अध्याय 2

एक उपदेश, जिसमें सब मसीहियों को बाहरी मूर्तिपूजा से भाग निकलने की चेतावनी दी गई है

Four Godly Sermons Against Idolatry · John Calvin

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एक उपदेश, जिसमें सब मसीहियों को बाहरी मूर्तिपूजा से भाग निकलने की चेतावनी दी गई है

भजन संहिता 16 के तीसरे पद से लिया गया

"मैं उनके खून के बलिदानों में सहभागी न होऊँगा, और न उनके नाम अपने मुँह से लूँगा।"

जिस शिक्षा पर हम यहाँ विचार करेंगे वह स्वयं में सीधी और सरल है, केवल इतना है कि अपने आप को मसीही कहनेवालों में से अधिकतर लोग अपनी बुराई को ढाँपने के लिए न जाने कैसी-कैसी चतुराइयाँ ढूँढ़ निकालते और लाते हैं। परन्तु इस सारी शिक्षा का सार यह है कि जब हम जीवते परमेश्वर को अपना पिता और यीशु मसीह को अपना छुड़ानेवाला जान चुके हैं, तब हमें अपना तन और मन दोनों उसी को समर्पित करना चाहिए जिसने अपनी असीम भलाई से हमें अपने पुत्रों की गिनती में ले लिया है; और उस उपकार को, जो हमारे परम प्रिय उद्धारकर्ता ने इतने बड़े मूल्य पर हमें मोल लेने के बाद हम पर करना चाहा, हर प्रकार की कृतज्ञता, आदर और आज्ञाकारिता के साथ स्वीकार करना चाहिए।

और इसलिए कि हम पर केवल सब अविश्वास को त्यागने का ही नहीं, वरन् उन सब अन्धविश्वासों से भी अपने आप को अलग करने का दायित्व है जो पिता परमेश्वर की सच्ची सेवा से भी उतने ही असंगत हैं जितने उसके पुत्र, हमारे उद्धारकर्ता के आदर से, और जो सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा और विश्वास के सच्चे अंगीकार से किसी भी रीति से मेल नहीं खा सकते, मैंने कहा था कि यह शिक्षा अपने आप में इतनी सरल है कि हमारे पास केवल इसका अभ्यास और पालन ही शेष रहना चाहिए; परन्तु बहुत-से लोग छल-भरे बहाने ढूँढ़ते हैं, जिनके द्वारा वे उस बात में पराजित होना नहीं चाहते जो स्वयं परमेश्वर के मुँह से सबसे अधिक दोषी ठहराई गई है। इसी कारण हमें इस समय इस विषय की व्याख्या में कुछ अधिक रुकना पड़ता है, ताकि हर एक मनुष्य अपना कर्तव्य जाने और अपने आप को धोखा न दे, यह सोचकर कि जब वह, जैसा कि लोकोक्ति है, भीगे हुए बोरे के नीचे ढँका है तो बच निकला है।

परन्तु क्योंकि बहुत-से लोग यह मत रखते हैं कि जिनकी कलीसियाएँ पोप-पन्थ की गन्दगी और मूर्तिपूजाओं से भली-भाँति शुद्ध हो चुकी हैं, उनके लिए यह विषय या यह शिक्षा अनावश्यक है, इसलिए आगे बढ़ने से पहले यह दिखा देना निष्फल न होगा कि ऐसे लोग बहुत बुरी रीति से धोखे में हैं। पहले तो, जब यह प्रकट किया जाता है कि मूर्तिपूजकों के साथ अशुद्ध और भ्रष्ट होना, और उनकी अधर्म की बातों से सहमत होने और जुड़ने का ढोंग करना, हमारे लिए कितना बड़ा अपराध है, तब हमें चिताया जाता है कि हम अपने पिछले पापों पर शोक करें और पूरी दीनता के साथ परमेश्वर से उनकी क्षमा माँगें, और इस बात में उस अनुपम उपकार को स्वीकार करें जो उसने हम पर किया, कि उसने हमें उसी गन्दगी में से बाहर खींच निकाला जिसमें हम दबे और डूबे हुए थे।

क्योंकि हम सचमुच इतने बड़े उपकार का यथोचित वर्णन नहीं कर सकते। और इसलिए कि हम नहीं जानते कि हम पर क्या बीतेगी, और परमेश्वर हमें किस अन्त के लिए रख छोड़ता है, यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम समय रहते तैयार और सन्नद्ध रहें, ताकि जिस दशा में भी हम पड़ें, या जिन परीक्षाओं से भी हमारा सामना हो, हम परमेश्वर के शुद्ध वचन से कभी न डिगें।

पहली बात यह कि हमारी इसी कलीसिया और मण्डली में से बहुत-से लोग किसी पोप-पन्थी देश की यात्रा कर सकते हैं, जिन्हें अब बहुत अधिक तैयार और युद्ध के लिए सन्नद्ध होना चाहिए। फिर, यद्यपि परमेश्वर इस समय हमें यह स्वतन्त्रता देता है कि हम शुद्ध रीति से और भक्ति के साथ उसकी सेवा करें, तौभी हम नहीं जानते कि हमारा यह उपकार कब तक बना रहेगा। इसलिए हम अपनी इस शान्ति और चैन के समय को ऐसा न समझें कि यह सदा बना रहेगा, वरन् इसे मानो युद्ध-विराम का समय जानें, जिसमें परमेश्वर हमें अपने आप को दृढ़ करने का अवसर देता है, ऐसा न हो कि जब हमें अपने विश्वास का अंगीकार प्रकट करने के लिए बुलाया जाए, तब हम इसलिए कि हमने उचित समय पर उस विषय पर मनन करना तुच्छ जाना, नौसिखिए और अप्रस्तुत पाए जाएँ।

और इसी बीच हमें अपने उन भाइयों को भी नहीं भूलना चाहिए जो मसीह-विरोधी के अत्याचार के अधीन रखे गए हैं और अत्यन्त दयनीय दासता से दबे हुए हैं; वरन् उनका स्मरण करें, उन पर तरस खाएँ, और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह उन्हें वही दृढ़ता प्रदान करे जो वह अपने वचन में माँगता है। हमें उन्हें हर प्रकार से चेताना और उभारना भी चाहिए कि वे उन स्थानों में न टिके रहें जहाँ लोग विलासिता में गहरी नींद सो रहे हैं, वरन् इस विचार और इच्छा में लगनपूर्वक लगे रहें कि वे परमेश्वर को देय महिमा का अंगीकार करें।

क्योंकि परमेश्वर की ओर से हमें केवल अपने ही लिए नहीं सिखाया जाता, वरन् इसलिए कि हर एक मनुष्य अपने विश्वास के परिमाण के अनुसार भाईचारे के साथ अपने पड़ोसियों को सहभागी बनाए, और जो कुछ उसने परमेश्वर की पाठशाला में सीखा और जाना है वह उन्हें बाँटे। अब हम देखते हैं कि यह हमारे लिए, और हमारे भाइयों के लिए भी, लाभदायक, वरन् सचमुच आवश्यक है कि इस शिक्षा का स्मरण बहुत बार नया किया जाए, विशेषकर इसलिए कि वह पाठ ही, जिसकी हम व्याख्या करेंगे, हमें इसी उद्देश्य की ओर ले चलता है।

दाऊद खुले रूप में प्रतिज्ञा करता है, और मानो गम्भीर शपथ खाता है कि वह मूर्तिपूजकों के बलिदानों में कभी सहभागी न होगा, और यह भी कि वह मूरतों से ऐसी घृणा और ऐसा गहरा बैर रखेगा कि कभी उनका नाम तक न लेगा, मानो उनका नाम लेने से उसका मुँह अशुद्ध हो जाएगा।

यह किसी एक मनुष्य का कार्य नहीं, वरन् दाऊद का उदाहरण है, जो सबसे उत्तम राजा और भविष्यद्वक्ता था, और जिसे परमेश्वर की सब सन्तानों के लिए भक्तिपूर्ण और सीधे जीवन का एक साझा नियम होना चाहिए। और इसलिए कि हम इस बात को और भली-भाँति समझें और परमेश्वर के सच्चे भय से अधिक प्रबलता के साथ प्रेरित हों, उस कारण पर ध्यान देना चाहिए जो वह जोड़ता है, जिसमें सचमुच उस पृथकता और घृणा की मानो एक नींव टिकी है, जिसके कारण वह मूर्तिपूजकों की संगति से अत्यन्त घृणा करता है।

वह कहता है, "यहोवा मेरा भाग है।" परन्तु क्या यह बात सब विश्वासियों और भक्तों के लिए साझी नहीं? ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो इतनी उत्तम वस्तु पर घमण्ड न करे। और निःसन्देह यह निश्चित है कि परमेश्वर, जो एक बार अपने पुत्र के व्यक्तित्व में हमें दिया गया है, प्रतिदिन हमें अपने आप को अपनाने के लिए बुलाता है। परन्तु बहुत ही थोड़े लोग हैं जो इस विषय में वैसे प्रभावित होते हैं जैसा इस बात की महानता और महत्ता माँगती और योग्य ठहराती है। और हम किसी भी रीति से परमेश्वर को अपना नहीं बना सकते, जब तक इस शर्त पर न हो कि हम भी उसके हो जाएँ। इसलिए दाऊद ने उचित और योग्य रीति से अपनी भक्ति और धर्म की नींव इसी वाक्य और तर्क में डाली: कि जब परमेश्वर उसका भाग है, तो वह मूरतों की उन सब अशुद्धताओं से दूर रहेगा जो हमें स्वयं परमेश्वर से फेर देती हैं।

इसी कारण यशायाह भविष्यद्वक्ता ने, जब उसने यहूदियों को डाँटा कि उन्होंने अपने आप को उन झूठे और पराये देवताओं को सौंप दिया है जिन्हें उन्होंने स्वयं बनाया था, तब आगे जोड़ा, "ये," वह कहता है, "तेरा भाग हैं।" इन शब्दों से वह यह जताता है कि परमेश्वर मूरतों के पूजनेवालों से वाचा के सब बन्धन और सहभागिता को अस्वीकार करता है, और उन्हें मीरास से वंचित कर देता है, और उस अनन्त महान उपकार से उन्हें पूरी रीति से रहित कर देता है जो वह अपने आप को उन्हें देकर उन पर करना चाहता था।

कोई यह आपत्ति उठा सकता है कि भविष्यद्वक्ता उस स्थान में केवल उन्हीं की चर्चा करता है जो मूरतों पर भरोसा रखते हैं और अपने मत और अविश्वास के कारण अपने आप को धोखा देते हैं। मैं यह मानता हूँ, परन्तु इसका उत्तर यह भी देता हूँ: यदि वे जो परमेश्वर का आदर मूरतों को दे देते हैं उसकी सहभागिता से पूरी रीति से अलग और कट जाते हैं, तो वे भी जो भय और मन की दुर्बलता के कारण अन्धविश्वासों से सहमत होने का ढोंग करते हैं, उससे कुछ-न-कुछ भटकते और दूर हटते हैं।

क्योंकि कोई मनुष्य न हृदय से, न किसी अनुरूप ढंग से, न इच्छा और मन के संकल्प से, न ढोंग से, न किसी सच्चे या दिखावटी मार्ग से मूरतों के निकट जा सकता है, कि वह उतना ही परमेश्वर से पीछे न हट जाए। इसलिए यह वाक्य हमें पूरी तरह विश्वास दिला दे और हमारे हृदयों में गहरा अंकित रहे, कि जो लोग शुद्ध और सच्चे मन से परमेश्वर को इसलिए खोजते हैं कि उसे अपना भाग बनाएँ, वे मूरतों के साथ कोई संगति और सहभागिता न रखेंगे, जिनके साथ परमेश्वर का ऐसा विच्छेद और झगड़ा है कि वह चाहता है कि उसके सब लोग उनके विरुद्ध निरन्तर और प्राणघातक युद्ध की घोषणा करें और उसे चलाए रखें।

और इस स्थान में दाऊद नाम लेकर प्रकट करता है कि वह कभी उनकी भेंटों में सहभागी न होगा, न उनके नाम अपने मुँह और बातचीत में रखेगा। वह इस प्रकार कह सकता था, "मैं अविश्वासियों की निर्बुद्धि और मूर्खतापूर्ण भक्तियों से अपने आप को धोखा न दूँगा, मैं ऐसे कुरीतियों पर भरोसा न रखूँगा, और इन झूठों के पीछे चलने के लिए परमेश्वर की सच्चाई को कभी न छोड़ूँगा," परन्तु वह इस प्रकार नहीं बोलता। वरन् वह दृढ़ता से प्रतिज्ञा करता है कि वह उनकी रीतियों में कभी न रमेगा। इसलिए वह गवाही देता है कि जहाँ तक परमेश्वर की सेवा का सम्बन्ध है, वह तन और मन दोनों की पूरी शुद्धता और पवित्रता में सदा बना रहेगा।

और पहले तो इस स्थान में हमें यह विचार करना है कि क्या यह मूर्तिपूजा नहीं है कि हम बाहरी चिह्नों से उन अन्धविश्वासों से अपनी सहमति जताएँ और प्रकट करें जिनसे परमेश्वर की सेवा बिगड़ती और पूरी तरह उलट जाती है। जो लोग (जैसा कि कहावत है) दो पानियों के बीच तैरते हैं, वे यह कथन आगे रखते हैं: कि जब परमेश्वर चाहता है कि उसका आदर आत्मा में हो, तो मूरतों का आदर किसी रीति से तब तक नहीं हो सकता जब तक कोई उन पर भरोसा न रखे। परन्तु इसका उत्तर सरलता से दिया जा सकता है कि परमेश्वर मन की आत्मिक सेवा और आराधना इस रीति से नहीं माँगता कि हमारे स्वभाव का दूसरा भाग मूरतों को सौंप दे और छोड़ दे, मानो वह भाग उससे कुछ भी सम्बन्ध न रखता हो।

क्योंकि बहुत स्थानों में कहा गया है कि परमेश्वर के सामने घुटने टेके जाएँ और हाथ भी स्वर्ग की ओर उठाए जाएँ। फिर क्या? निश्चय ही, परमेश्वर जो मुख्य आदर माँगता है वह आत्मिक है, परन्तु वह बाहरी चिह्न, जिसके द्वारा विश्वासी गवाही देते हैं कि वे केवल परमेश्वर ही की सेवा और आदर करते हैं, उसके साथ-साथ इतनी तुरन्त आना चाहिए कि दोनों एक ही समय एक साथ जुड़े हों। परन्तु उस आपत्ति का खण्डन करने के लिए, जिसे वे एक शब्द से पकड़ लेते हैं, एक ही स्थान सबके लिए पर्याप्त होगा, जिससे वे स्पष्ट रूप से डाँटे और दोषी ठहराए जाएँगे।

दानिय्येल के तीसरे अध्याय में लिखा है कि शद्रक, मेशक और अबेदनगो ने किसी भी बहाने से उस अन्धविश्वास से सहमत होने से इनकार कर दिया और नकार दिया जो नबूकदनेस्सर ने खड़ा और स्थापित किया था, और घोषित किया कि वे किसी रीति से उसके देवताओं का आदर न करेंगे। यदि ये सुन्दर चतुर कुतर्की उस समय वहाँ होते, तो परमेश्वर के इन तीनों दासों के भोलेपन पर ठट्ठा करके हँसते।

क्योंकि मैं समझता हूँ कि वे उन्हें ऐसी ही बातों से ताना मारते: "हे मूर्खो, यह सचमुच उनका आदर करना नहीं है, क्योंकि तुम इन वस्तुओं पर कोई भरोसा नहीं रखते। मूर्तिपूजा वहीं है जहाँ भक्ति है, अर्थात् मन का मूरतों का आदर और पूजा करने की ओर कुछ झुकना और लगना।" परन्तु इन भक्त पुरुषों ने एक उत्तम और बुद्धिमानी की सम्मति मानी; क्योंकि जो उत्तर उन्होंने दिया वह उनकी अपनी बुद्धि से नहीं निकला, वरन् पवित्र आत्मा से, जिसने उन्हें इस प्रकार बोलने को प्रेरित किया; और यदि हम उसका विरोध न करें, तो हमें इस स्थान और इस उदाहरण को एक निश्चित नियम और परिभाषा के रूप में स्वीकार करना होगा कि मूर्तिपूजा परमेश्वर के आदर के विरुद्ध एक बाहरी कार्य है, चाहे वह मन की इच्छा और संकल्प से न निकले, वरन् केवल दिखावटी और बनावटी हो।

इस विषय में वे सुन्दर कुतर्क करते हैं कि जहाँ हमारा भरोसा मूरतों पर नहीं रखा जाता वहाँ मूर्तिपूजा है ही नहीं। तौभी ये लोग उस दण्ड-आज्ञा के अधीन निरन्तर दोषी ठहरे रहेंगे जो परमप्रधान न्यायी ने सुनाई है। परन्तु ये लोग केवल नाम के लिए झगड़ते हैं, और अपने दोष को किसी प्रकार घटाने का प्रयत्न करते हैं, जिसका वे किसी रीति से बचाव या क्षमा-याचना नहीं कर सकते। वरन् वे यह तो मान लेंगे कि यह काम बुरा किया गया और ठीक नहीं, तौभी चाहते हैं कि इस कार्य को एक प्रकार का क्षमा-योग्य पाप माना जाए।

परन्तु यद्यपि हम नाम के विषय में उन्हें वह बात दे भी दें जो वे माँगते हैं, तौभी वे इससे इतना न पाएँगे कि अपने पक्ष को कुछ अधिक अच्छा बना लें। हम यों कहें कि मूरतों की ऐसी बनावटी पूजा मूर्तिपूजा नहीं कहलाती, तौभी वह परमेश्वर के विरुद्ध राजद्रोह का कार्य होगी, विश्वास के अंगीकार के प्रतिकूल एक कृत्य, और अधर्मी अपवित्रता से भरी घिनौनी और गन्दी अशुद्धता। मैं तुमसे पूछता हूँ, जब परमेश्वर की परम पवित्र सेवा और आदर इस प्रकार भंग हो कि हम उस प्रतिज्ञा को, जो हमने उससे की थी, झूठ-मूठ तोड़ें, कि कायरता और मन की निर्बलता से हम अपने मसीही अंगीकार को कपट और झूठ से नकारें, कि हम अस्थिर और दोहरे हो जाएँ, कि हम उन्हीं वस्तुओं से अपने आप को घृणित रीति से अशुद्ध करें जिन्हें परमेश्वर ने हर प्रकार के शाप से शापित ठहराया है: क्या यह इतनी हल्की बात है कि इसे कर चुकने के बाद हमें केवल अपना मुँह पोंछ लेना और यह मान लेना चाहिए कि हमने कोई छोटा-सा दोष किया है?

इसलिए हम इन बहानों को दूर करें, विशेषकर इसलिए कि वे और किसी काम के नहीं, केवल हमें और ढीठ बनाने और पाप करने की और अधिक छूट देने के काम आते हैं, और हमारे दोष को तनिक भी घटाते नहीं। और कुछ और भी निर्लज्ज हैं, जो नाम बदलकर यह समझाने का ही प्रयत्न नहीं करते कि यह इतना बड़ा और अयोग्य पाप नहीं, वरन् साफ़-साफ़ और दो-टूक इसे पाप होने से ही नकारते हैं। वे कहते हैं, "यह पर्याप्त है कि परमेश्वर का आदर हृदय और मन से हो।" हाँ, ठीक वैसा ही होता, यदि हृदय ही दोहरा न होता। क्योंकि जब मन सचमुच स्वस्थ और शुद्ध हो, तब देह कभी विपरीत दिशा में खिंचकर नहीं जाएगी।

मैं उनसे जानना चाहता हूँ कि वह क्या है जो उनके पैरों को मन्दिर की ओर हाँकता और ले जाता है। क्योंकि जब वे मिस्सा सुनने जाते हैं, तो उनकी टाँगें अपनी ही गति से कभी न हिलेंगी, वरन् अवश्य मन की भीतरी शक्ति से हिलाई जाएँगी। तब उन्हें अवश्य मानना पड़ेगा कि उनके भीतर मन की कोई अभिलाषा और गति है जिसके द्वारा वे मूरतों की पूजा करने को ले जाए जाते हैं, और मुख्यतः इसलिए कि वे उन लोगों की इच्छा और मत के अनुसार अपने आप को ढालना चाहते हैं जो सत्य के शत्रु हैं, वरन् उन्हें प्रसन्न करने के लिए अपने आप को इतना उनके अनुरूप कर लेते हैं कि वे परमेश्वर के आदर और महिमा की अपेक्षा उनकी कृपा और अपने प्राण को कहीं अधिक मूल्यवान समझते हैं।

इसके अतिरिक्त, उनकी ढिठाई ऐसी प्रकट और लज्जाजनक है कि उसके विरुद्ध तर्क करने में मुझे लाज आती है, मानो उसमें तर्क का कोई रंग या सादृश्य हो; तौभी मुझे यह करना ही पड़ेगा, क्योंकि वे अपने आप से इतने प्रसन्न हैं और मानो अपने ही मतों और सुखों में मतवाले होकर गहरी नींद में पड़े हैं। वे समझते हैं कि आत्मा में परमेश्वर की आराधना करना ही पर्याप्त है; तो फिर देह का क्या होगा? निश्चय ही, सन्त पौलुस हमें उकसाता है कि हम परमेश्वर का आदर देह और आत्मा दोनों से करें, क्योंकि वे उसी के हैं और किसी और के नहीं। परमेश्वर ने देह की सृष्टि की है, और क्या हमारे लिए उचित है कि उससे शैतान की सेवा और आदर करें, मानो वही उसका कर्ता और बनानेवाला ठहरे? अच्छा होता कि वे खुलकर अपने आप को मनिकी घोषित कर देते और यह नकार देते कि परमेश्वर ने पूरे मनुष्य को बनाया। यदि उन्होंने सुसमाचार का तनिक भी स्वाद चखा होता, तो वे ऐसी उद्दण्ड ढिठाई में न फूट पड़ते। पर अब यह बात पर्याप्त स्पष्ट है कि वे किसी रीति से नहीं जानते कि परमेश्वर के पुत्र के लहू से छुड़ाए जाने के इस उपकार की सामर्थ्य और महानता क्या है।

और इसे सच प्रमाणित करने के लिए, हम शरीर के जी उठने की आशा कैसे रख सकते हैं, जब तक हम यह विश्वास न करें कि मसीह यीशु देहों और आत्माओं दोनों का छुड़ानेवाला है? सन्त पौलुस भी हमें चिताता है कि हम मनुष्यों के दास न बनें, क्योंकि हम इतने बड़े मूल्य पर मोल लिए गए हैं, अर्थात् परमेश्वर के पुत्र के लहू पर। तब जो मूरतों की दुष्ट सेवा में अपने आप को जोड़ता और समर्पित करता है, क्या वह यीशु मसीह के उस परम पवित्र लहू को पैरों तले नहीं रौंदता, जिसमें उस अनन्त और अमर महिमा का मूल्य निहित है जिसकी आशा हम अपनी देहों में रखते हैं?

यह कौन-सा तर्क है कि हमारी देहें मूरतों के सामने अशुद्ध और अपवित्र की जाएँ, जबकि उनके लिए स्वर्ग में अनन्त जीवन के मुकुट की प्रतिज्ञा की गई है? शैतान के वेश्यालयों में यह लोटना और यह अत्यन्त घिनौनी अशुद्धता, क्या यह कोई साधन और मार्ग है जिससे हम परमेश्वर के राज्य में पहुँचें? फिर यह बात बिना बड़े कारण के नहीं कही गई कि हमारी देहें पवित्र आत्मा के मन्दिर हैं; इसलिए जो यह नहीं समझते कि उन्हें पूरी पवित्रता में रखना चाहिए, वे साफ़ दिखाते हैं कि वे सुसमाचार को तनिक भी नहीं समझते और नहीं जानते। वे यह भी प्रकट करते हैं कि वे यीशु मसीह की सामर्थ्य और उसके अनुग्रह को रत्ती भर भी नहीं जानते। क्योंकि जब इस प्रकार कहा गया है कि हम उसकी हड्डियों की हड्डी और उसके मांस का मांस हैं, तब उसे समझना चाहिए कि हम उससे देह और आत्मा दोनों में जुड़े हैं। इसलिए कोई मनुष्य अपनी देह को किसी भी प्रकार के अन्धविश्वास से अशुद्ध नहीं कर सकता, जब तक वह अपने आप को उस मिलाप से अलग न कर दे जिसके द्वारा हम परमेश्वर के पुत्र के अंग बनाए गए हैं।

परन्तु अब ये चतुर और कुशाग्र शास्त्री मुझे उत्तर दें कि क्या उन्होंने बपतिस्मा केवल अपनी आत्माओं में पाया है, या परमेश्वर ने यह ठहराया और स्थापित किया है कि यह चिह्न हमारे शरीर पर अंकित किया जाए। तो क्या वह देह, जिस पर यीशु मसीह की छाप लगी है, ऐसी विपरीत, विरोधी और ऐसी दुष्ट घृणित बातों से अशुद्ध और भ्रष्ट की जाएगी? और प्रभु-भोज, क्या वह केवल मन में ग्रहण किया जाता है, हाथों और मुँह से नहीं? क्या परमेश्वर ने हमारी देहों में अपने पुत्र के शस्त्र-चिह्न और पदक इसलिए खोदे हैं कि हम बाद में अपने आप को हर प्रकार की मलिनता, अत्यन्त घिनौने धब्बों और लज्जा से अशुद्ध करें, और अपने आप को इतना कुरूप बना लें कि मसीही सुन्दरता का कोई रूप या छाया तक दिखाई न दे?

सोने का एक सिक्का ढालते समय उस पर दो विपरीत मुद्राएँ अंकित करना उचित नहीं, न एक ही लेख पर दो ऐसी मुहरें लगाना जो एक-दूसरी के विरुद्ध हों: तो क्या एक नश्वर मनुष्य बपतिस्मा और यीशु मसीह के परम पवित्र भोज की नकल और बिगाड़ करने का साहस करेगा, और ऊपर से यह कहने की धृष्टता करेगा कि इतने बड़े और हानिकर कार्य में कोई बुराई नहीं? ऐसे लोग सचमुच इसी योग्य हैं कि उनके सेवक उन्हें यह विश्वास दिलाएँ कि वे उनकी सेवा करने में बड़ा आनन्द पाते हैं, जबकि वे वास्तव में सोने, सुख-विलास और सब प्रकार के आलस्य में लगे रहते हैं, और कोई काम करने के लिए एक उँगली तक नहीं हिलाते।

यदि वे कहें कि यह बराबर का तर्क नहीं है, क्योंकि हमें अपने अधीनस्थों के श्रम की आवश्यकता है: तो मैं उत्तर देता हूँ, यद्यपि परमेश्वर को हमारी कोई आवश्यकता नहीं, तौभी इसलिए कि वह हमारे श्रम, सेवा और आज्ञाकारिता को अपनी सेवा और आदर में काम में लाना चाहता है, यह सचमुच बहुत अशोभनीय है, और हमारे लिए सबसे बड़ी लज्जा और अपयश, कि हम सब कुछ उसकी इच्छा से भिन्न रीति से करें, और उस लगन और कर्तव्य से बिलकुल रहित हों जो हम पर उसका ऋण है। वरन् हमारी लज्जा इसलिए और भी बड़ी है कि पृथ्वी का कीड़ा और एक निर्जीव वस्तु हमसे अपने सृजनहार से अधिक अधिकार और आदर माँगे।

परन्तु फिर भी हमें इन पशुओं से और भी सीधे-सीधे बात करनी चाहिए। वे कहते हैं कि पोप-पन्थियों के बीच जो चाहें वह स्वाँग भरना और ढाँपना उनके लिए उचित है, और धर्म की उस रीति और ढब के अनुरूप हो जाना, जो अन्धविश्वास को पोसने के लिए सबसे उपयुक्त समझा जाता है। तो वहाँ उन्हें खाने को रोटी कौन देता है? भूमि को उपजाऊ कौन बनाता है कि वह फल दे? यदि परमेश्वर उन्हें उन स्थानों में, जहाँ वे बसे हैं, वैसे ही खिलाता और पालता है जैसे पृथ्वी के अन्य भागों में सब अन्य मनुष्यों को, तो वे इस उपकार के देनेवाले का आदर अपने उस अंश से क्यों नहीं करते जो उससे इतनी उदारता से पोषित होता है? वे अपनी देहों से शैतान की आज्ञा और सेवा क्यों करते हैं? यदि ये लोग किसी भी अंश में मसीही होते, तो मैं उनके साथ अधिक गम्भीर और ऊँचे तर्क काम में लाता, और उनसे पूछता कि हम इस संसार में किसलिए जीते हैं, और हमारे जीवन का सम्बन्ध किस उद्देश्य से होना चाहिए। परन्तु हाय, कैसी दयनीय दशा है कि जो लोग चतुराइयों और बहानों से प्रतिदिन परमेश्वर के साथ खिलवाड़ करते हैं, वे इतने पशु-तुल्य हैं कि उनके साथ उन मनुष्यों का-सा व्यवहार करना पड़ता है जो न केवल परमेश्वर की आत्मा से रहित हैं, वरन् एक प्रकार से स्वाभाविक सामान्य बुद्धि से भी खाली हैं।

वे सोचते हैं कि यह कहना कि हम इस प्रकार का कोई काम केवल संकट और खतरे के भय से करते हैं, एक पर्याप्त बहाना है; परन्तु यदि यह बहाना टिक सके, तो हमें यह कहना पड़ेगा कि यूसुफ ने कोई बुराई न की होती यदि वह अपनी स्वामिनी के साथ व्यभिचार कर लेता, जब वह उस पर बलपूर्वक थोपा गया था, क्योंकि तब वह अपनी इच्छा के पीछे न चलता, वरन् उस आवश्यकता और बल के आगे झुक जाता जो वह स्त्री उस पर करती थी। उसके लिए यह मूर्खता का काम होता कि वह ऐसे संकट और अपयश में पड़े जैसा उसे आगे चलकर उस दुष्ट स्त्री के झूठे दोषारोपण से सहना पड़ा, जबकि वह उसकी इच्छा पूरी करके उन बुराइयों से बच सकता था। परन्तु हमें तो यूसुफ का उदाहरण मानना चाहिए और पवित्र आत्मा की उस गवाही को मानना चाहिए जो उसकी दृढ़ता की सराहना करता है।

यदि पोप-पन्थियों की उग्र क्रूरता से बचने के लिए मूर्तिपूजक धर्म को अपना लेने में कोई बुराई नहीं, तो वह सेवक पाप न करेगा जो अपने स्वामी की प्रसन्नता के लिए, उसे अप्रसन्न करने के भय से, जिसके अधिकार में वह है, डाकू बने, हत्या करे और विश्वासघात करे। परन्तु मैं इस विषय पर बहुत देर ठहरता हूँ, जिसमें (जैसा मैंने पहले कहा) कोई सन्देह या कठिनाई नहीं। यह विचार करना प्रसंग से दूर न होगा कि वे कितनी बड़ी उलझन में पड़ते हैं जो अपनी सारी चालाकियों से परमेश्वर के न्याय से बचने का परिश्रम करते हैं।

कुछ और हैं जिन्होंने एक और बहाना और भाग निकलने का बिल ढूँढ़ निकाला है: वे मानते हैं कि अन्यजातियों का अन्धविश्वास दुष्ट और घिनौना धर्म है, परन्तु इनका और पोप-पन्थ के अन्धविश्वासों का तर्क एक-सा नहीं। मानो अन्यजातियों के बीच जो भी झूठा धर्म कभी रहा वह परमेश्वर के सच्चे धर्म का बिगाड़ और विकृति न था। अन्यजातियों ने अपनी रीतियाँ पवित्र पूर्वजों के सिवाय और कहाँ से खींचकर अपनाईं? इसमें उनका बड़ा दोष यही था कि जो बातें उन्होंने परमेश्वर की ओर से भली और बुद्धिमानी से ठहराई हुई पाई थीं, उन्हें उन्होंने बिगाड़ा और पूरी तरह उलट दिया। तौभी संसार में जितनी घृणित बातें कभी हुईं, वे सब स्वयं परमेश्वर के सुन्दर नाम और उसके धर्म के आवरण से ढँकी रही हैं। परन्तु उन नकली धर्मों को कभी वह सराहना, सामर्थ्य और अधिकार नहीं मिला कि परमेश्वर ने कभी उन सेवाओं और सभाओं को स्वीकार किया हो, या विश्वासी जन उन्हें काम में लाते और उनमें जाते रहे हों। अच्छा, आगे बढ़ें।

यद्यपि मैं यह मान भी लूँ कि पोप-पन्थियों की मूर्तिपूजा प्राचीन अन्यजातियों के अन्धविश्वास से भिन्न और असमान है, तौभी वे इससे इनकार नहीं कर सकते कि परमेश्वर ने बेतेल में दुष्टता से खड़े किए गए धर्म को उतनी ही गम्भीरता से वर्जित किया जितना अन्य स्थानों में ठहराए और मनाए गए सब अन्य अन्धविश्वासों को। जब दान और बेतेल में बछड़े खड़े किए गए, तो यह उसी के नाम के किसी आवरण के नीचे ठहराया और किया गया जो अपनी प्रजा को मिस्र से निकाल लाया था। तौभी वह धर्म जो वहाँ ठहराया गया, व्यवस्था की शिक्षा के स्पष्ट विरुद्ध है। परमेश्वर उन सब को दोषी ठहराता है जो वहाँ जाकर अपने आप को अशुद्ध और भ्रष्ट करते हैं। और सचमुच, यीशु मसीह का भोज और पोप-पन्थी मिस्सा एक-दूसरे के उतने ही विरोधी और प्रतिकूल हैं जितने मूसा और यारोबाम के बलिदान।

तो फिर यह छूट और अनुमति कहाँ से आई कि इस बहाने से मिस्सा सुनने जाएँ कि यीशु मसीह का भोज केवल रूप-परिवर्तित किया गया है, वरन् सच कहें तो विकृत किया गया है? परन्तु मैं इसके विपरीत कहता और दृढ़ता से मानता हूँ कि वे सब जो सचमुच परमेश्वर का भय मानते और भक्ति से उसका आदर करते हैं, उन्हें इससे और भी अधिक घृणा और बैर रखना चाहिए, क्योंकि यह यीशु मसीह की पवित्र विधि को उससे कहीं अधिक खुले रूप में भंग और अपवित्र करता है जितना यदि यह उसके इतना विरोधी और प्रतिकूल न होता। इसलिए आइए हम यह साझा नियम सामान्य रूप से थामे रखें कि मनुष्यों की वे सब विधियाँ और रचनाएँ जो परमेश्वर के वचन की सीधी सच्चाई को बिगाड़ने और उस धर्म को उलटने के लिए प्रस्तावित और आरम्भ की गई हैं जिसकी वह माँग और स्वीकृति देता है, पूरे अर्थ में अपवित्र कार्य हैं, जिनमें मसीही मनुष्य किसी रीति से भागी नहीं हो सकता, बिना उस अपमान और तिरस्कार के जो परमेश्वर के आदर को अत्यन्त दुष्टता से पैरों तले रौंदता है।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि यह कठोर न्याय उन्हें कितना भारी और असह्य लगता है जो अपनी ही अभिलाषा और कोमल मन के अनुसार अधिक नरमी और मृदुता से समझाए और सिखाए जाना चाहते हैं। इस विषय में वे मुझसे क्या चाहते हैं कि मैं करूँ? मैं कौन-सा संयम और नरमी बरतूँ? सचमुच अब मैं देखता हूँ कि वे कितने नाज़ुक और सुकुमार हैं। मैं जहाँ तक हो सके उन्हें बचाना चाहता हूँ, परन्तु परमेश्वर के बोल चुकने पर मैं और वे दोनों दोषी ठहरेंगे। इसलिए यदि हम अपने उद्धार की चिन्ता रखते हैं, तो इसे भली रीति से ग्रहण करें।

वे कहते हैं कि उन्हें मुझसे अधिक कठोर और तीखा कोई मनुष्य नहीं मिलता, परन्तु मैं उन्हें दूसरी ओर से बताऊँगा कि मैं उनके साथ उससे कहीं अधिक नरमी और कोमलता से व्यवहार करता हूँ जितनी इस विषय की सच्चाई, परमेश्वर के नाम की महिमा और उनके अपने उद्धार की माँग थी। और जब वास्तव में ऐसा ही है, तो वे अपने आप को उस कर्तव्य और गवाही की आवश्यकता से बरी और मुक्त नहीं कर सकते जो यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता बाबुल के बन्धुए यहूदियों से माँगता है, जिन्हें वह न केवल कसदियों की घृणित वस्तुओं के पास आने, या छल से और दिखावे से उनसे कोई सहमति जताने से रोकता है, वरन् स्पष्ट आज्ञा भी देता है कि वे कसदियों के दुष्ट धर्म को अपने लिए अत्यन्त घिनौनी दुर्गन्ध ठहराएँ।

यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता कहता है, "तुम उनसे यह कहना, कि जिन देवताओं ने आकाश और पृथ्वी को नहीं बनाया, वे पृथ्वी के ऊपर से और आकाश के नीचे से नष्ट हो जाएँगे।" इस स्थान में एक और बात भी ध्यान देने योग्य है कि भविष्यद्वक्ता ने अपनी पुस्तक इब्रानी में लिखी, तौभी उसने यह वाक्य कसदियों की साधारण बोलचाल की भाषा में रखा, मानो वह इस प्रकार यहूदियों को विवश करना चाहता था कि वे अपनी भाषा छोड़ दें, ताकि वे दुष्ट मूर्तिपूजकों के प्रति अपनी घृणा और असहमति को अधिक उपयुक्त रीति से प्रकट कर सकें।

अब हमारे ये नाज़ुक नौजवान मुझ पर शिकायत करें कि मेरी चेतावनी सब सीमा से बढ़ गई, जबकि मैंने उस कर्तव्य का आधा भाग भी कभी नहीं माँगा जो वह भविष्यद्वक्ता इतनी गम्भीरता से माँगता और चाहता है। परन्तु मेरे कहने और संयम का, या मेरी चुप्पी और मौन का ढंग चाहे जैसा हो, तौभी हम उस व्यवस्था से बँधे और जकड़े हैं जो परमेश्वर हमें देता है। और सचमुच, यह बिना कारण नहीं कि परमेश्वर अपने विश्वासियों से बोलते हुए उनसे कहता है, "तुम मेरे गवाह और मेरे दास हो जिन्हें मैंने चुना है।" इसलिए जो कोई अपने आप को यीशु मसीह का अंग प्रमाणित करना चाहे, उसे हर प्रकार से यह प्रकट करना चाहिए कि परमेश्वर के नाम की स्तुति और आदर उससे ऐसा सम्बन्ध रखता है कि जो लोग अपने ढोंग से उसकी सच्चाई की गवाही को छिपाते और गाड़ देते हैं, वे अपने आप को निरुत्तर छोड़ देते हैं।

उनके विषय में क्या सोचा जाए, मैं तुमसे पूछता हूँ, जो अपने सारे जीवन-भर उसी को उलटते रहते हैं? वे किस प्रकार के लोग हैं जो न केवल मसीही धर्म के अंगीकार को छिपाते हैं और मनुष्यों के सामने उसका कोई चिह्न नहीं दिखाते, वरन् बहुत-सी बातें करते भी हैं, और वे भी अत्यन्त विपरीत और अशोभनीय? इसलिए शेष यह रहता है कि परमेश्वर की सन्तान, जो वहाँ रहती है जहाँ अशुद्धताएँ और घृणित बातें बनी हैं, उस भक्त पुरुष लूत के उदाहरण के अनुसार शोक करे, और मनुष्यों के इतने बहुत और इतने बड़े घृणित दुर्गुणों के विरुद्ध उतनी स्वतन्त्रता से बोले जितना परमेश्वर उन्हें सामर्थ्य और अवसर दे।

अब हम कुछ ऐसी मूर्तिपूजाएँ दिखाने पर आएँ जो इन दिनों सबसे अधिक आदर पाती हैं। इनमें मिस्सा प्रमुख है, जिसकी चर्चा मैंने पहले कुछ की है। क्योंकि यद्यपि यह अपनी बेतुकेपन और अपनी हानि की महानता, दोनों में ऐसी प्रसिद्ध और विख्यात निन्दा है कि इससे अधिक घिनौनी और दुष्ट वस्तु कल्पना भी नहीं की जा सकती, तौभी बुरे पक्ष के पैरोकार अब भी मिलते हैं जो इस विषय में बकवास करते हैं। परन्तु चाहे-अनचाहे वे यह स्वीकार करने को विवश होंगे जो मैं कहता हूँ, कि मिस्सा स्वयं में यीशु मसीह की मृत्यु का नकारना है, और शैतान का रचा और ठहराया हुआ एक प्रकार का अपवित्र कार्य है जो प्रभु-भोज के संस्कार को मिटाने के लिए है। और वे इससे भी इनकार नहीं कर सकते कि सन्तों को पुकारना और मृतकों के लिए प्रार्थनाएँ दुष्ट कुरीतियाँ हैं, जिनसे परमेश्वर के नाम की पुकार, जो सब वस्तुओं में सबसे पवित्र है, अपवित्र की जाती है। और जो पोप-पन्थियों के बीच इन घृणित बातों से अपने आप को अशुद्ध करते हैं, वे अपने आप को किसी दोष का दोषी नहीं समझते। वे कहते हैं, "हम क्या करें? हमारे लिए उन बातों को सुधारना और ठीक करना उचित नहीं जिन्हें हम बुरा और दोषपूर्ण जानते हैं। हम साधारण जन हैं, और जिनके पास अधिकार और सार्वजनिक सामर्थ्य है वे इन्हें हठपूर्वक थामे हैं। इसलिए हमें वह बलपूर्वक आई आवश्यकता सहनी ही पड़ेगी।" मैं यह सब सच मानता हूँ। परन्तु मैं कहता हूँ कि यह प्रसंग की बात नहीं। लोगों के लिए सार्वजनिक व्यवस्था सुधारना और ठहराना उनका कार्य नहीं, न कोई उनसे यह माँगता है; तौभी उन्हें चेताया जाता है कि वे अपने आप को सुधारें, और निजी जीवन में सज्जनता और शिष्टता का व्यवहार स्थापित करें, जो निःसन्देह उनके कर्तव्य से सम्बन्ध रखता है। और हम उन्हें यह आज्ञा नहीं देते कि वे मन्दिरों और सार्वजनिक सड़कों को शुद्ध करें, वरन् यह कि हर एक अपनी देह और हृदय को शुद्धता और पवित्रता में रखे, और सब प्रकार से यह प्रयत्न करे कि परमेश्वर का आदर, सेवा और आज्ञापालन उसके अपने घर में हो।

क्योंकि किसी प्रदेश में मिस्सा को मिटा देना, और उस समय उसमें उपस्थित न होना जब उसका प्रचलन और वह धर्म किसी और रीति से रोका नहीं जा सकता, ये दोनों बहुत भिन्न और एक-दूसरे से बहुत असंगत बातें हैं; परन्तु वे अपनी वही बात बार-बार दोहराते हैं, अर्थात् यह कि वे यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग को नहीं नकारते, क्योंकि उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं कि मन में उसकी पूजा करें। परन्तु मैं उनसे पूछता हूँ, मसीही मनुष्य मुँह से क्या अंगीकार करता है, यदि वही नहीं जो वह हृदय से विश्वास करता है? यह बात पर्याप्त स्पष्ट और प्रकट है कि जो वे करते हैं वह विश्वास के अंगीकार से अत्यन्त असंगत है। इसलिए जहाँ तक उनके वश में है, वे विश्वास की सच्ची और उचित गवाही को न केवल छिपाते हैं, वरन् उसे पूरी तरह नकारते और त्याग भी देते हैं।

मैं उनसे अब भी कुछ और सरलता और सीधाई से बात करूँगा। क्योंकि पोप-पन्थी कहते हैं कि मिस्सा एक बलिदान है जिसमें वे यीशु मसीह को चढ़ाएँगे, कि अपने आप को परमेश्वर से मिलाएँ। परन्तु यदि ऐसा है, तो इससे यह निकलता है कि यीशु मसीह ने अपनी मृत्यु से हमारे लिए धार्मिकता और अनन्त उद्धार प्राप्त नहीं किया। वे जितने घुमाव और बहाने चाहें ढूँढ़ें, तौभी उन्हें इसी निष्कर्ष पर आना पड़ेगा कि सब जो भक्ति और धर्म के नाम पर मिस्सा में जाते हैं, वे अंगीकार करते हैं कि वे उससे सहमत हैं। इसलिए, जहाँ तक उनके वश में है, वे दिखाते हैं कि यीशु मसीह की मृत्यु से उन्हें अपना छुटकारा पर्याप्त पूरा नहीं मिला।

बहुत-से ऐसे हैं जो इतने व्यापक रूप में नहीं बोलते, और अपनी बात को सब प्रकार के मिस्साओं, अर्थात् अपवित्र कार्यों, में भटकने नहीं देते। वे केवल एक प्रकार के मिस्सा को चुनते हैं और उसी का बचाव करते हैं: उसे पल्ली का मिस्सा, या ऊँचा मिस्सा कहते हैं, क्योंकि इसमें वे समझते हैं कि यीशु मसीह के भोज से अधिक समानता और मेल है। और सचमुच, यह अधिक उपयुक्त रीति से कहा जा सकता है कि वे सब मिस्सा, जो निम्नतम श्रेणी के पुरोहित कहते हैं, और कैनन-पदाधिकारी भी, या वे पुरोहित जिनके पास कुछ निजी उपासनालय हैं, और अन्य सब जो किसी की वसीयत से स्थापित हैं, या ऐसे बिकाऊ हैं कि प्रतिदिन बिक्री के लिए सजाए जाते हैं, ये सब, मैं कहता हूँ, उन वेश्याओं के समान हैं जो वेश्यालयों में बिना किसी लाज और शील के अपने आप को बिकाऊ बनाकर अपनी देह सब मनुष्यों के लिए साझी कर देती हैं; परन्तु ऊँचा मिस्सा उसी वेश्या के बहुत समान है जो पति के आदरणीय नाम का चालाकी से दुरुपयोग करके अपनी निर्लज्जता को ढाँपती है, और एक सम्माननीय और सती पत्नी की प्रतिष्ठा को बनाए रखती और बचाती है।

यद्यपि यह उपमा हर अंश में मेल नहीं खाती, क्योंकि पति से ब्याही हुई वेश्या में कुछ लज्जा और शील रहता है कि वह अपने आप को हर आनेवाले के लिए साझी और खुला न बनाए, परन्तु पल्ली या ऊँचा मिस्सा तो सब अन्य में सबसे अधिक साझी, तैयार और सब मनुष्यों की इच्छाओं और दुष्ट वासनाओं के लिए खुली हुई वेश्या-समान मूर्तिपूजा है; यद्यपि ये गन्दे दलाल यहाँ इस रंग और ऐसी सुन्दरता से उसे रंगते और चिकना करते हैं कि उसमें यीशु मसीह के भोज के कुछ अवशेष अब भी बने हैं। यह वैसा ही है जैसे वह चोर जो तब और अधिक ऊँचे और गौरवपूर्ण रूप में डींग मारता और इतराता है, जब वह उसकी लूट जीतकर पहन लेता है जिसे उसने मार डाला है और जिसके घोड़े पर वह सवार है।

वे कहते हैं, "हम यीशु मसीह के भोज को खोजते हैं, और जब हम, उस अत्याचार के नीचे दबे होने के कारण जिसमें हम रहते हैं, उसे शुद्ध रूप में नहीं पा सकते, तो जो हमारे लिए बचा है उसी से सन्तुष्ट रहना चाहिए, और परमेश्वर के सहायक हाथ की बाट जोहनी चाहिए।" कैसा सुन्दर और मनोहर बहाना है! क्योंकि वे भोज का सही और सिद्ध प्रयोग नहीं रखते, इसलिए मानो उन्होंने कोई पूँजी जुटा ली हो, वे गवाही देते और खुले रूप में अंगीकार करते हैं कि उनके पास यीशु मसीह नहीं है जो अनन्त और एकमात्र पुरोहित है, और इसलिए हर सप्ताह अपने पापों को दूर करने के लिए एक नया बलिदान ढूँढ़ते हैं। क्योंकि यह सब ऊँचे मिस्सा में भी है, जैसा उसमें भी जो निकोलस के नाम से या मृतकों के लिए कहा जाता है। इस बात में वे अपने आप को मूरत की पूजा करनेवाले होने का ढोंग करते हैं, और फिर भी डींग मारते हैं कि वे यीशु मसीह को खोजते हैं; और इसलिए कि वे बिना तलवार और ढाल के परमेश्वर से लड़ते हुए न दिखें, वे अमुक या अमुक मनुष्य का अधिकार सामने रखते हैं, मानो किसी एक मनुष्य की क्षमा उन्हें इस प्रकार छूट और बचाव दे सकती है कि वे परमेश्वर की ओर से दोषी न ठहराए जाएँ।

मैं यह न कहूँगा कि जब वे अपने पक्ष के बचाव में ऐसे मनुष्यों का हवाला देते हैं तो वे घोर झूठ बोलते हैं। परन्तु यदि ऐसा भी हो कि कोई भक्त और ईश्वरीय मनुष्य कभी इस मत का रहा हो कि ऊँचे मिस्सा में जाने में कोई बुराई नहीं, तौभी बाद में जब वह सच्चाई जान ले, यदि वह अपने पिछले निर्णय को अस्वीकार और दोषी ठहराए, तो उसके पिछले से उसका बाद का निर्णय कहीं अधिक विश्वास के योग्य है, क्योंकि परमेश्वर ने उसे उसे अस्वीकार करने तक पहुँचाया, या कहें विवश किया, और क्योंकि वह देखता और स्पष्ट जानता है कि वह उस बात में पराजित हो गया जिसे उसने पहले बहुत अपनाया और स्वीकारा था।

परन्तु इस विषय में हमें सच्चाई को हिलाने की क्या आवश्यकता, मानो हमें शुद्ध और निर्मल जल को गँदला और मटमैला करना हो। क्या वे सोचते हैं कि एक नश्वर मनुष्य के निर्णय और कथन से वे परमेश्वर को रोक सकते और उसे घेर सकते हैं? हम जानते हैं कि सच्चाई के सिवाय कोई वस्तु नहीं जो न्याय में किसी का पक्षपात किए बिना प्रबल होनी चाहिए। यह विषय ऐसा है कि पल्ली या ऊँचा मिस्सा यीशु मसीह को बलिदान चढ़ाने, और जीवितों तथा मृतकों दोनों के लिए परमेश्वर की कृपा को मिलाने के लिए ठहराया गया है, और यह भी कि वहाँ रोटी का एक टुकड़ा ऐसे पूजा जाए मानो वह परमेश्वर का पुत्र हो। मैं उस मिस्सा की सब घृणित बातों और दुष्टताओं की पूरी जाँच नहीं करता, क्योंकि वे लगभग असंख्य हैं। परन्तु मैं केवल सबसे बुरी और सबसे स्थूल बातें गिनाता हूँ।

अब जो लोग ऐसी दुष्टता और बिगाड़ से केवल दिखावटी सहमति रखते हैं, वे अपने हाथ चाहे जितने साफ़ धो लें, तौभी वे पिलातुस से अधिक धर्मी और निर्दोष कभी न ठहरेंगे। परन्तु यह आश्चर्य की बात है कि ये भले और धार्मिक पल्लीवाले ईस्टर के समय कोई कोने का उपासनालय या कोई नकली मसीही भिक्षु ढूँढ़ते हैं जो उनके लिए बन्दर की नकल जैसा नकली भोज तैयार करके दे। यदि ऊँचा मिस्सा यीशु मसीह के भोज के सबसे निकट है, जैसा वे कहते हैं, तो वे उसी को क्यों नहीं मानते और बनाए रखते? परन्तु वर्ष-भर प्रत्येक रविवार को ऊँचे मिस्सा में रहने के बाद, इसलिए कि वे भोज के संस्कार में ठीक रीति से सहभागी होते दिखें, वे अचानक ऊँचे मिस्सा को झटककर छोड़ देते हैं।

परन्तु हमें ऐसी अस्थिरता पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए, वे कहते हैं, क्योंकि यह उनके लिए निश्चित और उचित दण्ड है जिन्होंने अपने मन में सच्चाई की कभी कोई नींव नहीं डाली, कि वे जो कुछ करें और हाथ में लें उस सब में सदा डगमगाते रहें और अपने ही विरुद्ध रहें। उस कपटी भोज के विषय में, मैं जानता हूँ कि उनका यह मत है कि जब उसे डाँटा और खण्डन किया जाता है तो वे उसे अपने प्रति सबसे बड़ा अपमान समझते हैं। परन्तु हम इस विषय में क्या कर सकते हैं, क्योंकि वह मसीह के नियम के बिलकुल अनुकूल नहीं? और मैं इसमें दोष नहीं निकालता कि वे इसे गुप्त रूप में करते हैं, क्योंकि मैं जानता हूँ कि भोज कभी इससे उत्तम या अधिक भक्ति से नहीं मनाया गया जितना तब जब चेले शत्रुओं के अत्याचार से भागकर किसी गुप्त स्थान में गए। परन्तु यहाँ दो दोष हैं जो सचमुच सहे नहीं जा सकते। एक यह कि जो ऐसा भोज करते हैं और बन्दरों की नाईं मसीह के सच्चे भोज की झूठी और बिगड़ी नकल करते हैं, वे ढोंग करते हैं कि अपने मिस्सा को मानते और पूजते हैं। दूसरा यह कि सेवा करनेवाला, जो अधिकांशतः कोई धार्मिक पुरुष होता है, कि बात को और अच्छी तरह छिपाए, वह यह काम मसीही की नाईं नहीं, वरन् पोप-पन्थी पेशे के पुरोहित की नाईं करता है। और इसमें वे समझते हैं कि उनके पास सम्मानजनक और पक्का बचाव है यदि मिस्सा कहनेवाले का यह उद्देश्य न हो कि रोटी और दाखरस उन्हें पूजे जाने के लिए दिखाए, यदि वह कैनन को छोड़ दे जिसमें बहुत-सी बड़ी अधर्म की बातें हैं, और यदि वह उपस्थित सब लोगों को संस्कार दोनों रूपों में दे।

परन्तु जब वे परमप्रधान न्यायी के सामने आएँगे, तब वे उस फल का अनुभव करेंगे जो उन्होंने ऐसी लीपापोती और झूठों से ढूँढ़ा, वरन् सचमुच उन्हें अब भी उसे अनुभव कर लेना चाहिए। क्योंकि मैं उन्हीं कोंचों और काँटों को, जिनसे उनके विवेक कोंचे और घायल होते हैं, उसी न्याय का गम्भीर पूर्वानुभव ठहराता हूँ। और सचमुच इस विषय का निर्णय और स्पष्ट विचार उसी स्थान और उसी न्यायालय में होना चाहिए, जहाँ सच्चाई के अपने गम्भीर और सच्चे गवाह हैं। क्योंकि संक्षेप में, वे स्वयं जानते हैं कि वे उस विषय के दोषी हैं जिसे उन्होंने परमेश्वर के शत्रुओं और साधारण लोगों के सामने भी प्रकट करने की ठानी है। परन्तु परमेश्वर को अवश्य अपने आप का इनकार करना पड़ेगा यदि वह उस अंगीकार की रीति और कार्य को स्वीकार करे। यदि संसार के सब मनुष्य एक मन और उद्देश्य से षड्यन्त्र करके इन्हें धर्मी ठहराएँ, तौभी कोई, चाहे वह कितना ही तत्पर और सामर्थी क्यों न हो, इन्हें इससे नहीं बचा सकता कि वे दोनों ओर लँगड़ाते हुए समझे जाएँगे।

और परमेश्वर अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा घोषणा करता है कि किसी मनुष्य का ऐसा लँगड़ाना उसके सामने कभी स्वीकार न किया जाएगा। जिस मनुष्य को वे अपने भोज का सेवक चुनते हैं, उसके विषय में, उसके व्यक्तित्व का दुरुपयोग करना मूर्खता है, मानो वे उसे इस पद और सेवा के योग्य बना सकें। वे कहते हैं, "हाँ, परन्तु उस संस्कार की सामर्थ्य सेवकों की सामर्थ्य में नहीं टिकी।" यह मैं मानता हूँ और यह भी जोड़ता हूँ कि यदि कोई शैतान भी भोज को परोसे, तो वह कुछ बुरा न होगा। इसके विपरीत, यदि कोई स्वर्गदूत मिस्सा गाए, तो वह तब भी रत्ती भर अच्छा न होगा।

परन्तु हम अब एक और प्रश्न पर हैं, अर्थात् यह कि क्या पोप की ओर से किसी भिक्षु को दिए गए पद उसे पास्टर के पद और कार्य के योग्य बना देते हैं। यदि वे उलटा कहें कि वे देखते हैं कि वह बात प्रसंग से कोई सम्बन्ध नहीं रखती, और कि वे उस रीति से नहीं चुनते, तो बात स्वयं इसके विपरीत दिखाती है। परन्तु मान लें कि सेवक के विषय में उनका ऐसा कोई विचार नहीं। तौभी मुझे उस बाहरी अंगीकार में ठहरना है जो वे अपनाते और पूजते हैं, वरन् उस पर गम्भीरता से बल देना है, क्योंकि वह एक मसीही मनुष्य के लिए अत्यन्त विपरीत और अयोग्य अंगीकार है। क्योंकि यह स्पष्ट और प्रकट है कि वे उस पुरोहित के व्यक्तित्व के नीचे, जो इसी प्रयोजन से रंग चढ़ाने और छिपाने के लिए बनाया गया है, अपना बचाव करते और छिपते हैं और करना चाहते हैं।

परन्तु यदि वे उस भोज को ठीक और वैध रीति से मनाना चाहें, तो उनका कर्तव्य होता कि वे अपने आप को मूर्तिपूजकों की व्यवस्था और अंगीकार से ऐसा अलग कर लें कि इसमें उनके साथ उनकी कोई साझेदारी न दिखाई दे। परन्तु अब वे इस अलगाव से इतने दूर हैं कि वे अपने आप को उनकी संगति और सहभागिता में लिखवाते हैं, और उनमें से हर एक कपट से अपने आप को उस देह का अंग होने का अंगीकार करता है।

इसके बाद वे हमारी तुलना उन प्राचीन विधर्मियों से करेंगे जिन्होंने सेवकों के दुर्गुणों के कारण संस्कारों का प्रयोग अस्वीकार किया, मानो हम यहाँ हर एक मनुष्य के निजी पापों को देखते हों, और सामान्य दशा और स्थिति को नहीं। मैं इस विषय को संक्षेप में छोड़ देता हूँ, क्योंकि जो कहा गया है वह ऐसी घिनौनी और लज्जाजनक ढिठाई को परास्त करने के लिए पर्याप्त है।

परन्तु यदि ये लोग इतने मूर्ख और मन्दबुद्धि हैं कि वे इस गन्दगी को नहीं समझते, तो परमेश्वर का वचन हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए, जब प्रभु यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहता है, "हे इस्राएल, यदि तू लौटे, तो मेरी ही ओर लौट।" इन शब्दों में अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रकट किया गया है कि हमें परमेश्वर के सामने किस सरलता और मन की खराई से व्यवहार करना और चलना चाहिए, बिना उन बातों की ओर लौटने के किसी विचार और इच्छा के जिन्हें हम जानते हैं कि वे उसे न भाती हैं, न स्वीकार्य हैं।

यही कारण है कि सन्त पौलुस भी गवाही देता है कि वह इसलिए भेजा गया कि अविश्वासियों को उनकी व्यर्थ बातों से जीवते परमेश्वर की ओर फेरे; मानो वह यह कहना चाहता हो कि किसी एक पुरानी और अभ्यस्त बुराई को अन्य ढोंगों और बनावटों से बदलना व्यर्थ है, वरन् सब अन्धविश्वासों को पूरी तरह मिटा देना चाहिए, ताकि सच्चा धर्म अपनी शुद्धता और पवित्रता में स्थापित हो। क्योंकि इस विश्वास और खराई के बिना मनुष्य परमेश्वर की ओर सही मार्ग से कभी नहीं आते, वरन् सदा डगमगाते रहते हैं और अनिश्चित रहते हैं कि किस ओर मुड़ें।

कुछ और हैं जो यहाँ तक पहुँच गए हैं कि वे मिस्सा को अस्वीकार और त्याग देते हैं, परन्तु वे कुछ टुकड़े-पैबन्द बनाए रखना चाहते हैं जिन्हें वे परमेश्वर की सेवा कहते हैं, कि कुछ लोग जैसा कहते हैं, वे सब धर्म से रहित न दिखें। और हो सकता है कि इनमें से कुछ भक्तिपूर्ण मन और उत्साह से प्रेरित हों; कम से कम मैं ऐसा ही सोचूँगा। परन्तु उनका उत्साह और उद्देश्य जो भी हो, तौभी हम नहीं कह सकते कि वे सच्चा नियम या कोई उचित माप थामे हैं।

बहुत-से कहते हैं कि हम उनके बपतिस्मा में जा सकते हैं, क्योंकि उनमें कोई प्रकट मूर्तिपूजा नहीं। मानो यह संस्कार भी सब प्रकार के बिगाड़ से भ्रष्ट और पूरी तरह विकृत न किया गया हो, यहाँ तक कि ऐसा प्रतीत हो कि यीशु मसीह अब भी पिलातुस के घर में सब अपमान और लज्जा सह रहा है।

अन्त में, जब वे कहते हैं कि वे कुछ रीतियाँ इसलिए बनाए रखना चाहते हैं कि कहीं वे सब धर्म से रहित न दिखें, तो यदि कोई उनके विवेक की जाँच करे, तो वही सचमुच उत्तर देगा कि वे यह पोप-पन्थियों को सन्तुष्ट करने के लिए करते हैं, और अत्याचार से बचने के लिए अपना मुँह बदलते हैं।

कुछ और ऐसे हैं जो समय ताकते हैं कि मिस्सा के समय न आएँ, और फिर भी मन्दिर में आते हैं, ताकि लोग समझें कि वे मिस्सा सुनते हैं। कुछ और केवल सन्ध्या-प्रार्थना के समय आते हैं, जिनसे मैं जानना चाहता हूँ कि क्या वे इसे कुछ भी नहीं समझते कि उसी समय मूरतों का आदर किया जाता है, चित्रों और प्रतिमाओं पर धूप का धुआँ किया जाता है, किसी सन्त की मध्यस्थता में और उसके पुण्यों के आधार पर गम्भीर प्रार्थना की जाती है, साल्वे रेजिना ऊँचे स्वर में गाया जाता है, और चारों ओर ऐसी बात सुनाई पड़ती है जो शैतानी और शापित निन्दा से इतनी भरी और परिपूर्ण है कि मन वहाँ उपस्थित कानों और आँखों के अपराध से तो घृणा करेगा ही, पर उसके स्मरण और चिन्तन से और भी अधिक प्रबलता से घृणा करेगा।

मैं इसे छोड़ देता हूँ कि अनजानी भाषा में गाना स्वयं परमेश्वर की स्तुति और पवित्रशास्त्र का प्रकट अपमान है, जैसा सन्त पौलुस कुरिन्थियों को लिखी पत्री के चौदहवें अध्याय में चेताता है। परन्तु यह अन्तिम दोष उन्हें क्षमा हो। यदि वे सन्ध्या-प्रार्थना में अपने मसीही होने का कोई चिह्न और गवाही देने आते हैं, तो वे यह मुख्यतः बड़े पर्वों पर करेंगे। परन्तु तब वहाँ मुख्य मूरतों के सामने धूप का गम्भीर धुआँ होगा, और मीठी धूप की बड़ी मात्रा उँडेली जाएगी, जो एक प्रकार का बलिदान है, जैसा पवित्रशास्त्र सिखाता है। यह अन्यजातियों के बीच भी प्रचलित रीति थी, और इसी से वे निर्बल मनुष्यों को परमेश्वर का इनकार करने को विवश करते थे। और इसी कारण अधिकांश शहीदों ने दृढ़ता से मृत्यु सही, क्योंकि वे मूरतों के लिए सुगन्ध जलाने और धूप चढ़ाने को तैयार न थे।

जब ये लोग यहाँ तक पहुँच जाते हैं कि धूपदानों की सुगन्ध अपने नथुनों में लेते हैं, तो वे उस सबसे बड़ी और घृणित अशुद्धता से भी अपने आप को अशुद्ध करते हैं जो वहाँ है, और फिर भी वे समझते हैं कि हमें इतनी बड़ी दुष्टता और हानि को छिपाना और ढाँपना चाहिए। परन्तु मैं परमेश्वर के आदरणीय और पवित्र नाम में उनसे विनती करता हूँ कि वे भजन संहिता के इस वचन को ध्यान से देखें, कि विश्वासी और भक्त मनुष्य को मूरतों से इतनी घृणा होनी चाहिए कि वे उसके मुँह या जीभ पर भी न आएँ, ऐसा न हो कि उनकी चर्चा उसे दूषित और अशुद्ध करती हुई दिखे।

यह एक ही शब्द हमें मूर्तिपूजकों की सब सभा और संगति से डराने और हटाने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि हम उस सभा में रहते हुए सहज ही उसमें लपेटे और अशुद्ध किए जा सकते हैं। परन्तु उन सब के विषय में, जो परमेश्वर और शैतान के बीच बीच का मार्ग खोजते हैं, मैं जो सोचता हूँ उसे सीधे और खुलकर कहूँ: उनके मन दोहरे और अस्थिर हैं, और मैं उन्हें दिखाने और उनकी जीती-जागती तस्वीर खींचने के लिए एसाव, उसी घिनौने और दोहरे मनुष्य, की उपमा से अधिक उपयुक्त और ठीक उपमा नहीं पाता।

क्योंकि जब उसने देखा कि उसका भाई याकूब उसके पिता इसहाक के द्वारा पत्नी ढूँढ़ने के लिए मेसोपोटामिया भेजा गया, इसलिए कि कनान देश की स्त्रियाँ पिता और उसकी पत्नी रिबका को इतनी अप्रिय थीं कि वे अपने जीवन को उनके बीच रहने में कड़वा और भारी समझते थे और उसकी जगह मृत्यु चाहते थे, तब उसने माता-पिता को कुछ सन्तुष्ट करने के लिए एक नई पत्नी ब्याह ली, परन्तु पुरानी को निकाला नहीं। इस प्रकार वह उसी बुराई को बनाए रखता है जिसकी इसहाक ने इतनी गम्भीरता से शिकायत की थी, परन्तु बात को कुछ सुधारने के लिए वह एक नई पत्नी ब्याह लेता है। ठीक वैसे ही जो लोग संसार में ऐसे लिपटे हैं कि किसी रीति से परमेश्वर के पीछे चल नहीं सकते, वे बहुत-से और भिन्न-भिन्न प्रकार के धर्मों और अन्धविश्वासों को मिलाते और उछालते हैं, ताकि किसी न किसी प्रकार से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो जाएँ, और वे सदा कुछ न कुछ बिगाड़ बनाए रखते हैं, जिससे जो कुछ वे करें वह शुद्ध और खरा न दिखाई दे।

मैं यह भी भली-भाँति जानता हूँ कि उन स्थानों में बहुत-सी दुखी आत्माएँ हैं, जो वहाँ बड़ी कठिनाइयों और चिन्ताओं में जीती हैं, जो सचमुच बिना कपट के सीधे चलना चाहती हैं, और फिर भी बहुत-से सन्देहों और संकोचों से अपने आप को छुड़ा नहीं पातीं, जो उस इतनी बड़ी और भयानक उलझन में कोई आश्चर्य नहीं जो हम इस समय पोप-पन्थ में देखते हैं। वरन् मुझे उनकी दयनीय दशा पर बड़ी दया आती है जो ऐसे उपाय ढूँढ़ते हैं जिनसे वे भक्ति से परमेश्वर की सेवा कर सकें और विश्वास के शत्रुओं के बीच रह भी सकें, यदि किसी रीति से सम्भव हो।

परन्तु हम क्या करें? मैं न इन्हें, न उन्हें, उनकी भूल और पाप के प्रकट करने के सिवाय और कुछ कर सकता हूँ, ताकि वे स्वयं उसका उपाय जोड़ें। यदि वे आगे मुझसे यह या वह और अधिक सावधानी और विस्तार से पूछने आएँ, तो मैं ऐसे जिज्ञासुओं को उस साझे नियम की ओर भेज दूँगा जो उनके पास परमेश्वर की ओर से है। मैं यह इसलिए कहता हूँ कि इस प्रकार के कुछ लोग इतने हठी हैं कि यदि कोई उनकी सब कठिनाइयों और सन्देहों का उत्तर दे, तो वह कभी किसी बात का अन्त करता न दिखेगा। और मुझे लगता है कि ऐसे लोगों की तुलना उन से भली-भाँति की जा सकती है, जो किसी उपदेश में यह सीखने के बाद कि देह को सादे वस्त्रों और बिना किसी ढीले और भड़कीले शृंगार के सजाना चाहिए, चाहेंगे कि उपदेशक उनके मोज़े भी बना दे और जूते भी सी दे। तो फिर हमें क्या करना चाहिए? इस विषय में हमारे सामने एक बात रखी गई है जिसकी ओर हमें अपना सारा मन, लगन और विचार लगाना और केन्द्रित करना चाहिए। वह यह है कि परमेश्वर के भवन की धुन हमारे हृदय को खा जाए, और हमें इतना प्रेरित करे कि वे सब अनादर, तिरस्कार और निन्दाएँ जो परमेश्वर के पवित्र नाम के विरुद्ध अत्यन्त अनुचित रीति से की जाती हैं, हम उन्हें अपने ऊपर उठा लें और सह लें।

जब परमेश्वर के आदर की ऐसी अभिलाषा और उमड़ता प्रेम हमारे हृदयों में जलाया जाएगा, सूखे भूसे की नाईं नहीं जो शीघ्र आग पकड़ता और सहज बुझ जाता है, परन्तु उस आग की नाईं जो निरन्तर जलती रहती है, तब मनुष्य इन घृणित बातों को, जिनसे परमेश्वर का नाम अत्यन्त लज्जाजनक और अनुचित रीति से अशुद्ध किया जाता है, सहने या स्वीकारने से इतना दूर होगा कि जब वह उन्हें देखेगा तो किसी रीति से ढोंग, चुप्पी और मौन को सह न सकेगा। और यह ध्यान से देखना चाहिए कि वह कहता है, परमेश्वर के भवन की धुन, ताकि हम जानें कि यह उस बाहरी व्यवस्था से सम्बन्ध रखती है जो कलीसिया में ठहराई गई है, कि हम अपने विश्वास के अंगीकार में अपने आप को लगाए रखें।

मैं उन ठट्ठा करनेवालों को कुछ नहीं गिनता जो कहते हैं कि मैं स्वयं यहाँ बिना किसी खतरे के, वरन् बड़े चैन से रहते हुए इन विषयों पर सुन्दर बातें करता हूँ। मैं वह मनुष्य नहीं जिससे इन लोगों का कोई प्रयोजन हो। क्योंकि यह भली-भाँति ज्ञात है कि यहाँ मेरी अपनी कोई भूमि नहीं है। यही हम उन सब दार्शनिकों के विषय में सोच और कह सकते हैं जो बिना विषय को जाने अपना निर्णय सुनाते हैं। क्योंकि जब वे परमेश्वर की नहीं सुनेंगे, जो अब सचमुच उनसे इतनी कोमलता से बोलता है कि उन्हें सिखाए, तो मैं उस दिन और न्याय की घोषणा करता हूँ जब वे परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने बुलाए जाकर वह दण्ड-आज्ञा सुनेंगे जिसके विरुद्ध कोई उत्तर या बचाव न होगा। क्योंकि जब वे उसे सबसे उत्तम और सबसे कोमल गुरु जानकर नहीं सुनेंगे, तब वे अन्त में उसे अपना सबसे निश्चित और धर्मी न्यायी जानेंगे और अनुभव करेंगे। उस समय उनमें से सबसे हठी और सबसे चालाक भी देख और जान लेगा कि वे अपने मतों में धोखा खाए हुए थे।

वे चाहे न्याय और धर्म को निभाने या उलटने में जितने सधे और तैयार हों, तौभी उनके व्यवस्था और न्यायालय के आभूषण, और बड़ी प्रतिष्ठा और सामर्थ्य के चिह्न, जिन्हें वे अब घमण्ड से धारण करके इतराते हैं, तब उन्हें जीत न दिलाएँगे। मैं यह इसलिए कहता हूँ कि परामर्शदाता, न्यायाधीश, वकील, अधिवक्ता और अन्य ऐसे लोग जो अदालतों और न्यायालयों में प्रभुत्व रखते हैं, न केवल परमेश्वर से झगड़ने का साहस करते हैं, और इतना हठ करते हैं कि मानो उन्होंने उसकी महिमा का उपहास और ठट्ठा करने का कोई अधिकार पा लिया हो, वरन् सारे पवित्रशास्त्र को ठुकराकर अपनी निन्दाएँ ऐसे उगलते हैं मानो वे व्यवस्था के सबसे बड़े वाक्य और सबसे ऊँचे आदेश हों।

ये लोग, जिन्हें संसार मूरतों की नाईं आदर देता है, एक शब्द बोलते ही तर्क और सच्चाई को ठहरने की कोई जगह नहीं पाने देते। परन्तु फिर भी मैं बीच में उन्हें पहले ही चेतावनी देता हूँ कि उनके लिए अच्छा होगा कि उस भयानक पलटा का कुछ स्मरण रखें जो उनके लिए ठहराया गया है जो न्याय को अन्याय से, और सच्चाई को झूठ से बदलते हैं।

न यहाँ के डॉक्टर और कोठरियों के स्वामी, न स्वादिष्ट निन्दक और पक्के विलासी, इससे ऊँचा कोई पद पाते हैं कि अपने भोजों और दावतों में बकबक करें और स्वर्गीय गुरु के विरुद्ध अपनी बातें बकें, जिसकी बात सब मनुष्यों को अत्यन्त लगन से सुननी चाहिए। न उनके सुन्दर और प्रसिद्ध पद किसी को उस न्याय से खींच सकते हैं, जिसमें प्रभुता करनेवाले और पूज्य मठाधीश, प्रायर, डीन और आर्कडीकन, खेल के प्रधान गुरु होने के कारण, उस दण्ड में नाच का नेतृत्व करने को विवश किए जाएँगे जिसे परमेश्वर अत्यन्त भारी ठहराएगा।

अब यद्यपि दरबारी लोग अपने पवित्र जल के छींटों से मनुष्यों को प्रसन्न करने के आदी हैं, वे यह न समझें कि वे इस प्रकार के काम से परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं। अन्त में, सब मसखरे और बकवादी चुप रहें और अपनी हँसी-ठट्ठे की चतुर बातों की डींग न मारें, जब तक वे उसके सामर्थी हाथ का अनुभव नहीं करना चाहते जिसके वचन पर उन्हें काँपना चाहिए। इसमें उनकी भूल बहुत ही मूर्खतापूर्ण है जो यह मानता है कि क्योंकि वे मुझे अपना विरोधी समझते हैं, इसलिए परमेश्वर उनका न्यायी न होगा। वे मेरा नाम अपनी पुस्तकों में से खुरच दें और पूरी तरह मिटा डालें, विशेषकर इस प्रकार के विषय और प्रश्न में, जिसमें मेरा उद्देश्य केवल यह है कि परमेश्वर की सुनी जाए और उसकी आज्ञा मानी जाए, यह नहीं कि मैं अपनी इच्छा से मनुष्यों के विवेकों पर शासन करूँ और उन पर कोई बाध्यता या व्यवस्था लादूँ। और उन सब अन्य के विषय में, जो परमेश्वर के वचन को इतने घमण्ड से तुच्छ नहीं जानते, और फिर भी इतने नाज़ुक और निर्बल हैं कि किसी रीति से हिलाए नहीं जा सकते, मैं पूरे मन से उनसे विनती करता हूँ कि वे अपने कर्तव्य, उद्धार और परमेश्वर के आदर का अधिक विचार और ध्यान रखें, और अपने आप को और चापलूसी न करें, जैसा वे अब तक करते आए हैं। इसलिए वे अपनी आँखें खोलें और अपने आप को उठाएँ कि उस दुर्दशा को देखें जिसमें वे हैं।

मैं उन बुराइयों, कठिनाइयों और रुकावटों को भली-भाँति जानता हूँ जिनमें वे पोप-पन्थियों के बीच लिपटे हैं। मैं उनसे ऐसे नहीं बोलता मानो मूर्तिपूजाओं के बीच परमेश्वर के शुद्ध और खरे धर्म का बचाव करने का भार उठाना सहज बात हो, परन्तु यदि उनमें बल की कमी हो, तो मैं उन्हें सम्मति देता हूँ कि वे समस्त सामर्थ्य के कर्ता परमेश्वर की ओर भागें, कि उससे बलवन्त किए जाएँ और संसार की सब वस्तुओं से बढ़कर उसकी महिमा को चुनना सीखें। क्योंकि मैं हृदय से चाहता हूँ कि सब विश्वासी, जो पोप-पन्थ में दयनीय रीति से पीड़ित हैं, यह समझें और जानें, कि यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता ने यरूशलेम में, यहूदिया में रहते हुए, उन लोगों को, जो बाबुल में बन्दी और दबे हुए थे, यह चेतावनी और उपदेश भेजा। यदि पोप और उसके सब सेवकों का अत्याचार उनके लिए तीखा और क्रूर है, तो उन्हें सोचना चाहिए कि उस समय के यहूदी भी भारी और कड़वी दासता सहते थे, और फिर भी उन्हें उस देश की साधारण भाषा में कसदियों की मूर्तिपूजा को कोसने की आज्ञा दी गई है। यह उचित नहीं कि मनुष्यों का अत्याचार उस उचित आदर को, जो हम परमेश्वर के प्रति रखते हैं, तोड़े या तनिक भी घटाए। यहाँ कोई ऐसी छूट या विशेषाधिकार का बहाना नहीं जिसे ऊँचा या नीचा, धनी या निर्धन, अपने लिए हड़प सके या हड़पे। इसलिए सब मनुष्य अपनी गर्दन झुकाएँ और पूरी दीनता से अपने आप को परमेश्वर के अधीन करें। निर्धन मनुष्य में परमेश्वर का सच्चा भय हो, वह अस्थिरता से यह न कहे कि "मैं नहीं जानता कि क्या करूँ", ऐसा न हो कि परमेश्वर उसे उत्तर दे, "मैं भी नहीं जानता कि तेरे साथ क्या करूँ।" धनी और सम्पन्न लोग मतवाले आलसियों की नाईं अपनी सम्पत्ति में न सोएँ, और सब वस्तुओं की समृद्धि और बहुतायत में मानो किसी कुण्ड में न डूब जाएँ, वरन् सन्त पौलुस के उदाहरण के अनुसार वे यह सीखें कि उस सब को कूड़ा और हानि समझें जो हमें भक्ति और मसीही जीवन से खींचता है, या किसी रीति से हमारे लिए बाधा प्रतीत होता है। हम भी, जो यहाँ चैन और शान्ति से परमेश्वर के सबसे बड़े और अनुपम उपकारों का उपभोग करते हुए रहते हैं, उस बात को न भूलें जिसे मैंने आरम्भ में छुआ था, कि हम इन बातों को अपनी शिक्षा के लिए काम में लाएँ, ताकि आगे जो कुछ भी हम पर बीते, या जिस किसी देश में हम पहुँचाए जाएँ, तब भी हम अपने विश्वास के शुद्ध अंगीकार में सदा दृढ़ बने रहें,

सब मूर्तिपूजक धर्म, अन्धविश्वासों और कुरीतियों से घृणा करते हुए, जो परमेश्वर की सच्चाई के विरुद्ध हैं, उसके आदर को धुँधला करते हैं, और उसके धर्म को पूरी तरह उलट देते हैं।

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