भाग 2 (5 में से)

पचानवे स्थापनाएँ

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पचानवे स्थापनाएँ।

पचानवे स्थापनाएँ।

परिचयात्मक पत्र परिचयात्मक पत्र।

मसीह में परमादरणीय पिता और परम यशस्वी प्रभु अल्बर्ट के नाम, जो मैग्डेबर्ग और मेंज़ की कलीसियाओं के आर्चबिशप और प्राइमेट, तथा ब्रैंडेनबर्ग के मार्क्विस इत्यादि हैं, अपने स्वामी और मसीह में पास्टर, परम कृपालु और सब भय और आदर के सर्वथा योग्य—

परमेश्वर का अनुग्रह आपके साथ हो, और वह जो कुछ है और जो कुछ कर सकता है, वह भी।

हे मसीह में परमादरणीय पिता, परम यशस्वी राजकुमार, मुझे क्षमा करें, यदि मैं, जो मनुष्यता का निरा मैल हूँ, आपकी महिमामयी उच्चता को पत्र लिखने का साहस करने का विचार लेकर आया हूँ। प्रभु यीशु मेरे साक्षी हैं कि अपनी तुच्छता और नीचता का बोध रखते हुए मैंने बहुत समय तक इस काम को टाला, जिसे अब मैंने अपना माथा कठोर करके करने का साहस किया है, विशेष रूप से इस भाव से प्रेरित होकर कि मसीह में आपके परमादरणीय पितृत्व के प्रति मैं जो सच्चा कर्तव्य रखता हूँ, वह मुझ पर है। सो आपका महामहिम इस बीच अपनी दृष्टि धूल के एक कण पर डालने, और अपनी पोपीय करुणा में मेरी विनती को समझने की कृपा करें।

आपके परम प्रतिष्ठित अधिकार के अधीन सन्त पतरस के महागिरजाघर के निर्माण के लिए पोप के पाप-क्षमा-पत्र इधर-उधर फैलाए जा रहे हैं। इनके विषय में मैं उतना उन प्रचारकों की अतिशयोक्तिपूर्ण बातों पर दोष नहीं लगाता, जिन्हें मैंने स्वयं नहीं सुना, बल्कि मैं उन अत्यन्त झूठी धारणाओं पर शोक करता हूँ जो लोग उनसे ग्रहण करते हैं, और जो हर ओर सामान्य बातचीत में फैल रही हैं—अर्थात यह कि अभागी आत्माएँ यह विश्वास करती हैं कि यदि वे पाप-क्षमा-पत्र मोल लें, तो वे अपने उद्धार के विषय में निश्चिन्त हो जाती हैं; और यह भी, कि ज्योंही वे अपना दान पेटी में डालती हैं, त्योंही आत्माएँ शुद्धिकरण-स्थान से उड़ निकलती हैं; और आगे यह, कि इस प्रकार दिया गया अनुग्रह इतना बड़ा है कि ऐसा कोई पाप नहीं जो इतना बड़ा हो—यहाँ तक कि, जैसा वे कहते हैं, यदि कोई असम्भव रूप से परमेश्वर की माता को अपवित्र कर बैठे—कि वह क्षमा न किया जा सके; और फिर यह, कि इन पाप-क्षमा-पत्रों4 के द्वारा मनुष्य सब दण्ड और दोष से मुक्त हो जाता है।

हे कृपालु परमेश्वर! इसी प्रकार वे आत्माएँ, जो आपकी देखभाल को सौंपी गई हैं, हे परम उत्तम पिता, अपनी मृत्यु तक ऐसी ही शिक्षा पाती जा रही हैं, और वह अत्यन्त कठोर लेखा, जो आपको उन सबके लिये देना होगा, बढ़ता और बढ़ता ही जा रहा है। इसलिये मैं इस विषय में अब और चुप नहीं रह सका, क्योंकि बिशप के पद के किसी भी कार्य से मनुष्य उद्धार के विषय में निश्चिन्त नहीं हो सकता, क्योंकि वह उस अनुग्रह के द्वारा भी, जो परमेश्वर उसमें डालता है, निश्चिन्त नहीं होता, परन्तु प्रेरित हमें आज्ञा देता है कि हम भय और कँपकँपी के साथ अपने उद्धार को सिद्ध करते रहें (फिलिप्पियों 2:12)।

धर्मी मनुष्य भी—पतरस कहता है—कठिनता से ही उद्धार पाएगा (1 पतरस 4:18)। सारांश यह कि जीवन की ओर ले जानेवाला मार्ग इतना सँकरा है, कि प्रभु, भविष्यद्वक्ता आमोस और जकर्याह के मुख से बोलते हुए, उद्धार पानेवालों को आग में से निकाली हुई लुकटी कहते हैं, और हमारा प्रभु सर्वत्र उद्धार की कठिनता को प्रगट करता है।

तो फिर इन झूठी कहानियों और क्षमा की प्रतिज्ञाओं के द्वारा उनके प्रचारक लोगों को निश्चिन्त और निर्भय क्यों बनाते हैं? क्योंकि पाप-क्षमा-पत्र आत्माओं को उद्धार या पवित्रता के विषय में बिलकुल कोई लाभ नहीं देते, वरन केवल उस बाहरी दण्ड को हटाते हैं, जो पूर्वकाल में कलीसियाई विधि के अनुसार लगाया जाता था।

परिचयात्मक पत्र अन्त में, भक्ति और दान के काम पाप-क्षमा-पत्रों से अनन्त गुणा उत्तम हैं, फिर भी वे इनका प्रचार उतने आडम्बर या उत्साह से नहीं करते; वरन क्षमा-पत्रों के प्रचार के लिये वे इनके विषय में चुप रहते हैं। तौभी सब बिशपों का पहला और एकमात्र कर्तव्य यही है कि लोग सुसमाचार और मसीही दान सीखें: क्योंकि मसीह ने कहीं भी यह आज्ञा नहीं दी कि पाप-क्षमा-पत्रों का प्रचार किया जाए। तब यह कैसी भयानक बात है, बिशप के लिये कैसा संकट है, कि यदि सुसमाचार को चुपचाप छोड़ दिया जाए, और वह अपने लोगों में पाप-क्षमा-पत्रों की कोलाहलपूर्ण पुकार के सिवाय और कुछ फैलने न दे, और इन पर सुसमाचार से अधिक ध्यान दे!

क्या मसीह उनसे न कहेगा: “मच्छर को छानते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो”?

इन सबके अतिरिक्त, हे प्रभु में परमादरणीय पिता, आयुक्तों के लिये उस निर्देश में, जो आपके परमादरणीय पितृत्व के नाम से प्रकाशित हुआ है, यह कहा गया है—निःसन्देह आपके परमादरणीय पितृत्व की जानकारी और सम्मति के बिना—कि पाप-क्षमा-पत्रों के द्वारा दिये गए मुख्य अनुग्रहों में से एक वह अमूल्य दान है 5

परमेश्वर का, जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर से मेल कर लेता है, और शुद्धिकरण-स्थान की सब पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं; और आगे यह, कि जो लोग इस प्रकार आत्माओं को छुड़ाते हैं या पापस्वीकार के लाइसेंस मोल लेते हैं, उनके लिये अनुताप आवश्यक नहीं है।

परन्तु हे परम उत्तम प्राइमेट और परम यशस्वी राजकुमार, मैं और क्या कर सकता हूँ, सिवाय इसके कि मैं प्रभु यीशु मसीह के द्वारा आपके आदरणीय पितृत्व से विनती करूँ कि आप हम पर पितृतुल्य देखभाल की दृष्टि डालने, और उस विज्ञापन को पूर्णतः रोकने, और क्षमा-पत्रों के प्रचारकों पर प्रचार का कोई और ढंग लागू करने की कृपा करें, कहीं ऐसा न हो कि अन्ततः कोई ऐसा उठ खड़ा हो जो इनके और इनके विज्ञापनों के खण्डन में लेख प्रकाशित करे, जिससे आपकी परम यशस्वी महिमा की गहरी निन्दा हो। यह होना मुझे अत्यन्त घृणित प्रतीत होता है, फिर भी मुझे भय है कि यह हो कर रहेगा, जब तक कि इस बुराई का शीघ्र उपचार न किया जाए।

अपने विनम्र कर्तव्य के इस सच्चे निर्वाह को मैं विनती करता हूँ कि आपकी परम यशस्वी अनुकम्पा राजकुमार और बिशप के योग्य भाव से—अर्थात सम्पूर्ण करुणा के साथ—ग्रहण करने की कृपा करे, जैसा कि मैं इसे अत्यन्त सच्चे हृदय से, और आपके परमादरणीय पितृत्व के प्रति अत्यन्त समर्पित होकर भेंट करता हूँ, क्योंकि मैं भी आपकी भेड़शाला का भाग हूँ। प्रभु यीशु आपके परमादरणीय पितृत्व की सदा सर्वदा रक्षा करे। आमीन।

विटेनबर्ग से, सन् 1517 में सर्वसंतों के पर्व की पूर्वसंध्या को।

यदि आपके परमादरणीय पितृत्व को यह अच्छा लगे, तो आप इन वाद-विवाद-विषयों को देख सकते हैं, जिससे आप जान सकें कि पाप-क्षमा-पत्रों के विषय में वह धारणा, जिसे वे मानो अत्यन्त निश्चित हो, ऐसा फैलाते हैं, कितनी संदिग्ध बात है।

आपके परमादरणीय पितृत्व के लिये।

पश्चाताप और पाप-क्षमा-पत्रों के विषय में डॉ. मार्टिन लूथर की वाद-विवाद-चर्चा।

पश्चाताप और पाप-क्षमा-पत्रों के विषय में डॉ. मार्टिन लूथर की वाद-विवाद-चर्चा।

सत्य को स्पष्ट करने की अभिलाषा रखते हुए और उसी उद्देश्य से, नीचे लिखी हुई स्थापनाओं के विषय में विटेनबर्ग नगर में एक सार्वजनिक वाद-विवाद-चर्चा आयोजित की जाएगी, जिसकी अध्यक्षता आदरणीय

पिता मार्टिन लूथर, जो सन्त आगस्टीन के धर्मसंघ के भिक्षु, कला और पवित्र धर्मविज्ञान के मास्टर, तथा वहाँ उसी विषय के नियमित प्राध्यापक हैं, की अध्यक्षता में एक वाद-विवाद होगा। अतः वे उन लोगों से, जो उपस्थित होकर हमारे साथ इस विषय पर मौखिक चर्चा नहीं कर सकते, यह विनती करते हैं कि वे अपनी अनुपस्थिति में पत्र के द्वारा ऐसा करें। हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में। आमीन।

1. हमारे प्रभु और स्वामी यीशु मसीह ने यह कहते हुए: “पश्चाताप करो,”1 इत्यादि, यह अभिप्राय रखा कि विश्वासियों का सम्पूर्ण जीवन पश्चाताप ही हो।

2. इस वचन को पश्चाताप-संस्कार के अर्थ में नहीं समझा जा सकता, अर्थात उस अंगीकार और प्रायश्चित-कर्म के अर्थ में, जो याजकों की सेवकाई के अधीन किए जाते हैं।

3. तौभी, यह केवल भीतरी पश्चाताप ही की ओर संकेत नहीं करता; वरन ऐसा भीतरी पश्चाताप व्यर्थ है, जब तक कि वह बाहरी रूप से देह के विविध दमन उत्पन्न न करे।

4. इस प्रकार यह दण्ड2 तब तक बना रहता है जब तक आत्म-घृणा—अर्थात सच्चा भीतरी पश्चाताप—बना रहता है; अर्थात स्वर्ग के राज्य में हमारे प्रवेश तक।

5. पोप के पास न तो इच्छा है और न सामर्थ्य कि वह किसी भी दण्ड को क्षमा करे, सिवाय उनके जो उसने अपने ही अधिकार से, या कलीसियाई विधि के अधिकार से लगाए हैं।

6. पोप के पास किसी भी दोष को क्षमा करने का सामर्थ्य नहीं है, सिवाय इसके कि वह यह घोषित और आश्वासित करे कि वह परमेश्वर के द्वारा क्षमा किया जा चुका है; या अधिक से अधिक अपने लिये सुरक्षित रखे गए मामलों को क्षमा करके; जिन मामलों में, यदि उसके अधिकार का तिरस्कार किया जाए, तो दोष निश्चय ही बना रहेगा।

7. परमेश्वर किसी भी मनुष्य के दोष को कभी क्षमा नहीं करता, बिना इसके कि वह साथ ही साथ उसे, सब बातों में नम्र बनाकर, अपने प्रतिनिधि याजक के अधिकार के अधीन कर दे।

8. पश्चाताप की विधियाँ केवल जीवितों पर ही लगाई जाती हैं, और उनके अनुसार मरनेवालों पर कोई बोझ नहीं डाला जाना चाहिए। 7

9. इसलिये पवित्र आत्मा, जो पोप में कार्य करता है, हमारे लिये भला करता है, इसमें कि वह अपने आदेशों में मृत्यु और अनिवार्यता की दशा को सदैव अपवाद मानकर छोड़ देता है।

10. वे याजक गलत और अज्ञानतापूर्वक काम करते हैं, जो मरनेवालों के मामले में, विधि-सम्मत दण्डों को शुद्धिकरण-स्थान के लिये सुरक्षित रखते हैं।

11. विधि-सम्मत दण्ड को शुद्धिकरण-स्थान के दण्ड में बदलने के विषय में वे जंगली बीज निश्चय ही उस समय बोए गए प्रतीत होते हैं जब बिशप सोए हुए थे।

12. पूर्वकाल में विधि-सम्मत दण्ड पापमोचन के बाद नहीं, वरन पहले लगाए जाते थे, सच्चे अनुताप की परीक्षा के रूप में।

1 लातीनी में, वुल्गेट से, “agite pœnitentiam,” जिसका अनुवाद कभी-कभी “पश्चाताप करो” किया जाता है। आगे की स्थापनाओं का प्रभाव कुछ सीमा तक “pœnitentia” शब्द के दोहरे अर्थ—पश्चाताप (भीतरी भाव) और पश्चाताप-संस्कार (बाहरी कृत्य)—पर निर्भर करता है।

2 अर्थात “Pœna” (दण्ड), और “pœna” व “pœnitentia” के बीच का सम्बन्ध यहाँ भी सूचक है।

पश्चाताप और पाप-क्षमा-पत्रों के विषय में डॉ. मार्टिन लूथर की वाद-विवाद-चर्चा।

13. मरनेवाले मृत्यु के द्वारा सब दण्ड चुका देते हैं, और कलीसियाई विधियों के लिये पहले से ही मृत हैं, और अधिकारपूर्वक उनसे मुक्त हैं।

14. मरनेवाले व्यक्ति की अपूर्ण स्वस्थता या दान अनिवार्य रूप से अपने साथ बड़ा भय लाती है, और यह जितनी कम होती है, उतना ही अधिक भय लाती है।

15. यह भय और आतंक अकेला ही, अन्य बातों की तो बात ही छोड़िए, शुद्धिकरण-स्थान की पीड़ाओं के लिये पर्याप्त है, क्योंकि यह निराशा के आतंक के अत्यन्त निकट है।

16. नरक, शुद्धिकरण-स्थान, और स्वर्ग में वैसा ही अन्तर प्रतीत होता है, जैसा निराशा, लगभग-निराशा, और मन की शान्ति में होता है।

17. शुद्धिकरण-स्थान की आत्माओं के साथ ऐसा प्रतीत होता है कि यह अवश्यम्भावी है कि जैसे-जैसे आतंक घटता है, वैसे-वैसे दान बढ़ता है।

18. न ही यह किसी तर्क या किसी पवित्रशास्त्र से सिद्ध होता प्रतीत होता है कि वे पुण्य की अवस्था या दान की वृद्धि से बाहर हैं।

19. न ही यह सिद्ध होता प्रतीत होता है, कि वे अपने धन्यपन के विषय में निश्चित और आश्वस्त हैं, कम से कम वे सब, यद्यपि हम स्वयं इसके विषय में अत्यन्त निश्चित हो सकते हैं।

20. इसलिये पोप, जब वह सब दण्डों के पूर्ण मोचन की बात करता है, तो उसका अर्थ सचमुच सब दण्डों से नहीं, वरन केवल उन दण्डों से है जो उसने स्वयं लगाए हैं।

21. इस प्रकार पाप-क्षमा-पत्रों के वे प्रचारक भूल में हैं, जो कहते हैं कि पोप के पाप-क्षमा-पत्रों के द्वारा मनुष्य सब दण्ड से मुक्त और बचाया जाता है।

22. क्योंकि वास्तव में वह शुद्धिकरण-स्थान की आत्माओं को ऐसा कोई दण्ड क्षमा नहीं करता, जिसे उन्हें विधियों के अनुसार इसी जीवन में चुकाना पड़ता। 8

23. यदि किसी को सब दण्डों का सम्पूर्ण मोचन दिया जा सकता है, तो निश्चय है कि यह केवल परम सिद्ध लोगों को ही दिया जाता है, अर्थात बहुत थोड़े लोगों को।

24. इसलिये अधिकांश लोग दण्ड से मुक्ति की इस अभेदपूर्ण और ऊँची-ऊँची प्रतिज्ञा के द्वारा अवश्य ही धोखा खाते हैं।

25. जैसा अधिकार पोप को सामान्यतः शुद्धिकरण-स्थान पर है, वैसा ही अधिकार हर बिशप को अपने धर्मप्रान्त में, और हर पल्ली-पुरोहित को अपनी पल्ली में, विशेष रूप से प्राप्त है।

26. पोप आत्माओं को मोचन देने में सबसे उचित कार्य तब करता है, जब वह कुंजियों के अधिकार से नहीं (जो इस मामले में कुछ काम नहीं आता) वरन मध्यस्थ-प्रार्थना के मार्ग से ऐसा करता है।

27. वे मनुष्य की बात प्रचार करते हैं, जो कहते हैं कि ज्योंही पेटी में डाला हुआ धन खनकता है, त्योंही आत्मा शुद्धिकरण-स्थान से उड़ निकलती है।

28. यह निश्चित है कि जब पेटी में धन खनकता है, तो लोभ और लाभ बढ़ सकते हैं, परन्तु कलीसिया की मध्यस्थ-प्रार्थना केवल परमेश्वर की इच्छा पर निर्भर करती है।

29. कौन जानता है कि क्या शुद्धिकरण-स्थान की सब आत्माएँ उससे छुड़ाई जाना चाहती भी हैं, जैसा कि सन्त सेवेरिनुस और पास्कल के विषय में कही गई कथा से प्रतीत होता है।

30. कोई भी मनुष्य अपने अनुताप की वास्तविकता के विषय में निश्चित नहीं है, पूर्ण मोचन की प्राप्ति के विषय में तो और भी कम।

31. जितना दुर्लभ एक सच्चा पश्चातापी है, उतना ही दुर्लभ है वह जो सचमुच पाप-क्षमा-पत्र मोल लेता है—अर्थात अत्यन्त दुर्लभ।

पश्चाताप और पाप-क्षमा-पत्रों के विषय में डॉ. मार्टिन लूथर की वाद-विवाद-चर्चा।

32. जो लोग यह विश्वास करते हैं कि क्षमा-पत्रों के द्वारा वे अपने उद्धार के विषय में निश्चिन्त हो गए हैं, वे अपने शिक्षकों के साथ अनन्तकाल के लिये दण्डित होंगे।

33. हमें विशेष रूप से उन लोगों से सावधान रहना चाहिए, जो कहते हैं कि पोप के ये क्षमा-पत्र वह अमूल्य दान हैं, जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर से मेल कर लेता है।

34. क्योंकि इन क्षमा-पत्रों के द्वारा दिया गया अनुग्रह केवल संस्कारगत प्रायश्चित-कर्म के दण्डों से सम्बन्ध रखता है, जो मानवीय नियुक्ति के हैं।

35. वे कोई मसीही सिद्धान्त नहीं सिखाते, जो यह सिखाते हैं कि जो लोग शुद्धिकरण-स्थान से आत्माओं को मोल लेते हैं या पापस्वीकार के लाइसेंस मोल लेते हैं, उनके लिये अनुताप आवश्यक नहीं है।

36. हर मसीही, जो सच्चा अनुताप अनुभव करता है, उसे बिना क्षमा-पत्रों के भी, अधिकारपूर्वक दण्ड और दोष का पूर्ण मोचन प्राप्त है। 9

37. हर सच्चा मसीही, चाहे जीवित हो या मृत, मसीह और कलीसिया के उन सब लाभों में भागी है, जो परमेश्वर ने उसे दिए हैं, बिना क्षमा-पत्रों के भी।

38. तौभी, पोप के द्वारा दिया गया मोचन किसी भी रीति से तुच्छ नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि यह, जैसा मैं कह चुका हूँ, ईश्वरीय मोचन की घोषणा है।

39. यह अत्यन्त कठिन बात है, यहाँ तक कि परम विद्वान धर्मविज्ञानियों के लिये भी, कि वे लोगों की दृष्टि में एक साथ क्षमा-पत्रों के व्यापक प्रभाव और सच्चे अनुताप की आवश्यकता, दोनों को ऊँचा उठाएँ।

40. सच्चा अनुताप दण्ड को ढूँढ़ता और उससे प्रेम रखता है; जबकि क्षमा-पत्रों की व्यापकता उसे शिथिल कर देती है, और मनुष्यों को उससे घृणा करने का कारण देती है, या कम से कम इसका अवसर देती है।

41. प्रेरितिक क्षमा-पत्रों का प्रचार सावधानी से किया जाना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि लोग झूठा यह मान बैठें कि इन्हें दान के अन्य भले कामों से ऊपर रखा गया है।

42. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि पोप का यह मन्तव्य नहीं है कि क्षमा-पत्रों को मोल लेना किसी भी रीति से दया के कामों के तुल्य समझा जाए।

43. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि जो कंगाल को देता है, या दरिद्र को उधार देता है, वह उससे भला काम करता है जो क्षमा-पत्र मोल लेता है।

44. क्योंकि दान के काम से दान बढ़ता है, और मनुष्य उत्तम बनता है; जबकि क्षमा-पत्रों के द्वारा वह उत्तम नहीं बनता, वरन केवल दण्ड से अधिक स्वतंत्र होता है।

45. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि जो किसी को आवश्यकता में देखकर उसे टाल देता है, और क्षमा-पत्रों के लिये धन देता है, वह अपने लिये पोप के पाप-क्षमा-पत्र नहीं, वरन परमेश्वर का क्रोध मोल ले रहा है।

46. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि जब तक उनके पास आवश्यकता से अधिक धन न हो, वे अपने घराने के उपयोग के लिये आवश्यक वस्तु को रखने के लिये बाध्य हैं, और उसे किसी भी रीति से क्षमा-पत्रों पर उड़ाना नहीं चाहिए।

47. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि यद्यपि वे क्षमा-पत्र मोल लेने के लिये स्वतंत्र हैं, तौभी उन्हें ऐसा करने की आज्ञा नहीं दी गई है।

48. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि पोप को, क्षमा-पत्र देने में, यह अधिक आवश्यकता और अधिक इच्छा है कि उसके लिये भक्तिपूर्ण प्रार्थना की जाए, न कि यह कि धन तुरन्त चुकाया जाए।

पश्चाताप और पाप-क्षमा-पत्रों के विषय में डॉ. मार्टिन लूथर की वाद-विवाद-चर्चा।

49. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि पोप के क्षमा-पत्र लाभदायक हैं, यदि वे उन पर भरोसा न रखें, परन्तु अत्यन्त हानिकारक हैं, यदि उनके द्वारा वे परमेश्वर का भय खो बैठें। 10

50. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि यदि पोप को क्षमा-पत्रों के प्रचारकों की अनुचित उगाहियों का ज्ञान होता, तो वह यही पसन्द करता कि सन्त पतरस का महागिरजाघर जलकर राख हो जाए, बजाय इसके कि वह अपनी भेड़ों की खाल, माँस, और हड्डियों से बनाया जाए।

51. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि जैसा यह पोप का कर्तव्य होता, वैसा ही यह उसकी इच्छा भी होती, कि यदि आवश्यक हो तो वह सन्त पतरस के महागिरजाघर को भी बेच दे, और अपने ही धन में से उन बहुतों को दे, जिनसे क्षमा-पत्रों के प्रचारक धन ऐंठते हैं।

52. क्षमा-पत्रों के द्वारा उद्धार की आशा व्यर्थ है, यहाँ तक कि यदि कोई आयुक्त—वरन पोप स्वयं—उनके लिये अपने ही प्राण की प्रतिज्ञा भी क्यों न करे।

53. वे मसीह और पोप दोनों के शत्रु हैं, जो, क्षमा-पत्रों के प्रचार के लिये, अन्य कलीसियाओं में परमेश्वर के वचन को सम्पूर्ण मौन का दण्ड देते हैं।

54. परमेश्वर के वचन के साथ अन्याय किया जाता है, जब उसी उपदेश में, उस पर दिए गए समय के बराबर या उससे अधिक समय क्षमा-पत्रों पर व्यय किया जाता है।

55. पोप का मन्तव्य अनिवार्य रूप से यह है कि यदि क्षमा-पत्र, जो अत्यन्त छोटी बात हैं, एक घंटी, एक जुलूस, और एक समारोह से मनाए जाते हैं, तो सुसमाचार, जो अत्यन्त बड़ी बात है, सौ घंटियों, सौ जुलूसों, और सौ समारोहों के साथ प्रचारित किया जाना चाहिए।

56. कलीसिया के पुण्य-भण्डार, जिनसे पोप पाप-क्षमा-पत्र प्रदान करता है, मसीह के लोगों के बीच न तो पर्याप्त रूप से नामित हैं, न ही जाने गए हैं।

57. यह स्पष्ट है कि वे कम से कम सांसारिक भण्डार तो नहीं हैं, क्योंकि इन्हें बहुत से प्रचारक इतनी सरलता से नहीं लुटाते, वरन केवल संचित करते हैं।

58. न ही वे मसीह और पवित्र लोगों के पुण्य हैं, क्योंकि ये, पोप से स्वतंत्र होकर, सदैव भीतरी मनुष्य के लिये अनुग्रह, और बाहरी मनुष्य के लिये क्रूस, मृत्यु, और नरक उत्पन्न करते रहते हैं।

59. सन्त लॉरेंस ने कहा कि कलीसिया के भण्डार कलीसिया के कंगाल लोग हैं, परन्तु उसने अपने समय में प्रचलित शब्द-प्रयोग के अनुसार यह कहा।

60. हम उतावलेपन से नहीं कह रहे, जब हम कहते हैं कि कलीसिया की कुंजियाँ, जो मसीह के पुण्य के द्वारा दी गई हैं, वही भण्डार हैं। 11

61. क्योंकि यह स्पष्ट है कि दण्डों और सुरक्षित मामलों के मोचन के लिये पोप का अधिकार अकेला ही पर्याप्त है।

62. कलीसिया का सच्चा भण्डार परमेश्वर की महिमा और अनुग्रह का पवित्र सुसमाचार है।

63. तौभी यह भण्डार यथोचित रूप से अत्यन्त घृणित है, क्योंकि यह पहलों को अन्तिम बना देता है।

64. जबकि पाप-क्षमा-पत्रों का भण्डार यथोचित रूप से अत्यन्त ग्राह्य है, क्योंकि यह अन्तिमों को पहला बना देता है।

65. इसलिये सुसमाचार के भण्डार वे जाल हैं, जिनसे पूर्वकाल में धनवान मनुष्यों को पकड़ा जाता था।

पश्चाताप और पाप-क्षमा-पत्रों के विषय में डॉ. मार्टिन लूथर की वाद-विवाद-चर्चा।

66. पाप-क्षमा-पत्रों के भण्डार वे जाल हैं, जिनसे अब मनुष्यों के धन को पकड़ा जाता है।

67. वे पाप-क्षमा-पत्र, जिन्हें प्रचारक ऊँचे स्वर से सबसे बड़े अनुग्रह घोषित करते हैं, लाभ की वृद्धि के विषय में सचमुच वैसे ही देखे जाते हैं।

68. फिर भी वास्तव में उनकी तुलना परमेश्वर के अनुग्रह और क्रूस की भक्ति से किसी भी रीति से नहीं की जा सकती।

69. बिशप और पल्ली-पुरोहित प्रेरितिक क्षमा-पत्रों के आयुक्तों को सम्पूर्ण आदर के साथ ग्रहण करने के लिये बाध्य हैं।

70. परन्तु वे इससे भी अधिक इस बात के लिये बाध्य हैं कि वे अपनी सब आँखों से देखें, और अपने सब कानों से सावधान रहें, कि ये लोग पोप के आदेश के स्थान पर अपने ही स्वप्न न प्रचारित करें।

71. जो प्रेरितिक क्षमा-पत्रों की सच्चाई के विरुद्ध बोलता है, वह अभिशप्त और शापित हो।

72. परन्तु दूसरी ओर, जो क्षमा-पत्रों के प्रचारकों की उच्छृंखलता और वाणी की स्वच्छन्दता के विरुद्ध परिश्रम करता है, वह धन्य हो।

73. जिस प्रकार पोप उचित रूप से उन लोगों के विरुद्ध गरजता है, जो क्षमा-पत्रों के व्यापार की हानि के लिये किसी भी प्रकार की युक्ति काम में लाते हैं, 74. उससे कहीं अधिक उसका अभिप्राय उन लोगों के विरुद्ध गरजना है, जो क्षमा-पत्रों की आड़ में, पवित्र दान और सत्य की हानि के लिये युक्तियाँ काम में लाते हैं।

75. यह सोचना कि पोप के क्षमा-पत्रों में इतना सामर्थ्य है कि यदि—असम्भव रूप से—किसी मनुष्य ने परमेश्वर की माता को अपवित्र कर दिया हो, तो भी वे उसे पापमोचन दे सकते हैं, पागलपन है।

76. इसके विपरीत हम यह पुष्टि करते हैं कि पोप के क्षमा-पत्र सबसे छोटे क्षम्य पाप के दोष को भी दूर नहीं कर सकते।

77. यह कहावत, कि यदि सन्त पतरस अभी पोप होते, तो भी वे इससे बड़ा कोई अनुग्रह न दे पाते, सन्त पतरस और पोप दोनों के विरुद्ध निन्दा है। 12

78. इसके विपरीत हम यह पुष्टि करते हैं कि वे और कोई भी अन्य पोप इससे बड़े अनुग्रह देने में समर्थ हैं, अर्थात सुसमाचार, सामर्थ्य, चंगाई के वरदान, इत्यादि (1 कुरिन्थियों 12:9)।

79. यह कहना कि पोप के राजचिन्हों में स्थापित क्रूस, मसीह के क्रूस के समान सामर्थ्य रखता है, निन्दा है।

80. वे बिशप, पल्ली-पुरोहित, और धर्मविज्ञानी, जो ऐसे प्रवचनों को लोगों के बीच प्रचलित होने देते हैं, उन्हें लेखा देना होगा।

81. क्षमा-पत्रों के प्रचार में यह स्वच्छन्दता विद्वान पुरुषों के लिये भी यह सरल नहीं बनाती कि वे पोप के प्रति उचित आदर की रक्षा साधारण लोगों की निन्दाओं से, या कम से कम उनके तीखे प्रश्नों से, कर सकें।

82. उदाहरण के लिये:—पोप परम पवित्र दान और आत्माओं की परम आवश्यकता के लिये—जो सब कारणों में सबसे न्यायसंगत है—शुद्धिकरण-स्थान को खाली क्यों नहीं कर देता, यदि वह उस अत्यन्त घातक वस्तु धन के लिये, जो एक महागिरजाघर के निर्माण पर व्यय की जानी है—जो एक अत्यन्त तुच्छ कारण है—अनगिनत आत्माओं को छुड़ाता है?

पश्चाताप और पाप-क्षमा-पत्रों के विषय में डॉ. मार्टिन लूथर की वाद-विवाद-चर्चा।

83. फिर; मृतकों के लिये अन्त्येष्टि मिस्सा और वार्षिक मिस्सा क्यों जारी रहते हैं, और पोप इस उद्देश्य के लिये दान की गई निधियों को क्यों नहीं लौटा देता, या उन्हें वापस लेने की अनुमति क्यों नहीं देता, जबकि जो पहले ही छुड़ाए जा चुके हैं, उनके लिये प्रार्थना करना एक अन्याय है?

84. फिर; परमेश्वर और पोप की यह कैसी नई कृपा है, कि धन के लिये वे एक भक्तिहीन और परमेश्वर के शत्रु मनुष्य को एक भक्त आत्मा को, जो परमेश्वर से प्रेम रखती है, छुड़ाने की अनुमति देते हैं, फिर भी उसी भक्त और प्रिय आत्मा को उसकी अपनी आवश्यकता के कारण, सेंत-मेंत के दान से नहीं छुड़ाते?

85. फिर; ऐसा क्यों है कि पश्चाताप की विधियाँ, जो वास्तव में और न केवल प्रचलन में बहुत पहले ही रद्द और मृत हो चुकी हैं, तौभी अब भी पाप-क्षमा-पत्रों के दान के द्वारा धन से मानो वे जीवन से भरपूर हों, इस प्रकार चुकाई जाती हैं?

86. फिर; पोप, जिसका धन आज के दिन धनवानों में भी सबसे धनवान से अधिक विशाल है, सन्त पतरस के उस एक महागिरजाघर को अपने ही धन से क्यों नहीं बनवाता, बजाय कंगाल विश्वासियों के धन से?

87. फिर; पोप उन लोगों को क्या क्षमा करता या प्रदान करता है, जिन्हें सिद्ध अनुताप के द्वारा पूर्ण मोचन और सहभागिता का अधिकार पहले से ही प्राप्त है? 18

88. फिर; कलीसिया को इससे और क्या बड़ा लाभ होगा, यदि पोप, जैसा वह अभी एक बार करता है, इसके स्थान पर किसी एक विश्वासी को दिन में सौ बार ये मोचन और सहभागिताएँ प्रदान करने लगे?

89. चूँकि पोप अपने क्षमा-पत्रों के द्वारा धन की अपेक्षा आत्माओं का उद्धार ही ढूँढ़ता है, तो वह बहुत पहले दिए गए पत्रों और क्षमा-पत्रों को स्थगित क्यों कर देता है, जबकि वे समान रूप से प्रभावशाली हैं।

90. साधारण लोगों की इन शंकाओं और तर्कों को केवल बल के द्वारा दबाना, और कारण बताकर उनका समाधान न करना, कलीसिया और पोप को उनके शत्रुओं की हँसी के लिये खुला छोड़ देना है, और मसीही मनुष्यों को दुःखी बनाना है।

91. यदि तब क्षमा-पत्रों का प्रचार पोप की आत्मा और मन्तव्य के अनुसार किया जाता, तो ये सब प्रश्न सरलता से सुलझ जाते; वरन उठते ही नहीं।

92. दूर हों तब वे सब भविष्यद्वक्ता, जो मसीह के लोगों से कहते हैं: “शान्ति, शान्ति,” जबकि शान्ति है ही नहीं।

93. धन्य हों वे सब भविष्यद्वक्ता, जो मसीह के लोगों से कहते हैं: “क्रूस, क्रूस,” जबकि क्रूस है ही नहीं।

94. मसीहियों को उत्साहित किया जाना चाहिए कि वे दण्डों, मृत्युओं, और नरकों के बीच से होकर अपने शिरोमणि मसीह का अनुसरण करने का प्रयत्न करें।

95. और इस प्रकार शान्ति की सुरक्षा में नहीं, वरन अनेक क्लेशों में से होकर स्वर्ग में प्रवेश करने का भरोसा रखें।

मैं, मार्टिन लूथर, डॉक्टर, विटेनबर्ग के भिक्षु-धर्मसंघ का सदस्य, यह सार्वजनिक रूप से गवाही देना चाहता हूँ कि पोपीय पाप-क्षमा-पत्रों के विरुद्ध, जैसा वे उन्हें कहते हैं, कुछ स्थापनाएँ मेरे द्वारा प्रस्तुत की गई हैं। अब यद्यपि, अब तक, न तो हमारे इस परम प्रसिद्ध और यशस्वी विद्यालय ने, न ही किसी सांसारिक या कलीसियाई सत्ता ने मुझे दोषी ठहराया है, फिर भी, जैसा मैं सुनता हूँ, कुछ उतावले और ढीठ स्वभाव के मनुष्य हैं, जो मुझे विधर्मी घोषित करने का साहस करते हैं, मानो इस मामले की पूरी तरह जाँच और अध्ययन किया जा चुका हो। परन्तु मेरी ओर से, जैसा मैं पहले भी अनेक बार कर चुका हूँ, वैसे ही अब भी मैं मसीह के विश्वास के द्वारा सब मनुष्यों से विनती करता हूँ, कि यदि किसी को दैवीय रूप से कोई उत्तम मार्ग प्रगट किया गया हो, तो वे मुझे वह मार्ग दिखाएँ, या कम से कम अपनी सम्मति को परमेश्वर और कलीसिया के न्याय के अधीन कर दें। क्योंकि मैं न तो इतना उतावला हूँ कि यह चाहूँ कि मेरी अकेली सम्मति को सब अन्य मनुष्यों की सम्मति से अधिक माना जाए, और न ही इतना निर्बुद्धि हूँ कि यह चाहूँ कि परमेश्वर का वचन मानवीय तर्क से गढ़ी गई कथाओं को अपना स्थान दे दे। 14

डॉ. मार्टिन लूथर के तीन प्रमुख ग्रन्थ।

डॉ. मार्टिन लूथर के तीन प्रमुख ग्रन्थ

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