अध्याय 5

कलीसिया को भ्रष्टता से शुद्ध करना

The Necessity of Reforming the Church · John Calvin

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कलीसिया को भ्रष्टता से शुद्ध करना

जो कुछ कहा जा चुका है, उससे आपके लिए यह समझना निस्सन्देह सरल होगा कि हमारे विरोधियों की निन्दा पर कितना कम ध्यान देना उचित है, जब वे हम पर अधर्मी धृष्टता और मानो अक्षम्य दुस्साहस का दोष लगाते हैं कि हमने रोमी पोप के संकेत की प्रतीक्षा किए बिना कलीसिया को उसकी शिक्षा और रीति-रिवाज़ों, दोनों की भ्रष्टता से शुद्ध करने का प्रयत्न किया। वे कहते हैं कि हमने वह किया है जिसका अधिकार साधारण व्यक्तियों को नहीं है। परन्तु कलीसिया की दशा सुधारने के विषय में, जिसके आगे हमसे झुक जाने को कहा जाता था, उससे क्या आशा की जा सकती थी? जो कोई यह विचार करे कि आरम्भ में लूथर और अन्य सुधारकों ने कैसा व्यवहार किया, और फिर वे आगे कैसे बढ़े, वह हमसे किसी सफ़ाई की माँग करना अनावश्यक समझेगा।

जब बातें अभी अछूती थीं, तब लूथर ने स्वयं नम्रतापूर्वक पोप से विनती की थी कि वह कृपा करके कलीसिया के अत्यन्त गम्भीर रोगों को दूर करे। क्या उसकी विनती सफल हुई? बुराइयाँ और बढ़ गईं; तब लूथर चुप भी रहता, तो भी परिस्थिति की आवश्यकता ही पोप को यह उकसाने के लिए पर्याप्त थी कि वह और विलम्ब न करे। सारा मसीही संसार स्पष्ट रीति से उससे यही माँग रहा था, और सब भक्तों की इच्छाएँ पूरी करने के साधन उसके हाथ में थे। क्या उसने ऐसा किया? अब वह बाधाओं की बात करता है। परन्तु यदि इस बात की जड़ तक पहुँचा जाए, तो पाया जाएगा कि आरम्भ से अब तक वह अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी अकेला ही बाधा रहा है। परन्तु इन हल्के तर्कों पर क्यों ज़ोर दें? क्या अपने आप में यही एक तर्क पर्याप्त स्पष्ट और पर्याप्त भारी नहीं कि आरम्भ से लेकर आज तक वह हमें अपने साथ किसी समझौते की कोई आशा नहीं देता, जब तक कि हम मसीह को फिर से गाड़ न दें, और उन सब अधर्मों में न लौट जाएँ जो पहले थे, ताकि वह उन्हें पहले से अधिक दृढ़ नींव पर स्थापित कर सके? निःसन्देह इसी कारण आज भी हमारे विरोधी इतने आग्रह से कहते हैं कि कलीसिया के पुनरुद्धार में हस्तक्षेप करने का हमें कोई अधिकार नहीं था—इसलिए नहीं कि वह कार्य आवश्यक नहीं था (इसे नकारना तो अति निराशाजनक निर्लज्जता होगी), परन्तु इसलिए कि वे चाहते हैं कि कलीसिया का कल्याण और उसका विनाश, दोनों रोमी पोप के केवल संकेत और इच्छा पर टिके रहें।

अब आइए उस एकमात्र उपाय पर ध्यान दें जो उन्होंने हमारे लिए छोड़ा है, जो यह समझते हैं कि कलीसिया चाहे कितनी ही बुराइयों से दबी हो, उँगली हिलाना भी अधर्म है। वे हमें सार्वभौमिक परिषद के भरोसे टालते हैं। क्या? यदि अधिकांश लोग हठ के कारण अपने ही विनाश की ओर दौड़ पड़ें, तो क्या हमें भी उनके साथ नष्ट हो जाना चाहिए, जबकि हमारे पास अपने उद्धार का उपाय करने के साधन हैं? परन्तु वे हमसे कहते हैं कि कलीसिया की एकता को भंग करना अनुचित है, और यदि कोई एक दल दूसरों को बुलाए बिना स्वयं ही विश्वास के किसी अंश का निर्णय कर ले, तो एकता भंग होती है। फिर वे उन असुविधाओं पर विस्तार से बोलते हैं जिनकी ओर ऐसा मार्ग ले जा सकता है—कि यदि हर जाति और हर राष्ट्र अपने लिए अपना ही विशेष विश्वास-रूप अपना ले, तो भयंकर उजाड़ और अव्यवस्थित गड़बड़ी के सिवा कुछ आशा नहीं की जा सकती। ऐसी बातें उचित रीति से, और अवसर के अनुकूल भी, तब कही जा सकती थीं जब कलीसिया का कोई एक अंग एकता को तुच्छ जानकर अपनी ही इच्छा से दूसरों से अलग हो जाता। परन्तु अब विवाद का विषय वह नहीं है। मैं चाहता हूँ कि मसीही संसार के सब राजा और राज्य एक पवित्र संघ में मिल सकें, और वर्तमान बुराइयों के एक साथ सुधार का संकल्प करें। परन्तु जब हम देखते हैं कि कुछ लोग सुधार के विरोधी हैं, और कुछ दूसरे युद्ध में फँसे हैं या अन्य चिन्ताओं में लगे हैं और इस विषय पर ध्यान नहीं दे सकते, तो कृपया बताइए, दूसरों की प्रतीक्षा करते हुए हम अपने लिए उपाय करना कब तक टालते रहें? और अपनी सब बुराइयों के मूल को और खुलकर कहूँ तो हम देखते हैं कि रोमी पोप, यदि उसका वश चले, तो कभी सब कलीसियाओं को एक होने नहीं देगा—उचित परामर्श के लिए तो क्या, किसी भी परिषद को बुलाने के लिए भी नहीं। जब भी उससे माँगा जाएगा वह प्रतिज्ञाएँ तो बहुत देगा, बशर्ते वह देखे कि सब मार्ग बन्द हैं और पहुँचने के सब रास्ते रुके हुए हैं, और उसके हाथ में ऐसी रुकावटें हैं जिन्हें वह बीच-बीच में डाल सकता है, ताकि टालमटोल के लिए बहानों की उसे कभी कमी न हो। थोड़े अपवादों को छोड़, सब कार्डिनल, बिशप और मठाधीश इस विषय में उससे सहमत हैं, क्योंकि उनकी एकमात्र चिन्ता यही है कि अपने हथियाए हुए अत्याचारी अधिकार को कैसे बनाए रखें। कलीसिया का कल्याण हो या विनाश, उन्हें इसकी तनिक भी चिन्ता नहीं।

परम अजेय कैसर, और परम प्रतापी राजकुमारो, मुझे यह भय नहीं कि मेरा कथन अविश्वसनीय लगेगा, या आपको इसकी सच्चाई का विश्वास दिलाना कठिन होगा। वरन् मैं आप सब के विवेक से पूछता हूँ कि क्या मैंने कुछ ऐसा कहा है जिसकी पुष्टि आपका अपना अनुभव नहीं करता। इस बीच कलीसिया अत्यन्त संकट में पड़ी है। असंख्य आत्माएँ, यह न जानते हुए कि किधर मुड़ें, दुखद रीति से उलझन में हैं; बहुत से तो मृत्यु से पहले ही घिरकर नष्ट हो जाते हैं, यदि प्रभु उन्हें आश्चर्यकर्म से न बचाए; भाँति-भाँति के पंथ उठ खड़े होते हैं; बहुत से लोग, जिनका अधर्म पहले छिपा था, वर्तमान मतभेदों से कुछ भी न मानने की छूट पा लेते हैं, और कई मन, जो अन्यथा बुरे नहीं थे, अपनी धार्मिक भावनाओं को छोड़ने लगते हैं। इन बुराइयों को रोकनेवाला कोई अनुशासन नहीं; हम में, जो केवल मसीह के नाम पर गर्व करते हैं और एक ही बपतिस्मा रखते हैं, उतनी भी एकता नहीं जितनी तब होती जब हम बिलकुल भिन्न धर्मों को मानते। और सबसे दयनीय बात यह है कि सारी कलीसिया का टूट बिखरना निकट है—लगभग आँखों के सामने है—और उसके हो जाने के बाद उसके उपाय ढूँढ़ना व्यर्थ होगा। इसलिए, जब कलीसिया की इस बड़ी विपत्ति और अत्यन्त संकट में उसकी सहायता करने में कोई शीघ्रता भी अधिक शीघ्र नहीं हो सकती, तो जो लोग हमें एक सार्वभौमिक परिषद के भरोसे टालते हैं, जिसकी कोई सम्भावना ही नहीं, वे परमेश्वर और मनुष्य दोनों का उपहास करने के सिवा और क्या करते हैं? इसलिए जर्मनों को यह दण्ड-वचन सहना होगा कि वे चुपचाप देखते रहना चाहते हैं कि परमेश्वर की कलीसिया उनके देश से नष्ट हो जाए, जबकि उसके रोगों को दूर करने के साधन उनके पास हैं; नहीं तो उन्हें तुरन्त इस कार्य में जुट जाना होगा। यह दूसरा विकल्प वे इतनी शीघ्रता से कभी न अपनाएँगे कि अब भी इस बात के लिए उचित रूप से दोषी न ठहराए जाएँ कि उन्होंने इसे और पहले क्यों नहीं अपनाया। परन्तु वे लोग, जो कोई भी हों, जो सार्वभौमिक परिषद के बहाने से विलम्ब डालते हैं, स्पष्ट है कि उनका और कोई उद्देश्य नहीं सिवाय इसके कि इस चाल से समय खींचते जाएँ, और उनकी बात सुनी जाने योग्य उतनी ही कम है जितनी तब होती जब वे वचन से मान लेते कि वे अपने निजी लाभ को कलीसिया के विनाश की कीमत पर खरीदने को तैयार हैं, जो वे कर्म से दिखा ही रहे हैं।

परन्तु कहा जाता है कि केवल जर्मनों का यह सुधार अपने हाथ में लेना अभूतपूर्व होगा; कि जब कभी धर्म के सिद्धान्तों पर विवाद उठा, तो कभी सुना नहीं गया कि कोई अकेला प्रान्त उसकी जाँच और निर्णय का काम अपने हाथ में ले ले। यह मैं क्या सुन रहा हूँ? क्या वे समझते हैं कि केवल अपने कथन से वे संसार को उस बात का विश्वास दिला देंगे जिसका खण्डन सब युगों का इतिहास करता है? जब-जब कोई नया पाखण्ड उठा, या कलीसिया किसी विवाद से अशान्त हुई, तब क्या यह सामान्य रीति नहीं थी कि तुरन्त प्रान्तीय धर्मसभा बुलाई जाए, ताकि उस उपद्रव का अन्त हो? सार्वभौमिक परिषद की शरण में जाना कभी रीति नहीं रही, जब तक दूसरा उपाय आज़मा न लिया गया हो। इससे पहले कि सारे मसीही संसार के बिशप आरियस का खण्डन करने नीकिया में एकत्र होते, पूर्व में इसी उद्देश्य से कई धर्मसभाएँ हो चुकी थीं। संक्षेप के लिए मैं अन्य उदाहरण छोड़ता हूँ, परन्तु जिस बात से हमारे शत्रु अनोखी समझकर बचते हैं, वह प्राचीन लेखकों के लेखों से साधारण प्रथा प्रमाणित होती है। अतः नवीनता के इस झूठे बहाने को छोड़ो।

यदि यह अन्धविश्वासी विचार अफ्रीका के बिशपों पर हावी होता, तो वे दोनातवादियों और पेलागियसवादियों का सामना करने में बहुत देर कर देते। दोनातवादी अफ्रीका के बड़े भाग को अपने दल में पहले ही मिला चुके थे, और कोई स्थान उस संक्रमण से पूरी तरह मुक्त नहीं था। वह अत्यन्त महत्त्व का विवाद था, जो कलीसिया की एकता और बपतिस्मा के उचित संचालन से सम्बन्ध रखता था। हमारे विरोधियों की नई बुद्धि के अनुसार, कलीसिया के अन्य अंगों से अपने को अलग न करने के लिए, रूढ़िवादी बिशपों को यह प्रश्न सार्वभौमिक परिषद को सौंप देना चाहिए था। क्या वे ऐसा करते हैं? नहीं, वरन् यह जानते हुए कि जलती हुई आग को बुझाने में एक क्षण भी खोया नहीं जा सकता, वे दोनातवादियों को आ दबोचते और उनका पीछा करते हैं, कभी उन्हें धर्मसभा में बुलाते हैं, कभी वाद-विवाद में उनसे मानो हाथापाई करते हैं।

हमारे शत्रु अगस्तीन को, और उस युग के उन अन्य पवित्र जनों को जो उसके साथ सहमत थे, कलीसिया से अधर्मी अलगाव का दोषी ठहराएँ, क्योंकि उन्होंने सार्वभौमिक परिषद बुलाए बिना, राजकीय अधिकार से दोनातवादियों को अपने साथ वाद-विवाद करने पर विवश किया, और एक अत्यन्त कठिन और जोखिम-भरे विवाद का निपटारा प्रान्तीय धर्मसभा में करने में झिझके नहीं। वहाँ भी पेलागियस ने अपने सींग दिखाए थे; तुरन्त उसके दुस्साहस को दबाने के लिए धर्मसभा हुई। जब वह थोड़े समय पश्चाताप का ढोंग करके फिर अपनी उल्टी की ओर लौट गया, तो अफ्रीका में अपने अधर्म पर लगे कलंक को लिए हुए वह रोम पहुँचा, जहाँ उसका कुछ आदर के साथ स्वागत हुआ। भक्त बिशप क्या मार्ग अपनाते हैं? क्या वे यह कहते हैं कि वे कलीसिया के केवल एक अंग हैं, और उन्हें सार्वभौमिक परिषद से राहत की प्रतीक्षा करनी चाहिए? नहीं, वरन् वे स्वयं पहले ही अवसर पर एकत्र होते हैं, और उस अधर्मी सिद्धान्त को, जिससे अब बहुत लोग संक्रमित हो चुके थे, बार-बार शापित ठहराते हैं, और मूल पाप तथा नया जन्म देनेवाले अनुग्रह के विषयों पर क्या मानना चाहिए, इसका निर्णय और परिभाषा स्वतन्त्रता से करते हैं। इसके पश्चात वे अपनी कार्यवाही की एक प्रतिलिपि रोम अवश्य भेजते हैं, कुछ तो इसलिए कि साझा अधिकार और सहमति से वे विधर्मियों की हठ को अधिक प्रभावी रीति से कुचल सकें, कुछ इसलिए कि वे दूसरों को ऐसे खतरे की चेतावनी दें जिससे सबको सावधान रहना चाहिए। रोमी पोप के चाटुकार इस बात को दूसरा मोड़ देते हैं, मानो बिशपों ने अपना निर्णय तब तक रोक रखा था जब तक कि कार्यवाही का अनुमोदन उस समय रोमी कलीसिया के अध्यक्ष इनोसेंट ने न कर दिया। परन्तु यह निर्लज्ज कथन पवित्र पिताओं के शब्दों से खण्डित होने से भी अधिक खण्डित है। क्योंकि वे न तो इनोसेंट से यह परामर्श माँगते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए, न उसे निर्णय के लिए सौंपते हैं, न उसके संकेत और अधिकार की प्रतीक्षा करते हैं, परन्तु वे बताते हैं कि वे मामले की जाँच कर चुके थे और निर्णय सुना चुके थे, उस मनुष्य और उसके सिद्धान्त दोनों को दोषी ठहराकर, ताकि इनोसेंट भी, यदि अपने कर्तव्य में चूकना न चाहे, उनके उदाहरण का अनुकरण करे। ये बातें तब हुईं जब कलीसियाएँ अभी खरे सिद्धान्त में एक-दूसरी से सहमत थीं। तो अब, जब शीघ्र उपाय न होने पर सब कुछ विनाश की धमकी दे रहा है, तब उन लोगों की सहमति की प्रतीक्षा में क्यों लटके रहें जो परमेश्वर के उस सत्य को, जिसे उन्होंने भगा दिया था, फिर से चमकने से रोकने के लिए कोई उपाय अनछुआ नहीं छोड़ते?

अम्ब्रोस का अपने समय में ऑक्सेंशियस के साथ हमारे विश्वास के प्रधान सिद्धान्त, अर्थात मसीह के ईश्वरत्व, पर विवाद हुआ। सम्राट ऑक्सेंशियस के मत का पक्षपाती था। फिर भी वह इस बहाने से कि इतने महत्त्वपूर्ण मामले का निर्णय किसी और रीति से करना अनुचित है, किसी सार्वभौमिक परिषद की दुहाई नहीं देता। वह केवल यह माँगता है कि विश्वास का प्रश्न होने के कारण उस पर कलीसिया में लोगों की उपस्थिति में चर्चा हो। और प्रान्तीय धर्मसभाओं का, जो कभी नियमित रूप से वर्ष में दो बार होती थीं, और क्या प्रयोजन था सिवाय इसके कि बिशप उठनेवाली परिस्थितियों पर मिलकर परामर्श करें, जैसा कल्सीडोन की परिषद का उन्नीसवाँ नियम समझाता है। एक प्राचीन विधान आज्ञा देता है कि हर प्रान्त के बिशप वर्ष में दो बार एकत्र हों। कल्सीडोन की परिषद हमें कारण बताती है कि जो भी भूलें उठी हों उन्हें सुधारा जा सके। हमारे विरोधी, जो सब जानते हैं उसके विपरीत, कहते हैं कि शिक्षा या आचरण की किसी भ्रष्टता को छूना तब तक उचित नहीं जब तक वह सार्वभौमिक परिषद के सामने न रखी जाए। वरन् जिस बहाने से आरियसवादी पैलेडियस और सेकुन्दिनियानस ने अक्विलेया की परिषद से इनकार किया, वह यही था कि वह पूर्ण और सार्वभौमिक नहीं थी, पूर्व के सब बिशप अनुपस्थित थे, और पश्चिम के भी थोड़े ही उपस्थित हुए थे। और निश्चित है कि इतालवियों में से भी मुश्किल से आधे एकत्र हुए थे। रोम का बिशप न स्वयं आया था, न अपने प्रतिनिधित्व के लिए अपने किसी प्राचीन को भेजा था। इन सब आपत्तियों का उत्तर अम्ब्रोस यह देता है कि पश्चिम के बिशपों का धर्मसभा करना कोई अभूतपूर्व बात नहीं थी, क्योंकि यह प्रथा पूर्व के बिशपों में प्रचलित थी—कि परिषद को बुलानेवाले भक्त सम्राटों ने बुद्धिमानी की थी कि सब को आने की स्वतन्त्रता दी, किसी को विवश न किया; और इसलिए जिन्हें उचित लगा वे सब आए, किसी को रोका नहीं गया। यद्यपि विधर्मी अपनी छिद्रान्वेषी आपत्तियाँ दबाते रहे, तथापि पवित्र पिताओं ने अपना उद्देश्य नहीं छोड़ा। निश्चय ही ऐसे उदाहरणों के बाद आपकी शाही महिमा को साम्राज्य की देह को पवित्र सामंजस्य में वापस लाने के अपने सुलभ साधनों का उपयोग करने से रोका नहीं जाना चाहिए।

यद्यपि, जैसा कहा गया, हमारे शत्रु, जो टालमटोल की सलाह देते हैं, यह इस दृष्टि से नहीं करते कि थोड़े समय बाद कलीसिया के कल्याण का परामर्श करें, परन्तु केवल विलम्ब से समय पाने के लिए, यह जानते हुए कि यदि वे हमें सार्वभौमिक परिषद की ओर लौटा सकें तो यह युद्धविराम पर्याप्त लम्बा होगा; तथापि हम मान लें कि सार्वभौमिक परिषद के तुरन्त बुलाए जाने में कोई बाधा नहीं है; यह भी मान लें कि वह सच्चे मन से बुलाई गई है, मिलने का दिन निकट है, और सब कुछ तैयार है। रोमी पोप तो अवश्य ही अध्यक्षता करेगा, या यदि वह आना न चाहे तो अपने स्थान पर अध्यक्षता करने के लिए अपने किसी कार्डिनल को प्रतिनिधि बनाकर भेजेगा, और निःसन्देह उसी को चुनेगा जिसे वह अपने हितों के प्रति सबसे विश्वासयोग्य समझता है। शेष कार्डिनल अपने आसन ग्रहण करेंगे, और उनके निकट बिशप और मठाधीश। नीचे के आसनों पर साधारण सदस्य बैठेंगे, जो अधिकांशतः ऊपरवालों के विचारों की अधीनता के लिए चुने गए होते हैं। यह अवश्य होगा कि उनमें कुछ थोड़े ईमानदार मनुष्य भी आसन पाएँगे, परन्तु अपनी संख्या की अल्पता के कारण उनका तिरस्कार होगा, और भय से निर्बल होकर, या कुछ भला कर पाने की निराशा से हतोत्साहित होकर, वे चुप रहेंगे। यदि उनमें से कोई संयोग से बोलने का प्रयत्न करे, तो शोर और कोलाहल से तुरन्त दबा दिया जाएगा। परन्तु बड़ा समूह कुछ भी सहने को तैयार रहेगा, पर कलीसिया को किसी उत्तम दशा में पुनःस्थापित नहीं होने देगा।

मैं सिद्धान्त के विषय में कुछ नहीं कहता। काश वे केवल ईमानदार और सीखने को तैयार मन से इस मामले में आते। परन्तु यह निश्चय की भी निश्चयता के समान निश्चित है कि सबका एकमात्र संकल्प यही होगा कि जो कुछ कहा जाए, या जिन तर्कों से उसका समर्थन किया जाए, वे चाहे जैसे हों, उनमें से कुछ भी न सुनें। वरन् वे अपने कान हठ और अड़ियलपन से ही नहीं ठूँस लेंगे कि सत्य का पालन न करें, परन्तु उसका सामना करने के लिए क्रूरता से भी सशस्त्र हो जाएँगे। और क्यों? क्या यह विश्वसनीय है कि जो लोग खरे सिद्धान्त का नाम तक अपने कानों में नहीं आने देते, वे जैसे ही बात तत्काल व्यवहार की आएगी, स्वेच्छा से अपना विरोध छोड़ देंगे? क्या हम आशा कर सकते हैं कि जो निरन्तर यह षड्यन्त्र रचते हैं कि मसीह का गिरा हुआ राज्य संसार में फिर न उठे, वे उसे उठाने और बढ़ाने में सहायता का हाथ देंगे? क्या वे जो अब आग और तलवार से सत्य के विरुद्ध उन्मत्त हैं, और दूसरों की क्रूरता को तेज़ करने और भड़काने में सब कुछ करते हैं, अपने को संयमी और दयालु दिखाएँगे? परन्तु यदि और कुछ न भी हो, तो हे परम अजेय सम्राट, और हे परम प्रतापी राजकुमारो, मैं आपकी बुद्धिमत्ता पर छोड़ता हूँ कि विचार करें कि क्या रोमी पोप और उसके सारे दल के निजी हित में है कि कलीसिया सच्ची व्यवस्था में पुनःस्थापित हो, और उसकी अति भ्रष्ट दशा सुसमाचार के कठोर मानक के अनुसार सुधारी जाए। वे अपने ही लाभ को कितना भूल जाते हैं, और उसकी उपेक्षा करके सामान्य कल्याण को बढ़ाने में तन-मन से लग जाते हैं, यह आपने निश्चित अनुभव से सीखा है!

महाराज, क्या आप कलीसिया को उन्हीं के हाथ में छोड़ देंगे कि वे उसके सुधार का निर्णय अपनी इच्छा से, या कहें अपनी सनक से, करें? क्या आप उनके संकेत की प्रतीक्षा में रुके रहेंगे, यह ठान कर कि जब तक वे सहमत न हों तब तक कलीसिया के लिए कभी परामर्श नहीं करेंगे? यदि वे जान लें कि यह आपका निश्चय है, तो वे सरल उपाय से अपने को छुड़ा लेंगे। वे ठहरा देंगे कि बातें जैसी हैं वैसी ही रहें। परन्तु मान लें कि वे या तो लज्जा के बोध से, या आपकी महिमा और अन्य राजकुमारों के अधिकार से, इतने दब जाएँ कि संयम का कुछ दिखावा करें और अपनी शक्ति का कोई छोटा-सा अंश छोड़ दें; तो क्या वे अपनी इच्छा से भी इतना झुकेंगे कि अपने को व्यवस्था में लाने दें, ताकि मसीह का राज्य ऊँचा उठे? परन्तु यदि वे ऐसा न करें, तो कलीसिया के सुधार की चिन्ता उन्हें सौंपने का प्रयोजन क्या है, सिवाय इसके कि भेड़ों को भेड़ियों के सामने डाल दिया जाए? यदि और कोई विकल्प नहीं, तो कलीसिया को निराशाजनक मानकर छोड़ देना ही अच्छा है, बजाय इसके कि वह ऐसे वैद्यों के हाथों पड़े।

सचमुच जिनका नाम और पद चरवाहों का है, उन्हें ही सबसे पहले उसकी सहायता को दौड़ना शोभा देता था। मैं मानता हूँ कि उन्हें अगुवे बनकर आगे आना, और राजकुमारों को इस पवित्र कार्य में साथी और सहयोगी बनाकर अपने साथ मिलाना शोभा देता था। परन्तु यदि वे स्वयं ऐसा करने से इनकार करें? यदि वे नहीं चाहते कि दूसरे यह करें? यदि वे इसे रोकने के लिए कोई उपाय अनछुआ न छोड़ें? तो क्या हमें फिर भी उनका लिहाज़ करना है? क्या जब तक वे संकेत न दें कोई हिले ही नहीं? क्या हमें उनकी वह गम्भीर कहावत फिर सुननी है, “जब तक पोप अनुमोदन न करे तब तक कुछ भी नहीं करना चाहिए”? इसलिए, महाराज, आप निश्चय जान लें, और हे परम प्रतापी राजकुमारो और प्रतिष्ठित महानुभावो, आप भी इसे एक निश्चित तथ्य मानकर हृदय में रखें, कि कलीसिया, जो न केवल अपने चरवाहों द्वारा धोखा खाई, त्यागी गई और असहाय छोड़ी गई है, परन्तु सताई गई, विपत्ति से दबी हुई और विनाश के लिए ठहराई हुई है, आपकी शरण में आ पड़ी है। वरन् इसे इस दृष्टि से देखें—परमेश्वर ने अब आपको अपनी ओर आपकी निष्ठा का निश्चित और प्रभावशाली प्रमाण देने के साधन दिए हैं। ऐसा कुछ नहीं जिसमें सब मनुष्यों को अधिक गहरी रुचि लेनी चाहिए, कुछ नहीं जिसमें परमेश्वर चाहता है कि हम अधिक तीव्र उत्साह दिखाएँ, उससे कि उसके नाम की महिमा अक्षुण्ण बनी रहे, उसका राज्य बढ़े, और वह खरा सिद्धान्त, जो अकेला हमें सच्ची आराधना की ओर ले जा सकता है, पूरे बल से फले-फूले। तब राजकुमारों को कितना अधिक शोभा देता है कि वे इन बातों को अपनी चिन्ता बनाएँ, इनकी योजना बनाएँ, इन्हें आरम्भ करें और पूरा करने तक चलाएँ, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अपने नाम में भागी बनाकर सम्मानित किया है, कि वे पृथ्वी पर उसकी महिमा के रक्षक और पक्षधर हों! मैं आपसे विनती करता हूँ, उन अधर्मी मनुष्यों की बात न सुनें, जो या तो झूठे परामर्श के दिखावे से आपको फुसलाते हैं, कि कलीसिया को आपके हाथ से कोई राहत न मिले, या उस कार्य को, यद्यपि वह सब कार्यों में सबसे बड़ा है, छोटा दिखाते हैं कि आप उसे हाथ में लेने में और ढीले पड़ें, या आपको उसमें हिंसक उपायों के लिए उकसाते हैं। हे परम अजेय सम्राट, अब तक आपको क्रोध से भड़काने और मानो कवच पहनाने के प्रयत्न में उन्होंने अपना परिश्रम खोया है, और आप निश्चय ही आनेवाली पीढ़ियों के लिए कोमलता और विवेक दोनों की उत्तम प्रशंसा छोड़ जाएँगे, कि आपने उन उपद्रवी परामर्शों से, जो आप पर इतनी बार और इतने ज़ोर से डाले गए, अपने को कभी संयम से डिगने नहीं दिया। आप सदा यही ध्यान रखें कि हमारे शत्रुओं के आग्रह से यह प्रशंसा आपसे छीनी न जाए। अगस्तीन मानता है कि वह अनुशासन बुरा है जो विधर्मियों को डराता है पर उन्हें सिखाता नहीं। यदि विधर्मी, जो अपनी असंयमता से और बिना किसी उचित कारण के कलीसिया को अशान्त करते हैं, ऐसी कोमलता से व्यवहार पाने के योग्य हैं जो यह सुनिश्चित करे कि शिक्षा सदा दण्ड से पहले हो, तो इस मामले में, जिसमें हम परमेश्वर और मनुष्यों को साक्षी ठहराते हैं कि हम परमेश्वर के खरे सिद्धान्त के प्रति दोनों ओर की सच्ची सहमति के सिवा कुछ नहीं चाहते, मानवता का प्रयोग कितना अधिक शोभा देता है? कि रोमी पोप और उसके अनुयायी रक्त और संहार के सिवा कुछ नहीं साँसते, इसके सर्वोत्तम साक्षी आप स्वयं हैं, महाराज। यदि आप उनके क्रोध के आगे झुक गए होते, तो जर्मनी बहुत पहले अपने ही रक्त में डूब गया होता। हे परम प्रतापी राजकुमारो, आप भी यह तथ्य भली-भाँति जानते हैं। क्या यह सम्भव है कि परमेश्वर का आत्मा ही उन्हें ऐसी क्रूरता की ओर सिर के बल धकेलता है? परन्तु बात ऐसी ही है; स्वेच्छाचार, जो बहुत समय से बिना रोक-टोक विचरता रहा है, लगाम का अनुभव करते ही उन्माद में फूट पड़ता है। यदि उनके सिवा, जो हमें हिंसा और शस्त्रों से कुचला देखना चाहते हैं, कुछ और लोग हैं, जो या तो दूसरों के उकसाने से भड़के हैं, या भीतर से किसी अविचारित उत्साह से प्रेरित हैं, तो वे उस कार्य से घृणा करते हैं जिसे वे जानते ही नहीं। क्योंकि ठीक वही बात, जिसकी टर्टुलियन अपनी क्षमा-याचना में उस समय की शिकायत करता है जब कलीसिया पहले-पहल उठी थी, आज हम भी अनुभव करते हैं। हमें केवल अपने नाम के प्रति पूर्वाग्रह से दोषी ठहराया जाता है, हमारे मामले की कोई जाँच किए बिना। और अब हम और किस बात के लिए संघर्ष कर रहे हैं सिवाय इसके कि हमारा मामला, एक बार उसकी उचित जाँच हो जाने के बाद, अन्ततः सत्य और न्याय के अनुसार निपटाया जाए, किसी झूठे पूर्वकल्पित मत के अनुसार नहीं? महाराज, यह वास्तव में मानवता और अद्वितीय बुद्धिमत्ता का उत्तम प्रमाण है कि आपने अब तक उस दबाव का सामना किया है जिसके साथ हमारे शत्रुओं ने आपको अन्यायी कठोरता की ओर हाँकने का यत्न किया है। अगली उत्तम बात यह है कि उन लोगों के घातक परामर्शों के आगे न झुकें जो विलम्ब के लिए लुभावने बहाने बनाकर, बहुत समय से इस पवित्र कार्य (अर्थात कलीसिया के सुधार) को रोकते आए हैं; और जो इससे भी बुरा है, उसे पूरी तरह रोकने का प्रयत्न कर रहे हैं।

सम्भवतः एक कठिनाई और शेष है जो आपको इस कार्य को आरम्भ करने से रोकती है। बहुत से लोग, जो अन्यथा विरोधी नहीं हैं, इस पवित्र उद्यम में केवल इसलिए नहीं लगते कि प्रयत्न से पहले ही वे उसकी सफलता से निराश हैं। परन्तु यहाँ दो बातों पर विचार करना चाहिए; एक यह कि कठिनाई उतनी बड़ी नहीं जितनी दिखाई देती है, और दूसरी यह कि वह चाहे कितनी भी बड़ी हो, उसमें ऐसा कुछ नहीं जो आपको हतोत्साहित करे, जब आप सोचें कि यह परमेश्वर का कार्य है, और जब वह इसे अपने अधीन चलाए तो हमारी आशाएँ भी पार हो सकती हैं और हमारी धारणाएँ भी भ्रान्त ठहर सकती हैं। इनमें से पहली बात का स्पष्टीकरण मेरे वर्तमान उद्देश्य का अंग नहीं; जब यह विषय गम्भीर विचार में लिया जाएगा, तब उपयुक्त अवसर मिलेगा। मैं केवल यह कहूँगा कि इसका निष्पादन सामान्यतः समझे जाने से अधिक शीघ्र और कम कठिन होगा, बशर्ते उसे आरम्भ करने का पर्याप्त साहस हो। तथापि एक पुरानी कहावत की सुविदित उक्ति के अनुसार यह सोचते हुए कि कोई भी वस्तु तेजस्वी नहीं जो कठिन और परिश्रमसाध्य भी न हो, क्या आश्चर्य कि सब कार्यों में सबसे महान और उत्कृष्ट कार्य में हमें बहुत कठिनाइयों से लड़कर मार्ग बनाना पड़ेगा? मैं पहले कह चुका हूँ कि यदि हम परमेश्वर को गहरी ठेस नहीं पहुँचाना चाहते, तो हमारे मन को ऊँचा दृष्टिकोण अपनाना होगा। क्योंकि यदि हम कलीसिया के पुनरुद्धार से उससे अधिक की आशा नहीं रखते जितनी वर्तमान परिस्थितियाँ दिखाती हैं, तो परमेश्वर की सामर्थ्य को अपनी सामर्थ्य की सीमा से नापना ही ठहरता है। सफलता की आशा कितनी ही क्षीण हो, परमेश्वर हमें ढाढ़स रखने और हर प्रकार के भय को दूर कर देने की आज्ञा देता है, कि हम उत्साह से इस कार्य के लिए कमर कस लें। कम से कम इतना तो हम उसका आदर करें। उसकी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य पर भरोसा रखकर हम यह आज़माने से पीछे न हटें कि वह कैसी सफलता देना चाहे।

साम्राज्य की वर्तमान दशा में, आपकी शाही महिमा, और आप परम प्रतापी राजकुमार, अनिवार्यतः नाना चिन्ताओं में फँसे हैं और कार्यों की बहुलता से विचलित हैं, और आप आन्दोलित तथा मानो तूफ़ान में डगमगाते हैं। परन्तु सदा निश्चित रहें कि सब कार्यों में यही एक निःसन्देह प्राथमिकता पाने का अधिकारी है। मैं अनुभव करता हूँ कि इस विषय के निरूपण के लिए कितना बल, कितनी गम्भीरता, कितनी तत्परता, कितना जोश चाहिए। और मैं भली-भाँति जानता हूँ कि ऐसे लोगों की कमी नहीं होगी जो आश्चर्य करेंगे कि इतने उदात्त और भव्य विषय पर मैं इतना ठण्डा हूँ। परन्तु मैं क्या करता? मैं इसके भार और विशालता के नीचे झुका जाता हूँ; इसलिए मुझे नहीं सूझता कि इससे उत्तम और क्या कर सकता हूँ कि मामला आपके सामने सादगी से, शब्दों के किसी अलंकार के बिना रख दूँ, कि आप बाद में उस पर मनन और जाँच करें। पहले कलीसिया की उन भयंकर विपत्तियों का स्मरण करें जो लोहे के मनों को भी दया से द्रवित कर सकती हैं। वरन् उसका मैला और कुरूप रूप, और सर्वत्र दिखाई देनेवाला शोकजनक उजाड़ अपनी आँखों के सामने रखें। कृपया बताइए, मसीह की दुल्हिन, आप सब की माता को आप कब तक इस प्रकार पड़ी हुई और पीड़ित रहने देंगे—और वह भी तब जब वह आपकी शरण की याचना कर रही है, और राहत के साधन आपके हाथ में हैं? फिर विचार करें कि और कितनी बुरी विपत्तियाँ मँडरा रही हैं। अन्तिम विनाश दूर नहीं हो सकता, जब तक आप अत्यन्त शीघ्रता से बीच में न आएँ। मसीह तो, जिस रीति से उसे उचित लगे, अपनी कलीसिया को आश्चर्यजनक रूप से और मानवीय आशा से परे सुरक्षित रखेगा; परन्तु मैं यह कहता हूँ कि आपकी ओर से थोड़े और विलम्ब का परिणाम यह होगा कि जर्मनी में हमारे पास कलीसिया का रूप भी नहीं रहेगा। चारों ओर देखें, और देखें कि कितने चिह्न उस विनाश की धमकी दे रहे हैं जिसे रोकना आपका कर्तव्य है, और घोषणा कर रहे हैं कि वह वास्तव में निकट है। ये बातें, मैं चुप भी रहूँ, तो भी बहुत ऊँचे स्वर में बोलती हैं।

परन्तु ऐसे चिह्नों को हमें केवल अपने वास्तविक रूप से ही नहीं झकझोरना चाहिए; उन्हें आनेवाले दण्ड की भी हमें याद दिलानी चाहिए। परमेश्वर की आराधना इतनी झूठी धारणाओं से दूषित और इतने अधर्मी तथा घृणित अन्धविश्वासों से बिगड़ गई है, कि परमेश्वर की पवित्र महिमा का घोर अपमान के साथ उपहास किया जाता है, उसका पवित्र नाम अपवित्र किया जाता है, उसकी महिमा बस पैरों तले रौंदी जाने से ही बची है। वरन् जब सारा मसीही संसार खुल्लमखुल्ला मूर्तिपूजा से अशुद्ध हो रहा है, मनुष्य उसकी जगह अपनी ही कल्पनाओं की आराधना करते हैं। हज़ार अन्धविश्वास राज्य करते हैं, ऐसे अन्धविश्वास जो उसके लिए उतने ही खुले अपमान हैं। मसीह की सामर्थ्य मनुष्यों के मन से लगभग मिट गई है, उद्धार की आशा उससे हटाकर खोखली, तुच्छ और निरर्थक रीतियों पर लगा दी गई है, और संस्कारों का अपवित्र किया जाना भी उतना ही घृणा के योग्य है। बपतिस्मा अनेक जोड़ों से कुरूप कर दिया गया है, पवित्र भोज को सब प्रकार की लज्जा के लिए बेच दिया गया है, और सारा धर्म बिलकुल भिन्न रूप में गिर चुका है।

यदि हम इन बुराइयों के सुधार में असावधान रहें, तो परमेश्वर निश्चय अपने आप को नहीं भूलेगा। जो घोषणा करता है कि वह अपने आदर को किसी भी प्रकार घटने नहीं देगा, वह उसके गिराए और नष्ट किए जाने पर बीच में कैसे न आए? जो उन सब जातियों को, जिनमें भविष्यवाणी लोप हो जाए, विनाश की धमकी देता है, वह भविष्यवाणियों के प्रति हमारे खुले और हठीले तिरस्कार को बिना दण्ड के कैसे जाने दे? जिसने कुरिन्थियों में अपने भोज पर लगे हल्के कलंक को इतनी कठोरता से दण्ड दिया, वह हमें कैसे छोड़े, जब हम उसे इतनी अकथनीय निन्दाओं से अपवित्र करने का साहस करते हैं? जो अपने सब भविष्यद्वक्ताओं के मुख से गवाही देता और घोषणा करता है कि वह मूर्तिपूजा के विरुद्ध दण्ड से सज्जित है, वह हममें इतनी भयानक मूर्तिपूजाओं को अनछुआ कैसे छोड़े? निश्चय वह उन्हें ऐसे ही नहीं छोड़ता, क्योंकि हम देखते हैं कि कैसे हाथ में तलवार लिए वह हमें हाँकता और हमारा पीछा करता है। तुर्कों का युद्ध अब सब के मन को घेरे हुए है और उन्हें भय से भर देता है। ऐसा होना भी चाहिए। प्रतिरोध के साधन तैयार करने के लिए परामर्श हो रहे हैं। यह भी विवेक और आवश्यकता से किया जा रहा है। सब चिल्लाते हैं कि साधारण से अधिक शीघ्रता की आवश्यकता है। मैं मानता हूँ कि शीघ्रता कितनी भी हो अधिक नहीं, बशर्ते इस बीच वह परामर्श, जो पहले होना चाहिए, कि कलीसिया को उसकी उचित दशा में कैसे पुनःस्थापित किया जाए, न उपेक्षित हो न विलम्बित। विलम्ब तो पहले ही आवश्यकता से अधिक डाले जा चुके हैं। तुर्कों के युद्ध का ईंधन भीतर है, हमारी अंतड़ियों में बन्द है, और यदि हम युद्ध को ही सफलतापूर्वक खदेड़ना चाहते हैं तो उसे पहले हटाना होगा।

इसलिए भविष्य में, जब-जब आप यह कर्कश स्वर सुनें—कलीसिया के सुधार का कार्य अभी टाल देना चाहिए—दूसरे कार्य निपटने के बाद उसे पूरा करने के लिए पर्याप्त समय होगा—तब, हे परम अजेय सम्राट, और परम प्रतापी राजकुमारो, स्मरण रखें कि जिस बात पर आपको विचार करना है वह यह है कि आप अपनी सन्तान के लिए कोई साम्राज्य छोड़ेंगे या कोई नहीं। फिर भी, मैं सन्तान की बात क्यों करूँ? अभी, जब आपकी अपनी आँखें देख रही हैं, वह आधा झुका हुआ है और अपने अन्तिम विनाश की ओर लड़खड़ा रहा है। जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, परिणाम चाहे जो हो, परमेश्वर की दृष्टि में हमें सदा इस बोध से सहारा मिलेगा कि हमने उसकी महिमा को बढ़ाना और उसकी कलीसिया की भलाई करना चाहा; कि हमने इस उद्देश्य के लिए विश्वासयोग्यता से परिश्रम किया; कि संक्षेप में, हमने जो हो सका वह किया। हमारा विवेक कहता है कि अपनी सब इच्छाओं और सब प्रयत्नों में हमारा कोई और लक्ष्य नहीं रहा। और हमने स्पष्ट प्रमाण से इस तथ्य की गवाही देने का यत्न किया है। और निश्चय, जब हम निश्चित हैं कि हम प्रभु के कार्य की चिन्ता भी करते हैं और उसे कर भी रहे हैं, तब हम यह भी विश्वास करते हैं कि वह न अपने प्रति और न उस कार्य के प्रति किसी प्रकार चूकेगा।

परन्तु परिणाम चाहे जो हो, हम कभी इसका पछतावा नहीं करेंगे कि हमने आरम्भ किया और यहाँ तक आए। पवित्र आत्मा हमारे सिद्धान्त का विश्वासयोग्य और अचूक गवाह है। हम जानते हैं, मैं कहता हूँ, कि हम परमेश्वर का सनातन सत्य प्रचार करते हैं। हम अवश्य चाहते हैं, जैसा चाहना चाहिए, कि हमारी सेवा संसार के लिए हितकर ठहरे; परन्तु उसे यह प्रभाव देना परमेश्वर का काम है, हमारा नहीं। यदि उन लोगों की, जिनकी हम भलाई करना चाहते हैं, कुछ कृतघ्नता और कुछ हठ का दण्ड देने के लिए, सफलता निराशाजनक ठहरे, और सब कुछ और बिगड़ जाए, तो मैं वही कहूँगा जो एक मसीही मनुष्य को कहना शोभा देता है, और जिस पर इस पवित्र पेशे के सब सच्चे जन हस्ताक्षर करेंगे:—हम मरेंगे, परन्तु मृत्यु में भी जयवन्त होंगे, केवल इसलिए नहीं कि उसके द्वारा हमें एक उत्तम जीवन का निश्चित मार्ग मिलेगा, परन्तु इसलिए भी कि हम जानते हैं कि हमारा लहू उस दिव्य सत्य के प्रसार के लिए बीज के समान होगा जिसे मनुष्य अब तुच्छ जानते हैं।

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मोनर्जिज़्म बुक्स

जॉन कैल्विन रचित कलीसिया के सुधार की आवश्यकता, कॉपीराइट ©

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