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वर्तमान विवाद
जहाँ तक उस विवाद का सम्बन्ध है जिस पर हमारे समय में इतनी तीव्रता से बहस हुई है, एक दुःखद प्रसंग, जिसे शैतान ने निःसंदेह सुसमाचार की उन्नति में बाधा डालने, या यों कहें कि उसे पूरी तरह रोक देने के लिए भड़काया, मैं चाहता हूँ कि उसकी स्मृति ही मिट जाए, उसे विस्तार से सुनाने की इच्छा से मैं इतना दूर हूँ। फिर भी, क्योंकि मैं देखता हूँ कि बहुत से भले विवेक विचलित हैं, क्योंकि वे नहीं जानते कि किस ओर मुड़ें, इसलिए मैं संक्षेप में वह सलाह दूँगा जो मुझे उन्हें यह दिखाने के लिए आवश्यक प्रतीत होती है कि उन्हें कैसे निर्णय लेना चाहिए। पहले, मैं सब विश्वासियों से परमेश्वर के नाम में विनती करता हूँ कि उस बड़े मतभेद से बहुत ठोकर न खाएँ जो उन लोगों के बीच उठ खड़ा हुआ है जिन्हें सत्य को दिन के उजाले में वापस लाने में अगुवा होना चाहिए था। क्योंकि प्रभु के लिए यह कोई नई बात नहीं कि वह अपने दासों को कुछ अज्ञानता में छोड़ दे, और उन्हें एक दूसरे के विरुद्ध विवाद करने दे। और यह उन्हें सदा के लिए छोड़ देने के लिए नहीं, वरन् केवल कुछ समय के लिए, उन्हें दीन करने के लिए। वास्तव में, यदि अब तक सब कुछ बिना किसी बाधा के वैसा ही चलता रहता जैसा चाहा गया था, तो सम्भव था कि मनुष्य अपने आप को भूल जाते, या परमेश्वर के अनुग्रह को जितना चाहिए उससे कम माना जाता। इस प्रकार हमारे प्रभु ने प्रसन्न होकर मनुष्यों को घमण्ड के हर कारण से वंचित किया, ताकि केवल उसी की महिमा हो। इसके अतिरिक्त, यदि हम विचार करें कि जब इस विवाद में भाग लेनेवालों ने हमारे लिए सत्य को प्रकट करना आरम्भ किया तब संसार अन्धकार के कितने गहरे गड्ढे में था, तो हमें तनिक भी आश्चर्य नहीं होगा कि वे आरम्भ ही में सब कुछ नहीं जानते थे। आश्चर्य तो इस पर करना चाहिए कि हमारे प्रभु ने इतने थोड़े समय में उन्हें ऐसा प्रकाशित कर दिया कि वे स्वयं भूल के कीचड़ से निकल आए, और इस प्रकार उन दूसरों को भी उससे बाहर खींच लाए जो इतने लम्बे समय से उसमें डूबे हुए थे। परन्तु इससे अच्छा कुछ नहीं कि यह दिखाया जाए कि यह बात कैसे हुई, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि ठोकर खाने का उतना बड़ा कारण नहीं है जितना सामान्यतः समझा जाता है।
जब लूथर ने सिखाना आरम्भ किया, तब उसने प्रभु-भोज के विषय को इस प्रकार देखा कि मसीह की शारीरिक उपस्थिति के सम्बन्ध में वह उसे वैसा ही छोड़ देने को तैयार प्रतीत हुआ जैसा संसार सामान्यतः उसे समझता था। क्योंकि पदार्थान्तरण की निन्दा करते हुए भी उसने कहा कि रोटी मसीह की देह है, जहाँ तक वह उससे जुड़ी हुई है। इसके अतिरिक्त, उसने कुछ उपमाएँ जोड़ दीं जो थोड़ी कठोर और रूखी थीं। परन्तु उसने यह मानो विवशता से किया, क्योंकि वह अपना अर्थ किसी और प्रकार से समझा नहीं सकता था। क्योंकि इतने उच्च विषय की व्याख्या देना बिना भाषा की कुछ अनुपयुक्तता के कठिन है।
दूसरी ओर, ज़्विंग्ली और ओइकोलम्पाडियस उठ खड़े हुए, जिन्होंने उस कुरीति और छल पर विचार करके जो शैतान ने मसीह की ऐसी शारीरिक उपस्थिति स्थापित करने में प्रयोग किया था जैसी छः सौ वर्ष से अधिक समय से सिखाई और मानी जाती आई थी, यह उचित नहीं समझा कि वे इसे छिपाएँ; क्योंकि इस मत में घृणित मूर्तिपूजा निहित थी, कि यीशु मसीह की आराधना इस प्रकार की जाती थी मानो वह रोटी के भीतर बन्द हो। अब क्योंकि इस मत को हटाना बहुत कठिन था, जो इतने समय से मनुष्यों के हृदयों में जड़ पकड़े हुए था, उन्होंने अपना सारा मन इसकी निन्दा करने में लगा दिया, यह समझाते हुए कि यह बहुत मोटी भूल है कि यीशु मसीह के स्वर्गारोहण के विषय में पवित्रशास्त्र में जो इतने स्पष्ट रूप से गवाही दी गई है, उसे न माना जाए, कि वह अपनी मानवता में स्वर्ग में उठा लिया गया, जहाँ वह तब तक रहता है जब तक कि वह जगत का न्याय करने के लिए न उतरे। जब वे इस बात में लीन थे, तो वे यह बताना भूल गए कि प्रभु-भोज में मसीह की वह उपस्थिति क्या है जिस पर विश्वास करना चाहिए, और वहाँ उसकी देह और उसके लहू की कौन सी सहभागिता प्राप्त होती है।
इसलिए लूथर ने सोचा कि वे अनुरूप आत्मिक सार के बिना केवल नंगे चिह्न ही छोड़ देना चाहते हैं। इसलिए वह उनका विरोध करने और उनके सामने खड़ा होने लगा, यहाँ तक कि उन्हें विधर्मी कहकर निन्दित करने तक पहुँच गया। जब विवाद एक बार आरम्भ हो गया, तो समय के साथ वह और भड़कता गया, और इस प्रकार लगभग पन्द्रह वर्ष तक बहुत कटुता से चलता रहा, बिना इसके कि कोई पक्ष दूसरे की बात शान्त मन से सुने। क्योंकि यद्यपि एक बार उन्होंने वार्तालाप किया, फिर भी इतनी दूरी थी कि वे बिना किसी समझौते के अलग हो गए। तब भलाई की इच्छा के साथ मिलने के बजाय वे सदा एक दूसरे से और अधिक दूर होते गए, अपने मत की रक्षा करने और जो कुछ उसके विपरीत था उसका खण्डन करने के सिवा और कुछ नहीं सोचते हुए। यहाँ हमें कारण मिलता है कि लूथर अपनी ओर से और ओइकोलम्पाडियस तथा ज़्विंग्ली अपनी ओर से क्यों चूक गए। लूथर का कर्तव्य था कि सबसे पहले वह स्पष्ट करता कि उसका अभिप्राय ऐसी स्थानीय उपस्थिति स्थापित करना नहीं है जैसी पोप-मतवादी कल्पना करते हैं; दूसरे, उसे घोषणा करनी चाहिए थी कि उसका अर्थ यह नहीं कि संस्कार की परमेश्वर के स्थान पर आराधना की जाए; और तीसरे, उसे उन उपमाओं से बचना चाहिए था जो इतनी कठोर और समझने में कठिन थीं, या उन्हें संयम से प्रयोग करना चाहिए था, इस प्रकार उनकी व्याख्या करते हुए कि वे ठोकर का कारण न बनें। जब बहस छिड़ गई, तो वह अपना मत घोषित करने में ही नहीं, वरन् दूसरे को अपनी वाणी की अत्यधिक तीखी कटुता से दोष देने में भी सीमा से आगे निकल गया। क्योंकि अपने आप को इस प्रकार समझाने के बजाय कि उसका मत समझा जा सके, अपने उस स्वभाव की उग्रता से जो विरोधियों पर आक्रमण करने में उसमें थी, उसने अतिशयोक्तिपूर्ण वाक्य प्रयोग किए, जिन्हें उन लोगों के लिए सहना निश्चय ही कठिन था जो वैसे भी उसकी बात मानने के लिए बहुत तैयार नहीं थे। दूसरों ने भी ठोकर खिलाई, क्योंकि वे मसीह की देह की स्थानीय उपस्थिति के विषय में पोप-मतवादियों के विपरीत मत को अन्धविश्वासी और काल्पनिक बताकर, और उससे निकली आराधना को विकृत बताकर, उसकी निन्दा करने में इतने उत्सुक थे कि उन्होंने भलाई को बनाने की अपेक्षा बुराई को ढाने में अधिक परिश्रम किया। क्योंकि यद्यपि उन्होंने सत्य का इनकार नहीं किया, तथापि उन्होंने उसे उतनी स्पष्टता से नहीं सिखाया जितनी चाहिए थी। मेरा कहना यह है कि इस बात को स्थापित करने में अत्यधिक परिश्रम करते हुए कि रोटी और दाखरस मसीह की देह और लहू इसलिए कहलाते हैं कि वे चिह्न हैं, उन्होंने यह आरक्षण करने की चिन्ता नहीं की कि वे ऐसे चिह्न हैं जिनसे वास्तविकता जुड़ी है; और न यह घोषणा करने की कि उनका अभिप्राय उस सच्ची सहभागिता को धुँधला करना बिलकुल नहीं था जो हमारा प्रभु संस्कार के द्वारा अपनी देह और लहू में हमें देता है।
दोनों पक्ष एक दूसरे की बात सुनने का धैर्य रखने में पूरी तरह चूक गए, ताकि सत्य को, जहाँ कहीं भी मिले, बिना आवेश के अपनाएँ। तो भी हमें यह सोचना नहीं छोड़ना चाहिए कि हमारा कर्तव्य क्या है। वह यह है कि हम उन दानों को न भूलें जो हमारे प्रभु ने उन्हें दिए, और उन आशीषों को जो वह उनके हाथों और उनके माध्यम से हमें बाँटता है। क्योंकि यदि हम बिलकुल कृतघ्न और जो हम पर उनका ऋण है उसे भूलनेवाले न हों, तो हम उन्हें इसे और इससे भी अधिक क्षमा कर सकते हैं, बिना उन्हें दोष देने या बदनाम करने के। संक्षेप में, क्योंकि हम देखते हैं कि वे पवित्र जीवन, उत्कृष्ट ज्ञान और कलीसिया को उन्नत करने के प्रत्यक्ष उत्साह के लिए प्रसिद्ध थे और अब भी हैं, इसलिए हमें सदा नम्रता और आदर से न्याय करना और बोलना चाहिए; इसलिए भी कि परमेश्वर को यह अच्छा लगा कि उन्हें इस प्रकार दीन करके अन्ततः इस दुःखद विवाद को समाप्त करे, या कम से कम शान्त कर दे, इस आशा में कि वह पूरी तरह सुलझ जाएगा। मैं यह इसलिए कहता हूँ कि अब तक कोई प्रकाशित सूत्र नहीं है जिसमें सहमति बनी हो, जैसा कि उचित होता। परन्तु यह तब होगा जब परमेश्वर उन सबको, जो उसे तैयार करनेवाले हैं, एक स्थान पर लाना चाहेगा। इस बीच हमें इतने से सन्तुष्ट रहना चाहिए कि कलीसियाओं के बीच भाईचारा और सहभागिता है, और परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार एकत्र होने के लिए जो आवश्यक है उसमें सब सहमत हैं। इसलिए हम सब एक मुँह से मानते हैं कि प्रभु की विधि के अनुसार विश्वास से संस्कार ग्रहण करते हुए हम सचमुच यीशु मसीह की देह और लहू के वास्तविक सार के भागी बनाए जाते हैं। यह कैसे होता है, इसे कुछ लोग दूसरों से अच्छी तरह निकाल सकते हैं और अधिक स्पष्टता से समझा सकते हैं। परन्तु चाहे जो हो, एक ओर हमें सब शारीरिक कल्पनाओं को दूर रखने के लिए अपने हृदयों को ऊपर स्वर्ग की ओर उठाना चाहिए, यह न सोचते हुए कि हमारा प्रभु यीशु मसीह इतना नीचे गिराया गया है कि किसी नाशवान तत्व के भीतर बन्द हो जाए। दूसरी ओर, इस पवित्र भेद की प्रभावशीलता को घटाने से बचने के लिए हमें यह मानना चाहिए कि वह परमेश्वर की गुप्त और अद्भुत सामर्थ्य से पूरा होता है, और परमेश्वर का आत्मा सहभागिता का बन्धन है, जिस कारण इसे आत्मिक कहा जाता है।
