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मसीह, हमारा छुड़ानेवाला, बहुत अंश तक उसके अधिकार से वंचित किया गया
मैं ऊपर दिखा चुका हूँ कि मसीह को बहुत अंश तक ठगा गया है, केवल याजकपद के सम्मान से ही नहीं, वरन् उसके उपकारों के लिए जो धन्यवाद उसे मिलना चाहिए था उससे भी। यह सच है कि वह छुड़ानेवाला कहलाता है, परन्तु इस प्रकार कि मनुष्य भी अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपने आप को पाप और मृत्यु की दासता से छुड़ा लेते हैं। यह सच है कि वह धार्मिकता और उद्धार कहलाता है, परन्तु इस प्रकार कि मनुष्य अब भी अपने कर्मों के पुण्य से अपने लिए उद्धार प्राप्त करते हैं; क्योंकि इस अनमोल दान को, जिसका वर्णन करने में न मनुष्यों की और न स्वर्गदूतों की वाक्पटुता पूरी पड़ सकती है, विद्वत्तावादी उसे संकुचित करने में लज्जा नहीं करते; वे हमें बताते हैं कि यद्यपि वह पहला पुण्य प्रदान करता है, अर्थात् जैसा वे समझाते हैं, पुण्य कमाने का अवसर, तो भी इस सहायता को पाने के पश्चात् हम अपने ही कर्मों से अनन्त जीवन के योग्य ठहरते हैं। यह सच है कि वे मानते हैं कि हम मसीह के लहू से अपने पापों से धोए जाते हैं, परन्तु इस प्रकार कि हर एक व्यक्ति अन्यत्र से प्राप्त शुद्धिकरणों के द्वारा अपने आप को शुद्ध करता है। यह सच है कि मसीह की मृत्यु को बलिदान का नाम मिलता है, परन्तु इस प्रकार कि पापों का प्रायश्चित्त मनुष्यों के दैनिक बलिदानों से होता है। यह सच है कि कहा जाता है कि मसीह ने हमें पिता से मिला दिया, परन्तु इस शर्त के साथ कि मनुष्य अपने ही प्रायश्चित्तों से उन दण्डों को मोल देकर चुका दें जो उन्हें परमेश्वर के न्याय के प्रति देने हैं। जब कुंजियों के उपकार से अतिरिक्त सहायता खोजी जाती है, तब मसीह का सम्मान कुप्रियान या कुरिकियुस से अधिक नहीं किया जाता। क्योंकि कलीसिया का भण्डार बनाने में मसीह के पुण्य और शहीदों के पुण्य एक ही ढेर में मिला दिए जाते हैं।
क्या इन सब बातों में उतनी ही घृणित निन्दाएँ नहीं हैं जितने शब्द हैं, ऐसी निन्दाएँ जिनसे मसीह की महिमा फाड़ी और चिथड़े-चिथड़े की जाती है? क्योंकि उसके सम्मान से बहुत अंश तक वंचित करके उसका नाम तो उसके पास रहने दिया जाता है, परन्तु सामर्थ्य उससे छीन ली जाती है। यहाँ भी निःसन्देह हम चुप रह सकते थे, यद्यपि हमने देखा कि पुत्र को, जिसे पिता ने सारा अधिकार, सामर्थ्य और महिमा सौंपी है, और जिसमें अकेले घमण्ड करने की वह हमें आज्ञा देता है, उसके दासों के साथ इस प्रकार गिना गया कि उनसे उसका कोई विशेष ऊँचा स्थान लगभग रहा ही नहीं। जब हमने देखा कि उसके उपकार इस प्रकार भुला दिए गए हैं — जब हमने देखा कि उसके गुण मनुष्यों की कृतघ्नता से नष्ट हो गए हैं — जब हमने देखा कि उसके लहू का मूल्य किसी गिनती में नहीं रहा, और उसकी मृत्यु के फल प्रायः मिट गए — जब, सारांश यह कि हमने देखा कि झूठे और अपवित्र मतों से उसका रूप ऐसा बिगाड़ा गया है कि वह स्वयं से अधिक किसी निराधार छाया के समान दिखता है, तब क्या हमें यह सब शान्ति और चुप्पी से सह लेना उचित था? हाय, वह शापित धीरज, यदि परमेश्वर का सम्मान घटाया जाता है, कहना नहीं चाहिए कि गिराया जाता है, और हम इतने थोड़े प्रभावित होते हैं कि आँखें मूँदकर आगे बढ़ जाएँ! हाय, मसीह के वे उपकार जो व्यर्थ ही दिए गए, यदि हम अधर्मी निन्दाओं के द्वारा उनकी स्मृति को इस प्रकार दबने दें!
मैं फिर मसीही सिद्धान्त की दूसरी शाखा की ओर लौटता हूँ।
कौन इनकार कर सकता है कि जब मनुष्य यह मानते हैं कि वे अपने कर्मों के पुण्य से अनन्त जीवन प्राप्त करते हैं, तब वे एक प्रकार के उन्माद में पड़े हैं? मैं मानता हूँ कि वे परमेश्वर के अनुग्रह को अपने कर्मों के साथ जोड़ते हैं, परन्तु जब ग्रहण किए जाने का उनका भरोसा उनकी अपनी योग्यता पर निर्भर कराया जाता है, तो स्पष्ट है कि उनके भरोसे और घमण्ड की नींव उनके कर्मों में है। पाठशालाओं का घिसा-पिटा और प्रिय सिद्धान्त, जो लगभग सब मनों में गहरा बैठा हुआ मत है, यह है कि हर एक व्यक्ति से परमेश्वर ठीक उसकी योग्यता के अनुपात में प्रेम करता है। इस विचार को मन में रखकर क्या आत्माएँ उस भरोसे के द्वारा, जो शैतान उनमें उत्पन्न करता है, ऐसी ऊँचाई तक नहीं चढ़ा दी जातीं जहाँ से, मानो किसी अधिक ऊँचे कगार से, वे पीछे निराशा की खाई में गिरा दी जाती हैं? फिर, जब वे परमेश्वर की कृपा के योग्य बनने का ढोंग करते हैं, तो वह केवल सच्ची आज्ञाकारिता से नहीं, वरन् तुच्छ और व्यर्थ विधियों के पालन से होता है। जिन पुण्य कर्मों को पहला स्थान दिया जाता है वे ये हैं — छोटी-छोटी प्रार्थनाओं की भीड़ बुदबुदाना, वेदियाँ बनाना और उन पर मूर्तियाँ या चित्र रखना — गिरजाघरों में बार-बार जाना और एक गिरजाघर से दूसरे में दौड़ते फिरना — बहुत-सी मिस्साएँ सुनना और कुछ मोल लेना — न जाने किन-किन उपवासों से अपनी देह को गलाना — ऐसे उपवास जिनका मसीही उपवास से कुछ भी सम्बन्ध नहीं; और विशेष करके मनुष्यों की परम्पराओं के पालन में अत्यन्त सावधान रहना। प्रायश्चित्तों के विषय में क्या यह और भी बड़ी मूढ़ता नहीं कि वे अन्यजातियों की रीति पर ऐसे शुद्धिकरणों की खोज में निकलें जिनसे वे अपने आप को परमेश्वर से मिला लें? इन सब प्रयासों के पश्चात्, इतने बड़े और लम्बे परिश्रम के पश्चात्, उन्होंने क्या पाया? सब कुछ सन्देहग्रस्त और काँपते हुए विवेक के साथ करते हुए वे सदा उस भयानक चिन्ता के, या यों कहें कि उस घोर यातना के, शिकार रहे जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ, क्योंकि उन्हें यह सन्देह करने की आज्ञा दी गई थी कि कहीं उनके व्यक्ति और उनके कर्म परमेश्वर की दृष्टि में घृणित तो नहीं। भरोसा इस प्रकार उलट दिया गया तो अवश्य परिणाम यह हुआ, जैसा पौलुस घोषणा करता है, कि अनन्त मीरास की प्रतिज्ञा व्यर्थ ठहरी। ऐसी दशा में मनुष्यों के उद्धार का क्या बना? जहाँ बोलना इतना आवश्यक था, वहाँ यदि हम चुप रहते, तो हम केवल परमेश्वर के प्रति कृतघ्न और विश्वासघाती ही नहीं, वरन् मनुष्यों के प्रति भी निर्दयी ठहरते, जिन पर हम अनन्त विनाश को मण्डराते देखते थे, यदि वे उचित मार्ग पर न लौटाए जाते।
यदि कोई कुत्ता अपने स्वामी के प्रति ऐसा अपमान होते देखे जैसा संस्कारों में परमेश्वर का अपमान किया जाता है, तो वह तुरन्त भौंकने लगेगा, और अपने स्वामी का इस प्रकार अपमान चुपचाप होने देने की अपेक्षा अपने प्राण को जोखिम में डालेगा। क्या हम परमेश्वर के प्रति उससे कम भक्ति दिखाएँ जितनी एक पशु मनुष्य के प्रति दिखाया करता है? मैं इस बात की चर्चा नहीं करता कि केवल मनुष्य के अधिकार पर स्थापित विधियों को उन भेदों के बराबर ठहरा दिया गया है जिन्हें मसीह ने ठहराया और जिनकी सिफ़ारिश उसके ईश्वरीय अधिकार से हुई, यद्यपि यह कार्य कठोरतम फटकार के योग्य है। परन्तु जब उन भेदों को ही उन अनेक अन्धविश्वासों से बिगाड़ा गया और उन अनेक झूठे मतों से अपमानित किया गया, जिनका उल्लेख हम पहले कर चुके हैं, और वह भी नीच और घृणित लाभ के लिए, तब क्या हमें ढोंग करके सहना, या देखकर भी न देखने का बहाना करना उचित था? मसीह ने कोड़े से सर्राफ़ों को मन्दिर से निकाल दिया, उनकी मेज़ें उलट दीं और उनका सामान बिखेर दिया। मैं मानता हूँ कि हर किसी को कोड़ा अपने हाथ में लेना उचित नहीं, परन्तु उन सब का, जो मसीह के कहलाते हैं, यह कर्तव्य है कि वे उसी उत्साह से जलें जिससे मसीह उस समय उत्तेजित हुआ था जब उसने अपने पिता की महिमा का पक्ष लिया। इसलिए मन्दिर की उस अपवित्रता को, जिस पर उसने इतने स्पष्ट रूप से अपनी तीव्र अप्रसन्नता प्रकट की, खुले, दृढ़ और निश्चित स्वर में दोषी ठहराना कम से कम हमारा काम है। कौन नहीं जानता कि संस्कार अब बहुत समय से गिरजाघरों में उतनी ही खुलेआम बेचे जाते हैं जितनी खुलेआम सार्वजनिक बाज़ार में सजा हुआ सामान? अन्य विधियों का भी निश्चित मूल्य है, और कुछ के विषय में तो बहुत मोल-भाव के पश्चात् ही सौदा तय होता है।
परन्तु क्योंकि प्रभु-भोज में जो उदाहरण दिखाई देते हैं वे प्रत्यक्ष हैं और अन्य विधियों की अपेक्षा अधिक घृणित स्वभाव के हैं, इसलिए आओ और कहो कि उसकी इतनी अनेक और इतनी निन्दायुक्त अपवित्रताओं की ओर हम किस विवेक से आँखें मूँद सकते थे? जब मेरे पास आज भी उन्हें प्रकट करने के लिए शब्द नहीं हैं, तो उनके विरुद्ध कठोरता से बोलने के कारण हम पर अत्यधिक उग्रता का दोष किस न्याय से लगाया जाता है? मसीह की उस पवित्र देह की शपथ, जो हमारे लिए बलिदान में लटकाई गई, और उस पवित्र लहू की शपथ, जो उसने हमारे धोने के लिए बहाया, मैं यहाँ महामहिम सम्राट से, और आप परम प्रतापी राजकुमारगण से, विनती करता हूँ कि आप गम्भीरता से विचार करने की कृपा करें कि वह भेद कितना बड़ा होगा जिसमें वह देह हमारे भोजन के लिए और वह लहू हमारे पीने के लिए रखा जाता है; विचार करें कि उसे अशुद्ध होने से कितनी सावधानी और कितनी श्रद्धा से बचाए रखना चाहिए। तब यह कितनी कृतघ्नता होगी कि यह स्वर्गीय भेद, जिसे मसीह ने हमें अत्यन्त बहुमूल्य रत्न के समान सौंपा है, सूअरों के पाँवों तले रौंदा जाए, और कोई उसे देखे और चुप रहे! परन्तु हम उसे केवल रौंदा हुआ ही नहीं, वरन् हर प्रकार की मलिनता से अशुद्ध किया हुआ भी देख सकते हैं। कैसा अपमान किया गया जब मसीह की मृत्यु की प्रभावशीलता को मनुष्यों के किए हुए नाटक के प्रदर्शन में बदल दिया गया — जब कोई छुटभैया पुरोहित, मानो मसीह का उत्तराधिकारी हो, परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ बनकर बीच में आ खड़ा हुआ — जब उस एकमात्र बलिदान की सामर्थ्य को नष्ट करके एक ही नगर में प्रतिदिन हज़ार प्रायश्चित्त-बलिदान चढ़ाए गए — जब मसीह को दिन में हज़ार बार बलि किया गया, मानो एक बार हमारे लिए मरकर उसने पर्याप्त न किया हो? मसीह पर ये सब अपमान ढेर करने में उन्होंने पवित्र भोज के स्वरूप का दुरुपयोग किया; क्योंकि ये सब बलिदान की इसी एक धारणा में समाए हुए हैं। मैं उन व्याख्याओं से अनजान नहीं जो हमारे विरोधी अपनी मूर्खताओं को ढाँकने के लिए काम में लाते हैं। इस युग तक वे उन सब घृणित बातों को निर्लज्जता से करते रहे जिनका मैंने उल्लेख किया है; परन्तु अब पकड़े जाने पर वे नए बिलों में घुस जाते हैं, तो भी अपनी नीचता को छिपा नहीं सकते। उन्होंने सिखाया कि मिस्सा एक बलिदान है, जिससे न केवल जीवितों के, वरन् मरे हुओं के भी पापों का प्रायश्चित्त होता है। अब वे बहानेबाज़ी से क्या पाते हैं, सिवाय इसके कि अपनी निर्लज्जता प्रकट कर दें? और संस्कार कितना अशुद्ध किया गया है जब वचन का खुला प्रचार, जो उसका वैध पवित्रीकरण है, छोड़कर रोटी पर फूँकों और फुसफुसाहटों से टोना किया जाता है? जब वह विश्वासियों की सभा में बाँटे जाने के स्थान पर एक ही मनुष्य द्वारा अलग खा लिया जाता है, या दूसरे के उपयोग के लिए अलग रख दिया जाता है? और जब, जहाँ किसी प्रकार का बाँटना होता भी है, वहाँ भी हमारे प्रभु की स्पष्ट आज्ञा की अवहेलना करके लोगों को आधे से, अर्थात् कटोरे से, वंचित किया जाता है? यह कैसा उन्माद है कि वे कल्पना करें कि उनके अनुष्ठानों से रोटी का सार तत्त्व मसीह में बदल जाता है! मिस्साओं का व्यापार जूतों के व्यापार की भाँति निःसंकोच चलते देखना कितना लज्जाजनक है! क्योंकि यदि यह सच है, जैसा वे कहते हैं, कि जो वस्तु वे बेचते हैं वह मसीह की मृत्यु का पुण्य है, तो मसीह का जो अपमान वे करते हैं वह उसके मुँह पर थूकने से कम घोर नहीं।
हे परम अजेय सम्राट और परम प्रतापी राजकुमारगण, कृपा करके उस विपत्ति को स्मरण करें जो प्राचीनकाल में कुरिन्थियों पर इस संस्कार के एक ही दुरुपयोग के कारण पड़ी, और वह भी ऐसा जो पहली दृष्टि में बहुत घोर नहीं दिखता था। हर एक अपने घर से अपना भोजन लाता था, साझे के चन्दे के रूप में नहीं, वरन् इसलिए कि धनी लोग विलासिता से भोज करें और गरीब भूखे रहें। इसी कारण प्रभु ने उन्हें कठोर और प्राणघातक महामारी से ताड़ना दी। पौलुस का यही वृत्तान्त है, जो साथ ही हमसे कहता है कि इसे पिता की छड़ी समझें, जिससे प्रभु ने उन्हें पश्चाताप के लिए बुलाया। इससे अनुमान लगाएँ कि आज हमें क्या अपेक्षा रखनी चाहिए, जो मसीह की सच्ची स्थापना से किसी छोटी-सी मात्रा में ही नहीं हटे, वरन् उससे अपार दूरी पर भटक गए हैं; जिन्होंने उसकी शुद्धता को केवल एक बात में नहीं बिगाड़ा, वरन् अनेक बातों में, और वे भी भयंकर प्रकार की, कुरूप कर दिया है; जिन्होंने उसके वैध उद्देश्य में केवल किसी एक दुरुपयोग से बाधा नहीं डाली, वरन् उसके सारे संचालन को ही उलट दिया है। और इसमें सन्देह नहीं कि अब कुछ समय से परमेश्वर ने इस अधर्म का बदला लेना आरम्भ कर दिया है। अब अनेक वर्षों से लगातार संसार अनेक प्रकार के क्लेशों और विपत्तियों से दबा हुआ है, यहाँ तक कि अन्ततः लगभग दुर्दशा की चरम सीमा तक पहुँच गया है। हम अपनी विपत्तियों पर चकित तो होते हैं, या कोई और कारण बताते हैं कि परमेश्वर हमें क्यों इस प्रकार दुःख देता है। परन्तु यदि हम विचार करें कि कुरिन्थियों ने पवित्र भोज को जिस त्रुटि से बिगाड़ा था वह कितनी हल्की थी, जब उसकी तुलना उन सब मलिनताओं से की जाए जिनसे आज हमारे बीच वह मैला और अशुद्ध किया जाता है, तो यह आश्चर्य की बात है कि हम यह न देखें कि परमेश्वर, जिसने उन्हें इतनी कठोरता से दण्ड दिया, हम पर न्यायपूर्वक और अधिक क्रोधित है।
यदि मैं कलीसिया के शासन के सब घृणित बिगाड़ों का अनुसरण करने लगूँ, तो एक अन्तहीन जंगल में प्रवेश कर जाऊँगा। याजकों के जीवन के विषय में मैं इस समय अनेक कारणों से बोलने से बचता हूँ; परन्तु तीन असह्य दोष हैं, जिन पर हर एक व्यक्ति स्वयं विचार कर सकता है। पहला, पवित्र बुलाहट के स्वरूप की अवहेलना करके पादरियों के पद सर्वत्र या तो बल से, या पद-क्रय (सिमोनी) से, या अन्य बेईमान और अधर्मी युक्तियों से प्राप्त किए जाते हैं। दूसरा, कलीसिया के अगुवे, जहाँ तक अपने कर्तव्यों के निर्वाह की बात है, सच्चे सेवकों की अपेक्षा खोखली छायाओं या निर्जीव मूर्तियों के समान अधिक हैं। और तीसरा, जब उन्हें परमेश्वर के वचन के अनुसार विवेकों का शासन करना चाहिए, तब वे अन्यायपूर्ण अत्याचार से उन्हें कुचलते हैं और अनेक अधर्मी व्यवस्थाओं की बेड़ियों से उन्हें दासत्व में बाँधे रखते हैं। क्या यह सच नहीं कि परमेश्वर और मनुष्य की व्यवस्थाओं की अवहेलना ही नहीं, वरन् लज्जा के किसी भी बोध के अभाव में, बिशपों और प्राचीनों की नियुक्ति में घिनौनी अव्यवस्था राज करती है? कि मनमानी न्याय का स्थान ले लेती है, पद-क्रय शायद ही कभी अनुपस्थित रहता है, और मानो ये कोई महत्त्व की बुराइयाँ न हों, उनका सुधार किसी आगामी युग के लिए टाल दिया जाता है? शिक्षा देने का कर्तव्य, जो सेवकाई की सच्ची पहचान है, कहाँ गया? विवेक की सच्ची स्वतंत्रता के विषय में हम जानते हैं कि पौलुस ने कितने संघर्ष किए और उसकी रक्षा के लिए कितनी गम्भीरता से लड़ा; परन्तु हर निष्पक्ष विचार करनेवाला व्यक्ति अवश्य देखेगा कि आज के समय में हमारे पास उसके लिए लड़ने का उससे कहीं अधिक कारण है। खरे सिद्धान्त के ऐसे चरम बिगाड़ में, संस्कारों की ऐसी दुष्ट अपवित्रता में, कलीसिया की ऐसी शोचनीय दशा में, जो लोग कहते हैं कि हमें इतना तीव्र अनुभव नहीं करना चाहिए था, वे विश्वासघाती सहिष्णुता से कम पर सन्तुष्ट न होते, जिससे हम परमेश्वर की आराधना, मसीह की महिमा, मनुष्यों के उद्धार, संस्कारों के सारे संचालन और कलीसिया के शासन को धोखे से बेच देते। संयम के नाम में कुछ आकर्षण है, और सहिष्णुता ऐसा गुण है जो देखने में सुन्दर लगता और प्रशंसा के योग्य जान पड़ता है; परन्तु वह नियम जिसका हमें हर जोखिम पर पालन करना चाहिए यह है कि परमेश्वर के पवित्र नाम पर अधर्मी निन्दा के आक्रमण को कभी धीरज से न सहें — कि उसके अनन्त सत्य को शैतान के झूठों से दबाया जाए, कि मसीह का अपमान हो, उसके पवित्र भेद अशुद्ध किए जाएँ, अभागी आत्माओं की क्रूरता से हत्या की जाए, और कलीसिया घातक घाव के प्रभाव से अन्तिम अवस्था में तड़पती छोड़ दी जाए, और हम इसे सह लें। यह नम्रता नहीं, वरन् उन बातों के प्रति उदासीनता होगी जिनके सामने और सब बातें गौण होनी चाहिए।
मुझे आशा है कि मैंने अब स्पष्ट दिखा दिया है, जैसा मैंने प्रस्ताव रखा था, कि कलीसिया के बिगाड़ों के सुधार में हम किसी भी प्रकार उतने से अधिक उग्र नहीं हुए जितना मामले को आवश्यक था। जो हमें दोष देते हैं वे भी यह जानते हैं, और इसलिए वे एक और आरोप का सहारा लेते हैं, अर्थात् यह कि हमारे हस्तक्षेप से अधिक से अधिक यही लाभ हुआ कि जो मसीही जगत् पहले शान्ति में था वह आपसी कलह से भर गया — कि सुधार दिखाई देना तो दूर, बातें और बिगड़ती गईं — कि जिन्होंने हमारा सिद्धान्त अपनाया उनमें से थोड़े ही अच्छे बने, वरन् कुछ तो, यदि अधिक नहीं, तो अधिक निरंकुश दुराचार के लिए साहसी हो गए हैं। वे यह भी आपत्ति करते हैं कि हमारी कलीसियाओं में न अनुशासन है, न उपवास के नियम, न दीनता के अभ्यास; कि लोग जुए से छूटकर दण्ड के भय के बिना पाप के मार्गों में उत्पात मचाते हैं। अन्त में वे हम पर कलीसियाई जनों की सम्पत्ति हड़पने का अपयश लगाते हैं, यह कहकर कि हमारे राजाओं ने उस पर ऐसे धावा बोला मानो वह वैध लूट का माल हो; कि इस प्रकार कलीसिया को बलपूर्वक और लज्जाजनक रीति से लूटा गया है, और अब कलीसिया की पैतृक सम्पदा पर वे लोग बिना भेदभाव अधिकार जमाए बैठे हैं जिन्होंने झगड़े के कोलाहल में बिना किसी व्यवस्था या उचित अधिकार-पत्र के उसे हथिया लिया।
मैं, अपनी ओर से, इससे इनकार नहीं करता कि जब अधर्म का राज था तब उसके राज्य में हमारे द्वारा उथल-पुथल हुई। परन्तु यदि उस क्षण, जब खरे और भक्तिपूर्ण सिद्धान्त का प्रकाश संसार पर चमका, सब लोग, जैसा उनका कर्तव्य था, स्वयं ही और तत्परता से अपना सहयोग देते, तो आज सब कलीसियाओं में (मसीह का राज्य फलता-फूलता हुआ) उससे कम शान्ति और चैन न होता जितना उन दिनों था जब मसीह-विरोधी अत्याचार करता था। जो लोग, यह प्रत्यक्ष है, सत्य के मार्ग में बाधा डालते हैं, वे मसीह से युद्ध छेड़ना छोड़ दें, तो तुरन्त पूरा मेल हो जाएगा; या वे उस फूट का दोष हम पर डालना छोड़ दें जिसे वे स्वयं भड़काते हैं। क्योंकि यह निश्चय ही अत्यन्त अन्याय है कि जब वे शान्ति की कोई शर्त नहीं मानते, सिवाय इसके कि मसीह-विरोधी को, भक्ति के सिद्धान्त को भगाकर और मानो मसीह को फिर कब्रों में डालकर, कलीसिया को वश में करने दिया जाए; यह अत्यन्त अन्याय है कि वे न केवल इस प्रकार घमण्ड करें मानो वे स्वयं निर्दोष हों, वरन् हम पर ठट्ठा भी करें; और यह कि हम, जो एकता के सिवाय कुछ नहीं चाहते, और जिनकी एकता का एकमात्र बन्धन परमेश्वर का अनन्त सत्य है, सारा दोष और अपयश इस प्रकार उठाएँ मानो हम ही फूट के कर्ता हों। इस आरोप के विषय में कि हमारे सिद्धान्त से कोई फल नहीं निकला, मैं भली-भाँति जानता हूँ कि अधर्मी लोग हमारा उपहास करते हैं और कहते हैं कि असाध्य घावों को कुरेदकर हम केवल फोड़े को बढ़ाते हैं। क्योंकि उनका मत है कि कलीसिया की निराशाजनक दशा के कारण उपचार का प्रयत्न व्यर्थ है, चंगे होने की कोई आशा नहीं; और इसलिए वे निष्कर्ष निकालते हैं कि जमी हुई बुराई को न छेड़ना ही सर्वोत्तम है। जो ऐसा कहते हैं वे नहीं समझते कि कलीसिया का पुनर्स्थापन परमेश्वर का काम है, और मनुष्यों की आशाओं और मतों पर उतना ही निर्भर नहीं, जितना मरे हुओं के जी उठने या ऐसे किसी और आश्चर्यकर्म पर। इसलिए यहाँ हमें कार्यों की सुगमता की प्रतीक्षा न मनुष्यों की इच्छा से करनी है, न समय के मिज़ाज से, वरन् निराशा के बीच से होकर आगे बढ़ना है। हमारे स्वामी की इच्छा है कि उसका सुसमाचार प्रचार किया जाए। आओ हम उसकी आज्ञा मानें और जहाँ-जहाँ वह बुलाए वहाँ-वहाँ चलें। सफलता क्या होगी, यह पूछना हमारा काम नहीं। हमारा एकमात्र कर्तव्य यह है कि जो सर्वोत्तम है उसकी इच्छा करें और प्रार्थना में प्रभु से उसकी याचना करें; वांछित परिणाम लाने के लिए पूरे उत्साह, चिन्ता और परिश्रम से यत्न करें, और साथ ही जो भी परिणाम हो उसे धीरज से स्वीकार करें।
इसलिए हम पर यह आरोप निराधार है कि हमने वह सारा भला नहीं किया जो हम चाहते थे और जो वांछनीय था। परमेश्वर हमें रोपने और सींचने की आज्ञा देता है। हमने वैसा किया है। बढ़ानेवाला वही अकेला है। फिर यदि वह हमारी इच्छा के अनुसार देना न चाहे तो क्या? यदि यह स्पष्ट है कि हमने अपना भाग विश्वासयोग्यता से निभाया है, तो हमारे विरोधी हम से और अधिक की माँग न करें; यदि परिणाम प्रतिकूल है तो वे परमेश्वर से विवाद करें। परन्तु यह बहाना कि हमारे सिद्धान्त से कोई लाभ नहीं हुआ, सर्वथा झूठा है। मैं बाहरी मूर्तिपूजा और अनेक अन्धविश्वासों और भ्रमों के सुधार की चर्चा नहीं करता, यद्यपि वह भी तुच्छ नहीं गिना जाना चाहिए। परन्तु क्या इसमें कोई फल नहीं कि बहुत-से सचमुच भक्त जन हमारे प्रति अपना ऋण अनुभव करते हैं, क्योंकि उन्होंने अन्ततः शुद्ध मन से परमेश्वर की आराधना करना और शान्त विवेक के साथ उसे पुकारना सीखा है, वे निरन्तर की यातनाओं से मुक्त हुए हैं, और मसीह में सच्चे आनन्द से परिपूर्ण किए गए हैं, ऐसे कि उस पर भरोसा रख सकें? परन्तु यदि हमसे ऐसे प्रमाण माँगे जाएँ जिन्हें हर आँख देख सके, तो हमारी दशा इतनी बुरी नहीं रही कि हम आनन्द के अनेक स्रोतों की ओर संकेत न कर सकें। कितने ही जो पहले दुष्ट जीवन बिताते थे इतने सुधर गए हैं कि मानो नए मनुष्य बन गए हैं? कितने ही जिनका बीता जीवन निर्दोष था, वरन् जो अत्यन्त आदर की दृष्टि से देखे जाते थे, पीछे हटने के बदले अपने आचरण से यह गवाही दे सके हैं कि हमारी सेवकाई न बाँझ सिद्ध हुई, न निष्फल? हमारे शत्रु निःसन्देह अपनी निन्दाओं से हमें कलंकित करने और चीरने की सामर्थ्य रखते हैं, विशेषकर अनजान लोगों के बीच; परन्तु वे यह कभी हमसे छीन नहीं सकते कि जिन्होंने हमारा सिद्धान्त अपनाया है उनमें उन सब से, जो उनके बीच सबसे उत्कृष्ट गिने जाते हैं, अधिक निर्दोषता, खराई और सच्ची पवित्रता पाई जाती है। परन्तु यदि कुछ ऐसे हैं (और हम मानते हैं कि उनकी संख्या बहुत अधिक है) जो अपनी वासनाओं को ढील देकर सुसमाचार को बिगाड़ते हैं, तो यह बात निश्चय ही नई नहीं; और यदि नई भी होती, तो उसका दोष हम पर कैसे डाला जा सकता है? यह स्वीकार किया जाता है कि भले और पवित्र जीवन का एकमात्र नियम सुसमाचार है; परन्तु इस बात में कि सब अपने आप को उसके अधीन नहीं होने देते, और कुछ, मानो बन्धन से छूटकर, और भी ढिठाई से पाप करते हैं, हम शमौन के उस कथन की सच्चाई को पहचानते हैं कि मसीह “इसलिए ठहराया गया है कि बहुत हृदयों के विचार प्रगट हों,” (लूका 2:35।)
यदि परमेश्वर उचित जाने कि सुसमाचार की ज्योति जलाए, ताकि दुष्टों का छिपा हुआ अधर्म प्रकट हो जाए, तो इसी में से सुसमाचार के सेवकों और उनके प्रचार के विरुद्ध आरोप गढ़ना द्वेष और निर्लज्जता की पराकाष्ठा है। परन्तु जब मैं उन पर वही बात लौटा देता हूँ जिससे वे हम पर आरोप खड़ा करना चाहते हैं, तो उनके साथ कोई अन्याय नहीं करता। क्योंकि परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले अपना दुस्साहसी दुराचार कहाँ से सीखते हैं, सिवाय इसके कि झगड़ों के कोलाहल के बीच वे यह कल्पना करें कि ऐसा कुछ नहीं जो करने की उन्हें छूट न हो? इसलिए इसमें वे इसे अपना ही अपराध मानें, अर्थात् यह कि सत्य की प्रगति को रोककर वे दुष्टों को दण्ड से बचे रहने की आशा देकर उनका साहस बढ़ाते हैं।
इस निन्दापूर्ण आरोप के विषय में कि हम में अनुशासन और उन व्यवस्थाओं का अभाव है जो लोगों को उचित नियन्त्रण में रखने के योग्य हों, हमारे पास दोहरा उत्तर है। यदि मैं यह कहूँ कि हमारे बीच अनुशासन पर्याप्त रूप से स्थापित है, तो उन दैनिक प्रवचनों से मेरा खण्डन हो जाएगा जिनमें हमारे शिक्षक विलाप करते हैं कि वह अब भी उपेक्षित पड़ा है। परन्तु यद्यपि मैं इनकार नहीं करता कि हम में सम्पूर्ण अनुशासन की आशीष का अभाव है, फिर भी मैं कहता हूँ कि यह विचार किया जाना चाहिए कि वे कौन लोग हैं जिनके कारण अब तक हमें वह प्राप्त नहीं हुआ और अब भी नहीं हो रहा, ताकि दोष उन्हीं के सिर पर आए। हमारे शत्रु, यदि कर सकें, तो इससे इनकार करें कि वे हर चाल इसलिए चलते हैं कि न केवल हमारी कलीसियाओं के गठन और स्थापना में हमारे प्रयत्नों में बाधा डालें, वरन् जो कुछ हम आरम्भ करते हैं उसे विफल और ध्वस्त भी कर दें। हम कलीसिया के निर्माण में परिश्रम से लगे रहते हैं, और जब हम काम में तल्लीन होते हैं, तब वे बार-बार शत्रु की भाँति घुस आते हैं कि हमारे कार्य में गड़बड़ी करें, और हमें ऐसा कोई अवकाश नहीं लेने देते जिसमें हम कलीसिया के घरेलू मामलों को व्यवस्थित कर सकें। इसके पश्चात् वे हमें उस जर्जरता के लिए फटकारते हैं जिसके कारण वे स्वयं हैं। यह कैसी सरलता है कि हमें निरन्तर सताएँ, और फिर हम पर यह आरोप लगाएँ कि उस सताव के कारण हमें कलीसिया के सब विभागों को व्यवस्थित करने की फुर्सत नहीं? परमेश्वर हमारे शोक का साक्षी है, मनुष्य हमारी शिकायतों के साक्षी हैं, कि हम अब भी सिद्धता से कितनी दूर हैं। परन्तु तब कहा जाता है कि अनुशासन की कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें हमने त्याग दिया है। सच है; परन्तु जैसे मनुष्य गिरे हुए भवन को फिर बनाते समय ढेरों में पड़े या इधर-उधर बिखरे टुकड़ों को खींचकर इकट्ठा करते हैं ताकि हर एक को उसके उचित स्थान पर बैठा सकें, वैसा ही करने को हम बाध्य थे। क्योंकि यदि प्राचीन अनुशासन का कोई भाग बचा भी रहा, तो वह खण्डहरों के उलझे हुए ढेर में ऐसा मिला और दबा हुआ था, और अपना पुराना रूप ऐसा खो चुका था, कि जब तक वह उस गड़बड़ी के बीच से बीनकर निकाला न जाता, उसका कोई उपयोग नहीं हो सकता था।
मैं चाहता हूँ कि हमारे विरोधी कम से कम अपने उदाहरण से हमें उभारें। परन्तु कैसे? वह अनुशासन जो, वे शोर मचाकर कहते हैं, हम में नहीं है, क्या वे स्वयं उसे रखते हैं? क्या यह अच्छा न होता कि वे हमारे साथ मिलकर परमेश्वर के सामने अपना दोष मान लेते और स्वीकार करते, इसके बदले कि वे हमें उस बात के लिए फटकारें जो तुरन्त उन्हीं के सिर पर लौटाई जा सकती है?
अनुशासन के दो भाग हैं, एक पादरियों से सम्बन्ध रखता है, दूसरा लोगों से। अब मैं जानना चाहता हूँ कि वे अपने पादरियों को सीधे और पवित्र आचरण में कितनी कठोरता से रखते हैं। वह अधिक शुद्ध और परिष्कृत पवित्रता जिससे प्राचीन नियम पादरियों को बाँधते हैं, मैं उनसे नहीं माँगता। क्योंकि मैं जानता हूँ कि जब कोई उन व्यवस्थाओं को, जो अब कई युगों से मृत पड़ी हैं, विस्मृति से उठा लाता है तो वे मन में कैसे हँसते हैं। मैं उनके पादरियों से केवल साधारण शिष्टता चाहता हूँ, ताकि यदि वे जीवन की शुद्धता से प्रसिद्ध नहीं, तो कम से कम नीचता से कुख्यात न हों। जब कोई भेंटों, या कृपा, या घृणित चापलूसी, या छल के प्रमाण-पत्रों के सहारे याजकपद में रेंगकर घुस जाता है, तो नियम उसे पद-क्रय घोषित करते हैं और उसी रूप में दण्ड देने की आज्ञा देते हैं। आज कितने हैं जो किसी और रीति से याजकपद में प्रवेश करते हैं? पर जैसा मैंने कहा, उस कड़ी कठोरता को विदा। फिर भी, यदि इस विषय में कोई विधान न होता, तब भी यह कितनी लज्जा की बात है कि बिशपों के घर खुले और व्यभिचारी पद-क्रय की भट्ठियाँ हों! रोमी पीठ के विषय में मैं क्या कहूँ, जहाँ अब यह स्वाभाविक-सा लगता है कि याजकीय पद खुलेआम सबसे ऊँची बोली लगानेवाले को दिए जाते हैं, या जहाँ वे दलाली और जादू-टोने और अश्लील पापों की मज़दूरी हैं? यदि हम में सामान्य बुद्धि का कुछ भी प्रभाव है, तो क्या यह राक्षसी बात नहीं लगती कि बारह वर्ष के लड़के प्रधान बिशप बना दिए जाएँ? जब मसीह को थप्पड़ मारे गए, तो क्या उसका इससे अधिक अपमान हुआ था? क्या परमेश्वर और मनुष्य का इससे बड़ा उपहास हो सकता है कि एक बालक को मसीही लोगों पर शासन करने बैठाया जाए और पिता और चरवाहे की गद्दी पर स्थापित किया जाए?
बिशपों और प्राचीनों के विषय में नियमों की आज्ञाएँ ये हैं कि सब अपने पदों पर जागरूक रहें और कोई अपनी कलीसिया से बहुत समय तक अनुपस्थित न रहे। परन्तु मान लें कि ऐसा कोई विधान न होता, तो कौन नहीं देखता कि मसीही नाम तुर्कों तक के उपहास का पात्र बनता है जब किसी कलीसिया के पासबान की उपाधि ऐसे व्यक्ति को दी जाती है जो अपने सारे जीवन में उसके पास एक बार भी नहीं जाता? क्योंकि जिस स्थान में वह पासबान ठहराया गया है वहाँ निरन्तर निवास करने का उदाहरण अब बहुत समय से दुर्लभ हो गया है। बिशप और मठाधीश या तो अपने दरबार लगाते हैं या सामान्यतः राजाओं के दरबारों में रहते हैं। हर एक अपनी रुचि के अनुसार वह स्थान चुन लेता है जहाँ वह विलास में रह सके। फिर जो अपने घोंसले में अधिक सुख पाते हैं, वे सचमुच अपनी वृत्तियों में निवास करनेवाले कहे जा सकते हैं, क्योंकि वे आलसी पेटू हैं, जिनके लिए अपने कर्तव्य से अधिक अनजान कुछ नहीं!
प्राचीन नियमों ने मना किया था कि एक ही व्यक्ति को दो कलीसियाएँ दी जाएँ। अच्छा, यह निषेध ऐसा समझ लिया जाए मानो कभी था ही नहीं। तो भी, एक ही मनुष्य को पाँच या उससे अधिक वृत्तियाँ देने की मूर्खता को वे किस छलावे से ढाँकेंगे? एक को, और वह भी कभी-कभी एक लड़के को, तीन बिशपपद रखने देने की, जो एक-दूसरे से इतनी दूर स्थित हैं कि वह और कुछ न करे तब भी वर्ष भर में उनका दौरा मुश्किल से कर सके?
नियम माँग करते हैं कि याजकों की पदोन्नति में जीवन और शिक्षा की कठोर और बारीक परीक्षा की जाए। आज के समय को हम यह छूट दे दें कि उसे इतने कठोर नियम में नहीं बाँधा जा सकता। परन्तु हम देखते हैं कि अज्ञानी, और वे जो विद्या और विवेक दोनों से सर्वथा खाली हैं, बिना भेद किए प्रवेश पा लेते हैं। खच्चर हाँकनेवाले को भाड़े पर रखने में भी उसके बीते जीवन का याजक चुनने से अधिक ध्यान रखा जाता है। यह कोई कल्पना या अतिशयोक्ति नहीं। यह सच है कि वे मंच पर खेलनेवाले नाटककारों के समान औपचारिकता पूरी करते हैं, ताकि प्राचीन प्रथा की कोई झलक दिखा सकें। बिशप, या उनके सहायक, पूछते हैं कि जिन्हें वे अभिषिक्त करना ठान चुके हैं वे योग्य हैं या नहीं? कोई उपस्थित व्यक्ति उत्तर देता है कि वे योग्य हैं। साक्षी के लिए दूर जाने या उसकी गवाही के लिए उसे घूस देने की आवश्यकता नहीं। उत्तर केवल एक औपचारिकता है; सब चपरासी, नाई और द्वारपाल उसे कण्ठस्थ जानते हैं।
फिर, अभिषेक के पश्चात्, प्राचीन नियमों के अनुसार पादरियों में लम्पटता का ज़रा-सा सन्देह भी सुधारा जाना चाहिए, और उसका प्रमाण मिलने पर पदच्युति और बहिष्कार का दण्ड दिया जाना चाहिए। इस प्राचीन कठोरता में कुछ ढील दे दें। फिर भी, दैनिक लम्पटता की ऐसी सहनशीलता के विषय में क्या कहा जाएगा जिससे लगभग उसे करने का अधिकार जतलाया जा सकता है? नियम घोषित करते हैं कि किसी भी दशा में पादरी को शिकार, या जुए, या रंगरलियों और नाच में लिप्त होने की अनुमति न दी जाए। वरन् वे उस हर मनुष्य को सेवकाई से निकाल देते हैं जिस पर किसी प्रकार का कलंक लगता हो। इसी प्रकार, जो सांसारिक कामों में उलझते हैं, या नागरिक पदों में इतना हस्तक्षेप करते हैं कि उनका ध्यान सेवकाई से बँट जाए — सारांश यह कि जो अपने कर्तव्यों के पालन में परिश्रमी नहीं, उन सब को वे कठोर फटकार देने की, और यदि वे पश्चाताप न करें तो पदच्युत करने की आज्ञा देते हैं। आपत्ति की जाएगी कि इन कठोर उपचारों को, जो सब दोषों को जड़ तक काट डालते हैं, यह युग सह नहीं सकता। ऐसा ही सही, मैं उनसे इतनी शुद्धता नहीं माँगता। परन्तु पादरियों में निरंकुश स्वेच्छाचार राज करे, ऐसा निरंकुश कि वे अन्य सब वर्गों से अधिक एक पहले से अत्यन्त भ्रष्ट संसार में और कलंक जोड़ें, तो इसे कौन क्षमा कर सकता है?
लोगों पर चलाए जानेवाले अनुशासन के विषय में बात यह है — जब तक पादरियों का प्रभुत्व अक्षुण्ण रहे, जब तक उनके कर या लूट में कोई कमी न की जाए, तब तक लगभग और सब कुछ बिना दण्ड के होता रहता है, या लापरवाही से अनदेखा किया जाता है। हम समाज के आचरण में सब प्रकार की दुष्टता का सर्वत्र प्रचलन देखते हैं। इसके प्रमाण में मैं महामहिम सम्राट और परम प्रतापी राजकुमारगण के सिवाय किसी और को साक्षी नहीं बुलाऊँगा। मैं मानता हूँ कि यह तथ्य अनेक कारणों से है, परन्तु अनेक कारणों में प्रमुख कारण यह है कि याजकों ने, या तो ढील से या लापरवाही से, दुष्टों को अपनी वासनाओं की लगाम ढीली छोड़ने दी है। इस घड़ी वे कैसा व्यवहार करते हैं? बुराइयों को उखाड़ने, या कम से कम उन्हें रोकने में वे कितनी चिन्ता करते हैं? कहाँ हैं उनकी चेतावनियाँ? कहाँ हैं उनकी फटकारें? अन्य बातों को छोड़ दें, बहिष्कार का, जो अनुशासन की सर्वोत्तम नस है, क्या उपयोग किया जाता है? यह सच है कि बहिष्कार के नाम पर उनके पास एक अत्याचारी वज्र है जिसे वे उन पर फेंकते हैं जिन्हें वे हठीला कहते हैं। परन्तु वे किस हठ को दण्ड देते हैं, सिवाय उन लोगों के हठ के, जो धन के मामलों में उनके न्यायालय में बुलाए जाने पर या तो उपस्थित नहीं हुए, या निर्धनता के कारण उनकी माँगें पूरी न कर सके? इस प्रकार अपराधियों को दण्ड देने का सबसे हितकारी उपाय, उसका वे केवल गरीबों और निर्दोषों को सताने में दुरुपयोग करते हैं। उनकी एक हास्यास्पद प्रथा यह भी है कि वे कभी-कभी छिपे हुए पापों को श्राप से कोड़े लगाते हैं, जैसे जहाँ चोरी हुई हो और चोर अज्ञात हो। यह प्रथा मसीह की स्थापना से सर्वथा विपरीत है। परन्तु यद्यपि इतने लज्जाजनक कार्य सबकी आँखों के सामने खुलेआम होते हैं, उनके लिए बहिष्कार सोया पड़ा है। फिर भी वही लोग जिनके बीच ये सब अव्यवस्थाएँ फैली हैं, हम पर क्रम के अभाव का आरोप लगाने का दुस्साहस करते हैं! निःसन्देह, यदि हम समान रूप से दोषी हैं, तो उन पर दोष लगाने से हमें कुछ लाभ नहीं; परन्तु अब तक जो मैंने कहा है उसमें मेरा उद्देश्य पलटकर दोष लगाते हुए उस आरोप से बच निकलना नहीं रहा जो वे हम पर लगाते हैं, वरन् उस अनुशासन का वास्तविक मूल्य दिखाना है जिसके विषय में वे शिकायत करते हैं कि हमने उसे उलट दिया। यदि दोनों की तुलना करना उचित समझा जाए, तो हमें विश्वास है कि हमारी अव्यवस्था, जैसी भी है, उस प्रकार की व्यवस्था से तो किसी न किसी रीति से कुछ अधिक व्यवस्थित पाई जाएगी जिस पर वे गर्व करते हैं। जब मैं यह कहता हूँ तो मेरा अभिप्राय अपनी त्रुटियों को छिपाना या उनकी चापलूसी करना नहीं। मैं जानता हूँ कि हमें कितने सुधार की आवश्यकता है। निःसन्देह, यदि परमेश्वर हम से लेखा ले, तो बहाना बनाना कठिन होगा; परन्तु जब हमें अपने शत्रुओं को उत्तर देने को बुलाया जाता है तो हमारा पक्ष कहीं अधिक अच्छा है, और विजय उससे अधिक सहज है जितनी हम चाह सकते थे।
ऐसी ही निर्लज्जता से वे शोर मचाते हैं कि हमने कलीसिया का धन हड़प लिया और उसे सांसारिक कामों में लगा दिया। यदि मैं यह कहूँ कि इस विषय में हमने पाप नहीं किया, तो मैं झूठ बोलूँगा। सचमुच, इतने बड़े परिवर्तन शायद ही कभी कुछ असुविधाओं के बिना होते हैं। यदि इसमें कुछ गलत किया गया है, तो मैं उसका बहाना नहीं करता। परन्तु हमारे विरोधी किस मुँह से हम पर यह आरोप लगाते हैं? वे कहते हैं कि कलीसिया के धन को सांसारिक उपयोग में लाना घोर अपवित्रता है। मैं मानता हूँ। वे जोड़ते हैं कि हम ऐसा करते हैं। मैं उत्तर देता हूँ कि अपनी ओर से उत्तर देने में हमें तनिक भी आपत्ति नहीं, बशर्ते वे भी अपनी बारी में अपना पक्ष रखने को तैयार होकर आएँ। हम तुरन्त अपने मामले पर ध्यान देंगे; इस बीच देखें कि वे क्या करते हैं। बिशपों के विषय में मैं उसके सिवाय कुछ नहीं कहता जो सब देखते हैं, कि वे पोशाक की शान, भोजन की विलासिता, सेवकों की संख्या, महलों की भव्यता, सारांश यह कि हर प्रकार के विलास में न केवल राजाओं से होड़ करते हैं, वरन् कलीसिया की आय को कहीं अधिक लज्जाजनक प्रकार के व्यय में उजाड़ते और उड़ाते भी हैं। मैं शिकार के खेलों की चर्चा नहीं करता, जुए की नहीं, उन अन्य सुखों की नहीं जो उनकी आय का कोई छोटा भाग नहीं निगलते। परन्तु कलीसिया से लेकर उसे दलालों और वेश्याओं पर उड़ाना निश्चय ही बहुत ही बुरा है। फिर यह कितना बेतुका है कि वे न केवल ठाट-बाट और दिखावे पर इतराएँ, वरन् उन्हें चरम सीमा तक पहुँचाएँ।
एक समय था जब याजकों की दरिद्रता गौरव की बात मानी जाती थी। अक्विला की महासभा में ऐसा ही था। एक अवसर पर यह भी ठहराया गया कि बिशप अपनी कलीसिया से थोड़ी ही दूरी पर एक दीन घर में, रूखे भोजन और साधारण सामान के साथ रहे, (Conc. Carth. 4. cap. 4 Can. 14।) परन्तु उस प्राचीन कठोरता में न जाकर भी, जब धन की वृद्धि के साथ अनेक बिगाड़ घुस आए, तब भी प्राचीन व्यवस्था फिर पक्की की गई, जिसने कलीसिया की आय को चार भागों में बाँटा; एक बिशप को अतिथि-सत्कार और अभावग्रस्तों की सहायता के लिए, दूसरा पादरियों को, तीसरा गरीबों को, और चौथा कलीसियाओं की मरम्मत के लिए। ग्रेगरी साक्षी देता है कि यह नियम उसके दिनों में भी पूरी तरह पालन किया जाता था। इसके अतिरिक्त, यदि इस विषय में कोई व्यवस्थाएँ न भी होतीं, और एक समय थीं भी नहीं, (क्योंकि जो मैंने बताई है वह, अन्य व्यवस्थाओं की तरह, आचरण के बिगाड़ से आवश्यक हुई थी,) तब भी कोई ऐसा मनुष्य नहीं जो जेरोम की उस बात की सच्चाई न माने, (ad Nepotianum,) कि गरीबों की आवश्यकताओं की पूर्ति करना बिशप की शोभा है, और निजी धन की लालसा रखना सब याजकों की लज्जा। शायद यह सोचा जाए कि वह दूसरी आज्ञा, जो वह उसी स्थान पर देता है, अर्थात् गरीबों और परदेशियों के लिए खुला भोजन रखा जाए, बहुत कठोर है। फिर भी वह उतनी ही सुदृढ़ आधारवाली है।
मठाधीश आय के विस्तार में जितना बिशपों के निकट पहुँचते हैं, उतना ही उनके समान बन जाते हैं। कैनन-पादरी और पल्ली के याजक, एक वृत्ति से पेटूपन, विलास और ठाट-बाट के लिए पर्याप्त न पाकर, शीघ्र ही इस असुविधा के निवारण का एक संक्षिप्त उपाय खोज निकले। क्योंकि जो एक महीने में उससे बहुत अधिक निगल सकता है जितना वह वर्ष भर में पाता है, उसे चार या पाँच वृत्तियाँ रखने से कौन रोक सकता है? बोझ की कुछ चिन्ता नहीं की जाती। क्योंकि निकट ही सहायक पादरी हैं जो झुककर उसे अपने कन्धों पर उठाने को तैयार हैं, बशर्ते उन्हें आय का कोई छोटा भाग निगल लेने दिया जाए। वरन् कम ही मिलेंगे जो एक बिशपपद या एक मठाधीशपद से सन्तुष्ट हों। पादरियों में से जो कलीसिया के सार्वजनिक व्यय पर जीते हैं, यद्यपि अपनी पैतृक सम्पदा पर जी सकते हैं, उन्हें जेरोम ने मन्दिर-लुटेरे कहा है, (C. Cler. I. Quaest. 2।) तब उनके विषय में क्या सोचा जाए जो एक साथ तीन बिशपपद निगल जाते हैं, अर्थात् पचास से सौ तक अच्छी-खासी पैतृक सम्पदाएँ? और ताकि वे यह शिकायत न करें कि थोड़ों के दोष के लिए उन पर अन्यायपूर्वक कलंक लगाया जा रहा है, उनके विषय में हम क्या सोचें जो न केवल कलीसिया की सार्वजनिक आय पर ऐश करते हैं, वरन् उसे दलालों और वेश्याओं की मज़दूरी चुकाने में उड़ाते हैं? मैं केवल उसी की चर्चा करता हूँ जो सर्वविदित है।
फिर, मैं कहता हूँ, यदि हम पूरे वर्ग से नहीं, वरन् उन थोड़ों से पूछें जो अपनी वृत्तियों में निवास करते हैं, कि वे किस अधिकार से एक सादा और मध्यम वेतन भी पाते हैं, तो ऐसे प्रश्न का भी वे उत्तर नहीं दे सकते। क्योंकि इसके बदले वे कौन-से कर्तव्य निभाते हैं? जैसे प्राचीनकाल में व्यवस्था के अधीन वेदी की सेवा करनेवाले वेदी से जीविका पाते थे, “वैसे ही प्रभु ने भी ठहराया कि जो लोग सुसमाचार सुनाते हैं, उनकी जीविका सुसमाचार से हो,” (1 कुरिन्थियों 9:9।)
ये पौलुस के शब्द हैं। इसलिए वे हमें दिखाएँ कि वे सुसमाचार के सेवक हैं, और मुझे उनका वेतन का अधिकार मान लेने में कोई कठिनाई न होगी। दाँवनेवाले बैल का मुँह न बाँधा जाए। परन्तु क्या यह बुद्धि से सर्वथा विपरीत नहीं कि हल जोतनेवाले बैल भूखे मरें और आलसी गधे पाले जाएँ? परन्तु वे कहेंगे कि वे वेदी पर सेवा करते हैं। मैं उत्तर देता हूँ कि व्यवस्था के अधीन याजक वेदी पर सेवा करने के कारण भरण-पोषण के योग्य थे; परन्तु जैसा पौलुस घोषणा करता है, नई वाचा के अधीन बात भिन्न है। और वे वेदी की कौन-सी सेवाएँ हैं जिनके लिए वे दावा करते हैं कि भरण-पोषण उनका अधिकार है? वाह, यही कि वे मिस्साएँ करें और गिरजाघरों में गाएँ, अर्थात् अंशतः व्यर्थ परिश्रम करें और अंशतः मन्दिर-लूट का पाप करें, और इस प्रकार परमेश्वर का क्रोध भड़काएँ। देखो, किस काम के लिए वे सार्वजनिक व्यय पर पाले जाते हैं!
कुछ लोग हैं जो हमारे राजाओं पर अक्षम्य मन्दिर-लूट का आरोप लगाते हैं, कि उन्होंने बल और घोर अन्याय से कलीसिया की उस पैतृक सम्पदा को हड़प लिया जो परमेश्वर को समर्पित की गई थी, और अब उसे अपवित्र कामों में उड़ा रहे हैं।
मैं पहले ही घोषित कर चुका हूँ कि जो कुछ हमारे बीच होता है उस सब का पक्षपाती बनने को मैं इच्छुक नहीं; वरन् मैं खुलकर अपना असन्तोष प्रकट करता हूँ कि कलीसिया की आय को केवल उन्हीं उद्देश्यों में उचित रीति से लगाने की ओर, जिनके लिए वह ठहराई गई थी, अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। इसका शोक मैं सब भले मनुष्यों के साथ करता हूँ। परन्तु इस समय विचारणीय केवल यही बात है कि क्या हमारे राजाओं ने कलीसिया की आय को मन्दिर-लूट के पाप से हड़पा, जब उन्होंने वह लिया जो उन्होंने याजकों और साधुओं के हाथों से छुड़ाया था? क्या इन आयों को ऐसे आलसी पेटों को भरने के सिवाय किसी और काम में लगाना अपवित्रता है? क्योंकि हमारे विरोधी अपना ही पक्ष लड़ रहे हैं, मसीह और उसकी कलीसिया का पक्ष नहीं। निःसन्देह, उन पर भारी दण्ड की घोषणा है जो कलीसिया को लूटते हैं और जो उसका है उसे अपने काम में ले जाते हैं। परन्तु साथ ही कारण भी बताया गया है, अर्थात् इसलिए कि वे सच्चे सेवकों को उनके भरण-पोषण से वंचित करते हैं, और गरीबों को भूखा मारकर उनके लहू के दोषी हैं। परन्तु इससे हमारे विरोधियों का क्या सम्बन्ध? क्योंकि उनके सारे वर्ग में कौन यह घोषणा कर सकता है जो अम्ब्रोस ने एक बार की थी, कि उसके पास जो कुछ है वह दरिद्रों की आय है; और फिर, कि बिशप के पास जो कुछ है वह सब गरीबों का है? (Ambrose, Epist. Lib. 5. Ep. 31 et 33।) मैं पूछता हूँ, उनमें से कितने थोड़े हैं जो जो कुछ उनके पास है उसका उतनी ही छूट से दुरुपयोग न करें मानो वह इसलिए दिया गया हो कि अपनी इच्छा से उड़ाया जाए? इसलिए यह उनका व्यर्थ ही शिकायत करना है कि वह उनसे ले लिया गया जो उनके पास बिना किसी अधिकार के था और जिसे उन्होंने घोर अधर्म से उड़ाया।
और हमारे राजाओं के लिए उन्हें इस प्रकार वंचित करना केवल उचित ही नहीं, आवश्यक भी था। जब उन्होंने देखा कि कलीसिया सच्चे सेवकों से सर्वथा वंचित है, और उनके पालन के लिए ठहराई गई आय आलसी निकम्मे मनुष्यों द्वारा निगल ली जाती है; जब उन्होंने देखा कि मसीह और गरीबों की पैतृक सम्पदा या तो थोड़े लोगों द्वारा निगल ली गई है या महँगे विलासों में उच्छृंखलता से उड़ाई जा रही है, तो क्या उन्हें हस्तक्षेप नहीं करना था? वरन् जब उन्होंने देखा कि सत्य के हठीले शत्रु कलीसिया की पैतृक सम्पदा पर दुःस्वप्न के समान बोझ बने पड़े हैं और उसका दुरुपयोग मसीह पर आक्रमण करने, खरे सिद्धान्त को दबाने और उसके सेवकों को सताने में करते हैं, तो क्या उसे तुरन्त उनके हाथों से छीन लेना उचित नहीं था, ताकि कम से कम वे कलीसिया के संसाधनों से सशस्त्र और सुसज्जित होकर कलीसिया को सताने न पाएँ? राजा योशिय्याह की प्रशंसा पवित्र आत्मा के अधिकार से की गई है, क्योंकि जब उसने देखा कि पवित्र भेंटें याजकों द्वारा अनुचित रीति से खर्च की जाती हैं, तो उसने उनसे लेखा लेने के लिए एक अधिकारी नियुक्त किया, (2 इतिहास 24:14।) और फिर भी वे याजक थे जिन्हें परमेश्वर ने सामान्य प्रबन्ध सौंपा था। तब उनके साथ क्या किया जाए जो कोई वैध सेवकाई नहीं करते, और जो न केवल उनकी तरह मन्दिर की मरम्मत की उपेक्षा करते हैं, वरन् कलीसिया को ढा देने में अपनी सारी शक्ति और साधन लगा देते हैं?
परन्तु कोई पूछेगा कि ली हुई आय का प्रबन्ध कैसे किया जाता है? निश्चय ही सर्वथा निर्दोष रीति से नहीं, तो भी हमारे शत्रुओं से कहीं अच्छी और पवित्र रीति से। उसमें से कम से कम सच्चे सेवकों का भरण-पोषण होता है जो अपनी भेड़-बकरियों को उद्धार के सिद्धान्त से चराते हैं, जबकि पहले, चरवाहों से सर्वथा खाली कलीसियाओं पर उन्हें वेतन देने का बोझ डाला जाता था। जहाँ भी विद्यालय या गरीबों के चिकित्सालय थे वे बने हुए हैं; कुछ स्थानों में उनकी आय बढ़ाई गई है; किसी में घटाई नहीं गई। बहुत स्थानों में मठों के बदले चिकित्सालय स्थापित किए गए हैं जहाँ पहले कोई न था; अन्य स्थानों में नए विद्यालय बने हैं, जिनमें न केवल शिक्षकों को नियमित वेतन दिया गया है, वरन् युवकों को भी प्रशिक्षित किया जाता है, इस आशा में कि वे पीछे कलीसिया के काम आएँगे।
सारांश यह कि कलीसियाओं को इन आयों से अनेक लाभ सामान्य रूप से मिलते हैं, जिनसे पहले केवल साधु और याजक ठूँस-ठूँसकर भरे जाते थे। असाधारण व्ययों में भी कोई छोटा भाग नहीं लगता, यद्यपि वे भली-भाँति गणना के योग्य हैं। यह निश्चित है कि जब कार्य अव्यवस्था में होते हैं तब उससे कहीं अधिक खर्च होता है जितना कलीसियाओं के बीच उचित प्रबन्ध करने पर होता। परन्तु इससे अधिक अन्याय कुछ नहीं हो सकता कि हमारे राजाओं और हाकिमों को इस प्रकार के व्यय करने के अधिकार से इनकार किया जाए, जो वे अपने निजी लाभ के लिए नहीं, वरन् कलीसिया की सार्वजनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते हैं। इसके अतिरिक्त, हमारे विरोधी अपनी लूटों और अन्यायपूर्ण वसूलियों को घटाना भूल जाते हैं, जिनसे बलिदानों के नाम पर समुदायों को लूटा जाता था, और जिनसे अब वे मुक्त हैं। परन्तु एक कारण है जो इस सारी चर्चा को बहुत अंश तक अनावश्यक बना देता है। तीन वर्ष से अधिक हुए, हमारे राजाओं ने घोषणा की थी कि वे लौटाने को तैयार हैं, बशर्ते यही नीति उन पर भी लागू की जाए जो कम सम्माननीय कारण से कहीं अधिक राशि दबाए बैठे हैं, और जो उसके प्रबन्ध में कहीं अधिक बड़े बिगाड़ के दोषी हैं। इसलिए हमारे राजा अपनी प्रतिज्ञा से महामहिम सम्राट के प्रति बँधे हैं। वह दस्तावेज़ भी संसार के सामने है; अतः यह सिद्धान्त की एकरूपता में बाधा न बने।
अन्तिम और प्रमुख आरोप जो वे हम पर लगाते हैं यह है कि हमने कलीसिया में फूट डाली है। और यहाँ वे हमारे विरुद्ध निर्भीकता से दावा करते हैं कि किसी भी दशा में कलीसिया की एकता को तोड़ना उचित नहीं। वे हम पर कितना अन्याय करते हैं, इसकी साक्षी हमारे लेखकों की पुस्तकें देती हैं। अब भी वे यह संक्षिप्त उत्तर ले लें — कि न हम कलीसिया से असहमत हैं, न उसकी सहभागिता से परे हैं। परन्तु क्योंकि कलीसिया के इस आकर्षक नाम से वे अन्यथा भक्त और सीधे मन के लोगों की आँखों में भी धूल झोंकने के आदी हैं, इसलिए मैं महामहिम सम्राट से और आप परम प्रतापी राजकुमारगण से विनती करता हूँ कि पहले तो सब पूर्वाग्रह त्याग दें, ताकि हमारे बचाव को निष्पक्ष कान से सुन सकें; दूसरे, कलीसिया का नाम सुनते ही तुरन्त भयभीत न हों, वरन् स्मरण रखें कि भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों का अपने दिनों की कथित कलीसिया के साथ वैसा ही संघर्ष था जैसा आप आज हमें रोमी पोप और उसके सारे दल के साथ करते देखते हैं। जब उन्होंने परमेश्वर की आज्ञा से मूर्तिपूजा, अन्धविश्वास, मन्दिर और उसकी पवित्र विधियों की अपवित्रता के विरुद्ध, याजकों की लापरवाही और सुस्ती के विरुद्ध, और सर्वव्यापी लोभ, क्रूरता और स्वेच्छाचार के विरुद्ध खुलकर बोला, तो उन्हें लगातार वही आपत्ति सुननी पड़ी जो हमारे विरोधियों के मुँह में सदा रहती है — कि सामान्य मत से असहमत होकर उन्होंने कलीसिया की एकता भंग की। कलीसिया का सामान्य शासन तब याजकों के हाथ में था। उन्होंने उसे अहंकार से अपने ऊपर नहीं ले लिया था, वरन् परमेश्वर ने उसे अपनी व्यवस्था के द्वारा उन्हें सौंपा था। सब उदाहरण बताने में बहुत समय लगेगा। इसलिए हम यिर्मयाह के उदाहरण से सन्तुष्ट रहें।
उसका सामना याजकों की सारी मण्डली से था, और जिन शस्त्रों से उन्होंने उस पर आक्रमण किया वे ये थे,
“आओ, हम यिर्मयाह के विरुद्ध युक्ति करें,
क्योंकि याजक से व्यवस्था, और बुद्धिमान से
सम्मति, और भविष्यद्वक्ता से वचन जाता नहीं रहेगा,” (यिर्मयाह 18:18।)
उनके बीच एक महायाजक था, जिसके निर्णय को ठुकराना प्राणदण्ड का अपराध था, और उनके साथ वह सारा वर्ग सहमत था जिसे परमेश्वर ने स्वयं यहूदी कलीसिया का शासन सौंपा था। यदि कलीसिया की एकता उसके द्वारा भंग होती है जो केवल ईश्वरीय सत्य से शिक्षित होकर सामान्य अधिकार का विरोध करता है, तो भविष्यद्वक्ता को फूट डालनेवाला ठहरना पड़ेगा; क्योंकि ऐसी धमकियों से तनिक भी न डरकर वह याजकों के अधर्म से युद्ध करता रहा और दृढ़ता से डटा रहा। कि परमेश्वर का वह अनन्त सत्य, जिसका प्रचार भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों ने किया, हमारे पक्ष में है, यह दिखाने को हम तैयार हैं, और किसी भी मनुष्य के लिए यह देखना सचमुच सहज है। परन्तु किया यह जाता है कि हम पर इस युद्ध-यन्त्र से आक्रमण होता है, “कलीसिया से अलग होने का कोई बहाना नहीं हो सकता।” हम सर्वथा इनकार करते हैं कि हम ऐसा करते हैं। तब वे हमें किस बात से दबाते हैं? इसके सिवाय कुछ नहीं कि कलीसिया का सामान्य शासन उनका है। परन्तु यिर्मयाह के शत्रुओं को यह तर्क देने का कितना अधिक अधिकार था? उनके पास तो कम से कम परमेश्वर का ठहराया हुआ वैध याजकपद अब भी बचा था; इसलिए उनकी बुलाहट निर्विवाद थी। जो आज प्रधान याजक कहलाते हैं, वे अपनी बुलाहट किसी भी व्यवस्था से, मानवीय या ईश्वरीय, प्रमाणित नहीं कर सकते।
फिर भी मान लें कि इस विषय में दोनों समान स्थिति में हैं, तब भी, जब तक वे पहले पवित्र भविष्यद्वक्ता को फूट का दोषी सिद्ध न करें, कलीसिया के उस आकर्षक नाम से वे हमारे विरुद्ध कुछ सिद्ध न कर सकेंगे। मैंने उदाहरण के रूप में एक भविष्यद्वक्ता का उल्लेख किया है। परन्तु अन्य सब घोषणा करते हैं कि उन्हें भी वही लड़ाई लड़नी पड़ी — दुष्ट याजक कलीसिया शब्द को विकृत करके उन्हें दबाने का यत्न करते थे। और प्रेरितों ने क्या किया? क्या उनके लिए, अपने आप को मसीह का दास घोषित करते हुए, आराधनालय के विरुद्ध युद्ध घोषित करना आवश्यक न था? फिर भी याजकपद का पद और प्रतिष्ठा तब नष्ट नहीं हुई थी। परन्तु कहा जाएगा कि यद्यपि भविष्यद्वक्ता और प्रेरित दुष्ट याजकों से सिद्धान्त में असहमत थे, फिर भी वे बलिदानों और प्रार्थनाओं में उनके साथ सहभागिता बनाए रखते थे। मैं मानता हूँ कि वे रखते थे, जब तक उन्हें मूर्तिपूजा में न घसीटा जाता। परन्तु भविष्यद्वक्ताओं में से किसके विषय में हम पढ़ते हैं कि उसने कभी बेतेल में बलिदान चढ़ाया? हम क्या मानें कि विश्वासियों में से किसने अशुद्ध बलिदानों में भाग लिया, जब अन्तियोकस द्वारा मन्दिर अपवित्र किया गया और उसमें अपवित्र विधियाँ चलाई गईं?
कुल मिलाकर, हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि परमेश्वर के दासों ने कलीसिया के इस खोखले नाम से कभी अपने आप को रुका हुआ अनुभव नहीं किया, जब वह अधर्म के राज्य का समर्थन करने के लिए आगे रखा गया। इसलिए केवल कलीसिया का नाम उछाल देना काफ़ी नहीं, वरन् विवेक से यह जाँचना चाहिए कि सच्ची कलीसिया कौन-सी है, और उसकी एकता का स्वरूप क्या है। और जिस बात पर सबसे पहले ध्यान देना आवश्यक है वह यह है कि कलीसिया को उसके सिर मसीह से अलग करने से सावधान रहें। जब मैं मसीह कहता हूँ, तो उसमें उसके सुसमाचार का सिद्धान्त भी सम्मिलित करता हूँ, जिस पर उसने अपने लहू की मुहर लगाई। इसलिए हमारे विरोधी, यदि हमें विश्वास दिलाना चाहते हैं कि वे सच्ची कलीसिया हैं, तो उन्हें सबसे पहले दिखाना होगा कि परमेश्वर का सच्चा सिद्धान्त उनके बीच है; और यही उसका अर्थ है जो हम प्रायः दोहराते हैं, अर्थात् यह कि सुव्यवस्थित कलीसिया के अचूक चिह्न खरे सिद्धान्त का प्रचार और संस्कारों का शुद्ध संचालन हैं। क्योंकि पौलुस घोषणा करता है कि कलीसिया “प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर उसारी गई है,” (इफिसियों 2:20) तो अवश्य ही यह निष्कर्ष निकलता है कि जो कलीसिया इस नींव पर स्थित नहीं, वह तुरन्त गिर जाएगी। अब मैं अपने विरोधियों की ओर आता हूँ।
वे निःसन्देह ऊँचे शब्दों में घमण्ड करते हैं कि मसीह उनके पक्ष में है। जैसे ही वे उसे अपने वचन में दिखाएँगे, हम मान लेंगे, उससे पहले नहीं। वे उसी प्रकार कलीसिया शब्द पर अड़े रहते हैं। परन्तु हम पूछते हैं, वह सिद्धान्त कहाँ है जिसे पौलुस कलीसिया की एकमात्र नींव घोषित करता है? निःसन्देह महामहिम सम्राट अब देखते हैं कि हम पर वास्तविकता से आक्रमण करने और केवल कलीसिया के नाम से आक्रमण करने में बड़ा अन्तर है। हम भी उतनी ही तत्परता से स्वीकार करते हैं जितनी वे कि जो कलीसिया को, विश्वासियों की सामान्य माता को, “सत्य का खम्भा और नींव” को छोड़ देते हैं, वे मसीह से भी विद्रोह करते हैं; परन्तु हमारा तात्पर्य उस कलीसिया से है जो अविनाशी बीज से सन्तानों को अमरता के लिए जन्म देती है, और जन्म देकर उन्हें आत्मिक भोजन से पालती है, (वह बीज और भोजन परमेश्वर का वचन है,) और जो अपनी सेवकाई के द्वारा उस सत्य को अखण्ड रखती है जो परमेश्वर ने उसकी गोद में रखा है। यह चिह्न किसी प्रकार सन्देहजनक नहीं, किसी प्रकार भ्रामक नहीं, और यह वही चिह्न है जो परमेश्वर ने स्वयं अपनी कलीसिया पर छाप दिया है कि उसके द्वारा वह पहचानी जाए। क्या हम यह चिह्न देखना चाहकर अन्याय करते जान पड़ते हैं? जहाँ वह नहीं है वहाँ कलीसिया का कोई रूप दिखाई नहीं देता। यदि केवल नाम आगे रखा जाए, तो हमें यिर्मयाह का वह प्रसिद्ध अंश उद्धृत करना ही पर्याप्त है, “तुम धोखे की बातों पर भरोसा मत करो, कि यह यहोवा का मन्दिर, यहोवा का मन्दिर, यहोवा का मन्दिर है,” (यिर्मयाह 7:4।)
“क्या यह भवन जो मेरे नाम से कहलाता है, तुम्हारी दृष्टि में डाकुओं की गुफा बन गया है?” (यिर्मयाह 7:11।)
इसी प्रकार, कलीसिया की एकता को, जैसा पौलुस उसका वर्णन करता है, हम पवित्र मानने की घोषणा करते हैं, और जो किसी भी रीति से उसे भंग करते हैं उन सब पर हम श्राप की घोषणा करते हैं। जिस सिद्धान्त से पौलुस एकता निकालता है वह यह है कि “एक प्रभु, एक विश्वास, एक बपतिस्मा, एक परमेश्वर और सब का पिता” है जिसने हमें एक ही आशा में बुलाया है, (इफिसियों 4:4, 5।) इसलिए हम एक देह और एक आत्मा हैं, जैसा यहाँ आज्ञा दी गई है, यदि हम केवल परमेश्वर से लगे रहें, अर्थात् विश्वास के बन्धन से एक-दूसरे के साथ खरे रहें। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए जो दूसरे स्थान पर कहा गया है, “कि विश्वास परमेश्वर के वचन से होता है।” इसलिए यह एक निश्चित बात ठहरे कि हमारे बीच पवित्र एकता तब है जब हम खरे सिद्धान्त में सहमत होकर केवल मसीह में एक किए गए हैं। और सचमुच, यदि किसी भी प्रकार के सिद्धान्त पर सहमति पर्याप्त होती, तो परमेश्वर की कलीसिया दुष्टों के अधर्मी गुटों से किस प्रकार पहचानी जा सकती? इसलिए प्रेरित थोड़ी ही देर पश्चात् जोड़ता है कि सेवकाई “मसीह की देह के गठन के लिए” ठहराई गई, “जब तक कि हम सब के सब विश्वास और परमेश्वर के पुत्र की पहचान में एक न हो जाएँ, और परिपक्व मनुष्य न बन जाएँ... ताकि हम आगे को बालक न रहें, जो मनुष्यों की ठग-विद्या और चतुराई से, उनके भ्रम की युक्तियों की, और उपदेश की हर एक बयार से उछाले और इधर-उधर घुमाए जाते हों, वरन् प्रेम में सत्य पर चलते हुए, सब बातों में उसमें जो सिर है, अर्थात् मसीह, बढ़ते जाएँ,” (इफिसियों 4:12-15।) क्या वह कलीसिया की सारी एकता को सच्चे सिद्धान्त में पवित्र सहमति में इससे अधिक स्पष्टता से समेट सकता था, जब वह हमें मसीह की ओर, और उस विश्वास की ओर जो उसकी पहचान में सम्मिलित है, और सत्य की आज्ञाकारिता की ओर लौटा लाता है? और जो कलीसिया को उस भेड़शाला के रूप में मानते हैं जिसका एकमात्र चरवाहा मसीह है, और जहाँ केवल उसी का शब्द सुना और परायों के शब्द से अलग पहचाना जाता है, उनके लिए इसके लम्बे प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं। और इसकी पुष्टि पौलुस से होती है, जब वह रोमियों के लिए प्रार्थना करता है, “धीरज और शान्ति का परमेश्वर तुम्हें यह बरदान दे कि मसीह यीशु के अनुसार आपस में एक मन रहो; ताकि तुम एक मन और एक मुँह होकर हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता परमेश्वर की स्तुति करो,” (रोमियों 15:5, 6।)
इसलिए हमारे विरोधी पहले मसीह के निकट आएँ, और तब हमें फूट का दोषी ठहराएँ कि हम सिद्धान्त में उनसे असहमत होने का साहस करते हैं। परन्तु जब मैं स्पष्ट कर चुका हूँ कि मसीह उनकी संगति से निकाल दिया गया है और उसके सुसमाचार का सिद्धान्त मिटा दिया गया है, तो हम पर उनका आरोप केवल इतना ठहरता है कि हम उनकी अपेक्षा मसीह से लगे रहते हैं। क्योंकि कौन मनुष्य, भला, विश्वास करेगा कि जो लोग अपने आप को मनुष्यों के वश में सौंपने के लिए मसीह और उसके सत्य से हटाए जाने से इनकार करते हैं, वे इस कारण फूट डालनेवाले और कलीसिया की सहभागिता से भगोड़े हैं? मैं निश्चय मानता हूँ कि याजकों का आदर किया जाना चाहिए और सामान्य अधिकार का तिरस्कार करने में बड़ा खतरा है। इसलिए यदि वे कहें कि हमें अपनी ही इच्छा से सामान्य अधिकार का विरोध नहीं करना चाहिए, तो हमें इस विचार पर हस्ताक्षर करने में कोई कठिनाई न होगी। क्योंकि हम इतने अशिष्ट नहीं कि यह न देखें कि जब शासकों के अधिकार का आदर नहीं होता तब कैसी अव्यवस्था उत्पन्न होगी। इसलिए पासबानों को उनका उचित सम्मान मिले — परन्तु ऐसा सम्मान जो मसीह के सर्वोच्च अधिकार को किसी भी प्रकार घटाता न हो, जिसके अधीन रहना उनका और हर मनुष्य का कर्तव्य है। क्योंकि परमेश्वर मलाकी के द्वारा घोषणा करता है कि इस्राएली कलीसिया का शासन याजकों को इस शर्त पर सौंपा गया था कि वे उस वाचा को विश्वासयोग्यता से पूरा करें जो उनके साथ बाँधी गई थी, अर्थात् कि उनके “होंठ ज्ञान की रक्षा करें,” और लोगों को व्यवस्था समझाएँ, (मलाकी 2:7।) जब याजक इस शर्त में सर्वथा चूक गए, तो वह घोषणा करता है कि उनके विश्वासघात से वाचा रद्द और निष्फल हो गई। पासबान भूल में हैं यदि वे समझते हैं कि वे कलीसिया के शासन में इसके सिवाय किसी और शर्त पर नियुक्त हैं कि वे परमेश्वर के सत्य के सेवक और साक्षी हों। इसलिए जब तक वे व्यवस्था और अपने पद के स्वभाव के विरुद्ध परमेश्वर के सत्य से उत्सुकता से युद्ध करते हैं, वे अपने ऊपर वह अधिकार न ओढ़ें जो परमेश्वर ने कभी न पहले याजकों को दिया, न अब बिशपों को दिया, उन शर्तों के सिवाय जिनका उल्लेख हो चुका है।
परन्तु क्योंकि वे मानते हैं कि कलीसिया की सहभागिता एक ऐसी शासन-प्रणाली तक सीमित है जो उन्होंने अपने लिए गढ़ ली है, इसलिए वे समझते हैं कि जब वे रोमी पीठ से हमारे अलगाव की ओर संकेत करते हैं तो अपने पक्ष में विजय का निर्णय करने को वह काफ़ी है। परन्तु रोमी पीठ की इस डींग मारी हुई प्रधानता का उत्तर देना कठिन नहीं। फिर भी यह ऐसा विषय है जिसमें मैं यहाँ प्रवेश नहीं करूँगा, एक तो इसलिए कि इसमें बहुत समय लगेगा, और दूसरे इसलिए कि हमारे लेखकों ने इस पर भरपूर चर्चा की है। मैं केवल महामहिम सम्राट और परम प्रतापी राजकुमारगण से विनती करूँगा कि वे कुप्रियान की सुनें, जब वह कलीसिया की सच्ची सहभागिता को परखने की उससे उत्तम रीति बताता है जो हमारे विरोधी करते हैं, अर्थात् उसे केवल रोमी पोप से जोड़ना। क्योंकि कलीसियाई एकता का एकमात्र स्रोत मसीह के अध्यक्षीय अधिकार में रखने के पश्चात्, जिस अध्यक्षीय अधिकार को वह कहता है कि प्रत्येक बिशप, जितनी मात्रा में वह उसे सौंपा गया है, उतनी में सम्पूर्ण रखता है, वह इस प्रकार आगे बढ़ता है: “कलीसिया एक है, जो अपनी फलदायकता की वृद्धि से बहुतों में फैलती है, जैसे सूर्य की किरणें बहुत हैं, पर प्रकाश एक ही है, वृक्ष में डालियाँ बहुत हैं, पर तना एक है, जो अपनी दृढ़ जड़ पर टिका है; और जब एक सोते से अनेक धाराएँ बहती हैं, तो यद्यपि प्रचुरता के कारण भागों में बँटवारा-सा दिखता है, तो भी उद्गम के विषय में एकता बनी रहती है। सूर्य के पिण्ड से एक किरण को अलग करो, प्रकाश की एकता बँटती नहीं। वृक्ष से एक डाली तोड़ो, जो तोड़ी गई वह अंकुरित नहीं हो सकती। सोते से एक धारा काट दो, वह सूख जाती है। वैसे ही परमेश्वर की कलीसिया, ज्योति से प्रकाशित होकर, अपनी किरणें सारे संसार पर भेजती है। फिर भी वह एक ही ज्योति है जो सर्वत्र फैली है। देह की एकता भंग नहीं होती।” (Cyprian De Unitat. Ecclesiae.) इसलिए विधर्म और फूट तब उत्पन्न होते हैं जब सत्य के उद्गम की ओर लौटा नहीं जाता, जब न सिर का ध्यान रखा जाता है, न स्वर्गीय स्वामी के सिद्धान्त की रक्षा की जाती है। तब वे हमें कोई ऐसा पदक्रम दिखाएँ जिसमें बिशप प्रतिष्ठित हों, पर मसीह के अधीन होने से इनकार करने के कारण नहीं, जिसमें वे उस पर एकमात्र सिर के रूप में निर्भर हों और केवल उसी को ध्यान में रखकर कार्य करें, जिसमें वे परस्पर भाईचारे की संगति रखें, उसके सत्य के सिवाय किसी और बन्धन से बँधे बिना; तब निःसन्देह मैं मान लूँगा कि उन पर कोई श्राप इतना कठोर नहीं जो उन्हें आदर की दृष्टि से नहीं देखते और उनकी पूर्ण आज्ञाकारिता नहीं करते। परन्तु क्या उस पदक्रम के झूठे मुखौटे में, जिस पर वे इतराते हैं, ऐसा कुछ है? केवल रोमी पोप, मसीह के प्रतिनिधि के रूप में, प्रबल है, और बिना व्यवस्था और बिना सीमा के, अत्याचारी की रीति से, वरन् किसी भी अत्याचारी से अधिक भ्रष्ट निर्लज्जता से शासन करता है। शेष देह उसके मानक के अनुसार अधिक ढाली गई है, मसीह के मानक के अनुसार नहीं। वह ज्योति जिसकी कुप्रियान चर्चा करता है बुझ गई है, वह भरपूर सोता काट दिया गया है; सारांश यह कि जो दिखाया जाता है वह केवल वृक्ष की ऊँचाई है, परन्तु ऐसा वृक्ष जो अपनी जड़ से अलग हो चुका है।
मैं जानता हूँ कि हमारे विरोधियों के पास रोमी पीठ की प्रधानता को बनाए रखने के लिए इतना जी-तोड़ परिश्रम करने का उचित कारण है। वे अनुभव करते हैं कि उसी पर वे स्वयं और उनका सब कुछ निर्भर है। परन्तु हे परम अजेय सम्राट और परम प्रतापी राजकुमारगण, आपका कर्तव्य यह है कि आप सावधान रहें कि वे व्यर्थ की व्याख्याओं से आपको धोखा न दें, जैसा वे असावधान लोगों को धोखा देने के आदी हैं। और पहली बात यह कि इस डींग मारी हुई सर्वोच्चता को स्वयं वे भी मानने को विवश हैं कि वह किसी ईश्वरीय अधिकार से नहीं, केवल मनुष्य की इच्छा से स्थापित हुई। कम से कम, जब हम इस तथ्य का प्रमाण देते हैं, तो यद्यपि वे स्पष्ट रूप से सहमत नहीं होते, फिर भी ऐसा लगता है मानो वे इसके विपरीत का समर्थन करने में लज्जित हैं। एक समय था जब उन्होंने पवित्रशास्त्र के कुछ अंशों को इस प्रत्यक्ष झूठ की पुष्टि के लिए ढिठाई से तोड़ा-मरोड़ा, परन्तु जैसे ही हम निकट के संघर्ष में आए, उनके हाथों से लकड़ी की उन फट्टियों को छीन लेना सहज पाया गया, जिन्हें उन्होंने दूर से तलवारों का रूप दे रखा था। इसलिए परमेश्वर के वचन से त्यागे जाकर वे सहायता के लिए प्राचीनता की ओर भागते हैं। परन्तु यहाँ भी हम बिना अधिक कठिनाई के उन्हें खदेड़ देते हैं। क्योंकि पवित्र पिताओं के लेख, महासभाओं की कार्यवाहियाँ, और सारा इतिहास स्पष्ट कर देते हैं कि सामर्थ्य की यह ऊँचाई, जो रोमी पोप को अब लगभग चार सौ वर्ष से प्राप्त है, धीरे-धीरे पाई गई, या यों कहें कि चालाकी से रेंगकर घुस आई या बलपूर्वक हथिया ली गई। परन्तु हम उन्हें यह भी क्षमा करें, और वे मान लें कि प्रधानता रोमी पीठ को ईश्वरीय रूप से दी गई थी, और प्राचीन कलीसिया की एकमत सम्मति से उसे अनुमोदन मिला है; तो भी इस प्रधानता के लिए स्थान केवल इस अनुमान पर है कि रोम में सच्ची कलीसिया भी है और सच्चा बिशप भी। क्योंकि गद्दी का सम्मान उस समय नहीं रह सकता जब गद्दी ही नहीं रही। इसलिए मैं पूछता हूँ कि रोमी पोप बिशप के कर्तव्य किस बात में निभाता है कि हमें उसे बिशप मानने को बाध्य होना पड़े? अगस्तीन का एक प्रसिद्ध कथन है, “बिशपपद एक कार्य का नाम है, केवल सम्मान की उपाधि नहीं।” और प्राचीन धर्म-सभाएँ बिशप के कर्तव्य इस प्रकार ठहराती हैं कि वचन के प्रचार से लोगों को चराना, संस्कारों का संचालन करना, पवित्र अनुशासन से पादरियों और लोगों को नियन्त्रित रखना, और इन कर्तव्यों से ध्यान न बँटे इसलिए इस जीवन की सब सामान्य चिन्ताओं से अलग रहना। इन सब कर्तव्यों में प्राचीनों को बिशप का सहायक होना चाहिए। पोप और उसके कार्डिनल इनमें से किसे निभाने का दावा करते हैं? तब वे बताएँ कि किस आधार पर वे अपने आप को वैध पासबान गिनाए जाने का दावा करते हैं, जबकि वे कर्तव्य के किसी भाग को अपनी छोटी उँगली से भी, दिखावे के लिए भी, नहीं छूते।
परन्तु हम ये सब बातें मान लें, अर्थात् यह कि वह बिशप है जो अपने कर्तव्य के हर भाग की सर्वथा उपेक्षा करता है, और वह कलीसिया है जो वचन की सेवकाई और संस्कारों के शुद्ध संचालन दोनों से वंचित है; तो भी क्या उत्तर दिया जाएगा जब हम यह जोड़ें कि न केवल इनका अभाव है, वरन् जो कुछ है वह इनके ठीक विपरीत है? कई शताब्दियों से वह पीठ अधर्मी अन्धविश्वासों, खुली मूर्तिपूजा और विकृत सिद्धान्तों के अधिकार में है, जबकि वे महान सत्य, जिनमें मसीही धर्म मुख्यतः समाया है, दबा दिए गए हैं। संस्कारों को घृणित लाभ और अन्य घिनौनी बातों के लिए बेच देने से मसीह का ऐसा चरम उपहास किया गया है कि मानो वह फिर से क्रूस पर चढ़ाया गया है। क्या वह सब कलीसियाओं की माता हो सकती है जो सच्ची कलीसिया का मुख तो क्या, एक रेखा तक नहीं रखती, और उन पवित्र सहभागिता के सब बन्धनों को तोड़ चुकी है जिनसे विश्वासियों को आपस में जुड़ा होना चाहिए? रोमी पोप अब सुसमाचार के पुनर्जीवित होते सिद्धान्तों का विरोध इस प्रकार करता है मानो उसका सिर दाँव पर हो। क्या वह इसी तथ्य से यह प्रमाणित नहीं करता कि उसकी पीठ की कोई सुरक्षा न होगी जब तक वह मसीह के राज्य को भगा न दे? महामहिम सम्राट जानते हैं कि यहाँ चर्चा का कितना विस्तृत क्षेत्र मेरे सामने खुलता है। परन्तु इस विषय को थोड़े शब्दों में समाप्त करने के लिए: मैं उस पीठ को प्रेरितीय मानने से इनकार करता हूँ जिसमें एक भयावह धर्मत्याग के सिवाय कुछ नहीं दिखता — मैं उसे मसीह का प्रतिनिधि मानने से इनकार करता हूँ जो सुसमाचार को उग्रता से सताकर अपने आचरण से प्रमाणित करता है कि वह मसीह-विरोधी है — मैं उसे पतरस का उत्तराधिकारी मानने से इनकार करता हूँ जो हर उस भवन को ढा देने का भरसक यत्न कर रहा है जो पतरस ने बनाया — और मैं उसे कलीसिया का सिर मानने से इनकार करता हूँ जो अपने अत्याचार से कलीसिया को चीरता और खण्ड-खण्ड करता है, उसे उसके सच्चे और एकमात्र सिर मसीह से अलग करके। इन इनकारों का उत्तर वे दें जो कलीसिया के पदक्रम को रोमी पीठ से जकड़ने पर इतने तुले हैं कि सुसमाचार के निश्चित और परखे हुए सिद्धान्तों को पोप के अधिकार के अधीन करने में नहीं हिचकिचाते। हाँ, मैं कहता हूँ, वे उत्तर दें; केवल आप, हे परम अजेय सम्राट और परम प्रतापी राजकुमारगण, विचार करें कि उन्हें इस प्रकार बुलाने में जो मैं माँगता हूँ वह उचित है या अनुचित।
