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प्रतापी सम्राट
ईश्वरीय सत्य अन्धकार और विकृति के नीचे दबा पड़ा था
प्रभु-भोज
हमारा छुड़ानेवाला मसीह बड़ी मात्रा में ठगा गया
कलीसिया को भ्रष्टता से शुद्ध करना
प्रतापी सम्राट,
आपने इस महासभा को इसलिए बुलाया है कि परम प्रतापी राजकुमारों और साम्राज्य के अन्य वर्गों के साथ मिलकर आप अन्ततः इस विषय पर विचार और निर्णय करें कि कलीसिया की वर्तमान दशा को, जिसे हम सब अत्यन्त दयनीय और लगभग निराशाजनक देखते हैं, किस प्रकार सुधारा जाए। अतः अब, जब आप इस परामर्श में विराजमान हैं, मैं विनम्रता से विनती और याचना करता हूँ, पहले आप महामहिम सम्राट से, और साथ ही आप परम प्रतापी राजकुमारो तथा प्रतिष्ठित महानुभावो से, कि जो कुछ मैं आपके सम्मुख रखने जा रहा हूँ उसे पढ़ने और ध्यानपूर्वक मनन करने से आप इनकार न करें। इस विषय की महत्ता और गम्भीरता आप में सुनने की उत्कण्ठा भली-भाँति जगा सकती है, और मैं इस बात को आपके सामने ऐसी स्पष्टता से रखूँगा कि कौन-सा मार्ग अपनाया जाए, यह निश्चित करने में आपको कोई कठिनाई न होगी। मैं जो भी हूँ, यहाँ यह दावा करता हूँ कि मैं खरे सिद्धान्त और कलीसिया, दोनों के पक्ष में वकालत कर रहा हूँ। इस हैसियत से मुझे किसी भी स्थिति में यह आशा रखने का अधिकार प्रतीत होता है कि आप मुझे तब तक सुनवाई से वंचित न करेंगे जब तक यह प्रकट न हो जाए कि मैं इस हैसियत का झूठा दावा कर रहा हूँ, अथवा सच्चाई से इसके कर्तव्य निभाता और जो कहता हूँ उसे सिद्ध करता हूँ। यद्यपि मैं जानता हूँ कि मैं इतने बड़े कार्य के किसी प्रकार योग्य नहीं हूँ, फिर भी मुझे तनिक भी भय नहीं कि मेरे पद का स्वरूप सुन लेने के पश्चात् आप मुझ पर यह दोष लगाएँगे कि मैंने आपके सामने इस प्रकार उपस्थित होने का साहस करके मूर्खता या ढिठाई की है। दो बातें ऐसी हैं जिनके द्वारा लोग अपने आचरण की सराहना करवाते, या कम से कम उसे उचित ठहराते हैं। यदि कोई काम ईमानदारी से और भक्तिमय उत्साह से किया जाए तो हम उसे प्रशंसा के योग्य मानते हैं; यदि वह सार्वजनिक आवश्यकता के दबाव में किया जाए तो हम कम से कम उसे क्षमा के अयोग्य नहीं मानते। चूँकि ये दोनों बातें यहाँ लागू होती हैं, इसलिए आपकी न्यायशीलता पर भरोसा करके मुझे विश्वास है कि मैं अपने उद्देश्य के लिए आपकी स्वीकृति सहज ही पा लूँगा। क्योंकि मैं अपने परिश्रम को इससे अधिक सार्थक या इससे अधिक खरे रूप में कहाँ लगा सकता हूँ, और कहाँ इससे अधिक आवश्यक विषय में, इस समय, कि अपनी सामर्थ्य भर मसीह की कलीसिया की सहायता का प्रयत्न करूँ, जिसके अधिकारों को किसी भी बात में नकारना अनुचित है, और जो अब घोर संकट और भारी जोखिम में है? परन्तु अपने विषय में लम्बी भूमिका की कोई आवश्यकता नहीं। जो मैं कहता हूँ उसे ऐसे ग्रहण कीजिए मानो वह उन सब की संयुक्त वाणी से कहा जा रहा हो जिन्होंने या तो कलीसिया को पुनःस्थापित करने का पहले ही यत्न किया है, या जो चाहते हैं कि वह सच्ची व्यवस्था में लौटा दी जाए। इस स्थिति में कई राजकुमार हैं, जो छोटे दर्जे के नहीं हैं, और अनेक प्रतिष्ठित समुदाय भी। इन सबकी ओर से मैं बोलता हूँ, यद्यपि अकेला व्यक्ति हूँ, फिर भी इस प्रकार कि अधिक सच यह है कि वे ही एक साथ, एक मुख से, मेरे द्वारा बोल रहे हैं। इनके साथ मसीही जगत के नाना प्रदेशों में बिखरे हुए उन असंख्य भक्त जनों को भी जोड़ लीजिए, जो अब भी इस वकालत में एकमत होकर मेरे साथ हैं। संक्षेप में, इसे उन सब की सामूहिक विनती समझिए जो कलीसिया की वर्तमान भ्रष्टता पर इतना शोक करते हैं कि उसे और सहन नहीं कर सकते, और जिन्होंने ठान लिया है कि जब तक कुछ सुधार न देख लें, चैन न लेंगे। मैं जानता हूँ कि हम पर कैसे घृणित नाम थोपे जाते हैं; परन्तु इस बीच, हमें चाहे जिस नाम से पुकारना उचित समझा जाए, हमारा मुकद्दमा सुन लीजिए, और सुन लेने के पश्चात् निर्णय कीजिए कि हमें कौन-सा स्थान रखने का अधिकार है।
अतः पहली बात यह है कि प्रश्न यह नहीं है कि कलीसिया अनेक और गम्भीर रोगों से पीड़ित है या नहीं (इसे तो सब संयत न्यायी भी मानते हैं), परन्तु यह है कि क्या ये रोग ऐसे हैं जिनके उपचार में और देर नहीं की जा सकती, और जिनके विषय में इसलिए धीमे उपायों के परिणाम की प्रतीक्षा करना न तो लाभदायक है और न शोभनीय। हम पर यह आरोप लगाया जाता है कि हमने कलीसिया की पूर्व अवस्था में कोई भी परिवर्तन प्रस्तावित करने का साहस करके उतावली और अधर्म से भरा नवाचार किया है। क्या कहा! चाहे वह बिना कारण या अधूरे ढंग से भी न किया गया हो? मैं सुनता हूँ कि ऐसे लोग हैं जो इस दशा में भी हमें दोषी ठहराने में नहीं हिचकिचाते; उनकी राय यह है कि सुधार की इच्छा करने में तो हम सही थे, परन्तु उसका प्रयत्न करने में सही नहीं थे। ऐसे लोगों से मैं इस समय केवल यह माँगता हूँ कि वे थोड़ी देर अपना निर्णय रोके रखें, जब तक मैं तथ्यों से यह न दिखा दूँ कि हमने समय से पहले उतावली नहीं की; कोई ऐसा काम नहीं किया जो उतावलेपन से या हमारे कर्तव्य से परे हो; और अन्ततः जब तक परम आवश्यकता ने विवश न किया, हमने कुछ भी नहीं किया। इसे सिद्ध करने के लिए विवादित विषयों पर ध्यान देना आवश्यक है।
अतः हमारा कथन है कि आरम्भ में, जब परमेश्वर ने लूथर और अन्य जनों को खड़ा किया, जिन्होंने उद्धार के मार्ग पर हमें चलाने के लिए मशाल ऊँची की, और जिनकी सेवकाई से हमारी कलीसियाएँ स्थापित और विकसित हुईं, तब सिद्धान्त के वे प्रमुख अंश, जिनमें हमारे धर्म का सत्य समाया है, जिनमें परमेश्वर की शुद्ध और वैध सन्तानता समाई है, और जिनमें मनुष्यों का उद्धार समाया है, बड़ी मात्रा में लुप्त हो चुके थे। हमारा कथन है कि संस्कारों का प्रयोग अनेक प्रकार से बिगाड़ा और दूषित किया गया था। और हमारा कथन है कि कलीसिया का शासन एक प्रकार के घिनौने और असहनीय अत्याचार में बदल दिया गया था। परन्तु सम्भव है कि ये कथन कुछ लोगों को हिलाने के लिए तब तक पर्याप्त बल न रखते हों जब तक उन्हें भली-भाँति समझाया न जाए। अतः मैं यही करूँगा, विषय की माँग के अनुसार नहीं, परन्तु जहाँ तक मेरी सामर्थ्य अनुमति दे। फिर भी यहाँ मेरा विचार हमारे सब विवादों की समीक्षा और विवेचना करने का नहीं है; उसके लिए लम्बे प्रवचन की आवश्यकता होगी, और यह उसका स्थान नहीं। मैं केवल यह दिखाना चाहता हूँ कि जिन परिवर्तनों के लिए हम पर दोष लगाया जाता है, उनकी ओर हमें धकेलनेवाले कारण कितने न्यायसंगत और आवश्यक थे। इसे पूरा करने के लिए मुझे ये तीन बातें साथ-साथ उठानी होंगी।
पहला, मुझे संक्षेप में उन बुराइयों की गणना करनी होगी जिन्होंने हमें उपचार ढूँढ़ने के लिए विवश किया।
दूसरा, मुझे यह दिखाना होगा कि हमारे धर्म-सुधारकों ने जो विशेष उपचार अपनाए, वे उपयुक्त और हितकारी थे।
तीसरा, मुझे यह स्पष्ट करना होगा कि हमें अपना हाथ बढ़ाने में और देर करने की स्वतन्त्रता नहीं थी, क्योंकि विषय तुरन्त सुधार की माँग कर रहा था।
पहली बात को, क्योंकि मैं उसका उल्लेख केवल इसलिए करता हूँ कि शेष दो के लिए मार्ग साफ़ हो जाए, मैं थोड़े शब्दों में निपटाने का यत्न करूँगा; परन्तु इस भारी आरोप को धो डालने में, कि हमने अनुचित रूप से और अनियन्त्रित उतावली के साथ ऐसा पद हथिया लिया जो हमारा नहीं था, और यह आरोप धर्म-द्रोही दुस्साहस और विद्रोह का है, मैं अधिक देर तक ठहरूँगा। यदि यह पूछा जाए कि हमारे बीच मसीही धर्म किन बातों के द्वारा मुख्यतः खड़ा रहता और अपने सत्य को बनाए रखता है, तो पाया जाएगा कि ये दो बातें न केवल प्रमुख स्थान रखती हैं, वरन् अपने अधीन अन्य सब अंगों को, और इस प्रकार मसीही धर्म के सम्पूर्ण सार को समेटे हुए हैं, अर्थात् पहला, इस बात का ज्ञान कि परमेश्वर की उचित रीति से उपासना कैसे की जाती है; और दूसरा, इस बात का ज्ञान कि उद्धार किस स्रोत से प्राप्त होता है। जब इन्हें दृष्टि से ओझल कर दिया जाए, तो चाहे हम मसीही नाम पर घमण्ड करें, हमारा अंगीकार खोखला और व्यर्थ है। इनके पश्चात् संस्कार और कलीसिया का शासन आते हैं, जो चूँकि सिद्धान्त के इन्हीं अंगों की रक्षा के लिए ठहराए गए थे, इसलिए किसी और प्रयोजन के लिए उपयोग में नहीं लाए जाने चाहिए; और वस्तुतः यह जाँचने का कि वे शुद्ध रूप से और उचित विधि से चलाए जाते हैं या नहीं, एकमात्र उपाय यही है कि उन्हें इसी कसौटी पर परखा जाए। यदि कोई अधिक स्पष्ट और सरल उदाहरण चाहे, तो मैं कहूँगा कि कलीसिया में शासन, पासबानी का पद, और व्यवस्था की अन्य सब बातें देह के समान हैं, जबकि वह सिद्धान्त जो परमेश्वर की उचित उपासना को नियमित करता है, और वह आधार दिखाता है जिस पर मनुष्यों के विवेक को उद्धार की आशा टिकानी है, वह प्राण है जो देह में जान डालता है, उसे जीवित और सक्रिय बनाता है, और संक्षेप में उसे मृत और निकम्मा शव होने से बचाता है।
जो कुछ मैंने अब तक कहा है, उसके विषय में भक्तों के बीच, या सीधे और स्वस्थ मन के मनुष्यों के बीच, कोई विवाद नहीं है।
अब देखें कि परमेश्वर की उचित उपासना से क्या अभिप्राय है। इसकी मुख्य नींव यह है कि हम उसे वैसा ही मानें जैसा वह है, अर्थात् सब सद्गुण, धार्मिकता, पवित्रता, बुद्धि, सत्य, सामर्थ्य, भलाई, दया, जीवन और उद्धार का एकमात्र स्रोत; इसी के अनुसार, जो कुछ भला है उसकी महिमा उसी को दें और अर्पित करें, सब कुछ केवल उसी में खोजें, और हर आवश्यकता में केवल उसी की शरण लें। इसी से प्रार्थना उत्पन्न होती है, इसी से स्तुति और धन्यवाद, जो उस महिमा की साक्षियाँ हैं जो हम उसे देते हैं। यही उसके नाम का वह सच्चा पवित्र ठहराया जाना है जो वह हम से सब बातों से बढ़कर चाहता है। इसके साथ आराधना जुड़ी है, जिसके द्वारा हम उसकी महानता और श्रेष्ठता के योग्य श्रद्धा प्रकट करते हैं, और इसके सहायक या साधन के रूप में रीतियाँ हैं, ताकि ईश्वरीय उपासना करते समय देह भी आत्मा के साथ अभ्यास में लगे। इनके बाद आत्म-दीनता आती है, जब संसार और शरीर को त्यागकर हम अपने मन के नए हो जाने से बदल जाते हैं, और अब अपने लिए नहीं जीते, वरन् उसके द्वारा शासित और संचालित होना स्वीकार करते हैं। इस आत्म-दीनता से हम उसकी इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता और समर्पण में प्रशिक्षित होते हैं, ताकि उसका भय हमारे हृदयों में राज्य करे और हमारे जीवन के सब कामों को नियमित करे। इन्हीं बातों में वह सच्ची और निष्कपट उपासना निहित है जिसे परमेश्वर ही अनुमोदित करता है और जिसमें वही प्रसन्न होता है; यह बात पवित्र आत्मा सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में सिखाता है, और विवाद से पहले ही भक्ति का स्पष्ट आदेश भी यही है। आरम्भ से परमेश्वर की उपासना की कोई दूसरी रीति नहीं थी; अन्तर केवल इतना था कि यह आत्मिक सत्य, जो हमारे यहाँ नग्न और सरल रूप में है, पूर्व व्यवस्था के अधीन प्रतीकों में लिपटा हुआ था। और हमारे उद्धारकर्ता के इन वचनों का अर्थ यही है,
“वह समय आता है, वरन् अब है, जिसमें सच्चे भक्त पिता का भजन आत्मा और सच्चाई से करेंगे,” (यूहन्ना 4:23।)
क्योंकि इन शब्दों से उसका अभिप्राय यह कहना नहीं था कि पुरखे इस आत्मिक रीति से परमेश्वर की उपासना नहीं करते थे, वरन् केवल बाहरी रूप में भेद दिखाना था, अर्थात् यह कि जहाँ उनके पास आत्मा अनेक प्रतीकों में छायारूप में था, वहाँ हमारे पास वह सरलता में है। परन्तु यह सदा से स्वीकृत बात रही है कि परमेश्वर, जो आत्मा है, उसकी उपासना आत्मा और सच्चाई से होनी चाहिए।
इसके अतिरिक्त, शुद्ध और बिगड़ी हुई उपासना के बीच भेद करनेवाला नियम सार्वभौमिक रूप से लागू होता है, ताकि हम कोई ऐसी युक्ति न अपनाएँ जो हमें स्वयं उचित लगे, वरन् केवल उसकी आज्ञा को देखें जिसे आज्ञा देने का एकमात्र अधिकार है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि वह हमारी उपासना को स्वीकार करे, तो इस नियम का, जिसे वह सर्वत्र अत्यन्त कठोरता से लागू करता है, सावधानी से पालन करना होगा। क्योंकि प्रभु के सब मनगढ़न्त उपासना-रीतियों को दोषी ठहराने और वर्जित करने में, और केवल अपनी ही वाणी की आज्ञाकारिता माँगने में, दोहरा कारण है। पहला, यह उसके अधिकार को स्थापित करने में बहुत सहायक है कि हम अपनी ही इच्छाओं के पीछे न चलें, वरन् पूरी तरह उसकी प्रभुता पर निर्भर रहें; और दूसरा, हमारी मूर्खता ऐसी है कि जब हमें स्वतन्त्र छोड़ दिया जाता है, तो हम भटकने के सिवा कुछ नहीं कर पाते। और जब एक बार हम सही मार्ग से हट जाते हैं, तब हमारे भटकने का कोई अन्त नहीं, जब तक हम अन्धविश्वासों की भीड़ तले दब न जाएँ। इसलिए प्रभु अपने प्रभुत्व का पूरा अधिकार जताने के लिए ठीक ही कठोरता से आज्ञा देता है कि वह हम से क्या चाहता है, और अपनी आज्ञा से विरोध रखनेवाली सब मानवीय युक्तियों को तुरन्त ठुकरा देता है। वह स्पष्ट शब्दों में हमारी सीमाएँ ठहराता है, यह भी ठीक ही है, ताकि हम उपासना की बिगड़ी हुई रीतियाँ गढ़कर उसके क्रोध को अपने विरुद्ध न भड़काएँ।
मैं जानता हूँ कि संसार को यह समझाना कितना कठिन है कि परमेश्वर उन सब उपासना-रीतियों को अस्वीकार करता है जो उसके वचन में स्पष्ट रूप से स्वीकृत नहीं हैं। इसके विपरीत जो धारणा उनसे चिपकी है, और मानो उनकी हड्डियों और मज्जा में बैठी है, वह यह है कि जो कुछ वे करते हैं उसे अपने आप में पर्याप्त अनुमोदन प्राप्त है, बशर्ते वह परमेश्वर के आदर के लिए किसी प्रकार का उत्साह दिखाता हो। परन्तु जब परमेश्वर उस सब को, जो उसकी उपासना के उत्साह से हम उसकी आज्ञा के विरुद्ध करते हैं, न केवल निष्फल समझता है, वरन् स्पष्ट रूप से घृणित भी ठहराता है, तब उलटा मार्ग अपनाने से हमें क्या मिलता है? परमेश्वर के वचन स्पष्ट और सुनिश्चित हैं,
“आज्ञा मानना बलिदान से उत्तम है।” “वे व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की आज्ञाओं को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं,” (1 शमूएल 15:22; मत्ती 15:9।)
उसके वचन में की गई हर वृद्धि, विशेषकर इस विषय में, झूठ है। केवल “स्वकल्पित उपासना” (ἐθελοθρησκεία) व्यर्थ है। यही निर्णय है, और जब न्यायी एक बार निर्णय सुना चुका, तब विवाद का समय नहीं रहता।
क्या अब महामहिम सम्राट इसे पहचानने की कृपा करेंगे, और क्या आप परम प्रतापी राजकुमारगण मेरी ओर ध्यान देंगे, जब मैं दिखाऊँगा कि वे सब रीति-रिवाज, जिनमें आज मसीही जगत भर में ईश्वरीय उपासना को सीमित कर दिया गया है, इस दृष्टिकोण से कितने पूर्णतः विपरीत हैं? शब्दों में तो वे सब भलाई की महिमा परमेश्वर को सौंप देते हैं, परन्तु वास्तव में वे उसकी सिद्ध विशेषताओं को सन्तों में बाँटकर उससे उसका आधा, या आधे से अधिक, छीन लेते हैं। हमारे विरोधी चाहे जितने बहाने बनाएँ, और जिन्हें वे तुच्छ भूलें बताते हैं उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर कहने के लिए हमारी निन्दा करें, मैं तो केवल वह तथ्य बताऊँगा जैसा हर मनुष्य उसे देखता है। ईश्वरीय कार्य सन्तों में ऐसे बाँटे जाते हैं मानो वे परमेश्वर के सहकर्मी नियुक्त किए गए हों, और अनेक अवसरों पर उनसे उसका काम करवाया जाता है जबकि वह दृष्टि से ओझल रखा जाता है। मैं जिस बात की शिकायत करता हूँ, उसे हर कोई एक प्रचलित कहावत में स्वीकार करता है। क्योंकि यह कहने का क्या अर्थ है कि “प्रभु प्रेरितों के बीच पहचाना नहीं जा सकता”, सिवा इसके कि प्रेरितों को जितना ऊँचा उठाया जाता है, उतना ही मसीह की गरिमा घटती है, या कम से कम धुँधली पड़ती है? इस विकृति का परिणाम यह है कि मनुष्य, जीवते जल के सोते को छोड़कर, जैसा यिर्मयाह हमें बताता है, उसके लिए अपने हाथों से खोदना सीख गए हैं
“हौद, वरन् टूटे हौद, जो जल नहीं रोक सकते,” (यिर्मयाह 2:13।)
क्योंकि वे उद्धार और हर दूसरी भलाई कहाँ खोजते हैं? क्या केवल परमेश्वर में? उनके जीवन का सम्पूर्ण ढर्रा इसके विपरीत की खुली घोषणा करता है। वे कहते अवश्य हैं कि वे उद्धार और हर दूसरी भलाई उसी में खोजते हैं; परन्तु यह निरा दिखावा है, क्योंकि वे उन्हें अन्यत्र खोजते हैं।
इस बात का स्पष्ट प्रमाण हमें उन भ्रष्टताओं में मिलता है जिनसे प्रार्थना पहले बिगड़ी, और फिर बड़ी मात्रा में विकृत होकर बुझा दी गई। हम देख चुके हैं कि प्रार्थना इस बात की कसौटी है कि प्रार्थी परमेश्वर को उचित महिमा देते हैं या नहीं। उसी प्रकार यह हमें यह पहचानने में भी समर्थ करेगी कि उसकी महिमा उससे छीनकर वे उसे सृजे हुओं को सौंपते हैं या नहीं। सच्ची प्रार्थना में केवल याचना से कुछ अधिक की आवश्यकता होती है। प्रार्थी को यह निश्चय होना चाहिए कि परमेश्वर ही एकमात्र है जिसकी शरण में उसे जाना चाहिए, इसलिए कि केवल वही आवश्यकता में उसकी सहायता कर सकता है, और इसलिए भी कि उसने ऐसा करने का वचन दिया है। परन्तु यह निश्चय किसी को तब तक नहीं हो सकता जब तक वह उस आज्ञा पर ध्यान न दे जिसके द्वारा परमेश्वर हमें अपने पास बुलाता है, और उस प्रतिज्ञा पर भी जो हमारी प्रार्थनाएँ सुनने की है और आज्ञा के साथ जुड़ी है। उस आज्ञा का तब आदर नहीं हुआ जब अधिकांश मनुष्य परमेश्वर के साथ-साथ स्वर्गदूतों और मरे हुए मनुष्यों को भी बिना भेद के पुकारने लगे, और अधिक समझदार वर्ग ने, यदि उन्हें परमेश्वर के स्थान पर नहीं पुकारा, तो कम से कम उन्हें ऐसे मध्यस्थ तो माना जिनकी विनती पर परमेश्वर उनकी बिनतियाँ पूरी करता है। तब वह प्रतिज्ञा कहाँ रही जो पूर्णतः मसीह की मध्यस्थता पर आधारित है? एकमात्र मध्यस्थ मसीह को छोड़कर प्रत्येक अपने उसी संरक्षक की शरण में चला गया जो उसकी कल्पना को भा गया, या यदि कभी मसीह को कोई स्थान दिया भी गया, तो वह ऐसा था जिसमें वह भीड़ में किसी साधारण व्यक्ति के समान अनदेखा पड़ा रहता था। फिर, यद्यपि सच्ची प्रार्थना के स्वभाव के लिए सन्देह और अविश्वास से अधिक विरोधी कुछ नहीं, तो भी ये इतने प्रबल हो गए कि लगभग ठीक प्रार्थना करने के लिए आवश्यक समझे जाने लगे। और यह क्यों हुआ? केवल इसलिए कि संसार ने उन शब्दों का बल नहीं समझा जिनमें परमेश्वर हमें अपने से प्रार्थना करने का निमन्त्रण देता है, अपनी आज्ञा और प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करके हम जो कुछ माँगें वह करने का वचन देता है, और मसीह को वह प्रतिनिधि ठहराता है जिसके नाम से हमारी प्रार्थनाएँ सुनी जाती हैं। इसके अतिरिक्त, कलीसियाओं में सामान्यतः प्रचलित सार्वजनिक प्रार्थनाओं को जाँच लीजिए। पाया जाएगा कि वे अनगिनत अशुद्धियों से कलंकित हैं। अतः उन्हीं से हम निर्णय कर सकते हैं कि ईश्वरीय उपासना का यह अंग कितना बिगड़ गया था। धन्यवाद की अभिव्यक्तियों में भी भ्रष्टता कम नहीं थी। इसकी गवाही वे सार्वजनिक भजन देते हैं जिनमें हर आशीष के लिए सन्तों की स्तुति की जाती है, मानो वे परमेश्वर के सहकर्मी हों।
फिर आराधना के विषय में मैं क्या कहूँ? क्या मनुष्य मूर्तियों और प्रतिमाओं को ठीक वही श्रद्धा नहीं देते जो वे परमेश्वर को देते हैं? यह मान लेना भूल है कि इस पागलपन और अन्यजातियों के पागलपन में कोई भेद है। क्योंकि परमेश्वर हमें न केवल मूर्तियों की आराधना करने से रोकता है, वरन् उन्हें अपने ईश्वरत्व का निवास समझने और उनमें बसे हुए उस ईश्वरत्व की आराधना करने से भी रोकता है। इस घृणित काम के पक्षधर आज जो बहाने बनाते हैं, वही बहाने पहले अन्यजाति अपनी अभक्ति को ढाँकने के लिए बनाते थे। इसके अतिरिक्त, यह निर्विवाद है कि सन्तों की, वरन् उनकी हड्डियों, वस्त्रों, जूतों और प्रतिमाओं की भी परमेश्वर के स्थान पर आराधना की जाती है। परन्तु कोई चतुर तर्कशास्त्री आपत्ति करेगा कि आराधना के भिन्न-भिन्न प्रकार हैं, कि जिसे वे दुलिया का आदर कहते हैं वह सन्तों, उनकी प्रतिमाओं और उनकी हड्डियों को दिया जाता है; और लात्रिया परमेश्वर के लिए सुरक्षित है क्योंकि वह केवल उसी का अधिकार है, सिवाय इसके कि हाइपरदुलिया को अपवाद माना जाए, जो एक ऐसा प्रकार है जिसे, जैसे-जैसे यह उन्माद बढ़ा, धन्य कुँवारी को शेष सबसे ऊपर बैठाने के लिए गढ़ा गया। मानो ये सूक्ष्म भेद उन लोगों के मन में, जो प्रतिमाओं के सामने दण्डवत् करते हैं, या तो जाने हुए हों या उपस्थित हों। इस बीच संसार ऐसी मूर्तिपूजा से भरा है जो मिस्रियों की प्राचीन मूर्तिपूजा से कम स्थूल नहीं, और यदि ऐसा कह सकूँ तो कम स्पर्श-योग्य भी नहीं, जिसकी सब भविष्यद्वक्ताओं ने सर्वत्र इतनी कठोरता से निन्दा की है।
मैं इन भ्रष्टताओं में से प्रत्येक पर केवल दृष्टि डाल रहा हूँ, क्योंकि आगे चलकर मैं इनके दोषों को अधिक स्पष्टता से प्रकट करूँगा।
अब मैं रीतियों पर आता हूँ, जिन्हें तो ईश्वरीय उपासना की गम्भीर साक्षियाँ होना चाहिए था, परन्तु वे परमेश्वर का निरा उपहास हैं। जिस यहूदी-धर्म को परमेश्वर ने स्पष्टतः रद्द कर दिया था, उसके स्थान पर एक नया यहूदी-धर्म फिर खड़ा कर दिया गया है, जो अलग-अलग स्थानों से बटोरे गए अनेक बचकाने ढकोसलों से बना है; और उनमें कुछ अधर्मी विधियाँ भी मिला दी गई हैं, जो कुछ तो अन्यजातियों से उधार ली गई हैं, और हमारे धर्म की गरिमा की अपेक्षा किसी नाट्य-प्रदर्शन के अधिक अनुकूल हैं। यहाँ पहली बुराई यह है कि रीतियों की एक विशाल संख्या, जिन्हें परमेश्वर ने अपने अधिकार से सदा के लिए रद्द कर दिया था, फिर से जिला दी गई है। दूसरी बुराई यह है कि जबकि रीतियों को भक्ति के जीवित अभ्यास होना चाहिए, मनुष्य व्यर्थ ही उनमें से ऐसी अनेक रीतियों में लगे रहते हैं जो तुच्छ और निरर्थक हैं। परन्तु सबसे अधिक घातक बुराई यह है कि जब मनुष्य इस प्रकार किसी न किसी तरह की रीतियों से परमेश्वर का उपहास कर चुकते हैं, तब वे समझते हैं कि उन्होंने अपना कर्तव्य ऐसे उत्तम रीति से पूरा कर दिया मानो इन रीतियों में भक्ति और ईश्वरीय उपासना का पूरा सार समाया हो।
आत्म-दीनता के विषय में, जिस पर नए जीवन के लिए नया जन्म निर्भर करता है, यह सारा सिद्धान्त मनुष्यों के मन से बिलकुल मिटा दिया गया, या कम से कम आधा दबा दिया गया, यहाँ तक कि वह थोड़े ही लोगों को ज्ञात था, और उन्हें भी बहुत हल्के रूप में। परन्तु वह आत्मिक बलिदान, जिसकी प्रभु विशेष रूप से अनुशंसा करता है, यही है कि पुराने मनुष्यत्व को मार डाला जाए और नए मनुष्य में बदल जाया जाए। सम्भव है प्रचारक इन शब्दों के विषय में कुछ तुतलाकर कह देते हों, परन्तु इन शब्दों के अर्थ की बातों का उन्हें कोई बोध नहीं, यह इसी से प्रकट है कि जब हम उपासना के इस अंग को पुनःस्थापित करने का यत्न करते हैं तो वे हमारा डटकर विरोध करते हैं। यदि वे कभी पश्चाताप पर प्रवचन करते भी हैं, तो प्रमुख महत्त्व की बातों को मानो तिरस्कार से छूकर निकल जाते हैं, और पूरी तरह देह के कुछ बाहरी अभ्यासों पर ही टिके रहते हैं, जो, जैसा पौलुस हमें निश्चय दिलाता है, सर्वोच्च उपयोग के नहीं हैं, (कुलुस्सियों 2:23; 1 तीमुथियुस 4:8।) इस हठधर्मिता को और भी असहनीय बनानेवाली बात यह है कि अधिकांश लोग, एक घातक भ्रम में पड़कर, वस्तु के स्थान पर छाया के पीछे दौड़ते हैं, और सच्चे पश्चाताप को अनदेखा करके अपना सारा ध्यान उपवासों, जागरणों और अन्य ऐसी बातों में लगा देते हैं जिन्हें पौलुस संसार की “निर्बल और निकम्मी बातें” कहता है।
यह देख लेने के पश्चात् कि परमेश्वर की तलवार वह कसौटी है जो उसकी सच्ची उपासना को झूठी और बिगड़ी हुई उपासना से अलग करती है, हम सहज ही यह निष्कर्ष निकालते हैं कि आजकल प्रचलित ईश्वरीय उपासना का सम्पूर्ण रूप निरी भ्रष्टता के सिवा कुछ नहीं। क्योंकि मनुष्य इस पर ध्यान नहीं देते कि परमेश्वर ने क्या आज्ञा दी है, या वह किस बात को स्वीकार करता है, ताकि वे उचित रीति से उसकी सेवा करें, वरन् उपासना की रीतियाँ गढ़ने की छूट अपने ऊपर ले लेते हैं, और फिर उन्हें आज्ञाकारिता के बदले में उस पर थोप देते हैं। यदि मेरे कथन में अतिशयोक्ति प्रतीत हो, तो उन सब कामों की जाँच की जाए जिनके द्वारा साधारण लोग समझते हैं कि वे परमेश्वर की उपासना करते हैं। मैं उनके दसवें भाग को भी यह कहकर स्वीकार करने का साहस मुश्किल से करूँगा कि वह उनके अपने मस्तिष्क की अन्धाधुन्ध उपज नहीं। और क्या चाहिए? परमेश्वर सब मनगढ़न्त उपासना को ठुकराता, दोषी ठहराता और घृणित मानता है, और अपने वचन को लगाम के समान काम में लाता है कि हम पूर्ण आज्ञाकारिता में बने रहें। जब हम इस जूए को उतार फेंकते हैं और अपनी कल्पनाओं के पीछे भटकते और उसे ऐसी उपासना चढ़ाते हैं जो मानवीय दुस्साहस की रचना है, तब वह हमें चाहे जितनी भाए, उसकी दृष्टि में वह व्यर्थ का खिलवाड़ है, वरन् नीचता और अशुद्धता है। मानवीय परम्पराओं के पक्षधर उन्हें सुन्दर और भड़कीले रंगों में चित्रित करते हैं; और पौलुस निश्चय मानता है कि उनमें बुद्धि का आभास है; परन्तु चूँकि परमेश्वर आज्ञाकारिता को सब बलिदानों से अधिक मूल्यवान समझता है, इसलिए किसी भी उपासना-रीति को ठुकराने के लिए यही पर्याप्त होना चाहिए कि उसे परमेश्वर की आज्ञा का अनुमोदन प्राप्त नहीं।
अब हम उस पर आते हैं जिसे हमने मसीही सिद्धान्त की दूसरी प्रमुख शाखा ठहराया है, अर्थात् उस स्रोत का ज्ञान जिससे उद्धार प्राप्त होना है। अब, हमारे उद्धार के ज्ञान में तीन भिन्न सीढ़ियाँ हैं। पहले, हमें अपनी निजी दुर्दशा के बोध से आरम्भ करना होगा, जो हमें निराशा से भर दे, मानो हम आत्मिक रूप से मरे हुए हों। यह प्रभाव तब उत्पन्न होता है जब हमारे स्वभाव की मूल और पैतृक भ्रष्टता को सारी बुराई के स्रोत के रूप में हमारे सामने रखा जाता है, वह भ्रष्टता जो हम में अविश्वास, परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह, घमण्ड, लोभ, वासना और हर प्रकार की बुरी लालसा उत्पन्न करती है, और हमें सब खरेपन और धार्मिकता से विमुख करके पाप के जूए तले बन्दी बनाए रखती है; और जब, इसके अतिरिक्त, प्रत्येक व्यक्ति अपने पापों के प्रकट होने पर अपनी नीचता से घबराकर अपने आप से असन्तुष्ट होने को विवश हो जाता है और अपने आपको तथा अपने पास जो कुछ अपना है उस सबको शून्य से भी तुच्छ गिनता है; तब दूसरी ओर, विवेक परमेश्वर के न्यायालय के सामने बुलाया जाकर उस शाप को अनुभव करता है जिसके अधीन वह पड़ा है, और मानो अनन्त मृत्यु की चेतावनी पा चुका हो, ईश्वरीय क्रोध से काँपना सीखता है। मैं कहता हूँ, उद्धार के मार्ग में यह पहली सीढ़ी है जब पापी, कुचला और गिरा हुआ होकर, शारीरिक सहायता की सब आशा छोड़ देता है, फिर भी परमेश्वर की धार्मिकता के विरुद्ध अपने को कठोर नहीं करता, और न स्तब्ध होकर संवेदनहीन बनता है, वरन् काँपता और व्याकुल होकर पीड़ा में कराहता और छुटकारे के लिए आहें भरता है। यहाँ से उसे दूसरी सीढ़ी पर चढ़ना चाहिए। यह वह तब करता है जब मसीह के ज्ञान से प्रोत्साहित होकर वह फिर साँस लेने लगता है। क्योंकि जो जन उस प्रकार दीन किया गया है जैसा हमने वर्णन किया, उसके लिए मसीह की ओर फिरने के सिवा कोई मार्ग नहीं बचता, ताकि उसकी मध्यस्थता से वह दुर्दशा से छुड़ाया जाए। परन्तु मसीह में उद्धार खोजनेवाला केवल वही मनुष्य है जो उसकी सामर्थ्य का विस्तार जानता है; अर्थात् उसे एकमात्र याजक मानता है जो हमारा पिता से मेल कराता है, और उसकी मृत्यु को वह एकमात्र बलिदान, जिससे पाप का प्रायश्चित्त होता, ईश्वरीय धार्मिकता सन्तुष्ट होती, और सच्ची तथा सिद्ध धार्मिकता प्राप्त होती है; जो, संक्षेप में, कार्य को अपने और मसीह के बीच नहीं बाँटता, वरन् यह स्वीकार करता है कि परमेश्वर की दृष्टि में वह केवल निःशुल्क अनुग्रह से ही धर्मी ठहराया जाता है। इस सीढ़ी से भी उसे तीसरी पर चढ़ना होगा, जब मसीह के अनुग्रह और उसकी मृत्यु तथा पुनरुत्थान के फलों की शिक्षा पाकर वह उसमें दृढ़ और ठोस भरोसे के साथ विश्राम करता है, यह निश्चय रखते हुए कि मसीह पूरी तरह उसका अपना है, और उसमें उसे धार्मिकता और जीवन प्राप्त है।
अब देखिए कि इस सिद्धान्त को कितनी बुरी तरह बिगाड़ा गया है। मूल पाप के विषय में विद्वत्तावादियों ने उलझन भरे प्रश्न उठाए हैं, जिन्होंने इस घातक रोग को समझाकर टालने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी; क्योंकि अपनी चर्चाओं में वे उसे शारीरिक भूख और वासना की अधिकता से कुछ ही अधिक तक सीमित कर देते हैं। बुद्धि के उस अन्धेपन और व्यर्थता के विषय में, जिससे अविश्वास और अन्धविश्वास निकलते हैं, आत्मा की भीतरी भ्रष्टता के विषय में, घमण्ड, महत्त्वाकांक्षा, हठ और बुराइयों के अन्य गुप्त स्रोतों के विषय में वे एक शब्द नहीं कहते। और उपदेश भी तनिक अधिक खरे नहीं। फिर स्वतन्त्र इच्छा के सिद्धान्त के विषय में, जैसा कि लूथर और अन्य धर्म-सुधारकों के प्रकट होने से पहले प्रचार किया जाता था, उसका और क्या प्रभाव हो सकता था सिवा इसके कि वह मनुष्यों को अपने ही सद्गुण की अभिमानी धारणा से भर दे, उन्हें व्यर्थ घमण्ड से फुला दे, और पवित्र आत्मा के अनुग्रह और सहायता के लिए कोई स्थान न छोड़े? परन्तु इस पर क्यों ठहरें? कोई ऐसा विषय नहीं जिस पर इतना तीव्र विवाद हो, और जिसमें हमारे विरोधी इतने कट्टर हों, जितना धर्मी ठहराए जाने का विषय, अर्थात् यह कि हम उसे विश्वास से पाते हैं या कर्मों से। वे किसी भी दशा में हमें यह अनुमति नहीं देंगे कि हम मसीह को हमारी धार्मिकता कहलाने का आदर दें, जब तक उनके कर्म भी साथ ही पुण्य में हिस्सा न पाएँ। विवाद यह नहीं है कि भक्तों को भले कर्म करने चाहिए या नहीं, और क्या वे परमेश्वर को स्वीकार्य हैं और वह उन्हें प्रतिफल देता है या नहीं, परन्तु यह है कि क्या अपने ही मूल्य से वे हमारा परमेश्वर से मेल कराते हैं; क्या हम उनके दाम पर अनन्त जीवन पाते हैं, क्या वे ऐसी क्षतिपूर्तियाँ हैं जो परमेश्वर की धार्मिकता को चुकाई जाती हैं ताकि दोष मिट जाए, और क्या उन पर उद्धार की नींव के रूप में भरोसा रखना चाहिए। हम उस भूल की निन्दा करते हैं जो मनुष्यों को आज्ञा देती है कि परमेश्वर को अनुकूल बनाने, उसका अनुग्रह कमाने और अनन्त जीवन की मीरास पाने के साधन के रूप में, संक्षेप में उसकी दृष्टि में धर्मी बनने के साधन के रूप में, वे मसीह से अधिक अपने कर्मों का आदर करें। पहले तो वे कर्मों के पुण्य पर इतराते हैं, मानो उन्होंने परमेश्वर को अपना ऋणी बना लिया हो। ऐसा घमण्ड आत्मा के घातक नशे के सिवा और क्या है? क्योंकि मसीह के स्थान पर वे अपनी ही आराधना करते हैं, और मृत्यु की गहरी खाई में डूबे हुए जीवन पाने के स्वप्न देखते हैं। कहा जा सकता है कि मैं इस विषय में बढ़ा-चढ़ाकर कह रहा हूँ, परन्तु कोई मनुष्य इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि पाठशालाओं और कलीसियाओं का घिसा-पिटा सिद्धान्त यही है कि हमें कर्मों के द्वारा परमेश्वर का अनुग्रह कमाना और कर्मों के द्वारा अनन्त जीवन प्राप्त करना है; कि भले कर्मों के सहारे के बिना उद्धार की कोई भी आशा उतावली और ढिठाई है; कि हम पापों की निःशुल्क क्षमा से नहीं, वरन् भले कर्मों की क्षतिपूर्ति से परमेश्वर के साथ मेल पाते हैं; कि भले कर्म अनन्त उद्धार के योग्य पुण्य हैं, इसलिए नहीं कि वे मसीह की योग्यताओं के द्वारा धार्मिकता के लिए मुफ़्त गिने जाते हैं, परन्तु व्यवस्था के अर्थ में; और यह कि मनुष्य जितनी बार परमेश्वर का अनुग्रह खो देते हैं, उतनी बार वे उससे निःशुल्क क्षमा से नहीं, वरन् उन कर्मों से मेल पाते हैं जिन्हें वे प्रायश्चित्त के कर्म कहते हैं, और इन कर्मों की कमी मसीह और शहीदों की योग्यताओं से पूरी की जाती है, बशर्ते पापी इस प्रकार सहायता पाने के योग्य हो। यह निश्चित है कि लूथर के संसार में जाने जाने से पहले सब मनुष्य इन अधर्मी सिद्धान्तों पर मोहित थे; और आज भी हमारे सिद्धान्त का कोई अंश ऐसा नहीं जिसका हमारे विरोधी इससे अधिक उत्साह और हठ से खण्डन करते हों।
अन्त में एक और अत्यन्त महामारी-जैसी भूल थी, जिसने न केवल मनुष्यों के मन पर अधिकार जमाया, वरन् विश्वास के प्रमुख अनुच्छेदों में से एक मानी गई, जिस पर सन्देह करना भी अधर्म था, अर्थात् यह कि विश्वासियों को परमेश्वर के अनुग्रह में अपने भाग के विषय में सदा अनिश्चय और अधर में रहना चाहिए। शैतान के इस सुझाव से विश्वास की सामर्थ्य पूरी तरह बुझा दी गई, मसीह के मोल लेने के लाभ नष्ट कर दिए गए, और मनुष्यों का उद्धार उलट दिया गया। क्योंकि जैसा पौलुस घोषणा करता है, वही विश्वास मसीही विश्वास है जो हमारे हृदयों में भरोसा उत्पन्न करता और हमें परमेश्वर की उपस्थिति में आने का साहस देता है, (रोमियों 5:2।) किसी और दृष्टि से उसका वह सिद्धान्त, जो उसने दूसरे स्थान पर कहा, टिक नहीं सकता, अर्थात् यह कि
“तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली, परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम अब्बा, हे पिता, कहकर पुकारते हैं,” (रोमियों 8:15।)
परन्तु जो हिचकिचाहट हमारे शत्रु अपने शिष्यों से माँगते हैं, उसका प्रभाव परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर सारे भरोसे को मिटा देने के सिवा और क्या है? पौलुस तर्क देता है कि
“यदि व्यवस्थावाले ही वारिस हैं तो विश्वास व्यर्थ और प्रतिज्ञा निष्फल ठहरी,” (रोमियों 4:14।)
ऐसा क्यों? केवल इसलिए कि व्यवस्था मनुष्य को सन्देह में रखती है, और उसे निश्चित और दृढ़ भरोसा रखने नहीं देती। परन्तु वे, दूसरी ओर, ऐसे विश्वास का स्वप्न देखते हैं जो मनुष्य को उस भरोसे से, जिसकी पौलुस माँग करता है, बाहर करके और दूर धकेलकर अनुमान पर फेंक देता है, ताकि वह हवा से हिलते हुए सरकण्डे के समान डोलता रहे। और यह आश्चर्य की बात नहीं कि जब उन्होंने एक बार अपनी उद्धार की आशा कर्मों के पुण्य पर टिका दी, तो वे इस सारी बेतुकी बात में जा गिरे। ऐसी चट्टान की ऊँचाई से उनका ऐसा गिरना अनिवार्य ही था। क्योंकि मनुष्य अपने कर्मों में सन्देह की, और अन्ततः निराशा की सामग्री के सिवा और क्या पा सकता है? इस प्रकार हम देखते हैं कि भूल से भूल कैसे उपजी।
यहाँ, प्रबल सम्राट, और परम प्रतापी राजकुमारो, आपको वह बात स्मरण दिलाना आवश्यक होगा जो मैंने पहले कही थी, अर्थात् यह कि कलीसिया की सुरक्षा इस सिद्धान्त पर उतनी ही निर्भर है जितना मानव-जीवन प्राण पर। यदि इस सिद्धान्त की शुद्धता किसी भी मात्रा में घटे, तो कलीसिया को घातक घाव लगा; और इसलिए जब मैं दिखा चुका होऊँगा कि वह अधिकांश में बुझा दिया गया था, तो वह वैसा ही होगा मानो मैंने दिखा दिया हो कि कलीसिया विनाश के कगार तक पहुँचा दी गई थी। अब तक मैंने इसका केवल प्रसंगवश संकेत किया है, परन्तु आगे चलकर मैं इसे अधिक स्पष्टता से खोलूँगा।
अब मैं उन बातों पर आता हूँ जिनकी मैंने देह से उपमा दी थी, अर्थात् शासन और संस्कारों का संचालन, जिनमें, जब सिद्धान्त उलट दिया जाए, तो उनकी शक्ति और उपयोगिता जाती रहती है, चाहे बाहरी रूप निर्दोष ही क्यों न हो। तो फिर क्या होगा यदि उनमें न बाहर से और न भीतर से कोई स्वस्थता थी? और यह दिखाना कठिन नहीं कि यही स्थिति थी। पहले, संस्कारों के विषय में, मनुष्यों की गढ़ी हुई रीतियाँ मसीह के ठहराए हुए भेदों के समान ही पंक्ति में रख दी गईं। क्योंकि सात संस्कार बिना किसी भेद के स्वीकार किए गए, जबकि मसीह ने केवल दो ठहराए, और अन्य केवल मानवीय अधिकार पर आधारित थे। फिर भी इनके साथ परमेश्वर का अनुग्रह उतना ही जुड़ा माना गया, मानो मसीह स्वयं उनमें उपस्थित हो। इसके अतिरिक्त, जिन दो को मसीह ने ठहराया, वे भयंकर रूप से बिगाड़े गए। बपतिस्मा फालतू जोड़ों से इतना ढँक गया कि शुद्ध और सच्चे बपतिस्मा का चिह्न मुश्किल से खोजा जा सकता था; जबकि प्रभु-भोज बाहरी रीतियों से ही नहीं बिगड़ा, वरन् उसका रूप ही पूरी तरह बदल गया। मसीह ने क्या करने की आज्ञा दी, और किस क्रम में, यह बिलकुल स्पष्ट है। परन्तु उसकी आज्ञा का तिरस्कार करके एक नाट्य-प्रदर्शन खड़ा किया गया, और प्रभु-भोज के स्थान पर रख दिया गया। क्योंकि मिस्सा और हमारे प्रभु के सच्चे भोज में क्या समानता है? जबकि मसीह की आज्ञा विश्वासियों को उसकी देह और लहू के पवित्र चिह्नों में एक-दूसरे के साथ सहभागी होने को कहती है, मिस्सा में जो दिखाई देता है उसे अधिक उचित रूप से बहिष्कार कहा जाना चाहिए। क्योंकि याजक सभा के शेष लोगों से अलग हो जाता है, और जो बीच में लाकर बाँटा जाना चाहिए था उसे अलग बैठकर निगल जाता है। फिर, मानो वह हारून का कोई उत्तराधिकारी हो, वह ढोंग करता है कि वह लोगों के पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए बलिदान चढ़ाता है। परन्तु मसीह ने बलिदान का उल्लेख कहाँ एक बार भी किया? वह हमें लेने, खाने और पीने को कहता है। लेने को चढ़ाना बना देने का अधिकार मनुष्यों को कौन देता है? और इस परिवर्तन का परिणाम इसके सिवा क्या है कि मसीह की स्थायी और अटल आज्ञा उनकी युक्तियों के आगे झुक जाए? यह सचमुच भारी बुराई है। परन्तु उससे भी बुरा वह अन्धविश्वास है जो इस काम को अनुग्रह प्राप्त करने के निमित्त कारण के रूप में जीवितों और मरे हुओं पर लागू करता है। इस प्रकार मसीह की मृत्यु की प्रभावकारिता एक व्यर्थ नाट्य-प्रदर्शन को सौंप दी गई है, और अनन्त याजकपद की गरिमा उससे छीनकर मनुष्यों को दे दी गई है। यदि कभी लोगों को सहभागिता के लिए बुलाया जाता है, तो उन्हें केवल आधा भाग दिया जाता है। ऐसा क्यों? मसीह सब को कटोरा देता और सब को उसमें से पीने की आज्ञा देता है; इसके विपरीत मनुष्य विश्वासियों की सभा को कटोरे को छूने से रोकते हैं। इस प्रकार वे चिह्न जो मसीह के अधिकार से अटूट बन्धन में जुड़े थे, मानवीय सनक से अलग कर दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त, बपतिस्मा और मिस्सा दोनों का समर्पण जादुई मन्त्रों से किसी बात में भिन्न नहीं। क्योंकि साँस फूँकने, फुसफुसाने और अबूझ ध्वनियों से वे समझते हैं कि वे भेद सिद्ध करते हैं। मानो मसीह की यह इच्छा रही हो कि धार्मिक विधियाँ करते समय उसका वचन बुदबुदाया जाए, न कि स्पष्ट स्वर में सुनाया जाए। सुसमाचार जिन शब्दों में बपतिस्मा की सामर्थ्य, स्वभाव और उपयोग को प्रकट करता है, उनमें कोई अस्पष्टता नहीं। फिर प्रभु-भोज में मसीह रोटी पर बुदबुदाता नहीं, वरन् प्रेरितों को स्पष्ट शब्दों में सम्बोधित करता है, जब वह प्रतिज्ञा सुनाता और आज्ञा जोड़ता है, “मेरे स्मरण के लिए यही किया करो।” इस सार्वजनिक स्मरण के स्थान पर वे गुप्त मन्त्र फुसफुसाते हैं, जो, जैसा मैं कह चुका हूँ, संस्कारों की अपेक्षा जादू-टोने की कलाओं के अधिक अनुकूल हैं। यहाँ हमारी पहली शिकायत यह है कि लोगों का मनोरंजन भड़कीली रीतियों से किया जाता है, जबकि उनके अर्थ और सच्चाई के विषय में एक शब्द नहीं कहा जाता। क्योंकि संस्कारों का कोई उपयोग नहीं जब तक कि जो वस्तु चिह्न दृश्य रूप में दर्शाता है, उसे परमेश्वर के वचन के अनुसार समझाया न जाए। इसलिए जब लोगों के सामने आँख को तृप्त करने के लिए खोखले प्रतीकों के सिवा कुछ नहीं रखा जाता, और वे कोई ऐसी शिक्षा नहीं सुनते जो उन्हें उचित अन्त की ओर निर्देशित करे, तो वे बाहरी कर्म से आगे नहीं देखते। इसी से वह अत्यन्त महामारी-जैसा अन्धविश्वास उपजा, जिसके अधीन वे, मानो उद्धार के लिए संस्कार ही पर्याप्त हों, विश्वास या पश्चाताप या स्वयं मसीह की भी कोई चिन्ता किए बिना, चिह्न द्वारा सूचित वस्तु के स्थान पर चिह्न से ही चिपक जाते हैं। और वस्तुतः यह दुष्ट सिद्धान्त न केवल अनपढ़ जनसाधारण में, वरन् पाठशालाओं में भी सर्वत्र प्रचलित हुआ कि संस्कार अपने आप में प्रभावकारी हैं, यदि घातक पाप उनके कार्य में बाधा न डाले; मानो संस्कार हमें हाथ पकड़कर मसीह तक पहुँचाने के सिवा किसी और प्रयोजन या उपयोग के लिए दिए गए हों। फिर, इसके ऊपर, रोटी को भक्तिमय विधि से अधिक विकृत मन्त्र के द्वारा समर्पित करने के पश्चात् वे उसे एक छोटे डिब्बे में रखते हैं, और कभी-कभी गम्भीर ठाठ से उसे घुमाते हैं, ताकि मसीह के स्थान पर उसकी आराधना की जाए और उससे प्रार्थना की जाए। तदनुसार, जब कोई संकट आता है, तो वे अपनी एकमात्र रक्षा मानकर उसी रोटी की शरण में भागते हैं, उसे सब दुर्घटनाओं के विरुद्ध ताबीज़ के रूप में बरतते हैं, और परमेश्वर से क्षमा माँगते समय उसे सर्वोत्तम प्रायश्चित्त के रूप में प्रयोग करते हैं; मानो जब मसीह ने संस्कार में हमें अपनी देह दी, तो उसका अभिप्राय यह रहा हो कि उसे सब प्रकार की बेतुकी बातों के लिए भ्रष्ट किया जाए। क्योंकि प्रतिज्ञा का सार क्या है? केवल यही कि जितनी बार हम संस्कार ग्रहण करें, हम उसकी देह और लहू के सहभागी हों। वह कहता है, “लो, खाओ और पीओ; यह मेरी देह है, यह मेरा लहू है। मेरे स्मरण के लिए यही किया करो।” क्या हम नहीं देखते कि प्रतिज्ञा दोनों ओर सीमाओं से घिरी है, जिनके भीतर हमें अपने को रखना होगा यदि हम वह पाना चाहें जो वह प्रस्तुत करती है? इसलिए वे धोखे में हैं जो कल्पना करते हैं कि संस्कार के वैध उपयोग से अलग उनके पास साधारण और असमर्पित रोटी के सिवा कुछ है। फिर, इन सब धार्मिक विधियों में एक अपवित्रता सामान्य है, अर्थात् यह कि उन्हें लज्जाजनक व्यापार का विषय बना दिया गया है, मानो वे लाभ की सेवा के सिवा किसी और प्रयोजन के लिए ठहराई ही न गई हों। और यह व्यापार छिपकर या संकोच से नहीं चलाया जाता; वह सार्वजनिक बाज़ार की भाँति खुलेआम चलता है। प्रत्येक जिले में ज्ञात है कि एक मिस्सा कितने में बिकता है। अन्य विधियों के भी निश्चित दाम हैं। संक्षेप में, जो भी विचार करे उसे दिखाई देगा कि कलीसियाएँ साधारण दुकानें हैं, और कोई भी पवित्र विधि ऐसी नहीं जो वहाँ बिक्री के लिए प्रदर्शित न हो।
यदि मैं कलीसियाई शासन के दोषों को विस्तार से गिनाने लगूँ, तो कभी समाप्त न कर पाऊँगा। इसलिए मैं केवल कुछ अधिक स्थूल दोषों की ओर संकेत करूँगा, जिन्हें छिपाया नहीं जा सकता। और पहले तो पासबानी का पद ही, जैसा मसीह ने ठहराया था, बहुत समय से व्यवहार से बाहर हो गया है। अध्यक्षों और पासबानों को, या उन्हें जिस भी नाम से पुकारा जाए, नियुक्त करने में उसका उद्देश्य निश्चय ही यह था, जैसा पौलुस घोषणा करता है, कि वे खरे सिद्धान्त से कलीसिया की उन्नति करें। इस दृष्टि से कोई मनुष्य कलीसिया का सच्चा पासबान नहीं जो शिक्षा देने का काम नहीं करता। परन्तु आजकल जिनका नाम पासबान है, लगभग वे सब इस काम को दूसरों पर छोड़ चुके हैं। सौ अध्यक्षों में मुश्किल से एक मिलेगा जो कभी शिक्षा देने के लिए मंच पर चढ़ता हो। और इसमें आश्चर्य नहीं; क्योंकि अध्यक्ष-पद सांसारिक रियासतों में बदल गए हैं। फिर निचले दर्जे के पासबान या तो समझते हैं कि वे मसीह की आज्ञा से सर्वथा परे तुच्छ क्रियाओं से अपना पद पूरा कर देते हैं, या अध्यक्षों के उदाहरण पर कर्तव्य का यह अंश भी दूसरों के कन्धों पर डाल देते हैं। इसलिए याजकीय पदों को किराए पर चढ़ाना खेतों को किराए पर चढ़ाने से कम सामान्य नहीं। और क्या चाहिए? जिस आत्मिक शासन की मसीह ने अनुशंसा की थी वह पूरी तरह लुप्त हो गया है, और एक नए और वर्णसंकर प्रकार का शासन चला दिया गया है, जो चाहे जिस नाम से चले, पहले के साथ उतनी ही समानता रखता है जितनी संसार को मसीह के राज्य से। यदि आपत्ति की जाए कि जो अपने कर्तव्य की उपेक्षा करते हैं उनका दोष पद-श्रेणी पर नहीं मढ़ा जाना चाहिए, तो मेरा उत्तर यह है, पहला, कि बुराई इतनी सर्वव्यापी है कि उसे सामान्य नियम माना जा सकता है; और दूसरा, कि यदि हम मान भी लें कि सब अध्यक्ष और उनके अधीन सब प्रेस्बिटर अपने-अपने निर्धारित स्थान पर रहते हैं और वह करते हैं जो आजकल व्यावसायिक कर्तव्य माना जाता है, तब भी वे मसीह की सच्ची विधि को कभी पूरा न करेंगे। वे कलीसिया में गाएँगे या बुदबुदाएँगे, नाट्य-वेशभूषा में अपने को दिखाएँगे, और अनेक रीतियों से गुज़रेंगे, परन्तु शिक्षा कभी-कभार ही देंगे, यदि कभी देंगे भी। फिर भी मसीह की आज्ञा के अनुसार कोई मनुष्य अध्यक्ष या पासबान के पद का दावा नहीं कर सकता जो अपने झुण्ड को प्रभु के वचन से नहीं चराता।
फिर, जबकि कलीसिया में अगुवाई करनेवालों को औरों से श्रेष्ठ होना और अधिक पवित्र जीवन के उदाहरण से चमकना चाहिए, आजकल जो उस पद पर हैं वे इस विषय में अपनी बुलाहट के कितने अनुरूप हैं! ऐसे समय में जब संसार की भ्रष्टता अपनी चरम सीमा पर है, कोई वर्ग सब प्रकार की दुष्टता में इनसे अधिक डूबा नहीं। मैं चाहता हूँ कि वे अपनी निर्दोषता से मेरे कथन का खण्डन करें। मैं कितनी प्रसन्नता से तुरन्त उसे वापस ले लूँगा। परन्तु उनकी नीचता सब की आँखों के सामने खुली पड़ी है, उनका अतृप्त लोभ और लूट खुली पड़ी है, उनका असहनीय घमण्ड और क्रूरता खुली पड़ी है। अश्लील रंगरलियों और नाच का शोर, जुए की धुन, और हर प्रकार की असंयम से भरी दावतें, उनके घरों में केवल साधारण बातें हैं, जबकि वे अपने विलासी स्वादिष्ट व्यंजनों पर ऐसे गर्व करते हैं मानो वे विशिष्ट सद्गुण हों। अन्य बातों को चुपचाप छोड़ते हुए भी, उस ब्रह्मचर्य में कैसी दण्डहीनता है जिसे वे स्वयं ही आदर का पद मानते हैं! मुझे उन घोर पापों को खोलने में लज्जा आती है जिन्हें मैं चुपचाप दबा देना कहीं अधिक पसन्द करता, यदि वे चुप रहने से सुधर सकते। और मैं वह भी प्रकट न करूँगा जो गुप्त में किया जाता है। जो अशुद्धताएँ खुलेआम दिखाई देती हैं वे पर्याप्त से अधिक हैं। कृपया बताइए, कितने याजक व्यभिचार से मुक्त हैं? वरन् उनके कितने ही घर प्रतिदिन के लम्पट कामों के लिए कुख्यात हैं? अपनी आवारा वासनाओं से वे कितने ही प्रतिष्ठित कुलों को अशुद्ध करते हैं? मुझे तो उनके दोष उघाड़ने में कोई आनन्द नहीं, और यह मेरे उद्देश्य का अंग भी नहीं, परन्तु यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि आजकल के याजक-वर्ग के आचरण में, और उस आचरण में जिस पर चलने को मसीह और उसकी कलीसिया के सच्चे सेवक बँधे हैं, कितना बड़ा अन्तर है।
कलीसियाई शासन का कम महत्त्व का अंग नहीं, उन लोगों का उचित और नियमित चुनाव और अभिषेक है जिन्हें शासन करना है। परमेश्वर का वचन वह मानक देता है जिस पर ऐसी सब नियुक्तियों को परखा जाना चाहिए, और प्राचीन महासभाओं के अनेक आदेश हैं जो चुनाव की उचित विधि से सम्बन्धित हर बात का सावधानी और बुद्धिमानी से प्रबन्ध करते हैं। तो हमारे विरोधी वैध चुनाव का एक अकेला उदाहरण भी प्रस्तुत करें, और मैं उन्हें विजय दे दूँगा। हम जानते हैं कि पवित्र आत्मा ने पौलुस के मुँह से (तीमुथियुस और तीतुस की पत्रियों में) पासबान से किस प्रकार की परीक्षा से गुज़रने की माँग की है, और प्राचीन पिताओं के पुराने नियम क्या आज्ञा देते हैं। आजकल अध्यक्षों की नियुक्ति में क्या ऐसी कोई बात दिखाई देती है? वरन् जो उस पद पर उठाए जाते हैं उनमें से कितने थोड़े हैं जिनमें वे गुण हल्के रूप में भी हों जिनके बिना वे कलीसिया के योग्य सेवक नहीं हो सकते? हम वह क्रम देखते हैं जो प्रेरितों ने सेवकों को अभिषिक्त करने में निभाया, जिसका आदिम कलीसिया ने आगे चलकर पालन किया, और अन्त में जिसके पालन की माँग प्राचीन नियम करते हैं। यदि मैं शिकायत करूँ कि इस समय यह क्रम ठुकराया और तिरस्कृत किया जाता है, तो क्या शिकायत उचित न होगी? तब क्या मैं यह कहूँ कि हर आदरणीय बात पैरों तले रौंदी जाती है, और पदोन्नति अत्यन्त लज्जाजनक और कुकर्मी युक्तियों से प्राप्त की जाती है? यह तथ्य सर्वविदित है। क्योंकि कलीसियाई पद या तो निर्धारित दाम पर खरीदे जाते हैं, या बल के हाथ से छीने जाते हैं, या दुष्ट कामों से हथियाए जाते हैं, या नीच चाटुकारिता से पाए जाते हैं। कभी-कभी तो वे दलाली और ऐसी ही सेवाओं की मज़दूरी के रूप में दिए जाते हैं। संक्षेप में, यहाँ वे निर्लज्ज कार्य दिखाई देते हैं जो सांसारिक सम्पत्ति के अर्जन में भी कभी नहीं होते।
और भला होता कि कलीसिया में अगुवाई करनेवाले, जब वे उसके शासन को बिगाड़ते हैं, केवल अपने ही लिए पाप करते, या कम से कम अपने बुरे उदाहरण के सिवा और किसी बात से दूसरों को हानि न पहुँचाते! परन्तु सब से दुहाई देने योग्य बुराई यह है कि वे अत्यन्त क्रूर अत्याचार चलाते हैं, और वह भी आत्माओं पर अत्याचार। वरन् आजकल कलीसिया की जिस अधिकार-शक्ति की डींग हाँकी जाती है, वह आत्माओं पर निरंकुश, उच्छृंखल, बेरोक-टोक प्रभुत्व के सिवा और क्या है, जो उन्हें अत्यन्त दयनीय दासता में जकड़ देता है? मसीह ने प्रेरितों को वैसा ही अधिकार दिया जैसा परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं को दिया था, एक ऐसा अधिकार जिसकी सीमा ठीक-ठीक निर्धारित थी, अर्थात् मनुष्यों के लिए उसके राजदूतों के रूप में कार्य करना। अब, अटल नियम यह है कि जिसे राजदूतत्व सौंपा गया है उसे अपने निर्देशों का निष्ठा और श्रद्धा से पालन करना चाहिए। प्रेरितीय आज्ञापत्र में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया है, “जाकर सब जातियों को सिखाओ, और जो कुछ मैंने तुम्हें सौंपा है उन सब का पालन करना उन्हें सिखाओ।” वैसे ही “प्रचार करो,” (जो तुम चाहो वह नहीं) परन्तु “सुसमाचार।” यदि पूछा जाए कि उनके उत्तराधिकारियों को किस अधिकार से सज्जित किया गया था, तो हमारे पास पतरस की परिभाषा है, जो कलीसिया में बोलनेवाले सब को आज्ञा देती है कि वे परमेश्वर के “वचन” ही बोलें। परन्तु अब जो कलीसिया के शासक कहलाना चाहते हैं, वे अपने लिए जो चाहें वह बोलने की छूट हथिया लेते हैं, और इस पर अड़ते हैं कि बोलते ही उनकी बिना किसी प्रश्न के आज्ञा मानी जाए। कहा जाएगा कि यह निन्दा है, और वे केवल यही अधिकार जताते हैं कि जो पवित्र आत्मा ने प्रकट किया है उसे अपने अधिकार से पुष्ट करें। इसलिए वे यह दावा करेंगे कि वे विश्वासियों के विवेक को अपनी युक्तियों या सनक के अधीन नहीं करते, केवल आत्मा के उन वचनों के अधीन करते हैं, जो उन पर प्रकट होकर वे दूसरों के लिए पुष्ट और प्रकाशित करते हैं। वाह, क्या चतुर बहाना है! इसमें किसी को सन्देह नहीं कि पवित्र आत्मा जो कुछ उनके हाथों से सौंपता है, उसमें उनकी बिना हिचक आज्ञा माननी है। परन्तु जब वे यह जोड़ते हैं कि वे पवित्र आत्मा के सच्चे वचनों के सिवा कुछ नहीं सौंप सकते, क्योंकि वे उसके मार्गदर्शन में हैं, और उनके सब निर्णय सत्य ही हैं, क्योंकि वे सत्य की गद्दियों पर बैठते हैं, तो क्या यह उनके अधिकार को उनकी सनक से नापना नहीं है? क्योंकि यदि उनके सब आदेश, बिना अपवाद, वचनों के रूप में स्वीकार किए जाने हैं, तो उनके अधिकार की कोई सीमा नहीं। कौन-सा तानाशाह कभी अपनी प्रजा के धैर्य का ऐसा भयंकर दुरुपयोग कर सका कि वह इस पर अड़ जाए कि जो कुछ वह घोषित करे उसे स्वर्ग का सन्देश माना जाए! तानाशाह निःसन्देह चाहेंगे कि उनके आदेश माने जाएँ, वे चाहे जैसे हों। परन्तु ये लोग तो इससे कहीं अधिक माँगते हैं। हमें विश्वास करना है कि पवित्र आत्मा तब बोलता है जब वे अपने स्वप्नों को हम पर थोपते हैं।
इसलिए हम देखते हैं कि वह दासता कितनी कठोर और अन्यायपूर्ण है जिसमें इस अधिकार से सशस्त्र होकर उन्होंने विश्वासियों की आत्माओं को जकड़ दिया है। व्यवस्थाओं पर व्यवस्थाएँ ढेर कर दी गई हैं, ताकि वे विवेक के लिए अनेक फन्दे बन जाएँ। क्योंकि उन्होंने इन व्यवस्थाओं को बाहरी व्यवस्था के विषयों तक सीमित नहीं रखा, वरन् आत्मा के भीतरी और आत्मिक शासन पर भी लागू किया। और जब तक वे उस विशाल संख्या तक न पहुँच गईं जो अब भूलभुलैया जैसी दिखती है, तब तक कोई अन्त न किया गया। वस्तुतः उनमें से कुछ तो मानो विवेकों को सताने और यातना देने के उद्देश्य से ही गढ़ी गई प्रतीत होती हैं, जबकि उनके पालन पर उतनी ही कठोरता से जोर दिया जाता है मानो उनमें भक्ति का पूरा सार समाया हो। वरन् यद्यपि परमेश्वर की आज्ञाओं के उल्लंघन के विषय में या तो कोई पूछताछ नहीं की जाती, या हल्के प्रायश्चित्त ठहराए जाते हैं, तथापि मनुष्यों के आदेशों के विरुद्ध किए गए किसी भी काम के लिए सर्वोच्च प्रायश्चित्त माँगा जाता है। जब कलीसिया इस अत्याचारी जूए से दबी है, तो जो इसके विरुद्ध एक शब्द कहने का साहस करता है उसे तुरन्त विधर्मी ठहराकर दोषी करार दिया जाता है। संक्षेप में, अपना शोक प्रकट करना प्राणदण्ड योग्य अपराध है। और इस असहनीय प्रभुत्व पर अधिकार बनाए रखने के लिए वे रक्तरंजित आदेशों के द्वारा लोगों को पवित्रशास्त्र पढ़ने और समझने से रोकते हैं, और जो उनकी सत्ता के विषय में कोई प्रश्न उठाते हैं उन पर गरजते हैं। यह अतिशय कठोरता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है, यहाँ तक कि अब धर्म के विषय में कोई पूछताछ करने की अनुमति भी मुश्किल से मिलती है।
