अध्याय 3 / 6

नया जन्म और पूर्ण पवित्रीकरण एक समान नहीं

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नया जन्म और पूर्ण पवित्रीकरण एक समान नहीं

जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।

खण्ड III [ITI]।

नया जन्म और पूर्ण पवित्रीकरण एक

समान नहीं।

"सोमवार, 28।—मैं लेविशम चला गया, और 'विश्वासियों में पाप' पर उपदेश लिखा, ताकि उस भूल को दूर किया जा सके जिसे कुछ लोग फैलाने में लगे थे,—कि जो धर्मी ठहराए गए हैं उनमें कोई पाप नहीं है।",—जर्नल, अप्रैल, 1762।

"तो क्या उसमें पाप है जो मसीह में है?

क्या उस पर विश्वास करनेवाले में पाप बना रहता है?

क्या परमेश्वर से जन्मे हुओं में कोई पाप है, या वे उससे पूरी तरह छुड़ाए जा चुके हैं?

कोई यह न समझे कि यह केवल जिज्ञासा का प्रश्न है; या यह कि इसका निर्णय एक प्रकार से हो या दूसरे प्रकार से, इससे कुछ विशेष अन्तर नहीं पड़ता।

बल्कि, यह हर गम्भीर मसीही के लिए अत्यन्त महत्त्व की बात है; इसका समाधान उसके वर्तमान और अनन्त सुख दोनों से बहुत निकट का सम्बन्ध रखता है।

"और फिर भी मुझे नहीं पता कि आदिम कलीसिया में कभी इस पर विवाद हुआ हो।

वास्तव में इस विषय में विवाद की कोई गुंजाइश ही नहीं थी, क्योंकि सभी मसीही एकमत थे।

और जहाँ तक मैंने देखा है, प्राचीन मसीहियों का सारा समूह, जिन्होंने हमारे लिए कुछ भी लिखित छोड़ा है, एक स्वर से घोषणा करता है कि मसीह में विश्वास करनेवालों को भी, जब तक वे 'प्रभु में और उसकी शक्ति के प्रभाव में बलवन्त' नहीं हो जाते, 'प्रधानों और अधिकारियों' से ही नहीं, वरन् 'लहू और मांस' से, अर्थात् एक बुरे स्वभाव से भी 'लड़ना' पड़ता है।

"और इस विषय में हमारी अपनी कलीसिया (जैसा कि वस्तुतः अधिकांश बातों में) ठीक आदिम कलीसिया का अनुसरण करती है; वह अपने नवें

मसीही सिद्धता,

अनुच्छेद में घोषणा करती है, 'आदि पाप हर मनुष्य के स्वभाव की वह भ्रष्टता है जिसके कारण हर मनुष्य अपने स्वभाव से ही बुराई की ओर झुका हुआ है, यहाँ तक कि शरीर आत्मा के विरुद्ध लालसा करता है।

और स्वभाव का यह संक्रमण उनमें भी बना रहता है, हाँ, जो नया जन्म पा चुके हैं; जिसके कारण शरीर की लालसा परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन नहीं होती।

और यद्यपि विश्वास करनेवालों के लिए कोई दण्ड की आज्ञा नहीं, तौभी यह लालसा अपने आप में पाप का स्वभाव रखती है।' .

"इसलिए विश्वासियों को निरन्तर समझाया जाता है कि वे संसार और शैतान के साथ-साथ शरीर से भी सावधान रहें।

और इससे परमेश्वर की सन्तानों का निरन्तर अनुभव मेल खाता है।

जब वे अपने भीतर साक्षी को अनुभव करते हैं, तब भी वे ऐसी इच्छा को अनुभव करते हैं जो परमेश्वर की इच्छा के प्रति पूरी तरह समर्पित नहीं है।

वे जानते हैं कि वे उसमें हैं; फिर भी ऐसा हृदय पाते हैं जो उससे दूर हो जाने को तैयार रहता है, अनेक बातों में बुराई की ओर झुकाव और भलाई की ओर अनिच्छा पाते हैं।

इसके विपरीत शिक्षा बिलकुल नई है; मसीह की कलीसिया में उसके संसार में आने के समय से लेकर काउण्ट

ज़िन्ज़ेनडोर्फ़ के समय तक कभी सुनी नहीं गई; और इसके परिणाम अत्यन्त घातक हैं।

यह हमारे बुरे स्वभाव के विरुद्ध, उस दलीला के विरुद्ध, जिसके विषय में हमें बताया जाता है कि वह जा चुकी है जबकि वह अब भी हमारी गोद में पड़ी है, सारी चौकसी को काट देता है।

यह निर्बल विश्वासियों की ढाल छीन लेता है, उन्हें उनके विश्वास से वंचित कर देता है, और इस प्रकार उन्हें संसार, शरीर और शैतान के सब आक्रमणों के सामने खुला छोड़ देता है।'"—उपदेश "विश्वासियों में पाप," खण्ड i. पृ. 108-115।

'पहले ही देखा जा चुका है कि इसके विपरीत शिक्षा, कि विश्वासियों में कोई पाप नहीं है, मसीह की कलीसिया में बिलकुल नई है; सत्रह सौ वर्ष तक यह कभी सुनी नहीं गई; जब तक काउण्ट ज़िन्ज़ेनडोर्फ़ ने इसे खोज नहीं निकाला।

मुझे स्मरण नहीं कि मैंने इसका ज़रा-सा भी संकेत किसी प्राचीन या आधुनिक लेखक में देखा हो; सिवाय शायद कुछ उन्मत्त, बड़बोले एण्टीनोमियन लोगों के।

और ये भी कहते हैं और फिर मुकर जाते हैं, यह मानते हुए कि उनके शरीर में तो पाप है, यद्यपि हृदय में कोई पाप नहीं।"—उपदेश, खण्ड 1. पृ. 111।

"पाप से मेरा यहाँ अभिप्राय भीतरी पाप से है; कोई भी पापमय स्वभाव, आवेश या भाव; जैसे घमण्ड, स्वेच्छाचार, संसार का प्रेम, किसी भी प्रकार या मात्रा में; जैसे वासना, क्रोध, चिड़चिड़ापन; कोई भी प्रवृत्ति जो उस

जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।

मन के विपरीत हो जो मसीह यीशु में था।

"प्रश्न बाहरी पाप के विषय में नहीं है; कि परमेश्वर की सन्तान पाप करती है या नहीं।

हम सब इस पर सहमत हैं और दृढ़ता से मानते हैं, 'जो पाप करता है वह शैतान की ओर से है।'

हम सहमत हैं, 'जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता।'

न ही हम अभी यह पूछ रहे हैं कि क्या भीतरी पाप परमेश्वर की सन्तानों में सदा बना रहेगा; क्या पाप आत्मा में तब तक बना रहेगा जब तक आत्मा देह में है; और न यह पूछ रहे हैं कि क्या धर्मी ठहराया गया व्यक्ति भीतरी या बाहरी पाप में फिर गिर सकता है; बल्कि केवल यह,—क्या धर्मी ठहराया गया या नया जन्म पाया हुआ मनुष्य धर्मी ठहराए जाते ही सब पाप से मुक्त हो जाता है?

क्या तब उसके हृदय में कोई पाप नहीं रहता?—और उसके बाद भी कभी नहीं, जब तक वह अनुग्रह से गिर न जाए?'—उपदेश, खण्ड i. पृ. 109।

"ऐसा परिवर्तन अनुभव करनेवाले कितनी स्वाभाविकता से मान बैठते हैं कि सारा पाप जा चुका है; कि वह उनके हृदय से जड़ से उखाड़ दिया गया है, और अब उसमें उसका कोई स्थान नहीं?

वे कितनी आसानी से यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं:

'मुझे कोई पाप अनुभव नहीं होता; इसलिए मुझ में कोई नहीं है; वह हिलता नहीं; इसलिए वह है ही नहीं; उसमें कोई गति नहीं; इसलिए उसका कोई अस्तित्व नहीं।

"परन्तु शीघ्र ही उनका भ्रम टूट जाता है, और वे पाते हैं कि पाप केवल स्थगित था, नष्ट नहीं हुआ था।

परीक्षाएँ लौट आती हैं, और पाप फिर जी उठता है; इससे प्रकट होता है कि वह पहले केवल अचेत था, मरा नहीं था।

अब वे अपने भीतर दो सिद्धान्त अनुभव करते हैं, जो स्पष्ट रूप से एक-दूसरे के विपरीत हैं: 'शरीर आत्मा के विरुद्ध लालसा करता है

;' स्वभाव परमेश्वर के अनुग्रह का विरोध करता है।

वे इससे इनकार नहीं कर सकते कि यद्यपि वे अब भी मसीह में विश्वास करने और परमेश्वर से प्रेम

करने की सामर्थ्य अनुभव करते हैं; और यद्यपि उसका 'आत्मा (अब भी) उनकी आत्मा के साथ गवाही देता है कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं;' तौभी वे अपने भीतर कभी घमण्ड या स्वेच्छाचार, कभी क्रोध या अविश्वास अनुभव करते हैं।,—उपदेश, खण्ड i. पृ. 385, 1765 में लिखा गया।

"और जैसे यह मत, कि विश्वासी में कोई पाप नहीं, कोई शारीरिक मन नहीं, पतन की ओर कोई झुकाव नहीं, परमेश्वर के वचन के विपरीत है, वैसे ही यह उसकी सन्तानों के अनुभव के भी विपरीत है।

मसीही सिद्धता,

ये निरन्तर अपने हृदय में पतन की ओर झुकाव अनुभव करते हैं; बुराई की ओर स्वाभाविक प्रवृत्ति; परमेश्वर से हट जाने और पृथ्वी की वस्तुओं से चिपके रहने की प्रवृत्ति।

वे प्रतिदिन हृदय में बचे हुए पाप को—घमण्ड, स्वेच्छाचार, अविश्वास को—और अपने हर कथन या कर्म से, यहाँ तक कि अपने सर्वोत्तम कार्यों और पवित्रतम कर्तव्यों से भी चिपके हुए पाप को अनुभव करते हैं।

फिर भी उसी समय वे 'जानते हैं कि वे परमेश्वर के हैं;' वे इसमें एक क्षण के लिए भी सन्देह नहीं कर सकते।

वे स्पष्ट रूप से अनुभव करते हैं कि उसका आत्मा 'उनकी आत्मा के साथ गवाही देता है कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं।'

वे मसीह यीशु के द्वारा परमेश्वर में आनन्दित होते हैं, 'जिसके द्वारा अब उन्होंने मेल-मिलाप पाया है।'

इसलिए उन्हें समान रूप से निश्चय है कि पाप उन में है, और यह भी कि 'मसीह उन में महिमा की आशा है...

'हम मानते हैं कि विश्वासी पाप के दोष और सामर्थ्य से छुड़ाए गए हैं; परन्तु हम इनकार करते हैं कि वे उसके अस्तित्व से छुड़ाए गए हैं।

मसीह वास्तव में वहाँ राज्य नहीं कर सकता जहाँ पाप राज्य करता है; न ही वह वहाँ वास करेगा जहाँ पाप को स्वीकार किया जाता है।

परन्तु वह हर उस विश्वासी के हृदय में है और वास करता है जो सब पाप से लड़ रहा है, यद्यपि वह अभी शुद्ध नहीं हुआ है।

वास्तव में, यह महान बात कि [अपवित्र] विश्वासियों में दो परस्पर विरोधी सिद्धान्त हैं—स्वभाव और अनुग्रह, शरीर और आत्मा,—सन्त पौलुस की सब पत्रियों में, हाँ, सारे पवित्र शास्त्र में चली आती है; उसमें लगभग सभी निर्देश और उपदेश इसी मान्यता पर आधारित हैं, और उन लोगों के बुरे स्वभाव या आचरण की ओर संकेत करते हैं जिन्हें फिर भी प्रेरित लेखक विश्वासी मानते हैं।"

"इस नई, अशास्त्रीय शिक्षा के विरुद्ध एक और तर्क उसके भयानक परिणामों से दिया जा सकता है।

एक कहता है, 'आज मुझे क्रोध आया।'

क्या मुझे उत्तर देना चाहिए, 'तो फिर तुम में विश्वास नहीं है?

दूसरा कहता है, 'मैं जानता हूँ कि आप जो सलाह देते हैं वह अच्छी है, परन्तु मेरी इच्छा उसके सर्वथा विरुद्ध है।'

क्या मुझे उससे कहना चाहिए, 'तो फिर तुम अविश्वासी हो, परमेश्वर के क्रोध और श्राप के अधीन हो?

इसका स्वाभाविक परिणाम क्या होगा?

यही कि यदि वह मेरी बात पर विश्वास करे, तो उसकी आत्मा न केवल दुःखी और घायल होगी, वरन् सम्भवतः पूरी तरह नष्ट हो जाएगी; क्योंकि

जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।

वह उस 'हियाव को, जिसका बड़ा प्रतिफल है, फेंक देगा;' और अपनी ढाल फेंक देने के बाद वह 'उस दुष्ट के जलते हुए तीरों को कैसे बुझाएगा?'

वह संसार पर कैसे जय पाएगा? क्योंकि 'वह जय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है, हमारा विश्वास है।'

वह अपने शत्रुओं के बीच निहत्था खड़ा है, उनके सब आक्रमणों के लिए खुला हुआ।

तब आश्चर्य क्या कि वह पूरी तरह पराजित हो जाए; वे उसे अपनी इच्छा से बन्दी बना लें; हाँ, वह एक दुष्टता से दूसरी दुष्टता में गिरता जाए, और फिर कभी भलाई न देखे?

इसलिए मैं किसी भी प्रकार से इस कथन को स्वीकार नहीं कर सकता कि धर्मी ठहराए जाने के क्षण से विश्वासी में कोई पाप नहीं रहता; पहला, क्योंकि यह सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के भाव के विपरीत है;—दूसरा, क्योंकि यह परमेश्वर की सन्तानों के अनुभव के विपरीत है;—तीसरा, क्योंकि यह बिलकुल नया है, कल तक संसार में कभी सुना नहीं गया; और अन्त में, क्योंकि इसके साथ स्वाभाविक रूप से अत्यन्त घातक परिणाम जुड़े हैं; यह उन्हें दुःखी करता है जिन्हें परमेश्वर ने दुःखी नहीं किया, और सम्भवतः उन्हें अनन्त विनाश में घसीट ले जाता है।'—उपदेश, खण्ड i. पृ. 110, 111।

"मैं कहता हूँ, सही रीति से समझा गया पश्चाताप; क्योंकि इसे पहले के पश्चाताप से मिलाना नहीं चाहिए।

धर्मी ठहराए जाने के बाद का पश्चाताप उससे बहुत भिन्न है जो उससे पहले होता है।

इसमें कोई दोष नहीं, दण्ड का कोई बोध नहीं, परमेश्वर के क्रोध की कोई चेतना नहीं होती।

यह परमेश्वर की कृपा के विषय में किसी सन्देह को, या किसी 'ऐसे भय को जिसमें पीड़ा होती है,' नहीं मानता।

यह यथार्थ में पवित्र आत्मा द्वारा उत्पन्न वह कायलता है जो हमारे हृदय में अब भी बचे हुए पाप के विषय में होती है; phronama sarkos [शारीरिक मन] के विषय में, उस शारीरिक मन के विषय में जो (जैसा हमारी कलीसिया कहती है) 'नया जन्म पाए हुओं में भी अब तक बना रहता है;' यद्यपि वह अब राज्य नहीं करता: अब उन पर उसका प्रभुत्व नहीं है।

यह हमारी बुराई की ओर प्रवृत्ति की, पतन की ओर झुके हुए हृदय की, और शरीर की आत्मा के विरुद्ध लालसा करने की अब भी बनी हुई प्रवृत्ति की कायलता है।

कभी, यदि हम निरन्तर जागते और प्रार्थना नहीं करते रहें, तो वह घमण्ड की लालसा करता है, कभी क्रोध की, कभी परमेश्वर से अधिक संसार के प्रेम की,

मसीही सिद्धता,

मान-सम्मान के प्रेम की, या सुख-विलास के प्रेम की।"—उपदेश, खण्ड i. पृ. 389, 1765 में लिखा गया।

"जो कहा जा चुका है उससे हम सरलता से उस मत की हानिकारकता समझ सकते हैं कि जब हम धर्मी ठहराए जाते हैं तभी पूरी तरह पवित्र भी हो जाते हैं; कि तब हमारे हृदय सब पाप से शुद्ध हो जाते हैं।

यह सच है कि तब हम, जैसा पहले कहा गया, बाहरी पाप के प्रभुत्व से छुड़ाए जाते हैं; और साथ ही भीतरी पाप की सामर्थ्य इतनी टूट जाती है कि हमें अब उसके पीछे चलने या उससे चलाए जाने की आवश्यकता नहीं; परन्तु यह किसी प्रकार सच नहीं कि तब भीतरी पाप पूरी तरह नष्ट हो जाता है; कि घमण्ड, स्वेच्छाचार, क्रोध, संसार-प्रेम की जड़ तब हृदय से निकाल दी जाती है; या कि शारीरिक मन और पतन की ओर झुका हुआ हृदय पूरी तरह उखाड़ दिए जाते हैं।

और इसके विपरीत मान लेना, जैसा कुछ लोग सोच सकते हैं, कोई निर्दोष, हानिरहित भूल नहीं है।

नहीं: यह भारी हानि करता है; यह किसी और परिवर्तन के मार्ग को पूरी तरह रोक देता है: क्योंकि यह प्रकट है,

'वैद्य भले चंगों को नहीं, परन्तु बीमारों को चाहिए।'

इसलिए यदि हम समझें कि हम पहले ही पूरी तरह चंगे हो चुके हैं, तो किसी और चंगाई को ढूँढ़ने का कोई स्थान नहीं रहता।

इस मान्यता पर पाप से और आगे छुटकारे की आशा रखना, चाहे क्रमशः या तत्क्षण, बेतुका है।"—उपदेश, खण्ड i. पृ. 124, "इससे उस प्रत्यक्षतः निर्दोष मत की अत्यन्त हानिकारकता प्रकट हो सकती है, कि विश्वासी में कोई पाप नहीं है; कि मनुष्य के धर्मी ठहराए जाते ही सब पाप जड़ और डाली समेत नष्ट हो जाता है।

उस पश्चाताप को पूरी तरह रोककर यह पवित्रीकरण के मार्ग को बिलकुल बन्द कर देता है; जो मानता है कि उसके जीवन या हृदय में कोई पाप नहीं, उसके लिए पश्चाताप का कोई स्थान नहीं; फलतः उसके प्रेम में सिद्ध किए जाने का भी कोई स्थान नहीं, जिसके लिए वह पश्चाताप अनिवार्य रूप से आवश्यक है।"—उपदेश, खण्ड i. पृ. 390।

"मान लीजिए यह हो गया, मान लीजिए उसने अब हमें जिला दिया है, हमारी मृत आत्माओं में जीवन डाल दिया है; फिर भी शारीरिक मन कितना बचा रहता है।

हमारा हृदय कितनी आसानी से जीवते परमेश्वर से

जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।

इस प्रकार हट जाता है!

हमारे हृदय में पाप की कैसी प्रवृत्ति बनी रहती है, यद्यपि हम जानते हैं कि हमारे बीते पाप क्षमा हो चुके हैं।

और हमारे सारे प्रयत्नों के बावजूद हमारे शब्दों और कर्मों दोनों से कितना पाप चिपका रहता है!

कौन उचित रीति से जान सकता है कि परमेश्वर के प्रति उसकी स्वाभाविक शत्रुता में से कितनी उसमें बची है!"—

उपदेश, खण्ड ii. पृ. 158।

"क्योंकि सामान्यतः भले मनुष्य भी, यद्यपि पाप का उन पर प्रभुत्व नहीं, फिर भी उसके अवशेषों से मुक्त नहीं हैं।

उनमें अब भी एक बुरे हृदय के अवशेष हैं, जो सदा 'जीवते परमेश्वर से हट जाने' की ओर झुका रहता है।

उनमें घमण्ड, क्रोध, मूर्खतापूर्ण अभिलाषा, वास्तव में हर अपवित्र स्वभाव के बीज हैं।'—उपदेश, खण्ड ii. पृ. 214।

"बस इतना स्मरण रहे कि विश्वासी का हृदय भी धर्मी ठहराए जाने पर पूरी तरह शुद्ध नहीं होता।

तब पाप पर विजय पाई जाती है, परन्तु वह जड़ से नहीं उखाड़ा जाता; वह परास्त होता है, परन्तु नष्ट नहीं होता।

अनुभव उसे दिखाता है, पहले यह कि पाप की जड़, स्वेच्छाचार, घमण्ड और मूर्तिपूजा, अब भी उसके हृदय में बनी हैं।

परन्तु जब तक वह जागता और प्रार्थना करता रहता है, इनमें से कोई उस पर प्रबल नहीं हो सकता।"—उपदेश, खण्ड ii. पृ. 476।

"परन्तु यद्यपि हम सहर्ष मानते हैं कि 'जो विश्वास करता है वह परमेश्वर से जन्मा है,' और 'जो परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता,' तौभी हम यह नहीं मान सकते कि वह उसे अपने भीतर अनुभव नहीं करता; वह राज्य नहीं करता, परन्तु बना रहता है।

और हमारे हृदय में बचे हुए पाप की कायलता उस पश्चाताप की एक बड़ी शाखा है जिसकी हम अभी चर्चा कर रहे हैं।"—उपदेश, खण्ड ii.

Ded live [अस्पष्ट मूल पाठ] "इसलिए हम यह भी दावा करने का साहस नहीं करते (जैसा कुछ ने किया है) कि यह पूर्ण उद्धार सच्चे विश्वासियों को एक ही बार में दे दिया जाता है।

परमेश्वर की सन्तानों की आत्माओं में उसका एक तत्क्षण (साथ ही क्रमिक) कार्य वास्तव में होता है; और हम जानते हैं कि गवाहों का एक बादल है जिन्होंने एक ही क्षण में या तो अपने पापों की क्षमा का स्पष्ट बोध पाया है, या पवित्र आत्मा की स्थायी गवाही।

परन्तु हम

मसीही सिद्धता,

किसी स्थान में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं जानते जिसमें किसी ने एक ही क्षण में पापों की क्षमा, आत्मा की स्थायी गवाही, और एक नया, शुद्ध हृदय पाया हो।'"— रचनाएँ, खण्ड vii. पृ. 596।

"तुम्हारा अपने में अब भी पाप का बचा होना पाना इस बात का प्रमाण नहीं कि तुम विश्वासी नहीं हो।

धर्मी ठहराए गए व्यक्ति में पाप बना रहता है, यद्यपि उस पर उसका प्रभुत्व नहीं होता।

क्योंकि आरम्भ में उसका हृदय शुद्ध नहीं होता, और न 'सब बातें' अब तक 'नई हुई' होती हैं।

परन्तु मत डरो, चाहे तुम्हारा हृदय बुरा हो।

थोड़े ही समय में तुम ऊपर से सामर्थ्य पहिनाए जाओगे, जिससे तुम 'अपने आप को वैसा ही शुद्ध कर सको जैसा वह शुद्ध है;' और 'पवित्र बनो, जैसा तुम्हारा बुलानेवाला पवित्र है।'"

—जर्नल, जून, 1740।

"मैं इसे इतनी बार समझा चुका हूँ कि अब और जोड़ने में समय नष्ट नहीं कर सकता; केवल इतना,—कि जिस क्षण पापी धर्मी ठहराया जाता है, उसका हृदय निम्न स्तर पर शुद्ध किया जाता है।

परन्तु फिर भी जब तक वह प्रेम में सिद्ध नहीं किया जाता, तब तक पूर्ण, यथार्थ अर्थ में उसका हृदय शुद्ध नहीं होता।'—रचनाएँ, खण्ड v. पृ. 284।

"हर स्थान पर मैंने उन गरीब लोगों के मन को स्थिर करने का प्रयत्न किया, जो एक नई शिक्षा से बहुत व्याकुल हो गए थे, जिसे भले जोनाथन सी—— और उसके धर्मान्तरित लोगों ने उनके बीच परिश्रम से फैलाया था,—कि विश्वासियों में कोई पाप नहीं; जिस क्षण हम विश्वास करते हैं, पाप जड़ और डाली समेत नष्ट हो जाता है।'

मुझे भरोसा है कि यह महामारी भी थम गई है; परन्तु वे अस्थिर लोग, जो 'उपदेश की हर बयार से इधर-उधर उछाले जाते हैं,' कितने लज्जित होने चाहिए!" '—जर्नल,

जून, 1763।

रेवरेंड जोसेफ़ बेन्सन को, 1770 में:— "अब, क्या कोई विश्वास के बिना धर्मी ठहराया जा सकता है?

कोई नहीं।

इसलिए तुम विश्वासी हो; तुम्हें मसीह में विश्वास है; तुम प्रभु को जानते हो; तुम कह सकते हो, 'हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर।'

और जो कोई इससे इनकार करता है, वह यह भी इनकार कर सकता है कि सूर्य दोपहर में चमकता है।

जैसा जॉन वेस्ली ने सिखाया।

फिर भी दस हज़ार वासनाएँ बनी रहती हैं, और तुम्हारी आत्मा को सताती हैं, जो पाप के दण्ड से छूट चुकी है; अब भी विद्रोही स्वभाव राज्य करने का यत्न करता है, और तुम सब अशुद्ध हो, अशुद्ध!

यह उतना ही स्पष्ट और निर्विवाद है।

और यह केवल तुम्हारा अनुभव नहीं, वरन् हज़ार और विश्वासियों का अनुभव है, जो फिर भी परमेश्वर की कृपा के विषय में उतने ही निश्चित हैं जितने अपने अस्तित्व के विषय में।

इस विषय में सब सन्देह दूर करने के लिए मैं तुमसे विनती करता हूँ कि उन दो उपदेशों, 'विश्वासियों में पाप' और 'विश्वासियों का पश्चाताप,' को एक बार फिर गम्भीरता से पढ़ो।

'"*परन्तु क्या कोई सहायता नहीं?

क्या इस भीतरी शत्रु से कोई छुटकारा, कोई उद्धार नहीं?

निश्चय है; नहीं तो अनेक बड़ी और अनमोल प्रतिज्ञाएँ व्यर्थ हो जाएँगी।

'मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; मैं तुम्हें तुम्हारी सारी मलिनता और तुम्हारी सारी मूरतों से शुद्ध करूँगा।'

'मैं तेरे हृदय का खतना करूँगा'

(सब पाप से), 'कि तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण से प्रेम करे।"

इसी को मैं पवित्रीकरण (जो तत्क्षण भी है और क्रमिक भी), या सिद्धता कहता हूँ; अर्थात् प्रेम में सिद्ध किया जाना, प्रेम से भर जाना, जिसमें अब भी हज़ार श्रेणियाँ सम्भव हैं।""— रचनाएँ, खण्ड vii. पृ. 71।

"वे (मेथोडिस्ट) जानते हैं कि जिस समय मनुष्य धर्मी ठहराया जाता है, उसी समय यथार्थ में पवित्रीकरण आरम्भ होता है।

क्योंकि जब वह धर्मी ठहराया जाता है तब वह 'नया जन्म' पाता है, 'ऊपर से जन्म' पाता है; 'आत्मा से जन्म' पाता है; जो यद्यपि (जैसा कुछ मानते हैं) पवित्रीकरण की सारी प्रक्रिया नहीं है, तथापि निस्सन्देह उसका द्वार है।"'—उपदेश, खण्ड ii. पृ. 390।

"तब यह अपने लोगों (मेथोडिस्टों) को दिया गया एक बड़ा आशीर्वाद है कि जैसे वे धर्मी ठहराए जाने की चर्चा इस रीति से नहीं करते कि वह पवित्रीकरण को हटा दे, वैसे ही पवित्रीकरण की चर्चा भी इस रीति से नहीं करते कि वह धर्मी ठहराए जाने को हटा दे।

वे ध्यान रखते हैं कि दोनों को अपने-अपने स्थान पर रखें, और दोनों पर समान बल दें।

वे जानते हैं कि परमेश्वर ने इन्हें जोड़ा है, और मनुष्य को इन्हें अलग करना नहीं चाहिए; इसलिए

मसीही सिद्धता,

वे समान उत्साह और परिश्रम से एक ओर सेंतमेंत, पूर्ण, वर्तमान धर्मी ठहराए जाने की, और दूसरी ओर हृदय और जीवन दोनों के पूर्ण पवित्रीकरण की शिक्षा को थामे रहते हैं।"— उपदेश, खण्ड ii. पृ. 390।

1765 में लिखा गया।

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