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परिचय
जिनेवा की कलीसिया,
बालकों के लिए मसीह के सिद्धान्त की शिक्षा का एक प्रारूप
मसीह का सिद्धान्त।
समर्पण।
यूहन्ना कल्विन की ओर से पूर्वी फ्रीज़लैण्ड भर में मसीह के उन विश्वासयोग्य सेवकों के नाम, जो सुसमाचार के शुद्ध सिद्धान्त का प्रचार करते हैं।
चूँकि हमारे लिए उचित है कि हम सब प्रकार से यत्न करें कि विश्वास की वह एकता, जिसकी पौलुस ने इतनी प्रशंसा की है, हमारे बीच प्रकाशित हो, इसलिए हमारे सामूहिक बपतिस्मा के साथ जो विश्वास-अंगीकार जुड़ा है, उसका प्रमुख सम्बन्ध इसी उद्देश्य से होना चाहिए। अतः यह कामना की जा सकती है कि न केवल भक्ति के सिद्धान्त में सब के बीच निरन्तर सहमति दिखाई दे, वरन् सब कलीसियाओं के लिए एक ही प्रश्नोत्तरी भी हो। परन्तु जब बहुत से कारणों से यह कदाचित् ही सम्भव है कि ऐसा हो, और प्रत्येक कलीसिया की अपनी-अपनी प्रश्नोत्तरी हो, तो हमें इसे रोकने के लिए अत्यधिक आग्रह नहीं करना चाहिए; परन्तु शर्त यह है कि शिक्षा देने की रीति में जो भिन्नता हो वह ऐसी हो कि हम सब एक ही मसीह की ओर निर्देशित किए जाएँ, जिसके सत्य में एक साथ जुड़कर हम एक देह और एक आत्मा बनकर बढ़ें, और एक ही मुँह से वह सब भी घोषित करें जो विश्वास के सार से सम्बन्ध रखता है। जो प्रश्नोत्तरी-रचयिता इस उद्देश्य पर ध्यान नहीं देते, वे धर्म में फूट की सामग्री बोकर कलीसिया की घातक हानि तो करते ही हैं, साथ ही बपतिस्मा का अधर्मपूर्ण अपमान भी करते हैं। क्योंकि यदि यह नींव न रहे कि हम सब एक ही विश्वास में सहमत हैं, तो बपतिस्मा की उपयोगिता फिर कहाँ रह जाएगी?
इसलिए जो लोग प्रश्नोत्तरियाँ प्रकाशित करते हैं, उन्हें और भी सावधान रहना चाहिए, ऐसा न हो कि किसी बात को उतावली से प्रस्तुत करके वे न केवल वर्तमान काल में, वरन् आनेवाली पीढ़ियों के लिए भी भक्ति की गम्भीर हानि करें और कलीसिया को घातक घाव पहुँचाएँ।
यह बात मैंने अपने पाठकों के सामने घोषणा के रूप में पहले कहना चाही कि मैंने भी, जैसा मुझे उचित था, यही चिन्तापूर्ण यत्न किया है कि अपनी इस प्रश्नोत्तरी में कोई ऐसी बात न कहूँ जो सब भक्तों में ग्रहण किए गए सिद्धान्त के अनुकूल न हो। जो लोग निष्कपट मन और खरे विवेक से पढ़ेंगे, वे इस घोषणा को व्यर्थ न पाएँगे। मुझे भरोसा है कि मैं कम से कम इतना सफल हुआ हूँ कि मेरा परिश्रम, यद्यपि वह सन्तुष्ट न करे, तो भी सब भले लोगों को स्वीकार्य होगा, क्योंकि वे उसे उपयोगी समझेंगे।
इसे लैटिन भाषा में लिखने में, यद्यपि कदाचित् कुछ लोग इस उद्देश्य को पसन्द न करें, मैं अनेक कारणों से प्रेरित हुआ हूँ, जिन सब का इस समय वर्णन करना किसी काम का नहीं। मैं केवल वे ही कारण चुनूँगा जो मुझे निन्दा को दूर करने के लिए पर्याप्त जान पड़ते हैं।
पहले, मसीहीजगत की इस अस्त-व्यस्त और विभाजित दशा में मैं यह उपयोगी समझता हूँ कि ऐसी सार्वजनिक साक्षियाँ हों, जिनके द्वारा वे कलीसियाएँ, जो दूरी में चाहे कितनी ही अलग हों परन्तु मसीह के सिद्धान्त में सहमत हैं, एक दूसरे को पहचान सकें। क्योंकि इसके अतिरिक्त कि यह परस्पर दृढ़ता के लिए कुछ कम नहीं है, इससे बढ़कर और क्या चाहने योग्य है कि उनके बीच परस्पर बधाइयाँ आदान-प्रदान हों और वे भक्तिपूर्वक एक दूसरे को प्रभु के हाथ सौंपें? इसी दृष्टि से पुराने समय में, जब विश्वास में सहमति सब के बीच अब तक विद्यमान और फलती-फूलती थी, अध्यक्ष लोग सागर पार महासभाई पत्र भेजा करते थे, जिनके द्वारा, मानो चिह्नों के रूप में, वे कलीसियाओं के बीच पवित्र सहभागिता बनाए रखते थे। अब मसीही जगत के इस भयानक उजाड़ में यह कितना अधिक आवश्यक है कि वे थोड़ी-सी कलीसियाएँ जो परमेश्वर की यथोचित आराधना करती हैं, और वे भी बिखरी हुई तथा चारों ओर से मसीह-विरोधी के अपवित्र सभा-घरों से घिरी हुई हैं, पवित्र एकता का यह चिह्न परस्पर दें और लें, ताकि इसके द्वारा वे उस भ्रातृ-आलिंगन के लिए उभारी जाएँ जिसका मैंने उल्लेख किया है?
परन्तु यदि आज के दिनों में यह इतना आवश्यक है, तो आनेवाली पीढ़ी के विषय में हमारे मन में क्या भाव होने चाहिए, जिसके लिए मैं इतना चिन्तित हूँ कि उसके बारे में सोचने का भी साहस मुझे नहीं होता? यदि परमेश्वर स्वर्ग से आश्चर्यकर्म द्वारा सहायता न भेजे, तो मैं यह देखे बिना नहीं रह सकता कि संसार पर घोर असभ्यता का संकट मँडरा रहा है। मैं चाहता हूँ कि हमारी सन्तानें शीघ्र ही यह अनुभव न करें कि यह अनुमान से अधिक सच्ची भविष्यद्वाणी थी। इसलिए हमें और भी परिश्रम करना चाहिए कि अपने लेखों के द्वारा कलीसिया का जो कुछ शेष रहेगा, या हमारी मृत्यु के बाद फिर उभरेगा, उसे इकट्ठा करें। भिन्न प्रकार के लेख यह दिखाएँगे कि धर्म के सब विषयों में हमारे विचार क्या थे, परन्तु हमारी कलीसियाओं में जो सिद्धान्त सम्बन्धी सहमति थी, वह प्रश्नोत्तरियों से अधिक स्पष्ट प्रमाण से नहीं देखी जा सकती। क्योंकि उनमें न केवल यह प्रकट होगा कि किसी एक या दूसरे मनुष्य ने कभी क्या सिखाया, परन्तु यह भी कि हमारे बीच पढ़े और अनपढ़ दोनों बचपन से किन आरम्भिक शिक्षाओं में निरन्तर ढाले जाते थे, और सब विश्वासी उन्हें मसीही सहभागिता का अपना औपचारिक प्रतीक मानकर थामे रहते थे। इस प्रश्नोत्तरी को प्रकाशित करने का मेरा प्रमुख कारण वास्तव में यही था।
दूसरा कारण, जिसका मेरे लिए कुछ कम महत्त्व न था, यह था कि मैंने सुना कि बहुत से लोग इसकी इच्छा रखते थे, जिन्हें आशा थी कि यह पढ़े जाने के अयोग्य न होगी। वे ऐसा समझने में ठीक हैं या नहीं, यह निर्णय करना मेरा काम नहीं, परन्तु उनकी इच्छा के आगे झुकना मेरे लिए उचित था। वरन् मुझ पर लगभग विवशता ही आ पड़ी थी, और मैं बिना हानि उठाए इसे टाल नहीं सकता था। क्योंकि सात वर्ष पहले मैं प्रश्नोत्तरी के नाम से धर्म का एक संक्षिप्त सार प्रकाशित कर चुका था, इसलिए मुझे भय था कि यदि मैं यह नई प्रश्नोत्तरी सामने न लाऊँ, तो (जो मैं नहीं चाहता था) पहली प्रश्नोत्तरी उलटे बहिष्कृत हो जाएगी। इसलिए यदि मैं जन-हित का ध्यान रखना चाहता था, तो मुझे यह देखना उचित था कि जो प्रश्नोत्तरी मुझे प्रिय थी, वही उस स्थान को ले।
इसके अतिरिक्त, मैं इसे संसार के सामने गवाही देने का एक अच्छा उदाहरण समझता हूँ कि हम जो कलीसिया के पुनःस्थापन का लक्ष्य रखते हैं, सर्वत्र निष्ठा से प्रयत्नशील हैं, ताकि प्रश्नोत्तरी का वह प्रयोग, जो कुछ शताब्दियाँ पहले पोप-तन्त्र के अधीन मिटा दिया गया था, अब अपने खोए हुए अधिकारों को फिर पा ले। क्योंकि न तो इस पवित्र रीति की उपयोगिता के लिए उसकी पर्याप्त सराहना की जा सकती है, और न पोप के अनुयायियों की उस घोर भ्रष्टता के लिए पर्याप्त निन्दा की जा सकती है, जिसके द्वारा उन्होंने उसे बचकाने खेलों में बदलकर न केवल एक ओर रख दिया, वरन् उसे अशुद्ध और अधर्मी अन्धविश्वास के प्रयोजनों के लिए नीचता से दुरुपयोग भी किया। उसके स्थान पर उन्होंने जो नकली पुष्टिकरण स्थापित किया है, उसे वे वेश्या के समान अनगिनत रीतियों की भव्यता और शानदार दिखावों से सजाते हैं; वरन् उसे अलंकृत करने की इच्छा में वे उसके विषय में घृणित निन्दा की बातें कहते हैं, जब वे घोषित करते हैं कि वह बपतिस्मा से भी ऊँचे पद का संस्कार है, और उन्हें केवल आधा मसीही कहते हैं जो उनके तेल से अभिषिक्त नहीं किए गए। इस बीच सारी कार्यवाही नाटकीय हाव-भावों से बढ़कर कुछ नहीं, अथवा यों कहें कि बन्दरों की ऐसी उच्छृंखल क्रीड़ा है जिसमें नकल करने की भी कोई कुशलता नहीं।
प्रभु में अपने अति प्रिय भाइयो, इस रचना को मैंने आप ही के नाम समर्पित करना चुना है, क्योंकि आपके समुदाय में से कुछ ने मुझे यह बताने के अतिरिक्त कि आप मुझसे प्रेम रखते हैं और आप में से अधिकतर मेरे लेखों से आनन्दित होते हैं, पत्र द्वारा स्पष्ट रूप से मुझसे यह भी निवेदन किया कि मैं उनके लिए यह परिश्रम अपने ऊपर लूँ। इससे अलग भी, यह कारण पर्याप्त होता कि गम्भीर और भक्त पुरुषों के कथन से जो कुछ मैंने बहुत पहले आपके विषय में जाना, उसने मुझे पूरे मन से आपसे बाँध दिया था। अब मैं वह माँगता हूँ जो आप, मुझे भरोसा है, अपनी ही इच्छा से करेंगे, कि आप आपके प्रति मेरी शुभकामना के इस चिह्न की उपयोगिता का ध्यान रखने की कृपा करें। विदा! प्रभु आपको कलीसिया की उन्नति के लिए बुद्धि, विवेक, उत्साह और धैर्य की आत्मा में अधिकाधिक बढ़ाए।
जिनेवा, 2 दिसम्बर, 1545।
पाठक के नाम।
कलीसिया की सदा से यही रीति रही है, और उस पर सावधानी से ध्यान भी दिया गया है, कि बालकों को मसीही धर्म की यथोचित शिक्षा दी जाए। यह अधिक सुविधा से हो सके, इसके लिए पुराने समय में न केवल पाठशालाएँ खोली गईं और व्यक्तियों को आज्ञा दी गई कि वे अपने घरानों को ठीक रीति से सिखाएँ, वरन् यह एक मान्य सार्वजनिक रीति और प्रथा भी थी कि कलीसियाओं में बालकों से उन प्रत्येक मुख्य बातों पर प्रश्न पूछे जाएँ जो सब मसीहियों में सामान्य और सुविदित होनी चाहिए। यह क्रमपूर्वक होता रहे, इसके लिए एक सूत्र लिखा गया, जो प्रश्नोत्तरी या शिक्षा-सूत्र कहलाता था। तत्पश्चात् शैतान ने परमेश्वर की कलीसिया को दयनीय रीति से फाड़कर और उस पर भयंकर विनाश लाकर (जिसके चिह्न संसार के अधिकांश भाग में अब भी बहुत स्पष्ट हैं) इस पवित्र व्यवस्था को उलट दिया, और केवल कुछ ऐसी तुच्छ बातें पीछे छोड़ दीं जो उन्नति का कोई फल दिए बिना केवल अन्धविश्वास को जन्म देती हैं। इसी प्रकार का वह पुष्टिकरण है, जैसा वे उसे कहते हैं, जो हाव-भावों से भरा है, जो हास्यास्पद से भी बुरे और केवल बन्दरों के योग्य हैं, और जिनके टिकने के लिए कोई आधार नहीं। इसलिए हम अब जो प्रस्तुत करते हैं, वह उन बातों के प्रयोग के सिवा और कुछ नहीं जिन्हें प्राचीनकाल से मसीही और परमेश्वर के सच्चे आराधक मानते आए हैं, और जिन्हें तब तक कभी नहीं छोड़ा गया जब तक कलीसिया पूरी तरह भ्रष्ट न हो गई।
