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खण्ड IV

जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।

खण्ड IV।

धर्मी ठहराई हुई और नया जन्म पाई हुई दशा में

पाप करना

सम्भव नहीं।

"इस विश्वास का, जिससे हम परमेश्वर से जन्म लेते हैं, एक तात्कालिक और निरन्तर फल, ऐसा फल जो उससे किसी प्रकार अलग नहीं हो सकता, नहीं, एक घण्टे के लिए भी नहीं, पाप पर सामर्थ्य है,—हर प्रकार के बाहरी पाप पर सामर्थ्य; हर बुरे वचन और कर्म पर।

. .

'जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता, क्योंकि उसका बीज उसमें बना रहता है; और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह परमेश्वर से जन्मा है'

(1 यूहन्ना 3:9)।

परन्तु कुछ लोग कहेंगे, 'ठीक है; जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह आदतन पाप नहीं करता।'

आदतन!

यह कहाँ से आया?

मैं इसे नहीं पढ़ता।

यह पवित्र पुस्तक में लिखा नहीं है।

परमेश्वर स्पष्ट कहता है, 'वह पाप नहीं करता;' और तू जोड़ता है आदतन!

तू कौन है जो परमेश्वर के वचनों को सुधारता है?

हम प्रेरित को अनुमति दें कि वह अपने शब्दों की व्याख्या अपने सम्पूर्ण प्रवचन के भाव से करे।

इसी अध्याय की पाँचवीं आयत में उसने कहा था, 'तुम जानते हो कि वह (मसीह) इसलिए प्रगट हुआ कि पापों को हर ले जाए; और उसमें कोई पाप नहीं।'

वह इससे क्या निष्कर्ष निकालता है?

'जो कोई उसमें बना रहता है वह पाप नहीं करता; जो कोई पाप करता है, उसने न तो उसे देखा है और न उसे जाना है'

इस महत्त्वपूर्ण शिक्षा पर बल देने से पहले वह एक अत्यन्त आवश्यक चेतावनी देता है,—'हे बालको, किसी के बहकावे में न आना' (आयत 7); क्योंकि बहुत से ऐसा करने का यत्न करेंगे, तुम्हें समझाएँगे कि तुम अधर्मी रहकर, पाप करते हुए भी परमेश्वर की सन्तान हो सकते हो; 'जो धार्मिकता का काम करता है

मसीही सिद्धता,

वह धर्मी है, जैसा वह धर्मी है।

जो पाप करता है वह शैतान की ओर से है, क्योंकि शैतान आरम्भ से पाप करता आया है।'

फिर आगे आता है:

'जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; क्योंकि उसका बीज उसमें बना रहता है, और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह परमेश्वर से जन्मा है।'

प्रेरित आगे कहता है, 'इसी से परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान प्रगट होती हैं।'

इसी स्पष्ट चिह्न से (पाप करना या न करना) वे एक-दूसरे से पहचाने जाते हैं।

पाँचवें अध्याय के ये शब्द भी इसी आशय के हैं:

'हम जानते हैं कि जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; पर जो परमेश्वर से उत्पन्न हुआ, उसे वह सुरक्षित रखता है, और वह दुष्ट उसे छूता नहीं' (आयत 18)।"—उपदेश, खण्ड i. पृ. 155।

"कोई भी जो ऊपर वर्णित रीति से परमेश्वर से जन्मा है, जो निरन्तर परमेश्वर की ओर से जीवन का श्वास, अर्थात् उसके आत्मा का अनुग्रहपूर्ण प्रभाव अपनी आत्मा में ग्रहण करता है और निरन्तर उसे लौटा देता है; जो इस प्रकार विश्वास करता और प्रेम करता है, जो विश्वास के द्वारा अपनी आत्मा पर परमेश्वर के निरन्तर कार्यों को पहचानता है और एक प्रकार की आत्मिक प्रतिक्रिया से जो अनुग्रह पाता है उसे अटूट प्रेम, स्तुति और प्रार्थना में लौटा देता है; वह न केवल जब तक अपने आप को इस प्रकार सुरक्षित रखता है तब तक पाप नहीं करता, वरन् जब तक यह 'बीज उसमें बना रहता है, वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह परमेश्वर से जन्मा है।'

"पाप से मेरा यहाँ अभिप्राय बाहरी पाप से है, शब्द के सादे, सामान्य अर्थ के अनुसार; व्यवस्था का वास्तविक, स्वेच्छा से किया गया उल्लंघन; परमेश्वर की प्रकट की हुई, लिखित व्यवस्था का; परमेश्वर की किसी भी आज्ञा का, जो उस समय, जब उसका उल्लंघन किया जाता है, आज्ञा के रूप में पहचानी जाती हो।

परन्तु 'जो कोई परमेश्वर से जन्मा है'; जब तक वह विश्वास और प्रेम में, और प्रार्थना और धन्यवाद की आत्मा में बना रहता है, इस प्रकार न केवल पाप नहीं करता, वरन् कर ही नहीं सकता।

जब तक वह मसीह के द्वारा परमेश्वर पर इस प्रकार विश्वास करता है, उससे प्रेम करता है, और उसके सामने अपना हृदय उँडेलता रहता है, तब तक वह परमेश्वर की किसी आज्ञा का स्वेच्छा से उल्लंघन नहीं कर सकता, न कोई ऐसी बात कहकर या करके जिसे वह जानता है कि परमेश्वर ने मना किया है; जब तक वह बीज जो उसमें बना रहता है, अर्थात् वह प्रेममय, प्रार्थनामय, धन्यवादी विश्वास, उसे विवश करता

जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।

है कि वह हर उस बात से दूर रहे जिसे वह जानता है कि परमेश्वर की दृष्टि में घृणित है।''—उपदेश, खण्ड i. पृ. 164।

"परन्तु मसीह में बालक भी इस अर्थ में सिद्ध हैं, या परमेश्वर से जन्मे हैं (यह वाक्यांश भी भिन्न-भिन्न अर्थों में लिया गया है) कि सबसे पहले, वे पाप नहीं करते।

अब परमेश्वर का वचन स्पष्ट घोषणा करता है कि जो धर्मी ठहराए गए हैं, जिन्होंने निम्नतम अर्थ में भी नया जन्म पाया है, वे भी पाप में बने नहीं रहते; वे उसमें 'आगे को जीवित नहीं रह सकते'

(रोमियों 6:1, 2); कि वे मसीह की 'मृत्यु की समानता में उसके साथ जुड़ गए हैं'

(आयत 5); कि उनका 'पुराना मनुष्यत्व उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया,' पाप का शरीर नष्ट किया गया, कि वे आगे को पाप के दास न रहें; कि मसीह के साथ मर जाने से वे पाप से मुक्त हैं (आयत 6 और 7); कि वे 'पाप के लिए मरे हुए और परमेश्वर के लिए जीवित' हैं

(आयत 11); कि 'पाप का उन पर कोई प्रभुत्व नहीं होगा'; जो 'व्यवस्था के अधीन नहीं, परन्तु अनुग्रह के अधीन' हैं; परन्तु ये 'पाप से मुक्त होकर' धार्मिकता के दास बन गए हैं (आयत 14 और 18)।''-—उपदेश, खण्ड i. पृ. 359।

"जो विश्वास के द्वारा परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; पहला, किसी आदतन पाप से नहीं, क्योंकि हर आदतन पाप राज्य करनेवाला होता है, परन्तु पाप किसी विश्वास करनेवाले में राज्य नहीं कर सकता।

न दूसरा, किसी जानबूझकर किए गए पाप से, क्योंकि जब तक वह उस विश्वास में बना रहता है उसकी इच्छा सब पाप के पूर्णतः विरुद्ध होती है, और वह उससे घातक विष की तरह घृणा करता है।

न तीसरा, किसी पापमय अभिलाषा से; क्योंकि वह निरन्तर परमेश्वर की पवित्र और सिद्ध इच्छा की अभिलाषा करता है; और अपवित्र अभिलाषा की किसी भी प्रवृत्ति को वह परमेश्वर के अनुग्रह से जन्म लेते ही दबा देता है।

न चौथा, वह दुर्बलताओं से पाप करता है, चाहे कर्म में, वचन में या विचार में; क्योंकि उसकी दुर्बलताओं में उसकी इच्छा की सहमति नहीं होती; और इसके बिना वे यथार्थ में पाप नहीं हैं।

इस प्रकार, 'जो परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता।'

और यद्यपि वह यह नहीं कह सकता कि उसने पाप नहीं किया, तौभी अब वह पाप नहीं करता।"—उपदेश, खण्ड i.

पृ. 16 [P16]।

"यद्यपि वे अपने भीतर कड़वाहट की जड़ को अनुभव करते हैं, तौभी वे ऊपर से सामर्थ्य पाए हुए हैं कि उसे निरन्तर पैरों तले कुचलते रहें, ताकि वह 'उगकर

मसीही सिद्धता,

उन्हें कष्ट न दे;' यहाँ तक कि हर नया आक्रमण जो वे सहते हैं, उन्हें केवल यह पुकारने का नया अवसर देता है,

'परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जय देता है।'"—उपदेश, खण्ड i. पृ. 69।

जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।

खण्ड V।

धर्मी ठहराए गए विश्वासियों पर कोई दण्ड की आज्ञा नहीं।

"यद्यपि उन्हें निरन्तर कायल किया जाता है कि उनके हर कार्य से पाप चिपका है; यद्यपि वे जानते हैं कि वे अपने विचारों, वचनों या कर्मों में सिद्ध व्यवस्था को पूरा नहीं करते; यद्यपि वे जानते हैं कि वे प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय, सारे मन, सारे प्राण और सारी शक्ति से प्रेम नहीं करते; यद्यपि वे अनुभव करते हैं कि थोड़ा-बहुत घमण्ड या स्वेच्छाचार उनके सर्वोत्तम कर्तव्यों में चुपके से घुसकर मिल जाता है।

फिर भी उन पर अब भी कोई दण्ड की आज्ञा नहीं, न परमेश्वर की ओर से, न उनके अपने हृदय की ओर से।"

'उन पर, जो 'आत्मा के अनुसार चलते हैं,' भीतरी पाप के कारण, जो अब भी बचा है, कोई दण्ड की आज्ञा नहीं, जब तक वे उसके आगे झुकते नहीं; और न उस पाप के कारण जो उनके हर कार्य से चिपका है।

तब अपने हृदय में अभक्ति के बने रहने पर भी अपने आप को मत कुढ़ा।"

"तीसरे, वे भीतरी पाप के लिए दोषी नहीं ठहराए जाते, चाहे वह अब भी बना है।

कि स्वभाव की भ्रष्टता अब भी बनी है, उनमें भी जो विश्वास के द्वारा परमेश्वर की सन्तान हैं; कि उनमें घमण्ड और अहंकार, क्रोध, वासना और बुरी अभिलाषा के बीज हैं; हाँ, हर प्रकार का पाप; यह इतना स्पष्ट है कि इससे इनकार नहीं किया जा सकता, यह प्रतिदिन के अनुभव की बात है।

और इसी कारण सन्त पौलुस उनसे बात करते हुए जिनके विषय में वह अभी गवाही दे चुका था कि वे 'मसीह

यीशु में' हैं

(1 कुरिन्थियों 1:2, 9), कि 'परमेश्वर ने उन्हें अपने पुत्र यीशु मसीह की सहभागिता में बुलाया है;' फिर भी घोषित करता है, 'हे भाइयो, मैं तुम से इस रीति से बातें न कर सका जैसे आत्मिक लोगों से, परन्तु जैसे शारीरिक लोगों से, अर्थात् उनसे जो मसीह में बालक हैं' (1 कुरिन्थियों 3:1)।"

मसीही सिद्धता,

"और फिर भी इस सब के बावजूद वे दोषी नहीं ठहराए जाते।

यद्यपि वे अपने भीतर शरीर, बुरे स्वभाव को अनुभव करते हैं; यद्यपि वे दिन-प्रतिदिन अधिक जानते जाते हैं कि उनका 'हृदय धोखेबाज़ और असाध्य रूप से दुष्ट है;' तौभी जब तक वे उसके आगे नहीं झुकते; जब तक वे शैतान को स्थान नहीं देते; जब तक वे सब पाप से, घमण्ड, क्रोध, अभिलाषा से निरन्तर युद्ध करते रहते हैं, ताकि शरीर का उन पर प्रभुत्व न हो, परन्तु वे अब भी 'आत्मा के अनुसार चलें;' तब तक 'उन पर, जो मसीह यीशु में हैं, कोई दण्ड की आज्ञा नहीं।"

"उन पर किसी ऐसी बात के लिए दण्ड की आज्ञा नहीं जिसे रोकना उनके वश में नहीं; चाहे वह भीतरी स्वभाव की हो या बाहरी, और चाहे कुछ करना हो या कुछ न करना।

उदाहरण के लिए, प्रभु-भोज दिया जाना है; पर तुम उसमें सम्मिलित नहीं होते।

तुम क्यों नहीं होते?

तुम बीमारी से बँधे हो; इसलिए तुम उसे छोड़ने से बच नहीं सकते; इसी कारण तुम दोषी नहीं ठहराए जाते।

कोई दोष नहीं, क्योंकि कोई चुनाव नहीं।

क्योंकि यदि 'मन की तैयारी हो तो वह उसके अनुसार ग्रहण किया जाता है जो उसके पास है, उसके अनुसार नहीं जो उसके पास नहीं।' "?

"वे दुर्बलता के पापों के लिए, जैसा उन्हें साधारणतः कहा जाता है, दोषी नहीं ठहराए जाते।

शायद उन्हें दुर्बलताएँ ही कहना उचित होगा, ताकि हम उन्हें दुर्बलता के साथ जोड़कर पाप का किसी प्रकार समर्थन या उसे हल्का करते न दिखें।

परन्तु (यदि हमें ऐसी अस्पष्ट और खतरनाक अभिव्यक्ति रखनी ही पड़े), दुर्बलता के पापों से मेरा अभिप्राय ऐसी अनजानी भूलों से होगा, जैसे कोई बात जिसे हम सच मानते हैं कहना, जबकि वास्तव में वह झूठ निकले; या अपने पड़ोसी को बिना जाने या चाहे हानि पहुँचाना, शायद तब जब हमने उसकी भलाई करनी चाही थी।

यद्यपि ये परमेश्वर की पवित्र, भावती और सिद्ध इच्छा से विचलन हैं, तौभी ये यथार्थ में पाप नहीं हैं, और न 'उन पर जो मसीह यीशु में हैं' उनके विवेक पर कोई दोष लाते हैं।"

—उपदेश, खण्ड i. पृ. 70-73।

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