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नया जन्म और पूर्ण पवित्रीकरण के बीच का समय
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
खण्ड VII.
नया जन्म और पूर्ण पवित्रीकरण के बीच का समय
पूर्ण पवित्रीकरण।
"परमेश्वर के साथ एक दिन हज़ार वर्ष के समान है।
इससे स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके लिए समय की मात्रा कुछ भी नहीं है।
शताब्दियाँ, वर्ष, महीने, दिन, घण्टे और क्षण — सब बिलकुल एक समान हैं।
इसलिए वह हमारे धर्मी ठहराए जाने के बाद एक दिन में भी उतनी ही सरलता से पवित्र कर सकता है जितनी सरलता से सौ वर्ष में।
इसमें कोई भेद नहीं, जब तक कि हम उसे अपने ही जैसा न मान लें।
तदनुसार, हम वास्तव में देखते हैं कि पवित्र करनेवाले अनुग्रह के कुछ सबसे निर्विवाद गवाह धर्मी ठहराए जाने के कुछ ही दिनों के भीतर पवित्र किए गए थे।
अरे, हम सब को यह प्रोत्साहन क्यों नहीं देते कि वे धर्मी ठहराए जाने के क्षण से ही हर घड़ी इस आशीष की आशा रखें?" — खण्ड iv. पृ. 451.
"वे अगली रात मैक्लेसफ़ील्ड में फिर मिले, और छः-सात और लोग विश्वास करने में शान्ति और आनन्द से भर गए।
इसी प्रकार अगले सोमवार तक हर रात एक-दो और लोग भर गए, जब अनुग्रह की एक और सामान्य वर्षा हुई।
और बहुतों ने विश्वास किया कि 'मसीह के लहू ने उन्हें सब पाप से शुद्ध कर दिया है।'
मैंने इनसे (कुल चालीस से) एक-एक करके बात की।
उनमें से कुछ ने कहा कि परमेश्वर के साथ शान्ति पाने के दस दिन बाद, कुछ ने सात, कुछ ने चार, और कुछ ने तीन दिन बाद वह आशीष पाई।
इसमें आश्चर्य ही क्या, क्योंकि 'परमेश्वर के साथ एक दिन हज़ार वर्ष के समान है!'
— वर्क्स, खण्ड vii. पृ. 381.
सोसाइटी के एक सदस्य को लिखे पत्र में: — "हर एक जन, चाहे वह एक क्षण में परमेश्वर से जन्मा हो, और हाँ, एक क्षण में
मसीही सिद्धता,
पवित्र किया गया हो, फिर भी निःसन्देह पहले और बाद के दोनों परिवर्तनों के पश्चात धीरे-धीरे बढ़ता है।
परन्तु इससे यह नहीं निकलता कि दोनों के बीच बहुत लम्बा समय अवश्य होना चाहिए।
परमेश्वर के लिए एक वर्ष या एक महीना हज़ार के समान ही है।
यदि वह चाहे, तो करना उसके लिए तत्काल है; बहुत दुःख सहने की तो और भी कोई आवश्यकता नहीं: परमेश्वर अपना कार्य पीड़ा से भी कर सकता है और आनन्द से भी।
इसलिए निःसन्देह हमारा कर्तव्य है कि हम प्रतिदिन, प्रति घण्टे, प्रति क्षण पूर्ण उद्धार के लिए प्रार्थना करें और उसकी बाट जोहें, इसकी प्रतीक्षा किए बिना कि हम और अधिक करें या और अधिक सहें। यह स्वीकार्य समय क्यों न हो?" — वर्क्स, खण्ड vi. पृ. 764.
'अगली सुबह मैंने उन लोगों से अलग-अलग बात की जो विश्वास करते थे कि वे पवित्र किए गए हैं।
वे कुल इक्यावन थे — इक्कीस पुरुष, इक्कीस विधवाएँ या विवाहित स्त्रियाँ, और नौ युवतियाँ या बच्चे।
इनमें से एक में यह परिवर्तन धर्मी ठहराए जाने के तीन सप्ताह बाद हुआ; तीन में उसके सात दिन बाद; एक में पाँच दिन बाद; और चौदह वर्ष के सैमुएल लटविच में केवल दो दिन बाद।" — वर्क्स, खण्ड vii. पृ. 389.
"(व्हिटबी में) सोसाइटी की सभा के बाद मैंने एक समझदार स्त्री से बात की, जिसका अनुभव विचित्र-सा लगा।
उसने कहा: 'पिछले ईस्टर से कुछ दिन पहले मुझे पाप का गहरा बोध हुआ; और ईस्टर के सप्ताह में मैंने जाना कि मेरे पाप क्षमा हो गए हैं, और मैं विश्वास करने में 'आनन्द और शान्ति' से भर गई।
परन्तु लगभग अठारह दिन में एक स्वप्न में मुझे एक उच्चतर उद्धार की आवश्यकता का बोध हुआ; और मैं दिन-रात पूरी तरह पवित्र किए जाने की तीव्र अभिलाषा की पीड़ा में विलाप करती रही; जब तक कि धर्मी ठहराए जाने के तेईसवें दिन मैंने पूर्ण परिवर्तन पाया, साथ ही यह स्पष्ट गवाही भी कि यीशु के लहू ने मुझे सब अधर्म से शुद्ध कर दिया है।" — जर्नल, जून,
1761.
"मि. टिमिन्स का मामला भी कम उल्लेखनीय नहीं है।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
वह एक कुख्यात पापी रहा था।
दो महीने पहले वह गहराई से घायल हुआ।
दस दिन पहले, शुक्रवार को, परमेश्वर ने उसकी आत्मा से शान्ति की बात कही।
अगले रविवार को, एक भीषण संघर्ष के बाद, वह मानो मृत होकर गिर पड़ा।
वह मिट्टी की तरह ठण्डा था।
लगभग दस मिनट के बाद वह होश में आया, और पुकार उठा, 'नया हृदय, नया हृदय!'
उसने कहा कि उसने एक क्षण में अपने आपको पाप से पूरी तरह खाली और परमेश्वर से भरा हुआ अनुभव किया।
भाई बैरी को भी धर्मी ठहराए हुए केवल कुछ ही दिन हुए थे कि परमेश्वर ने उसे हृदय की शुद्धता दी।" — जर्नल, जुलाई, 1762.
उसकी अन्तिम प्रार्थना के समय मैं परमेश्वर की सामर्थ्य से पूरी तरह अभिभूत हो गया।
मैंने अपने हृदय की गहराई में एक अवर्णनीय परिवर्तन अनुभव किया; और उस घड़ी से मैंने न कोई क्रोध, न अभिमान, न किसी प्रकार का कोई बुरा स्वभाव अनुभव किया है; परमेश्वर के शुद्ध प्रेम के विपरीत कुछ भी नहीं, जिसे मैं निरन्तर अनुभव करता हूँ।
मैं मसीह के सिवा कुछ नहीं चाहता; और मेरे हृदय में मसीह सदा राज्य करता है।
मुझे किसी वस्तु की घटी नहीं; वही इस जीवन और अनन्तकाल में मेरा पर्याप्त भाग है।
"ऐसा उदाहरण (ग्रेस पैडी) मैंने पहले कभी नहीं जाना; ऐसा उदाहरण मैंने कभी नहीं पढ़ा: एक व्यक्ति जिसे पाप का बोध हुआ, जो परमेश्वर की ओर फिरा, और प्रेम में नया किया गया — बारह घण्टे के भीतर!
फिर भी यह किसी प्रकार अविश्वसनीय नहीं, क्योंकि परमेश्वर के साथ एक दिन हज़ार वर्ष के समान है।" — जर्नल, सितम्बर 1765.
"जो सुबह इतने ज़ोर से चिल्लाई थी, उससे मैंने पूछा कि उसे क्या हुआ था।
उसने कहा, 'मैं परमेश्वर की सामर्थ्य और प्रेम से इतनी अभिभूत हो गई थी कि उसे छिपा न सकी।'
जब मैंने उससे और पूछा, तो उसने कहा, 'तीन महीने पहले, एक शनिवार की रात, मुझे पूरा विश्वास हो गया कि मैं पापी हूँ, और नरक में गिरने से डर गई; परन्तु रविवार को मैंने परमेश्वर के क्षमा करनेवाले प्रेम का अनुभव किया; फिर भी मुझे बहुत सन्देह रहे, जब तक कि
सोमवार की सन्ध्या को वे सब एक क्षण में दूर हो गए।
इसके बाद मैंने अपने हृदय की दुष्टता को देखा और अनुभव किया, और उससे छुटकारा पाने की लालसा की; और रविवार को मैं छुड़ाई गई, और इसकी वैसी ही स्पष्ट गवाही मिली जैसी मेरे धर्मी ठहराए जाने की थी।" — जर्नल, जून, 1770.
मसीही सिद्धता,
'यद्यपि इसलिए, आमतौर पर परमेश्वर धर्मी ठहराए जाने और पवित्रीकरण के बीच कुछ समय रखना उचित समझता है, फिर भी हमें इसे अटल नियम नहीं मान लेना चाहिए।
जो ऐसा सोचते हैं, उन्हें यही सोचना पड़ेगा कि हम कर्मों से पवित्र किए जाते हैं, या, जो एक ही बात है, दुःख सहने से; नहीं तो समय की आवश्यकता किसलिए?
वह या तो करने के लिए होगा, या सहने के लिए।
जबकि यदि केवल सरल विश्वास की आवश्यकता है, तो एक क्षण भी एक युग के बराबर है।" — वर्क्स, खण्ड vii. पृ. 14.
1774 में थॉमस रैंकिन को लिखे पत्र में: — "मैं हाल ही में एक बात पर बहुत सोच रहा हूँ, जिसमें शायद हम सब चूकते रहे हैं।
हमने इसे नियम नहीं बनाया कि लोगों के धर्मी ठहराए जाते ही उन्हें 'सिद्धता की ओर बढ़ते जाने' की याद दिलाएँ।
जबकि यही
सब समयों से उत्तम समय है।
तब उनमें छोटे बच्चों की सरलता होती है; और वे आत्मा में उत्साही होते हैं, दाहिना हाथ काट डालने या दाहिनी आँख निकाल फेंकने को तैयार।
परन्तु यदि हम इस उत्साह को एक बार ठण्डा पड़ने दें, तो उन्हें फिर इस बिन्दु तक भी लाना बहुत कठिन होगा।"
अपनी सेवकाई के आरम्भिक दिनों में मि. वेस्ली मानते थे कि पूर्ण पवित्रीकरण प्रायः एक क्रमिक कार्य है, जो मृत्यु के समय या उसके निकट प्राप्त होता है, और यह कि नया-नया मन फिराया हुआ परमेश्वर का सन्तान, विरले उदाहरणों को छोड़कर, कुछ समय बीतने से पहले पूरी तरह उद्धार नहीं पा सकता।
परन्तु जब उनके आसपास अनेक उदाहरण तेज़ी से बढ़ते गए, जिनके अनुभव की सच्चाई पर सन्देह करने का उन्हें कोई कारण न दिखा, तो वे शीघ्र ही इस शिक्षा को पूरी तरह स्वीकार करने लगे कि मन-परिवर्तन के बाद किसी भी समय विश्वास के द्वारा तत्क्षण पवित्रीकरण हो सकता है।
(खण्ड viii देखें।)
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
खण्ड VIII.
पवित्रीकरण तत्क्षण होता है, विश्वास से, और
अनुग्रह में वृद्धि से नहीं।
मि. वेस्ली ने 1761-63 के पवित्रता के महान जागृति से बीस वर्ष पहले ही विश्वास के द्वारा तत्क्षण पवित्रीकरण की शिक्षा दी थी, और उसके बाद भी अपने जीवन के अन्त तक। "मुझे यह कथन अच्छा नहीं लगता कि यह हमारे बीच दो-तीन वर्ष पहले तक न जाना गया था, न सिखाया गया था।
मैं मानता हूँ कि तुम इसे नहीं जानते थे।
तुमने बार-बार मुझसे तत्क्षण पवित्रीकरण का इनकार किया है; परन्तु मैंने इसे बीस वर्ष से अधिक समय से जाना और सिखाया है (और मेरे भाई ने भी, जैसा हमारे लेखों से प्रकट है)।" — बेल और ओवेन को पत्र, जर्नल, अक्टूबर, 1762.
मि. वेस्ली के इस कथन और अन्य कथनों से प्रकट होता है कि चार्ल्स वेस्ली ने भी, उनके समान, वर्षों तक तत्क्षण पवित्रीकरण की शिक्षा दी थी, यद्यपि बाद में मैक्सवेल और बेल की धर्मोन्मत्तता के कारण कुछ समय के लिए वे इसके कुछ विरुद्ध हो गए।
(इसी खण्ड में वेस्ली का 1768 का पत्र देखें।) 1744 के पहले मेथोडिस्ट सम्मेलन में पूछा गया: "क्या विश्वास पवित्रीकरण का साधन है या उसकी शर्त?"
उत्तर दिया गया: "वह उसकी शर्त भी है और साधन भी। जब हम विश्वास करना आरम्भ करते हैं, तब पवित्रीकरण आरम्भ होता है, और जैसे-जैसे विश्वास बढ़ता है, पवित्रता बढ़ती है, जब तक कि हम नए सिरे से न रचे जाएँ।
— टायरमैन, खण्ड ii. पृ. 4] re [अस्पष्ट मूल पाठ]
मसीही सिद्धता,
1749 में उन्होंने सिखाया: — "1.
मसीही सिद्धता परमेश्वर और अपने पड़ोसियों के प्रति वह प्रेम है जिसमें सब पाप से छुटकारा निहित है।
"2. यह केवल विश्वास से प्राप्त होती है।
"3. यह तत्क्षण, एक ही क्षण में दी जाती है।
"4. हमें इसकी आशा मृत्यु के समय नहीं, परन्तु हर क्षण रखनी है; 'कि अभी स्वीकार्य समय है, अभी उद्धार का दिन है।'" — वर्क्स, खण्ड vi. पृ. 500.
"(1761 में) यह पूछने पर कि इन सब क्षेत्रों में पूर्ण उद्धार के इतने कम गवाह क्यों हैं, मुझे लगातार एक ही उत्तर मिलता है:
'अब हम देखते हैं कि हमने इसे अपने कर्मों से खोजा; हमने सोचा कि यह धीरे-धीरे आएगा; हमने कभी आशा न की कि यह एक क्षण में, केवल सरल विश्वास से, ठीक उसी रीति से आएगा जैसे हमने धर्मी ठहराया जाना पाया था।'
तो आश्चर्य क्या कि तुम इन सब वर्षों तक उसकी तरह लड़ते रहे हो जो हवा को पीटता है।" — वर्क्स, खण्ड vii. पृ. 377.
"धर्मी ठहराए जाने से हम पाप के दोष से बचाए जाते हैं और परमेश्वर के अनुग्रह में बहाल किए जाते हैं; पवित्रीकरण से हम पाप की सामर्थ्य और जड़ से बचाए जाते हैं और परमेश्वर के स्वरूप में बहाल किए जाते हैं।
सारा अनुभव, और पवित्रशास्त्र भी, दिखाता है कि यह उद्धार तत्क्षण भी है और क्रमिक भी।
यह उसी क्षण आरम्भ होता है जब हम धर्मी ठहराए जाते हैं — परमेश्वर और मनुष्य के पवित्र, नम्र, कोमल और धीरजवन्त प्रेम में।
उस क्षण से यह क्रमशः बढ़ता है, 'राई के दाने' के समान, 'जो पहले सब बीजों में सबसे छोटा है,' परन्तु बाद में बड़ी-बड़ी डालियाँ निकालता और एक बड़ा वृक्ष बन जाता है; जब तक कि एक और क्षण में हृदय सब पाप से शुद्ध होकर परमेश्वर और मनुष्य के शुद्ध प्रेम से भर जाए।" — उपदेश, खण्ड ii. पृ. 236.
"मैं (इन पच्चीस वर्षों से) निजी और सार्वजनिक रूप से लगातार गवाही देता रहा हूँ कि हम विश्वास से जैसे धर्मी ठहराए जाते हैं वैसे ही पवित्र भी किए जाते हैं।
और वास्तव में, इन महान सत्यों में से एक दूसरे को बहुत अधिक स्पष्ट करता है।
जैसे ठीक
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
हम विश्वास से धर्मी ठहराए जाते हैं, वैसे ही हम विश्वास से पवित्र किए जाते हैं।"
— वर्क्स, खण्ड i. पृ. 388.
"धर्मी ठहराए जाने के क्षण से ही तुम पाप पर बढ़ती हुई विजय पा सकते हो।
परन्तु यह पर्याप्त नहीं।
पाप की देह, शारीरिक मन, नष्ट होना चाहिए; पुराना मनुष्यत्व मारा जाना चाहिए, नहीं तो हम नया मनुष्यत्व पहिन नहीं सकते, जो परमेश्वर के अनुसार (अर्थात् परमेश्वर के स्वरूप में) धार्मिकता और सच्ची पवित्रता में सृजा गया है; और यह एक क्षण में होता है।
इस कार्य को क्रमिक कहना उतना ही निरर्थक होगा जितना क्रमिक धर्मी ठहराए जाने की बात करना।"
— एच. ए. रॉजर्स की जर्नल, पृ. 174.
"परन्तु क्या परमेश्वर यह महान कार्य आत्मा में धीरे-धीरे करता है या तत्क्षण?
हो सकता है कि कुछ में यह क्रमिक रूप से सम्पन्न हो; मेरा अर्थ यह है कि वे उस विशेष क्षण पर ध्यान नहीं देते जिसमें पाप का अन्त होता है।
परन्तु यदि परमेश्वर की इच्छा हो, तो यह अत्यन्त वांछनीय है कि यह तत्क्षण हो; कि प्रभु पाप को 'अपने मुँह की साँस से' एक क्षण में, पलक झपकते नष्ट कर दे।
और वह प्रायः ऐसा ही करता है; यह एक स्पष्ट तथ्य है, जिसका प्रमाण किसी भी निष्पक्ष व्यक्ति को सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त है।
इसलिए तू हर क्षण इसकी बाट जोह! ऊपर बताई रीति से इसकी बाट जोह; उन सब भले कामों में जिनके लिए तू 'मसीह यीशु में नए सिरे से सृजा गया' है।
तब कोई जोखिम नहीं: यदि इस आशा से तू बेहतर न हुआ, तो भी बदतर नहीं होगा।
क्योंकि यदि तेरी आशा निराश भी हो जाए, तो भी तेरी कोई हानि नहीं।
परन्तु तेरी आशा निराश न होगी: वह आएगी, और देर न करेगी।
तो हर दिन, हर घड़ी, हर क्षण इसकी बाट जोह!
इसी घड़ी, इसी क्षण क्यों नहीं?
निश्चय ही तू अभी इसकी बाट जोह सकता है, यदि तू विश्वास करता है कि यह विश्वास से मिलता है।
और इस चिह्न से तू निश्चित जान सकता है कि तू इसे विश्वास से खोज रहा है या कर्मों से।
यदि कर्मों से, तो तू चाहता है कि पवित्र किए जाने से पहले कुछ किया जाए।
तू सोचता है कि मुझे ऐसा होना या ऐसा करना चाहिए
मसीही सिद्धता,
तब तू आज तक इसे कर्मों से खोज रहा है।
यदि तू इसे विश्वास से खोज रहा है, तो जैसा तू अभी है वैसा ही इसकी आशा रख सकता है; और यदि जैसा तू है वैसा, तो अभी इसकी आशा रख।
यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि इन तीन बातों में अटूट सम्बन्ध है: विश्वास से इसकी आशा रखो, जैसे हो वैसे ही इसकी आशा रखो, अभी इसकी आशा रखो। इनमें से एक का इनकार सब का इनकार है।
एक को मानना सब को मानना है।
क्या तुम विश्वास करते हो कि हम विश्वास से पवित्र किए जाते हैं?
तो अपने सिद्धान्त के प्रति सच्चे रहो; और इस आशीष की बाट वैसे ही जोहो जैसे तुम हो, न बेहतर न बदतर; एक कंगाल पापी की तरह जिसके पास चुकाने को कुछ नहीं, दलील देने को कुछ नहीं, सिवा इसके कि मसीह मरा।
और यदि तुम इसे वैसे ही जैसे हो चाहते हो, तो अभी इसकी आशा रखो।
किसी बात की प्रतीक्षा न करो: तुम क्यों करो?
मसीह तैयार है; और वही तुम्हारी एकमात्र आवश्यकता है।
वह तुम्हारी प्रतीक्षा में है: वह द्वार पर है!
अपनी अन्तरतम आत्मा से पुकार उठो: — 'आ, आ, हे स्वर्गीय अतिथि!
यहाँ से फिर न जा; मेरे साथ भोजन कर, और यह भोज हो अनन्त प्रेम का।'
— उपदेश, खण्ड i. पृ. 390, 391.
"वास्तव में यह ऐसा स्पष्ट सत्य है कि चारों ओर बिखरे परमेश्वर के प्राय: सब सन्तान, अन्य बातों में चाहे जितना भिन्न हों, इसमें सामान्यतः सहमत हैं: कि यद्यपि हम 'आत्मा से देह के कामों को मार' सकते हैं, बाहरी और भीतरी दोनों पापों का विरोध और पराजय कर सकते हैं, यद्यपि हम दिन-ब-दिन अपने शत्रुओं को निर्बल कर सकते हैं; फिर भी हम उन्हें निकाल बाहर नहीं कर सकते।
धर्मी ठहराए जाने के समय दिए गए सारे अनुग्रह से भी हम उन्हें जड़ से नहीं उखाड़ सकते।
हम चाहे कितना भी जागते और प्रार्थना करते रहें, हम अपने हृदय या हाथों को पूरी तरह शुद्ध नहीं कर सकते।
निश्चय ही हम तब तक नहीं कर सकते जब तक हमारे प्रभु को यह उचित न लगे कि वह हमारे हृदयों से फिर, दूसरी बार, कहे, शुद्ध हो जा: और तभी कोढ़ शुद्ध होता है।
तभी बुरी जड़, शारीरिक मन, नष्ट होता है; और जन्मजात पाप फिर नहीं रहता।
परन्तु यदि ऐसा कोई दूसरा परिवर्तन न हो, यदि धर्मी ठहराए जाने के बाद कोई तत्क्षण छुटकारा न हो, यदि
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
परमेश्वर का केवल एक क्रमिक कार्य ही हो (कि एक क्रमिक कार्य है, यह कोई इनकार नहीं करता), तो हमें जैसे बने सन्तुष्ट रहना होगा कि मृत्यु तक पाप से भरे रहें; और यदि ऐसा है, तो हमें मृत्यु तक दोषी रहना होगा, निरन्तर दण्ड के योग्य।" — उपदेश, खण्ड ii. पृ. 122.
"क्या वह इसे धीरे-धीरे, क्रमशः करता है; या एक क्षण में तत्क्षण?
परमेश्वर के सन्तानों में भी इस विषय पर कितने विवाद हैं! और इस पर जो कुछ कहा गया है या कहा जा सकता है, उस सबके बाद भी ऐसे ही रहेंगे।
क्योंकि बहुत-से अब भी उस प्रसिद्ध यहूदी के साथ कहेंगे, 'तू मुझे समझाए भी, तो भी मैं न मानूँगा।'
और वे इसमें और भी दृढ़ रहेंगे, क्योंकि इस विषय पर पवित्रशास्त्र मौन है: क्योंकि यह बात परमेश्वर के वचनों के किसी भी भाग में, कम से कम स्पष्ट शब्दों में, निर्धारित नहीं की गई।
इसलिए हर मनुष्य अपनी समझ में बढ़ता जाए, बशर्ते वह अपने पड़ोसी को भी वही स्वतन्त्रता दे; बशर्ते वह अपने मत से भिन्न मत रखनेवालों पर क्रोधित न हो, और न उनके विषय में कठोर विचार रखे।
मुझे एक बात और जोड़ने दीजिए: परिवर्तन चाहे तत्क्षण हो या क्रमिक, देखो कि जब तक वह तुम्हारी अपनी आत्मा में सम्पन्न न हो जाए, तुम कभी चैन न लो, यदि तुम महिमा में परमेश्वर के साथ रहना चाहते हो।" — उपदेश, खण्ड ii. पृ. 222.
"जिस अनुपात में वह विश्वास में बढ़ता है, उसी अनुपात में वह पवित्रता में बढ़ता है; वह प्रेम में, दीनता में, नम्रता में, परमेश्वर के स्वरूप के हर भाग में बढ़ता जाता है; जब तक कि परमेश्वर यह उचित न समझे, कि जब वह जन्मजात पाप और अपने स्वभाव की पूर्ण भ्रष्टता का पूरी तरह कायल हो जाए, तब उसे सब दूर कर दे; उसके हृदय को शुद्ध करे और उसे सब अधर्म से शुद्ध करे; और वह प्रतिज्ञा पूरी करे जो उसने पहले अपने प्राचीन लोगों से, और उनमें सब युगों के परमेश्वर के इस्राएल से की थी: 'मैं तेरे हृदय का और तेरे वंश के हृदय का खतना करूँगा, कि तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे हृदय और सारे प्राण से प्रेम रखे।'"
— उपदेश, खण्ड ii. पृ. 222.
मसीही सिद्धता,
"यह भूमिका देकर, इस रोचक प्रश्न पर जितना प्रकाश डाल सकूँ उसके लिए, मैं सीधे वही बताऊँगा जो मैंने स्वयं अनेक वर्षों के दौरान देखा है।
पैंतालीस या चौवालीस वर्ष पहले, जब मुझे यह स्पष्ट समझ नहीं थी कि प्रेरित का क्या अर्थ है जब वह हमें उकसाता है कि 'मसीह की शिक्षा की आदि बातों को छोड़कर सिद्धता की ओर बढ़ते जाएँ;' तब लंदन में दो-तीन व्यक्तियों ने, जिन्हें मैं सचमुच निष्कपट जानता था, मुझे अपना अनुभव बताना चाहा।
वह अत्यन्त विचित्र लगा, क्योंकि जो मैंने पहले सुना था उससे भिन्न था: परन्तु पूर्ण पवित्रीकरण के पिछले वर्णन से ठीक मिलता-जुलता था।
'अगले वर्ष ब्रिस्टल में दो-तीन और व्यक्ति, और किंग्सवुड में दो-तीन, अलग-अलग मेरे पास आकर ठीक वही अनुभव बता गए।
कुछ वर्ष बाद, मैंने लंदन में उन सब से, जो यही दावा करते थे, कहा कि वे सब एक साथ फ़ाउण्ड्री में मेरे पास आएँ, ताकि मैं पूरी तरह सन्तुष्ट हो सकूँ।
मैंने परमेश्वर के उस जन थॉमस वॉल्श से कहा कि वहाँ हमसे मिले।
जब हम मिले, तो पहले हममें से एक ने, फिर दूसरे ने, वे सबसे गहरे प्रश्न पूछे जो हम सोच सकते थे।
उन्होंने हर एक का उत्तर बिना झिझक और पूरी सरलता से दिया, जिससे हमें पूरा विश्वास हो गया कि वे अपने आपको धोखा नहीं दे रहे थे।"
"वर्ष 1759, 1760, 1761 और 1762 में उनकी संख्या बहुत बढ़ गई, केवल लंदन और ब्रिस्टल में ही नहीं, बल्कि आयरलैंड और इंग्लैंड के अनेक भागों में।
दूसरों की गवाही पर भरोसा न करके, मैंने इनमें से अधिकांश की स्वयं सावधानी से जाँच की; और अकेले लंदन में मैंने हमारी सोसाइटी के छः सौ बावन सदस्य पाए, जिनका अनुभव अत्यन्त स्पष्ट था, और जिनकी गवाही पर सन्देह करने का मुझे कोई कारण नहीं दिखा।
मेरा विश्वास है कि उस समय से कोई वर्ष ऐसा नहीं गया जिसमें परमेश्वर ने यही कार्य अनेक अन्य लोगों में न किया हो; परन्तु कभी इंग्लैंड या आयरलैंड के एक भाग में, कभी दूसरे में; — जैसे 'हवा जिधर चाहती है उधर बहती है;' — और इनमें से हर एक ने (सबसे
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
सावधान जाँच के बाद, ग्रेट ब्रिटेन या आयरलैंड में मुझे एक भी अपवाद नहीं मिला) घोषित किया है कि पाप से उसका छुटकारा तत्क्षण था: कि परिवर्तन एक क्षण में हुआ।
यदि इनमें से आधों, या एक तिहाई, या बीस में से एक ने भी कहा होता कि यह उनमें धीरे-धीरे हुआ, तो मैं उनके विषय में यह मान लेता, और सोचता कि कुछ क्रमशः पवित्र किए जाते हैं और कुछ तत्क्षण। परन्तु इतने लम्बे समय में मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा कहता न मिला; जब वे सब जो मानते हैं कि वे पवित्र किए गए हैं, एक स्वर से घोषित करते हैं कि परिवर्तन एक क्षण में हुआ, तब मैं यह विश्वास किए बिना नहीं रह सकता कि पवित्रीकरण प्रायः, यदि सदा नहीं, तो तत्क्षण कार्य है।" — उपदेश, खण्ड ii. पृ. 223.
यह उपदेश मि.
वेस्ली की मृत्यु से कुछ ही समय पहले लिखा गया था।
(टायरमैन, खण्ड i. पृ. 462 देखें।) सी. वेस्ली को 1767 में लिखे पत्र में: — "मैं अब भी सोचता हूँ कि सब दावा करनेवालों पर अविश्वास करना इस बात का इनकार करने के बराबर है।
क्योंकि यदि जो हमने बीस वर्ष तक प्रचार किया उसका कोई जीवित गवाह नहीं, तो मैं उसे और अधिक प्रचार नहीं कर सकता, न मेरा साहस होता है।
सारी बात एक बिन्दु पर आ जाती है: क्या धर्मी ठहराए जाने और मृत्यु के बीच कोई तत्क्षण पवित्रीकरण है, या नहीं है?
मैं कहता हूँ, हाँ।
तुम (प्रायः लगता है) कहते हो, नहीं।
कौन-से तर्कों ने तुम्हें ऐसा सोचने पर पहुँचाया?
शायद वे मुझे भी कायल कर दें।" — खण्ड vi. पृ. 6¢9 [अस्पष्ट मूल पाठ] "मुझे सिद्धता, अर्थात् शुद्ध प्रेम का तुम्हारा सिद्धान्त पसन्द है; ऐसा प्रेम जो पाप को बहिष्कृत करता है; तुम्हारा यह आग्रह कि यह केवल विश्वास से है; कि फलस्वरूप यह तत्क्षण है (यद्यपि इससे पहले और बाद में क्रमिक कार्य होता है), और कि यह अभी, इसी क्षण हो सकता है।" — बेल और ओवेन को पत्र, जर्नल, अक्टूबर, 1762.
"यह भी एक स्पष्ट तथ्य है कि यह सामर्थ्य सामान्यतः उन पर एक क्षण में छा जाती है; और उस समय से वे वह भीतरी और बाहरी पवित्रता भोगते हैं, जिससे वे पहले बिलकुल अपरिचित थे।" — जर्नल, अगस्त, 1768.
मसीही सिद्धता,
अपने भाई चार्ल्स को, 1768: — "मैं विभिन्न व्यक्तियों से लंदन में परमेश्वर के कार्य का इतना अच्छा समाचार सुनकर आनन्दित हूँ।
तुम वहाँ प्रभु के बिना नहीं गए; और तुम पाते हो कि तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं।
मुझे सन्देह नहीं कि तुम और अधिक फल देखोगे, जब तक तुम मुख्यतः उनसे बात करते हो जो परमेश्वर के प्यासे हैं।
जब मैं इनके बीच होता हूँ और जब फ़ैशनेबल मेथोडिस्टों के बीच होता हूँ, तो मैं अपने में अद्भुत अन्तर पाता हूँ।
इस कारण इंग्लैंड का उत्तरी भाग मुझे सबसे अधिक अनुकूल है, जहाँ इतने लोग पूर्ण छुटकारे के लिए कराह रहे हैं।
"परन्तु हम क्या करें?
मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि तुम और मैं कम से कम एक निर्णय पर पहुँचें।
क्या हम सारे संसार के विरुद्ध सिद्धता का दावा करते जाएँ?
या चुपचाप इसे छोड़ दें? हमें वास्तव में इनमें से एक करना ही होगा; और, मेरी समझ में, जितनी जल्दी उतना अच्छा।
इसकी प्रकृति, समय (अभी, या कभी बाद में), और रीति के विषय में हम मिलकर और स्पष्ट रूप से क्या मानें (और हमारे सब प्रचारकों को क्या सुझाएँ)? तत्क्षण या नहीं?
मैं आन्तरिक युद्ध से थक गया हूँ; प्रचारकों के हममें से एक को दूसरे के विरुद्ध उद्धृत करने से।
अन्ततः, आओ हम सदा के लिए कुछ निश्चित कर लें; या तो वही जो पहले था, या उससे भिन्न।
Erroso. [अस्पष्ट मूल पाठ]
[विदा]।" — वर्क्स, खण्ड vi. पृ. 672.
डॉ. स्टीवन्स अपनी "मेथोडिज़्म का इतिहास" में कहते हैं:
'वेस्ली ने इसे, धर्मी ठहराए जाने की भाँति, विश्वास की एक प्राप्ति माना, जो किसी भी क्षण सम्भव है।"
— खण्ड i. पृ.
406.
टायरमैन कहते हैं: "मसीही सिद्धता का सिद्धान्त, जो विश्वास के एक सरल कार्य से एक क्षण में प्राप्य है, 1762 में मेथोडिस्ट मण्डलियों में प्रमुखता से आया, और उसके बाद सदा मि. वेस्ली की सेवकाई और उनके घुमन्तू प्रचारकों की सेवकाई के मुख्य विषयों में से एक रहा।" (टायरमैन, खण्ड ii, पृ. 346, 416, 444.) इसके अनुसार, अपने सेवकाई-जीवन के
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
आधे समय तक मि. वेस्ली ने तत्क्षण पवित्रीकरण को अपनी सेवकाई का एक प्रमुख विषय बनाया।
उन्होंने 1766 में अपने भाई चार्ल्स को लिखा: "हर जगह इस पर बल दो कि पूर्ण छुटकारा अभी केवल विश्वास से मिलता है।
. .. तत्क्षण आशीष पर ज़ोर दो।"
मसीही सिद्धता,
खण्ड IX.
मसीही सिद्धता कैसे प्राप्त की जाए।
सन् 1738 में, पैंतीस वर्ष की आयु में, मि. वेस्ली ने ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के सामने "विश्वास से उद्धार" पर अपना उपदेश दिया, जिसमें उन्होंने कहा: —
"इस विश्वास के द्वारा कौन-सा उद्धार मिलता है।
"1. और पहली बात, और जो कुछ भी इसमें निहित हो, यह एक वर्तमान उद्धार है।
यह ऐसी वस्तु है जो पृथ्वी पर प्राप्य है, वरन् इस विश्वास के सहभागियों द्वारा वास्तव में प्राप्त की जाती है।
क्योंकि प्रेरित इफिसुस के विश्वासियों से, और उनमें सब युगों के विश्वासियों से, यही कहता है: यह नहीं कि तुम उद्धार पाओगे (यद्यपि
यह भी सच है) परन्तु यह कि तुम विश्वास के द्वारा उद्धार पा चुके हो।"
"2. तुम पाप से उद्धार पा चुके हो (सब कुछ एक शब्द में समेटने के लिए)।
यही वह उद्धार है जो विश्वास के द्वारा है।
यही वह महान उद्धार है जिसकी भविष्यवाणी स्वर्गदूत ने उस समय की थी जब परमेश्वर अपने पहिलौठे को जगत में लाया: 'तू उसका नाम
यीशु रखना, क्योंकि वह अपने लोगों को उनके पापों से बचाएगा।'
और न यहाँ, न पवित्र शास्त्र के अन्य भागों में, कोई सीमा या प्रतिबन्ध है।
अपने सब लोगों को, या जैसा अन्यत्र कहा गया है, 'जो उस पर विश्वास करते हैं' उन सबको, वह उनके सब पापों से बचाएगा; मूल और कर्मजात, बीते और वर्तमान पाप से
'शरीर और आत्मा के।'
उस पर जो विश्वास है उसके द्वारा वे उसके दोष और उसकी सामर्थ्य, दोनों से बचाए जाते हैं।" — उपदेश, खण्ड i. पृ. 15.
सन् 1744 में मि. वेस्ली ने अपनी "बुद्धि और धर्म के मनुष्यों से गम्भीर निवेदन" प्रकाशित की, जिसमें वे कहते हैं:
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
- "हम केवल यही मानते हैं कि हम आन्तरिक उद्धार का प्रचार करते हैं, जो अब विश्वास से प्राप्य है।"
"परन्तु वह विश्वास क्या है जिससे हम पवित्र किए जाते हैं? पाप से बचाए जाते हैं और प्रेम में सिद्ध किए जाते हैं?
यह एक ईश्वरीय प्रमाण और दृढ़ निश्चय है, पहला कि परमेश्वर ने इसकी प्रतिज्ञा पवित्र
शास्त्र में की है।
जब तक हम इस विषय में पूरी तरह निश्चिन्त नहीं होते, एक कदम भी आगे बढ़ने का कोई उपाय नहीं।
"यह एक ईश्वरीय प्रमाण और दृढ़ निश्चय है, दूसरा, कि जिसकी परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है उसे वह पूरा करने में समर्थ है।
इसलिए यह मानते हुए कि 'मनुष्यों से यह असम्भव है' कि 'अशुद्ध वस्तु में से शुद्ध निकाले,' हृदय को सब पाप से शुद्ध करे और उसे सारी पवित्रता से भर दे; फिर भी इससे इस विषय में कोई कठिनाई नहीं उत्पन्न होती, क्योंकि 'परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है।'
"यह, तीसरा, एक ईश्वरीय प्रमाण और दृढ़ निश्चय है कि वह इसे अभी करने में समर्थ और इच्छुक है।
और क्यों नहीं?
क्या उसके लिए एक क्षण हज़ार वर्ष के समान नहीं है?
उसे अपनी इच्छा की किसी भी बात को पूरा करने के लिए और समय की आवश्यकता नहीं।
और उसे उन लोगों में, जिन्हें वह सम्मानित करना चाहता है, और अधिक योग्यता या उपयुक्तता की प्रतीक्षा या आवश्यकता नहीं।
इसलिए हम समय के किसी भी बिन्दु पर साहस से कह सकते हैं, 'अभी उद्धार का दिन है!'
'आज यदि तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मन को कठोर न करो।'
'देखो, अब सब कुछ तैयार है, ब्याह में आओ!'
"इस भरोसे में, कि परमेश्वर हमें अभी पवित्र करने में समर्थ और इच्छुक है, एक बात और जोड़नी है, एक ईश्वरीय प्रमाण और दृढ़ निश्चय कि वह इसे करता है।
जिस घड़ी यह होता है, परमेश्वर अन्तरतम आत्मा से कहता है, 'तेरे विश्वास के अनुसार तेरे लिये हो!' तब आत्मा पाप के हर धब्बे से शुद्ध होती है; वह 'सब अधर्म से' शुद्ध होती है।
तब विश्वासी उन गम्भीर वचनों का गहरा अर्थ अनुभव करता है, 'यदि हम ज्योति में चलें जैसा वह ज्योति में है, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं, और उसके पुत्र यीशु का लहू
मसीह हमें सब पाप से शुद्ध करता है।'" — उपदेश, खण्ड
मसीही सिद्धता,
टायरमैन कहते हैं: "यह स्मरण रखना चाहिए कि अभी (1762) तक मसीही सिद्धता का सिद्धान्त, जो विश्वास के एक सरल कार्य से एक क्षण में प्राप्य है, मेथोडिस्ट मण्डलियों में प्रमुखता से नहीं आया था; परन्तु उसके बाद सदा वह वेस्ली की सेवकाई और उनके घुमन्तू प्रचारकों की सेवकाई के मुख्य विषयों में से एक रहा।"
— खण्ड i. पृ. 444.
डॉ. व्हाइटहेड अपनी "वेस्ली का जीवन" में कहते हैं: "सिद्धता, अर्थात् सिद्ध प्रेम का सिद्धान्त, निःसन्देह आरम्भ से मेथोडिस्टों के बीच सिखाया जाता था; परन्तु जिस रीति से इसका अब (1762 में) प्रचार किया गया, कि लोगों को पाप की जड़ के नाश की, जैसा कहा जाता था, एक ही क्षण में आशा रखने को प्रेरित किया जाए, वह निश्चय ही नई थी।"
— खण्ड ii. पृ. 299.
डॉ. व्हाइटहेड का यह कथन इस विषय में मि.
वेस्ली के साथ न्याय नहीं करता।
स्वयं मि. वेस्ली द्वारा दिए गए कथनों और तिथियों के प्रकाश में, 1762 से पहले उनकी शिक्षा के विषय में अधिक से अधिक सुरक्षित रूप से यही कहा जा सकता है कि उस समय से अनेक वर्ष पहले वे विश्वास से तत्क्षण पवित्रीकरण सिखाते थे, परन्तु इस विषय में उन्हें कम प्रकाश था, और उन्होंने उस काल की महान वर्षा के बाद की अपेक्षा इसका प्रचार और आग्रह कम किया।
लेडी [अस्पष्ट मूल पाठ] को, 1771 में: — "अनेक वर्ष पहले मैंने देखा कि 'बिना पवित्रता के कोई प्रभु को न देखेगा।'
मैंने उसके पीछे चलना आरम्भ किया, और जिन-जिनसे मेरा सम्पर्क था उन सब को भी ऐसा ही करने को उकसाया।
दस वर्ष बाद परमेश्वर ने मुझे पहले से अधिक स्पष्ट दर्शन दिया कि इसे कैसे पाया जाए; अर्थात् परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास के द्वारा।
और मैंने तुरन्त सब को घोषित किया, 'हम पाप से बचाए जाते हैं, हम विश्वास से पवित्र किए जाते हैं।'
मैंने इसकी गवाही निजी रूप से, सार्वजनिक रूप से, और छपे हुए रूप में दी; और परमेश्वर ने हज़ार गवाहों से इसकी पुष्टि की।
मैं इसे घोषित करता आया हूँ
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
तीस वर्ष से अधिक समय से; और परमेश्वर अपने अनुग्रह के वचन की पुष्टि करता रहा है।
परन्तु इस दौरान लगभग सारा धार्मिक संसार मेरे विरुद्ध पाँति बाँधकर खड़ा हो गया है, और उनमें मेरे अपने अनेक बच्चे भी, मेरे सबसे बड़े पुत्रों में से एक, मि. डब्ल्यू. के उदाहरण का अनुसरण करते हुए।
उनकी सामान्य पुकार रही है, 'वह विश्वास में अस्वस्थ है; वह दूसरा सुसमाचार सुनाता है!'
मैं उत्तर देता हूँ, चाहे वह वही हो जो वे प्रचार करते हैं या नहीं, यह वही है जिसका प्रचार मैं तीस वर्ष से अधिक से करता आया हूँ।
यह उस पूरे काल में मेरे प्रकाशित किए गए लेखों से आसानी से प्रकट हो सकता है।
मैं केवल तीन उपदेशों का उदाहरण देता हूँ: 'विश्वास से उद्धार', जो सन् 1738 में छपा; 'प्रभु हमारी धार्मिकता', जो कुछ वर्ष पहले छपा; और मि. व्हिटफ़ील्ड के अन्तिम संस्कार का, जो केवल कुछ महीने पहले छपा।" — वर्क्स, खण्ड vii. पृ. 36.
मिस पाइवेल को, 1777 में: — "तुम्हारे काम का एक भाग यह है कि जितनों ने विश्वास किया है उन सब को सिद्धता की ओर बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करो, और हर क्षण उस पूर्ण उद्धार की आशा रखने को, जो सरल विश्वास से मिलता है।
मुझे विश्वास है कि तुम्हारा जहाँ हो वहाँ होना भलाई के लिए होगा।
अपने आसपास सब से बोलो, और संकोच न करो।
परमेश्वर अपने सत्य की स्वयं गवाही देगा।" — वर्क्स, खण्ड vii. पृ. 35.
"प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, जिसे परमेश्वर ने तेरे पापों के प्रायश्चित्त के लिए ठहराया है, और तू उद्धार पाएगा; पहले पाप के दोष से, क्योंकि तुझे उसके लहू के द्वारा छुटकारा मिला है; फिर उसकी सामर्थ्य से, जो तुझ पर फिर प्रभुता न करेगी; और फिर उसकी जड़ से, परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वरूप तक।" — उपदेश, खण्ड ii. पृ. 405.
"पवित्रीकरण भी 'कर्मों के कारण नहीं है, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।'
'यह परमेश्वर का दान है,' और सरल, साधारण विश्वास से पाना है।
मान लो कि तुम अभी 'सब प्रकार की बुराई से बचे रहने,' 'भले कामों के लिए उत्साही' होने, और परमेश्वर की सब विधियों में परिश्रम और सावधानी से चलने का प्रयत्न कर रहे हो; तब केवल एक ही बात शेष रहती है: तुम्हारी आत्मा से
मसीही सिद्धता,
परमेश्वर की वाणी यह है, 'विश्वास कर, और उद्धार पा।'
पहले, विश्वास करो कि परमेश्वर ने तुम्हें सब पाप से बचाने और सारी पवित्रता से भरने की प्रतिज्ञा की है; दूसरे, विश्वास करो कि वह ऐसा करने में समर्थ है
"उन सब को जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं पूर्ण रूप से उद्धार देने में सामर्थी है;" तीसरे, विश्वास करो कि वह तुम्हें भी पूर्ण रूप से उद्धार देने में जितना सामर्थी है उतना ही इच्छुक भी है; कि वह तुम्हें सारे पाप से शुद्ध करे और तुम्हारे सारे हृदय को प्रेम से भर दे।
चौथे, विश्वास करो कि वह ऐसा करने में न केवल सामर्थी है, वरन् अभी करने को इच्छुक है। मृत्यु के समय नहीं; किसी दूर के समय में नहीं; कल नहीं, वरन् आज।
तब वह तुम्हें विश्वास करने में समर्थ करेगा कि अपने वचन के अनुसार वह हो चुका है: और तब "धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ, और तुम में किसी बात की घटी न रहे।" — उपदेश, खंड 2, पृ. 224।
यह उपदेश उसकी मृत्यु से कुछ ही समय पहले लिखा गया था।
(देखिए टायरमैन, खंड 1, पृ. 498।) "परन्तु क्या आप विश्वास करते हैं कि हम विश्वास से पवित्र किए जाते हैं?
हम जानते हैं कि आप विश्वास करते हैं कि हम विश्वास से धर्मी ठहराए जाते हैं; परन्तु क्या आप यह विश्वास नहीं करते, और तदनुसार यह शिक्षा नहीं देते, कि हम अपने कामों से पवित्र किए जाते हैं?
इन पच्चीस वर्षों से यह बात स्पष्ट रूप से और बड़े ज़ोर से कही जाती रही है; परन्तु मैं तो निरन्तर इसके ठीक विपरीत घोषणा करता आया हूँ; और वह भी हर प्रकार से।
मैं निजी रूप से और सार्वजनिक रूप से लगातार गवाही देता आया हूँ कि हम विश्वास से जैसे धर्मी ठहराए जाते हैं वैसे ही पवित्र भी किए जाते हैं।
और सचमुच इन महान सत्यों में से एक दूसरे को बहुत अधिक स्पष्ट करता है।
जिस प्रकार हम विश्वास से धर्मी ठहराए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार विश्वास से पवित्र किए जाते हैं। विश्वास ही पवित्रीकरण की शर्त है, और एकमात्र शर्त, ठीक वैसे ही जैसे वह धर्मी ठहराए जाने की है।
यह शर्त है: जो विश्वास करता है उसके सिवाय कोई पवित्र नहीं किया जाता; विश्वास के बिना कोई मनुष्य पवित्र नहीं किया जाता।
और यही एकमात्र शर्त है: पवित्रीकरण के लिए यही अकेला पर्याप्त है।
हर एक जो विश्वास करता है पवित्र किया जाता है, चाहे उसके पास और कुछ हो या न हो।
दूसरे शब्दों में, जब तक कोई मनुष्य विश्वास नहीं करता तब तक वह पवित्र नहीं किया जाता: हर मनुष्य जब विश्वास करता है तब पवित्र किया जाता है।" — उपदेश, खंड 1, पृ.
388।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार
1756 में कुमारी फर्ली को: — "संभवतः आपके और दूसरों के बीच का अन्तर मुख्यतः शब्दों में है।
जो कोई भी पवित्र किए जाने की आशा रखते हैं, वे सब विश्वास से पवित्र किए जाने की आशा रखते हैं।
परन्तु साथ ही वे जानते हैं कि विश्वास केवल उन्हीं को दिया जाएगा जो आज्ञा मानते हैं।
इसलिए दूर के रूप में यह आशीष हमारे कामों पर निर्भर है; यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से यह केवल सरल विश्वास पर निर्भर है।" — रचनाएँ, खंड 6, पृ. 710।
To-Mrs.7A; He ins lL (64 [अस्पष्ट मूल पाठ]: — "वह महान सत्य, कि 'हम विश्वास से उद्धार पाते हैं,' कभी पुराना नहीं होगा; और यह कि पवित्र करनेवाला विश्वास भी, धर्मी ठहरानेवाले विश्वास के समान, परमेश्वर का मुफ़्त दान है।
अब, परमेश्वर के लिए एक दिन हज़ार वर्ष के समान है।
इससे स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकलता है कि समय की मात्रा उसके लिए कुछ भी नहीं है:
सदियाँ, वर्ष, महीने, दिन, घंटे और क्षण, सब बिलकुल एक समान हैं।
इसलिए वह धर्मी ठहराए जाने के एक दिन बाद भी उतनी ही सरलता से पवित्र कर सकता है जितनी सरलता से सौ वर्ष बाद।
इसमें कोई अन्तर है ही नहीं, जब तक कि हम यह न मान लें कि वह हमारे ही जैसा कोई है।
तदनुसार हम वास्तव में देखते हैं कि पवित्र करनेवाले अनुग्रह के कुछ सबसे निर्विवाद गवाह धर्मी ठहराए जाने के कुछ ही दिनों के भीतर पवित्र किए गए थे।
मैंने मैक्लस्फ़ील्ड की एस. एच—— जैसी समर्पित आत्मा कम ही देखी है, जो पाप का कायल होने के नौ दिन के भीतर पवित्र की गई।
उस समय वह बारह वर्ष की थी, और मेरा विश्वास है कि उसके बाद कभी किसी ने उसके मुँह से कोई अनुचित शब्द नहीं सुना, न उसे कोई अनुचित काम करते जाना।
उसकी दृष्टि देखनेवाले सब पर श्रद्धा का भाव उत्पन्न कर देती थी।
वह अब अब्राहम की गोद में है।
"इसलिए यद्यपि परमेश्वर प्रायः धर्मी ठहराए जाने और पवित्रीकरण के बीच कुछ समय रखना उचित समझता है, फिर भी, जैसा कि 'आगे के विचार' में स्पष्ट रूप से कहा गया है, हमें इसे अटल नियम नहीं मान लेना चाहिए।
जो ऐसा सोचते हैं, उन्हें यह भी सोचना होगा कि हम कामों से, अथवा जो इसी के समान है, दुःख-भोग से पवित्र किए जाते हैं: क्योंकि अन्यथा समय की क्या आवश्यकता है?
वह या तो करने के लिए होगा या सहने के लिए।
जबकि, यदि
मसीही सिद्धता,
सरल विश्वास के सिवाय और कुछ अपेक्षित नहीं, तो एक क्षण एक युग के बराबर अच्छा है।" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 14।
1767 में श्रीमती एलिज़ाबेथ बेनिस को: — "मसीही पवित्रता का सार यह है कि हृदय को पूरी तरह परमेश्वर को दे दिया जाए; और निश्चय ही हमें उस ज्योति और प्रेम का कोई अंश खोने की आवश्यकता नहीं जो आरम्भ में इसके साथ होता है: यदि हम खोते हैं तो यह हमारी अपनी दुर्बलता है; हमारे विषय में प्रभु की यह इच्छा नहीं है।
आपका वर्तमान काम यह तर्क करना नहीं है कि अपने अनुभव को यह कहें या वह, वरन् अपनी सारी आवश्यकताओं को, चाहे वे कितनी ही बड़ी या कितनी ही अधिक हों, लेकर सीधे उसके पास जाना है जो आपसे प्रेम करता है।
तब सब कुछ तैयार है; माँगते ही सहायता दी जाती है। आपको केवल सरल विश्वास से उसे ग्रहण करना है।
तौभी आप अगणित दुर्बलताओं से घिरी रहेंगी; क्योंकि आप मिट्टी के घर में रहती हैं, और इसलिए यह नाशवान देह कम या अधिक आत्मा को दबाती रहेगी, फिर भी इतना नहीं कि आप सदा आनन्दित रहने से और इस गवाही से वंचित हो जाएँ कि आपका हृदय
उसका है।" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 51।
1772 में अपने भाई चार्ल्स को: — "मैं लम्बे अनुभव से पाता हूँ कि लोगों से यह कहना कि वे मरते समय सारे पाप से छुड़ाए जाएँगे, या यह कहना कि यह एक वर्ष बाद, या एक सप्ताह बाद, या अभी को छोड़कर किसी भी समय हो सकता है, ठीक एक ही बात है।
हमारा वचन न धर्मी ठहराए जाने के विषय में लाभदायक होता है, न पवित्रीकरण के विषय में, जब तक कि हम बोलते समय उन्हें इस आशीष की अपेक्षा करने की ओर न ला सकें।" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 673।
1780 में रॉबर्ट कार ब्रैकनबरी को: — "वह आपको उस मार्ग में चलाता रहे जिसमें आपको चलना चाहिए, और आपको समर्थ करे कि आप अपना सारा हृदय उसे दें! आप इस महान आशीष को दूर नहीं ठहराइए, क्योंकि आप अपने भीतर बहुत संघर्ष पाते हैं।
संभव है कि यह घटेगा नहीं, वरन् उस क्षण तक बढ़ता जाएगा जब तक आपका हृदय स्वतंत्र न किया जाए।
यह संघर्ष
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार। [JCHN WESLEY]
आपके प्रतिज्ञा को पाने से पहले नहीं थमेगा, वरन् उसके पाने के द्वारा ही थमेगा।
और यदि आप उसे केवल विश्वास से खोजते हैं, तो आप उसे अभी क्यों नहीं पा सकते?
विश्वास का आनन्द आपको सब बातों में और सब बातों से बढ़कर लक्ष्य बनाना चाहिए।
आपके लिए धार्मिकता, शान्ति और आनन्द की निरन्तर आपूर्ति की कामना करता हूँ।"
— रचनाएँ, खंड 7, पृ. 149
1782 में कुमारी एच. ए. रो को:
— "श्री लीच के प्रचार की सफलता में हमें हज़ार प्रमाणों में से एक प्रमाण मिलता है कि परमेश्वर की आशीष सदा उस पूर्ण उद्धार की घोषणा के साथ रहती है जो सरल विश्वास से अभी प्राप्य है।
आपके पास वह छोटी पुस्तिका, 'मसीही सिद्धता का सादा वर्णन', सदा तैयार रहनी चाहिए।
उन लोगों का मुँह बन्द करने के लिए, जो इसे 'नया सिद्धान्त' कहते हैं, इससे अधिक प्रभावी कुछ नहीं।
जो इस प्रकार आपत्ति करते हैं वे सब वास्तव में (चाहे उन्हें इसका ज़रा भी संदेह न हो) कामों से पवित्रीकरण खोज रहे हैं।
यदि यह कामों से है तो निश्चय ही इन कामों को करने के लिए समय चाहिए।
परन्तु यदि यह विश्वास से है, तो स्पष्ट है कि एक क्षण हज़ार वर्ष के समान है।
तब परमेश्वर कहता है (आत्मिक जगत में भी, जैसा बाहरी जगत में), 'उजियाला हो; और उजियाला हो गया।'" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 195।
1782 में कुमारी लॉक्सडेल को: — "अनुभव से, जो सब तर्कों में सबसे सशक्त है, आप बार-बार इस बात की कायल हुई हैं कि भीतरी पाप से उद्धार सरल विश्वास से प्राप्त होता है, यद्यपि यह निश्चित है कि उससे पहले भी और उसके बाद भी एक क्रमिक कार्य होता है।
"तो क्या यह आपकी बुद्धिमानी नहीं कि आप जान-बूझकर उन लोगों से बातचीत न करें जो इस महान और महत्त्वपूर्ण सत्य का विरोध करते हैं?
यदि आप आग से खेलेंगी, तो क्या देर-सबेर जलेंगी नहीं?
नहीं, क्या आप पहले ही जल नहीं चुकीं?" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 222।
जहाँ तक रीति का प्रश्न है, मेरा विश्वास है कि यह सिद्धता सदा आत्मा में विश्वास के एक सरल कार्य से उत्पन्न होती है; इसलिए एक क्षण
मसीही सिद्धता,
में।"
वह आगे कहता है:
'इसकी प्रतीक्षा प्रतिदिन, प्रति घंटे, प्रति क्षण करो।
इसी घड़ी क्यों नहीं—इसी क्षण क्यों नहीं?
निश्चय ही यदि तुम विश्वास करते हो कि यह विश्वास से है, तो तुम इसकी प्रतीक्षा अभी कर सकते हो। और इसी चिह्न से तुम निश्चित जान सकते हो कि तुम इसे विश्वास से खोजते हो या कामों से।
यदि कामों से, तो तुम चाहते हो कि पवित्र किए जाने से पहले कुछ किया जाए।
तुम सोचते हो, मुझे ऐसा या वैसा होना या करना चाहिए।
तब तुम आज तक उसे कामों से खोज रहे हो।
यदि तुम उसे विश्वास से खोजते हो, तो उसकी अपेक्षा जैसे तुम हो वैसे ही करो, और यदि जैसे तुम हो वैसे ही, तो अभी अपेक्षा करो।
यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि इन तीन बातों के बीच अटूट सम्बन्ध है — विश्वास से अपेक्षा करो, जैसे हो वैसे अपेक्षा करो, और अभी अपेक्षा करो।
एक को नकारना इन
सब को नकारना है।'" — उपदेश, खंड 1, पृ. 391।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
खंड 10
पूर्ण पवित्रीकरण के विषय में आत्मा की
गवाही
"इसलिए किसी को भी यह विश्वास नहीं करना चाहिए कि कार्य हो चुका है जब तक कि आत्मा की वह गवाही न जुड़ जाए जो उसके पूर्ण पवित्रीकरण की गवाही उतनी ही स्पष्टता से दे जितनी उसके धर्मी ठहराए जाने की।"
— सादा वर्णन, पृ. 79।
"कुछ लोगों को अपने धर्मी ठहराए जाने और पवित्रीकरण दोनों की गवाही बिना किसी रुकावट के मिलती है, जो, मेरा अनुमान है, और भी अधिक लोगों को मिल सकती थी, यदि वे परमेश्वर के साथ नम्रता से और निकटता से चलते।" — वेस्ली का सादा वर्णन, पृ. 122।
"सचमुच, पवित्रीकरण की गवाही आरम्भ में सदा स्पष्ट नहीं होती (जैसे धर्मी ठहराए जाने की भी नहीं); और बाद में भी वह सदा एक-सी नहीं रहती, वरन् धर्मी ठहराए जाने की गवाही के समान कभी अधिक प्रबल और कभी अधिक क्षीण होती है।
हाँ, और कभी-कभी वह हटा ली जाती है।
फिर भी, सामान्यतः आत्मा की बाद वाली गवाही उतनी ही स्पष्ट और उतनी ही स्थिर होती है जितनी पहली।"
— सादा वर्णन, पृ. 119।
"यहाँ अब लगभग बीस व्यक्ति हैं जो विश्वास करते हैं कि वे पाप से बचाए गए हैं: 1. क्योंकि वे सदा प्रेम करते, प्रार्थना करते, आनन्दित होते और धन्यवाद देते हैं; और 2. क्योंकि उन्हें अपने भीतर इसकी गवाही है।
परन्तु यदि वे जो पा चुके थे उसे खो दें, तो यह सोच लेना सबसे सरल होगा कि उन्होंने कभी उसे पाया ही नहीं था।
लंदन में चार सौ लोग थे (कम से कम कहें तो), जिनका (यदि उन्होंने मुझसे झूठ न कहा हो) वही अनुभव था।
यदि उनमें से लगभग आधे ने उसे खो दिया है जो
मसीही सिद्धता,
उन्हें मिला था, तो मुझे आश्चर्य नहीं यदि वे सोचते हैं कि उन्होंने उसे कभी पाया ही नहीं: परमेश्वर के धन्य दान को फेंक देने के लिए अपने आपको दोषमुक्त ठहराने का यह बहुत ही सरल उपाय है।"
— रचनाएँ, खंड 6, पृ. 768।
"मैंने कहा था कि आसपास के नगरों के जितने लोग आ सकें, जो विश्वास करते हैं कि वे पाप से बचाए गए हैं, वे मुझसे मिलें; तब मैंने दिन का अधिकांश भाग उनमें से एक-एक की जाँच करने में बिताया।
कुछ की गवाही मैं स्वीकार न कर सका: परन्तु अधिकतर के विषय में यह स्पष्ट है (जब तक यह न माना जाए कि वे जान-बूझकर और सोच-समझकर झूठ बोल रहे थे), 1. कि वे अपने भीतर कोई पाप नहीं पाते, और अपनी जानकारी में कोई बाहरी पाप नहीं करते; 2. कि वे हर क्षण परमेश्वर को देखते और उससे प्रेम करते हैं, और सदा प्रार्थना करते, आनन्दित होते और धन्यवाद देते हैं; 3. कि पवित्रीकरण की उतनी ही स्पष्ट गवाही उन्हें परमेश्वर की ओर से निरन्तर मिलती है जितनी धर्मी ठहराए जाने की।
अब, इसमें मैं आनन्दित हूँ, और आनन्दित रहूँगा, आप इसे जो चाहें कहें।" — रचनाएँ, खंड 4, पृ. 56।
"जैसे ही श्री फ़ुगिल ने बोलना आरम्भ किया, मैंने अनुभव किया कि मेरी आत्मा पूरी तरह प्रेम ही प्रेम है।
मैं परमेश्वर पर ऐसा स्थिर था जैसा पहले कभी अनुभव नहीं किया था, और मैं जानती थी कि मैं उससे अपने सारे हृदय से प्रेम करती हूँ।
जब मैं घर आई तो कुछ माँग न सकी; केवल धन्यवाद ही दे सकती थी।
और यह गवाही कि परमेश्वर ने मुझे मेरे सारे पापों से बचा लिया है, हर घंटे और स्पष्ट होती गई।
बुधवार को यह पहले से कहीं अधिक प्रबल थी।
तब से मैंने कभी अपने हृदय को परमेश्वर से भटकते नहीं पाया।" — दैनिकी, मार्च, 1760।
"मेरे पिछले विवरण के बाद से अनेक लोग पवित्र किए गए हैं और कई धर्मी ठहराए गए हैं।
पहले वर्ग में से एक विलियम मूर है।
वह इस आशीष के लिए बहुत समय तक संघर्ष करता रहा; और एक रात उसने ठान लिया कि इसके बिना बिस्तर पर नहीं जाएगा। वह दो घंटे तक परमेश्वर से मल्लयुद्ध करता रहा, जब उसने एक महिमामय परिवर्तन अनुभव किया, और परमेश्वर के आत्मा को गवाही देते पाया कि कार्य पूरा हो गया है।" — दैनिकी, मई, 1762।
"वहाँ से मैं ओटले गया।
वहाँ भी परमेश्वर का कार्य
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
बढ़ रहा है, विशेषकर पवित्रीकरण के विषय में।
और मैं समझता हूँ कि जिसने भी इसका अनुभव किया है, वह परमेश्वर के किए हुए कार्य की स्पष्ट गवाही बनाए रखता है।" — रचनाएँ, खंड 4, पृ. 505।
कुमारी जे. सी. एम. को, 1762: — "जब आप धर्मी ठहराई गईं, तब आपको सीधी गवाही मिली कि आपके पाप क्षमा हो गए; उसके बाद यह गवाही प्रायः रुकती रही; फिर भी आपने उस पर सन्देह नहीं किया।
उसी प्रकार आपको सीधी गवाही मिली है कि आप पाप से बचाई गई हैं, और यह गवाही प्रायः रुकती है; फिर भी तब भी आप उस पर सन्देह नहीं करतीं।
परन्तु मुझे बहुत सन्देह है कि परमेश्वर हमारी ओर से कोई कारण दिए बिना ही इनमें से किसी भी गवाही को हटा लेता है।
मैंने किसी को कभी स्थायी गवाही धीरे-धीरे पाते नहीं जाना; इसलिए मैं सोचता हूँ कि यह भी एक क्षण में दी जाती है।" — रचनाएँ, खंड 8, पृ.
250।
श्रीमती ए. एफ़. को, 1764: — "'सिद्धता पर विचार' में कहा गया है कि इससे पहले कि कोई निश्चित हो सके कि वह पाप से बचाया गया है, उसे न केवल कोई पाप अनुभव न होना चाहिए, वरन् अपने उद्धार की 'सीधी गवाही' भी होनी चाहिए।
और यह कई लोगों को उतनी ही स्पष्ट मिली है जितनी एस. आर—— को मिली थी, जो बाद में उस उद्धार से गिर गई; यद्यपि एस——
आर——, अपनी योजना के अनुरूप बने रहने के लिए, यह अवश्य नकारेगी कि उन्हें यह कभी मिली थी; हाँ, और उसे यह कहना पड़ेगा कि वह गवाही या तो स्वभाव से थी या शैतान से।
यदि वह वास्तव में परमेश्वर की ओर से थी, तो क्या वह इससे प्रसन्न है?" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 15।
कुमारी जे. सी. एम. को, 1764:
— 'आप दो महान सत्यों की जीवित गवाह हैं: पहला यह कि आत्मा की सीधी गवाही के बिना शुद्ध प्रेम का स्थायी, स्थिर आनन्द नहीं हो सकता; अर्थात् परमेश्वर के आत्मा के अपने ही कार्य पर प्रकाश डाले बिना नहीं: दूसरा यह कि सिद्धता को बहुत ऊँचा ठहराना उसे संसार से निकाल देने का सरल उपाय है।" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 250।
मसीही सिद्धता,
"लगभग दोपहर के दो बजे मैंने पॉट्टो में प्रचार किया, और संध्या को हटन-रैडबी में।
इन भागों में यहाँ सबसे बड़ी सोसाइटी है, और परमेश्वर के प्रति सबसे जीवित।
उन सब के साथ कुछ समय बिताकर मैं उनसे अलग मिला जो विश्वास करते हैं कि वे पाप से बचाए गए हैं।
मुझे सुखद आश्चर्य हुआ।
मेरे विचार में सोलह-सत्रह जिनकी मैंने जाँच की, उनमें से दो से अधिक ने उस उद्धार का अनुभव करने के बाद से उसकी सीधी गवाही नहीं खोई है।" — दैनिकी, जुलाई, 1763।
श्रीमती एलिज़ाबेथ बेनिस को, 1766: — "हमारे एक प्रचारक ने हाल ही में हमारे बीच एक नया मत रखा है, — कि पवित्रीकरण की कोई सीधी या तात्कालिक गवाही नहीं होती, केवल यह बोध या चेतना होती है कि हम बदल गए हैं, प्रेम से भर गए हैं और पाप से शुद्ध किए गए हैं।
परन्तु यदि मैं आपको ठीक समझता हूँ, तो आप पाती हैं कि आपको इस बात की सीधी गवाही है कि आप परमेश्वर की सन्तान हैं।" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 50।
रेवरेंड जॉन मेसन को, 1768: — "यदि कोई पवित्रीकरण की गवाही को नकारे और चुने हुए समाज में विवाद खड़ा करे, तो वह स्त्री हो या पुरुष, उसे उसमें कोई स्थान न मिले... '' — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 96। [मूल पाठ में "no mM..." अस्पष्ट है]
मैं डेरी-अर्विल गया, जहाँ मैंने राज्य भर में कुछ सबसे जीवित मसीही देखे हैं।
उनमें से आठ की मैंने निकटता से जाँच की, जिन्होंने गवाही दी कि जिस घड़ी से वे प्रेम में सिद्ध किए गए, तब से उन्होंने गवाही नहीं खोई, न कोई ह्रास अनुभव किया।" — दैनिकी, जून, 1773।
"मैं (व्हिटबी में) एक ऐसे चुने हुए समाज से मिला जैसा लंदन छोड़ने के बाद से नहीं देखा था।
वे लगभग चालीस थे, जिनमें से मैंने एक भी ऐसा नहीं पाया जिसे भीतरी पाप से बचाए जाने की स्पष्ट गवाही न हो।
उनमें से कई ने उसे कुछ समय के लिए खो दिया था, पर जब तक उसे पुनः प्राप्त न कर लिया, उन्हें चैन न मिला। और उनमें से हर एक अब परमेश्वर के मुखमंडल के पूर्ण प्रकाश में चलता हुआ प्रतीत होता था।" — दैनिकी, जून, 1784।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
खंड 11
श्री वेस्ली ने मसीही पवित्रता के
अंगीकार को प्रोत्साहित किया
"परमेश्वर के सिद्ध प्रेम को बनाए रखने के लिए बड़ी सजगता की आवश्यकता है; और उसे बनाए रखने का एक बड़ा साधन यह है कि जो कुछ परमेश्वर ने तुम्हें दिया है उसे खुलकर बताओ, और जितने विश्वासियों से मिलो उन सब को पूर्ण उद्धार के पीछे चलने के लिए गंभीरता से समझाओ।" — खंड 2, पृ. 13।
"श्री वेस्ली मैक्लस्फ़ील्ड आए, और मैंने पहली बार उन्हें देखा और उनसे बातचीत की।
उन्होंने मेरे साथ पिता के समान कोमलता से व्यवहार किया, और मेरी आत्मा पर प्रभु की भलाई से बहुत आनन्दित हुए; मुझे प्रोत्साहित किया कि मैं दृढ़ बनी रहूँ और जो कुछ प्रभु ने किया है उसे बताती रहूँ।" — एच. ए. रॉजर्स की दैनिकी।
"प्रेम-भोज में श्री सी. ने बताया कि परमेश्वर ने किस प्रकार उन्हें प्रेम में सिद्ध किया, — ऐसी गवाही जिसके साथ सदा एक विशेष आशीष रहती है।" — खंड 4, पृ. 458।
"शुद्ध प्रेम के कुछ गवाह वहाँ अब भी हैं, परन्तु अनेक अब्राहम की गोद में जा चुके हैं।
मैक्लस्फ़ील्ड में जो इसका आनन्द लेते हैं उन्हें प्रोत्साहित करो कि वे जो अनुभव करते हैं उसे स्पष्ट रूप से कहें; और तब तक आगे बढ़ते रहें जब तक वे परमेश्वर के उस प्रेम को पूरी तरह न जान लें 'जो ज्ञान से परे है।'" — एच. ऐन रॉजर्स को पत्र।
"मौन रहकर वह उन अनेक क्रूसों से बच सकता है जो स्वभावतः और अनिवार्यतः आ पड़ते हैं यदि वह विश्वासियों के बीच भी सरलता से बता दे कि परमेश्वर ने उसकी आत्मा में क्या किया है।
इसलिए यदि ऐसा व्यक्ति शरीर और लहू से सलाह करे, तो वह
मसीही सिद्धता,
पूरी तरह चुप रहेगा।
परन्तु यह शुद्ध विवेक के साथ नहीं किया जा सकता, क्योंकि निश्चय ही उसे बोलना चाहिए।" — खंड 6, पृ. 502।
"निःसन्देह यह एक क्रूस होगा कि आप बताएँ कि परमेश्वर ने आपकी आत्मा के लिए क्या किया है; वरन् इसके बाद शैतान इसी बात पर आप पर दोष लगाएगा, और कहेगा, 'तूने यह घमण्ड से किया।'
हाँ, और आपकी कुछ बहनें आपको दोष देंगी, और शायद इसका वही अर्थ लगाएँगी।
तौभी, यदि आप इसे एकचित्त दृष्टि से करें तो यह परमेश्वर को भली-भाँति प्रसन्न करेगा।"
— खंड 7, पृ. 103।
"स्वर्ग के नीचे कोई भी बात धर्मी ठहराए गए लोगों की अभिलाषाओं को उतना नहीं जगाती जितना उन लोगों से बातचीत करना जिनके विषय में वे मानते हैं कि उन्होंने और भी ऊँचे उद्धार का अनुभव किया है।"
— खंड 6, पृ. 502।
"तब (ब्रिस्टल में) कई लोग बोले, और व्यर्थ नहीं।
ज्वाला हृदय से हृदय तक दौड़ गई, विशेषकर तब जब एक स्त्री पूरी सरलता से बता रही थी कि प्रातःकालीन उपदेश के समय ('मैं चाहता हूँ, तू शुद्ध हो जा' इन शब्दों पर) परमेश्वर ने किस प्रकार उसकी आत्मा को पूर्ण स्वतंत्रता दी।
दो पुरुषों ने भी इसी आशय की बात कही; और दो अन्य ने भी जिन्होंने परमेश्वर के साथ मेल पा लिया था।
तब हमने आनन्द से परमेश्वर के सामने अपनी आत्माएँ उँडेलीं, और उसके आश्चर्यकर्मों के लिए उसकी स्तुति की।" —
दैनिकी, जुलाई, 1761।
"मैं घोड़े पर टैडकास्टर गया, और भीतर प्रचार किया, क्योंकि वर्षा के कारण हम बाहर न रह सके जैसा मैंने सोचा था।
संध्या को मैंने ओटले में प्रचार किया, और उसके बाद सोसाइटी के बहुत-से लोगों से बात की।
विश्वास करने का कारण है कि इनमें से दस या बारह परमेश्वर के प्रेम से भरे हैं।
अगले दिन ओटले से कुछ मील उत्तर में फ्यूस्टन में (जहाँ मैंने दोपहर को प्रचार किया) मुझे एक-दो और मिले, जिन्हें परमेश्वर ने उसी उत्तम अंगीकार की गवाही देने के लिए खड़ा किया था।
और सचमुच, पूरी मण्डली सब प्रतिज्ञाओं को पाने के लिए मानो पूरी तरह पक चुकी थी।"
— दैनिकी, जुलाई, 1761।
"मैंने कक्षाओं का दौरा किया, और यह देखकर आश्चर्य हुआ कि
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
TT उस महान उद्धार की कोई गवाही नहीं थी। [अस्पष्ट मूल पाठ]
निश्चय ही जो ज्वाला डबलिन में जलाई गई है वह वहीं नहीं रुकेगी।
अगली संध्या को परमेश्वर ने सचमुच उसे यहाँ जला दिया; चारों ओर से पुकार उठी; और जीवित विश्वासी सब मानो 'सब अधर्म से शुद्ध किए जाने' के लिए आग में थे।" — दैनिकी, जून, 1762।
"हमारे भाइयों में से एक को विवश होकर खुलकर कहना पड़ा कि उसे विश्वास है कि परमेश्वर ने उसमें यह परिवर्तन किया है।
मुझे भरोसा है कि वह उस दान को, जो परमेश्वर ने उसे दिया है, सहज ही नहीं फेंकेगा।
प्रातःकाल मैं उन्हें आनन्दित और परमेश्वर की स्तुति करते छोड़कर घोड़े पर मोनाघन चला गया।" — दैनिकी, अप्रैल, 1762।
"लगभग तीन वर्ष से वह (जोसफ़ नॉरबरी) नम्रता और निर्भीकता से गवाही देता आया है कि परमेश्वर ने उसे सारे पाप से बचा लिया है।" —
खंड 2, पृ. 297।
अपने भाई चार्ल्स को, 1766: — "आपको लंदन पहुँचने में बहुत समय लग रहा है; इसलिए आशा है कि आप वहाँ बहुत भलाई करेंगे।
'हाँ,' विलियम कहता है, 'श्री चार्ल्स लंदन के बैंडों में उनकी बकवास को वैसे ही रोक देंगे जैसे उन्होंने ब्रिस्टल में रोकी है।'
मैं ऐसा नहीं मानता।
मेरा विश्वास है कि आप उन्हें बल्कि प्रोत्साहित करेंगे कि वे नम्रता और संयम से सत्य और सुबुद्धि की बातें कहें।
इससे बड़ी भलाई हुई है और होगी।
अपने 'ज्ञान को अग्नि का मार्गदर्शक बनने दो, उसे बुझाने मत दो।'
यह तो पहले ही बहुत हो चुका है।
मुझे भरोसा है कि अब आप उनकी आशाओं को ऊँचा उठाएँगे, दबाएँगे नहीं।" — रचनाएँ, खंड 6, पृ. 668।
श्रीमती एलिज़ाबेथ बेनिस को, 1766: — 'अब निश्चय ही, यदि परमेश्वर ने आपको यह ज्योति दी है, तो उसका उद्देश्य यह नहीं था कि आप इसे पैमाने के नीचे छिपाएँ।
'राजा का भेद छिपाना अच्छा है, परन्तु प्रभु की करुणा का वर्णन करना अच्छा है।'
हर एक को बताना चाहिए कि परमेश्वर ने उसकी आत्मा के लिए क्या किया है, और वह पूरी सरलता से; केवल इतनी सावधानी रखनी है कि कई लोगों को हमारे अनुभव का उतना ही भाग बताया जाए जितना वे अलग-अलग
मसीही सिद्धता,
सह सकें: और उसके कुछ भाग केवल उन्हें जो सीधे और सरल हृदय के हैं।
"जो पाप से बचाए गए हैं उन्हें विश्वासियों के सामने उसे खुलकर क्यों बताना चाहिए, इसका एक कारण यह है कि उनके लिए उसी आशीष को खोजने की इससे प्रबल प्रेरणा और कुछ नहीं।
और हमें हर संभव उपाय से हर गंभीर विश्वासी से आग्रह करना चाहिए कि वह पीछे की बातों को भूलकर पूरी लगन से सिद्धता की ओर बढ़ता जाए।
सचमुच, यदि वे इसके लिए प्यासे नहीं हैं, तो जो उनके पास है उसे बनाए रखना लगभग असंभव है: यदि वे पवित्रता के लिए हाँफ नहीं रहे, तो वे विश्वास की कोई शक्ति मुश्किल से ही बनाए रख सकते हैं।" — रचनाएँ, खंड 6, पृ. 50।
'शनिवार, 15 को मैं डेरी-अनविल गया, जो सब सड़कों से दूर एक छोटा-सा गाँव है, दलदलों से घिरा हुआ, ठीक लिंकनशायर में मेरे पुराने पल्ली रूट के समान।
फिर भी मण्डली बहुत बड़ी और बहुत जीवित थी।
मैंने उनमें से कई से विस्तार से बात की जो विश्वास करते हैं कि वे पाप से बचाए गए हैं, और उन पर अविश्वास करने का कोई कारण न पाया: और इन भागों में मुझे और भी बहुतेरे मिले जो उसी अंगीकार की गवाही देते हैं।"
— दैनिकी, अप्रैल, 1769।
श्रीमती मेरी सैवेज को, 1771: — "जिन-जिन तक आपकी पहुँच है उन सब को समझाइए कि सब बड़ी और बहुमूल्य प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करने में देर न करें!
जो सरल हृदय हैं उन सब को खुलकर बताइए कि उसने आपकी आत्मा के लिए क्या किया है।" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 127।
कुमारी चैपमैन को, 1778: — "मसीही सिद्धता के विषय पर आप कभी भी बहुत ज़ोर देकर या बहुत स्पष्ट रूप से नहीं बोल सकतीं।
यदि आप केवल धीमे और अप्रत्यक्ष रूप से बोलेंगी, तो न कोई अप्रसन्न होगा, न किसी को लाभ होगा।
परन्तु यदि आप खुलकर बोलें, तो यद्यपि कुछ लोग शायद क्रोधित हों, फिर भी दूसरे शीघ्र ही उद्धार के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य को पा लेंगे।'
— रचनाएँ, खंड 7, पृ. 254।
| "संध्या को हमारे प्रेम-भोज में (रेडरथ में) हमारे कई
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
मित्रों ने बताया कि परमेश्वर ने उन्हें भीतरी पाप से कैसे बचाया, और ऐसी यथार्थता से, विचार और भाषा दोनों में, कि स्पष्ट दिखता था कि वे परमेश्वर से सिखाए गए थे।" — दैनिकी,
सितम्बर, 1785।
"इसके बाद हमारा एक प्रेम-भोज हुआ (एपवर्थ के बाज़ार में), जिसमें शीघ्र ही एक ज्वाला भड़क उठी; जो तब और भी बढ़ गई जब श्री कंडी ने बताया कि परमेश्वर ने किस प्रकार उन्हें प्रेम में सिद्ध किया: ऐसी गवाही जिसके साथ सदा एक विशेष आशीष रहती है।" — दैनिकी, जुलाई, 1776।
"संध्या को हमारा प्रेम-भोज हुआ (ब्रिस्टल रूम में), जिसमें श्रीमती फ्लेचर ने सरलता से अपना वर्तमान अनुभव बताया।
मैं किसी को नहीं जानता जो कुछ ही वर्षों में इतना भला बदल गया हो, यहाँ तक कि अपने बोलने के ढंग में भी।
अब वह सहज, सरल और स्वाभाविक है, तब भी जब भाव गहरा और प्रबल हो।"
— दैनिकी, मार्च, 1787।
श्रीमती मेरी सैवेज को, 1772: — "इन दो बातों, पापमयता और असहायता, के बीच का अन्तर देखना सरल है।
पहली को अब आपको अनुभव करने की आवश्यकता नहीं; दूसरी को आप जीवन भर अनुभव करती रहेंगी, और सचमुच जितना आप परमेश्वर के निकट आएँगी, उतना ही अधिक आप इसे महसूस करेंगी।
परन्तु सावधान रहिए कि यह आपको उस बात पर ज़रा भी सन्देह में न डाल दे जो परमेश्वर ने आपकी आत्मा के लिए किया है।
और सावधान रहिए कि यह आपको पूरी सरलता से उसके विषय में बोलने में रत्ती भर भी पीछे न कर दे।" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 128।
कुमारी एच. ए. रो को, 1782: — "मुझे बड़ी आशा है कि जैसे जे. एस. की अपनी आत्मा मैक्लस्फ़ील्ड में बहुत सजीव हुई, वह अब चेस्टर में बहुतों के लिए आशीष होगा।
शुद्ध प्रेम के कुछ गवाह वहाँ अब भी हैं; परन्तु अनेक अब्राहम की गोद में जा चुके हैं।
एम. में जो इसका आनन्द लेते हैं उन्हें प्रोत्साहित करो कि वे जो अनुभव करते हैं उसे स्पष्ट रूप से कहें; और तब तक आगे बढ़ते रहें जब तक वे परमेश्वर के उस प्रेम को पूरी तरह न जान लें 'जो ज्ञान से परे है।'" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 195।
मसीही सिद्धता,
"संध्या को (मैक्लस्फ़ील्ड में) हमारा प्रेम-भोज हुआ; और ऐसा जैसा मैंने कई वर्षों से नहीं देखा था।
सोलह या अठारह व्यक्तियों ने प्रेम में नया किए जाने की स्पष्ट, पवित्रशास्त्रीय गवाही दी।
और अन्य बहुतों ने अनुपम सरलता से बताया कि परमेश्वर ने उनकी आत्माओं के लिए क्या किया है।"
— दैनिकी, अप्रैल, 1782।
श्री जॉन किंग को, 1787: — "परमेश्वर के सिद्ध प्रेम को बनाए रखने के लिए बड़ी सजगता की आवश्यकता है; और उसे बनाए रखने का एक बड़ा साधन यह है कि जो कुछ परमेश्वर ने तुम्हें दिया है उसे खुलकर बताओ, और जितने विश्वासियों से मिलो उन सब को पूर्ण उद्धार के पीछे चलने के लिए गंभीरता से समझाओ।" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 13।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
खंड 12
पूर्ण पवित्रीकरण के गवाह
"हम ऐसे बहुत-से लोगों को जानते हैं, हर आयु और लिंग के, बचपन से लेकर अति वृद्धावस्था तक, जिन्होंने वे सब प्रमाण दिए हैं जो इस बात की प्रकृति के अनुसार दिए जा सकते हैं, कि वे 'पूरी रीति से पवित्र किए गए
हैं;' 'शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध किए गए हैं,' कि वे 'प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय, सारे मन, सारे प्राण और सारी शक्ति से प्रेम रखते हैं;' कि वे निरन्तर अपनी आत्माओं और देहों को 'जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भानेवाला बलिदान' करके चढ़ाते हैं; जिसके फलस्वरूप वे 'सदा आनन्दित रहते, निरन्तर प्रार्थना करते, और हर बात में धन्यवाद देते हैं।'
और हमारे विश्वास के अनुसार यही सच्चा, पवित्रशास्त्रीय पवित्रीकरण है, इसके सिवाय और कुछ नहीं।" — उपदेश, खंड 2, पृ. 247।
"इसके अनुरूप ही सीधी-सादी वास्तविक घटना है।
कई लोगों ने बिना किसी रुकावट के बहुत वर्षों तक इस आशीष का आनन्द लिया है।
कई आज भी इसका आनन्द ले रहे हैं।
और अनेक ने अपनी मृत्यु तक इसका आनन्द लिया है, जैसा उन्होंने अपनी अन्तिम साँस तक कहा; शान्ति से गवाही देते हुए कि परमेश्वर ने उन्हें सारे पाप से बचा लिया है, जब तक उनकी आत्मा परमेश्वर के पास लौट न गई।"
— उपदेश, खंड 2, पृ. 174।
कुमारी एलिज़ाबेथ हार्डी को, 1761: — "सीधी बात यह है: मैं बहुतों को जानता हूँ जो परमेश्वर से अपने सारे हृदय, मन, प्राण और शक्ति से प्रेम करते हैं।
वही उनकी एकमात्र अभिलाषा है, उनका एकमात्र आनन्द है, और वे उसमें निरन्तर सुखी रहते हैं।
वे अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करते हैं।
वे हर मनुष्य के, भला हो या बुरा, मित्र हो या शत्रु, सुख के लिए उतनी ही सच्ची, उत्कट और निरन्तर
मसीही सिद्धता,
अभिलाषा अनुभव करते हैं जितनी अपने सुख के लिए।
वे 'सदा आनन्दित रहते, निरन्तर प्रार्थना करते, और हर बात में धन्यवाद देते हैं।'
उनकी आत्माएँ पवित्र आनन्द, प्रार्थना और स्तुति में निरन्तर परमेश्वर की ओर उमड़ती रहती हैं।
यह सीधा, खरा, पवित्रशास्त्रीय अनुभव है: और इसके हमारे पास अधिकाधिक जीवित गवाह हैं।" — रचनाएँ, खंड #1 [अस्पष्ट मूल पाठ], पृ. 737।
"सोसाइटी की सभा के बाद मैंने एक समझदार स्त्री से बात की, जिसका अनुभव विशेष प्रतीत होता था।
उसने कहा: 'पिछले ईस्टर से कुछ दिन पहले मैं पाप की गहरी कायल हुई; और ईस्टर के सप्ताह में मैंने जाना कि मेरे पाप क्षमा हो गए हैं, और मैं 'विश्वास करने में आनन्द और शान्ति' से भर गई।
परन्तु लगभग अठारह दिन में एक स्वप्न में मुझे एक उच्चतर उद्धार की आवश्यकता का बोध हुआ; और मैं रात-दिन तीव्र अभिलाषा की पीड़ा में पूरी रीति से पवित्र किए जाने के लिए विलाप करती रही, जब तक कि धर्मी ठहराए जाने के तेईसवें दिन मैंने एक पूर्ण परिवर्तन पाया, और साथ ही स्पष्ट गवाही कि यीशु के लहू ने मुझे सब अधर्म से शुद्ध कर दिया है।" — दैनिकी, जून
23, 1761।
"संध्या को मैंने मैनचेस्टर में उनसे बात की जो विश्वास करते थे कि परमेश्वर ने उनके हृदयों को शुद्ध किया है।
वे संख्या में तिरसठ थे, और उनमें से लगभग साठ के विरुद्ध मुझे कोई उचित आपत्ति न मिली।" — खंड 7, पृ. 381।
श्री फ़र्ली को, 1762: — "मैं तो एक बार फिर केवल मामला सामने रखूँगा।
चालीस या पचास लोग हैं जो घोषणा करते हैं (और मैं उनकी बात मान सकता हूँ, क्योंकि मैं उन्हें भली-भाँति जानता हूँ), हर एक अपने विषय में, 'परमेश्वर ने मुझे समर्थ किया है कि मैं सदा आनन्दित रहूँ, और निरन्तर प्रार्थना करूँ और धन्यवाद दूँ।
मैं कोई घमण्ड, कोई क्रोध, कोई कामना, कोई अविश्वास अनुभव नहीं करता, केवल शुद्ध प्रेम।' ... यह रही एक सीधी वास्तविकता।
आप जब तक चाहें बहस करें, तर्क करें, हुज्जत करें।
इस बीच मैं हर प्रकार के प्रमाण से जानता हूँ कि ये राज्य के सबसे सुखी और सबसे पवित्र लोग हैं।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार
Bee light shines before men." [अस्पष्ट मूल पाठ] — मेथोडिस्ट मैगज़ीन, 1856, पृ.
988।
"इनमें से अनेक ने परमेश्वर का दान बनाए नहीं रखा, यह इस बात का प्रमाण नहीं कि वह उन्हें दिया ही नहीं गया था।
कि अनेक आज तक उसे बनाए हुए हैं, यह स्तुति और धन्यवाद की बात है।
और उनमें से अनेक उसके पास जा चुके हैं जिससे उन्होंने प्रेम किया, अपनी अन्तिम साँस तक उसकी स्तुति करते हुए; ठीक ऐन
स्टीड की आत्मा में, जो ब्रिस्टल में उस महान उद्धार की पहली गवाह थी; जो रोग और असह्य पीड़ा से क्षीण होकर, अपने आसपास के सब लोगों को परमेश्वर को सौंपने के बाद, आँखें उठाकर ऊँचे स्वर में बोली, 'महिमा! हल्लिलूय्याह!' और चल बसी।"
— दैनिकी, अक्टूबर, 1762।
"मैंने जोसफ़ नॉरबरी की अस्थियाँ दफ़नाईं, जो यीशु मसीह का एक विश्वासयोग्य गवाह था।
लगभग तीन वर्ष से वह नम्रता और निर्भीकता से गवाही देता आया था कि परमेश्वर ने उसे सारे पाप से बचा लिया है: और जीवन और मृत्यु में उसकी सारी आत्मा और आचरण ने उसकी गवाही को निर्विवाद बना दिया।" — दैनिकी, दिसम्बर, 1763
"मैंने थॉमस सैल्मन की अस्थियाँ दफ़नाईं, जो एक भला और उपयोगी मनुष्य था।
उसके अनुभव में विशेष बात यह थी कि वह नहीं जानता था कि वह कब धर्मी ठहराया गया; परन्तु वह जानता था कि वह प्रेम में कब नया किया गया, क्योंकि वह कार्य अत्यन्त स्पष्ट रीति से हुआ।
इसके बाद वह लगभग एक वर्ष तक निरन्तर प्रेम, आनन्द और शान्ति में रहा; फिर कुछ दिन की बीमारी के बाद वह प्रसन्नता से परमेश्वर के पास चला गया।" — दैनिकी, फ़रवरी, 1764।
अपने भाई चार्ल्स को, 1766: — "जिस सिद्धता में मैं विश्वास करता हूँ, उसका प्रचार मैं निर्भीकता से कर सकता हूँ; क्योंकि मुझे लगता है कि मैं उसके पाँच सौ गवाह देखता हूँ।" —
रचनाएँ, अंग्रेज़ी संस्करण, खंड 12, पृ. 122।
"संध्या को मैंने वेडन्सबरी के भवन में एलिज़ाबेथ लॉन्गमोर के लिए अंत्येष्टि उपदेश दिया; मेरे विचार में वह मसीही सिद्धता की पहली गवाह थी जिसे परमेश्वर ने इन भागों में खड़ा किया।
मैंने बहुत वर्ष पहले उसके अनुभव का कुछ वृत्तान्त दिया था।
उस समय से उसका सारा जीवन
मसीही सिद्धता,
उसके अंगीकार के अनुरूप, हर प्रकार से पवित्र और निर्दोष रहा।
प्रायः उसके पास खाने को रोटी नहीं होती थी; परन्तु यह उसे 'सदा आनन्दित रहने' से नहीं रोक पाया।" — जर्नल, मार्च, 1770।
"मैं सूसन्ना पिल्सन के अंतिम संस्कार में सम्मिलित हुआ।
वह इस सोसाइटी के पहले सदस्यों में से थी, और सताव की सबसे तीव्र अवस्था में भी दृढ़ बनी रही।
बीस वर्ष से अधिक समय तक उसने परमेश्वर के साथ स्थिर और एकसमान रूप से चलते हुए सुसमाचार की शोभा बढ़ाई।
अधिकांश समय वह इस बात की जीवित साक्षी रही कि 'यीशु मसीह का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।'
लंबी बीमारी के बाद उसने शान्ति से अपनी आत्मा अपने विश्वासयोग्य सृजनहार के हाथों में सौंप दी।" — जर्नल, मई, 1771।
"अपने धर्मी ठहराए जाने के समय से ही उसने (सूसन्ना स्पेन्सर ने) स्पष्ट देखा कि पूरी तरह पवित्र किया जाना आवश्यक है; और उसे परमेश्वर के पूर्ण स्वरूप की अकथनीय भूख और प्यास लगी; और सन् 1772 में परमेश्वर ने उसकी इच्छा पूरी की।
दूसरा परिवर्तन उतने ही प्रबल और स्पष्ट रूप से हुआ जैसा पहला हुआ था।" — जर्नल, अक्टूबर, 1774।
"मैं लंदन लौटा, और रविवार, 11 तारीख को एलेनॉर ली की अस्थियों को मिट्टी दी।
मेरा विश्वास है कि उसने परमेश्वर की महान प्रतिज्ञा, अर्थात् पूर्ण पवित्रीकरण, पन्द्रह या सोलह वर्ष पहले पाया था, और उसे एक घंटे के लिए भी नहीं खोया।
तब से मैं उसके साथ घनिष्ठता से बातचीत करता रहा, और न कभी उसे कोई छोटा या बड़ा कार्य करते देखा, न कोई ऐसा शब्द बोलते सुना, जिसके लिए मैं उसे डाँट सकता।
तू सचमुच 'इस्राएल में एक माता' थी!"
— जर्नल, अक्टूबर, 1778।
"दोपहर बाद मैंने मेरी चार्लटन के लिए अंतिम संस्कार का प्रवचन दिया, जो सचमुच एक इस्राएली थी।
जिस घड़ी से उसने पहले-पहल परमेश्वर के क्षमा करनेवाले प्रेम को जाना, उसने उसे एक क्षण के लिए भी आँखों से ओझल नहीं होने दिया।
ग्यारह वर्ष पहले उसने विश्वास किया कि परमेश्वर ने उसे सब पापों से शुद्ध कर दिया है; और अपने पवित्र और निर्दोष आचरण से उसने दिखा दिया कि उसका विश्वास करना व्यर्थ नहीं था।"
— जर्नल, मई, 1781।
एल. कॉघलैंड को, 1768:—
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
"परमेश्वर का धन्यवाद हो, यद्यपि हम सौ उन्मादियों को अलग भी कर दें, तब भी हम 'गवाहों के बड़े बादल से घिरे हुए' हैं, जिन्होंने जीवन में और मृत्यु में उस सिद्धता की गवाही दी है और दे रहे हैं, जिसे मैं इन चालीस वर्षों से सिखाता आया हूँ!
यह सिद्धता तब तक भ्रम नहीं हो सकती जब तक बाइबल भी भ्रम न हो; मेरा आशय है, 'अपने सारे मन से परमेश्वर से प्रेम करना, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना।'
मैं इसके सब विरोधियों को इसी परिभाषा से बाँध देता हूँ।
कोई बहाना नहीं!
प्रश्न को इधर-उधर नहीं घुमाना!
इसमें भ्रम कहाँ है?
या तो तुमने यह प्रेम पाया है, या नहीं पाया; यदि पाया है, तो क्या तुम इसे भ्रम कहने का साहस करोगे?
तुम सारे संसार के बदले भी इसे ऐसा नहीं कहोगे।
यदि तुमने कुछ और पाया है, तो उसका इस प्रश्न पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।"
— जर्नल, अगस्त, 1768।
मसीही सिद्धता,
खंड XIII।
पवित्रता का प्रचार करने की आवश्यकता।
डॉ. स्टीवन्स ने अपने "मेथोडिज़्म का इतिहास" में आरंभिक मेथोडिस्ट प्रचारकों के विषय में कहा है:—"उनमें से हर एक ने, घुमंतू सेवकाई में अपने स्वीकार किए जाने के समय, इस सिद्धांत में अपना विश्वास प्रकट किया, और यह कि वह
इस उच्च अनुग्रह के लिए 'कराह' रहा था, यदि उसने इसे पहले से प्राप्त नहीं किया था।
संभवतः कोई एक तथ्य मेथोडिज़्म की अद्भुत सफलता की इससे उत्तम व्याख्या नहीं देता।
"वेस्ली ने देखा और घोषित किया कि जहाँ कहीं इसका प्रचार हुआ, वहाँ प्रायः आत्मिक जागृति फैली।
उसने कहा, 'यह वह महान धरोहर है जो परमेश्वर ने मेथोडिस्ट कहलानेवाले लोगों को दी है, और ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने उन्हें मुख्यतः इसी के प्रसार के लिए खड़ा किया।
उनका उद्देश्य कोई धार्मिक दल बनाना नहीं था, बल्कि इन देशों में पवित्रता फैलाना था।'
व्यक्तिगत पवित्रीकरण का सिद्धांत, संक्षेप में, मेथोडिज़्म का महान प्रभावशाली विचार था।
. इन पवित्र पुरुषों ने अपने आपको पूरी तरह सार्वजनिक बलिदान के रूप में अर्पित करके, परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण के एक अंश के रूप में ऐसा किया, ताकि वे स्वयं पूरी तरह पवित्र किए जाएँ और साथ ही दूसरों के लिए उपयोगी भी हों।"—मेथोडिज़्म का इतिहास, खंड ii, पृ. 406।
"इसलिए हमारे सब प्रचारक यह ठान लें कि वे विश्वासियों को सिद्धता का प्रचार निरंतर, दृढ़ता से और स्पष्ट रूप से करेंगे।" ..
"मुझे संदेह नहीं कि हम पूर्ण पवित्रीकरण के विषय में, चाहे सार्वजनिक रूप से या निजी तौर पर, पर्याप्त स्पष्टता से नहीं बोलते।"—खंड vi, पृ. 529।
"वर्तमान व्यवस्था में वह निस्संदेह उसी लक्ष्य की ओर लगा है,
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
कि देश भर में पवित्रता फैलाए।
हमारी बुद्धिमानी इसी में है कि हम इसे सदा दृष्टि में रखें, अर्थात् आंतरिक और बाहरी पवित्रता को।
मनुष्य और दुष्टात्माएँ हमें अपने लक्ष्य से भटकाने के लिए हज़ारों बातें सामने रखेंगे।
हमें इनसे निरंतर सावधान रहना है; क्योंकि वे निरंतर अपना रूप बदलती रहेंगी।
परन्तु अपनी दृष्टि एक ही रखो; सदा एक ही बात का लक्ष्य रखो—पवित्र, प्रेममय विश्वास; परमेश्वर को सारा मन देना।
और सबको इसी के लिए उभारो; एक प्रेम, एक वर्तमान और अनन्त स्वर्ग।" — रचनाएँ, खंड vi, पृ. 778।
"कॉर्नवॉल के विश्वासियों से मैं जितनी अधिक बातचीत करता हूँ, उतना ही मुझे विश्वास होता है कि मसीही सिद्धता के सिद्धांत को स्पष्टता और दृढ़ता से सिखाए जाते न सुनने के कारण उन्हें बड़ी हानि हुई है।
मैं देखता हूँ कि जहाँ कहीं ऐसा नहीं किया जाता, वहाँ विश्वासी मुर्दा और ठंडे पड़ जाते हैं।
और इसे रोका नहीं जा सकता, सिवाय इसके कि उनमें प्रेम में सिद्ध किए जाने की घड़ी-घड़ी की आशा बनाए रखी जाए।
मैं कहता हूँ घड़ी-घड़ी की आशा; क्योंकि इसकी आशा मृत्यु के समय, या कभी भविष्य में रखना, लगभग वैसा ही है जैसे इसकी आशा बिल्कुल न रखना।" — जर्नल, सितंबर 1762।
मिस्टर मेरीवेदर को, 1766:—"जहाँ मसीही सिद्धता का दृढ़ और स्पष्ट प्रचार नहीं होता, वहाँ परमेश्वर की ओर से शायद ही कोई उल्लेखनीय आशीष मिलती है; और फलस्वरूप सोसाइटी को बहुत कम, और उसके सदस्यों में बहुत कम जीवन होता है।
इसलिए यदि जैकब रोवेल ढीला पड़ गया है और इसके विषय में बहुत कम कहता है, तो उसकी सेवा की कमी तुम पूरी करो।
बोलो, और संकोच न करो।
किसी मनुष्य का लिहाज़ तुम्हें परमेश्वर के सत्य से विश्वासघात करने के लिए न उकसाए।
जब तक तुम विश्वासियों पर ज़ोर नहीं डालते कि वे अभी पूर्ण उद्धार की आशा रखें, तब तक तुम्हें किसी जागृति की आशा नहीं करनी चाहिए।" — रचनाएँ, खंड vi, पृ. 761।
चार्ल्स वेस्ली को, 1766:—"हर जगह इस बात पर ज़ोर दो कि पूर्ण छुटकारा अभी, केवल विश्वास से, प्राप्त किया जा सकता है! अतः उसकी आशा भी अभी रखनी चाहिए।
तुम मानो इसी काम के लिए बनाए गए हो।
ठीक यहीं तुम
मसीही सिद्धता
अपने स्वाभाविक क्षेत्र में हो।
. तात्कालिक आशीष पर ज़ोर दो, तब मुझे अपने विशेष बुलावे, अर्थात् क्रमिक कार्य पर बल देने के लिए अधिक समय मिलेगा।" — रचनाएँ, अंग्रेज़ी संस्करण, खंड xii, पृ. 122।
जॉन ब्रेडिन को:—"मूर्खतापूर्ण चापलूसी के कारण स्कॉटलैंड में हमारे प्रचारकों ने प्रायः हानि पहुँचाई है।
पूरी तरह मेथोडिस्ट बनो; और ज़ोर देकर कहो कि पूर्ण उद्धार अभी, सरल विश्वास से प्राप्त किया जाए।" — वेस्लियन टाइम्स, मई, 1761।
श्रीमती क्रॉस्बी को, 1766:—"क्या वे लंदन में आगे बढ़ रहे हैं?
मुझे डर है कि [मसीही] सिद्धता भुला दी जाएगी।
रिचर्ड ब्लैकवेल और मिस्टर कॉली को प्रोत्साहित करो कि वे स्पष्ट बोलें, और विश्वासियों से आग्रह करें कि वे इसकी निरंतर खोज और उत्कट आशा रखें।
इस विषय में एक सामान्य शिथिलता पूरे राज्य पर छा गई है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि प्रचारकों और लोगों, दोनों की धारा के विरुद्ध संघर्ष करते-करते मैं लगभग थक गया हूँ।"
— रचनाएँ, खंड vii, पृ. 29।
मिस बोसांके (जो बाद में श्रीमती फ्लेचर बनीं) को, 1767:
"तुम ठीक कहती हो।
जब तक तुमने मुझे लिखकर नहीं बताया, मुझे कभी पता नहीं था कि रिचर्ड टेलर लेटनस्टोन में गया भी था।
इस सम्मेलन में यह निर्धारित किया जाएगा कि हमारे सब प्रचारक निरंतर मसीही सिद्धता पर ज़ोर देंगे, या कोई नहीं।"
— रचनाएँ, खंड vii, पृ. 60।
मिस जेन हिल्टन को, 1769:—"मेरा विश्वास है कि तुम भाई हॉवर्ड से बिना संकोच बात कर सकती हो।
वह शांत, विचारशील मनुष्य है।
पर क्या वह मसीही सिद्धता का स्पष्ट और खुला प्रचार करता है? तुम्हारे अन्य प्रचारकों में कौन करता है?" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 43।
रेवरेंड जॉन फ्लेचर की पत्नी को, 1770:—"मुझे प्रसन्नता है कि रिचर्ड टेलर उपयोगी हो रहा है।
वह और भी अधिक
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
उपयोगी होगा, यदि वह मन का सरल बना रहे, और पूर्ण छुटकारे के विषय में स्पष्ट बोले, और विश्वासियों से आग्रह करे कि वे उसे अभी स्वीकार करें!
यही नियम तुम्हारे लिए भी उचित होगा कि उन सबके साथ बातचीत में पालन करो जो सच्चे मन से खोजते हैं।
तुम्हारी आत्मा के साथ शान्ति रहे!" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 62।
"मुझे आशा है कि वह पूर्ण उद्धार का, जो विश्वास से अभी प्राप्त हो सकता है, प्रचार करने में लज्जित नहीं होता।
यही वह वचन है जिसे परमेश्वर सदा आशीष देगा, और जिससे शैतान को विशेष घृणा है; इसलिए वह निरंतर अपने बच्चों को, और परमेश्वर के निर्बल बच्चों को भी, इसके विरुद्ध भड़काता रहता है।"—श्रीमती
बेनिस को पत्र, 1771।
अपने भाई चार्ल्स को, 1772:—"मैं पाता हूँ कि लगभग हमारे सब प्रचारक, हर परिक्षेत्र में, मसीही सिद्धता को छोड़ चुके हैं।
वे कहते हैं कि वे इसे मानते हैं; परन्तु इसका प्रचार कभी नहीं करते; या तिमाही में एक बार भी नहीं।
क्या किया जाए?
क्या हम इसे छूट जाने दें, या इस पर ज़ोर दें?"
— रचनाएँ, खंड vi, पृ. 673।
रेवरेंड एफ. वुल्फ को, 1772:
—"तुम दोनों हर जगह विश्वासियों को दृढ़ता से उभारो कि वे 'सिद्धता की ओर आगे बढ़ते जाएँ'; नहीं तो वे जो उनके पास है उसे बनाए नहीं रख सकते।" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 122।
रेवरेंड सैमुअल बीयर्ड्सली को, 1772:—"प्रिय सैमी,—यह बड़ी आशीष है कि तुम्हारे सहकर्मी और तुम सब एक मन के हो।
जब ऐसा होता है, तब प्रभु का कार्य तुम्हारे हाथों में सफल होता है।
जब तक तुम एक ही जुए में खिंचते रहोगे, यह कार्य गहराई के साथ-साथ फैलता भी जाएगा।
यदि तुम चाहते हो कि यह विश्वासियों में और गहरा हो, तो उन्हें निरंतर उभारते रहो कि वे सिद्धता की ओर आगे बढ़ते जाएँ; जो भी अनुग्रह उन्होंने पाया है उसका स्थिरता से उपयोग करें, और हर क्षण पूर्ण उद्धार की आशा रखें।
"मसीही सिद्धता का सरल वृत्तांत" तुम्हें स्वयं एक से अधिक बार पढ़ना चाहिए, और उन सबको इसकी सिफ़ारिश करनी चाहिए जो पूर्ण छुटकारे के लिए कराह रहे हैं।" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 129।
मसीही सिद्धता,
मिस पाइवेल को, 1773:—"तुम्हारे कार्य का एक भाग यह है कि जिन्होंने विश्वास किया है उन सबको उभारो कि वे सिद्धता की ओर बढ़ते जाएँ, और हर क्षण उस पूर्ण उद्धार की आशा रखें जो सरल विश्वास से मिलता है।" — खंड vii, पृ. 36।
श्रीमती जेन बार्टन को, 1774:
—"मुझे प्रसन्नता है कि बहन क्रॉस्बी बेवर्ली में रही हैं, और तुम्हें उनकी बात सुनने का अवसर मिला।
वे जहाँ कहीं जाती हैं, उपयोगी होती हैं; विशेषकर विश्वासियों को सिद्धता की ओर आगे बढ़ने के लिए उभारने में।" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 46।
मिस रिची को, 1774:—"और परमेश्वर के शुद्ध प्रेम को बनाए रखने का एक उपाय है, दूसरों को उत्कटता से इसकी खोज में लगने के लिए उभारना। जब तुम रविवार की सुबह इकट्ठी होती हो, तो मुझे संदेह नहीं कि यही तुम्हारी प्रार्थनाओं और बातचीत का मुख्य विषय होता होगा।
तब तुम आशा रख सकती हो कि तुम ऊपर से सामर्थ्य से अधिकाधिक भरपूर रूप से भरी जाओगी; और यह गवाही दोगी कि वह विश्वासयोग्य और धर्मी है, कि हमारे पाप क्षमा करे और हमें सब अधर्म से शुद्ध करे।" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 173।
रेवरेंड जोसेफ बेन्सन को, 1774:—"मुझे प्रसन्नता है कि तुम 'सब विश्वासियों को' परमेश्वर की सन्तानों की पूर्ण स्वतंत्रता की अभिलाषा करने के लिए उभारते हो।
ऐसा करने के लिए उन्हें अपना विश्वास नहीं छोड़ना है; इसमें पहले तुम कुछ भूल में प्रतीत होते थे।
उन्हें विश्वास से विश्वास में आगे बढ़ने दो; निर्बल विश्वास से उस प्रबल विश्वास तक, जो पाप पर केवल जय ही नहीं पाता बल्कि उसे निकाल बाहर करता है।
इस बीच यह निश्चित है कि बहुत-से लोग अपने को विश्वासी कहते हैं जो पाप पर जय भी नहीं पाते; जो परमेश्वर के सम्पूर्ण आंतरिक राज्य से अपरिचित हैं, और आत्मा के सारे फल से रहित हैं।" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 74।
"बुधवार, 14—मैंने टिवर्टन में प्रचार किया; और गुरुवार को लॉन्सेस्टन गया।
यहाँ मुझे इसका स्पष्ट कारण मिला कि इस परिक्षेत्र में परमेश्वर का कार्य क्यों कोई प्रगति नहीं कर पाया था
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
पूरे वर्ष भर।
प्रचारकों ने मेथोडिस्ट गवाही छोड़ दी थी।
या तो वे सिद्धता के विषय में (जो हमें सौंपा गया विशेष सिद्धांत है) बिल्कुल बोलते ही नहीं थे, या केवल सामान्य शब्दों में बोलते थे, विश्वासियों को 'सिद्धता की ओर आगे बढ़ने' और हर क्षण उसकी आशा रखने के लिए नहीं उभारते थे।
और जहाँ कहीं यह उत्कटता से नहीं किया जाता, वहाँ परमेश्वर का कार्य सफल नहीं होता।" — जर्नल, अगस्त, 1776।
रेवरेंड ज़कर्याह ट्यूडल को, 1779:—"तुम जहाँ कहीं भी हो, यह स्वीकार करने को तैयार रहो कि परमेश्वर ने तुम्हारी आत्मा के लिए क्या किया है; और सब विश्वासियों को उत्कटता से उभारो कि वे पूर्ण उद्धार की आशा रखें।" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 154।
"एडिनबरा, गुरुवार, 17—मैंने सोसाइटी की जाँच की।
पाँच वर्षों में मैंने पाया कि केवल पाँच सदस्य बढ़े थे! निन्यानवे से बढ़कर एक सौ चार हुए थे।
तो फिर हमारे प्रचारक इस सारे समय में क्या करते रहे हैं?
1. उन्होंने सप्ताह में चार संध्याओं को और रविवार की सुबह प्रचार किया है; अन्य सुबहों को उन्होंने सीधे-सीधे छोड़ दिया है।
2. उन्होंने बड़ी सावधानी रखी है कि बहुत स्पष्ट न बोलें, कहीं ऐसा न हो कि किसी को ठेस पहुँचे।
3. जब मिस्टर ब्रैकनबरी ने पुराने मेथोडिस्ट सिद्धांत का प्रचार किया, तो उनमें से एक ने कहा, 'आपको यहाँ ऐसे सिद्धांत का प्रचार नहीं करना चाहिए।
सिद्धता का सिद्धांत एडिनबरा के वातावरण के अनुकूल नहीं है।'
तब अन्य सब बाधाओं को एक ओर रख दें, तो क्या आश्चर्य कि परमेश्वर का कार्य यहाँ सफल नहीं हुआ?" — जर्नल, जून, 1779।
मिस्टर रॉबर्ट हॉपकिन्स को, 1781:—"तुम्हारे लिए अच्छा है कि जो तुमने पाया है उसे दृढ़ता से थामे रहो, और निरंतर इसकी अभिलाषा करते रहो; और तुम अपनी आत्मा में कभी इससे अधिक जीवन नहीं पाओगे जितना तब पाओगे जब तुम दूसरों को सिद्धता की ओर आगे बढ़ने के लिए उत्कटता से उभार रहे होगे।
बहुत-से लोग ऐसा करने के लिए तुम्हें दोष देंगे; परन्तु उसकी परवाह न करो: आदर और अनादर के बीच से आगे बढ़ते जाओ।
'मैं एक काम करता हूँ,' यही तुम्हारा आदर्श-वाक्य है।" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 252।
मसीही सिद्धता,
"मैं हार्दिक इच्छा करता हूँ कि हमारे सब प्रचारक पिछले वृत्तांत (रेवरेंड अलेक्जेंडर माथर के अनुभव) पर गंभीरता से विचार करें, और इतने से संतुष्ट न रहें कि वे सार्वजनिक या निजी रूप से इस महान उद्धार के विरुद्ध कभी न बोलें; और जो लोग समझते हैं कि उन्होंने इसे पा लिया है, उन्हें शब्द या कर्म से कभी हतोत्साहित न करें।
नहीं; बल्कि विवेकपूर्वक उन्हें प्रोत्साहित करें कि जो उन्होंने पाया है उसे थामे रहें, और सब विश्वासियों को दृढ़ता और स्पष्टता से उभारें कि वे सिद्धता की ओर आगे बढ़ते जाएँ; हाँ, केवल अनुग्रह से, सरल विश्वास के द्वारा, हर क्षण पाप से पूर्ण उद्धार की आशा रखें।"
— आर्मीनियन मैगज़ीन, जनवरी, 1780।
रेवरेंड सैमुअल बीयर्ड्सली को, 1775:—"तुम जितना अधिक परिश्रम करोगे, उतनी अधिक आशीष पाओगे; विशेषकर उस पूर्ण उद्धार का प्रचार करने में, जो विश्वास से अभी प्राप्त हो सकता है।"
"सब विश्वासियों को दृढ़ता और स्पष्टता से उभारो कि वे सिद्धता की ओर आगे बढ़ें, और हर उस आशीष की आशा रखें जिसकी परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है—कल नहीं, आज ही।"
"हर जगह विश्वासियों को उभारो कि वे सरल विश्वास से अभी पूर्ण उद्धार की आशा रखें।"
मिस रिची को, 1782:—"वह बात, अर्थात् जन्मजात पाप से पूर्ण उद्धार, प्रचार या प्रार्थना में जब भी ज़ोर देकर कही जाए, लगभग सदा किसी विशेष आशीष के साथ ही कही जाती है।
सच्चा आइज़क ब्राउन दृढ़ता से इस सिद्धांत को मानता है कि इसी जीवन में हमें सब पापों से बचाया जाना है।
परन्तु मैं चाहता हूँ कि अवसर मिलने पर तुम उसे प्रोत्साहित करो कि 1. वह मसीही सिद्धता का प्रचार निरंतर, दृढ़ता से और स्पष्टता से करे; 2. स्पष्ट रूप से यह कहे और प्रमाणित करे कि यह अभी प्राप्त किया जा सकता है; और 3. (जो वास्तव में उसी में निहित है) कि यह सरल विश्वास से प्राप्त होता है।" —
रचनाएँ, खंड vii, पृ. 181।
रेवरेंड जोसेफ बेन्सन को, 1782:—"तुम्हारे मित्रों की सुविधा के लिए, जो आस-पास रहते हैं, उन दोनों प्रवचनों की कुछ प्रतियाँ छापने में मुझे कोई आपत्ति नहीं
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
है।
मुझे संदेह है कि हम पूर्ण पवित्रीकरण के विषय में, सार्वजनिक या निजी रूप से, पर्याप्त स्पष्ट नहीं बोलते।" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 81।
रेवरेंड रॉबर्ट हॉपकिन्स को, 1784:—"जो आशीषें तुमने पाई हैं उनके बदले में तुम्हें यही करना है कि उन्हें सब मनुष्यों को बताओ; और सब विश्वासियों को दृढ़ता और स्पष्टता से उभारो कि वे सिद्धता की ओर आगे बढ़ें।
जो तुम अब अनुभव करते हो उसे तुम्हें कभी खोना नहीं है; बल्कि जब तक तुम्हारी आत्मा परमेश्वर के पास न लौट जाए, तुम इसमें बढ़ सकते हो।" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 252।
रेवरेंड ए. क्लार्क को, 1786:—"तुम पूर्ण और वर्तमान उद्धार पर ज़ोर देकर अच्छा करते हो, चाहे लोग सुनें या न सुनें।" — खंड vii, पृ. 203।
सन् 1790 में, मिस्टर वेस्ली की मृत्यु से दो वर्ष पहले, उन्होंने रॉबर्ट कैर ब्रैकनबरी, एस्क्वायर को लिखा:—"मुझे प्रसन्नता है कि भाई डी. को पूर्ण पवित्रीकरण के विषय में अधिक ज्योति मिली है।
यह सिद्धांत वह महान धरोहर है जो परमेश्वर ने मेथोडिस्ट कहलानेवाले लोगों के पास रखी है; और ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यतः इसी के प्रसार के लिए उसने हमें खड़ा किया है।" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 153।
रेवरेंड जॉन बूथ को, 1791 में, मिस्टर
वेस्ली की मृत्यु से दो महीने पहले:—"जहाँ कहीं तुम्हें विश्वासियों से बात करने का अवसर मिले, उनसे आग्रह करो कि वे सिद्धता की ओर आगे बढ़ें।
कोई कसर न छोड़ो; और परमेश्वर, हमारा अपना परमेश्वर, तुम्हें अब भी अपनी आशीष दे।"—रचनाएँ, खंड vii, पृ. 238।
मसीही सिद्धता,
खंड XIV।
मिस्टर वेस्ली अक्सर मसीही
सिद्धता पर प्रचार करते थे।
"यह वह महान धरोहर है जो परमेश्वर ने मेथोडिस्ट कहलानेवाले लोगों को दी है; और ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने उन्हें मुख्यतः इसी के प्रसार के लिए खड़ा किया।"
. "हम मानते हैं कि अमेरिका में मेथोडिस्ट कहलानेवाले प्रचारकों को खड़ा करने में परमेश्वर का उद्देश्य इस महाद्वीप का सुधार करना और इन देशों में पवित्रशास्त्र-सम्मत पवित्रता फैलाना था।" — मेथोडिस्ट अनुशासन-पुस्तिका।
"सितंबर, 1738 में, जब मैं जर्मनी से लौटा, तो मैंने जितनों को हो सका उभारा कि वे उस महान उद्धार के पीछे चलें जो मसीह के लहू पर विश्वास के द्वारा है; 'परमेश्वर की सब विधियों में' उसकी बाट जोहते हुए, और 'जैसा अवसर मिले सब मनुष्यों का भला करते हुए।'" — जर्नल।
"मैं और मेरा भाई टिवर्टन के लिए निकले।
लगभग ग्यारह बजे मैंने बर्फ़ोर्ड में प्रचार किया।
शनिवार की संध्या को मैंने ब्रिस्टल में मसीही सिद्धता का स्वरूप और विस्तार समझाया।"
— जर्नल, नवंबर, 1739।
"मैनचेस्टर में हमें सुबह और दोपहर, दोनों समय असाधारण आशीष मिली।
संध्या को मैं विश्वासियों से मिला, और उन्हें दृढ़ता से उभारा कि वे 'सिद्धता की ओर आगे बढ़ें।'
उनमें से बहुतों को यह नया सिद्धांत लगा।
फिर भी उन सबने इसे प्रेम से ग्रहण किया; और एक ज्वाला भड़क उठी, जिसे मुझे आशा है न मनुष्य और न दुष्टात्माएँ कभी बुझा सकेंगे।"
—जर्नल, अप्रैल, 1761।
"मैंने सात बजे इस पर प्रचार किया, 'हे प्रभु, यदि तू चाहे तो तू
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
मुझे शुद्ध कर सकता है।'
और ओह, परमेश्वर ने कैसी ज्वाला भड़काई!
बहुत-से लोग 'प्रेम में विलीन हो जाने के लिए जल रहे थे।'"
— जर्नल, जुलाई, 1761।
"मैं लंदन आया।
मैंने सुबह और संध्या, दोनों सेवाओं में वही आत्मा पाया जो मैं यहाँ छोड़ गया था।
सोमवार 2 को, पाँच बजे, मैंने मसीही सिद्धता पर प्रवचन-माला आरंभ की।"—जर्नल, नवंबर, 1761।
"सुबह पाँच बजे एक बड़ी मंडली उपस्थित हुई, और मानो इस उपदेश के लिए पूरी तरह तैयार थी, 'आओ हम सिद्धता की ओर आगे बढ़ें।'
मुझे सचमुच यह संतोष मिला कि यहाँ के अधिकांश विश्वासी पूर्ण छुटकारे के प्यासे थे।"
— जर्नल, अप्रैल, 1764।
"वहाँ से हम ग्रिम्सबी गए, जो कभी पूरे परगने में सबसे मुर्दा, और अब सबसे जीवंत स्थान है। यहाँ सोसाइटी और श्रोताओं, दोनों में बड़ी और तेज़ वृद्धि हुई है, इतनी कि गैलरियाँ जोड़ने पर भी भवन अब तक छोटा पड़ता है।
सुबह, बुधवार, 4 को, मैंने विस्तार से मसीही सिद्धता का स्वरूप समझाया।
जिन्हें पहले इसमें संदेह था, उनमें से बहुत-से पूरी तरह संतुष्ट हो गए।
अब केवल यही शेष है कि हम जो मानते हैं उसका अनुभव करें।" — जर्नल, अप्रैल, 1764।
सात बजे मैंने मसीही पवित्रता की ऊँचाई और गहराई को स्पष्टता और दृढ़ता से वर्णित किया; और (जो आश्चर्य की बात है) बाद में मैं किसी को नाराज़ हुआ नहीं पा सका। — जर्नल,
नवंबर, 1764।
"सुबह पाँच बजे मैंने मसीही सिद्धता पर प्रवचन-माला आरंभ की; कि कदाचित् उसके लिए वह प्यास लौट आए जो कुछ वर्ष पहले इतनी सामान्य थी।
तब से हमने परमेश्वर के पवित्र आत्मा को कितनी गहराई से दुःखी किया है!
फिर भी दो-तीन लोगों ने हाल ही में उसका शुद्ध प्रेम पाया है; और कुछ और जन्म के निकट लाए गए हैं।" — जर्नल, दिसंबर, 1767।
सारा क्रॉस्बी ने 1770 में मिस बोसांके को लिखा:
"मिस्टर वेस्ली कल लीड्स से गए।
मैंने उन्हें कभी इससे
मसीही सिद्धता,
अच्छा प्रचार करते नहीं सुना, यदि इतना अच्छा भी कभी किया हो।
हर प्रवचन में उन्होंने 'मसीही सिद्धता' को अत्यंत सुंदर प्रकाश में प्रस्तुत किया।"
— टायरमैन, खंड iii, पृ. 68।
"संध्या को स्विनफ़्लीट का भवन मंडली के एक तिहाई को भी समा नहीं सकता था, इसलिए मैंने हवा से बचे एक समतल, हरे स्थान पर इब्रानियों 7:25 पर प्रचार किया। बहुतों ने 'पूर्ण रूप से उद्धार' पाने की बात सुनकर आनन्द किया, जो ठीक वही बात थी जिसकी उनके प्राणों को लालसा थी।" — जर्नल, जुलाई, 1770।
"अगली संध्या को (मैक्लेसफ़ील्ड में) मैंने इब्रानियों 12:14 पर प्रचार किया: 'बिना पवित्रता के कोई प्रभु को नहीं देखेगा।'
मुझे सामर्थ्य मिली कि मैं गहरी बात कह सकूँ, मुख्यतः उनसे जो विश्वास से उद्धार पाने की आशा रखते थे।
मुझे आशा है कि उनमें से कोई भी आगे कभी ऐसे विश्वास से स्वर्ग जाने का स्वप्न नहीं देखेगा जो पवित्रता उत्पन्न नहीं करता। — जर्नल, अप्रैल, 1777।"
"चालीस वर्ष पहले मैं हर वह मसीही सिद्धांत जानता और सिखाता था जो मैं अब सिखाता हूँ।" — जर्नल, सितंबर, 1778।
"लगभग दस बजे मैंने न्यू मिल्स में प्रचार किया, ऐसे लोगों को जो चैपल के लोगों जितने ही सरल थे।
यह देखकर कि सिद्धता का सिद्धांत उन्हें स्पष्टता से समझाया न जाने और उन पर दृढ़ता से ज़ोर न दिए जाने के कारण उन्हें बड़ी हानि हुई है, मैंने इसी विषय पर विशेष रूप से प्रचार किया; और सोसाइटी से मिलते समय भी इसी आशय की बात कही।
बहुतों के मन बहुत जाग उठे; और वे अब 'सिद्धता की ओर आगे बढ़' रहे हैं।
मैंने आवश्यक समझा कि संध्या को स्टॉकपोर्ट में भी यही बात ज़ोर देकर कहूँ।" — जर्नल,
अप्रैल, 1782।
"संध्या को मैंने उन सबको उभारा कि वे क्षमा या पवित्रता की आशा आज रखें, कल नहीं।
ओह, उनका प्रेम कभी ठंडा न पड़े!" — जर्नल, मई, 1783।
"शुक्रवार, 6, स्थानीय प्रचारकों की तिमाही बैठक का दिन होने के कारण, बीस से तीस के बीच प्रचारक वेस्ट स्ट्रीट में मिले, और एक-दूसरे के सामने अपने हृदय खोले।
उन सबके एक साथ होने का अवसर पाकर, रात्रि
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
में मैंने तीमुथियुस को दी गई संत पौलुस की सलाह पर ज़ोर दिया, 'जो तुझे सौंपा गया है उसकी रखवाली कर;' विशेषकर मसीही सिद्धता के सिद्धांत पर, जो परमेश्वर ने विशेष रूप से मेथोडिस्टों को सौंपा है।"
— जर्नल, फरवरी, 1789।
"नौ बजे मैंने टन्स्टॉल के नए चैपल में प्रचार किया; जो बाथ छोड़ने के बाद से मेरे देखे चैपलों में सबसे सुंदर है।
मेरा पाठ था, 'आओ हम सिद्धता की ओर आगे बढ़ें;' और लोग वचन को मानो निगल रहे थे।" — जर्नल, अप्रैल, 1790।
"हम विगन गए, जो कई वर्षों तक कहावत में 'दुष्ट विगन' कहलाता था। पर अब वह वैसा नहीं रहा जैसा था।
वहाँ के निवासियों ने सामान्यतः अधिक कोमल रूप ले लिया है।
संध्या को भवन भर से भी अधिक भर गया; और जो भीतर आ सके वे सब बहुत प्रभावित दिखे, जब मैंने प्रभु के उन शब्दों को दृढ़ता से लागू किया,
'मैं चाहता हूँ, तू शुद्ध हो जा।'" — जर्नल, मई, 1790।
"यदि मुझे विश्वास हो जाए कि इंग्लैंड में किसी ने भी वह प्राप्त नहीं किया जिसका इतने प्रचारकों ने, इतने स्थानों पर, इतने लंबे समय तक इतनी दृढ़ता और स्पष्टता से प्रचार किया है, तो मुझे स्पष्ट विश्वास हो जाएगा कि हम सबने उन पवित्रशास्त्र-वचनों का अर्थ गलत समझा है।" — सरल वृत्तांत, पृ. 88।
यहाँ दिए गए उदाहरण केवल उसका नमूना हैं जो उनकी सारी जर्नलों में व्याप्त है।
डॉ. एडम क्लार्क, ब्रैमवेल, कार्वोसो, श्रीमती हेस्टर ऐन रॉजर्स और लेडी मैक्सवेल की जर्नलों में, जहाँ मिस्टर वेस्ली के बहुत-से प्रवचनों और पाठों का उल्लेख है, आप पाएँगे कि उनका एक बड़ा भाग पूर्ण उद्धार, अर्थात् सिद्धता, के विषय पर है।
मिस्टर वेस्ली द्वारा रचे गए भजनों में से आधे से अधिक पवित्रता के विषय पर थे।
मसीही सिद्धता,
खंड XV।
मिस्टर वेस्ली किसी एक ही अभिव्यक्ति-प्रकार
तक सीमित नहीं थे।
"मुझे 'सिद्धता' शब्द से कोई विशेष लगाव नहीं है।
यह मेरे प्रचार या लेखों में बहुत कम आता है।
यह मेरे विरोधी हैं जो इसे बार-बार मुझ पर थोपते हैं, और मुझसे पूछते हैं कि इससे मेरा क्या तात्पर्य है।
बिशप गिब्सन ने भी ऐसा ही किया, जब तक कि उनकी सलाह पर मैंने सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं कर दिया कि इससे मेरा क्या तात्पर्य नहीं है, और क्या है।
मैंने सोचा कि यह प्रवचन के रूप में, एक पाठ को सामने रखकर, सबसे अच्छा किया जा सकता है, जिसमें वह शब्द आता हो।
परन्तु वह पाठ वहाँ केवल विषय के अवसर या भूमिका के रूप में प्रयोग किया गया है।
मैं उस पर कोई सिद्धांत नहीं खड़ा करता, न उसकी आलोचनात्मक व्याख्या का बीड़ा उठाता हूँ।
"सिद्धता का अर्थ क्या है? यह एक और प्रश्न है; परन्तु यह कि यह पवित्रशास्त्रीय शब्द है, निर्विवाद है।
इसलिए, किसी को इस शब्द के प्रयोग पर आपत्ति नहीं करनी चाहिए, चाहे वे इसकी किसी-किसी व्याख्या पर जो भी करें।
उस प्रवचन के पहले शीर्षक के अंतर्गत जो कहा गया है, उस पर तुम्हें जो भी आपत्ति हो, उस पर विचार करने को मैं बहुत इच्छुक हूँ।
परन्तु मैं अब भी मानता हूँ कि सिद्धता पवित्रता, या मनुष्य में परमेश्वर के स्वरूप, का ही दूसरा नाम है।
मेरे विचार से 'परमेश्वर ने मनुष्य को सिद्ध बनाया' का अर्थ ठीक वही है जो 'उसने उसे पवित्र' या 'अपने ही स्वरूप में बनाया' का है।" — रचनाएँ, खंड vi, पृ. 535।
"जिस क्षण पापी धर्मी ठहराया जाता है, उसका हृदय कुछ अल्प मात्रा में शुद्ध किया जाता है; फिर भी जब तक वह प्रेम में सिद्ध नहीं किया जाता, तब तक उसका हृदय पूर्ण, यथार्थ अर्थ में शुद्ध नहीं होता।" — जर्नल,
1744, खंड v, पृ. 284
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
"मैंने हटन-रडबी की सोसाइटी से एक-एक करके बात की।
वे लगभग अस्सी थे; जिनमें से लगभग सत्तर विश्वासी थे, और सोलह (संभवतः) प्रेम में नवीकृत थे।"
— जर्नल, जून, 1761।
"हम लंदन लौटे।
रविवार, 29 को हमारी एक सुखद प्रेम-भोज सभा हुई, जिसमें कई लोगों ने उन आशीषों की गवाही दी जो उन्होंने हाल में पाई थीं।
हमें इसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं कि उन्हें किस नाम से पुकारें, जब तक वह बात स्वयं निर्विवाद है।
बहुत-से लोगों ने अनुभव किया है, और बहुत-से प्रतिदिन करते हैं, एक अकथनीय परिवर्तन।
जन्मजात पाप, विशेषकर अभिमान, क्रोध, स्वेच्छा और अविश्वास के विषय में गहराई से कायल होने के बाद, एक क्षण में वे सारा विश्वास और प्रेम अनुभव करते हैं; न अभिमान, न स्वेच्छा, न क्रोध।
और उसी क्षण से उनकी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति रहती है, वे सदा आनन्दित रहते, प्रार्थना करते और धन्यवाद देते हैं।"
— जर्नल, दिसंबर, 1761।
"मैं फिर उनसे मिला जो विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें कड़वाहट की जड़ से छुड़ा लिया है।
उनकी संख्या प्रतिदिन बढ़ती है।
मैं नहीं जानता कि इस सप्ताह पन्द्रह या सोलह लोगों ने यह आशीष नहीं पाई हो।" — जर्नल, 23 मार्च, 1761।
"सोमवार और मंगलवार मैं (लंदन में) कक्षाओं का दौरा करने में लगा रहा; और उनके बीच मुझे बड़ी सांत्वना मिली।
उन सबमें, जिन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह का स्वाद चखा था, अपने स्वरूप में पूर्ण नवीनीकरण के लिए ऐसी भूख और प्यास थी।" — जर्नल, अप्रैल, 1762।
"यहाँ मुझे कुछ ऐसे मिले जो बहुत समय से आग में परिश्रम कर रहे थे, और अपने आप को पवित्र बनाने के लिए कमर तोड़ रहे थे।
उन्हें एक उत्तम मार्ग दिखाने के लिए मैंने रोमियों 10:6, 7, 8 पर प्रचार किया।
— जर्नल, 23 जुलाई, 1762।
सन् 1762 के अंतिम दिन मिस्टर वेस्ली ने अपनी जर्नल में लिखा: "बहुतेरे पाप के कायल हुए हैं; बहुत-से लोगों ने परमेश्वर के साथ मेल पाया है, और केवल लंदन में
मेरा विश्वास है कि पूरे दो सौ लोग महिमामय स्वतंत्रता में लाए गए हैं।"
मसीही सिद्धता,
'बहुत-से पाप के कायल हुए, बहुत-से धर्मी ठहराए गए, और बहुत-से भटके हुए लोग चंगे किए गए।
परन्तु इस ऋतु का विशेष कार्य वह रहा है जिसे संत पौलुस 'पवित्र लोगों को सिद्ध करना' कहता है।'" —
जर्नल, 1763।
'प्रचार के कुछ ही देर बाद एक स्त्री मेरे पास आई जो विश्वास करती थी कि परमेश्वर ने अभी-अभी उसकी आत्मा को पूर्ण स्वतंत्रता दी है।" —जर्नल, जून
6, 1763।
"अगले सप्ताह मैंने सोसाइटी के हर सदस्य से बात की, और उनके बीच मुझे बहुत संतोष मिला।
उनमें से कई के विषय में सब उचित प्रमाण है कि उन्होंने परमेश्वर को अपना सारा हृदय दे दिया है।
बहुत-से अन्य पूर्ण उद्धार के लिए कराह रहे हैं; और बाकी सब बाहरी दोष से मुक्त हैं।
क्यों न हर मसीही समुदाय यहाँ तक पहुँच सके?" — जर्नल, जून, 1765।
"मैंने यहाँ (न्यूकासल में) लोगों को परमेश्वर के प्रति इतना जीवित शायद ही कभी देखा हो; विशेषकर उन्हें जो विश्वास करते हैं कि वे पाप से बचाए गए हैं।
मैं कहने को तैयार था, 'यहाँ रहना अच्छा है;' परन्तु मुझे तम्बू नहीं बनाने हैं।
मुझे पृथ्वी पर घुमंतू रहना है, और जब तक मेरी आत्मा परमेश्वर के पास न लौट जाए, मैं विश्राम नहीं चाहता।" —
जर्नल, अगस्त, 1765।
श्रीमती ई. बेनिस को पत्र, 1770:—"बाइबल के सीधे वृत्तांत के अनुसार पवित्रीकरण—हृदय और जीवन में शुद्ध प्रेम का राज्य करना—से अधिक स्पष्ट कुछ नहीं है।" — खंड vii, पृ. 53।
रेवरेंड जोसेफ बेन्सन को, 1770:—"परन्तु मेरे पास शब्दों के लिए झगड़ने में गँवाने को समय नहीं है, विशेषकर जहाँ वस्तु स्वीकार की जाती हो।
और तुम वह सारी बात मानते हो जिसके लिए मैं तर्क करता हूँ; पाप से पूर्ण छुटकारा, परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वरूप की पुनःप्राप्ति, अपने सारे हृदय, प्राण और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम करना।
और तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर तुम्हें यह देने में समर्थ है; हाँ, एक क्षण में देने में।
तुम भरोसा रखते हो कि वह देगा।
ओह, इसे भी दृढ़ता से थामे रहो;
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
इस धन्य आशा को, जिसे उसने तुम्हारे हृदय में उत्पन्न किया है!
और पूरे उत्साह और परिश्रम से भाइयों को स्थिर करो—1.
जो उन्होंने पाया है उसे थामे रहने में; अर्थात् लहू बहानेवाले प्रभु पर विश्वास के द्वारा अपने सब पापों की क्षमा।
2. एक दूसरे परिवर्तन की आशा रखने में, जिसके द्वारा वे सब पाप से बचाए जाएँगे और प्रेम में सिद्ध किए जाएँगे।
"यदि वे इसे 'पवित्र आत्मा पाना' कहना चाहें, तो कह सकते हैं; केवल इतना है कि उस अर्थ में यह वाक्यांश पवित्रशास्त्रीय नहीं है, और पूरी तरह उचित भी नहीं; क्योंकि उन सबने तो धर्मी ठहराए जाने के समय ही 'पवित्र आत्मा पाया' था।
तब परमेश्वर ने 'अपने पुत्र का आत्मा उनके हृदयों में भेजा, जो अब्बा, हे पिता कहकर पुकारता है।'" —
रचनाएँ, खंड vii, पृ. 71।
डब्ल्यू. चर्ची को, 1771:—"पूर्ण पवित्रीकरण, अर्थात् मसीही सिद्धता, न अधिक है न कम, शुद्ध प्रेम है; वह प्रेम जो पाप को निकालता है और परमेश्वर की सन्तान के हृदय और जीवन, दोनों पर शासन करता है।" — खंड vii, पृ. 82।
"बुधवार, 26, मैंने ग्रेंज में और भी अधिक जीवंत और बड़ी मंडली में प्रचार किया; परन्तु सबसे जीवंत मंडली मुझे डेरी-एन्विल में मिली।
इस छोटी सोसाइटी के छह-सात लोग अब भी परमेश्वर के शुद्ध प्रेम में आनन्दित हैं।
इस प्रकार परमेश्वर के अपने गुप्त जन हैं, देश के एक छोटे-से कोने में, जो दलदलों से घिरा है और सब मार्गों से दूर है।" — जर्नल, जुलाई, 1771।
"शनिवार को कुछ लोग मिस्टर हंटर के कमरे में मिले, जो पूर्ण पवित्रीकरण के प्यासे थे।
इसके लिए उन्होंने परमेश्वर से कुश्ती की, जब तक कि एक युवक ने आशीष न पा ली, जैसा तब से कई अन्य लोगों ने भी किया है।"
— जर्नल, जून, 1772।
मिस एच. ए. रो को, 1776:—"तुम्हारा रोग स्वाभाविक रूप से मन को उदास करता है, और भारीपन तथा निराशा उत्पन्न करता है।
क्या इस पर भी तुम 'सदा आनन्दित रह' सकती हो, और 'हर बात में धन्यवाद' दे सकती हो?
निश्चय ही पाप की जड़ के निकाले जाने से पहले भी विश्वासी
मसीही सिद्धता,
उसकी शक्ति से ऊपर जीवन बिता सकते हैं।
फिर भी पहले प्रेम और शुद्ध प्रेम में कितना अंतर है! यह तुम मिस्टर रो को अपने अनुभव से समझा सकती हो।
वह आगे बढ़ता रहे, और कितनी जल्दी वह इसे पा सकता है!" — रचनाएँ, खंड vii, पृ. 190।
"संध्या को मैंने ब्रैडफ़ोर्ड में प्रचार किया, जहाँ मुझे यह देखकर बहुत प्रसन्नता हुई कि बहुत-से स्त्री-पुरुष थे जिन्होंने प्रेम में सिद्ध किए जाने के बाद से कभी कोई ह्रास नहीं सहा था।" —
जर्नल, अप्रैल, 1780।
; मिस रिची को, 1782:—"वह बात, अर्थात् जन्मजात पाप से पूर्ण उद्धार, प्रचार या प्रार्थना में जब भी ज़ोर देकर कही जाए, लगभग सदा किसी विशेष आशीष के साथ ही कही जाती है।" — खंड vii, पृ. 181।
एफ. गैरेट्सन को, 1785:—"और जैसे ही उनमें से कोई परमेश्वर के साथ मेल पाए, अच्छा होगा कि उन्हें 'सिद्धता की ओर बढ़ते जाने' के लिए उभारा जाए।
तुम जितनी अधिक स्पष्टता और दृढ़ता से सब विश्वासियों पर ज़ोर दोगे कि वे पूर्ण पवित्रीकरण की अभिलाषा करें, जो सरल विश्वास से अभी प्राप्य है, उतना ही अधिक परमेश्वर का सारा कार्य सफल होगा।
— खण्ड 7, पृ. 184।
"पवित्रशास्त्र में शायद ही कोई ऐसा शब्द हो जिसने इससे अधिक ठोकर खिलाई हो — 'सिद्ध' शब्द को बहुत-से लोग सहन नहीं कर पाते।
इसकी ध्वनि ही उन्हें घृणित लगती है, और जो कोई सिद्धता का प्रचार करता है (जैसा कि इस वाक्यांश का प्रयोग होता है), अर्थात् यह कहता है कि इस जीवन में उसे प्राप्त किया जा सकता है, वह उनकी दृष्टि में अन्यजाति या चुंगी लेनेवाले से भी बुरा समझे जाने के बड़े जोखिम में रहता है।
"और इसीलिए कुछ लोगों ने सलाह दी है कि इन अभिव्यक्तियों का प्रयोग पूरी तरह छोड़ दिया जाए, 'क्योंकि इन्होंने इतनी ठोकर खिलाई है।'
परन्तु क्या ये परमेश्वर के वचनों में नहीं पाई जातीं?
यदि हाँ, तो परमेश्वर का कोई भी दूत किस अधिकार से इन्हें छोड़ सकता है, चाहे सब मनुष्य ठोकर ही क्यों न खाएँ? हमने मसीह को ऐसा नहीं सीखा, और न हमें इस प्रकार स्थान देना चाहिए
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
शैतान को।
परमेश्वर ने जो कुछ कहा है, वही हम कहेंगे, चाहे लोग सुनें या न सुनें; क्योंकि हम जानते हैं कि तभी मसीह का कोई भी सेवक 'सब मनुष्यों के लहू से निर्दोष' ठहर सकता है, जब उसने 'परमेश्वर की सारी मनसा बताने में कुछ भी उठा न रखा हो।'" — उपदेश, खण्ड 1, पृ. 355।
श्री वेस्ली ने इस कार्य और अनुग्रह को व्यक्त करने के लिए अनेक प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया।
जो शब्द दिए गए हैं, उनमें ये मिलते हैं:
"सिद्ध प्रेम," "महिमामय स्वतंत्रता," "परमेश्वर का सम्पूर्ण स्वरूप," "पूर्ण उद्धार," "परमेश्वर का शुद्ध प्रेम," "दूसरा परिवर्तन,"
"प्रेम में नया किया जाना,"
"पूर्ण पवित्रीकरण,"
"पवित्रता," "शुद्ध हृदय," "सम्पूर्ण उद्धार," "मसीही सिद्धता," "प्रेम में सिद्ध किया जाना," "पाप से बचाया जाना,"
"पाप की जड़ का निकाला जाना," "पवित्रीकरण," "उसके स्वरूप में पूर्ण नवीनीकरण," और "सब पापों से शुद्ध किया जाना।"
उन्होंने "प्रेम में नया किया जाना" शब्द का प्रयोग अन्य किसी भी शब्द से अधिक बार किया।
मसीही सिद्धता,
खण्ड V.
श्री वेस्ली ने "दूसरी आशीष" वाक्यांश का
अनुमोदन किया और प्रयोग भी।
श्रीमती क्रॉस्बी को, 1761: — "परमेश्वर का कार्य यहाँ (लंदन में) सामर्थ्य के साथ आगे बढ़ रहा है, पाप का बोध कराने में भी और मन फिराव में भी।
आज सुबह मैंने चार-पाँच ऐसे लोगों से बात की जो इसी महीने के भीतर स्वतंत्र किए गए प्रतीत होते हैं।
मेरा विश्वास है कि पाँच सप्ताह के भीतर एक क्लास में छह लोगों ने पापों की क्षमा पाई है, और एक बैंड में पाँच लोगों ने दूसरी आशीष पाई है।
आप सब पर शान्ति बनी रहे!" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 28।
"मैंने एस. एम. से कहा था कि वह मुझे बर्नार्ड कैसल में परमेश्वर के हाल के कार्य का कुछ और विवरण दे।
उसके उत्तर का एक भाग यह था: 'दस सप्ताह के भीतर, इस नगर में कम से कम बीस लोगों ने परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप पाया है, और अट्ठाईस ने परमेश्वर का शुद्ध प्रेम।
आज सुबह, आपके हमें छोड़ने से पहले, एक ने मेल-मिलाप पाया, और एक ने दूसरी आशीष।'" — दैनिक वृत्तान्त, जून, 1763।
कुमारी जेन हिल्टन को, 1766: — "क्या आप अब क्रोध, या अभिमान, या हठ, या शारीरिक मन के किसी अवशेष जैसा कुछ अनुभव करती हैं? क्या आपका दूसरा छुटकारा तब हुआ जब मैं बेवर्ली में था? उपदेश के समय, या उसके बाद? आपने मुझे नहीं बताया कि आपने वह परिवर्तन किस रीति से पाया, और क्या वह उसी क्षण से बिना किसी रुकावट के बना रहा है।
निश्चय ही
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
कभी कोई ह्रास होना आवश्यक नहीं है; यदि आप प्रार्थना में जागते रहेंगी तो कभी होगा भी नहीं।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 42।
कुमारी जेन हिल्टन को, 1774: — "यह नितान्त निश्चित है कि परमेश्वर ने आपको वह दूसरी आशीष दी थी, जो उचित रूप में इसी नाम की अधिकारी है।
उसने आपको कड़वाहट की जड़ से, जन्मजात पाप से भी और कर्मरूप पाप से भी, छुड़ाया।
और उस समय आप उसे अपना सारा हृदय देने, सदा आनन्दित रहने और निरन्तर प्रार्थना करने के योग्य बनाई गईं।
उसके बाद, उसने अपने कार्य को परखे जाने दिया; और कभी-कभी आग के समान।
कुछ समय तक आप विचलित नहीं हुईं; वरन् सब बातों में कह सकती थीं, 'प्रभु की इच्छा भली है।'
परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि आप धीरे-धीरे ढीली पड़ती गईं, यहाँ तक कि कुछ सीमा तक अपनी सामर्थ्य खो बैठीं।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 45।
टायरमैन कहता है: "सभी इस बात पर सहमत थे कि 'दूसरी आशीष', जैसा कि उस समय इसे कहा जाता था, केवल विश्वास के द्वारा प्राप्त की जा सकती है।" — टायरमैन, खण्ड 2, पृ. 422।
इन उद्धरणों में हमें "दूसरी आशीष," "दूसरा छुटकारा," और "दूसरा परिवर्तन" शब्द मिलते हैं, जिनका प्रयोग श्री वेस्ली ने पूर्ण पवित्रीकरण को व्यक्त करने के लिए किया, और जैसा कि वे कहते हैं, "उचित रूप में इसी नाम के अधिकारी" के रूप में।
मसीही सिद्धता,
खण्ड XVII.
पवित्रता का परमेश्वर के
सामान्य कार्य की उन्नति के साथ एकरूप होना।
"कॉर्नवॉल में विश्वासियों से मैं जितनी अधिक बातचीत करता हूँ, उतना ही अधिक मुझे विश्वास होता है कि मसीही सिद्धता के सिद्धान्त को स्पष्टता और दृढ़ता से न सुनने के कारण उन्हें बड़ी हानि उठानी पड़ी है।
मैं देखता हूँ, जहाँ कहीं ऐसा नहीं किया जाता, वहाँ विश्वासी मुरझा जाते और ठण्डे पड़ जाते हैं।
और इसे रोका नहीं जा सकता, सिवाय इसके कि उनमें प्रतिक्षण प्रेम में सिद्ध किए जाने की आशा बनाए रखी जाए।" — खण्ड 4, पृ. 137।
"जहाँ मसीही सिद्धता का दृढ़ और स्पष्ट प्रचार नहीं होता, वहाँ परमेश्वर की ओर से कोई उल्लेखनीय आशीष कम ही मिलती है; और फलस्वरूप सोसाइटी में थोड़ी ही वृद्धि होती है, और उसके सदस्यों में थोड़ा ही जीवन रहता है।
इसलिए यदि जेकब रोवेल कमज़ोर पड़ गया है और इसके विषय में बहुत कम कहता है, तो तुम उसकी सेवा की कमी को पूरा करो।
बोलो और संकोच मत करो।
किसी भी मनुष्य का लिहाज़ तुम्हें परमेश्वर के सत्य के साथ विश्वासघात करने की ओर न ले जाए।
जब तक तुम विश्वासियों से यह आग्रह नहीं करते कि वे अभी पूर्ण उद्धार की आशा रखें, तब तक किसी जागृति की अपेक्षा मत करो।" — खण्ड 6, पृ. 721।
"मुझे इसका स्पष्ट कारण मिल गया कि इस [लॉन्सेस्टन] सर्किट में पूरे वर्ष परमेश्वर के कार्य ने कोई प्रगति क्यों नहीं की।
प्रचारकों ने मेथोडिस्ट गवाही को छोड़ दिया था।
या तो वे सिद्धता के विषय में बिलकुल बोलते ही नहीं थे (वह विशेष सिद्धान्त जो हमारे भरोसे सौंपा गया है), या फिर वे उसके विषय में केवल सामान्य
शब्दों में बोलते थे, विश्वासियों से यह आग्रह किए बिना कि वे सिद्धता की ओर बढ़ते जाएँ और उसकी प्रत्येक क्षण अपेक्षा रखें।
और जहाँ कहीं ऐसा नहीं किया जाता, वहाँ परमेश्वर का कार्य नहीं फलता-फूलता।" — खण्ड 4, पृ. 459।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
"यहीं से पवित्रीकरण का वह महिमामय कार्य आरम्भ हुआ जो बीस वर्ष से लगभग ठहरा हुआ था।
परन्तु समय-समय पर वह फैलता गया; और जहाँ कहीं पवित्रीकरण का कार्य बढ़ा, वहाँ परमेश्वर का सारा कार्य अपनी सब शाखाओं में बढ़ा।"
— खण्ड 7, पृ. 576।
"मैंने देखा कि परमेश्वर का कार्य यहाँ (लंदन में) तेज़ी से बढ़ रहा है।
हर स्थान पर सभाएँ उससे बड़ी थीं जितनी कई वर्षों से रही थीं।
बहुतेरे दिन-प्रतिदिन पाप के विषय में कायल हो रहे थे। बहुतों ने परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप पाया। बहुत-से भटके हुए लोग चंगे किए गए, वरन् अवर्णनीय आनन्द से भर गए।
और बहुत-से विश्वासी ऐसे विश्राम में प्रवेश कर गए जिसकी कल्पना उनके हृदय में पहले कभी नहीं आई थी।" — दैनिक वृत्तान्त, अगस्त, 1761।
"रविवार, 11 — मैंने देखा कि परमेश्वर किंग्सवुड में अपने कार्य को पुनर्जीवित कर रहा है:
वह सोसाइटी, जो बहुत घट गई थी, अब फिर बढ़कर लगभग तीन सौ सदस्यों की हो गई है; जिनमें से अनेक अब पूर्ण छुटकारे के प्यासे हैं, जिसे वे कुछ वर्षों से लगभग भूल चुके थे।" — दैनिक वृत्तान्त, अक्टूबर, 1761।
"सोमवार, 30, और उसके बाद के दो दिन, मैंने ब्रिस्टल की सोसाइटी की जाँच की, और यह देखकर चकित हुआ कि पिछले अक्टूबर में मैं जितने सदस्य छोड़ गया था, उससे पचास कम हैं।
एक कारण यह है कि मसीही सिद्धता पर बहुत कम बल दिया गया है; और जहाँ कहीं ऐसा नहीं किया जाता, प्रचारक चाहे कितने ही वाक्पटु हों, श्रोताओं की संख्या में या अनुग्रह में बहुत कम वृद्धि होती है।"
— दैनिक वृत्तान्त, अक्टूबर, 1765।
रेवरेंड पीयर्ड डिकिन्सन को, 1767: — "जब परमेश्वर का कार्य इंग्लैंड और आयरलैंड के इतने अनेक भागों में बढ़ रहा है, तो यह आश्चर्य की बात होगी यदि लंदन में उसकी कोई वृद्धि न हो; विशेषकर तब, जब सब प्रचारक एक मन के हैं और एक ही बात कहते हैं।
बस यह न भूलें कि विश्वासियों से दृढ़ता और स्पष्टता से आग्रह करें कि वे "सिद्धता की ओर बढ़ते जाएँ।"
जब यह निरन्तर और गम्भीरता से किया जाता है, तो वचन सदा सामर्थ्य से सुसज्जित होता है।"
— रचनाएँ, खण्ड 7, पृ.
101।
मसीही सिद्धता,
"यहाँ (व्हिटबी में) मैंने सचमुच एक जीवन्त सोसाइटी पाई: उनकी जीवन्तता का मुख्य कारण यह था: — जो लोग प्रेम में नए किए गए थे (लगभग चालीस की संख्या में), वे आत्मा में उत्साही और परमेश्वर के लिए जोशीले बने रहकर शेष को जगाते थे, और अपने आस-पास सब के लिए आशीष थे।" — दैनिक वृत्तान्त, जून, 1772।
रेवरेंड जॉन मेसन को, 1774: — "यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जो संसार से प्रेम रखते हैं वे हमारे साथ बने रहना पसन्द नहीं करते।
हमारा मार्ग बहुत सकरा है।
'प्रकृति की धारा में बहते हुए, वे स्वर्ग का चौड़ा मार्ग ढूँढ़ते हैं।'
फिर भी, हम उसी भले पुराने मार्ग पर बने रहें; और हम जानते हैं कि वह अन्त में हमें शान्ति तक पहुँचाएगा।
यदि आप सब विश्वासियों से आग्रह करें कि वे सिद्धता की ओर बढ़ते जाएँ और प्रत्येक क्षण पाप से छुटकारे की आशा रखें, तो वे अनुग्रह में बढ़ेंगे।
परन्तु यदि कभी वे उस आशा को खो दें, तो वे फीके और ठण्डे पड़ जाएँगे।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 96।
"मैंने ब्रैडफ़ोर्ड में प्रचार किया, जहाँ सब लोग जीवन्त हैं।
यहाँ बहुतों ने हाल में उस महान उद्धार का अनुभव किया है, और उनके जोश ने सब के लिए आशीष का काम किया है।
वास्तव में, मैं सदा यही देखता हूँ — जहाँ कहीं पवित्रीकरण का कार्य फूट निकलता है, वहाँ परमेश्वर का सारा कार्य फलता-फूलता है।
कुछ लोग पाप के विषय में कायल होते हैं, कुछ धर्मी ठहराए जाते हैं, और सब उद्धार के लिए और अधिक गम्भीरता से जागृत हो जाते हैं।" — दैनिक वृत्तान्त, अग., 1775।
"मैं ऑटले गया, जहाँ परमेश्वर का वचन बिना रुकावट फैल रहा है और बहुत फल ला रहा है।
इसका मुख्य कारण उन लोगों की आत्मा और आचरण है जिन्हें परमेश्वर ने प्रेम में सिद्ध किया है।
उनका जोश बहुतों को जगाता है; और उनका स्थिर और एकसार चाल-चलन ऐसी भाषा बोलता है जिसका लगभग विरोध नहीं किया जा सकता।"
— दैनिक वृत्तान्त, अप्रैल, 1776।
"मैंने इंग्लैंड के किसी भी भाग में हाल में इतना जीवन्त कार्य नहीं पाया जितना यहाँ डार्लिंगटन में।
सोसाइटी निरन्तर बढ़ रही है, और परमेश्वर के लिए पूरी तरह प्रज्वलित प्रतीत होती है।
उनके बीच
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
नम्र, सरल प्रेम के सिवा कुछ नहीं है; न कोई विवाद, न किसी प्रकार की खटपट।
वे ठीक उस वर्णन के अनुरूप हैं जो डेविड ब्रेनर्ड ने अपनी इंडियन मण्डली का दिया है।
मैंने विशेष रूप से प्रचारकों और अगुवों दोनों से कहा कि वे उन पर विशेष ध्यान रखें, और यदि सम्भव हो तो शैतान या उसके दूतों को उनकी सरलता को विषैला करने से रोकें।
उनमें से बहुत-से अब भी जानते हैं कि 'यीशु मसीह का लहू' उन्हें 'सब पापों से शुद्ध करता है।'
— दैनिक वृत्तान्त, मई, eure [अस्पष्ट मूल पाठ] "जब श्री ब्रैकेनबरी ने पुराने मेथोडिस्ट सिद्धान्त का प्रचार किया, तो उनमें से एक ने कहा, 'आपको यहाँ ऐसा सिद्धान्त नहीं सुनाना चाहिए।
सिद्धता का सिद्धान्त एडिनबरा के अक्षांश के अनुकूल नहीं है।'
तो फिर, अन्य सब बाधाओं को एक ओर रखकर भी, क्या यह कोई आश्चर्य है कि यहाँ परमेश्वर का कार्य नहीं फला-फूला?" — दैनिक वृत्तान्त, 1779, खण्ड 4, पृ. 510।
"मैं लिन गया, जो लम्बे समय से एक ठण्डा और अप्रिय स्थान रहा है।
परन्तु अब दृश्य पूरी तरह बदल गया है।
दो युवा, उत्साही, सक्रिय प्रचारकों ने लोगों से दृढ़तापूर्वक आग्रह किया कि वे पूर्ण और तत्काल उद्धार की आशा रखें, और इससे सोसाइटी और मण्डली दोनों में जान आ गई है।" — दैनिक वृत्तान्त, अक्टू., 1785।
रेवरेंड जॉन ओगिल्वी को, 1785: — "जब तक आप स्वयं सब पाप से पूर्ण छुटकारे और परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वरूप में नवीनीकरण की उत्कट अभिलाषा रखते हैं, तब तक परमेश्वर आपके परिश्रम में आपको सफल करेगा; विशेषकर यदि आप सब विश्वासियों को निरन्तर और दृढ़ता से उपदेश दें कि वे केवल विश्वास के द्वारा अभी पूर्ण पवित्रीकरण की आशा रखें।
और भला करने में कभी थको मत: यदि हियाव न छोड़ोगे तो ठीक समय पर कटनी काटोगे!" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 147।
रेवरेंड जॉन बैक्सेंडेल को, 1785: — "आप मुझे विगन और उसके आस-पास परमेश्वर के कार्य का सुखद विवरण भेजते हैं।
वास्तव में, उसका कार्य हर
मसीही सिद्धता,
उस स्थान में फलेगा-फूलेगा जहाँ पूर्ण पवित्रीकरण का स्पष्ट और दृढ़ प्रचार किया जाता है।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 172।
रेवरेंड फ्रीबॉर्न गैरेट्सन को, 1785: — "उनमें से कोई भी आधे-अधूरे मसीही बनकर संतुष्ट न रहे।
वे जो कुछ भी करें, अपनी पूरी सामर्थ्य से करें; और अच्छा होगा कि जैसे ही उनमें से कोई परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप पाए, उसे 'सिद्धता की ओर बढ़ते जाने' का उपदेश दिया जाए।
आप जितनी अधिक स्पष्टता और दृढ़ता से सब विश्वासियों से आग्रह करेंगे कि वे पूर्ण पवित्रीकरण की अभिलाषा रखें, जो केवल विश्वास से अभी प्राप्य है, उतना ही अधिक परमेश्वर का सारा कार्य फलेगा-फूलेगा।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ.
12:
"शाम को हमारी एक प्रेम-भोज सभा हुई (सेंट मार्गरेट्स में), जिसमें बहुतों ने निश्छल भाव से गवाही दी कि परमेश्वर ने उनके प्राणों के लिए क्या किया है।
मैंने इस सोसाइटी को कई वर्षों से इतनी समृद्ध अवस्था में नहीं जाना।
इसका कारण निस्सन्देह, पहले, उस कठोर अनुशासन में है जो कुछ समय से उनके बीच रखा गया है, और फिर, विश्वासियों को दृढ़ता से और निरन्तर 'सिद्धता की ओर बढ़ते जाने' का उपदेश देने में।" —
दैनिक वृत्तान्त, 1786, खण्ड 4, पृ. 632।
"वेस्ली का जीवन और समय" के लेखक रेवरेंड एल. टायरमैन, ई. सी. एस्टेस, एस्क्वायर को लिखे एक पत्र में कहते हैं: "मेथोडिस्ट इतिहास से परिचित सभी लोग भली-भाँति जानते हैं कि मेथोडिज़्म सबसे अधिक तब फला-फूला है जब पूर्ण पवित्रीकरण का सिद्धान्त सबसे अधिक लोकप्रिय रहा है।"
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
खण्ड XVIII.
चुनिंदा सोसाइटियाँ उनके लिए थीं जो पूर्ण रूप से
पवित्र किए गए थे।
"मैंने देखा कि उन सब को कुछ सलाह देना उपयोगी हो सकता है जो परमेश्वर के मुख के प्रकाश में बने रहे, जिसकी उनके शेष भाइयों को आवश्यकता नहीं थी, और सम्भवतः वे उसे ग्रहण भी नहीं कर सकते थे।
इसलिए मैंने ऐसे थोड़े-से लोगों से, जो इस अवस्था में प्रतीत होते थे, कहा कि वे प्रत्येक सोमवार सुबह मेरे साथ एक घण्टा बिताएँ।
मेरा उद्देश्य केवल यह नहीं था कि उन्हें सिद्धता की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाऊँ; उनके प्रत्येक अनुग्रह का अभ्यास कराऊँ और उन्हें मिले हर वरदान को बढ़ाऊँ; और उन्हें एक-दूसरे से अधिक प्रेम करने और एक-दूसरे की अधिक सावधानी से चौकसी करने को प्रेरित करूँ; परन्तु यह भी कि मेरे पास एक चुना हुआ दल हो जिसके सामने मैं हर अवसर पर बिना कुछ छिपाए अपना हृदय खोल सकूँ; और जिसे मैं उनके सब भाइयों के सामने प्रेम, पवित्रता और भले कामों के आदर्श के रूप में रख सकूँ।"
— रचनाएँ, खण्ड 5, पृ. 184।
"बारह बजे मैं लगभग तीस लोगों से मिला (ल्यूशम में), जिन्होंने परमेश्वर के गहरे कार्य का अनुभव किया था; और मैंने उनसे प्रति सप्ताह मिलने के लिए एक घण्टा निश्चित किया।
चाहे वे पाप से बचाए गए हों या नहीं, वे निश्चय ही विश्वास और प्रेम से परिपूर्ण हैं, और मेरे प्राण के लिए विशेष रूप से सहायक हैं।" — दैनिक वृत्तान्त, मार्च,
1761।
"मैं चुनिंदा सोसाइटी से (वॉर्सेस्टर में) मिला।
परमेश्वर ने इनमें अपने कार्य को कितनी शीघ्रता से गहरा किया है!
मैंने ब्रिस्टल या लंदन में बहुत कम लोगों को देखा है जिनका अनुभव इनसे अधिक स्पष्ट हो। जिन सब की जाँच करने का मुझे समय मिला, उन्होंने जो विवरण दिया
मसीही सिद्धता,
वह पवित्रशास्त्र के अनुकूल और तर्कसंगत था।
और, मान लें कि उन्होंने सच कहा, तो वे उस सिद्धता के गवाह हैं जिसका मैं प्रचार करता हूँ।"
— दैनिक वृत्तान्त, मार्च, 1764।
श्रीमती मार्स्टन को, 1770: — "भारीपन आप कभी-कभी अनुभव कर सकती हैं; परन्तु आपको कभी अन्धकार में आने की आवश्यकता नहीं।
अन्धकार, अर्थात् अविश्वास, को विश्वास के प्रकाश से अच्छा समझने से सावधान रहें।
ऐसा समझना पोपवाद की घोर भूलों में से एक है।
हमारा प्रभु कहता है, 'जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा।'
आप हज़ार प्रकार से परखी जाती हैं, इससे आपको कोई हानि नहीं होगी।
इन सब बातों में आप जयवन्त से भी बढ़कर होंगी।
मुझे आशा है कि चुनिंदा सोसाइटी नियमित रूप से मिलती है, और आप एक-दूसरे से खुलकर बात करती हैं।
नम्रता और दृढ़ता से आगे बढ़ती जाएँ, अपने आप का इनकार करती हुई और अपना क्रूस उठाती हुई।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 125।
"पाँच बजे प्रचार करने के बाद मैं चुनिंदा सोसाइटी से मिला, जिन सब ने एक ही आशीष का स्वाद चखा प्रतीत होता है।"
— दैनिक वृत्तान्त, अप्रैल, 1764।
"मैं व्हिटबी में चुनिंदा सोसाइटी से मिला, जिसमें पैंसठ सदस्य थे।
मेरा विश्वास है कि ये सब पाप से बचाए गए थे, और इनमें से अधिकांश महिमामय स्वतंत्रता में चलते थे।
इनमें से बहुतों ने सराहनीय सरलता से बात की; और उनका वचन आग के समान था।
तुरन्त आग भड़क उठी, और हृदय से हृदय तक फैलती गई।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 388, 1770।
"मैं छह बजे चुनिंदा सोसाइटी से मिला (यॉर्क में), और यह जानकर प्रसन्नता हुई कि जिन्होंने महीनों या वर्षों से उस बड़ी आशीष को खो दिया था, उन्होंने उसे बहुत वृद्धि के साथ फिर पा लिया है।"
— दैनिक वृत्तान्त, जून, 1770।
"चुनिंदा सोसाइटी से मिलते हुए (विटनी में), मुझे यह देखकर बहुत सान्त्वना मिली कि उनमें से बहुत कम पीछे हटे हैं, और कहीं अधिक लोग अब भी गवाही देते हैं कि 'मसीह का लहू सब पापों से शुद्ध करता है।'" — दैनिक वृत्तान्त, अक्टू., 1775।
"मुझे इस प्रेमी जन-समुदाय के बीच (वॉर-
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
सेस्टर में) बहुत ताज़गी मिली; विशेषकर चुनिंदा सोसाइटी से, जिनमें से कहीं अधिक लोग गवाही दे सकते थे कि परमेश्वर ने उन्हें भीतरी पाप से भी और बाहरी पाप से भी बचाया है।" — दैनिक वृत्तान्त, मार्च, 1766।
"इसके बाद चुनिंदा सोसाइटी की जाँच करते हुए (हटन-रूडबी में) मुझे सुखद आश्चर्य हुआ।
उनमें से बहुत-से लगभग बीस वर्ष से उसके सदस्य रहे हैं।
और जब से उन्होंने परमेश्वर का शुद्ध प्रेम पाया है, तब से उनमें से एक ने भी उसे नहीं खोया।" — दैनिक वृत्तान्त, जून, 1779।
"मैं लीड्स आगे गया, और प्रचार के बाद चुनिंदा सोसाइटी से मिला, जिसमें लगभग साठ सदस्य थे; उनमें से अधिकांश गवाही दे सकते हैं कि 'यीशु मसीह का लहू सब पापों से शुद्ध करता है।'" — दैनिक वृत्तान्त, जुलाई, 1782।
"मैं चुनिंदा सोसाइटी से मिला (सेंट मैरी में); उनमें से अधिकांश स्पष्ट रूप से प्रेम में सिद्ध किए गए हैं।" — दैनिक वृत्तान्त, मार्च, 1786।
"मैंने चुनिंदा सोसाइटी के साथ (बर्मिंघम में) एक सुखद घण्टा बिताया।
उनमें से अधिकांश अब भी परमेश्वर के शुद्ध प्रेम का आनन्द लेते हैं, और शेष उसके लिए उत्कट लालसा रखते हैं।" — दैनिक वृत्तान्त,
मार्च, 1787।
"शाम को मैं दूसरी बार बैंडों से मिला (डब्लिन में)।
मैंने उनकी बहुत सराहना की।
वे लंदन या ब्रिस्टल के लोगों से अधिक खुले हैं; और मेरा विचार है कि यहाँ ऐसे लोगों की संख्या, जो अब स्पष्ट रूप से प्रेम में सिद्ध किए गए हैं, उससे अधिक है जितनी मैं अब स्वयं लंदन में पाता हूँ।"
— दैनिक वृत्तान्त, अप्रैल 1789।
श्री ई. लेउबी को, 1791: — "जो मनुष्य मसीही सिद्धता का सच्चा मित्र नहीं है, वह दूसरों को सरलता से उलझन में डाल देगा, और इस प्रकार किसी भी चुनिंदा सोसाइटी को, यदि नष्ट नहीं तो, कमज़ोर अवश्य कर देगा।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 258।
डॉ. स्टीवन्स अपने कलीसिया-इतिहास, खण्ड 1, पृ. 458 में कहते हैं: "श्री वेस्ली ने पश्चातापी और भटके हुए लोगों के लिए सभाएँ, और उन लोगों के लिए चुनिंदा सोसाइटियाँ स्थापित कीं जो
मसीही सिद्धता,
विशेष रूप से मसीही सिद्धता के विषय में रुचि रखते थे।"
श्री टायरमैन कहते हैं: "चुनिंदा सोसाइटियाँ बैंडों में से ली गई थीं, और उनमें वे लोग थे जो परमेश्वर के मुख के प्रकाश में चलते प्रतीत होते थे।"
— टायरमैन, खण्ड 1, पृ. 444।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
खण्ड XIX.
पूर्ण उद्धार खोया जा सकता है।
"जो पवित्र किए गए हैं, उनके लिए यह मानना एक आम बात है कि वे गिर नहीं सकते; वे अपने आप को परमेश्वर के मन्दिर में ऐसे खम्भे समझते हैं जो फिर बाहर न जाएँगे।
फिर भी हमने उनमें से कुछ सबसे दृढ़ लोगों को भी, कुछ समय बाद, अपनी स्थिरता से डिगते देखा है।
कभी अचानक, परन्तु अधिकतर धीरे-धीरे, वे परीक्षा के आगे झुक गए हैं; और अभिमान, या क्रोध, या मूर्खतापूर्ण अभिलाषाएँ उनके हृदय में फिर उभर आई हैं।
वरन् कभी-कभी उन्होंने परमेश्वर का जीवन बिलकुल खो दिया है, और पाप ने उन पर फिर अधिकार जमा लिया है।
"इनमें से कई, अपने पतन को भली-भाँति समझने और परमेश्वर के सामने गहरी लज्जा अनुभव करने के बाद, फिर प्रेम से भर गए हैं, और उसमें न केवल सिद्ध किए गए हैं, परन्तु दृढ़, सबल और स्थिर भी किए गए हैं।
उन्होंने वह आशीष, जो उनके पास पहले थी, बहुत वृद्धि के साथ पाई है।" — उपदेश, खण्ड 2, पृ. 247।
"इसके बाद मैंने उन लोगों के साथ एक घण्टा बिताया जो कभी मानते थे कि वे पाप से बचाए गए हैं (बर्नार्ड कैसल में)।
मैंने यहाँ भी, लंदन की तरह, लगभग एक तिहाई को पाया जिन्होंने अपना भरोसा दृढ़ता से थामे रखा।
शेष को कम या अधिक हानि हुई थी, और दो-तीन अपनी सारी सामर्थ्य खो बैठे थे।" — दैनिक वृत्तान्त,
1765।
"(मैनचेस्टर में) निकट जाँच करने पर, उन पचास से अधिक लोगों में से, जो दो-तीन वर्ष पहले परमेश्वर के प्रेम से
मसीही सिद्धता,
भरे हुए थे, मैंने एक तिहाई से अधिक को ऐसा नहीं पाया जिन्हें हानि न हुई हो।
परन्तु लगभग सभी अपनी हानि को गहराई से अनुभव करते थे, और जो कभी उनके पास था उसके लिए उत्कट आहें भरते थे।" — दैनिक वृत्तान्त, अप्रैल, 1766।
"यही उत्कटता मैंने मैक्सफ़ील्ड की मण्डली में देखी।
और फिर भी, जिनकी मैंने पहले जाँच की थी, उनमें से मुश्किल से एक तिहाई अब उस महिमामय स्वतंत्रता को बनाए रखते हैं जिसका आनन्द वे तब लेते थे।" — दैनिक वृत्तान्त, अप्रैल, 1766।
कुमारी जेन हिल्टन को, 1769: — "यह सुनकर मुझे आनन्द हुआ कि आप उस स्वतंत्रता में दृढ़ हैं जिसमें मसीह ने आपको स्वतंत्र किया है; और इसलिए और भी अधिक, क्योंकि यद्यपि बहुत-से लोग उस स्वर्गीय दान, अर्थात् जन्मजात पाप से छुटकारे, का स्वाद चखते हैं, फिर भी इतने कम, अत्यन्त कम, उसे एक वर्ष तक बनाए रखते हैं; दस में से मुश्किल से एक; वरन् तीस में से एक।
लंदन में सैकड़ों लोग सोलह या अठारह महीनों के भीतर उसके भागी बनाए गए; परन्तु मुझे सन्देह है कि उनमें से बीस भी अब उतने पवित्र और उतने सुखी हैं जितने वे थे।
और इसी कारण दूसरों को सन्देह हुआ है कि क्या परमेश्वर का अभिप्राय था कि वह उद्धार दीर्घकाल तक भोगा जाए।
कि बहुतों के पास वह कुछ समय के लिए होता है, यह वे मानते हैं; परन्तु उन्हें इस बात का निश्चय नहीं कि कोई उसे सदा बनाए रखता है।
क्या आप, कम से कम एक के रूप में, नहीं रखेंगी?
आप रखेंगी, यदि आप जागती और प्रार्थना करती रहें और उससे लिपटी रहें।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 43।
श्रीमती एलिज़ाबेथ बेनिस को, 1769: — "कुछ वर्ष पहले मैं यह सोचने की ओर झुका हुआ था कि जिसने एक बार परमेश्वर के शुद्ध प्रेम का आनन्द लिया और फिर उसे खो दिया, वह अनन्तकाल में कदम रखने के क्षण से पहले उसे फिर कभी पाने की आशा न करे।
परन्तु अनुभव ने हमें इससे अच्छी बातें सिखाई हैं: इस समय हमारे पास ऐसे लोगों के अनेक उदाहरण हैं जिन्होंने उस अवर्णनीय आशीष को त्याग दिया था, और अब उसका आनन्द पहले से कहीं अधिक मात्रा में लेते हैं।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 51।
कुमारी जेन हिल्टन को, 1770: — "दो बातें निश्चित हैं: एक यह कि परमेश्वर के शुद्ध प्रेम को भी
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
खो देना सम्भव है; दूसरी यह कि ऐसा होना आवश्यक नहीं है, अपरिहार्य नहीं है; वह खोया जा सकता है, परन्तु बनाए भी रखा जा सकता है।
तदनुसार, राज्य के हर भाग में हमारे कुछ ऐसे लोग हैं जो अपनी स्थिरता से कभी नहीं डिगे।
और इस क्षण से आपको कभी डिगने की आवश्यकता नहीं:
उसका अनुग्रह आपके लिए बहुत है।
परन्तु यदि आप स्थिर रहती हैं तो आपको बढ़ते भी रहना होगा; क्योंकि कोई भी एक ही जगह ठहरा नहीं रह सकता।"
— रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 48।
"यह सम्भव है कि जिन्होंने इस प्रकार कहा, उनमें से कुछ भूल में थे।
और यह निश्चित है कि कुछ ने उसे खो दिया जो उन्होंने तब पाया था।
कुछ ने (कुल संख्या की तुलना में बहुत थोड़ों ने) पहले उन्माद के आगे, फिर अभिमान के आगे, फिर पूर्वाग्रह और ठोकर के आगे हार मानी, और अन्त में अपने भाइयों से अलग हो गए।
परन्तु यद्यपि इसने मार्ग में एक भारी ठोकर का पत्थर रख दिया, फिर भी परमेश्वर का वचन आगे बढ़ता गया।
और वह आज तक अपनी किसी भी शाखा में नहीं रुका।
परमेश्वर अब भी कायल करता है, धर्मी ठहराता है, पवित्र करता है।
हमने केवल मैल खोया है, अर्थात् उन्माद, पूर्वाग्रह और ठोकर।
खरा सोना बना हुआ है, अर्थात् विश्वास, जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है, और हमारे पास विश्वास करने का आधार है कि वह प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।"
— दैनिक वृत्तान्त, दिस., 1763।
"मैं लिमरिक लौटा, परन्तु कड़े मौसम के कारण बाहर प्रचार न कर सका।
सोमवार, 10, सुबह के प्रचार के बाद, मैं चुनिंदा सोसाइटी से मिला।
इन सब ने कभी पाप से उद्धार का अनुभव किया था।
कुछ अब भी उसका आनन्द लेते हैं; परन्तु अधिकांश की सामर्थ्य कम या अधिक घट गई है; फिर भी वे उसे फिर पाने की आशा से रहित नहीं हैं।" — दैनिक वृत्तान्त, मई,
1773।
"मैं शेफ़ील्ड गया, और मंगलवार को चुनिंदा सोसाइटी से मिला।
परन्तु वह साठ से घटकर बीस रह गई थी; और इनमें से भी केवल आधे ने वह सब बनाए रखा था जो उन्होंने कभी पाया था!
कैसी गम्भीर भूल है यह सोचना कि जो पाप से बचाए गए हैं वे जो उन्होंने पाया है उसे खो नहीं सकते!
यदि वे न खोएँ तो यह एक चमत्कार है; क्योंकि सारी पृथ्वी और नरक उनके विरुद्ध क्रोधित हैं।" —
दैनिक वृत्तान्त, जुलाई, 1774।
मसीही सिद्धता,
"मैं चेस्टर लौटा, और बहुतों को परमेश्वर के प्रति जीवित पाया, परन्तु शायद ही कोई ऐसा मिला जिसने उसके शुद्ध प्रेम को बनाए रखा हो।"
— दैनिक वृत्तान्त, अप्रैल, 1780।
"यहाँ (लिमरिक में) लोग सदा स्नेहशील रहे हैं; परन्तु मैंने उन्हें कभी इतना स्नेहशील नहीं पाया जितना अब।
शाम को बाहर खड़े होने के लिए बहुत ठण्ड थी; इसलिए हमने जितने लोगों को हो सके उतने को प्रचार-भवन में ठूँस लिया।
मैंने इस पर प्रचार किया, 'तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय से प्रेम रखना।'
यहाँ बहुतों ने कभी इसका अनुभव किया था; परन्तु अब उसे बनाए रखनेवाले थोड़े ही हैं, यदि कोई हैं भी!" — दैनिक वृत्तान्त, मई, 1787।
एडम क्लार्क को, 1790: — "परमेश्वर के अनुग्रह को बनाए रखना उसे पाने से कहीं अधिक है; तीन में से मुश्किल से एक ऐसा करता है।
और यह उन सब से, जिन्होंने सिद्ध प्रेम का स्वाद चखा है, दृढ़ता और स्पष्टता से आग्रहपूर्वक कहा जाना चाहिए।
यदि हम यह प्रमाणित कर सकें कि हमारा कोई स्थानीय प्रचारक या अगुवा, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, इसके विरुद्ध बोलता है, तो वह आगे से स्थानीय प्रचारक या अगुवा न रहे।
मुझे सन्देह है कि उसे सोसाइटी में रहना भी चाहिए; क्योंकि जो हमारी मण्डली में इस प्रकार बोल सकता है, वह खरा मनुष्य नहीं हो सकता। पिछले सप्ताह
मुझे श्रीमती पॉसन (पूर्ण उद्धार की एक महिमामय गवाह) की एक उत्तम चिट्ठी मिली, जिसमें दिखाया गया था कि शुद्ध प्रेम में बढ़े बिना उसे बनाए रखना कितना असम्भव है।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 206।
"इस सप्ताह मैंने ब्रिस्टल की क्लासों का दौरा किया।
मुझे आश्चर्य है कि हमारी संख्या नहीं बढ़ती, जबकि बहुत-से कायल किए गए हैं, बहुत-से धर्मी ठहराए गए हैं, और कुछ प्रेम में सिद्ध किए गए हैं।
मैं संख्या में वृद्धि न होने का कारण आत्म-त्याग की कमी के सिवा और कुछ नहीं बता सकता।
इसके बिना, सचमुच, उनके पास और जो भी सहायताएँ हों, कोई भी विश्वासी आगे नहीं बढ़ सकता।" — दैनिक वृत्तान्त, मार्च, 1790।
"दोपहर के लगभग मैंने पॉट्टो में एक गहरी गम्भीर मण्डली के सामने प्रचार किया; और शाम को हटन-रूडबी में वैसी ही दूसरी मण्डली के सामने।
बीस वर्ष तक यह सोसाइटी गम्भीरता और गहरी भक्ति में सारे देहात के लिए आदर्श रही।
मेरा विचार है कि सत्र-
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
सत्रह उनमें से प्रेम में सिद्ध किए गए थे; परन्तु उनमें से केवल तीन रह गए हैं, और शेष में से अधिकांश या तो अन्यत्र चले गए हैं, या ठण्डे और मृत हो गए हैं।" — दैनिक वृत्तान्त, जून, 1790।
इन कथनों से स्पष्ट है कि श्री वेस्ली के समय में भी, हमारे समय की तरह, बहुत अस्थिरता थी, और बहुतों ने उस आशीष को खो दिया, और कलीसिया में यह कार्य कुछ स्थानों में और कुछ व्यक्तियों में रुक-रुककर होनेवाला था।
मसीही सिद्धता,
खण्ड XX.
सिद्ध प्रेम रखनेवालों को सलाह।
"मैंने उनसे, जो मानते थे कि वे पाप से बचाए गए हैं (सोलह या सत्रह की संख्या में), कहा कि दोपहर को मुझसे मिलें; और उन्हें मैंने ऐसी चेतावनियाँ और शिक्षाएँ दीं जिन्हें मैंने आवश्यक समझा।
और उनमें से किसी ने यह दावा नहीं किया कि वह मनुष्य की शिक्षा से ऊपर है, वरन् सब ने उसे पूरी कृतज्ञता से ग्रहण किया।" — दैनिक वृत्तान्त,
फर., 1760।
"दोपहर बाद मैंने उन कई लोगों से बात की जो विश्वास करते हैं कि वे पाप से बचाए गए हैं (लीड्स में); और निकट जाँच के बाद मुझे आशा रखने का कारण मिला कि उनमें से चौदह धोखे में नहीं थे।
शाम को मैंने 1 कुरिन्थियों की पत्री का तेरहवाँ अध्याय समझाया, और सब से आग्रह किया कि वे अपने आप को उस तराज़ू में तौलें और देखें कि कहीं वे 'घटी में तो नहीं पाए जाते।'" — दैनिक वृत्तान्त, अप्रैल, 1761।
सोसाइटी के एक सदस्य को, 1763: — "मसीही सिद्धता से सम्बन्धित सबसे सूक्ष्म बात वही है जिसके विषय में आप पूछती हैं।
इतना निश्चित है: जो अपने सारे हृदय से परमेश्वर से और सब मनुष्यों से अपने समान प्रेम करते हैं, वे पवित्रशास्त्र के अनुसार सिद्ध हैं।
और निश्चय ही ऐसे लोग हैं; नहीं तो परमेश्वर की प्रतिज्ञा मनुष्य की दुर्बलता का केवल उपहास होती।
इसे दृढ़ता से थामे रहें; परन्तु दूसरी ओर यह भी स्मरण रखें कि यह धन आपके पास मिट्टी के बरतन में है; आप मिट्टी के एक दीन, टूटे-फूटे घर में रहती हैं, जो अमर आत्मा को दबाए रखता है।
इसी कारण आपके सब विचार, वचन और कर्म इतने अपूर्ण हैं; उस स्तर तक पहुँचने से इतने दूर
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
(प्रेम की उस व्यवस्था तक, जिसे नाशमान देह न होती तो आपका प्राण सब बातों में पूरा करता) कि जब तक आप उसके पास न पहुँच जाएँ जिससे आप प्रेम करती हैं, आप भली-भाँति कह सकती हैं — 'प्रभु, प्रत्येक क्षण मुझे तेरी मृत्यु की योग्यता की आवश्यकता है।'"
— रचनाएँ, खण्ड 6, पृ. 767।
श्रीमती क्रॉस्बी को, 1765: — "परन्तु अब आप जो कुछ भी पाएँ, सावधान रहें कि जो आपने एक बार पाया था उसका इनकार न करें: मैं यह नहीं कहता कि 'ईश्वरीय निश्चय कि आप कभी पाप न करेंगी, या कोई आत्मिक हानि न उठाएँगी।'
मैं नहीं जानता कि आपने कभी यह पाया था।
परन्तु आप निश्चय ही पाप से बचाई गई थीं; और उतनी ही स्पष्टता से और उतनी ही ऊँची मात्रा में जितनी कभी सैली रायन थी।
और यदि इसमें आपको कोई हानि हुई है, तो विश्वास करें और चंगी हो जाएँ।
"आजकल का एक सामान्य प्रलोभन है, परमेश्वर ने जो किया उसका इनकार करना।
जिन से भी आप बात करें, उन सब को इससे बचाएँ: और इस कल्पना से भी कि बड़ा अनुग्रह बिना बड़ी चौकसी और आत्म-त्याग के बनाए रखा जा सकता है।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ.
28।
"मैं विचार कर रहा था कि ऐसा कैसे हुआ कि इतने लोग, जो कभी प्रेम से भरे थे, अब निर्बल और ढीले पड़ गए हैं।
और बात स्पष्ट है; परमेश्वर के व्यवहार का अटल नियम यह है: 'जिसके पास नहीं है, उससे वह भी ले लिया जाएगा जो उसके पास है।'
इसलिए यह असम्भव है कि कोई जो पाता है उसे बढ़ाए बिना बनाए रखे।
इसमें यह भी जोड़ें कि हमने जितना अधिक पाया है, उतनी ही अधिक सावधानी और परिश्रम की आवश्यकता है, उतनी ही अधिक चौकसी और प्रार्थना, और हर प्रकार के चाल-चलन में उतनी ही अधिक सतर्कता और गम्भीरता।
तो क्या आश्चर्य कि जो इसे भूल जाते हैं, वे जो पाया था उसे शीघ्र खो बैठते हैं? वरन् उन्हें सिखाया ही किसने कि इसे भूल जाओ? चौकसी न करो!
प्रार्थना न करो — इस बहाने से कि हम तो सदा प्रार्थना करते हैं!" — दैनिक वृत्तान्त, फर., 1760।
"जो अनुभव केवल आपने ही नहीं, वरन् बहुतों ने भी किया है, उससे
मसीही सिद्धता,
हम पाते हैं कि बहुधा एक प्रकार की जंगल जैसी अवस्था आती है, न केवल धर्मी ठहराए जाने के बाद, परन्तु पाप से छुटकारे के बाद भी; और मुझे सन्देह है कि उस अवस्था पर दिया गया उपदेश इस स्थिति में भी आपको प्रकाश न दे सके।
परन्तु इस अन्धकार या संकट का सबसे बारम्बार कारण, मेरा विश्वास है, बुरा तर्क-वितर्क है: इसी से जो अपना भरोसा छोड़ देते हैं, उनमें से चार में से तीन धीरे-धीरे ऐसा करने की ओर ले जाए जाते हैं।
और यदि यही कारण है, तो उस छुटकारे को फिर पाने का कोई उपाय है, सिवाय इसके कि आप अपना भरोसा फिर थाम लें?" — रचनाएँ, खण्ड 6, पृ. 767।
एक युवा शिष्य को, 1769: — "सिद्धता की अवस्था को बहुत ऊँचा ठहराना उसे संसार से निकाल देने का सबसे निश्चित उपाय है।
उस पाठ [test, सम्भवतः text] का सार, मेरा विश्वास है, मैंने देखा है; और मैं उसे मानवता के अनुकूल नहीं समझता; अर्थात् मानव प्राण की उस अवस्था के, जब तक वह नाशमान देह से जुड़ा है।
इन सूक्ष्म पूछताछों से अब अपने आप को और उलझन में न डालें; परन्तु अपने निर्णय को फिर स्थिर करने के लिए 'आगे के विचार' या 'मसीही सिद्धता का सरल वर्णन' को एक बार फिर मनन से पढ़ें।
जिसने बहुत पहले आपको अपने क्षमा करनेवाले प्रेम का स्वाद चखाया, उसी ने बाद में आपको अपने शुद्ध प्रेम का स्वाद चखाया।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 92।
श्रीमती रेवरेंड जॉन फ्लेचर को, 1770: — "यदि एक प्राण की अगुवाई दूसरे की अगुवाई से बहुत भिन्न हो, तो यह अचम्भे की बात नहीं।
वही आत्मा हर एक में कार्य करता है; फिर भी वह अपनी इच्छा के अनुसार अलग-अलग रीति से कार्य करता है।
हमारा कर्तव्य है कि हम अपने ही प्रकाश के अनुसार चलें; क्योंकि हमारा न्याय दूसरे के विवेक से नहीं होना है।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 61।
"सदा स्मरण रखें, मसीही पवित्रता का सार सरलता और शुद्धता है; एक ही उद्देश्य, एक ही अभिलाषा; परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण समर्पण।
परन्तु इसमें हज़ार श्रेणियाँ और भेद सम्भव हैं, और निश्चय ही हज़ार
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
प्रलोभनों से यह परखी जाएगी; परन्तु इन सब बातों में आप जयवन्त से भी बढ़कर होंगी।" — रचनाएँ, खण्ड 6, पृ. 774।
श्रीमती एलिज़ाबेथ बेनिस को, 1770: — "इस समय इंग्लैंड भर में हमारे बहुत-से लोग ठीक उसी अवस्था में हैं जिसका आपने वर्णन किया है।
वे कुछ समय पहले प्रेम में नए किए गए थे, और तब सदा आनन्दित रहते थे; परन्तु कुछ वर्षों, महीनों या सप्ताहों के बाद वे अपनी दृढ़ता से डिग गए; फिर भी इनमें से कई ने कुछ ही महीनों में वह सब पुनः पा लिया जो उन्होंने खोया था, और कुछ ने तो बढ़ोतरी के साथ पाया, और वे पहले से कहीं अधिक स्थिर हो गए; तो आपके साथ ऐसा क्यों न हो ?" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 51।
"यह सच है कि हम अपने आनन्द के माप से अपना आकलन नहीं कर सकते; यह हमारी सब अनुभूतियों में सबसे अधिक बदलने वाली है, और प्रायः बहुत हद तक हमारे रक्त और प्राणों की दशा पर निर्भर करती है।
परन्तु यदि आप प्रेम, आनन्द, शान्ति, नम्रता, कोमलता और समर्पण को एक साथ लें, तो परमेश्वर की ओर आपकी दशा को परखने का इससे अधिक निश्चित कोई नियम मैं नहीं जानता।" — रचनाएँ, खण्ड 6, पृ. 773।
कुमारी मेरी स्टोक्स को, 1771: — "क्या मैं आपको कुछ सलाहें दूँ?
1. जो परमेश्वर ने आपको दिया है उसे सुरक्षित रखिए; जो भी आशीष आपने पाई है उसे कभी हाथ से न जाने दीजिए।
उन किसी की न सुनिए जो आपसे कहते हैं, 'आपको इसे खोना ही पड़ेगा।'
नहीं; आपके पास आनन्द कम या अधिक हो सकता है।
यह हज़ारों परिस्थितियों पर निर्भर करता है; परन्तु प्रेम का एक अंश भी आपको कभी खोने की आवश्यकता नहीं।
2. यदि आप परमेश्वर के नाना प्रकार के वरदानों की सावधान भण्डारी हैं, तो आप कभी नहीं खोएँगी।
'जिसके पास है'
(अर्थात् जो अपने पास की वस्तु का उपयोग करता है), 'उसे दिया जाएगा' और भी, और अधिकाई से।
इसलिए, 3. अपने हर अनुग्रह का उपयोग कीजिए।
परमेश्वर के उस वरदान को जो आप में है प्रज्वलित कीजिए।
अपनी सामर्थ्य के अनुसार उत्साही और सक्रिय रहिए।
जहाँ कहीं भी हों, परमेश्वर के लिए बोलिए।
परन्तु साथ ही, 4. दीन बने रहिए!
आप में वही मन हो जो मसीह यीशु में था।
सम्पूर्ण
मसीही सिद्धता,
दीनता की आत्मा के लिए प्रार्थना कीजिए, ताकि आप सदा यह अनुभव करें कि आप कुछ भी नहीं हैं, और इन शब्दों को अनुभव करें, 'सारा सामर्थ्य, सारी महिमा, सारी स्तुति, सारा गौरव मेरे प्रभु मसीह का हो!'"
— रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 140।
"जब तक हम मिट्टी के घर में रहते हैं, वह मन को प्रभावित करने के योग्य है; कभी बुद्धि को सुस्त या धुंधला करके, और कभी अधिक सीधे आत्मा को दबाकर और उदास करके तथा उसे संकट और भारीपन में डुबोकर।
इस दशा में किसी न किसी प्रकार का सन्देह या भय स्वाभाविक रूप से उठेगा।
और इस संसार का सरदार, जो भली-भाँति जानता है कि हम किस वस्तु से बने हैं, उस हृदय को, जिसे परमेश्वर ने सब अधर्म से शुद्ध किया है, अशुद्ध न कर सकने पर भी, उसे व्याकुल करने के लिए अवसर का लाभ उठाने से नहीं चूकेगा।" — रचनाएँ, खण्ड 6, पृ. 776।
कुमारी बोल्टन को, 1771: — "अन्ततः मैंने एक घण्टा निकाल लिया है कि जो सलाहें मैंने आपको पहले दी थीं उन्हें लिखकर दोहराऊँ।
1. जो परमेश्वर ने आपको दिया है उसे सुरक्षित रखिए: जो भी आशीष आपने पाई है उसे कभी हाथ से न जाने दीजिए।
उन किसी की न सुनिए जो आपसे कहते हैं, 'आपको इसे खोना ही पड़ेगा।'
नहीं; प्रेम का एक अंश भी आपको कभी खोने की आवश्यकता नहीं।
2. आप कभी नहीं खोएँगी, बशर्ते आप परमेश्वर के नाना प्रकार के वरदानों की सावधान भण्डारी हों।
जिसके पास है, अर्थात् जो अपने पास की वस्तु का उपयोग करता है, उसे दिया जाएगा और भी, और अधिकाई से।
इसलिए, 3. अपने हर अनुग्रह का उपयोग कीजिए।
परमेश्वर के उस वरदान को जो आप में है प्रज्वलित कीजिए।
उत्साही बनिए!
सक्रिय बनिए!
किसी को न छोड़िए।
जहाँ कहीं भी हों, परमेश्वर के लिए बोलिए।
परन्तु साथ ही, 4. दीन बनिए: आप में वही मन हो जो मसीह यीशु में था।
और दीनता का वस्त्र पहन लीजिए।
प्रार्थना कीजिए कि आप सदा अनुभव करें कि आप कुछ भी नहीं, बल्कि कुछ भी नहीं से भी कम और व्यर्थ हैं।
इसी आत्मा में हर बात कहिए और कीजिए, और सारी महिमा उसे दीजिए जो विश्वास के द्वारा आपके हृदय में जीवित है और राज्य करता है।"
— रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 114।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
श्रीमती एलिज़ाबेथ बेनिस को, 1774: — "परमेश्वर को स्थिर और एकसमान रूप से समर्पित इच्छा पवित्रीकरण की दशा के लिए अनिवार्य है; परन्तु आनन्द, या शान्ति, या परमेश्वर के साथ सुखद संगति की एकरूपता अनिवार्य नहीं।
ये भिन्न-भिन्न मात्राओं में घट-बढ़ सकते हैं; बल्कि ये शरीर से या शैतानी प्रभाव से भी ऐसे ढंग से प्रभावित हो सकते हैं जिसे हमारी सारी बुद्धि न समझ सकती है, न रोक सकती है।
भटकते विचारों के विषय में, आप 'भटकते विचार' नामक उपदेश पर विचार करें तो बहुत अच्छा करेंगी।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 58।
मसीही सिद्धता,
खण्ड 21।
मोरावियाई मत के विषय में श्री वेस्ली के विचार।
"मोरावियाई सिद्धान्त और हमारे सिद्धान्त के बीच (इस विषय में) अन्तर यह है: — वे मानते और सिखाते हैं, — "1. कि मसीह ने समस्त मानव जाति के उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था वह सब कर दिया है।
"2. कि इसलिए हमें उद्धार के लिए आवश्यक समझकर कुछ भी नहीं करना है, केवल उस पर विश्वास करना है।
"3. कि अब केवल एक ही कर्तव्य है, केवल एक ही आज्ञा है, अर्थात् मसीह पर विश्वास करना।
"4. कि मसीह ने अन्य सब आज्ञाएँ और कर्तव्य हटा दिए हैं, क्योंकि उसने 'व्यवस्था को पूरी तरह रद्द कर दिया है'; कि इसलिए विश्वासी 'व्यवस्था से स्वतन्त्र' है, और उसे उसके द्वारा कुछ करने या न करने के लिए बाध्य नहीं होना है; क्योंकि आज्ञा मानकर कुछ भी करना उसकी स्वतन्त्रता के विपरीत है।
"5. कि हम धर्मी ठहराए जाने के क्षण ही पूरी तरह पवित्र किए जाते हैं, और अपनी मृत्यु के दिन तक न अधिक पवित्र होते हैं, न कम; पूर्ण पवित्रीकरण और पूर्ण धर्मी ठहराया जाना एक ही क्षण में होते हैं।
"6. कि विश्वासी अपने आप में कभी पवित्र या पवित्र जन नहीं होता, केवल मसीह में होता है; उसमें अपनी कोई पवित्रता है ही नहीं, उसकी सारी पवित्रता आरोपित है, अन्तर्निहित नहीं।
"7. कि यदि कोई मनुष्य प्रार्थना, या पवित्रशास्त्र की खोज, या प्रभु-भोज में सहभागी होने को कर्तव्य मानता है; यदि वह स्वयं को इन कामों के लिए बाध्य समझता है, या उन्हें न करने पर व्यथित होता है
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
तो वह बन्धन में है; उसमें कोई विश्वास है ही नहीं, परन्तु वह व्यवस्था के कामों से उद्धार खोज रहा है।"
हम मानते हैं कि इनमें से पहला प्रस्ताव अस्पष्ट है, और शेष सब पूर्णतः मिथ्या हैं।
"1. मसीह ने समस्त मानव जाति के उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था वह सब कर दिया है।"
यह अस्पष्ट है। मसीह ने समस्त मानव जाति के पूर्ण उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था वह सब नहीं किया है।
क्योंकि मसीह ने जो कुछ किया है उसके होते हुए भी, जो विश्वास नहीं करता वह दोषी ठहराया जाएगा।
परन्तु उसने समस्त मानव जाति के सशर्त उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था वह सब कर दिया है; अर्थात् यदि वे विश्वास करें; क्योंकि उसकी योग्यताओं के द्वारा वे सब जो अन्त तक उस विश्वास के साथ विश्वास करते हैं जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है, उद्धार पाएँगे।
"3. अब केवल एक ही कर्तव्य है, केवल एक ही आज्ञा है, अर्थात् मसीह पर विश्वास करना।"
नए नियम का लगभग हर पृष्ठ इस कथन की असत्यता को प्रमाणित करता है।
"4. मसीह ने अन्य सब आज्ञाएँ और कर्तव्य हटा दिए हैं, क्योंकि उसने व्यवस्था को पूरी तरह रद्द कर दिया है।"
यह उसकी अपनी गम्भीर घोषणा के कितना सर्वथा विपरीत है!
— "यह न समझो कि मैं व्यवस्था या भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूँ।
मैं लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ। जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी कभी न टलेगा।"
"इसलिए विश्वासी व्यवस्था से स्वतन्त्र है।"
कि वह "व्यवस्था के शाप से स्वतन्त्र" है, यह हम जानते हैं; और कि वह "पाप और मृत्यु की व्यवस्था" या सामर्थ्य से "स्वतन्त्र" है: परन्तु यह कहाँ लिखा है कि वह परमेश्वर की व्यवस्था से स्वतन्त्र है?
"उसे उसके द्वारा कुछ करने या न करने के लिए बाध्य नहीं होना है, क्योंकि आज्ञा मानकर कुछ भी करना उसकी स्वतन्त्रता के विपरीत है।"
तो आपकी स्वतन्त्रता परमेश्वर की अवज्ञा करने की स्वतन्त्रता है; जबकि हमारी स्वतन्त्रता सब बातों में उसकी आज्ञा मानने की स्वतन्त्रता है: इतनी घोर बात है कि जहाँ हम
"व्यवस्था को स्थिर करते हैं," वहाँ आप "विश्वास के द्वारा व्यवस्था को व्यर्थ ठहराते हैं!"
मसीही सिद्धता,
"5. हम धर्मी ठहराए जाने के क्षण ही पूरी तरह पवित्र किए जाते हैं, और अपनी मृत्यु के दिन तक न अधिक पवित्र होते हैं, न कम; पूर्ण पवित्रीकरण और पूर्ण धर्मी ठहराया जाना एक ही क्षण में होते हैं।"
परमेश्वर के वचन के भाव से भी और उसकी सन्तानों के अनुभव से भी ठीक इसके विपरीत प्रकट होता है।
"6. विश्वासी अपने आप में कभी पवित्र या पवित्र जन नहीं होता, केवल मसीह में होता है; उसमें अपनी कोई पवित्रता है ही नहीं; उसकी सारी पवित्रता आरोपित है, अन्तर्निहित नहीं।"
पवित्रशास्त्र की पवित्रता परमेश्वर का स्वरूप है; वह मन जो मसीह में था; परमेश्वर और मनुष्य का प्रेम; दीनता, कोमलता, संयम, धैर्य, पवित्रता।
और क्या आप शान्ति से यह कहते हैं कि यह विश्वासी पर केवल आरोपित है, और उसमें इस पवित्रता में से कुछ भी नहीं है?
क्या संयम केवल उसी पर आरोपित होता है जो अब भी पियक्कड़ है; या पवित्रता उस स्त्री पर जो व्यभिचार में लगी रहती है?
नहीं, विश्वासी वास्तव में पवित्र और संयमी होता है।
और यदि ऐसा है, तो वह इतना तो अपने आप में पवित्र है।
क्या विश्वासी परमेश्वर से प्रेम करता है, या नहीं?
यदि करता है, तो उसमें परमेश्वर का प्रेम है।
क्या वह दीन, या नम्र, या धैर्यवान है भी?
यदि है, तो ये स्वभाव उसमें अपने आप में हैं: और यदि वे उसमें अपने आप में नहीं हैं, तो वह न दीन है, न नम्र, न धैर्यवान।
इसलिए आप इनकार नहीं कर सकते कि हर विश्वासी में पवित्रता है, यद्यपि अपने आप से नहीं; अन्यथा आप इनकार करते हैं कि वह पवित्र है ही; और यदि ऐसा है, तो वह प्रभु को नहीं देख सकता।
और वास्तव में, यदि सामान्य रूप से पवित्रता वही मन है जो मसीह में था, तो "विश्वासी अपने आप में पवित्र नहीं, केवल मसीह में है" कहने से कोई क्या अर्थ ले सकता है? कि जो मन मसीह में था वह विश्वासी में भी है; परन्तु वह उसमें है, — अपने आप में नहीं, परन्तु मसीह में!"
यह स्पष्ट आत्म-विरोधों का कैसा ढेर है, यह कैसी अर्थहीन बकवास है! — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 22।
रेवरेण्ड जोसेफ बेन्सन को, 1770: — "आप ठीक कहते हैं; सिद्ध प्रेम और मसीही स्वतन्त्रता
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
बिलकुल एक ही बात हैं; और ये दोनों अभिव्यक्तियाँ समान रूप से उचित हैं, क्योंकि समान रूप से पवित्रशास्त्रीय हैं।
'भला, वे और आप एक ही बात का अर्थ कैसे ले सकते हैं?
'वे कहते हैं, आप सृजे हुए प्राणी में पवित्रता, अच्छे स्वभावों, और नष्ट किए गए पाप पर ज़ोर देते हैं।"
निश्चय ही।
और मसीही स्वतन्त्रता पवित्रता का दूसरा नाम नहीं तो और क्या है?
और यदि यह स्वतन्त्रता या पवित्रता सृजे हुए प्राणी में नहीं है, तो कहाँ है?
पवित्रता परमेश्वर और मनुष्य का प्रेम है, या वह मन जो मसीह में था।
अब, मुझे विश्वास है कि परमेश्वर का प्रेम उस पवित्र आत्मा के द्वारा जो आपको दिया गया है, आपके हृदय में उंडेला गया है।
और यदि आप पवित्र हैं, तो क्या आप में वह मन नहीं है जो मसीह यीशु में भी था?" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 68।
"मैं स्वयं इसका ('मसीह की धार्मिकता' का) प्रयोग करने में और भी संकोच करता हूँ क्योंकि इसका इतनी बार और इतने भयानक ढंग से दुरुपयोग किया गया है; और क्योंकि आज भी नियमविरोधी इसका उपयोग घोर घृणित कार्यों को उचित ठहराने के लिए करते हैं।
और यह बड़े खेद की बात है कि जो लोग पवित्रता से प्रेम करते हैं, उसका प्रचार करते हैं और उसके पीछे चलते हैं, वे मसीह का आदर करने की धारणा के अधीन, उन लोगों का किसी भी प्रकार से समर्थन करें जो निरन्तर उसे
'पाप का सेवक' बनाते हैं, और उसकी धार्मिकता पर इस प्रकार आधार रखते हैं कि ऐसी अभक्ति और अधर्म में जीते हैं जिसका नाम अन्यजातियों में भी मुश्किल से लिया जाता है।" — रचनाएँ, खण्ड 6, पृ. 102।
"परन्तु तब हम इसका उस अंश से मेल कैसे बैठाएँ जो (प्रकाशितवाक्य के) सातवें अध्याय में है, 'उन्होंने अपने वस्त्र मेम्ने के लहू में धोकर श्वेत किए हैं'?
क्या वे कहेंगे कि मसीह की धार्मिकता मसीह के लहू में धोई गई और श्वेत की गई?
ऐसी नियमविरोधी बकवास दूर हो।
क्या सीधा अर्थ यह नहीं है: कि सन्तों की धार्मिकता का मूल्य और परमेश्वर के यहाँ उसकी ग्राह्यता उसी प्रायश्चित्त करने वाले लहू से आती है? ... मसीह की धार्मिकता के बिना हमारा महिमा पर कोई अधिकार नहीं होता; पवित्रता के बिना हम उसके योग्य नहीं होते।
पहली के द्वारा हम मसीह के अंग, परमेश्वर की सन्तान,
मसीही सिद्धता,
और स्वर्ग के राज्य के उत्तराधिकारी बनते हैं।
दूसरी के द्वारा, 'हम ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास के भागी होने के योग्य बनाए जाते हैं।'" — उपदेश, खण्ड 2, पृ. 457।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
खण्ड 22।
श्री वेस्ली के दिनों में इस कार्य का विस्तार।
"यहाँ मैं खड़ा होकर हाल की घटनाओं को पीछे मुड़कर देखने लगा।
थॉमस वॉल्श के इंग्लैंड छोड़ने से पहले, परमेश्वर ने वह महान कार्य आरम्भ किया जो तब से बिना किसी उल्लेखनीय रुकावट के चलता आ रहा है।
इस पूरे समय में बहुतों को पाप का कायल किया गया, बहुत धर्मी ठहराए गए, और बहुत-से पतित जन चंगे किए गए।
परन्तु इस काल का विशेष कार्य वह रहा है जिसे सन्त पौलुस 'पवित्र लोगों की सिद्धता' कहता है।
लंदन, ब्रिस्टल, यॉर्क और इंग्लैंड तथा आयरलैंड के विभिन्न भागों में बहुत-से लोगों ने ऐसे गहरे और सर्वांगीण परिवर्तन का अनुभव किया है जिसकी कल्पना भी पहले उनके हृदय में नहीं आई थी।
अन्तर्निहित पाप के गहरे बोध के बाद, परमेश्वर से अपने पूर्ण पतन के बोध के बाद, वे विश्वास और प्रेम से ऐसे भर गए (और प्रायः एक क्षण में) कि पाप लुप्त हो गया, और उन्होंने उस समय से अपने में न अभिमान पाया, न क्रोध, न लालसा, न अविश्वास।
वे सदा आनन्दित रह सके, निरन्तर प्रार्थना कर सके, और हर बात में धन्यवाद दे सके।
अब, चाहे हम इसे पाप का नाश कहें या उसका निलम्बन, यह परमेश्वर का एक महिमामय कार्य है।
ऐसा कार्य जो, उसकी गहराई और विस्तार दोनों को देखते हुए, हमने इन राज्यों में पहले कभी नहीं देखा। ... अगली संध्या वे फिर मिले; और प्रभु टूटे मनवालों को चंगा करने के लिए फिर उपस्थित था।
एक को पापों की क्षमा मिली; और तीन और लोगों ने विश्वास किया कि परमेश्वर ने उन्हें सब पाप से शुद्ध कर दिया है।
और ध्यान देने योग्य बात है कि ये सब ग़रीब, अनपढ़ प्राणी हैं, जो सबसे अधिक
log [अस्पष्ट मूल पाठ]
मसीही सिद्धता,
दिखावा करने में असमर्थ और ऐसा प्रयास करने की सबसे कम सम्भावना वाले हैं।" — दैनिकी, मार्च, 1760।
"यहीं (ओटली में) पवित्रीकरण का वह महिमामय कार्य आरम्भ हुआ जो बीस वर्षों से लगभग ठहरा हुआ था; परन्तु अब समय-समय पर फैलता गया, पहले यॉर्कशायर के विभिन्न भागों में, फिर लंदन में, फिर इंग्लैंड के अधिकांश भागों में, फिर डबलिन, लिमरिक और आयरलैंड के समस्त दक्षिण-पश्चिम में। और जहाँ-जहाँ पवित्रीकरण का कार्य बढ़ा, वहाँ-वहाँ परमेश्वर का सारा कार्य अपनी सब शाखाओं में बढ़ा।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 376।
"मैं फिर उन लोगों से मिला जो विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें कड़वाहट की जड़ से छुड़ा दिया है।
उनकी संख्या प्रतिदिन बढ़ती जाती है।
मैं नहीं जानता कि इस सप्ताह पन्द्रह या सोलह लोगों ने यह आशीष पाई है या नहीं।" — दैनिकी, मार्च, 1761।
"वेडन्सबरी में कई लोगों से बात करके मैंने पाया कि परमेश्वर यहाँ भी अपना कार्य वैसे ही कर रहा है जैसे लंदन में।
हमें आशा करने का आधार है कि शनिवार प्रातः के उपदेश के दौरान एक बन्दी पूरी तरह स्वतन्त्र किया गया; और एक और शनिवार संध्या के उपदेश के दौरान।
रविवार को एक या अधिक ने पापों की क्षमा पाई; सोमवार प्रातः एक और ने, और बुधवार को एक और ने विश्वास किया कि यीशु मसीह के लहू ने उसे सब पाप से शुद्ध कर दिया है।
संध्या को मैं यह सोचे बिना न रह सका कि एक से अधिक ने उसे यह कहते सुना, "मैं चाहता हूँ; तू शुद्ध हो जा!"
वास्तव में, आधी रात तक वह इतने अद्भुत रूप से उपस्थित था, मानो वह पूरी मण्डली को चंगा कर देना चाहता हो।" —
दैनिकी, मार्च, 1761।
"मैं घोड़े पर चेस्टर तक गया।
सोसाइटी पहले कभी ऐसी दशा में न थी।
उनके झगड़े और विवाद समाप्त हो चुके थे; और मैंने उनमें शान्ति और प्रेम के सिवा कुछ न पाया।
उनमें से लगभग बारह ने विश्वास किया कि वे पाप से बचाए गए हैं; और उनके जीवन उनके दावे का खण्डन नहीं करते थे।
शेष में से अधिकांश परमेश्वर के लिए तीव्रता से प्यासे थे, और निरन्तर उसकी बाट जोह रहे थे।" — दैनिकी, अगस्त, 1762।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
"लिमरिक में एक महिमामय कार्य चल रहा है।
बारह या चौदह को नए किए जाने का स्पष्ट बोध है; इस सप्ताह कई धर्मी ठहराए गए हैं; और रविवार की रात, सोसाइटी की सभा में ऐसी पुकार उठी जैसी मैंने शायद ही कभी सुनी हो।"
— दैनिकी, जुलाई, 1762।
"यहाँ (डबलिन में) का कार्य ऐसा है जैसा देखने की मैंने कभी अपेक्षा नहीं की थी।
लगभग प्रतिदिन कुछ लोग धर्मी ठहराए जाते हैं या पवित्र किए जाते हैं।
इस सप्ताह तीन या चार धर्मी ठहराए गए, और उतने ही, यदि अधिक नहीं, प्रेम में नए किए गए।
सब लोग आग से भरे हैं।
पिछले रविवार जैसा दिन मैंने कभी नहीं देखा।
जब मैं सोसाइटी में प्रार्थना कर रहा था, तब प्रभु की सामर्थ्य हम पर छा गई, और कुछ पुकार उठे, 'प्रभु, मैं विश्वास कर सकता हूँ!'"
"और इन ढाई दिनों में चार जनों ने परमेश्वर की क्षमाशील दया के बोध के लिए धन्यवाद दिया; और सात ने
(जिनमें एक माँ और उसकी बेटी थीं), प्रेम में सिद्ध किए जाने के लिए।"
"और अधिक जाँच करने पर मैंने डबलिन में तैंतालीस या चवालीस लोगों को पाया, जो परमेश्वर के शुद्ध प्रेम का आनन्द लेते प्रतीत होते थे।
इनमें से कम से कम चालीस चार महीनों के भीतर स्वतन्त्र किए गए थे।
कुछ अन्य, जिन्होंने वही आशीष पाई थी, नगर से बाहर चले गए थे।
उतनों ने, या उससे अधिक ने, पापों की क्षमा पाई थी।
प्रभु का हाथ अब भी छोटा नहीं हुआ था।
वह अब भी पहले जैसी ही तेज़ी से कार्य कर रहा था।"
"परमेश्वर का कार्य प्रतिदिन बढ़ रहा है।
शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब कुछ लोग धर्मी न ठहराए जाते हों, या पवित्र न किए जाते हों, या दोनों।
बृहस्पतिवार को तीन जन आए और मुझे बताया कि यीशु मसीह के लहू ने उन्हें सब पाप से शुद्ध कर दिया है।
उनमें से एक ने मुझे बताया कि उसे धर्मी ठहराए सात वर्ष हो चुके थे, और पाँच वर्ष से वह पवित्रीकरण की आवश्यकता की कायल थी।
परन्तु यह सहज कायल होना किसी काम न आया।
पन्द्रह दिन पहले उसे इतने तीव्र बोध ने आ पकड़ा कि उसे चैन न मिला, जब तक कि
परमेश्वर ने उसे पवित्र न किया और उसके हृदय में इसकी गवाही न दी।"
— दैनिकी, जुलाई, 1762।
मसीही सिद्धता,
"कुछ बातों में इस स्थान (डबलिन) में परमेश्वर का कार्य लंदन के कार्य से भी अधिक उल्लेखनीय था।
1. समय और लोगों की संख्या के अनुपात में यह कहीं अधिक बड़ा है।
उस सोसाइटी में सत्ताईस सौ से अधिक सदस्य थे; इसमें उसकी संख्या का पाँचवाँ भाग भी नहीं।
वहाँ ज्वाला भड़कने के छह महीने बाद हमारे पास उस महान उद्धार के लगभग तीस गवाह थे।
डबलिन में चार महीने से भी कम समय में चालीस से अधिक थे।
_ 2. यह कार्य अधिक शुद्ध था।
इस पूरे समय में, जब तक उनके साथ नम्रता और कोमलता का व्यवहार किया गया, उनमें से कोई भी हठी या सलाह न मानने वाला नहीं था; कोई अपने सिखाने वालों से अधिक बुद्धिमान नहीं था; किसी ने अमर या अचूक, या प्रलोभन से परे होने का स्वप्न नहीं देखा; संक्षेप में, कोई सनकी या उन्मादी व्यक्ति नहीं था।
सब शान्त और संयमी थे।" — दैनिकी, जुलाई, 1762।
"आग उस सब को पकड़ लेती है जो उसके निकट आता है।
जर्मनी से उत्तरी आयरलैंड लौटता हुआ एक बूढ़ा सिपाही एक रात इन कुश्ती लड़ते याकूबों से आ मिला, और बहुत चकित हुआ।
जब वह युद्ध के आरम्भ में जर्मनी जा रहा था, तब प्रभु ने उसे डबलिन में चंगा किया था; और एक कठिन सैन्य अभियान के सब कष्टों के बावजूद वह निरन्तर ज्योति में चलता रहा।
लंदन से लौटते हुए वह पूर्ण पवित्रीकरण की आवश्यकता का कायल हुआ; और यहाँ आने के कुछ ही समय बाद, एक छोटी मण्डली के साथ, जो प्रतिदिन प्रार्थना के लिए मिलती है, उसका हृदय टूटकर चूर-चूर हो गया।
एक संध्या, जब वे जा रहे थे, उसने उन्हें रोका और विनती की कि जब तक परमेश्वर उसे आशीष न दे, वे न जाएँ।
वे फिर घुटनों के बल बैठ गए, और तब तक परमेश्वर से मल्लयुद्ध करना न छोड़ा, जब तक उसे गवाही न मिली कि वह सब पाप से बचाया गया है।"
— रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 379, 1762।
'अब मैं खड़ा होकर बीते वर्ष को पीछे मुड़कर देखने लगा; असाधारण परीक्षाओं और असाधारण आशीषों का वर्ष।
बहुतायत से लोग पाप के कायल हुए हैं; बहुत-से परमेश्वर के साथ मेल पा चुके हैं; और केवल लंदन में, मेरा विश्वास है, पूरे दो सौ लोग महिमामय स्वतन्त्रता में लाए गए हैं।
फिर भी मुझे
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
छह महीनों में उससे अधिक चिन्ता और कष्ट रहा है जितना पिछले कई वर्षों में रहा।
अन्त क्या होगा, मैं नहीं जानता; परन्तु यही बहुत है कि परमेश्वर जानता है।" — दैनिकी, दिसम्बर, 1762।
"मुझे उस ज्वाला की सूचना मिली जो बोल्टन में भड़क उठी थी।
श्री फर्ज़ को लिखने वाले एक जन ने उसका कुछ वर्णन इन शब्दों में किया: "परमेश्वर की महिमा हो, वह हमारे बीच आश्चर्यकर्म कर रहा है!
जब से आप हमें छोड़कर गए, एक ही सभा में सात (यदि अधिक नहीं) धर्मी ठहराए गए, और छह पवित्र किए गए।
इनमें से दो, मेरे विचार में, तीन दिन से भी कम में धर्मी ठहराए गए और पवित्र किए गए।
ओह, हमारी पिछली क्लास-मीटिंग कैसी सभा थी!
तीन मिनट में, या उससे भी कम में, परमेश्वर ने सत्य के एक पुराने विरोधी को अप्रत्याशित रूप से कायल कर दिया, और बहुतों को घायल किया।" — दैनिकी, अप्रैल, 1762।
कल रात उसकी सामर्थ्य सचमुच उपस्थित थी; और एक और जन को निश्चय हुआ कि परमेश्वर ने, जिसने पहले उसके पाप क्षमा किए थे, अब उसे सब अधर्म से शुद्ध कर दिया है।
अब दस स्त्रियाँ और तेरह पुरुष हैं जो वही अंगीकार गवाही देते हैं; और उनके जीवन उसके अनुरूप हैं।
आठ ने हाल ही में अपने पापों की क्षमा पाई है; और बहुत-से परमेश्वर के लिए पूरी तरह तत्पर हैं, और बस कुण्ड में उतरने को तैयार हैं।'
इससे प्रकट होता है कि समय के अनुपात में, जो केवल तीन या चार सप्ताह था, और सुनने वालों की संख्या के अनुपात में (आधी भी नहीं, यदि तिहाई), परमेश्वर का कार्य लिमरिक में डबलिन से भी बड़ा था।" — दैनिकी, जुलाई,
1762।
"बहुत वर्ष पहले मेरा भाई प्रायः कहा करता था, 'तुम्हारा पिन्तेकुस्त का दिन अभी पूरी तरह नहीं आया है; परन्तु मुझे सन्देह नहीं कि वह आएगा: और तब तुम पवित्र किए गए लोगों के विषय में उतनी ही बार सुनोगे जितनी बार अब धर्मी ठहराए गए लोगों के विषय में सुनते हो।'
कोई भी निष्पक्ष पाठक देख सकता है कि वह अब पूरी तरह आ चुका था।
और तदनुसार हमने लंदन में, इंग्लैंड के अधिकांश अन्य भागों में, डबलिन में और आयरलैंड के अनेक अन्य भागों में पवित्र किए गए लोगों के विषय में उतनी ही बार सुना जितनी बार धर्मी ठहराए गए लोगों के विषय में;
मसीही सिद्धता,
यद्यपि बाद वाले के उदाहरण पिछले बीस वर्षों की तुलना में कहीं अधिक बार थे।" — दैनिकी,
अक्टूबर, 1762।
"'30 मार्च, 1764। — मैं सेफ़ील्ड में उन लोगों से मिला जो विश्वास करते थे कि परमेश्वर ने उन्हें 'उनके सब पापों से छुड़ा लिया है।'
वे संख्या में लगभग साठ थे।
मुझे यह पता न चला कि उनमें से कोई अपने दावे के अयोग्य चला हो।
बहुतों ने बुराई के लिए उन पर निगरानी रखी; परन्तु उन्होंने भलाई से बुराई पर जय पाई। मैंने उनमें अहंकार, हठ, विरोध के प्रति असहिष्णुता, या उन्माद का कुछ भी नहीं पाया।
उन्होंने उससे, जो मन में नम्र और दीन था, बेहतर सीखा था, और 'हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर के उपदेश को शोभा दी।'" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 386।
"दोपहर बाद मैंने (डबलिन में) सोसाइटी के सदस्यों से बात की।
मैं चार सौ चालीस छोड़ गया था, और पाँच सौ से अधिक पाता हूँ; इस राज्य में मेरे पहली बार उतरने के बाद से कभी इतने न थे।
और वे केवल संख्या में ही नहीं बढ़े हैं, परन्तु उनमें से बहुत-से परमेश्वर के शुद्ध प्रेम में आनन्दित हैं; और बहुत और हैं जो तब तक सान्त्वना लेने से इनकार करते हैं जब तक वे वही अंगीकार गवाही न दे सकें।" — दैनिकी, जुलाई, 1765।
'"मैं घोड़े पर मेड्रोस गया, जो सेंट ऑस्टल के निकट है, जहाँ पूर्वी सर्किट की त्रैमासिक सभा हुई।
यहाँ भी हमें परमेश्वर के निरन्तर बढ़ते हुए कार्य का सुखद विवरण मिला।
इस सोसाइटी में छियासी सदस्य हैं, और सब परमेश्वर के प्रेम में आनन्दित हैं।
इनमें से पचपन या छप्पन विश्वास करते हैं कि उसने उन्हें सब पाप से बचा लिया है; और उनका जीवन किसी प्रकार उनके दावे का खण्डन नहीं करता।
परन्तु कितने अन्त तक टिके रहेंगे?" — दैनिकी, सितम्बर, 1765।
"स्वेलडेल में संध्या की मण्डली कहीं बड़ी थी, और उतनी ही ध्यान देने वाली: और सोसाइटी उन सबसे जीवन्त सोसाइटियों में से एक थी जिनसे मैं इंग्लैंड में मिला हूँ।
उनमें से बहुत-से परमेश्वर के शुद्ध प्रेम में आनन्दित हैं, और बहुत और उसे गम्भीरता से खोज रहे हैं।" — दैनिकी, जुलाई, 1768।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
"वे अब (कॉर्क में) केवल एक सौ सत्तर हैं; फिर भी जो बचे हैं उनमें परमेश्वर का कार्य गहरा होता जाता है।
मैंने बहुतों को अनुग्रह में बढ़ते पाया; बहुतों को परमेश्वर के शुद्ध प्रेम में आनन्दित; और बहुत और को, जो उस सम्पूर्ण मन के लिए गहरी लालसा रखते थे जो मसीह में था।" — दैनिकी, मई,
1771।
"बुधवार संध्या के प्रचार के बाद (कारमार्थन में) हमारी ऐसी सभा हुई जैसी मैंने कम ही जानी है।
लगभग हर एक ने बोला, जैसा आँसुओं के बीच वे बोल सके, और पूरी सरलता के साथ; और उनमें से बहुत-से
'उस महान उद्धार' को जानते और अपने सारे हृदय से परमेश्वर से प्रेम करते प्रतीत हुए।" — दैनिकी, अगस्त, 1772।
"मुझे हाई-वाइकोम्ब में एक और सोसाइटी मिली, जो विटनी की सोसाइटी के लगभग उतनी ही उत्साही थी।
प्रातः पाँच बजे एक बड़ी मण्डली उपस्थित थी, जिनमें से बहुत-से पूर्ण उद्धार के प्यासे थे।
मैंने उनमें से बारह से बात की, जिन्होंने इसका अनुभव किया प्रतीत होता था।
यही सच्ची मसीहियत है!" — दैनिकी, अक्टूबर, 1772।
"वाचा के नवीकरण के समय हमारी मण्डली उससे बड़ी थी जितनी कई वर्षों से हमारी रही है: और मैं नहीं जानता कि हमें कभी इससे बड़ी आशीष मिली हो।
इसके बाद बहुतों ने धन्यवाद देना चाहा, किसी ने क्षमा के बोध के लिए, किसी ने पूर्ण उद्धार के लिए, और किसी ने उसके अनुग्रह के नए प्रकाशन के लिए जो उनके सब पतन को चंगा करता है।" — दैनिकी, फरवरी, 1775।
"दोपहर को मैंने ट्यूक्सबरी में प्रचार किया, जो अब सर्किट में सबसे जीवन्त स्थान है।
यहाँ बहुत-से हाल ही में पाप के कायल हुए हैं, और बहुत-से परमेश्वर की ओर फिराए गए हैं।
कुछ उस महान उद्धार के सहभागी बनाए गए हैं, और उनके प्रेम और उत्साह ने औरों को जगाया है।
इसलिए ज्वाला अब और अधिक दूर-दूर तक फैल रही है।
ओह, कोई उसे बुझा न सके!" — दैनिकी, मार्च, 1775।
"यहाँ हमारे बीच परमेश्वर का कार्य फल-फूल रहा है: मैंने इसके बराबर कुछ कभी नहीं देखा।
पिछली बार जब मैं सेंट जस्ट में था, तो
मसीही सिद्धता,
अगुवों ने मुझे सत्तर ऐसे व्यक्तियों का विवरण दिया जिन्होंने पिछले पन्द्रह दिनों में या तो क्षमा या सिद्ध प्रेम पाया था: और जिस रात और सुबह मैं वहाँ था, बीस और छुड़ाए गए।" — दैनिकी, अप्रैल, 1782।
"मैं (मैनचेस्टर में) चुनी हुई सोसाइटी से मिला, जिसमें चालीस से पचास के बीच सदस्य हैं।
इनमें से कई हाल ही में उस महान उद्धार के सहभागी बनाए गए; जैसे कई बीस वर्ष से भी पहले बनाए गए थे।
मेरा विश्वास है कि लंदन को छोड़कर कोई स्थान नहीं जहाँ हमारे पास परमेश्वर के प्रति इतनी गहराई से समर्पित इतनी आत्माएँ हों; और उसका हाथ अब भी छोटा नहीं हुआ, परन्तु उसका कार्य चारों ओर तेज़ी से बढ़ रहा है।" — दैनिकी, मई, 1783।
"मंगलवार को और उसके बाद के तीन दिनों में मैंने (डबलिन में) सोसाइटी की जाँच की।
मैंने उसे पहले कभी ऐसी दशा में नहीं पाया; उनमें से बहुत-से अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर में आनन्दित थे, और स्त्री-पुरुष दोनों अपने पहनावे में उतने ही सादे थे जितने ब्रिस्टल और लंदन के।
बहुत-से, मुझे सचमुच विश्वास है, अपने सारे हृदय से परमेश्वर से प्रेम करते हैं; और इनकी संख्या प्रतिदिन बढ़ती है।
पूरी सोसाइटी की संख्या सात सौ सैंतालीस है।" — दैनिकी, अप्रैल, 1785।
'"संध्या को मुझे खुले में प्रचार करना पड़ा।
इसके बाद हमारी प्रेम-भोज सभा हुई (डार्लिंगटन में); जिसमें बहुत-से सीधे-सादे लोगों ने मसीही अनुभव की ऊँचाई और गहराई को अत्यन्त सरल और निष्कपट ढंग से बताया।" — दैनिकी,
जून, 1786।
"(बर्सलेम में) कई लोगों ने यह भी गवाही दी कि मसीह के लहू ने उन्हें सब पाप से शुद्ध कर दिया है।
दो ने कड़वी पुकारों के बाद घोषणा की कि वे जानते हैं कि उनके पाप ठीक उसी समय मेम्ने के लहू से मिटा दिए गए; और मुझे सन्देह नहीं कि पूछताछ करने पर पाया जाएगा कि कई और या तो धर्मी ठहराए गए या पवित्र किए गए।" — दैनिकी, मार्च, 1787।
"यहाँ (वियरडेल में) परमेश्वर का कार्य हाल ही में बहुत बढ़ा है।
बहुत-से पाप के कायल हुए हैं, बहुत धर्मी ठहराए गए; कुछ प्रेम में सिद्ध किए गए, और बहुत-से सोसाइटी में जोड़े गए हैं।"
— दैनिकी, जून, 1788।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
13S 'पैलेटाइन परिवारों के सब शेष लोग बैलिगैरेन, कोर्ट-मैट्रिस और रैथील से यहाँ आए; इन सभी स्थानों में हाल ही में एक असाधारण ज्वाला भड़क उठी है, जैसी पहले कभी नहीं देखी गई। हर स्थान में बहुत-से गहराई से कायल हुए, बहुत-से परमेश्वर की ओर फिराए गए, और कुछ प्रेम में सिद्ध किए गए।
कुछ सोसाइटियाँ संख्या में दुगुनी हो गईं, कुछ छह या दस गुना तक बढ़ गईं।" — दैनिकी, मई, 1789।
मसीही सिद्धता,
खण्ड 23।
पवित्रता के विषय पर श्री वेस्ली को जिस
विरोध का सामना करना पड़ा।
"अब मुझे पूछने दीजिए, आप उन लोगों से इतने क्रुद्ध क्यों हैं जो इसे पा लेने का दावा करते हैं? और मसीही सिद्धता के विरुद्ध इतने उन्मत्त क्यों (मैं इसे कोई नरम नाम नहीं दे सकता)? —
उस सबसे महिमामय वरदान के विरुद्ध जो परमेश्वर ने पृथ्वी पर मनुष्य की सन्तानों को कभी दिया?
इसे पिछले सभी दृष्टिकोणों से देखिए, और देखिए कि इसमें ऐसा क्या है जो घृणित या भयानक हो: जो किसी भी विवेकशील प्राणी में घृणा या भय जगाने के योग्य हो।
"अपने परमेश्वर प्रभु से अपने सारे हृदय से प्रेम करने पर आपको कौन-सी तर्कसंगत आपत्ति हो सकती है? आप इससे क्यों डरें? क्या इससे आपको कोई हानि होगी? क्या इससे इस संसार में या आने वाले संसार में आपका सुख घटेगा?
और आप क्यों नहीं चाहते कि दूसरे उसे अपना सारा हृदय दें?
या कि वे अपने पड़ोसियों से अपने समान प्रेम करें? — बल्कि, "जैसा मसीह ने हमसे प्रेम किया?" क्या यह घृणित है?
क्या यह घृणा का उचित पात्र है?
या यह सूर्य के नीचे सबसे प्रिय वस्तु है?
क्या यह भय जगाने के योग्य है?
क्या यह उच्चतम स्तर तक वांछनीय नहीं है?
"आप अपने में सम्पूर्ण 'वह मन जो मसीह यीशु में था' पाने से इतने विमुख क्यों हैं?
वे सब भावनाएँ, वे सब स्वभाव और प्रवृत्तियाँ जो उसमें थीं, जब वह मनुष्यों के बीच रहा? आप इससे क्यों डरें?
क्या आपके लिए यह कुछ बुरा होगा, यदि परमेश्वर आप में
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
14] इसी घड़ी वह सारा मन उत्पन्न कर दे जो उसमें था?" — उपदेश, खण्ड 2, पृ. 174।
"इसका प्रचार करने वालों को पागल कुत्तों की तरह क्यों हूट किया गया है, यहाँ तक कि परमेश्वर का भय मानने वाले लोगों द्वारा भी, बल्कि उनकी अपनी सन्तानों द्वारा भी, कुछ ऐसों द्वारा जिन्हें उन्होंने, परमेश्वर के अधीन, सुसमाचार के द्वारा जन्माया?" — सरल विवरण, पृ. 170।
सारा क्रॉस्बी को, 1766: — "इस विषय में (मसीही सिद्धता के विषय में) एक सामान्य शिथिलता पूरे राज्य पर आ पड़ी है।
कभी-कभी मैं प्रचारकों और लोगों, दोनों की धारा के विरुद्ध संघर्ष करते-करते लगभग थक-सा जाता हूँ।"
"जो लोग अपने सारे हृदय से परमेश्वर से प्रेम करते हैं, उन्हें उन पेशेवर विश्वासियों से बहुत विरोध की अपेक्षा करनी चाहिए जो बीस वर्षों से किसी पुराने घिसे-पिटे मार्ग पर चलते आए हैं, और अपने को सारे संसार से अधिक बुद्धिमान समझते हैं।
ये सदा पवित्रीकरण के कार्य का सबसे अधिक विरोध करते हैं।"
— एच. ए. रोजर्स की दैनिकी, पृ. 177।
एक बड़ा आदमी कहता है, 'यह भूलों की भूल है; मैं इससे हृदय से घृणा करता हूँ।
मैं इसका पीछा सारे संसार में आग और तलवार से करता हूँ।'
भला, इतना उग्र क्यों?
क्या आप गम्भीरता से सोचते हैं कि स्वर्ग के नीचे इसके बराबर कोई भूल नहीं है?
यहाँ कुछ है जो मैं समझ नहीं सकता।
पाप से उद्धार का विरोध करने वाले (कुछ अपवादों को छोड़कर) इतने उतावले क्यों हैं?
मैं तो लगभग कहने ही वाला था, उग्र?
क्या आप pro aris et focis [वेदियों और चूल्हों के लिए] लड़ रहे हैं? परमेश्वर और अपने देश के लिए?
उस सबके लिए जो संसार में आपके पास है?
उस सबके लिए जो आपके निकट और प्रिय है? अपनी स्वतन्त्रता के लिए? अपने प्राण के लिए?
परमेश्वर के नाम पर, आपको पाप इतना प्रिय क्यों है?
इसने आपका कभी क्या भला किया है? इस संसार में या आने वाले संसार में, इससे आपका क्या भला होने की सम्भावना है?
और आप उन लोगों के विरुद्ध इतने उग्र क्यों हैं जो इससे छुटकारे की आशा रखते हैं? यदि हम भूल में हैं तो हमारे साथ धीरज रखिए; बल्कि हमें अपनी भूल का आनन्द लेने दीजिए।
यदि हम इसे न पा सकें, तो भी इस छुटकारे की प्रत्याशा ही हमें वर्तमान सान्त्वना देती है; बल्कि, और min-
मसीही सिद्धता,
उन शत्रुओं का सामना करने की सामर्थ्य, जिन पर हम विजय पाने की आशा रखते हैं।
यदि तुम हमें उस विजय से निराश होने के लिए मना लो, तो हम संघर्ष ही छोड़ देंगे।
अब 'हम आशा के द्वारा उद्धार पाए हैं'; इसी आशा से उद्धार की एक मात्रा उत्पन्न होती है।
उन पर क्रोधित न हो जो felices errore suo [अपनी भूल में सुखी] हैं; अर्थात् अपनी भूल में सुखी हैं।
नहीं तो, उनका मत सही हो या गलत, तुम्हारा स्वभाव निस्संदेह पापमय है: इसलिए हमें सहो, जैसे हम
तुम्हें सहते हैं; और देखो कि क्या प्रभु हमें नहीं छुड़ाएगा!
क्या वह उन्हें 'जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, पूरी रीति से उद्धार करने' में समर्थ ही नहीं, वरन् इच्छुक भी नहीं है?" — उपदेश, खण्ड 2, पृ. 176।
"परन्तु क्या इन क्रूसों को रोकने का कोई उपाय नहीं, जो प्रायः उन पर आ पड़ते हैं जो इस प्रकार उद्धार पाने की बात करते हैं?" —
"ऐसा लगता है कि जब तक विश्वासियों में भी इतना स्वभाव शेष है, तब तक वे पूरी तरह रोके नहीं जा सकते। परन्तु कुछ किया जा सकता है, यदि हर स्थान पर प्रचारक: (1) जो लोग ऐसा कहते हैं उन सबसे खुलकर बात करे; और (2) उन लोगों के साथ, जिनके पक्ष में उचित प्रमाण है, अन्यायपूर्ण या निर्दयतापूर्ण व्यवहार को रोकने का प्रयत्न करे।" — सरल विवरण, पृ. 71।
"मुझे एक प्रश्न और पूछने दीजिए।
विवेक और धर्म रखनेवाला कोई भी मनुष्य सब पापों से उद्धार से डरे या उससे विमुख क्यों हो?
क्या नरक के इस ओर पाप ही सबसे बड़ी बुराई नहीं है? और यदि है, तो क्या स्वाभाविक रूप से यह नहीं निकलता कि इससे पूरा छुटकारा स्वर्ग के इस ओर के सबसे बड़े आशीर्वादों में से एक है? तब परमेश्वर की सब सन्तानों को इसके लिए कितनी लगन से प्रार्थना करनी चाहिए! पाप से मेरा तात्पर्य है, ज्ञात व्यवस्था का स्वैच्छिक उल्लंघन।
क्या आप इससे छुड़ाए जाने से विमुख हैं?
क्या आप ऐसे छुटकारे से डरते हैं?
तो क्या आप पाप से प्रेम करते हैं, कि उससे अलग होने को इतने अनिच्छुक हैं? निश्चय ही नहीं।
आप न तो शैतान से प्रेम करते हैं, न उसके कामों से।
आप तो यही चाहते हैं कि उनसे पूरी तरह छुड़ाए जाएँ: कि पाप आपके जीवन और आपके हृदय, दोनों से जड़ से उखाड़ दिया जाए।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
"मैंने प्रायः देखा है, और आश्चर्य के साथ, कि सिद्धता के विरोधी उसका सबसे अधिक उग्र विरोध तब करते हैं जब उसे इस दृष्टि से रखा जाता है, किसी अन्य दृष्टि से नहीं: वे परमेश्वर और मनुष्य के प्रेम के विषय में; उस मन के विषय में जो मसीह में था; आत्मा के फल के विषय में; परमेश्वर के स्वरूप के विषय में; सर्वव्यापी पवित्रता के विषय में; पूर्ण आत्म-समर्पण के विषय में; आत्मा, प्राण और देह की पवित्रता के विषय में; वरन् हमारे सब विचारों, वचनों और कामों को परमेश्वर के लिए बलिदान के रूप में चढ़ाने के विषय में भी, आप जो कुछ कहते हैं, सब मान लेंगे; — यह सब वे मान लेंगे, बशर्ते हम यह भी मानें कि थोड़ा-सा पाप मृत्यु तक हमारे भीतर रहता है।"
— उपदेश, खण्ड 2, पृ. 176।
"सोमवार, 14।— मैं उस 'स्वतंत्रता' की व्याख्या कर रहा था जो हमें 'यीशु के लहू के द्वारा परमपवित्र स्थान में प्रवेश करने की' है, कि एक व्यक्ति मानो पीड़ा में चिल्ला उठा, 'तू कपटी है, शैतान है, कलीसिया का शत्रु है।" — जर्नल, 1740।
1763 में, मैक्सफ़ील्ड और बेल के धर्मोन्माद के समय, चार्ल्स वेस्ली तात्कालिक पवित्रीकरण के विरुद्ध काफ़ी पूर्वाग्रही हो गए, और कुछ समय के लिए अपने भाई का विरोध करते-से दिखे।
1768 में, श्री वेस्ली ने इस प्रकार लिखा: "हम क्या करें?
मेरे विचार में अब समय आ गया है कि आप और मैं, कम से कम, किसी एक बात पर पहुँचें।
क्या हम सारे संसार के विरुद्ध सिद्धता का प्रतिपादन करते रहें, या चुपचाप उसे छोड़ दें?
हमें इनमें से एक अवश्य करना है; और मेरी समझ में, जितनी जल्दी हो उतना अच्छा।
उसके स्वरूप, समय (अभी या कुछ समय बाद), और रीति के विषय में, — तात्कालिक हो या नहीं, — हम अपने सब प्रचारकों को संयुक्त रूप से और स्पष्टता से क्या सिखाएँ और क्या सुझाएँ?
मैं इस आपसी युद्ध से थक गया हूँ, जिसमें प्रचारक हम में से एक को दूसरे के विरुद्ध उद्धृत करते हैं।
अन्ततः, आइए हम सदा के लिए कुछ ठहरा लें, चाहे वह पहले जैसा हो या उससे भिन्न।"
— रचनाएँ, अंग्रेज़ी संस्करण, खण्ड 12, पृ. 126।
मसीही सिद्धता,
"अब हमें हर ओर से विरोध मिलने लगा है।
कुछ कहते हैं कि यह घोर धर्मोन्माद है; कुछ कहते हैं कि यह या तो धोखा है या केवल अभिमान; कुछ कहते हैं कि यह कोई नई बात है, और बाइबल में ऐसा कुछ नहीं मिलता।"
3 जून।— "प्रभु अपने कार्य को उसी अनुपात में बढ़ाता है जिस अनुपात में उसे विरोध मिलता है।" — जर्नल, मई, 1762।
"(1763 के) इस वसन्त का अधिकांश भाग मैं सोसाइटी का दौरा करने और उन लोगों के मन को स्थिर करने में पूरी तरह लगा रहा, जो हज़ारों गलत बयानों से उलझन और संकट में पड़ गए थे।
सचमुच, निन्दा और बुराई की बातों की बाढ़ (जैसा सहज ही पूर्वानुमान था) चारों ओर उमड़ पड़ी थी।
मेरा लक्ष्य अब भी यही था कि जिस कार्य के लिए मुझे बुलाया गया है, उसमें सीधा आगे बढ़ता रहूँ।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 393।
रेव. श्री वेन को, 1765: — "इस तुच्छ उद्देश्य के लिए सिद्धता के सिद्धान्त को सिर और कन्धों से घसीट लाया गया है।
और जब ऐसी रियायतें दी गईं जो किसी भी निष्पक्ष और सच्चे मनुष्य को भली-भाँति सन्तुष्ट कर देतीं, तब भी वे निकट नहीं आए, — वरन् और दूर हो गए; क्योंकि उन्हें सन्तुष्ट होने की कोई इच्छा ही नहीं थी।
इस प्रिय दरार को और चौड़ा करने के लिए, मेरे विषय में और 'सिद्ध जनों' के विषय में, कहानियाँ यत्न से बटोरी गईं, बढ़ाई गईं, वरन् गढ़ी गईं और फैलाई गईं।
और जब कोई बहुत बुरी बात हाथ लगी, तो कुछ लोग ऐसे आनन्दित हुए मानो उन्हें बड़ी लूट मिल गई हो।"
— रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 303।
अपने भाई को, 1768: — "मैं दो बातों के विषय में बुद्धि के छोर पर आ पहुँचा हूँ, — कलीसिया और मसीही सिद्धता।
यदि आप और मैं दोनों सच्चे मन से दरार में खड़े न हुए, तो मेथोडिस्ट इन दोनों को छोड़ देंगे।
बातों से कुछ नहीं होगा।
हमें कुछ करना होगा, नहीं तो हम बह जाएँगे।
क्या आप कन्धे से कन्धा मिलाएँगे?
यदि हाँ, तो इस विषय पर गहराई से सोचिए, और मुझे बताइए कि क्या किया जा सकता है।
Age, vir esto! nervos intendas tuos. [आगे बढ़ो, पुरुषार्थ दिखाओ! अपनी नसों को तान लो।]
[आओ, या पुरुषार्थ दिखाओ
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
अपनी पूरी शक्ति लगा दो।] आपको और आपके परिवार को शान्ति मिले!
अलविदा।"
— रचनाएँ, खण्ड 6, पृ. 670।
"और इसलिए, स्वाभाविक रूप से, आप उन लोगों से खिन्न हुए जो इस स्वभाव के आगे नहीं झुके, और उस अनुरूपता को दोषी ठहराया।
सम्भवतः उनमें से कुछ ने प्रेम में सिद्ध किए जाने का दावा किया या उसकी आशा रखी; कम से कम वे सिद्धता पर विश्वास करते थे।
अब आप इससे पूरी घृणा करते प्रतीत होते थे; और इस कारण उन्हें और अधिक नापसन्द करते थे।" — जर्नल, जून, 1769।
"गुरुवार, 14।
लगभग दो बजे पोट्टो में; और सायंकाल हटन में।
यहाँ, और अन्यत्र भी, जो विश्वास करते हैं कि वे पाप से बचाए गए हैं, वे अपने भाइयों की ओर से अनेक परीक्षाओं से गुज़रते हैं।
परन्तु इतना ही अधिक 'सारे अनुग्रह का परमेश्वर', जब वे 'थोड़ी देर दुःख उठा चुकेंगे, उन्हें स्थिर, बलवन्त और दृढ़ करेगा।'"
— जर्नल, जून, 1770।
श्रीमती एलिज़ाबेथ बेनिस को, 1771: — "मैं विश्वास करता था कि भाई सी. आपके काम आएँगे, और आप उनके काम आ सकती हैं।
एक-दूसरे से बिना संकोच बात कीजिए, तब आप शायद ही कभी व्यर्थ मिलेंगे।
उन्हें सारी सोसाइटी का दौरा करने के लिए आगे धकेलिए (केवल उनका नहीं जो उन्हें खाना-पीना दे सकें), घर-घर, सम्मेलन की कार्यवृत्तियों में रखी योजना के अनुसार; तब वे शीघ्र ही अपने परिश्रम का फल देखेंगे। मुझे आशा है कि वे पूर्ण उद्धार का प्रचार करने में लज्जित नहीं होते, जो अब विश्वास से प्राप्त किया जा सकता है। यही वह वचन है जिसे परमेश्वर सदा आशीष देगा, और जिससे शैतान विशेष रूप से घृणा करता है; इसलिए वह अपनी सन्तानों और परमेश्वर की निर्बल सन्तानों, दोनों को इसके विरुद्ध निरन्तर भड़काता रहता है।"
— रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 55।
श्रीमती मेरी मार्स्टन को, 1771:
"क्या श्री क्लफ़, या कोई अन्य प्रचारक, सिद्धता के विरुद्ध बोलता है, या उन्हें अवसर देता है जो आपको सताते हैं?
जो ऐसा करे, उससे बात करना आपके लिए अच्छा होगा, ताकि आप बेहतर समझ तक पहुँच सकें।
जहाँ तक आप से
मसीही सिद्धता,
हो सके, अपने भीतर की भलाई की बुराई न होने दीजिए।
परन्तु सावधान रहिए, कहीं आपके भाइयों का निर्दयी व्यवहार आपको किसी प्रकार के छल या झूठी चतुराई में न डाल दे।
तब भी आपका सारा आचरण सरलता और ईश्वरीय निष्कपटता में हो।
सीधी, खुली, निश्छल रहिए, बिना किसी आवरण के।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 127।
डॉ. एडम क्लार्क को, 1790: — "जर्सी में परमेश्वर के महान कार्य के जारी रहने का जो विवरण आपने भेजा, उससे मुझे बड़ा सन्तोष हुआ।
परमेश्वर के अनुग्रह को बनाए रखना उसे पाने से कहीं अधिक कठिन है; तीन में मुश्किल से एक ही ऐसा करता है।
और यह बात उन सब पर ज़ोर देकर और स्पष्ट रूप से रखी जानी चाहिए जिन्होंने सिद्ध प्रेम का स्वाद चखा है।
यदि हम सिद्ध कर सकें कि हमारा कोई स्थानीय प्रचारक या अगुआ, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, इसके विरुद्ध बोलता है, तो वह अब स्थानीय प्रचारक या अगुआ न रहे।
मुझे सन्देह है कि उसे सोसाइटी में बने रहना चाहिए।
क्योंकि जो हमारी मण्डलियों में ऐसा बोल सके, वह ईमानदार मनुष्य नहीं हो सकता।" —
रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 205।
टायरमैन कहते हैं: "जैसा हमने बार-बार दिखाया है, वेस्ली मसीही सिद्धता के सिद्धान्त के प्रचार को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानते थे।"
डॉ. एडम क्लार्क को लिखे इस पत्र को उद्धृत करने के बाद वे कहते हैं: "ऐसे पत्र बहुत बढ़ाए जा सकते हैं।" —टायरमैन, खण्ड 3, पृ. 688।
श्री एडवर्ड लीज़्ली को, 1791 में, अपनी मृत्यु से एक मास पहले: — "मैं नहीं मानता कि आपकी चुनी हुई सोसाइटी में कोई एक भी व्यक्ति यह कहने में हिचकता है: — 'हर क्षण, हे प्रभु, मुझे तेरी मृत्यु की योग्यता की आवश्यकता है।'
यह 'मसीही सिद्धता पर विचार' में स्पष्ट रूप से निर्धारित है।
परन्तु साधारण लोगों से कौन यथार्थ बोलने की अपेक्षा करता है? और उन्हें उनकी बातों में उलझाना कितना सरल है!
मुझे डर है कि कुछ लोग यह पहले ही कर चुके हैं।
जो मनुष्य
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
मसीही सिद्धता का पक्का मित्र नहीं है, वह दूसरों को सहज ही उलझा देगा, और इस प्रकार किसी भी चुनी हुई सोसाइटी को कमज़ोर कर देगा, यदि नष्ट न भी करे।
मुझे सन्देह है कि आपके यहाँ ऐसा ही हुआ है।
वह सोसाइटी जीवन्त अवस्था में थी और भली-भाँति एकजुट थी, जब मैं पिछली बार बर्मिंघम में था।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 253।
मसीही सिद्धता,
खण्ड 24।
सत्य का विरोध करनेवाले पादरियों को सुनने के विषय में।
"1. पिछली गर्मियों में मुझे यॉर्कशायर से कई गम्भीर पुरुषों के हस्ताक्षर सहित एक पत्र मिला, जिसमें उन्होंने एक कठिनाई रखी थी जिसमें उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें।
और सचमुच, मैं भी ठीक से नहीं जानता था कि उन्हें क्या सलाह दूँ।
इसलिए मैंने उन्हें निश्चित उत्तर देना तब तक टाला, जब तक मैं यह विषय आगामी सम्मेलन में अपने भाइयों के सामने न रख सका।
उनकी कठिनाई यह थी: 'आप हमारी सोसाइटियों के सब सदस्यों को सलाह देते हैं कि वे नियमित रूप से कलीसिया की आराधना में उपस्थित हों।
हम काफ़ी समय से ऐसा करते आए हैं।
परन्तु बहुत बार हमारे पादरी श्री आर. ऐसा उपदेश देते हैं जिसे हम न केवल असत्य, वरन् खतरनाक रूप से असत्य मानते हैं।
वे यह कहते हैं और सिद्ध करने का यत्न करते हैं कि हम इस जीवन में अपने पापों से नहीं बचाए जा सकते; और हमें इस लोक में प्रेम में सिद्ध किए जाने की आशा नहीं रखनी चाहिए।
हमारा स्वभाव इसे ग्रहण करने को बहुत तत्पर है; इसलिए इससे हमें हानि पहुँचने की बड़ी आशंका है।
इसलिए हमें सन्देह है कि क्या ऐसा उपदेश सुनना हमारा कर्तव्य है, जिसके विषय में अनुभव दिखाता है कि वह हमारी आत्माओं को निर्बल करता है।'
3. यह पत्र मैंने सम्मेलन के सामने रखा, और हमने सहज ही देखा कि इसमें रखी गई कठिनाई केवल बैल्डन की सोसाइटी की नहीं, वरन् राज्य के विभिन्न भागों की अनेक अन्य सोसाइटियों की भी है।
इसलिए इस पर विस्तार से विचार किया गया, और सब भाइयों से कहा गया कि वे अपने विचार खुलकर रखें।
अन्त में, वे सर्वसम्मति से इस पर सहमत हुए कि, पहला, यह अत्यन्त उचित है कि वे सब मेथोडिस्ट (जो कहलाते हैं), जिनका पालन-पोषण कलीसिया में हुआ है, जितनी बार सम्भव हो कलीसिया की आराधना में उपस्थित हों;
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
परन्तु दूसरा, यदि पादरी या तो अटल आज्ञाओं का प्रचार करने लगे, या उपहास करने और डाँटने लगे
मसीही सिद्धता पर, तो वे चुपचाप और शान्ति से कलीसिया से बाहर चले जाएँ; फिर भी अगले अवसर पर फिर वहाँ उपस्थित हों।
"4. तब से मैंने इस विषय को अपने मन में बार-बार विचारा है; और जितना अधिक सोचता हूँ, उतना ही मुझे विश्वास होता है कि यही सर्वोत्तम उत्तर था जो दिया जा सकता था।
मैं अब भी अपने सब मित्रों को सलाह देता हूँ कि जब ऐसा हो, तो चुपचाप और शान्ति से बाहर चले जाएँ।
केवल मैं उन्हें गम्भीरता से चेताता हूँ कि वे छिद्रान्वेषी न बनें; किसी मनुष्य को एक शब्द के लिए दोषी न ठहराएँ; और न कुछ वाक्यों के लिए, जो अटल आज्ञाओं में विश्वास रखनेवाला कोई भी बिना इरादे के कह सकता है।
परन्तु यदि ऐसा पादरी कभी जानबूझकर और सोचे-समझे उद्देश्य से पूर्ण पूर्वनियति को स्थापित करने, या शास्त्रीय सिद्धता का खण्डन करने का प्रयत्न करे, तब मैं मण्डली के सब मेथोडिस्टों को सलाह देता हूँ कि चुपचाप चले जाएँ।"
लूइशम, 9 जनवरी, 1782।
मसीही सिद्धता,
खण्ड 25।
धर्मोन्माद के प्रति श्री वेस्ली की आपत्ति और
उसके साथ उनका व्यवहार।
पाठक स्मरण रखें कि आगामी उद्धरणों में प्रयुक्त शब्द "एन्थ्यूज़ियाज़्म" (उन्माद) का श्री वेस्ली के दिनों में वही अर्थ था जो आज "फैनैटिसिज़्म" (धर्मोन्माद) का है।
"'अनुग्रह में बढ़ने' की इच्छा भी कभी-कभी उन्माद का द्वार बन सकती है।
क्योंकि वह हमें निरन्तर नया अनुग्रह खोजने की ओर ले जाती है, वह हमें अनजाने में परमेश्वर और मनुष्य के प्रति प्रेम की नई मात्राओं के अतिरिक्त कुछ और नया खोजने की ओर भी ले जा सकती है।
इस प्रकार वह कुछ लोगों को नए हृदय के बाद एक नए प्रकार के वरदान खोजने और यह कल्पना करने की ओर ले गई है कि उन्हें मिल गए।
"इन और हज़ार भूलों का एक और आधार यह है कि हम गहराई से यह नहीं सोचते कि प्रेम ही परमेश्वर का सर्वोच्च वरदान है — नम्र, कोमल, धैर्यवान प्रेम; कि सब दर्शन, प्रकाशन, प्रकटीकरण प्रेम की तुलना में छोटी बातें हैं; और कि ऊपर बताए सब वरदान या तो उसके समान हैं, या उससे असीम रूप से निम्न हैं।
"यह अच्छा है कि आप इसे भली-भाँति समझें — स्वर्गों का स्वर्ग प्रेम है।
धर्म में इससे ऊँचा कुछ नहीं, — वास्तव में इसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं।
यदि आप अधिक प्रेम के सिवा कुछ और खोजते हैं, तो आप निशाने से दूर देख रहे हैं — आप राजमार्ग से बाहर जा रहे हैं।
"और जब आप दूसरों से पूछते हैं, 'क्या आपने यह या वह आशीष पाई है?' तो यदि आपका अभिप्राय अधिक प्रेम के सिवा कुछ और है, तो आप गलत अभिप्राय रखते हैं; आप उन्हें मार्ग से बाहर ले जा रहे हैं, और
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
उन्हें झूठी गन्ध के पीछे लगा रहे हैं।
इसलिए अपने हृदय में ठान लीजिए कि जिस क्षण से परमेश्वर ने आपको सब पाप से बचाया है, आपको और किसी बात का लक्ष्य नहीं रखना है, केवल उस प्रेम की अधिकता का जो कुरिन्थियों के तेरहवें अध्याय में वर्णित है।
जब तक आप इब्राहीम की गोद में न पहुँचा दिए जाएँ, आप इससे ऊँचे नहीं जा सकते।
"मैं फिर कहता हूँ, उन्माद से सावधान रहिए; जैसे यह कल्पना करना कि आपके पास भविष्यवाणी का या आत्माओं को परखने का वरदान है, जो मैं नहीं मानता कि आप में से किसी के पास है; नहीं, और कभी था भी नहीं।" — सरल विवरण, पृ. 140, 141।
"मैं ऑक्सफ़ोर्ड लौटा, और बुधवार को घोड़े पर ब्रिस्टल गया।
मैंने पाया कि मेरा भाई पहले ही वेल्स जा चुका था; इसलिए मैं ठीक समय पर पहुँचा; और वह भी एक अन्य कारण से; क्योंकि उन्माद की आत्मा अनेक लोगों में घुस रही थी, जो अपनी ही कल्पनाओं को परमेश्वर की इच्छा ठहराते थे, और वह भी लिखित नहीं, वरन् उनके हृदयों पर अंकित।
यदि ये अंकित प्रभाव लिखित वचन के स्थान पर कर्म का नियम मान लिए जाएँ, तो मैं ऐसी कोई बुराई या मूर्खता नहीं जानता जिसमें हम पड़ न सकें, और वह भी बिना उपचार के।" —जर्नल, जुलाई,
1741।
"मेरी श्री सिम्पसन से लम्बी बातचीत हुई।
और इस बात का मुझे पूरा निश्चय है कि वे जो कुछ करते हैं, अपने हृदय की सच्चाई से करते हैं।
परन्तु वे एक गलत सिद्धान्त के कारण हज़ार भूलों में पड़ गए हैं (वही जिसे अनेक लोग अज्ञानता या दुष्टता से मेथोडिस्ट कहलानेवाले लोगों के पूरे समुदाय पर लगाते हैं), अर्थात् भीतरी प्रभावों को कर्म का नियम बनाना, लिखित वचन को नहीं।" — जर्नल, जून, 1742।
"मैंने (ब्रिस्टल की) सोसाइटी की जाँच शुरू की, और तब, जब उसकी आवश्यकता थी: क्योंकि महामारी शुरू हो चुकी थी।
मैंने बहुतों को चिल्लाते पाया, 'विश्वास, विश्वास!
विश्वास करो, विश्वास करो!' पर वे विश्वास के फलों, चाहे पवित्रता हो या भले काम, की कम परवाह करते थे।
कुछ ही दिनों में वे होश में आ गए, और उन्हें उस सत्य की, जो यीशु में है, अधिक पूर्ण समझ मिली।"
— जर्नल, फ़रवरी, 1744।
मसीही सिद्धता,
"लगभग एक बजे मैंने सीक्रॉफ़्ट में प्रचार किया, और कई ऐसे पाए जो मानते थे कि परमेश्वर ने उन्हें पाप से बचा लिया है।
सायंकाल मैंने इनमें से बारह-चौदह से विशेष रूप से बातचीत की; पर मुझे एक भी ऐसा नहीं मिला जो यह कहने का साहस करता कि उसे प्रायश्चित्त के लहू की आवश्यकता नहीं।
न ही मैं ऐसे दो से अधिक व्यक्तियों के विषय में सुन सका जिन्होंने कभी इस प्रकार कहा हो; और इसी कारण वे दोनों शीघ्र ही ओटली की सोसाइटी से निकाल दिए गए।" —जर्नल, जुलाई, 1761।
"मैंने जॉर्ज बेल को एक बार और सुना, और मुझे निश्चय हो गया कि उसे फ़ाउण्डरी में प्रार्थना करते रहने नहीं देना चाहिए।
मसीह की निन्दा सहने को मैं तैयार हूँ; परन्तु उन्माद की निन्दा नहीं, यदि मैं उससे बच सकूँ।" — जर्नल, दिसम्बर, 1762।
"परन्तु इसमें मुझे कई बातें नापसन्द हैं: 1. कई लोगों का एक साथ गाना, या बोलना, या प्रार्थना करना: 2. केवल परमेश्वर के पुत्र से प्रार्थना करना, या पिता से अधिक उससे करना: 3. प्रार्थना में अनुचित अभिव्यक्तियों का प्रयोग करना; कभी बहुत ढीठ, यदि अश्रद्धापूर्ण नहीं तो; कभी बहुत आडम्बरपूर्ण और भव्य, परमेश्वर की बजाय अपनी बड़ाई करते हुए, और उसे यह बताते हुए कि आप क्या हैं, यह नहीं कि आपको क्या चाहिए: 4. फीके, नीरस, खोखले भजनों का प्रयोग करना:
5. प्रार्थना में कभी घुटने न टेकना: 6. आपका अत्यन्त अशोभनीय मुद्राओं या हाव-भाव का प्रयोग करना: 7. आपका चीखना, यहाँ तक कि शब्द समझ में न आएँ: 8. आपका यह कहना कि लोग अभी धर्मी ठहरेंगे या पवित्र किए जाएँगे: 9. यह कहना कि वे हो चुके हैं, जबकि वे नहीं हुए: 10. उनसे कहलवाना, 'मैं विश्वास करता हूँ':
11. जो विरोध करते हैं उनकी कटु निन्दा करना, उन्हें भेड़िये आदि कहना; और उन्हें कपटी, या धर्मी न ठहराया हुआ घोषित करना।"
"मुझे वह बात नापसन्द है जिसमें उन्माद का रूप हो, अर्थात् भावनाओं और भीतरी प्रभावों को अधिक महत्त्व देना, कल्पना के मात्र कार्य को आत्मा की वाणी समझ लेना, साधनों के बिना साध्य की अपेक्षा करना; और सामान्यतः तर्क, ज्ञान और बुद्धि को कम आँकना।"
"मुझे आपका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धर्मी ठहराए जाने को घटाना नापसन्द है;
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
यह कहना कि धर्मी ठहराया हुआ व्यक्ति मसीह में नहीं है, परमेश्वर से जन्मा नहीं है, नई सृष्टि नहीं है, उसका हृदय नया नहीं है, वह पवित्र नहीं किया गया, पवित्र आत्मा का मन्दिर नहीं है; या कि वह परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता, या अनुग्रह में बढ़ नहीं सकता।
"मुझे आपका यह कहना नापसन्द है कि पाप से बचाए गए व्यक्ति को यीशु की ओर देखने के सिवा और कुछ नहीं चाहिए; उसे और कुछ सुनने या सोचने की आवश्यकता नहीं; विश्वास करो, विश्वास करो, यही पर्याप्त है; उसे आत्म-परीक्षण की कोई आवश्यकता नहीं, एकान्त प्रार्थना के समयों की कोई आवश्यकता नहीं।"
"परन्तु मुझे आपका यह मान लेना नापसन्द है कि मनुष्य स्वर्गदूत के समान सिद्ध हो सकता है; कि वह पूर्णतः सिद्ध हो सकता है; कि वह अचूक हो सकता है, या परीक्षा से ऊपर; या कि जिस क्षण वह हृदय का शुद्ध हो जाता है, वह उससे गिर नहीं सकता।" — बेल और ओवेन को
जर्नल, अक्तूबर, 1762।
इस सारे समय मैंने देखा कि हमारे कुछ भाई यत्नपूर्वक इस सिद्धान्त का प्रचार कर रहे थे कि प्रेम में नए बनाए गए लोगों को कोई शिक्षा नहीं दे सकता, जब तक वह स्वयं उसी अवस्था में न हो।
मैंने इसकी प्रवृत्ति देखी; परन्तु मैंने यह भी देखा कि उग्र उपचार काम नहीं आएँगे।" — जर्नल, 1762।
"स्वयं सुनने का निश्चय करके, मैं ऐसी जगह खड़ा हुआ जहाँ से बिना देखे गए सुन और देख सकूँ।
जॉर्ज बेल ने कुल मिलाकर लगभग एक घण्टा प्रार्थना की।
उसके आत्मा के उत्साह की मैं सराहना किए बिना न रह सका।
बाद में मैंने उसे बताया कि मुझे क्या नापसन्द था; अर्थात्: 1. उसका बीच-बीच में इतने अजीब ढंग से चीखना कि कोई मुश्किल से समझ पाता कि वह क्या कह रहा है; 2. उसका यह सोचना कि उसमें आत्माओं को चमत्कारिक रूप से पहचानने की शक्ति है।"
— जर्नल, नवम्बर, 1762।
"एक और धारणा है, आपकी प्रभुता (लंदन के बिशप) कहती है, जो हम इन लोगों के लेखों में फैली पाते हैं, और वह है भीतरी, गुप्त और अचानक प्रेरणाओं को अपने कामों, निश्चयों और योजनाओं का मार्गदर्शक बनाना।
श्री चर्च ने पहले भी यही आपत्ति उठाई थी।
'परमेश्वर के वचन को अपने कामों का नियम बनाने के बदले, वह केवल अपनी गुप्त प्रेरणा का अनुसरण करता है।'
मैं आज्ञा चाहता हूँ कि
मसीही सिद्धता,
वही उत्तर दूँ।
भाषा के पूरे विस्तार में कोई कथन ऐसा नहीं जो मुझ पर इससे कम लागू होता हो।
मैंने बार-बार घोषित किया है कि मैं परमेश्वर के वचन को अपने सब कामों का नियम बनाता हूँ; और उसके बदले किसी 'गुप्त प्रेरणा' का मैं उतना ही अनुसरण नहीं करता जितना मुहम्मद या कन्फ़्यूशियस का।" — रचनाएँ, खण्ड 5, पृ. 341।
अपने भाई को, 1762: — "हमारे बहुत-से भाई लंदन में संयमी मसीही जीवन की सीमा लाँघ रहे हैं।
ओह, कि मैं दरार में खड़ा हो सकता!
ओह, कि मैं स्वयं को बलिदान करके उन्माद की इस विशाल खाई को बन्द कर सकता, जो हमारे बीच अपना मुँह खोल रही है!
सर्वोत्तम वस्तुओं का बिगाड़ सदा सबसे बुरा बिगाड़ होता है।" — आर्मिनियन मैगज़ीन, 1795, पृ. 151।
"दोपहर को मैं, सदा की भाँति, उनसे मिला जो मानते हैं कि वे पाप से बचाए गए हैं, और उन्हें उस उन्माद के विषय में चेताया जो घुस रहा था, दो-तीन निर्बल, यद्यपि भले, मनुष्यों के द्वारा, जिन्होंने प्रकाशितवाक्य के एक गलत समझे गए पद से यह निष्कर्ष निकाला कि वे नहीं मरेंगे।
उन्होंने चेतावनी को बड़े प्रेम से स्वीकार किया।" — जर्नल, 1762।
"सायंकाल मैंने यार्म में प्रचार किया; परन्तु मैंने पाया कि मसीही सिद्धता के भले सिद्धान्त की चर्चा वहाँ कुछ समय से नहीं हुई थी।
लंदन में हमारे बेचारे भाइयों की उच्छृंखलता ने उसे दो सौ मील से अधिक दूर भी लज्जित कर दिया है; इस प्रकार सिद्धता के इन अजीब पक्षधरों ने उसे उससे गहरा घाव दिया है जितना उसके सब विरोधी मिलकर भी नहीं दे सकते थे!" — जर्नल, 1763।
"इस पूरे सप्ताह मैंने उन्हें दृढ़ करने का यत्न किया जो मसीही सिद्धता के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त के विषय में डगमगा गए थे, चाहे उसके उच्छृंखल पक्षधरों के द्वारा, या चतुर विरोधियों के द्वारा, जिन्होंने उस उच्छृंखलता का बहुत लाभ उठाया।
यह अवश्य है कि ऐसी ठोकरें आएँगी; परन्तु 'हाय उस पर जिसके द्वारा ठोकर आती है'!" — जर्नल, अक्तूबर, 1763।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
"मैं घोड़े पर न्यूकैसल पहुँचा, जहाँ मेरी बिलकुल अपेक्षा नहीं थी।
मैंने पाया कि पिछली बार मेरे यहाँ आने के बाद से श्रोता, सोसाइटी और विश्वासी, सब बढ़ गए हैं; और कुछ और लोग मानते हैं कि वे पाप से बचाए गए हैं।
इस बीच शैतान भी निष्क्रिय नहीं रहा।
दो व्यक्ति जॉर्ज बेल के पीछे कदम-कदम चल रहे थे, कि 'आत्म-परीक्षण की आवश्यकता नहीं', 'मनुष्य से शिक्षा पाने की आवश्यकता नहीं', और उसकी अधिकांश अन्य अशास्त्रीय अतियों में; परन्तु चूँकि वे अब भी सलाह मानने योग्य मन के प्रतीत हुए, कम से कम इस समय के लिए, इसलिए फन्दा टूट गया।" — जर्नल,
अप्रैल, 1765।
सुश्री बोल्टन को, 1772: — "मैंने लंदन में जो देखा, उसी ने पहली चेतावनी
आपको देने का कारण दिया।
जॉर्ज बेल, विलियम ग्रीन, और अन्य अनेक, जो तब प्रेम से भरे थे, परमेश्वर की ओर से असाधारण प्रकाशनों और प्रकटीकरणों से कृपापात्र हुए।
परन्तु इसी बात के द्वारा शैतान ने उन्हें उस सरलता से बहका दिया जो मसीह में है।
अज्ञात क्रम से वे इन असाधारण वरदानों को परमेश्वर के साधारण अनुग्रह से अधिक मूल्य देने लगे; और मैं उन्हें विश्वास न दिला सका कि नम्र प्रेम का एक कण इन सब वरदानों को मिलाकर भी उनसे उत्तम है।
मेरी प्रिय मित्र, यही कारण था कि मैं आपके विषय में डरा।
यही कारण है कि मैं आपको बार-बार स्मरण दिलाता हूँ।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 115।
सुश्री रिची को, 1776: — "ओह, प्रेम से भिन्न स्वभाव की किसी वस्तु की इच्छा मत कीजिए! पृथ्वी या स्वर्ग में इससे ऊँचा कुछ नहीं।
जिस किसी बात की चर्चा वह करता है जो इससे ऊँची प्रतीत होती है, वह या तो स्वाभाविक या अलौकिक उन्माद है।
इन असाधारण बातों में से किसी की इच्छा मत कीजिए।
ऐसी इच्छा हज़ार भ्रमों का द्वार बन सकती है।
मैं चाहता हूँ कि आपकी सब इच्छाएँ इसी में केन्द्रित हों, — 'मैं गवाही चाहता हूँ, प्रभु, कि जो कुछ मैं करता हूँ वह ठीक है!
तेरी इच्छा और वचन के अनुसार, तेरी दृष्टि में भाता हुआ।
मसीही सिद्धता,
मैं इससे ऊँची अवस्था नहीं माँगता, बस इतना मुझे दे दे!
और शीघ्र या देर से, फिर मुझे अपने अनन्त आनन्द में पहुँचा दे!'" रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 178।
सुश्री लॉक्सडेल को, 1781: — "मैं किसी के भी अनुभव या भाषा में जो कुछ विशेष हो, उससे बचता हूँ, उससे डरता हूँ।
मैं कुछ नहीं चाहता, मैं कुछ स्वीकार नहीं करूँगा, केवल साझा विश्वास और साझा उद्धार को; और मैं चाहता हूँ, मेरी प्रिय बहन, कि आप ठीक वैसी ही साधारण मसीही बनें जैसी जेनी कूपर थी।
मदाम बूरिन्यों के नए शब्दों का स्वाभाविक झुकाव आपको विचारों का एक नया समूह देने की ओर था।
वे निश्चय ही आपकी कल्पना को काम में लगा देंगे, और आपको अद्भुत बातें कल्पित कराएँगे; परन्तु वे केवल छायाएँ थीं।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 219।
सुश्री एच. ए. रो को, 1781: — "लंदन में हमारे बहुत-से भाइयों और बहनों ने, आत्मा के उस महान उण्डेले जाने के समय, कई नई आशीषों की चर्चा की जो उन्होंने पाई थीं।
परन्तु अन्त में, उन्हें शुद्ध प्रेम से ऊँचा कुछ न मिला; जिसके साथ सामान्यतः आशा का पूर्ण निश्चय रहता है।
इसी को प्रेरित लेख सदा सर्वोच्च बिन्दु के रूप में प्रस्तुत करते हैं; केवल उसकी असंख्य मात्राएँ हैं।
प्लेरोफ़ोरी, अर्थात् विश्वास का पूर्ण निश्चय, अभी परमेश्वर के अनुग्रह में होने का ऐसा स्पष्ट दृढ़ विश्वास है, जो उसके विषय में सब सन्देह और भय को दूर कर देता है।"
— रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 193।
सुश्री बोल्टन को, 1784: — "आप अपने अनुभव से सबको, विशेषकर युवाओं को, परमेश्वर के लिखित वचन के सिवा किसी और बात पर बल देने से बचाने में अधिक समर्थ होंगी।
उन्हें इस खतरनाक रीति से तर्क करने से बचाइए, 'यदि मैं इसमें धोखा खा गया, तो मैं स्वयं को
धर्मी ठहराया हुआ समझने में भी धोखा खा गया।'
बिलकुल नहीं: यद्यपि बाद के मामले में स्वभाव या शैतान ने
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
परमेश्वर के कामों की नकल बड़ी खूबी से की।"
— रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 118।
सुश्री बोल्टन को, 1785: — "मैंने प्रायः अपने और दूसरों में ऐसी प्रवृत्ति पाई है कि हम उन घटनाओं को जोड़ देते हैं जिनका आपस में कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं।
इसलिए कोई कहता है, 'मुझे इतना निश्चय है कि यह परमेश्वर की इच्छा है, जितना कि मैं धर्मी ठहराया गया हूँ।'
कोई और कहता है, 'परमेश्वर ने यह मेरे हृदय से उतने ही निश्चय से कहा जितना उसने कभी मुझसे कहा है।'
यह सोचने या बोलने का अत्यन्त खतरनाक ढंग है।
हम नहीं जानते कि यह हमें कहाँ ले जाएगा।
यह हमारे धर्म की नींव ही खोखली कर सकता है।
यह हमें अनजाने में ईश्वरवाद (डीइज़्म) या नास्तिकता में खींच सकता है।
मेरी प्रिय नैन्सी, मेरी बहन, मेरी मित्र, इससे सावधान रहिए!" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 119।
"मुख्यतः इन विशाल पहाड़ों के बीच ही इतने लोग जगाए गए, धर्मी ठहराए गए, और शीघ्र ही प्रेम में सिद्ध किए गए; परन्तु जब वे प्रेम से भरे हैं, तब भी शैतान उनमें से बहुतों को अति की ओर धकेलने का यत्न करता है।
यह कई बातों में दिखता है: —1. प्रायः तीन-चार, वरन् दस-बारह, सब एक साथ ऊँचे स्वर में प्रार्थना करते हैं।
2. उनमें से कुछ, सम्भवतः बहुत-से, जितना ऊँचा हो सके उतना ऊँचा, सब एक साथ चीखते हैं।
3. उनमें से कुछ प्रार्थना में अनुचित, वरन् अशोभनीय, शब्दों का प्रयोग करते हैं।
4. कई मृतक की भाँति गिर पड़ते हैं; और शव के समान अकड़ जाते हैं; परन्तु कुछ देर में उछलकर खड़े हो जाते हैं, और सम्भवतः बीस बार एक साथ चिल्लाते हैं, 'महिमा! महिमा!'
ठीक इसी प्रकार फ़्रांसीसी भविष्यद्वक्ता, और अभी हाल में वेल्स के कूदनेवाले, सच्चे कार्य को तिरस्कार का पात्र बना देते हैं।
फिर भी जब कभी हम उन्हें डाँटें, तो यह यथासम्भव अत्यन्त नम्र और कोमल रीति से होना चाहिए।" — जर्नल, अप्रैल, 1786।
रेव. फ़्रीबॉर्न गैरेट्सन को, 1789: — "एक महान पुरुष कहते हैं कि आत्मा की अगुवाई तीन प्रकार की होती है।
कुछ को वह हर अवसर पर उपयुक्त शास्त्रपद देकर चलाता है; कुछ को
मसीही सिद्धता,
उनके हर कदम के लिए कारण सुझाकर, — यही वह मार्ग है जिससे वह मुख्यतः मेरी अगुवाई करता है; और कुछ को भीतरी प्रभावों से; परन्तु वे अन्तिम को सबसे कम वांछनीय मार्ग मानते हैं; क्योंकि प्रायः अन्धकारपूर्ण प्रभावों को ईश्वरीय, या शैतानी तक से अलग करना असम्भव होता है। — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 187।
रेव. फ़्रीबॉर्न गैरेट्सन को, 1789: — "परन्तु आपके पत्र में एक अभिव्यक्ति दो-तीन बार आई है, जो मुझे कुछ चिन्ता देती है; आप यह या वह करने की स्वतंत्रता पाने की बात करते हैं।
यह ऐसा शब्द है जिसका दुरुपयोग होने की बहुत सम्भावना है।
यदि किसी काम के लिए मेरे पास स्पष्ट शास्त्रपद, या स्पष्ट तर्क है, तो ठीक है।
ये मेरे नियम हैं, और मेरे एकमात्र नियम हैं।
मैं इसकी परवाह नहीं करता कि मुझे स्वतंत्रता मिली या नहीं।
यह एक अशास्त्रीय अभिव्यक्ति है, और बहुत भ्रामक नियम।
मैं चाहता हूँ कि हर बात में, बड़ी हो या छोटी, एक शास्त्रीय, विवेकशील मसीही बनूँ।" — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 186।
"कुछ लोग (कुल संख्या की तुलना में बहुत थोड़े) पहले उन्माद के आगे झुके, फिर अभिमान के; फिर पूर्वाग्रह और रोष के; और अन्त में अपने भाइयों से अलग हो गए। परन्तु यद्यपि इसने मार्ग में एक बड़ी ठोकर रख दी, तथापि परमेश्वर का कार्य आगे बढ़ता गया।
और आज तक यह अपनी किसी भी शाखा में थमा नहीं है।
परमेश्वर अब भी कायल करता है, धर्मी ठहराता है, पवित्र करता है।
हमने केवल मैल खोया, अर्थात् उन्माद, पूर्वाग्रह और रोष।
शुद्ध सोना बना रहा, 'विश्वास जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है'; वरन् प्रतिदिन बढ़ता गया। — रचनाएँ, खण्ड 7, पृ. 384।
"मेरे हाथों में अब भी बहुतायत से पत्र हैं, जो अब तक छपे किसी भी पत्र के बराबर हैं।
सचमुच, इनमें से बहुतों में, जो वर्ष 1759 और उसके बाद के कुछ वर्षों में लिखे गए, विचार और भाषा की एक विशेष शक्ति है, जो आत्मा के उस असाधारण उण्डेले जाने के अनुरूप है, जिससे उस सुखद काल में लंदन और इंग्लैंड तथा आयरलैंड के अनेक भाग कृपापात्र हुए। सुखद,
मैं उसे कहे बिना नहीं रह सकता, उन जंगली दानों के होते हुए भी जिन्हें शैतान ने
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
गेहूँ के बीच बोने का उपाय निकाल लिया।
और मैं स्कॉटलैंड के एक भक्त मनुष्य की उस प्रार्थना को अपनाए बिना नहीं रह सकता, जो उसने ऐसे ही अवसर पर की थी, 'हे प्रभु, यदि तुझे भाए, तो वही कार्य फिर कर, दोषों के बिना; परन्तु यदि यह न हो सके, तो सब दोषों के साथ भी वही कार्य कर।'"
— आर्मिनियन मैगज़ीन, 1780।
श्री वेस्ली ने धर्मोन्माद के साथ कैसा व्यवहार किया, यह 1762 में अपने भाई चार्ल्स को लिखे एक पत्र में दिखता है: —
"इस सप्ताह मैंने पाँच-छह निष्कपट उन्मादियों के विषय में अपना मन कहना आरम्भ किया है।
परन्तु मैं एक बार में केवल बाल भर आगे बढ़ता हूँ।
कठोरता से कुछ लाभ नहीं होगा।
आवश्यकता है एक स्त्री के हाथ की, और साथ ही सिंह के हृदय की।"
1768 तक भी श्री वेस्ली लिखते हैं: "यदि सौ उन्मादियों को अलग कर दिया जाए, तब भी हम गवाहों के बड़े बादल से घिरे हैं, जिन्होंने उस सिद्धता की, जो हम चालीस वर्ष से सिखाते आए हैं, जीवन और मृत्यु में गवाही दी है और दे रहे हैं।" — जर्नल, अगस्त, 1768।
मसीही सिद्धता,
खण्ड 26।
सम्मेलन की वार्ताओं के कार्यवृत्त।
मंगलवार प्रातः, 26 जून, 1759 को पवित्रीकरण के सिद्धान्त पर विचार किया गया।
इन वार्ताओं का एक भाग "सरल विवरण" में अलग-अलग अंशों में दिया गया है।
मैं उन्हें वैसे ही देता हूँ जैसे वे उनकी रचनाओं में मिलते हैं।
पवित्र किए जाने का क्या अर्थ है?
परमेश्वर के स्वरूप में, धार्मिकता और सच्ची पवित्रता में नया किया जाना।
क्या विश्वास पवित्रीकरण की शर्त है, या साधन?
वह उसकी शर्त भी है और साधन भी।
जब हम विश्वास करना आरम्भ करते हैं, तब पवित्रीकरण आरम्भ होता है।
और जैसे-जैसे विश्वास बढ़ता है, पवित्रता बढ़ती है, जब तक हम नए सिरे से रचे न जाएँ।
सिद्ध मसीही होने का क्या तात्पर्य है?
प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय, अपनी सारी बुद्धि, प्राण और शक्ति से प्रेम रखना; व्यवस्थाविवरण 6:5; 30:6;
यहेजकेल 36:25, 29) क्या इसका अर्थ यह है कि सारा भीतरी पाप दूर कर दिया जाता है?
निस्संदेह; अन्यथा यह कैसे कहा जा सकता है कि हम "अपनी सारी अशुद्धता से" बचाए गए हैं? पद 29।
क्या हम ऐसे व्यक्ति को पहचान सकते हैं जो इस प्रकार बचाया गया हो?
इसका उचित प्रमाण क्या है?
आत्माओं को परखने की चमत्कारिक सामर्थ्य के बिना हम उन लोगों के विषय में पूर्ण निश्चय के साथ नहीं कह सकते जो इस प्रकार बचाए गए हैं।
परन्तु हमारी समझ में, वस्तु के स्वभाव के अनुसार सबसे उत्तम प्रमाण ये होंगे: (1.) यदि हमारे पास इस बात का पर्याप्त प्रमाण हो कि
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
उनका पिछला आचरण निर्दोष रहा है।
(2.) यदि वे उस समय और रीति का, जिसमें वे पाप से बचाए गए, तथा उसकी परिस्थितियों का स्पष्ट वर्णन ऐसी खरी बातों में करें जिन पर कोई दोष न लगाया जा सके।
और (3.) यदि बाद में समय-समय पर कड़ी जाँच करने पर यह प्रकट हो कि उनके सारे स्वभाव, वचन और कार्य पवित्र और निर्दोष थे।
जो लोग समझते हैं कि वे इस स्थिति को प्राप्त कर चुके हैं, उनके साथ हमें कैसा व्यवहार करना चाहिए?
उन्हें उभारें कि वे पीछे की बातों को भूल जाएँ, और सदा जागते तथा प्रार्थना करते रहें, कि परमेश्वर उनके हृदयों की तह तक खोज ले।— रचनाएँ, खंड 5, पृ. 197।
आरम्भ में हम लगभग पूरी तरह अविश्वासियों को ही प्रचार करते थे।
इसलिए उनसे हम लगभग निरन्तर मसीह की मृत्यु के द्वारा पापों की क्षमा और उनके लहू पर विश्वास के स्वरूप के विषय में बोलते थे।
और अब भी हम ऐसा ही करते हैं, उन लोगों के बीच जिन्हें मसीह के सुसमाचार की आरम्भिक बातें सिखाए जाने की आवश्यकता है।
परन्तु जिनमें नींव पहले ही डाली जा चुकी है, उन्हें हम सिद्धता की ओर आगे बढ़ने के लिए उभारते हैं; इसे हमने आरम्भ में इतने स्पष्ट रूप से नहीं देखा था, यद्यपि आरम्भ से ही हम कभी-कभी इसकी चर्चा करते थे।— रचनाएँ, खंड 5, पृ. 209।
क्या हम सामान्यतः धर्मी ठहराए गए अवस्था को उतना महान और सुखी बताते हैं जितनी वह है?
; सम्भवतः नहीं।
ज्योति में चलनेवाला विश्वासी अवर्णनीय रूप से महान और सुखी है।
क्या हमें इस बात से सावधान नहीं रहना चाहिए कि पूर्ण पवित्रीकरण की अवस्था को ऊँचा दिखाने के लिए हम धर्मी ठहराए जाने को घटाकर न बताएँ?
निस्संदेह हमें इससे सावधान रहना चाहिए; क्योंकि मनुष्य अनजाने में इसमें फिसल सकता है।
हम इससे प्रभावी रूप से कैसे बच सकते हैं?
जब हम पूर्ण पवित्रीकरण के विषय में बोलने जाएँ, तब पहले धर्मी ठहराए गए अवस्था की आशीषों का यथासम्भव प्रबल वर्णन करें।— रचनाएँ, खंड 5, पृ. 201।
मसीही सिद्धता,
पूर्ण पवित्रीकरण के विषय में हमसे भिन्न मत रखनेवाले हमारे भाई कितना स्वीकार करते हैं? वे मानते हैं (1.) कि मृत्यु के समय हर एक को पूर्ण रूप से पवित्र किया जाना अवश्य है।
(2.) कि तब तक विश्वासी प्रतिदिन अनुग्रह में बढ़ता जाता है और सिद्धता के अधिकाधिक निकट आता जाता है।
(3.) कि हमें निरन्तर इसी की ओर बढ़ते रहना चाहिए और दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए उभारना चाहिए।
हम उनके लिए कितना स्वीकार करते हैं?
, हम मानते हैं, (1.) कि जो लोग विश्वास में मरे हैं, वरन हमारे जाने हुए उनमें से अधिकांश, मृत्यु से कुछ ही पहले तक सर्वांग में पवित्र नहीं किए गए थे, और प्रेम में सिद्ध नहीं किए गए थे।
(2.) कि "पवित्र किए गए" शब्द का प्रयोग संत पौलुस सदा उन सब के लिए करता है जो धर्मी ठहराए गए थे, अर्थात् सच्चे विश्वासियों के लिए।
(3.) कि केवल इसी शब्द से उसका अर्थ, यदि कभी हो भी तो, बहुत कम "सारे पाप से बचाए गए" होता है।
(4.) कि इसलिए इस अर्थ में इसका प्रयोग "पूरी रीति से, सम्पूर्ण रूप से" या ऐसे ही किसी शब्द को जोड़े बिना करना उचित नहीं।
(5.) कि प्रेरित लेखक लगभग सदा धर्मी ठहराए हुओं के विषय में या उन्हीं से बोलते हैं; परन्तु पूरी रीति से पवित्र किए हुओं के विषय में या उनसे बहुत ही कम बोलते हैं।
(6.) कि इसलिए हमें सार्वजनिक रूप से लगभग सदा धर्मी ठहराए जाने की अवस्था के विषय में बोलना उचित है; परन्तु पूर्ण पवित्रीकरण के विषय में पूर्ण और स्पष्ट शब्दों में कम बोलना।
तो फिर वह बात क्या है जिसमें हम अलग होते हैं?
यह है: क्या हमें मृत्यु के समय से पहले सारे पाप से बचाए जाने की आशा रखनी चाहिए।
क्या इसकी कोई स्पष्ट पवित्रशास्त्रीय प्रतिज्ञा है कि परमेश्वर हमें सारे पाप से बचाएगा?
है:
"वह इस्राएल को उसके सारे पापों से छुड़ा लेगा,"
भजन संहिता 130:8।
यह और अधिक विस्तार से यहेजकेल की भविष्य-
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
द्वाणी में कही गई है:
"तब मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; मैं तुम्हें तुम्हारी सारी अशुद्धता से और तुम्हारी सारी मूरतों से शुद्ध करूँगा।
मैं तुम्हें तुम्हारी सारी अशुद्धता से भी बचाऊँगा," 36:25, 29।
इससे अधिक स्पष्ट प्रतिज्ञा और कोई नहीं हो सकती।
और प्रेरित इसी की ओर स्पष्ट संकेत करता है इस उपदेश में:
"इसलिए जब कि ये प्रतिज्ञाएँ हमें मिली हैं, तो आओ, हम अपने आप को शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध करें, और परमेश्वर का भय रखते हुए पवित्रता को सिद्ध करें," 2 कुरिन्थियों 7:1।
उतनी ही स्पष्ट और सुनिश्चित वह प्राचीन प्रतिज्ञा है: "तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे हृदय का और तेरे वंश के हृदय का खतना करेगा, कि तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे हृदय और अपने सारे प्राण से प्रेम रखे," व्यवस्थाविवरण
30:6। परन्तु क्या नए नियम में इसके अनुरूप कोई कथन मिलता है?
मिलता है, और अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में कहा गया है। जैसे संत
यूहन्ना: "परमेश्वर का पुत्र इसलिए प्रकट हुआ कि शैतान के कामों को नष्ट करे," 3:8, बिना किसी सीमा या प्रतिबन्ध के: और सारा पाप शैतान का काम है।
इसके समान संत पौलुस का यह कथन है: "मसीह ने कलीसिया से प्रेम किया और अपने आप को उसके लिए दे दिया; कि उसे अपने सामने ऐसी तेजस्वी कलीसिया बनाकर खड़ा करे जिसमें न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु हो, वरन वह पवित्र और निष्कलंक हो," इफिसियों 5:25, 27।
और इसी आशय का उसका कथन रोमियों के आठवें अध्याय में है: "परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा — कि व्यवस्था की धार्मिकता हममें पूरी हो, जो शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं," पद 3, 4।
क्या नए नियम में सारे पाप से बचाए जाने की आशा रखने का और कोई आधार मिलता है?
निस्संदेह मिलता है, उन प्रार्थनाओं और आज्ञाओं में जो सबसे प्रबल कथनों के बराबर हैं।
आपका किन प्रार्थनाओं से तात्पर्य है?
पूर्ण पवित्रीकरण के लिए की गई प्रार्थनाएँ; यदि ऐसी कोई वस्तु न होती तो ये परमेश्वर का उपहास मात्र होतीं।
विशेषकर ये हैं, (1.) "हमें बुराई से बचा;" या अधिक ठीक, "उस
मसीही सिद्धता,
दुष्ट से (बचा)।"
अब जब यह हो जाए, जब हम सब बुराई से छुड़ा लिए जाएँ, तब कोई पाप शेष नहीं रह सकता।
(2.) "मैं केवल इन्हीं के लिए बिनती नहीं करता, परन्तु उनके लिए भी जो इनके वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे; कि वे सब एक हों; जैसा तू, हे पिता, मुझ में है और मैं तुझ में, वैसे ही वे भी हम में एक हों।
मैं उनमें और तू मुझ में, कि वे सिद्ध होकर एक हो जाएँ," यूहन्ना 17:20, 21, 23।
(3.) "मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता के सामने घुटने टेकता हूँ — कि वह तुम्हें दे — कि तुम प्रेम में जड़ पकड़कर और नींव डालकर सब पवित्र लोगों के साथ भली-भाँति समझने की सामर्थ्य पाओ कि उसकी चौड़ाई, लम्बाई, ऊँचाई और गहराई कितनी है; और मसीह के उस प्रेम को जान सको जो ज्ञान से परे है, कि तुम परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण हो जाओ," इफिसियों 3:14, 16-19।
-(4.) "शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा, प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन तक निर्दोष सुरक्षित रहें," 1 थिस्सलुनीकियों 5:23।
इसी आशय की कौन-सी आज्ञा है?
(1.) "इसलिए तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है," मत्ती 5:48।
(2.) "तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय, अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख," मत्ती 22:37।
परन्तु यदि परमेश्वर का प्रेम सारे हृदय को भर दे, तो वहाँ कोई पाप नहीं रह सकता।
परन्तु यह कैसे प्रकट होता है कि यह मृत्यु के समय से पहले होना है?
पहला।
आज्ञा के स्वभाव ही से, जो मृतकों को नहीं, जीवितों को दी जाती है।
इसलिए "तू अपने सारे हृदय से परमेश्वर से प्रेम रख" का अर्थ यह नहीं हो सकता कि जब तू मरे तब ऐसा करना, परन्तु यह कि जब तक तू जीवित है।
दूसरा।
पवित्रशास्त्र के स्पष्ट पदों से:
(1.) "परमेश्वर का अनुग्रह जो उद्धार लानेवाला है, सब मनुष्यों पर प्रकट हुआ है, और हमें सिखाता है कि हम अभक्ति और सांसारिक अभिलाषाओं का इनकार (अर्नेसामेनोई) करके इस वर्तमान युग में संयम, धार्मिकता और भक्ति से जीवन बिताएँ; और उस धन्य आशा की अर्थात् अपने महान परमेश्वर और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के तेजोमय
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
प्रकट होने की बाट जोहते रहें; जिसने अपने आप को हमारे लिए दे दिया, कि हमें सब अधर्म से छुड़ा ले और शुद्ध करके अपने लिए एक ऐसी प्रजा बना ले जो उसकी अपनी हो और भले कामों में उत्साही हो," तीतुस 2:11-14।
(2.) "उसने हमारे लिए उद्धार का सींग खड़ा किया है, — कि हमारे पूर्वजों पर दया करे; उस शपथ को जो उसने हमारे पिता अब्राहम से खाई, कि वह हमें यह देगा कि हम अपने शत्रुओं के हाथ से छूटकर, जीवन भर उसके सामने पवित्रता और धार्मिकता से निडर होकर उसकी सेवा करें," लूका 1:69-75।
क्या पवित्रशास्त्र में ऐसे लोगों का कोई उदाहरण है जिन्होंने इसे प्राप्त किया हो?
हाँ।
संत यूहन्ना, और वे सब जिनके विषय में वह अपनी पहली पत्री में कहता है, "इसी से प्रेम हम में सिद्ध हुआ है कि हमें न्याय के दिन साहस हो; क्योंकि जैसा वह है, वैसे ही हम भी इस जगत में हैं," 4:17।
परन्तु नए नियम में इस प्रकार के और उदाहरण क्यों अंकित नहीं हैं?
इस विषय में हमें दृढ़तापूर्वक निश्चयात्मक होना शोभा नहीं देता।
एक कारण सम्भवतः यह हो सकता है कि प्रेरितों ने कलीसिया को तब लिखा जब वह शैशव की अवस्था में थी।
इसलिए सम्भव है कि उन्होंने ऐसे लोगों का उल्लेख कम किया, ताकि बच्चों को ठोस भोजन न दे बैठें।
क्या आप अब ऐसा एक उदाहरण दिखा सकते हैं? ऐसा सिद्ध जन कहाँ है?
इस प्रकार पूछनेवालों में से कुछ को कोई यह उत्तर दे सकता है, "यदि मैं जानता भी, तो तुम्हें न बताता।
क्योंकि तुम प्रेम से नहीं पूछ रहे।
तुम हेरोदेस के समान हो।
तुम बालक को केवल इसलिए ढूँढ़ते हो कि उसे मार डालो।"
परन्तु अधिक सीधे रूप में हम उत्तर देते हैं कि असंख्य कारण हैं कि क्यों थोड़े ही (यदि कोई हों) निर्विवाद उदाहरण हों।
ऐसा करना उस व्यक्ति के लिए ही कितनी कठिनाइयाँ लाएगा, जो सबके निशाने के लिए लक्ष्य बना दिया जाए।
यह दूसरों के लिए कितनी बड़ी परीक्षा होगी, केवल उन मनुष्यों के लिए नहीं जो परमेश्वर को नहीं जानते, वरन स्वयं विश्वासि-
मसीही सिद्धता,
यों के लिए भी!
ऐसे व्यक्ति की मूर्तिपूजा करने से वे कितनी कठिनाई से बच पाएँगे!
और फिर भी विरोधियों के लिए यह कितना निष्फल होगा!
"क्योंकि यदि वे मूसा और भविष्यद्वक्ताओं की नहीं सुनते," मसीह और उसके प्रेरितों की, "तो यदि कोई मरे हुओं में से जी उठे तब भी उसे न मानेंगे।"
मान लीजिए कि किसी ने इसे प्राप्त कर लिया है, तो क्या आप उसे इसके विषय में बोलने की सलाह देंगे?
उन से नहीं जो परमेश्वर को नहीं जानते।
इससे वे केवल विरोध और निन्दा करने को उकसाएँगे; और किसी से भी बिना किसी विशेष कारण के, बिना किसी विशेष भलाई को दृष्टि में रखे नहीं।
और तब उन्हें घमण्ड के हर आभास से बचने की विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
क्या उनकी बात पर विश्वास न करना पाप है जो कहते हैं कि उन्होंने इसे प्राप्त कर लिया है?
बिलकुल नहीं, चाहे वे सच ही क्यों न कहते हों।
हमें शीघ्रता से विश्वास नहीं करना चाहिए, वरन पूरा और दृढ़ प्रमाण मिलने तक अपना निर्णय रोके रखना चाहिए।
परन्तु क्या हममें उन लोगों के प्रति, जो कहते हैं कि वे सारे पाप से बचाए गए हैं, भीतर-भीतर अरुचि होने की प्रवृत्ति नहीं होती?
यह बहुत सम्भव है कि ऐसा हो, और कई कारणों से; कुछ तो परमेश्वर की महिमा और उन प्राणों की भलाई की चिन्ता से, जिन्हें हानि पहुँच सकती है, वरन जो भटक सकते हैं, यदि ये वैसे न हों जैसा वे दावा करते हैं; कुछ उन पर एक प्रकार की अप्रकट डाह से जो हमसे ऊँची उपलब्धियों की बात करते हैं; और कुछ परमेश्वर के कामों पर विश्वास करने में हमारे हृदय की मन्दता और अनिच्छा से।
क्या कठोरता से सिद्धता का प्रचार करना विश्वासियों को एक प्रकार की दासता या दास-सदृश भय में डालने की प्रवृत्ति नहीं रखता?
रखता है; इसलिए हमें इसे सदा सबसे मनोहर रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि वह केवल आशा, आनन्द और अभिलाषा जगाए।
हम सिद्ध किए जाने तक भी विश्वास के आनन्द में क्यों न बने रहें?
क्यों नहीं भला! क्योंकि पवित्र शोक इस आनन्द को नहीं बुझाता; क्योंकि जब हम क्रूस के नीचे होते हैं, जब हम गहराई से
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
मसीह के दुःखों में सहभागी होते हैं, तब भी हम अवर्णनीय आनन्द के साथ आनन्दित हो सकते हैं।
क्या हम विश्वासियों को सदा आनन्दित रहने से हतोत्साहित नहीं करते?
हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।
वे जीवन भर परमेश्वर के सामने आनन्दित रहें, बस श्रद्धा के साथ।
और यदि उनके आनन्द में हल्कापन या घमण्ड मिल भी जाए, तो हम स्वयं आनन्द पर (यह परमेश्वर का दान है) नहीं, परन्तु उस हल्केपन या घमण्ड पर प्रहार करें, ताकि बुराई मिट जाए और भलाई बनी रहे।
क्या हमें सिद्धता के विषय में इस चिन्ता से व्याकुल रहना चाहिए कि कहीं उसे पाने से पहले ही हमारी मृत्यु न हो जाए?
किसी भी रीति से नहीं।
हमें किसी भी बात की ऐसी चिन्ता नहीं करनी चाहिए, न आत्मिक की, न सांसारिक की।
परन्तु क्या हमें उस पापमय स्वभाव के कारण व्याकुल नहीं होना चाहिए जो अब भी हममें बना है?
हमारे लिए उचित है कि हम इसका गहरा बोध रखें और प्रभु के सामने बहुत लज्जित हों: परन्तु इससे हमें केवल यही और अधिक तत्परता से प्रेरित होना चाहिए कि हम हर क्षण मसीह की ओर फिरें और उससे ज्योति, जीवन और बल लेते रहें, ताकि हम जीतते हुए और जय पाने को आगे बढ़ते जाएँ।
और इसलिए जब हमारे पाप का बोध अधिक बढ़े, तब उसके प्रेम का बोध उससे कहीं अधिक बढ़ना चाहिए।
क्या अनुग्रह में बढ़ने के साथ हमारा आनन्द बढ़ेगा या हमारी व्याकुलता?
सम्भवतः दोनों।
परन्तु निस्संदेह प्रभु में हमारा आनन्द उसी के अनुसार बढ़ेगा जैसे हमारा प्रेम बढ़ता है।
क्या विश्वासियों को निरन्तर अपने जन्मजात पाप पर ही ध्यान गड़ाए रहना सिखाना उन्हें यह भुला देने का सीधा मार्ग नहीं कि वे अपने पिछले पापों से शुद्ध किए गए थे?
हम अनुभव से पाते हैं कि है; या उन्हें इसे तुच्छ समझने और छोटी बात मानने की ओर ले जाना; जबकि वास्तव में (यद्यपि इसके पीछे और भी बड़े दान हैं) यह अवर्णनीय रूप से महान और महिमामय है। — रचनाएँ, खंड 5, पृ. 207-209।
सब विश्वासियों को दृढ़ता और स्पष्टता से उभारें कि वे "सिद्धता की ओर आगे बढ़ें।"
कि हम "सब एक ही बात कहें," मैं एक बार ही सदा के लिए पूछता हूँ, क्या हम इस सिद्धता का बचाव करें, या इसे
मसीही सिद्धता,
छोड़ दें? आप सब इसका बचाव करने पर सहमत हैं, जिसका अर्थ (जैसा आरम्भ से हमारा रहा) परमेश्वर और मनुष्य के प्रेम से हमारे हृदय के भर जाने के द्वारा सारे पाप से उद्धार है।
रोमन कैथोलिक कहते हैं, "यह तब तक प्राप्त नहीं हो सकता जब तक हम शोधन-स्थान की आग से शुद्ध न कर लिए जाएँ।"
कैल्विनवादी कहते हैं, "नहीं, यह तभी प्राप्त हो जाएगा जैसे ही प्राण और देह अलग हों।"
पुराने मेथोडिस्ट कहते हैं, "यह मरने से पहले प्राप्त हो सकता है: एक क्षण बाद बहुत देर हो चुकी होती है।"
क्या ऐसा है या नहीं?
आप सब सहमत हैं कि हम मृत्यु से पहले सारे पाप से बचाए जा सकते हैं।
तब सार तो निश्चित हो गया; परन्तु परिस्थिति के विषय में, क्या परिवर्तन क्रमिक है या तात्कालिक?
यह दोनों ही है।
जिस क्षण से हम धर्मी ठहराए जाते हैं, उसी से क्रमिक पवित्रीकरण हो सकता है, अनुग्रह में बढ़ना, परमेश्वर के ज्ञान और प्रेम में प्रतिदिन आगे बढ़ना।
और यदि पाप मृत्यु से पहले समाप्त हो जाए, तो वस्तु के स्वभाव के अनुसार एक तात्कालिक परिवर्तन अवश्य होगा; एक अन्तिम क्षण होगा जिसमें वह था, और एक पहला क्षण जिसमें वह नहीं है।
"परन्तु क्या हमें प्रचार में दोनों पर ही बल देना चाहिए?"
निश्चय ही हमें क्रमिक परिवर्तन पर बल देना चाहिए; और वह भी गम्भीरता से और निरन्तर।
और क्या ऐसे कारण नहीं हैं कि हम तात्कालिक परिवर्तन पर भी बल दें? यदि मृत्यु से पहले ऐसा धन्य परिवर्तन होता है, तो क्या हमें सब विश्वासियों को इसकी आशा रखने के लिए प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए? और विशेषकर इसलिए कि निरन्तर अनुभव दिखाता है, वे जितनी गम्भीरता से इसकी आशा रखते हैं, उतनी ही तेज़ी और दृढ़ता से उनके प्राण में परमेश्वर का क्रमिक कार्य आगे बढ़ता है; वे सब पाप से उतने ही अधिक सावधान रहते हैं, अनुग्रह में बढ़ने के लिए उतने ही यत्नशील, भले कामों के लिए उतने ही उत्साही, और परमेश्वर की सब विधियों में उपस्थित होने में उतने ही नियमित।
जबकि जब यह आशा समाप्त हो जाती है, तब ठीक इसके विपरीत प्रभाव देखे जाते हैं।
वे "आशा से उद्धार पाए हैं," पूर्ण परिवर्तन की इस आशा से, जिसके साथ उद्धार धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।
इस आशा को नष्ट कर दें, तो वह उद्धार थम जाता है, या यों कहें कि प्रतिदिन घटता जाता है।
इसलिए जो कोई विश्वासियों में क्रमिक परिवर्तन को बढ़ाना चाहे, उसे तात्कालिक परिवर्तन पर दृढ़ता से बल देना चाहिए। — रचनाएँ, खंड 5, पृ. 233।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
खंड 27।
विविध।
"ये [पाप और भ्रष्टता] इस प्रकार साथ जोड़े जाते हैं मानो एक ही हों; परन्तु ये एक ही वस्तु नहीं हैं।
दोष एक बात है, सामर्थ्य दूसरी, और अस्तित्व तीसरी।
हम मानते हैं कि विश्वासी पाप के दोष और सामर्थ्य से छुड़ाए गए हैं; कि वे उसके अस्तित्व से भी छुड़ाए गए हैं, इसका हम इनकार करते हैं।" — वेस्ली के उपदेश, खंड 1, पृ. 113।
"धर्मी ठहरानेवाले विश्वास के साथ कौन-से पाप संगत हैं?"
"कोई जानबूझकर किया गया पाप नहीं।
यदि कोई विश्वासी जानबूझकर पाप करता है, तो वह अपने विश्वास को फेंक देता है।
न ही यह सम्भव है कि पहले पश्चाताप किए बिना उसे फिर से धर्मी ठहरानेवाला विश्वास प्राप्त हो।" — रचनाएँ, खंड 5, पृ. 195।
"विश्वास से उद्धार पर उपदेश में मैं कहता हूँ, 'जो परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता' (एक कथन जिसे एक अन्य उपदेश में विस्तार से समझाया गया है, और जो सर्वत्र स्पष्ट या अप्रत्यक्ष रूप से 'जब तक वह अपने आप को सुरक्षित रखता है' से जुड़ा है), 'किसी पापमय अभिलाषा के द्वारा नहीं; कोई अपवित्र अभिलाषा हो तो वह उसे जन्म लेते ही दबा देता है।'
(निश्चय ही वह दबा देता है, 'जब तक वह अपने आप को सुरक्षित रखता है')। 'न ही वह दुर्बलताओं के द्वारा पाप करता है, क्योंकि उसकी दुर्बलताओं में उसकी इच्छा की सहमति नहीं होती; और इसके बिना वे वास्तव में पाप नहीं हैं।"
— रचनाएँ, खंड 6, पृ. 535।
"मैं देखता हूँ कि इन दोनों की आत्मा और अनुभव ठीक समानान्तर चलते हैं।
परमेश्वर पिता और पुत्र के साथ निरन्तर संगति उनके हृदयों को नम्र प्रेम से भर देती है।
अब यही वह है जिसे मैंने सदा सिद्धता कहा है, और अब भी कहता हूँ।
और
मसीही सिद्धता,
मेरा विश्वास है कि बहुतों ने इसे प्राप्त किया है, उसी प्रमाण पर जिस पर मैं विश्वास करता हूँ कि बहुत-से धर्मी ठहराए गए हैं।
परमेश्वर उनकी संख्या हज़ार गुना बढ़ाए!" — पत्रिका, मार्च, 1760।
"बुधवार, 12। — यह इच्छा प्रकट करने पर कि पास के नगरों (लीड्स के आसपास) के जितने लोग, जो विश्वास करते थे कि वे पाप से बचाए गए हैं, मुझसे मिलें, मैंने इस दिन का अधिकांश भाग उनकी एक-एक करके जाँच करने में बिताया।
कुछ की गवाही मैं स्वीकार न कर सका; परन्तु सबसे बड़े भाग के विषय में यह स्पष्ट है (जब तक यह न माना जाए कि वे जानबूझकर और सोच-समझकर झूठ बोल रहे थे), 1. कि वे भीतर कोई पाप अनुभव नहीं करते; और अपनी जानकारी में कोई बाहरी पाप नहीं करते; 2. कि वे हर क्षण परमेश्वर को देखते और उससे प्रेम करते हैं, और सदा प्रार्थना करते, आनन्दित होते और धन्यवाद देते हैं: 3. कि उन्हें पवित्रीकरण के विषय में परमेश्वर की ओर से उतनी ही स्पष्ट गवाही निरन्तर मिलती है जितनी धर्मी ठहराए जाने के विषय में।
अब इसमें मैं आनन्दित हूँ, और आनन्दित होता रहूँगा, चाहे आप इसे कुछ भी कहें; और मैं चाहता हूँ कि परमेश्वर करे कि हज़ारों ने इतना अनुभव किया हो: फिर परमेश्वर जितना और चाहे उतना और अनुभव करें।" — पत्रिका, मार्च,
1760।
"रविवार, 4, गम्भीर आनन्द का दिन था, उतना ही जितना मैंने डबलिन में देखा था।
सन्ध्या के प्रेम-भोज में प्रकट हुआ कि परमेश्वर ने अब लिमरिक की भी सुधि ली है।
पाँच जनों ने परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहा, उसके क्षमा करनेवाले प्रेम के स्पष्ट बोध के लिए: कई और ने विश्वास की वृद्धि और सन्देहों तथा भयों से छुटकारे के लिए।
और दो ने सीधा, सरल वर्णन दिया कि परमेश्वर ने किस रीति से उनके हृदयों को शुद्ध किया, ऐसा कि अब वे न क्रोध, न घमण्ड, न स्वेच्छा अनुभव करते हैं; वरन निरन्तर प्रेम, प्रार्थना और स्तुति।" —
पत्रिका, जुलाई, 1762।
— "जिस प्रस्ताव को मैं थामे रखूँगा वह यह है: 'कोई व्यक्ति सारे पापमय स्वभावों से शुद्ध किया जा सकता है, और फिर भी प्रायश्चित्त के लहू की आवश्यकता रख सकता है।'
किसलिए?
'लापरवाहियों और अज्ञान-
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
Vet ances [अस्पष्ट मूल पाठ] के लिए;' शब्दों और कार्यों (तथा चूकों) दोनों के लिए, जो एक अर्थ में सिद्ध व्यवस्था का उल्लंघन हैं।
और मेरा विश्वास है कि कोई भी इनसे तब तक मुक्त नहीं होता जब तक वह इस नाशमान देह को न त्याग दे।" — रचनाएँ, खंड 6, पृ. 741।
Rew को, 1162 [अस्पष्ट मूल पाठ]:
"यहाँ तक मैं आपके साथ जा सकता हूँ, इससे आगे नहीं।
मैं अब भी कहता हूँ, और बिना किसी आत्म-विरोध के, कि मैं किसी जीवित व्यक्ति को नहीं जानता जो भविष्यद्वक्ता, याजक और राजा के रूप में मसीह की अपनी आवश्यकता का उतना गहरा बोध रखता हो जितना वे जो अपने को, और जिन्हें मैं भी, सारे पाप से शुद्ध किया हुआ मानता हूँ; अर्थात् सारे घमण्ड, क्रोध, बुरी अभिलाषा, मूर्तिपूजा और अविश्वास से।
यही जन पहले से कहीं अधिक अपने अज्ञान, अनुग्रह की अल्पता, मसीह के पूर्ण मन से चूकने, और अपने दिव्य आदर्श के अनुसार जैसा चल सकते थे उससे कम यथार्थता से चलने का अनुभव करते हैं: वे पहले से अधिक आश्वस्त हैं कि वे जो कुछ हैं, उनके पास जो कुछ है, या वे जो कुछ करते हैं, वह बिना मध्यस्थ के परमेश्वर की दृष्टि को सह पाने के लिए अपर्याप्त है; और उसकी आवश्यकता के बोध से पहले से कहीं अधिक भेदे गए हैं।"
— रचनाएँ, खंड 7, पृ. 36।
चार्ल्स वेस्ली को, 1766: — "जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता है उसकी वाणी निश्चय ही यह है, — 'मृत्यु से भी बुरा है, हे मेरे परमेश्वर, प्रेम करना, और केवल मेरे परमेश्वर ही को नहीं।'
ऐसा जन निश्चय ही 'पवित्रीकरण का उतना ही प्यासा है जितना वह कभी धर्मी ठहराए जाने का था।'
आपको स्मरण होगा, यह आपके निरन्तर प्रश्नों में से एक हुआ करता था।
अब नहीं है; इसलिए आपके विचार बदल गए हैं: और जब तक हम स्पष्टीकरण पर न आएँ, हम अनिवार्य रूप से एक-दूसरे का खण्डन करेंगे।
परन्तु यह किसी भी प्रकार नहीं होना चाहिए, यदि इससे बचा जा सकता है।
"मैं अब भी समझता हूँ कि सब दावा करनेवालों पर अविश्वास करना उस वस्तु का ही इनकार करने के बराबर है।
क्योंकि यदि उसका कोई जीवित गवाह नहीं
मसीही सिद्धता,
जिसका हमने बीस वर्ष प्रचार किया है, तो मैं अब और उसका प्रचार नहीं कर सकता, नहीं कर सकूँगा।
सारी बात एक ही बिन्दु पर आती है: क्या धर्मी ठहराए जाने और मृत्यु के बीच कोई तात्कालिक पवित्रीकरण है, या नहीं?
मैं कहता हूँ, हाँ।" — रचनाएँ, खंड 6, पृ. 668।
रेव. जॉन फ्लेचर को, 1768: — "मैं एक कदम और आगे जाऊँगा।
मैं शायद ही कभी ऐसे किसी से बातचीत को लाभदायक पाता हूँ जो पूर्ण उद्धार का प्यासा न हो, और जो हर क्षण उसे पाने की गम्भीर आशा से भरा न हो।
अब, जिनकी हम चर्चा कर रहे हैं उनमें आप इनमें से किसी को नहीं पाते; वरन इसके विपरीत बहुतों को, जो अनेक रीतियों से, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, परमेश्वर के इस धन्य कार्य का विरोध करते हैं; वह कार्य, मेरा तात्पर्य है, जो परमेश्वर इस सारे राज्य में अनपढ़ और साधारण मनुष्यों के द्वारा कर रहा है।" —
रचनाएँ, खंड 6, पृ. 686।
एक युवा शिष्य को, 1772: — "परीक्षा और पाप का भेद सरल हृदयवालों के लिए प्रायः काफ़ी स्पष्ट होता है; परन्तु कुछ अपवाद-स्वरूप मामलों में वह स्पष्ट नहीं होता: वहाँ हमें उस पवित्र जन के अभिषेक की आवश्यकता होती है।
स्वैच्छिक नम्रता, जो हर कमी को पाप कहती है, परमेश्वर को भली नहीं लगती।
पाप, ठीक-ठीक कहें तो, न कम न अधिक, 'परमेश्वर की किसी ज्ञात व्यवस्था का जानबूझकर उल्लंघन' है।" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 94।
'पवित्र एकान्तवासी' का वाक्यांश सुसमाचार से उतना ही असंगत है जितना 'पवित्र व्यभिचारी'।
मसीह का सुसमाचार सामाजिक धर्म के सिवा कोई धर्म नहीं जानता; सामाजिक पवित्रता के सिवा कोई पवित्रता नहीं।
'प्रेम के द्वारा कार्य करनेवाला विश्वास' मसीही सिद्धता की लम्बाई, चौड़ाई, गहराई और ऊँचाई है।
'हमें मसीह से यह आज्ञा मिली है कि जो परमेश्वर से प्रेम रखता है, वह अपने भाई से भी प्रेम रखे;' और कि हम अपना प्रेम 'सब मनुष्यों के साथ भलाई करने के द्वारा, विशेषकर विश्वासी घराने के लोगों के साथ' प्रकट करें।" — रचनाएँ, खंड 7, पृ. 393।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
1% "लम्बे अनुभव और निरीक्षण से मैं इस ओर झुका हूँ कि जो कोई यीशु के लहू में छुटकारा पाता है, जो कोई धर्मी ठहराया जाता है, उसे तब ऊँचे या नीचे मार्ग पर चलने का चुनाव मिलता है।
मेरा विश्वास है कि पवित्र आत्मा उस समय उसके सामने 'उत्तम मार्ग' रखता है, और उसे उस पर चलने, सँकरे मार्ग में भी सबसे सँकरी राह चुनने, पवित्रता की ऊँचाइयों और गहराइयों की अभिलाषा करने के लिए प्रेरित करता है,
— परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वरूप की अभिलाषा करने के लिए।
परन्तु यदि वह इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता, तो वह अनजाने में मसीहियों की निचली श्रेणी में गिर जाता है।
वह अब भी ऐसे मार्ग पर चलता रहता है जिसे अच्छा कहा जा सकता है, अपनी सीमा में परमेश्वर की सेवा करता है, और जीवन के अन्त में वाचा के लहू के द्वारा दया पाता है।
"मैं धुआँ देते सन को बुझाने से, — नीचे स्तर पर परमेश्वर की सेवा करनेवालों को निरुत्साहित करने से, कोसों दूर रहूँगा।
परन्तु मैं नहीं चाहता कि वे यहीं रुक जाएँ; मैं उनके कानों में नरक और दण्ड की गरज किए बिना उन्हें और ऊपर आने के लिए प्रोत्साहित करूँगा।
जिस मार्ग पर वे थे उसकी निन्दा किए बिना, यह कहे बिना कि वह विनाश का मार्ग है, मैं यत्न करूँगा कि उन्हें दिखाऊँ कि हर दृष्टि से 'उत्तम मार्ग' क्या है।
यह भली-भाँति स्मरण रहे कि मैं यह नहीं कहता कि जो इस मार्ग पर नहीं चलते वे सब नरक के राजमार्ग पर हैं।
परन्तु इतना मुझे अवश्य कहना है, कि यदि वे उत्तम भाग को चुनते तो स्वर्ग में जितना ऊँचा स्थान उन्हें मिलता, उतना ऊँचा उन्हें न मिलेगा।" — उपदेश, खंड 1, पृ. 267।
रेव. चार्ल्स वेस्ली को, 1772 में: — "यदि हम अपने सारे प्रचार में केवल विश्वास और कर्म को जोड़ दें, तो आशीष पाने से न चूकेंगे।
परन्तु सब प्रचार में, जिसे सामान्यतः सुसमाचार प्रचार कहा जाता है वही सबसे निष्फल है, यदि सबसे हानिकारक न हो, — मसीह के दुःखों या विश्वास से उद्धार पर एक नीरस, या जोशीला, भाषण, पवित्रता पर दृढ़ता से बल दिए बिना।
मैं अधिकाधिक देखता हूँ कि यह स्वाभाविक रूप से पवित्रता को संसार से बाहर निकालने की प्रवृत्ति रखता है।" —
रचनाएँ, अंग्रेज़ी संस्करण, खंड 12, पृ. 130।
मसीही सिद्धता
खंड 28।
श्री वेस्ली ने अपने विचार किस सीमा तक बदले
मसीही सिद्धता के विषय में।
यह कि श्री वेस्ली के मन में इस विषय पर कुछ परिवर्तन हुए, और उनके जीवन के विभिन्न कालों के लेखन में कुछ प्रतीयमान विरोधाभास हैं, स्वीकार किया जा सकता है, यद्यपि कुछ लेखकों ने उन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ाकर और अनुचित रूप से प्रस्तुत किया है।
इस विषय पर उनके लिखित विचार छियासठ वर्षों की अवधि में उनकी पत्रिकाओं, उपदेशों, पत्रों, लेखों और वाद-विवादों में बिखरे हैं; और यह मान लेना अनुचित है कि इतने लम्बे समय में कोई प्रतीयमान विरोधाभास न मिले।
कि उन्होंने इसके स्वभाव और गुणों की किसी आवश्यक बात में अपने विचार बदले, इसका वे बार-बार अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में खण्डन करते हैं।
उनके मन के परिवर्तन, जहाँ तक उनके लेखन दिखाते हैं, ये हैं: — 1. आरम्भिक जीवन में थोड़े समय के लिए उनका मत था कि पूर्ण रूप से पवित्र किया हुआ जन गिर नहीं सकता।
उन्होंने शीघ्र ही अपनी भूल देखी और उसे त्याग दिया। वे कहते हैं: — "मैं इससे गिरने की असम्भावना को, न आंशिक रूप से, न पूर्ण रूप से, सम्मिलित करता हूँ।
इसलिए मैं अपने भजनों के कई वाक्यांश वापस लेता हूँ, जो ऐसी असम्भावना को कुछ व्यक्त करते, कुछ ध्वनित करते हैं।
. पहले हम सोचते थे कि पाप से बचाया हुआ जन गिर नहीं सकता, अब हम इसके विपरीत जानते हैं।" — रचनाएँ, खंड 6, पृ. 219।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
1767 में अपने भाई चार्ल्स को लिखते हुए वे कहते हैं: — "क्या जिसने इसे प्राप्त कर लिया है वह गिर सकता है?
पहले मैं समझता था कि नहीं; परन्तु आपने (थॉमस वॉल्श और जॉन जोन्स के साथ) मुझे मेरी भूल का कायल किया। — खंड 6, पृ. 669।
2. 1741 में उन्होंने भजनों का एक संग्रह प्रकाशित किया, जिसकी भूमिका में वे कहते हैं: — "वे (जो पूर्ण रूप से पवित्र किए गए हैं) स्वेच्छा से मुक्त हैं, और पवित्र तथा सिद्ध परमेश्वर की इच्छा के सिवा कुछ नहीं चाहते; न अभाव में पूर्ति, न पीड़ा में आराम, न जीवन, न मृत्यु, न कोई प्राणी। ..
. उस पवित्र जन का अभिषेक उन्हें प्रत्येक घण्टे सिखाता है कि उन्हें क्या करना और क्या कहना है, इसलिए उन्हें इस विषय में तर्क करने की कोई आवश्यकता नहीं।
वे एक अर्थ में परीक्षाओं से मुक्त हैं। ... सब समयों में उनके प्राण सम और शान्त रहते हैं, उनके हृदय दृढ़ और अटल रहते हैं।" — रचनाएँ, खंड 6, पृ. 492।
श्री वेस्ली ने पुस्तक के प्रकाशित होने के कुछ ही समय बाद पाद-टिप्पणियों द्वारा इन्हें सुधारा, यह कहते हुए, "यह बहुत प्रबल है। ..
यह बहुत ही प्रबल है।
. प्रायः ऐसा होता है।
. कभी-कभी उन्हें आवश्यकता नहीं होती।"
वे कहते हैं कि उस समय (1741) उन्होंने "मसीही सिद्धता का अब तक का सबसे प्रबल वर्णन दिया; वस्तुतः एक से अधिक बातों में बहुत प्रबल, जैसा कि संलग्न टिप्पणियों में देखा गया है।"
उनके सारे लेखन में इस विषय पर उनके विचार बदलने के केवल यही उदाहरण मिलते हैं।
कुछ ने दावा किया है कि 1760-2 में पवित्रीकरण के महान पुनरुत्थान से पहले वे वृद्धि और कर्मों द्वारा क्रमिक पवित्रीकरण सिखाते थे।
श्री वेस्ली, 1741 में, उस महान कार्य से बीस वर्ष पहले, कहते हैं: — "क्या कुछ और भी अधिक स्पष्ट हो सकता है:
— 1. कि यहाँ भी उतना ही पूर्ण और उच्च उद्धार है जितना हमने कभी बताया है?
मसीही सिद्धता,
2. कि इसके विषय में कहा गया है कि यह केवल विश्वास से प्राप्त हो सकता है, और केवल अविश्वास से रुकता है?
3. कि इस विश्वास को, और फलतः उस उद्धार को जो यह लाता है, एक क्षण में दिया जानेवाला कहा गया है?
4. कि यह माना गया है कि वह क्षण अभी हो सकता है! कि हमें एक क्षण भी और रुकने की आवश्यकता नहीं? कि 'अभी', यही 'अभी'
. इस पूर्ण 'उद्धार' का स्वीकार्य समय है, अभी इसका दिन है, और, .
5. अन्त में, कि यदि कोई इससे भिन्न कहे, तो वही व्यक्ति है जो हमारे बीच नए सिद्धान्त लाता है।" — रचनाएँ, खंड 6, पृ.
494।
1762 में बेल और ओवन को एक पत्र में वे कहते हैं: — "आपने बार-बार मुझसे तात्कालिक पवित्रीकरण का इनकार किया है; परन्तु मैं इसे बीस वर्ष से अधिक से जानता और सिखाता आया हूँ (और मेरा भाई भी, जैसा हमारे लेखन दिखाते हैं)।"
— पत्रिका, अक्टूबर, 1762।
इससे प्रकट होता है कि वे और उनके भाई चार्ल्स 1742 से तात्कालिक पवित्रीकरण सिखाते थे।
श्री वेस्ली के लेखन में दो-तीन उदाहरण हैं जहाँ दावा किया गया है कि वे वृद्धि द्वारा पवित्रीकरण सिखाते हैं।
उद्धरण ये हैं: — "जब हम नया जन्म लेते हैं, तब हमारा पवित्रीकरण, हमारी भीतरी और बाहरी पवित्रता, आरम्भ होती है; और तब से हमें 'उसमें, जो हमारा जीवित सिर है, बढ़ते जाना' है।
प्रेरित का यह कथन दोनों के बीच के भेद को उत्कृष्ट रूप से स्पष्ट करता है, और यह भी दिखाता है कि प्राकृतिक और आत्मिक वस्तुओं के बीच ठीक कैसा सादृश्य है।
एक बालक स्त्री से एक क्षण में, या कम से कम बहुत थोड़े समय में, जन्म लेता है; उसके बाद वह धीरे-धीरे और क्रमशः बढ़ता है, जब तक वह पुरुष के कद को न पहुँचे।
उसी प्रकार, एक बालक परमेश्वर से थोड़े समय में, यदि एक क्षण में नहीं, जन्म लेता है।
परन्तु उसके बाद वह धीरे-धीरे क्रमशः पूर्ण कद के नाप तक बढ़ता है-
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
Lit ure [अस्पष्ट मूल पाठ] मसीह के पूर्ण कद के नाप तक।
इसलिए जो सम्बन्ध हमारे प्राकृतिक जन्म और हमारी वृद्धि के बीच है, वही हमारे जन्म और हमारे पवित्रीकरण के बीच भी है।" — उपदेश, खंड 1, पृ. 406।
अपने "परमेश्वर की दाख की बारी" उपदेश में वे कहते हैं: — "और जैसे प्राकृतिक जन्म में मनुष्य एक ही बार में जन्म लेता है, और फिर धीरे-धीरे बड़ा और बलवन्त होता है, वैसे ही आत्मिक जन्म में मनुष्य एक ही बार में जन्म लेता है, और फिर धीरे-धीरे आत्मिक कद और बल में बढ़ता है।
इसलिए नया जन्म पवित्रीकरण का पहला बिन्दु है, जो पूर्ण दिन तक अधिकाधिक बढ़ सकता है।" — उपदेश, खंड 2, पृ. 390।
मिस कुक को, 1785: — "आप कितनी शीघ्रता से पवित्रीकरण की सहभागी बनाई जा सकती हैं!
और केवल अनुग्रह में धीमी तथा अनजानी बढ़ोतरी द्वारा ही नहीं, बल्कि परमप्रधान की सामर्थ्य द्वारा, जो एक क्षण में, पलक झपकते ही आप पर छाया करके पाप को पूरी तरह मिटा दे और आपको अपने सम्पूर्ण स्वरूप में नया कर दे!
यदि आप हृदय की सरल हैं, यदि आप उस स्वर्गीय दान को एक छोटे बालक की तरह बिना तर्क-वितर्क के ग्रहण करने को तैयार हैं, तो आप उसे अभी क्यों नहीं पा सकतीं?
पवित्र करनेवाला निकट है; वह आपके साथ है; वह आपके हृदय के द्वार पर खटखटा रहा है!" — वर्क्स, खण्ड 7, पृ. 199।
इन कथनों और इस विषय पर उसकी सम्पूर्ण शिक्षा की प्रवृत्ति के बीच एक प्रकट असंगति दिखाई देती है, और यदि उसने इस विषय पर इन संक्षिप्त उद्धरणों से अधिक कुछ न कहा होता, तो कुछ औचित्य के साथ यह दावा किया जा सकता था कि उसने क्रमिक पवित्रीकरण की शिक्षा दी; परन्तु सब देख सकते हैं कि सैकड़ों उदाहरणों में उसने एक भिन्न सिद्धान्त सिखाया, और जहाँ उसने सम्पूर्ण पवित्रीकरण से पहले और बाद दोनों में बढ़ने, विकसित होने और उन्नति करने की शिक्षा दी, वहीं साथ ही उसका यह मत भी रहा कि सम्पूर्ण पवित्री-
मसीही सिद्धता,
करण विश्वास से होता है, कर्मों से नहीं; वह तात्कालिक है, बढ़ोतरी से नहीं होता, और वह एक अलौकिक तथा ईश्वरीय कार्य है।
(देखिए खण्ड 7।) मि. वेस्ली को ध्यानपूर्वक पढ़नेवाला पाठक देखेगा कि 1759 तक सम्पूर्ण पवित्रीकरण को खोजने की रीति के विषय में उसके विचार उतने स्पष्ट और निश्चित नहीं थे जितने उसके जीवन के अन्तिम तीस वर्षों में थे।
(देखिए टायरमैन, खण्ड 1, पृ. 498।) मि. वेस्ली बार-बार अपने विचारों में किसी मूलभूत परिवर्तन से इनकार करता है, यद्यपि वह स्वीकार करता है कि अपनी आरम्भिक सेवकाई के एक भाग में उसने कुछ बातें बढ़ा-चढ़ाकर कहीं और कम स्पष्टता से बोला।
यह निश्चिन्त होकर कहा जा सकता है कि जहाँ वह हमें बढ़ोतरी द्वारा क्रमिक पवित्रीकरण का एक भी उदाहरण नहीं देता, वहाँ वह विश्वास द्वारा तात्कालिक पवित्रीकरण की स्पष्ट शिक्षा देता है, और ऐसे कई हज़ार उदाहरण हमारे सामने रखता है।
वह यह भी कहता है कि उसने सम्पूर्ण पवित्रीकरण के क्रमिक होने का कोई उदाहरण कभी नहीं जाना।
(देखिए सर्मन्स, खण्ड 2, पृ. 223।) 1777 में, अपनी "मसीही सिद्धता का सादा वर्णन" के अन्तिम संशोधन में, वह अपने उस प्रवचन के विषय में, जो "हृदय का खतना" पर था और जो 1788 में ऑक्सफ़ोर्ड के विश्वविद्यालय के सामने प्रचारित किया गया था, कहता है: —
"यह प्रवचन मेरे प्रकाशित लेखों में से सबसे पहले रचा गया था।
उस समय धर्म का जो दृष्टिकोण मेरा था, जिसे मैंने तब भी सिद्धता कहने में संकोच नहीं किया, वह यही था।
आज भी उसके विषय में मेरा यही दृष्टिकोण है, उसमें कोई उल्लेखनीय बढ़ती या घटी नहीं हुई।" — वर्क्स, खण्ड 6, पृ. 485।
1739 में उसने इसी विषय पर विशेष रूप से अपनी पहली पुस्तिका लिखी, और उसके विषय में कहता है: —
"क्या यह देखना सरल नहीं कि यह वही सिद्धान्त है जिसे मैं आज (1777 में) मानता और सिखाता हूँ, और जिसमें मैं उस आन्तरिक या बाहरी पवित्रता में, जिसका मैंने
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
अड़तीस वर्ष पहले समर्थन किया था, एक भी बात नहीं जोड़ता?
और यह वही है जिसे मैं परमेश्वर के अनुग्रह से उस समय से अब तक सिखाता आया हूँ, जैसा कि नीचे दिए गए उद्धरणों से हर निष्पक्ष व्यक्ति को प्रकट होगा।" — वर्क्स, खण्ड 6, पृ. 488।
1777 में "सादा वर्णन" के अपने अन्तिम संशोधन में, 1741 में लिखे गए अपने प्रवचन "मसीही सिद्धता" और उसी समय के भजनों के एक संग्रह से उद्धरण देने के बाद, वह कहता है: — "तब से हमने इस विषय पर, पद्य में या गद्य में, जो कुछ भी आगे कहा है, उसमें ऐसा कुछ नहीं जो इस भूमिका में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निहित न हो; इसलिए हमारा वर्तमान सिद्धान्त सही हो या गलत, वह वही है जो हमने आरम्भ से सिखाया।"
— वर्क्स, खण्ड 6, पृ. 493।
1742 में उसने भजनों का एक संग्रह प्रकाशित किया, जिनमें से बहुत-से विशेष रूप से इसी विषय पर थे, और उनके विषय में वह कहता है: — "यह वही सिद्धान्त है जिसका प्रचार हमने आरम्भ से किया, और जिसका प्रचार हम आज भी करते हैं।
सच है कि इसे हर दृष्टिकोण से देखकर, और बार-बार एक ओर परमेश्वर के वचन से तथा दूसरी ओर परमेश्वर की सन्तानों के अनुभव से मिलाकर, हमने मसीही सिद्धता के स्वभाव और गुणों को और आगे समझा।
परन्तु फिर भी हमारे पहले और अन्तिम विचारों में कोई विरोध नहीं है। ... और अब भी हमारी उसके विषय में वही धारणा है, न कुछ जोड़ा गया, न घटाया गया।" — वर्क्स, खण्ड 6, पृ. 495।
1744, 1745, 1746 और 1747 के सम्मेलनों से उद्धरण देने के बाद वह कहता है: — "इन उद्धरणों से निर्विवाद रूप से प्रकट होता है कि न केवल मेरा और मेरे भाई का क्या मत था, बल्कि
मसीही सिद्धता,
1744, 1745, 1746 और 1747 में हमारे साथ जुड़े सब प्रचारकों का क्या मत था।
और मुझे स्मरण नहीं कि इनमें से किसी भी सम्मेलन में हमारे बीच एक भी विरोधी स्वर उठा हो।" — वर्क्स, खण्ड 6, पृ. 499।
1752 में लिखे अपने लेखों से उद्धरण देने के बाद वह कहता है: — '
"मैंने इन उद्धरणों को इसलिए अधिक विस्तार से दिया है कि इनसे सब आपत्तियों से परे प्रकट होता है कि आज तक मैं और मेरा भाई दोनों यह मानते आए हैं: —
1. कि मसीही सिद्धता परमेश्वर और अपने पड़ोसियों से प्रेम करना है, जिसमें पाप से छुटकारा निहित है।
2. कि वह केवल विश्वास से प्राप्त होती है।
— 3. कि वह तत्काल, एक क्षण में दी जाती है।
4. कि हमें उसकी अपेक्षा मृत्यु के समय नहीं, बल्कि हर क्षण करनी है; कि अभी मनभावना समय है, अभी उद्धार का दिन है।" — वर्क्स, खण्ड 6, पृ. 500।
1777 में उसे सब ओर से सामान्य रूप से देखने के बाद वह कहता है: — "अब आप इन दृष्टिकोणों में से जिसमें चाहें उसे लें (क्योंकि इनमें कोई उल्लेखनीय अन्तर नहीं है), यही वह सम्पूर्ण और एकमात्र सिद्धता है, जैसा कि लेखों की एक शृंखला प्रमाणित करती है, जिसे मैंने 1725 से 1765 तक इन चालीस वर्षों में माना और सिखाया है।" — वर्क्स, खण्ड 6, पृ. 530।
1778 में, जब मि. वेस्ली पचहत्तर वर्ष के थे, वह अपनी डायरी में कहता है: — "मैं नहीं जानता कि मैं हृदय के खतने पर इससे अच्छा (प्रवचन) लिख सकता हूँ, जैसा मैंने पैंतालीस वर्ष पहले लिखा था...
. चालीस वर्ष पहले मैं हर मसीही सिद्धान्त को जानता और उसका प्रचार करता था, जिसका प्रचार मैं अब करता हूँ।"
— डायरी, सितम्बर, 1778।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
एक कालक्रमिक सार।
1. मि. वेस्ली का जन्म 17 जून, 1703 को हुआ।
2. उसकी मृत्यु 2 मार्च, 1791 को, 88 वर्ष की आयु में हुई।
3. 1733 में, तीस वर्ष की आयु में, उसने ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के सामने अपना प्रवचन "हृदय का खतना" लिखा और सुनाया।
4. 1739 में उसने अपनी पुस्तिका "एक मेथोडिस्ट का चरित्र" लिखी, जिसके विषय में वह कहता है कि मसीही सिद्धता के विषय पर यह उसकी लिखी पहली पुस्तिका थी।
5. उसने 1739 में भजनों और पवित्र कविताओं का एक संग्रह प्रकाशित किया, जिसमें पवित्रता के विषय में उसके और उसके भाई के विचार प्रस्तुत किए गए थे।
6. 1740 में लंदन के बिशप डॉ. गिब्सन से भेंट के बाद, अपने सैंतीसवें वर्ष में, उसने अपना प्रवचन "मसीही सिद्धता" लिखा।
7. 1741 में उसने भजनों का दूसरा संग्रह प्रकाशित किया, जिसमें उसने और उसके भाई ने मसीही सिद्धता का वह सबसे सशक्त वर्णन दिया जो उन्होंने कभी सिखाया, और जिसमें कुछ बातें अत्यधिक कड़ी थीं, जिन्हें उसने शीघ्र ही सुधार दिया।
8. उसने 1742 में भजनों का तीसरा संग्रह प्रकाशित किया, जिसमें उसने इस विषय पर पहले से कहीं अधिक विस्तार से कहा।
9. उसका पहला सम्मेलन 1744 में हुआ, जिसमें पवित्रीकरण के विषय पर गम्भीरता से विचार किया गया और उनकी शिक्षाओं की समीक्षा की गई, जिसका सार उसने अपने लेखों में दिया है।
10. उसने 1744 में अपनी "विवेक और धर्म के मनुष्यों से हार्दिक अपील" प्रकाशित की।
मसीही सिद्धता,
11. 1749 में उसने और उसके भाई ने भजनों और पवित्र कविताओं के दो खण्ड प्रकाशित किए; और चूँकि वे उसकी अनुपस्थिति में प्रकाशित हुए, उनमें कुछ बातें ऐसी थीं जिन्हें वह स्वीकार नहीं करता था।
12. उसने 1752 में 1749 के भजनों का दूसरा संस्करण कुछ भूलों के सुधार के साथ निकाला।
13. 1759 के सम्मेलन में उसने इस सिद्धान्त पर विस्तार से विचार किया, और उसके अन्त में अपने "मसीही सिद्धता पर विचार" प्रकाशित किए।
— 14. 1761 में उसने अपने "मसीही सिद्धता पर और विचार" लिखे।
15. पवित्रता का महान पुनर्जागरण 1762 में लंदन में आरम्भ हुआ, और आगामी वर्षों में इंग्लैंड और आयरलैंड में फैल गया।
16. 1762 में वह ल्यूइशम चला गया और उसने अपना प्रवचन "विश्वासियों में पाप" लिखा।
17. उसने 1764 में इस विषय पर "संक्षिप्त प्रतिज्ञप्तियों" की एक शृंखला लिखी, जो बाद में उसके "सादा वर्णन" में पृष्ठ 166-169 पर सम्मिलित की गई।
18. प्रवचन "उद्धार का शास्त्रीय मार्ग" 1765 में लिखा गया।
19. "सादा वर्णन" उसने 1766 में लिखा, और उसे 1766 में लीड्स के सम्मेलन में अध्ययन-क्रम का भाग बनाया।
20. मेथोडिस्ट एपिस्कोपल चर्च के अनुशासन-ग्रन्थ में अभिषेक-सेवा में प्रयुक्त होनेवाले प्रश्न
— "क्या आपको मसीह में विश्वास है?
क्या आप सिद्धता की ओर बढ़ते जा रहे हैं?
क्या आप इसी जीवन में प्रेम में सिद्ध किए जाने की आशा रखते हैं?
क्या आप उसके लिए तरस रहे हैं?" — मि. वेस्ली द्वारा पहली बार 1766 में लीड्स के सम्मेलन में प्रयोग किए गए।
21. उसका प्रवचन "विश्वासियों का पश्चाताप" iy liOs, [अस्पष्ट मूल पाठ] में लिखा गया था। उसका "सिद्धता" पर दूसरा प्रवचन 1785 में, अपनी मृत्यु से छह वर्ष पहले लिखा गया। nN) om hed [अस्पष्ट मूल पाठ]
खण्ड 30।
मसीही सिद्धता का सादा वर्णन
जैसा माना और सिखाया गया
आदरणीय
मि. जॉन वेस्ली द्वारा,
1725 से 1777 तक।
1. आगामी पत्रों में मेरा उद्देश्य यह है कि मैं उन चरणों का सादा और स्पष्ट वर्णन दूँ जिनके द्वारा अनेक वर्षों के क्रम में मैं मसीही सिद्धता के सिद्धान्त को अपनाने तक पहुँचाया गया।
यह मैं मानवजाति के उस गम्भीर भाग का ऋणी हूँ, जो "वह सत्य जैसा यीशु में है" उस पूरे को जानना चाहता है।
और इस प्रकार के प्रश्नों से केवल यही लोग सरोकार रखते हैं।
इन्हीं के सामने मैं बात को जैसी है वैसी निष्कपट रूप से कहना चाहूँगा, और आरम्भ से अन्त तक एक काल से दूसरे काल तक यह दिखाने का यत्न करूँगा कि मैं क्या सोचता था और ऐसा क्यों सोचता था।
1725 में, अपनी आयु के तेईसवें वर्ष में, मुझे बिशप टेलर की "पवित्र जीवन और पवित्र मृत्यु के नियम और अभ्यास" पुस्तक मिली।
इस पुस्तक के कई भागों को पढ़ते समय मैं अत्यन्त प्रभावित हुआ; विशेष रूप से वह भाग जो उद्देश्य की शुद्धता से सम्बन्ध रखता है।
तुरन्त मैंने निश्चय किया कि मैं अपना सारा जीवन, अपने सब विचार, शब्द और कर्म परमेश्वर को समर्पित कर दूँगा; क्योंकि मुझे पूरा विश्वास हो गया था कि कोई बीच का मार्ग नहीं है; वरन् मेरे जीवन का हर भाग (केवल कुछ ही नहीं)
पाद-टिप्पणी। — "सादा वर्णन" में, जैसा वह मि. वेस्ली की रचनाओं में मूलतः प्रकाशित हुआ था, कोई परिवर्तन किए बिना, हमने उसे शीर्षकों द्वारा विभाजित करने की स्वतन्त्रता ली है, जिससे हमारे विचार में वह अधिक पठनीय हो जाता है।
मसीही सिद्धता,
या तो परमेश्वर के लिए बलिदान होगा, या मेरे लिए, अर्थात् वस्तुतः शैतान के लिए।
क्या कोई गम्भीर व्यक्ति इसमें सन्देह कर सकता है, या परमेश्वर की सेवा और शैतान की सेवा के बीच कोई मध्य मार्ग पा सकता है?
1726 में मुझे केम्पिस की "मसीही का आदर्श" मिली।
आन्तरिक धर्म का, हृदय के धर्म का, स्वरूप और विस्तार अब मुझे पहले से कहीं अधिक प्रबल प्रकाश में दिखाई दिया।
मैंने देखा कि अपना सारा जीवन भी परमेश्वर को देना (यह मानकर कि ऐसा करना और उससे आगे न जाना सम्भव है) मुझे कुछ लाभ न पहुँचाएगा, जब तक कि मैं अपना हृदय, हाँ अपना सारा हृदय उसे न दूँ।
मैंने देखा कि "उद्देश्य की सरलता और भावना की शुद्धता", हमारे हर कथन और कर्म में एक ही अभिप्राय, और हमारे सब स्वभावों पर शासन करनेवाली एक ही अभिलाषा, सचमुच "आत्मा के पंख" हैं, जिनके बिना वह कभी परमेश्वर के पर्वत पर नहीं चढ़ सकती।
एक-दो वर्ष बाद मि. लॉ की "मसीही सिद्धता" और "गम्भीर पुकार" मेरे हाथों में दी गईं।
इन्होंने मुझे पहले से कहीं अधिक आश्वस्त किया कि आधा मसीही होना बिलकुल असम्भव है; और मैंने उसके अनुग्रह से (जिसकी नितान्त आवश्यकता को मैं गहराई से अनुभव करता था) ठान लिया कि मैं पूरी तरह परमेश्वर को समर्पित रहूँगा, अपना सारा प्राण, अपनी देह और अपनी सम्पत्ति उसे दे दूँगा।
क्या कोई विचारशील मनुष्य कहेगा कि यह बात को बहुत आगे ले जाना है? या कि जिसने हमारे लिए अपने आप को दे दिया, उसे अपने आप को, अपना सब कुछ और जो कुछ हम हैं, देने से कम कुछ भी देना उचित है।
1729 में मैंने बाइबल को न केवल पढ़ना, बल्कि उसका अध्ययन करना आरम्भ किया, सत्य के एकमात्र मानक और शुद्ध धर्म के एकमात्र नमूने के रूप में।
इससे मैंने अधिकाधिक स्पष्ट प्रकाश में देखा कि "वह मन जो मसीह में था" रखना और "जैसे मसीह भी चला वैसा ही चलना" कितना अनिवार्य है; अर्थात् उसके मन का केवल कोई अंश नहीं, वरन् सम्पूर्ण मन रखना; और जैसे वह चला वैसे ही चलना, केवल बहुत-सी या अधिकतर बातों में नहीं, वरन् सब बातों में।
और
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
यही वह प्रकाश था जिसमें मैं उस समय सामान्यतः धर्म को देखता था, अर्थात् मसीह का एकरूप अनुसरण, हमारे स्वामी के साथ सम्पूर्ण आन्तरिक और बाहरी अनुरूपता।
और मुझे किसी बात का इससे अधिक भय नहीं था कि इस नियम को अपने या दूसरे मनुष्यों के अनुभव के अनुसार झुका दूँ; कि हमारे महान आदर्श से ज़रा-सी भी असमानता को अपने लिए स्वीकार कर लूँ।
ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के सामने "हृदय का खतना" पर प्रवचन
(ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के सामने)
1 जनवरी, 1733 को मैंने विश्वविद्यालय के सामने सेंट मैरी के गिरजाघर में "हृदय का खतना" पर प्रचार किया; जिसका वर्णन मैंने इन शब्दों में दिया: "यह आत्मा का वह स्थायी स्वभाव है जिसे पवित्र शास्त्र में पवित्रता कहा गया है; और जिसका सीधा अर्थ है पाप से शुद्ध किया जाना, 'शरीर और आत्मा की सब मलिनता से'; और परिणामस्वरूप उन गुणों से सम्पन्न किया जाना जो मसीह यीशु में थे; अपने मन के स्वरूप में ऐसे 'नए किए जाना' कि 'जैसा हमारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है वैसे ही हम भी सिद्ध हों।'" — खण्ड 1, पृ. 148।
उसी प्रवचन में मैंने कहा था, "'प्रेम व्यवस्था की पूर्ति है, आज्ञा का अन्त है।'
यह केवल 'पहली और बड़ी' आज्ञा ही नहीं, बल्कि सब आज्ञाएँ एक में हैं।
'जो जो बातें सत्य हैं, जो जो बातें पवित्र हैं, यदि कोई सद्गुण है, यदि कोई प्रशंसा की बात है,' वे सब इसी एक शब्द प्रेम में समाई हुई हैं।
इसी में सिद्धता, महिमा और सुख है: स्वर्ग और पृथ्वी की राजसी व्यवस्था यही है, 'तू अपने परमेश्वर प्रभु से अपने सारे मन, और अपने सारे प्राण, और अपनी सारी बुद्धि, और अपनी सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना।'
वह एकमात्र सिद्ध भलाई तुम्हारा एकमात्र अन्तिम लक्ष्य हो।
तुम एक ही वस्तु को उसके अपने लिए चाहो, अर्थात् उसका आनन्द लेना जो सब में सब है।
अपने प्राणों के सामने एक ही सुख रखो, अर्थात् उसके साथ मेल जिसने उन्हें रचा, 'पिता और पुत्र के साथ सहभागिता' होना, 'प्रभु के साथ एक आत्मा होकर जुड़ जाना।'
(ne [एक]
मसीही सिद्धता,
लक्ष्य जिसका तुम्हें काल के अन्त तक पीछा करना है, परमेश्वर का आनन्द, समय में और अनन्तकाल में।
अन्य वस्तुओं की इच्छा तभी तक करो जब तक वे इसी की ओर ले जाती हैं; सृष्टि से तभी तक प्रेम करो जब तक वह सृष्टिकर्ता तक पहुँचाती है।
परन्तु अपने हर कदम में यही वह महिमामय बिन्दु हो जहाँ तुम्हारी दृष्टि ठहरती है।
हर भावना, विचार, वचन और कर्म इसके अधीन हो।
जो कुछ तुम चाहो या डरो, जो कुछ खोजो या त्यागो, जो कुछ सोचो, कहो या करो, वह परमेश्वर में तुम्हारे सुख के लिए हो, जो तुम्हारे अस्तित्व का एकमात्र उद्देश्य और साथ ही स्रोत है।" — वही, पृ. 150, 151।
मैंने इन शब्दों में समाप्त किया: "यही सिद्ध व्यवस्था का सार है, हृदय का खतना।
आत्मा अपनी भावनाओं की पूरी मण्डली के साथ परमेश्वर के पास लौट आए जिसने उसे दिया।
उसने हमसे और बलिदान नहीं चाहे, परन्तु हृदय के जीवित बलिदान को उसने चुना है।
उसे पवित्र प्रेम की ज्वालाओं में मसीह के द्वारा निरन्तर परमेश्वर को अर्पित किया जाए।
और किसी सृष्टि को उसके साथ भागी न होने दिया जाए; क्योंकि वह जलन रखनेवाला परमेश्वर है।
वह अपना सिंहासन किसी और के साथ नहीं बाँटेगा; वह बिना प्रतिद्वन्द्वी के राज्य करेगा।
वहाँ कोई ऐसी योजना या अभिलाषा प्रवेश न पाए जिसका अन्तिम उद्देश्य वह स्वयं न हो।
यही वह मार्ग है जिस पर परमेश्वर की वे सन्तानें कभी चलीं, जो मरकर भी हमसे बोलती हैं:
'केवल उसके नाम की स्तुति करने के लिए जीने की इच्छा रखो; हमारे सब विचार, वचन और कर्म उसकी महिमा की ओर लगे हों।'
'तुम्हारा प्राण उसके प्रति ऐसे सम्पूर्ण प्रेम से भर जाए कि तुम उसके लिए ही सब कुछ प्रेम करो।'
'हृदय का शुद्ध अभिप्राय रखो, हमारे सब कार्यों में उसकी महिमा पर दृढ़ दृष्टि रखो।'
'क्योंकि तभी, और उससे पहले नहीं, वह मन हममें है जो मसीह यीशु में भी था, जब हमारे हृदय की हर गति में, हमारी जीभ के हर शब्द में, हमारे हाथों के हर काम में हम उसी से सम्बन्ध रखकर और उसकी इच्छा के अधीन होकर ही कुछ करते हैं;' जब हम भी न 'अपनी इच्छा, परन्तु उसकी इच्छा पूरी करने के लिए, जिसने हमें भेजा, सोचते, बोलते या करते हैं;' जब 'चाहे
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
हम खाएँ या पीएँ, या जो कुछ करें,' सब कुछ 'परमेश्वर की महिमा के लिए' करते हैं।" — वही, पृ. 153।
देखा जा सकता है कि यह प्रवचन मेरे प्रकाशित लेखों में सबसे पहले रचा गया था।
उस समय धर्म का जो दृष्टिकोण मेरा था, जिसे मैंने तब भी सिद्धता कहने में संकोच नहीं किया, वह यही था।
आज भी उसके विषय में मेरा यही दृष्टिकोण है, उसमें कोई उल्लेखनीय बढ़ती या घटी नहीं हुई।
और इसमें ऐसा क्या है जिस पर कोई समझदार मनुष्य, जो बाइबल पर विश्वास करता है, आपत्ति कर सके?
वह शास्त्र का सीधा खण्डन किए बिना क्या अस्वीकार कर सकता है?
परमेश्वर के वचन से कुछ घटाए बिना क्या काट सकता है?
मैं और मेरा भाई (उन सब युवकों के साथ, जिन्हें उपहास में मेथोडिस्ट कहा गया) इसी मत पर बने रहे, जब तक कि 1735 के अन्त में हमने अमेरिका के लिए जहाज़ नहीं लिया।
अगले वर्ष, जब मैं सवाना में था, तब मैंने ये पंक्तियाँ लिखीं: — क्या सूर्य के नीचे कोई ऐसी वस्तु है, जो तेरे साथ मेरा हृदय बाँटने का यत्न करती है?
हाय! उसे वहाँ से उखाड़ फेंक, और अकेला राज्य कर, वहाँ की हर गति का प्रभु!
1738 के आरम्भ में, जब मैं वहाँ से लौट रहा था, मेरे हृदय की पुकार यह थी, ओ, ऐसा कर कि मेरे प्राण में तेरे शुद्ध प्रेम के सिवा कुछ न बसे!
ओ, तेरा प्रेम मुझे पूरी तरह अपने अधिकार में ले ले, मेरा आनन्द, मेरा धन और मेरा मुकुट; पराई आग मेरे हृदय से दूर कर दे, मेरा हर कर्म, शब्द और विचार प्रेम हो!
मैंने कभी नहीं सुना कि किसी ने इस पर आपत्ति की हो।
और सचमुच, कौन आपत्ति कर सकता है?
क्या यह न केवल हर विश्वासी की, बल्कि हर उस व्यक्ति की भाषा नहीं है जो सच्चे अर्थ में जाग उठा है?
परन्तु
मसीही सिद्धता,
आज तक मैंने ऐसा क्या लिखा है जो इससे अधिक सशक्त या अधिक स्पष्ट हो।
8. अगस्त में, जर्मनी में, मेरी आर्विड ग्रैडिन के साथ लम्बी बातचीत हुई।
जब वह मुझे अपने अनुभव का वर्णन दे चुका, तो मैंने उससे "विश्वास की पूर्ण निश्चयता" की एक परिभाषा लिखित रूप में देने को कहा, जो उसने इन शब्दों में दी: — Requies in sanguine Christi; firma fiducia in Deum, et persuasio de gratia Divina; tranquillitas mentis summa, atque serenitas et pax ; cum absentia omnis desiderii carnalis, et cessatione peccatorum etiam internorum. [मसीह के लोहू में विश्राम; परमेश्वर पर दृढ़ भरोसा और ईश्वरीय अनुग्रह का निश्चय; मन की परम शान्ति, निर्मलता और मेल; हर शारीरिक अभिलाषा के अभाव के साथ, और भीतरी पापों तक के थम जाने के साथ।]
मसीह के लोहू में [विश्राम]; परमेश्वर पर दृढ़ भरोसा, और उसकी कृपा का निश्चय; मन की परम शान्ति, निर्मलता और मेल, हर शारीरिक अभिलाषा से छुटकारे के साथ, और सब, यहाँ तक कि भीतरी पापों के भी थम जाने के साथ।"
यह उस बात का पहला वर्णन था जो मैंने किसी जीवित मनुष्य से सुना, जिसे मैं पहले स्वयं परमेश्वर के वचनों से सीख चुका था, और जिसके लिए मैं (अपने मित्रों की छोटी मण्डली के साथ) कई वर्षों से प्रार्थना करता और जिसकी आशा रखता आया था।
9. 1739 में मैंने और मेरे भाई ने "भजन और पवित्र कविताएँ" का एक संग्रह प्रकाशित किया।
इनमें से बहुतों में हमने अपने विचार दृढ़ता और स्पष्टता से प्रकट किए।
जैसे, पृष्ठ 24 पर, — प्रकृति की धारा का पूरा प्रवाह मोड़ दे; हमारे सब कार्य तेरी ओर बढ़ें, जो उनका स्रोत है; तेरा प्रेम मार्गदर्शक हो,
तेरी महिमा अन्त हो।
तब पृथ्वी स्वर्ग की सीढ़ी बनेगी; इन्द्रियाँ मार्ग दिखाएँगी; सब प्राणी हमें तेरी ओर ले चलेंगे, और जो कुछ हम चखें वह परमेश्वर ही हो।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
फिर, — हे प्रभु, मुझे अपनी आत्मा के बल से सज्जित कर, क्योंकि मैं तेरे महान नाम से पुकारा गया हूँ:
मेरे भटकते विचारों को अपने में एक कर, मेरे सब कामों का लक्ष्य तू ही हो; तेरा प्रेम जीवन भर मेरे साथ रहे, और तेरी स्तुति ही मेरा एकमात्र व्यापार हो।
(पृ. 122।) फिर, — तेरे लिए उत्सुक होकर मैं माँगता और हाँफता हूँ, ईश्वरीय सिद्धान्त इतना प्रबल है, कि मधुर विवशता से मुझे आगे ले जाता है, जब तक मेरा सारा पवित्र किया हुआ प्राण तेरा न हो जाए; परमेश्वरत्व के गहरे सागर में डूबा हुआ, और तेरी असीमता में खोया हुआ!
(पृ. 125।) एक बार और, — स्वर्गीय आदम, ईश्वरीय जीवन, मेरे स्वभाव को अपने स्वभाव में बदल दे; मेरे सारे प्राण में चल और फैल, सब को सक्रिय कर और भर दे।
(पृ. 153।) इसी आशय के और भी बहुत-से अंश उद्धृत करना सरल होगा।
परन्तु ये इतना दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि उस समय हमारे विचार क्या थे, और इसमें कोई खण्डन नहीं हो सकता।
मसीही सिद्धता पर उसकी लिखी पहली पुस्तिका।
10. इसी विषय पर विशेष रूप से मेरी लिखी पहली पुस्तिका इसी वर्ष के अन्त में प्रकाशित हुई।
ताकि पढ़ने से पहले कोई पूर्वाग्रह न रखे, मैंने उसे "एक मेथोडिस्ट का चरित्र" जैसा तटस्थ शीर्षक दिया।
इसमें मैंने एक सिद्ध मसीही का वर्णन किया, और सबसे आगे यह रखा, "ऐसा नहीं कि मैं पा चुका हूँ।"
उसका एक भाग मैं बिना किसी परिवर्तन के यहाँ जोड़ता हूँ: — "मेथोडिस्ट वह है जो प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन, अपने सारे प्राण, अपनी सारी बुद्धि और अपनी सारी शक्ति से प्रेम करता है।
परमेश्वर उसके हृदय का आनन्द और उसके
मसीही सिद्धता,
प्राण की अभिलाषा है, जो निरन्तर पुकारता है, 'स्वर्ग में तेरे सिवा मेरा कौन है? और पृथ्वी पर तेरे सिवा मैं किसी से प्रीति नहीं रखता।'
मेरा परमेश्वर और मेरा सब कुछ!
'तू मेरे हृदय की चट्टान और सदा के लिए मेरा भाग है।'
इसलिए वह परमेश्वर में सुखी है; हाँ, सदा सुखी, क्योंकि उसमें उसके पास जल का ऐसा सोता है जो अनन्त जीवन के लिए उमड़ता रहता है, और उसके प्राण को शान्ति और आनन्द से भर देता है।
सिद्ध प्रेम ने अब भय को निकाल दिया है, इसलिए वह सदा आनन्दित रहता है।
हाँ, उसका आनन्द परिपूर्ण है, और उसकी सब हड्डियाँ पुकार उठती हैं, 'हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर और पिता धन्य हो, जिसने अपनी बड़ी दया से मुझे जीवित आशा के लिए नया जन्म दिया, अर्थात् ऐसी मीरास के लिए जो अविनाशी, निर्मल और अटल है और जो मेरे लिए स्वर्ग में रखी हुई है।'
"और जिसे यह आशा है, जो इस प्रकार अमरता से भरी है, वह हर बात में धन्यवाद करता है, यह जानते हुए कि (जो कुछ भी हो) यह उसके विषय में मसीह यीशु में परमेश्वर की इच्छा है।
इसलिए वह सब कुछ उसी से आनन्द के साथ ग्रहण करता है, और कहता है, 'प्रभु की इच्छा भली है;' और चाहे वह दे या ले ले, दोनों में समान रूप से प्रभु के नाम को धन्य कहता है।
चाहे सुख में हो या पीड़ा में, रोग में या स्वास्थ्य में, जीवन में या मृत्यु में, वह हृदय की गहराई से उसका धन्यवाद करता है जो उसे भलाई के लिए ठहराता है; जिसके हाथों में उसने अपनी देह और अपना प्राण पूरी तरह सौंप दिया है, 'जैसे विश्वासयोग्य सृजनहार के हाथों में।'
इसलिए वह किसी बात की चिन्ता नहीं करता, क्योंकि उसने 'अपनी सारी चिन्ता उस पर डाल दी है जिसे उसकी परवाह है;' और 'हर बात में' अपना 'निवेदन धन्यवाद के साथ उसके सामने प्रस्तुत करके' उसी पर निर्भर रहता है।
"क्योंकि वह सचमुच 'निरन्तर प्रार्थना करता है;' हर समय उसके हृदय की भाषा यही होती है, 'मेरा मुँह तेरी ओर है, चाहे उसमें आवाज़ नहीं; और मेरा मौन तुझसे बोलता है।'
उसका हृदय हर समय और हर स्थान में परमेश्वर की ओर उठा रहता है।
इसमें उसे कोई व्यक्ति या वस्तु कभी रोक नहीं पाती, बाधा तो और भी कम डाल पाती है।
एकान्त में हो या संगति में,
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
अवकाश में, व्यवसाय में या वार्तालाप में, उसका हृदय सदा प्रभु के साथ रहता है।
चाहे वह लेटे या उठे, 'परमेश्वर उसके सब विचारों में है:' वह निरन्तर परमेश्वर के साथ चलता है; उसके प्राण की प्रेममयी आँख उसी पर लगी रहती है, और वह हर जगह 'उसे जो अदृश्य है
देखता है।'
"और परमेश्वर से प्रेम करते हुए, वह 'अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखता है;' वह हर मनुष्य से अपने प्राण के समान प्रेम करता है।
वह अपने शत्रुओं से प्रेम करता है, हाँ, परमेश्वर के शत्रुओं से भी।
और यदि उसके वश में नहीं कि 'जो उससे बैर रखते हैं उनका भला करे,' तो भी वह 'उनके लिए प्रार्थना' करना नहीं छोड़ता, चाहे वे उसके प्रेम को ठुकराएँ, और अब भी 'उसका अपमान करें और उसे सताएँ।'
"क्योंकि वह 'मन का शुद्ध' है।
प्रेम ने उसके हृदय को डाह, द्वेष, क्रोध और हर कठोर स्वभाव से शुद्ध कर दिया है।
उसने उसे अभिमान से शुद्ध किया है, जिससे 'केवल झगड़ा ही उत्पन्न होता है;' और अब उसने 'दया की कोमलता, भलाई, दीनता, नम्रता और सहनशीलता धारण कर ली है।'
और सचमुच, उसकी ओर से झगड़े के सारे सम्भव आधार काट दिए गए हैं।
क्योंकि कोई उससे वह नहीं छीन सकता जो वह चाहता है, क्योंकि वह 'न संसार से, न संसार की किसी वस्तु से प्रेम रखता है;' परन्तु 'उसकी सारी अभिलाषा परमेश्वर की ओर और उसके नाम के स्मरण की ओर है।'
"उसकी इस एक अभिलाषा के अनुरूप उसके जीवन का एक ही उद्देश्य है; अर्थात् 'अपनी इच्छा नहीं, परन्तु उसकी इच्छा पूरी करना जिसने उसे भेजा।'
हर समय और हर स्थान में उसका एक ही अभिप्राय है, अपने आप को नहीं, परन्तु उसे प्रसन्न करना जिससे उसका प्राण प्रेम करता है।
उसकी आँख एक है; और क्योंकि उसकी 'आँख एक है, इसलिए उसका सारा शरीर प्रकाशमान है।
सब कुछ प्रकाश है, जैसे दीपक की उजली चमक घर को प्रकाशित करती है।'
परमेश्वर अकेला राज्य करता है; प्राण में जो कुछ है वह 'यहोवा के लिए पवित्र' है।
उसके हृदय में एक भी गति ऐसी नहीं जो उसकी इच्छा के अनुसार न हो।
उठनेवाला हर विचार उसी की ओर संकेत करता है, और 'मसीह की व्यवस्था की आज्ञाकारिता' में है।
"और वृक्ष अपने फलों से पहचाना जाता है।
क्योंकि, जैसे वह परमेश्वर से प्रेम करता है, वैसे ही वह 'उसकी आज्ञाओं का पालन करता है;' केवल कुछ का, या
मसीही सिद्धता,
अधिकांश का नहीं, परन्तु सब का, छोटी से छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी तक।
वह 'सारी व्यवस्था का पालन करके एक ही बात में चूकने' से सन्तुष्ट नहीं होता, परन्तु सब बातों में उसका 'परमेश्वर और मनुष्यों के सामने विवेक निर्दोष' रहता है।
जो कुछ परमेश्वर ने मना किया है, उससे वह बचता है; जो कुछ परमेश्वर ने आज्ञा दी है, उसे वह करता है।
'वह परमेश्वर की आज्ञाओं के मार्ग पर दौड़ता है,' क्योंकि अब उसने उसके हृदय को स्वतन्त्र कर दिया है।
ऐसा करना उसकी महिमा और आनन्द है; यह उसका प्रतिदिन का आनन्द का मुकुट है, कि 'परमेश्वर की इच्छा पृथ्वी पर वैसे ही पूरी करे जैसे स्वर्ग में होती है।'
'इसलिए वह परमेश्वर की सब आज्ञाओं का पालन करता है, और अपनी पूरी शक्ति से; क्योंकि उसकी आज्ञाकारिता उसके प्रेम के अनुपात में है, जो उसका स्रोत है।
और इसलिए, अपने सारे हृदय से परमेश्वर से प्रेम करते हुए, वह अपनी सारी शक्ति से उसकी सेवा करता है; वह निरन्तर अपने प्राण और 'देह को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भानेवाला बलिदान करके' प्रस्तुत करता है; अपने आप को, अपना सब कुछ, और जो कुछ वह है, पूरी तरह और बिना कुछ रोके उसकी महिमा के लिए समर्पित करता है।
उसके पास जितने भी वरदान हैं, उन सब को वह निरन्तर अपने स्वामी की इच्छा के अनुसार लगाता है; अपने प्राण की हर शक्ति और क्षमता को, अपनी देह के हर अंग को।
"परिणामस्वरूप, 'वह जो कुछ करता है, सब परमेश्वर की महिमा के लिए करता है।'
अपने हर प्रकार के सब कामों में वह न केवल इसी का लक्ष्य रखता है, जो एक ही आँख रखने में निहित है, बल्कि वस्तुतः इसे पा भी लेता है; उसका व्यवसाय और उसका विश्राम, साथ ही उसकी प्रार्थनाएँ, सब इसी महान उद्देश्य की सेवा करते हैं।
चाहे वह 'घर में बैठे, या मार्ग पर चले,' चाहे लेटे या उठे, वह अपनी हर बात और हर कर्म में अपने जीवन के एक ही कार्य को आगे बढ़ा रहा होता है।
चाहे वह वस्त्र पहने, या परिश्रम करे, या खाए-पीए, या अत्यधिक थका देनेवाले परिश्रम से अपना मन बहलाए, यह सब मनुष्यों में शान्ति और भलाई की इच्छा के द्वारा परमेश्वर की महिमा को बढ़ाने की ओर ही ले जाता है।
उसका एक अटल नियम यह है: 'तुम जो कुछ भी करो, वचन से या कर्म से, सब कुछ प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।'
"और न संसार की रीतियाँ उसकी 'दौड़ में किसी भी प्रकार बाधा डालती हैं।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई।
उस दौड़ में जो उसके सामने रखी है।'
इसलिए वह 'पृथ्वी पर धन इकट्ठा' नहीं कर सकता, जैसे वह अपनी छाती में आग नहीं रख सकता।
वह अपने पड़ोसी की बुराई नहीं कर सकता, जैसे वह परमेश्वर या मनुष्य के लिए झूठ नहीं बोल सकता।
वह किसी के विषय में कठोर शब्द नहीं कह सकता; क्योंकि प्रेम उसके होठों के द्वार का पहरा देता है।
वह 'व्यर्थ बातें नहीं कह सकता; कोई बिगड़ी हुई बात' कभी 'उसके मुँह से नहीं निकलती;' वरन् वह सब जो 'उन्नति के लिए उपयोगी' नहीं, और 'सुननेवालों पर अनुग्रह करने के योग्य' नहीं है।
परन्तु 'जो जो बातें पवित्र हैं, जो जो बातें सुहावनी हैं, जो जो बातें' उचित रूप से 'सुनने में भली हैं,' वही वह सोचता, कहता और करता है, और 'सब बातों में हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर के उपदेश को शोभा देता है।'"
इन्हीं शब्दों में मैंने पहली बार विस्तार से मसीही सिद्धता के विषय में अपने विचार प्रकट किए थे।
और क्या यह देखना सरल नहीं कि, (1.) यही वह लक्ष्य है जिस पर मैं 1725 से निरन्तर निशाना साधता आया; और 1730 से अधिक निश्चयपूर्वक, जब मैं homo unius libri [एक ही पुस्तक का मनुष्य], "एक पुस्तक का मनुष्य" बना, और अपेक्षाकृत बाइबल के सिवा किसी को न गिनता था?
क्या यह देखना सरल नहीं कि, (2.) यह वही सिद्धान्त है जिसे मैं आज भी मानता और सिखाता हूँ; और अड़तीस वर्ष पहले जिस आन्तरिक या बाहरी पवित्रता का मैंने समर्थन किया था, उसमें एक भी बात नहीं जोड़ता?
और यह वही है जिसे मैं परमेश्वर के अनुग्रह से उस समय से अब तक सिखाता आया हूँ; जैसा कि नीचे दिए गए उद्धरणों से हर निष्पक्ष व्यक्ति को प्रकट होगा।
11. मुझे नहीं पता कि किसी लेखक ने आज तक उस पुस्तिका के विरुद्ध कोई आपत्ति उठाई हो; और कुछ समय तक मुझे इस विषय पर अधिक विरोध नहीं मिला, कम से कम गम्भीर लोगों की ओर से तो नहीं।
परन्तु कुछ समय बाद एक शोर उठा, और, जिस बात ने मुझे कुछ चकित किया, वह धार्मिक लोगों के बीच से, जिन्होंने यह नहीं कहा कि मैंने सिद्धता का वर्णन गलत किया, बल्कि यह कि 'पृथ्वी पर कोई सिद्धता नहीं है;' यहाँ तक कि उलटा कहने के कारण वे मुझ पर और मेरे भाई पर बड़े आवेश से टूट पड़े।
हमें इन लोगों से इतने कठोर आक्रमण की
मसीही सिद्धता,
आशा कठिनता से थी; विशेषकर इसलिए कि हम विश्वास द्वारा धर्मी ठहराए जाने के विषय में स्पष्ट थे, और सारा उद्धार केवल परमेश्वर के अनुग्रह का मानने में सावधान थे।
परन्तु जिस बात ने हमें सबसे अधिक चकित किया, वह यह थी कि हम पर "मसीह का अनादर" करने का आरोप लगाया गया, यह कहने के कारण कि वह "पूरी तरह उद्धार करता है," और यह मानने के कारण कि वह हमारे हृदयों में अकेला राज्य करेगा और सब कुछ अपने वश में कर लेगा।
मसीही सिद्धता पर उसका प्रवचन
12. मेरा विचार है कि 1740 के अन्त में लंदन के तत्कालीन बिशप डॉ. गिब्सन से व्हाइटहॉल में मेरी बातचीत हुई थी।
उन्होंने मुझसे पूछा कि सिद्धता से मेरा क्या तात्पर्य है।
मैंने उन्हें बिना किसी छिपाव या संकोच के बता दिया।
जब मैं बोल चुका, तो उन्होंने कहा, "श्रीमान वेस्ली, यदि आपका अभिप्राय बस इतना ही है, तो इसे सारे संसार में प्रकाशित कर दीजिए।
यदि फिर कोई आपकी बात का खंडन कर सके, तो उसे पूरी छूट है।"
मैंने उत्तर दिया, "महोदय, मैं ऐसा ही करूँगा;" और तदनुसार मैंने मसीही सिद्धता पर वह उपदेश लिखा और प्रकाशित किया।
इसमें मैंने यह दिखाने का प्रयत्न किया कि (1.) किस अर्थ में मसीही सिद्ध नहीं हैं, (2.) और किस अर्थ में वे सिद्ध हैं।
"(1.) किस अर्थ में वे सिद्ध नहीं हैं।
वे ज्ञान में सिद्ध नहीं हैं।
वे अज्ञानता से मुक्त नहीं हैं, और न भूल से ही मुक्त हैं।
हमें किसी जीवित मनुष्य से अचूक होने की आशा उतनी ही नहीं करनी चाहिए जितनी सर्वज्ञ होने की।
वे दुर्बलताओं से मुक्त नहीं हैं, जैसे समझ की कमज़ोरी या मंदता, कल्पना की अनियमित तीव्रता या भारीपन।
दूसरी प्रकार की ऐसी ही दुर्बलताएँ हैं भाषा की अनुपयुक्तता, उच्चारण की अशोभनीयता; और इनमें बातचीत या आचरण की एक हज़ार अनाम त्रुटियाँ भी जोड़ी जा सकती हैं।
इन जैसी दुर्बलताओं से कोई भी पूर्णतः तब तक मुक्त नहीं होता जब तक उसकी आत्मा परमेश्वर के पास न लौट जाए; और न हम तब तक परीक्षा से पूरी तरह मुक्त होने की आशा कर सकते हैं; क्योंकि 'दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता।'
परन्तु इस अर्थ में भी पृथ्वी पर कोई
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
निरपेक्ष सिद्धता नहीं है।
श्रेणियों की कोई सिद्धता नहीं है, ऐसी कोई नहीं जिसमें निरन्तर वृद्धि की गुंजाइश न हो।
"(2.) तब किस अर्थ में वे सिद्ध हैं?
ध्यान दीजिए, हम अभी मसीह में शिशुओं की नहीं, बल्कि प्रौढ़ मसीहियों की बात कर रहे हैं।
परन्तु मसीह में शिशु भी इस हद तक सिद्ध हैं कि पाप नहीं करते।
संत यूहन्ना स्पष्ट रूप से यह कहता है; और इसे पुराने नियम के उदाहरणों से झुठलाया नहीं जा सकता।
क्योंकि यदि प्राचीन यहूदियों में सबसे पवित्र जन ने कभी-कभी पाप कर भी लिया हो तो क्या?
इससे हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि 'सब मसीही जब तक जीवित हैं पाप करते हैं और अवश्य करेंगे।'
"परन्तु क्या पवित्र शास्त्र यह नहीं कहता, 'धर्मी दिन में सात बार पाप करता है?'
नहीं कहता।
वास्तव में वह कहता है, 'धर्मी सात बार गिरता है।'
परन्तु यह बिलकुल दूसरी बात है; क्योंकि, पहली बात, 'दिन में' ये शब्द पाठ में हैं ही नहीं।
दूसरी बात, यहाँ पाप में गिरने का तो कोई उल्लेख ही नहीं है।
यहाँ जिसका उल्लेख है, वह सांसारिक विपत्ति में गिरना है।
" परन्तु अन्यत्र सुलैमान कहता है, 'ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो पाप न करता हो।'
निःसंदेह सुलैमान के दिनों में ऐसा ही था; वरन् सुलैमान से मसीह तक उस समय कोई ऐसा मनुष्य न था जो पाप न करता हो।
परन्तु व्यवस्था के अधीन रहनेवालों की दशा चाहे जो भी रही हो, हम संत यूहन्ना के साथ निःशंक कह सकते हैं कि जब से सुसमाचार दिया गया है, 'जो परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है वह पाप नहीं करता।'
"मसीहियों के विशेषाधिकारों को उसके आधार पर कदापि नहीं नापना चाहिए जो पुराना नियम यहूदी व्यवस्था के अधीन रहनेवालों के विषय में लिखता है; क्योंकि अब समय की पूर्णता आ पहुँची है, पवित्र आत्मा अब दिया गया है, यीशु मसीह के प्रकाशन के द्वारा परमेश्वर का महान उद्धार अब मनुष्यों के पास लाया गया है।
स्वर्ग का राज्य अब पृथ्वी पर स्थापित हो चुका है, जिसके विषय में परमेश्वर के आत्मा ने प्राचीन काल में घोषणा की (दाऊद मसीही सिद्धता का आदर्श या मानक होने से कितना दूर है!), 'उस समय उनमें जो निर्बल होगा वह दाऊद के समान होगा, और दाऊद का घराना उनके आगे परमेश्वर के समान, अर्थात् यहोवा के दूत के समान होगा,' जकर्याह 12:8।
"परन्तु प्रेरितों ने स्वयं पाप किया; पतरस ने
मसीही सिद्धता,
कपट करके, पौलुस ने बरनबास के साथ अपने तीखे विवाद के द्वारा।
मान लीजिए उन्होंने किया, तो क्या आप ऐसा तर्क करेंगे: 'यदि प्रेरितों में से दो ने एक बार पाप किया, तो सब युगों के अन्य सब मसीही जब तक जीवित हैं पाप करते हैं और अवश्य करेंगे?'
नहीं, परमेश्वर करे हम ऐसा न कहें।
उन पर पाप की कोई अनिवार्यता नहीं थी; परमेश्वर का अनुग्रह निश्चय ही उनके लिए पर्याप्त था।
और वह आज हमारे लिए भी पर्याप्त है।
"परन्तु संत याकूब कहता है, 'हम सब बहुत बातों में चूक जाते हैं।'
सच है; परन्तु यहाँ किन लोगों की बात हो रही है?
यही कि उन बहुत-से गुरुओं या शिक्षकों की जिन्हें परमेश्वर ने नहीं भेजा था; न स्वयं प्रेरित की, न किसी सच्चे मसीही की।
कि 'हम' शब्द में, जो वाक्-अलंकार के रूप में प्रयुक्त है और जो प्रेरित-लेखन के साथ-साथ अन्य सब लेखनों में भी सामान्य है, प्रेरित अपने आपको या किसी अन्य सच्चे विश्वासी को कदापि सम्मिलित नहीं कर सकता था, यह पहली बात, नौवें पद से प्रकट होता है, 'इसी से हम प्रभु और पिता की स्तुति करते हैं, और इसी से हम मनुष्यों को श्राप देते हैं।'
निश्चय ही हम प्रेरित नहीं! हम विश्वासी नहीं!
दूसरी बात, इस पाठ से पहले के शब्दों से:
'हे मेरे भाइयो, तुम में से बहुत-से उपदेशक न बनें,' अर्थात् शिक्षक, 'क्योंकि जानते हो कि हम पर और भी कठोर दंड की आज्ञा होगी।
इसलिए कि हम सब बहुत बातों में चूक जाते हैं।'
हम? कौन? प्रेरित नहीं, न सच्चे विश्वासी, परन्तु वे जिन पर 'और भी कठोर दंड की आज्ञा' होनी थी, उन बहुत-से अपराधों के कारण।
वरन् तीसरी बात, स्वयं यह पद सिद्ध करता है कि 'हम सब चूक जाते हैं,' यह न सब मनुष्यों के विषय में कहा जा सकता है, न सब मसीहियों के विषय में।
क्योंकि इसके तुरन्त बाद एक ऐसे मनुष्य का उल्लेख है जो 'नहीं चूकता,' जैसा कि पहले जिस 'हम' का उल्लेख हुआ था वह चूकता था; इसलिए उससे उसे स्पष्टतः भिन्न बताया गया है और 'सिद्ध मनुष्य' घोषित किया गया है।
"परन्तु संत यूहन्ना स्वयं कहता है, 'यदि हम कहें कि हम में कुछ भी पाप नहीं, तो हम अपने आपको धोखा देते हैं;' और, 'यदि हम कहें कि हमने पाप नहीं किया, तो हम उसे झूठा ठहराते हैं, और उसका वचन हम में नहीं है।'
"मैं उत्तर देता हूँ, (1.) दसवाँ पद आठवें पद का अर्थ निश्चित करता है: पहले पद में 'यदि हम कहें कि हम में कुछ भी पाप नहीं,' की व्याख्या बाद के पद के 'यदि हम कहें कि हमने पाप नहीं किया,' से हो जाती है।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
(2.) विचाराधीन बात यह नहीं है कि हमने पहले पाप किया है या नहीं; और इन दोनों पदों में से कोई भी यह नहीं कहता कि हम अब पाप करते हैं या पाप में लगे हैं।
(3.) नौवाँ पद आठवें और दसवें दोनों की व्याख्या करता है: 'यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है।'
मानो उसने कहा हो, 'मैं पहले कह चुका हूँ, यीशु मसीह का लहू हमें सब पाप से शुद्ध करता है।'
और कोई मनुष्य यह नहीं कह सकता, 'मुझे इसकी आवश्यकता नहीं; मुझ में ऐसा कोई पाप नहीं जिससे शुद्ध होना हो।
'यदि हम कहें कि हम में कुछ भी पाप नहीं,' कि 'हमने पाप नहीं किया, तो हम अपने आपको धोखा देते हैं,' और परमेश्वर को झूठा ठहराते हैं; परन्तु 'यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह विश्वासयोग्य और धर्मी है,' केवल 'हमारे पापों को क्षमा करने' में ही नहीं, वरन् 'हमें सब अधर्म से शुद्ध करने' में भी, कि हम 'जाएँ और फिर पाप न करें।'
इसलिए संत यूहन्ना की शिक्षा और सम्पूर्ण नए नियम के सारे स्वर के अनुरूप, हम यह निष्कर्ष स्थिर करते हैं: मसीही इस हद तक सिद्ध है कि पाप नहीं करता।
"यह प्रत्येक मसीही का महिमामय विशेषाधिकार है, चाहे वह मसीह में केवल शिशु ही क्यों न हो।
परन्तु केवल प्रौढ़ मसीहियों के विषय में ही यह कहा जा सकता है कि वे ऐसे अर्थ में सिद्ध हैं कि, दूसरे, बुरे विचारों और बुरे स्वभावों से मुक्त हैं।
पहले, बुरे या पापमय विचारों से।
वास्तव में, वे कहाँ से उपजें?
यदि कहीं से हों तो 'मनुष्य के मन से ही बुरे विचार निकलते हैं।'
इसलिए यदि मन अब बुरा नहीं रहा, तो बुरे विचार उसमें से अब नहीं निकलते: क्योंकि 'अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं ला सकता।'
'और जैसे वे बुरे विचारों से मुक्त हैं, वैसे ही बुरे स्वभावों से भी।
इनमें से प्रत्येक जन संत
पौलुस के साथ कह सकता है, 'मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ; तो भी मैं जीवित हूँ; परन्तु मैं नहीं, वरन् मसीह मुझ में जीवित है;'— ये शब्द स्पष्टतः बाहरी के साथ-साथ भीतरी पाप से भी छुटकारे का वर्णन करते हैं।
यह नकारात्मक रूप में भी व्यक्त है, 'मैं जीवित नहीं,' मेरा बुरा स्वभाव, पाप की देह नष्ट हो गई है; और सकारात्मक रूप में भी, 'मसीह मुझ में जीवित है,' और इसलिए वह सब जो पवित्र, धर्ममय और भला है।
वास्तव में ये दोनों, 'मसीह मुझ में जीवित है,' और, 'मैं जीवित
मसीही सिद्धता,
नहीं,' अटूट रूप से जुड़े हुए हैं।
क्योंकि ज्योति का अंधकार से, या मसीह का बलियाल से क्या मेल?
"इसलिए जो इन मसीहियों में वास करता है उसने 'विश्वास के द्वारा उनके मन को शुद्ध किया है;' यहाँ तक कि हर वह जन जिसमें
मसीह है, जो 'महिमा की आशा' है, 'अपने आपको वैसा ही शुद्ध करता है जैसा वह शुद्ध है।'
वह अभिमान से शुद्ध किया गया है; क्योंकि मसीह मन में दीन था; वह अभिलाषा और स्वेच्छा से शुद्ध है; क्योंकि मसीह केवल पिता की इच्छा पूरी करना चाहता था; और वह क्रोध से, शब्द के सामान्य अर्थ में, शुद्ध है, क्योंकि मसीह नम्र और कोमल था।
मैं कहता हूँ, शब्द के सामान्य अर्थ में; क्योंकि वह पाप पर क्रोधित होता है, जबकि पापी के लिए दुःखी होता है।
परमेश्वर के विरुद्ध हर अपराध पर उसे अप्रसन्नता होती है, परन्तु अपराधी के प्रति केवल कोमल करुणा।
"इस प्रकार यीशु अपने लोगों को उनके पापों से बचाता है; केवल बाहरी पापों से नहीं, वरन् उनके मन के पापों से भी।
कुछ लोग कहते हैं, 'सच है, परन्तु मृत्यु से पहले नहीं, इस संसार में नहीं।'
नहीं, संत यूहन्ना कहता है, 'इसी में प्रेम हमारे लिए सिद्ध हुआ है कि हमें न्याय के दिन साहस हो; क्योंकि जैसा वह है, वैसे ही हम भी इस संसार में हैं।'
प्रेरित यहाँ, निर्विवाद रूप से, अपने और अन्य जीवित मसीहियों के विषय में कहता है, जिनके विषय में वह स्पष्ट घोषणा करता है कि न केवल मृत्यु के समय या उसके बाद, वरन् 'इस संसार में' ही वे 'अपने स्वामी के समान' हैं।
"इसके ठीक अनुरूप पहले अध्याय में उसके ये शब्द हैं: 'परमेश्वर ज्योति है और उसमें कुछ भी अंधकार नहीं।
यदि हम ज्योति में चलें, जैसा वह ज्योति में है, तो हमारी आपस में सहभागिता है, और उसके पुत्र यीशु मसीह का लहू हमें सब पाप से शुद्ध करता है।'
और फिर: 'यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है।'
अब यह प्रकट है कि प्रेरित यहाँ इसी संसार में किए गए छुटकारे की बात करता है: क्योंकि वह यह नहीं कहता, मसीह का लहू शुद्ध करेगा (मृत्यु की घड़ी में, या न्याय के दिन), परन्तु वह 'वर्तमान समय में, हम जीवित मसीहियों को 'सब पाप से' शुद्ध करता है।' और यह भी उतना ही प्रकट है कि यदि कोई भी पाप शेष रहे, तो हम सब पाप से शुद्ध नहीं
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
हुए।
यदि आत्मा में कोई अधर्म शेष रहे, तो वह सब अधर्म से शुद्ध नहीं की गई।
और कोई यह न कहे कि यह केवल धर्मी ठहराए जाने से, या पाप के दोष से हमारे शुद्ध किए जाने से सम्बन्ध रखता है: पहले इसलिए कि ऐसा कहना उन बातों को आपस में मिला देना है जिन्हें प्रेरित स्पष्टतः अलग करता है, जो पहले 'हमारे पापों को क्षमा करने' का उल्लेख करता है, और फिर 'हमें सब अधर्म से शुद्ध करने' का।
दूसरे इसलिए कि यह कर्मों से धर्मी ठहराए जाने की बात को सबसे प्रबल अर्थ में प्रतिपादित करना है; यह सारी भीतरी, और साथ ही बाहरी, पवित्रता को धर्मी ठहराए जाने से पहले अनिवार्य बना देता है।
क्योंकि यदि यहाँ कहा गया शुद्धिकरण पाप के दोष से शुद्ध किए जाने के सिवा कुछ और नहीं है, तो हम दोष से शुद्ध नहीं होते, अर्थात् धर्मी नहीं ठहराए जाते, जब तक कि 'ज्योति में चलें, जैसा वह ज्योति में है' इस शर्त पर न हों।
तब शेष यही रहता है कि मसीही इस संसार में सब पाप से, सब अधर्म से बचाए जाते हैं; कि वे अब ऐसे अर्थ में सिद्ध हैं कि पाप नहीं करते और बुरे विचारों तथा बुरे स्वभावों से मुक्त हैं।"
यह हो नहीं सकता था कि इस प्रकार का एक प्रवचन, जो उन बहुतों की प्रिय धारणा का सीधा खंडन करता था जो दूसरों की दृष्टि में, और संभवतः अपनी दृष्टि में भी, सर्वोत्तम मसीहियों में गिने जाते थे (जबकि यदि ये बातें सच थीं तो वे मसीही थे ही नहीं), थोड़ा-सा भी अपराध उत्पन्न न करे।
इसलिए बहुत-से उत्तरों या आलोचनाओं की अपेक्षा थी; परन्तु मुझे सुखद निराशा हुई।
मुझे नहीं पता कि कोई प्रकाशित हुआ; इसलिए मैं चुपचाप अपने मार्ग पर चलता रहा।
उसके भजनों के दूसरे खंड की भूमिका।
13. इसके कुछ ही समय बाद, मेरे विचार से सन् 1741 के वसंत में, हमने भजनों का दूसरा खंड प्रकाशित किया।
चूँकि इस सिद्धान्त को अब भी बहुत गलत समझा जा रहा था, और परिणामस्वरूप उसका गलत चित्रण हो रहा था, मैंने उचित समझा कि इस विषय पर और स्पष्टीकरण दूँ, जो उसकी भूमिका में इस प्रकार किया गया:—
मसीही सिद्धता,
"परमेश्वर का यह महान दान, हमारे प्राणों का उद्धार, हमारे हृदयों पर नए सिरे से अंकित परमेश्वर के स्वरूप के सिवा और कुछ नहीं है।
यह 'विश्वासियों का अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नया हो जाना है, उसके स्वरूप के अनुसार जिसने उन्हें सृजा है।'
परमेश्वर ने अब 'वृक्ष की जड़ पर कुल्हाड़ा रख दिया है, विश्वास के द्वारा उनके मन को शुद्ध करते हुए,' और 'अपने पवित्र आत्मा की प्रेरणा से उनके हृदयों के सब विचारों को शुद्ध करते हुए।'
यह आशा रखते हुए कि वे परमेश्वर को वैसा ही देखेंगे जैसा वह है, वे 'अपने आपको वैसा ही शुद्ध करते हैं जैसा वह शुद्ध है,' और 'सारे चालचलन में पवित्र हैं, जैसा उनका बुलानेवाला पवित्र है।'
ऐसा नहीं कि उन्होंने वह सब पा लिया है जो वे पाएँगे, या वे पहले ही इस अर्थ में सिद्ध हैं।
परन्तु वे प्रतिदिन 'बल पर बल पाते हुए आगे बढ़ते हैं, और अब 'दर्पण में' प्रभु की महिमा को निहारते हुए, प्रभु के आत्मा के द्वारा, महिमा पर महिमा पाकर उसी स्वरूप में बदलते जाते हैं।'
" और 'जहाँ प्रभु का आत्मा है वहाँ स्वतंत्रता है'; 'पाप और मृत्यु की व्यवस्था' से ऐसी स्वतंत्रता कि इस संसार की सन्तान उस पर विश्वास न करेंगे, चाहे कोई उन्हें बताए भी।
जो इस प्रकार 'परमेश्वर से उत्पन्न' हुए हैं, उन्हें पुत्र ने पाप और कड़वाहट की उस बड़ी जड़, अभिमान, से स्वतंत्र किया है।
वे अनुभव करते हैं कि उनकी सारी 'योग्यता परमेश्वर की ओर से है', कि वही है जो 'उनके सब विचारों में है', और 'अपनी सुइच्छा के अनुसार उन में इच्छा और काम दोनों का प्रभाव डालता है।'
वे अनुभव करते हैं कि 'बोलनेवाले वे नहीं हैं, परन्तु उनके पिता का आत्मा है जो उन में बोलता है,' और जो कुछ उनके हाथों से होता है, उसमें 'पिता जो उन में है, वही अपने काम करता है।'
इस प्रकार परमेश्वर उनके लिए सब कुछ है, और वे उसकी दृष्टि में कुछ भी नहीं।
वे स्वेच्छा से मुक्त हैं, क्योंकि वे परमेश्वर की पवित्र और सिद्ध इच्छा के सिवा कुछ नहीं चाहते: न अभाव में आपूर्ति, न पीड़ा में आराम,* न जीवन, न मृत्यु, न कोई प्राणी; वरन् अपने अन्तरतम प्राण में निरन्तर पुकारते हैं, 'हे पिता, तेरी इच्छा पूरी हो।'
वे बुरे विचारों से मुक्त हैं, इसलिए ® यह बहुत कठोर कथन है।
हमारे प्रभु ने स्वयं पीड़ा में आराम चाहा।
उसने उसे केवल समर्पण के साथ माँगा: "मेरी नहीं," जैसा मैं चाहता हूँ, "परन्तु तेरी इच्छा के अनुसार हो।"
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
वे उनमें प्रवेश नहीं कर सकते, क्षण भर के लिए भी नहीं।
पहले, जब कोई बुरा विचार आता था, तो वे ऊपर देखते थे और वह लुप्त हो जाता था।
परन्तु अब वह आता ही नहीं, क्योंकि उस प्राण में, जो परमेश्वर से भरा है, इसके लिए स्थान ही नहीं।
वे प्रार्थना में भटकने से मुक्त हैं।
जब कभी वे अधिक सीधे रूप से परमेश्वर के सामने अपना हृदय उँडेलते हैं, तो उन्हें किसी बीती,* या अनुपस्थित, या आनेवाली बात का विचार नहीं होता, केवल परमेश्वर का।
बीते समय में भटकते विचार भीतर घुस आते थे, जो फिर भी धुएँ के समान उड़ जाते थे; परन्तु अब वह धुआँ उठता ही नहीं।
उन्हें न अपनी सामान्य दशा के विषय में, न किसी विशेष कार्य के विषय में कोई भय या सन्देह है।†
'उस पवित्र जन की ओर से अभिषेक' उन्हें प्रति घड़ी सिखाता है कि वे क्या करें और क्या कहें; इसलिए उन्हें इस विषय में तर्क करने की आवश्यकता भी नहीं।§ वे एक अर्थ में परीक्षाओं से मुक्त हैं; क्योंकि यद्यपि असंख्य परीक्षाएँ उनके चारों ओर मँडराती हैं, तो भी वे उन्हें व्याकुल नहीं करतीं।
सब समय उनके प्राण स्थिर और शान्त रहते हैं, उनके हृदय दृढ़ और अटल हैं।
उनकी शान्ति, नदी के समान बहती हुई, 'समझ से परे' है, और वे 'ऐसे आनन्द से जो वर्णन से बाहर और महिमा से भरपूर है, मगन होते हैं।'
क्योंकि वे 'छुटकारे के दिन के लिए आत्मा से मुहरबन्द किए गए हैं,' और उनके अपने भीतर यह साक्षी है कि उनके लिए 'धार्मिकता का मुकुट रखा है, जिसे प्रभु' उन्हें 'उस दिन देगा।' ‖ " ऐसा नहीं कि हर कोई तब तक शैतान की सन्तान है जब तक वह इस प्रकार प्रेम में नया न किया जाए: इसके विपरीत, जिसे 'परमेश्वर पर पक्का भरोसा है कि मसीह की योग्यता के द्वारा उसके पाप क्षमा हुए,' वह परमेश्वर की सन्तान है, और यदि वह उसमें बना रहे तो सब प्रतिज्ञाओं का वारिस है।
न ही उसे किसी रीति से
देखिए उपदेश "भटकते विचारों पर।"
प्रायः ऐसा होता है; परन्तु केवल कुछ समय के लिए।
+ कुछ समय के लिए ऐसा हो सकता है; परन्तु सदा नहीं।
कभी-कभी उन्हें आवश्यकता नहीं होती; अन्य समयों में होती है।
1 कभी-कभी वे नहीं करते; अन्य समयों में करते हैं, और बहुत दुःख के साथ।
सब नहीं जो पाप से बचाए गए हैं; उनमें से बहुतों ने उसे अभी तक नहीं पाया।
मसीही सिद्धता,
अपने भरोसे को त्याग दे, या जो विश्वास उसने पाया है उसका इनकार कर दे, इसलिए कि वह दुर्बल है, या इसलिए कि वह 'आग से परखा जाता है, और उसका प्राण नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण 'उदास' है।
मन-फिराव के समय पूर्ण रूप से नहीं बचाए जाते।
'"हम यह भी कहने का साहस नहीं करते, जैसा कुछ ने कहा है, कि यह सारा उद्धार एक ही बार में दिया जाता है।
अपने बच्चों में परमेश्वर का कार्य क्रमिक होने के साथ-साथ तात्कालिक भी होता है; और हम जानते हैं कि गवाहों का एक बादल है जिन्होंने एक ही क्षण में या तो अपने पापों की क्षमा का स्पष्ट बोध पाया है, या पवित्र आत्मा की स्थायी साक्षी।
परन्तु हम कहीं भी एक भी ऐसा उदाहरण नहीं जानते जिसमें किसी व्यक्ति ने एक ही क्षण में पापों की क्षमा, आत्मा की स्थायी साक्षी, और एक नया, स्वच्छ हृदय तीनों पाए हों।
'"वास्तव में, परमेश्वर कैसे कार्य कर सकता है यह हम नहीं बता सकते; परन्तु जिस सामान्य रीति से वह कार्य करता है वह यह है: जो पहले अपने ऊपर भरोसा रखते थे कि वे धर्मी हैं, कि वे धनवान हैं और माल बढ़ा चुके हैं और उन्हें किसी वस्तु की घटी नहीं, वे परमेश्वर के आत्मा के द्वारा, जो उसके वचन को लागू करता है, कायल किए जाते हैं कि वे कंगाल और नंगे हैं।
उनके किए हुए सब काम उन्हें स्मरण कराए जाते हैं और उनके सामने पंक्तिबद्ध किए जाते हैं, कि वे परमेश्वर के क्रोध को अपने सिर पर लटकता देखें और अनुभव करें कि वे नरक के दंड के योग्य हैं।
अपने संकट में वे प्रभु को पुकारते हैं, और वह उन्हें दिखाता है कि उसने उनके पाप दूर कर दिए हैं, और उनके हृदयों में स्वर्ग का राज्य खोल देता है,— 'धार्मिकता, और शान्ति, और पवित्र आत्मा में आनन्द।'
शोक और पीड़ा भाग जाते हैं, और 'पाप का उन पर कोई प्रभुत्व नहीं रहता।'
यह जानते हुए कि वे उसके लहू पर विश्वास के द्वारा सेंतमेंत धर्मी ठहराए गए हैं, उन्हें 'यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल' मिलता है; वे 'परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करते हैं,' और 'परमेश्वर का प्रेम उनके हृदयों में उँडेला गया है।'
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
मन-फिराव के बाद क्या आता है।
"इस शान्ति में वे दिनों, या सप्ताहों, या महीनों तक रहते हैं, और सामान्यतः समझते हैं कि अब उन्हें युद्ध का सामना फिर नहीं करना पड़ेगा; जब तक कि उनके कुछ पुराने शत्रु, उनके हृदय के पाप, या वह पाप जो उन्हें सबसे सहज ही फँसा लेता था (शायद क्रोध या अभिलाषा), फिर उन पर आक्रमण न करें और उन पर ज़ोर से प्रहार न करें कि वे गिर जाएँ।
तब यह भय उठता है कि वे अन्त तक स्थिर न रह सकेंगे; और प्रायः यह सन्देह कि कहीं परमेश्वर ने उन्हें भुला तो नहीं दिया, या यह सोचकर कि उनके पाप क्षमा हो गए, कहीं उन्होंने अपने आपको धोखा तो नहीं दिया।
इन बादलों के नीचे, विशेषकर यदि वे शैतान से तर्क करें, वे दिन भर विलाप करते फिरते हैं।
परन्तु बहुत देर नहीं होती कि उनका प्रभु स्वयं उत्तर देता है, और उन्हें शान्ति देने के लिए पवित्र आत्मा को भेजता है, कि वह उनकी आत्माओं के साथ निरन्तर साक्षी दे कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं।
तब वे सचमुच नम्र, कोमल और सीखने को तैयार होते हैं, एक छोटे बच्चे के समान।
परिवर्तित हृदय में भ्रष्टता।
" और अब पहली बार वे अपने हृदय की तह देखते हैं,* जो परमेश्वर ने पहले उन पर प्रकट नहीं की थी, ऐसा न हो कि प्राण उसके सामने मूर्छित हो जाए, और वह आत्मा भी जो उसने बनाई है।
अब वे वहाँ सब छिपी घृणित बातें देखते हैं, अभिमान, स्वेच्छा और नरक की गहराइयाँ; फिर भी उनके अपने भीतर यह साक्षी है, 'तू परमेश्वर का वारिस है, मसीह के साथ संगी वारिस, इस आग की परीक्षा के बीच भी;' जो उस तीव्र बोध को निरन्तर बढ़ाती है जो उन्हें तब होता है कि वे अपनी सहायता आप नहीं कर सकते, और उस अवर्णनीय भूख को भी जो वे 'धार्मिकता और सच्ची पवित्रता' में उसके स्वरूप के पूर्ण नवीकरण के लिए अनुभव करते हैं।
क्या यह आश्चर्य की बात नहीं, कि जब यह पुस्तक उपलब्ध है, जो चौबीस वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी, कोई मुझे डटकर कहे कि यह नया सिद्धान्त है, और मैंने इसे पहले कभी नहीं सिखाया?—[यह टिप्पणी पहली बार सन् 1765 में प्रकाशित हुई। — सम्पादक]
मसीही सिद्धता,
द्वितीय आशीष।
"तब परमेश्वर अपने भय माननेवालों की अभिलाषा का ध्यान रखता है, और उन्हें एकाग्र दृष्टि और शुद्ध हृदय देता है; वह उन पर अपना स्वरूप और अपनी छाप अंकित करता है; वह उन्हें मसीह यीशु में नया सृजता है; वह अपने
पुत्र और धन्य आत्मा के साथ उनके पास आता है, और उनके प्राणों में अपना निवास बनाकर उन्हें उस 'विश्राम' में ले आता है 'जो परमेश्वर के लोगों के लिए बाकी है।'"
यहाँ मैं यह टिप्पणी किए बिना नहीं रह सकता कि (1.) यह मसीही सिद्धता का सबसे प्रबल विवरण है जो हमने कभी दिया— वस्तुतः एक से अधिक बातों में बहुत प्रबल, जैसा कि संलग्न टिप्पणियों में देखा गया है।
(2.) कि इस विषय पर हमने तब से जो कुछ कहा है, चाहे पद्य में या गद्य में, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं जो इस भूमिका में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निहित न हो।
इसलिए हमारा वर्तमान सिद्धान्त सही हो या गलत, वह वही है जो हमने आरम्भ से सिखाया।
14.
इसके और प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं, उस खंड से ही उद्धरण बढ़ाकर।
इतना ही पर्याप्त होगा कि मैं उस खंड के अन्तिम भजन का केवल एक अंश उद्धृत करूँ:— हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ कि एक विश्राम बाकी है, जो तेरे सब लोगों को ज्ञात है; ऐसा विश्राम जहाँ शुद्ध आनन्द का राज्य है, और केवल तू ही प्रेम किया जाता है; ऐसा विश्राम जहाँ हमारे प्राण की सारी अभिलाषा ऊपर की बातों पर टिकी है; जहाँ सन्देह, पीड़ा और भय समाप्त हो जाते हैं, सिद्ध प्रेम से निकाल दिए जाते हैं।
हर बुरी प्रवृत्ति से मुक्त, (पुत्र ने हमें स्वतन्त्र किया है,) हम नरक की सारी शक्तियों को कुचलते हैं, महिमामय स्वतन्त्रता में।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
जीवन के मार्ग में सुरक्षित, हम मृत्यु, पृथ्वी और नरक के ऊपर उठते हैं; प्रेम में सिद्ध होने पर हम पाते हैं अपना चिरकाल से खोजा हुआ स्वर्गलोक।
काश कि मैं अब उस विश्राम को जान पाता, विश्वास करता और उसमें प्रवेश करता!
अब, हे उद्धारकर्ता, अब सामर्थ्य प्रदान कर, और मुझे पाप से विश्राम दे!
मेरे हृदय से यह कठोरता दूर कर, यह अविश्वास दूर कर; मुझे विश्वास का विश्राम प्रदान कर, अपने प्रेम का विश्रामदिन।
आ, हे मेरे उद्धारकर्ता, आ जा! मेरे प्राण में उतर आ!
अब अपने प्राणी से दूर न रह, हे मेरे रचयिता और मेरे अन्त!
जो आनन्द तूने मेरे लिए तैयार किया है, उसमें अब और विलम्ब न हो:
आ, मेरे अत्यन्त महान प्रतिफल, जिसके लिए मैं पहले रचा गया था।
आ, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, और मुझे अपना निवास मानकर मुहर लगा!
मेरा सब कुछ तुझ में खो जाए; सब कुछ परमेश्वर में खो जाए!
क्या इससे अधिक स्पष्ट कुछ हो सकता है कि (1.) यहाँ भी उतना ही पूर्ण और उच्च उद्धार है जितने का हमने कभी वर्णन किया है?
(2.) कि इसे केवल विश्वास से प्राप्य बताया गया है, और केवल अविश्वास से बाधित?
(3.) कि इस विश्वास को, और परिणामस्वरूप उस उद्धार को जो यह लाता है, एक क्षण में दिया जाने वाला बताया गया है?
(4.) कि यह माना गया है कि वह क्षण अभी हो सकता है? कि हमें एक पल भी और ठहरने की आवश्यकता नहीं? कि "अभी," ठीक "अभी" "प्रसन्नता का समय है? अभी इस पूर्ण "उद्धार" का "दिन है?"
और अन्त में, कि यदि कोई
मसीही सिद्धता,
इससे भिन्न कहे, तो वही व्यक्ति है जो हमारे बीच नया सिद्धान्त ला रहा है?
उसके भजनों के तीसरे खंड की भूमिका।
15.
लगभग एक वर्ष बाद, अर्थात् सन् 1742 में, हमने भजनों का एक और खंड प्रकाशित किया।
विवाद अब चरम पर था, इसलिए हमने इस विषय पर पहले से कहीं अधिक विस्तार से कहा।
तदनुसार इस खंड के बहुत-से भजन स्पष्ट रूप से इसी विषय पर हैं।
और भूमिका भी इसी पर है, जो छोटी होने के कारण पूरी उद्धृत कर देना अनुचित न होगा:—
"(1.) मसीही सिद्धता के प्रति सामान्य पूर्वाग्रह शायद मुख्यतः उसके स्वरूप की गलतफहमी से उत्पन्न होता है। हम सहर्ष मानते हैं, और निरन्तर घोषित करते हैं, कि इस जीवन में ऐसी कोई सिद्धता नहीं जो या तो भलाई करने और परमेश्वर की सब विधियों में उपस्थित रहने से छूट का संकेत दे, या अज्ञानता, भूल, परीक्षा और उन हज़ार दुर्बलताओं से मुक्ति का, जो शरीर और लहू से अनिवार्य रूप से जुड़ी हैं।
"(2.) पहली बात।
हम न केवल मानते हैं, वरन् दृढ़ता से कहते हैं, कि इस जीवन में ऐसी कोई सिद्धता नहीं जो परमेश्वर की सब विधियों में उपस्थित रहने से, या जब तक हमारे पास समय है सब मनुष्यों की भलाई करने से, यद्यपि
'विशेष करके विश्वासी भाइयों की,' कोई छूट दे।
हम विश्वास करते हैं कि न केवल मसीह में शिशु, जिन्होंने अभी-अभी उसके लहू में छुटकारा पाया है, वरन् वे भी जो 'सिद्ध पुरुष बन गए हैं,' जब-जब अवसर मिले, 'उसकी स्मृति में रोटी खाने और दाखरस पीने,' और 'पवित्र शास्त्र में ढूँढ़ने' के लिए अनिवार्य रूप से बाध्य हैं; संयम के साथ-साथ उपवास के द्वारा 'अपनी देह को वश में रखने और उसे अधीन करने' के लिए; और सबसे बढ़कर, गुप्त में भी और बड़ी मण्डली में भी प्रार्थना में अपने प्राण उँडेलने के लिए।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
"(3.) दूसरी बात, हम विश्वास करते हैं कि इस जीवन में ऐसी कोई सिद्धता नहीं जो उद्धार के लिए अनिवार्य न होने वाली बातों में अज्ञानता या भूल से, या नाना प्रकार की परीक्षाओं से, या उन असंख्य दुर्बलताओं से, जिनसे नश्वर देह प्राण को कमोबेश दबाती है, पूर्ण छुटकारे का संकेत दे।
हमें पवित्र शास्त्र में ऐसा कोई आधार नहीं मिलता कि हम मान लें कि मिट्टी के घर का कोई भी निवासी शारीरिक दुर्बलताओं से, या बहुत-सी बातों की अज्ञानता से पूर्णतः मुक्त है; या यह कल्पना करें कि कोई भूल करने, या विविध परीक्षाओं में पड़ने में असमर्थ है।
"(4.) तब 'सिद्ध जन' से आपका आशय किससे है?
हमारा आशय उससे है जिसमें 'वह मन है जो मसीह में था,' और जो ऐसे 'चलता है जैसे मसीह भी चला'; ऐसा मनुष्य
'जिसके हाथ शुद्ध हैं और हृदय पवित्र,' या जो 'शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध किया गया है'; जिसमें 'ठोकर खाने का कोई कारण नहीं,' और जो, तदनुसार, 'पाप नहीं करता।'
इसे थोड़ा और विशेष रूप से कहें तो: 'सिद्ध मनुष्य' इस पवित्र शास्त्रीय अभिव्यक्ति से हम उसे समझते हैं जिसमें परमेश्वर ने अपना विश्वासयोग्य वचन पूरा किया है, 'मैं तुम्हें तुम्हारी सारी मलिनता और तुम्हारी सब मूरतों से शुद्ध करूँगा:
मैं तुम्हें तुम्हारी सब अशुद्धताओं से भी बचाऊँगा।'
इससे हम उसे समझते हैं जिसे परमेश्वर ने 'देह, प्राण और आत्मा, सब में पवित्र किया है'; जो 'ज्योति में चलता है जैसा वह ज्योति में है, जिसमें कुछ भी अंधकार नहीं; उसके पुत्र यीशु मसीह के लहू ने उसे सब पाप से शुद्ध कर दिया है।'
"(5.) यह मनुष्य अब समस्त मानव-जाति के सामने गवाही दे सकता है, 'मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ: तो भी मैं जीवित हूँ; परन्तु मैं नहीं, वरन् मसीह मुझ में जीवित है।'
वह हृदय में भी और 'सारे चालचलन में' भी 'पवित्र है जैसा परमेश्वर जिसने' उसे 'बुलाया पवित्र है।'
वह 'अपने परमेश्वर प्रभु से अपने सारे हृदय से प्रेम रखता है,' और उसकी सेवा 'अपनी सारी शक्ति से' करता है।
वह 'अपने पड़ोसी से,' हर मनुष्य से, 'अपने समान प्रेम रखता है'; वरन् 'जैसा मसीह हम से प्रेम रखता है'; विशेषकर उनसे जो 'उसका अपमान करते और उसे सताते हैं,
मसीही सिद्धता,
क्योंकि वे न पुत्र को जानते हैं, न पिता को।'
वास्तव में, उसका प्राण पूर्णतः प्रेम है, 'दया की कोमलता, कृपा, नम्रता, सौम्यता, सहनशीलता' से भरा हुआ।
और उसका जीवन उसके अनुरूप है, 'विश्वास के काम, आशा के धीरज, प्रेम के परिश्रम' से परिपूर्ण।
'और जो कुछ' वह 'वचन या कर्म से करता है, सब कुछ' प्रभु यीशु के नाम में, उसके प्रेम और सामर्थ्य में
'करता है।'
संक्षेप में, वह 'परमेश्वर की इच्छा पृथ्वी पर पूरी करता है, जैसी स्वर्ग में पूरी की जाती है।'
"(6.) सिद्ध मनुष्य होने का, 'सर्वथा पवित्र किए जाने' का यही अर्थ है; वरन् 'परमेश्वर के प्रेम से ऐसा प्रज्वलित हृदय' होना (आर्चबिशप अशर के शब्दों में), 'कि हर विचार, वचन और कर्म को निरन्तर आत्मिक बलिदान के रूप में चढ़ाया जाए, जो मसीह के द्वारा परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हो।'
हमारे हृदय के हर विचार में, हमारी जीभ के हर वचन में, हमारे हाथों के हर कर्म में, 'उसके गुण प्रकट करना जिसने हमें अंधकार से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है।'
काश कि हम, और वे सब जो सच्चाई से प्रभु यीशु को खोजते हैं, इस प्रकार 'एक होकर सिद्ध किए जाएँ!'"
वह अपने विचारों में किसी भी परिवर्तन का खंडन करता है।
यही वह सिद्धान्त है जो हमने आरम्भ से प्रचारित किया, और जिसका हम आज भी प्रचार करते हैं।
वास्तव में, इसे हर दृष्टिकोण से देखते हुए, और बार-बार एक ओर परमेश्वर के वचन से और दूसरी ओर परमेश्वर की सन्तानों के अनुभव से मिलाते हुए, हमने मसीही सिद्धता के स्वरूप और गुणों को और आगे तक देखा।
परन्तु फिर भी हमारी पहली और अन्तिम धारणाओं में कोई विरोध नहीं है।
हमारी पहली धारणा यह थी कि यह "वह मन" रखना है "जो मसीह में था," और "वैसे चलना जैसे वह चला;" वह सारा मन रखना जो उसमें था, और सदा वैसे चलना जैसे वह चला: दूसरे शब्दों में, भीतर और बाहर परमेश्वर को समर्पित होना; हृदय और जीवन में पूर्णतः समर्पित।
और हमारी आज भी वही धारणा है, न कुछ जोड़ा गया न घटाया गया।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
16.
इस खंड में इस विषय पर भजन इतने अधिक हैं कि उनकी प्रतिलिपि नहीं की जा सकती।
मैं केवल तीन में से एक अंश उद्धृत करूँगा:— हे पाप से बचानेवाले, मैं प्रतीक्षा करता हूँ कि जानूँ कि यीशु तेरा चंगा करनेवाला नाम है; प्रेम में सिद्ध होने पर खो देना, जो कुछ मेरे पास है, या मैं कर सकता हूँ, या मैं हूँ; मैं तेरे विश्वासयोग्य वचन पर टिकता हूँ, '* दास अपने स्वामी के समान होगा।'
मुझ में वह कृपापूर्ण उद्देश्य पूरा कर जिसके लिए तेरा बहुमूल्य जीवन दिया गया; हर अधर्म से छुड़ा, पुनःस्थापित कर, और मुझे स्वर्ग के योग्य बना।
जब तक तू मेरा हर दाग़ न धो दे, तेरा दुःख उठाना और मेरा विश्वास व्यर्थ है।
क्या तू इसलिए नहीं मरा कि मैं जीऊँ, अब अपने लिए नहीं परन्तु तेरे लिए?
कि देह, प्राण और आत्मा उसे दूँ जिसने मेरे लिए अपने आपको दे दिया?
तो आ, मेरे स्वामी और मेरे परमेश्वर, अपने लहू के प्रिय मोल को ले ले।
अपने निज दास पर अधिकार जता, अपनी ही सच्चाई और दया के निमित्त; मुझ में अपने महिमामय नाम को पवित्र कर; इसी क्षण मुझे अपना ले; और बदल और भली-भाँति शुद्ध कर; < केवल तेरा ही होकर मैं जीऊँ और मरूँ।
(पृ. 80।) संसार में से चुना गया, यदि अब मैं खड़ा हूँ, दिव्य धार्मिकता से सजा हुआ; यदि प्रतिज्ञा की हुई भूमि में लाया गया हूँ।
तो मैं ठीक ही उद्धारकर्ता को अपना कहता हूँ:
पवित्र करनेवाला आत्मा उँडेल, मेरी प्यास बुझाने और मुझे धोकर स्वच्छ करने को; अब, हे उद्धारकर्ता, कृपा की वर्षा उतरे, और मुझे पाप से शुद्ध कर दे।
मसीही सिद्धता,
मुझे हर पापमय धब्बे से शुद्ध कर:
मेरी सब मूरतें दूर फेंक दी जाएँ:
मुझे हर बुरे विचार से शुद्ध कर, स्वार्थ और अभिमान की सारी मलिनता से, शारीरिक मन की घृणा को मेरी देह में से तुरन्त दूर कर:
मुझे कोमल हृदय दे, समर्पित, और शुद्ध, और विश्वास तथा प्रेम से परिपूर्ण।
ओह, कि अब मैं पाप से छूटकर, तेरे वचन को पूर्ण रूप से परख पाऊँ, तेरे प्रतिज्ञा किए हुए विश्राम में, तेरे सिद्ध प्रेम के कनान में प्रवेश करूँ!
अब मुझे सिद्धता की ऊँचाई प्राप्त हो!
अब मैं शून्य में विलीन हो जाऊँ; अपनी दृष्टि में शून्य से भी तुच्छ हो जाऊँ, और अनुभव करूँ कि मसीह ही सब में सब है।
(पृ. 258।) हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ, तेरा अनुग्रह का कार्य आत्मा में सिद्ध है:
जो तेरा मुख देखता है उसका हृदय शुद्ध है, उसका आत्मा स्वस्थ किया गया है।
तेरे वचन से हर रोग से, हर घिनौनी बीमारी से, बचाया गया और सिद्ध स्वास्थ्य में, सिद्ध पवित्रता में लौटा दिया गया:
वह महिमामय स्वतंत्रता में चलता है, पाप के लिए पूरी तरह मरा हुआ:
सत्य, अर्थात् पुत्र ने उसे स्वतंत्र किया है, और वह सचमुच स्वतंत्र है।
उसकी सारी आत्मा में तेरी महिमा चमकती है, उसकी आत्मा पूरी तरह नई की गई है, और ईश्वरीय धार्मिकता से सजी हुई, परमेश्वर से ढकी और भरी हुई है।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
यही वह विश्राम, वह जीवन, वह शान्ति है जिसे तेरे सब लोग अनुभव करते हैं; प्रेम सिद्धता का बंधन है, और उनकी सारी आत्मा प्रेम ही है।
ओह, अनुग्रह के सुसमाचार की आनन्दमय ध्वनि!
मसीह मुझ में प्रकट होगा; मैं, हाँ मैं, उसका मुख देखूँगा, मैं यहीं पवित्र हो जाऊँगा!
वह अब मिट्टी के इस घर में आता है, वह अपने भावी निवास को हिला देता है; हे प्रभु, काश तू इस आनन्द के दिन अपने मन्दिर में आ जाए!
आ, हे मेरे परमेश्वर, अपने आप को प्रकट कर।
इस सारे विशाल शून्य को भर दे; केवल तू ही मेरी आत्मा को भर सकता है:
आ, हे मेरे परमेश्वर, मेरे परमेश्वर!
मेरी बड़ी माँगों को पूरा कर, पूरा कर, जो अनन्तता जितनी बड़ी हैं!
दे, मुझे दे जो मेरी आत्मा चाहती है, सब कुछ, वह सब जो तुझ में है!
उसके पहले, दूसरे और तीसरे सम्मेलनों के कार्यवृत्त।
17.
सोमवार, 25 जून, 1744 को हमारा पहला सम्मेलन आरम्भ हुआ; उसमें छह पादरी और हमारे सब प्रचारक उपस्थित थे।
अगली सुबह हमने पवित्रीकरण, अर्थात् सिद्धता के सिद्धान्त पर गम्भीरता से विचार किया।
इसके विषय में जो प्रश्न पूछे गए और जो उत्तर दिए गए, उनका सार इस प्रकार था: — "पवित्र किया जाना क्या है?
"'धार्मिकता और सच्ची पवित्रता में' परमेश्वर के स्वरूप में नया किया जाना।
"सिद्ध मसीही होने का क्या अर्थ है?
Zig [अस्पष्ट मूल पाठ]
मसीही सिद्धता,
"अपने सारे मन, सारे प्रण और सारी आत्मा से परमेश्वर से प्रेम करना (व्यवस्थाविवरण 6:5)।
"क्या इसका अर्थ यह है कि सब भीतरी पाप दूर कर दिया जाता है?
"निःसन्देह; नहीं तो हम कैसे कह सकते हैं कि हम 'अपनी सब अशुद्धता से बचाए गए हैं?' (यहेजकेल 36:29)।"
हमारा दूसरा सम्मेलन 1 अगस्त, 1745 को आरम्भ हुआ।
अगली सुबह हमने पवित्रीकरण के विषय में इस प्रकार बात की: — "भीतरी पवित्रीकरण कब आरम्भ होता है?
"जिस क्षण मनुष्य धर्मी ठहराया जाता है।
(फिर भी उसमें पाप बना रहता है, हाँ, सब पापों का बीज, जब तक कि वह पूरी तरह पवित्र न किया जाए।)
उसी समय से विश्वासी धीरे-धीरे पाप के लिए मरता और अनुग्रह में बढ़ता जाता है।
"क्या यह सामान्यतः मृत्यु से कुछ पहले तक नहीं दिया जाता?
"उन्हें नहीं, जो इसकी अपेक्षा इससे पहले नहीं करते।
"परन्तु क्या हम इसे इससे पहले पाने की आशा कर सकते हैं?
"क्यों नहीं? क्योंकि यद्यपि हम मानते हैं, (1) कि विश्वासियों में से अधिकांश, जिन्हें हम अब तक जानते हैं, मृत्यु के निकट तक इस प्रकार पवित्र नहीं किए गए थे; (2) कि जिनको
पौलुस ने अपनी पत्रियाँ लिखीं उनमें से थोड़े ही उस समय ऐसे थे; और (3) कि वह स्वयं अपनी पहली पत्रियाँ लिखते समय ऐसा नहीं था; फिर भी इससे यह सिद्ध नहीं होता कि हम आज ऐसे नहीं हो सकते।
"हमें पवित्रीकरण का प्रचार किस रीति से करना चाहिए?
"उनके सामने तो प्रायः बिलकुल नहीं जो आगे बढ़ने का प्रयत्न नहीं कर रहे; जो कर रहे हैं उनके सामने सदा प्रतिज्ञा के रूप में: सदा खींचते हुए, हाँके बिना।"
हमारा तीसरा सम्मेलन मंगलवार, 26 मई, 1746 को आरम्भ हुआ।
इसमें हमने पिछले दोनों सम्मेलनों के कार्यवृत्त को ध्यान से पढ़ा, कि देखें क्या उनमें कुछ ऐसा है जिसे अधिक परिपक्व विचार के बाद घटाया या बदला जाना चाहिए।
परन्तु हमें उसमें किसी भी बात को बदलने का कारण नहीं दिखा जिस पर हम पहले सहमत हुए थे।
हमारा चौथा सम्मेलन मंगलवार, 16 जून को आरम्भ हुआ,
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
1747।
क्योंकि वहाँ कई ऐसे लोग उपस्थित थे जो सिद्धता के सिद्धान्त पर विश्वास नहीं करते थे, हम इस बात पर सहमत हुए कि उसे नींव से जाँचें।
इसके लिए पूछा गया, "पूर्ण पवित्रीकरण के विषय में हमसे भिन्न मत रखनेवाले हमारे भाई कितना मानते हैं?
"वे मानते हैं, (1) कि प्रत्येक जन मृत्यु के समय पूरी तरह पवित्र किया जाना चाहिए।
(2) कि तब तक विश्वासी प्रतिदिन अनुग्रह में बढ़ता है और सिद्धता के अधिकाधिक निकट आता है।
(3) कि हमें निरन्तर उसकी ओर बढ़ते रहना चाहिए और सब दूसरों को भी ऐसा ही करने का उपदेश देना चाहिए।
"हम उन्हें क्या मानते हैं?
"हम मानते हैं, (1) कि विश्वास में मरनेवालों में से बहुत-से, हाँ, जिन्हें हम जानते हैं उनमें से अधिकांश, अपनी मृत्यु से कुछ पहले तक प्रेम में सिद्ध नहीं किए गए थे।
(2) कि 'पवित्र किया गया' शब्द पौलुस द्वारा उन सबके लिए निरन्तर प्रयोग किया जाता है जो धर्मी ठहराए गए थे।
(3) कि केवल इसी शब्द से उसका आशय 'सब पापों से बचाया गया' शायद ही कभी, यदि कभी, होता है।
(4) कि इसलिए उस अर्थ में इसका प्रयोग करना उचित नहीं, जब तक 'पूर्णतः', 'सर्वथा' या ऐसा ही कोई शब्द न जोड़ा जाए।
(5) कि प्रेरित लेखक प्रायः निरन्तर उन्हीं के विषय में या उन्हीं से बोलते हैं जो धर्मी ठहराए गए थे, परन्तु उनके विषय में या उनसे बहुत कम जो पूर्णतः पवित्र किए गए थे।* (6) कि इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम धर्मी ठहराए जाने की दशा के विषय में प्रायः निरन्तर बोलें; परन्तु पूर्ण पवित्रीकरण के विषय में कम, कम से कम पूर्ण और स्पष्ट शब्दों में।'
"तब वह बिन्दु कौन-सा है जहाँ हम अलग होते हैं?
"वह यह है: क्या हमें मृत्यु से पहले सब पाप से बचाए जाने की आशा करनी चाहिए?
अर्थात् केवल उन्हीं से, दूसरों को छोड़कर; परन्तु वे उनसे दूसरों के साथ मिलाकर प्रायः निरन्तर बोलते हैं।
कम, मैं मानता हूँ; परन्तु कुछ स्थानों में बहुत बार, दृढ़ता से और स्पष्ट रूप से।
मसीही सिद्धता,
पवित्रशास्त्र से सिद्ध किया गया सिद्धान्त "क्या इसकी कोई स्पष्ट शास्त्रीय प्रतिज्ञा है, — कि परमेश्वर हमें सब पाप से बचाएगा?
"है: 'वही इस्राएल को उसके सब अधर्मों से छुड़ाएगा,'
भजन संहिता 130:8।
"यह यहेजकेल की भविष्यवाणी में अधिक विस्तार से कहा गया है: 'तब मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; तुम्हारी सारी अशुद्धता और तुम्हारी सब मूरतों से मैं तुम्हें शुद्ध करूँगा; मैं तुम्हें तुम्हारी सब अशुद्धताओं से बचाऊँगा,' 36:25, 29।
इससे अधिक स्पष्ट कोई प्रतिज्ञा नहीं हो सकती।
और प्रेरित उस उपदेश में स्पष्ट रूप से इसी का उल्लेख करता है:
'ये प्रतिज्ञाएँ हमें मिली हैं, इसलिए आओ, हम अपने आप को शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध करें, और परमेश्वर के भय में पवित्रता को सिद्ध करें,' 2 कुरिन्थियों 7:1। उतनी ही स्पष्ट और सुनिश्चित वह प्राचीन प्रतिज्ञा है: 'तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे हृदय का और तेरे वंश के हृदय का खतना करेगा, कि तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे हृदय और अपने सारे प्राण से प्रेम करे,' व्यवस्थाविवरण 30:6।
"परन्तु क्या नए नियम में इसके अनुरूप कोई कथन मिलता है?
"मिलता है, और अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में कहा गया है।
जैसे 1 यूहन्ना 3:8: 'परमेश्वर का पुत्र इसलिए प्रगट हुआ कि शैतान के कामों को नष्ट करे;' शैतान के कामों को, बिना किसी सीमा या प्रतिबन्ध के; परन्तु सब पाप शैतान का काम है।
इसके समानान्तर पौलुस का यह कथन है: 'मसीह ने कलीसिया से प्रेम किया और अपने आप को उसके लिए दे दिया, कि उसे अपने लिए एक ऐसी महिमामय कलीसिया बनाकर खड़ा करे जिसमें न कोई दाग, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु हो, परन्तु वह पवित्र और निष्कलंक हो,' इफिसियों 5:25-27।
"और इसी आशय का उसका कथन रोमियों के आठवें अध्याय, पद 3, 4 में है: 'परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा, कि व्यवस्था की धार्मिकता हम में पूरी हो, जो शरीर के अनुसार नहीं, परन्तु आत्मा के अनुसार चलते हैं।'
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
"क्या नए नियम में सब पाप से बचाए जाने की आशा रखने का कोई और आधार मिलता है?
"निःसन्देह मिलता है; उन प्रार्थनाओं और आज्ञाओं दोनों में, जो सबसे दृढ़ कथनों के समान हैं।
"आप किन प्रार्थनाओं की बात कर रहे हैं?
"पूर्ण पवित्रीकरण के लिए प्रार्थनाएँ; जो यदि ऐसी कोई बात न होती, तो परमेश्वर का केवल उपहास होतीं।
विशेष रूप से ऐसी हैं, (1) 'हमें बुराई से बचा।'
अब जब यह किया जाता है, जब हम सब बुराई से बचा लिए जाते हैं, तब कोई पाप शेष नहीं रह सकता।
(2) 'मैं केवल इनके लिए बिनती नहीं करता, परन्तु उनके लिए भी जो इनके वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे; कि वे सब एक हों; जैसा तू, हे पिता, मुझ में है और मैं तुझ में, वैसे ही वे भी हम में एक हों; मैं उनमें और तू मुझ में, कि वे सिद्ध होकर एक हो जाएँ,' यूहन्ना 17:20-23।
(3) 'मैं उस पिता के सामने घुटने टेकता हूँ जो हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर और पिता है, कि वह तुम्हें यह दे कि तुम प्रेम में जड़ पकड़कर और नींव डालकर, सब पवित्र लोगों के साथ भली-भाँति समझ सको कि चौड़ाई, लम्बाई, गहराई और ऊँचाई कितनी है, और मसीह के उस प्रेम को जान सको जो ज्ञान से परे है; कि तुम परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण हो जाओ,'
इफिसियों 3:14, आदि।
(4) 'शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे।
और मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारी आत्मा, प्राण और देह हमारे प्रभु के आगमन तक निर्दोष बनी रहे,
यीशु मसीह के,' 1 थिस्सलुनीकियों 5:23।
"इसी आशय की कौन-सी आज्ञा है?
"(1) 'इसलिए तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है,' मत्ती 5:48।
(2) 'तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय, अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि से प्रेम रखना,' मत्ती 22:37।
परन्तु यदि परमेश्वर का प्रेम सारे हृदय को भर दे, तो उसमें कोई पाप नहीं रह सकता।
"परन्तु यह कैसे प्रकट होता है कि यह मृत्यु से पहले होना है?
"आज्ञा के स्वभाव ही से, जो मृतकों को नहीं, जीवितों को दी जाती है।
इसलिए 'तू अपने सारे हृदय से
मसीही सिद्धता,
परमेश्वर से प्रेम रखना,' का अर्थ 'तू मरते समय ऐसा करना' नहीं हो सकता, परन्तु यह कि जब तक तू जीवित है।
"(2) पवित्रशास्त्र के स्पष्ट पदों से: (i) 'परमेश्वर का अनुग्रह, जो उद्धार लाता है, सब मनुष्यों पर प्रगट हुआ है; और हमें सिखाता है कि हम अभक्ति और सांसारिक अभिलाषाओं को त्यागकर इस वर्तमान युग में संयम, धार्मिकता और भक्ति से जीवन बिताएँ; और उस महान परमेश्वर और अपने उद्धारकर्ता
यीशु मसीह की महिमा के प्रगट होने की आशा देखते रहें, जिसने अपने आप को हमारे लिए दे दिया, कि हमें सब अधर्म से छुड़ा ले और शुद्ध करके अपने लिए एक ऐसी प्रजा बना ले जो भले कामों में उत्साही हो,' तीतुस 2:11-14।
(ii) 'उसने हमारे लिए उद्धार का एक सींग खड़ा किया, कि हमारे पूर्वजों पर प्रतिज्ञा की हुई दया को पूरा करे; उस शपथ को जो उसने हमारे पिता अब्राहम से खाई, कि वह हमें यह देगा कि हम अपने शत्रुओं के हाथ से छूटकर, उसके सामने पवित्रता और धार्मिकता से जीवन भर निडर होकर उसकी सेवा करें,' लूका 1:69, आदि।
"क्या पवित्रशास्त्र में ऐसे लोगों का कोई उदाहरण है जो इसे प्राप्त कर चुके थे?
"हाँ; यूहन्ना, और वे सब जिनके विषय में वह कहता है, 'इसी में हमारा प्रेम सिद्ध हुआ है कि हमें न्याय के दिन साहस हो; क्योंकि जैसा वह है, वैसे ही हम भी इस संसार में हैं,'
1 यूहन्ना 4:17।
"क्या आप अब ऐसा एक उदाहरण दिखा सकते हैं?
ऐसा सिद्ध जन कहाँ है?
"जो लोग यह पूछते हैं उनमें से कुछ को कोई यह उत्तर दे सकता है, यदि मैं यहाँ एक को जानता भी होता, तो तुम्हें न बताता; क्योंकि तुम प्रेम से नहीं पूछते।
तुम हेरोदेस के समान हो; तुम केवल उस बालक को मार डालने के लिए ढूँढ़ते हो।
"परन्तु अधिक सीधे रूप में हम उत्तर देते हैं: ऐसे कई कारण हैं कि निर्विवाद उदाहरण थोड़े हों, यदि कोई हों भी।
सबके निशाने का लक्ष्य बना दिए जाने पर उस व्यक्ति पर कैसी कठिनाइयाँ आ पड़तीं!
और विरोधियों के लिए यह कितना निष्फल होता!
'क्योंकि यदि वे मूसा और भविष्यवक्ताओं की,' मसीह और उसके प्रेरितों की, 'नहीं सुनते, तो यदि कोई मरे हुओं में से जी उठे तो भी नहीं मानेंगे।'
4» [अस्पष्ट मूल पाठ] जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
"Are 106 not apt to have a secret distaste w any who sag trey are sared from all sin? [अस्पष्ट मूल पाठ] (अर्थ: क्या हम उन लोगों के प्रति, जो कहते हैं कि वे सब पाप से बचाए गए हैं, मन में गुप्त अरुचि रखने के प्रवृत्त नहीं होते?)
"बहुत सम्भव है कि हम रखते हों, और कई कारणों से; कुछ तो उन आत्माओं की भलाई की चिन्ता से, जिन्हें हानि पहुँच सकती है यदि ये वैसे न हों जैसा वे दावा करते हैं; कुछ एक प्रकार की परोक्ष ईर्ष्या से उन लोगों के प्रति जो हमारी अपनी उपलब्धि से ऊँची उपलब्धियों की बात करते हैं; और कुछ हमारी स्वाभाविक मन्दता और परमेश्वर के कार्यों पर विश्वास करने में हृदय की अनिच्छा से।
"हम विश्वास के आनन्द में तब तक क्यों न बने रहें जब तक प्रेम में सिद्ध न किए जाएँ?
"सचमुच क्यों नहीं? क्योंकि पवित्र शोक इस आनन्द को नहीं बुझाता; क्योंकि क्रूस के नीचे रहते हुए भी, जब हम मसीह के दुःखों में गहराई से सहभागी होते हैं, तब भी हम अवर्णनीय आनन्द से आनन्दित हो सकते हैं।"
इन उद्धरणों से निर्विवाद रूप से प्रकट होता है, न केवल मेरा और मेरे भाई का मत क्या था, परन्तु वर्ष 1744, 45, 46 और 47 में हमारे साथ जुड़े सब प्रचारकों का मत क्या था।
और मुझे स्मरण नहीं कि इन सम्मेलनों में से किसी एक में भी हमारे बीच कोई असहमति का स्वर उठा हो; परन्तु जब हम मिले तब किसी को जो भी सन्देह थे, वे हमारे अलग होने से पहले सब दूर हो गए।
1749 में प्रकाशित भजन।
वर्ष 1749 में मेरे भाई ने "भजन और पवित्र कविताएँ" की दो जिल्दें छपवाईं।
क्योंकि मैंने उन्हें प्रकाशित होने से पहले नहीं देखा था, उनमें कुछ बातें ऐसी थीं जो मुझे स्वीकार नहीं थीं।
परन्तु इस विषय पर लिखे भजनों के मुख्य भाग को मैंने पूरी तरह स्वीकार किया; उनमें से कुछ पद नीचे दिए जाते हैं: —
हे प्रभु, यहाँ प्रकट हो, और शैतान के सब कामों को नष्ट कर; अब मुझ में बिना पाप के प्रकट हो, और मुझे अनन्त आनन्द से भर दे; अपना परम सुखदायक मुख दिखा; तेरी उपस्थिति ही सिद्ध दिन है।
(जिल्द 1, पृ. 208।)
मसीही सिद्धता।
शीघ्र मेरे उद्धार को आ, इसी क्षण अपने को अपना ले; मेरी भटकती आत्मा को घर इकट्ठा कर, और सिद्ध शान्ति में रख।
अब और न भटकने दे सारी पृथ्वी पर इधर-उधर, अपने प्रेम के बन्दी को पकड़ ले, और मुझे परमेश्वर में बन्द कर दे!
(पृ. 247।) अपने बन्दियों को छुड़ा, हमें अपनी शान्ति दे; और हमारे दुःख और पाप एक क्षण में समाप्त हो जाएँगे।
वह क्षण अभी हो!
हमारी बिनती को स्वीकार कर, तू ही हमारा वर्तमान छुड़ानेवाला और सान्त्वना देनेवाला है! (जिल्द 2, पृ. 124
इस जन्मजात पाप से छुड़ा; जूआ अब टूट जाए; मुझे सदा के लिए अपना बना ले।
अपने सिद्ध स्वभाव का सहभागी बना, कि मैं अब तुझ में एक नई, निष्पाप सृष्टि हो जाऊँ।
(पृ. 156।) मुझे फेर, हे प्रभु, मुझे अभी फेर, मेरी आत्मा को अपने जूए के नीचे झुका; मुझे दीन और शान्त मन का वह मोती अभी पाने दे।
मेरे व्याकुल मन को शान्त कर, हाँ शान्त कर; मुझे वह दूसरा विश्राम पाने दे; मैं अपने कामों से सदा के लिए विश्राम पाऊँ, पवित्रता में सिद्ध होकर।
(पृ. 168।) इस स्वीकार्य घड़ी में आ, अपना स्वर्गीय राज्य ले आ!
हमें महिमामय सामर्थ्य से भर दे, जो पाप के बीजों को जड़ से उखाड़ दे।
(पृ. 162।) आ, हे प्रिय मेमने, जो पापियों के लिए बलि हुआ, शुद्ध करनेवाली धारा ले आ:
हर दाग धोने के लिए अपना प्रभावशाली लहू लगा।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
ओह, वह हमारी आत्मा में उतर जाए, जन्मजात पाप जितनी गहराई तक; हर घायल आत्मा को स्वस्थ कर, और हर कोढ़ी को शुद्ध कर!
171।) आशा के बन्दियो, उठो, और अपने प्रभु को प्रकट होते देखो; देखो! वह प्रेम के पंखों पर उड़ता आता है, और छुटकारे को निकट ले आता है।
वह तुम्हें अपने लहू में छुटकारा पाने को बुलाता है; ~ वह कहता है, मेरे पास आओ, मैं क्षमा करनेवाला परमेश्वर हूँ; विश्वास करो," वह पुकारता है, "विश्वास करो!"
हे यीशु, हम तेरी ओर देखते हैं, जब तक कि पाप के अवशेषों से बचाए जाकर, हम जन्मजात अत्याचारी का जूआ उतार न फेंकें, और उसकी बेड़ियाँ दूर न कर दें।
हमारा स्वभाव फिर हम पर प्रभुता न करेगा; हम विश्वास से उस सामर्थ्य को थामते हैं, जो सदा के लिए बचाएगी।
(पृ. 188।) हे यीशु, हमारे जीवन, हम में प्रकट हो, जो प्रतिदिन तेरी मृत्यु मरते हैं; अपने आप को पूर्ण करनेवाला प्रकट कर; अपनी जिलानेवाली आत्मा फूँक!
छिपा हुआ भेद खोल दे, वह दूसरा दान प्रदान कर; अपना महिमामय स्वरूप मुझ में प्रकट कर, हर प्रतीक्षारत हृदय में।
(पृ. 195।) उसमें हमें शान्ति है, उसमें हमें सामर्थ्य है!
उसके अनुग्रह से सुरक्षित, अन्धकार की घड़ी में भी, हमारी सब परीक्षाओं में वह हमें थामे रखता है, कि प्रमाणित करे
उसका पूर्ण उद्धार, उसके प्रेम की परिपूर्णता।
आनन्द का वचन सुना, और हमें स्वतंत्र होने की आज्ञा दे?
हे प्रभु, क्या मेरे लिए तेरे पास कोई आशीष नहीं?
जो शान्ति तूने दी है, उसे इसी क्षण दे, और अपना स्वर्ग खोल दे, हे प्रेम, मेरे हृदय में!
मसीही सिद्धता,
इन भजनों का दूसरा संस्करण वर्ष 1752 में प्रकाशित हुआ; और उसमें कुछ अक्षरों की भूलों को सुधारने के सिवा और कोई परिवर्तन नहीं किया गया।
मैंने इन उद्धरणों को इसलिए अधिक विस्तार से दिया है क्योंकि इनसे बिना किसी अपवाद की सम्भावना के यह प्रकट होता है कि आज तक मैं और मेरा भाई दोनों यह मानते आए हैं, (1) कि मसीही सिद्धता परमेश्वर और पड़ोसी का वह प्रेम है जिसमें सब पाप से छुटकारा निहित है।
(2) कि यह केवल विश्वास से प्राप्त होती है।
(3) कि यह तत्क्षण, एक ही क्षण में दी जाती है।
(4) कि हमें इसकी आशा मृत्यु के समय नहीं, परन्तु हर क्षण करनी चाहिए; कि अभी ही स्वीकार्य समय है, अभी ही इस उद्धार का दिन है।
1759 में प्रकाशित "मसीही सिद्धता पर विचार।"
19.
1759 के सम्मेलन में, यह देखकर कि हमारे बीच अनजाने में मतभेद आ जाने का कुछ खतरा है, हमने इस सिद्धान्त पर फिर विस्तार से विचार किया; और इसके शीघ्र बाद मैंने "मसीही सिद्धता पर विचार" प्रकाशित किए, जिसकी भूमिका में यह सूचना थी: —
"यह निबन्ध किसी की जिज्ञासा को सन्तुष्ट करने के लिए बिलकुल नहीं है।
इसका उद्देश्य उन लोगों के विरोध में, जो इस सिद्धान्त को ठुकराते और इसका उपहास करते हैं, इसे विस्तार से सिद्ध करना नहीं है; और न इसके विरुद्ध उठाई जा सकनेवाली उन अनेक आपत्तियों का उत्तर देना है, जो गम्भीर लोग भी उठा सकते हैं।
यहाँ मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि इस विषय पर मेरे विचार क्या हैं, इसकी घोषणा करूँ; मेरी समझ में मसीही सिद्धता में क्या सम्मिलित है और क्या नहीं; और इस विषय से सम्बन्धित कुछ व्यावहारिक टिप्पणियाँ और निर्देश जोड़ूँ।
"क्योंकि ये विचार पहले प्रश्न और उत्तर के रूप में एकत्र किए गए थे, मैंने उन्हें उसी रूप में रहने दिया।
ये ठीक वही हैं जो मैं बीस वर्ष से अधिक समय से रखता आया हूँ।
"मसीही सिद्धता क्या है?
"परमेश्वर से अपने सारे हृदय, मन, प्राण और
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
शक्ति से प्रेम करना।
इसका अर्थ है कि आत्मा में कोई गलत स्वभाव, प्रेम के विपरीत कुछ भी, नहीं रहता; और सब विचार, शब्द और कार्य शुद्ध प्रेम से संचालित होते हैं।
"क्या आप कहते हैं कि यह सिद्धता सब दुर्बलताओं, अज्ञानता और भूल को दूर कर देती है?
"मैं निरन्तर इसके बिलकुल विपरीत कहता हूँ, और सदा यही कहता आया हूँ।
"परन्तु हर विचार, शब्द और कार्य शुद्ध प्रेम से कैसे संचालित हो सकता है, जबकि मनुष्य उसी समय अज्ञानता और भूल के अधीन हो?
"मुझे यहाँ कोई विरोधाभास नहीं दिखता: 'मनुष्य शुद्ध प्रेम से भरा हो सकता है, और फिर भी भूल कर सकता है।'
सचमुच, मैं वास्तविक भूलों से छूटने की आशा नहीं रखता, जब तक यह नश्वर देह अमरता को न पहन ले।
मैं इसे आत्मा के मांस और लहू में बसने का स्वाभाविक परिणाम मानता हूँ।
क्योंकि अब हम उन शारीरिक अंगों की मध्यस्थता के बिना बिलकुल सोच ही नहीं सकते, जिन्होंने हमारे शेष ढाँचे के समान ही हानि उठाई है।
और इसलिए हम कभी-कभी गलत सोचने से बच नहीं सकते, जब तक यह नाशमान देह अविनाशी न पहन ले।
"परन्तु हम इस विचार को और आगे ले जा सकते हैं।
विचार की भूल सम्भवतः आचरण में भूल का कारण बन सकती है।
उदाहरण के लिए: श्रीमान डी रेन्टी की देह-दमन के स्वभाव के विषय में भूल, जो पालन-पोषण के पूर्वाग्रह से उपजी थी, उस व्यावहारिक भूल का कारण बनी कि वे लोहे की पेटी पहनते थे।
और ऐसे हज़ारों उदाहरण हो सकते हैं, अनुग्रह की सबसे ऊँची दशा में रहनेवालों में भी।
फिर भी, जहाँ हर शब्द और कार्य प्रेम से उत्पन्न होता है, वहाँ ऐसी भूल प्रत्यक्ष रूप से पाप नहीं है।
तथापि वह परमेश्वर के न्याय की कठोरता को सह नहीं सकती, परन्तु प्रायश्चित्त के लहू की आवश्यकता रखती है।
"अगस्त 1758 में ब्रिस्टल में मिले हमारे सब भाइयों का इस विषय पर क्या मत था?
"वह इन शब्दों में व्यक्त किया गया था: (1) प्रत्येक जन जब तक जीवित है भूल कर सकता है।
(2) मत की भूल
222,
मसीही सिद्धता,
आचरण में भूल का कारण हो सकती है।
(3) ऐसी प्रत्येक भूल सिद्ध व्यवस्था का उल्लंघन है।
इसलिए, (4) ऐसी प्रत्येक भूल, यदि प्रायश्चित्त का लहू न होता, तो अनन्त दण्ड के योग्य ठहराती।
(5) इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अत्यन्त सिद्ध जनों को भी अपने वास्तविक उल्लंघनों के लिए मसीह की योग्यता की निरन्तर आवश्यकता है, और वे अपने लिए भी, और अपने भाइयों के लिए भी, कह सकते हैं, 'हमारे अपराध क्षमा कर।'
"इससे वह बात सहज ही समझ में आ जाती है जो अन्यथा बिलकुल अव्याख्येय लग सकती है; अर्थात् यह कि जो लोग प्रेम की सर्वोच्च अवस्था की चर्चा से नाराज़ नहीं होते, वे भी पाप के बिना जीवन बिताने की बात सुनना नहीं चाहते।
कारण यह है कि वे जानते हैं कि सब मनुष्य भूल कर सकते हैं, और आचरण में भी, विचार में भी।
परन्तु वे यह नहीं जानते, या ध्यान नहीं देते, कि यदि प्रेम ही कार्य का एकमात्र सिद्धान्त हो तो यह पाप नहीं है।
"परन्तु फिर भी, यदि वे बिना पाप के जीवन बिताते हैं, तो क्या इससे मध्यस्थ की आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाती?
कम से कम, क्या यह स्पष्ट नहीं कि उन्हें मसीह के याजकीय पद की अब आवश्यकता नहीं रही?
"ऐसा बिलकुल नहीं।
इनके समान मसीह की आवश्यकता कोई अनुभव नहीं करता; इनके समान कोई उस पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहता।
क्योंकि मसीह आत्मा को जीवन अपने से अलग नहीं, परन्तु अपने में और अपने साथ देता है।
इसलिए उसके वचन सब मनुष्यों के विषय में, वे अनुग्रह की जिस भी दशा में हों, समान रूप से सत्य हैं: 'जैसे डाली यदि दाखलता में न बनी रहे तो आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में न बने रहो तो नहीं फल सकते: मेरे' (अर्थात् मुझसे अलग 'बिना तुम कुछ नहीं कर सकते।')
पूर्णतः पवित्र किए गए लोगों को प्रायश्चित्त की आवश्यकता है।
"हर दशा में हमें मसीह की आवश्यकता इन बातों में है, (1) जो भी अनुग्रह हम पाते हैं, वह उसी की ओर से एक मुफ़्त दान है।
(2) हम उसे उसके मोल लिए हुए के रूप में पाते हैं, केवल उस मूल्य के कारण जो उसने चुकाया।
(3) हमारे पास यह अनुग्रह केवल मसीह से नहीं, परन्तु उसमें है।
क्योंकि हमारी सिद्धता किसी वृक्ष की सिद्धता के समान नहीं
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
जो अपनी ही जड़ से मिले रस से फलता-फूलता है, परन्तु जैसा पहले कहा गया, उस डाली के समान है जो दाखलता से जुड़ी रहकर फल लाती है; और उससे कटकर सूख और मुरझा जाती है।
(4) हमारी सब आशीषें, सांसारिक, आत्मिक और अनन्त, हमारे लिए उसकी मध्यस्थता पर निर्भर हैं, जो उसके याजकीय पद की एक शाखा है, और इसलिए हमें उसकी सदा समान आवश्यकता है।
(5) श्रेष्ठतम मनुष्यों को भी मसीह की उसके याजकीय पद में आवश्यकता है, कि वह उनकी चूकों, उनकी कमियों (जैसा कुछ लोग अनुचित नहीं कहते), उनकी मत और आचरण की भूलों, और नाना प्रकार की त्रुटियों का प्रायश्चित्त करे।
क्योंकि ये सब सिद्ध व्यवस्था से विचलन हैं, और इसलिए प्रायश्चित्त की आवश्यकता रखती हैं।
फिर भी वे यथार्थ में पाप नहीं हैं, यह हम समझते हैं कि पौलुस के इन शब्दों से प्रकट हो सकता है, 'जो प्रेम रखता है उसने व्यवस्था को पूरा किया है; क्योंकि प्रेम व्यवस्था की पूर्णता है,' रोमियों 13:10।
अब, भूलें और जो भी दुर्बलताएँ देह की नाशमान दशा से अनिवार्य रूप से उत्पन्न होती हैं, वे किसी रीति से प्रेम के विपरीत नहीं हैं; और इसलिए पवित्रशास्त्र के अर्थ में पाप भी नहीं।
अनैच्छिक उल्लंघन और निष्पाप सिद्धता।
इस विषय पर अपनी बात कुछ और स्पष्ट करने के लिए: (1) केवल यथार्थ में कहा जानेवाला पाप (अर्थात् ज्ञात व्यवस्था का स्वैच्छिक उल्लंघन) ही नहीं, परन्तु अयथार्थ रूप में कहा जानेवाला पाप (अर्थात् ईश्वरीय व्यवस्था का अनैच्छिक उल्लंघन, चाहे ज्ञात हो या अज्ञात) भी प्रायश्चित्त के लहू की आवश्यकता रखता है।
(2) मैं विश्वास करता हूँ कि इस जीवन में ऐसी कोई सिद्धता नहीं जो इन अनैच्छिक उल्लंघनों को दूर कर दे, जिन्हें मैं नश्वरता से अविभाज्य अज्ञानता और भूलों का स्वाभाविक परिणाम समझता हूँ।
(3) इसलिए 'निष्पाप सिद्धता' ऐसा वाक्यांश है जिसका मैं कभी प्रयोग नहीं करता, ऐसा न हो कि मैं अपना ही खण्डन करता दिखाई दूँ।
(4) मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम से भरा हुआ व्यक्ति भी इन अनैच्छिक उल्लंघनों के अधीन रहता है।
(5) ऐसे उल्लंघनों को आप चाहें तो पाप कह सकते हैं: मैं नहीं कहता, ऊपर बताए गए कारणों से।
मसीही सिद्धता,
"जो उन्हें ऐसा कहते हैं और जो नहीं कहते, उन्हें आप क्या सलाह देंगे?
"जो उन्हें पाप नहीं कहते, वे कभी न सोचें कि वे स्वयं या कोई और ऐसी दशा में हैं कि बिना मध्यस्थ के अनन्त न्याय के सामने खड़े हो सकें।
यह या तो गहरी से गहरी अज्ञानता, या सबसे बड़े अहंकार और दुस्साहस को प्रकट करेगा।
"जो उन्हें पाप कहते हैं, वे सावधान रहें कि इन त्रुटियों को यथार्थ में कहे जानेवाले पापों से गड्ड-मड्ड न कर दें।
"परन्तु वे इससे कैसे बचेंगे? यदि सब को बिना भेद के पाप कहा जाए तो इन्हें उनसे कैसे अलग किया जाएगा? मुझे बहुत भय है कि यदि हम किसी भी पाप को सिद्धता के साथ संगत मान लें, तो थोड़े ही लोग इस विचार को उन्हीं त्रुटियों तक सीमित रखेंगे जिनके विषय में ही यह कथन सत्य हो सकता है।
"परन्तु भूल की सम्भावना सिद्ध प्रेम के साथ कैसे रह सकती है?
क्या प्रेम में सिद्ध किया गया व्यक्ति हर क्षण उसके प्रभाव में नहीं होता? और क्या कोई भूल शुद्ध प्रेम से निकल सकती है?
"मैं उत्तर देता हूँ, (1) बहुत-सी भूलें शुद्ध प्रेम के साथ रह सकती हैं; (2) कुछ संयोगवश उससे निकल सकती हैं: मेरा आशय है कि प्रेम स्वयं हमें भूल की ओर झुका सकता है।
परमेश्वर के प्रेम से उत्पन्न पड़ोसी का शुद्ध प्रेम बुरा नहीं सोचता, सब बातों की प्रतीति करता और सब बातों की आशा रखता है।
अब यही स्वभाव, जो संदेह नहीं करता और सब मनुष्यों के विषय में अच्छा विश्वास और आशा रखने को तैयार रहता है, हमें कुछ मनुष्यों को वास्तविकता से अच्छा समझने का कारण बन सकता है।
यहाँ तब एक प्रत्यक्ष भूल है, जो संयोगवश शुद्ध प्रेम से निकलती है।
"हम सिद्धता को बहुत ऊँचा या बहुत नीचा ठहराने से कैसे बचें?
"बाइबल से लगे रहकर, और उसे ठीक उतना ही ऊँचा ठहराकर जितना पवित्रशास्त्र ठहराता है।
वह इससे न अधिक है न कम, — परमेश्वर और मनुष्य का शुद्ध प्रेम; परमेश्वर से प्रेम करना
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
अपने सारे हृदय और प्राण से, और अपने पड़ोसी से अपने समान।
यह वह प्रेम है जो हृदय और जीवन पर शासन करता है, और हमारे सब स्वभाव, शब्दों और कार्यों में प्रवाहित होता है।
पवित्रता का अंगीकार करने के विषय में।
"मान लीजिए किसी ने इसे प्राप्त कर लिया है, तो क्या आप उसे इसके विषय में बोलने की सलाह देंगे?
आरम्भ में शायद वह स्वयं को रोक ही न सके, उसके भीतर आग इतनी तेज़ होगी; प्रभु की करुणा को सुनाने की उसकी इच्छा उसे धारा के समान बहा ले जाएगी।
परन्तु बाद में वह रुक सकता है; और तब यही उचित होगा कि वह इसके विषय में उनसे न कहे जो परमेश्वर को नहीं जानते (सम्भव है कि इससे वे केवल विरोध और निन्दा करने को भड़केंगे); और न दूसरों से बिना किसी विशेष कारण के, बिना किसी भलाई की दृष्टि के।
और तब उसे विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए कि घमण्ड का कोई भी आभास न हो; गहरी दीनता और श्रद्धा से बोले, और सारी महिमा परमेश्वर को दे।
"परन्तु क्या यह अच्छा न होगा कि वह पूरी तरह चुप रहे, इसके विषय में कुछ न कहे?
"चुप रहकर वह बहुत-से क्रूसों से बच सकता है, जो स्वाभाविक और अनिवार्य रूप से तब आएँगे यदि वह विश्वासियों के बीच भी सीधे-सीधे कहे कि परमेश्वर ने उसकी आत्मा में क्या किया है।
इसलिए यदि ऐसा व्यक्ति मांस और लहू से सलाह करे, तो वह पूरी तरह चुप रहेगा।
परन्तु यह शुद्ध विवेक के साथ नहीं किया जा सकता: क्योंकि निश्चय ही उसे बोलना चाहिए।
मनुष्य दीया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं रखते; सर्वज्ञानी परमेश्वर तो और भी नहीं रखता।
वह अपनी सामर्थ्य और प्रेम का ऐसा स्मारक इसलिए खड़ा नहीं करता कि उसे सारी मानवजाति से छिपा दे।
वरन् वह इसे उनके लिए, जो मन के सीधे हैं, एक सामान्य आशीष के रूप में ठहराता है।
इससे उसका उद्देश्य केवल उस एक व्यक्ति का सुख नहीं, परन्तु दूसरों को उसी आशीष के पीछे चलने के लिए उत्साहित और प्रोत्साहित करना है।
उसकी इच्छा है, कि 'बहुत-से लोग इसे देखें' और आनन्दित हों, 'और प्रभु पर भरोसा रखें।'
मसीही सिद्धता,
(प्रभु पर भरोसा रखें।)
और स्वर्ग के नीचे कोई बात धर्मी ठहराए गए लोगों की अभिलाषाओं को इससे अधिक नहीं जगाती कि वे उनसे बातचीत करें जिनके विषय में वे मानते हैं कि उन्होंने उससे भी ऊँचे उद्धार का अनुभव किया है।
यह उस उद्धार को उनकी दृष्टि के ठीक सामने रखता है, और उसके लिए उनकी भूख-प्यास बढ़ाता है; ऐसा लाभ जो पूरी तरह खो जाता, यदि इस प्रकार बचाया गया व्यक्ति स्वयं को चुप्पी में गाड़ लेता।
"परन्तु क्या इन क्रूसों को रोकने का कोई उपाय नहीं जो प्रायः उन पर आते हैं जो अपने इस प्रकार बचाए जाने की चर्चा करते हैं?
"प्रतीत होता है कि इन्हें पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, जब तक विश्वासियों में भी स्वभाव का इतना अंश बना है।
परन्तु कुछ किया जा सकता है, यदि प्रचारक हर स्थान पर, (1) ऐसा कहनेवाले सब लोगों से खुलकर बात करे; और (2) उन लोगों के प्रति अन्यायपूर्ण या निर्दयी व्यवहार को रोकने का प्रयत्न करे जिनके पक्ष में उचित प्रमाण हो।
पूर्ण पवित्रीकरण के प्रमाण।
"उचित प्रमाण क्या है? हम निश्चय के साथ कैसे जान सकते हैं कि कौन सब पाप से बचाया गया है?
"हम अचूक रूप से नहीं जान सकते कि कौन इस प्रकार बचाया गया है (न यह कि कौन धर्मी ठहराया गया है), जब तक परमेश्वर हमें आत्माओं को परखने की अद्भुत विवेकशक्ति न दे दे।
परन्तु हम समझते हैं कि किसी भी विवेकशील मनुष्य के लिए ये पर्याप्त प्रमाण होंगे, और कार्य की सच्चाई या गहराई पर सन्देह के लिए बहुत कम स्थान छोड़ेंगे: (1) यदि हमारे पास इस माने हुए परिवर्तन से कुछ समय पहले उसके अनुकरणीय आचरण का स्पष्ट प्रमाण हो।
इससे हमें विश्वास करने का कारण मिलेगा कि वह 'परमेश्वर के लिए झूठ' नहीं बोलेगा, परन्तु जितना अनुभव करता है उससे न अधिक न कम कहेगा; (2) यदि वह उस समय और रीति का स्पष्ट वर्णन दे जिसमें परिवर्तन हुआ, ऐसी खरी बातों में जिनमें दोष न निकाला जा सके; और (3) यदि यह प्रकट हो कि उसके बाद के सब शब्द और कार्य पवित्र और निर्दोष थे।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
gat [अस्पष्ट मूल पाठ] "संक्षेप में बात यह है: (1) मेरे पास यह विश्वास करने का भरपूर कारण है कि यह व्यक्ति झूठ नहीं बोलेगा; (2) वह परमेश्वर के सामने गवाही देता है, 'मैं कोई पाप अनुभव नहीं करता, केवल प्रेम; मैं निरन्तर प्रार्थना करता, आनन्द मनाता और धन्यवाद देता हूँ; और मुझे इस बात का उतना ही स्पष्ट भीतरी साक्षी है कि मैं पूरी तरह नया किया गया हूँ, जितना कि इसका कि मैं धर्मी ठहराया गया हूँ।'
अब यदि मेरे पास इस स्पष्ट गवाही के विरोध में कहने को कुछ नहीं, तो विवेक के अनुसार मुझे इस पर विश्वास करना चाहिए।
"यह आपत्ति करने से कुछ नहीं होता, 'परन्तु मैं कई बातें जानता हूँ जिनमें वह बिलकुल भूल पर है।'
क्योंकि यह माना जा चुका है कि जो देह में हैं वे सब भूल कर सकते हैं; और विचार की भूल कभी-कभी आचरण की भूल का कारण बन सकती है; यद्यपि बड़ी सावधानी रखनी चाहिए कि इस स्वीकारोक्ति का कोई बुरा उपयोग न किया जाए।
उदाहरण के लिए: प्रेम में सिद्ध किया गया व्यक्ति भी किसी दूसरे के विषय में भूल कर सकता है, और किसी विशेष मामले में उसे वास्तविकता से अधिक या कम दोषी समझ सकता है।
और इसलिए वह उससे सत्य की माँग से अधिक या कम कठोरता से बोल सकता है।
और इसी अर्थ में (यद्यपि याकूब का मुख्य अर्थ यह नहीं है), 'हम सब बहुत बार चूक जाते हैं।'
इसलिए यह इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि इस प्रकार बोलनेवाला व्यक्ति सिद्ध नहीं है।
"परन्तु क्या यह प्रमाण नहीं है, यदि वह किसी आवाज़, गिरने या अचानक खतरे से चौंक या घबरा जाए?
"नहीं है; क्योंकि कोई चौंक सकता है, काँप सकता है, रंग बदल सकता है, या शरीर में अन्यथा विचलित हो सकता है, जबकि आत्मा शान्ति से परमेश्वर में स्थिर रहती और सिद्ध शान्ति में बनी रहती है।
नहीं, मन स्वयं गहरे संकट में हो सकता है, अत्यंत शोकाकुल हो सकता है, भारीपन और वेदना से व्याकुल और दबा हुआ हो सकता है, यहाँ तक कि प्राणांतक पीड़ा तक, जबकि हृदय सिद्ध प्रेम के द्वारा परमेश्वर से लगा रहता है और इच्छा पूरी तरह उसके अधीन समर्पित रहती है।
क्या स्वयं परमेश्वर के पुत्र के साथ ऐसा ही नहीं हुआ था?
क्या मनुष्य की कोई भी संतान वह संकट, वह वेदना, वह पीड़ा सहती है जो उसने सही?
और फिर भी वह पाप से अनजान था।
मसीही सिद्धता,
"परंतु क्या कोई शुद्ध हृदय वाला व्यक्ति अरुचिकर भोजन की अपेक्षा स्वादिष्ट भोजन को पसंद कर सकता है; या इंद्रियों का कोई ऐसा सुख ले सकता है जो नितांत आवश्यक न हो?
यदि हाँ, तो वे दूसरों से कैसे भिन्न हैं?
"स्वादिष्ट भोजन लेने में इनमें और दूसरों में अंतर यह है: (1.) उन्हें प्रसन्न होने के लिए इन वस्तुओं में से किसी की आवश्यकता नहीं, क्योंकि उनके भीतर आनंद का एक सोता है।
वे परमेश्वर को देखते और उससे प्रेम करते हैं।
इसलिए वे सदा आनंदित रहते हैं और हर बात में धन्यवाद देते हैं।
(2.) वे इनका उपयोग कर सकते हैं, पर इनकी खोज में नहीं रहते। (3.) वे इनका उपयोग संयम से करते हैं, और उस वस्तु के अपने ही लिए नहीं। यह पहले कह देने के बाद, हम सीधा उत्तर देते हैं, 'ऐसा व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन का उपयोग उस खतरे के बिना कर सकता है जो उन लोगों पर आता है जो पाप से बचाए नहीं गए हैं।
वह उसे कम स्वादिष्ट, पर समान रूप से पौष्टिक भोजन की अपेक्षा पसंद कर सकता है, धन्यवादी मन को बढ़ाने के साधन के रूप में, एकाग्र दृष्टि से परमेश्वर की ओर, जो हमें सब कुछ भरपूरी से देता है कि हम उसका आनंद लें।
इसी सिद्धांत पर वह किसी फूल को सूँघ सकता है, या अंगूर का गुच्छा खा सकता है, या कोई भी अन्य सुख ले सकता है जो परमेश्वर में उसके आनंद को घटाता नहीं बल्कि बढ़ाता है।
इसलिए हम यह भी नहीं कह सकते कि प्रेम में सिद्ध किया गया व्यक्ति विवाह और सांसारिक कारोबार के अयोग्य होगा; यदि वह इसके लिए बुलाया जाए, तो पहले से कहीं अधिक योग्य होगा; क्योंकि वह बिना हड़बड़ी या चिंता के, बिना आत्मा की किसी व्याकुलता के सब कुछ कर सकता है।
"परंतु यदि दो सिद्ध मसीहियों के संतान हो, तो वे पाप में कैसे जन्म लेंगे, जबकि माता-पिता में कोई पाप था ही नहीं?
यह संभव तो है, पर संभावित नहीं।
मुझे संदेह है कि ऐसा कभी हुआ है या कभी होगा।
परंतु इसे छोड़कर, मेरा उत्तर यह है: 'पाप मुझ पर प्रत्यक्ष पीढ़ी-दर-पीढ़ी के द्वारा नहीं, बल्कि मेरे प्रथम पूर्वज के द्वारा आया है।'
'आदम में सब मरते हैं; एक मनुष्य की अनाज्ञाकारिता से सब मनुष्य पापी ठहरे;' सब मनुष्य, बिना किसी अपवाद के, जो उसके कटिप्रदेश में थे जब उसने वर्जित फल खाया।
बागवानी में हमें इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण मिलता है; कलमें
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
जंगली सेब की डाली पर लगाई जाएँ तो उत्तम फल देती हैं; परंतु इस फल की गुठलियाँ बोओ, तो परिणाम क्या होगा?
वे ऐसे जंगली सेब उत्पन्न करती हैं जैसे कभी खाए गए हों।
नया जन्म पाए हुए और पूरी तरह पवित्र
किए गए लोगों का बाहरी जीवन एक ही है।
"परंतु सिद्ध व्यक्ति दूसरों से अधिक क्या करता है? साधारण विश्वासियों से अधिक क्या?
"शायद कुछ नहीं; क्योंकि हो सकता है परमेश्वर की व्यवस्था ने उसे बाहरी परिस्थितियों से घेर रखा हो।
शायद इतना अधिक नहीं; यद्यपि वह परमेश्वर के लिए खर्च होने और खप जाने की इच्छा और लालसा रखता है; कम से कम बाहरी रूप में नहीं: वह न इतने शब्द बोलता है, न इतने कार्य करता है।
जैसे हमारे प्रभु ने स्वयं भी अपने कुछ प्रेरितों जितने शब्द नहीं बोले, या उतने कार्य नहीं किए, नहीं, उतने बड़े कार्य भी नहीं, यूहन्ना 14:12।
परंतु इससे क्या?
यह इसका प्रमाण नहीं कि उसमें अधिक अनुग्रह नहीं है; और परमेश्वर बाहरी कार्य को इसी से नापता है।
उसकी सुनो: 'मैं तुमसे सच कहता हूँ, इस कंगाल विधवा ने उन सब से अधिक डाला है।'
सचमुच, इस दीन मनुष्य ने अपने थोड़े टूटे-फूटे शब्दों से उन सब से अधिक कहा है।
सचमुच, इस दीन स्त्री ने, जिसने एक कटोरा ठंडा पानी दिया, उन सब से अधिक किया है।
अरे, 'दिखावे के अनुसार न्याय करना' छोड़ दो, और 'सच्चा न्याय करना' सीखो!
"परंतु क्या यह उसके विरुद्ध प्रमाण नहीं कि मुझे उसके शब्दों या प्रार्थना में कोई सामर्थ्य महसूस नहीं होती?
"नहीं, ऐसा नहीं: क्योंकि हो सकता है कि यह आपका ही दोष हो।
यदि इन बाधाओं में से कोई भी मार्ग में हो, तो आपको उसमें सामर्थ्य महसूस होने की संभावना नहीं: (1.) आपकी अपनी आत्मिक मृतता।
मरे हुए फरीसियों ने उसके शब्दों में भी कोई सामर्थ्य महसूस नहीं की जिसने 'ऐसा बोला जैसा कभी किसी मनुष्य ने नहीं बोला।'
(2.) विवेक पर पड़ा किसी अपश्चातापी पाप का दोष।
(3.) उसके प्रति किसी भी प्रकार का पूर्वाग्रह।
(4.) आपका इस बात पर विश्वास न करना कि वह अवस्था प्राप्त की जा सकती है जिसमें होने का वह दावा करता है।
(5.) यह सोचने या मानने की अनिच्छा
मसीही सिद्धता,
कि उसने इसे प्राप्त कर लिया है।
(6.) उसे आवश्यकता से अधिक महत्व देना या उसकी मूर्तिपूजा करना।
(7.) अपने आपको और अपने ही निर्णय को आवश्यकता से अधिक महत्व देना।
यदि इनमें से कोई भी बात हो, तो इसमें क्या आश्चर्य कि आप उसकी किसी बात में सामर्थ्य महसूस नहीं करते?
परंतु क्या दूसरे इसे महसूस नहीं करते?
यदि करते हैं, तो आपका तर्क धरती पर गिर पड़ता है।
और यदि नहीं करते, तो क्या इनमें से कोई बाधा उनके मार्ग में भी नहीं है?
इस पर कोई तर्क खड़ा करने से पहले आपको इसका निश्चय होना चाहिए; और तब भी आपका तर्क इससे अधिक कुछ सिद्ध नहीं करेगा कि अनुग्रह और वरदान सदा साथ-साथ नहीं चलते।
परंतु वह सिद्ध मसीही के विषय में मेरी धारणा पर पूरा नहीं उतरता।'
और शायद कोई कभी उतरा भी न हो, न कभी उतरेगा।
क्योंकि आपकी धारणा पवित्रशास्त्र के वर्णन से आगे जा सकती है, या कम से कम उससे अलग हो सकती है।
उसमें वह भी सम्मिलित हो सकता है जो बाइबल में सम्मिलित नहीं है, या कम से कम ऐसा कुछ जिसे वह सम्मिलित नहीं करती।
पवित्रशास्त्र की सिद्धता है: शुद्ध प्रेम का हृदय को भर देना, और सब शब्दों और कार्यों पर शासन करना।
यदि आपकी धारणा में इससे कुछ अधिक या कुछ और है, तो वह पवित्रशास्त्रीय नहीं है; और तब इसमें आश्चर्य नहीं कि पवित्रशास्त्र के अनुसार सिद्ध मसीही उस पर पूरा नहीं उतरता।
"मुझे डर है कि बहुत-से लोग इस ठोकर के पत्थर पर लड़खड़ाते हैं।
वे सिद्ध व्यक्ति की अपनी धारणा में जितने चाहें उतने तत्व जोड़ लेते हैं, पवित्रशास्त्र के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी कल्पना के अनुसार; और फिर किसी को भी ऐसा मानने से तुरंत इनकार कर देते हैं जो उस काल्पनिक धारणा पर खरा न उतरे।
"इसलिए हमें और अधिक सावधानी रखनी चाहिए कि पवित्रशास्त्र का सरल वर्णन निरंतर हमारी दृष्टि में रहे।
हृदय और जीवन में अकेले शुद्ध प्रेम का राज्य करना, यही पवित्रशास्त्रीय सिद्धता का सार है।
आत्मा हमारे पवित्रीकरण की गवाही उतनी ही स्पष्टता से देता है जितनी
हमारे धर्मी ठहराए जाने की।
"कोई व्यक्ति कब अपने बारे में निर्णय कर सकता है कि उसने इसे प्राप्त कर लिया है?
"जब भीतर बसे पाप के विषय में कायल किए जाने के बाद, उस कायल किए जाने से कहीं
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
अधिक गहरे और स्पष्ट रूप से जो उसने धर्मी ठहराए जाने से पहले अनुभव किया था, और उसके क्रमिक मरण का अनुभव करने के बाद, वह पाप के प्रति पूर्ण मृत्यु और परमेश्वर के प्रेम और स्वरूप में पूर्ण नवीनीकरण का अनुभव करता है, ऐसा कि वह सदा आनंदित रहे, निरंतर प्रार्थना करे, और हर बात में धन्यवाद दे।
ऐसा नहीं कि 'सारा प्रेम और कोई पाप न महसूस करना' पर्याप्त प्रमाण है।
कई लोगों ने अपनी आत्माओं के पूरी तरह नए किए जाने से पहले कुछ समय तक इसका अनुभव किया है।
इसलिए किसी को भी यह विश्वास नहीं करना चाहिए कि कार्य पूरा हो गया, जब तक आत्मा की गवाही न जुड़े, जो उसके पूर्ण पवित्रीकरण की गवाही उतनी ही स्पष्टता से दे जितनी उसके धर्मी ठहराए जाने की।
हम धोखा खा सकते हैं।
"परंतु ऐसा क्यों है कि कुछ लोग कल्पना करते हैं कि वे इस प्रकार पवित्र हो गए हैं, जबकि वास्तव में नहीं हुए हैं?
इसलिए कि वे पूर्वोक्त सब चिह्नों से नहीं, बल्कि या तो उनमें से कुछ से, या दूसरे संदिग्ध चिह्नों से निर्णय करते हैं।
परंतु मैं ऐसा कोई उदाहरण नहीं जानता कि कोई व्यक्ति उन सब पर ध्यान दे और फिर भी इस विषय में धोखा खाए।
मेरा विश्वास है कि संसार में ऐसा कोई नहीं हो सकता।
यदि कोई मनुष्य धर्मी ठहराए जाने के बाद भीतर बसे पाप के विषय में गहराई से और पूरी तरह कायल हो; यदि फिर वह पाप का क्रमिक मरण अनुभव करे, और उसके बाद परमेश्वर के स्वरूप में पूर्ण नवीनीकरण; यदि इस परिवर्तन के साथ, जो उस परिवर्तन से अत्यधिक बड़ा है जो उसके धर्मी ठहराए जाने पर हुआ था, उस नवीनीकरण की स्पष्ट, सीधी गवाही भी जुड़े; तो मैं मानता हूँ कि इस मनुष्य का इसमें धोखा खाना उतना ही असंभव है जितना परमेश्वर का धोखा देना।
और यदि कोई, जिसे मैं सत्यवादी जानता हूँ, मुझे ये बातें बताए, तो मुझे बिना किसी पर्याप्त कारण के उसकी गवाही को अस्वीकार नहीं करना चाहिए।
क्रमिक या तात्कालिक?
"क्या पाप के प्रति यह मृत्यु और प्रेम में नवीनीकरण क्रमिक है या तात्कालिक?
"मनुष्य कुछ समय से मर रहा हो सकता है; फिर भी वह
मसीही सिद्धता,
वास्तव में तब तक मरता नहीं, जब तक आत्मा देह से अलग न हो जाए; और उसी क्षण वह अनंत जीवन जीने लगता है।
इसी प्रकार, वह कुछ समय से पाप के प्रति मर रहा हो सकता है; फिर भी वह पाप के प्रति मरा हुआ नहीं है, जब तक पाप उसकी आत्मा से अलग न हो जाए; और उसी क्षण वह प्रेम का पूर्ण जीवन जीने लगता है।
और जैसे देह के मरने पर जो परिवर्तन होता है वह भिन्न प्रकार का है, और हमारे पहले जाने हुए किसी भी परिवर्तन से असीम रूप से बड़ा है, हाँ, ऐसा कि उस समय तक उसकी कल्पना करना असंभव है; वैसे ही जब आत्मा पाप के प्रति मरती है तब जो परिवर्तन होता है वह भिन्न प्रकार का है, और पहले के किसी भी परिवर्तन से, और जिसकी कोई कल्पना कर सकता है, असीम रूप से बड़ा है, जब तक वह उसका अनुभव न करे।
फिर भी वह अनुग्रह में, मसीह की पहचान में, परमेश्वर के प्रेम और स्वरूप में बढ़ता रहता है; और न केवल मृत्यु तक, बल्कि सारी अनंतता तक बढ़ता रहेगा।
"हमें इस परिवर्तन की प्रतीक्षा कैसे करनी चाहिए?
"लापरवाह उदासीनता या आलसी निष्क्रियता में नहीं; बल्कि सशक्त, सर्वांगीण आज्ञाकारिता में, सब आज्ञाओं के उत्साहपूर्वक पालन में, सतर्कता और परिश्रम में, अपने आपका इनकार करने और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाने में; साथ ही गंभीर प्रार्थना और उपवास में, और परमेश्वर की सब विधियों में निकटता से उपस्थित रहने में।
और यदि कोई मनुष्य इसे किसी और रीति से पाने का सपना देखे (हाँ, या इसके प्राप्त हो जाने पर, जब उसने इसे सबसे बड़ी मात्रा में भी पा लिया हो, इसे बनाए रखने का), तो वह अपनी ही आत्मा को धोखा देता है।
यह सच है कि हम इसे सरल विश्वास से पाते हैं; परंतु परमेश्वर वह विश्वास नहीं देता, न देगा, जब तक हम उसे पूरी लगन से उस मार्ग में न खोजें जो उसने ठहराया है।
"यह विचार उन लोगों को संतुष्ट कर सकता है जो पूछते हैं कि इतने कम लोगों ने यह आशीष क्यों पाई है।
पूछो कि कितने लोग इसे इस मार्ग से खोज रहे हैं; और तुम्हें पर्याप्त उत्तर मिल जाएगा।
"विशेष रूप से प्रार्थना की कमी है।
कौन उसमें लगा रहता है?
कौन ठीक इसी बात के लिए परमेश्वर से मल्लयुद्ध करता है?
इसीलिए, 'तुम्हें नहीं मिलता, क्योंकि तुम माँगते नहीं; या इसलिए कि बुरी रीति से माँगते हो,' अर्थात् इसलिए कि तुम मरने से पहले नए किए जाओ।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
मरने से पहले! क्या यह तुम्हें संतुष्ट करेगा?
नहीं, बल्कि माँगो कि यह अभी हो; आज ही, जब तक 'आज' कहा जाता है।
इसे 'परमेश्वर के लिए समय ठहराना' मत कहो।
निश्चय ही आज भी उसका समय है, जैसे कल भी।
जल्दी कर, मनुष्य, जल्दी कर!
तेरी आत्मा तीव्र अभिलाषा से फूट पड़े कि सिद्ध आनंद को चखे; तेरा लालायित हृदय पूरी तरह जल उठे कि प्रेम में विलीन हो जाए!
"परंतु क्या हम तब तक शांति और आनंद में नहीं रह सकते जब तक हम प्रेम में सिद्ध न किए जाएँ?
"निश्चय ही रह सकते हैं; क्योंकि परमेश्वर का राज्य अपने ही विरुद्ध बँटा हुआ नहीं है; इसलिए विश्वासी 'प्रभु में सदा आनंदित रहने' से हतोत्साहित न हों।
और फिर भी हमें उस पापमय स्वभाव से, जो अब भी हममें रह गया है, स्पष्ट रूप से पीड़ा हो सकती है।
हमारे लिए यह अच्छा है कि हमें इसका गहरा बोध हो, और उससे छुड़ाए जाने की तीव्र लालसा हो।
परंतु इसे हमें केवल इसलिए प्रेरित करना चाहिए कि हम और अधिक उत्साह से हर क्षण अपने सामर्थी सहायक की ओर दौड़ें, और और अधिक गंभीरता से 'उस लक्ष्य की ओर बढ़ते जाएँ, जो मसीह
यीशु में हमारे उच्च बुलावे का पुरस्कार है।'
और जब हमारे पाप का बोध सबसे अधिक बढ़े, तब उसके प्रेम का बोध उससे कहीं अधिक बढ़ना चाहिए।
पवित्रता का दावा करने वालों के साथ कैसा व्यवहार करें।
"जो सोचते हैं कि उन्होंने इसे प्राप्त कर लिया है, उनके साथ हमें कैसा व्यवहार करना चाहिए?
"उनकी निष्पक्षता से जाँच करो, और उन्हें उत्साह दिलाओ कि वे गंभीरता से प्रार्थना करें कि परमेश्वर उन्हें वह सब दिखाए जो उनके हृदयों में है।
सारे नए नियम में, जो अनुग्रह की सर्वोच्च अवस्था में हैं, उन्हीं को हर अनुग्रह में बढ़ते जाने की अत्यंत गंभीर आग्रहपूर्ण बातें और हर बुराई से बचने की सबसे कठोर चेतावनियाँ दी गई हैं।
परंतु यह अत्यंत कोमलता से किया जाना चाहिए; और बिना किसी कठोरता, रूखेपन या कड़वाहट के।
हमें क्रोध, निर्दयता या तिरस्कार के आभास से भी सावधानी से बचना चाहिए।
इस प्रकार परखना शैतान और
मसीही सिद्धता,
उसकी संतानों पर छोड़ दो जो पुकारते हैं, 'आओ हम उसे अपमान और यातना से परखें, कि हम उसकी नम्रता जानें और उसके धीरज को जाँचें।'
यदि वे दिए गए अनुग्रह के प्रति विश्वासयोग्य हैं, तो उससे नष्ट होने का उन्हें कोई खतरा नहीं; नहीं, चाहे वे उस भूल में तब तक बने रहें जब तक उनकी आत्मा परमेश्वर के पास लौट न जाए।
"परंतु उनके साथ कठोरता से व्यवहार करने में क्या हानि है?
"या तो वे भूल में हैं, या नहीं हैं।
यदि हैं, तो यह उनकी आत्माओं को नष्ट कर सकता है।
यह कुछ असंभव नहीं, नहीं, अनहोना भी नहीं।
यह उन्हें इतना क्रोधित या इतना हतोत्साहित कर सकता है कि वे गिर जाएँ और फिर न उठें।
यदि वे भूल में नहीं हैं, तो यह उन्हें दुःख दे सकता है जिन्हें परमेश्वर ने दुःखी नहीं किया, और हमारी अपनी आत्माओं को बहुत हानि पहुँचा सकता है।
क्योंकि निःसंदेह, जो उन्हें छूता है, वह मानो परमेश्वर की आँख की पुतली को छूता है।
यदि वे सचमुच उसके आत्मा से परिपूर्ण हैं, तो उनके साथ निर्दयता या तिरस्कार से व्यवहार करना अनुग्रह के आत्मा का कोई छोटा अपमान नहीं है।
इसी प्रकार इससे हम अपने भीतर बुरे संदेह और अनेक गलत स्वभावों को पोषित करते और बढ़ाते हैं।
केवल एक का उदाहरण लें: यह कैसा आत्म-संतोष है कि हम परमेश्वर की इन गूढ़ बातों में स्वयं को प्रधान जिज्ञासु, निर्णायक न्यायी बना बैठें!
क्या हम इस पद के योग्य हैं? क्या हम सब मामलों में बता सकते हैं कि दुर्बलता कहाँ तक पहुँचती है? किसे उसके अंतर्गत माना जा सकता है और किसे नहीं? किन परिस्थितियों में क्या सिद्ध प्रेम के साथ रह सकता है और क्या नहीं?
क्या हम ठीक-ठीक निश्चय कर सकते हैं कि वह दृष्टि, हाव-भाव और स्वर पर कैसा प्रभाव डालेगा?
यदि कर सकते हैं, तो निःसंदेह हम ही 'वे लोग हैं, और बुद्धि हमारे साथ ही मर जाएगी।'
"परंतु यदि वे हमारे उन पर विश्वास न करने से अप्रसन्न होते हैं, तो क्या यह उनके विरुद्ध पूरा प्रमाण नहीं?
"यह उस अप्रसन्नता के प्रकार पर निर्भर है।
यदि वे क्रोधित हैं, तो यह उनके विरुद्ध प्रमाण है; यदि वे दुःखी हैं, तो नहीं।
यदि हम परमेश्वर के किसी वास्तविक कार्य पर विश्वास नहीं करते और इस प्रकार उस लाभ से स्वयं को वंचित करते हैं जो हमें
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
उससे मिल सकता था, तो उन्हें दुःखी होना ही चाहिए। और हम इस दुःख को आसानी से क्रोध समझ सकते हैं, क्योंकि दोनों की बाहरी अभिव्यक्तियाँ बहुत मिलती-जुलती होती हैं।
"परंतु क्या यह अच्छा नहीं कि उन लोगों का पता लगाया जाए जो कल्पना करते हैं कि उन्होंने इसे प्राप्त कर लिया है, जबकि उन्होंने नहीं किया?
"नम्र और प्रेमपूर्ण जाँच द्वारा ऐसा करना अच्छा है।
परंतु इन पर भी विजय का उत्सव मनाना अच्छा नहीं।
यदि हमें ऐसा कोई उदाहरण मिले, तो इस प्रकार आनंद मनाना अत्यंत गलत है मानो हमें बड़ी लूट मिल गई हो।
क्या हमें बल्कि दुःखी नहीं होना चाहिए, गहराई से चिंतित होना चाहिए, और आँखों से आँसू बहाने चाहिए?
यहाँ एक ऐसा जन था जो मानो परमेश्वर की पूरी तरह उद्धार करने की सामर्थ्य का जीवित प्रमाण प्रतीत होता था; परंतु हाय! यह वैसा नहीं निकला जैसी हमें आशा थी।
वह तराजू में तौला गया और घटी में पाया गया!
और क्या यह आनंद की बात है?
क्या हमें हजार गुना अधिक आनंदित नहीं होना चाहिए, यदि हमें शुद्ध प्रेम के सिवा और कुछ न मिले?
"परंतु वह धोखे में है।'
तो क्या हुआ?
यह एक हानिरहित भूल है, जब तक वह अपने हृदय में प्रेम के सिवा कुछ महसूस नहीं करता।
यह ऐसी भूल है जो प्रायः बड़े अनुग्रह का, पवित्रता और सुख दोनों की उच्च मात्रा का प्रमाण देती है।
यह हर सरल हृदय वाले के लिए सच्चे आनंद की बात होनी चाहिए; भूल स्वयं नहीं, बल्कि अनुग्रह की वह ऊँचाई जो कुछ समय के लिए इसका कारण बनती है।
मैं आनंदित हूँ कि यह आत्मा मसीह में सदा सुखी, सदा प्रार्थना और धन्यवाद से भरी रहती है।
मैं आनंदित हूँ कि वह कोई अपवित्र स्वभाव महसूस नहीं करता, बल्कि निरंतर परमेश्वर का शुद्ध प्रेम।
और मैं आनंदित रहूँगा, यदि पाप तब तक रुका रहे जब तक वह पूरी तरह नष्ट न हो जाए।
"तो क्या किसी मनुष्य के इस प्रकार धोखा खाने में कोई खतरा नहीं?
"उस समय नहीं जब वह कोई पाप महसूस नहीं करता।
पहले खतरा था, और फिर होगा जब वह नई परीक्षाओं में पड़ेगा।
परंतु जब तक वह प्रेम के सिवा कुछ महसूस नहीं करता जो उसके सब विचारों, शब्दों और कार्यों को जीवंत करता है, तब तक उसे कोई खतरा नहीं; वह न केवल सुखी है, वरन सुरक्षित है, 'सर्वशक्तिमान की छाया में;' और परमेश्वर के लिए, उसे जब तक हो सके उस प्रेम में बने रहने दो।
इस बीच, आप उसे चेतावनी देकर अच्छा कर सकते हैं
मसीही सिद्धता,
कि यदि उसका प्रेम ठंडा पड़ जाए और पाप फिर जी उठे तो कैसा खतरा होगा; अर्थात् आशा छोड़ देने और यह मान बैठने का खतरा, कि क्योंकि उसने अभी तक प्राप्त नहीं किया, इसलिए वह कभी नहीं करेगा।
"परंतु यदि अब तक किसी ने इसे प्राप्त नहीं किया हो तो?
यदि वे सब जो ऐसा सोचते हैं धोखे में हों तो?
"मुझे इसका कायल कर दो, तो मैं इसका और अधिक प्रचार करूँगा।
परंतु मुझे ठीक से समझो; मैं किसी सिद्धांत को इस या उस व्यक्ति पर नहीं टिकाता।
यह या कोई और मनुष्य धोखा खा सकता है, और मैं विचलित नहीं होता।
परंतु यदि अब तक कोई सिद्ध नहीं किया गया, तो परमेश्वर ने मुझे सिद्धता का प्रचार करने नहीं भेजा।
"एक समान उदाहरण लें।
बहुत वर्षों से मैंने प्रचार किया है, 'परमेश्वर की एक ऐसी शांति है जो सारी समझ से परे है।'
मुझे कायल कर दो कि यह वचन भूमि पर गिर पड़ा; कि इन सब वर्षों में किसी ने यह शांति नहीं पाई; कि आज के दिन इसका कोई जीवित गवाह नहीं है; तो मैं इसका प्रचार फिर नहीं करूँगा।
"'अरे, परंतु कई लोग उस शांति में मरे हैं।'
शायद; परंतु मुझे जीवित गवाह चाहिए।
मैं सचमुच अचूक निश्चय के साथ नहीं कह सकता कि यह या वह व्यक्ति गवाह है; परंतु यदि मैं निश्चित होता कि ऐसे कोई नहीं हैं, तो मुझे इस सिद्धांत को छोड़ देना पड़ता।
"'आप मुझे गलत समझते हैं।
मेरा विश्वास है कि जो इस प्रेम में मरे, उनमें से कुछ ने अपनी मृत्यु से बहुत पहले इसका आनंद लिया था।
परंतु मुझे इसका निश्चय नहीं था कि उनकी पहले की गवाही सच थी, जब तक उनकी मृत्यु से कुछ घंटे पहले।'
"तब आपको अचूक निश्चय नहीं था; और एक उचित निश्चय आपको पहले हो सकता था; ऐसा निश्चय जो आपकी अपनी आत्मा को जीवंत और सांत्वना दे सकता, और अन्य सब मसीही प्रयोजनों को पूरा कर सकता।
ऐसा निश्चय कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति पा सकता है, मान लीजिए कोई जीवित गवाह है, उस व्यक्ति से परमेश्वर के प्रेम और भय में एक घंटा बात करके।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
"परंतु इससे क्या फर्क पड़ता है कि किसी ने इसे प्राप्त किया है या नहीं, जब इतने पवित्रशास्त्र इसकी गवाही देते हैं?
"यदि मुझे कायल कर दिया जाए कि इंग्लैंड में किसी ने भी वह प्राप्त नहीं किया जिसका इतने प्रचारकों ने, इतने स्थानों पर और इतने लंबे समय से इतने स्पष्ट और सशक्त रूप से प्रचार किया है, तो मैं स्पष्ट रूप से कायल हो जाऊँगा कि हम सबने उन पवित्रशास्त्रों का अर्थ गलत समझा; और इसलिए आगे के लिए मुझे भी सिखाना होगा कि 'पाप मृत्यु तक बना रहेगा।'"
1762 में लंदन में कट्टरता प्रकट हुई।
20. सन् 1762 में लंदन में परमेश्वर के कार्य की बड़ी वृद्धि हुई।
बहुत-से लोग, जिन्हें अब तक इन बातों की कोई चिंता नहीं थी, अपनी खोई हुई दशा के विषय में गहराई से कायल हुए; बहुतों ने मसीह के लहू में छुटकारा पाया; कम नहीं, पीछे हटे हुए लोग चंगे किए गए; और काफी लोगों ने विश्वास किया कि परमेश्वर ने उन्हें सब पाप से बचा लिया है।
यह आसानी से भाँपकर कि शैतान गेहूँ के बीच जंगली बीज बोने का प्रयास करेगा, मैंने उन्हें खतरे से सचेत करने में बहुत परिश्रम किया, विशेषकर अहंकार और उन्माद के विषय में।
और जब तक मैं नगर में रहा, मेरे पास आशा रखने का कारण था कि वे नम्र और संयमी बने रहे।
परंतु मेरे जाते ही लगभग तुरंत उन्माद घुस आया।
दो-तीन लोग अपनी ही कल्पनाओं को परमेश्वर की ओर से प्रेरणा मानने लगे, और इससे यह मान बैठे कि वे कभी नहीं मरेंगे; और ये, दूसरों को भी इसी मत में लाने का प्रयास करते हुए, बड़ा शोर और गड़बड़ी का कारण बने।
शीघ्र ही बाद में, वही लोग कुछ और लोगों के साथ अन्य अतिवादों में जा पड़े; यह कल्पना करते हुए कि उनकी परीक्षा नहीं हो सकती; कि उन्हें कोई पीड़ा महसूस नहीं होगी; और कि उनमें भविष्यवाणी का और आत्माओं को परखने का वरदान है।
शरद ऋतु में लंदन लौटने पर उनमें से कुछ ने डाँट सह ली; परंतु अन्य सुधार की पहुँच से ऊपर निकल चुके थे।
इस बीच निंदा की बाढ़ लगभग हर ओर से मुझ पर आई; उनकी ओर से, क्योंकि मैं
मसीही सिद्धता,
हर अवसर पर उन्हें रोकता था; और दूसरों की ओर से, क्योंकि वे कहते थे कि मैं उन्हें नहीं रोकता।
फिर भी प्रभु का हाथ रुका नहीं, बल्कि अधिकाधिक पापी कायल होते गए; कुछ लगभग प्रतिदिन परमेश्वर की ओर फिरते थे, और अन्य अपने सारे हृदय से उससे प्रेम करने के योग्य किए जाते थे।
21. इसी समय के लगभग, लंदन से कुछ दूर रहने वाले एक मित्र ने मुझे इस प्रकार लिखा:—
"इससे अत्यधिक न घबराएँ कि शैतान मसीह के गेहूँ के बीच जंगली बीज बोता है।
ऐसा सदा से होता आया है, विशेषकर उसके आत्मा के किसी विशेष उंडेले जाने पर; और तब तक होता रहेगा जब तक वह हज़ार वर्ष के लिए बाँधा न जाए।
तब तक वह सदा मसीह के आत्मा के कार्य की नकल करेगा और उसका विरोध करने का प्रयास करेगा।
"इसका एक दुःखद परिणाम यह हुआ है कि वह संसार, जो सदा उस दुष्ट की गोद में सोया रहता है, पवित्र आत्मा के हर कार्य का उपहास करता आया है।
"परंतु सच्चे मसीही क्या कर सकते हैं?
यही कि यदि वे अपने योग्य आचरण करना चाहें, तो उन्हें चाहिए कि (1.) प्रार्थना करें कि हर भ्रमित आत्मा छुड़ाई जाए; (2.) नम्रता की आत्मा में उन्हें सुधारने का प्रयास करें; और अंत में, प्रार्थना और सतर्कता दोनों से पूरी सावधानी रखें कि दूसरों का भ्रम उस सर्वांगीण पवित्रता, आत्मा, प्राण और देह की पवित्रता, को खोजने में उनके उत्साह को कम न करे, 'जिसके बिना कोई प्रभु को नहीं देखेगा।'
"सचमुच, यह पूर्णतः नई सृष्टि एक पागल संसार के लिए केवल पागलपन है।
परंतु फिर भी यह परमेश्वर की इच्छा और बुद्धि है।
हम सब इसकी खोज करें!
"परंतु कुछ लोग, जो इस सिद्धांत को उसकी पूरी व्यापकता में मानते हैं, प्रायः सर्वशक्तिमान को सीमित करने के दोषी होते हैं।
वह अपने वरदान ठीक वैसे ही बाँटता है जैसा उसे अच्छा लगे; इसलिए यह न बुद्धिमानी है, न विनम्रता, कि यह दृढ़ता से कहा जाए कि पवित्रता के आत्मा की ऊँची मात्रा पाने के योग्य होने से पहले किसी को कितने ही समय तक विश्वासी रहना ही होगा।
"परमेश्वर की सामान्य रीति एक बात है, पर उसकी प्रभुतापूर्ण
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
इच्छा दूसरी बात है।
अपने कार्य को शीघ्र करने और विलंब करने, दोनों के लिए उसके पास बुद्धिमानी भरे कारण हैं।
कभी वह अचानक और अनपेक्षित रूप से आता है; कभी तब तक नहीं जब तक हम बहुत समय तक उसकी बाट न जोह लें।
"सचमुच, कई वर्षों से मेरी यह धारणा रही है कि मनुष्य जो दिव्य जीवन में इतनी कम उन्नति करते हैं, उसका एक बड़ा कारण उनकी अपनी शीतलता, लापरवाही और अविश्वास है।
और फिर भी मैं यहाँ विश्वासियों की बात कर रहा हूँ।
"'मसीह का आत्मा हमें सब बातों में सही विवेक दे, और हमें 'परमेश्वर की सारी परिपूर्णता से भर दे;' कि हम 'सिद्ध और पूर्ण हों, और हम में किसी बात की घटी न हो।'
22. उसी समय के आसपास, पाँच-छह निष्कपट उन्मादियों ने भविष्यवाणी की कि संसार का अंत 28 फरवरी को होगा।
मैंने तुरंत हर संभव उपाय से, सार्वजनिक और निजी दोनों रूप से, उनका सामना किया।
मैंने वेस्ट स्ट्रीट और स्पिटलफ़ील्ड्स दोनों में विशेष रूप से इसी विषय पर प्रचार किया।
मैंने सोसाइटी को बार-बार चेताया, और जितनों से हो सका उनसे अलग-अलग बात की; और मैंने अपने परिश्रम का फल देखा।
उन्होंने बहुत ही कम अनुयायी बनाए।
मेरा विश्वास है कि हमारी पूरी सोसाइटी में मुश्किल से तीस।
फिर भी, उन्होंने बहुत शोर मचाया, उन लोगों को ठोकर का बड़ा कारण दिया जो मेरे विरुद्ध हर अवसर का पूरा लाभ उठाने की ताक में रहते थे, और मसीही सिद्धता का विरोध करने वालों की संख्या और साहस दोनों को बहुत बढ़ाया।
उनसे प्रश्न जो इस जीवन में सिद्धता की प्राप्ति से इनकार करते हैं
इस जीवन में।
23. इनमें से एक के द्वारा अब प्रकाशित कुछ प्रश्नों ने एक सादे मनुष्य को निम्नलिखित लिखने के लिए प्रेरित किया
— "उनसे विनम्र प्रश्न, जो इस जीवन में सिद्धता की प्राप्ति से इनकार करते हैं।
"(1.) क्या सुसमाचार के अधीन पवित्र आत्मा की एक बड़ी मात्रा नहीं दी गई, यहूदी
मसीही सिद्धता,
व्यवस्था के अधीन की तुलना में?
यदि नहीं, तो किस अर्थ में आत्मा नहीं दिया गया था, क्योंकि यीशु की महिमा अब तक प्रकट नहीं हुई थी? यूहन्ना 7:39।
"(2.) क्या वह 'महिमा जो मसीह के दुःखभोग के बाद आने वाली थी,' 1 पतरस 1:11, बाहरी महिमा थी या भीतरी, अर्थात् पवित्रता की महिमा?
"(3.) क्या परमेश्वर ने पवित्रशास्त्र में कहीं हमें उससे अधिक आज्ञा दी है जितनी उसने हमसे प्रतिज्ञा की है?
"(4.) क्या पवित्रता के विषय में परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ इसी जीवन में पूरी होनी हैं, या केवल आने वाले जीवन में?
"(5.) क्या एक मसीही उन व्यवस्थाओं के सिवा किसी और व्यवस्था के अधीन है जिन्हें परमेश्वर 'हमारे हृदयों पर लिखने' की प्रतिज्ञा करता है? यिर्मयाह 31:31, आदि; इब्रानियों 8:10।
"(6.) किस अर्थ में 'व्यवस्था की धार्मिकता उनमें पूरी की जाती है जो शरीर के अनुसार नहीं, बल्कि आत्मा के अनुसार चलते हैं'? रोमियों 7:4 [मूल में यही संदर्भ]।
"(7.) क्या इस जीवन में किसी के लिए 'अपने सारे हृदय, और सारे मन, और सारी आत्मा, और सारी शक्ति से परमेश्वर से प्रेम करना' असंभव है?
और क्या मसीही किसी ऐसी व्यवस्था के अधीन है जो इस प्रेम में पूरी नहीं होती?
"(8.) क्या आत्मा के देह से निकल जाने से उसमें बसे पाप से उसकी शुद्धि होती है?
"(9.) यदि हाँ, तो क्या यह कुछ और नहीं, न कि 'मसीह का लहू, जो' उसे 'सब पाप से शुद्ध करता है'?
"(10.) यदि उसका लहू हमें सब पाप से शुद्ध करता है, जब आत्मा और देह जुड़े हैं, तो क्या यह इसी जीवन में नहीं?
"(11.) यदि वह तब जब वह मेल टूट जाए, तो क्या यह आने वाले जीवन में नहीं?
और क्या यह बहुत देर नहीं?
"(12.) यदि मृत्यु के क्षण में; तो आत्मा किस दशा में होती है, जब वह न देह में है और न उससे बाहर?
"(13.) क्या मसीह ने कहीं हमें उस वस्तु के लिए प्रार्थना करना सिखाया है जिसे देने का उसका कभी इरादा नहीं?
"(14.) क्या उसने हमें यह प्रार्थना करना नहीं सिखाया, 'तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसी ही पृथ्वी पर भी हो'?
और क्या वह स्वर्ग में सिद्ध रूप से पूरी नहीं होती?
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
"(15.) यदि हाँ, तो क्या उसने हमें पृथ्वी पर सिद्धता के लिए प्रार्थना करना नहीं सिखाया?
तो क्या उसका इसे देने का इरादा नहीं?
"(16.) क्या संत पौलुस ने परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना नहीं की, जब उसने प्रार्थना की कि थिस्सलुनीकियों के लोग 'पूरी रीति से पवित्र किए जाएँ, और' (इस संसार में, आने वाले में नहीं, जब तक वह मरे हुओं के लिए प्रार्थना नहीं कर रहा था) 'यीशु मसीह के आने तक देह, प्राण और आत्मा में निर्दोष रखे जाएँ'?
"(17.) क्या आप सच्चाई से चाहते हैं कि इस जीवन में भीतर बसे पाप से मुक्त हों?
"(18.) यदि हाँ, तो क्या वह इच्छा परमेश्वर ने आपको नहीं दी?
"(19.) यदि हाँ, तो क्या उसने वह आपको आपका उपहास करने के लिए दी, जबकि उसका कभी पूरा होना असंभव है?
"(20.) यदि आप में इतनी सच्चाई भी नहीं कि इसकी इच्छा करें, तो क्या आप ऐसी बातों पर विवाद नहीं कर रहे जो आपकी पहुँच से बहुत ऊँची हैं?
"(21.) क्या आप कभी परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह 'आपके हृदय के विचारों को शुद्ध करे, कि आप' उससे 'सिद्धता से प्रेम कर सकें'?
"(22.) यदि आप न तो उसकी इच्छा करते हैं जो माँगते हैं, न उसे प्राप्य मानते हैं, तो क्या आप मूर्ख की भाँति प्रार्थना नहीं करते?
"परमेश्वर आपको इन प्रश्नों पर शांति और निष्पक्षता से विचार करने में सहायता करे!"
कुछ गवाह।
24. इस वर्ष के अंत में, परमेश्वर ने उस जलती और चमकती ज्योति, जेन कूपर, को अपने पास बुला लिया।
चूँकि वह मसीही सिद्धता की जीवित और मरती हुई दोनों गवाह थी, इसलिए विषय से बिल्कुल बाहर न होगा कि उसकी मृत्यु का संक्षिप्त वृत्तांत जोड़ दिया जाए, उसके अपने एक पत्र के साथ, जिसमें उस रीति का सादा और निश्छल वर्णन है जिससे परमेश्वर ने
उसकी आत्मा में वह बड़ा परिवर्तन करना चाहा: — 2 मई, 1761।
"मेरा विश्वास है कि जब तक मुझमें स्मरण-शक्ति रहेगी, कृतज्ञता बनी रहेगी।
जब से आपने गलातियों 5:5 पर प्रचार किया, तब से मैंने अपनी आत्मा की सच्ची दशा स्पष्ट देखी।
उस उपदेश ने मेरे हृदय का वर्णन किया, और यह भी कि उसे क्या होना चाहिए; अर्थात् सचमुच सुखी
मसीही सिद्धता,
आपने श्री एम— का पत्र पढ़ा, और उसने उस धर्म का वर्णन किया जिसकी मैं इच्छा करती थी।
उसी समय से पुरस्कार दृष्टि में आ गया, और मुझे उसके पीछे दृढ़ता से चलने के योग्य किया गया।
मैं प्रार्थना में जागती रही, कभी बड़े संकट में, कभी आशीष की धीरज भरी प्रतीक्षा में।
आपके लंदन छोड़ने से कुछ दिन पहले, मेरी आत्मा उस प्रतिज्ञा पर टिकी रही जो प्रार्थना में मुझे लागू की गई थी: 'प्रभु, जिसे तुम खोजते हो, वह अचानक अपने मंदिर में आ जाएगा।' मैंने विश्वास किया कि वह आएगा, और वहाँ शोधने वाले की आग के समान बैठेगा।
आपके जाने के बाद मंगलवार को मुझे लगा कि जब तक वह उसी रात अपना वचन पूरा न करे, मैं सो नहीं सकूँगी।
इन शब्दों की शक्ति मैंने तब जैसी कभी नहीं जानी थी: 'चुप हो जाओ, और जान लो कि मैं ही परमेश्वर हूँ।'
मैं उसके सामने कुछ भी नहीं रही, और मेरी आत्मा में पूर्ण शांति का आनंद लिया।
मैं नहीं जानती थी कि उसने मेरा पाप नष्ट किया है या नहीं; पर मैं जानना चाहती थी, कि मैं उसकी स्तुति करूँ।
फिर भी मैंने शीघ्र अविश्वास का लौटना पाया, और बोझ से दबी होकर कराही।
बुधवार को मैं लंदन गई, और बिना रुके प्रभु को खोजा।
मैंने प्रतिज्ञा की कि यदि वह मुझे पाप से बचाए, तो मैं उसकी स्तुति करूँगी।
मैं सब कुछ छोड़ सकती थी, कि मसीह को प्राप्त करूँ।
परंतु मैंने पाया कि ये सब दलीलें कुछ भी मूल्य की नहीं; और यदि वह मुझे बचाए, तो वह मुफ़्त में, अपने ही नाम के लिए होगा।
गुरुवार को मुझे इतनी परीक्षा हुई कि मैंने अपना अंत कर लेने, या फिर कभी परमेश्वर के लोगों से बात न करने का विचार किया; फिर भी मुझे उसके क्षमाशील प्रेम पर कोई संदेह न था; परंतु, — 'अपने परमेश्वर से प्रेम करना, पर केवल अपने परमेश्वर से नहीं, मृत्यु से भी बुरा था।'
शुक्रवार को मेरा संकट और गहरा हो गया।
मैंने प्रार्थना करने का प्रयास किया, और न कर सकी।
मैं श्रीमती डी— के पास गई, जिन्होंने मेरे लिए प्रार्थना की, और मुझे बताया कि यह स्वभाव की मृत्यु है।
मैंने बाइबल खोली, और यह निकला, 'डरपोकों, और अविश्वासियों का भाग उस झील में होगा जो आग और गंधक से जलती रहती है।'
मैं इसे सह न सकी।
मैंने फिर खोली, मरकुस 16:6, 7 पर: 'चकित मत
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
हो; तुम यीशु नासरी को खोजते हो।
जाओ, उसके चेलों से कहो कि वह तुम्हारे आगे गलील को जाता है; वहाँ तुम उसे देखोगे।'
मुझे प्रोत्साहन मिला, और मैं यह विश्वास करके प्रार्थना करने के योग्य हुई कि मैं घर पर यीशु को देखूँगी।
उस रात मैं लौटी, और श्रीमती जी— को पाया।
उन्होंने मेरे लिए प्रार्थना की; और पूर्वनियतिवादी के पास इसके सिवा कोई दलील न थी, 'हे प्रभु, तू किसी का पक्षपात नहीं करता।'
उसने यह प्रमाणित किया कि वह नहीं करता, मुझे आशीष देकर।
मैं एक क्षण में यीशु मसीह को थाम लेने के योग्य हुई, और सरल विश्वास से उद्धार पाया।
उसने मुझे आश्वासन दिया कि प्रभु, राजा, मेरे बीच में है, और मैं फिर बुराई न देखूँगी।
अब मैंने उसे धन्य कहा जिसने मुझ पर कृपादृष्टि की और मुझे छुड़ाया, और मेरे लिए 'ज्ञान, धार्मिकता, पवित्रीकरण और छुटकारा' बन गया।
मैंने यीशु को सर्वांग सुंदर देखा; और जाना कि वह अपने सब पदों में मेरा है।
और उसकी महिमा हो, वह अब मेरे हृदय में बिना किसी प्रतिद्वंद्वी के राज्य करता है।
मुझे उसकी इच्छा के सिवा कोई इच्छा नहीं मिलती।
मैं कोई अहंकार महसूस नहीं करती; और न कोई लगाव, सिवा उसके जो उस पर लगा है।
मैं जानता हूँ कि मैं विश्वास से स्थिर हूँ; और प्रार्थना में जागते रहना ही विश्वास का पहरा होना चाहिए।
इस क्षण मैं परमेश्वर में आनन्दित हूँ, और अगले क्षण के लिए भी विश्वास करता हूँ।
आपके बताए हुए अध्याय (1 कुरिन्थियों 13) को मैंने अनेक बार पढ़ा है, और अपने हृदय तथा जीवन की तुलना उससे की है।
ऐसा करते हुए मैं अपनी कमियों को और प्रायश्चित्त करनेवाले लहू की अपनी आवश्यकता को अनुभव करता हूँ।
फिर भी मैं यह कहने का साहस नहीं करता कि वहाँ वर्णित प्रेम का कुछ अंश मुझमें नहीं है, यद्यपि जैसा मुझे होना है वैसा मैं अभी नहीं हूँ।
मैं उस 'प्रेम' में खो जाना चाहता हूँ 'जो ज्ञान से परे है।' मैं देखता हूँ कि 'धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा'; और मुझ पर, जो सब पवित्र लोगों में छोटे से भी छोटा हूँ, यह अनुग्रह दिया गया है।
यदि मैं प्रधान स्वर्गदूत होता, तो उसके सम्मुख अपना मुँह ढाँप लेता, और मौन ही को उसकी स्तुति कहने देता!"
निम्नलिखित वृत्तान्त एक ऐसी स्त्री ने दिया जिसने जो वह बताती है उसे अपनी आँखों से देखा और कानों से सुना था : — "(1.) नवम्बर के आरम्भ में उसे मानो पूर्वाभास हो गया था कि उस पर क्या आनेवाला है, और वह प्रायः ये शब्द गाया करती थी : —
मसीही सिद्धता,
'जब इस दुर्बल देह पर पीड़ा हावी हो, तब मेमने जैसे धैर्य से मेरे हृदय को सुसज्जित कर।'
और जब उसने मुझे यह बताने के लिए बुलावा भेजा कि वह बीमार है, तो उसने अपने पत्र में लिखा, 'मैं यीशु की इच्छा को सहती हूँ; वह जो कुछ भेजता है, सब उसके प्रेम से मधुर हो जाता है।
मैं ऐसी आनन्दित हूँ मानो मुझे यह वाणी सुनाई दे रही हो : — 'मेरे लिए मेरे बड़े भाई प्रतीक्षा कर रहे हैं, और स्वर्गदूत मुझे दूर बुला रहे हैं, और यीशु मुझे आने को कहता है!'
"(2.) जब मैंने उससे कहा, 'तुम्हारे लिए जीवन या मृत्यु चुनना मेरे हाथ में नहीं है,' तो उसने कहा, 'मैंने प्रभु से माँगा था कि यदि उसकी इच्छा हो,
तो मैं पहले मरूँ।
और उसने मुझसे कहा, तुम मेरे बाद जीवित रहोगे, और तुम ही मेरी आँखें बन्द करोगे।'
जब हमने जान लिया कि यह चेचक है, तो मैंने उससे कहा, 'मेरी प्यारी, यदि हम तुम्हें बता दें कि तुम्हारा रोग क्या है तो तुम डरोगी नहीं।'
उसने कहा, 'मैं उसकी इच्छा से डर नहीं सकती।'
"'(3.) रोग शीघ्र ही उस पर बहुत भारी हो गया; पर उतना ही अधिक उसका विश्वास दृढ़ होता गया।
मंगलवार, 16 नवम्बर को उसने मुझसे कहा, 'मैं सिंहासन के सम्मुख महिमामय रीति से आराधना करती रही हूँ; मेरी आत्मा परमेश्वर में इतनी समा गई थी!'
मैंने कहा, 'क्या प्रभु ने तुम्हें कोई विशेष प्रतिज्ञा दी?'
उसने उत्तर दिया, 'नहीं; वह सब यही था — 'वह पवित्र भय जो हिलने का साहस नहीं करता, और प्रेम का वह सारा मौन स्वर्ग।'
""(4.) बृहस्पतिवार को जब मैंने पूछा, 'तुम्हें मुझसे क्या कहना है?' तो उसने कहा, 'कुछ नहीं, बस वही जो तुम पहले से जानते हो : परमेश्वर प्रेम है।'
मैंने पूछा, 'क्या तुम्हारे पास कोई विशेष प्रतिज्ञा है?'
उसने उत्तर दिया, 'मुझे किसी की आवश्यकता नहीं जान पड़ती; मैं उसके बिना भी जी सकती हूँ।
मैं विकृति का एक लोथड़ा बनकर मरूँगी, परन्तु तुम सब से पूर्ण महिमा में मिलूँगी; और इस बीच मैं तुम्हारी आत्मा के साथ संगति रखती रहूँगी।'
"(5.) श्री एम. ने पूछा कि उसके विचार में चलने का सबसे उत्तम मार्ग क्या है
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
और उसकी मुख्य बाधाएँ क्या हैं।
उसने उत्तर दिया : 'सबसे बड़ी बाधा प्रायः स्वाभाविक स्वभाव से आती है।
मेरा स्वभाव संकोची होना, बहुत शान्त रहना, बहुत कुछ सहना और कम बोलना था।
कुछ लोग एक मार्ग को अधिक उत्तम समझें, और कुछ दूसरे को : परन्तु मुख्य बात परमेश्वर की इच्छा में जीना है।
पिछले कुछ महीनों से, जब मैं विशेष रूप से इसी के प्रति समर्पित रही हूँ, मैंने उसके आत्मा का ऐसा मार्गदर्शन अनुभव किया है, और उस पवित्र जन से जो अभिषेक मुझे मिला है उसने मुझे सब बातें ऐसी सिखाई हैं कि मुझे आवश्यकता नहीं कि कोई मनुष्य मुझे सिखाए, सिवाय इसके कि जैसा यह अभिषेक सिखाता है।'
"(6.) शुक्रवार की सुबह उसने कहा, 'मेरा विश्वास है कि मैं मर जाऊँगी।'
फिर वह अपने बिस्तर पर उठकर बैठ गई और बोली, 'हे प्रभु, मैं तेरा धन्यवाद करती हूँ कि तू सदा मेरे साथ है, और जो कुछ तेरा है वह मेरा है।
तेरा प्रेम मेरी दुर्बलता से बड़ा है, मेरी असहायता से बड़ा है, मेरी अयोग्यता से बड़ा है।
हे प्रभु, तू नाशमान देह से कहता है, तू मेरी बहन है! और हे यीशु, तेरी महिमा हो,
तू मेरा भाई है।
मुझे सब पवित्र लोगों के साथ तेरे प्रेम की लम्बाई, चौड़ाई, गहराई और ऊँचाई को समझने दे!
इन्हें आशीष दे' (जो वहाँ उपस्थित थे उनके लिए); 'वे हर क्षण सब बातों में वैसे ही अभ्यस्त होते रहें जैसा तू उन्हें चाहता है।'
"(7.) कुछ घंटों के बाद ऐसा जान पड़ा कि मृत्यु की पीड़ाएँ उस पर आने ही वाली हैं; परन्तु उसका चेहरा विजय की मुस्कान से भरा था, और उसने आनन्द से ताली बजाई।
श्रीमती
सी. ने कहा, 'मेरी प्यारी, तुम मेम्ने के लहू के द्वारा जयवन्त से भी बढ़कर हो।'
उसने उत्तर दिया, 'हाँ, हाँ, प्यारे यीशु!
हे मृत्यु, तेरा डंक कहाँ है?'
फिर वह कुछ समय तक मानो ऊँघती हुई पड़ी रही।
इसके बाद उसने बोलने का प्रयत्न किया, पर बोल न सकी; फिर भी उसने कमरे में सब से हाथ मिलाकर अपना प्रेम प्रकट किया।
"(8.) तब श्री डब्ल्यू. आए।
उसने कहा, 'महोदय, मैं नहीं जानती थी कि मैं आपको देखने के लिए जीवित रहूँगी।
परन्तु मैं आनन्दित हूँ कि प्रभु ने मुझे यह अवसर दिया
मसीही सिद्धता,
और आपसे बात करने की सामर्थ्य भी दी।
मैं आपसे प्रेम करती हूँ।
आपने सदा कठोरतम सिद्धान्त का प्रचार किया है; और मुझे उसका पालन करना प्रिय लगा।
अब भी वैसा ही करते रहिए, चाहे कोई प्रसन्न हो या अप्रसन्न।'
उन्होंने पूछा, 'क्या तुम अब विश्वास करती हो कि तुम पाप से बचाई गई हो?'
उसने कहा, 'हाँ; कई महीनों से मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं रहा।
जो कभी सन्देह हुआ, वह इसलिए कि मैं विश्वास में बनी नहीं रही।
अब मैं अनुभव करती हूँ कि मैंने विश्वास की रखवाली की है; और सिद्ध प्रेम सारे भय को दूर कर देता है।
आपके विषय में प्रभु ने मुझसे प्रतिज्ञा की है कि आपके पिछले कामों से आपके बाद के काम बढ़कर होंगे, यद्यपि मैं उसे देखने के लिए जीवित नहीं रहूँगी।
इन छः महीनों में, जैसा वे कहते हैं, मैं बड़ी उन्मादी रही हूँ; परन्तु अपने जीवन में मैं कभी मसीह के हृदय के इतने निकट नहीं रही।
महोदय, आप उस सरलता का अनुसरण करके, जिससे आपकी आत्मा प्रेम करती है, सैकड़ों लोगों के हृदयों को शान्ति देने की इच्छा रखते हैं।'
"(9.) एक ऐसे व्यक्ति से, जिसने उसकी प्रार्थना के समय परमेश्वर का प्रेम पाया था, उसने कहा, 'मैं अनुभव करती हूँ कि मैंने चतुराई से गढ़ी हुई कहानी का अनुसरण नहीं किया; क्योंकि मैं उतनी ही आनन्दित हूँ जितनी जीवित रहकर हो सकती हूँ।
तुम आगे बढ़ते जाओ, और लक्ष्य से पहले मत रुको।'
कुमारी एम——स से उसने कहा, 'मसीह से प्रेम करो; वह तुमसे प्रेम करता है।
मेरा विश्वास है कि मैं तुम्हें परमेश्वर के दाहिने हाथ पर देखूँगी : परन्तु जैसे एक तारा दूसरे तारे से महिमा में भिन्न होता है, वैसे ही पुनरुत्थान में भी होगा।
मैं परमेश्वर की उपस्थिति में तुम्हें आदेश देती हूँ कि उस दिन भीतर से पूर्णतः महिमामय होकर मुझसे मिलना।
संसार के अनुरूप होने से हर प्रकार बचो।
तुम अपने अनेक विशेषाधिकारों से वंचित की गई हो।
मैं जानती हूँ कि मैं निर्दोष पाई जाऊँगी।
तुम परिश्रम करो कि उसके सम्मुख शान्ति में, निष्कलंक पाई जाओ।'
"(10.) शनिवार की सुबह उसने लगभग इस प्रकार प्रार्थना की :
'हे मेरे प्रभु, मैं जानती हूँ कि मेरा जीवन केवल तेरी इच्छा पूरी करने के लिए बढ़ाया गया है।
और यद्यपि मैं फिर कभी न खाऊँ न पीऊँ' (उसने लगभग अट्ठाईस घंटों से कुछ निगला नहीं था), 'तेरी इच्छा पूरी हो।
मैं बारह महीने तक भी ऐसे ही रखी जाने को तैयार हूँ :
मनुष्य केवल रोटी से जीवित नहीं रहता।
मैं तेरी स्तुति करती हूँ कि हमारी गलियों में शिकायत की छाया तक नहीं है।
उस अर्थ में हम नहीं जानते कि बीमारी क्या होती है।
सचमुच, प्रभु, न
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
जीवन, न मृत्यु, न वर्तमान बातें, न भविष्य की बातें, और न कोई सृष्टि हमें एक क्षण के लिए भी तेरे प्रेम से अलग कर सकेगी।
इन्हें आशीष दे, कि इनकी आत्माओं में किसी बात की घटी न हो।
मेरा विश्वास है कि न होगी।
मैं विश्वास से प्रार्थना करती हूँ।'
"रविवार और सोमवार को वह प्रलाप में थी, पर कभी-कभी होश में आ जाती थी।
तब स्पष्ट दिखाई दिया कि उसका हृदय अब भी स्वर्ग में था।
किसी ने उससे कहा, 'यीशु हमारा लक्ष्य है।'
उसने उत्तर दिया : 'मेरा एक ही लक्ष्य है; मैं पूर्णतः आत्मिक हूँ।'
कुमारी एम. ने उससे कहा, 'तुम परमेश्वर में बसती हो।'
उसने उत्तर दिया :
'पूर्ण रूप से।'
किसी ने उससे पूछा, 'क्या तुम मुझसे प्रेम करती हो?'
उसने कहा, 'ओह, मैं मसीह से प्रेम करती हूँ; मैं अपने मसीह से प्रेम करती हूँ।'
दूसरे से उसने कहा, 'मैं यहाँ अधिक समय नहीं रहूँगी; यीशु अनमोल है, सचमुच बहुत अनमोल है।'
उसने कुमारी एम. से कहा, 'प्रभु बहुत भला है; वह मेरी आत्मा को सब से ऊपर रखता है।'
मरने से पहले पन्द्रह घंटे वह तेज़ ऐंठनों में रही : उसके कष्ट अत्यधिक थे।
किसी ने कहा, 'तुम दुःखों के द्वारा सिद्ध की गई हो।'
उसने कहा, 'और अधिक, और अधिक।'
कुछ समय शान्त पड़े रहने के बाद उसने कहा, 'हे प्रभु, तू सामर्थी है!'
फिर बड़ी देर तक रुककर उसने अपने अन्तिम शब्द कहे, 'यीशु ही मेरे लिए सब कुछ है : समय और अनन्तकाल में उसकी महिमा हो।'
इसके बाद वह लगभग आधे घंटे तक चुपचाप पड़ी रही, और फिर बिना किसी आह या कराह के प्राण त्याग दिए।"
25. अगले वर्ष, जब पाप से बचाए जाने का विश्वास करनेवालों की संख्या बढ़ती ही गई, तो मैंने आवश्यक समझा कि मुख्यतः उन्हीं के उपयोग के लिए प्रकाशित करूँ,
'S "मसीही सिद्धता पर आगे के विचार" :
— "1. 'हर एक विश्वास करनेवाले के लिए धार्मिकता के निमित्त मसीह व्यवस्था का अन्त क्यों है?' रोमियों 10:4।
इसे समझने के लिए आपको समझना होगा कि यहाँ किस व्यवस्था की बात हो रही है; और मेरी समझ में यह है, (1.) मूसा की व्यवस्था, अर्थात् मूसा की पूरी व्यवस्था-प्रणाली; जिसके विषय में संत पौलुस निरन्तर ऐसे कहता है मानो वह एक ही हो, यद्यपि उसके तीन भाग हैं,
मसीही सिद्धता,
राजनैतिक, नैतिक और रीति-सम्बन्धी।
(2.) आदम की व्यवस्था, जो आदम को निर्दोष अवस्था में दी गई थी, जिसे ठीक ही 'कर्मों की व्यवस्था' कहा जाता है।
यह सार रूप में स्वर्गदूतों की व्यवस्था के समान है, क्योंकि यह स्वर्गदूतों और मनुष्यों दोनों के लिए समान है।
इसकी माँग थी कि मनुष्य उन सब शक्तियों को, जिनके साथ वह रचा गया था, परमेश्वर की महिमा के लिए उपयोग करे।
अब, वह अपनी बुद्धि और अपनी भावनाओं, दोनों में किसी भी दोष से रहित रचा गया था।
तब उसकी देह मन के लिए बोझ नहीं थी; वह उसे सब बातों को स्पष्टता से समझने, उनके विषय में सही निर्णय करने, और यदि वह तर्क करता तो ठीक तर्क करने से नहीं रोकती थी।
मैं कहता हूँ, यदि वह तर्क करता; क्योंकि सम्भव है कि वह करता ही न हो।
सम्भवतः उसे तर्क करने की आवश्यकता तब तक थी ही नहीं, जब तक उसकी नाशमान देह ने मन को दबाकर उसकी स्वाभाविक क्षमताओं को क्षीण नहीं कर दिया।
सम्भवतः तब तक मन हर सामने आनेवाले सत्य को वैसे ही सीधे देख लेता था जैसे आँख अब प्रकाश को देखती है।
"फलतः यह व्यवस्था, जो उसकी मूल शक्तियों के अनुपात में थी, माँग करती थी कि वह सदा सोचे, सदा बोले, और सदा कार्य करे, हर बात में ठीक वैसा ही जैसा होना चाहिए।
वह ऐसा करने में भली-भाँति समर्थ था : और परमेश्वर उस सेवा की माँग करने से नहीं चूक सकता था जिसे वह दे सकता था।
" परन्तु आदम गिर गया; और उसकी अविनाशी देह नाशमान हो गई; और तब से वह आत्मा के लिए बोझ है और उसके कार्यों में बाधा डालती है।
इसलिए आज कोई भी मनुष्य की सन्तान सब समय स्पष्टता से समझ या सही निर्णय नहीं कर सकती।
और जहाँ समझ या निर्णय में चूक हो, वहाँ ठीक तर्क करना असम्भव है।
इसलिए मनुष्य का भूल करना उतना ही स्वाभाविक है जितना साँस लेना; और वह एक के बिना उतना ही नहीं जी सकता जितना दूसरे के बिना: अतः कोई भी मनुष्य वह सेवा करने में समर्थ नहीं जो आदम की व्यवस्था माँगती है।
" और किसी मनुष्य पर उसे करना अनिवार्य नहीं; परमेश्वर किसी मनुष्य से इसकी माँग नहीं करता : क्योंकि मसीह आदम की व्यवस्था का भी अन्त है, जैसे मूसा की व्यवस्था का।
अपनी मृत्यु से उसने दोनों का अन्त कर दिया है; उसने मनुष्य के सम्बन्ध में दोनों को ही रद्द कर दिया है; और इनमें से किसी एक का पालन करने की बाध्यता
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
समाप्त हो गई है।
और कोई जीवित मनुष्य आदम की व्यवस्था का पालन करने के लिए उतना ही बाध्य नहीं जितना मूसा की व्यवस्था का।
(मेरा अर्थ है कि यह न वर्तमान उद्धार की, न भविष्य के उद्धार की शर्त है।) "इसके स्थान पर मसीह ने एक और व्यवस्था स्थापित की है, अर्थात् विश्वास की व्यवस्था।
अब पूर्ण अर्थ में धार्मिकता वही पाता है जो विश्वास करता है, न कि हर वह जो करता है; अर्थात् वह धर्मी ठहराया जाता है, पवित्र किया जाता है और महिमान्वित किया जाता है।
"2. तो क्या हम व्यवस्था के लिए मर गए हैं?
"हम 'मसीह की देह के द्वारा व्यवस्था के लिए मर गए हैं' जो हमारे लिए दी गई; रोमियों 7:4; आदम की व्यवस्था के लिए भी और मूसा की व्यवस्था के लिए भी।
हम उसकी मृत्यु के द्वारा उससे पूर्णतः छुड़ाए गए हैं; वह व्यवस्था उसी के साथ समाप्त हो गई।
"3. तो फिर हम कैसे 'परमेश्वर की व्यवस्था से रहित नहीं, परन्तु मसीह की व्यवस्था के अधीन' हैं? 1 कुरिन्थियों 9:21।
"हम उस व्यवस्था से रहित हैं; पर इससे यह नहीं निकलता कि हम किसी भी व्यवस्था से रहित हैं; क्योंकि परमेश्वर ने उसके स्थान पर एक और व्यवस्था स्थापित की है, अर्थात् विश्वास की व्यवस्था; और हम सब परमेश्वर और मसीह के प्रति इसी व्यवस्था के अधीन हैं; हमारा सृजनहार और हमारा
छुड़ानेवाला, दोनों हमसे इसका पालन करने की माँग करते हैं।
प्रेम व्यवस्था की पूर्ति है।
"4. क्या प्रेम इस व्यवस्था की पूर्ति है?
"निःसन्देह है।
जिस व्यवस्था के अधीन हम अब हैं, वह सारी प्रेम से पूरी होती है : रोमियों 13:9, 10।
प्रेम के द्वारा कार्य करता हुआ या प्रेम से प्रेरित विश्वास ही वह सब है जिसकी परमेश्वर अब मनुष्य से माँग करता है।
उसने स्वर्गदूतों की सिद्धता के स्थान पर (खरेपन को नहीं, बल्कि) प्रेम को ठहराया है।
"5. 'प्रेम आज्ञा का लक्ष्य' कैसे है? 1 तीमुथियुस 1:5।
"यह परमेश्वर की हर आज्ञा का लक्ष्य है।
यह सम्पूर्ण मसीही
मसीही सिद्धता,
व्यवस्था-प्रणाली और उसके हर भाग का लक्ष्य-बिन्दु है।
नींव विश्वास है, जो हृदय को शुद्ध करता है; लक्ष्य प्रेम है, जो शुद्ध विवेक को बनाए रखता है।
"6. यह कौन-सा प्रेम है?
"प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय, मन, प्राण और शक्ति से प्रेम करना; और अपने पड़ोसी, हर मनुष्य, से अपने समान, अपने प्राण के समान प्रेम करना।
"7. इस प्रेम के फल या गुण क्या हैं?
"संत पौलुस हमें विस्तार से बताता है, प्रेम धीरजवन्त है।
यह परमेश्वर की सन्तानों की सब दुर्बलताओं को, और संसार की सन्तानों की सब दुष्टता को सहता है; और वह भी थोड़े समय के लिए नहीं, पर जब तक परमेश्वर चाहे।
सब बातों में यह परमेश्वर का हाथ देखता है और प्रसन्नता से उसके अधीन रहता है।
इस बीच यह कृपालु है।
सब में, और सब के बाद भी, यह सहता है, यह कोमल, मृदु, नम्र और दयालु है।
'प्रेम डाह नहीं करता;' यह हृदय से हर प्रकार और हर मात्रा की डाह को निकाल देता है; 'प्रेम अनुचित व्यवहार नहीं करता,' उग्र और हठीली रीति से नहीं, और न कोई उतावला या कठोर निर्णय सुनाता है : यह 'अशिष्ट व्यवहार नहीं करता;' असभ्य नहीं होता, अपने स्वभाव के विपरीत कार्य नहीं करता : 'अपना सुख नहीं चाहता' अर्थात् अपना आराम, आनन्द, सम्मान या लाभ नहीं ढूँढ़ता; 'झुँझलाता नहीं;' हृदय से सारा क्रोध निकाल देता है : 'बुरा नहीं सोचता;' सब ईर्ष्या, सन्देह और बुराई पर शीघ्र विश्वास कर लेने की प्रवृत्ति को दूर कर देता है : 'अधर्म से आनन्दित नहीं होता;' वरन् अपने कट्टर से कट्टर शत्रुओं के पाप या मूर्खता पर भी रोता है : 'परन्तु सत्य से आनन्दित होता है;' अर्थात् हर मनुष्य की पवित्रता और सुख में।
'प्रेम सब बातें सह लेता है,' किसी की बुराई नहीं करता; 'सब बातों की प्रतीति करता है,' जो दूसरे के चरित्र के हित में हों।
यह 'सब बातों की आशा रखता है,' जो उन दोषों को हल्का कर सके जिन्हें नकारा नहीं जा सकता; और यह 'सब बातों में धीरज धरता है,' जिन्हें परमेश्वर होने दे, या मनुष्य और दुष्टात्माएँ पहुँचाएँ।
यही 'मसीह की व्यवस्था, सिद्ध व्यवस्था, स्वतन्त्रता की व्यवस्था' है।
"और 'विश्वास की व्यवस्था' (अर्थात् प्रेम) तथा 'कर्मों की व्यवस्था' के बीच यह भेद न तो सूक्ष्म है न अनावश्यक।
यह स्पष्ट, सरल और किसी भी
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सामान्य समझ के लिए बोधगम्य है।
और यह उन लोगों में भी हज़ार सन्देहों और भयों को रोकने के लिए नितान्त आवश्यक है जो
'प्रेम में चलते' हैं।
"8. परन्तु क्या हम 'बहुत बातों में सब चूक नहीं जाते,' हाँ, हम में से सर्वोत्तम भी, इसी व्यवस्था के विरुद्ध?
"एक अर्थ में नहीं, जब तक हमारे सब स्वभाव, विचार, वचन और कार्य प्रेम से उत्पन्न होते हैं।
परन्तु दूसरे अर्थ में हम चूकते हैं, और जब तक देह में हैं कमोबेश चूकते रहेंगे।
क्योंकि न प्रेम और न 'उस पवित्र जन का अभिषेक' हमें अचूक बनाता है : इसलिए समझ की अपरिहार्य कमी के कारण हम बहुत बातों में भूल किए बिना नहीं रह सकते।
और ये भूलें प्रायः हमारे स्वभाव, वचनों और कार्यों में कुछ अनुचित उत्पन्न कर देती हैं।
किसी के चरित्र को गलत समझने से हम उससे उतना कम प्रेम कर सकते हैं जितने का वह वास्तव में योग्य है।
और उसी भूल से हम अनिवार्यतः उस व्यक्ति के विषय में ऐसा बोलने या करने की ओर प्रेरित हो जाते हैं जो पहले बताई गई बातों में से किसी न किसी में इस व्यवस्था के विपरीत है।
प्रायश्चित्त की आवश्यकता।
"9. क्या इस कारण से भी हमें मसीह की आवश्यकता नहीं?
"सबसे पवित्र मनुष्यों को भी अब तक मसीह की आवश्यकता है, अपने भविष्यद्वक्ता के रूप में, 'जगत की ज्योति' के रूप में।
क्योंकि वह उन्हें प्रकाश क्षण-क्षण ही देता है; जिस क्षण वह हट जाए, सब अन्धकार हो जाता है।
उन्हें अब भी अपने राजा के रूप में मसीह की आवश्यकता है; क्योंकि परमेश्वर उन्हें पवित्रता का कोई भण्डार नहीं देता।
पर यदि उन्हें हर क्षण नई आपूर्ति न मिले, तो अपवित्रता के सिवा कुछ न बचे।
उन्हें अब भी अपने याजक के रूप में मसीह की आवश्यकता है, कि वह उनकी पवित्र बातों के लिए प्रायश्चित्त करे।
सिद्ध पवित्रता भी परमेश्वर को केवल यीशु मसीह के द्वारा ग्रहणयोग्य है।
"10. तो क्या सर्वोत्तम मनुष्य भी उस मरते हुए शहीद का यह अंगीकार नहीं अपना सकते : 'मैं अपने आप में पाप, अन्धकार और नरक के सिवा कुछ नहीं हूँ; परन्तु तू मेरी ज्योति, मेरी पवित्रता, मेरा स्वर्ग है'?
मसीही सिद्धता,
"'ठीक ऐसे नहीं।
पर सर्वोत्तम मनुष्य कहते हैं, 'तू मेरी ज्योति, मेरी पवित्रता, मेरा स्वर्ग है।
तुझ से मेरे मेल के कारण मैं ज्योति, पवित्रता और सुख से भरा हूँ।
परन्तु यदि मैं अपने आप पर छोड़ दिया जाऊँ, तो मैं पाप, अन्धकार और नरक के सिवा कुछ न हूँगा।'
"परन्तु आगे बढ़ें : सर्वोत्तम मनुष्यों को अपने याजक, अपने प्रायश्चित्त, और पिता के पास अपने सहायक के रूप में मसीह की आवश्यकता है; केवल इसलिए नहीं कि उनकी हर आशीष का बना रहना उसकी मृत्यु और मध्यस्थता पर निर्भर है, बल्कि इसलिए भी कि वे प्रेम की व्यवस्था से कम पड़ जाते हैं।
क्योंकि हर जीवित मनुष्य ऐसा ही करता है।
तुम जो सारा प्रेम अनुभव करते हो, अपनी तुलना पहले के वर्णन से करो।
अपने आपको इस तराजू में तौलो, और देखो कि क्या तुम अनेक बातों में घटी में नहीं हो।
"11. परन्तु यदि यह सब मसीही सिद्धता के अनुकूल है, तो वह सिद्धता सब पाप से स्वतन्त्रता नहीं है; क्योंकि 'पाप व्यवस्था का उल्लंघन है'; और सिद्ध जन उसी व्यवस्था का उल्लंघन करते हैं जिसके अधीन वे हैं।
इसके अतिरिक्त, उन्हें मसीह के प्रायश्चित्त की आवश्यकता है; और वह पाप के सिवा किसी और बात का प्रायश्चित्त नहीं है।
तो क्या 'निष्पाप सिद्धता' शब्द उचित है?
"इस पर विवाद करना व्यर्थ है।
परन्तु ध्यान दो कि ये व्यक्ति किस अर्थ में मसीह के प्रायश्चित्त के आवश्यकतामन्द हैं।
उन्हें उसकी आवश्यकता इसलिए नहीं कि वह उन्हें फिर से परमेश्वर से मिलाए; क्योंकि वे मेल पा चुके हैं।
उन्हें उसकी आवश्यकता परमेश्वर की कृपा लौटाने के लिए नहीं, बल्कि उसे बनाए रखने के लिए है। वह उनके लिए नए सिरे से क्षमा नहीं दिलाता, बल्कि 'उनके लिए बिनती करने को सदा जीवित है;' और 'उसने एक ही भेंट के द्वारा उन्हें, जो पवित्र किए जाते हैं, सदा के लिए सिद्ध कर दिया है,' इब्रानियों 10:14।
"इस पर उचित विचार न करने के कारण कुछ लोग इनकार करते हैं कि उन्हें मसीह के प्रायश्चित्त की आवश्यकता है।
सचमुच, बहुत ही थोड़े; मुझे स्मरण नहीं कि इंग्लैंड में मैंने उनमें से पाँच भी पाए हों।
दोनों में से मैं सिद्धता को छोड़ देना पसन्द करूँगा।
परन्तु हमें इनमें से किसी एक को भी छोड़ने की आवश्यकता नहीं।
जिस सिद्धता को मैं मानता हूँ, 'सदा आनन्दित रहनेवाला प्रेम, निरन्तर प्रार्थना करना, और
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हर बात में धन्यवाद करना,' वह उसके भली-भाँति अनुकूल है; यदि कोई ऐसी सिद्धता मानता है जो उसके अनुकूल नहीं, तो उसे स्वयं देखना होगा।
"12. तो क्या मसीही सिद्धता में खरेपन से अधिक कुछ निहित है?
"नहीं, यदि उस शब्द से आपका अर्थ है वह प्रेम जो हृदय को भर दे और घमण्ड, क्रोध, लालसा और अपनी इच्छा को निकाल दे; सदा आनन्दित रहना, निरन्तर प्रार्थना करना, और हर बात में धन्यवाद करना।
परन्तु मुझे सन्देह है कि कम ही लोग खरेपन को इस अर्थ में प्रयोग करते हैं।
इसलिए मेरी समझ में पुराना शब्द ही सबसे उत्तम है।
'कोई व्यक्ति खरा हो सकता है और फिर भी उसमें उसके सब स्वाभाविक स्वभाव हों, घमण्ड, क्रोध, वासना, अपनी इच्छा।
परन्तु वह तब तक सिद्ध नहीं, जब तक उसका हृदय इन से और अपनी अन्य सब भ्रष्टताओं से शुद्ध न हो जाए।
"इस बात को थोड़ा और स्पष्ट करने के लिए : मैं बहुत-से ऐसे लोगों को जानता हूँ जो परमेश्वर से अपने सारे हृदय से प्रेम करते हैं।
वही उनकी एकमात्र अभिलाषा, उनका एकमात्र आनन्द है, और वे उसमें निरन्तर सुखी हैं।
वे अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करते हैं।
वे हर मनुष्य के सुख की, चाहे भला हो या बुरा, मित्र हो या शत्रु, उतनी ही सच्ची, उत्कट और निरन्तर इच्छा अनुभव करते हैं जितनी अपने सुख की।
वे सदा आनन्दित रहते हैं, निरन्तर प्रार्थना करते हैं, और हर बात में धन्यवाद करते हैं।
उनकी आत्माएँ पवित्र आनन्द, प्रार्थना और स्तुति में निरन्तर परमेश्वर की ओर उमड़ती रहती हैं।
यह एक तथ्य है; और यह स्पष्ट, खरा, पवित्रशास्त्र-सम्मत अनुभव है।
"परन्तु ये आत्माएँ भी एक जर्जर देह में रहती हैं, और उससे इतनी दबी हैं कि वे सदा अपनी इच्छा के अनुसार, ठीक-ठीक सोचने, बोलने और कार्य करने में अपने को नहीं लगा सकतीं।
उत्तम शारीरिक अंगों के अभाव में उन्हें कभी-कभी गलत सोचना, बोलना या करना पड़ता है; प्रेम की कमी से नहीं, बल्कि ज्ञान की कमी से।
और जब तक ऐसा है, उस कमी और उसके परिणामों के होते हुए भी, वे प्रेम की व्यवस्था को पूरा करते हैं।
"फिर भी, चूँकि इस स्थिति में भी सिद्ध व्यवस्था के साथ पूर्ण अनुरूपता नहीं है, इसलिए अत्यन्त सिद्ध जन भी इसी कारण प्रायश्चित्त के लहू के आवश्यकतामन्द हैं, और उचित रीति से अपने
मसीही सिद्धता,
लिए भी और अपने भाइयों के लिए भी कह सकते हैं, 'हमारे अपराध क्षमा कर।'
"13. परन्तु यदि मसीह ने उस व्यवस्था का अन्त कर दिया है, तो उसके उल्लंघन के लिए किसी प्रायश्चित्त की क्या आवश्यकता?
"ध्यान दो कि उसने किस अर्थ में उसका अन्त किया है, और कठिनाई मिट जाएगी।
यदि उसकी मृत्यु की स्थायी योग्यता और हमारे लिए उसकी निरन्तर मध्यस्थता न होती, तो व्यवस्था अब भी हमें दोषी ठहराती।
इसलिए इसके हर उल्लंघन के लिए हमें इनकी अब भी आवश्यकता है।
पवित्रता प्रलोभन को बाहर नहीं करती।
"14. परन्तु क्या पाप से बचाया हुआ व्यक्ति परीक्षा में पड़ सकता है?
"हाँ; क्योंकि मसीह की परीक्षा हुई थी।
"15. परन्तु जिसे आप प्रलोभन कहते हैं, उसे मैं अपने हृदय की भ्रष्टता कहता हूँ।
और आप एक को दूसरे से कैसे अलग करेंगे?
"कुछ स्थितियों में आत्मा की प्रत्यक्ष गवाही के बिना अन्तर करना असम्भव है।
परन्तु सामान्यतः इस प्रकार अन्तर किया जा सकता है : — 'कोई मेरी प्रशंसा करता है।
यह घमण्ड का प्रलोभन है।
परन्तु तुरन्त मेरी आत्मा परमेश्वर के सम्मुख दीन हो जाती है।
और मैं कोई घमण्ड अनुभव नहीं करता; और इसके विषय में मैं उतना ही निश्चित हूँ जितना इस बात के विषय में कि घमण्ड दीनता नहीं है।
" कोई मनुष्य मुझे मारता है।
यह क्रोध का प्रलोभन है।
परन्तु मेरा हृदय प्रेम से उमड़ पड़ता है।
और मैं कोई क्रोध अनुभव नहीं करता; और इसके विषय में मैं उतना ही निश्चित हो सकता हूँ जितना इस बात के विषय में कि प्रेम और क्रोध एक नहीं हैं।
" कोई स्त्री मुझे लुभाती है।
यह वासना का प्रलोभन है।
परन्तु एक क्षण में मैं पीछे हट जाता हूँ।
और मैं कोई इच्छा या वासना अनुभव नहीं करता; और इसके विषय में मैं उतना ही निश्चित हो सकता हूँ जितना इस बात के विषय में कि मेरा हाथ ठण्डा है या गर्म।
"यही बात तब है जब मैं किसी वर्तमान वस्तु से परखा जाता हूँ; और यही तब भी है जब, उसके अनुपस्थित होने पर, शैतान मेरे मन में किसी प्रशंसा, किसी चोट, या किसी स्त्री को फिर से
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ले आता है।
उसी क्षण आत्मा प्रलोभन को ठुकरा देती है, और शुद्ध प्रेम से भरी रहती है।
"और भेद तब और भी स्पष्ट हो जाता है जब मैं अपनी वर्तमान दशा की तुलना अपनी पिछली दशा से करता हूँ, जिसमें मैं प्रलोभन और भ्रष्टता, दोनों को अनुभव करता था।
हम कैसे जान सकते हैं कि हम पवित्र किए गए हैं।
"16. परन्तु आप कैसे जानते हैं कि आप पवित्र किए गए हैं, अपनी जन्मजात भ्रष्टता से बचाए गए हैं?
"मैं इसे उसी प्रकार जान सकता हूँ जैसे मैं जानता हूँ कि मैं धर्मी ठहराया गया हूँ।
'इसी से हम जानते हैं कि हम परमेश्वर के हैं,' दोनों अर्थों में, 'उस आत्मा के द्वारा जो उसने हमें दिया है।'
"हम इसे आत्मा की गवाही और आत्मा के फल से जानते हैं।
और पहले, गवाही से।
जैसे जब हम धर्मी ठहराए गए तब आत्मा ने हमारी आत्मा के साथ गवाही दी कि हमारे पाप क्षमा हुए; वैसे ही जब हम पवित्र किए गए तब उसने गवाही दी कि वे दूर कर दिए गए।
सच है कि पवित्रीकरण की गवाही आरम्भ में सदा स्पष्ट नहीं होती (जैसे धर्मी ठहराए जाने की भी नहीं); और न बाद में सदा एक-सी रहती है, पर धर्मी ठहराए जाने की गवाही के समान कभी प्रबल और कभी धीमी होती है।
हाँ, और कभी-कभी वह हटा ली जाती है।
तथापि सामान्यतः आत्मा की बाद की गवाही उतनी ही स्पष्ट और स्थिर होती है जितनी पहली।
"17. परन्तु इसकी क्या आवश्यकता, जब पवित्रीकरण एक वास्तविक परिवर्तन है, धर्मी ठहराए जाने के समान केवल सापेक्ष नहीं?
" परन्तु क्या नया जन्म केवल सापेक्ष परिवर्तन है?
क्या यह वास्तविक परिवर्तन नहीं?
इसलिए यदि हमें अपने पवित्रीकरण की गवाही की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह वास्तविक परिवर्तन है, तो उसी कारण हमें इस बात की भी गवाही की आवश्यकता न होनी चाहिए कि हम परमेश्वर से जन्मे हैं, या परमेश्वर की सन्तान हैं।
"18. परन्तु क्या पवित्रीकरण अपनी ही ज्योति से नहीं चमकता?
" और क्या नया जन्म भी नहीं?
कभी-कभी चमकता है,
मसीही सिद्धता,
और पवित्रीकरण भी; अन्य समयों में नहीं चमकता।
परीक्षा की घड़ी में शैतान परमेश्वर के कार्य को धुँधला कर देता है, और अनेक सन्देह और तर्क डालता है, विशेषकर उनमें जिनकी समझ या तो बहुत दुर्बल है या बहुत प्रबल।
ऐसे समयों में उस गवाही की नितान्त आवश्यकता होती है, जिसके बिना पवित्रीकरण का कार्य न केवल पहचाना न जा सकेगा, बल्कि और टिक भी न सकेगा।
यदि यह न हो, तो आत्मा तब परमेश्वर के प्रेम में बनी नहीं रह सकती; सदा आनन्दित रहना और हर बात में धन्यवाद करना तो दूर की बात है।
इसलिए इन परिस्थितियों में इस बात की प्रत्यक्ष गवाही कि हम पवित्र किए गए हैं, अत्यधिक आवश्यक है।
"परन्तु मेरे पास कोई गवाही नहीं कि मैं पाप से बचाया गया हूँ।
और फिर भी मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं।
बहुत अच्छा; जब तक आपको सन्देह नहीं, यही पर्याप्त है; जब होगा, तब आपको उस गवाही की आवश्यकता होगी।
पवित्रीकरण के प्रति आत्मा की गवाही का पवित्रशास्त्रीय
प्रमाण।
"19. परन्तु कौन-सा पवित्रशास्त्र ऐसी किसी बात का उल्लेख करता है, या उसकी आशा रखने का कोई कारण देता है?
"वही वचन, 'हमने संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें जो परमेश्वर ने हमें सेंतमेंत दी हैं,' 1 कुरिन्थियों
2:12।
"निश्चय ही पवित्रीकरण उन 'बातों' में से एक है 'जो परमेश्वर ने हमें सेंतमेंत दी हैं।'
और इसे अपवाद ठहराने का कोई सम्भव कारण नहीं दिया जा सकता, जब प्रेरित कहता है, 'हमने आत्मा पाया है' इसी उद्देश्य से, 'कि हम उन बातों को जानें जो इस प्रकार हमें सेंतमेंत दी गई हैं।'
"क्या उस प्रसिद्ध वचन में भी यही अर्थ निहित नहीं, 'आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं?' रोमियों 8:16।
क्या वह यह गवाही केवल उन्हीं को देता है जो निम्नतम अर्थ में परमेश्वर की सन्तान हैं?
नहीं, वरन् उन्हें भी जो उच्चतम अर्थ में ऐसे हैं।
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
और क्या वह यह गवाही नहीं देता कि वे उच्चतम अर्थ में ऐसे हैं? इस पर सन्देह करने का हमारे पास क्या कारण है?
"यदि कोई मनुष्य कहे (जैसा कि वास्तव में अनेक कहते हैं) कि यह गवाही केवल मसीहियों के उच्चतम वर्ग की है, तो?
क्या आप उत्तर न देंगे, 'प्रेरित कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाता; इसलिए निस्सन्देह यह परमेश्वर की सब सन्तानों की है'?
और क्या वही उत्तर तब भी लागू न होगा, यदि कोई कहे कि यह केवल निम्नतम वर्ग की है?
" 1 यूहन्ना 5:19 पर भी विचार करो : 'हम जानते हैं कि हम परमेश्वर के हैं।'
कैसे?
'उस आत्मा के द्वारा जो उसने हमें दिया है।'
और, 'इसी से हम जानते हैं कि वह हम में बना रहता है।'
और पवित्रशास्त्र या तर्क से हमारे पास क्या आधार है कि यहाँ आत्मा के फल को तो माना जाए पर गवाही को बाहर रखा जाए?
इसलिए इसके द्वारा भी 'हम जानते हैं कि हम परमेश्वर के हैं,' और किस अर्थ में हैं; चाहे हम बालक हों, जवान हों, या पिता, हम एक ही रीति से जानते हैं।
"मैं यह नहीं कहता कि सब जवानों, या पिताओं, के पास भी यह गवाही हर क्षण रहती है।
इस प्रत्यक्ष गवाही में कि वे इस प्रकार परमेश्वर से जन्मे हैं, अन्तराल हो सकते हैं; परन्तु मसीह में बढ़ने के साथ ये अन्तराल कम और छोटे होते जाते हैं; और कुछ के पास अपने धर्मी ठहराए जाने और पवित्रीकरण, दोनों की गवाही बिना किसी अन्तराल के रहती है; जो मेरी समझ में और अधिक लोगों को मिल सकती थी, यदि वे परमेश्वर के साथ दीनता और निकटता से चलते।
"20. क्या उनमें से कुछ के पास आत्मा की ओर से यह गवाही नहीं हो सकती कि वे अन्ततः परमेश्वर से गिर न जाएँगे?
"हो सकती है।
और यह दृढ़ विश्वास कि न जीवन न मृत्यु उन्हें उससे अलग करेगी, हानिकारक होने से कोसों दूर, कुछ परिस्थितियों में अत्यन्त उपयोगी हो सकता है।
इसलिए हमें इन्हें किसी प्रकार दुःखी नहीं करना चाहिए, वरन् उत्साह से प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे 'अपने आरम्भिक भरोसे को अन्त तक दृढ़ता से थामे रहें।'
"21. परन्तु क्या किसी के पास आत्मा की ओर से यह गवाही है कि वे कभी पाप न करेंगे?
मसीही सिद्धता,
"हम नहीं जानते कि परमेश्वर किन विशेष व्यक्तियों को क्या प्रदान करे; परन्तु हमें पवित्रशास्त्र में कोई ऐसी सामान्य दशा नहीं मिलती जिससे मनुष्य पाप की ओर फिर न सके।
यदि कोई ऐसी दशा होती जिसमें यह असम्भव होता, तो वह उनकी होती जो पवित्र किए गए हैं, जो 'मसीह में पिता हैं, जो सदा आनन्दित रहते हैं, निरन्तर प्रार्थना करते हैं, और हर बात में धन्यवाद करते हैं'; परन्तु इनके लिए भी पीछे हटना असम्भव नहीं।
जो पवित्र किए गए हैं वे भी गिर सकते और नष्ट हो सकते हैं : इब्रानियों 10:29।
मसीह में पिताओं को भी इस चेतावनी की आवश्यकता है : 'संसार से प्रेम मत रखो,' 1 यूहन्ना 2:15। जो 'आनन्दित रहते, प्रार्थना करते' और 'निरन्तर धन्यवाद करते' हैं, वे भी फिर भी
'आत्मा को बुझा' सकते हैं, 1 थिस्सलुनीकियों 5:16 आदि।
यहाँ तक कि जिन पर 'छुटकारे के दिन के लिए मुहर लगाई गई है,' वे भी 'परमेश्वर के पवित्र आत्मा को दुःखी' कर सकते हैं, इफिसियों 4:30।
"इसलिए, यद्यपि परमेश्वर कुछ विशेष व्यक्तियों को ऐसी गवाही दे सकता है, फिर भी सामान्य मसीहियों को इसकी आशा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसी आशा के लिए कोई पवित्रशास्त्र-आधार नहीं है।
पवित्रीकरण में आत्मा का फल।
"22. किस 'आत्मा के फल' से हम 'जान सकते हैं कि हम परमेश्वर के हैं,' उच्चतम अर्थ में भी?
"प्रेम, आनन्द, शान्ति से, जो सदा बने रहें; अटल धीरज, सहनशीलता, समर्पण से; कोमलता से, जो सब उकसावों पर विजयी हो; भलाई, नम्रता, मिठास, और आत्मा की कोमलता से; विश्वासयोग्यता, सरलता, और ईश्वरीय खरेपन से; दीनता, शान्ति, और आत्मा की समता से; संयम से, केवल खान-पान और नींद में ही नहीं, वरन् सब स्वाभाविक और आत्मिक बातों में।
"23. परन्तु इसमें बड़ी बात क्या है?
क्या जब हम धर्मी ठहराए जाते हैं तब यह सब हमारे पास नहीं होता?
"क्या! परमेश्वर की इच्छा के प्रति पूर्ण समर्पण, बिना अपनी इच्छा की किसी मिलावट के? कोमलता, जिसमें क्रोध की कोई छाया न हो, उकसाए जाने के क्षण में भी? परमेश्वर के प्रति ऐसा प्रेम, जिसमें
जॉन वेस्ली द्वारा सिखाई गई
सृष्टि के प्रति थोड़ा भी प्रेम न हो, सिवाय परमेश्वर में और उसके लिए, और जो सब घमण्ड को निकाल दे? मनुष्य के प्रति ऐसा प्रेम, जो सब डाह, सब ईर्ष्या और उतावले निर्णय को निकाल दे? दीनता, जो सारी आत्मा को अटूट शान्ति में रखे? और सब बातों में संयम?
यदि आपकी इच्छा हो तो इनकार कर दीजिए कि कोई कभी इस तक पहुँचा; परन्तु यह न कहिए कि जितने धर्मी ठहराए गए हैं, सब पहुँचते हैं।
धर्मी ठहराए गए लोग क्रोध, घमण्ड और अपनी इच्छा को अनुभव करते हैं।
"24. परन्तु कुछ जो नए-नए धर्मी ठहराए गए हैं, उन्हें अनुभव करते हैं।
तब हम उनसे क्या कहें?
"यदि वे सचमुच अनुभव करते हैं, तो मैं कहूँगा कि वे पवित्र किए गए हैं; उसी क्षण पाप से बचाए गए हैं; और परमेश्वर ने जो दिया है उसे उन्हें कभी खोने या फिर पाप अनुभव करने की आवश्यकता नहीं।
"परन्तु निश्चय ही यह एक अपवाद है।
अधिकांश धर्मी ठहराए गए लोगों का हाल भिन्न है : वे अपने भीतर कमोबेश घमण्ड, क्रोध, अपनी इच्छा, और पीछे हटने की ओर झुका हुआ हृदय अनुभव करते हैं।
और जब तक वे धीरे-धीरे इन्हें मार न डालें, वे प्रेम में पूरी रीति से नए नहीं बनाए जाते।
"25. परन्तु क्या यह उन सब की दशा नहीं है जो धर्मी ठहराए गए हैं?
क्या वे धीरे-धीरे पाप के लिए मरते और अनुग्रह में बढ़ते नहीं जाते, जब तक कि मृत्यु के समय, या शायद उससे कुछ पहले, परमेश्वर उन्हें प्रेम में सिद्ध नहीं कर देता?
"मेरा विश्वास है कि अधिकांश की दशा यही है, परन्तु सब की नहीं।
परमेश्वर सामान्यतः मनुष्यों को ज्योति पाने, अनुग्रह में बढ़ने, और अपनी इच्छा को पूरा करने और उसके लिए दुःख उठाने के लिए पर्याप्त समय देता है, इससे पहले कि वे धर्मी ठहराए जाएँ या पवित्र किए जाएँ; परन्तु वह सदा इसी पर टिका नहीं रहता; कभी-कभी वह 'अपने काम को संक्षिप्त कर देता है'; वह कई वर्षों का काम कुछ सप्ताहों में कर देता है; शायद एक सप्ताह में, एक दिन में, एक घण्टे में।
वह उन्हें भी धर्मी ठहराता या पवित्र करता है जिन्होंने कुछ किया या सहा नहीं, और जिन्हें ज्योति या अनुग्रह में धीरे-धीरे बढ़ने का समय भी नहीं मिला।
और 'क्या वह अपनी वस्तु के साथ जो चाहे वह नहीं कर सकता?
क्या तेरी आँख इसलिए बुरी है कि वह भला है?'
"इसलिए बार-बार यह कहने की आवश्यकता नहीं, और
मसीही सिद्धता,
पवित्रशास्त्र के चालीस पदों से यह सिद्ध करने की भी आवश्यकता नहीं कि अधिकांश लोग अन्त में प्रेम में सिद्ध किए जाते हैं, कि आत्मा में परमेश्वर का एक क्रमिक कार्य होता है, या कि सामान्यतः पाप के नाश होने में लम्बा समय, यहाँ तक कि कई वर्ष लग जाते हैं।
यह सब हम जानते हैं; परन्तु यह भी जानते हैं कि परमेश्वर, मनुष्य की भली सहमति से, जिस मात्रा में चाहे 'अपने काम को संक्षिप्त कर सकता है,' और कई वर्षों का सामान्य कार्य एक क्षण में कर सकता है।
वह बहुत-से उदाहरणों में ऐसा करता है; फिर भी उस क्षण के पहले और बाद में भी एक क्रमिक कार्य होता है; इसलिए कोई कह सकता है कि यह कार्य क्रमिक है, और दूसरा कह सकता है कि यह तात्कालिक है, और इसमें किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं।
क्या सन्त पौलुस का 'आत्मा से मुहरबन्द किए जाने' से कुछ और अर्थ है, उसके सिवा कि 'प्रेम में नया किया जाना'?
"शायद एक स्थान (2 कुरिन्थियों 1:22) में उसका अर्थ इतना नहीं है; परन्तु दूसरे स्थान (इफिसियों 1:13) में वह फल और गवाही दोनों को सम्मिलित करता प्रतीत होता है; और वह भी उस उच्चतर मात्रा में जितनी का अनुभव हमें तब भी नहीं होता जब हम पहले-पहल 'प्रेम में नए किए जाते' हैं;
परमेश्वर हमें 'प्रतिज्ञा के आत्मा से मुहरबन्द करता है,' हमें 'आशा का पूर्ण निश्चय' देकर; परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाओं को पाने का ऐसा भरोसा जो सन्देह की सम्भावना को दूर कर देता है; उस पवित्र आत्मा के साथ, जो सम्पूर्ण पवित्रता के द्वारा परमेश्वर का पूरा स्वरूप हमारे हृदयों पर अंकित करता है।
"27. परन्तु जो इस प्रकार मुहरबन्द किए गए हैं, वे 'परमेश्वर के पवित्र आत्मा को शोकित' कैसे कर सकते हैं?
"सन्त पौलुस आपको बहुत विशेष रूप से बताता है: (1.) ऐसी बातचीत के द्वारा जो लाभदायक नहीं, जो उन्नति के काम की नहीं, और सुननेवालों पर अनुग्रह पहुँचाने के योग्य नहीं।
(2.) कड़वाहट या दयालुता की कमी में फिर गिर जाने के द्वारा।
(3.) क्रोध, स्थायी अप्रसन्नता, या कोमल-हृदयता की कमी के द्वारा।
(4.) रोष के द्वारा, चाहे वह कितनी ही जल्दी बीत जाए; एक-दूसरे को तुरन्त क्षमा न करने के द्वारा।
(5.) कोलाहल या चिल्लाहट के द्वारा, ऊँचे, कठोर, रूखे ढंग से बोलने के द्वारा।
(6.) बुरा बोलने, कानाफूसी करने, चुगली करने के द्वारा; किसी अनुपस्थित व्यक्ति का दोष बिना आवश्यकता के चर्चा में लाने के द्वारा, चाहे कितने ही मृदु ढंग से क्यों न हो।
जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।
लंदन में जो पवित्र किए गए थे, उन्हें वह कैसे देखता था।
"28. लंदन के उन लोगों के विषय में आप क्या सोचते हैं, जो हाल ही में 'प्रेम में नए किए गए' प्रतीत होते हैं?
"उनमें से अधिकांश के अनुभव में कुछ बहुत विशेष बात है।
कोई यह अपेक्षा करेगा कि विश्वासी पहले प्रेम से भरे और उसके द्वारा पाप से खाली हो; जबकि ये पहले पाप से खाली किए गए, और तब प्रेम से भरे गए।
शायद परमेश्वर को यही रीति भायी कि वह अपने कार्य को अधिक स्पष्ट और अकाट्य बनाए; और उसे उस उमड़ते हुए प्रेम से अधिक साफ़ भिन्न दिखाए जो धर्मी ठहराए जाने की दशा में भी प्रायः अनुभव होता है।
"यह उस महान प्रतिज्ञा के भी अत्यन्त अनुकूल प्रतीत होता है:
'मैं तुम्हें तुम्हारी सब अशुद्धता से शुद्ध करूँगा; मैं तुम्हें नया हृदय दूँगा, और तुम्हारे भीतर नया आत्मा उत्पन्न करूँगा,' यहेजकेल 36:25, 26।
"परन्तु मैं उन सब के विषय में एक-सा नहीं सोचता; उनमें से कुछ और दूसरों के बीच बड़ा अन्तर है।
मैं समझता हूँ कि जिनसे मैंने बात की है उनमें से अधिकांश में बहुत विश्वास, प्रेम, आनन्द और शान्ति है।
मेरा विश्वास है कि इनमें से कुछ प्रेम में नए किए गए हैं, और उसकी सीधी गवाही रखते हैं; और वे अपने सब शब्दों और कामों में ऊपर वर्णित फल प्रकट करते हैं।
अब, कोई मनुष्य इसे जो चाहे कहे, मैं इसी को सिद्धता कहता हूँ।
'परन्तु कुछ ऐसे हैं जिनमें बहुत प्रेम, शान्ति और आनन्द है, फिर भी उनके पास सीधी गवाही नहीं है; और कुछ दूसरे जो समझते हैं कि उनके पास है, फिर भी स्पष्ट रूप से फल में घटी रखते हैं।
कितने, यह मैं नहीं कहूँगा; शायद दस में से एक; शायद अधिक या कम।
परन्तु कुछ निर्विवाद रूप से सहनशीलता, मसीही समर्पण में घटी रखते हैं।
वे जो कुछ घटता है उसमें परमेश्वर का हाथ नहीं देखते और उसे आनन्द से स्वीकार नहीं करते।
वे हर बात में धन्यवाद नहीं करते, और सदा आनन्दित नहीं रहते।
वे सुखी नहीं हैं, कम से कम सदा सुखी नहीं; क्योंकि कभी-कभी वे शिकायत करते हैं।
वे कहते हैं कि यह या वह कठिन है!
मसीही सिद्धता
"कुछ कोमलता में घटी रखते हैं।
वे दूसरा गाल फेरने के बजाय बुराई का सामना करते हैं।
वे निन्दा को कोमलता से ग्रहण नहीं करते; यहाँ तक कि ताड़ना को भी नहीं।
वरन् वे विरोध को बिना रोष के, कम से कम रोष के आभास के बिना, सह नहीं सकते।
यदि उन्हें ताड़ना दी जाए या उनका विरोध किया जाए, चाहे नम्रता से ही, तो वे उसे भली रीति से नहीं लेते; वे पहले से अधिक दूरी और संकोच के साथ व्यवहार करते हैं।
यदि उन्हें कठोरता से ताड़ना दी जाए या उनका विरोध किया जाए, तो वे कठोरता से उत्तर देते हैं; ऊँचे स्वर में, या क्रोधित लहजे में, या तीखे और चिड़चिड़े ढंग से।
जब वे दूसरों को ताड़ना देते हैं तो तीखे या रूखे ढंग से बोलते हैं; और अपने से छोटों के साथ रूखा व्यवहार करते हैं।
"कुछ भलाई में घटी रखते हैं। वे सब समयों में अपने मन में, अपने शब्दों में, अपनी दृष्टि और मुद्रा में, अपने पूरे आचरण की रीति में दयालु, सौम्य, मधुर, प्रिय, कोमल और प्रेमी नहीं होते; और वह भी सब के प्रति, ऊँचे और नीचे, धनी और निर्धन, बिना पक्षपात के; विशेषकर उनके प्रति जो भटके हुए हैं, विरोधियों के प्रति, और अपने घराने के लोगों के प्रति।
वे इसकी लालसा नहीं रखते, न इसका अध्ययन या प्रयत्न करते हैं कि हर उपाय से अपने आस-पास के सब लोगों को सुखी बनाएँ।
वे उन्हें व्याकुल देख सकते हैं और चिन्तित नहीं होते; शायद वे ही उन्हें व्याकुल करते हैं; और फिर मुँह पोंछकर कहते हैं, 'अरे, वे इसी के योग्य हैं; यह उन्हीं का दोष है।'
"कुछ विश्वासयोग्यता में घटी रखते हैं, अर्थात् सत्य के प्रति सूक्ष्म आदर, सरलता और ईश्वरीय निष्कपटता में।
उनका प्रेम मुश्किल से बिना कपट के होता है; उनके मुँह में छल जैसा कुछ पाया जाता है।
रूखेपन से बचने के लिए वे दूसरी अति की ओर झुक जाते हैं।
वे अत्यधिक चिकने-चुपड़े होते हैं, इतने कि चापलूसी, या जो वे नहीं मानते उसे मानने का दिखावा करने से मुश्किल से बच पाते हैं।
"कुछ नम्रता, आत्मा की शान्ति, संयम और स्वभाव की समता में घटी रखते हैं।
वे कभी ऊपर, कभी नीचे होते हैं; कभी उत्साहित, कभी उदास; उनका मन भली-भाँति सन्तुलित नहीं है।
उनकी भावनाएँ या तो उचित अनुपात में नहीं हैं; एक अधिक है, दूसरी कम; या वे उचित रीति से
जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।
मिली-जुली और संतुलित नहीं हैं कि एक-दूसरे को सन्तुलित कर सकें।
इसलिए प्रायः बेसुरापन होता है।
उनका प्राण सुर से बाहर है, और सच्चा सामंजस्य नहीं बना सकता।
"कुछ संयम में घटी रखते हैं।
वे उस प्रकार और मात्रा का भोजन स्थिरता से नहीं लेते जिसके विषय में वे जानते हैं, या जान सकते हैं, कि वह देह के स्वास्थ्य, बल और शक्ति के लिए सबसे अधिक सहायक होगा; या वे नींद में संयमी नहीं हैं; वे उस बात पर कठोरता से नहीं टिकते जो देह और मन दोनों के लिए सर्वोत्तम है; नहीं तो वे नित्य जल्दी सोते और जल्दी उठते, और निश्चित समय पर; या वे देर से रात्रि-भोजन करते हैं, जो न देह के लिए अच्छा है न आत्मा के लिए; या वे न उपवास करते हैं, न संयम; या वे (जो सब असंयम के ही प्रकार हैं) उस प्रचार, पठन या बातचीत को, जो उन्हें क्षणिक आनन्द और सान्त्वना देती है, उससे अधिक पसन्द करते हैं जो ईश्वरीय शोक, या धार्मिकता की शिक्षा लाती है।
ऐसा आनन्द पवित्र किया हुआ नहीं है; वह हृदय के क्रूसित किए जाने की ओर नहीं ले जाता, और उसमें समाप्त नहीं होता।
ऐसा विश्वास परमेश्वर में केन्द्रित नहीं होता, बल्कि स्वयं में।
"यहाँ तक सब स्पष्ट है।
मैं मानता हूँ कि आपके पास विश्वास, प्रेम, आनन्द और शान्ति है।
फिर भी आप, जो विशेष रूप से इससे सम्बन्धित हैं, अपने-अपने लिए जानते हैं कि आप ऊपर बताई गई बातों में घटी रखते हैं।
आप या तो सहनशीलता, कोमलता या भलाई में घटी रखते हैं; या विश्वासयोग्यता, नम्रता या संयम में।
तो फिर आइए, दोनों ओर से शब्दों पर झगड़ा न करें।
वस्तु के विषय में हम स्पष्ट रूप से सहमत हैं।
"आपके पास वह नहीं है जिसे मैं सिद्धता कहता हूँ; यदि दूसरे उसे ऐसा कहें, तो कह सकते हैं।
फिर भी, जो आपके पास है उसे दृढ़ता से थामे रहें, और जो नहीं है उसके लिए गम्भीरता से प्रार्थना करें।
जो प्रेम में सिद्ध हैं वे अनुग्रह में बढ़ सकते हैं या
अनुग्रह से गिर सकते हैं।
"29. क्या जो सिद्ध हैं वे अनुग्रह में बढ़ सकते हैं?
"निस्सन्देह वे बढ़ सकते हैं; और केवल जब तक वे देह में हैं तभी नहीं, वरन् अनन्तकाल तक।
मसीही सिद्धता
"30. क्या वे उससे गिर सकते हैं?
"मुझे पूरा निश्चय है कि वे गिर सकते हैं; वास्तविक घटनाएँ इसे विवाद से परे कर देती हैं।
पहले हम सोचते थे कि पाप से बचाया हुआ व्यक्ति गिर नहीं सकता; अब हम इसके विपरीत जानते हैं।
हम उन लोगों के उदाहरणों से घिरे हैं जिन्होंने हाल ही में वह सब अनुभव किया जिसे मैं सिद्धता कहता हूँ।
उनके पास आत्मा का फल भी था और गवाही भी; परन्तु अब उन्होंने दोनों खो दिए हैं।
न ही कोई इस दशा की प्रकृति में निहित किसी बात के बल पर स्थिर रहता है।
पवित्रता की ऐसी कोई ऊँचाई या सामर्थ्य नहीं जिससे गिरना असम्भव हो।
यदि कोई ऐसा है जो गिर नहीं सकता, तो यह परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर निर्भर है।
"31. क्या जो इस दशा से गिर जाते हैं वे इसे फिर पा सकते हैं?
"क्यों नहीं? इसके भी हमारे पास बहुत-से उदाहरण हैं। वरन् यह बहुत सामान्य बात है कि लोग इसमें स्थिर होने से पहले इसे एक से अधिक बार खो देते हैं।
"इसलिए पाप से उद्धार पाए हुओं को ठोकर के हर अवसर से बचाने के लिए मैं ये सलाहें देता हूँ।
परन्तु पहले मैं इस कार्य के विषय में स्पष्ट बोलूँगा।
"मैं इस हाल के कार्य को परमेश्वर की ओर से मानता हूँ; सम्भवतः इस समय पृथ्वी पर सबसे महान।
फिर भी, अन्य सबकी तरह, इसमें भी मानवीय दुर्बलता बहुत मिली हुई है।
परन्तु ये दुर्बलताएँ उससे कहीं कम हैं जितनी अपेक्षा की जा सकती थी; और धार्मिकता से प्रेम रखनेवाले और उसके पीछे चलनेवाले सब को इन्हें आनन्द से सह लेना चाहिए था।
कि कुछ दुर्बल, उतावले स्वभाव के लोग रहे हैं, यह स्वयं इस कार्य की निन्दा नहीं है, और कठोर पवित्रता के आदर्श बने हुए संयमी लोगों की एक बड़ी संख्या पर दोष लगाने का कोई उचित आधार नहीं।
फिर भी (जैसा होना चाहिए था उससे ठीक उलटा) विरोध बड़ा है; सहायक थोड़े हैं।
इसके द्वारा बहुत-से लोग दूसरों के झूठे उत्साह के कारण विश्वास और पवित्रता की खोज करने से रुक जाते हैं; और कुछ जिन्होंने आरम्भ में अच्छी दौड़ आरम्भ की थी, मार्ग से हटा दिए गए हैं।
जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।
पवित्र किए गए लोगों के लिए सलाह।
"32. आप उन्हें पहली सलाह* क्या देंगे?
"घमण्ड के विरुद्ध लगातार जागते और प्रार्थना करते रहो।
यदि परमेश्वर ने उसे निकाल दिया है, तो देखो कि वह फिर भीतर न आए: वह लालसा के समान ही खतरनाक है।
और तुम अनजाने में उसमें फिर फिसल सकते हो; विशेषकर यदि तुम समझते हो कि उसका कोई खतरा नहीं।
'नहीं, पर मैं जो कुछ मेरे पास है वह सब परमेश्वर का मानता हूँ।'
तुम ऐसा मान सकते हो, फिर भी घमण्डी हो सकते हो।
क्योंकि घमण्ड केवल यही नहीं कि हम अपने पास की किसी वस्तु का श्रेय अपने को दें, परन्तु यह भी कि हम यह समझें कि हमारे पास वह है जो वास्तव में नहीं है।
उदाहरण के लिए, श्री L ने अपने पास की सारी ज्योति का श्रेय परमेश्वर को दिया, और इस हद तक वह नम्र था; परन्तु फिर उसने समझा कि उसके पास जीवित किसी भी मनुष्य से अधिक ज्योति है; और यह प्रत्यक्ष घमण्ड था।
इसी प्रकार तुम अपने पास का सारा ज्ञान परमेश्वर को श्रेय देते हो; और इस बात में तुम नम्र हो।
परन्तु यदि तुम समझते हो कि तुम्हारे पास वास्तव में जितना है उससे अधिक है; या यदि तुम समझते हो कि तुम्हें परमेश्वर से ऐसी शिक्षा मिली है कि अब मनुष्य की शिक्षा की आवश्यकता नहीं; तो घमण्ड द्वार पर है।
हाँ, तुम्हें न केवल श्री मॉर्गन से, एक-दूसरे से, श्री मैक्सफ़ील्ड या मुझसे, परन्तु लंदन के सबसे दुर्बल प्रचारक से भी, वरन् सब मनुष्यों से सीखने की आवश्यकता है।
क्योंकि परमेश्वर जिसके द्वारा चाहता है उसके द्वारा भेजता है।
"इसलिए जो कोई तुम्हें सलाह दे या ताड़ना दे, उससे यह न कहो, 'तुम अन्धे हो; तुम मुझे सिखा नहीं सकते।'
यह न कहो, 'यह तुम्हारी बुद्धि है, तुम्हारा शारीरिक तर्क है;' परन्तु बात को परमेश्वर के सामने शान्ति से तौलो।
"सदा स्मरण रखो, बहुत अनुग्रह का अर्थ बहुत ज्योति नहीं है।
ये दोनों सदा साथ-साथ नहीं चलते।
जैसे ऐसा हो सकता है * आगे की सलाहें 1762 में एक अलग पुस्तिका में प्रकाशित की गई थीं, जिसका शीर्षक था 'मेथोडिस्ट सोसाइटियों के सबसे बड़े अगुवों को दी गई चेतावनियाँ और निर्देश,' और उसके साथ यह आदर्श-वाक्य था: —
"झूठे गवाहों को अलग करो, फिर भी सत्य को सदा दृढ़ता से थामे रहो।"
स्पष्ट है कि इसका उद्देश्य लोगों को जॉर्ज बेल और उसके मित्रों की हानिकारक अतिशयताओं से बचाना था, जिनका विशेष वर्णन श्री वेस्ली की उस समय की डायरी में मिलता है। — सम्पादक।
मसीही सिद्धता,
कि जहाँ प्रेम थोड़ा हो वहाँ बहुत ज्योति हो सकती है, वैसे ही जहाँ ज्योति थोड़ी हो वहाँ बहुत प्रेम हो सकता है।
हृदय में आँख से अधिक गर्मी है; फिर भी वह देख नहीं सकता।
और परमेश्वर ने देह के अंगों को बुद्धिमानी से इस प्रकार एक साथ मिलाया है कि कोई दूसरे से यह न कह सके, 'मुझे तेरी आवश्यकता नहीं।'
"यह कल्पना करना कि तुम्हें केवल वे ही सिखा सकते हैं जो स्वयं पाप से उद्धार पा चुके हैं, बहुत बड़ी और खतरनाक भूल है।
इसे एक क्षण के लिए भी स्थान न दो; यह तुम्हें हज़ार और भूलों में ले जाएगा, और ऐसी कि उनसे उबरना सम्भव न होगा।
नहीं; अधिकार अनुग्रह पर आधारित नहीं है, जैसा पिछले युग के पागल लोग कहा करते थे।
'प्रभु में जो तुम्हारे ऊपर हैं' उनकी आज्ञा मानो और उनका आदर करो, और यह न समझो कि तुम उनसे बेहतर जानते हो।
उनका स्थान और अपना स्थान पहचानो; सदा स्मरण रखते हुए कि बहुत प्रेम का अर्थ बहुत ज्योति नहीं है।
"इसे न देखने से कुछ लोग बहुत-सी भूलों में, और कम से कम घमण्ड के आभास में पड़ गए हैं।
ओह, आभास से भी सावधान रहो, और वास्तविकता से भी!
'तुम में वही मन हो जो मसीह यीशु में था।' और 'तुम भी दीनता को धारण करो।'
वह तुम्हें केवल भर ही न दे, परन्तु तुम्हें ऊपर से ढक ले।
तुम्हारे सब शब्दों और कामों में विनम्रता और आत्म-संकोच दिखाई दे।
तुम जो कुछ कहो और करो उससे प्रकट हो कि तुम अपनी दृष्टि में छोटे, तुच्छ, नीच और घृणित हो।
"इसका एक उदाहरण यह है कि जो भी दोष तुमसे हुआ हो उसे मानने को सदा तैयार रहो।
यदि तुमने कभी गलत सोचा, गलत कहा, या गलत किया हो, तो उसे स्वीकार करने में हिचकिचाओ मत।
कभी यह न सोचो कि इससे परमेश्वर के कार्य को हानि होगी; नहीं, इससे वह आगे बढ़ेगा।
इसलिए जब तुम पर किसी बात का आरोप लगाया जाए, तो खुले और स्पष्ट रहो; उसे टालने या छिपाने का प्रयत्न न करो; परन्तु उसे ठीक वैसा ही प्रकट होने दो जैसा वह है, और इस प्रकार तुम सुसमाचार में बाधा नहीं, बल्कि उसकी शोभा बढ़ाओगे।
"33. आप उन्हें दूसरी सलाह क्या देंगे?
"घमण्ड की उस बेटी, धर्मोन्माद से सावधान रहो।
ओह, उससे अधिक से अधिक दूर रहो!
किसी उत्तेजित
जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।
कल्पना को स्थान न दो।
बातों का श्रेय उतावली से परमेश्वर को न दो।
स्वप्नों, आवाज़ों, प्रभावों, दर्शनों या प्रकाशनों को आसानी से परमेश्वर की ओर से न मान लो।
वे उसकी ओर से हो सकते हैं।
वे स्वभाव की ओर से हो सकते हैं।
वे शैतान की ओर से हो सकते हैं।
इसलिए, 'हर एक आत्मा की प्रतीति न करो, परन्तु आत्माओं को परखो कि वे परमेश्वर की ओर से हैं या नहीं।'
सब बातों को लिखित वचन से परखो, और सब उसके सामने झुकें। यदि तुम पवित्रशास्त्र से ज़रा भी हटो, वरन् किसी पद के संदर्भ के साथ लिए गए सीधे, शाब्दिक अर्थ से भी, तो तुम हर घड़ी धर्मोन्माद के खतरे में हो।
और तुम तब भी खतरे में हो यदि तुम तर्क, ज्ञान या मानवीय विद्या को तुच्छ जानते या हल्का समझते हो; इनमें से हर एक परमेश्वर का उत्तम वरदान है, और सबसे उदात्त उद्देश्यों की सेवा कर सकता है।
"मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि बुद्धि, तर्क या ज्ञान शब्दों को कभी निन्दा के रूप में प्रयोग न करो।
इसके विपरीत, प्रार्थना करो कि तुम स्वयं उनमें और अधिक बढ़ते जाओ।
यदि तुम्हारा अर्थ सांसारिक बुद्धि, निष्प्रयोजन ज्ञान, झूठे तर्क से है, तो वैसा कहो; और भूसे को फेंक दो, गेहूँ को नहीं।
"धर्मोन्माद का एक सामान्य प्रवेश-द्वार है: साधनों के बिना लक्ष्य की आशा रखना; जैसे पवित्रशास्त्र में खोज किए बिना और परमेश्वर की सन्तानों से परामर्श किए बिना ज्ञान की आशा रखना; निरन्तर प्रार्थना और स्थिर जागरूकता के बिना आत्मिक सामर्थ्य की आशा रखना; हर अवसर पर परमेश्वर का वचन सुने बिना किसी आशीष की आशा रखना।
"कुछ लोग शैतान की इस युक्ति से अनजान रहे हैं।
उन्होंने पवित्रशास्त्र में खोजना छोड़ दिया है।
उन्होंने कहा, 'परमेश्वर सारा पवित्रशास्त्र मेरे हृदय पर लिखता है।
इसलिए मुझे उसे पढ़ने की आवश्यकता नहीं।'
दूसरों ने सोचा कि उन्हें सुनने की उतनी आवश्यकता नहीं, और इस प्रकार प्रातःकालीन प्रचार में आने में ढीले पड़ गए।
ओह, तुम जो इसमें सम्मिलित हो, चेतावनी लो!
तुमने किसी अजनबी की आवाज़ सुनी है।
मसीह की ओर लौट आओ, और उस भले पुराने मार्ग पर बने रहो, जो 'पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था;' वह मार्ग जिसके विषय में एक अन्यजाति ने भी
मसीही सिद्धता,
गवाही दी: 'कि मसीही प्रतिदिन भोर को उठकर मसीह के लिए, मानो वह परमेश्वर हो, भजन गाते हैं।'
"'अनुग्रह में बढ़ने' की इच्छा भी कभी-कभी धर्मोन्माद का प्रवेश-द्वार हो सकती है।
चूँकि यह हमें लगातार नया अनुग्रह खोजने की ओर ले जाती है, यह हमें अनजाने में परमेश्वर और मनुष्य के प्रति प्रेम की नई मात्राओं के अलावा कोई और नई वस्तु खोजने की ओर ले जा सकती है।
इस प्रकार यह कुछ लोगों को नए हृदय के बाद एक नए प्रकार के वरदानों की खोज करने और उन्हें पाने की कल्पना करने की ओर ले गई है, जैसे (1.) परमेश्वर से अपने सारे मन से प्रेम करना: (2.) अपने सारे प्राण से: (3.) अपनी सारी शक्ति से: (4.) परमेश्वर के साथ एकता: (5.) मसीह के साथ एकता:
(6.) हमारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा होना: (7.) मसीह के साथ मरा हुआ होना: (8.) उसके साथ जी उठना: (9.) उसके साथ स्वर्गीय स्थानों में बैठना: (10.) उसके सिंहासन तक उठा लिया जाना: (11.) नए यरूशलेम में होना:
(12.) परमेश्वर के तम्बू को मनुष्यों के बीच उतरते देखना: (13.) सब कर्मों के लिए मरा हुआ होना: (14.) मृत्यु, पीड़ा, शोक या परीक्षा के अधीन न होना।
"इनमें से बहुत-सी भूलों का एक आधार यह है कि इन पदों में से किसी के भी हृदय पर हर नए, प्रबल प्रयोग को एक नए प्रकार का वरदान मान लिया जाता है; यह न जानते हुए कि इनमें से कई पद अभी पूरे नहीं हुए हैं; कि अधिकांश अन्य तब पूरे होते हैं जब हम धर्मी ठहराए जाते हैं; और शेष उसी क्षण जब हम पवित्र किए जाते हैं।
केवल इतना शेष रहता है कि उनका अनुभव उच्चतर मात्राओं में किया जाए।
हमें बस इतनी ही आशा रखनी चाहिए।
"इनकी और हज़ार अन्य भूलों का एक और आधार यह है कि हम गहराई से विचार नहीं करते कि प्रेम परमेश्वर का सर्वोच्च वरदान है; नम्र, कोमल, धीरजवन्त प्रेम; कि सब दर्शन, प्रकाशन, प्रकटीकरण प्रेम की तुलना में छोटी बातें हैं; और ऊपर बताए गए सब वरदान या तो उसी के समान हैं, या उससे असीम रूप से निम्न हैं।
"अच्छा होगा कि तुम इसे भली-भाँति समझ लो — स्वर्गों का स्वर्ग प्रेम है।
धर्म में इससे ऊँचा कुछ नहीं; वास्तव में इसके सिवा कुछ है ही नहीं; यदि तुम अधिक प्रेम के सिवा कुछ और ढूँढ़ते हो, तो तुम लक्ष्य से बहुत दूर देख रहे हो,
जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।
तुम राजमार्ग से बाहर निकल रहे हो।
और जब तुम दूसरों से पूछते हो, 'क्या तुमने यह या वह आशीष पाई है?' तो यदि तुम्हारा अर्थ अधिक प्रेम के सिवा कुछ और है, तो तुम्हारा अर्थ गलत है; तुम उन्हें मार्ग से भटका रहे हो और उन्हें गलत सुराग पर डाल रहे हो।
इसलिए अपने हृदय में यह निश्चय कर लो कि जिस क्षण परमेश्वर ने तुम्हें सब पाप से बचा लिया, उसके बाद तुम्हें और किसी बात का लक्ष्य नहीं रखना, केवल उस प्रेम के और अधिक होने का जो 1 कुरिन्थियों के तेरहवें अध्याय में वर्णित है।
जब तक तुम इब्राहीम की गोद में न उठा लिए जाओ, तुम इससे ऊँचे नहीं जा सकते।
"मैं फिर कहता हूँ, धर्मोन्माद से सावधान रहो।
जैसे यह कल्पना करना कि तुम्हारे पास भविष्यवाणी या आत्माओं की परख का वरदान है, जो मेरे विश्वास में तुममें से किसी के पास नहीं है; न कभी था।
लोगों को अपनी भावनाओं के आधार पर सही या गलत ठहराने से सावधान रहो।
यह परखने का कोई शास्त्रसम्मत तरीका नहीं है।
ओह, 'व्यवस्था और गवाही' से चिपके रहो!
"34. तीसरी सलाह क्या है?
"व्यवस्था-विरोधवाद (एन्टिनोमियनिज़्म) से सावधान रहो; 'विश्वास के द्वारा' व्यवस्था को, या उसके किसी भी अंश को, 'व्यर्थ ठहराने' से।
धर्मोन्माद स्वाभाविक रूप से इसी की ओर ले जाता है; वास्तव में, ये मुश्किल से अलग किए जा सकते हैं।
यह हज़ार रूपों में तुम पर चुपके से आ सकता है, इसलिए तुम इसके विरुद्ध जितना सावधान रहो कम है।
हर उस बात से सावधान रहो, चाहे सिद्धान्त में हो या आचरण में, जिसका इस ओर कुछ भी झुकाव हो।
वह महान सत्य भी कि 'मसीह व्यवस्था का अन्त है,' हमें इसमें फँसा सकता है, यदि हम यह विचार न करें कि उसने नैतिक व्यवस्था की हर बात को अपना लिया है और उसे प्रेम की व्यवस्था में कलम किया है।
यह सोचने से सावधान रहो, 'क्योंकि मैं प्रेम से भरा हूँ, इसलिए मुझे इतनी पवित्रता की आवश्यकता नहीं।
क्योंकि मैं सदा प्रार्थना करता हूँ, इसलिए मुझे निजी प्रार्थना के लिए कोई निश्चित समय नहीं चाहिए।
क्योंकि मैं सदा जागता रहता हूँ, इसलिए मुझे कोई विशेष आत्म-परीक्षण नहीं चाहिए।'
आइए हम 'व्यवस्था को, अर्थात् सारे लिखित वचन को, बड़ा मानें और उसे आदरणीय ठहराएँ।'
हमारी यही वाणी हो: 'मैं तेरी आज्ञाओं को सोने से, वरन् बहुमूल्य रत्नों से भी अधिक प्रिय जानता हूँ,
मसीही सिद्धता,
ओह, मैं तेरी व्यवस्था से कितना प्रेम रखता हूँ! दिन भर मेरा ध्यान उसी में लगा रहता है।'
व्यवस्था-विरोधी पुस्तकों से सावधान रहो; विशेषकर डॉ. क्रिस्प और श्री साल्टमार्श की रचनाओं से।
'उनमें बहुत-सी उत्तम बातें हैं; और यही उन्हें और भी खतरनाक बनाता है।
ओह, समय रहते चेतावनी लो!
आग से मत खेलो।
नाग के बिल पर अपना हाथ न रखो।
मैं तुमसे विनती करता हूँ, कट्टरता से सावधान रहो।
तुम्हारा प्रेम या उपकार केवल तथाकथित मेथोडिस्टों तक सीमित न हो; और उनके उस बहुत छोटे भाग तक तो और भी नहीं जो प्रेम में नए किए गए प्रतीत होते हैं; या उन तक जो तुम्हारी और उनकी बात पर विश्वास करते हैं।
ओह, इसे अपना शिब्बोलेत मत बनाओ!
निश्चलता से सावधान रहो; अपने कामों से गलत अर्थ में रुक जाने से।
अनेक में से एक उदाहरण लें: कोई कहता है, 'तुम्हें एक बड़ी आशीष मिली थी।
परन्तु तुमने उसके विषय में बात करना और यह-वह करना आरम्भ कर दिया; इसलिए तुमने उसे खो दिया।
तुम्हें शान्त रहना चाहिए था।'
"आत्म-भोग से सावधान रहो; वरन् उसे गुण बना लेने से भी, आत्म-त्याग का, प्रतिदिन क्रूस उठाने का, उपवास या संयम का उपहास करने से।
दोष-दर्शिता से सावधान रहो; उन्हें, जो किसी भी रीति से तुम्हारा विरोध करते हैं, चाहे विचार में या आचरण में, अन्धे, मरे हुए, गिरे हुए, या 'इस कार्य के शत्रु' समझने या कहने से।
एक बार और, केवल-विश्वासवाद (सोलिफ़िडियनिज़्म) से सावधान रहो; 'विश्वास करो, विश्वास करो!' के सिवा कुछ न पुकारने से, और उन लोगों को अज्ञानी या व्यवस्थावादी ठहराने से जो अधिक शास्त्रसम्मत ढंग से बोलते हैं।
निश्चय ही, कुछ समयों में केवल पश्चाताप, या केवल विश्वास, या पूर्णतः पवित्रता की बात करना उचित हो सकता है; परन्तु सामान्यतः हमारी बुलाहट परमेश्वर की सारी मनसा को घोषित करने और विश्वास के अनुपात के अनुसार भविष्यवाणी करने की है।
लिखित वचन धार्मिकता की सम्पूर्णता और उसकी हर एक शाखा की चर्चा करता है, उसकी छोटी से छोटी शाखाओं तक उतरते हुए; जैसे संयमी, विनम्र, परिश्रमी, धीरजवन्त होना, सब मनुष्यों का आदर करना।
इसी प्रकार पवित्र आत्मा भी हमारे हृदयों में वही कार्य करता है, केवल सामान्य रूप से पवित्रता की लालसा उत्पन्न नहीं करता, परन्तु हमें हर एक विशेष गुण की ओर दृढ़ता से झुकाता है, 'जो कुछ मनभावना है' उसके हर एक अंश तक हमें ले जाता है।
और
जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।
यह अत्यन्त उचित रीति से: क्योंकि जैसे 'कर्मों से विश्वास सिद्ध होता है,' वैसे ही विश्वास के कार्य की पूर्ति या विनाश, और परमेश्वर की कृपा का आनन्द या उसकी अप्रसन्नता का कष्ट, आज्ञाकारिता या अवज्ञा के हर एक कार्य पर बहुत निर्भर करता है।
"35. चौथी सलाह क्या है?
"चूक के पापों से सावधान रहो; किसी भी प्रकार की भलाई करने का कोई अवसर न खोओ।
भले कामों के लिए उत्साही रहो; जान-बूझकर भक्ति या दया का कोई काम न छोड़ो।
मनुष्यों की देह और आत्मा दोनों की जितनी भलाई कर सकते हो करो।
विशेषकर, 'तू अपने पड़ोसी को अवश्य डाँटना, और उसके कारण पाप न सहना।'
सक्रिय रहो।
आलस्य या सुस्ती को स्थान न दो; यह कहने का कोई अवसर न दो, 'तुम आलसी हो, तुम आलसी हो।'
बहुत लोग अब भी यही कहेंगे; परन्तु तुम्हारा पूरा मन और आचरण इस निन्दा का खण्डन करे।
सदा काम में लगे रहो; समय का एक टुकड़ा भी न खोओ; बचे हुए टुकड़ों को बटोर लो, कि कुछ नष्ट न हो।
और जो कुछ तेरा हाथ करने को पाए, उसे अपनी पूरी शक्ति से कर।
'बोलने में धीमे' रहो, और बोलने में सावधान।
'बहुत बोलने में अपराध की कमी नहीं होती।'
बहुत बातें न करो; और एक बार में लम्बी बातें भी नहीं।
थोड़े ही लोग एक घण्टे से अधिक लाभदायक बातचीत कर सकते हैं।
भक्तिपूर्ण गपशप से, धार्मिक चर्चाओं के बकबक से अधिक से अधिक दूर रहो।
"36. पाँचवीं सलाह क्या है?
"परमेश्वर के सिवा किसी और वस्तु की इच्छा करने से सावधान रहो। अब तुम और कुछ नहीं चाहते; हर दूसरी इच्छा निकाल दी गई है; देखो कि कोई फिर भीतर न आए।
'अपने आप को पवित्र रख;' अपनी 'आँख' को 'निर्मल' रहने दो, 'तो तुम्हारा सारा शरीर उजियाले से भर जाएगा।'
स्वादिष्ट भोजन की, या इन्द्रियों के किसी अन्य सुख की इच्छा को स्थान न दो; किसी भव्य, नई या सुन्दर वस्तु से आँख या कल्पना को प्रसन्न करने की इच्छा को नहीं; धन की, प्रशंसा या सम्मान की, किसी सृष्ट वस्तु में सुख की इच्छा को नहीं।
तुम इन इच्छाओं को वापस ला सकते हो; परन्तु तुम्हें ऐसा करने की आवश्यकता नहीं; तुम्हें इन्हें फिर कभी अनुभव करने की आवश्यकता नहीं।
ओह, उस स्वतन्त्रता में स्थिर रहो जिसमें मसीह ने तुम्हें स्वतन्त्र किया है!
gia [अस्पष्ट मूल पाठ]
मसीही सिद्धता,
"आत्म-त्याग और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाने में सब के लिए आदर्श बनो।
उन्हें देखने दो कि तुम किसी भी ऐसे सुख को कुछ नहीं गिनते जो तुम्हें परमेश्वर के निकट नहीं लाता, और किसी ऐसी पीड़ा की परवाह नहीं करते जो लाती है; कि तुम केवल उसे प्रसन्न करने का लक्ष्य रखते हो, चाहे करने से या सहने से; कि सुख या पीड़ा, मान या अपमान, धन या निर्धनता के विषय में तुम्हारे हृदय की निरन्तर भाषा यह है,
'मेरे लिए सब एक-सा है, बस मैं अपने प्रभु के लिए जी सकूँ और मर सकूँ!'
"37. छठी सलाह क्या है?
"फूट से सावधान रहो, मसीह की कलीसिया में दरार डालने से।
वह आन्तरिक अलगाव, कि अंग 'एक-दूसरे की' परस्पर चिन्ता (1 कुरिन्थियों 12:25) रखना छोड़ दें, सब झगड़ों और हर बाहरी बिखराव की जड़ है।
इस ओर ले जानेवाली हर बात से सावधान रहो।
बाँटनेवाली आत्मा से सावधान रहो; जिस किसी बात का उस ओर ज़रा भी रुख हो उससे दूर रहो।
इसलिए यह न कहो, 'मैं पौलुस का हूँ, या अपुल्लोस का;' यही वह बात थी जिसने कुरिन्थ में फूट डाली।
यह न कहो, 'यह मेरा प्रचारक है; इंग्लैंड का सबसे अच्छा प्रचारक।
मुझे वही दे दो और बाकी सब ले लो।'
यह सब फूट पैदा करने या भड़काने की ओर ले जाता है, उन्हें अलग करने की ओर जिन्हें परमेश्वर ने जोड़ा है।
किसी प्रचारक को तुच्छ न जानो और न उसे नीचा दिखाओ; किसी एक को बाकी सब से ऊपर न उठाओ, ऐसा न हो कि तुम उसे और परमेश्वर के कार्य दोनों को हानि पहुँचाओ।
दूसरी ओर, किसी के अभिव्यक्ति की किसी असंगति या अशुद्धि के कारण उस पर कठोर न हो; न ही कुछ भूलों के कारण, यदि वे वास्तव में भूलें हों।
"इसी प्रकार, यदि तुम फूट से बचना चाहते हो, तो सोसाइटी और बैंडों के हर नियम का विवेक के कारण पालन करो।
अपनी क्लास या बैंड की सभा में आना कभी न छोड़ो; किसी सार्वजनिक सभा से कभी अनुपस्थित न रहो।
ये हमारी सोसाइटी की नसें हैं; और जो कुछ इनके प्रति हमारे आदर को, या इनमें उपस्थित रहने की नियमितता को कमज़ोर करता है, या कमज़ोर करने की ओर झुकता है, वह हमारे समुदाय की जड़ पर प्रहार करता है।
जैसा किसी ने कहा है, 'हमारी व्यवस्था का वह भाग, अर्थात् प्रार्थना,
जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।
परीक्षण और विशेष उपदेश के लिए साप्ताहिक निजी सभाएँ, प्रचार किए गए वचन से प्राप्त हर आशीष को गहरा करने और दृढ़ करने का, और उसे उन दूसरों तक पहुँचाने का सबसे बड़ा साधन रही हैं जो सार्वजनिक सेवकाई में उपस्थित नहीं हो सकते थे; जबकि इस धार्मिक संगति और मेल-जोल के बिना केवल प्रचार के द्वारा किए गए सबसे उत्साही प्रयास भी स्थायी लाभ के सिद्ध नहीं हुए हैं।'
"अपने भाइयों से अलग होने का एक विचार भी मन में न आने दो, चाहे उनके मत तुम्हारे मत से मिलते हों या नहीं।
यह न सोचो कि कोई मनुष्य तुम पर विश्वास न करने, तुम्हारी बात न मानने से पाप करता है; या कि यह या वह मत इस कार्य के लिए अनिवार्य है, और दोनों साथ ही स्थिर रहेंगे या साथ ही गिरेंगे।
विरोध के प्रति अधीरता से सावधान रहो।
उन्हें दोषी न ठहराओ और न उनके विषय में बुरा सोचो जो ठीक वैसा नहीं देख पाते जैसा तुम देखते हो, या जो तुम्हारा विरोध करना अपना कर्तव्य समझते हैं, चाहे बड़ी बात में हो या छोटी में।
मुझे डर है कि हम में से कुछ ने दूसरों के विषय में केवल इसलिए बुरा सोचा है कि उन्होंने हमारी कही बात का विरोध किया।
यह सब फूट की ओर ले जाता है; और इस प्रकार की हर बात से हम उन्हें अपने ही विरुद्ध बुरी शिक्षा दे रहे हैं।
"ओह, चिड़चिड़ेपन से, झुँझलाहट से सावधान रहो, कि कोई कुछ कहे तो सहन न हो; ज़रा-से शब्द पर चौंक पड़ना; और उनसे दूर भागना जो मेरी या किसी और की बातों को बिना सोचे नहीं मानते!
"विरोध और विपरीतता की, और नाना प्रकार के क्रूसों की आशा रखो।
सन्त पौलुस के शब्दों पर विचार करो:
'तुम पर मसीह के कारण' — उसके निमित्त, तुम्हारे लिए उसकी मृत्यु और मध्यस्थता के फल के रूप में — 'न केवल उस पर विश्वास करने का, पर उसके लिए दुःख उठाने का भी अनुग्रह हुआ है,' फिलिप्पियों 1:29।
यह दिया गया है!
परमेश्वर तुम्हें यह विरोध या निन्दा देता है; यह उसके प्रेम का एक नया चिन्ह है।
और क्या तुम देनेवाले को अस्वीकार करोगे; या उसके उपहार को ठुकराकर उसे दुर्भाग्य गिनोगे?
क्या तुम यह नहीं कहोगे, 'हे पिता, वह घड़ी आ पहुँची है कि तेरी महिमा हो; अब तू अपनी सन्तान को अपने लिए कुछ दुःख उठाने देता है; मेरे साथ अपनी इच्छा के अनुसार कर?'
जान लो कि ये बातें परमेश्वर के कार्य में बाधा होने से तो दूर,
मसीही सिद्धता,
या तुम्हारे प्राण के लिए, जब तक कि तुम्हारा अपना दोष न हो, न केवल प्रभु की व्यवस्था के क्रम में अपरिहार्य हैं, वरन् तुम्हारे लिए लाभदायक, हाँ, आवश्यक हैं।
इसलिए उन्हें परमेश्वर से (संयोग से नहीं) इच्छापूर्वक और धन्यवाद के साथ ग्रहण करो।
उन्हें मनुष्यों से नम्रता, दीनता, झुकाव, कोमलता और मधुरता के साथ ग्रहण करो।
तुम्हारा बाहरी रूप और व्यवहार भी कोमल क्यों न हो?
लेडी कट्स के चरित्र को स्मरण रखो।
'रोमी सम्राट तीतुस के विषय में कहा गया था कि कोई उसके पास से अप्रसन्न होकर नहीं गया।
परन्तु उसके विषय में कहा जा सकता था कि कोई उसके पास अप्रसन्न होकर नहीं गया; सब को उससे दयालु और अनुकूल स्वागत मिलने का ऐसा निश्चय था।'
"दूसरों को अपने से अलग होने के लिए ललचाने से सावधान रहो।
कोई ऐसी ठोकर न दो जिससे बचा जा सकता हो; देखो कि तुम्हारा आचरण सब बातों में तुम्हारे दावे के अनुकूल हो, और हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर की शिक्षा को शोभा दे।
अपने विषय में बोलते समय विशेष रूप से सावधान रहो।
तुम परमेश्वर के कार्य का इनकार तो नहीं कर सकते; परन्तु जब तुमसे कहा जाए तब उसके विषय में यथासम्भव सबसे अहानिकारक रीति से बोलो।
सब भव्य, आडम्बरपूर्ण शब्दों से बचो; वास्तव में तुम्हें उसे कोई सामान्य नाम देने की आवश्यकता नहीं; न सिद्धता, न पवित्रीकरण, न दूसरी आशीष, न 'पा चुका हूँ।'
बल्कि उन विशेष बातों के विषय में बोलो जो परमेश्वर ने तुम्हारे लिए की हैं।
तुम कह सकते हो, 'अमुक समय मैंने एक ऐसा परिवर्तन अनुभव किया जिसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता; और उस समय से मैंने न घमण्ड अनुभव किया है, न हठ, न क्रोध, न अविश्वास; न परमेश्वर और सारी मानवजाति के प्रति प्रेम की परिपूर्णता के सिवा कुछ और।'
और जो कोई अन्य सीधा प्रश्न पूछा जाए, उसका उत्तर नम्रता और सरलता से दो।
"और यदि तुममें से कोई कभी उस दशा से गिर जाए जिसमें अब है, यदि वह फिर घमण्ड या अविश्वास, या कोई ऐसा स्वभाव अनुभव करे जिससे वह अब छूटा हुआ है; तो इनकार न करे, छिपाए नहीं, किसी रीति से भेस न बदले, अपने प्राण के जोखिम पर।
किसी भी स्थिति में, किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाओ जिस पर तुम भरोसा कर सको, और जो कुछ तुम अनुभव करते हो वही कह दो।
परमेश्वर उसे बोलने में समर्थ करेगा s [अस्पष्ट मूल पाठ]
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
उचित समय पर एक वचन, जो तुम्हारी आत्मा के लिए स्वास्थ्य होगा।
और निश्चय ही वह फिर तुम्हारा सिर ऊँचा करेगा, और जो हड्डियाँ टूट गई हैं उन्हें आनन्दित करेगा।
"38. उन्हें आप अन्तिम सलाह क्या देंगे?
"सब बातों में आदर्श बनो; विशेषकर बाहरी बातों में (जैसे पहनावे में), छोटी बातों में, अपना धन खर्च करने में (हर अनावश्यक खर्च से बचते हुए), गहरी और स्थिर गम्भीरता में, और अपनी सारी बातचीत की ठोसता और उपयोगिता में।
तब तुम 'अन्धेरे स्थान में चमकती हुई ज्योति' होगे।
तब तुम प्रतिदिन ' अनुग्रह में बढ़ते' जाओगे, जब तक कि 'हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनन्त राज्य में तुम्हारा प्रवेश बहुतायत से कराया न जाए।'
"पिछली अधिकांश सलाहें निम्नलिखित चिन्तनों में दृढ़ता से पुष्ट की गई हैं, जिन पर मैं पवित्रशास्त्र के बाद तुम्हें गहराई से और बार-बार विचार करने की सलाह देता हूँ : —
"(1.) समुद्र परमेश्वर की परिपूर्णता का, और उस धन्य आत्मा की परिपूर्णता का, उत्तम प्रतीक है।
क्योंकि जैसे सब नदियाँ समुद्र में लौट जाती हैं; वैसे ही धर्मियों की देहें, आत्माएँ और भले कार्य परमेश्वर में लौट जाते हैं, ताकि वहाँ उसके अनन्त विश्राम में जीवित रहें।
" यद्यपि परमेश्वर के सारे अनुग्रह उसकी केवल उदारता पर निर्भर हैं, फिर भी वह प्रायः उन्हें उन लोगों की प्रार्थनाओं, शिक्षाओं और पवित्रता से जोड़ देना पसन्द करता है जिनके साथ हम होते हैं।
प्रबल, यद्यपि अदृश्य, आकर्षणों के द्वारा वह कुछ आत्माओं को दूसरों के साथ उनके मेल-जोल के माध्यम से अपनी ओर खींचता है।
" अनुग्रह से बनी सहानुभूतियाँ प्रकृति से बनी सहानुभूतियों से कहीं बढ़कर होती हैं।
"सच्चे भक्त दिखाते हैं कि सच्चे प्रेम से भी भावनाएँ उतनी ही स्वाभाविक रूप से उमड़ती हैं जितनी झूठे प्रेम से, क्योंकि वे उन लोगों के भले-बुरे को, जिनसे वे परमेश्वर के निमित्त प्रेम करते हैं, इतनी गहराई से अनुभव करते हैं।
परन्तु इसे केवल वे ही समझ सकते हैं जो प्रेम की भाषा समझते हैं।
"आत्मा की तलहटी विश्राम में हो सकती है, तब भी जब हम
मसीही सिद्धता,
बाहर से अनेक कष्टों में हों; ठीक जैसे समुद्र की तलहटी शान्त रहती है, जबकि उसकी सतह बहुत उथल-पुथल में होती है।
'अनुग्रह में बढ़ने के सर्वोत्तम सहायक वे दुर्व्यवहार, अपमान और हानियाँ हैं जो हम पर आती हैं।
हमें उन्हें पूरी कृतज्ञता से ग्रहण करना चाहिए, और सब अन्य बातों से उत्तम मानना चाहिए, चाहे केवल इसी कारण से — कि उनमें हमारी इच्छा का कोई भाग नहीं होता।
"अपने कष्टों से बचने का सबसे सीधा मार्ग यह है कि हम चाहें कि वे उतने समय तक रहें जितना परमेश्वर को भाए।
"यदि हम सताव और क्लेश को सही रीति से सहें, तो इनमें से किसी एक अवसर का उचित उपयोग करके हम मसीह के अनुरूप होने में उससे अधिक बढ़ सकते हैं, जितना केवल बहुत-से भले कार्यों में उसकी दया का अनुकरण करने से बढ़ पाते।
'' परमेश्वर से प्रेम करनेवालों के प्रति उसके प्रेम के सबसे बड़े प्रमाणों में से एक यह है कि वह उन्हें क्लेश भेजता है, और साथ ही उन्हें सहने का अनुग्रह भी देता है।
"बड़े से बड़े क्लेशों में भी हमें परमेश्वर के सामने यह गवाही देनी चाहिए कि उन्हें उसके हाथ से लेते हुए हम पीड़ा के बीच भी आनन्द अनुभव करते हैं, क्योंकि हमें वह क्लेश दे रहा है जो हमसे प्रेम करता है और जिससे हम प्रेम करते हैं।
"मनुष्य को अपनी ओर खींचने के लिए परमेश्वर का सबसे सीधा तरीका यह है कि वह उसे उसी में पीड़ा दे जिसे वह सबसे अधिक चाहता है, और यह उचित भी है; और यह क्लेश किसी ऐसे भले कार्य से उत्पन्न कराए जो सच्चे मन से किया गया हो; क्योंकि और कुछ उसे इससे अधिक स्पष्टता से नहीं दिखा सकता कि संसार में जो सबसे सुन्दर और वांछनीय है वह कितना खोखला है।
"(2.) सच्चा समर्पण परमेश्वर की सम्पूर्ण इच्छा के साथ पूर्ण अनुरूपता में है, जो संसार में होनेवाली सब बातों को (पाप को छोड़कर) चाहता और करता है।
इसके लिए हमें केवल इतना करना है कि सब घटनाओं को, अच्छी और बुरी, उसकी इच्छा के रूप में स्वीकार करें।
"जो बड़े से बड़े क्लेश धर्मियों पर स्वर्ग या पृथ्वी से आ सकते हैं, उनमें भी वे अपनी आत्मा की सारी शक्तियों को एक करनेवाले, उसकी ओर भीतरी, प्रेमपूर्ण दृष्टि के द्वारा, शान्ति में अटल और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित बने रहते हैं।
"जो कुछ हम पर आए उसे हमें चुपचाप सहना चाहिए, वहन करना चाहिए
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
दूसरों की और अपनी कमियों को, गुप्त प्रार्थना में या उन आहों के साथ जो बयान नहीं की जा सकतीं, परमेश्वर के सामने मान लेना चाहिए; परन्तु कभी कठोर या चिड़चिड़ा शब्द नहीं बोलना, न बड़बड़ाना या कुढ़ना, बल्कि पूरी तरह इच्छुक रहना कि परमेश्वर तुम्हारे साथ वैसा व्यवहार करे जैसा उसे भाए।
हम उसके मेमने हैं, इसलिए हमें बिना शिकायत किए मृत्यु तक भी दुःख सहने को तैयार रहना चाहिए।
"जिन्हें हम सुधार नहीं सकते उन्हें सहना चाहिए, और उन्हें परमेश्वर को अर्पित करके सन्तुष्ट रहना चाहिए।
यही सच्चा समर्पण है।
और चूँकि उसने हमारी निर्बलताओं को उठाया है, इसलिए उसके निमित्त हम भी एक-दूसरे की निर्बलताओं को भली-भाँति सह सकते हैं।
"सब कुछ त्याग देना, अपने आपको सब कुछ से रिक्त कर देना, ताकि यीशु मसीह को खोजें और उसके पीछे चलें — नंगे बैतलहम तक, जहाँ वह जन्मा; नंगे उस सभागृह तक जहाँ उसे कोड़े मारे गए; और नंगे कलवरी तक, जहाँ वह क्रूस पर मरा — यह इतनी बड़ी दया है कि न यह बात और न इसका ज्ञान किसी को दिया जाता है, सिवाय परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास के द्वारा।
"(3.) धैर्य के बिना परमेश्वर का कोई प्रेम नहीं, और दीनता तथा मन की मधुरता के बिना कोई धैर्य नहीं।
"दीनता और धैर्य प्रेम की वृद्धि के सबसे पक्के प्रमाण हैं।
" केवल दीनता ही धैर्य को प्रेम से जोड़ती है, जिसके बिना दुःख से लाभ उठाना, या वास्तव में शिकायत से बचना असम्भव है, विशेषकर तब जब हम समझते हैं कि मनुष्य हमें जो दुःख देते हैं उसके लिए हमने कोई कारण नहीं दिया।
"सच्ची दीनता एक प्रकार का आत्म-विलोपन है, और यही सब सद्गुणों का केन्द्र है।
" परमेश्वर की ओर लौटी हुई आत्मा को उद्धार के विषय में जो कुछ उससे कहा जाए, उस पर लाभ उठाने की इच्छा के साथ ध्यान देना चाहिए।
'जिन पापों को परमेश्वर ने क्षमा किया है, उनमें से कुछ भी शेष न रहे, सिवाय हृदय में गहरी दीनता और हमारी बातों, कार्यों और दुःखों में अधिक कठोर संयम के।
"(4.) मनुष्यों को सहना, और बुराइयों को नम्रता और चुप्पी से सहना, मसीही जीवन का सार है।
मसीही सिद्धता,
"परमेश्वर हमारे प्रेम का पहला विषय है: उसके बाद प्रेम का अगला कार्य दूसरों की कमियों को सहना है।
और हमें इसका अभ्यास अपने ही घराने से आरम्भ करना चाहिए।
"हमें अपना प्रेम मुख्यतः उन्हीं पर प्रकट करना चाहिए जो हमारी सोचने की रीति, या हमारे स्वभाव, या हमारे ज्ञान, या इस इच्छा को सबसे अधिक ठेस पहुँचाते हैं कि दूसरे उतने ही सद्गुणी हों जितना हम स्वयं होना चाहते हैं।
"(5.) परमेश्वर अपना आत्मा उन्हें भी मुश्किल से देता है जिन्हें उसने अनुग्रह में स्थिर किया है, यदि वे सब अवसरों पर उसके लिए प्रार्थना न करें, केवल एक बार नहीं, बल्कि बार-बार।
"परमेश्वर प्रार्थना के उत्तर में ही सब कुछ करता है; और जो परमेश्वर की ओर फिरे हैं, चाहे उन्होंने स्वयं इसके लिए प्रार्थना न की हो (जो अत्यन्त दुर्लभ है), वे भी दूसरों की प्रार्थनाओं के बिना नहीं थे।
आत्मा की प्रत्येक नई विजय एक नई प्रार्थना का फल है।
''बेचैनी के हर अवसर पर हमें प्रार्थना में एकान्त में जाना चाहिए, ताकि हम परमेश्वर के अनुग्रह और ज्योति को स्थान दें, और फिर अपने संकल्प करें, इस चिन्ता के बिना कि उनका क्या परिणाम होगा।
'"'सबसे बड़ी परीक्षाओं में मसीह की ओर एक ही दृष्टि, और केवल उसका नाम लेना, उस दुष्ट पर जय पाने के लिए पर्याप्त है, बशर्ते यह भरोसे और मन की शान्ति के साथ किया जाए।
''परमेश्वर की यह आज्ञा कि ' निरन्तर प्रार्थना करो,' इस आवश्यकता पर आधारित है कि आत्मा में परमेश्वर के जीवन को बनाए रखने के लिए हमें उसके अनुग्रह की आवश्यकता है, जो उसके बिना एक क्षण भी नहीं टिक सकता, जैसे देह वायु के बिना नहीं टिक सकती।
" चाहे हम परमेश्वर का विचार करें या उससे बातें करें, चाहे उसके लिए कार्य करें या दुःख उठाएँ, सब कुछ प्रार्थना है, जब हमारा कोई और लक्ष्य नहीं होता सिवाय उसके प्रेम और उसे प्रसन्न करने की इच्छा के।
" एक मसीही जो कुछ करता है, यहाँ तक कि खाना और सोना भी, प्रार्थना है, जब वह सरलता से, परमेश्वर के नियम के अनुसार किया जाए, और अपनी इच्छा से उसमें कुछ जोड़ा या घटाया न जाए।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
"प्रार्थना हृदय की इच्छा में जारी रहती है, चाहे बुद्धि बाहरी बातों में लगी हो।
"प्रेम से भरी आत्माओं में परमेश्वर को प्रसन्न करने की इच्छा एक निरन्तर प्रार्थना है।
" जैसे शैतान की हमारे प्रति उग्र घृणा को सिंह की गर्जना कहा जाता है, वैसे ही हमारे तीव्र प्रेम को परमेश्वर को पुकारना कहा जा सकता है।
"परमेश्वर अपनी वयस्क सन्तानों से केवल इतना चाहता है कि उनके हृदय सचमुच शुद्ध हों, और वे उसे निरन्तर वे इच्छाएँ और मन्नतें अर्पित करें जो सिद्ध प्रेम से स्वाभाविक रूप से उमड़ती हैं।
क्योंकि ये इच्छाएँ, प्रेम के सच्चे फल होने के कारण, उससे उत्पन्न होनेवाली सबसे सिद्ध प्रार्थनाएँ हैं।
"(6.) यह कल्पना करना कठिन है कि वह मार्ग कितना सीधा है जिसमें परमेश्वर अपने पीछे चलनेवालों को ले चलता है; और यदि हम उसके प्रति अपनी विश्वासयोग्यता में कमी न करें, तो हमें उस पर कितना निर्भर रहना होगा।
"यह विश्वास करना कठिन है कि परमेश्वर के सामने छोटी से छोटी बातें कितनी महत्त्वपूर्ण हैं; और जो दोष हल्के प्रतीत होते हैं उनके पीछे कभी-कभी कितनी बड़ी हानियाँ आती हैं।
" जैसे बहुत थोड़ी-सी धूल घड़ी को बिगाड़ देती है, और रेत का छोटा-सा कण हमारी दृष्टि को धुँधला कर देता है, वैसे ही हृदय पर पड़ा पाप का छोटे से छोटा कण परमेश्वर की ओर उसकी सही गति में बाधा डालता है
परमेश्वर।
'"' हमें कलीसिया में वैसे होना चाहिए जैसे सन्त स्वर्ग में होते हैं, और घर में वैसे जैसे सबसे पवित्र लोग कलीसिया में होते हैं; घर में अपना काम वैसे करना जैसे कलीसिया में प्रार्थना करते हैं; हृदय की गहराई से परमेश्वर की आराधना करते हुए।
" हमें अपने आसपास की सब व्यर्थ वस्तुओं को काट डालने के लिए निरन्तर परिश्रम करना चाहिए: और परमेश्वर प्रायः हमारी आत्माओं की फ़ालतू बातों को उसी अनुपात में घटाता है जिस अनुपात में हम अपनी देह की फ़ालतू बातों को घटाते हैं।
"शैतान का विरोध करने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि हम में जो कुछ संसार का शेष है उसे नष्ट कर दें, ताकि उसके खण्डहरों पर परमेश्वर के लिए पूर्णतः प्रेम से बना एक भवन खड़ा करें।
तब हम
मसीही सिद्धता,
इस क्षणभंगुर जीवन में ही परमेश्वर से वैसा प्रेम करना आरम्भ करेंगे जैसा हम अनन्तकाल में उससे करेंगे।
''हम मुश्किल से कल्पना कर पाते हैं कि सबसे सद्गुणी लोगों के साथ अपनी मित्रता में परमेश्वर को उसके हक से वंचित करना कितना सरल है, जब तक कि मृत्यु उन्हें हमसे छीन न ले।
परन्तु यदि यह हानि स्थायी शोक उत्पन्न करे, तो यह स्पष्ट प्रमाण है कि पहले हमारे पास दो खजाने थे, जिनके बीच हमने अपना हृदय बाँट रखा था।
"(7.) यदि सब कुछ त्याग देने के बाद हम निरन्तर चौकस न रहें, और परमेश्वर से यह विनती न करें कि वह हमारी चौकसी के साथ अपनी चौकसी भी जोड़े, तो हम फिर फँस जाएँगे और हार जाएँगे।
"जैसे अत्यन्त खतरनाक हवाएँ छोटे-छोटे छिद्रों से भीतर आ सकती हैं, वैसे ही शैतान सबसे खतरनाक रूप से उन छोटी-छोटी अनदेखी घटनाओं के द्वारा आता है जो कुछ भी नहीं प्रतीत होतीं, फिर भी अनजाने में हृदय को बड़ी परीक्षाओं के लिए खोल देती हैं।
"समय-समय पर अपने आपको नया करना अच्छा है, अपनी आत्मा की दशा की बारीकी से जाँच करके, मानो हमने इसे पहले कभी न किया हो; क्योंकि विश्वास के पूर्ण निश्चय की ओर इससे अधिक कुछ नहीं ले जाता कि हम इस उपाय से अपने आपको दीनता में और सब भले कार्यों के अभ्यास में बनाए रखें।
" निरन्तर चौकसी और प्रार्थना के साथ निरन्तर लगे रहना भी जोड़ा जाना चाहिए।
क्योंकि अनुग्रह भी रिक्तता से वैसे ही भागता है जैसे प्रकृति; और जो कुछ परमेश्वर नहीं भरता उसे शैतान भर देता है।
"आत्माओं के मार्गदर्शक और उसके द्वारा निर्देशित व्यक्ति के बीच जैसी विश्वासयोग्यता होनी चाहिए, वैसी कोई अन्य नहीं।
उन्हें परमेश्वर में निरन्तर एक-दूसरे का ध्यान रखना चाहिए, और अपने आपको बारीकी से जाँचना चाहिए कि क्या उनके सब विचार शुद्ध हैं, और उनके सब शब्द मसीही विवेक से निर्देशित हैं।
अन्य मामले केवल मनुष्यों की बातें हैं; परन्तु ये विशेष रूप से परमेश्वर की बातें हैं।
"(8.) सन्त पौलुस के ये शब्द, 'कोई पवित्र आत्मा के बिना यीशु को प्रभु नहीं कह सकता,' हमें अपने भले कार्यों में, यहाँ तक कि अपने छोटे से छोटे विचारों में भी, परमेश्वर की ओर दृष्टि रखने की आवश्यकता दिखाते हैं; यह जानते हुए कि उसे वे ही प्रसन्न करते हैं जिन्हें वह हम में और हमारे साथ रचता है।
इसी से हम सीखते हैं
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
कि हम उसकी सेवा नहीं कर सकते, जब तक वह हमारी जीभ, हाथों और हृदय का उपयोग करके स्वयं अपने और अपने आत्मा के द्वारा वह सब न करे जो वह हमसे कराना चाहता है।
"यदि हम सर्वथा असमर्थ न होते, तो हमारे भले कार्य हमारी अपनी सम्पत्ति होते; परन्तु अब वे पूरी तरह परमेश्वर के हैं, क्योंकि वे उसी से और उसके अनुग्रह से निकलते हैं: हमारे कार्यों को ऊँचा उठाकर और उन सबको दिव्य बनाकर, वह उनके द्वारा हम में
अपना ही आदर करता है।
"धर्म के प्रमुख नियमों में से एक यह है कि परमेश्वर की सेवा का कोई अवसर न खोएँ।
और चूँकि वह हमारी आँखों से अदृश्य है, इसलिए हमें उसकी सेवा अपने पड़ोसी में करनी चाहिए; जिसे वह ऐसे स्वीकार करता है मानो स्वयं उसी के प्रति किया गया हो, जो हमारे सामने प्रत्यक्ष खड़ा हो।
"परमेश्वर चंचल मनुष्यों से प्रेम नहीं करता, न बीच-बीच में रुक जानेवाले भले कार्यों से।
उसे कुछ भी प्रसन्न नहीं करता सिवाय उसके जिसमें उसकी अपनी अपरिवर्तनीयता की समानता हो।
"जो कार्य परमेश्वर हमें सौंपता है उस पर निरन्तर ध्यान देना ठोस भक्ति का चिह्न है।
'"' प्रेम जब हो सके और जितना हो सके उपवास करता है।
वह परमेश्वर की सब विधियों की ओर ले जाता है, और उन सब बाहरी कार्यों में लगा रहता है जिनके वह योग्य है।
वह मानो एलिय्याह के समान मैदान के ऊपर से उड़ता है, ताकि परमेश्वर को उसके पवित्र पर्वत पर पाए।
"परमेश्वर इतना महान है कि वह उसकी सेवा के लिए किए गए छोटे से छोटे कार्य को भी महानता प्रदान करता है।
"' धन्य हैं वे जो बीमार पड़ते हैं, वरन् एक भला कार्य करने के कारण अपने प्राण भी खो देते हैं।
"परमेश्वर प्रायः उस भाग को छिपाए रखता है जो उसकी सन्तानों का दूसरी आत्माओं के मन-फिराव में होता है।
फिर भी निर्भीकता से कहा जा सकता है कि जो व्यक्ति किसी अन्य की आत्मा के मन-फिराव के लिए उसके सामने बहुत समय तक आहें भरता रहा, वह आत्मा जब कभी परमेश्वर की ओर फिरती है, तो उसके मुख्य कारणों में से एक वही होता है।
" दान का अभ्यास तब तक ठीक से नहीं किया जा सकता, जब तक कि पहले, परमेश्वर जिस क्षण अवसर दे उसी क्षण हम उसे न करें; और दूसरे, उसके तुरन्त बाद एकान्त में जाकर उसे नम्र धन्यवाद के साथ परमेश्वर को अर्पित न करें
मसीही सिद्धता,
देते हुए।
और यह तीन कारणों से: पहला, जो कुछ हमने उससे पाया है वह उसे लौटा देने के लिए।
दूसरा, उस खतरनाक परीक्षा से बचने के लिए जो इन कार्यों की भलाई से ही उत्पन्न होती है।
और तीसरा, अपने आपको परमेश्वर से जोड़ने के लिए, जिसमें आत्मा प्रार्थना में अपने सब प्राप्त अनुग्रहों और किए हुए भले कार्यों के साथ फैलती है, ताकि उससे नया बल पाए, उन बुरे प्रभावों के विरुद्ध जो ये कार्य ही हम में उत्पन्न कर सकते हैं, यदि हम उन औषधियों का उपयोग न करें जो परमेश्वर ने इन विषों के विरुद्ध ठहराई हैं।
अनुग्रह की सम्पदा से फिर से भरे जाने का सच्चा उपाय इस प्रकार अपने आपको उससे रिक्त करना है; और इसके बिना भले कार्यों के अभ्यास में थक न जाना अत्यन्त कठिन है।
" भले कार्य अपनी अन्तिम सिद्धता तभी पाते हैं, जब वे मानो परमेश्वर में अपने आपको खो देते हैं।
यह उनके लिए एक प्रकार की मृत्यु है, जो हमारी देहों की मृत्यु के समान है, जो अपना सर्वोच्च जीवन, अपनी अमरता, तब तक नहीं पाएँगी जब तक वे हमारी आत्माओं की, या यों कहें कि परमेश्वर की महिमा में, जिससे वे भरी जाएँगी, अपने आपको खो न दें।
और भले कार्य इस आत्मिक मृत्यु में केवल वही खोते हैं जो उनमें पार्थिव और नश्वर था।
"अग्नि प्रेम का प्रतीक है; और परमेश्वर का प्रेम हमारे सब भले कार्यों का मूल और अन्त है।
परन्तु सत्य प्रतीक से बढ़कर है; और दिव्य प्रेम की अग्नि को भौतिक अग्नि पर यह लाभ है कि वह अपने स्रोत की ओर ऊपर लौट सकती है, और उन सब भले कार्यों को, जिन्हें वह उत्पन्न करती है, अपने साथ वहाँ ऊपर उठा ले जाती है।
और इस उपाय से वह उन्हें घमण्ड, व्यर्थ अभिमान, या किसी भी बुरी मिलावट से भ्रष्ट होने से रोकती है।
परन्तु यह इस प्रकार के सिवाय नहीं हो सकता कि इन भले कार्यों को आत्मिक रीति से परमेश्वर में मरने दिया जाए, गहरी कृतज्ञता के द्वारा, जो आत्मा को उसमें मानो अथाह कुण्ड में डुबो देती है, उस सबके साथ जो वह है, और उस सब अनुग्रह और कार्यों के साथ जिनके लिए वह उसका ऋणी है — ऐसी कृतज्ञता, जिससे आत्मा मानो अपने आपको उनसे रिक्त कर देती है, ताकि वे अपने स्रोत को लौट जाएँ, जैसे नदियाँ मानो अपने आपको रिक्त करना चाहती हैं, जब वे अपने सारे जल के साथ समुद्र में जा गिरती हैं।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
जब हमें परमेश्वर से कोई कृपा मिले, तो हमें, यदि अपनी कोठरी में नहीं तो अपने हृदय में, एकान्त में जाकर कहना चाहिए, 'हे प्रभु, जो तूने दिया है वह मैं तुझे लौटाने आया हूँ; और मैं उसे स्वेच्छा से त्यागता हूँ, ताकि फिर अपनी शून्यता में लौट जाऊँ।
क्योंकि तेरे सामने स्वर्ग या पृथ्वी का सबसे सिद्ध प्राणी भी क्या है, सिवाय एक ऐसी रिक्तता के जो तुझसे और तेरे द्वारा भरी जा सकती है; जैसे वायु, जो रिक्त और अन्धकारमय है, सूर्य के प्रकाश से भरी जा सकती है, जो उसे प्रतिदिन वापस ले लेता है ताकि अगले दिन फिर लौटा दे, क्योंकि वायु में कुछ भी नहीं जो इस प्रकाश को अपना बना ले या उसका विरोध करे? ओह, मुझे भी तेरे अनुग्रह और भले कार्यों को ग्रहण करने और लौटाने की वैसी ही सहजता दे!
मैं कहता हूँ, तेरे; क्योंकि मैं मानता हूँ कि जिस जड़ से वे फूटते हैं वह तुझ में है, मुझ में नहीं।'"'
1764 में लिखे गए प्रस्ताव।
26. सन् 1764 में, सारे विषय की समीक्षा करने पर, मैंने जो कुछ देखा था उसका सार निम्नलिखित संक्षिप्त प्रस्तावों में लिख दिया : —
"(1.) सिद्धता नाम की एक वस्तु है; क्योंकि पवित्रशास्त्र में उसका बार-बार उल्लेख हुआ है।
"(2.) यह धर्मी ठहराए जाने जितनी जल्दी नहीं मिलती; क्योंकि धर्मी ठहराए गए लोगों को ' सिद्धता की ओर आगे बढ़ते जाना' है, इब्रानियों 6:1।
"(3.) यह मृत्यु जितनी देर से भी नहीं मिलती; क्योंकि सन्त पौलुस जीवित मनुष्यों के विषय में कहता है कि वे सिद्ध थे, फिलिप्पियों 3:15।
"(4.) यह निरपेक्ष नहीं है।
निरपेक्ष सिद्धता न मनुष्य की है, न स्वर्गदूतों की, केवल परमेश्वर की है।
"(5.) यह मनुष्य को अचूक नहीं बनाती; जब तक कोई देह में रहता है, कोई अचूक नहीं है।
"(6.) क्या यह निष्पाप है? किसी शब्द के लिए विवाद करना उचित नहीं।
यह 'पाप से उद्धार' है।
"(7.) यह ' सिद्ध प्रेम' है, 1 यूहन्ना 4:18।
यही इसका सार है; इसके गुण, या अविभाज्य फल, हैं सदा आनन्दित रहना,
मसीही सिद्धता,
निरन्तर प्रार्थना करना, और हर बात में धन्यवाद करना, 1 थिस्सलुनीकियों 5:16, आदि।
(8.) यह उन्नत की जा सकती है।
यह किसी अविभाज्य बिन्दु में टिकी नहीं है, न ऐसी है कि इसमें वृद्धि न हो सके; जो प्रेम में सिद्ध किया गया है वह पहले से कहीं अधिक तेज़ी से अनुग्रह में बढ़ सकता है।
"(9.) इसे खोया जा सकता है; इसके अनेक उदाहरण हमारे पास हैं।
परन्तु हमें इसका पूरा विश्वास पाँच-छह वर्ष पहले तक नहीं हुआ था।
"(10.) इसके पहले भी और बाद में भी सदा एक क्रमिक कार्य होता है।
"(11.) परन्तु क्या यह अपने आप में तात्कालिक है या नहीं?
इसकी जाँच में हम कदम-कदम आगे बढ़ें।
"कुछ विश्वासियों में एक तात्कालिक परिवर्तन हुआ है।
इससे कोई इनकार नहीं कर सकता।
"उस परिवर्तन के बाद से वे सिद्ध प्रेम का आनन्द लेते हैं; वे यही और केवल यही अनुभव करते हैं; वे ' सदा आनन्दित रहते, निरन्तर प्रार्थना करते, और हर बात में धन्यवाद करते हैं।'
अब सिद्धता से मेरा अभिप्राय बस यही है; इसलिए ये उस सिद्धता के साक्षी हैं जिसका मैं प्रचार करता हूँ।
"'¢परन्तु कुछ में यह परिवर्तन तात्कालिक नहीं था।'
उन्होंने उस क्षण को नहीं पहचाना जब यह हुआ।
किसी मनुष्य के मरने के क्षण को पहचानना प्रायः कठिन होता है; फिर भी एक क्षण होता है जिसमें जीवन समाप्त होता है।
और यदि पाप भी समाप्त होता है, तो उसके अस्तित्व का एक अन्तिम क्षण, और उससे हमारे छुटकारे का एक प्रथम क्षण अवश्य होगा।
यदि उनमें अब यह प्रेम है, तो वे इसे खो देंगे।'
वे खो सकते हैं; परन्तु उन्हें खोना आवश्यक नहीं।
और चाहे वे खोएँ या न खोएँ, अभी यह उनके पास है; जो हम सिखाते हैं उसे वे अभी अनुभव करते हैं।
वे अभी पूर्णतः प्रेम हैं; वे अभी निरन्तर आनन्दित होते, प्रार्थना करते और स्तुति करते हैं।
'तो भी उनमें पाप केवल स्थगित है; नष्ट नहीं हुआ।'
जो चाहे कह लो।
वे आज पूर्णतः प्रेम हैं; और कल की चिन्ता नहीं करते।
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार।
'परन्तु इस सिद्धान्त का बहुत दुरुपयोग हुआ है।'
विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त का भी हुआ है।
परन्तु यह इसे, या किसी अन्य पवित्रशास्त्रीय सिद्धान्त को, छोड़ देने का कारण नहीं है।
' जब तुम अपने बच्चे को नहलाओ,' जैसा किसी ने कहा है, 'तो पानी फेंक दो; परन्तु बच्चे को मत फेंको।'
'परन्तु जो समझते हैं कि वे पाप से बचाए गए हैं, वे कहते हैं कि उन्हें मसीह की योग्यताओं की कोई आवश्यकता नहीं।'
वे तो ठीक इसके विपरीत कहते हैं।
उनकी भाषा यह है,— 'हे प्रभु, हर क्षण मुझे तेरी मृत्यु की योग्यता चाहिए!'
"उन्हें मसीह की उसके सब पदों में आवश्यकता का ऐसा गहरा, अवर्णनीय बोध पहले कभी न था, जैसा अब है।
"इसलिए हमारे सब प्रचारकों को विश्वासियों के सामने सिद्धता का प्रचार निरन्तर, दृढ़ता से और स्पष्ट रूप से करना अपना कर्तव्य बना लेना चाहिए; और सब विश्वासियों को इसी एक बात पर ध्यान देना चाहिए, और इसके लिए निरन्तर संघर्ष करना चाहिए।"
उपसंहार।
27. मैंने अब वह कर लिया जो प्रस्तावित किया था।
मैंने सरल और सीधा विवरण दिया है कि मैंने सिद्धता का सिद्धान्त पहले किस रीति से ग्रहण किया, और किस अर्थ में मैंने इसे ग्रहण किया, और किस अर्थ में आज तक ग्रहण करता और सिखाता हूँ।
उस पवित्रशास्त्रीय अभिव्यक्ति से मेरा जो अभिप्राय है, उस सबको और उसके हर भाग को मैंने घोषित कर दिया है।
मैंने उसका चित्र पूरी लम्बाई में, बिना किसी छद्म या आवरण के, खींच दिया है।
और अब मैं किसी निष्पक्ष व्यक्ति से पूछता हूँ, इसमें ऐसा भयानक क्या है?
यह सारा शोर कहाँ से आया है, जो इन बीस वर्षों और उससे अधिक से पूरे राज्य में मचाया गया है; मानो सारा मसीही धर्म नष्ट हो गया हो, और सारा धर्म जड़ से उखाड़ दिया गया हो?
ऐसा क्यों है कि सिद्धता का नाम तक मसीहियों के मुँह से निकाल दिया गया है; वरन् मानो वह सबसे घातक विधर्म हो, ऐसे ठुकराया और घृणित ठहराया गया है? परमेश्वर का भय माननेवाले मनुष्यों ने भी इसके प्रचारकों पर पागल कुत्तों के समान हूट क्यों किया है; वरन्
मसीही सिद्धता,
और उनके अपने ही बच्चों ने भी, उनमें से कुछ ने जिन्हें उन्होंने, परमेश्वर के अधीन, सुसमाचार के द्वारा जन्म दिया था?
इसका क्या कारण है, या क्या बहाना?
कारण, उचित कारण, कोई नहीं है।
हो ही नहीं सकता।
परन्तु बहाने हैं, और वे भी बहुत अधिक।
वास्तव में, यह आशंका करने का आधार है कि हमारे साथ ऐसा व्यवहार करनेवाले कुछ लोगों के लिए यह केवल बहाना है; आदि से अन्त तक यह उनके चेहरे की ही नकल मात्र है।
वे मेरे विरुद्ध अवसर चाहते थे, खोजते थे; और यहाँ उन्हें वह मिल गया जो वे खोजते थे।
"यह मिस्टर वेस्ली का सिद्धान्त है!
वह सिद्धता का प्रचार करता है!"
वह करता है; फिर भी यह उसका सिद्धान्त नहीं है, उतना ही जितना यह आपका, या किसी और का नहीं है जो मसीह का सेवक है।
क्योंकि यह उसका सिद्धान्त है, विशेष रूप से, ज़ोर देकर उसी का; यह यीशु मसीह का सिद्धान्त है।
ये उसके शब्द हैं, मेरे नहीं: 'इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है।'
और कौन कहता है, तुम नहीं हो सकते; या कम से कम तब तक नहीं जब तक तुम्हारी आत्मा देह से अलग न हो जाए?
यह सन्त पौलुस का सिद्धान्त है, सन्त याकूब का, सन्त पतरस का, और सन्त यूहन्ना का; और यह मिस्टर वेस्ली का केवल उसी अर्थ में है जिसमें यह हर उस व्यक्ति का है जो शुद्ध और सम्पूर्ण सुसमाचार का प्रचार करता है।
मैं तुम्हें जितना स्पष्ट बोल सकता हूँ, बताता हूँ कि मैंने यह कहाँ और कब पाया।
मैंने इसे परमेश्वर के वचनों में पाया, पुराने और नए नियम में; जब मैंने उन्हें पढ़ा तो मेरा कोई और उद्देश्य या इच्छा नहीं थी, केवल अपनी आत्मा को बचाना।
परन्तु यह सिद्धान्त चाहे किसी का भी हो, मैं आपसे पूछता हूँ, इसमें क्या हानि है?
इसे फिर देखिए; हर ओर से इसका सर्वेक्षण कीजिए, और वह भी पूरे ध्यान से।
एक दृष्टि से, यह मंशा की शुद्धता है, सारे जीवन को परमेश्वर को समर्पित करना।
यह परमेश्वर को अपना सारा हृदय देना है; यह एक ही इच्छा और उद्देश्य है जो हमारे सब स्वभावों पर शासन करता है।
यह अपनी आत्मा, देह और सम्पत्ति का एक भाग नहीं, बल्कि सब कुछ परमेश्वर को समर्पित करना है।
दूसरी दृष्टि से, यह वह सारा मन है जो मसीह में था, जो हमें वैसे चलने में समर्थ करता है जैसे मसीह चला।
यह हृदय का सब मलिनता से खतना है, सब
जॉन वेस्ली की शिक्षा के अनुसार
भीतरी तथा बाहरी अशुद्धता से।
यह हृदय का परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वरूप में नवीनीकरण है, अपने सृजनहार की पूरी समानता में।
एक और दृष्टि से, यह परमेश्वर से अपने सारे हृदय से, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना है।
अब, इनमें से जिस दृष्टि से चाहें इसे लीजिए (क्योंकि इसमें कोई भौतिक अन्तर नहीं), यही सम्पूर्ण और एकमात्र सिद्धता है, जैसा लेखों की एक शृंखला प्रमाणित रूप से सिद्ध करती है, जिसे मैंने इन चालीस वर्षों से माना और सिखाया है, सन्
1725 से सन् 1765 तक।
28. अब इस सिद्धता को उसके स्वाभाविक रूप में प्रकट होने दीजिए, और कौन इसके विरुद्ध एक शब्द भी कह सकता है?
क्या कोई यह साहस करेगा कि प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय से, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के विरुद्ध बोले? हृदय के नवीनीकरण के विरुद्ध, जो केवल आंशिक नहीं बल्कि परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वरूप में हो?
वह कौन है जो देह और आत्मा दोनों की सब मलिनता से शुद्ध किए जाने के विरुद्ध, या उस सारे मन के होने के विरुद्ध जो मसीह में था, और सब बातों में वैसे चलने के विरुद्ध जैसे मसीह चला, अपना मुँह खोलेगा? अपने को मसीही कहनेवाला कौन मनुष्य इतना ढीठ है कि अपनी आत्मा, देह और सम्पत्ति का एक भाग नहीं, बल्कि सब कुछ परमेश्वर को समर्पित करने पर आपत्ति करे?
कौन गम्भीर मनुष्य परमेश्वर को सारा हृदय देने, और एक ही इच्छा के हमारे सब स्वभावों पर शासन करने का विरोध करेगा?
मैं फिर कहता हूँ, इस मसीही सिद्धता को अपने ही रूप में प्रकट होने दीजिए, और कौन इसके विरुद्ध लड़ेगा?
इसका विरोध करने से पहले इसे वेश बदलकर छिपाना पड़ता है।
पहले इसे भालू की खाल ओढ़ानी पड़ती है, नहीं तो जंगली पशु समान लोग भी इसे फाड़ खाने के लिए मुश्किल से तैयार होंगे।
परन्तु वे जो भी करें, परमेश्वर की सन्तानें अब और परमेश्वर के स्वरूप से न लड़ें।
मसीह के अंग उस सारे मन के विरुद्ध कुछ न कहें जो मसीह में था।
जो परमेश्वर के लिए जीवित हैं, वे सारे जीवन को उसे समर्पित करने का विरोध न करें।
आप जिनके हृदय में उसका प्रेम उँडेला गया है, उसे अपना सारा हृदय देने का विरोध क्यों करें?
क्या आपके भीतर का सब कुछ यह नहीं पुकारता, 'ओह, जो उसे प्रेम करता है वह क्या उसे पर्याप्त प्रेम कर सकता है?'
कैसी
मसीही सिद्धता,
दया की बात है कि जो उसे प्रसन्न करना चाहते और उसका उद्देश्य रखते हैं, उनके कोई और उद्देश्य या इच्छा हो!
और इससे भी अधिक कि वे इस एक इच्छा और उद्देश्य के हर स्वभाव पर शासन करने से, घातक भ्रम समझकर डरें, वरन् परमेश्वर के लिए घृणित वस्तु समझकर उससे घृणा करें!
भक्त लोग अपनी आत्मा, देह और सम्पत्ति को पूरी तरह परमेश्वर को समर्पित करने से क्यों डरें? मसीह से प्रेम करनेवाले इस विचार को विनाशकारी भूल क्यों मानें कि हम में वह सारा मन हो सकता है जो उसमें था?
हम मानते हैं, हम दृढ़ता से कहते हैं, कि हम मसीह की धार्मिकता और लहू के द्वारा मुफ़्त में धर्मी ठहराए जाते हैं।
और आप हम पर इतने क्रोधित क्यों हैं, क्योंकि हम यह भी आशा करते हैं कि उसके आत्मा के द्वारा पूर्ण रूप से पवित्र किए जाएँ?
हम न तो पाप के खुले सेवकों से, न उनसे जिनके पास केवल भक्ति का बाहरी रूप है, किसी कृपा की आशा रखते हैं।
परन्तु आप, जो आत्मा में परमेश्वर की आराधना करते हैं, जिनका " उस खतने से खतना हुआ है जो हाथों से नहीं किया गया," कब तक उन लोगों के विरुद्ध मोर्चा बाँधे रहेंगे जो हृदय का पूर्ण खतना चाहते हैं, जो देह और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध होने और परमेश्वर के भय में पवित्रता को सिद्ध करने के प्यासे हैं?
क्या हम आपके शत्रु हैं क्योंकि हम उस शारीरिक मन से पूर्ण छुटकारे की आशा रखते हैं जो परमेश्वर से बैर है?
नहीं, हम आपके भाई हैं, हमारे प्रभु की दाख की बारी में आपके सहकर्मी, यीशु के राज्य और धीरज में आपके साथी।
यद्यपि यह हम मान लेते हैं (यदि इसमें हम मूर्ख हैं, तो मूर्ख समझकर ही हमें सह लीजिए), कि हम आशा करते हैं कि
परमेश्वर से अपने सारे हृदय से, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करेंगे।
हाँ, हम विश्वास करते हैं कि वह इस संसार में ही अपने पवित्र
आत्मा की प्रेरणा से "हमारे हृदयों के विचारों को ऐसा शुद्ध करेगा कि हम सिद्धता से उससे प्रेम करें, और योग्य रीति से उसके पवित्र नाम की महिमा करें।" — Works, vol. vi. p. 483. [वेस्ली की रचनाएँ, खण्ड 6, पृ. 483]
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सिद्धता पर वेस्ली
परमेश्वर के वचन को छोड़कर किसी मनुष्य ने "मसीही सिद्धता" के विषय में जॉन वेस्ली से अधिक सटीक बात नहीं कही। मिस्टर वेस्ली ने इस सिद्धान्त को आरम्भ नहीं किया; वह
परमेश्वर का साधन था जिसने इस महिमामय सत्य को मध्ययुगीन सदियों के अन्धेरे धर्मशास्त्रीय कारागारों से बाहर निकाला, जहाँ वह कलीसियाई उपेक्षा और अज्ञान की धूल से ढका पड़ा था।
जैसा बिशप मैलालियू ने घोषित किया, 'जॉन वेस्ली और मेथोडिस्ट मत का मिशन कैल्विनवादी नियतिवाद के अतर्कसंगत, अतार्किक और अशास्त्रीय मतों को नष्ट करना रहा है, और यह कि परमेश्वर हर उस आत्मा का धर्मी ठहरानेवाला है जो सच्चे पश्चात्ताप में यीशु मसीह को प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करती है।" इसी अन्त के लिए और इसी उद्देश्य से यह पुस्तक पुनः छापी गई है।
मसीही सिद्धता पर मिस्टर वेस्ली का अन्तिम वचन यहाँ है।
मेथोडिस्ट। इस बहुत निन्दित सिद्धान्त को छुटकारे की व्यवस्था में उसके सच्चे शास्त्रीय स्थान पर उठाया गया है।
युवा और वृद्ध दोनों के लिए स्पष्ट बाइबिलीय भेद प्रस्तुत किए गए हैं। इस ग्रन्थ में वह सब है जो मिस्टर वेस्ली ने बोला, प्रचार किया या लिखा, चाहे पत्रों में, उपदेशों में, या दैनन्दिनियों में। स्रोत भी सहज उपलब्ध हैं। यह पुस्तक उन प्रचारकों, धर्मशास्त्रियों, सेमिनरी प्राध्यापकों और अन्य लोगों के लिए नितान्त अनिवार्य है जो "हृदय की पवित्रता" के महिमामय सिद्धान्त से प्रेम करते और उसकी वकालत करते हैं।
! i Schmul 978088019266 @1. | Wesleyan Book € 44/98/2019 2:25-2 [अस्पष्ट मूल पाठ]
