि तुम प्रायः अपने आपको अकेला खड़ा पाते हो। मुझे विश्वास है कि संसार में जो भ्रष्टता और दुष्टता तुम अपने चारों ओर देखते हो, उससे तुम कभी-कभी लगभग ठिठक जाते हो। तुम देखते हो कि झूठा सिद्धान्त फैला हुआ है। तुम हर प्रकार का अविश्वास और अधर्म देखते हो। कभी-कभी तुम्हें यह कहने का प्रलोभन होता है, "क्या मैं अपने धर्म में सचमुच सही हूँ? क्या सचमुच ये सब लोग गलत हो सकते हैं?" ऐसे विचारों को मन में स्थान देने से सावधान रहो। स्मरण रखो, तुम अपने स्वामी के वचनों की सच्चाई का व्यावहारिक प्रमाण ही पा रहे हो। यह न सोचो कि उसकी योजनाएँ विफल हो रही हैं। यह न सोचो कि संसार में उसका कार्य आगे नहीं बढ़ रहा। वह अब भी अपनी स्तुति के लिए एक प्रजा को निकाल रहा है। वह अब भी सारे संसार में यहाँ-वहाँ अपने लिए गवाह खड़े कर रहा है। जब सब अन्त में इकट्ठे किए जाएँगे, तब उद्धार पाए हुए लोग "ऐसी बड़ी भीड़ पाए जाएँगे जिसे कोई गिन नहीं सकता।" (प्रकाशित वाक्य 7:9।) पृथ्वी अब भी प्रभु के ज्ञान से भर जाएगी। सब जातियाँ उसकी सेवा करेंगी, सब राजा उसका आदर करने में आनन्दित होंगे। परन्तु रात अभी बीती नहीं है। प्रभु की सामर्थ्य का दिन अभी आने को है। इस बीच सब कुछ वैसे ही हो रहा है जैसा उसने 1800 वर्ष पहले कहा था: बहुत लोग नाश हो रहे हैं और थोड़े उद्धार पा रहे हैं।
(च) क्या थोड़े ही लोग उद्धार पाते हैं? तो यदि तुम उनमें से एक हो, तो अत्यधिक भक्ति से न डरो। अपने मन में यह ठान लो कि तुम पवित्रता, आत्मिक-मनोभाव और परमेश्वर के प्रति समर्पण की उच्चतम श्रेणी का लक्ष्य रखोगे, और पवित्रीकरण की किसी निम्न श्रेणी से सन्तुष्ट न होगे। दृढ़ निश्चय करो कि परमेश्वर के अनुग्रह से तुम मसीही जीवन को संसार की दृष्टि में सुन्दर बनाओगे। स्मरण रखो कि संसार के लोगों के सामने सच्चे धर्म के बहुत थोड़े ही उदाहरण हैं। जहाँ तक तुमसे हो सके, यत्न करो कि वे थोड़े उदाहरण तुम्हारे स्वामी की सेवा की सराहना कराएँ। काश कि हर सच्चा मसीही यह याद रखता कि वह अन्धकारमय संसार के बीच प्रकाश-स्तम्भ के रूप में खड़ा किया गया है, और इस प्रकार जीने का परिश्रम करता कि उसका हर अंग प्रकाश को प्रतिबिम्बित करे और कोई पक्ष धुँधला न रहे!
(छ) क्या उद्धार पानेवाले थोड़े हैं? तो फिर, यदि तुम उनमें से एक हो, तो आत्माओं की भलाई करने का हर अवसर काम में लाओ। अपने मन में यह बात ठान लो कि तुम्हारे आस-पास के लोगों की विशाल बहुसंख्या सदा के लिए नाश होने के भयंकर संकट में है। उन तक सुसमाचार पहुँचाने के लिए हर साधन लगा दो। जलती आग में से लकड़ियाँ खींच निकालने के हर मसीही उद्यम में सहायता करो। उस हर संस्था को उदारता से दान दो जिसका उद्देश्य अनन्त सुसमाचार का फैलाव है। अपना सारा प्रभाव पूरे मन से और बिना किसी संकोच के आत्माओं की भलाई के काम में लगा दो। ऐसे मनुष्य की नाईं जीओ जो पूरी रीति से यह विश्वास करता है कि समय थोड़ा है और अनन्तकाल निकट है—शैतान बलवन्त है और पाप बढ़ता जा रहा है—अन्धकार बहुत गहरा है और ज्योति बहुत थोड़ी—अभक्त बहुत हैं और भक्त बहुत थोड़े—संसार की वस्तुएँ मात्र क्षणिक छायाएँ हैं, और स्वर्ग और नरक ही बड़ी ठोस वास्तविकताएँ हैं।
हाय! बहुत से विश्वासी जैसा जीवन बिताते हैं, उस पर कैसा शोक होता है! कितने ही ठण्डे और जमे हुए हैं—धर्म के विषय में कोई निश्चित काम करने में कितने धीमे, और बहुत आगे बढ़ जाने से कितने डरते हैं—कोई नया काम करने में कितने पीछे हटनेवाले—किसी भले आन्दोलन को हतोत्साहित करने को कितने तैयार—चुपचाप बैठे रहना ही अच्छा है, इसके कारण खोजने में कितने चतुर—यह मानने को कभी तैयार नहीं कि सक्रिय परिश्रम का "समय" आ गया है—दोष निकालने में कितने बुद्धिमान—और बढ़ती बुराइयों का सामना करने की योजनाएँ बनाने में कितने निकम्मे! सचमुच जब कोई उन बहुतों की चाल देखता है जो विश्वासी गिने जाते हैं, तो कभी-कभी उसे ऐसा लग सकता है कि सारा संसार स्वर्ग जा रहा है और नरक केवल एक झूठ है।
आओ, हम सब मन की इस दशा से सावधान रहें! हम इसे मानना चाहें या न चाहें, नरक तेज़ी से भर रहा है। मसीह प्रतिदिन एक आज्ञा न माननेवाली प्रजा की ओर अपना हाथ बढ़ाए हुए है। बहुत से लोग उस चौड़े मार्ग पर हैं जो विनाश की ओर ले जाता है! थोड़े ही उस मार्ग पर हैं जो जीवन की ओर ले जाता है! बहुत, बहुत लोगों के नाश होने की सम्भावना है। थोड़े, बहुत थोड़े लोगों के उद्धार पाने की सम्भावना है।
इस लेख के आरम्भ में जैसे मैंने पूछा था, वैसे ही मैं हर पाठक से एक बार फिर पूछता हूँ—क्या तुम उद्धार पाओगे? यदि तुम अभी उद्धार नहीं पा चुके हो, तो मेरे हृदय की इच्छा और परमेश्वर से मेरी प्रार्थना यह है कि तुम बिना देर किए उद्धार की खोज करो। यदि तुम उद्धार पा चुके हो, तो मेरी इच्छा है कि तुम उद्धार पाए हुए प्राण की नाईं जीओ—और उस मनुष्य की नाईं जो जानता है कि उद्धार पानेवाले थोड़े हैं।
"सकेत फाटक से प्रवेश करो, क्योंकि चौड़ा है वह फाटक और सरल है वह मार्ग जो विनाश को पहुँचाता है, और बहुत से हैं जो उसमें से प्रवेश करते हैं। क्योंकि सकेत है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है, और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं।" मत्ती 7:13-14
तुम कैसे पढ़ते हो?
"पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ो" (यूहन्ना 5:39)
"तू कैसे पढ़ता है?" (लूका 10:26)।
प्रार्थना के बाद व्यावहारिक धर्म में बाइबल पढ़ने के समान महत्त्वपूर्ण और कुछ नहीं है। परमेश्वर ने दया करके हमें एक ऐसी पुस्तक दी है जो "तुझे मसीह यीशु पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकती है" (2 तीमुथियुस 3:15)। उस पुस्तक को पढ़ने से हम सीख सकते हैं कि क्या विश्वास करें, कैसे बनें और क्या करें; सुख-चैन से कैसे जीएँ और शान्ति से कैसे मरें। वह मनुष्य धन्य है जिसके पास बाइबल है! उससे भी अधिक धन्य वह है जो उसे पढ़ता है! सबसे अधिक धन्य वह है जो केवल उसे पढ़ता ही नहीं, वरन् उसका पालन भी करता है और उसे अपने विश्वास और आचरण का नियम बना लेता है!
फिर भी यह एक शोकजनक तथ्य है कि मनुष्य में परमेश्वर के दानों का दुरुपयोग करने की दुःखद क्षमता है। उसके विशेषाधिकार, उसकी शक्ति और उसकी योग्यताएँ, सब बड़ी चतुराई से उन उद्देश्यों से भिन्न कामों में बिगाड़ दी जाती हैं जिनके लिए वे दी गई थीं। उसकी वाणी, उसकी कल्पना, उसकी बुद्धि, उसका बल, उसका समय, उसका प्रभाव, उसका धन—अपने सृष्टिकर्ता की महिमा करने के साधन बनने के बदले—प्रायः व्यर्थ गँवाए जाते हैं, या उसके अपने स्वार्थ के लिए काम में लाए जाते हैं। और जैसे मनुष्य स्वभाव से परमेश्वर की अन्य दयाओं का बुरा उपयोग करता है, वैसे ही लिखित वचन का भी करता है। सारे मसीही जगत् पर एक ही व्यापक दोष लगाया जा सकता है, और वह दोष है बाइबल की उपेक्षा और उसका दुरुपयोग।
इस दोष को सिद्ध करने के लिए हमें और कहीं देखने की आवश्यकता नहीं: प्रमाण हमारे अपने द्वार पर है। मुझे कोई सन्देह नहीं कि इस समय हमारे देश में जितनी बाइबलें हैं, उतनी संसार के आरम्भ से अब तक कभी न थीं। जितनी बाइबलें अब खरीदी और बेची जाती हैं—जितनी बाइबलें छापी और बाँटी जाती हैं—उतनी हमारे एक जाति होने के समय से कभी न थीं। हम हर पुस्तक-भण्डार में बाइबलें देखते हैं, हर आकार, मूल्य और रूप की बाइबलें—बड़ी बाइबलें और छोटी बाइबलें—धनवानों के लिए बाइबलें और निर्धनों के लिए बाइबलें। देश के लगभग हर घर में बाइबल है। परन्तु इस सारे समय में मुझे भय है कि हम यह भूलने के संकट में हैं कि बाइबल का "होना" एक बात है और उसे "पढ़ना" बिलकुल दूसरी बात।
यही उपेक्षित पुस्तक वह विषय है जिसके बारे में मैं आज इस लेख के पाठकों से बात करता हूँ। निश्चय ही तुम बाइबल के साथ जो कर रहे हो, वह कोई छोटी बात नहीं है। निश्चय ही जब दूसरे देशों में महामारी फैल रही है, तब तुम्हें खोजकर देखना चाहिए कि कहीं वह रोग का चिह्न तुम पर तो नहीं है। मेरी ओर ध्यान दो, जब मैं तुम्हारे सामने कुछ सीधे-सादे कारण रखता हूँ कि क्यों हर उस मनुष्य को जिसे अपनी आत्मा की चिन्ता है, बाइबल का बड़ा मूल्य मानना, उसका नियमित अध्ययन करना और उसकी विषय-वस्तु से भली-भाँति परिचित होना चाहिए।
I. पहली बात यह कि, "किसी मनुष्य के उद्धार के लिए उन बातों के ज्ञान को छोड़कर, जो बाइबल में पाई जाती हैं, और कोई ज्ञान नितान्त आवश्यक नहीं है।"
हम ऐसे दिनों में जी रहे हैं जब दानिय्येल के वचन हमारी आँखों के सामने पूरे हो रहे हैं: "बहुत लोग इधर-उधर जाएँगे, और ज्ञान बढ़ जाएगा" (दानिय्येल 12:4)। जहाँ देखो वहाँ पाठशालाएँ बढ़ रही हैं। नए महाविद्यालय खुल रहे हैं। पुराने विश्वविद्यालयों में सुधार और उन्नति हो रही है। नई पुस्तकें निरन्तर छप रही हैं। संसार के आरम्भ से अब तक कभी इतना सिखाया, इतना सीखा और इतना पढ़ा नहीं गया जितना अब। यह सब भला है। मैं इससे आनन्दित हूँ। किसी भी जाति के लिए अज्ञानी जनसंख्या एक जोखिम-भरा और महँगा बोझ है। वह उस पहले मनुष्य का सहज शिकार बन जाती है जो उसे बुराई करने के लिए फुसलाने उठ खड़ा हो। परन्तु मैं यह कहता हूँ—हमें कभी न भूलना चाहिए कि मनुष्य का सिर जितनी भी शिक्षा पा सकता है, वह सब उसकी आत्मा को नरक से नहीं बचाएगी, जब तक कि वह बाइबल के सत्यों को न जाने।
एक मनुष्य "के पास अपार विद्या हो सकती है और फिर भी वह कभी उद्धार न पाए।" वह संसार में बोली जानेवाली आधी भाषाओं का स्वामी हो सकता है। वह स्वर्ग और पृथ्वी की ऊँची से ऊँची और गहरी से गहरी बातों से परिचित हो सकता है। उसने इतनी पुस्तकें पढ़ी हो सकती हैं कि वह चलता-फिरता विश्वकोश बन गया हो। वह आकाश के तारों, हवा के पक्षियों, पृथ्वी के पशुओं और समुद्र की मछलियों से भलीभाँति परिचित हो सकता है। वह सुलैमान की नाईं "लबानोन के देवदार से लेकर भीत में से उगनेवाले जूफा तक के पेड़-पौधों का वर्णन" कर सकता है, और पशुओं, पक्षियों, रेंगनेवाले जन्तुओं और मछलियों के विषय में भी शिक्षा दे सकता है (1 राजाओं 4:33)। वह अग्नि, वायु, पृथ्वी और जल के सब रहस्यों पर व्याख्यान दे सकता है। फिर भी यदि वह बाइबल के सत्य से अनजान रहकर मरे, तो वह कंगाल होकर मरता है! रसायनशास्त्र ने कभी दोषी विवेक को चुप नहीं कराया। गणित ने कभी टूटे हुए हृदय को चंगा नहीं किया। संसार के सारे विज्ञान किसी मरते हुए मनुष्य को कभी शान्ति नहीं दे पाए। कोई सांसारिक दर्शन मृत्यु के समय आशा नहीं दे सका। कोई प्राकृतिक धर्मशास्त्र पवित्र परमेश्वर से भेंट होने की संभावना के सामने शान्ति नहीं दे सका। ये सब बातें पृथ्वी की हैं और मनुष्य को पृथ्वी के स्तर से ऊपर कभी नहीं उठा सकतीं। वे मनुष्य को पृथ्वी पर अपना थोड़ा-सा समय अपने संगी मनुष्यों से कुछ अधिक गरिमामय चाल से अकड़कर चलते और व्याकुल होते हुए बिताने के योग्य बना सकती हैं, परन्तु वे उसे पंख कभी नहीं दे सकतीं कि वह स्वर्ग की ओर उड़ सके। जिसके पास इनका सबसे बड़ा भाग है, वह भी समय आने पर पाएगा कि बाइबल के ज्ञान के बिना उसके पास कोई स्थायी सम्पत्ति नहीं है। मृत्यु उसकी सारी उपलब्धियों का अन्त कर देगी, और मृत्यु के बाद वे उसे कुछ भी लाभ न पहुँचाएँगी।
एक मनुष्य "बहुत अज्ञानी हो सकता है, और फिर भी उद्धार पा सकता है।" हो सकता है कि वह एक अक्षर भी न पढ़ सके, न कोई पत्र लिख सके। वह अपने नगर या ज़िले की सीमा से बाहर के भूगोल के विषय में कुछ न जानता हो, और यह भी न बता सके कि इंग्लैंड से कौन-सा निकट है, पेरिस या न्यूयॉर्क। वह अंकगणित कुछ न जानता हो, और दस लाख तथा एक हज़ार में कोई अन्तर न समझे। वह इतिहास कुछ न जानता हो, अपने ही देश का भी नहीं, और बिलकुल न जानता हो कि उसके देश का प्रधान कोई कबीले का मुखिया है या महारानी एलिज़ाबेथ। वह विज्ञान और उसकी खोजों के विषय में कुछ न जानता हो, और यह कि जूलियस सीज़र ने अपनी जीतें बारूद से पाईं, या प्रेरितों के पास छापाखाना था, या सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता है, इन बातों का उसे कुछ अनुमान तक न हो। फिर भी यदि उसी मनुष्य ने बाइबल का सत्य अपने कानों से सुना और अपने हृदय से उस पर विश्वास किया, तो वह अपनी आत्मा के उद्धार के लिए पर्याप्त जानता है। अन्त में वह लाज़र के साथ स्वर्ग में पाया जाएगा, जबकि उसका विज्ञान-ज्ञानी संगी मनुष्य, जो बिना मन फिराए मरा, सदा के लिए खो जाएगा।
आजकल विज्ञान और "उपयोगी ज्ञान" की बहुत चर्चा होती है। परन्तु बाइबल का ज्ञान ही वह एकमात्र ज्ञान है जो आवश्यक है और अनन्तकाल तक उपयोगी है। मनुष्य धन, विद्या, स्वास्थ्य या मित्रों के बिना भी स्वर्ग पहुँच सकता है, परन्तु बाइबल के ज्ञान के बिना वह कभी वहाँ नहीं पहुँचेगा। किसी मनुष्य की बुद्धि बहुत प्रबल हो सकती है, और उसकी स्मृति में वह सब भरा हो सकता है जो प्रबल बुद्धि ग्रहण कर सकती है, फिर भी यदि वह बाइबल की बातों को नहीं जानता, तो उसकी आत्मा सदा के लिए नाश हो जाती है। हाय! हाय! हाय! उस मनुष्य पर जो बाइबल से अनजान रहकर मरता है!
आज मैं इन पृष्ठों के पाठकों से इसी पुस्तक के विषय में बात कर रहा हूँ। "आप ऐसी पुस्तक के साथ क्या करते हैं", यह कोई छोटी बात नहीं है। यह आपकी आत्मा के जीवन से सम्बन्ध रखती है। मैं आपको बुलाता हूँ, मैं आपको चिताता हूँ कि मेरे प्रश्न का सच्चा उत्तर दें। आप बाइबल के साथ क्या कर रहे हैं? क्या आप उसे पढ़ते हैं? आप उसे कैसे पढ़ते हैं?
II. दूसरी बात यह कि "संसार में कोई ऐसी पुस्तक नहीं है जो उस रीति से लिखी गई हो जैसे बाइबल।"
बाइबल "परमेश्वर की प्रेरणा से रची गई है" (2 तीमुथियुस 3:16)। इस बात में वह अन्य सब लेखों से सर्वथा भिन्न है। परमेश्वर ने उसके लेखकों को सिखाया कि क्या लिखें। परमेश्वर ने उनके मन में विचार और भाव डाले। परमेश्वर ने उन विचारों और भावों को लिखने में उनकी लेखनी का मार्गदर्शन किया। जब आप उसे पढ़ते हैं, तो आप आपके ही समान दीन और अपूर्ण मनुष्यों की स्वयं सीखी हुई रचनाएँ नहीं पढ़ रहे, परन्तु अनन्त परमेश्वर के वचन पढ़ रहे हैं। जब आप उसे सुनते हैं, तो आप अल्पायु नश्वर मनुष्यों की भूल-भरी रायें नहीं सुन रहे, परन्तु राजाओं के राजा के अटल मन को सुन रहे हैं। जिन मनुष्यों को बाइबल लिखने के लिए काम में लाया गया, उन्होंने अपनी ओर से नहीं कहा। वे "पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर की ओर से बोलते थे" (2 पतरस 1:21)। संसार की अन्य सब पुस्तकें, चाहे अपनी रीति से कितनी ही अच्छी और उपयोगी हों, कम या अधिक दोषपूर्ण हैं। जितना आप उन्हें ध्यान से देखेंगे, उतना ही उनके दोष और कलंक आपको दिखाई देंगे। केवल बाइबल ही पूर्णतः सिद्ध है। आदि से अन्त तक वह "परमेश्वर का वचन" है।
मैं इसका कोई लम्बा और परिश्रमी प्रमाण देने में समय नष्ट नहीं करूँगा। मैं साहस के साथ कहता हूँ कि स्वयं यह पुस्तक ही अपनी प्रेरणा की सबसे उत्तम साक्षी है। यह संसार का सबसे बड़ा स्थायी चमत्कार है। जो यह कहने का साहस करता है कि बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा से नहीं रची गई, उसे बताना चाहिए कि वह ऐसा क्यों मानता है, यदि बता सके। वह इस पुस्तक के विलक्षण स्वभाव और चरित्र की ऐसी व्याख्या करे जो किसी भी साधारण बुद्धि के मनुष्य को सन्तुष्ट करे। मेरी समझ में प्रमाण का भार उसी पर पड़ता है।
यह कहना कि बाइबल के लेखकों की शैली एक-दूसरे से भिन्न है, प्रेरणा के विरुद्ध कुछ भी सिद्ध नहीं करता, जैसा कि कुछ लोगों ने दावा किया है। यशायाह यिर्मयाह की तरह नहीं लिखता, और पौलुस यूहन्ना की तरह नहीं लिखता। यह बिलकुल सच है, फिर भी इन लोगों की रचनाएँ किसी भी प्रकार से कम प्रेरित नहीं हैं। समुद्र के जल के अनेक भिन्न-भिन्न रंग होते हैं। कहीं वह नीला दिखाई देता है, तो कहीं हरा। फिर भी यह भेद उस भाग की गहराई या उथलेपन के कारण, या तल की प्रकृति के कारण होता है, जिसे हम देखते हैं। हर स्थिति में जल वही खारा समुद्र ही है। मनुष्य की साँस उस वाद्य के स्वभाव के अनुसार भिन्न-भिन्न ध्वनियाँ उत्पन्न कर सकती है जिसे वह बजाता है। बाँसुरी, बीन और तुरही, हर एक का अपना विशेष स्वर होता है। फिर भी जो साँस उन स्वरों को निकालती है, वह हर स्थिति में एक ही है। स्वर्ग में जो ग्रहों का प्रकाश हम देखते हैं, वह अत्यन्त भिन्न-भिन्न होता है। मंगल, शनि और बृहस्पति, हर एक का अपना अलग रंग है। फिर भी हम जानते हैं कि सूर्य का जो प्रकाश हर ग्रह परावर्तित करता है, वह हर स्थिति में एक ही है। ठीक इसी प्रकार पुराने और नए नियम की सब पुस्तकें प्रेरित सत्य हैं, फिर भी उस सत्य का रूप उस मन के अनुसार बदलता है जिसके द्वारा पवित्र आत्मा उसे प्रवाहित करता है। लेखकों की हस्तलिपि और शैली इतनी भिन्न है कि यह प्रमाणित हो जाए कि हर एक का अपना अलग व्यक्तित्व था; परन्तु वह ईश्वरीय मार्गदर्शक जो सब कुछ लिखवाता और निर्देशित करता है, सदा एक ही है। सब प्रेरित हैं। हर अध्याय, हर पद और हर शब्द परमेश्वर की ओर से है।
ओह, कि जो लोग प्रेरणा के विषय में सन्देहों और विचारों से व्याकुल हैं, वे शान्त मन से स्वयं बाइबल की जाँच करते! ओह, कि वे वह सलाह मान लेते जो ऑगस्टीन के मन फिराव का पहला कदम बनी, "उठाओ और पढ़ो! उठाओ और पढ़ो!" कितनी कठिनाइयाँ और आपत्तियाँ उगते सूर्य के सामने कुहरे की नाईं तुरन्त मिट जातीं! कितने लोग शीघ्र ही मान लेते, "यहाँ परमेश्वर की उँगली है! इस पुस्तक में परमेश्वर है, और मैं यह जानता न था।"
यही वह पुस्तक है जिसके विषय में मैं इस पत्र के पाठकों से बात कर रहा हूँ। निश्चय ही यह कोई छोटी बात नहीं कि "तुम इस पुस्तक के साथ क्या कर रहे हो।" यह कोई छोटी बात नहीं कि परमेश्वर ने इस पुस्तक को "हमारी शिक्षा के लिये लिखवाया" है, और "परमेश्वर के वचन" तुम्हारे सामने हैं (रोमियों 3:2; 15:4)। मैं तुम्हें आदेश देता हूँ, मैं तुम्हें बुलाता हूँ कि मेरे प्रश्नों का सच्चा उत्तर दो। तुम बाइबल के साथ क्या कर रहे हो? क्या तुम उसे पढ़ते भी हो? तुम उसे कैसे पढ़ते हो?
III. तीसरी बात यह कि "संसार में कोई भी पुस्तक ऐसी नहीं है जिसमें बाइबल के समान महत्त्वपूर्ण विषय हों।"
यदि मैं उन सब महान बातों का पूरा वर्णन करने लगूँ जो बाइबल में, और केवल बाइबल में पाई जाती हैं, तो समय कम पड़ जाएगा। बाइबल के खजाने किसी रूपरेखा या संक्षिप्त चित्रण से प्रदर्शित नहीं किए जा सकते। उन अनुपम सत्यों की सूची से जो वह प्रकट करती है, एक पूरी पुस्तक भरना सरल होगा, और फिर भी उसकी आधी सम्पत्ति अनकही रह जाएगी।
परमेश्वर की उद्धार की योजना और उस मार्ग का जिससे हमारे पाप क्षमा हो सकते हैं, जो वर्णन वह हमें देती है, वह कैसा महिमामय और आत्मा को तृप्त करनेवाला है! परमेश्वर-मनुष्य यीशु मसीह का पापियों को बचाने के लिये जगत में आना—उसके द्वारा मनुष्य के लिये पूरा किया गया छुटकारा, कि उसने हमारे स्थान पर दुःख उठाया, अर्थात् धर्मी ने अधर्मियों के लिये—अपने ही लहू से हमारे पापों की पूरी कीमत चुका देना—हर उस पापी का धर्मी ठहराया जाना जो केवल यीशु पर विश्वास करता है—पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की यह तत्परता कि वे ग्रहण करें, क्षमा करें और पूरी रीति से उद्धार करें—ये सब सत्य कितने अकथनीय रूप से महान और सान्त्वनादायक हैं! बाइबल के बिना हम इनमें से कुछ भी न जानते।
नई वाचा के महान मध्यस्थ—मनुष्य मसीह यीशु—का जो वृत्तान्त वह हमें देती है, वह कितना सान्त्वनादायक है! चार बार उसका चित्र कृपापूर्वक हमारी आँखों के सामने खींचा गया है। चार अलग-अलग गवाह हमें उसके आश्चर्यकर्मों और सेवकाई के विषय में, उसके वचनों और कार्यों के विषय में, उसके जीवन और मृत्यु के विषय में, उसकी सामर्थ्य और प्रेम के विषय में, उसकी कोमलता और धीरज के विषय में, उसकी चाल, उसके शब्दों, उसके कामों, उसके विचारों और उसके हृदय के विषय में बताते हैं। परमेश्वर का धन्यवाद हो, बाइबल में एक बात ऐसी है जिसे अत्यन्त पूर्वाग्रही पाठक भी शायद ही समझने से चूके, और वह है यीशु मसीह का चरित्र!
भले लोगों के जो उदाहरण बाइबल हमें देती है, वे कितने उत्साहवर्धक हैं! वह हमें बहुतों के विषय में बताती है जो हमारे ही समान स्वभाव के मनुष्य थे—ऐसे स्त्री-पुरुष जिन पर हमारी ही तरह चिन्ताएँ, क्रूस, परिवार, परीक्षाएँ, क्लेश और रोग थे—फिर भी जो "विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञाओं के वारिस" हुए, और सुरक्षित घर पहुँच गए (इब्रानियों 6:12)। इन लोगों के इतिहास में से वह कुछ भी छिपाकर नहीं रखती। उनकी भूलें, उनकी निर्बलताएँ, उनके संघर्ष, उनके अनुभव, उनकी प्रार्थनाएँ, उनकी स्तुतियाँ, उनके उपयोगी जीवन, उनकी सुखद मृत्यु—सब कुछ पूरी रीति से लिखा गया है। और वह हमें बताती है कि इन स्त्री-पुरुषों का परमेश्वर और उद्धारकर्ता आज भी वैसा ही है जैसा कल था, और अब भी अनुग्रह करने को तैयार है।
बुरे लोगों के जो उदाहरण बाइबल हमें देती है, वे कितने शिक्षाप्रद हैं! वह हमें ऐसे स्त्री-पुरुषों के विषय में बताती है जिनके पास हमारी ही तरह ज्योति, ज्ञान और अवसर थे, फिर भी उन्होंने अपने हृदय कठोर कर लिए, संसार से प्रेम रखा, अपने पापों से चिपके रहे, अपनी ही बात पर अड़े रहे, डाँट को तुच्छ जाना, और अपनी आत्माओं को सदा के लिये नाश कर लिया। और वह हमें चेतावनी देती है कि जिस परमेश्वर ने फिरौन, शाऊल, अहाब, ईज़ेबेल और यहूदा को दण्ड दिया, वह ऐसा परमेश्वर है जो कभी नहीं बदलता, और कि नरक सचमुच है।
परमेश्वर से प्रेम रखनेवालों के लिये बाइबल में जो प्रतिज्ञाएँ हैं, वे कितनी बहुमूल्य हैं! शायद ही कोई ऐसी संकट की घड़ी या दशा हो जिसके लिये उसके पास आशा और प्रोत्साहन का कोई वचन न हो। और वह मनुष्यों को बताती है कि परमेश्वर को इन प्रतिज्ञाओं की स्मरण-दिलाई सुहाती है, और कि यदि उसने कहा है कि वह कुछ करेगा, तो उसकी प्रतिज्ञा अवश्य पूरी होगी।
मसीह यीशु में विश्वास करनेवाले के सामने बाइबल जो आशाएँ रखती है, वे कितनी धन्य हैं! मृत्यु की घड़ी में शान्ति—कब्र के उस पार विश्राम और सुख—पुनरुत्थान की भोर में महिमामय देह—न्याय के दिन पूर्ण और विजयी रूप से निर्दोष ठहराया जाना—मसीह के राज्य में सदा का प्रतिफल—इकट्ठे किए जाने के दिन प्रभु के लोगों से आनन्दपूर्ण भेंट—हाँ, यही हर सच्चे मसीही के भविष्य की आशाएँ हैं। ये सब उसी पुस्तक में लिखी हैं—उस पुस्तक में जो पूरी की पूरी सत्य है।
बाइबल मनुष्य के चरित्र पर जो प्रकाश डालती है, वह कितना प्रभावशाली है! वह हमें सिखाती है कि जीवन की हर स्थिति और हर व्यवसाय में मनुष्यों से क्या होने और क्या करने की आशा की जा सकती है। वह मानवीय कार्यों के गुप्त स्रोतों और उद्देश्यों की, और मनुष्यों के हाथ में रहनेवाली घटनाओं के साधारण क्रम की गहरी समझ देती है। वही सचमुच "मन के विचारों और भावों को जाँचनेवाला" है (इब्रानियों 4:12)। नीतिवचन और सभोपदेशक की पुस्तकों में कितनी गहरी बुद्धि भरी है! मैं एक पुराने मसीही के इस कथन को भली-भाँति समझ सकता हूँ,
"मुझे एक दीया और एक बाइबल दे दो और मुझे अँधेरी काल-कोठरी में बन्द कर दो, तो मैं तुम्हें बता दूँगा कि सारा संसार क्या-क्या कर रहा है।"
ये सब ऐसी बातें हैं जो मनुष्य को बाइबल के सिवा और कहीं नहीं मिल सकतीं। सम्भवतः हमें इसका ज़रा भी अनुमान नहीं कि यदि हमारे पास बाइबल न होती तो हम इन बातों के विषय में कितना कम जानते। हम उस वायु का, जिसमें हम साँस लेते हैं, और उस सूर्य का, जो हम पर चमकता है, मूल्य मुश्किल से जानते हैं, क्योंकि हमने कभी जाना ही नहीं कि इनके बिना रहना कैसा होता है। जिन सत्यों पर मैं अभी विचार कर रहा था, उनका मूल्य हम नहीं समझते, क्योंकि हम उन लोगों के अन्धकार को नहीं समझते जिन पर ये सत्य प्रकट नहीं किए गए। निश्चय ही कोई जीभ उन निधियों का मूल्य पूरी तरह नहीं बता सकती जो इस एक पुस्तक में समाई हैं। पुराने यूहन्ना न्यूटन ने ठीक ही कहा था कि उसकी दृष्टि में कुछ पुस्तकें ताँबे की थीं, कुछ चाँदी की, और थोड़ी-सी सोने की, परन्तु अकेली बाइबल ऐसी पुस्तक थी मानो पूरी की पूरी बैंक-नोटों से बनी हो।
यही वह पुस्तक है जिसके विषय में मैं आज इस लेख के पाठक से बात कर रहा हूँ। निश्चय ही यह कोई छोटी बात नहीं कि तुम बाइबल के साथ क्या कर रहे हो। यह कोई छोटी बात नहीं कि तुम इस निधि का उपयोग किस प्रकार कर रहे हो। मैं तुम्हें चुनौती देता हूँ, मैं तुम्हें बुलाता हूँ कि मेरे प्रश्न का सच्चा उत्तर दो—तुम
बाइबल के साथ क्या कर रहे हो? क्या तुम उसे पढ़ते हो? तुम उसे कैसे पढ़ते हो?
4. चौथी बात यह कि "संसार में कोई भी पुस्तक ऐसी नहीं है जिसने समस्त मानव-जाति पर बाइबल जैसे अद्भुत प्रभाव डाले हों।"
(क) यह वही पुस्तक है जिसके सिद्धान्तों ने प्रेरितों के दिनों में संसार को उलट-पलट दिया।
अनेक शताब्दियाँ बीत चुकी हैं जब परमेश्वर ने पृथ्वी के एक दूर के कोने से कुछ यहूदियों को ऐसा काम करने भेजा, जो मनुष्य की दृष्टि में असम्भव ही लगा होगा। उसने उन्हें ऐसे समय भेजा जब सारा संसार अन्धविश्वास, क्रूरता, वासना और पाप से भरा था। उसने उन्हें यह घोषणा करने भेजा कि पृथ्वी के स्थापित धर्म झूठे और व्यर्थ हैं, और उन्हें छोड़ देना चाहिए। उसने उन्हें मनुष्यों को समझाने भेजा कि वे पुरानी आदतें और रीतियाँ छोड़ें और भिन्न जीवन जिएँ। उसने उन्हें सबसे विकृत मूर्तिपूजा से, सबसे नीच और घिनौने व्यभिचार से, कट्टर याजकवर्ग से, उपहास करनेवाले दार्शनिकों से, अज्ञानी जनता से, रक्त के प्यासे सम्राटों से और रोम के सम्पूर्ण प्रभाव से लड़ने भेजा। देखने में इससे अधिक अव्यावहारिक और सफलता की कम सम्भावनावाला कोई उद्यम कभी न था!
और उसने उन्हें इस युद्ध के लिए किस प्रकार सज्जित किया? उसने उन्हें कोई सांसारिक हथियार नहीं दिए। उसने उन्हें सहमति के लिए विवश करने की कोई सांसारिक शक्ति नहीं दी, और विश्वास मोल लेने के लिए कोई सांसारिक धन नहीं दिया। उसने केवल पवित्र आत्मा को उनके हृदयों में और पवित्रशास्त्र को उनके हाथों में रख दिया। उसने केवल यह आज्ञा दी कि वे बाइबल के सिद्धान्तों की व्याख्या और समझाइश करें, उनके पालन की माँग करें और उन्हें प्रचारित करें। पहली शताब्दी में मसीही धर्म का प्रचारक न तो लोगों को डराने के लिए तलवार और सेनावाला मनुष्य था, और न हिन्दुओं की लज्जाजनक मूर्तियों के पुजारियों के समान लोगों को लुभाने के लिए विषय-भोग की छूटवाला मनुष्य। नहीं, वह एक पवित्र पुस्तक लिए हुए एक पवित्र मनुष्य से अधिक कुछ न था।
और एक ही पुस्तकवाले इन मनुष्यों को कैसी सफलता मिली? कुछ ही पीढ़ियों में उन्होंने बाइबल के सिद्धान्तों के द्वारा समाज का रूप पूरी तरह बदल डाला। उन्होंने अन्यजातियों के देवताओं के मन्दिर खाली कर दिए। उन्होंने मूर्तिपूजा को भूखा मारकर उसे रेत पर पड़े जहाज़ के समान सूखा छोड़ दिया। उन्होंने संसार में मनुष्य और मनुष्य के बीच नैतिकता का एक ऊँचा स्तर स्थापित किया। उन्होंने स्त्री के चरित्र और पद को ऊँचा उठाया। उन्होंने पवित्रता और शिष्टता का मानदण्ड बदल दिया। उन्होंने मनुष्य की क्रूर और रक्तरंजित रीतियों का अन्त कर दिया, जैसे मल्लयुद्ध की लड़ाइयाँ—इस परिवर्तन को रोकना असम्भव था। सताव और विरोध व्यर्थ रहे। एक के बाद एक विजय प्राप्त होती गई। एक के बाद एक बुराई पिघलती गई। मनुष्य चाहें या न चाहें, वे धीरे-धीरे नए धर्म की गति से प्रभावित हुए और उसकी शक्ति के भँवर में खिंचते चले गए।
पृथ्वी हिल गई, और उनके सड़े-गले आश्रय भूमि पर आ गिरे। बाढ़ चढ़ी, और उन्होंने पाया कि उन्हें भी उसके साथ ऊपर उठना पड़ेगा। मसीही धर्म का वृक्ष फूलता और बढ़ता गया, और जो ज़ंजीरें उन्होंने उसकी वृद्धि को रोकने के लिए उस पर डाली थीं, वे डोरी के समान टूट गईं। और यह सब बाइबल के सिद्धान्तों के द्वारा हुआ! बड़ी-बड़ी विजयों की बात करो! सिकन्दर, कैसर और नेपोलियन की विजयें उनके सामने क्या हैं जिनका मैंने अभी उल्लेख किया? विशालता में, पूर्णता में, परिणामों में और स्थायित्व में बाइबल की विजयों जैसी कोई विजय नहीं।
(ख) यह वही पुस्तक है जिसने गौरवशाली प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के दिनों में यूरोप को उलट-पलट दिया।
पाँच सौ वर्ष पहले मसीही जगत् का जैसा इतिहास था, उसे पढ़कर कोई भी मनुष्य यह देखे बिना नहीं रह सकता कि मसीह की सारी नाममात्र की कलीसिया पर अन्धकार छाया हुआ था, ऐसा गहरा अन्धकार जिसे मानो छुआ जा सकता था। मसीही धर्म में इतना बड़ा परिवर्तन आ गया था कि यदि कोई प्रेरित मरे हुओं में से जी उठता, तो वह उसे पहचान न पाता, और समझता कि मूर्तिपूजा फिर से जीवित हो गई है। सुसमाचार के सिद्धान्त मनुष्यों की परम्पराओं के घने ढेर के नीचे दबे पड़े थे। प्रायश्चित्त के कर्म, तीर्थयात्राएँ, पाप-क्षमा के प्रमाणपत्र, अवशेषों की पूजा, मूर्तियों की पूजा, सन्तों की पूजा और कुँवारी मरियम की पूजा ही अधिकांश लोगों के धर्म का सार और सारांश थे। कलीसिया को एक मूर्ति बना दिया गया था। कलीसिया के पुरोहितों और सेवकों ने मसीह का स्थान हड़प लिया था। और यह सारा शोचनीय अन्धकार किस उपाय से दूर हुआ? केवल बाइबल को फिर से सामने लाने से।
जर्मनी में प्रोटेस्टेंट मत को स्थापित करनेवाली बात केवल लूथर और उसके मित्रों का प्रचार ही नहीं था। उस देश में रोमन कैथोलिक कलीसिया की सामर्थ्य को उखाड़ फेंकनेवाला बड़ा हथियार लूथर द्वारा बाइबल का जर्मन भाषा में किया गया अनुवाद था। इंग्लैंड में रोमन कैथोलिक मत को गिरानेवाली बात केवल अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों के लेख ही नहीं थे। जिस कार्य को आगे बढ़ाया गया, उसके बीज सबसे पहले बहुत वर्ष पहले विक्लिफ़ के बाइबल-अनुवाद ने बोए थे। इंग्लैंड के लोगों के मन पर से पोप की पकड़ ढीली करनेवाली बात केवल हेनरी अष्टम और रोम के पोप का झगड़ा ही नहीं था। वह तो बाइबल का अनुवाद कराने और उसे कलीसियाओं में रखवाने की राजकीय अनुमति थी, ताकि जो चाहे उसे पढ़ सके। हाँ! यह पवित्रशास्त्र का पढ़ा जाना और उसका फैलाया जाना ही था, जिसने मुख्य रूप से
इंग्लैंड, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड में प्रोटेस्टेंट मत के उद्देश्य को स्थापित किया। इसके बिना सम्भवतः पहले धर्म-सुधारकों के मरते ही लोग अपनी पुरानी दासता में लौट जाते। परन्तु बाइबल पढ़ने से जनता का मन धीरे-धीरे सच्चे धर्म के सिद्धान्तों से भर गया। लोगों की आँखें भली-भाँति खुल गईं। उनकी आत्मिक समझ पूरी तरह विस्तृत हो गई। रोमन कैथोलिक मत के घिनौने काम स्पष्ट दिखाई देने लगे। शुद्ध सुसमाचार की उत्तमता उनके हृदयों में जमा हुआ विचार बन गई। तब पोपों का बहिष्कार की धमकियाँ गरजाना व्यर्थ था। राजाओं और रानियों का आग और तलवार से प्रोटेस्टेंट मत की गति रोकने का प्रयत्न करना निष्फल था। यह सब बहुत देर से हो रहा था। लोग बहुत कुछ जान चुके थे। उन्होंने ज्योति देख ली थी। उन्होंने आनन्द का शब्द सुन लिया था। उन्होंने सत्य का स्वाद चख लिया था। उनके मनों पर सूर्य उदय हो चुका था। उनकी आँखों से छिलके गिर चुके थे। बाइबल ने उनके भीतर अपना ठहराया हुआ काम पूरा कर दिया था, और उस काम को उलटा नहीं जा सकता था। लोग मिस्र को वापस नहीं जाएँगे। घड़ी की सुइयाँ फिर पीछे नहीं घुमाई जा सकती थीं। मानसिक और नैतिक क्रान्ति हो चुकी थी, और मुख्यतः परमेश्वर के वचन द्वारा हुई थी। सच्ची क्रान्तियाँ वही हैं जो बाइबल करती है। फ्रांस और इंग्लैंड ने जितनी क्रान्तियाँ देखी हैं, वे इनकी तुलना में क्या हैं? कोई क्रान्ति इतनी रक्तहीन नहीं, कोई इतनी सन्तोषजनक नहीं, और कोई स्थायी परिणामों में इतनी समृद्ध नहीं, जितनी बाइबल द्वारा पूरी की गई क्रान्तियाँ!
यही वह पुस्तक है जिस पर जातियों का कल्याण सदा निर्भर रहा है, और जिससे इस समय मसीही जगत् के प्रत्येक जन का परम हित अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। जिस अनुपात में बाइबल का आदर किया जाता है या नहीं किया जाता, उसी अनुपात में किसी जाति में ज्योति या अन्धकार, सदाचार या दुराचार, सच्चा धर्म या अन्धविश्वास, स्वतंत्रता या अत्याचार, अच्छी व्यवस्थाएँ या बुरी व्यवस्थाएँ पाई जाएँगी। मेरे साथ आओ और इतिहास के पन्ने खोलो, तो तुम बीते समयों में इसके प्रमाण पढ़ोगे।
इसे राजाओं के अधीन इस्राएल के इतिहास में पढ़ो। उस समय कितनी बड़ी दुष्टता फैली हुई थी! परन्तु इसमें आश्चर्य क्या है? यहोवा की व्यवस्था बिलकुल भुला दी गई थी, और योशिय्याह के दिनों में वह मन्दिर के एक कोने में फेंकी हुई मिली। (2 राजाओं 22:8)। इसे हमारे प्रभु यीशु मसीह के समय के यहूदियों के इतिहास में पढ़ो। शास्त्रियों और फरीसियों तथा उनके धर्म का चित्र कैसा भयानक है! परन्तु इसमें आश्चर्य क्या है? पवित्रशास्त्र “मनुष्य की परम्परा के कारण व्यर्थ ठहराया गया था” (मत्ती 15:6)। इसे मध्य युग में मसीह की कलीसिया के इतिहास में पढ़ो। उसकी अज्ञानता और अन्धविश्वास के जो वृत्तान्त हमारे पास हैं, उनसे बुरा क्या हो सकता है? परन्तु इसमें आश्चर्य क्या है? वे समय बहुत अन्धकारमय थे, क्योंकि लोगों के पास बाइबल की ज्योति नहीं थी।
यही वह पुस्तक है जिसका सभ्य संसार अपनी बहुत-सी सर्वोत्तम और प्रशंसनीय संस्थाओं के लिए ऋणी है। सम्भवतः कम लोग जानते हैं कि लोगों ने सार्वजनिक भलाई के लिए जो अनेक अच्छी बातें अपनाई हैं, उनका मूल स्पष्ट रूप से बाइबल में खोजा जा सकता है। जहाँ-जहाँ इसे ग्रहण किया गया, वहाँ इसने स्थायी चिह्न छोड़े हैं। समाज को व्यवस्थित रखनेवाली अनेक उत्तम व्यवस्थाएँ बाइबल से ली गई हैं। सत्य, ईमानदारी और पति-पत्नी के सम्बन्धों के विषय में नैतिकता का जो स्तर मसीही जातियों में प्रचलित है, वह बाइबल से ही मिला है, और उसका आदर बहुत मामलों में चाहे कितना ही दुर्बल क्यों न हो, वही मसीहियों और अन्यजातियों के बीच इतना बड़ा अन्तर उत्पन्न करता है। निर्धन श्रमिक के लिए उस अत्यन्त दयालु प्रबन्ध, अर्थात् प्रभु के विश्राम के दिन, रविवार के लिए हम बाइबल के ऋणी हैं। जितनी भी दयापूर्ण और परोपकारी संस्थाएँ विद्यमान हैं, उन लगभग सब के लिए हम बाइबल के प्रभाव के ऋणी हैं। बाइबल के संसार को प्रभावित करने से पहले बीमारों, निर्धनों, बूढ़ों, अनाथों, पागलों, मन्दबुद्धि लोगों और अन्धों की चिन्ता प्रायः कभी नहीं की जाती थी। एथेंस या रोम के इतिहासों में उनकी सहायता के लिए बनी संस्थाओं का कोई वृत्तान्त तुम व्यर्थ ही खोजोगे। हाँ! ऐसे बहुत लोग हैं जो बाइबल का उपहास करते हैं और कहते हैं कि इसके बिना भी संसार भली-भाँति चल जाता, परन्तु वे यह नहीं सोचते कि बाइबल के प्रति उनका अपना ऋण कितना बड़ा है। जब अविश्वासी हमारे किसी बड़े अस्पताल में बीमार पड़ा होता है, तो वह यह बहुत कम सोचता है कि उसके वर्तमान सारे सुख उसी पुस्तक के कारण हैं जिसे वह तुच्छ जानता है। यदि बाइबल न होती, तो वह दुःख में, बिना देखभाल के, अनदेखा और अकेला मर गया होता। सचमुच जिस संसार में हम रहते हैं, वह अपने ऋणों से अनजान है। मेरा विश्वास है कि न्याय का दिन उस पूरे लाभ को प्रकट करेगा जो बाइबल ने मनुष्यजाति को पहुँचाया है।
यही अद्भुत पुस्तक आज उस विषय के रूप में है जिसके बारे में मैं इस लेख के पाठक से बात करता हूँ। निश्चय ही यह कोई छोटी बात नहीं है कि आप बाइबल के साथ क्या कर रहे हैं। विजयी सेनापतियों की तलवारें—वह जहाज़ जिस पर नेल्सन ने इंग्लैंड के बेड़ों को विजय की ओर बढ़ाया—वह जल-चालित दाब-यन्त्र जिसने मेनाई का नलीदार पुल उठाया; ये सब महान शक्ति के साधन होने के कारण रुचि की वस्तुएँ हैं। जिस पुस्तक की मैं आज चर्चा करता हूँ वह इन सबसे हज़ार गुना अधिक सामर्थी साधन है। निश्चय ही यह कोई छोटी बात नहीं कि आप उसे वह ध्यान दे रहे हैं या नहीं जिसकी वह योग्य है। मैं आपसे आग्रह करता हूँ, आपको बुलाता हूँ कि आज मुझे सच्चा उत्तर दें—आप बाइबल के साथ क्या कर रहे हैं? क्या आप उसे पढ़ते हैं? आप उसे कैसे पढ़ते हैं?
V. पाँचवें स्थान पर, "संसार में कोई भी पुस्तक ऐसी नहीं जो खुले हृदय से पढ़नेवाले प्रत्येक जन के लिये उतना कर सके जितना बाइबल।"
बाइबल इस संसार की बुद्धि सिखाने का दावा नहीं करती। वह भूविज्ञान या खगोलविज्ञान समझाने के लिये नहीं लिखी गई थी। वह न आपको गणित सिखाएगी, न प्राकृतिक दर्शन। वह आपको न चिकित्सक बनाएगी, न वकील, न अभियन्ता।
परन्तु उस संसार के अतिरिक्त, जिसमें मनुष्य अभी रहता है, एक और संसार भी विचार करने योग्य है। मनुष्य धन कमाने और काम करने के अतिरिक्त अन्य उद्देश्यों के लिये भी रचा गया था। उसके शरीर के हितों के अतिरिक्त और भी हित हैं जिन पर उसे ध्यान देना है, और वे हित उसकी आत्मा के हित हैं। बाइबल विशेष रूप से अमर आत्मा के हितों को बढ़ावा देने में समर्थ है। यदि आप व्यवस्था-विधि जानना चाहें तो ब्लैकस्टोन या सुग्डन का अध्ययन कर सकते हैं। यदि खगोलविज्ञान या भूविज्ञान जानना हो तो हर्शेल और लायल का अध्ययन कर सकते हैं। परन्तु यदि आप जानना चाहें कि अपनी आत्मा का उद्धार कैसे हो, तो आपको परमेश्वर के लिखित वचन का अध्ययन करना होगा।
बाइबल "तुझे मसीह यीशु पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकती है" (2 तीमुथियुस 3:15)। वह आपको वह मार्ग दिखा सकती है जो स्वर्ग को ले जाता है। वह आपको वह सब सिखा सकती है जो आपको जानना आवश्यक है, वह सब बता सकती है जिस पर आपको विश्वास करना आवश्यक है, और वह सब समझा सकती है जो आपको करना आवश्यक है। वह आपको दिखा सकती है कि आप क्या हैं—एक पापी। वह आपको दिखा सकती है कि परमेश्वर क्या है—सर्वथा पवित्र। वह आपको क्षमा, शान्ति और अनुग्रह के महान दाता को दिखा सकती है—यीशु मसीह को। मैंने एक अंग्रेज़ के विषय में पढ़ा है जो ब्लेयर, रदरफ़ोर्ड और डिक्सन के दिनों में स्कॉटलैंड गया, जो तीन प्रसिद्ध प्रचारक थे, और उसने तीनों को बारी-बारी से सुना। उसने कहा कि पहले ने उसे परमेश्वर की महिमा-महत्ता दिखाई—दूसरे ने उसे मसीह की सुन्दरता दिखाई—और तीसरे ने उसे उसके अपने हृदय की सब बातें दिखा दीं। बाइबल की महिमा और सुन्दरता यही है कि वह अपने पहले अध्याय से लेकर अन्तिम अध्याय तक कमोबेश इन्हीं तीन बातों की शिक्षा देती रहती है।
पवित्र आत्मा द्वारा हृदय पर लगाई गई बाइबल "वह महान साधन है जिससे आत्माएँ पहले-पहल परमेश्वर की ओर फिरती हैं।" वह सामर्थी परिवर्तन आम तौर पर वचन के किसी पद या सिद्धान्त से आरम्भ होता है जो मनुष्य के विवेक तक पहुँचा दिया जाता है। इसी रीति से बाइबल ने हज़ारों नैतिक चमत्कार किए हैं। उसने पियक्कड़ों को संयमी बनाया—अशुद्ध लोगों को पवित्र—चोरों को ईमानदार और क्रोधी स्वभाव के लोगों को नम्र। उसने मनुष्यों के जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी है। उसने उनकी पुरानी बातें जाती रहने दीं और उनके सारे चाल-चलन नए कर दिए। उसने सांसारिक लोगों को पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करना सिखाया। उसने सुख-विलास के प्रेमियों को परमेश्वर के प्रेमी बनना सिखाया। उसने मनुष्यों के स्नेह की धारा को नीचे की ओर बहने के बदले ऊपर की ओर बहना सिखाया। उसने मनुष्यों को सदा पृथ्वी की चिन्ता करने के बदले स्वर्ग का विचार करना और देखने के सहारे जीने के बदले विश्वास से जीना सिखाया। यह सब उसने संसार के हर भाग में किया है। यह सब आज भी पूरा हो रहा है। रोमन कैथोलिक चमत्कार, जिन पर निर्बल लोग विश्वास करते हैं, इन सबके सामने क्या हैं, चाहे वे सच भी होते? सच्चे महान चमत्कार तो वे हैं जो वचन के द्वारा निरन्तर किए जा रहे हैं।
पवित्र आत्मा द्वारा हृदय पर लगाई गई बाइबल "वह मुख्य साधन है जिससे मनुष्य परिवर्तन के पश्चात् विश्वास में दृढ़ किए और बढ़ाए जाते हैं।" वह उन्हें शुद्ध करने, पवित्र करने, धार्मिकता की शिक्षा देने और हर एक भले कर्म के लिये भली-भाँति सिद्ध करने में समर्थ है। (भजन संहिता 119:9; यूहन्ना 17:17; 2 तीमुथियुस 3:16-17)। आत्मा सामान्यतः ये काम लिखित वचन के द्वारा करता है; कभी पढ़े गए वचन से, कभी प्रचार किए गए वचन से, परन्तु वचन के बिना कदाचित् ही कभी। बाइबल विश्वासी को दिखा सकती है कि इस संसार में कैसे चले कि परमेश्वर को प्रसन्न करे। वह उसे सिखा सकती है कि जीवन के सब सम्बन्धों में मसीह की महिमा कैसे करे, और उसे अच्छा अगुवा, कर्मचारी, अधीनस्थ, पति, पिता या पुत्र बना सकती है। वह उसे समर्थ कर सकती है कि विपत्तियों और हानि को बिना कुड़कुड़ाए सह ले और कहे, "सब कुशल है।" वह उसे समर्थ कर सकती है कि कब्र में झाँककर कहे, "मैं किसी विपत्ति से न डरूँगा" (भजन संहिता 23:4)। वह उसे समर्थ कर सकती है कि न्याय और अनन्तकाल के विषय में सोचे और भयभीत न हो। वह उसे समर्थ कर सकती है कि सताव को बिना डगमगाए सह ले और मसीह के सत्य का इन्कार करने के बदले स्वतंत्रता और प्राण तक त्याग दे।
क्या वह आत्मा में थका हुआ है? वह उसे जगा सकती है।
क्या वह शोक में है? वह उसे शान्ति दे सकती है।
क्या वह भटक रहा है? वह उसे लौटा ला सकती है।
क्या वह निर्बल है? वह उसे बलवन्त कर सकती है।
क्या वह अविश्वासी की संगति में है? वह उसे बुराई से बचाए रख सकती है।
क्या वह अकेला है? वह उससे बातचीत कर सकती है। (भजन संहिता 6:22)।
यह सब बाइबल सब विश्वासियों के लिये कर सकती है—छोटे से छोटे के लिये भी और बड़े से बड़े के लिये भी—धनवान के लिये भी और निर्धन के लिये भी। वह हज़ारों के लिये यह कर चुकी है, और प्रतिदिन हज़ारों के लिये कर रही है।
जिस मनुष्य के पास बाइबल है और जिसके हृदय में पवित्र आत्मा है, उसके पास वह सब कुछ है जो उसे आत्मिक रीति से बुद्धिमान बनाने के लिये नितान्त आवश्यक है। उसे जीवन की रोटी तोड़ने के लिये किसी याजक की आवश्यकता नहीं। उसे सब सत्य में अगुवाई पाने के लिये न प्राचीन परम्पराओं की, न प्राचीन पिताओं की रचनाओं की, न कलीसिया की वाणी की आवश्यकता है। सत्य का कुआँ उसके सामने खुला है, और उसे और क्या चाहिए? हाँ! चाहे वह अकेला किसी बन्दीगृह में बन्द हो, या किसी निर्जन द्वीप पर फेंका गया हो—चाहे वह फिर कभी कोई गिरजाघर या सेवक न देखे—यदि उसके पास केवल बाइबल है, तो उसे अचूक मार्गदर्शक मिल गया है, और उसे और किसी की आवश्यकता नहीं। यदि उसमें उस बाइबल को ठीक रीति से पढ़ने की इच्छा है, तो वह निश्चय ही उसे वह मार्ग सिखाएगी जो स्वर्ग को ले जाता है। अचूकता केवल यहीं निवास करती है। वह इसमें नहीं है
कलीसिया में नहीं है। यह महासभाओं में नहीं है। यह सेवकों में नहीं है। यह केवल लिखित वचन में है।
(क) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग कहते हैं कि उन्हें बाइबल में उद्धार करनेवाली कोई सामर्थ्य नहीं मिली।
वे हमें बताते हैं कि उन्होंने इसे पढ़ने का प्रयत्न किया, पर उससे कुछ नहीं सीखा। उन्हें इसमें बोझिल और अमूर्त बातों के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। वे हमसे पूछते हैं कि इसकी सामर्थ्य की चर्चा करने से हमारा क्या तात्पर्य है।
मैं उत्तर देता हूँ कि इसमें निस्सन्देह कुछ कठिन बातें हैं, नहीं तो यह परमेश्वर की पुस्तक न होती। इसमें ऐसी बातें हैं जिन्हें समझना कठिन है, पर वे इसीलिए कठिन हैं कि हमारे पास उन्हें समझने की मानसिक योग्यता नहीं है। इसमें हमारी तर्कशक्ति से परे की बातें हैं, पर कोई ऐसी बात नहीं जो समझाई न जा सके, यदि हमारी समझ की आँखें दुर्बल और धुँधली न होतीं। परन्तु क्या अपनी अज्ञानता को स्वीकार करना ही समस्त ज्ञान की आधारशिला और नींव नहीं है? क्या हर विज्ञान के आरम्भ में बहुत सी बातें बिना प्रमाण माननी नहीं पड़तीं, तभी हम उससे परिचय की ओर एक भी कदम बढ़ा सकते हैं? क्या हम अपने बच्चों से ऐसी बहुत सी बातें नहीं सिखवाते जिनका अर्थ वे आरम्भ में नहीं समझ पाते? तो फिर जब हम परमेश्वर के वचन का अध्ययन आरम्भ करते हैं, तब क्या हमें "गहरी बातों" के मिलने की आशा नहीं रखनी चाहिए, और साथ ही यह भी विश्वास करना चाहिए कि यदि हम पढ़ने में लगे रहें तो उनमें से बहुतों का अर्थ किसी दिन स्पष्ट कर दिया जाएगा? निःसन्देह हमें ऐसी ही आशा रखनी और ऐसा ही विश्वास करना चाहिए। हमें नम्रता से पढ़ना चाहिए। हमें बहुत कुछ भरोसे पर मान लेना चाहिए। हमें विश्वास करना चाहिए कि जो हम अभी नहीं जानते, उसे आगे जान लेंगे; कुछ इस जगत में, और सब आनेवाले जगत में।
परन्तु मैं उस मनुष्य से पूछता हूँ जिसने बाइबल पढ़ना इसलिए छोड़ दिया कि उसमें कठिन बातें हैं, क्या उसने उसमें बहुत सी बातें सरल और स्पष्ट नहीं पाईं? मैं उसके विवेक से पूछता हूँ कि क्या उसे इसमें आरम्भ से अन्त तक बड़े-बड़े चिह्न और सिद्धान्त दिखाई नहीं दिए? मैं उससे पूछता हूँ कि क्या उद्धार के लिए आवश्यक बातें प्रकाश-स्तम्भों की नाईं उसकी आँखों के सामने साफ़ खड़ी नहीं दिखाई दीं? उस जहाज़ के कप्तान के विषय में हम क्या सोचेंगे जो रात को चैनल के प्रवेश-द्वार पर आकर यह दावा करे कि वह ब्रिटिश तट के हर गाँव, बस्ती और खाड़ी को नहीं जानता? क्या हम उसे आलसी और कायर नहीं समझेंगे, जबकि लिज़र्ड, एडीस्टोन, स्टार्ट, पोर्टलैंड, सेंट कैथरीन, बीची हेड, डंजनेस और फ़ोरलैंड्स की बत्तियाँ अनेक दीपकों की नाईं उसे नदी तक पहुँचाने के लिए चमक रही हों? क्या हम न कहेंगे, तूने बड़ी मार्गदर्शक बत्तियों के सहारे जहाज़ क्यों नहीं चलाया? और उस मनुष्य से हम क्या कहें जो बाइबल पढ़ना इसलिए छोड़ देता है कि उसमें कठिन बातें हैं, जबकि उसकी अपनी दशा, स्वर्ग का मार्ग और परमेश्वर की सेवा का मार्ग, सब सूर्य की किरण से लिखे हुए की नाईं स्पष्ट और असंदिग्ध रूप से लिखे हैं? निश्चय हमें उस मनुष्य से कहना चाहिए कि उसकी आपत्तियाँ आलसी बहानों से अधिक कुछ नहीं हैं और सुनने के योग्य नहीं हैं।
(ख) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग यह आपत्ति उठाते हैं कि हज़ारों लोग बाइबल पढ़ते हैं और अपने पढ़ने से रत्ती भर भी अच्छे नहीं बनते।
और वे हमसे पूछते हैं कि जब ऐसा है तो बाइबल की उस सामर्थ्य का, जिसका इतना बखान किया जाता है, क्या हुआ?
मैं उत्तर देता हूँ कि इतने लोगों का बाइबल को बिना किसी लाभ के पढ़ने का कारण स्पष्ट और सीधा है—वे इसे सही रीति से नहीं पढ़ते। संसार में हर काम को करने की प्रायः एक सही रीति होती है और एक गलत रीति; और जैसा अन्य बातों में है, वैसा ही बाइबल के पढ़ने के विषय में भी है। बाइबल सब अन्य पुस्तकों से ऐसी पूरी तरह भिन्न नहीं है कि इससे कोई अन्तर न पड़े कि आप उसे किस मनोभाव और रीति से पढ़ते हैं। केवल छपे अक्षरों पर आँखें फिरा लेने से यह अपने आप कोई भला नहीं करती, जैसे बपतिस्मा और प्रभु-भोज केवल ग्रहण कर लेने के गुण से कोई भला नहीं करते। जब तक इसे नम्रता और सच्ची प्रार्थना के साथ न पढ़ा जाए, यह सामान्यतः कोई भला नहीं करती। जो सबसे उत्तम इंजन कभी बना हो, वह भी बेकार है यदि मनुष्य उसे चलाना न जाने। जो सबसे उत्तम धूपघड़ी कभी बनी हो, वह भी अपने स्वामी को दिन का समय नहीं बताएगी यदि वह इतना अज्ञानी हो कि उसे छाया में रख दे। जैसा उस इंजन और उस धूपघड़ी के विषय में है, वैसा ही बाइबल के विषय में है। जब लोग इसे बिना लाभ के पढ़ते हैं, तो "दोष पुस्तक का नहीं, उन्हीं का है।"
जो मनुष्य बाइबल की सामर्थ्य पर इसलिए सन्देह करता है कि बहुत से लोग इसे पढ़ते हैं और पढ़कर भी अच्छे नहीं बनते, उससे मैं कहता हूँ कि किसी वस्तु का दुरुपयोग उसके उपयोग के विरुद्ध कोई तर्क नहीं है। मैं उससे निडर होकर कहता हूँ कि आज तक किसी स्त्री या पुरुष ने उस पुस्तक को बच्चे जैसे दृढ़ मन से—कूश देशवासी खोजे और बिरीया के लोगों की नाईं (प्रेरितों के काम 8:28; 17:11)—पढ़ा हो और स्वर्ग का मार्ग चूक गया हो। हाँ, न्याय के दिन बहुत से लोग लज्जित किए जाएँगे; परन्तु एक भी प्राण ऐसा नहीं उठेगा जो कह सके कि मैं प्यासा होकर बाइबल के पास गया और उसमें मुझे जीवन का जल न मिला—मैंने पवित्रशास्त्र में सत्य को ढूँढ़ा, और ढूँढ़ने पर भी वह न मिला। नीतिवचन में बुद्धि के विषय में जो वचन कहे गए हैं, वे बाइबल के विषय में ठीक-ठीक सत्य हैं: "यदि तू प्रवीणता के लिये पुकारे, और समझ के लिये अपना स्वर उठाए, और उसको चाँदी की नाईं ढूँढ़े, और गुप्त धन के समान उसकी खोज में लगा रहे, तो तू यहोवा के भय को समझेगा, और परमेश्वर का ज्ञान तुझे प्राप्त होगा" (नीतिवचन 2:3-5)।
यही अद्भुत पुस्तक वह विषय है जिसके विषय में मैं आज इस लेख के पाठकों से बात करता हूँ। निश्चय ही यह कोई हल्की बात नहीं है कि "आप बाइबल के साथ क्या करते हैं।" उस मनुष्य के विषय में आप क्या सोचेंगे जिसने हैज़े के समय शरीर के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एक अचूक नुस्खे को तुच्छ जाना? यदि आप अपनी आत्मा के अनन्त स्वास्थ्य के एकमात्र अचूक नुस्खे को तुच्छ जानते हैं, तो आपके विषय में क्या सोचा जाना चाहिए? मैं आपसे आग्रह करता हूँ, मैं आपसे विनती करता हूँ, मेरे प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर दीजिए। आप बाइबल के साथ क्या करते हैं? क्या आप उसे पढ़ते हैं? आप उसे कैसे पढ़ते हैं?
VI. छठे स्थान पर, "बाइबल ही वह एकमात्र कसौटी है जिससे सिद्धान्त या कर्तव्य के सब प्रश्नों को परखा जा सकता है।"
प्रभु परमेश्वर हमारी गिरी हुई और दीन समझ की निर्बलताओं और दुर्बलताओं को जानता है। वह जानता है कि मन फिराव के बाद भी सही और गलत के विषय में हमारी धारणाएँ अत्यन्त धुँधली रहती हैं। वह जानता है कि शैतान कितनी चतुराई से भ्रम पर सत्य का आवरण चढ़ा सकता है, और गलत बात को ऐसे युक्तिसंगत तर्कों से सजा सकता है कि वह सही दिखाई देने लगे। यह सब जानते हुए उसने दया करके हमें सत्य और भ्रम, सही और गलत की एक अचूक कसौटी दी है, और इस बात का ध्यान रखा है कि वह कसौटी एक लिखित पुस्तक—पवित्रशास्त्र—हो।
संसार पर दृष्टि डालनेवाला कोई भी मनुष्य ऐसे प्रबन्ध की बुद्धि को देखे बिना नहीं रह सकता। कोई भी मनुष्य बहुत दिन जीकर यह जाने बिना नहीं रह सकता कि उसे निरन्तर एक सलाहकार और मार्गदर्शक की, विश्वास और आचरण के ऐसे नियम की आवश्यकता रहती है जिस पर वह भरोसा कर सके। यदि वह पशु के समान आत्मा और विवेक के बिना नहीं जीता, तो वह पाएगा कि कठिन और उलझन में डालनेवाले प्रश्न उस पर बार-बार टूट पड़ते हैं। वह अकसर अपने आप से पूछेगा, मुझे क्या मानना चाहिए? और मुझे क्या करना चाहिए?
(क) संसार सिद्धान्त की बातों के विषय में कठिनाइयों से भरा हुआ है। भ्रम का घर सत्य के घर के बिलकुल पास है। एक का द्वार दूसरे के द्वार से इतना मिलता-जुलता है कि भूल होने का जोखिम निरन्तर बना रहता है।
क्या कोई मनुष्य बहुत पढ़ता या यात्रा करता है? उसे शीघ्र ही पता चल जाएगा कि जो लोग मसीही कहलाते हैं उनमें परस्पर विरोधी मत प्रचलित हैं। वह देखेगा कि इस महत्वपूर्ण प्रश्न का कि उद्धार पाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए, भिन्न-भिन्न लोग एक-दूसरे से बहुत भिन्न उत्तर देते हैं। रोमन कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट और मॉर्मन, प्रत्येक यह दावा करेगा कि सत्य केवल उसी के पास है। प्रत्येक उससे कहेगा कि सुरक्षा केवल उसके ही दल में मिलती है। प्रत्येक कहता है, "हमारे साथ आओ।" यह सब उलझन में डालनेवाला है। मनुष्य क्या करे?
क्या वह यहाँ अपने देश में ही किसी कलीसिया में चुपचाप बस जाता है? उसे शीघ्र ही पता चलेगा कि हमारे अपने देश में भी अत्यन्त परस्पर-विरोधी विचार माने जाते हैं। वह शीघ्र ही जान लेगा कि विश्वास के विभिन्न अंगों और अनुच्छेदों के सापेक्ष महत्व के विषय में मसीहियों के बीच गम्भीर मतभेद हैं। एक मनुष्य कलीसिया के शासन के सिवा और कुछ नहीं सोचता—दूसरा केवल संस्कारों, सेवाओं और रीतियों के सिवा—तीसरा सुसमाचार के प्रचार के सिवा कुछ नहीं। क्या वह समाधान के लिए सेवकों के पास जाता है? सम्भव है कि वह एक सेवक को एक सिद्धान्त और दूसरे को दूसरा सिद्धान्त सिखाते पाए। यह सब उलझन में डालनेवाला है। मनुष्य क्या करे?
इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर है। मनुष्य को केवल बाइबल को ही अपना नियम बनाना चाहिए। उसे ऐसी किसी बात को न ग्रहण करना चाहिए और न मानना चाहिए जो वचन के अनुसार न हो। उसे सब धार्मिक शिक्षा को एक ही सीधी कसौटी पर परखना चाहिए—क्या यह बाइबल से मेल खाती है? पवित्रशास्त्र क्या कहता है?
मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि इस देश के मसीहियों की आँखें इस विषय में और अधिक खुल जाएँ। मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे उपदेशों, पुस्तकों, मतों और सेवकों को बाइबल के तराज़ू में तौलना सीखें, और हर बात का मूल्य इस आधार पर आँकें कि वह वचन के कितना अनुकूल है। मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे देखें कि यह बहुत मायने नहीं रखता कि कोई बात किसने कही। प्रश्न यह है—क्या कही गई बात पवित्रशास्त्र के अनुसार है? यदि है, तो उसे ग्रहण करना और मानना चाहिए। यदि नहीं है, तो उसे अस्वीकार करके एक ओर फेंक देना चाहिए। मैं उस आज्ञाकारी स्वीकृति के परिणामों से डरता हूँ जिसके साथ बहुत से मसीही "प्रचारक" की हर बात को मान लेते हैं। मुझे भय है कि कहीं वे अन्धे किए गए अरामियों के समान ऐसी जगह न पहुँचा दिए जाएँ जिसका उन्हें पता तक नहीं, और किसी दिन जागकर अपने आप को रोम के अधिकार में न पाएँ। (2 राजाओं 6:20)। काश, मनुष्य केवल यह याद रखते कि बाइबल उन्हें किस उद्देश्य से दी गई थी!
मैं मसीहियों से कहता हूँ कि जैसा कुछ लोग कहते हैं, यह कहना व्यर्थ है कि किसी सेवक की शिक्षा को वचन से परखना घमण्ड है। जब एक कलीसिया में एक सिद्धान्त और दूसरी में दूसरा सिद्धान्त सुनाया जाता है, तब लोगों को स्वयं पढ़कर निर्णय करना चाहिए। दोनों सिद्धान्त सही नहीं हो सकते, और दोनों को वचन से परखा जाना चाहिए। मैं उन्हें सब बातों से बढ़कर यह चिताता हूँ कि वे कभी यह न समझें कि सुसमाचार का कोई सच्चा सेवक इस बात को नापसन्द करेगा कि उसके लोग उसकी हर शिक्षा को बाइबल से मापें। इसके विपरीत, वे जितना अधिक बाइबल पढ़ेंगे और उसकी हर बात को बाइबल से जाँचेंगे, वह उतना ही अधिक प्रसन्न होगा। झूठा सेवक कह सकता है, "तुम्हें अपने निजी निर्णय का प्रयोग करने का कोई अधिकार नहीं: बाइबल को हम अभिषिक्त लोगों पर छोड़ दो।" सच्चा सेवक कहेगा, "पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ो, और यदि मैं तुम्हें वह न सिखाऊँ जो पवित्रशास्त्र के अनुसार है, तो मेरा विश्वास मत करो।" झूठा सेवक पुकार सकता है, "कलीसिया की सुनो," और "मेरी सुनो।" सच्चा सेवक कहेगा, "परमेश्वर के वचन की सुनो।"
(ख) परन्तु संसार केवल सिद्धान्त की बातों के विषय में ही कठिनाइयों से नहीं भरा है, वह "आचरण" की बातों के विषय में भी उतनी ही कठिनाइयों से भरा है।
प्रत्येक मसीही कहलानेवाला मनुष्य, जो विवेक के अनुसार चलना चाहता है, जानता होगा कि ऐसा ही है। अत्यन्त उलझन में डालनेवाले प्रश्न निरन्तर उठते रहते हैं। कर्तव्य के मार्ग के विषय में वह चारों ओर से सन्देहों से परखा जाता है, और अकसर उसे मुश्किल से ही दिखाई देता है कि करने योग्य सही बात क्या है।
यदि वह व्यापार या कारोबार में है, तो वह अपने "सांसारिक पेशे" के प्रबन्ध से जुड़े प्रश्नों से परखा जाता है। वह कभी-कभी ऐसी बातें होते देखता है जो अत्यन्त सन्देहास्पद प्रकृति की हैं—ऐसी बातें जिन्हें मुश्किल से ही उचित, सीधी और सच्ची कहा जा सकता है, और ऐसी बातें जो आप नहीं चाहेंगे कि आपके साथ की जाएँ। पर व्यापार में तो सब लोग ये बातें करते हैं। ये सबसे प्रतिष्ठित घरानों में सदा से होती आई हैं। यदि ये न की जाएँ तो लाभदायक व्यापार चल ही नहीं सकता। ये ऐसी बातें नहीं हैं जिनका परमेश्वर ने स्पष्ट नाम लेकर निषेध किया हो। यह सब उलझन में डालनेवाला है। मनुष्य क्या करे?
वह सांसारिक मनोरंजनों के विषय के प्रश्नों से परखा जाता है। घुड़दौड़ें, नाच-रंग, ओपेरा, नाट्यशालाएँ और ताश की गोष्ठियाँ, सब समय बिताने के अत्यन्त सन्देहास्पद तरीके हैं। परन्तु फिर वह बहुत से बड़े लोगों को उनमें भाग लेते देखता है। क्या ये सब लोग गलत हैं? क्या इन बातों में सचमुच इतनी बड़ी हानि हो सकती है? यह सब उलझन में डालनेवाला है। मनुष्य क्या करे?
उसकी परीक्षा उसके बच्चों की शिक्षा के विषय में होती है। वह चाहता है कि उन्हें नैतिक और धार्मिक रीति से पाले, और उनकी आत्माओं का ध्यान रखे। पर बहुत से समझदार लोग उससे कहते हैं कि जवान तो जवान ही रहेंगे—उन्हें बहुत अधिक रोकना-टोकना ठीक नहीं, और उसे स्वयं तमाशों और बच्चों की दावतों में जाना चाहिए, और बच्चों के नाच-गाने के आयोजन भी करने चाहिए। उसे बताया जाता है कि अमुक कुलीन पुरुष या अमुक प्रतिष्ठित महिला सदा ऐसा ही करते हैं, फिर भी वे धर्मी माने जाते हैं। तब यह अवश्य ही बुरा नहीं हो सकता। यह सब बड़ी उलझन में डालनेवाला है। वह क्या करे?
इन सब प्रश्नों का केवल एक ही उत्तर है। मनुष्य को बाइबल को अपने आचरण का नियम बनाना चाहिए। उसके प्रमुख सिद्धान्तों को वह दिशासूचक यन्त्र बनाए जिससे वह जीवन में अपनी राह तय करे। हर कठिन बात और प्रश्न को वह बाइबल के अक्षर या आत्मा की कसौटी पर परखे। "व्यवस्था और चितावनी की ओर चलो! पवित्रशास्त्र क्या कहता है?" उसे इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि दूसरे लोग क्या ठीक समझते हैं। उसे अपनी घड़ी अपने पड़ोसी की दीवार-घड़ी से नहीं, वरन् वचन की घड़ी से मिलानी चाहिए।
मैं अपने पाठकों को गम्भीरता से चिताता हूँ कि जो सूत्र मैंने अभी रखा है उस पर चलें, और जीवन के सब दिन उससे कठोरता से बँधे रहें। आप कभी पछताएँगे नहीं। इसे अपना प्रमुख सिद्धान्त बना लें कि वचन के विरुद्ध कभी कुछ न करेंगे। इस दोष की परवाह न करें कि आप आवश्यकता से अधिक कठोर हैं और व्यर्थ की बारीकी करनेवाले हैं। स्मरण रखें कि आप एक कठोर और पवित्र परमेश्वर की सेवा करते हैं। उस साधारण आपत्ति पर कान न दें कि जो नियम आपने ठहराया है वह असम्भव है और इस संसार में उसका पालन नहीं हो सकता। ऐसी आपत्ति उठानेवाले साफ़-साफ़ कहें कि फिर बाइबल मनुष्य को किस प्रयोजन से दी गई थी। वे स्मरण रखें कि अन्तिम दिन हम सब का न्याय बाइबल से होगा, और वे यहीं उससे अपने आप को जाँचना सीखें, ऐसा न हो कि न्याय के दिन वह उन्हें दोषी ठहराए।
विश्वास और आचरण का यही सामर्थी नियम वह पुस्तक है जिसके विषय में मैं आज इस लेख के पाठकों से बात कर रहा हूँ। निश्चय ही यह कोई छोटी बात नहीं कि "आप बाइबल के साथ क्या कर रहे हैं।" जब दाएँ और बाएँ दोनों ओर संकट निकट हो, तब आपको सोचना चाहिए कि परमेश्वर ने जो रक्षा-साधन दिया है उसके साथ आप क्या कर रहे हैं। मैं आपसे आग्रह करता हूँ, विनती करता हूँ, कि मेरे प्रश्न का सच्चा उत्तर दें। आप बाइबल के साथ क्या कर रहे हैं? क्या आप उसे पढ़ते हैं? आप उसे कैसे पढ़ते हैं?
7. सातवीं बात यह कि "बाइबल वह पुस्तक है जिसके सहारे परमेश्वर के सब सच्चे सेवक सदा जिए हैं और जिससे उन्होंने सदा प्रेम रखा है।"
परमेश्वर जो भी जीवित वस्तु रचता है उसे भोजन चाहिए। जो जीवन परमेश्वर देता है उसे सम्भाले जाने और पोषण पाने की आवश्यकता होती है। यह पशु और वनस्पति के जीवन के विषय में सच है—पक्षियों, पशुओं, मछलियों, रेंगनेवाले जन्तुओं, कीड़ों और पौधों के विषय में। आत्मिक जीवन के विषय में भी यह उतना ही सच है। जब पवित्र आत्मा किसी मनुष्य को पाप की मृत्यु से उठाकर यीशु मसीह में नई सृष्टि बनाता है, तब उस मनुष्य के हृदय के नए सिद्धान्त को भोजन चाहिए, और उसे सम्भालनेवाला एकमात्र भोजन परमेश्वर का वचन है।
संसार के एक छोर से दूसरे छोर तक ऐसा कोई स्त्री या पुरुष नहीं हुआ जो सचमुच परिवर्तित हुआ हो और जिसने परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा से प्रेम न रखा हो। जैसे संसार में जन्मा बच्चा स्वाभाविक रूप से उस दूध की लालसा करता है जो उसके पोषण के लिए ठहराया गया है, वैसे ही "नया जन्म पाया हुआ" प्राण वचन के निर्मल दूध की लालसा करता है। यह परमेश्वर की सब सन्तानों का एक सामान्य चिह्न है—वे "यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहते हैं" (भजन संहिता 1:2)।
मुझे कोई ऐसा व्यक्ति दिखाइए जो बाइबल पढ़ने को तुच्छ जानता है, या बाइबल के प्रचार को कम महत्त्व देता है, तो मैं इसे निश्चित तथ्य मानता हूँ कि उसका अभी "नया जन्म" नहीं हुआ है। वह रीतियों और विधियों के लिए उत्साही हो सकता है। वह कलीसिया में जाने और प्रभु-भोज लेने में परिश्रमी हो सकता है। परन्तु यदि ये बातें उसे बाइबल से अधिक प्रिय हैं, तो मैं विश्वास नहीं कर सकता कि वह परिवर्तित मनुष्य है। मुझे बताइए कि बाइबल किसी मनुष्य के लिए क्या है, और मैं प्रायः बता दूँगा कि वह मनुष्य कैसा है। हृदय की दशा जाननी हो तो यही नाड़ी परखने की है—यही वायुदाबमापी देखने का है। मैं यह नहीं मान सकता कि आत्मा किसी मनुष्य में वास करे और अपनी उपस्थिति का स्पष्ट प्रमाण न दे। और मैं इसे आत्मा की उपस्थिति का स्पष्ट प्रमाण मानता हूँ जब वचन सचमुच किसी मनुष्य की आत्मा को प्रिय हो।
वचन से प्रेम रखना उन विशेषताओं में से एक है जो हम अय्यूब में देखते हैं। इस कुलपिता और उसके युग के विषय में हम यद्यपि थोड़ा ही जानते हैं, फिर भी यह बात स्पष्ट रूप से उभरकर आती है। वह कहता है, "मैंने उसके मुँह की बातों को अपने आवश्यक भोजन से भी अधिक मूल्यवान जानकर सँभाल रखा है" (अय्यूब 23:12)।
वचन से प्रेम दाऊद के चरित्र की एक चमकती हुई विशेषता है। देखिए कि पवित्रशास्त्र के उस अद्भुत भाग, 119वें भजन में, यह कैसे आदि से अन्त तक दिखाई देता है। वह भली-भाँति कह सकता था, "आहा! मैं तेरी व्यवस्था से कैसी प्रीति रखता हूँ!" (भजन संहिता 119:97)।
वचन से प्रेम पौलुस के चरित्र की एक उल्लेखनीय बात है। वह और उसके साथी पवित्रशास्त्र में सामर्थी पुरुष नहीं तो और क्या थे? उसके उपदेश वचन की व्याख्या और उसके प्रयोग नहीं तो और क्या थे?
वचन से प्रेम हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह में सबसे बढ़कर दिखाई देता है। उसने उसे सब के सामने पढ़ा। उसने उसे निरन्तर उद्धृत किया। उसने बार-बार उसकी व्याख्या की। उसने यहूदियों को सलाह दी कि उसमें "ढूँढ़ें"। उसने उसे शैतान का सामना करने के लिए अपने हथियार के रूप में काम में लिया। उसने बार-बार कहा, "पवित्रशास्त्र का पूरा होना अवश्य है।" उसके अन्तिम कामों में से एक यह था कि उसने "उनकी [चेलों की] समझ खोल दी कि पवित्रशास्त्र को समझें" (लूका 24:45)। मुझे भय है कि जिस मनुष्य में बाइबल के प्रति अपने स्वामी का सा मन और भाव नहीं है, वह मसीह का सच्चा सेवक नहीं हो सकता।
प्रेरितों के दिनों से लेकर अब तक उन सब सन्तों के इतिहास में, जिनके विषय में हम कुछ भी जानते हैं, वचन से प्रेम एक प्रमुख विशेषता रहा है। यही वह दीपक है जिसके पीछे अथानासियुस, क्रिसोस्टम और ऑगस्टीन चले। यही वह दिशासूचक यन्त्र है जिसने वाल्डेन्सियों और अल्बिजेन्सियों को विश्वास का जहाज़ डूबने से बचाए रखा। यही वह कुआँ है जिसे बहुत समय तक बन्द रहने के बाद विक्लिफ़ और लूथर ने फिर खोला। यही वह तलवार है जिससे लैटिमर, ज्यूएल और नॉक्स ने विजय पाई। यही वह मन्ना है जिसने बैक्सटर, ओवेन और प्यूरिटन लोगों की उस श्रेष्ठ मण्डली का पोषण किया और उन्हें युद्ध में बलवन्त किया। यही वह शस्त्रागार है जिससे व्हाइटफ़ील्ड और वेस्ली ने अपने सामर्थी हथियार लिए। यही वह खान है जिससे बिकरस्टेथ और मैकचेन ने बहुमूल्य सोना निकाला।
यद्यपि ये पवित्र जन कुछ बातों में एक-दूसरे से भिन्न थे, तौभी एक बात पर वे सब सहमत थे—वे सब परमेश्वर के वचन से आनन्दित होते थे।
वचन से प्रेम रखना उन पहली बातों में से एक है जो संसार भर के विभिन्न मिशनरी केन्द्रों में मन फिराए हुए अन्यजातियों में दिखाई देती है। गर्म देशों में और ठण्डे देशों में—असभ्य लोगों में और सभ्य लोगों में—न्यूज़ीलैण्ड में, दक्षिण सागर के द्वीपों में, अफ्रीका में, हिन्दुस्तान में—सब जगह एक ही बात है। उन्हें इसे पढ़ा जाता सुनना अच्छा लगता है। वे स्वयं इसे पढ़ सकने की लालसा रखते हैं। वे आश्चर्य करते हैं कि मसीही लोगों ने इसे उनके पास पहले क्यों नहीं भेजा। मोफ़ैट ने अफ्रीकानेर का, जो दक्षिण अफ्रीका का उग्र सरदार था, जब वह पहली बार सुसमाचार के प्रभाव में आया, कैसा सजीव चित्र खींचा है! वह कहता है, "मैंने उसे प्रायः एक बड़ी चट्टान की छाया में लगभग सारा दिन बाइबल के पन्नों को उत्सुकता से पढ़ते देखा है।" एक मन फिराए हुए गरीब अश्वेत जन का बाइबल के विषय में कहा हुआ वचन कैसा हृदयस्पर्शी है! उसने कहा, "यह कभी पुरानी नहीं होती और कभी ठण्डी नहीं पड़ती।" एक और बूढ़े अश्वेत जन की बात कैसी मर्मस्पर्शी थी, जब कुछ लोग उसकी वृद्धावस्था के कारण उसे पढ़ना सीखने से हतोत्साहित करना चाहते थे। उसने कहा, "नहीं! मैं मरते दम तक इसे नहीं छोड़ूँगा। केवल इस एक पद को पढ़ सकने के लिए सारा परिश्रम सार्थक है, 'परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए' (यूहन्ना 3:16)।"
बाइबल से प्रेम रखना हमारे अपने देश के सब मन फिराए हुए स्त्री-पुरुषों के बीच सहमति के बड़े बिन्दुओं में से एक है। अनेक इंजीलवादी सम्प्रदायों के लोग, जैसे ही वे सच्चे मसीही बनते हैं, बाइबल का आदर करने में एकजुट हो जाते हैं। यह वह मन्ना है जिस पर हमारे नए इस्राएल के सब गोत्र पलते हैं और तृप्त करनेवाला भोजन पाते हैं। यह वह सोता है जिसके चारों ओर मसीह के झुण्ड के सब भिन्न-भिन्न दल इकट्ठे होते हैं, और जहाँ से कोई भेड़ प्यासी नहीं लौटती।
ओह, इस देश के विश्वासी लिखित वचन से और दृढ़ता से जुड़े रहना सीखें! ओह, वे देखें कि जितना अधिक बाइबल, और केवल बाइबल, मनुष्यों के धर्म का सार होती है, उतना ही अधिक वे सहमत होते हैं! सम्भवतः कभी कोई अप्रेरित पुस्तक इतनी सार्वभौमिक रूप से सराही नहीं गई जितनी
बनयन की "यात्री की प्रगति"। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसका आदर करने में मसीहियों के सब सम्प्रदाय आनन्दित होते हैं। इसे सब दलों से प्रशंसा मिली है। अब यह कितना उल्लेखनीय तथ्य है कि इसका लेखक सर्वोपरि एक ही पुस्तक का मनुष्य था! उसने बाइबल के सिवाय लगभग कुछ भी नहीं पढ़ा था।
यह एक धन्य विचार है कि अन्त में स्वर्ग में "बहुत से लोग" होंगे। किसी एक निश्चित समय या स्थान में प्रभु के लोग निःसन्देह चाहे थोड़े ही हों, फिर भी अन्त में सब इकट्ठे होकर वे "एक ऐसी बड़ी भीड़ होंगे जिसे कोई गिन नहीं सकता" (प्रकाशित वाक्य 7:9; 19:1)। उनका एक ही हृदय और एक ही मन होगा। वे एक ही अनुभव से होकर निकले होंगे। उन सब ने मन फिराया होगा, विश्वास किया होगा, और पवित्र, प्रार्थनामय तथा नम्र जीवन बिताया होगा। उन सब ने अपने वस्त्र मेम्ने के लहू में धोकर श्वेत किए होंगे। परन्तु इन सब के अतिरिक्त एक बात और उनमें समान होगी: वे सब बाइबल के पदों और सिद्धान्तों से प्रेम रखेंगे। पृथ्वी पर उनकी यात्रा के दिनों में बाइबल उनका भोजन और आनन्द रही होगी। और जब वे स्वर्ग में इकट्ठे होंगे, तब बाइबल आनन्दपूर्ण मनन और स्मरण का साझा विषय होगी।
यह पुस्तक, जिस पर सब सच्चे मसीही जीते हैं और जिससे वे प्रेम रखते हैं, वही विषय है जिसके बारे में मैं आज इस लेख के पाठकों से बात कर रहा हूँ। निश्चय ही यह कोई छोटी बात नहीं कि आप बाइबल के साथ क्या कर रहे हैं। निश्चय ही यह गम्भीर जाँच का विषय है कि क्या आप वचन के इस प्रेम के विषय में कुछ जानते हैं, और क्या आप में "भेड़ों के पदचिह्नों" पर चलने का यह चिह्न है (श्रेष्ठगीत 1:8)। मैं आपसे आग्रह करता हूँ, मैं आपसे विनती करता हूँ कि मुझे सच्चा उत्तर दें। आप बाइबल के साथ क्या कर रहे हैं? क्या आप इसे पढ़ते हैं? आप इसे कैसे पढ़ते हैं?
8. अन्तिम बात यह कि "बाइबल ही एकमात्र पुस्तक है जो मनुष्य को उसके जीवन की अन्तिम घड़ियों में शान्ति दे सकती है।"
मृत्यु एक ऐसी घटना है जो सम्भवतः हम सब के सामने है। इससे बचा नहीं जा सकता। यह वह नदी है जिसे हम में से प्रत्येक को पार करना है। मैं जो लिखता हूँ, और आप जो पढ़ते हैं, हमें एक दिन मरना है। इसे स्मरण रखना अच्छा है। हम सब दुःख की बात है कि इस विषय को अपने से दूर रखने के प्रवृत्त होते हैं। "हर मनुष्य सोचता है कि सब मरनेवाले हैं, पर वह स्वयं नहीं।" मैं चाहता हूँ कि हर कोई जीवन में अपना कर्तव्य निभाए, परन्तु मैं यह भी चाहता हूँ कि हर कोई मृत्यु का विचार करे। मैं चाहता हूँ कि हर कोई जानता हो कि कैसे जीना है, परन्तु मैं यह भी चाहता हूँ कि हर कोई जानता हो कि कैसे मरना है।
मृत्यु हर किसी के लिए एक गम्भीर घटना है। यह सब सांसारिक योजनाओं और आशाओं का अन्त है। यह उन सब से अलगाव है जिनसे हमने प्रेम किया और जिनके साथ हम रहे। यह प्रायः बहुत शारीरिक पीड़ा और कष्ट के साथ आती है। यह हमें कब्र, कीड़ों और सड़न तक पहुँचाती है। यह न्याय और अनन्तकाल का द्वार खोलती है—स्वर्ग या नरक का। यह ऐसी घटना है जिसके बाद न कोई परिवर्तन होता है, न मन फिराने का अवसर। अन्य भूलें सुधारी या पूरी की जा सकती हैं, पर मृत्यु-शय्या पर की गई भूल नहीं। जैसे वृक्ष गिरता है, वैसे ही उसे पड़ा रहना है। ताबूत में कोई मन-परिवर्तन नहीं! साँस बन्द होने के बाद कोई नया जन्म नहीं! और मृत्यु हम सब के सामने है। यह निकट भी हो सकती है। हमारे जाने का समय बिलकुल अनिश्चित है। परन्तु देर-सवेर हम में से प्रत्येक को अकेले लेटकर मरना है। ये सब गम्भीर विचार हैं।
मसीह में विश्वास करनेवाले के लिए भी मृत्यु एक गम्भीर घटना है। निःसन्देह उसके लिए "मृत्यु का डंक" निकाल दिया गया है। (1 कुरिन्थियों 15:55)। मृत्यु अब उसके विशेषाधिकारों में से एक बन गई है, क्योंकि वह मसीह का है। जीवित रहे या मरे, वह प्रभु का है। यदि वह जीवित रहता है तो मसीह उसमें जीवित रहता है; और यदि वह मरता है तो मसीह के साथ जीने के लिए जाता है। उसके लिए "जीवित रहना मसीह है और मर जाना लाभ है" (फिलिप्पियों 1:21)। मृत्यु उसे अनेक कष्टों से छुड़ाती है—दुर्बल देह से, भ्रष्ट हृदय से, परखनेवाले शैतान से, और फँसानेवाले या सतानेवाले संसार से। मृत्यु उसे अनेक आशीषों के आनन्द में प्रवेश देती है। वह अपने परिश्रम से विश्राम पाता है—आनन्दमय पुनरुत्थान की आशा निश्चय में बदल जाती है; उसे पवित्र छुड़ाए हुए आत्माओं की संगति मिलती है—वह "मसीह के साथ" होता है। यह सब सच है, फिर भी विश्वासी के लिए भी मृत्यु एक गम्भीर बात है। शरीर और लहू स्वभाव से ही उससे सिकुड़ते हैं। जिन्हें हम प्रिय जानते हैं उन सबसे बिछुड़ना भावनाओं के लिए एक बोझ और परीक्षा है। जिस लोक में हम जाते हैं वह अनजाना है, चाहे वही हमारा घर क्यों न हो। मृत्यु विश्वासी के लिए चाहे कितनी ही मित्रवत और हानिरहित हो, फिर भी वह ऐसी घटना नहीं जिसे हल्के में लिया जाए। वह सदा एक अत्यन्त गम्भीर बात रहेगी।
हर विचारशील और समझदार मनुष्य के लिए अच्छा है कि वह शान्त मन से सोचे कि वह मृत्यु का सामना कैसे करेगा। पुरुष की भाँति दृढ़ बनो और इस विषय का सीधे सामना करो। जिस अन्त की ओर हम बढ़ रहे हैं उसके विषय में मैं तुमसे कुछ बातें कहता हूँ, ध्यान से सुनो।
जब मनुष्य मृत्यु के निकट पहुँचता है तब संसार की अच्छी वस्तुएँ उसे सान्त्वना नहीं दे सकतीं। कैलिफ़ोर्निया और ऑस्ट्रेलिया का सारा सोना मृत्यु की अँधेरी घाटी के लिए प्रकाश नहीं दे सकता। धन मनुष्य की देह के लिए सर्वोत्तम चिकित्सा-परामर्श और सेवा खरीद सकता है; परन्तु उसके विवेक, हृदय और आत्मा के लिए शान्ति नहीं खरीद सकता।
जब मनुष्य मृत्यु के निकट पहुँचता है तब सम्बन्धी, प्रेमी, मित्र और साथी उसे सान्त्वना नहीं दे सकते। वे प्रेम से उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की सेवा कर सकते हैं। वे कोमलता से उसके बिछौने के पास पहरा दे सकते हैं और उसकी हर इच्छा पहले से भाँप सकते हैं। वे उसका मरणासन्न तकिया ठीक कर सकते हैं और अपनी बाँहों में उसकी ढलती देह को सँभाल सकते हैं। परन्तु वे "रोगी मन की सेवा" नहीं कर सकते। वे व्याकुल हृदय की पीड़ा को नहीं रोक सकते। वे बेचैन विवेक को परमेश्वर की दृष्टि से छिपा नहीं सकते।
जब मनुष्य मृत्यु के निकट पहुँचता है तब संसार के सुख उसे सान्त्वना नहीं दे सकते। जगमगाता नृत्य-भवन, आनन्द भरा नाच, आधी रात की उमंग, घुड़दौड़ की मंडली, ताश की मेज़, नाट्यशाला का विशेष कक्ष, गानेवाले पुरुषों और गानेवाली स्त्रियों के स्वर—ये सब अन्त में अरुचिकर हो जाते हैं। शिकार और निशानेबाज़ी के कार्यक्रमों की चर्चा उसे कोई आनन्द नहीं देती। भोजों, नौका-दौड़ों और सजावटी मेलों के निमन्त्रण उसे कोई चैन नहीं देते। वह अपने आप से यह नहीं छिपा सकता कि ये सब खोखली, रिक्त और निर्बल वस्तुएँ हैं। वे उसके विवेक के कान में केवल कोलाहल हैं। वे उसकी दशा से मेल नहीं खातीं। जब अन्तिम शत्रु बाढ़ की तरह चढ़ा आता है, तब वे उसके हृदय की एक भी दरार नहीं भर सकतीं। पवित्र परमेश्वर से मिलने की आशंका में वे उसे शान्त नहीं कर सकतीं।
जब मनुष्य मृत्यु के निकट पहुँचता है तब पुस्तकें और समाचार-पत्र उसे सान्त्वना नहीं दे सकते। डिकेन्स की सबसे शानदार रचनाएँ भी उसके कान को उदासी लगेंगी। टाइम्स का सबसे योग्य लेख भी उसकी रुचि नहीं जगा पाएगा। एडिनबरा और क्वार्टरली समीक्षाएँ उसे कोई आनन्द नहीं देंगी। इलस्ट्रेटेड न्यूज़ और सबसे नया उपन्यास बिना खुले और अनदेखे पड़े रहेंगे। उनका समय बीत चुका होगा। उनका काम समाप्त हो चुका होगा। स्वास्थ्य में वे चाहे जो कुछ हों, मृत्यु की घड़ी में वे व्यर्थ हैं।
अन्त के निकट पहुँचते मनुष्य के लिए सान्त्वना का केवल एक ही सोता है, और वह बाइबल है। बाइबल के अध्याय, बाइबल के पद, बाइबल से लिए गए सत्य के कथन, बाइबल से निकली सामग्री वाली पुस्तकें—मरते समय मनुष्य के लिए सान्त्वना पाने का यही एकमात्र अवसर है। मैं यह नहीं कहता कि यदि मरणासन्न मनुष्य ने पहले बाइबल को मूल्यवान नहीं जाना तो वह स्वाभाविक रूप से उसके लिए भला करेगी। मैं मृत्युशय्याओं के विषय में दुर्भाग्य से इतना जानता हूँ कि ऐसा नहीं कह सकता। मैं यह भी नहीं कहता कि जिसने जीवन भर अविश्वास किया और बाइबल की उपेक्षा की, वह मृत्यु के समय तुरन्त विश्वास करेगा और उससे सान्त्वना पाएगा, यह सम्भव है या नहीं। परन्तु मैं निश्चयपूर्वक कहता हूँ कि कोई भी मरणासन्न मनुष्य परमेश्वर के वचन की बातों को छोड़ किसी और से सच्ची सान्त्वना कभी नहीं पाएगा। किसी और स्रोत से मिली हर सान्त्वना रेत पर बना घर है।
मैं इसे एक सार्वभौमिक नियम के रूप में कहता हूँ। मैं पृथ्वी पर किसी वर्ग के पक्ष में कोई अपवाद नहीं करता। राजा और कंगाल, विद्वान और अनपढ़—इस विषय में सब बराबर हैं। किसी भी मरणासन्न मनुष्य के लिए तब तक कोई सच्ची सान्त्वना नहीं, जब तक वह उसे बाइबल से न पाए। पवित्रशास्त्र के अध्याय, अंश, पद, प्रतिज्ञाएँ और सिद्धान्त—सुने गए, ग्रहण किए गए, माने गए और जिन पर भरोसा रखा गया—जब कोई संसार छोड़ता है तब मैं केवल इन्हीं सान्त्वना देनेवालों की प्रतिज्ञा करने का साहस करता हूँ। जब तक वचन ग्रहण और विश्वास न किया जाए, तब तक प्रभु-भोज में सम्मिलित होना मनुष्य को रोमन कैथोलिक "अन्तिम अभिषेक" के संस्कार से अधिक कोई भला नहीं करेगा। रोमन कैथोलिक पादरी का पापमोचन विवेक को उससे अधिक चैन नहीं देगा जितना किसी अन्यजाति जादूगर के मन्त्र, यदि वह बेचारा मरता हुआ पापी बाइबल के सत्य को ग्रहण और विश्वास नहीं करता। मैं इस लेख को पढ़नेवाले हर एक से कहता हूँ कि यद्यपि मनुष्य जीवित रहते हुए बाइबल के बिना सुखपूर्वक निभाते दिखाई दे सकते हैं, फिर भी वे निश्चित जानें कि बाइबल के बिना वे सुख से मर नहीं सकते। विद्वान सेल्डन का यह कथन सच्चा था, "ऐसी कोई पुस्तक नहीं जिस पर हम मृत्यु की घड़ी में भरोसा रख सकें, सिवाय बाइबल के।"
जो कुछ मैंने अभी कहा है, उसकी पुष्टि मैं उदाहरणों और दृष्टान्तों से सरलता से कर सकता हूँ। मैं आपको उन मनुष्यों के मृत्यु-शय्या के दृश्य दिखा सकता हूँ जिन्होंने बाइबल को तुच्छ जाना। मैं बता सकता हूँ कि वोल्टेयर और पेन जैसे प्रसिद्ध नास्तिक कैसे दुःख, कड़वाहट, क्रोध, भय और निराशा में मरे। मैं उन लोगों की सुखद मृत्यु-शय्याएँ भी दिखा सकता हूँ जिन्होंने बाइबल से प्रेम किया और उस पर विश्वास किया, और यह भी कि उनकी मृत्यु-शय्या के दृश्य का दूसरों पर कितना आशीषमय प्रभाव पड़ा। सिसिल, जो एक ऐसे सेवक थे जिनकी प्रशंसा सब कलीसियाओं में होनी चाहिए, कहते हैं, "मैं अपनी मरणासन्न माता की शय्या के पास खड़े होने का वह क्षण कभी नहीं भूलूँगा। मैंने पूछा, 'क्या आपको मरने से डर लगता है?' उन्होंने उत्तर दिया, 'नहीं!' मैंने फिर पूछा, 'पर आगे की दशा की अनिश्चितता आपको चिन्तित क्यों नहीं करती?' उन्होंने कहा, 'क्योंकि परमेश्वर ने कहा है, जब तू जल में होकर जाए, मैं तेरे संग संग रहूँगा; और जब तू नदियों में होकर चले, तब वे तुझे न डुबा सकेंगी'" (यशायाह 43:2)। मैं इस प्रकार के उदाहरण सरलता से बढ़ा सकता हूँ। परन्तु मुझे उचित लगता है कि अपने विषय के इस भाग को एक सेवक के रूप में अपने निजी अवलोकन का निष्कर्ष देकर समाप्त करूँ।
मैंने अपने जीवन में अनेक मरणासन्न लोगों को देखा है। उनके स्वभाव और व्यवहार में मैंने बड़ी विविधता देखी है। कुछ को मैंने चिड़चिड़े, मौन और सान्त्वनारहित मरते देखा। कुछ को अज्ञानी, उदासीन और प्रत्यक्षतः बिना अधिक भय के मरते देखा। कुछ लम्बी बीमारी से इतने थक चुके थे कि जाने को पूरी तरह तैयार थे, फिर भी मुझे वे परमेश्वर के सम्मुख जाने के योग्य दशा में बिलकुल नहीं लगे। कुछ को मैंने आशा और परमेश्वर पर भरोसे के दावों के साथ मरते देखा, पर वे इस बात के कोई सन्तोषजनक प्रमाण नहीं छोड़ गए कि वे चट्टान पर थे। कुछ और ऐसे मरे जो, मेरे विश्वास में, "मसीह में" थे और सुरक्षित थे, फिर भी उन्हें कभी कोई स्पष्ट सान्त्वना अनुभव करते नहीं देखा गया। थोड़े से लोगों को मैंने आशा की पूर्ण निश्चयता में मरते देखा है, जो बनयन के "स्टैंडफास्ट" की नाईं नदी के बीच भी मसीह की सच्चाई की महिमामय गवाही देते रहे। परन्तु एक बात मैंने कभी नहीं देखी। मैंने किसी को ऐसा सच्चा, ठोस, शान्त और विवेकपूर्ण मेल-मिलाप अपनी मृत्यु-शय्या पर भोगते नहीं देखा जिसने उसे बाइबल से प्राप्त न किया हो। और मैं निडर होकर कहता हूँ कि जो मनुष्य इस विचार से मृत्यु-शय्या तक पहुँचना चाहता है कि बाइबल उसकी सान्त्वना देनेवाली, उसकी साथी और उसकी मित्र न हो, वह संसार के सबसे बड़े पागलों में से एक है। आत्मा के लिए बाइबल की सान्त्वना को छोड़ और कोई सान्त्वना नहीं है, और जिसने उसे नहीं थामा, उसने कुछ भी नहीं थामा, सिवाय एक टूटे हुए सरकण्डे के।
मृत्यु-शय्या के लिए एकमात्र सान्त्वना देनेवाली वही पुस्तक है जिसके विषय में मैं आज इस लेख के पाठकों से बात कर रहा हूँ। निश्चय ही यह कोई छोटी बात नहीं कि आप उस पुस्तक को पढ़ते हैं या नहीं। निश्चय ही मरणशील संसार में रहनेवाले एक मरणशील मनुष्य को गम्भीरता से विचार करना चाहिए कि जब उसके मरने की बारी आएगी तब उसके पास उसे सान्त्वना देने के लिए कुछ है भी या नहीं। मैं आपको चिताता हूँ, मैं आपसे विनती करता हूँ, कि अन्तिम बार मेरे प्रश्न का सच्चा उत्तर दीजिए। आप बाइबल के साथ क्या कर रहे हैं? क्या आप उसे पढ़ते हैं? आप उसे कैसे पढ़ते हैं?
मैंने अब वे कारण बता दिए हैं जिनके कारण मैं हर पाठक से बाइबल पढ़ने के कर्तव्य और महत्त्व पर आग्रह करता हूँ। मैंने दिखाया है कि कोई भी पुस्तक उस रीति से नहीं लिखी गई जैसे बाइबल लिखी गई है,
—कि बाइबल का ज्ञान उद्धार के लिए नितान्त आवश्यक है
—कि किसी भी पुस्तक में ऐसी विषय-वस्तु नहीं है
—कि किसी भी पुस्तक ने सामान्यतः संसार के लिए इतना कुछ नहीं किया
—कि कोई भी पुस्तक अपने हर पाठक के लिए इतना कुछ नहीं कर सकती
—कि यही पुस्तक विश्वास और आचरण का एकमात्र आधार है
—कि यह परमेश्वर के सब सच्चे सेवकों का भोजन है, और सदा रही है
—और कि यही एकमात्र पुस्तक है जो मनुष्यों को मरते समय सान्त्वना दे सकती है।
ये सब पुरानी बातें हैं। मैं कोई नई बात बताने का दावा नहीं करता। मैंने केवल पुराने सत्य एकत्र किए हैं और उन्हें एक नया रूप देने का प्रयत्न किया है। अब मैं सब कुछ समाप्त करने से पहले पाठकों के हर वर्ग के विवेक से कुछ सीधे शब्द कहता हूँ।
(1) यह लेख ऐसे कुछ लोगों के हाथ में पड़ सकता है जो "पढ़ तो सकते हैं, पर बाइबल कभी पढ़ते ही नहीं।"
क्या आप उन्हीं में से एक हैं? यदि हाँ, तो मुझे आपसे कुछ कहना है। आपकी वर्तमान मनोदशा में मैं आपको सान्त्वना नहीं दे सकता। ऐसा करना उपहास और छल होगा। जब तक आप बाइबल के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, मैं आपसे शान्ति और स्वर्ग की बात नहीं कर सकता। आप अपनी आत्मा को खोने के संकट में हैं।
आप संकट में हैं, क्योंकि "आपकी उपेक्षित बाइबल इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आप परमेश्वर से प्रेम नहीं करते।" मनुष्य के शरीर का स्वास्थ्य सामान्यतः उसकी भूख से जाना जाता है। मनुष्य की आत्मा का स्वास्थ्य बाइबल के प्रति उसके व्यवहार से जाना जाता है। अब आप स्पष्टतः एक गम्भीर रोग के साथ जी रहे हैं। क्या आप मन नहीं फिराएँगे?
मैं जानता हूँ कि मैं आपके हृदय तक नहीं पहुँच सकता। मैं आपको इन बातों को देखने और अनुभव करने के योग्य नहीं बना सकता। मैं केवल बाइबल के प्रति आपके वर्तमान व्यवहार के विरुद्ध अपना गम्भीर विरोध दर्ज कर सकता हूँ और उसे आपके विवेक के सामने रख सकता हूँ। मैं यह अपने सारे प्राण से करता हूँ। ओह, सावधान रहिए कि कहीं आप बहुत देर से मन न फिराएँ! सावधान रहिए कि आप बाइबल पढ़ना तब तक न टालते रहें जब तक अपनी अन्तिम बीमारी में आप वैद्य को न बुलवा लें, और तब बाइबल को एक मुहरबन्द पुस्तक पाएँ, और इस्राएल तथा मिस्र की सेनाओं के बीच के बादल की नाईं अपनी व्याकुल आत्मा के लिए अन्धकारमय!
सावधान रहिए कि आप जीवन भर यह कहते न रहें, "लोग इस सारे बाइबल-पठन के बिना भी बहुत अच्छी तरह निभा लेते हैं," और अन्त में अपनी हानि से यह जानें कि बाइबल के बिना मनुष्य बहुत बुरी दशा में होते हैं, और नरक में जा पड़ते हैं! सावधान रहिए कि वह दिन न आए जब आप अनुभव करें, "यदि मैंने बाइबल का उतना आदर किया होता जितना मैंने समाचार-पत्र का किया है, तो अपने अन्तिम घण्टों में मैं सान्त्वनाहीन न रह जाता!" बाइबल की उपेक्षा करनेवाले पाठक, मैं आपको सीधी चेतावनी देता हूँ। न्याय आपके द्वार के बाहर खड़ा है, भीतर आकर आपको नष्ट करने को तैयार। प्रभु आपकी आत्मा पर दया करे!
(2) यह लेख किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में पड़ सकता है जो "बाइबल पढ़ना आरम्भ करने को तैयार है, परन्तु यह सलाह चाहता है कि कैसे आरम्भ करे।"
क्या आप वही व्यक्ति हैं? मेरी बात सुनिए, मैं कुछ संक्षिप्त सुझाव देता हूँ।
(क) पहली बात, "आज ही बाइबल पढ़ना आरम्भ कीजिए।"
किसी काम को करने का तरीका उसे करना ही है, और बाइबल पढ़ने का तरीका भी सचमुच उसे पढ़ना ही है। उसका अर्थ समझने की इच्छा करना, या चाहना, या संकल्प करना, या मन में ठानना, या उसके विषय में सोचते रहना — इनसे तुम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ोगे। तुम्हें निश्चय ही पढ़ना होगा। इस विषय में कोई राजमार्ग नहीं है, जैसे प्रार्थना के विषय में भी नहीं है। यदि तुम स्वयं नहीं पढ़ सकते, तो किसी दूसरे को मनाओ कि वह तुम्हें पढ़कर सुनाए। परन्तु किसी न किसी रीति से, आँखों के द्वारा या कानों के द्वारा, पवित्रशास्त्र के वचन सचमुच तुम्हारे मन के सामने से गुज़रने चाहिए।
(ख) दूसरी बात यह कि "बाइबल को उसे समझने की सच्ची लालसा के साथ पढ़ो।"
क्षण भर के लिए भी यह न सोचो कि मुख्य उद्देश्य छपे हुए कागज़ की एक निश्चित मात्रा को पलट डालना है, और इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि तुम उसे समझो या न समझो। कुछ अज्ञानी लोग ऐसा समझते प्रतीत होते हैं कि प्रतिदिन इतने अध्याय पढ़ लेने से सब कुछ पूरा हो गया, चाहे उन्हें यह भी पता न हो कि वे अध्याय किस विषय में हैं, और वे केवल इतना जानते हों कि उन्होंने अपनी पुस्तक-चिह्नक को इतने पृष्ठ आगे खिसका दिया है। यह बाइबल पढ़ने को मात्र एक औपचारिकता बना देना है। यह लगभग वैसा ही बुरा है जैसी रोमन कैथोलिकों की वह आदत कि वे "हेल मेरी" और "हमारे पिता" की अविश्वसनीय संख्या में आवृत्ति करके क्षमा-पत्र खरीदते हैं। अपने मन में इसे एक सामान्य सिद्धान्त के रूप में बैठा लो कि जो बाइबल समझी नहीं गई, वह कोई भला नहीं करती। पढ़ते समय अपने आप से बार-बार कहो, "यह सब किस विषय में है?" अर्थ को वैसे खोदो जैसे कोई मनुष्य सोने के लिए खोदता है। कठिन परिश्रम करो, और उस काम को जल्दबाज़ी में न छोड़ो।
(ग) तीसरी बात यह कि "बाइबल को बालकों जैसे विश्वास और नम्रता के साथ पढ़ो।"
जैसे तुम अपनी पुस्तक खोलते हो, वैसे ही अपना हृदय भी खोलो, और कहो, "हे प्रभु, बोल, क्योंकि तेरा दास सुनता है।" दृढ़ निश्चय करो कि जो कुछ वहाँ पाओगे उस पर पूरा विश्वास करोगे, चाहे वह तुम्हारे अपने पूर्वाग्रहों के कितना ही विरुद्ध क्यों न हो। दृढ़ निश्चय करो कि सत्य के प्रत्येक कथन को मन से ग्रहण करोगे, चाहे वह तुम्हें अच्छा लगे या न लगे।
मन की उस दयनीय आदत से सावधान रहो जिसमें बाइबल के कुछ पाठक पड़ जाते हैं। वे कुछ सिद्धान्त इसलिए ग्रहण कर लेते हैं कि वे उन्हें अच्छे लगते हैं; और दूसरों को इसलिए ठुकरा देते हैं कि वे उनके अपने लिए, या किसी प्रिय जन, सम्बन्धी या मित्र के लिए दोषी ठहराने वाले हैं। इस रीति से तो बाइबल निकम्मी हो जाती है। क्या हम इसके न्यायी बनेंगे कि वचन में क्या होना चाहिए? क्या हम परमेश्वर से अधिक जानते हैं? अपने मन में ठान लो कि तुम हर बात ग्रहण करोगे और हर बात पर विश्वास करोगे, और जो तुम्हारी समझ में न आए उसे भरोसे पर मान लोगे। स्मरण रखो, जब तुम प्रार्थना करते हो तो तुम परमेश्वर से बात करते हो और परमेश्वर तुम्हारी सुनता है। परन्तु यह भी स्मरण रखो कि जब तुम पढ़ते हो तो परमेश्वर तुम से बात करता है, और तुम्हें "पलटकर उत्तर" नहीं देना है, वरन् सुनना है।
(घ) चौथी बात यह कि "बाइबल को आज्ञाकारिता और स्वयं पर लागू करने की भावना से पढ़ो।"
इसके अध्ययन के लिए प्रतिदिन इस दृढ़ संकल्प के साथ बैठो कि "तुम" इसके नियमों के अनुसार जीओगे, इसके कथनों पर भरोसा रखोगे, और इसकी आज्ञाओं पर चलोगे। हर अध्याय में से गुज़रते हुए विचार करो, "इसका मेरे दृष्टिकोण और मेरे आचरण पर क्या प्रभाव पड़ता है? यह मुझे क्या सिखाता है?" बाइबल को केवल जिज्ञासा से, और अटकलें लगाने के उद्देश्य से पढ़ना, कि अपने सिर और मन को मतों से भर लिया जाए जबकि पुस्तक को अपने हृदय और जीवन पर प्रभाव डालने की अनुमति न दी जाए — यह अनुचित है। वही बाइबल सबसे अच्छी तरह पढ़ी गई है जिसे हमारे दैनिक जीवन में व्यवहार में लाया जाता है।
(ङ) पाँचवीं बात यह कि "बाइबल को प्रतिदिन पढ़ो।"
इसे प्रतिदिन के काम का एक भाग बना लो कि परमेश्वर के वचन के किसी अंश को पढ़ो और उस पर मनन करो। हमारी आत्माओं के लिए अनुग्रह के निजी साधन प्रतिदिन उतने ही आवश्यक हैं जितने हमारे शरीरों के लिए भोजन और वस्त्र। कल का भोजन आज काम करनेवाले का पेट नहीं भरेगा, और आज का भोजन कल काम करनेवाले का पेट नहीं भरेगा। वैसा ही करो जैसा इस्राएलियों ने जंगल में किया था। प्रतिदिन भोर को अपना मन्ना ताज़ा बटोरो। अपने समय और घण्टे स्वयं चुन लो। अपने पढ़ने में जल्दबाज़ी न करो। अपनी बाइबल को अपने समय का सबसे अच्छा भाग दो, सबसे बुरा नहीं। परन्तु जो भी योजना तुम अपनाओ, अपने जीवन का यह नियम बना लो कि प्रतिदिन अनुग्रह के सिंहासन के निकट और बाइबल के निकट जाओ।
(च) छठी बात यह कि "सारी बाइबल को पढ़ो, और क्रमबद्ध रीति से पढ़ो।"
मुझे डर है कि वचन के ऐसे अनेक भाग हैं जिन्हें कुछ लोग कभी पढ़ते ही नहीं। यह बड़ी ढिठाई की आदत है। "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश के लिए लाभदायक है" (2 तीमुथियुस 3:16)। इसी आदत के कारण सत्य के विषय में वह विस्तृत और सन्तुलित दृष्टि का अभाव है जो आज के दिनों में इतना सामान्य है। कुछ लोगों का बाइबल पढ़ना बस लगातार इधर-उधर से डुबकी मारने और चुन लेने की पद्धति है। उन्हें यह विचार ही नहीं आता कि पूरी पुस्तक को क्रम से पढ़ें। यह भी बड़ी भूल है। निःसन्देह रोग और दुःख के समयों में समयोचित अंशों को ढूँढ़ निकालना उचित है। परन्तु इस अपवाद को छोड़कर, मेरा विश्वास है कि सबसे उत्तम योजना यही है कि पुराने और नए नियम को एक ही समय आरम्भ किया जाए, प्रत्येक को आदि से अन्त तक पढ़ा जाए, और फिर दोबारा आरम्भ किया जाए। यह ऐसा विषय है जिसमें हर एक को अपने मन में पूरी तरह निश्चित होना चाहिए। मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि लगभग चालीस वर्ष से यही मेरी अपनी योजना रही है, और मुझे इसे बदलने का कभी कोई कारण नहीं दिखा।
(छ) सातवीं बात यह कि "बाइबल को निष्पक्षता और ईमानदारी से पढ़ो।"
ठान लो कि हर बात को उसके सीधे और स्पष्ट अर्थ में लोगे, और सब खींचतान की व्याख्याओं को बड़े सन्देह की दृष्टि से देखोगे। सामान्य नियम के रूप में, बाइबल की किसी आयत का जो अर्थ प्रतीत होता है, वही उसका अर्थ है। सेसिल का नियम बहुत मूल्यवान है: "पवित्रशास्त्र की व्याख्या का सही मार्ग यह है कि उसे वैसा ही लिया जाए जैसा हम उसे पाते हैं, उसे किसी विशेष प्रणाली में ज़बरदस्ती बैठाने का प्रयत्न किए बिना।" हूकर ने भी खूब कहा है, "पवित्रशास्त्र की व्याख्या में मैं इसे सबसे अचूक नियम मानता हूँ कि जब शाब्दिक अर्थ टिक सकता हो, तब शाब्दिक अर्थ से जो जितनी दूर है वह प्रायः उतना ही बुरा है।"
(ज) अन्त में यह कि "बाइबल को निरन्तर मसीह को दृष्टि में रखकर पढ़ो।"
सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र का प्रथम उद्देश्य यीशु की गवाही देना है:
पुराने नियम के विधि-विधान मसीह की छाया हैं।
पुराने नियम के न्यायी और छुड़ानेवाले मसीह के प्रतिरूप हैं।
पुराने नियम का इतिहास संसार को मसीह की आवश्यकता दिखाता है।
पुराने नियम की भविष्यद्वाणियाँ मसीह के दुःखभोग से भरी हैं।
पुराने नियम की भविष्यद्वाणियाँ मसीह की आनेवाली महिमा से भरी हैं।
पहला आगमन और दूसरा।
प्रभु की दीनता।
प्रभु का राज्य।
प्रभु का क्रूस और मुकुट।
ये सब बाइबल में सर्वत्र चमकते हैं। यदि तुम बाइबल को ठीक रीति से पढ़ना चाहते हो तो इस सूत्र को स्मरण रखो।
यदि स्थान की अनुमति होती तो मैं इन सुझावों में सरलता से और भी जोड़ सकता था। ये थोड़े और छोटे हैं, फिर भी आप इन्हें अपने ध्यान के योग्य पाएँगे। इन पर चलिए, और मुझे दृढ़ विश्वास है कि आप स्वर्ग का मार्ग कभी न चूकेंगे। इन पर चलिए, और आप पाएँगे कि आपके मन में ज्योति निरन्तर बढ़ती जाती है। कोई भी प्रमाण-ग्रन्थ उस आन्तरिक प्रमाण की बराबरी नहीं कर सकता जो उस मनुष्य को मिलता है जो प्रतिदिन परमेश्वर के वचन को ठीक रीति से काम में लाता है। ऐसे मनुष्य को विद्वानों की पुस्तकों की आवश्यकता नहीं—गवाही तो उसके भीतर ही है। यह पुस्तक उसकी आत्मा को तृप्त करती और पोषण देती है। एक दीन मसीही स्त्री ने एक अविश्वासी से कहा था, "मैं विद्वान नहीं हूँ। मैं आपकी तरह तर्क नहीं कर सकती। परन्तु मैं जानती हूँ कि शहद शहद है, क्योंकि वह मेरे मुँह में मिठास छोड़ जाता है। और मैं जानती हूँ कि बाइबल परमेश्वर की पुस्तक है, क्योंकि वह मेरे हृदय में जो स्वाद छोड़ जाती है, उसी से।"
(3) यह पर्चा किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में पड़ सकता है जो "बाइबल से प्रेम रखता और उस पर विश्वास करता है, फिर भी उसे बहुत थोड़ा ही पढ़ता है।"
मुझे भय है कि आज के दिनों में ऐसे बहुत लोग हैं। यह भाग-दौड़ और हड़बड़ी का युग है। यह बातें करने, समितियों की बैठकों और सार्वजनिक कार्य का युग है। अपनी जगह ये सब बातें ठीक हैं, परन्तु मुझे भय है कि ये कभी-कभी बाइबल के निजी पठन को काट-छाँटकर छोटा कर देती हैं। क्या आपका विवेक आपसे कहता है कि जिन लोगों की मैं बात कर रहा हूँ, उनमें से आप भी एक हैं? मेरी सुनिए, और मैं कुछ बातें कहूँगा जो आपके गम्भीर ध्यान के योग्य हैं।
आप वही मनुष्य हैं जिसे "आवश्यकता के समय बाइबल से बहुत कम शान्ति मिलने" की सम्भावना है। परीक्षाएँ भिन्न-भिन्न समयों पर आती हैं। दुःख एक खोजनेवाली आँधी है जो वृक्षों के पत्ते झाड़ देती है और चिड़ियों के घोंसले उघाड़ देती है। अब मुझे भय है कि आपके पास बाइबल की सांत्वनाओं का भण्डार किसी दिन बहुत घट जाएगा। मुझे भय है कि कहीं आप अन्त में अपने को बहुत थोड़ी रसद पर पाएँ, और दुर्बल, थके-माँदे और क्षीण होकर बन्दरगाह में पहुँचें।
आप वही मनुष्य हैं जो सम्भवतः "सत्य में कभी स्थिर न होगा।" यदि मैं सुनूँ कि आप निश्चयता, अनुग्रह, विश्वास, अन्त तक स्थिर रहने और ऐसी ही बातों के विषय में सन्देहों और प्रश्नों से घिरे रहते हैं, तो मुझे आश्चर्य न होगा। शैतान एक पुराना और धूर्त शत्रु है। बिन्यामीनियों की नाईं वह "बाल पर गोफन से पत्थर चलाए और चूके नहीं" (न्यायियों 20:16)। जब चाहे तब वह पवित्रशास्त्र का हवाला बड़ी सरलता से दे सकता है। अब आप अपने हथियारों के साथ इतने तैयार नहीं हैं कि उससे अच्छी लड़ाई लड़ सकें। आपका कवच ठीक नहीं बैठता। आपकी तलवार आपके हाथ में ढीली पड़ी है।
आप वही मनुष्य हैं जो सम्भवतः "जीवन में भूलें करेगा।" यदि मुझे बताया जाए कि आपने अपने विवाह के विषय में भूल की—अपने बच्चों की आत्मिक बातों की शिक्षा के विषय में भूल की—अपने घराने के आचरण के विषय में भूल की—अपनी संगति के विषय में भूल की, तो मुझे अचम्भा न होगा। जिस संसार में होकर आप जहाज़ खे रहे हैं, वह चट्टानों, तल की शिलाओं और रेत के टीलों से भरा है। आप न तो खोजी बत्तियों से, न अपने नक्शों से भली-भाँति परिचित हैं।
आप वही मनुष्य हैं जो सम्भवतः "किसी छलिया झूठे शिक्षक के बहकावे में कुछ समय के लिए बह जाएगा।" यदि वे चतुर, वाक्पटु लोग, जो "झूठ को सच दिखा सकते हैं," आपको अनेक मूर्खतापूर्ण धारणाओं में ले जा रहे हों, तो मुझे आश्चर्य न होगा। आप सन्तुलन खो बैठे हैं। यदि आप लहरों पर डोलते काग की नाईं इधर-उधर उछाले जाएँ तो कोई अचम्भा नहीं।
ये सब असुविधाजनक बातें हैं। मैं चाहता हूँ कि इस पर्चे का हर पाठक इन सबसे बच निकले। जो सलाह मैं आज आपको देता हूँ, उसे मानिए। केवल "थोड़ा" बाइबल न पढ़िए, वरन् बहुत अधिक पढ़िए। "मसीह का वचन तुम्हारे हृदय में अधिकाई से बसे" (कुलुस्सियों 3:16)। आत्मिक ज्ञान में केवल बालक न बने रहिए। "स्वर्ग के राज्य के विषय में भली-भाँति सिखाए हुए" बनने का यत्न कीजिए और निरन्तर पुरानी बातों में नई बातें जोड़ते रहिए। भावनाओं पर टिका धर्म अनिश्चित वस्तु है। वह ज्वार की नाईं है, कभी ऊँचा, कभी नीचा। वह चन्द्रमा की नाईं है, कभी उजला, कभी धुँधला। बाइबल के गहरे ज्ञान पर टिका धर्म एक दृढ़ और स्थायी सम्पत्ति है। वह मनुष्य को केवल यह कहने के योग्य नहीं बनाता कि "मुझे मसीह में आशा अनुभव होती है," वरन् यह भी कि "मैं जानता हूँ कि मैंने किस पर विश्वास किया है" (2 तीमुथियुस 1:12)।
(4) यह पर्चा किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में पड़ सकता है जो "बाइबल बहुत पढ़ता है, फिर भी मानता है कि अपने पढ़ने के कारण वह कुछ भी बेहतर नहीं हुआ।"
यह शैतान का एक धूर्त प्रलोभन है। एक अवस्था में वह कहता है, "बाइबल बिल्कुल मत पढ़ो।" दूसरी में वह कहता है, "तुम्हारे पढ़ने से तुम्हें कोई लाभ नहीं होता: इसे छोड़ दो।" क्या आप वही मनुष्य हैं? मैं अपनी आत्मा की गहराई से आपके लिए तरस खाता हूँ। मुझे आपका कुछ भला करने का यत्न करने दीजिए।
केवल इसलिए यह न सोचिए कि आपको बाइबल से कोई लाभ नहीं मिल रहा, कि आप वह लाभ दिन-प्रतिदिन देख नहीं पाते। सबसे बड़े प्रभाव प्रायः चुपचाप, शान्त और उस समय पहचानने में कठिन होते हैं जब वे उत्पन्न हो रहे होते हैं। पृथ्वी पर चन्द्रमा के प्रभाव का, और मनुष्य के फेफड़ों पर वायु के प्रभाव का विचार कीजिए।
स्मरण कीजिए कि ओस कितनी चुपके से गिरती है, और घास कितनी अनजाने बढ़ती है। आपके बाइबल-पठन से आपकी आत्मा में उससे कहीं अधिक हो रहा हो सकता है जितना आप सोचते हैं।
सम्भव है कि वचन धीरे-धीरे आपके हृदय पर गहरी "छाप" डाल रहा हो, जिसका आपको अभी पता न हो। प्रायः जब स्मृति कोई बात नहीं रख पाती, तब भी मनुष्य के चरित्र पर कोई सदा की छाप पड़ रही होती है। क्या पाप आपको प्रति वर्ष अधिक घिनौना लगने लगा है? क्या मसीह प्रति वर्ष अधिक बहुमूल्य होता जा रहा है? क्या पवित्रता आपकी दृष्टि में प्रति वर्ष अधिक मनोहर और वांछनीय होती जा रही है? यदि ऐसा है, तो हियाव बाँधिए। बाइबल आपका भला कर रही है, चाहे आप दिन-प्रतिदिन उसका पता न लगा सकें।
सम्भव है कि बाइबल आपको किसी पाप या भ्रम से रोक रही हो जिसमें आप अन्यथा जा पड़ते। हो सकता है कि वह प्रतिदिन आपको पीछे थामे हुए हो, आपके चारों ओर बाड़ा बाँधे हुए हो, और अनेक भूल-भरे पगों को रोक रही हो। हाँ, यदि आप वचन पढ़ना छोड़ दें तो शीघ्र ही अपनी हानि से यह जान लेंगे! आशीषों से परिचित होना कभी-कभी हमें उनके मूल्य के प्रति असंवेदनशील बना देता है। शैतान का साम्हना कीजिए। इसे अपने मन में स्थापित नियम बना लीजिए कि चाहे आप उसी क्षण अनुभव करें या न करें, बाइबल पढ़ने से आप आत्मिक स्वास्थ्य श्वास में ले रहे हैं और अनजाने ही अधिक सबल होते जा रहे हैं।
(5) यह पर्चा ऐसे कुछ लोगों के हाथ में पड़ सकता है जो "सचमुच बाइबल से प्रेम रखते हैं, बाइबल पर जीते हैं और उसे नियमित पढ़ते हैं।"
क्या आप इनमें से एक हैं? मेरी ओर ध्यान दीजिए, और मैं कुछ बातें बताऊँगा जिन्हें आगे के लिए अपने हृदय में रखना हमारे लिए भला होगा।
आइए हम संकल्प करें कि जितने वर्ष हम जीएँ, हर वर्ष "बाइबल को और अधिक पढ़ेंगे।" आइए हम प्रयत्न करें कि वह हमारी स्मृति में जड़ पकड़ ले और हमारे हृदयों पर खुद जाए। आइए हम मृत्यु की यात्रा के लिए उसके द्वारा भली-भाँति सामग्री से लैस हों। कौन जाने हमारी यात्रा अत्यन्त तूफ़ानी हो? देखने और सुनने की शक्ति जाती रहे, और हम गहरे जल में हों। आह, ऐसी घड़ी में वचन का "हमारे हृदय में छिपा" होना कितना भला होगा! (भजन संहिता 119:11)।
आइए हम संकल्प करें कि जितने वर्ष हम जीएँ, हर वर्ष अपने बाइबल-पठन के विषय में "और अधिक सतर्क रहेंगे।" आइए हम उसे दिए जानेवाले समय और उस समय के बिताए जाने के ढंग के विषय में ईर्ष्यालु-सी सावधानी बरतें। आइए हम बिना पर्याप्त कारण के अपना दैनिक पठन छोड़ने से सावधान रहें। आइए पढ़ते समय हम अपनी पुस्तक के ऊपर जम्हाई लेते, ऊँघते और झपकियाँ लेते न रहें। आइए हम ऐसे पढ़ें जैसे लन्दन का कोई व्यापारी टाइम्स के नगर-समाचार का अध्ययन करता है, या जैसे कोई पत्नी दूर देश से आई अपने पति की चिट्ठी पढ़ती है। आइए हम बहुत सावधान रहें कि कभी किसी सेवक, या उपदेश, या पुस्तक, या पर्चे, या मित्र को वचन से ऊँचा न ठहराएँ। धिक्कार है उस पुस्तक, या पर्चे, या मनुष्य की सम्मति को, जो हमारे और बाइबल के बीच घुस आए और बाइबल को हमारी आँखों से ओझल कर दे! मैं फिर कहता हूँ, आइए हम अत्यन्त सतर्क रहें। जिस क्षण हम बाइबल खोलते हैं, शैतान हमारे पास आ बैठता है। आह, भूखे मन से और आत्मिक उन्नति की सीधी लालसा के साथ पढ़ना कितना भला है!
आइए हम संकल्प करें कि "अपने परिवारों में बाइबल का और अधिक आदर करेंगे।" आइए हम प्रातः और सायं अपने बच्चों और जीवनसाथी को उसे पढ़कर सुनाएँ, और मनुष्यों को ऐसा करते देखने देने में लज्जित न हों। आइए हम उससे कोई भलाई होती न देखकर निराश न हों। परिवार में बाइबल-पठन ने कितनों को कारागार और बन्दीगृह से, और नरक की अनन्त आग से बचा रखा है।
आइए हम संकल्प करें कि "बाइबल पर और अधिक मनन करेंगे।" संसार में निकलते समय दो-तीन पद अपने साथ ले जाना और जब भी थोड़ा अवकाश मिले उन्हें मन में बार-बार उलटना-पलटना अच्छा है। इससे बहुत-से व्यर्थ विचार दूर रहते हैं। इससे दैनिक पठन की कील और कस जाती है। यह हमारी आत्मा को सड़ने और बिगड़ी हुई बातें उत्पन्न करने से बचाता है। यह हमारी स्मृति को पवित्र और सजीव करता है, और उसे उन तालाबों के समान बनने से रोकता है जिनमें मेंढक तो रहते हैं पर मछलियाँ मर जाती हैं।
आइए हम संकल्प करें कि जब भी विश्वासियों से मिलें, "उनसे बाइबल के विषय में और अधिक बातचीत करेंगे।" खेद के साथ कहना पड़ता है कि जब मसीही लोग मिलते हैं तो उनकी बातचीत प्रायः बड़ी निष्फल होती है! कितनी ही हल्की, तुच्छ और निर्दय बातें कही जाती हैं! आइए हम बाइबल को और अधिक सामने लाएँ, तो वह शैतान को भगाने में सहायता करेगी और हमारे हृदयों को सुर में रखेगी। आह, कि हम सब इस बुरे संसार में एक साथ चलने का ऐसा यत्न करें कि यीशु बार-बार निकट आए और हमारे साथ चले, जैसे वह इम्माऊस जानेवाले उन दो चेलों के साथ चला था!
अन्त में, आइए हम संकल्प करें कि जितने वर्ष हम जीएँ, हर वर्ष "बाइबल के अनुसार और अधिक जीएँगे।" आइए हम बार-बार अपने सब मतों और आचरणों का, अपनी आदतों और स्वभावों का, अपने सार्वजनिक और निजी व्यवहार का, संसार में और अपने घरों में अपने चाल-चलन का लेखा लें। आइए हम हर बात को बाइबल से नापें, और परमेश्वर की सहायता से उसके अनुसार चलने का संकल्प करें। आह, कि हम अधिकाधिक सीखें कि "अपनी चाल को शुद्ध कैसे रखें? उसके वचन के अनुसार सावधानी से चलकर।" (भजन संहिता 119:9)।
मैं ये सब बातें हर उस व्यक्ति के गम्भीर और प्रार्थनापूर्ण ध्यान के लिए सौंपता हूँ जिसके हाथ में यह पर्चा पड़े। मैं चाहता हूँ कि मेरे प्रिय देश के सेवक बाइबल पढ़नेवाले सेवक हों, मण्डलियाँ बाइबल पढ़नेवाली मण्डलियाँ हों, और राष्ट्र बाइबल पढ़नेवाला राष्ट्र हो। इस वांछनीय उद्देश्य को पूरा करने के लिए मैं अपनी पूँजी परमेश्वर के भण्डार में डालता हूँ। प्रभु करे कि यह व्यर्थ न ठहरे!
क्रूस के विषय में आप क्या सोचते हैं?
"परन्तु ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल अपने प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिस के द्वारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ।" गलातियों 6:14
मसीह के क्रूस के विषय में हम क्या सोचते और अनुभव करते हैं? हम एक मसीही देश में रहते हैं। सम्भवतः हम किसी मसीही कलीसिया की आराधना में सम्मिलित होते हैं। हममें से अधिकांश ने मसीह के नाम में बपतिस्मा लिया है। हम अपने आप को मसीही कहते और मानते हैं। यह सब अच्छा है; संसार के करोड़ों लोगों के विषय में तो इतना भी नहीं कहा जा सकता। परन्तु मसीह के क्रूस के विषय में हम क्या सोचते और अनुभव करते हैं?
मैं यह जाँचना चाहता हूँ कि अब तक हुए सबसे महान मसीहियों में से एक ने मसीह के क्रूस के विषय में क्या सोचा। उसने अपनी सम्मति लिख दी है; उसने अपना निर्णय ऐसे शब्दों में दिया है जिनका कोई अन्य अर्थ नहीं निकल सकता। मेरा तात्पर्य प्रेरित पौलुस से है। उसकी सम्मति उस पत्री में मिलती है जो पवित्र आत्मा ने उसे गलातियों को लिखने की प्रेरणा दी। जिन शब्दों में उसका निर्णय लिखा है, वे ये हैं, "परन्तु ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल अपने प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का।"
अब पौलुस के ऐसा कहने का क्या अर्थ था? उसका अभिप्राय दृढ़ता से यह घोषित करना था कि अपने पापों की क्षमा और अपनी आत्मा के उद्धार के लिए वह "क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु मसीह" के सिवा किसी पर भरोसा नहीं रखता। दूसरे चाहें तो उद्धार के लिए कहीं और देखें; दूसरे यदि चाहें तो क्षमा और शान्ति के लिए अन्य बातों पर भरोसा रखें; जहाँ तक उसका सम्बन्ध था, प्रेरित ने ठान लिया था कि वह "यीशु मसीह के क्रूस" को छोड़ किसी पर न टिके, किसी का सहारा न ले, किसी पर अपनी आशा न बाँधे, किसी पर भरोसा न रखे, और किसी का घमण्ड न करे।
मैं इस पुस्तक के पाठकों से "क्रूस" के विषय में कुछ कहना चाहता हूँ। मेरा विश्वास कीजिए, यह विषय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह केवल वाद-विवाद का प्रश्न नहीं है। यह उन बातों में से नहीं है जिनमें लोग असहमत होने पर भी सहमत रह सकें और यह मान सकें कि मतभेद उन्हें स्वर्ग से बाहर नहीं रखेंगे। मनुष्य को इस विषय में सही होना ही चाहिए, नहीं तो वह सदा के लिए नाश हो गया। स्वर्ग या नरक, सुख या दुःख, जीवन या मृत्यु, अन्तिम दिन आशीष या श्राप, सब कुछ इस प्रश्न के उत्तर पर टिका है, "मसीह के क्रूस के विषय में आप क्या सोचते हैं?"
I. पहले मैं आपको दिखाता हूँ कि प्रेरित पौलुस ने किस बात का घमण्ड नहीं किया।
ऐसी बहुत-सी बातें थीं जिनका पौलुस घमण्ड कर सकता था, यदि वह भी आज के कुछ लोगों की तरह सोचता। यदि पृथ्वी पर कभी कोई ऐसा हुआ जिसके पास अपने विषय में घमण्ड करने को कुछ था, तो वह अन्यजातियों का वही महान प्रेरित था। अब यदि उसने घमण्ड करने का साहस नहीं किया, तो कौन करेगा?
उसने अपनी जातीय विशेषताओं पर कभी घमण्ड नहीं किया। वह जन्म से यहूदी था, और जैसा वह स्वयं हमें बताता है, "इब्रानियों का इब्रानी।" (फिलिप्पियों 3:5।) वह अपने बहुत से भाइयों की तरह कह सकता था, "मेरे पूर्वज अब्राहम हैं; मैं कोई अन्धकार में पड़ा हुआ अज्ञानी अन्यजाति नहीं हूँ; मैं परमेश्वर के कृपापात्र लोगों में से एक हूँ—मुझे खतने के द्वारा परमेश्वर के साथ वाचा में सम्मिलित किया गया है। मैं अज्ञानी अन्यजातियों से कहीं अच्छा मनुष्य हूँ।" परन्तु उसने ऐसा कभी नहीं कहा। उसने इस प्रकार की किसी भी बात पर कभी घमण्ड नहीं किया। एक क्षण के लिए भी नहीं!
उसने अपने कर्मों पर कभी घमण्ड नहीं किया। परमेश्वर के लिए उसके समान परिश्रम किसी ने नहीं किया। वह सब प्रेरितों से "अधिक परिश्रम" करनेवाला था। (2 कुरिन्थियों 11:23।) मसीह के काम के लिए किसी मनुष्य ने इतना प्रचार नहीं किया, इतनी यात्राएँ नहीं कीं, और इतने कष्ट नहीं सहे। इतनी आत्माओं के मन फिराव का साधन कोई नहीं बना, किसी ने संसार की इतनी भलाई नहीं की, और अपने आपको मनुष्यों के लिए इतना उपयोगी नहीं बनाया। आरम्भिक कलीसिया का कोई पिता, कोई धर्म-सुधारक, कोई प्यूरिटन, कोई मिशनरी, कोई सेवक, कोई साधारण विश्वासी—किसी एक मनुष्य का नाम नहीं लिया जा सकता जिसने प्रेरित पौलुस जितने भले कर्म किए हों। परन्तु क्या उसने कभी उन पर इस प्रकार घमण्ड किया मानो वे ज़रा भी पुण्य के योग्य हों और उसकी आत्मा को बचा सकें? कभी नहीं! एक क्षण के लिए भी नहीं!
उसने अपने ज्ञान पर कभी घमण्ड नहीं किया। वह स्वभाव से ही बड़े वरदानों का मनुष्य था, और मन फिराने के बाद पवित्र आत्मा ने उसे और भी बड़े वरदान दिए। वह एक सामर्थी प्रचारक, एक सामर्थी वक्ता और एक प्रभावशाली लेखक था। वह अपनी लेखनी में उतना ही महान था जितना अपनी वाणी में। वह यहूदियों और अन्यजातियों दोनों से समान रूप से तर्क कर सकता था। वह कुरिन्थ के अविश्वासियों से, यरूशलेम के फरीसियों से, या गलातिया के अपने आपको धर्मी समझनेवालों से वाद-विवाद कर सकता था। वह बहुत सी गूढ़ बातें जानता था। वह तीसरे स्वर्ग तक उठाया गया था और उसने "अकथनीय बातें सुनी" थीं। (2 कुरिन्थियों 12:4।) उसे भविष्यद्वाणी की आत्मा मिली थी और वह आनेवाली बातें पहले से बता सकता था। परन्तु क्या उसने कभी अपने ज्ञान पर इस प्रकार घमण्ड किया मानो वह उसे परमेश्वर के सामने धर्मी ठहरा सकता है? कभी नहीं—कभी नहीं! एक क्षण के लिए भी नहीं!
उसने अपने अनुग्रह के गुणों पर कभी घमण्ड नहीं किया। यदि कभी कोई अनुग्रह के गुणों से भरपूर था, तो वह पौलुस था। वह प्रेम से परिपूर्ण था। वह कितनी कोमलता और स्नेह से लिखा करता था! वह आत्माओं के लिए वैसे ही तरसता था जैसे कोई माता या दाई अपने बच्चे के लिए तरसती है। वह साहसी मनुष्य था। जब सत्य का प्रश्न होता, तब वह इसकी चिन्ता नहीं करता था कि किसका विरोध कर रहा है। जब आत्माओं को जीतना होता, तब वह इसकी चिन्ता नहीं करता था कि कितना जोखिम उठाना पड़ेगा। वह आत्म-त्यागी मनुष्य था—बहुधा भूख-प्यास में, जाड़े और नंगेपन में, जागरणों और उपवासों में। वह नम्र मनुष्य था। वह अपने आपको सब पवित्र लोगों में छोटे से भी छोटा, और पापियों में सबसे बड़ा समझता था। वह प्रार्थनाशील मनुष्य था। देखो, उसकी सब पत्रियों के आरम्भ में यह कैसे प्रकट होता है। वह धन्यवादी मनुष्य था। उसके धन्यवाद और उसकी प्रार्थनाएँ साथ-साथ चलती थीं। परन्तु उसने इस सब पर कभी घमण्ड नहीं किया, इसके कारण अपने आपको कभी बड़ा नहीं समझा—अपनी आत्मा की आशा कभी इस पर नहीं टिकाई। अरे नहीं—एक क्षण के लिए भी नहीं!
उसने अपनी कलीसियाई स्थिति पर कभी घमण्ड नहीं किया। यदि कभी कोई सच्चा कलीसिया का मनुष्य था, तो वह पौलुस था। वह स्वयं चुना हुआ प्रेरित था। वह कलीसियाओं का संस्थापक और सेवकों को नियुक्त करनेवाला था—तीमुथियुस और तीतुस, और बहुत से प्राचीनों ने अपनी पहली नियुक्ति उसी के हाथों से पाई। उसने बहुत से अन्धकारपूर्ण स्थानों में आराधना और संस्कारों का आरम्भ किया। बहुतों को उसने बपतिस्मा दिया; बहुतों को उसने प्रभु-भोज में सम्मिलित किया; प्रार्थना, स्तुति और प्रचार की बहुत सी सभाएँ उसने आरम्भ कीं और चलाईं। बहुत सी नई कलीसियाओं में अनुशासन उसी ने स्थापित किया। बहुत सी कलीसियाओं में जो भी विधियाँ, नियम और रीतियाँ मानी जाती थीं, उनकी सिफ़ारिश पहले उसी ने की थी। परन्तु क्या उसने कभी अपने पद और कलीसियाई स्थिति पर घमण्ड किया? क्या वह कभी ऐसे बोलता है मानो उसकी कलीसियाई स्थिति उसे बचा लेगी, उसे धर्मी ठहराएगी, उसके पाप मिटा देगी, और उसे परमेश्वर के सामने ग्रहणयोग्य बना देगी? अरे नहीं! कभी नहीं—कभी नहीं! एक क्षण के लिए भी नहीं!
अब यदि प्रेरित पौलुस ने इन बातों में से किसी पर भी कभी घमण्ड नहीं किया, तो पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक, आज के दिन किसे इन पर घमण्ड करने का अधिकार है? यदि पौलुस ने कहा, "परमेश्वर न करे कि मैं क्रूस को छोड़ किसी और बात पर घमण्ड करूँ," तो कौन यह कहने का साहस करेगा, "मेरे पास घमण्ड करने के लिए कुछ है—मैं पौलुस से अच्छा मनुष्य हूँ"?
इस लेख के पाठकों में कौन है जो अपनी किसी भलाई पर भरोसा रखता है? कौन है जो अपने सुधारों पर—अपनी नैतिकता पर—अपनी कलीसियाई स्थिति पर—अपने कर्मों और किसी भी प्रकार के कामों पर निर्भर है? कौन है जो अपनी आत्मा का भार अपनी किसी भी बात पर, चाहे वह बहुत ही थोड़ी क्यों न हो, टिका रहा है? मैं कहता हूँ, जान लो कि तुम प्रेरित पौलुस से बहुत भिन्न हो। जान लो कि तुम्हारा धर्म प्रेरितों का धर्म नहीं है।
इस लेख के पाठकों में कौन है जो उद्धार के लिए अपने धार्मिक अंगीकार पर भरोसा रखता है? कौन है जो अपने बपतिस्मा, या प्रभु-भोज में अपनी उपस्थिति—रविवार को अपने कलीसिया जाने, या सप्ताह भर में अपनी दैनिक आराधनाओं पर अपने आपको बड़ा समझता है—और मन ही मन कहता है, "मुझमें और किस बात की घटी है?" मैं कहता हूँ, आज ही जान लो कि तुम पौलुस से बहुत भिन्न हो। तुम्हारा मसीही जीवन नए नियम का मसीही जीवन नहीं है। पौलुस "क्रूस" को छोड़ किसी बात पर घमण्ड नहीं करता था। तुम्हें भी नहीं करना चाहिए।
ओह, हम अपनी धार्मिकता के घमण्ड से सावधान रहें! खुला पाप हज़ारों आत्माओं को मारता है। अपनी धार्मिकता का घमण्ड दसियों हज़ारों को मारता है! जाओ और अन्यजातियों के उस महान प्रेरित के साथ नम्रता सीखो। जाओ और पौलुस के साथ क्रूस के चरणों में बैठो। अपना गुप्त अभिमान त्याग दो। अपनी भलाई के व्यर्थ विचारों को दूर फेंक दो। यदि तुम्हारे पास अनुग्रह है तो धन्यवादी बनो—परन्तु उस पर एक क्षण के लिए भी घमण्ड न करो। परमेश्वर और मसीह के लिए पूरे मन, प्राण, बुद्धि और शक्ति से काम करो—परन्तु अपने किसी भी काम पर भरोसा रखने का स्वप्न भी एक पल के लिए न देखो।
सोचो, तुम जो अपनी भलाई के कुछ काल्पनिक विचारों में सुख पाते हो—सोचो, तुम जो इस धारणा में अपने आप को लपेटे हुए हो कि "यदि मैं अपनी कलीसिया से जुड़ा रहूँ तो सब ठीक ही होगा"—क्षण भर सोचो कि तुम कैसी रेतीली नींव पर निर्माण कर रहे हो! सोचो कि मृत्यु की घड़ी में और न्याय के दिन तुम्हारी आशाएँ और तुम्हारी दलीलें कितनी दयनीय रूप से अधूरी दिखाई देंगी! लोग जब तक बलवान और स्वस्थ हैं, अपनी भलाई के विषय में चाहे जो कहें, परन्तु जब वे रोगी और मरणासन्न होंगे तब उसके विषय में कहने को उनके पास बहुत कम रह जाएगा। इस संसार में वे अपने कर्मों में चाहे जो पुण्य देखें, परन्तु जब वे मसीह के न्यायासन के सामने खड़े होंगे तब उनमें कोई पुण्य नहीं पाएँगे। उस बड़े न्याय-दिन का प्रकाश उनके सब कामों के रूप में अद्भुत अन्तर ला देगा। वह चमक-दमक को उतार देगा, रंगत को मुरझा देगा, और बहुत से ऐसे कामों का सड़ापन खोल देगा जो अब भले कहलाते हैं। उनका गेहूँ भूसे के सिवा कुछ न निकलेगा—उनका सोना मैल के सिवा कुछ न ठहरेगा। लाखों तथाकथित 'भले कर्म' पूरी तरह अधूरे और अनुग्रह-रहित निकलेंगे। वे मनुष्यों में चलते थे और उनका मोल था—परन्तु परमेश्वर के तराजू में वे हल्के और निकम्मे ठहरेंगे। वे पुराने समय की सफेदी पुती कब्रों के समान पाए जाएँगे—बाहर से सुन्दर और मनोहर—परन्तु भीतर से सड़ाहट से भरे हुए। हाय उस मनुष्य पर जो न्याय के दिन की ओर देखता है, और फिर भी अब अपने किसी भी काम पर अपनी आत्मा को थोड़ा-सा भी टिकाता है!
"चाहे लोग जब निश्चिन्त बैठे होते हैं तब अपने पुण्य और अपने प्रतिफल के बीच न जाने किस अनुपातिक सम्बन्ध की मनमानी कल्पना से अपने हृदयों को व्यर्थ गुदगुदाते रहें, और अपने ऊँचे चिन्तन की तन्मयता में यह स्वप्न देखें कि परमेश्वर ने मानो उनके लिए गट्ठर बाँधकर उसे नापा और रख छोड़ा है—तौभी हम दैनिक अनुभव से उनमें से भी बहुतों में यह देखते हैं कि जब मृत्यु की घड़ी निकट आती है, जब वे भीतर ही भीतर सुनते हैं कि उन्हें उस न्यायी के सामने खड़े होने के लिए बुलाया जा रहा है जिसके तेज से स्वर्गदूतों की आँखें भी चौंधिया जाती हैं, तब ये सब निरर्थक कल्पनाएँ अपना मुँह छिपाने लगती हैं। तब पुण्य का नाम लेना अपनी आत्माओं को यातना-यन्त्र पर चढ़ाना है। अपने ही कामों की स्मृति उन्हें घिनौनी लगती है। जिन-जिन बातों पर उन्होंने कभी कुछ भी भरोसा और विश्वास रखा था, वे सब को छोड़ देते हैं। तब कोई सहारा नहीं, कोई विश्राम नहीं, कोई चैन नहीं, कोई शान्ति नहीं—केवल मसीह यीशु में।"—रिचर्ड हूकर। 1585।
मैं फिर कहता हूँ, आओ हम हर सम्भव रूप और आकार के आत्म-धार्मिकता से सावधान रहें। कुछ लोगों को अपने कल्पित गुणों से उतनी ही हानि पहुँचती है जितनी दूसरों को अपने पापों से। तब तक चैन न लो, चैन न लो, जब तक तुम्हारा हृदय पौलुस के हृदय के सुर में न धड़कने लगे। तब तक चैन न लो जब तक तुम उसके साथ यह न कह सको, "ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का!"
II. दूसरे स्थान पर मुझे यह समझाने दो कि "मसीह के क्रूस" से हमें क्या समझना चाहिए।
'क्रूस' शब्द बाइबल में एक से अधिक अर्थों में प्रयोग हुआ है। जब पौलुस ने गलातियों की पत्री में कहा, "मैं मसीह के क्रूस में घमण्ड करता हूँ," तो उसका क्या अभिप्राय था? यही बात है जिसकी मैं अब ध्यान से जाँच करना और स्पष्ट करना चाहता हूँ।
कभी-कभी क्रूस का अर्थ वह लकड़ी का क्रूस होता है जिस पर प्रभु यीशु मसीह कलवरी पर कीलों से जड़ा गया और मार डाला गया। जब पौलुस ने फिलिप्पियों से कहा कि मसीह "यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली," (फिलिप्पियों 2:8) तब उसके मन में यही था। यह वह क्रूस नहीं है जिसमें पौलुस घमण्ड करता था। लकड़ी के एक टुकड़े में घमण्ड करने के विचार से वह भय से सिकुड़ जाता। मुझे कोई सन्देह नहीं कि वह रोमन कैथोलिकों की क्रूस-मूर्ति की उपासना की निन्दा करता, और उसे अपवित्र, ईश-निन्दा और मूर्तिपूजा कहता।
कभी-कभी क्रूस का अर्थ वे क्लेश और परीक्षाएँ होता है जिनसे मसीह में विश्वासियों को अपने धर्म के कारण गुज़रना पड़ता है, यदि वे मसीह के पीछे सच्चाई से चलें। प्रभु इसी अर्थ में इस शब्द का प्रयोग करता है जब वह कहता है, "जो अपना क्रूस न उठाए और मेरे पीछे न आए, वह मेरे योग्य नहीं।" (मत्ती 10:38) गलातियों को लिखते समय पौलुस ने भी इस शब्द का प्रयोग इस अर्थ में नहीं किया है। वह उस क्रूस को भली-भाँति जानता था—उसने उसे धीरज से उठाया। परन्तु यहाँ वह उसकी बात नहीं कर रहा।
परन्तु कुछ स्थानों में क्रूस का अर्थ यह सिद्धान्त भी है कि मसीह पापियों के लिए क्रूस पर मरा—वह प्रायश्चित जो उसने क्रूस पर उनके लिए दुःख उठाकर किया—पाप के लिए वह सम्पूर्ण और सिद्ध बलिदान जो उसने तब चढ़ाया जब उसने अपनी देह को क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए दे दिया। संक्षेप में, यह एक शब्द, "क्रूस," क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह, एकमात्र उद्धारकर्ता का द्योतक है। पौलुस इसी अर्थ में इस शब्द का प्रयोग करता है जब वह कुरिन्थियों से कहता है, "क्रूस की कथा नाश होनेवालों के निकट मूर्खता है।" (1 कुरिन्थियों 1:18) इसी अर्थ में उसने गलातियों को लिखा, "ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल क्रूस का।" उसका अभिप्राय केवल इतना था, "मैं अपनी आत्मा के उद्धार के रूप में क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह को छोड़ और किसी बात का घमण्ड नहीं करता।"
"मसीह के क्रूस से प्रेरित का अभिप्राय क्रूस पर मसीह के उस सर्वपर्याप्त, प्रायश्चित्तिक और सन्तोषजनक बलिदान से है, हमारे छुटकारे के सम्पूर्ण कार्य के साथ; जिसके उद्धार देनेवाले ज्ञान में वह घोषणा करता है कि वह महिमा पाएगा और घमण्ड करता है।"—गलातियों पर कडवर्थ। 1613।
"इन वचनों के विषय में, मुझे कोई टीकाकार—चाहे प्राचीन हो या आधुनिक, पोपवादी हो या प्रोटेस्टेंट—जो इस स्थान पर लिखता हो, ऐसा नहीं मिलता जो यहाँ बताए गए क्रूस की व्याख्या क्रूस के चिह्न के रूप में करता हो—बल्कि उसमें जो क्रूस पर टाँगा गया उस पर विश्वास के अंगीकार के रूप में।"—मेयर की टीका। 1631।
"इसे उस क्रूस के विषय में समझना चाहिए जो मसीह ने हमारे लिए सहा, उसके विषय में नहीं जो हम उसके लिए सहते हैं।"—लेई की टिप्पणियाँ। 1650।
क्रूस पर चढ़ाया हुआ यीशु मसीह पौलुस की आत्मा का आनन्द और प्रसन्नता, उसकी शान्ति और मेल, उसकी आशा और भरोसा, उसकी नींव और विश्रामस्थान, उसका जहाज़ और शरण, उसका भोजन और औषधि था। उसने यह नहीं सोचा कि उसने स्वयं क्या किया और स्वयं क्या सहा। उसने अपनी भलाई और अपनी धार्मिकता पर मनन नहीं किया। उसे यह सोचना प्रिय था कि मसीह ने क्या किया और मसीह ने क्या सहा—मसीह की मृत्यु, मसीह की धार्मिकता, मसीह का प्रायश्चित, मसीह का लहू, मसीह का पूरा किया हुआ कार्य। इसी पर वह घमण्ड करता था। यही उसकी आत्मा का सूर्य था।
यही वह विषय है जिसका प्रचार करना उसे प्रिय था। वह पृथ्वी पर इधर-उधर घूमनेवाला मनुष्य था, जो पापियों के सामने घोषणा करता था कि परमेश्वर के पुत्र ने उनकी आत्माओं को बचाने के लिये अपने हृदय का लहू बहाया। वह संसार में चलता-फिरता लोगों को बताता था कि यीशु मसीह ने उनसे प्रेम किया और क्रूस पर उनके पापों के लिये मरा। देखिए, वह कुरिन्थियों से कैसे कहता है, "मैं ने सबसे पहले तुम्हें वही बात पहुंचा दी, जो मुझे पहुंची थी, कि पवित्रशास्त्र के वचन के अनुसार मसीह हमारे पापों के लिये मर गया।" (1 कुरिन्थियों 15:3।) "मैं ने यह निश्चय किया था कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह, बरन क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानूं।" (1 कुरिन्थियों 2:2।) वह निन्दा करनेवाला, सतानेवाला फरीसी मसीह के लहू से धोया गया था। वह इसके विषय में चुप नहीं रह सकता था। वह क्रूस की कथा सुनाते-सुनाते कभी नहीं थकता था।
विश्वासियों को लिखते समय भी वह इसी विषय पर विस्तार से बोलना चाहता था। यह देखकर आश्चर्य होता है कि उसकी पत्रियाँ प्रायः मसीह के दुःखभोग और मृत्यु से कितनी भरी हुई हैं—कैसे वे मसीह के मरते हुए प्रेम और सामर्थ्य के विषय में "साँस लेते विचारों और जलते शब्दों" से छलकती हैं। उसका हृदय इस विषय से भरा हुआ प्रतीत होता है। वह निरन्तर इसका विस्तार करता है, बार-बार इसी की ओर लौट आता है। यही वह सुनहरा सूत्र है जो उसकी सारी सैद्धान्तिक शिक्षा और व्यावहारिक उपदेशों में पिरोया हुआ है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि सबसे आगे बढ़ा हुआ मसीही भी क्रूस के विषय में कभी बहुत अधिक नहीं सुन सकता।
"क्रूस पर चढ़ाया हुआ मसीह सुसमाचार का सार है, और उसकी सारी धन-सम्पत्ति उसी में समाई है। पौलुस मसीह से इतना मोहित था कि यीशु से अधिक मधुर कुछ भी उसकी लेखनी और होठों से नहीं टपक सकता था। देखा गया है कि उसकी पत्रियों में "यीशु" शब्द पाँच सौ बार आया है।"—चार्नॉक। 1684।
अपने मन फिराव के समय से लेकर सारे जीवन भर वह इसी पर जीवित रहा। वह गलातियों से कहता है, "मैं शरीर में जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझ से प्रेम किया और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।" (गलातियों 2:20।) किस बात ने उसे परिश्रम करने के लिये इतना सामर्थी बनाया? किस बात ने उसे काम करने के लिये इतना तत्पर बनाया? किस बात ने उसे कुछ को बचाने के प्रयत्न में इतना अथक बनाया? किस बात ने उसे इतना दृढ़ और धीरजवन्त बनाया? मैं आपको इस सब का भेद बताता हूँ। वह सदा विश्वास के द्वारा मसीह की देह और मसीह के लहू से पोषण पाता था। क्रूस पर चढ़ाया हुआ यीशु उसकी आत्मा का खाना-पीना था।
और हम निश्चिन्त रह सकते हैं कि पौलुस सही था। निश्चय जानिए, मसीह का क्रूस—पापियों के प्रायश्चित के लिये क्रूस पर मसीह की मृत्यु—सारी बाइबल का केन्द्रीय सत्य है। उत्पत्ति खोलते ही हम इसी सत्य से आरम्भ करते हैं। स्त्री के वंश का सर्प के सिर को कुचलना क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह की भविष्यद्वाणी के सिवा और कुछ नहीं है। यही सत्य मूसा की व्यवस्था और यहूदियों के इतिहास में परदे के पीछे से चमकता है। प्रतिदिन का बलिदान, फसह का मेम्ना, तम्बू और मन्दिर में लगातार बहाया जानेवाला लहू—ये सब क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के प्रतीक थे। यही सत्य है जिसका सम्मान हम प्रकाशित वाक्य की पुस्तक समाप्त करने से पहले स्वर्ग के दर्शन में देखते हैं। हमें बताया गया है, "सिंहासन और चारों प्राणियों के बीच में, और उन प्राचीनों के बीच में, मानो एक मेम्ना जो वध किया हुआ था, खड़ा था।" (प्रकाशित वाक्य 5:6।) स्वर्ग की महिमा के बीच भी हमें क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का दर्शन मिलता है। मसीह के क्रूस को हटा दीजिए, तो बाइबल एक अन्धकारमय पुस्तक बन जाती है। यह उन मिस्री चित्रलिपियों के समान है जिनके अर्थ खोलनेवाली कुंजी खो गई हो—विचित्र और आश्चर्यजनक, परन्तु वास्तव में किसी काम की नहीं।
इस लेख का प्रत्येक पाठक मेरी बात पर ध्यान दे। आप बाइबल के विषय में बहुत कुछ जानते होंगे। आप उसमें दिए गए इतिहासों की रूपरेखा और वर्णित घटनाओं की तिथियाँ वैसे ही जानते होंगे जैसे कोई इंग्लैंड का इतिहास जानता है। आप उसमें उल्लिखित स्त्री-पुरुषों के नाम वैसे ही जानते होंगे जैसे कोई कैसर, सिकन्दर महान या नेपोलियन को जानता है। आप बाइबल की अनेक आज्ञाओं को जानते और उनकी सराहना करते होंगे, जैसे कोई अफ़लातून, अरस्तू या सेनेका की सराहना करता है। परन्तु यदि आपने अब तक यह नहीं जाना कि क्रूस पर चढ़ाया हुआ मसीह इस सारी पुस्तक की नींव है, तो आपने अब तक अपनी बाइबल बहुत ही कम लाभ के साथ पढ़ी है। आपका धर्म बिना सूर्य का स्वर्ग है, बिना शिरोमणि पत्थर की मेहराब है, बिना सुई का दिशा-सूचक यन्त्र है, बिना कमानी या बाटों की घड़ी है, बिना तेल का दीपक है। वह आपको शान्ति नहीं देगा। वह आपकी आत्मा को नरक से नहीं छुड़ाएगा।
मैं फिर कहता हूँ, ध्यान दीजिए। आप मसीह के विषय में एक प्रकार के मस्तिष्क के ज्ञान से बहुत कुछ जान सकते हैं। आप जान सकते हैं कि वह कौन था, कहाँ जन्मा और उसने क्या किया। आप उसके चमत्कारों, उसके वचनों, उसकी भविष्यद्वाणियों और उसके विधियों को जान सकते हैं। आप जान सकते हैं कि वह कैसे जीया, कैसे दुःख उठाया और कैसे मरा। परन्तु जब तक आप अनुभव से मसीह के क्रूस की सामर्थ्य को नहीं जानते—जब तक आप भीतर यह नहीं जानते और अनुभव नहीं करते कि उस क्रूस पर बहाए गए लहू ने आपके अपने विशेष पापों को धो डाला है—जब तक आप यह मानने को तैयार नहीं कि आपका उद्धार पूरी तरह उस कार्य पर निर्भर है जो मसीह ने क्रूस पर किया—जब तक ऐसा नहीं है, मसीह से आपको कुछ भी लाभ नहीं होगा। केवल मसीह का नाम जान लेना आपको कभी नहीं बचाएगा। आपको उसके क्रूस और उसके लहू को जानना होगा, नहीं तो आप अपने पापों में मरेंगे।
"यदि हमारा विश्वास मसीह के जीवन पर ही रुक जाए और उसके लहू को न थामे, तो वह धर्मी ठहरानेवाला विश्वास नहीं होगा। उसके चमत्कार, जिन्होंने संसार को उसकी शिक्षाओं के लिये तैयार किया; उसकी पवित्रता, जिसने उसे अपने दुःखभोग के योग्य बनाया—क्रूस के जुड़े बिना हमारे लिये अपर्याप्त होते।" चार्नॉक। 1684।
जब तक आप जीवित हैं, ऐसे धर्म से सावधान रहिए जिसमें क्रूस की बहुत चर्चा नहीं है। आप ऐसे समय में जी रहे हैं जब यह चेतावनी दुःखद रूप से आवश्यक है। मैं फिर कहता हूँ, क्रूस के बिना धर्म से सावधान रहिए।
आज के दिनों में सैकड़ों आराधना-स्थल ऐसे हैं जिनमें क्रूस को छोड़कर लगभग सब कुछ है। वहाँ नक्काशीदार बलूत की लकड़ी और तराशे हुए पत्थर हैं; रंगीन काँच और चमकदार चित्रकारी है; गम्भीर आराधनाएँ और विधियों का निरन्तर चक्र है; परन्तु मसीह का सच्चा क्रूस वहाँ नहीं है। वेदी पर से क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु की घोषणा नहीं होती। परमेश्वर के मेम्ने को ऊँचा नहीं उठाया जाता, और उस पर विश्वास के द्वारा उद्धार का सेंतमेंत प्रचार नहीं किया जाता। और इसीलिए सब कुछ गलत है। ऐसे आराधना-स्थलों से सावधान रहो। वे प्रेरितों के समान नहीं हैं। वे पौलुस को सन्तुष्ट न कर पाते।
"पौलुस ने ठान लिया था कि यीशु मसीह, और उसमें भी क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह को छोड़ और कुछ न जानेगा। परन्तु बहुत से लोग सेवकाई को इस प्रकार चलाते हैं मानो उन्होंने इसके विपरीत ठान लिया हो—अर्थात् यीशु मसीह और क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह को छोड़ और सब कुछ जानना।"—ट्रेल। 1690।
हमारे समय में हज़ारों धार्मिक पुस्तकें छपती हैं जिनमें क्रूस को छोड़कर सब कुछ है। वे संस्कारों के विषय में निर्देशों और कलीसिया की प्रशंसाओं से भरी हैं। उनमें पवित्र जीवन के विषय में उपदेशों और सिद्धता प्राप्त करने के नियमों की भरमार है। उनमें भीतर और बाहर, दोनों ओर, बपतिस्मा-कुण्ड और क्रूस बहुत हैं। परन्तु मसीह का सच्चा क्रूस छोड़ दिया गया है। उद्धारकर्ता, और उसके प्रायश्चित तथा सम्पूर्ण उद्धार के काम का या तो उल्लेख ही नहीं होता, या पवित्रशास्त्र के विरुद्ध रीति से होता है। और इसीलिए वे व्यर्थ से भी बुरी हैं। ऐसी पुस्तकों से सावधान रहो। वे प्रेरितों के समान नहीं हैं। वे पौलुस को कभी सन्तुष्ट न कर पातीं।
पौलुस ने क्रूस को छोड़ किसी बात पर घमण्ड न किया। उसके समान बनने का यत्न करो। क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु को अपनी आत्मा की आँखों के सामने पूरी रीति से रखो। ऐसी किसी शिक्षा को न सुनो जो तुम्हारे और उसके बीच किसी वस्तु को खड़ा करे। गलातियों की पुरानी भूल में न पड़ो—यह न सोचो कि आज किसी का मार्गदर्शन प्रेरितों से अच्छा है। उन "पुराने मार्गों" से लज्जित न हो, जिन पर पवित्र आत्मा से प्रेरित लोग चले थे। आधुनिक शिक्षकों की अस्पष्ट बातें, जो "सार्वभौमिकता" और "कलीसिया" के विषय में बड़े-बड़े घमण्ड के बोल बोलते हैं, तुम्हारी शान्ति को भंग न करें, और तुम्हें क्रूस से अपने हाथ छुड़ाने पर विवश न करें। कलीसियाएँ, सेवक और संस्कार, सब अपनी रीति से उपयोगी हैं—परन्तु वे क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह नहीं हैं। मसीह की महिमा किसी और को न दो। "जो घमण्ड करे वह प्रभु पर घमण्ड करे।" (1 कुरिन्थियों 1:31।)
3. अन्त में मैं यह दिखाऊँ कि सब मसीहियों को मसीह के क्रूस पर क्यों घमण्ड करना चाहिए।
मैं अनुभव करता हूँ कि मुझे इस विषय में कुछ कहना ही चाहिए, क्योंकि इसके बारे में अज्ञानता फैली हुई है। मुझे सन्देह है कि बहुत से लोग मसीह के क्रूस के विषय में कोई विशेष महिमा और सुन्दरता नहीं देखते। इसके विपरीत वे इसे पीड़ादायक, अपमानजनक और नीचा दिखानेवाला समझते हैं। उन्हें उसकी मृत्यु और दुःखों की कथा में कोई विशेष लाभ नहीं दिखता। वे उससे मुँह फेर लेते हैं, मानो वह कोई अप्रिय बात हो।
अब मेरा विश्वास है कि ऐसे लोग बिलकुल गलत हैं। मैं उनसे सहमत नहीं हो सकता। मेरा विश्वास है कि हम सब के लिए मसीह के क्रूस पर निरन्तर ध्यान लगाए रखना अत्यन्त उत्तम बात है। यह स्मरण करते रहना अच्छा है कि यीशु को कैसे दुष्ट मनुष्यों के हाथ पकड़वाया गया—कैसे उन्होंने अत्यन्त अन्यायपूर्ण न्याय से उसे दोषी ठहराया—कैसे उन्होंने उस पर थूका, उसे कोड़े मारे, पीटा, और उसे काँटों का मुकुट पहनाया—कैसे वे उसे वध के लिए ले जाए जानेवाले मेम्ने के समान बाहर ले गए, और उसने न कुड़कुड़ाया न विरोध किया—कैसे उन्होंने उसके हाथों और पाँवों में कीलें ठोंकीं, और उसे दो चोरों के बीच कलवरी पर खड़ा किया—कैसे उन्होंने उसकी पसली को भाले से बेधा, उसके दुःखों में उसका उपहास किया, और उसे नंगा और लहूलुहान वहीं टँगा रहने दिया जब तक वह मर न गया। मैं कहता हूँ, इन सब बातों का स्मरण करना भला है। यह व्यर्थ नहीं कि नए नियम में क्रूस पर चढ़ाए जाने का वर्णन चार बार हुआ है। बहुत कम बातें ऐसी हैं जिनका वर्णन सुसमाचार के चारों लेखक करते हैं। साधारणतः यदि मत्ती, मरकुस और लूका हमारे प्रभु के जीवन की कोई बात बताते हैं, तो यूहन्ना उसे नहीं बताता। परन्तु एक बात ऐसी है जिसे चारों ने पूरे विस्तार से दिया है, और वह एक बात क्रूस की कथा है। यह एक सार्थक तथ्य है, जिसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
लोग यह भूल जाते हैं कि क्रूस पर मसीह के सब दुःख पहले से ठहराए गए थे। वे उस पर संयोग या दुर्घटना से नहीं आए—वे सब अनन्तकाल से योजित, सुनिश्चित और निर्धारित थे। पापियों के उद्धार के लिए अनन्त त्रिएकता की सब योजनाओं में क्रूस को पहले से देखा गया था। परमेश्वर के उद्देश्यों में क्रूस अनन्तकाल से स्थापित था। यीशु ने पीड़ा की एक धड़कन भी न सही, और यीशु ने अपने लहू की एक भी अनमोल बूँद न बहाई, जो बहुत पहले से नियत न हुई हो। अनन्त बुद्धि ने ठहराया कि छुटकारा क्रूस के द्वारा हो। अनन्त बुद्धि ही यीशु को ठीक समय पर क्रूस तक ले आई। वह "परमेश्वर की ठहराई हुई मनसा और पूर्व-ज्ञान के अनुसार" क्रूस पर चढ़ाया गया। (प्रेरितों के काम 2:23।)
लोग यह भी भूल जाते हैं कि क्रूस पर मसीह के सब दुःख मनुष्य के उद्धार के लिए आवश्यक थे। यदि हमारे पाप कभी उठाए जाने थे तो उसे ही उन्हें उठाना था। केवल उसके कोड़ों से ही हम चंगे हो सकते थे। हमारे ऋण का यही एक भुगतान था जिसे परमेश्वर स्वीकार करता—यही वह महान बलिदान था जिस पर हमारा अनन्त जीवन निर्भर था। यदि
मसीह क्रूस पर न जाता और हमारे स्थान पर दुःख न उठाता, अर्थात् धर्मी अधर्मियों के लिए, तो हमारे लिए आशा की एक चिंगारी भी न होती। हमारे और परमेश्वर के बीच एक भारी खाई होती, जिसे कोई मनुष्य कभी पार न कर सकता।
"मसीह की दीनता में हमारी महिमा, उसकी निर्बलता में हमारा बल, उसके अपमान में हमारी महिमा, और उसकी मृत्यु में हमारा जीवन निहित है।"—कडवर्थ। 1613।
"विश्वास की आँख मसीह को क्रूस की चोटी पर विजय-रथ में बैठे हुए देखती है; और शैतान को उसी क्रूस के सबसे निचले भाग में बँधा हुआ और मसीह के पाँवों तले रौंदा हुआ।"—डेवनेन्ट, कुलुस्सियों पर। 1627।
लोग भूल जाते प्रतीत होते हैं कि मसीह के सारे दुःख उसने स्वेच्छा से और अपनी ही इच्छा से सहे। उस पर कोई दबाव नहीं था। उसने अपनी ही इच्छा से अपना प्राण दिया—अपनी ही इच्छा से वह क्रूस पर गया कि जो काम करने आया था उसे पूरा करे। वह एक ही वचन से स्वर्गदूतों की सेनाओं को बुला सकता था, और पिलातुस और हेरोदेस तथा उनकी सारी सेनाओं को हवा के आगे भूसे की नाईं तितर-बितर कर सकता था। परन्तु वह स्वेच्छा से दुःख सहनेवाला था। उसका मन पापियों के उद्धार पर लगा था। उसने ठान लिया था कि अपना ही लहू बहाकर "पाप और अशुद्धता के लिये एक सोता" खोल दे। (जकर्याह 13:1।)
जब मैं यह सब सोचता हूँ, तो मसीह के क्रूस के विषय में मुझे कुछ भी पीड़ादायक या अप्रिय नहीं दिखाई देता। इसके विपरीत, मैं उसमें बुद्धि और सामर्थ्य, शान्ति और आशा, आनन्द और हर्ष, सान्त्वना और ढाढ़स देखता हूँ। जितना अधिक मैं क्रूस को अपने मन की आँखों के सामने रखता हूँ, उतनी ही अधिक परिपूर्णता मुझे उसमें दिखाई देती है। जितनी देर मैं अपने विचारों में क्रूस पर ठहरा रहता हूँ, उतना ही मुझे सन्तोष होता है कि संसार में किसी भी और स्थान की अपेक्षा क्रूस के पास सीखने को अधिक है।
(क) क्या मैं जानना चाहता हूँ कि पापी संसार के प्रति पिता परमेश्वर के प्रेम की लम्बाई-चौड़ाई कितनी है? उसे मैं सबसे अधिक स्पष्ट रूप में कहाँ देखूँगा? क्या मैं उसके महिमामय सूर्य को देखूँ, जो कृतघ्नों और दुष्टों पर प्रतिदिन चमकता है? क्या मैं बोने और काटने के समय को देखूँ, जो हर वर्ष नियमित क्रम से लौट आते हैं? नहीं, कदापि नहीं! मुझे इस प्रकार की किसी भी बात से बढ़कर प्रेम का प्रमाण मिल सकता है। मैं मसीह के क्रूस को देखता हूँ। उसमें मैं पिता के प्रेम का कारण नहीं—परन्तु उसका परिणाम देखता हूँ। वहाँ मैं देखता हूँ कि परमेश्वर ने इस दुष्ट संसार से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया—उसे दुःख उठाने और मरने के लिये दे दिया—ताकि "जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो—परन्तु अनन्त जीवन पाए।" (यूहन्ना 3:16।) मैं जानता हूँ कि पिता हम से प्रेम रखता है, क्योंकि उसने अपने पुत्र को, अपने एकलौते पुत्र को, हम से नहीं रख छोड़ा। कभी-कभी मैं कल्पना कर सकता हूँ कि पिता परमेश्वर इतना ऊँचा और पवित्र है कि हम जैसे दयनीय, भ्रष्ट प्राणियों की चिन्ता नहीं करता! परन्तु जब मैं मसीह के क्रूस को देखता हूँ, तब मैं ऐसा सोच नहीं सकता, मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए, और ऐसा सोचने का साहस भी नहीं कर सकता।
"जिस संसार में हम रहते हैं वह हमारे सिरों पर गिर पड़ता, यदि क्रूस के खम्भे ने उसे थामा न होता; यदि मसीह बीच में आकर मनुष्य के पाप का प्रायश्चित करने की प्रतिज्ञा न करता। इसी से सब कुछ स्थिर है—हम जिस किसी आशीष का आनन्द लेते हैं वह हमें इसकी स्मृति दिला सकती है; वे सब पाप के कारण खो गई थीं—परन्तु उसके लहू से मोल ली गईं। यदि हम इसका भली-भाँति अध्ययन करें तो हमें बोध होगा कि परमेश्वर ने पाप से कैसा बैर और संसार से कैसा प्रेम रखा।"—चार्नॉक।
(ख) क्या मैं जानना चाहता हूँ कि परमेश्वर की दृष्टि में पाप कितना अत्यन्त पापमय और घृणित है? उसे मैं सबसे अधिक पूर्णता से प्रकट होता हुआ कहाँ देखूँगा? क्या मैं जलप्रलय के इतिहास की ओर मुड़कर पढ़ूँ कि पाप ने किस प्रकार संसार को डुबो दिया? क्या मैं मृत सागर के तट पर जाकर देखूँ कि पाप ने सदोम और अमोरा पर क्या विपत्ति डाली? क्या मैं भटकते हुए यहूदियों की ओर देखकर ध्यान दूँ कि पाप ने उन्हें पृथ्वी के चारों ओर किस प्रकार बिखेर दिया है? नहीं! मुझे इससे भी स्पष्ट प्रमाण मिल सकता है! मैं मसीह के क्रूस को देखता हूँ। वहाँ मैं देखता हूँ कि पाप इतना काला और दण्डनीय है कि परमेश्वर के अपने पुत्र के लहू के सिवा कोई और वस्तु उसे धो नहीं सकती। वहाँ मैं देखता हूँ कि पाप ने मुझे मेरे पवित्र सृष्टिकर्ता से इस प्रकार अलग कर दिया है कि स्वर्ग के सारे स्वर्गदूत मिलकर भी हमारे बीच मेल नहीं करा सकते थे। मसीह की मृत्यु से कम कुछ भी हमें मिला नहीं सकता था। यदि मैं घमण्डी लोगों की तुच्छ बातें सुनता, तो कभी-कभी कल्पना कर सकता था कि पाप इतना भी पापमय नहीं है! परन्तु जब मैं मसीह के क्रूस को देखता हूँ, तब पाप को तुच्छ नहीं समझ सकता।
(ग) क्या मैं जानना चाहता हूँ कि परमेश्वर ने पापियों के लिये जो उद्धार ठहराया है वह कितना परिपूर्ण और सम्पूर्ण है? उसे मैं सबसे स्पष्ट रूप में कहाँ देखूँगा? क्या मैं बाइबल में परमेश्वर की दया के विषय में दिए गए सामान्य कथनों की ओर जाऊँ? क्या मैं इस सामान्य सत्य पर ठहर जाऊँ कि परमेश्वर "प्रेम का परमेश्वर" है? नहीं, कदापि नहीं! मैं मसीह के क्रूस को देखूँगा। मुझे उसके जैसा कोई प्रमाण नहीं मिलता। घायल विवेक और व्याकुल मन के लिये मुझे वैसा कोई मरहम नहीं मिलता जैसा यीशु को शापित काठ पर अपने लिये मरते हुए देखने से मिलता है। वहाँ मैं देखता हूँ कि मेरे सारे भारी ऋणों का पूरा भुगतान किया जा चुका है। जिस व्यवस्था को मैंने तोड़ा उसका शाप उस पर आ पड़ा जिसने वहाँ मेरे स्थान पर दुःख उठाया। उस व्यवस्था की सब माँगें पूरी हो गई हैं। मेरे लिये भुगतान हो चुका है, यहाँ तक कि अन्तिम कौड़ी तक। वह दो बार नहीं माँगा जाएगा। आह, कभी-कभी मैं सोच सकता था कि मैं क्षमा पाने के योग्य होने से भी अधिक बुरा हूँ! मेरा अपना मन कभी-कभी कानाफूसी करता है कि मैं उद्धार पाने के लिये बहुत दुष्ट हूँ। परन्तु मैं अपने अच्छे क्षणों में जानता हूँ कि यह सब मेरा मूर्खतापूर्ण अविश्वास है। मैं अपने सन्देहों का उत्तर कलवरी पर बहाए गए लहू में पढ़ता हूँ। जब मैं क्रूस को देखता हूँ तब मुझे निश्चय होता है कि अत्यन्त नीच लोगों के लिये भी स्वर्ग का मार्ग है।
(घ) क्या मैं पवित्र जन होने के लिये प्रबल कारण खोजना चाहता हूँ? उनके लिये मैं कहाँ मुड़ूँ? क्या मैं केवल दस आज्ञाओं को सुनूँ? क्या मैं उन उदाहरणों का अध्ययन करूँ जो बाइबल में दिए गए हैं कि अनुग्रह क्या कर सकता है? क्या मैं स्वर्ग के प्रतिफलों और नरक के दण्डों पर मनन करूँ? क्या इनसे भी प्रबल कोई प्रेरणा नहीं है? है! मैं मसीह के क्रूस को देखूँगा! वहाँ मैं देखता हूँ कि मसीह का प्रेम मुझे विवश करता है कि "अपने लिये नहीं—परन्तु उसके लिये जीऊँ।" वहाँ मैं देखता हूँ कि अब मैं अपना नहीं हूँ— मैं "दाम देकर मोल लिया गया" हूँ। (2 कुरिन्थियों 5:15; 1 कुरिन्थियों 6:20।) मैं अत्यन्त गम्भीर बन्धनों से बँधा हूँ कि अपने शरीर और आत्मा से, जो उसके हैं, यीशु की महिमा करूँ। वहाँ मैं देखता हूँ कि यीशु ने अपने आप को मेरे लिये दे दिया, केवल इसलिये नहीं कि मुझे सब अधर्म से छुड़ाए—परन्तु इसलिये भी कि मुझे शुद्ध करे, और मुझे एक "विशेष प्रजा" का जन बनाए, जो "भले कामों में सरगर्म" हो। (तीतुस 2:14।) उसने मेरे पापों को अपनी देह पर काठ पर उठा लिया, "ताकि मैं पापों के लिये मरकर धार्मिकता के लिये जीवित रहूँ।" (1 पतरस 2:24।) मसीह के क्रूस के स्पष्ट दर्शन के समान पवित्र करनेवाली कोई वस्तु नहीं! वह संसार को हमारे लिये, और हमें संसार के लिये क्रूस पर चढ़ा देता है। जब हम स्मरण करते हैं कि हमारे पापों के कारण यीशु मरा, तब हम पाप से प्रेम कैसे रख सकते हैं? निश्चय ही क्रूस पर चढ़ाए गए प्रभु के चेलों के समान पवित्र किसी को नहीं होना चाहिए।
(इ) क्या मैं जानना चाहूँ कि जीवन की सब चिन्ताओं और झंझटों में सन्तुष्ट और प्रसन्न कैसे रहा जाए? मैं किस पाठशाला में जाऊँ? इस मनोदशा को सबसे सहजता से कैसे प्राप्त करूँ? क्या मैं परमेश्वर की सर्वसत्ता, परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर के विधान और परमेश्वर के प्रेम को देखूँ? ऐसा करना भला है। परन्तु मेरे पास इससे भी उत्तम तर्क है। मैं मसीह के क्रूस को देखूँगा। मैं अनुभव करता हूँ कि "जिसने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे मेरे लिये मरने को सौंप दिया, वह उसके साथ मुझे और सब कुछ भी क्योंकर न देगा"—वह सब जिसकी मुझे सचमुच आवश्यकता है। (रोमियों 8:32।) जिसने मेरी आत्मा के लिये ऐसी पीड़ा, ऐसे दुःख और ऐसे कष्ट सहे, वह निश्चय ही मुझसे कोई ऐसी वस्तु नहीं रोक रखेगा जो सचमुच भली है। जिसने मेरे लिये बड़े-बड़े काम किए हैं, वह निस्सन्देह छोटे काम भी करेगा। जिसने स्वर्ग में मेरा घर बनाने के लिये अपना ही लहू दिया, वह निःसन्देह मार्ग में मेरे लिये जो कुछ सचमुच लाभदायक है वह सब जुटाएगा। सन्तोष सीखने के लिये क्रूस के चरणों के समान कोई पाठशाला नहीं है!
(ई) क्या मैं इस आशा के लिये तर्क जुटाना चाहूँ कि मैं कभी निकाला न जाऊँगा? उन्हें ढूँढ़ने मैं कहाँ जाऊँ? क्या मैं अपने ही गुणों और वरदानों को देखूँ? क्या मैं अपने ही विश्वास, प्रेम, पश्चात्ताप, उत्साह और प्रार्थना में शान्ति ढूँढ़ूँ? क्या मैं अपने ही मन की ओर मुड़कर कहूँ, "यही मन कभी विश्वासघाती और ठंडा न होगा"? अरे नहीं! परमेश्वर न करे! मैं मसीह के क्रूस को देखूँगा। यही मेरा सबसे बड़ा तर्क है। यही मेरा मुख्य आधार है। मैं यह नहीं सोच सकता कि जिसने मेरी आत्मा को छुड़ाने के लिये ऐसे कष्ट सहे, वह उस आत्मा को अन्त में नष्ट होने देगा, जबकि उसने एक बार स्वयं को उसी पर डाल दिया है। अरे नहीं! जिस वस्तु का मूल्य यीशु ने चुकाया, उसे यीशु अवश्य सुरक्षित रखेगा। उसने उसके लिये भारी मूल्य चुकाया है। वह उसे सहज ही खोने न देगा। जब मैं अन्धकार में पड़ा पापी था, तब उसने मुझे अपने पास बुलाया—मेरे विश्वास कर लेने के बाद वह मुझे कभी न त्यागेगा। जब शैतान हमें इस बात पर सन्देह करने को उकसाए कि मसीह के लोग गिरने से बचाए जाएँगे या नहीं, तब हमें शैतान से कहना चाहिए कि वह क्रूस को देखे।
"विश्वासी अनन्त क्रोध से ऐसा छूटा हुआ है कि यदि शैतान और विवेक कहें, 'तू पापी है, और व्यवस्था के श्राप के अधीन है,' तो वह कह सकता है, 'यह सच है, मैं पापी हूँ; परन्तु मैं तो काठ पर टाँगा गया और मरा, और अपने सिर और व्यवस्था-दाता मसीह में श्रापित ठहरा, और उसका चुकाया हुआ मूल्य और उसका सहा हुआ दुःख मेरा ही मूल्य और मेरा ही दुःख है।'"—रदरफ़ोर्ड, क्राइस्ट डाइंग। 1647।
और अब, क्या तुम्हें आश्चर्य होगा कि मैंने कहा कि सब मसीहियों को क्रूस पर घमण्ड करना चाहिए? क्या तुम्हें इससे बढ़कर यह आश्चर्य न होगा कि कोई क्रूस की बात सुनकर भी अटल बना रहे? मैं घोषणा करता हूँ कि मनुष्य की भ्रष्टता का इससे बड़ा कोई प्रमाण मैं नहीं जानता कि कहलानेवाले हज़ारों मसीही क्रूस में कुछ भी नहीं देखते। हमारे हृदय भली-भाँति पत्थर कहलाएँ—हमारे मन की आँखें भली-भाँति अन्धी कहलाएँ—हमारा सारा स्वभाव भली-भाँति रोगी कहलाए—हम सब भली-भाँति मरे हुए कहलाएँ, जब मसीह के क्रूस की बात सुनकर भी उसकी उपेक्षा की जाती है। निश्चय ही हम भविष्यद्वक्ता के शब्द अपनाकर कह सकते हैं, "हे आकाश सुन, और हे पृथ्वी कान लगा; एक अचम्भे और भयानक बात हुई है"—मसीह पापियों के लिये क्रूस पर चढ़ाया गया, फिर भी बहुत से मसीही ऐसे जीते हैं मानो वह कभी क्रूस पर चढ़ाया ही नहीं गया!
(अ) क्रूस मसीही धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है। दूसरे धर्मों में व्यवस्थाएँ और नैतिक आज्ञाएँ, रीतियाँ और विधियाँ, पुरस्कार और दण्ड होते हैं। परन्तु दूसरे धर्म हमें किसी मरनेवाले उद्धारकर्ता के विषय में नहीं बता सकते। वे हमें क्रूस नहीं दिखा सकते। यही सुसमाचार का मुकुट और महिमा है। यही वह विशेष शान्ति है जो केवल उसी की है। वह धार्मिक शिक्षा सचमुच अभागी है जो स्वयं को मसीही कहती है, फिर भी जिसमें क्रूस की कोई बात नहीं। जो मनुष्य इस प्रकार शिक्षा देता है, वह यह भी दावा कर सकता है कि वह सौरमण्डल की व्याख्या करता है, और फिर भी अपने सुननेवालों को सूर्य के विषय में कुछ नहीं बताता।
(आ) क्रूस सेवक का बल है। मैं तो इसे सारे संसार के बदले भी न छोड़ूँ। मैं बिना हथियार के सैनिक के समान, बिना तूलिका के चित्रकार के समान, बिना दिशासूचक के नाविक के समान, बिना औज़ारों के मज़दूर के समान अनुभव करूँगा। दूसरे चाहें तो व्यवस्था और नैतिकता का प्रचार करें; दूसरे नरक के भय और स्वर्ग के आनन्द की बातें सुनाएँ; दूसरे अपनी मण्डलियों को संस्कारों और कलीसिया की शिक्षाओं से भिगो दें; मुझे तो मसीह का क्रूस दीजिए! यही एकमात्र उत्तोलक है जिसने अब तक संसार को उलट-पुलट किया है और लोगों से उनके पाप छुड़वाए हैं। और यदि यह नहीं कर सकता, तो कुछ भी नहीं कर सकता। मनुष्य लैटिन, यूनानी और इब्रानी के पूरे ज्ञान के साथ प्रचार आरम्भ कर सकता है; परन्तु यदि वह क्रूस के विषय में कुछ नहीं जानता तो अपने सुननेवालों में बहुत कम या कुछ भी भला नहीं कर पाएगा। ऐसा कोई सेवक कभी नहीं हुआ जिसने आत्माओं के मन फिराव के लिये बहुत कुछ किया हो और क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह पर बहुत न ठहरा हो। लूथर, रदरफ़ोर्ड, व्हिटफ़ील्ड और मैक्चेन—ये सब अत्यन्त उत्कृष्ट रीति से क्रूस के प्रचारक थे। पवित्र आत्मा इसी प्रचार को आशीष देने में आनन्दित होता है। वह उनका आदर करना चाहता है जो क्रूस का आदर करते हैं।
(ग) क्रूस ही सब मिशनरी सफलता का भेद है। अन्यजातियों के हृदयों को इसके सिवाय किसी और बात ने कभी नहीं छुआ। जिस अनुपात में इसे ऊँचा उठाया गया है, उसी अनुपात में मिशनों की उन्नति हुई है। यही वह हथियार है जिसने पृथ्वी के हर कोने में हर प्रकार के हृदयों पर विजय पाई है। ग्रीनलैंडवासियों, अफ्रीकियों, दक्षिण-सागर के द्वीपवासियों, हिन्दुओं, चीनियों, सभी ने समान रूप से इसकी सामर्थ्य को अनुभव किया है। जैसे मेनाई जलडमरूमध्य को पार करनेवाली वह विशाल लोहे की नली उसमें रखे जा सकनेवाले सारे मृत भार से कहीं अधिक आधे घण्टे की धूप से प्रभावित होकर मुड़ जाती है, वैसे ही जंगली लोगों के हृदय क्रूस के सामने पिघल गए हैं, जबकि और हर तर्क उन्हें पत्थरों से अधिक नहीं हिला पाता था। एक उत्तर-अमरीकी इण्डियन ने अपने मन फिराव के बाद कहा, "भाइयो, मैं अन्यजाति था। मैं जानता हूँ कि अन्यजाति कैसे सोचते हैं। एक बार एक प्रचारक आया और हमें समझाने लगा कि एक परमेश्वर है; पर हमने उससे कहा कि जहाँ से आया है वहीं लौट जा। एक और प्रचारक आया और हमसे कहा कि झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, मदिरा मत पीओ; पर हमने उसकी ओर ध्यान न दिया। अन्त में एक और दिन मेरी झोपड़ी में आया और बोला, 'मैं स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु के नाम से तुम्हारे पास आया हूँ। वह तुम्हें यह बताने भेजता है कि वह तुम्हें सुखी करेगा और दुःख से छुड़ाएगा। इसी उद्देश्य से वह मनुष्य बना, अपना प्राण फिरौती के रूप में दिया, और पापियों के लिये अपना लहू बहाया।' मैं उसकी बातें भूल न सका। मैंने उन्हें दूसरे इण्डियनों को बताया, और हमारे बीच एक जागृति आरम्भ हुई।" इसलिये मैं कहता हूँ कि यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे शब्द अन्यजातियों के बीच प्रवेश पाएँ, तो हमारे उद्धारकर्ता मसीह के दुःखभोग और मृत्यु का प्रचार करो। शैतान की ऐसी पूरी विजय कभी न हुई, जैसी तब हुई जब उसने चीन के जेसुइट मिशनरियों को क्रूस की कथा छिपाए रखने के लिये मना लिया!
(घ) क्रूस कलीसिया की उन्नति की नींव है। जिस कलीसिया में क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह निरन्तर ऊँचा नहीं उठाया जाता, वह कभी आदर न पाएगी—क्रूस की कमी की भरपाई कोई वस्तु नहीं कर सकती। उसके बिना सब कुछ शालीनता और क्रम से किया जा सकता है; उसके बिना भव्य रीतियाँ, सुन्दर संगीत, शानदार गिरजाघर, विद्वान सेवक, प्रभु-भोज की भरी हुई मेज़ें, और गरीबों के लिये बड़े-बड़े चन्दे हो सकते हैं। परन्तु क्रूस के बिना कोई भलाई न होगी; अन्धकार भरे हृदय प्रकाशित न होंगे, घमण्डी हृदय दीन न होंगे, शोकित हृदय शान्ति न पाएँगे, मूर्छित हृदय प्रोत्साहित न होंगे। कलीसिया और प्रेरितीय सेवकाई पर उपदेश—बपतिस्मा और प्रभु-भोज पर उपदेश—एकता और फूट पर उपदेश—उपवासों और सहभागिता पर उपदेश—प्राचीन पिताओं और सन्तों पर उपदेश—ऐसे उपदेश मसीह के क्रूस पर उपदेशों की कमी की पूर्ति कभी न करेंगे। वे कुछ लोगों का मनोरंजन कर सकते हैं—किसी का पेट न भरेंगे। भूखे मनुष्य के लिये भोजन के अभाव की पूर्ति भव्य भोज-कक्ष और मेज़ पर सोने के सुन्दर बर्तन कभी नहीं कर सकते। क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह लोगों की भलाई करने के लिये परमेश्वर की ठहराई हुई विधि है। जब कभी कोई कलीसिया क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह को छिपा रखती है, या किसी भी और वस्तु को उस प्रथम स्थान पर रखती है जो क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का सदा होना चाहिए, उसी क्षण से वह कलीसिया उपयोगी होना छोड़ देती है। अपने मंचों पर क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के बिना कलीसिया भूमि को व्यर्थ घेरनेवाले, एक मृत शव, बिना जल के कुएँ, एक बाँझ अंजीर के पेड़, सोते हुए पहरुए, मौन तुरही, गूँगे गवाह, शान्ति की शर्तों से रहित राजदूत, बिना समाचार के दूत, बिना आग के प्रकाश-स्तम्भ, निर्बल विश्वासियों के लिये ठोकर, अविश्वासियों के लिये सान्त्वना, कर्मकाण्ड के लिये तपा हुआ बिछौना, शैतान के लिये आनन्द और परमेश्वर के लिये अप्रिय वस्तु से कुछ ही अच्छी है।
(ङ) क्रूस सच्चे मसीहियों के बीच एकता का महान केन्द्र है। निःसन्देह हमारे बाहरी भेद बहुत हैं। कोई एपिस्कोपल है, कोई प्रेस्बिटेरियन—कोई इन्डिपेन्डेन्ट है, कोई बैपटिस्ट—कोई कैल्विनवादी है, कोई आर्मीनियनवादी—कोई लूथरन है, कोई प्लिमथ ब्रदरन—कोई राजकीय कलीसिया का समर्थक है, कोई स्वैच्छिक प्रणाली का—कोई लिटर्जी का समर्थक है, कोई तत्काल की गई प्रार्थना का। परन्तु अन्त में स्वर्ग में इन भेदों में से अधिकांश के विषय में हम क्या सुनेंगे? सम्भवतः कुछ नहीं—बिल्कुल कुछ नहीं। क्या कोई मनुष्य सचमुच और सच्चाई से मसीह के क्रूस पर घमण्ड करता है? यही मुख्य प्रश्न है। यदि करता है, तो वह मेरा भाई है—हम एक ही मार्ग पर चल रहे हैं; हम उस घर की ओर यात्रा कर रहे हैं जहाँ मसीह ही सब कुछ है, और धर्म की सब बाहरी बातें भुला दी जाएँगी। परन्तु यदि वह मसीह के क्रूस पर घमण्ड नहीं करता, तो मैं उसके विषय में निश्चिन्त नहीं हो सकता। केवल बाहरी बातों पर एकता कुछ समय की ही एकता है—क्रूस पर एकता अनन्त काल की एकता है। बाहरी बातों में भ्रम केवल ऊपरी चमड़ी का रोग है—क्रूस के विषय में भ्रम हृदय का रोग है। बाहरी बातों पर एकता केवल मनुष्य की बनाई एकता है—मसीह के क्रूस पर एकता केवल पवित्र आत्मा ही उत्पन्न कर सकता है।
मैं नहीं जानता कि तुम इस सब के विषय में क्या सोचते हो। मुझे ऐसा लगता है कि जो कहा जा सकता था, उसकी तुलना में मैंने कुछ नहीं कहा। मुझे ऐसा लगता है कि क्रूस के विषय में जो मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ, उसका आधा भाग अनकहा रह गया। परन्तु मैं आशा करता हूँ कि मैंने तुम्हें सोचने के लिये कुछ दिया है। मैं भरोसा रखता हूँ कि मैंने तुम्हें दिखाया है कि इस लेख के आरम्भ में जो प्रश्न मैंने रखा था, "मसीह के क्रूस के विषय में तुम क्या सोचते और अनुभव करते हो?" उसका मेरे पास कारण था। अब कुछ क्षण मेरी बात सुनो, जब मैं इस पूरे विषय को तुम्हारे विवेक पर लागू करता हूँ।
(क) क्या तुम किसी प्रकार के पाप में जी रहे हो? क्या तुम इस संसार की चाल पर चल रहे हो और अपनी आत्मा की उपेक्षा कर रहे हो? मैं तुमसे विनती करता हूँ, आज जो मैं तुमसे कहता हूँ उसे सुनो, "मसीह के क्रूस को देखो।" देखो, यीशु ने तुमसे कैसा प्रेम किया! देखो, तुम्हारे लिये उद्धार का मार्ग तैयार करने को यीशु ने क्या-क्या सहा! हाँ, लापरवाह स्त्री-पुरुषो, तुम्हारे लिये वह लहू बहाया गया! तुम्हारे लिये उन हाथों और पाँवों में कीलें ठोंकी गईं! तुम्हारे लिये वह देह क्रूस पर पीड़ा में लटकी रही! तुम वे ही हो जिनसे यीशु ने प्रेम किया और जिनके लिये उसने प्राण दिए! निश्चय ही वह प्रेम तुम्हें पिघला देना चाहिए। निश्चय ही क्रूस का विचार तुम्हें मन फिराव की ओर खींचना चाहिए। काश कि आज ही ऐसा हो! काश कि तुम अभी उस उद्धारकर्ता के पास आ जाओ जिसने तुम्हारे लिये प्राण दिए और जो बचाने को तैयार है! आओ, और विश्वास की प्रार्थना के साथ उसे पुकारो, और मैं जानता हूँ कि वह सुनेगा। आओ, और क्रूस को थाम लो, और मैं जानता हूँ कि वह तुम्हें निकाल न देगा। आओ, और उस पर विश्वास करो जिसने क्रूस पर प्राण दिए, और आज ही तुम्हें अनन्त जीवन मिलेगा। यदि तुम ऐसे बड़े उद्धार की उपेक्षा करो, तो कैसे बच निकलोगे? निश्चय ही नरक में सबसे गहरे वे होंगे जो क्रूस को तुच्छ जानते हैं!
(ख) क्या तुम स्वर्ग का मार्ग पूछ रहे हो? क्या तुम उद्धार की खोज में हो, परन्तु सन्देह में हो कि वह मिलेगा भी या नहीं? क्या तुम मसीह में भागी होना चाहते हो, परन्तु शंका करते हो कि मसीह तुम्हें ग्रहण करेगा या नहीं? तुमसे भी मैं आज कहता हूँ, "मसीह के क्रूस को देखो।" यदि तुम सचमुच चाहते हो, तो यहाँ तुम्हारे लिये प्रोत्साहन है। प्रभु यीशु के पास साहस के साथ आओ, क्योंकि तुम्हें रोकनेवाली कोई बात नहीं। उसकी बाहें तुम्हें ग्रहण करने को खुली हैं, उसका हृदय तुम्हारे प्रति प्रेम से भरा है। उसने ऐसा मार्ग बना दिया है जिससे तुम भरोसे के साथ उसके पास आ सकते हो। क्रूस का विचार करो। निकट आओ, और मत डरो।
(ग) क्या तुम अनपढ़ मनुष्य हो? क्या तुम स्वर्ग पहुँचना चाहते हो, परन्तु बाइबल की उन कठिनाइयों से, जिन्हें तुम समझा नहीं सकते, घबराकर रुक गए हो? तुमसे भी मैं आज कहता हूँ, "मसीह के क्रूस को देखो।" वहाँ पढ़ो पिता का प्रेम और पुत्र की करुणा। वे तो बड़े और स्पष्ट अक्षरों में लिखे हैं, जिन्हें कोई भी भली-भाँति पढ़ सकता है। चाहे तुम अभी चुनाव के सिद्धान्त से घबराए हुए हो, चाहे अभी तुम अपनी पूरी भ्रष्टता और अपनी उत्तरदायित्व का मेल न बैठा सको, तो क्या? क्रूस को देखो। क्या वह क्रूस तुम्हें नहीं बताता कि यीशु सामर्थी, प्रेमी और तत्पर उद्धारकर्ता है? क्या वह एक बात स्पष्ट नहीं कर देता कि यदि तुम्हारा उद्धार नहीं होता तो सारा दोष तुम्हारा ही है? अरे, इस सत्य को पकड़ लो और उसे दृढ़ता से थामे रहो!
(घ) क्या तुम दुःखी विश्वासी हो? क्या तुम्हारा हृदय रोग से दबा, निराशाओं से परखा और चिन्ताओं से बोझिल है? तुमसे भी मैं आज कहता हूँ, "मसीह के क्रूस को देखो।" सोचो कि तुम्हें ताड़ना देनेवाला हाथ किसका है; सोचो कि कड़वाहट का जो कटोरा तुम अब पी रहे हो, उसे तुम्हारे लिये नापनेवाला हाथ किसका है। वह उसी का हाथ है जो क्रूस पर चढ़ाया गया! यह वही हाथ है जो तुम्हारी आत्मा के प्रति प्रेम में उस श्रापित काठ पर ठोंका गया था। निश्चय ही यह विचार तुम्हें शान्ति और साहस देगा। निश्चय ही तुम अपने आप से कहोगे, "क्रूस पर चढ़ाया गया उद्धारकर्ता मुझ पर कभी ऐसी बात न डालेगा जो मेरी भलाई के लिये न हो। इसका प्रयोजन है। सब कुछ भला ही होगा।"
(ङ) क्या तुम ऐसे विश्वासी हो जो और अधिक पवित्र होने की लालसा रखता है? क्या तुम ऐसे हो जिसका हृदय सांसारिक वस्तुओं से प्रेम करने को बहुत तत्पर पाया जाता है? तुमसे भी मैं कहता हूँ, "मसीह के क्रूस को देखो।" क्रूस को देखो, क्रूस का विचार करो, क्रूस पर मनन करो, और फिर यदि हो सके तो जाकर संसार में अपना मन लगाओ। मेरा विश्वास है कि पवित्रता कहीं इतनी अच्छी तरह नहीं सीखी जाती जितनी कलवरी पर। मेरा विश्वास है कि क्रूस को बहुत देखने पर तुम यह अनुभव किए बिना नहीं रह सकते कि तुम्हारी इच्छा पवित्र की गई और तुम्हारी रुचियाँ अधिक आत्मिक हो गईं। जैसे सूर्य को ताकने से और सब कुछ अँधेरा और धुँधला दिखता है, वैसे ही क्रूस इस संसार की झूठी चमक को फीका कर देता है। जैसे मधु चखने के बाद और वस्तुएँ बेस्वाद लगती हैं, वैसे ही विश्वास से देखा गया क्रूस संसार के सुखों की सारी मिठास हर लेता है। प्रतिदिन स्थिर होकर मसीह के क्रूस को देखते रहो, और तुम शीघ्र ही संसार के विषय में वैसा ही कहोगे जैसा कवि कहता है—
इसके सुख अब मुझे नहीं भाते, अब कोई सन्तोष नहीं देते; ऐसे आनन्द मेरे हृदय से दूर रहें, अब जब मैंने प्रभु को देख लिया है।
जैसे खुलते दिन के प्रकाश में सब तारे छिप जाते हैं, वैसे ही जब यीशु प्रकट होता है तो सांसारिक सुख मिट जाते हैं।
(च) क्या तुम मरणासन्न विश्वासी हो? क्या तुम उस खाट पर पड़े हो जिससे तुम्हारे भीतर कुछ कहता है कि तुम जीवित न उठोगे? क्या तुम उस गम्भीर घड़ी के निकट पहुँच रहे हो जब आत्मा और शरीर कुछ समय के लिये अलग होंगे और तुम्हें अनजाने लोक में प्रवेश करना होगा? अरे, विश्वास से मसीह के क्रूस पर स्थिर दृष्टि रखो, और तुम शान्ति में रखे जाओगे! अपने मन की आँखें मनुष्य के बनाए क्रूसधारी रूप पर नहीं, परन्तु क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु पर दृढ़ता से लगाओ, और वह तुम्हें तुम्हारे सब भयों से छुड़ाएगा। यद्यपि तुम अँधेरी घाटियों से होकर चलो, वह तुम्हारे साथ रहेगा। वह तुम्हें कभी न छोड़ेगा, न त्यागेगा। अन्त तक क्रूस की छाया में बैठे रहो, और उसका फल तुम्हारे स्वाद में मीठा होगा। एक मरणासन्न मिशनरी ने कहा, "अहा, मृत्यु-शय्या पर केवल एक ही बात आवश्यक है, और वह यह कि अपनी बाहें क्रूस के चारों ओर अनुभव करें!"
ये विचार मैं तुम्हारे मन के सामने रखता हूँ। मसीह के क्रूस के विषय में तुम अब क्या सोचते हो, यह मैं नहीं कह सकता। परन्तु मैं तुम्हारे लिये इससे उत्तम कामना नहीं कर सकता कि मरने या प्रभु से मिलने से पहले तुम प्रेरित पौलुस के साथ कह सको, "ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का।"
क्या तुम्हें निश्चयता है?
2 तीमुथियुस 4:6-8 पर विचार
"निश्चयता के साथ अनुग्रह स्वर्ग से कुछ कम नहीं, वह आत्मा में उतारा गया स्वर्ग ही है।" - बिशप हॉपकिन्स। 1680।
"क्योंकि मैं अब अर्घ की नाईं उण्डेला जाता हूँ, और मेरे संसार से जाने का समय आ पहुँचा है। मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धार्मिकता का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी न्यायी है, उस दिन मुझे देगा; और मुझे ही नहीं, वरन उन सब को भी जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं।" (2 तीमुथियुस 4:6-8)
पाठक,
इस पृष्ठ के शीर्ष पर दिए गए पवित्रशास्त्र के वचनों में आप प्रेरित पौलुस को तीन ओर देखते हुए पाते हैं: नीचे की ओर, पीछे की ओर, आगे की ओर। नीचे कब्र की ओर,—पीछे अपनी सेवकाई की ओर,—आगे उस महान दिन की ओर, अर्थात् न्याय के दिन की ओर।
मैं आज आपको आमंत्रित करता हूँ कि कुछ क्षण प्रेरित के पास खड़े होकर उसके कहे शब्दों पर ध्यान दें। धन्य है वह आत्मा जो वहाँ देख सके जहाँ पौलुस ने देखा, और फिर वैसा ही कह सके जैसा पौलुस ने कहा!
वह कब्र की ओर देखता है, और बिना किसी भय के देखता है। सुनिए वह क्या कहता है।
"मैं अब अर्घ की नाईं उंडेला जाता हूँ।" मैं उस पशु के समान हूँ जिसे बलिदान के स्थान पर लाया गया हो, और जिसे रस्सियों से वेदी के सींगों तक बाँध दिया गया हो। रीति के अनुसार मेरे सिर पर दाखमधु और तेल उण्डेला जा चुका है। अन्तिम विधियाँ पूरी हो चुकी हैं। हर तैयारी हो चुकी है। अब केवल मृत्यु का प्रहार पाना शेष है, और फिर सब कुछ समाप्त हो जाएगा।
"मेरे कूच करने का समय आ पहुँचा है।" मैं उस जहाज के समान हूँ जो लंगर उठाकर समुद्र में उतरने को है। जहाज पर सब कुछ तैयार है। मैं केवल इस प्रतीक्षा में हूँ कि जो रस्से मुझे किनारे से बाँधे हैं वे खोल दिए जाएँ, और तब मैं पाल खोलकर अपनी यात्रा आरम्भ करूँगा।
पाठक, ये महिमामय शब्द हमारे ही समान आदम की एक सन्तान के होंठों से निकले हैं। मृत्यु एक गम्भीर बात है, और जब वह अत्यन्त निकट दिखाई देती है तब तो और भी अधिक। कब्र एक ठण्डी और हृदय को दहला देनेवाली जगह है, और यह दिखावा करना व्यर्थ है कि उसमें कोई भय नहीं। फिर भी यहाँ एक नश्वर मनुष्य है जो सब जीवितों के लिए ठहराए हुए उस संकरे घर में शान्ति से झाँक सकता है, और उसके किनारे पर खड़े होकर कह सकता है, "मैं सब कुछ देख रहा हूँ, और मुझे भय नहीं।"
आइए, उसे फिर सुनें। वह अपने सेवकाई-जीवन की ओर पीछे देखता है, और बिना किसी लज्जा के देखता है। सुनिए वह क्या कहता है।
"मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ।" यहाँ वह एक सैनिक की भाँति बोलता है। मैंने संसार, शरीर और शैतान के साथ वह अच्छी लड़ाई लड़ी है जिससे बहुत से लोग डरकर पीछे हट जाते हैं।
"मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है।" यहाँ वह उस व्यक्ति की भाँति बोलता है जो पुरस्कार के लिए दौड़ा हो। मैं उस दौड़ को दौड़ चुका हूँ जो मेरे लिए ठहराई गई थी: मैं उस मार्ग को पार कर चुका हूँ जो मेरे लिए नियुक्त था, चाहे वह कितना ही ऊबड़-खाबड़ और चढ़ाईवाला रहा हो। मैं कठिनाइयों के कारण मार्ग से नहीं मुड़ा, और रास्ते की लम्बाई से हताश नहीं हुआ। अब मैं अन्त में लक्ष्य के सामने आ पहुँचा हूँ।
"मैं ने विश्वास की रखवाली की है।" यहाँ वह एक भण्डारी की भाँति बोलता है। जो महिमामय सुसमाचार मुझे सौंपा गया था, मैंने उसे दृढ़ता से थामे रखा है। मैंने उसे मनुष्यों की परम्पराओं के साथ नहीं मिलाया, न अपनी बनाई बातें जोड़कर उसकी सरलता बिगाड़ी, और न दूसरों को उसमें मिलावट करने दिया, बिना उनका मुँह पर विरोध किए। वह मानो कहता है, "एक सैनिक, एक धावक, एक भण्डारी के रूप में मुझे कोई लज्जा नहीं।"
पाठक, वह मसीही धन्य है जो इस संसार को छोड़ते समय अपने पीछे ऐसी गवाही छोड़ सके। शुद्ध विवेक किसी मनुष्य का उद्धार नहीं कर सकता,—किसी पाप को धो नहीं सकता,—हमें स्वर्ग की ओर बाल भर भी नहीं उठा सकता। फिर भी, मृत्यु की घड़ी में शुद्ध विवेक हमारे बिस्तर के पास एक सुखद अतिथि पाया जाएगा। क्या आपको "पिलग्रिम्स प्रोग्रेस" का वह स्थान स्मरण है जहाँ वृद्ध ऑनेस्ट के मृत्यु की नदी पार करने का वर्णन है? बनयन कहता है, "उस समय नदी कई स्थानों पर अपने किनारों से बाहर बह रही थी; परन्तु श्रीमान ऑनेस्ट ने अपने जीवनकाल में गुड कॉन्शिएन्स नामक एक व्यक्ति से कह रखा था कि वह वहाँ उससे आ मिले: और उसने वैसा ही किया, और अपना हाथ बढ़ाकर उसे पार पहुँचा दिया।" मेरा विश्वास कीजिए, उस अंश में सत्य की एक खान है।
आइए, प्रेरित को एक बार और सुनें। वह लेखा-जोखा लेने के उस महान दिन की ओर आगे देखता है, और बिना किसी सन्देह के देखता है। उसके शब्दों पर ध्यान दीजिए।
"भविष्य में मेरे लिये धार्मिकता का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी न्यायी है, उस दिन मुझे देगा; और मुझे ही नहीं, वरन् उन सब को भी जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं।" वह मानो कहता है, एक महिमामय प्रतिफल मेरे लिए तैयार है और भण्डार में रखा है: वही मुकुट जो केवल धर्मियों को दिया जाता है। न्याय के उस महान दिन प्रभु यह मुकुट मुझे देगा, और मेरे साथ उन सब को भी जिन्होंने उसे एक अनदेखे उद्धारकर्ता के रूप में प्रेम किया और आमने-सामने उसे देखने की लालसा की। पृथ्वी पर मेरा काम समाप्त हो गया। अब मेरे आगे देखने को बस यही एक बात शेष है, और कुछ नहीं।
पाठक, ध्यान दीजिए कि प्रेरित बिना किसी झिझक या अविश्वास के बोलता है। वह मुकुट को एक निश्चित बात मानता है: मानो वह पहले से ही उसका अपना है। वह अटल भरोसे के साथ अपनी दृढ़ धारणा प्रकट करता है कि धर्मी न्यायी उसे वह मुकुट देगा। पौलुस उस गम्भीर दिन की सब परिस्थितियों और उसके साथ होनेवाली बातों से अनजान न था जिसका वह उल्लेख कर रहा था। वह बड़ा श्वेत सिंहासन,—इकट्ठा किया हुआ संसार,—खुली हुई पुस्तकें,—सब गुप्त बातों का प्रकट होना,—सुनते हुए स्वर्गदूत,—भयानक दण्ड की आज्ञा,—खोए हुओं और उद्धार पाए हुओं का सदा के लिए अलग किया जाना,—ये सब बातें उसे भली-भाँति ज्ञात थीं। परन्तु इनमें से किसी ने उसे विचलित नहीं किया। उसका सबल विश्वास इन सब के पार निकल गया, और उसने केवल यीशु को देखा, जो उसका सर्वशक्तिमान सहायक है, और छिड़काव का लहू, और धुला हुआ पाप। वह कहता है, "मेरे लिये मुकुट रखा हुआ है।" "प्रभु स्वयं उसे मुझे देगा।" वह ऐसे बोलता है मानो वह सब कुछ अपनी आँखों से देख रहा हो।
इन पदों में मुख्य बातें ये ही हैं। इनमें से अधिकांश के विषय में बोलने का मैं दावा नहीं कर सकता, क्योंकि स्थान इसकी अनुमति नहीं देगा। मैं इस अंश की केवल एक बात आपके सामने रखने का प्रयत्न करूँगा, और वह है "निश्चित आशा" जिसके साथ प्रेरित न्याय के दिन में अपनी स्थिति की ओर आगे देखता है।
मैं यह और भी तत्परता से करूँगा, क्योंकि मैं निश्चयता के विषय को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानता हूँ, और मेरी विनम्र समझ में आज के समय में उसकी प्रायः बड़ी उपेक्षा की जाती है।
परन्तु मैं यह भय और थरथराहट के साथ करूँगा। मैं अनुभव करता हूँ कि मैं बहुत कठिन भूमि पर चल रहा हूँ, और इस विषय में उतावली से और पवित्रशास्त्र के विरुद्ध बोल जाना सहज है। सत्य और भ्रम के बीच का मार्ग यहाँ विशेष रूप से एक सँकरी घाटी है, और यदि मैं कुछ लोगों का भला कर सकूँ और दूसरों की कोई हानि न करूँ, तो मैं बहुत कृतज्ञ होऊँगा।
पाठक, निश्चयता के विषय पर बोलते हुए मैं चार बातें आपके सामने रखना चाहता हूँ, और यदि मैं उनका नाम अभी ही बता दूँ तो हमारा मार्ग स्पष्ट हो जाएगा।
I. पहले, तब, मैं आपको यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि जैसी निश्चित आशा पौलुस यहाँ प्रकट करता है, वह एक सच्ची और पवित्रशास्त्र-सम्मत बात है।
II. दूसरे, मैं यह व्यापक रियायत दूँगा,—कि कोई मनुष्य इस निश्चित आशा तक कभी न पहुँचे और फिर भी उसका उद्धार हो जाए।
III. तीसरा, मैं आपको कुछ कारण बताऊँगा कि निश्चयता की आशा क्यों अत्यन्त वांछनीय है।
IV. अन्त में, मैं यह बताने का प्रयत्न करूँगा कि निश्चयता की आशा इतनी कम क्यों प्राप्त की जाती है।
I. तो पहले, मैं यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि निश्चयता की आशा एक सच्ची और पवित्रशास्त्रीय बात है।
निश्चयता, जैसी पौलुस ने इस पुस्तिका के शीर्ष की आयतों में व्यक्त की है, कोई मात्र कल्पना या भावना नहीं है। यह उच्च शारीरिक उत्साह या देह के आशावादी स्वभाव का परिणाम नहीं है। यह पवित्र आत्मा का एक वास्तविक वरदान है, जो मनुष्यों की शारीरिक बनावट या प्रकृति का विचार किए बिना दिया जाता है, और ऐसा वरदान जिसे मसीह में हर विश्वासी को पाने का लक्ष्य रखना और खोजना चाहिए।
मुझे लगता है कि परमेश्वर का वचन सिखाता है कि एक विश्वासी अपने उद्धार के विषय में पक्के भरोसे तक पहुँच सकता है।
मैं इसे पूरी तरह और व्यापक रूप में कहना चाहूँगा कि एक सच्चा मसीही, एक परिवर्तित मनुष्य, मसीह में विश्वास की उस सुखद अवस्था तक पहुँच सकता है कि वह सामान्यतः अपनी आत्मा के क्षमा और सुरक्षा के विषय में पूरी तरह निश्चिन्त अनुभव करे,—उसे संदेह कम सताएँ,—दुविधा उसे कम भटकाए,—चिन्ताजनक प्रश्न उसे कम व्याकुल करें,—और संक्षेप में, पाप के साथ अनेक भीतरी संघर्षों से पीड़ित होते हुए भी, वह मृत्यु की ओर बिना काँपे, और न्याय की ओर बिना घबराए देखे।1
निश्चयता का मेरा वर्णन यही है। मैं आपसे विनती करता हूँ कि इसे भली-भाँति ध्यान में रखें। जो मैंने यहाँ कहा है, मैं उससे न कम कहता हूँ न अधिक।
अब, ऐसे कथन का प्रायः विरोध और खण्डन किया जाता है। बहुत लोग इसकी सच्चाई को बिलकुल नहीं देख पाते।
रोम की कलीसिया निश्चयता की अत्यन्त कठोर शब्दों में निन्दा करती है। ट्रेण्ट की महासभा स्पष्ट घोषणा करती है कि "अपने पापों की क्षमा के विषय में विश्वासी की निश्चयता एक व्यर्थ और अधर्मी भरोसा है;" और रोमन मत के सुविख्यात पक्षधर कार्डिनल बेलार्मिन इसे "झूठी शिक्षा देनेवालों का प्रमुख भ्रम" कहते हैं।
हमारे बीच के संसारी लोगों का बहुत बड़ा भाग निश्चयता के सिद्धान्त का विरोध करता है। इसकी चर्चा सुनकर वे बुरा मानते और खीझ उठते हैं। उन्हें यह अच्छा नहीं लगता कि दूसरे सुखी और निश्चिन्त अनुभव करें, क्योंकि वे स्वयं कभी ऐसा अनुभव नहीं करते। वे इसे ग्रहण नहीं कर सकते, इसमें निश्चय ही कोई आश्चर्य नहीं।
परन्तु कुछ सच्चे विश्वासी भी हैं जो निश्चयता को अस्वीकार करते हैं, या इसे खतरे से भरा सिद्धान्त मानकर इससे कतराते हैं। वे इसे दुस्साहस के निकट समझते हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि कभी भी निश्चिन्त न होना और कुछ संदेह में जीवन बिताना ही उचित दीनता है। यह खेद की बात है, और इससे बहुत हानि होती है।
मैं खुले मन से मानता हूँ कि कुछ दुस्साहसी लोग हैं जो ऐसे भरोसे का दावा करते हैं जिसके लिए उनके पास पवित्रशास्त्र का कोई आधार नहीं। ऐसे लोग सदा होते हैं जो अपने विषय में अच्छा सोचते हैं जबकि परमेश्वर बुरा सोचता है, जैसे ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने विषय में बुरा सोचते हैं जबकि परमेश्वर अच्छा सोचता है। ऐसे लोग सदा रहेंगे। पवित्रशास्त्र का कोई सत्य कभी ऐसा नहीं रहा जिसका दुरुपयोग और जिसकी नकल न हुई हो। परमेश्वर का चुनाव,—मनुष्य की असमर्थता,—अनुग्रह से उद्धार,—इन सबका समान रूप से दुरुपयोग होता है। जब तक संसार खड़ा है, कट्टरपंथी और उन्मादी लोग रहेंगे। परन्तु इस सबके होते हुए भी निश्चयता एक वास्तविक, संयमित और सच्ची बात है; और परमेश्वर की सन्तानों को केवल इसलिए किसी सत्य के प्रयोग से पीछे नहीं हटना चाहिए कि उसका दुरुपयोग होता है।2
जो लोग वास्तविक, सुदृढ़ आधारवाली निश्चयता के अस्तित्व से इन्कार करते हैं, उन सबको मेरा उत्तर केवल यही है,—पवित्रशास्त्र क्या कहता है? यदि निश्चयता वहाँ नहीं है, तो मुझे और कुछ नहीं कहना।
पर क्या अय्यूब यह नहीं कहता, "मुझे तो निश्चय है कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है, और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा। और अपनी खाल के इस प्रकार नाश हो जाने के बाद भी, मैं शरीर में होकर परमेश्वर का दर्शन करूँगा"? (अय्यूब 19:25-26।)
क्या दाऊद यह नहीं कहता, "चाहे मैं घोर अंधकारमय घाटी में होकर चलूँ, तौभी हानि से न डरूँगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरी छड़ी और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है"? (भजन संहिता 23:4।)
क्या यशायाह यह नहीं कहता, "जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए है, उसको तू पूर्ण शान्ति के साथ रखेगा, क्योंकि वह तुझ पर भरोसा रखता है"? (यशायाह 26:3।)
और फिर, "धार्मिकता का फल शान्ति होगा, और धार्मिकता का परिणाम सदा के लिए चैन और निश्चिन्तता होगी।" (यशायाह 32:17।)
क्या पौलुस रोमियों से यह नहीं कहता, "मुझे निश्चय है कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्टि हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी"? (रोमियों 8:38-39।)
क्या वह कुरिन्थियों से यह नहीं कहता, "हम जानते हैं कि जब हमारा पृथ्वी पर का डेरा रूपी घर गिराया जाएगा, तो हमें परमेश्वर की ओर से स्वर्ग में एक ऐसा भवन मिलेगा जो हाथों से बना हुआ नहीं, चिरस्थाई है"? (2 कुरिन्थियों 5:1।)
और फिर, "हम सदा ढाढ़स बाँधे रहते हैं, और यह जानते हैं कि जब तक हम देह में रहते हैं, तब तक प्रभु से अलग हैं।" (2 कुरिन्थियों 5:6।)
क्या वह तीमुथियुस से यह नहीं कहता, "मैं जानता हूँ कि मैंने किस पर विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है कि वह मेरी धरोहर की उस दिन तक रखवाली करने में समर्थ है"? (2 तीमुथियुस 1:12।)
और क्या वह कुलुस्सियों से "समझ की पूरी निश्चयता" (कुलुस्सियों 2:2) की, और इब्रानियों से "विश्वास के पूर्ण निश्चय" और "आशा के पूर्ण निश्चय" की बात नहीं करता? (इब्रानियों 6:11; 10:22।)
क्या पतरस स्पष्ट रूप से यह नहीं कहता, "अपने बुलाए जाने और चुने जाने को सिद्ध करने का भरसक यत्न करते रहो"? (2 पतरस 1:10।)
क्या यूहन्ना यह नहीं कहता, "हम जानते हैं कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं"? (1 यूहन्ना 3:14।)
और फिर, "मैंने तुम्हें, जो परमेश्वर के पुत्र के नाम पर विश्वास करते हो, इसलिए लिखा है कि तुम जानो कि अनन्त जीवन तुम्हारा है।" (1 यूहन्ना 5:13।)
और फिर, "हम जानते हैं कि हम परमेश्वर से हैं।" (1 यूहन्ना 5:19।)
पाठक, इन बातों पर हम क्या कहें? किसी भी विवादित विषय पर मैं पूरी दीनता से बोलना चाहता हूँ। मैं अनुभव करता हूँ कि मैं स्वयं आदम की एक दीन, भूल करनेवाली सन्तान मात्र हूँ। परन्तु मुझे यह कहना ही होगा कि जिन अंशों को मैंने अभी उद्धृत किया है, उनमें मुझे उन "आशाओं" और "भरोसों" से कहीं ऊँची बात दिखाई देती है जिनसे आज के बहुत-से विश्वासी सन्तुष्ट प्रतीत होते हैं। मुझे उनमें दृढ़ विश्वास, भरोसे, ज्ञान की भाषा दिखाई देती है,—बल्कि मैं लगभग यह भी कह सकता हूँ कि निश्चितता की भाषा। और मैं अपने विषय में अनुभव करता हूँ कि यदि मैं इन पदों को उनके सीधे, स्पष्ट अर्थ में ग्रहण करूँ, तो निश्चयता का सिद्धान्त सत्य है।
पर जो लोग निश्चयता के सिद्धान्त को अहंकार के निकट जानकर नापसन्द करते हैं, उन सब को मेरा आगे का उत्तर यह है: पतरस और पौलुस के, अय्यूब और यूहन्ना के पदचिह्नों पर चलना शायद ही अहंकार हो सकता है। यदि कभी कोई नम्र और दीन मन के मनुष्य हुए हैं तो वे सब ऐसे ही थे; फिर भी वे सब अपनी दशा के विषय में निश्चित आशा के साथ बोलते हैं। निश्चय ही इससे हमें यह सीखना चाहिए कि गहरी नम्रता और दृढ़ निश्चयता में पूरा मेल है, और आत्मिक भरोसे तथा घमण्ड के बीच कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है।3
मेरा आगे का उत्तर यह है कि बहुतों ने ऐसी निश्चित आशा प्राप्त की है जैसी हमारे पाठ में व्यक्त की गई है, यहाँ तक कि आधुनिक समय में भी। मैं एक क्षण के लिए भी यह मानने को तैयार नहीं कि यह प्रेरितों के दिनों तक सीमित कोई विशेष सौभाग्य था। हमारे ही देश में ऐसे अनेक विश्वासी हुए हैं जो पिता और पुत्र के साथ लगभग निरन्तर सहभागिता में चलते हुए दिखाई दिए, जिन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि परमेश्वर के मेल-मिलाप पाए हुए मुखमण्डल का प्रकाश उन पर लगभग लगातार चमक रहा है, और उन्होंने अपना अनुभव लिख छोड़ा है। यदि स्थान होता तो मैं प्रसिद्ध नामों का उल्लेख कर सकता था। यह बात हुई है और होती है, और यही पर्याप्त है।
मेरा अन्तिम उत्तर यह है कि ऐसी बात में, जहाँ परमेश्वर बिना किसी शर्त के बोलता है, दृढ़ता से विश्वास रखना गलत नहीं हो सकता; जब परमेश्वर निश्चयपूर्वक प्रतिज्ञा करता है तब निश्चयपूर्वक मानना, और जब हम उसके वचन और शपथ पर टिके हैं जो कभी नहीं बदलता, तब क्षमा और शान्ति का पक्का भरोसा रखना गलत नहीं हो सकता। यह सोचना सर्वथा भूल है कि जो विश्वासी निश्चयता का अनुभव करता है वह अपने भीतर दिखनेवाली किसी बात पर भरोसा किए हुए है। वह तो केवल नई वाचा के मध्यस्थ और सत्य के पवित्रशास्त्र पर टिका है। वह मानता है कि प्रभु यीशु जो कहता है वही उसका अर्थ है, और वह उसे उसके वचन पर ही ग्रहण करता है। निश्चयता अन्ततः पूर्ण विकसित विश्वास से अधिक कुछ नहीं है; वह पौरुषपूर्ण विश्वास जो मसीह की प्रतिज्ञा को दोनों हाथों से थामे रहता है; वह विश्वास जो उस भले सूबेदार की तरह तर्क करता है: यदि प्रभु "केवल मुँह से कह दे" तो मैं चंगा हो जाऊँगा। तो फिर मैं सन्देह क्यों करूँ? (मत्ती 8:8।)4
पाठक, तुम निश्चित जानो कि पौलुस संसार का अन्तिम मनुष्य था जो अपनी निश्चयता को अपनी किसी बात पर आधारित करता। जिसने अपने आप को "सब पापियों में सबसे बड़ा" (1 तीमुथियुस 1:15) लिखा, उसे अपने दोष और भ्रष्टता का गहरा बोध था। परन्तु उसे उससे भी गहरा बोध मसीह की उस धार्मिकता की लम्बाई-चौड़ाई का था जो उसके लिए गिनी गई।—जो पुकार उठा, "मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ" (रोमियों 7:24), उसे अपने हृदय के भीतर बुराई के सोते का स्पष्ट दर्शन था। परन्तु उसे उस दूसरे सोते का और भी स्पष्ट दर्शन था जो "सब पाप और अशुद्धता" को दूर कर सकता है।—जिसने अपने आप को "सब पवित्र लोगों में से छोटे से भी छोटा" (इफिसियों 3:8) समझा, उसे अपनी निर्बलता का जीवित और स्थायी बोध था। परन्तु उसे इससे भी जीवित बोध यह था कि मसीह की यह प्रतिज्ञा, "वे कभी नष्ट न होंगी" (यूहन्ना 10:28), टूट नहीं सकती।—पौलुस जानता था, जैसा कोई भी मनुष्य जान सकता है, कि वह एक दीन, निर्बल नाव है जो तूफानी समुद्र पर बह रही है। यदि किसी ने देखा तो उसने देखा कि उसके चारों ओर लहरें उमड़ रही हैं और आँधी गरज रही है। परन्तु तब उसने अपने आप से दृष्टि हटाकर यीशु की ओर देखा, और डरा नहीं। उसे वह लंगर याद था जो परदे के भीतर है, जो "सुरक्षित और स्थिर" है। उसे उस के वचन, कार्य और निरन्तर मध्यस्थता की प्रार्थना की याद थी जिसने उससे प्रेम किया और अपने आप को उसके लिए दे दिया। और यही था, और कुछ नहीं, जिसने उसे इतने साहस से यह कहने के योग्य बनाया, "मेरे लिए एक मुकुट रखा है, और प्रभु वह मुझे देगा"; और इतने निश्चय से यह निष्कर्ष निकालने के योग्य बनाया, "प्रभु मुझे बचाए रखेगा; मैं कभी लज्जित न होऊँगा।" 5
मैं इस विषय के इस भाग पर और अधिक नहीं रुक सकता। मुझे लगता है कि तुम मानोगे कि मैंने अपने कथन का आधार दिखा दिया है, कि निश्चयता एक सच्ची बात है।
II. अब मैं दूसरी बात पर आता हूँ जिसकी मैंने चर्चा की थी। मैंने कहा था कि एक विश्वासी उस निश्चित आशा तक, जिसे पौलुस व्यक्त करता है, कभी न पहुँचे और फिर भी उसका उद्धार हो सकता है।
मैं इसे पूरी उदारता से स्वीकार करता हूँ। मैं एक क्षण के लिए भी इसका खण्डन नहीं करता। मैं नहीं चाहूँगा कि जिस पश्चातापी हृदय को परमेश्वर ने उदास नहीं किया उसे उदास करूँ, या परमेश्वर की किसी मूर्छित होती सन्तान को निराश करूँ, या यह धारणा छोड़ूँ कि जब तक मनुष्य निश्चयता का अनुभव न करे तब तक मसीह में उसका कोई भाग या अधिकार नहीं।
किसी जन में मसीह पर उद्धार देनेवाला विश्वास हो सकता है, और फिर भी प्रेरित पौलुस जैसी निश्चित आशा का आनन्द उसे कभी न मिले। विश्वास करना और ग्रहण किए जाने की धुँधली-सी आशा रखना एक बात है; अपने विश्वास में आनन्द और शान्ति पाना और आशा में बढ़ते जाना बिलकुल दूसरी बात है। परमेश्वर की सभी सन्तानों में विश्वास होता है; सब में निश्चयता नहीं होती। मेरे विचार में इसे कभी भूलना नहीं चाहिए।
मैं जानता हूँ कि कुछ महान और भले पुरुषों का मत भिन्न रहा है। मेरा विश्वास है कि सुसमाचार के अनेक उत्तम सेवक, जिनके चरणों में मैं सहर्ष बैठना चाहूँगा, मेरे बताए इस भेद को स्वीकार नहीं करते। परन्तु मैं किसी मनुष्य को स्वामी कहना नहीं चाहता। जैसे कोई और, वैसे ही मैं भी विवेक के घावों को ऊपर-ऊपर से चंगा करने के विचार से डरता हूँ; परन्तु मेरी समझ में मेरे बताए मत से भिन्न कोई भी दृष्टिकोण प्रचार करने के लिए अत्यन्त असान्त्वनादायक सुसमाचार होगा, और ऐसा जो आत्माओं को बहुत समय तक जीवन के द्वार से दूर रखने की सम्भावना रखता है।
मैं यह कहने से नहीं हिचकता कि अनुग्रह से किसी मनुष्य में मसीह की ओर भाग आने के लिए पर्याप्त विश्वास हो सकता है; सचमुच उसे थामने के लिए, सचमुच उस पर भरोसा रखने के लिए, सचमुच परमेश्वर की सन्तान होने के लिए, सचमुच उद्धार पाने के लिए पर्याप्त विश्वास; और फिर भी अपने अन्तिम दिन तक वह बहुत चिन्ता, सन्देह और भय से कभी मुक्त न हो।
एक पुराना लेखक कहता है, "एक पत्र लिखा जा सकता है जिस पर मुहर न लगी हो; उसी प्रकार अनुग्रह हृदय में लिखा जा सकता है, फिर भी पवित्र आत्मा ने उस पर निश्चयता की मुहर न लगाई हो।"
एक बालक किसी बड़ी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी होकर जन्म ले सकता है और फिर भी अपने धन से अनजान रहे; बालक की तरह जिए, बालक की तरह मरे, और अपनी सम्पत्ति की महानता को कभी न जाने।
इसी प्रकार कोई मनुष्य मसीह के परिवार में शिशु हो सकता है; शिशु की तरह सोचे, शिशु की तरह बोले; और उद्धार पाए हुए होने पर भी कभी जीवित आशा का आनन्द न ले, न अपने उत्तराधिकार के सच्चे विशेषाधिकारों को जाने।
पाठक, जब तुम मुझे निश्चयता पर बल देते सुनो तो मेरा आशय गलत न समझना। मेरे साथ यह अन्याय न करना कि मैंने तुम से कहा कि केवल वही उद्धार पाए हैं जो पौलुस के साथ कह सकते हैं, "मैं जानता हूँ और मुझे निश्चय है, मेरे लिए एक मुकुट रखा है।" मैं ऐसा नहीं कहता। मैं तुम से ऐसी कोई बात नहीं कहता।
प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास किसी मनुष्य में अवश्य होना चाहिए, इसमें कोई सन्देह नहीं, यदि उसे उद्धार पाना है। पिता तक पहुँचने का कोई और मार्ग मैं नहीं जानता। मसीह को छोड़ और किसी के द्वारा दया का कोई संकेत मुझे दिखाई नहीं देता। मनुष्य को अपने पापों और अपनी खोई हुई दशा का बोध होना चाहिए,—उसे क्षमा और उद्धार के लिये यीशु के पास आना चाहिए,—और अपनी आशा उसी पर, केवल उसी पर रखनी चाहिए। परन्तु यदि उसमें इतना करने भर का विश्वास है, चाहे वह विश्वास कितना ही निर्बल और क्षीण क्यों न हो, तो मैं पवित्रशास्त्र के आधार पर निश्चय के साथ कहता हूँ कि वह स्वर्ग से वंचित न रहेगा।
आओ, हम महिमामय सुसमाचार की स्वतन्त्रता को कभी न घटाएँ, और न उसके सुन्दर स्वरूप को काट-छाँट कर छोटा करें। फाटक को और अधिक सकरा और मार्ग को और अधिक संकीर्ण कभी न बनाएँ, जितना घमण्ड और पाप के प्रेम ने उसे पहले ही बना दिया है। प्रभु यीशु बड़ा दयालु और कोमल करुणा से भरा है। वह विश्वास की मात्रा को नहीं, उसके स्वरूप को देखता है। वह उसके परिमाण को नहीं नापता, उसकी सच्चाई को देखता है। वह कुचले हुए नरकट को न तोड़ेगा, और धुँआती बत्ती को न बुझाएगा। वह कभी यह न कहलाने देगा कि कोई क्रूस के चरणों में नाश हुआ। वह कहता है, "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" (यूहन्ना 6:37।)6
हाँ, पाठक: चाहे किसी मनुष्य का विश्वास राई के दाने से बड़ा न हो, यदि वह उसे केवल मसीह के पास ले आता है और उसके वस्त्र के छोर को छूने के योग्य बनाता है, तो वह उद्धार पाएगा,—उतने ही निश्चय से उद्धार पाएगा जितना स्वर्गलोक के सबसे पुराने सन्त ने पाया; उतने ही पूर्ण और अनन्त रूप से उद्धार पाएगा जितना
पतरस, या यूहन्ना, या पौलुस ने पाया। हमारे पवित्रीकरण में तो श्रेणियाँ हैं। हमारे धर्मी ठहराए जाने में कोई श्रेणी नहीं। जो लिखा है, वह लिखा है, और कभी विफल न होगा: "जो कोई उस पर विश्वास करेगा,"—न कि जो कोई दृढ़ और सामर्थी विश्वास रखता है,—"जो कोई उस पर विश्वास करेगा, वह लज्जित न होगा।" (रोमियों 10:11।)
परन्तु इस सारे समय में, मैं चाहता हूँ कि तुम यह ध्यान दो, वह दीन आत्मा परमेश्वर के यहाँ अपनी क्षमा और ग्रहण किए जाने की पूर्ण निश्चयता न रखता हो। वह भय पर भय और सन्देह पर सन्देह से व्याकुल रह सकता है। उसके मन में अनेक प्रश्न और अनेक चिन्ताएँ,—अनेक संघर्ष और अनेक शंकाएँ,—बादल और अन्धकार,—आँधी और तूफ़ान अन्त तक रह सकते हैं।
मैं फिर कहता हूँ कि मैं निश्चय के साथ कहता हूँ कि मसीह में केवल सादा विश्वास मनुष्य को बचाएगा, चाहे वह निश्चयता तक कभी न पहुँचे; परन्तु मैं यह नहीं कहता कि वह उसे प्रबल और भरपूर शान्ति के साथ स्वर्ग में पहुँचाएगा। मैं कहता हूँ कि वह उसे सुरक्षित बन्दरगाह में पहुँचा देगा; परन्तु यह नहीं कहता कि वह उस बन्दरगाह में पाल पूरे खोले, निश्चिन्त और आनन्दित होकर प्रवेश करेगा। यदि वह अपने मनचाहे बन्दरगाह में थपेड़े खाया और तूफ़ान से झकझोरा हुआ पहुँचे, और महिमा में आँखें खोलने तक अपनी सुरक्षा को मुश्किल से समझ पाए, तो मुझे आश्चर्य न होगा।
पाठक, मेरा विश्वास है कि विश्वास और निश्चयता के इस भेद को ध्यान में रखना बहुत महत्त्वपूर्ण है। इससे वे बातें समझ में आती हैं जिन्हें धर्म के विषय में खोज करनेवाले को कभी-कभी समझना कठिन लगता है।
स्मरण रखें, विश्वास जड़ है, और निश्चयता फूल है। निःसन्देह जड़ के बिना फूल कभी नहीं हो सकता; परन्तु यह भी उतना ही निश्चित है कि जड़ हो सकती है और फूल न हो।
विश्वास वह काँपती हुई दीन स्त्री है जो भीड़ में यीशु के पीछे आकर उसके वस्त्र के छोर को छू गई। (मरकुस 5:27।) निश्चयता स्तिुफनुस है जो अपने हत्यारों के बीच शान्त खड़ा होकर कहता है, "मैं स्वर्ग को खुला हुआ, और मनुष्य के पुत्र को परमेश्वर के दाहिनी ओर खड़ा हुआ देखता हूँ।" (प्रेरितों के काम 7:56।)
विश्वास वह पश्चात्तापी डाकू है जो पुकारता है, "हे प्रभु, मुझे स्मरण कर।" (लूका 23:42।) निश्चयता अय्यूब है जो राख में बैठा, फोड़ों से भरा हुआ कहता है, "मैं जानता हूँ कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है।" (अय्यूब 19:25।) "चाहे वह मुझे घात भी करे, तौभी मैं उस पर भरोसा रखूँगा।" (अय्यूब 13:15।)
विश्वास पतरस की वह डूबते समय की पुकार है, जब वह डूबने लगा, "हे प्रभु, मुझे बचा।" (मत्ती 14:30।) निश्चयता वही पतरस है जो बाद के दिनों में महासभा के सामने घोषणा करता है, "यह वही पत्थर है जिसे तुम राजमिस्त्रियों ने तुच्छ जाना, और वह कोने के सिरे का पत्थर हो गया। और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों को कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें।" (प्रेरितों के काम 4:11-12।)
विश्वास वह चिन्तित, काँपती हुई वाणी है, "हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ; मेरे अविश्वास का उपाय कर।" (मरकुस 9:24।) निश्चयता वह निडर चुनौती है, "परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर वह है जो उन्हें धर्मी ठहरानेवाला है। कौन है जो दण्ड की आज्ञा देगा?" (रोमियों 8:33-34।) विश्वास शाऊल है जो दमिश्क में यहूदा के घर में प्रार्थना कर रहा है, शोकित, अन्धा और अकेला। (प्रेरितों के काम 9:11।) निश्चयता पौलुस है, वह बूढ़ा बन्दी, जो शान्ति से कब्र की ओर देखता हुआ कहता है, "मैं जानता हूँ कि मैंने किस पर विश्वास किया है। मेरे लिये धार्मिकता का वह मुकुट रखा हुआ है।" (2 तीमुथियुस 1:12; 4:8।)
विश्वास जीवन है। यह कितना बड़ा आशीर्वाद है! जीवन और मृत्यु के बीच की खाई को कौन बता सकता है? फिर भी जीवन निर्बल, रोगी, अस्वस्थ, पीड़ादायक, कठिन, चिन्ताग्रस्त, थका हुआ, बोझिल, आनन्दहीन और अन्त तक मुस्कानहीन हो सकता है। निश्चयता जीवन से भी अधिक है। वह स्वास्थ्य, बल, सामर्थ्य, स्फूर्ति, सक्रियता, ऊर्जा, पौरुष और सौन्दर्य है।
पाठक, हमारे सामने प्रश्न यह नहीं है कि उद्धार हुआ या नहीं हुआ, परन्तु यह कि विशेषाधिकार है या नहीं।—प्रश्न यह नहीं है कि शान्ति है या नहीं, परन्तु यह कि बड़ी शान्ति है या थोड़ी शान्ति।—प्रश्न इस संसार के भटकनेवालों और मसीह की पाठशाला के बीच नहीं है; यह तो केवल पाठशाला का ही प्रश्न है;—यह पहली कक्षा और अन्तिम कक्षा के बीच का प्रश्न है।
जिसमें विश्वास है, वह अच्छा करता है। यदि मैं यह सोच पाता कि इस पुस्तिका के सब पाठकों में वह है, तो मैं प्रसन्न होता। धन्य, तिगुने धन्य हैं वे जो
