अध्याय 5 / 6

धर्मी ठहराए गए विश्वासी भीतर बसे पाप के विषय में कायल किए जाते हैं

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धर्मी ठहराए गए विश्वासी भीतर बसे पाप के विषय में कायल किए जाते हैं

जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।

खण्ड VI।

धर्मी ठहराए गए विश्वासी भीतर बसे पाप के विषय में कायल किए जाते हैं।

"यह कल्पना करना सरल नहीं कि जो वह अब अनुभव करता है और जो उसने पहले अनुभव किया था, उनमें कितना अन्तर है।

'जब तक यह सार्वभौमिक परिवर्तन उसकी आत्मा में नहीं हुआ था, उसकी सारी पवित्रता मिश्रित थी।

वह नम्र था, पर पूरी तरह नहीं; उसकी नम्रता में घमण्ड मिला था: वह दीन था, पर उसकी दीनता बार-बार क्रोध से टूट जाती थी,

या किसी बेचैन और उग्र आवेश से।

परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम बार-बार किसी प्राणी के प्रेम से मन्द पड़ जाता था; अपने पड़ोसी के प्रति प्रेम बुरे सन्देह से, या प्रेम के विपरीत किसी विचार से, यदि स्वभाव से नहीं।

उसकी इच्छा पूरी तरह परमेश्वर की इच्छा में पिघल नहीं गई थी; यद्यपि सामान्यतः वह कह सकता था, मैं 'अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजनेवाले की इच्छा पूरी करने आया हूँ;' तौभी कभी-कभी स्वभाव विद्रोह करता था, और वह स्पष्ट रूप से नहीं कह सकता था, 'हे प्रभु, मेरी इच्छा नहीं, परन्तु तेरी इच्छा पूरी हो।'

उसकी सारी आत्मा अब अपने आप से सुसंगत है; कोई बेसुरा तार नहीं।"—उपदेश, खण्ड ii. पृ. 222।

"इस शान्ति में वे दिनों, या सप्ताहों, या महीनों तक बने रहते हैं, और साधारणतः मान लेते हैं कि अब वे युद्ध को फिर नहीं जानेंगे, जब तक उनके कुछ पुराने शत्रु, उनके हृदय के पाप, या वह पाप जो उन्हें सबसे सहज ही उलझा लेता था (शायद क्रोध या अभिलाषा), उन पर फिर आक्रमण न करे, और उन्हें गिराने के लिए ज़ोर से धक्का न दे।

तब भय उठता है कि वे अन्त तक स्थिर न रह सकेंगे, और प्रायः सन्देह होता है कि कहीं परमेश्वर उन्हें भूल तो नहीं गया, या कहीं उन्होंने यह सोचकर अपने आप को धोखा तो नहीं दिया कि उनके पाप क्षमा हो गए और वे परमेश्वर की सन्तान हैं।

इन बादलों के नीचे, विशेषकर यदि वे शैतान से तर्क करें,

मसीही सिद्धता,

या सन्देहपूर्ण वाद-विवादों में पड़ जाएँ, तो वे दिन भर शोक करते फिरते हैं, जैसे पिता अपने इकलौते प्रिय पुत्र के लिए शोक करता है। परन्तु शीघ्र ही उनका प्रभु स्वयं उनके पक्ष में उत्तर देता है, और उन्हें शान्ति देने के लिए पवित्र आत्मा भेजता है, कि वह निरन्तर उनकी आत्मा के साथ गवाही दे कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं।

और तब वे सचमुच नम्र, कोमल, और सीखने को तत्पर होते हैं, जैसे छोटे बच्चे।

पापों की क्षमा पाने से पहले उनका पथरीला हृदय टुकड़े-टुकड़े किया गया था; फिर भी वह कठोर बना रहा; परन्तु अब वह पिघल गया है, कोमल, नरम, और हर प्रभाव को ग्रहण करनेवाला है।

और अब पहली बार वे अपने हृदय की तह को देखते हैं; जिसे परमेश्वर ने पहले उन पर प्रकट नहीं किया था, कहीं ऐसा न हो कि शरीर उसके सामने, और वह आत्मा जिसे उसने बनाया है, निर्बल हो जाए।

अब वे वहाँ सब छिपी हुई घृणित बातें देखते हैं; घमण्ड, अहं और नरक की गहराइयाँ: फिर भी, अपने भीतर यह गवाही पाकर,—तू 'परमेश्वर का वारिस, मसीह के साथ सह-वारिस' है; तू 'नए आकाश और नई पृथ्वी का, जिन में धार्मिकता वास करती है, अधिकारी होगा,'—उनकी आत्मा अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर में आनन्दित होती है, इस अग्निमय परीक्षा के बीच भी, जो निरन्तर उस तीव्र बोध को बढ़ाती है कि वे अपनी सहायता आप नहीं कर सकते, और उस अवर्णनीय भूख को भी जो वे उसके स्वरूप में, धार्मिकता और सच्ची पवित्रता में पूर्ण नवीनीकरण के लिए अनुभव करते हैं।

तब परमेश्वर उनकी इच्छा का ध्यान रखता है जो उसका भय मानते हैं: वह अपनी पवित्र वाचा को स्मरण करता है, और उन्हें एकाग्र दृष्टि और शुद्ध हृदय देता है।

वह उन पर अपना ही स्वरूप और छाप लगा देता है; वह उन्हें मसीह यीशु में नए सिरे से सृजता है;

वह अपने पुत्र और अपने धन्य आत्मा के साथ उनके पास आता है, और उनकी आत्माओं में अपना निवास बनाकर उन्हें उस 'विश्राम में पहुँचाता है जो परमेश्वर के लोगों के लिए बाकी है।' "—रचनाएँ, खण्ड vii. पृ. 597।

"वहाँ से मैं छः-सात मील घोड़े पर टोनी-लोमोन [Tonny-Lommon] गया, जहाँ बिलकुल दूसरी तरह की मण्डली थी।

उनमें से बड़ा भाग जानता था कि उसने किस पर विश्वास किया है; सब गहरे और स्थिर ध्यान से सुन रहे थे; और अनेक भीतरी पाप के विषय में पूरी तरह कायल हो चुके थे

जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।

और पूर्ण छुटकारे के लिए कराह रहे थे।"—जर्नल, मई, 1769।

"क्योंकि जो यह समझता था कि सारा पाप जा चुका है, वह शीघ्र ही अनुभव करता है कि उसके हृदय में घमण्ड है।

वह कायल हो जाता है कि अनेक बातों में उसने अपने आप को जितना समझना चाहिए उससे अधिक समझा है, और कि उसने किसी ऐसी बात की प्रशंसा अपने ऊपर ले ली जो उसे मिली थी, और उसमें ऐसे घमण्ड किया मानो उसे मिली ही न हो; और फिर भी वह जानता है कि वह परमेश्वर की कृपा में है।

वह 'अपने हियाव को' नहीं छोड़ सकता, और न उसे छोड़ना चाहिए।

'आत्मा' अब भी उसकी 'आत्मा के साथ गवाही देता है कि वह परमेश्वर की सन्तान है।'

"न ही शीघ्र ही वह अपने हृदय में स्वेच्छाचार को अनुभव करने से रहता है; ऐसी इच्छा जो परमेश्वर की इच्छा के विपरीत है,—ऐसी इच्छा जो हर मनुष्य में अनिवार्य रूप से होगी, जब तक उसमें समझ है।

यह मानव स्वभाव का, वास्तव में हर बुद्धिमान प्राणी के स्वभाव का आवश्यक अंग है।

हमारे धन्य प्रभु की भी मनुष्य के रूप में एक इच्छा थी; नहीं तो वह मनुष्य न होता।

परन्तु उसकी मानवीय इच्छा सदा अपने पिता की इच्छा के अधीन थी।

हर समय और हर अवसर पर, यहाँ तक कि गहरी से गहरी पीड़ा में भी, वह कह सकता था, 'मेरी इच्छा नहीं, परन्तु तेरी इच्छा पूरी हो।'

परन्तु मसीह के सच्चे विश्वासी के साथ भी यह हर समय नहीं होता।

वह प्रायः अपनी इच्छा को न्यूनाधिक परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध उठते पाता है।

वह किसी बात की इच्छा करता है क्योंकि वह स्वभाव को भाती है, पर परमेश्वर को नहीं भाती; और वह किसी बात की इच्छा नहीं करता (उससे विमुख होता है) क्योंकि वह स्वभाव को पीड़ादायक है, जबकि वही उसके विषय में परमेश्वर की इच्छा है।

वास्तव में, यदि वह विश्वास में बना रहता है, तो वह अपनी सारी शक्ति से उससे लड़ता है: परन्तु यही बात दर्शाती है कि वह सचमुच है, और वह उसके प्रति सचेत है।

"और क्या हम ऐसे अन्य स्वभाव अनुभव नहीं करते जो पड़ोसी के प्रेम के उतने ही विपरीत हैं जितने ये परमेश्वर के प्रेम के?

पड़ोसी का प्रेम 'बुरा नहीं सोचता।'

क्या हम इस प्रकार की कोई बात नहीं पाते?

क्या हम कभी कोई डाह, कोई बुरे सन्देह, कोई निराधार या अनुचित शंकाएँ नहीं पाते?

जो इन बातों में निर्दोष हो, वही अपने पड़ोसी पर

मसीही सिद्धता,

पहला पत्थर फेंके।

कौन कभी ऐसे अन्य स्वभाव या भीतरी हलचलें अनुभव नहीं करता, जिन्हें वह जानता है कि भाईचारे के प्रेम के विपरीत हैं?

यदि द्वेष, घृणा या कड़वाहट कुछ नहीं, तो क्या ईर्ष्या का कोई स्पर्श नहीं, विशेषकर उनके प्रति जो किसी वास्तविक या कल्पित भलाई का आनन्द लेते हैं जिसकी हम इच्छा करते हैं पर पा नहीं सकते?

क्या जब हमारा अपमान या अनादर किया जाता है, विशेषकर उनके द्वारा जिन्हें हमने विशेष रूप से प्रेम किया और जिनकी सहायता और भलाई के लिए सबसे अधिक परिश्रम किया, तब हम कभी किसी मात्रा में रोष नहीं पाते?

क्या अन्याय या कृतघ्नता हम में कभी बदला लेने की इच्छा नहीं जगाती?

और 'भलाई से बुराई को जीतने' के स्थान पर बुराई के बदले बुराई करने की इच्छा?

यह भी दर्शाता है कि हमारे हृदय में अब भी कितना कुछ है जो पड़ोसी के प्रेम के विपरीत है।'"—'"विश्वासियों का पश्चाताप।'—उपदेश, खण्ड i. पृ. 116।

"शुक्रवार, 13 को, लगभग तीस व्यक्ति रात्रि के लगभग आठ बजे ओटली में एकत्र हुए, कि (हमेशा की तरह) प्रार्थना करें, भजन गाएँ, और एक-दूसरे को प्रेम और भले कामों के लिए उकसाएँ।

प्रार्थना समाप्त होने के बाद, जब वे अपनी आत्माओं की अलग-अलग दशाओं के विषय में बोलने लगे, तब कुछ ने गहरी आहों और कराहों के साथ भीतर बसे पाप के अवशेषों का बोझ बताया, यह पहले से कहीं अधिक स्पष्ट प्रकाश में देखते हुए कि उससे छुटकारे की आवश्यकता है।"

—जर्नल, फरवरी, 1760।

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