अध्याय 5

चौथा उपदेश, जिसमें यह बताया गया है कि किसी मसीही कलीसिया में परमेश्वर की शुद्ध आराधना करने की स्वतंत्रता को कितने परिश्रम और कितनी चिन्ता के साथ खोजना चाहिए

Four Godly Sermons Against Idolatry · John Calvin

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चौथा उपदेश, जिसमें यह बताया गया है कि किसी मसीही कलीसिया में परमेश्वर की शुद्ध आराधना करने की स्वतंत्रता को कितने परिश्रम और कितनी चिन्ता के साथ खोजना चाहिए

भजन संहिता 27 के इस वचन से लिया गया:

"मेरे हृदय ने तेरे विषय में कहा है, मेरे मुख को ढूँढ़ो। हे प्रभु, तेरे मुख को मैं ढूँढ़ूँगा,

हे प्रभु।"

जैसे मनुष्य अपनी वासनाओं और अभिलाषाओं की लगाम ढीली छोड़कर, जहाँ मन चाहे वहाँ उच्छृंखल दौड़ते हुए अपने आप को भयानक अव्यवस्था में डाल देते हैं, वैसे ही परमेश्वर की आज्ञाओं को खोज निकालना, और उन्हें पूरे हृदय और पूरे यत्न के साथ अपनाना और उनका पालन करना एक दुर्लभ और अत्यन्त उच्च बुद्धि है। इसका एक उत्तम उदाहरण, जो अनुसरण करने के सर्वथा योग्य है, हमें इस स्थान पर मिलता है। क्योंकि दाऊद मन की उन उथल-पुथल से सर्वथा मुक्त या रिक्त नहीं था जिनके द्वारा हम उलटी दिशा में बहुत बहकाए और खींचे जाते हैं; परन्तु निःसन्देह वह ऐसी परीक्षाओं से प्रभावित होता था जिनके कारण उसका मन परमेश्वर से भटककर इधर-उधर जा सकता था।

फिर भी, उन सब अवसरों के विरुद्ध जिनके कारण हम परमेश्वर के भय और सच्ची पवित्रता से गिर जाते हैं, उपाय पाने के लिए और निश्चित मार्ग पर बने रहने के लिए, वह केवल उसी पर ध्यान देता है जो परमेश्वर उससे कहता है; वही वह अपने मन में मनन करता और विचारता है। और इस आज्ञा तथा चेतावनी को थोड़े शब्दों में कहें तो, परमेश्वर सब विश्वासियों को उभारता है और उनसे आग्रह करता है कि वे उसके मुख को ढूँढ़ें। अब दाऊद गवाही देता है कि उसने इस आज्ञा को मानने और पालन करने में अपना सारा यत्न इस प्रकार लगा दिया है कि बोलनेवाले और आज्ञा देनेवाले परमेश्वर के बीच, जो यों कहता है: "मेरे मुख को ढूँढ़ो," और उसके बीच जो यों उत्तर देता है: "हे मेरे प्रभु, मैं तुझे ढूँढ़ूँगा," एक सुन्दर मेल, सहमति और एकता है।

परन्तु यहाँ हमें यह विचार करना है कि परमेश्वर ने "मुख" शब्द को विशेष रूप से क्यों रखा है। क्योंकि यदि उसका कोई मुख न होता, केवल मुख का एक आभास और छाया होती जिसमें वह अपने आप को हमें दिखाना चाहता, तो वह हमें धोखा देता, क्योंकि वह हमें उस वस्तु को ढूँढ़ने की आज्ञा देता जो उसमें पाई या जानी नहीं जा सकती। फिर भी मैं अनजान नहीं हूँ कि बहुत से ऐसे लोग हैं जो इस स्थान पर अपनी बुद्धि की तीक्ष्णता दिखाना चाहते हैं, और कहते हैं कि इसका अर्थ वही है मानो सीधे-सीधे कहा गया हो, "मुझे ढूँढ़ो।" तौभी जो लोग पवित्रशास्त्र में परिश्रम से अभ्यस्त हुए हैं, वे सहज ही समझ लेंगे कि परमेश्वर एक निश्चित रीति और क्रम को बताना और प्रकट करना चाहता है, जिसके द्वारा वह सदा मनुष्यों को अपने आप को बहुत निकटता से दिखाता और प्रस्तुत करता आया है। और निश्चय ही पवित्रस्थान और वाचा के सन्दूक को परमेश्वर का मुख कहना पवित्रशास्त्र में बोलने की ऐसी रीति है जो जितनी साधारण और प्रचलित हो सकती है उतनी है।

और ऐसा क्यों? इसलिए कि परमेश्वर, जो अपने स्वभाव और महिमा में अगम्य है, मनुष्यों की निर्बलता और अनगढ़पन के अनुकूल कुछ साधन ढूँढ़ लेता है जिनके द्वारा वह उन्हें अपने पास ला सके।

संसार तो सदा अपने लिए झूठे और व्यर्थ स्वरूप गढ़ता रहता है, और परमेश्वर के मुख की भ्रष्ट और मूर्खतापूर्ण नकल करता है।

क्योंकि जिन्हें हम अपनी बुद्धि से गढ़ लेते हैं, वे झूठे और छलनेवाले मुखौटों के सिवा और कुछ नहीं हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर की कल्पना की जाती है। या अधिक स्पष्ट कहूँ, तो उस अन्धविश्वास के विषय में मेरा जो निर्णय है, कि जब मनुष्य अपने लिए कोई आकार या मूर्ति गढ़ लेते हैं ताकि परमेश्वर उन्हें दिखाई दे, तब वे एक मूर्ति बनाने और उसकी पूजा करने के सिवा और कुछ नहीं करते। परन्तु जब परमेश्वर अपनी इच्छा और प्रसन्नता से अपने आप को हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है, और हमें ऐसे चिह्न और संकेत देता है जिनके द्वारा हम उसे जान सकें, तब वह मानो एक मुख के रूप में ठहरता है जिसमें उसे जाना जा सके। इसमें वह हमें चिताता और आज्ञा देता है कि हम में से हर एक अपनी आँखें उसी मुख की ओर फेरे, और बड़े ध्यान, चिन्ता और यत्न के साथ उसे निहारे। क्योंकि निश्चय यही हमारा परम सुख है जिससे हमें कभी तृप्त और भरपूर होना है, कि हम परमेश्वर के दर्शन और मुख का आनन्द उठाएँ, और सब आनन्दों की सारी भरपूरी के साथ, जैसा कि भजन संहिता 60 में कहा गया है।

और क्योंकि हम इतने ऊँचे स्थान पर बिना सीढ़ियों और सोपानों की सहायता के नहीं चढ़ सकते, इसलिए उसके इस उपकार को दूसरे स्थान पर गिनना और मानना चाहिए, क्योंकि यह उन साधनों को प्रस्तुत करता है जिनके द्वारा हम उस प्रधान और परम भलाई तक पहुँच सकते हैं। इसलिए हम ध्यान दें कि यह वचन, जिसमें परमेश्वर हमें अपने मुख को ढूँढ़ने की आज्ञा देता है, ऐसी सामर्थ्य रखता है मानो वह हमारे लिए द्वार खोल रहा हो, जिसके द्वारा वह हमें अनन्त जीवन में ले जाना चाहता है।

जैसा कि दाऊद के समय में प्रकट है, मन्दिर में आना कोई बड़ी बात नहीं थी, कि लोग वहाँ किए जानेवाले और मनाए जानेवाले इतने सारे विधि-विधानों को देख सकें। परन्तु यदि हम उस आत्मिक आदर्श और नमूने पर ठीक से विचार करें जो मूसा को दिखाया गया था, तो हम न इसे अनोखा समझेंगे और न निराधार, कि परमेश्वर उसे अपना मुख कहता है। क्योंकि निःसन्देह जब वहाँ मसीह प्रकट किया गया था, तो इसके सिवा और क्या कहा जा सकता है कि परमेश्वर ने अपने आप को निहारे और देखे जाने के लिए प्रस्तुत किया? अब विचार करें: क्या परमेश्वर हमारे लिए कुछ ऐसे साधन नियुक्त और प्रस्तुत नहीं करता जिनके द्वारा वह एक प्रकार से हमारे द्वारा देखा और अनुभव किया जा सके? यह बहुत सत्य है कि वह अपने पुत्र में प्रकट हुआ है, जो उसका जीवित स्वरूप है, और जिसमें ही वह पूर्ण रीति से जाना जाना चाहता है। फिर भी, संत पौलुस घोषणा करता है कि सुसमाचार एक ऐसा दर्पण है जिसमें सब मनुष्यों को उसे देखना और उस पर विचार करना है। संस्कारों में भी वही सामर्थ्य और स्वभाव है; अन्त में, उसके द्वारा कलीसिया में ठहराया गया सारा क्रम हमें वही दर्शन दिखाता है।

इसलिए संसार के घमण्डी डींग मारनेवाले परमेश्वर के इस क्रम और इस ध्यान का जितना चाहें उपहास करें। फिर भी, जब परमेश्वर हमारे साथ इतना प्रेम और कोमलता का व्यवहार करता है कि इस रीति से वह अपने आप को हमारे अधीन कर देता है, तो हम उसके वचन और संस्कारों को यह आदर देने में लज्जित न हों, कि हम उनमें उसे मानो उसके मुख में देखें और निहारें। इसका अर्थ यह नहीं कि हम संसार की भ्रष्ट होनेवाली तत्त्व-वस्तुओं में बँधे और जकड़े रहें, जैसे पोप के अनुयायी, जो इन चिह्नों का, जो परमेश्वर ने हमें इसलिए दिए कि हम उनके द्वारा यीशु मसीह तक पहुँचाए जाएँ, अन्धविश्वास के साथ मूर्तिपूजा के लिए दुरुपयोग करते हैं। परन्तु यदि हम आगे चलकर परमेश्वर की उस परम सान्त्वनादायक उपस्थिति का, जिसकी सबसे अधिक अभिलाषा करनी चाहिए, पूरा और सिद्ध आनन्द उठाना चाहते हैं, तो हमें इसी दीन और नीची रीति और मार्ग से उसके पास आना होगा।

फिर भी, जो मैं कहता हूँ उसका ऐसा कठोर अर्थ नहीं लेना चाहिए मानो विश्वासी परमेश्वर के निकट केवल तभी पहुँचते हों जब वे मन्दिर में आते हैं। क्योंकि किसी निश्चित स्थान से बँधे रहने की यह धारणा अत्यन्त मूर्खतापूर्ण अन्धविश्वास होती। परन्तु मेरा तात्पर्य यह है कि हम परमेश्वर को बादलों के ऊपर न बैठाएँ (जैसा कि कुछ लोग अपने चिन्तनों में करते हैं), यह सोचकर कि जब वे अपनी आँखें बन्द करके उसकी ईश्वरीय महिमा की कल्पना करते हैं, तो उसे देख लेते हैं; और जो कुछ हमारे मस्तिष्क में आता है वही उसके विषय में मान लेते हैं, तथा सुसमाचार के प्रचार और उसके ज्ञान और चिन्तन के लिए आवश्यक ऐसे ही अन्य साधनों और सहायताओं की उपेक्षा करते हैं। क्योंकि यह अत्यन्त सत्य है कि जो लोग उन संस्कारों के प्रयोग को, जिनके विषय में मैं कहता हूँ, और कलीसिया के सारे क्रम को तुच्छ जानते हैं, वे उसी समय परमेश्वर को देखने से इनकार करते हैं जब वह अपने आप को देखे और निहारे जाने के लिए प्रस्तुत करता है।

अब देखें कि यह गम्भीर और प्रबल आग्रह और उकसावा हमारे लिए कितना आवश्यक है, जिसके द्वारा परमेश्वर हमें अपने पास बुलाता है।

हम पहले ही कह चुके हैं कि जब वह हमें इतने प्रेम और कोमलता से अपने पास बुलाता है कि वह हमारा उद्धार करे, और हमें उस सच्चे और सिद्ध सुख तक पहुँचाए जिससे हम स्वभाव से इतनी दूर हैं, तब वह हम पर कितनी कृपा, प्रेम और आदर दिखाता है। परन्तु हमें यह भी देखना और विचारना है कि परमेश्वर हर प्रकार से हमें कोंचता और उभारता है, कि हम सावधान रहें कि दुर्दशा में न पड़ें। सबसे पहले, हमारी आँखें इतनी भटकनेवाली और चंचल हैं कि यह बहुत ही दयनीय दशा जान पड़ती है। क्योंकि हमारे इस सारे जीवन में संसार की व्यर्थताओं के सिवा कुछ नहीं है जो हमारी सारी इन्द्रियों को व्यस्त रखती हैं, और शैतान के पास अनगिनत और अत्यन्त चतुर भ्रम हैं जिनके द्वारा वह निरन्तर हमें घेरता और छलता रहता है। यद्यपि उसके सब छल और कपट कुछ मूर्खतापूर्ण मुखौटों और दिखावों, खेल दिखानेवालों के तुच्छ और नकली तमाशों और जादूगरी के सिवा और कुछ नहीं हैं। परन्तु अनुभव स्पष्ट सिखाता है कि हम कितने मूर्ख हैं, कितने पागल और सब सुध-बुध से रहित, कि हम अपने आप को इतनी सरलता से और इतनी बार भुलावे और धोखे में पड़ने देते हैं। इसलिए यदि हम बुद्धिमान और सुविचारित होते, तो यह वाणी निरन्तर हमारे कानों में गूँजती रहती: "मेरे मुख को ढूँढ़ो।" और हम क्या ढूँढ़ते हैं? परमेश्वर हमारे उद्धार के लिए जितना चिन्तित और यत्नशील है, हम उसके पीछे चलने में उतने ही लापरवाह और धीमे हैं। और परमेश्वर करे कि हम अड़ियल और अड़नेवाले घोड़ों के समान न होते, जो आगे बढ़ने से अधिक पीछे हटने को तैयार रहते हैं। फिर भी यह उदाहरण हमारे सामने व्यर्थ नहीं रखा गया। क्योंकि दाऊद का यह श्रद्धापूर्ण उत्तर और यह प्रतिज्ञा, कि वह इस शिक्षा पर अपने हृदय में मनन करता था, जिसके द्वारा वह और सब विश्वासी परमेश्वर के मुख को ढूँढ़ने के लिए चेताए जाते हैं, हमें बताती है कि हमें अपना अध्ययन और यत्न किस बात में लगाना चाहिए, ऐसा न हो कि हमें अपने पास बुलानेवाला परमेश्वर हम पर अपना सारा परिश्रम व्यर्थ गँवा दे। और इस शिक्षा में दो बातें हैं जो ध्यान देने के सबसे योग्य हैं। पहली यह कि जैसे ही परमेश्वर ने यों कहा और आज्ञा दी, "मेरे मुख को ढूँढ़ो," वह इस वचन को अत्यन्त उत्कट प्रेम के साथ उत्तर देता है। दूसरी यह कि परमेश्वर की आज्ञा से सहमत होने और उसे स्वीकार करने के बाद, वह प्रतिज्ञा करता है कि वह सचमुच परमेश्वर के मुख को ढूँढ़ेगा, और कर्म तथा यत्न से उसे प्रकट करेगा। और निश्चय परमेश्वर की आराधना में हमें यही क्रम रखना चाहिए, कि सबसे पहले परमेश्वर के वचन और आज्ञा को प्रवेश और स्थान दें, जैसा कि हमें एक और भजन में सिखाया गया है: "यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मन को कठोर न करो।" परन्तु बहुत थोड़े ही ऐसे मिलते हैं जो इस मन से परमेश्वर की आज्ञाओं को अपनाते हैं, यद्यपि अधिकतर लोग इस प्रकार कहेंगे और ऐसा ही उत्तर देंगे: "सच है, यह हमारा कर्तव्य है; हम इसके विरुद्ध न बोल सकते हैं, न हमें बोलना चाहिए।" परन्तु जिस बात पर वे मुँह से सहमत होते हैं, वह उनके मन में उतरने और पैठने से बहुत दूर है। इसलिए हम इससे सीखें कि अपनी धार्मिकता की नींव इस प्रकार रखें, कि हम परमेश्वर को सच्चाई और निष्कपटता से उत्तर दें, कि जब वह हमें इतनी दया से अपना मुख निहारने को बुलाता है, तब हम उसके इस अत्यन्त उत्तम उपकार को पूरी रीति से समझते और अनुभव करते हैं। जब यह बोध और अनुभव इस प्रकार हृदय को छू लें और उसे तैयार कर दें, तो यह हो ही नहीं सकता कि धर्म और कर्तव्य का दूसरा भाग तुरन्त पीछे न आए, अर्थात् जो कुछ हम जानते हैं कि परमेश्वर की ओर से अत्यन्त न्यायसंगत रीति से आज्ञा दिया गया है और हमारे विशेष हित से सम्बन्ध रखता है, उसे पूरा करने का सामर्थ्य।

क्योंकि दाऊद का मनन ठण्डा और निर्जीव नहीं था, जिसमें परमेश्वर के मुख को ढूँढ़ने और निहारने में सारे जीवन को लगाने की न कोई प्रेरणा थी, न कोई प्रयोग। परन्तु जैसे ही उसने निश्चय कर लिया कि उसे परमेश्वर को ढूँढ़ना चाहिए, वह इस प्रतिज्ञा के साथ आगे बढ़ता है कि वह अपने हृदय की इस अभिलाषा को पूरे यत्न से पूरा करेगा। इसमें वे लोग अवश्य बहुत लज्जित होंगे जो अपने आप को मसीही कहते हैं, और न उनके हृदय में वह अभिलाषा है और न कोई भली प्रेरणा, और न वे जीवन के उस कर्तव्य में, जो इस पर निर्भर है, अपने आप को लगाते या अभ्यास करते हैं।

परन्तु कुछ लोग यह कहेंगे कि उनके लिए अपना वह देश छोड़ना उचित नहीं जिसमें वे जन्मे हैं: चाहे वे जीवन के भोजन से वंचित हों और वहाँ भयानक उजाड़ के सिवा कुछ दिखाई न देता हो, जिसके कारण कलीसिया का सारा क्रम बिगड़ गया है, या यों कहें कि नष्ट हो गया है। ऐसा क्यों? वे कहते हैं कि कहीं वे उस राजभक्ति को न तोड़ बैठें जो वे अपने जन्म के और नागरिक शासक के प्रति रखते हैं। मैं उनके इस बहाने का उत्तर थोड़े शब्दों में दूँगा: मैं उनसे केवल यह पूछता हूँ: यदि वे ऐसी दरिद्रता और जीविका के अभाव में होते कि घर में खाने-पीने को कुछ न होता, तो क्या ऐसा कोई सन्देह उन्हें उन स्थानों में रोक रखता? निश्चय ऐसा कोई मनुष्य नहीं होगा जो भूख से मर न जाने के लिए अपना देश छोड़ने की क्षमा न माँगे। मैं एक और स्थिति भी रखता हूँ जिसमें कोई आवश्यकता नहीं है: यदि उन्हें किसी परदेश में उससे छह गुना धन दिया जाए जितना उनके अपने देश में है, तो उन्हें उस यात्रा से कोई बात नहीं रोकेगी, कि वे ऐसी सम्पत्ति पा सकें। तब उन्हें ऐसे आवरण और रंगे-पुते बहाने लाने की क्या आवश्यकता, जबकि स्पष्ट और प्रकट है कि उनकी बात उससे बहुत दूर है जो वे अपने विवेक में अनुभव करते हैं? हम इस विषय को इसलिए नहीं उठाते कि उन्हें कोई बात न रोके, परन्तु इसलिए कि वे इस राजा और उसकी सारी प्रजा के लिए पवित्रता, शुद्धता और लाभ के साथ प्रार्थना कर सकें।

अब ऐसी यात्रा, जो ऐसे स्थान की ओर स्पष्टतः की जाए, उन यात्राओं से अधिक अपराध नहीं हो सकती जो इस वर्तमान जीवन की सुविधाओं और अवसरों के लिए की जाती हैं, और जिन पर कोई किसी बात में दोष नहीं लगा सकता। परन्तु आगे देखें कि क्या यह आवश्यकता उन्हें पर्याप्त रूप से निर्दोष ठहराती है। देखो, प्रभु ही आज्ञा देता और कहता है: "मेरे मुख को ढूँढ़ो।" अब नागरिक अधिकारी परमेश्वर से गिर जाते हैं और बहुत दूर भटक जाते हैं, और दूसरों को भी उसी त्याग और विद्रोह के लिए विवश करते हैं, या कम से कम दुखी प्राणियों को उनके प्रतिदिन के भोजन से वंचित कर देते हैं, और परमेश्वर के मुख के स्थान पर अन्धविश्वासी मूर्तिपूजाओं की कल्पनाएँ खड़ी करते हैं। क्या इस बात में मरणहार मनुष्यों को जीवते और अमर परमेश्वर से बढ़कर मानना उचित है? यदि परमेश्वर की आज्ञा माननी है, तो उन्हें चाहिए कि वे संसार के सब छोरों में परिश्रम करते हुए उसके मुख को ढूँढ़ने जाएँ जहाँ वह उसे दिखाता है, बजाय इसके कि अपने घोंसलों में छिपे और कुढ़ते पड़े रहें, चाहे राजा कोई भी आज्ञा दे या उसके विरुद्ध कुछ भी उद्यम करे जिसके पास उन पर और उनमें से हर एक पर सर्वोच्च अधिकार और सामर्थ्य है; और यदि लोग उनकी आज्ञा न मानें तो उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचती। यद्यपि, जो मैंने अभी कहा उसके अतिरिक्त, ऐसे लोग पर्याप्त दिखाते हैं कि उन्होंने कभी यह विचार नहीं किया और न तौला कि उनकी दशा और स्थिति क्या है, वह बन्धुआई कितनी दयनीय और घिनौनी है जिसमें वे रोके और दबाए गए हैं। जब तक उनका विवेक पूरी तरह सुला न दिया गया हो, यह असम्भव है कि वे निरन्तर मन की ऐसी पीड़ा और दुःख में न हों जैसी तब होती यदि उनका शरीर पीड़ा और यातना में होता।

क्योंकि अपने परिवारों और घरों में किसी भी रीति से परमेश्वर का आदर करने की उन्हें क्या स्वतंत्रता है? उदाहरण के लिए, यदि उनमें से किसी के घर सन्तान जन्मे, तो उसका कर्तव्य है कि उसे प्रार्थना और धन्यवाद के साथ परमेश्वर को अर्पित करे, और यह माँगे कि उसकी देह पर बपतिस्मा का चिह्न लगाया जाए जो उद्धार का चिह्न है। अब हम जानते हैं कि पोप के मत में बपतिस्मा इतना बिगड़ा हुआ और ऐसे अन्धविश्वास और अशुद्धता से अपवित्र है कि बालक उसे ग्रहण नहीं कर सकता, बिना तुरन्त अशुद्ध और अपवित्र हुए। इसलिए पिता बिना पाप किए शिशु को बपतिस्मा नहीं दे सकता। और यदि वह रुका रहे, तो भी पाप करता है, चाहे और किसी बात में नहीं तो इसी बात में, कि परमेश्वर के पुत्र द्वारा ठहराए गए संस्कार को छोड़कर और उसकी उपेक्षा करके वह मनुष्यों को ठोकर खिलाता है।

तब उसके मन की कैसी दुविधा है, कि यह बात न की जा सकती है और न न की जा सकती है, बिना इसके कि परमेश्वर बहुत गम्भीर रूप से अप्रसन्न हो? मैं उनकी अन्य असुविधाओं और दुःखों को नहीं गिनाता, क्योंकि यही एक उदाहरण उनकी दयनीय दशा और स्थिति बताने के लिए आवश्यकता से अधिक है। अब जब कोई मनुष्य अपने सारे जीवन इस दयनीय दुविधा में रहा हो, अनिश्चित कि किधर मुड़े, तब मृत्यु के समय उसे अत्यन्त गम्भीर आक्रमणों और परीक्षाओं की प्रतीक्षा करनी होगी, क्योंकि उस समय निश्चय शैतान अपने सारे अस्त्र-शस्त्र एकत्र कर लेगा। और इस दयनीय बन्दी की, जो पहले अपनी पत्नी और परिवार की चिन्ता और फ़िक्र के कारण परमेश्वर की सेवा करने से रोका गया था, मृत्यु के समय उसकी दशा अत्यन्त दयनीय है।

इसलिए जो लोग सांसारिक राजा के प्रति आज्ञाकारिता के किसी बहाने के नीचे इस दलदल से, या यों कहें इस नारकीय गड्ढे से निकलने में सन्देह करते हैं, वे प्रकृति के सारे क्रम को उलट देते हैं। क्योंकि वह उचित प्रार्थना जिसे परमेश्वर हमारे राजाओं के लिए करने की अनुमति देता है, उस अधिकार के अनुकूल और अत्यन्त उपयुक्त है जो उसने उन्हें दिया है, और उस कर्तव्य के भी जिससे उसने हमें उनके प्रति बाँधा और ठहराया है। इस प्रकार संत पौलुस राजाओं और अधिकारियों के लिए प्रार्थना करने और कराने का आग्रह करता है, कि हम सारी भक्ति, शान्ति और भले आचरण और परमेश्वर के भय के साथ शान्तिपूर्ण और चैन का जीवन बिताएँ। परन्तु पार्थिव राजाओं की आज्ञाकारिता का यह बढ़ाना और ऊँचा करना अत्यधिक है, जब वह परमेश्वर से अलग होने और स्वर्गीय राजा को दिए जानेवाले आदर और आराधना के घटाए जाने से जुड़ा हो। बेचारे यहूदी तो सचमुच बाबुल की बन्धुआई में इतने समय तक रहने को विवश हुए जब तक कि परमेश्वर का ठहराया हुआ वह समय पूरा न हुआ जब उन्हें वह दुखद बन्धुआई सहनी थी; परन्तु ये लोग, जो मनुष्य की व्यवस्था और आज्ञाकारिता की इतनी बात करते हैं, और जिनसे मुझे काम पड़ा है, वे बताएँ कि हम मसीही ऐसी ही आज्ञाकारिता से इस सीमा तक बँधे हैं कि अपनी इच्छा से अपने आप को उन आत्मिक आशीषों से वंचित कर लें जो परमेश्वर अपनी सन्तान को उदारता से देता है। वे बड़ी आवश्यकता अनुभव करते हैं जिससे वे बहुत दबे हुए हैं, और अपनी ही दुर्बलता से बहुत लुभाए जाते हैं; परन्तु परमेश्वर उन्हें इन इतनी बड़ी बुराइयों का उपाय दिखाता है। इसका क्या कारण है कि वे इन इतनी बड़ी सहायताओं और आशीषों को उनकी आज्ञाकारिता और सेवा के लिए तुच्छ जानते हैं जो उनके हाथों से उनकी रोटी छीन लेते हैं?

पुरुष का अपनी पत्नी के प्रति, या पत्नी का पति के प्रति, कारण इससे भी बड़ा है। क्योंकि जब परमेश्वर ने उन्हें एक तन करके जोड़ दिया है, तो परमेश्वर को ढूँढ़ने के किसी बहाने के नीचे एक का दूसरे को छोड़ना किसी दशा में भला नहीं हो सकता। केवल इतना ही नहीं कि वे पति-पत्नी के बीच के कर्तव्य में बाधा डालने के लिए एक-दूसरे से दूर न जाएँ, परन्तु हर एक को चाहिए कि हर प्रकार से और पूरे यत्न से परिश्रम करे कि उस पवित्र जीवन के साथी और संगी को परमेश्वर की आराधना में खींचकर ले आए। तब यही कर्तव्य है जो एक का दूसरे के प्रति है, कि पति अपनी पत्नी को बताए कि वे कितने दीन और अभागे हैं, क्योंकि उनमें विश्वासियों की पवित्र संगति और सहभागिता नहीं है, क्योंकि वे संस्कारों और उपदेशों से वंचित हैं (जो अत्यन्त निश्चित चिह्न, प्रतिज्ञाएँ और गवाहियाँ हैं और जिनके द्वारा हम पूरी निश्चयता से जान सकते हैं कि परमेश्वर हमारे बीच बसा है)।

फिर उसे चाहिए कि उसे उत्साहित करे कि वह निराश न हो और अविश्वास न करे, परन्तु परमेश्वर की दया पर भरोसा रखे। और यदि वह उसे उतनी शीघ्रता से न समझा सके और न मना सके जितनी वह चाहता है, तो जब तक उसका उद्देश्य पूरा न हो जाए, वह कभी न थके। और यद्यपि उसकी पत्नी उसके उद्देश्य का बहुत दृढ़ता से विरोध करे, तौभी पुरुष उस विषय में उससे लगातार प्रयत्न करना न छोड़े, और हर रीति से उसके मन को परखता रहे, जब तक वह अपने बुरे उद्देश्य में हठीली और अड़ियल सिद्ध न हो जाए। जब वह वह सब कुछ आज़मा और प्रयत्न कर चुके जो उससे हो सकता है, यदि वह वहाँ और अधिक नहीं ठहर सकता, तब वह विवाह की सारी व्यवस्था और ठहरे रहने की आवश्यकता से पूरी तरह स्वतंत्र और छूटा हुआ है: क्योंकि उसने अपना सारा कर्तव्य निभा दिया और उसकी ओर से कोई कमी नहीं रही सिवाय इसके कि उसकी पत्नी अपने कर्तव्य के अनुसार उसके पीछे चलती। फिर भी पुरुष का पत्नी से यह चले जाना तलाक नहीं है, परन्तु पति वहाँ आगे जाता है जहाँ परमेश्वर बुलाता है, कि अपनी पत्नी को मार्ग दिखाए। और जहाँ तक विवाहिता स्त्री का सम्बन्ध है, वह विवाह के और भी कसे हुए बन्धन में बँधी है क्योंकि वह निम्न है, और उसे योग्य रीति से अपने पति को अपना सिर मानना और उसका आदर करना चाहिए। इसलिए उसे हर सम्भव रीति से अपने पति को उस मन और उस उपाय की ओर लाना चाहिए कि वह उन दोनों को स्वतंत्र करे और छुड़ाए।

और जब वह वह सब कुछ कर चुकी हो जो वह कर सकती है, तौभी वह स्वतंत्र और छूटी हुई नहीं है कि उसे छोड़ दे जिससे वह बँधी और जिसके अधीन है, जब तक कि कोई उत्पीड़न न उठ खड़ा हो जिसमें संकट प्रकट हो, और विशेष रूप से यदि उसका अपना पति उसे मृत्यु तक सताने को तैयार हो: क्योंकि तब वह अपने पति को नहीं छोड़ती, परन्तु उस बुराई से बचती है जो उसके लिए तैयार की गई है और अपने शत्रुओं के उस उग्र क्रोध से जिसे परमेश्वर होने देता और अनुमति देता है। अन्त में, वह बड़ा संकट और हिंसा जो उसके प्रति ठानी गई है, उसे ऐसे कड़वे और संकटपूर्ण जीवन के बन्धन से मुक्त और छुड़ा देती है: तौभी, जब सब बातें भली-भाँति तौली और विचारी जाएँ, तो कोई सांसारिक कारण पति या पत्नी को एक-दूसरे से अलग न करे, केवल वह पारस्परिक सद्भावना, प्रेम और दया जो एक का दूसरे के उद्धार के प्रयत्न के प्रति कर्तव्य है।

क्योंकि यदि मनुष्य को अपने आप को इस प्रकार भूल जाना आवश्यक है कि उसे इस पार्थिव जीवन और देह से सम्बन्ध रखनेवाली बातों का कोई ध्यान न रहे, तो उसे अपने आस-पास की बातों को भी इसी प्रकार भूल जाना और तुच्छ जानना चाहिए।

इसलिए हम उस गणना की ओर लौटें जो दाऊद करता है, कि प्रभु के मुख को ढूँढ़ना चाहिए, जैसा कि वह भजन संहिता 84 में भी कहता है, जहाँ वह कहता है कि प्रभु के आँगनों में एक दिन रहना उनसे दूर रहकर हज़ार दिन रहने से उत्तम है: जिससे वह बताता है कि विश्वासियों का जीवन कितना भी छोटा हो कम नहीं, यदि परमेश्वर उन्हें यह अनुग्रह दे कि जब तक वे इस संसार में रहें, वे उसकी सेवा और आदर में अपने आप को लगाए रखें, और उसकी प्रतिज्ञाओं के साथ अपने आप को स्थिर करें, और सारे भक्तिपूर्ण अंगीकार और स्तुति के साथ उसके नाम का गुणगान करें। यदि कोई यह आपत्ति करे कि यह किसी निर्जन स्थान में या विश्वास के शत्रुओं के बीच भी हो सकता है, तो मैं उत्तर देता हूँ कि दाऊद का मन्दिर के आँगनों का नाम लेकर कहना निराधार नहीं है। क्योंकि वह विचार करता है कि मरणहार मनुष्यों के लिए कलीसिया का क्रम कितना आवश्यक है, विशेष रूप से इसलिए कि वह उनके अनगढ़ और निर्बल स्वभाव को जानता है; परन्तु यदि यह उपदेश और चेतावनी सब मनुष्यों के हृदयों में ऐसी जल उठती कि सब कम से कम किसी मसीही कलीसिया तक आ जाते जहाँ वे चैन और शान्ति से मर सकें, तो कोई ऐसा नहीं होता जो सहज और शीघ्र अपना बोझ न उठा ले और अपने आप को तैयार न करे। परन्तु हम क्या ढूँढ़ते हैं? हर एक जीना चाहता है, और वह भी पूरे आराम और सुख के साथ, हर एक उसी प्रकार के सुख और अभिलाषा में जिसके द्वारा वह चलाया और खींचा जाता है। यही कारण है कि आज परमेश्वर की कलीसिया इतनी तिरस्कृत और ठुकराई जाती है। हाँ, और बहुत से चतुर और चालाक हैं जो अपनी आँखों के सामने ऐसी रुकावटें और बाधाएँ गढ़ते और खड़ी करते हैं जो उन्हें भक्ति के उस अध्ययन से हटा दें जो दाऊद में था।

इसके अतिरिक्त, वे यह भी कहते हैं कि यदि हम स्थान बदल लें, तो हमें क्या लाभ होगा? जहाँ भी हम जाएँ, हम संसार को अपने देश से कम नहीं पाएँगे। इस समय आचरण और सब बातों में अद्भुत भ्रष्टता है। सब बातें ठोकरों, परीक्षाओं और ऐसी भ्रष्टताओं से भरी हैं जिनके द्वारा मनुष्यों के मन परमेश्वर के सच्चे भय से सरलता से गिरकर संसार के प्रेम में पड़ सकते हैं। मैं मानता हूँ कि सब बातें वैसी ही हैं जैसी वे सोचते और कहते हैं। परन्तु यदि उनके शरीर पर संकट होता और उन्हें बताया जाता कि वे कहाँ विद्वान और योग्य वैद्य तथा उचित और स्वास्थ्यकर औषधियाँ और अन्य सहायताएँ पा सकते हैं, जिनसे स्वास्थ्य लौटे या बना रहे, तो मैं कहता हूँ कि वे यह नहीं कहते कि उन्हें इसकी चिन्ता नहीं या वे इसे तुच्छ समझते हैं क्योंकि सब स्थानों में मनुष्यों को रोग लग सकते हैं। मैं मानता हूँ कि हम जिस भी स्थान में हों, हमें बुराई करने के असंख्य अवसर, संसार की भ्रष्टताएँ और लुभावने जाल मिलेंगे; परन्तु इसमें बड़ा अन्तर है कि हमारे पास सहायताएँ हैं या नहीं। वे सहायताएँ जिनसे हम या तो अपने कर्तव्य पर बने रह सकें या कर्तव्य से भटक जाने पर पुनः स्थापित हो सकें, या हम उनसे सर्वथा वंचित हों। मान लें कि दुर्गुण अब राज्य करते हैं और संसार में ऐसे ही प्रबल हैं, कि उनके विष से वायु महामारी के समान दूषित हो गई है: तो क्या हम दूसरों से अच्छी दशा में नहीं हैं, कि हमारे पास ऐसी औषधियाँ हैं जो परमेश्वर ने अपनी सन्तान को दी हैं, जिनके द्वारा हम या तो आती हुई और आक्रमण करती हुई गम्भीर बीमारियों को अपने से दूर कर सकते हैं, या उनके आ जाने पर उन्हें शुद्ध करके निकाल सकते हैं?

इसके अतिरिक्त, मैं समझता हूँ कि सुसमाचार की शिक्षा जब शुद्ध रूप से प्रचार की जाती है, और संस्कार जब उनका उचित प्रयोग बना रहता है, और सार्वजनिक प्रार्थनाएँ और इनके अतिरिक्त अन्य साधन भी, सदा अत्यन्त आवश्यक हैं कि हमें उभारें और चिताएँ कि हम संसार की भ्रष्टताओं और परीक्षाओं से मानो किन्हीं विषों के समान संक्रमित न हों। अब सब मनुष्य जानते हैं कि पोप के मत में इन इतने बड़े और स्वास्थ्यकर उपायों और आशीषों में से कुछ भी नहीं है, परन्तु इसके विपरीत सब दुष्टता है और जीवन और उद्धार के खो जाने का अत्यन्त संकट है।

इसलिए हम सावधान रहें कि उस सहायता को अस्वीकार न करें जो परमेश्वर इस बड़ी आवश्यकता में, जब हमें अपने उद्धार के लिए बड़ी सहायता चाहिए, अत्यन्त दया के साथ देता है। फिर भी कुछ ऐसे हैं जो अपने पेट की गन्दगी और रोग को और अधिक स्पष्ट रूप से उगल देते हैं। वे कहते हैं, क्या हम उस कलीसिया में जाएँ जहाँ हम बड़े दुःख के साथ वे हलचलें और ठोकरें देखेंगे, जो अभी हमें अज्ञात होने के कारण हमारी आँखों और मन को नहीं खटकतीं? यदि उन स्थानों में, जहाँ सुसमाचार का प्रचार होता है, कलीसिया का ऐसा शासन और क्रम होता जैसा हमारी उन्नति के लिए चाहिए, यदि हमें विश्वास होता कि वहाँ केवल स्वर्गदूत ही मिलेंगे जो हमें स्वर्गलोक में ले जाएँगे, तो हम बड़ी शीघ्रता और यत्न से वहाँ दौड़ जाते। परन्तु जब हम वहाँ पहुँचेंगे, तो बहुत सी बातें सुनेंगे जो हमें बहुत ठेस पहुँचाएँगी, और आवश्यकता से कहीं अधिक बातें देखेंगे: वहाँ बहुत से मनुष्य हर प्रकार की दुष्टता और निर्लज्जता की ओर झुके होंगे, जो अपने उच्छृंखल जीवन से सुसमाचार की निन्दा और बदनामी कराते हैं; व्यर्थता, ठाठ-बाट, घमण्ड और पियक्कड़पन उचित से अधिक सामान्य होंगे।

इसके अतिरिक्त, जो सबसे अधिक दुखद और असह्य है, वहाँ बहुत से लोग ऐसे उद्दण्ड और उग्र, परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले दिखाई देंगे कि उनके जीवन में पोप के अनुयायियों से भी अधिक दुष्टता प्रकट होगी; और फिर, हाकिमों और न्याय करनेवालों में उतनी ही भ्रष्टता, अव्यवस्था और अधर्म पाया जाएगा जितना अन्य स्थानों में। और जो सुसमाचार प्रचार करने के लिए ठहराए गए हैं, उनमें भी बहुत सी बातें दिखाई देंगी जो निन्दा और डाँट के योग्य जान पड़ेंगी। क्योंकि उनमें से कुछ सेवकाई में लापरवाह होंगे, या अपने निजी और घरेलू कामों में इतने व्यस्त कि जो विश्वासयोग्यता, यत्न और निष्कपटता उन्हें दिखानी चाहिए उसकी उन्हें अधिक चिन्ता नहीं होगी। और सबसे बुरा यह कि इस प्रकार के लोगों में कुछ ऐसे हैं जो सुख-विलास में इतने डूबे हैं कि वे शरीर और पेट की सब लालसाओं की ओर झुके रहते हैं, और आराम से जीने और शरीर को पालने के सिवा और किसी बात की चिन्ता या परवाह नहीं करते; और इसे अधिक स्वतंत्रता से करने के लिए वे दुष्टों से मिल जाते हैं और हर बुराई और दुष्कर्म में उनकी संगति में आते-जाते हैं।

अच्छा, मान लें कि वहाँ दस गुना अधिक बुराई है जितनी वास्तव में है, या जितनी मनुष्य कल्पना करते हैं: तौभी यह बहाना उन लोगों के लिए सदा व्यर्थ होगा जो इसे अपने लिए रुकावट और बाधा बनाते हैं कि वे परमेश्वर की कलीसिया में न आएँ। और इस बात को प्रमाणित करने के लिए, आइए हम दाऊद के उस उदाहरण को, जो हमारे हाथ में है, और भी गहरे विचार और ध्यान से देखें। क्या शाऊल के दिनों में, मैं तुमसे पूछता हूँ, न्याय और अन्य पदों में वैसी धार्मिकता और खराई देखी जाती थी जैसी राज्य की दशा और कलीसिया की गरिमा को चाहिए थी? नहीं, इसके विपरीत, हम सुनते हैं कि दाऊद बार-बार राजा की और अन्य अधिकारियों की, जो न्याय और सार्वजनिक पदों में थे, दुर्भावना, छल-कपट, उग्रता और घमण्ड की कितनी बड़ी शिकायतें करता है। और याजकों और लेवियों के विषय में, क्या वे याजकपद का काम और पवित्र वस्तुओं की सेवकाई इतनी शुद्धता और भक्ति से करते थे कि उन्हें अपने और कलीसिया के लिए उचित रूप से आनन्दित होने का कारण मिलता? या क्या हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि उनमें से अधिकतर साधारण दुर्गुणों और भ्रष्टताओं के पीछे चलते थे, हाँ और अपनी चापलूसी से दुष्टता को पोसते और बढ़ाते थे? और प्रजा और साधारण भीड़ के विषय में, वे कपट और नाना प्रकार के पापों और अत्यन्त प्रकट अपराधों से भरे थे। फिर भी इन सबके होते हुए दाऊद उस सभा से घृणा नहीं करता, न कलीसिया में आने और प्रवेश करने से इनकार करता है, और न उसे देखने की अपनी अभिलाषा को बुझाता या घटाता है। मैं मानता हूँ कि यह बहुत भारी और कठिन परीक्षा है। क्योंकि मनुष्य जितना अधिक परमेश्वर के आदर की धुन और अभिलाषा से प्रेरित होता है, उतना ही अधिक उसे शोक और विलाप का कारण होता है जब वह उसकी कलीसिया की अशुद्धता में उसका अत्यधिक अनादर देखता है: परन्तु इन सब असुविधाओं और बाधाओं पर जय पाने का उपाय दाऊद ने बताया है, अर्थात् यह कि हम प्रभु के मुख को ढूँढ़ें, और अपना सारा सुख और जीवन की आनन्दमयता पूरी तृप्ति के साथ उसके दर्शन और निहारने में रखें, और उन सब कष्टों के विरुद्ध जो शैतान हमारे विरुद्ध उठाता है, यह निश्चय और ठान लें कि परमेश्वर के मन्दिर में, जहाँ उसका मुख देखा जा सकता है, रहने से बढ़कर कुछ भी न मनभावन है न सुखद: इस प्रकार जब-जब ऐसी ठोकरें हमारे सामने आएँ, हम स्मरण करेंगे कि शैतान अपनी सामान्य रीति के अनुसार हमारी आँखों को चौंधियाने और हमें व्याकुल करने का प्रयत्न करता है।

परन्तु इस बात में हम बुद्धिमान और दृढ़ बनें, कि हम उसके चिन्तन से कभी बहक न जाएँ, परन्तु उसके अत्यन्त सान्त्वनादायक दर्शन से अपना सम्पूर्ण और पूरा आनन्द लें। बेचारे मूर्तिपूजकों को हमें लज्जित करना चाहिए। क्योंकि यदि उनमें से कोई मूर्खतापूर्ण तीर्थयात्रा में अपनी देह को थका डालने के बाद, उस स्थान पर पहुँचकर जहाँ वह जाना चाहता था, किसी ऐसे सराय-स्वामी से मिले जो उससे अनुचित रीति से धन माँगे, या ऐसे नीच और क्रूर दुष्टों से जो उसके साथ अन्याय करें, या लोभी पुजारियों से जो उसे ठगें, और संक्षेप में वहाँ अव्यवस्था और गड़बड़ी के सिवा कुछ न पाए, तौभी ऐसी कोई बुराई या असुविधा नहीं जो उसे इस आरम्भ किए हुए धर्म, या यों कहें अन्धविश्वास, से फेर सके। क्योंकि वह कहेगा कि वह इसलिए वहाँ आया है कि किसी धन्य सन्त की देह की पूजा करे, या हमारी स्त्री की, जैसा वे उसे कहते हैं, किसी मूर्ति की, या किसी प्रकार के अवशेषों की।

और क्या सचमुच किसी शव, या तुच्छ मूर्ति का दर्शन मात्र उन अविश्वासी लोगों को, जिनमें कोई विश्वास नहीं, अपने अन्धविश्वासों में हठीले बने रहने के लिए अधिक बल देगा, इससे कि स्वयं परमेश्वर का मुख और उपस्थिति हमें दृढ़ करे और वह स्थिरता दे जो इतनी बड़ी भलाई के पीछे चलने और उसे पाने के लिए आवश्यक है? यदि हम यह या वह कुछ देखें जो हमारे मन को दुखी या व्याकुल करे, तो परमेश्वर हमें फिर अपनी ओर बुलाता है और चाहता है कि उसके मुख को निहारने और देखने में हम वह सान्त्वना और आनन्द पाएँ कि दूसरी असुविधाओं को धीरज से सह सकें। इसलिए सब भक्त और विश्वासी लोगों के लिए यही ढाल और शरण हो, कि वे निरन्तर परमेश्वर के मुख और स्वरूप की ओर देखते हुए उससे लिपटे रहें, चाहे शैतान उन्हें बहकाकर ले जाने के लिए कैसा भी यत्न और उपाय करे। और निश्चय, यदि हम सचमुच और जैसा चाहिए वैसा परमेश्वर के मुख का मूल्य जानें, तो अन्य वस्तुओं की हानि में, चाहे हम जो भी सहें, हम कभी कोई हानि या घाटा नहीं गिनेंगे।

यद्यपि सच कहूँ तो उनमें से अधिकांश को मन की अनिश्चितता से उतनी रुकावट नहीं होती जितनी देह से सम्बन्धित वस्तुओं के अभाव और असुविधा से: ऐसा नहीं कि परमेश्वर की सन्तान के विवेक में बड़े और कठिन संघर्ष नहीं होते जब वे उन कलीसियाओं में, जो सुधारी हुई कही जाती हैं, उन ठोकरों को पाते हैं जिनकी हमने चर्चा की। इसलिए जो ऐसे स्थानों में जाने का निश्चय किए हैं जहाँ सुसमाचार का प्रचार होता है, उन्हें पहले से बहुत सी और भारी ठोकरों के विषय में चेताया जाना चाहिए, और उन्हें सहने और उन पर जय पाने के लिए अपने आप को तैयार करना चाहिए; और जिन्होंने पहले ही ये असुविधाएँ और बाधाएँ चख और परख ली हैं, उन्हें अपने आप को सबसे अधिक दृढ़ करना चाहिए, कि शैतान की इच्छा के विरुद्ध वे परमेश्वर के मुख को अत्यन्त स्थिरता से ढूँढ़ें। परन्तु यदि सब बातों को ठीक से परखा और विचारा जाए, तो कुछ नहीं मिलेगा सिवा सचमुच के अविश्वास और अनिश्चय के, जो भीड़ को और अधिकांश मनुष्यों को रोके हुए है।

और जैसे मनुष्य बहाने ढूँढ़ने में बहुत चतुर हैं, धनवानों के बहाने एक प्रकार के हैं और निर्धन भी अपने बहाने लाते हैं। धनवान कहता है, "यह कैसे हो सकता है कि मैं अपना सब कुछ छोड़ दूँ? क्या मैं इस प्रकार अपनी सारी धन-सम्पत्ति से अपने आप को वंचित कर दूँ? मेरी पत्नी और बच्चे हैं; हमें बिना किसी परिश्रम के आराम से रहने की आदत हो गई है।"

हम परदेश में क्या करेंगे जहाँ हमारी कोई आमदनी या किराया नहीं होगा? परन्तु निर्धन इसके विपरीत कहते हैं: मेरे पास सचमुच बहुत थोड़ा है, परन्तु मैं अपने मित्रों के बीच हूँ, जिनकी उदारता से मेरी दरिद्रता और आवश्यकता पूरी होती है। मेरा परिश्रम इतना जाना-पहचाना है और उसके बिना काम नहीं चलता, कि मैं यहाँ अपने परिश्रम से जी सकता हूँ। अनजान और अपरिचित लोगों के बीच मैं क्या करूँगा, जब मेरे पास एक पैसा या कौड़ी नहीं होगी, और कोई परिचय, मित्रता, कृपा या सहायता मेरी मदद न करेगी? और सम्भव है कि ऐसे बहाने कुछ अंश में सच हों। और इस विषय में और तर्क न करें, तो यह बहुत कठिन और अप्रिय बात है कि केवल उस देश को छोड़ें जिसमें आप जन्मे थे, पर उस स्थान को भी जिसमें लम्बे और घनिष्ठ सम्पर्क से स्वभाव का एक निश्चित झुकाव सा बन गया है।

परन्तु ये सब फिर भी कल्पना करते हैं कि वे अपनी आँखों के सामने वे बाधाएँ कैसे रखें जिनसे वे उस मार्ग को रोक दें जिससे उन्हें परमेश्वर के पास आना चाहिए, अर्थात्: यद्यपि वे बातों को उतना कठिन और उलझा हुआ नहीं पाते जितना वे बनाते हैं, तौभी वे जिन आवरणों से हो सके अपने आप को ढक लेना चाहते हैं। और जब वे ये भारी और दुखभरी शिकायतें उँडेल चुकते हैं, तो समझते हैं कि उन्होंने परमेश्वर का मुँह बन्द कर दिया है, और यदि वह उन्हें फिर भी ऐसे दोष देता है मानो उन्हें ऐसी बातों के लिए विवश करना चाहता हो जो हो ही नहीं सकतीं, तो वह उनके साथ बड़ा अन्याय करता है। सच तो यह है कि मेरे पास इन बातों का कोई उत्तर नहीं, सिवा उसके जो भजन संहिता 84 में लिखा है, अर्थात् यह कि विश्वासी, उन तराइयों और सूखे जंगलों में से होकर जाते हुए जहाँ जल का नाम नहीं, अपने लिए गड्ढे और हौद खोद लेंगे। और मैं समझता हूँ कि यह उन्हें पराजित करने के लिए पर्याप्त है जो हठ और दुर्भावना से परमेश्वर का विरोध नहीं करेंगे।

इसलिए जो अपने आप को इतनी बड़ी असुविधाओं और संकटों से घिरा देखते हैं कि उन्हें जाने का कोई मार्ग या पगडण्डी नहीं दिखती, उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि वे निर्जन स्थान भी, जहाँ जल की एक बूँद भी नहीं मिल सकती, उनकी यात्रा में बाधा न बनें। और कि हम इस वचन को अधिक स्पष्ट और सहज रूप से समझें, हमें यह देखना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा है कि उसकी सन्तान उसे ढूँढ़े, हरे चरागाहों में से नहीं जो उन्हें मीठे फूलों की विविधता से प्रसन्न करें, न मनभावने वृक्षों और सुखद छायाओं में से, परन्तु ऊबड़-खाबड़ और खड़ी राहों से, पहाड़ियों और तराइयों से, खाइयों और रेत के गड्ढों से, बंजर देशों और उजाड़ जंगलों से; और यह सब इसलिए किया जाता है कि उनके विश्वास का अभ्यास हो और उसके पास आने की उनकी उत्कट लगन और अभिलाषा परखी और जाँची जाए।

इसलिए यदि हम परमेश्वर के पास आ ही नहीं सकते सिवाय इसके कि मार्ग में किसी जंगल और उजाड़ और बीहड़ वीराने से होकर निकलें, तो जान लें कि यह पहली बार नहीं कि परमेश्वर अपने विश्वासियों के साथ ऐसा करता है; और हम अपने मन तैयार करें और पूरी रीति से ठान लें कि उनके पीछे चलें जो बहुत पहले हमसे आगे चले गए।

इनके अतिरिक्त, परमेश्वर की सम्मति और भक्तों का वह उल्लेखनीय उदाहरण जिसका अनुसरण करना चाहिए, परमेश्वर की सन्तान में ऐसी लगन और उत्कट मनोभाव होना चाहिए कि कोई वस्तु उन्हें उसकी सही आराधना और सेवा से न हटा सके। आजकल यह बहुत थोड़ों में देखा जाता है; लगभग सब ऐसे नाजुक और सुख-प्रिय हैं कि यदि मार्ग में एक तिनका भी हो, तो वह उन्हें रोक सकता है और वे आगे नहीं बढ़ेंगे। वे कहते हैं, "हम इससे आगे नहीं जा सकते।" ऐसा क्यों? क्योंकि वे एक छोटी सी बाधा से जूझकर निकलने का कष्ट नहीं उठाना चाहते। सचमुच, उस मन की अभिलाषा बहुत निर्बल है जो ऐसी छोटी बातों से कमज़ोर और परास्त हो जाए। क्योंकि हमें केवल इतना ही नहीं करना चाहिए कि मार्ग की अनिश्चितता से हताश न हों और मानो अटके और संशय में खड़े रहकर नाश न हो जाएँ, परन्तु हमें सब रुकावटों और बाधाओं के विरुद्ध, चाहे वे कितनी ही बड़ी या बहुत हों, सज्जित होना चाहिए।

इसे पाने के लिए हमें यह शिक्षा सदा स्मरण रखनी चाहिए: कि परमेश्वर किसी को अपनी सन्तान नहीं मानता सिवाय उनके जो उसे सूखे और बंजर स्थानों में ढूँढ़ते हैं, और अपने लिए ऐसे हौद खोदते हैं जहाँ जल की एक बूँद भी दिखाई नहीं देती। इन शब्दों से हमें यह बताया और जताया गया है कि कोई परिश्रम या दुःख इतना बड़ा नहीं होना चाहिए जिसे हम परमेश्वर के मुख का आनन्द पाने के लिए उठाना और सहना न चाहें। तो क्या आवश्यक है कि कोई ऐसा स्थान ढूँढ़ा जाए जहाँ हमें परमेश्वर की शुद्ध आराधना और सेवा की स्वतंत्रता हो? जो भी मार्ग मिले, या यात्रा कितनी भी कठिन हो, तौभी यात्रा करनी और पूरी करनी चाहिए। क्या हम मार्ग में भूख और प्यास सहेंगे? तौभी हम ऐसी कमी और अभाव में साहस न हारें, परन्तु अत्यन्त आनन्द से आगे बढ़ते जाएँ।

परन्तु कोई मेरी ओर देखकर मीन-मेख न निकाले, मानो मैं इस विषय में अपनी बड़ी शान्ति में, स्वयं कोई कष्ट अनुभव किए बिना, बोल रहा हूँ। क्योंकि यह पवित्र आत्मा ही है जो हमें सिखाता है कि हमें भूमि खोदना और कुरेदना चाहिए, बजाय इसके कि परमेश्वर की कलीसिया की ओर आरम्भ की हुई अत्यन्त भक्तिपूर्ण यात्रा से हटें या मुड़ जाएँ। अब यदि वे जो दूर देशों में रहते हैं और संसार की दृष्टि में उन सब साधनों से बाहर हैं जिनसे वे उस स्थान पर पहुँच सकें जहाँ सुसमाचार का प्रचार होता है, उनके पास कोई बहाना नहीं, तो उन्हें क्या आशा करनी चाहिए जिनके द्वार के भीतर ही सुसमाचार है और फिर भी वे परमेश्वर की कलीसिया में प्रवेश करने के लिए एक पग भी आगे नहीं बढ़ाते?

प्रतिदिन उपदेश दिए जाते हैं, सार्वजनिक प्रार्थनाएँ भी होती हैं, और उन्हें केवल एक गली की चौड़ाई पार करनी होती है। तौभी देखो, हर एक कहेगा कि उसे घर में कुछ काम है। और संक्षेप में, बहुत से लोग इसी में अपना सुख मानते हैं कि वे अपने आप को परमेश्वर से सर्वथा अलग रखें और पीछे हटाए रहें। क्योंकि तब वे समझते हैं कि उन्होंने सब कुछ पा लिया, यदि उन्हें कोई हल्का और निरर्थक बहाना मिल जाए जिससे वे भक्तों की संगति और परमेश्वर के दर्शन से भाग निकलें।

अब, स्वभाव से हम परमेश्वर से इतनी घृणा करते हैं कि हम उससे भागना चाहते हैं और जितना हो सके उतनी दूर रहना चाहते हैं, हाँ, और तब अपने आप को उससे सबसे दूर कर लेते हैं जब वह हमारे सबसे निकट आता है। आइए हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें उस मन और अभिलाषा में दृढ़ करे, कि हम आरम्भ की हुई यात्रा में तब तक बने रहें और आनन्द से आगे बढ़ते जाएँ जब तक कि वहाँ हमें उद्धार के जीवित सोते न मिल जाएँ, जहाँ पहले हमें अत्यन्त सूखे और जल के अभाव के सिवा कुछ नहीं मिलता था।

और चाहे यह सब न भी हो, तौभी हम हौद खोदें और स्वर्ग से वर्षा की बाट जोहें। यदि परमेश्वर की यह इच्छा न हो कि हम उसकी सान्त्वना इतनी शीघ्र अनुभव करें, तो भी हम पूरे यत्न से आगे बढ़ना न छोड़ें। परन्तु मैं जानता हूँ कि यह बात बहुतों को बहुत अस्पष्ट लगेगी। परन्तु यह अस्पष्टता और कठिनाई कहाँ से आती है, सिवाय इसके कि इसका कभी अभ्यास, व्यवहार या अनुभव नहीं किया गया? क्योंकि हमें हज़ार वर्ष सिखाया जाए, तौभी हम इस शिक्षा का एक शब्द भी नहीं समझेंगे जब तक कि अनुभव से न सीखें कि परमेश्वर के पास आने के लिए सूखे और प्यासे मार्ग से यात्रा करना क्या होता है। इसलिए यह शिक्षा सब विश्वासियों के लिए बहुत परिचित होनी चाहिए: अर्थात् यह कि वे उन सब परीक्षाओं के विरुद्ध, जो शैतान किसी भी रीति से उस यात्रा को तोड़ने के लिए करेगा जिससे वे परमेश्वर तक पहुँचाए जाएँगे, अपने आप को यत्न से तैयार और सज्जित करें।

क्योंकि निश्चय जो अपना सारा यत्न विश्वासपूर्वक केवल इसी में लगाते हैं, अर्थात् परमेश्वर को ढूँढ़ने में, चाहे वे उस स्थान से हिलें भी नहीं जहाँ वे हैं, तौभी उन्हें बहुत सी भारी निराशाएँ मिलेंगी जो उन्हें पीछे मोड़ सकती हैं और विपरीत दिशा में बुला सकती हैं, यदि उनके मन स्थिर और विरोध के लिए तैयार न हों। परन्तु यह विलाप के योग्य बात है कि अधिकतर लोग, जैसा मैंने कहा, मार्ग में सामने आनेवाली इन कठिनाइयों से निर्बल और परास्त हो जाते हैं। वे तो मान लेंगे, हाँ, कि उन्हें ऐसा करना चाहिए। वे यात्रा के लिए तैयार और भली-भाँति सज्जित दिखाई देंगे, परन्तु जब उन्हें आगे बढ़ना और यात्रा में प्रवेश करना होता है, तब उनका हृदय बैठ जाता है; और जो भली-भाँति प्रवेश कर चुके हैं और आगे बढ़ चुके हैं, वे भी बहुधा बीच मार्ग में ही हार मान लेते हैं और पूरी तरह छोड़ देते हैं।

इसलिए यह शिक्षा हमारी स्मृति में और अधिक बैठनी चाहिए, कि हम गड्ढे खोदें, अर्थात् ऐसी सहायताएँ खोजें जो हमसे छिपी और अज्ञात भी हों, ताकि हम निरन्तर आगे बढ़ते जाएँ। मैं कहता हूँ, हम परिश्रम करें और मनुष्य के सामर्थ्य से बढ़कर यत्न करें। यदि बातें हमारी इच्छा के अनुसार न हों, तौभी हम उस भले मार्ग पर चलना न छोड़ें जिस पर परमेश्वर ने हमें रखा है। यह अत्यन्त निश्चित है कि यदि हम विश्वास से उसे पुकारें, तो वह सूखे जंगल को सोतों में बदल सकता है। परन्तु इस बीच हमारे कर्तव्य के अनुसार यही उचित है कि हम निठल्ले न बैठें, और न पड़े रहें मानो हमारे हाथ-पाँव में संवेदना और गति ही नहीं। हाँ, सचमुच, परमेश्वर हमें आज्ञा देता है कि हम गड्ढे खोदें। तो हम इस खुदाई में तब तक परिश्रम करें जब तक कि आरम्भ की हुई यात्रा पूरी न कर लें। आइए हम अपनी आँखों के सामने उन सैनिकों की दयनीय दशा रखें जो हर महीने अपना प्राण बिकाऊ रखते हैं। यदि वे छावनी में हों, तो कोई मनुष्य पर्याप्त रीति से बता नहीं सकता कि वे कितनी असुविधाएँ और कष्ट सहते हैं। यदि वे किसी स्थान में घेर लिए जाएँ, तो वे उससे भी अधिक कठिन बातें सहते हैं। यदि उन्हें किसी स्थान की ओर यात्रा करनी हो, तो कोई शीत या गर्मी, आँधी या वर्षा उन्हें ठहराई हुई यात्रा और आरम्भ किए हुए उद्यम से न रोक सकती है और न रुकवा सकती है।

और कभी-कभी वे ऐसी चरम दशा तक पहुँच जाते हैं कि यदि वे भूमि खोदकर जल न निकालें, तो उनके पास पीने को जल की एक बूँद भी नहीं होती। ऐसा कोई परिश्रम, संकट या कष्ट इतना बड़ा नहीं जो वे उसे पाने के लिए, जो उन्होंने ठाना और आरम्भ किया है, न सहें। और फिर भी जब उन्होंने सब कुछ कर और सह लिया हो, चाहे वे बच निकलें या मारे जाएँ, उन्होंने अपना यह सारा यत्न और परिश्रम खो दिया, क्योंकि इन सब इतने बड़े कष्टों को सहने में वे केवल शैतान की सेवा करते हैं। परमेश्वर के पुत्र ने हमें चुना है कि हम उसकी पताका के नीचे लड़ें, और उसके विश्वासयोग्य सैनिक बनकर यत्न से उसकी सेवा करें।

और हम जानते हैं कि वह हमारे सब परिश्रमों और संकटों का कैसा प्रतिफल हमसे प्रतिज्ञा करता है। तब उसके प्रति अपना कर्तव्य निभाने के लिए हमें इन दुखी और हताश मनुष्यों से कितना अधिक साहसी होना चाहिए जो अपने ही विनाश का पीछा करते हैं? और यहाँ केवल यही नहीं कहा जा रहा कि हर मनुष्य मीलों की गिनती करे और अपने घर से उस स्थान तक का सारा अन्तर नापे जहाँ वह स्वतंत्रता से परमेश्वर की आराधना कर सके, अपने विश्वास का अंगीकार कर सके, और सुसमाचार की शिक्षा का शुद्ध प्रचार सुन सके। हमें और आगे जाना है और एक और लम्बी यात्रा करनी है, जिसमें हमारे जीवन का सारा मार्ग पूरी तरह बीतना है।

क्या हम एक वर्ष या उससे अधिक समय से परमेश्वर की कलीसिया में आते-जाते रहे हैं? यदि हम बने रहें और ठहरे रहें, तो प्रतिदिन नई चिन्ताएँ पाएँगे। क्योंकि कभी हम पर बीमारी आएगी, कभी चरम दरिद्रता और सब आवश्यक वस्तुओं का अभाव; इसके अतिरिक्त हमारी पत्नियाँ और बच्चे मरेंगे, और यह भी हो सकता है कि परमेश्वर की आराधना की वह स्वतंत्रता और छूट हमें न रहे जो आरम्भ में थी। अन्त में, ऐसा कोई प्रकार का क्लेश या दुःख नहीं जिससे हम अपने आप को मुक्त समझें कि उससे हम पर आक्रमण न हो। इसलिए हमसे मन की वह स्थिरता और दृढ़ता और धीरज चाहिए कि अन्त तक हमारे हाथ गड्ढे खोदने को तैयार रहें, और हमारे नाखून भी भूमि कुरेदने को, यदि आवश्यकता ऐसा माँगे।

यदि कोई कहे, "तो क्या? क्या हम परमेश्वर के मन्दिर में नहीं हैं?" तो मैं उत्तर देता हूँ कि हम उसमें इस प्रकार हैं कि हमें और निकट आना और प्रतिदिन उसमें और भीतर प्रवेश करना है। यह सच है कि हम प्रतिदिन परमेश्वर का मुख देखते हैं, परन्तु हम उसके अत्यन्त सुन्दर मुख से पूर्ण तृप्त और भरपूर नहीं हुए हैं जैसा हम तब होंगे जब वह हमें अपने पास ले लेगा। इसलिए हम सबको सामान्य रूप से इसे जीवन के अभ्यास में लगाना चाहिए: और जैसे शैतान उन सबको रोकने और व्याकुल करने में सदा व्यस्त है जो परमेश्वर के पास जाना चाहते हैं, वैसे ही हर एक अपने आप को दृढ़ करे और पूरा यत्न करे कि जो उसने आज किया है उसे कल भी अत्यन्त स्थिरता से करता और निभाता रहे। क्योंकि यदि शत्रु बिना थके और बिना हारे हमारी यात्रा को पलटने और परमेश्वर की ओर आरम्भ किए हुए हमारे मार्ग से हमें हटाने में इतना यत्नशील है, तो हमें साहस खोना और भी कम चाहिए, बल्कि सदा और आगे बढ़ना और परमेश्वर के और निकट होना चाहिए, निरन्तर और बिना रुके नया बल पाते रहना चाहिए।

परन्तु यह करने और इसमें बने रहने के लिए अनिवार्य है कि हमारे हृदयों में वह निर्णय और उत्कट अभिलाषा अंकित हो जो दाऊद में अत्यन्त उत्तम रीति से थी। वह कहता है, "मैं दुष्टों के तम्बुओं और डेरों में रहने से अपने परमेश्वर के भवन की डेवढ़ी पर रहना अधिक चाहता हूँ," जिसमें वह स्पष्ट बताता है कि वह अत्यन्त नीची, तुच्छ और तिरस्कृत दशा में पहुँचाए जाने पर भी सन्तुष्ट होगा, कि प्रभु के भवन में रहने का यह लाभ पाए। मैं तुमसे विनती करता हूँ, आइए थोड़ा विचार करें कि उसकी दशा क्या थी। वह राजा का दामाद था, यहूदिया के प्रधान हाकिमों में से एक, अत्यन्त ऊँचे आदर और अधिकार में। तौभी वह पूरे मन से उस ऊँचे आदर और पद को खोने, और साधारण नीची प्रजा में से एक के समान बनाए जाने को सन्तुष्ट है, कि उसे परमेश्वर की कलीसिया में कोई छोटा सा कोना मिल जाए। यदि यह अभिलाषा सब में इतनी बड़ी और उत्तम होती, तो वे उस अदला-बदली की योजना और तैयारी में इतना समय न बिताते जो उन्हें करनी पड़ती है जब वे परमेश्वर की कलीसिया में आने के लिए अपना घर और देश छोड़ते हैं।

परन्तु बहुत थोड़े ही ऐसे मिलते हैं जो अपनी सम्पत्ति के घटने और अपनी दशा और पद के गिरने को भली रीति से ले सकें और चुपचाप सह लें। हर मनुष्य बड़ी अभिलाषा रखता है कि उसे आराम से पालकी में उस स्थान पर पहुँचाया जाए जहाँ वह स्वतंत्रता से परमेश्वर की आराधना कर सके, और यह भी कि उसकी सारी भूमि और सम्पत्ति, सारा लाभ और व्यापारियों के साथ उसका लेन-देन, मनुष्यों में उसकी प्रतिष्ठा, कुटुम्ब और मित्रता, और जीवन की ऐसी ही अन्य सुविधाएँ भी उसके साथ-साथ चलें।

परन्तु जब वे केवल इसी बात पर हैं, तो मैं पूछता हूँ, वे यीशु मसीह को कितना तुच्छ समझते हैं? क्योंकि वे उसके लिए जो कुछ करेंगे वह इससे आगे नहीं कि मानो उसकी इच्छा पर, आनन्द और मनोरंजन के लिए सैर करने जाएँ: जो बात दयनीय है और एक मसीही के लिए अत्यन्त अयोग्य और अशोभनीय है। क्योंकि यद्यपि हम वास्तव में कुछ भी नहीं हैं, तौभी उसने अपनी असीम भलाई से हमारा इतना मूल्य ठहराया कि उसने हमारे उद्धार के लिए अपने आप को भी नहीं बचाया, वही जिसमें सब भली वस्तुओं की सम्पूर्णता समाई हुई है। और क्या हम क्षणभंगुर वस्तुओं की हानि पर कुढ़ेंगे और बड़बड़ाएँगे, और अपनी दशा को और बुरा समझेंगे यदि हमारे साथ वैसा अच्छा व्यवहार नहीं होता और हमें पहले जैसे सुख नहीं मिलते? यह उससे बहुत दूर है जो संत पौलुस अपने उदाहरण से हमारे अनुसरण के लिए रखता है: अर्थात् यह कि हम उन सब वस्तुओं को कूड़ा और गोबर समझें जो हमें रोकती हैं कि हम मसीह तक न पहुँच सकें और उसे प्राप्त न कर सकें, और उन्हें हानि और घाटा जानकर फेंक दें, यह जानते हुए कि जो कुछ हमें जीवन से दूर ले जाता है वह अवश्य हमें मृत्यु तक पहुँचाएगा।

और स्वादिष्ट भोजनों और धन की यह हमारी लालसा उस उपदेश को अपनाने और उस चेतावनी का पालन करने से बहुत दूर है जो हमारे उद्धारकर्ता यीशु मसीह ने दी है, कि हम अपना सब कुछ जो इस संसार में है बेच डालें और स्वर्ग के राज्य के लिए उसे छोड़ दें, यह जानते हुए कि यह ऐसा बहुमूल्य रत्न है जो अपनी उत्कृष्टता में उन सब वस्तुओं से बहुत बढ़कर है जिनकी मनुष्य इतनी अभिलाषा और आदर करते हैं। यदि कोई यह आपत्ति करे कि मनुष्य अपना घर छोड़े बिना भी स्वर्ग के राज्य में पहुँच सकता है, तो मैं उत्तर देता हूँ कि हमारा उद्धारकर्ता सुसमाचार के प्रचार का नाम इस प्रकार व्यर्थ नहीं लेता, क्योंकि जिनके पास सुसमाचार की शिक्षा नहीं है और जिन्हें उन साधनों और अवसरों को ढूँढ़ने की कोई चिन्ता या परवाह नहीं जिनसे वे इतनी बड़ी भलाई का आनन्द उठा सकें, वे दिखाते हैं कि वे संसार की वस्तुओं से उससे अधिक लोभ और लालच से चिपके हैं जितना उन्हें चाहिए, और अभी उस अदला-बदली के लिए तैयार नहीं हैं जो उन्हें स्वर्ग के राज्य के साथ करनी चाहिए।

अब यदि वे दोनों का आनन्द ले सकते, तो निश्चय मैं उनके इतने बड़े सुख से डाह न करता। परन्तु यदि वे अपनी सम्पत्ति नहीं रख सकते, न अपने घोंसले में पड़े रह सकते हैं, सिवाय इसके कि अपने आप को परमेश्वर की सन्तान के सबसे स्वास्थ्यकर और एकमात्र भोजन से वंचित कर लें, और उस दशा में नहीं रह सकते जिसमें वे अभी हैं, सिवाय इसके कि अपने आप को परमेश्वर की कलीसिया से काट लें: तो उनका कर्तव्य है कि उस आवश्यकता पर विचार करें जो परमेश्वर उन पर डालता है। वे जो चाहें बहाने लाएँ, परन्तु ऐसे सब आवरण और चालें उनके कुछ काम न आएँगी जब परम प्रधान न्यायी अपनी भयानक वाणी से उन सब पर गरज उठेगा, जो उस पार्थिव जीवन को, जो हमारे और पशुओं के बीच साझा है, उस अनन्त मीरास से अधिक मानते हैं जिसे उसने अपनी सन्तान के लिए ठहराया है।

और यह बहुत मूर्खतापूर्ण और असंगत बात है कि बहुत से लोग सोचते हैं कि वे हमारा मुँह बन्द कर देंगे जब तक हम उन्हें कोई ऐसा साधन और पद न दें जिससे वे परमेश्वर की सेवा करते हुए जी सकें। वे कहते हैं, "हमारे देश में मेरी दशा यह है, यदि मैं उसे छोड़ दूँ तो मुझ पर क्या बीतेगा? मेरा पालन-पोषण करने की क्या आशा है?" मानो परमेश्वर ने सुसमाचार प्रचार करनेवालों को कारिन्दे और भण्डारी ठहराया हो कि हर मनुष्य को उसका पद और भत्ता दें, और हर एक को उसकी योग्यता या पद के अनुसार निश्चित वेतन और मज़दूरी चुकाएँ। यदि हम सम्मति या मार्गदर्शन से किसी की सहायता कर सकें, तो हम अपने निर्धन भाइयों के प्रति इस प्रकार बँधे हैं कि हमें किसी भी रीति से अपना यत्न और सेवा देने से इनकार नहीं करना चाहिए, परन्तु सदा तैयार रहना चाहिए, चाहे कोई माँगे भी नहीं। परन्तु यदि हम सहायता करने या इस विषय में कोई उपकार करने में असमर्थ हों, तो क्या इस कारण हमसे यह स्वतंत्रता भी छीन ली जाए कि हम हर एक को वह बात न सिखाएँ जो परमेश्वर की ओर से उसे आज्ञा दी गई है?

परन्तु यदि उन्होंने दाऊद की इस शिक्षा को भली-भाँति सीखा होता और उसे स्मृति में रखा होता, कि उन्हें मन्दिर के द्वार पर एक छोटे से कोने की उस अत्यन्त उच्च पद के किसी भी स्थान से अधिक अभिलाषा करनी चाहिए जहाँ वे अविश्वासियों के बीच रखे जाएँ, तो वे कभी इसे इतना कठिन और संशयपूर्ण न समझते कि इस विषय में उन्हें क्या करना चाहिए। फिर भी यहाँ बुराई यह है कि वे अपनी पुरानी दशा और जीवन-वृत्ति को रखना चाहते हैं और यह नहीं सह सकते कि उनकी सम्पत्ति और आदर किसी बात में घटे, न यह कि वे उन सुविधाओं, सुखों और आनन्दों से वंचित हों जिनमें वे अब जमे हुए हैं; अर्थात् वे यीशु मसीह को उठाने के लिए अपनी गर्दन नहीं झुका सकते और न अपनी पीठ नवा सकते हैं।

वे जितना चाहें इस विषय में झगड़ें और तर्क करें, उन्हें इसमें अवश्य दोषी ठहराया जाएगा। जहाँ तक उनका सम्बन्ध है जिन्होंने अपना देश इसलिए छोड़ा कि उस स्थान पर पहुँचें जहाँ वे स्वतंत्रता से परमेश्वर की आराधना कर सकें और जहाँ उन्हें सुसमाचार का सत्य विश्वासयोग्यता से सुनाया जाए, उनके लिए अत्यन्त आवश्यक है कि वे इस वचन को बार-बार स्मरण करें, और इसके मनन और अभ्यास में अपने आप को लगाए रखें, कि इसके निरन्तर प्रयोग और लम्बे अभ्यास से उनके मन कठोर और दृढ़ हो जाएँ।

क्योंकि बहुत सी बातें घट सकती हैं और प्रतिदिन घटती हैं, जो उन लोगों के मन को निर्बल और कमज़ोर कर दें, हाँ, पूरी तरह तोड़ दें, जो पहले धर्म के प्रति विशेष लगन और प्रेम से भरे थे। जो कलीसिया से जुड़ते हैं, उनके साथ सदा वैसा व्यवहार नहीं होता जैसा उनके पद के अनुसार चाहिए। क्रम बहुत बार इतना बिगाड़ा और उलझाया जाता है कि जो पदोन्नति के सबसे योग्य थे वे सबसे अधिक उपेक्षित होते हैं या सबसे निचले दर्जे में रखे जाते हैं: निश्चय यही परीक्षा उन्हें पीछे मोड़ सकती है और उनके अपने उद्धार से दूर बुला सकती है, यदि वे कलीसिया की गोद में इस प्रकार विश्राम न करते हों कि वे परमेश्वर के घर में सबसे छोटे और सबसे तुच्छ बने रहना उससे अलग रहकर अत्यन्त बड़े आदर में जीने से अधिक चुनें।

इस प्रकार जो सचमुच विश्वासी हैं, जिनके पास वे सब सुविधाएँ नहीं हैं जिनके वे अभ्यस्त थे, बल्कि इसके विपरीत अपना देश छोड़ने में वे असुविधाएँ और दुःख अनुभव करते हैं जो बहुत से हैं, उन्हें इन थोड़े शब्दों से अपने आप को सान्त्वना और दृढ़ता देना सीखना चाहिए: "परन्तु हम परमेश्वर के घर में हैं। अब संसारी लोग चाहे जितना हमारा उपहास करें, हाँ, अपने घमण्ड में तुच्छ और निकाले हुए जानकर हमें उग्रता से हानि भी पहुँचाएँ, तौभी हमारे लिए यही पर्याप्त है कि परमेश्वर हमें अपने भवन और पवित्रस्थान में रखने का यह आदर देना स्वीकार करता है।"

हम देखते हैं कि संसार के महत्त्वाकांक्षी और घमण्डी लोग कितना परिश्रम और कष्ट उठाते हैं कि वे किसी राजा के घराने और कुल में गिने जाएँ। वे अपने आप को अत्यन्त भाग्यशाली समझते हैं यदि वे रसोई या दालान में ही पहुँच जाएँ। अब जबकि हम संसार की दृष्टि में अत्यन्त तुच्छ और तिरस्कृत हैं, फिर भी यदि हम परमेश्वर की कलीसिया के हैं, तो वह हमें अपनी बुद्धि के अत्यन्त ऊँचे और अद्भुत भेदों में ऐसी घनिष्ठता के साथ ले जाता है जैसी पिता अपने बच्चों के साथ रखता है। यदि यह प्रतिफल हमारे मन को सन्तुष्ट न करे तो हम बहुत रूखे और कृतघ्न हैं। यद्यपि विश्वासी सचमुच भारी रीति से परखे जा सकते हैं और मन में एक प्रकार की झुँझलाहट और ठेस तक से भर सकते हैं, जब उनकी दशा और बुरी होती दिखाई दे, और दुष्ट सब समृद्धि में फलते-फूलते रहें।

तौभी यदि वे इसके विपरीत यह विचारें कि वे परमेश्वर की ओर से उसके घराने के होने के लिए चुने गए हैं, और वहाँ उसकी सन्तान के रूप में रखे जाएँगे, तो यह सान्त्वना बहुत कम प्रभावी है यदि वह उन असुविधाओं के सब कठिन विचारों को घटाए और शान्त न करे और उसके कारण आनेवाले मन के सारे शोक को पूरी तरह मिटा न दे। और निश्चय जो कुड़कुड़ाते और बड़बड़ाते हैं कि परमेश्वर उनके साथ वैसा व्यवहार नहीं करता जैसा वे चाहते हैं, या जो अब पछताते हैं कि उन्होंने भक्तिपूर्ण जीवन आरम्भ किया, वे सहज ही दिखा देते हैं कि उन्होंने हमारे प्रभु और स्वामी की सम्मति किसी बात में नहीं मानी, जो यह है कि जब कोई भवन बनाना आरम्भ किया जाए तो पहले यत्न से गिन लेना चाहिए कि उसे पूरा करने के लिए कितना खर्च और व्यय चाहिए, ऐसा न हो कि वे जितना चाहिए उससे अधिक लगाकर पछताएँ और काम अधूरा छोड़ दें।

परन्तु यह और भी बुरा और लज्जाजनक है कि उनमें से बहुत से, जो इस प्रकार बीच मार्ग में थक जाते हैं, बिना किसी कारण के छोड़ देते हैं। इसमें वे अपने आप को अत्यन्त निर्लज्ज दिखाते हैं। क्योंकि वे लोग भी, जिनके न घर थे न भूमि और जिन्हें कोई असुविधा नहीं थी और जो संसार के सबसे दूर के कोने में भी अपने देश के समान रह सकते थे, परमेश्वर को ताना मारने में नहीं लजाते कि उन्होंने उसके लिए यह और वह छोड़ा। परन्तु मान लें कि उन्होंने इस प्रकार अपनी सम्पत्ति और पूँजी में से न जाने कितना खो दिया: तौभी एक कौड़ी को मुकुट या सोने की मुहर से अधिक मानना मूर्खता है। इस बीच इन कुड़कुड़ाहटों और शिकायतों के सिवा कुछ सुनाई नहीं देता। और परमेश्वर करे कि ये चिन्ता करनेवाले शिकायती हमसे दूर होते, कि वे अपनी सुविधाओं और सुखों का आनन्द उठाते, यद्यपि न निर्धन न धनवान के पास उस पवित्र और भक्तिपूर्ण उद्देश्य से हटने का कोई उचित कारण है, और न उन क्लेशों के लिए कोई बहाना जो परमेश्वर की बुलाहट और उसकी आज्ञाकारिता उन पर लाती है।

परन्तु क्योंकि यह हमारे लिए अत्यन्त कठिन है, इसलिए इसका उपाय भजन संहिता 84 में बताया गया है। जब दाऊद यह कहने के बाद कि वह मनुष्य धन्य है जो परमेश्वर पर आशा रखता है, तुरन्त जोड़ता है, "और जिसके हृदय में उसके राजमार्ग हैं," मानो वह यह कहता हो कि जिसका मन उस मार्ग में प्रवेश करने, उस पर चलते रहने और उसे पूरा करने की ओर झुका और पूरी तरह फिरा है जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने दी है। इसलिए दो बातें हैं जो एक-दूसरी से अलग नहीं की जा सकतीं: कि हमारी आशा परमेश्वर में हो, और हम सीधे मार्ग पर चलें: इसलिए जब हमारी दुर्बलता हमें रोकती है कि हम आगे न बढ़ें, या हमें ऐसा नाजुक और धीमा बना देती है कि हम उसकी परम पवित्र बुलाहट से किनारे हटकर दूसरी राह लेना चाहें: तो हम विश्वास और आशा में अपने आप को दृढ़ करें, और अपने अत्यन्त उदार और दयालु परमेश्वर से विनती करें कि वह हमारी आँखें अपनी ओर फेर दे, कि जब तक हम उसके मुख को निहारें और उसकी इन प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखें, तब तक कोई बात हमें व्याकुल न करे, जिनके द्वारा उसने हमें निश्चय दिलाया है कि वह जीवन और मृत्यु दोनों में सदा हमारे साथ रहेगा।

ऐसा ही हो।

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