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चौथा उपदेश
चौथा उपदेश
यशायाह 38
18. क्योंकि अधोलोक तेरा धन्यवाद नहीं करता, और मृतक तेरी स्तुति नहीं करते, और जो गड्ढे में उतर जाते हैं वे तेरी सच्चाई की आशा नहीं रखते। 19. जीवित, हाँ जीवित ही तेरा गुणगान करेगा, जैसा मैं आज करता हूँ: पिता अपने बच्चों को तेरी सच्चाई से अवगत कराएगा। 20. प्रभु मुझे बचाने को यहाँ है: और हम अपने जीवन के सारे दिन प्रभु के भवन में गीत गाते रहेंगे। 21. यशायाह ने कहा, अंजीरों की एक टिकिया लेकर घाव पर उसकी पुलटिस बाँधो, तब वह चंगा हो जाएगा। 22. और हिजकिय्याह ने कहा था, इसका क्या चिह्न है कि मैं प्रभु के भवन को जाऊँगा?
यह बिलकुल निश्चित है कि यदि हमारा जीवन जैसा होना चाहिए वैसा व्यवस्थित होता, तो जब तक हम संसार में हैं, परमेश्वर का आदर करना ही सदा हमारा मुख्य उद्देश्य होता। और सचमुच यही उचित है कि हम अपना सारा अध्ययन इसी में लगाएँ, क्योंकि हम उससे अनगिनत और निरन्तर अनुग्रह पाते रहते हैं। इसी कारण हिजकिय्याह ने, यह पहचानकर कि परमेश्वर ने उसका जीवन बढ़ा दिया है और उस पर ऐसा अनुपम प्रेम दिखाया है, कहा कि वह ऐसे उपकार के लिए धन्यवाद देने को और भी अधिक साहस के साथ परमेश्वर के नाम की बड़ाई करेगा। और वह विशेष रूप से यह भी जोड़ता है कि केवल तभी तक नहीं जब तक वह स्वयं संसार में है, वह परमेश्वर को धन्य कहलवाने का यत्न करेगा, वरन् अपने उत्तराधिकारियों के लिए भी वह यह बात सदा प्रकट करवाता रहेगा कि परमेश्वर ने उसके साथ कैसा व्यवहार किया। और अन्त में, निष्कर्ष के रूप में, वह कहता है कि केवल परमेश्वर ही हमारा उद्धारकर्ता है, और यदि हम उसमें विश्राम पाएँ तो हमारा उद्धार निश्चित और अचूक होगा। परन्तु इस बीच किसी को यह अटपटा लग सकता है कि वह कहता है कि मृतक कब्र में परमेश्वर की स्तुति नहीं करेंगे—क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है मानो वह परमेश्वर की किसी और भलाई को नहीं मानता और नहीं पहचानता, सिवाय उस समय के जब परमेश्वर मनुष्यों को इस नश्वर जीवन में सम्भाले रखता है।
अब यदि हम केवल उसी को देखें जो यहाँ नीचे है, तो हमारा विश्वास निश्चय ही निर्बल होगा; जबकि हम जानते हैं कि हम इसी शर्त पर जीते हैं कि परमेश्वर की भलाई का कुछ अंश चखें, ताकि हम ऊपर खींचे जाएँ, और यहाँ तक कि पूरी तरह स्वर्गीय जीवन में उठा लिए जाएँ। तब ऐसा लग सकता है कि हिजकिय्याह संसार से बहुत अधिक बँधा हुआ है, और परमेश्वर के आत्मिक राज्य की उसे तनिक भी समझ नहीं है। क्योंकि यह कहने में कि कब्र परमेश्वर की स्तुति नहीं कर सकती, और न वे जो मर चुके हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि उसकी दृष्टि इस वर्तमान जीवन के सिवा किसी और बात पर नहीं है। और हम जानते हैं कि पहली बात यह कही गई है कि परमेश्वर चाहता है कि जैसे हमारे जीवन में वैसे ही हमारी मृत्यु में भी उसकी महिमा हो। और सन्त पौलुस इसी कारण कहता है कि उसके लिए कोई अन्तर नहीं कि वह जीए या मरे, बशर्ते उससे परमेश्वर की महिमा सदा आगे बढ़ती रहे। तो ऐसा लग सकता है कि सन्त पौलुस और हिजकिय्याह में बड़ा अन्तर है—क्योंकि एक मृत्यु से भागता और उससे भयभीत होता है, यह तर्क देते हुए कि मृतक परमेश्वर की स्तुति नहीं करेंगे, जबकि दूसरा कहता है, “मेरे लिए सब एक है कि मैं जीऊँ या मरूँ, क्योंकि परमेश्वर की महिमा मुझमें सदा होती रहेगी।” और यदि हम मृतकों की दशा पर विचार करें, कि वे संसार से अलग किए जा चुके हैं और परमेश्वर के निकट खींच लिए गए हैं, तो ऐसा लग सकता है कि वे उसके नाम को धन्य कहने के लिए और भी अधिक तत्पर और उत्सुक हैं। क्योंकि जब तक हम यहाँ अपने शरीर के इस बन्दीगृह के बोझ से दबे हैं, तब तक हम परमेश्वर की स्तुति करने को, कहने को, मुश्किल से अपने मुँह खोल पाते हैं; हम उस स्वतंत्र साहस या उस प्रचण्ड उत्साह के साथ इसमें नहीं लगते जैसा आवश्यक होता। परन्तु मृतक इस प्रकार बाधित नहीं हैं; वे हमारी तरह परमेश्वर से दूर नहीं हैं (जैसा कि सन्त पौलुस 2 कुरिन्थियों में इसकी चर्चा करता है)—इसलिए वे स्वर्ग के गायक-दलों के साथ इस गान में और भी अच्छी तरह सम्मिलित हो सकते हैं। और हम जानते हैं कि स्वर्गदूतों के विषय में क्या कहा गया है (जैसा कि हमने छठवें अध्याय में भी देखा) कि वे निरन्तर पुकारते रहते हैं, “सेनाओं का प्रभु धन्य है, पवित्र, पवित्र, पवित्र।” इसलिए, जहाँ तक हम अनुमान कर सकते हैं, जिन्हें परमेश्वर ने इस नश्वर जीवन से अलग कर लिया है, उन्हें उसके नाम की स्तुति करने के लिए और भी अच्छी रीति से तैयार होना चाहिए।
परन्तु सबसे पहले हम यह ध्यान दें कि हिजकिय्याह ने यहाँ इस पर विचार किया कि परमेश्वर ने हमें संसार में क्यों रखा है, और वह हमें इसमें क्यों सम्भाले रखता है। परमेश्वर हमसे कोई प्रतिफल नहीं माँगता: वह उस मनुष्य के समान नहीं है जो अपने घर में सेवकों को इसलिए रखता है कि वे उसकी भूमि जोतें और वह उनसे लाभ उठाए। न ही वह किसी बड़े राजकुमार के समान है जो बहुत-सी प्रजा इसलिए चाहता है कि उनके द्वारा उसका पालन हो और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सहायता मिले। परन्तु परमेश्वर हमसे कोई लाभ नहीं चाहता, ठीक वैसे ही जैसे उसे हमारी कोई आवश्यकता नहीं है; वह केवल इतना माँगता है कि जो अनेक उपकार वह हम पर करता है, उनके लिए हम उसे श्रद्धांजलि अर्पित करें। क्योंकि हमारा सारा जीवन, जैसा कि हम पहले संकेत कर चुके हैं, इसी उद्देश्य की ओर होना चाहिए: कि हम परमेश्वर को धन्य कहें, और यह साक्षी दें कि उसके उपकार हम पर व्यर्थ नहीं गए, जैसे वे व्यर्थ होते यदि हम, मानो, गूँगे होते।
तो हमें यही देखना है: कि हिजकिय्याह ने यह कहकर कि जीवित लोग परमेश्वर की स्तुति करेंगे, यह बताना चाहा कि जब मनुष्य परमेश्वर की स्तुति करने में नहीं लगते तो वे प्रकृति के क्रम को बिगाड़ देते हैं, और जब वे परमेश्वर के अनुग्रहों को दबा देते और भुला देते हैं तो उनकी कृतघ्नता किसी भी प्रकार क्षमा के योग्य नहीं ठहरती। इसलिए, चूँकि हमारा प्रभु हमसे और कुछ नहीं चाहता सिवाय इसके कि इस संसार में उसके नाम की महिमा हो, हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हिजकिय्याह कहता है, “जीवित, हाँ जीवित ही परमेश्वर की स्तुति करेंगे।” और हमें जीवितों और मृतकों की दशा के बीच का भेद भी ध्यान में रखना चाहिए। यदि मृतक परमेश्वर की स्तुति करते भी हों, तब भी हम यह निर्णय या कल्पना नहीं कर सकते कि वे हमारी रीति से इकट्ठे होकर अपने विश्वास की बाहरी एकता प्रकट करते हैं। उनमें से हर एक अकेले-अकेले परमेश्वर की स्तुति कर सकता है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वे एक देह में इकट्ठे हैं जैसे हम अभी हैं, क्योंकि पवित्रशास्त्र इस विषय में कुछ नहीं कहता। हमें अपने ही मन में, जैसा हमें भला लगे, वैसी कल्पनाएँ नहीं गढ़नी चाहिए। क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर इस सिद्धता को अन्तिम दिन के लिए रखता है—कि हम सब एक हो जाएँगे, अपने परमेश्वर से ऐसे जुड़ जाएँगे कि उसकी महिमा हममें पूरी रीति से चमके। इसलिए, चूँकि मृतकों के पास परमेश्वर की स्तुति में स्वयं को लगाने का वैसा तरीका नहीं है जैसा हमारे पास है, इसी कारण कहा गया है कि यह विशेष रूप से हम जीवितों का काम है।
परन्तु इससे भी अधिक बात है, क्योंकि हिजकिय्याह यहाँ केवल सामान्य रूप से मृत्यु की बात नहीं करता, जैसा हम पहले ही देख चुके हैं, वरन् वह उसे विशेष रूप से परिभाषित करता है—मानो वह परमेश्वर की कलीसिया से और उद्धार की सारी आशा से काट दिया गया होता, यदि वह दण्ड-आज्ञा पूरी की जाती; या मानो वह अपने न्यायी के सम्मुख खड़ा हुआ हो। इसलिए हिजकिय्याह केवल मरने की तैयारी नहीं कर रहा था, क्योंकि स्वभाव से हममें से कोई भी उस अनिवार्यता से बच नहीं सकता, परन्तु उसके पास परमेश्वर के क्रोध की यह गवाही थी, जिससे वह ऐसा भयभीत हुआ मानो उसके लिए सब कुछ खो गया हो। अब हम जानते हैं कि कोई भी परमेश्वर का गुणगान तब तक नहीं कर सकता जब तक उसके पास उसका अवसर और कारण न हो—क्योंकि जब हमारा प्रभु हमें भयानक मुख दिखाता है, तब हमारे मुँह बन्द हो जाते हैं, हम ऐसी वेदना से जकड़े जाते हैं कि उसे धन्य कहना हमारे लिए असम्भव हो जाता है; वरन् इसके विपरीत, जब परमेश्वर का क्रोध हमें इस प्रकार स्तब्ध कर देता है तब दाँत पीसने के सिवा और कुछ नहीं होगा। हिजकिय्याह की दशा ऐसी ही थी।
इसके विपरीत, जब परमेश्वर हम पर कृपालु प्रकट होता है, और अपनी कृपा का कोई चिह्न हमें देता है, तब वह हमारे मुँह खोल देता है, जैसा कि भजन संहिता इक्यावनवें में कहा गया है: “हे प्रभु, तूने मेरे होंठ खोले हैं, इसलिए मैं तेरी स्तुति गाऊँगा”; और अन्य स्थानों में, “हे प्रभु, तूने मेरे मुँह में नया गीत डाला है।” इससे भविष्यद्वक्ता यह संकेत देते हैं कि जब परमेश्वर ने उन्हें किसी विपत्ति से छुड़ाकर आनन्दित किया, तब उसने उसी के द्वारा उन्हें अपनी स्तुति गाने, अपने नाम को धन्य कहने, और अपने अनुग्रहों को स्मरण करने के लिए प्रेरित किया। इसलिए, जब हम परमेश्वर में केवल भयावह आतंक ही देखते हैं, तब हम मानो स्तब्ध हो जाते हैं, और द्वार बन्द हो जाता है, जिससे हम परमेश्वर की स्तुति कर ही नहीं सकते। अतः इस खण्ड में हिजकिय्याह जब कहता है कि मृतक परमेश्वर की स्तुति नहीं करेंगे, तो उसका आशय सामान्य रूप से उन सब से नहीं जो इस क्षणभंगुर जीवन से चले जाते हैं, परन्तु उनसे है जो मानो परमेश्वर से कट गए हैं, उसके क्रोध से दबे हुए हैं, उसकी भलाई का कुछ भी स्वाद नहीं पाते, और उद्धार की सारी आशा से वंचित और पराए हो गए हैं। ऐसे लोगों के लिए परमेश्वर की स्तुति करना असम्भव है।
एक और बात ध्यान देने योग्य है। क्योंकि जब विश्वासी किसी संकट में जकड़े और दबे होते हैं, तब उन्हें अपने दुःख के सिवा शायद ही कुछ और दिखाई देता है, और हममें से हर एक इसे अपने भीतर भली-भाँति अनुभव करता है। जब कोई विपत्ति हमें पूरी तरह गिरा देती है, तब हम अपना मन किसी और बात की ओर नहीं लगा पाते, क्योंकि हम वहाँ मानो एक सँकरे कारागार में रुके रहते हैं। हिजकिय्याह के साथ ऐसा ही हुआ। जैसा कि भजन संहिता अट्ठासीवें में भी जब कहा गया है कि मृतकों की दशा विस्मृति की भूमि है, जहाँ परमेश्वर के विषय में कुछ नहीं जाना जाता—तो वह निन्दा-सी लग सकती है। परन्तु बोलने के ऐसे ढंग मनुष्यों की अपरिपक्वता और निर्बलता से उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे स्वयं को शान्त करके स्थिर मन से निर्णय नहीं कर पाते, और स्पष्ट और भली-भाँति विचारी हुई समझ नहीं रख पाते; वरन् उनका दुःख उन्हें दबाता और बहा ले जाता है, जिससे वे मानो बिना सोचे और गड़बड़ाकर बोलते हैं। इसी प्रकार अय्यूब कहता है कि मनुष्य, जब इस संसार से अलग हो जाते हैं, तो उन्हें कोई चिन्ता नहीं रहती, कि हर एक ऐसे विश्राम में है मानो वहाँ सब कुछ गड्डमड्ड हो, कि दास और स्वामी सब एक हैं, और अत्याचारी अब भय उत्पन्न नहीं करते। वह मृतकों की दशा के विषय में ऐसे कहता है मानो मृत्यु ने सब कुछ मिटा दिया हो। फिर भी यह उसका वास्तव में सोचा-समझा निर्णय नहीं था—वरन् उसके शोक ने उसे शान्त मनुष्य की भाँति बोलने नहीं दिया, क्योंकि वह संकट से इतना विचलित हो गया था कि उसके शब्द भटकने लगे।
हम हिजकिय्याह के विषय में भी यही मान सकते हैं। वह मृतकों की दशा और स्थिति के विषय में वैसा नहीं बोलता जैसा पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है। और क्यों? उसके शोक और उसके मन में बैठे भय ने उसे ऐसा वश में कर लिया कि उसे पता ही न रहा कि वह कहाँ खड़ा है। यह सच है कि इसे क्षमा नहीं किया जा सकता—और इसी कारण हमारा प्रभु हमें हमारी अपनी निर्बलता के दर्पण दिखाता है, जब हम देखते हैं कि अत्यन्त पवित्र और सिद्ध मनुष्य भी ऐसा बोलते हैं। परन्तु इस बीच परमेश्वर ने हिजकिय्याह को सह लिया, क्योंकि उसमें मुख्य बात बनी रही—जैसा हम पहले देख चुके हैं, उसका लक्ष्य इसी ओर था: परमेश्वर के नाम की महिमा करना। क्योंकि वह इस संसार में एक पल भी ऐसे जीने की अपेक्षा, कि परमेश्वर ने उसके लिए जो भली वस्तुएँ कीं उन्हें कृतघ्नता से अपवित्र करे, सौ बार मर जाना अधिक पसन्द करता। यहाँ हिजकिय्याह इस नियम पर दृढ़ है: कि मनुष्यों को जीवन का एक दिन भी नहीं चाहना चाहिए, सिवाय इसके कि उससे परमेश्वर की महिमा हो। परन्तु इस बीच यह कि वह इतने बड़े क्लेशों से ऐसा विचलित था कि जैसा उसे बोलना चाहिए था वैसा स्पष्ट रूप से नहीं बोल सका—यह उसकी निर्बलता से आता है, जिसे परमेश्वर क्षमा करता और सह लेता है; क्योंकि यह अवज्ञा नहीं है, चूँकि हमारी प्रार्थनाओं में बहुत-सी अतिशयोक्तियाँ होती हैं। यह सच है कि हमें सदा उस नियम के अनुसार चलना चाहिए जो हमें दिया गया है, ताकि कोई भी परमेश्वर से अपनी ही सनक के अनुसार, जैसा उसे भाए, प्रार्थना न करे। परन्तु जो भी हो, हमारे भीतर ऐसे पछतावे और शिकायतें होंगी जो उचित सीमा से बढ़कर होंगी, और इस विषय में परमेश्वर को हम पर तरस खाना पड़ता है।
तो संक्षेप में यही हमें स्मरण रखना है: कि सबसे बढ़कर, जीवित रहते हुए हम सदा इसी उद्देश्य को रखें कि परमेश्वर का आदर हो। क्योंकि इसी कारण उसने हमें इस संसार में रखा है, इसी कारण उसने हमें अपने झुण्ड का होने के लिए चुना है—अर्थात् इसलिए कि हम इकट्ठे होकर एक मन से उसकी स्तुति गाएँ। हम इसे भजन संहिता एक सौ पन्द्रहवें में और भी स्पष्ट देखते हैं, जहाँ ऐसा ही कथन है। और वहाँ केवल एक मनुष्य नहीं बोल रहा, वरन् विश्वासियों की कलीसिया की सारी देह बोल रही है, जो कहती है कि मृत्यु में परमेश्वर की स्तुति नहीं की जाएगी—परन्तु हम जीवित, वे कहते हैं, अन्त तक यह मानेंगे कि परमेश्वर ने हमें बचाए रखा है। वहाँ हमें यह संकेत मिलता है कि परमेश्वर संसार के अन्त तक अपनी कलीसिया को सदा बचाए रखेगा, और लोगों का कोई न कोई बचा हुआ भाग सदा रहेगा। क्यों? क्योंकि वह मनुष्यों के बीच पिता और उद्धारकर्ता के रूप में जाना जाना चाहता है, और भले ही वह सबसे बड़ी भीड़ न हो, तब भी वह चाहता है कि उसे धन्य कहने वाली कोई मण्डली रहे।
तो आओ हम सीखें कि जब तक वह हमें यहाँ नीचे रखता है, और जब तक हम उसकी उदारता से पोषित होते हैं, और—इससे भी बढ़कर—चूँकि उसने हमें अपने पास बुलाया है, तब तक हम सदा अनन्त मीरास की आशा की ओर बढ़ते हुए परमेश्वर के नाम को धन्य कहने का अभ्यास करें। चूँकि यह ऐसा है, आओ हम अपना सारा प्रयत्न इसी में लगाएँ, वरन् अपने सारे जीवन भर। क्योंकि यदि हम ऐसा न करें तो इससे अच्छा होता कि हमारी माताओं का गर्भपात हो जाता, या पृथ्वी फटकर हमें निगल जाती, बजाय इसके कि हम यहाँ पशुओं की भाँति पेट भरते रहें, परमेश्वर जो इतने उपकार हम पर करता है उनके लिए कृतघ्न बने रहें, और अपनी चुप्पी से उसकी स्तुति को गाड़ दें। यह एक बात हुई।
और आगे, आओ हम सन्त पौलुस के उदाहरण पर चलते हुए सदा इसके लिए तैयार रहें कि चाहे जीवन से हो या मृत्यु से, परमेश्वर की महिमा करें। यदि हम कभी-कभी व्याकुल हो जाएँ, जैसा भला राजा हिजकिय्याह हुआ था, तो हम पहचानें कि हमारे सारे पछतावे, शिकायतें और कराहें हमारे लिए सन्देहास्पद होनी चाहिए, क्योंकि हमारी निर्बलता के कारण हम उनमें उचित मर्यादा नहीं रख सकते। इसलिए जो यहाँ कहा गया है—कि मृतक परमेश्वर की स्तुति नहीं करेंगे—उसे हमें एक सामान्य सिद्धान्त नहीं बना लेना चाहिए, ताकि जब परमेश्वर हमें अपने पास बुलाना चाहे तब हम अपना पक्ष रखने के लिए उसे तर्क बनाएँ; आओ हम हिजकिय्याह, या दाऊद के बहाने, जिसने भजन संहिता छठवें में ऐसा ही कहा, या सारे लोगों के बहाने, जिनका हमने अभी हवाला दिया, यह बहाना न बनाएँ। क्योंकि उसमें अतिरेक था—क्योंकि दाऊद और हिजकिय्याह दोनों, और सामान्य रूप से सारी कलीसिया, भयानक विनाश के समय में यह सोचने के लिए परखे गए थे कि परमेश्वर उन्हें त्यागना, अस्वीकार करना और उनसे और कोई सम्बन्ध न रखना चाहता है। चूँकि उन्होंने इस प्रकार अपने मन में अपने आपको परमेश्वर से अलग कर लिया था, वे घबरा गए, और इसमें आश्चर्य की बात नहीं। परन्तु आओ हम इससे कोई नियम न निकालें, मानो हम भी वैसा कर सकते हैं, वरन् यह हमें अपनी निर्बलता को पहचानना सिखाए। और आगे, भले ही परमेश्वर हमें सह लेता है, हम ऐसी भूल में अपने आपको ढील न दें। तो यही हमें स्मरण रखना है।
अब, इस बीच, हमें चेताया जाता है कि जितना परमेश्वर हमें अपने अनुग्रहों का अनुभव कराता है, उतना ही हमारे हृदय विशाल हों और हमारे मुँह उसके नाम को धन्य कहने के लिए खुलें। और इसके विपरीत, कि हम उसकी स्तुति में भले और स्वतंत्र भाव से निकला एक शब्द भी कभी नहीं कह सकेंगे जब तक हमें विश्वास न हो कि परमेश्वर हम पर कृपालु है, और हम उसके हाथ से पाई हुई भली वस्तुओं का सदुपयोग करें। पहली बात के विषय में, हममें से हर एक परमेश्वर के अनुग्रहों के उस लेखे के अनुसार, जो वह बनाता है, अपने आपको जगाना सीखे, क्योंकि उनकी गिनती अनन्त है। हममें से कोई ऐसा नहीं जो, यदि वह अपने विषय में ठीक से सोचे, तो दब न जाए—जैसा कि भजन संहिता चालीसवें में कहा गया है, कि यदि हम उन गवाहियों को गिनना चाहें जो परमेश्वर हमें अपनी पितृवत् देखभाल और दया की देता है, तो वे हमारे सिर के बालों से भी अधिक हैं, और हम पूरी तरह चकित रह जाएँगे। परन्तु जिस भी माप में परमेश्वर हममें से हर एक पर अपनी भलाई की सम्पत्ति दिखाता है, उतना ही हम उसके नाम को धन्य कहने के लिए प्रेरित हों, और हममें से हर एक इसमें यत्न और परिश्रम करे। इस खण्ड पर संक्षेप में हमें यही ध्यान देना है।
अब, दूसरी ओर, आओ हम पहचानें कि हमारा जीवन शापित है यदि हम परमेश्वर की दी हुई भली वस्तुओं से तो पेट भरें परन्तु उनमें उसकी भलाई पर मनन न करें। क्योंकि जो कुछ हमारे उपयोग और हमारे उद्धार के लिए समर्पित किया गया था, उस सबको हम अपवित्र करते हैं, जब तक कि हम इस निष्कर्ष तक न पहुँचें—अर्थात् यह पहचानना कि परमेश्वर सचमुच हमारे प्रति पिता प्रमाणित होता है, और हर प्रकार की कोमलता से हमें अपनी ओर खींचता है, ताकि हम सन्देह न करें कि वह हमें अपनी सन्तान मानता है। और इसमें हम यह भी देखते हैं कि पोप के अनुयायियों की दशा कितनी दयनीय है—क्योंकि वे अपने आपको परमेश्वर की भलाई का निश्चय रखने भी नहीं देते, परन्तु कहते हैं कि हमें सदा सन्देह में रहना चाहिए। और इस प्रकार उनकी सारी प्रार्थनाएँ, और परमेश्वर को दिया जानेवाला उनका सारा धन्यवाद, कपट और दिखावे के सिवा कुछ नहीं है। क्योंकि हम परमेश्वर को भरोसे के बिना नहीं पुकार सकते, और न ही यह जाने बिना कि वह हम पर कृपालु है उसके नाम की स्तुति कर सकते हैं। अब वे इससे पूरी तरह वंचित हैं। इसलिए आओ हम सीखें कि जब तक हमें उसकी भलाई का निश्चय न हो, हम कभी भी परमेश्वर को स्तुति का ऐसा बलिदान नहीं चढ़ा सकेंगे जिसे वह आदर और मूल्य दे, और न कभी अपने जीवन के सच्चे उद्देश्य को पा सकेंगे। और इसलिए, जब भी हम परमेश्वर के सारे अनुग्रहों और उपकारों के विषय में सोचें, तब यह बात मन में आए: कि परमेश्वर हमारे लेपालकपन को पक्का और प्रमाणित करता है, ताकि हम सन्देह न करें कि वह हमें अपनी सन्तान मानता है, और हम निःसंकोच उसे पिता कहकर पुकार सकें। इस खण्ड से संक्षेप में हमें यही स्मरण रखना है।
अब हमें यह भी देखना है कि हिजकिय्याह क्या कहता है: “जीवित, हाँ जीवित ही तेरा गुणगान करेगा; वरन् पिता अपने बच्चों को तेरी सच्चाई बताएगा।” उसने ऊपर कहा था कि मृतक अब परमेश्वर की सच्चाई की आशा नहीं रखेंगे—अर्थात् उन्हें उसमें अब कोई आशा नहीं रहेगी। और इसमें हम वह देखते हैं जिसका संकेत मैं पहले कर चुका हूँ: कि हिजकिय्याह उन सब के विषय में, जिन्हें परमेश्वर ने इस संसार से अलग कर लिया है, बिना भेद के नहीं कहता—क्योंकि यह निश्चित है कि विश्वासी परमेश्वर की सच्चाई की आशा रखते हैं। जब याकूब ने अन्तिम साँस लेते हुए कहा, “हे प्रभु, मैं तेरे उद्धार की बाट जोहता रहा हूँ,” तो उसने यह केवल एक क्षण के लिए नहीं कहा, परन्तु घोषणा की और दृढ़ता से कहा कि उसके हृदय पर यह निश्चय अंकित था, जो कभी बुझेगा नहीं, ऐसा कि चाहे वह सैकड़ों मृत्युओं से होकर गुज़रे, यह निधि उसके लिए सदा सुरक्षित रखी जाएगी। इसलिए सन्त और विश्वासी लोग, जब परमेश्वर उन्हें संसार से बुला लेता है तब भी, पुनरुत्थान की और अपने लिए प्रतिज्ञा की हुई उस आशीष की आशा को पोसना नहीं छोड़ते। परन्तु हिजकिय्याह मृतकों के विषय में ऐसे बोलता है मानो वे लोग हों जो परमेश्वर के राज्य से मानो निर्वासित और पूरी तरह पराए हैं, जिन्हें वह त्यागता है। अब वह स्वयं अपनी समझ के अनुसार उसी दशा में था, जब तक कि परमेश्वर ने उसे अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा सान्त्वना न दी। क्योंकि उसके पास जो सन्देश भेजा गया था वह यह दिखाने के लिए था कि परमेश्वर उसके विरुद्ध है, और उसके शत्रु के रूप में, उसके विरुद्ध शस्त्र बाँधे हुए आ रहा है। इसलिए हिजकिय्याह को उस दशा में घबराया हुआ रहना ही था। अतः यह बिना कारण नहीं कि वह कहता है कि मृतक परमेश्वर की सच्चाई की आशा नहीं रखते—अर्थात् वे उसकी प्रतिज्ञाओं से पूरी तरह बाहर कर दिए गए हैं, अब उसकी सन्तान में गिने नहीं जाते। परन्तु अब वह कहता है कि जीवित लोग, जो परमेश्वर की भलाई का स्वाद चखते हैं, अपने बच्चों को उसकी सच्चाई से परिचित कराएँगे।
अब यहाँ फिर हम देखते हैं कि हमारे बीच परमेश्वर की यथोचित स्तुति और आदर कब होता है—अर्थात् जब यह जाना जाता है कि वह अपने सब लोगों के प्रति विश्वासयोग्य है, कि वह उन्हें कभी नहीं त्यागता, परन्तु आवश्यकता के समय उनके लिए उसकी सहायता तैयार रहती है, और उस पर टेक लगाने से वे कभी निराश नहीं होंगे। यही परमेश्वर की स्तुति का सच्चा सार है। इसलिए संक्षेप में हम देखते हैं कि जब मनुष्य परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, या उसे धन्यवाद देने का दिखावा करते हैं, और साथ ही उस प्रेम के विषय में शिक्षित नहीं होते जो वह उनसे रखता है, अपने उद्धार का निश्चय नहीं रखते, और कोई प्रतिज्ञा नहीं जानते, तो वह झूठ और मिथ्या के सिवा कुछ नहीं है। जब यह कमी होती है, तब निश्चित है कि मनुष्यों के मुँह में परमेश्वर की जो भी स्तुतियाँ गूँजें, वे हवा और धुएँ के सिवा कुछ नहीं हैं। तो क्या हम परमेश्वर की स्तुति वैसी करना चाहते हैं जैसी हमें करनी चाहिए, कि वह हमारी चढ़ाई हुई स्तुति और धन्यवाद की बलियों को स्वीकार करे? तो आओ हम उसके वचन से लाभ उठाएँ, आओ हम जानें कि उस पर भरोसा रखने का क्या अर्थ है—जो हम तब तक नहीं कर सकते जब तक वह हम पर अपनी भली इच्छा प्रकट न करे, हमें निश्चय न दिलाए कि वह हमें ग्रहण करता है, कि हमें उस तक पहुँच प्राप्त है, और कि जब तक हम उसकी शरण में आते रहेंगे हम कभी त्यागे नहीं जाएँगे। यदि हमें ऐसी शिक्षा न मिले, तो हम परमेश्वर की स्तुति में, जैसी अपेक्षित है, एक शब्द भी कभी नहीं कह सकेंगे। इसलिए हिजकिय्याह के कथन का सम्बन्ध यही है—कि पिता अपने बच्चों को परमेश्वर की सच्चाई से अवगत कराएगा। और आगे, जैसे उसने कहा कि मृतक उसकी आशा नहीं कर सकते और न उसमें अपना सहारा पा सकते हैं, वैसे ही आओ हम पहचानें कि जब परमेश्वर हम पर कृपालु और उदार होना प्रकट करता है, तो यह इसलिए कि हमारी आशा सदा और भी दृढ़ हो, जिससे हम उसकी शरण में आने के लिए और भी अधिक साहस पाएँ, और कभी सन्देह न करें कि आवश्यकता में हमारी सहायता के लिए उसका हाथ सदा तैयार है।
तो हम परमेश्वर के अनुग्रहों का सही उपयोग कैसे करेंगे? जब हम विश्वास में सदा और अधिक दृढ़ होते जाएँ, जब हम हर परीक्षा को चुनौती दे सकें, जब हम यह निश्चय कर सकें कि परमेश्वर को पुकारने में हमें अपना परिश्रम व्यर्थ जाने का कभी भय न होगा, क्योंकि हमारी आशा कभी लज्जित नहीं होगी। जब हम इसमें भली-भाँति निश्चित हो जाएँ, ताकि हम शैतान से युद्ध कर सकें और हर परीक्षा को हटा सकें, तब हम जान पाएँगे कि परमेश्वर के उपकारों को अपने उपयोग में बुद्धिमानी से कैसे लाएँ, और उन्हें लाभदायक कैसे बनाएँ। यहाँ संक्षेप में हमें यही स्मरण रखना है।
आगे, जब यह कहा जाता है कि पिताओं को अपनी सन्तान के प्रति कैसा आचरण करना चाहिए, तो हमें सामान्य रूप से यह निष्कर्ष निकालना चाहिए (जैसा कि ऊपर पहले ही चर्चा हो चुकी है) कि केवल इतना पर्याप्त नहीं कि हम अपने जीवनकाल में परमेश्वर की महिमा हो ऐसा करें—वरन् हमें यह भी चाहना चाहिए कि जैसे उसका नाम अमर है, वैसे ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसका गुणगान होता रहे, कि हमारे बाद आनेवाले शुद्ध धर्म को थामे रहें, कि परमेश्वर की सेवा कभी पतन में न गिरे परन्तु सदा बनी रहे और आगे बढ़ती रहे, और कि परमेश्वर की भलाई की सर्वत्र बड़ाई हो। जिनके बच्चे हैं वे पहचानें कि परमेश्वर ने उन्हें उनकी देखरेख में सौंपा है, और जब तक वे उन्हें परमेश्वर की सेवा करना सिखाने में पूरा परिश्रम न करें, तब तक उन्हें उनका लेखा देना होगा। क्योंकि जब यह कहा गया है कि पिता अपने बच्चों के सामने परमेश्वर की सच्चाई की घोषणा करेगा, तो हमें सदा इसी उद्देश्य पर लौटना चाहिए: कि बच्चे उस पर भरोसा रखें, उसे पुकारें, हर भली वस्तु की स्तुति उसी को दें, और अपने आपको पूरी तरह उसी को और उसकी आज्ञाकारिता को समर्पित और अर्पित करें। इसलिए यदि पिता अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं, तो वे पहचानें कि यही वह मुख्य मीरास है जो उन्हें अपने बच्चों के लिए छोड़नी चाहिए। क्योंकि यदि वे उनके लिए धन-सम्पत्ति तो जोड़ें, परन्तु इस बीच जब उन्हें उच्छृंखल, दुष्ट, अपवित्र और परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाला बनते देखें तब भी उन्हें खुली छूट दे दें—तो उन सारे परिश्रमों पर हाय, जो वे उन्हें सांसारिक रीति से आगे बढ़ाने में लगाते हैं, क्योंकि वे उन्हें केवल इसलिए ऊँचा उठाते हैं कि उनकी गर्दनें और भी ज़ोर से टूटें। जब उनके पास बड़ी सम्पत्ति हो और फिर भी वे परमेश्वर की शिक्षा में उसका तिरस्कार करें, तो उनका पतन और भी घातक होगा—उनकी लज्जा और भी भयानक होगी, क्योंकि उनकी कृतघ्नता उतनी ही कम क्षमा के योग्य होगी। इसलिए पिता इस विषय में जितना वे सोचने के आदी हैं उससे अधिक ध्यान से सोचें: कि जब परमेश्वर उन्हें सन्तान देता है, तो वह उन्हें इस कर्तव्य में बाँध देता है, कि वे और भी यत्न करें कि उन्हें जीवन भर के लिए उसकी सच्चाई की शिक्षा मिले—जैसा कि हम अब्राहम में, जो विश्वासियों का पिता है, हमारे सामने दिया गया उदाहरण देखते हैं। क्योंकि जब परमेश्वर यह दिखाना चाहता है कि वह अपने घराने को जैसा चाहिए वैसा चलाएगा, तो वह कहता है, “क्या मैं अपने दास अब्राहम से वह छिपाऊँगा जो मैं करने पर हूँ? नहीं”—यहाँ परमेश्वर उसके साथ घनिष्ठता प्रकट करता है। “क्योंकि,” वह कहता है, “वह अपने बच्चों को मेरी विधियों, मेरी व्यवस्थाओं और मेरे नियमों में सिखाएगा।” यही वह चिह्न है जिससे विश्वासी लोग उनसे अलग पहचाने जाते हैं जो परमेश्वर का तिरस्कार करते हैं। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि हम कलीसिया में गिने जाएँ, तो आओ हम अब्राहम की इस धुन और इस लगन का अनुसरण करें—अर्थात् हममें से हर एक, जैसा घराना उसके पास है उसके अनुसार, यत्न करे कि उसमें परमेश्वर का आदर हो, और उसकी सच्चाई वहाँ अन्त तक सदा जानी जाती रहे।
अब, निष्कर्ष में हिजकिय्याह कहता है: “प्रभु मुझे बचाने को यहाँ है।” इस वाक्यांश का अर्थ है कि वह हर दूसरे उद्धार को ठुकराता और अलग रख देता है, मानो वह कह रहा हो, “केवल परमेश्वर ही है।” वह कह सकता था, “प्रभु ने मुझे बचा लिया”; वह कह सकता था, “मेरा जीवन उसी से और उसके निरे अनुग्रह से है”—परन्तु वह इससे आगे जाता है, मानो वह यहाँ परमेश्वर के आदर को थामे रखना चाहता हो, और उन सब भरोसों को गिरा देना चाहता हो जो मनुष्य अपनी ही कल्पनाओं में बना लेते हैं। क्योंकि हमारी यह आदत है कि जब हम अपने आपको सुरक्षित करना और निश्चय पाना चाहते हैं, तो कहते हैं, “मैं यह उपाय करूँगा, या वह उपाय।” परन्तु हिजकिय्याह उस सब को त्याग देता है, और घोषणा करता है कि केवल परमेश्वर ही है, और कि हमें केवल उसी के पास आना है। यह सच है कि परमेश्वर हमें उन सब साधनों का उपयोग करने देता है जो वह हमें देता है, और जिन्हें उसने ऐसे ही उपयोग के लिए ठहराया है—परन्तु फिर भी वह नहीं चाहता कि उससे उसकी महिमा धुँधली हो, और ठीक ही। फिर भी मनुष्य इतने दुष्ट और हठीले हैं कि वे सदा परमेश्वर की महिमा को घटाने का अवसर ढूँढ़ लेते हैं, इस बहाने से कि वह अपनी सृष्टि की वस्तुओं के द्वारा उनकी सहायता करता है। यदि परमेश्वर केवल हमें अपनी सामर्थ्य का अनुभव कराकर सन्तुष्ट नहीं होता, परन्तु अपनी सारी सृष्टि को हमारे उपयोग में लगा देता है, तो हमें उसकी स्तुति करने के लिए और भी अधिक प्रेरित होना चाहिए। परन्तु इसके बजाय हम ठीक उलटा करते हैं: हम उसका उचित अधिकार उससे छीन लेते हैं, हम उसे छोड़ देते हैं, और अपना भरोसा इधर-उधर लगाते हैं, यह कल्पना करते हुए कि हमारा उद्धार इस स्रोत से या उस स्रोत से आता है। इसी प्रकार परमेश्वर उस चीज़ से ठगा जाता है जो उसका उचित अधिकार है।
इसलिए जो हिजकिय्याह यहाँ कहता है, उसे हमें और भी सावधानी से देखना चाहिए: “प्रभु हमें बचाने को यहाँ है”—अर्थात् यद्यपि परमेश्वर हमारी ओर अपना हाथ बढ़ाता है, और हमें अपने आपको सम्भालने के साधन देता है, तो भी हमें स्वीकार करना चाहिए कि वही सोता है, और जो धारा हमारी ओर बहकर आती है वह हमें यह जानने से नहीं रोकती कि पानी कहाँ से आता है। इसलिए आओ हम सदा इसी स्रोत की ओर देखें—अर्थात् कि परमेश्वर की महिमा हो, और वह उस में जो ठीक-ठीक उसका है, अक्षुण्ण बना रहे। और जब हम सब साधनों से वंचित हो जाएँ, तब हम कहें, “अकेला प्रभु ही पर्याप्त होगा।” और इसी कारण दाऊद कहता है, “परमेश्वर की करुणा जीवन से उत्तम है।” इसलिए नहीं कि मनुष्यों का जीवन स्वयं परमेश्वर की करुणा का भाग नहीं—परन्तु वह दिखाता है कि मनुष्यों को इस संसार की वस्तुओं से बँधा नहीं रहना चाहिए, और कि वे पशुओं की भाँति काम करते हैं जब वे कल्पना करते हैं कि वे इस उपाय से या उस उपाय से अपने आपको बचा, सम्भाल और सुरक्षित रख सकते हैं; वरन् उन्हें सब से बढ़कर केवल परमेश्वर की भलाई को चुनना चाहिए, और उसी में सन्तुष्ट रहना चाहिए। यह, तब, बड़ी शिक्षा का वचन है, यदि हम उससे लाभ उठाना जानें।
तो आओ हम हिजकिय्याह के उदाहरण पर चलें, और जब परमेश्वर आवश्यकता में हमारी सहायता करे, तब हम अपने जीवन की स्तुति उसी को दें, यह मानते हुए कि केवल वही बचा सकता है।
फिर वह आगे जोड़ता है: “और हम अपने जीवन के सारे दिन प्रभु के भवन में अपने गीत गाते रहेंगे।” यहाँ वह वही दोहराता है जो वह पहले कह चुका था—अर्थात् कि परमेश्वर के दिए हुए जीवन का जो कुछ शेष रहेगा, उसे वह उसके लिए परमेश्वर को धन्यवाद देने में बिताएगा, ताकि कृतघ्न न ठहरे। क्योंकि, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, इससे अच्छा होता कि हम कभी जन्मे ही न होते, बजाय इसके कि परमेश्वर हमारे लिए जो भली वस्तुएँ करता है उन्हें भोगें और अपने मुँह बन्द रखें और उसके विषय में कभी न सोचें। तो आओ हम भली-भाँति ध्यान दें कि यह दोहराव अनावश्यक नहीं है, जब हिजकिय्याह इतनी बार कहता है कि चूँकि उसका जीवन बढ़ा दिया गया है, वह परमेश्वर की स्तुति करने के लिए और भी अधिक प्रेरित होगा। यह एक बात है। वह आगे यह भी दिखाता है कि यह केवल क्षणिक आवेग के लिए नहीं होगा—क्योंकि बहुत लोग परमेश्वर की भलाई का पहले-पहल अनुभव करने पर बड़े प्रचण्ड भाव से उसकी स्तुति कर सकते हैं, परन्तु यह शीघ्र ही मन्द पड़ जाता है, उसकी स्मृति खो जाती है, और उन्हें यही काफी लगता है कि एक बार गवाही दे दी कि उनका कुशल-क्षेम परमेश्वर से है। परन्तु हिजकिय्याह हमें दिखाता है कि हमें सच्ची स्थिरता के साथ इसमें बने रहना चाहिए—क्योंकि हम अपने जीवन का एक दिन भी परमेश्वर से किसी दूसरे दिन से अधिक नहीं पाते। इसलिए हमारा सारा जीवन पूरी तरह उसी को समर्पित और अर्पित होना चाहिए। इस प्रकार, अपने भीतर की सुस्ती और ठण्डेपन को देखते हुए, आओ हम सीखें कि जब-जब हम अपने उत्साह को ठण्डा पड़ता अनुभव करें, तब-तब अपने आपको जगाएँ, ऐसा न हो कि वह पूरी तरह बुझ जाए। आओ हम अपने आपको जगाएँ। कैसे? यदि मैंने परमेश्वर के अनुग्रह को एक-दो बार पहचाना, तो क्या—क्या अब उसे भुला दिया जाए? और यदि एक महीने मैंने परमेश्वर के नाम को धन्य कहा, फिर एक वर्ष, और दो, और तीन, और अब मैं उसके विषय में बिलकुल नहीं सोचता—तो उस सबसे मुझे क्या मिलेगा, सिवाय इसके कि मैं कपट का और भी अधिक दोषी ठहरूँ, यह दिखाते हुए कि वह तिनकों की आग के सिवा कुछ नहीं था, जिसमें कोई स्थिरता या दृढ़ता बिलकुल नहीं थी? इसलिए यदि हम इस भले राजा के उदाहरण को ध्यान से देखें, तो हममें से हर एक और भी प्रेरित होगा कि इस सुस्ती को पालना बन्द करे, जो हममें स्वाभाविक है, और जिसकी ओर हम अत्यधिक झुके हुए हैं।
जब वह कहता है, “प्रभु के भवन में,” तो इसका अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर की स्तुतियाँ मन्दिर तक ही सीमित थीं (क्योंकि कोई भी अपने घर में परमेश्वर की स्तुति कर सकता है, वरन् उसे करनी भी चाहिए)—वरन् हिजकिय्याह दिखाता है कि केवल निजी तौर पर परमेश्वर की स्तुति करना पर्याप्त नहीं; वह दूसरों को भी जगाएगा, ताकि इसमें उसके बहुत-से साथी हों। इसलिए वह यहाँ स्तुति के उस गम्भीर बलिदान की बात करता है जो वह एक बड़ी सभा में परमेश्वर को चढ़ाएगा। और इसी कारण हमारे प्रभु ने चाहा कि उसके अपने लोग इकट्ठे हों—क्योंकि यदि वह चाहता तो हमें अलग-अलग भी सिखा सकता था, यह कहकर, “तुममें से हर एक अपनी कोठरी में मेरी स्तुति करे।” परन्तु वह चाहता है कि यह क्रम हो: कि हम एक देह होकर एक हों, कि हम एक स्वर से उसे पुकारें, और कि हम मिलकर एकमत होकर अपने विश्वास का अंगीकार करें। और क्यों? यह सच है कि पहले तो हम देखते हैं कि हमारी सारी शक्तियाँ उसकी महिमा करने में लगनी चाहिए—परन्तु एक दूसरा कारण भी है: कि हम एक-दूसरे को उभारें, जैसा हम सब को आवश्यक है। क्योंकि हममें से कोई ऐसा नहीं जो परमेश्वर की स्तुति करने के लिए इतना तैयार हो कि जब वह विश्वासियों की मण्डली को देखे और उसे उदाहरण दिखाया जाए तो उसे कुछ और प्रेरणा की आवश्यकता न हो। इसलिए, चूँकि यह हमें उभारता है, परमेश्वर चाहता है कि हम उसकी स्तुति सार्वजनिक रूप से और साथ मिलकर गाएँ। और इसी कारण हिजकिय्याह यहाँ विशेष रूप से कहता है कि वह प्रभु के मन्दिर में आएगा कि उसके नाम की स्तुति करे और उसे धन्य कहे—जैसा कि हम योना को भी यही कहते देखते हैं। वह प्रभु के भवन की बात करता है। और क्यों? इसलिए नहीं, जैसा मैंने कहा, कि परमेश्वर की स्तुतियाँ वहाँ बन्द और छिपी थीं, परन्तु इसलिए कि लोग वहाँ इकट्ठे होते थे, और वह जानता था कि इससे अधिक लाभ होगा, क्योंकि कुछ लोग उसके उदाहरण से उभरेंगे। तो संक्षेप में यही हिजकिय्याह का गीत है।
अब, अन्त में, यहाँ यह दर्ज है कि भविष्यद्वक्ता यशायाह आदेश देता है कि उसके घाव पर अंजीरों की पुलटिस बाँधी जाए। इससे सम्भावना जान पड़ती है कि उसे जो था वह महामारी का फोड़ा था। फिर यह आगे जोड़ा गया है कि हिजकिय्याह ने एक चिह्न भी माँगा, जो उसे दिया गया, जैसा हमने देखा जब आहाज की धूपघड़ी पर सूर्य को पीछे लौटाया गया। यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि यह पुलटिस औषधि थी, या भविष्यद्वक्ता का दिया हुआ कोई चिह्न। और ऐसा लग सकता है कि यदि यह औषधि थी, तो इससे परमेश्वर की महिमा घटती, क्योंकि हिजकिय्याह का जीवन चमत्कारिक होना था। तो परमेश्वर ने उसे बिना किसी साधन के ही चंगा क्यों नहीं किया? परन्तु जब सब बातों को भली-भाँति विचारा जाए, तो हिजकिय्याह को जो चिह्न या चमत्कार दिया गया—जब सूर्य अपनी गति में रुक गया, और धूपघड़ी की छाया इतने अंश पीछे लौट गई—वही पर्याप्त है और सारा सन्देह दूर कर देता है। इसके अतिरिक्त, यद्यपि हिजकिय्याह ने इस पुलटिस का प्रयोग किया, तो इसका यह अर्थ नहीं कि चंगाई केवल प्राकृतिक थी। क्योंकि चूँकि परमेश्वर ने आकाश का क्रम बदल दिया था और ऐसी स्पष्ट गवाही दी थी कि यह उसके हाथ से आया है, और कि यह एक असाधारण उपकार था, हमें उतने से सन्तुष्ट होना चाहिए; और हम देखते हैं कि परमेश्वर ने कभी-कभी इस रीति से अपनी सृष्टि की वस्तुओं का उपयोग किया है, फिर भी स्पष्ट घोषणा की है कि वह केवल उसी की सामर्थ्य से हुआ। जो लोग सोचते हैं कि हिजकिय्याह के पास यह पुलटिस मानो एक संस्कार के रूप में उसे दृढ़ करने के लिए थी, वे मानते हैं कि अंजीर ऐसे घाव के लिए लाभ से अधिक हानि करते—परन्तु उनसे ऐसा लेप बनाया जा सकता है जो घाव को पकाने के योग्य हो, और यह भली-भाँति जाना जाता है।
यह सच है कि परमेश्वर कभी-कभी ऐसे चिह्न देता है जो प्रतिज्ञा किए हुए के बिलकुल विपरीत लगते हैं—और यह इसलिए कि हम और भी अधिक उसकी ओर खिंचें, कि हम अपनी सारी धारणाओं को त्याग दें, और इससे सन्तुष्ट हों कि उसने कह दिया है। कैसे? परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि पृथ्वी फिर कभी जलप्रलय से नष्ट नहीं होगी। अच्छा—तो वह इसका क्या चिह्न देता है? एक ऐसा चिह्न जो स्वभाव से हमें वर्षा की धमकी देता है।
जब कोई आकाश में इन्द्रधनुष देखता है, तो वह कैसा चिह्न है? वह ऐसा दृश्य है कि लगता है मानो हम डूब जाएँगे, और पृथ्वी नष्ट हो जाएगी। फिर भी कैसे? यह चिह्न हमें परमेश्वर की ओर से इसीलिए दिया गया है कि हम जानें कि पृथ्वी फिर कभी जलप्रलय से नष्ट नहीं होगी—हाँ, परन्तु इसलिए भी कि हम उसकी सच्चाई पर विश्राम करना सीखें, और अन्य सब बातों से, उन सब से जो हम अपने भीतर कल्पना करते हैं, अपनी आँखें मूँद लें, और परमेश्वर की सच्चाई हमारे लिए इतनी अधिकारपूर्ण हो कि हम बिना विरोध उसे ग्रहण करें। इसलिए परमेश्वर ऐसी रीति से भी कार्य कर सकता है—परन्तु जहाँ तक इस खण्ड का सम्बन्ध है, हम यह मान सकते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने हिजकिय्याह के कष्ट को हल्का करने के लिए यह उपाय भी देना चाहा—क्योंकि महामारी जितना पीड़ादायक घाव शायद ही कोई हो; वह आग के समान है जो रोगी को जलाती है। और इसलिए, जब परमेश्वर ने इस भले राजा का जीवन बढ़ा दिया, तो उसने उसके ऊपर यह और कृपा जोड़ना चाही कि पीड़ा कम हो। इसलिए भविष्यद्वक्ता उसे यह अतिरिक्त देता है, ताकि केवल यही नहीं कि परमेश्वर उसके जीवन को बढ़ाता है, वरन् वह नहीं चाहता कि वह इतना कष्ट सहे, या उन यातनाओं को भोगे जो उसने पहले अनुभव की थीं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर ने हर रीति से और सब बातों में इस भले राजा के प्रति अपने आपको दयालु प्रकट किया, और चाहा कि उसके विरुद्ध ऐसी कठोरता बरतने के बाद, मानो उसे पूरी तरह नष्ट करने के लिए अपनी भुजा बढ़ाई हो, वह हर बात में अपने आपको शान्त प्रकट करे। फिर भी इसका अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर अपने हर एक जन के साथ ठीक वैसा ही करता है—इसलिए आओ हम यह माँग न करें कि परमेश्वर एक ही क्षण में, हमें कब्र से खींच लाने के बाद, हमें आनन्दित करे और हर प्रकार से वह सब दे जो हमें सन्तुष्ट करे। परन्तु यदि वह धीरे-धीरे हमारे कष्टों को हल्का करना चाहे, तो हम उसी से सन्तुष्ट रहें। और सचमुच, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि परमेश्वर हिजकिय्याह के साथ भी चरणों में कार्य करता रहा—क्योंकि पहले ही यह चमत्कार हो चुका था कि सूर्य की छाया पीछे लौट गई थी, और भविष्यद्वक्ता के द्वारा उसके जीवन के बढ़ाए जाने का सन्देश उसे दिया जा चुका था। तब ऐसा लग सकता है कि हिजकिय्याह पूरी तरह छुड़ाया जा चुका था—और फिर भी इस पुलटिस की आवश्यकता थी। इसलिए जब हमारा प्रभु किसी विपत्ति में हमें कुछ राहत देने के बाद भी उसका कुछ अंश बाकी छोड़ देता है, तो यह हमें विचलित न करे, और हम उसकी ताड़नाओं को सहने से खीझें नहीं, जब तक कि वह हमें पूरी तरह सुरक्षित न कर दे।
इस बीच, हमने समझा दिया है कि हिजकिय्याह ने चिह्न क्यों माँगा था—क्योंकि यद्यपि यह निर्बलता से आया था, तो भी परमेश्वर ने उसका यह निवेदन भी स्वीकार किया। और इसमें हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारे प्रति कितना कोमल है, कि वह न केवल वे निवेदन पूरे करता है जो हम शुद्ध और सच्चे भाव से उससे करते हैं, परन्तु जब उनमें कुछ निर्बलता भी मिली हो, और हम उसके पास कुछ अतिरंजित भावनाएँ ले आएँ, तब भी परमेश्वर इस विषय में हम पर तरस खाता है। यह निश्चित है कि यदि हिजकिय्याह में सिद्ध विश्वास होता, तो वह भविष्यद्वक्ता के मुँह से वचन सुन लेने भर से सन्तुष्ट हो जाता। इसलिए जब वह कहता है, “हाय, क्या मुझे कोई चिह्न न मिलेगा?” तो इससे वह दिखाता है कि वह परमेश्वर के वचन पर पूरा और सम्पूर्ण विश्वास नहीं रखता। परन्तु यहाँ वह अपनी भूल मानता है, और उसे मानते हुए वह उपचार माँगता है—और किससे? स्वयं परमेश्वर से। इसलिए जब हम अपने आपको ऐसा बाधित पाएँ, तो पहले अपनी दरिद्रता को पहचानें, और अपने भीतर की भूल का बहाना बनाने न आएँ, परन्तु उसके लिए दण्डाज्ञा को स्वेच्छा से स्वीकार करें। यदि इसी आधार पर हम परमेश्वर से माँगें कि वह अपनी भलाई से उसका उपचार करे, तो वह हमें सह लेगा और हमारे निवेदन सुनेगा। यह सच है कि जब भी हमें भाए तब चिह्न या चमत्कार माँगना हमारा काम नहीं—क्योंकि (जैसा वहाँ समझाया गया जहाँ भविष्यद्वक्ता ने इस चिह्न का पहले उल्लेख किया था) हिजकिय्याह को इसके लिए विशेष प्रेरणा मिली थी, जैसी गिदोन को भी मिली थी। परन्तु जब हम अपनी निर्बलता को पहचानें, तब हम अपने आपको परमेश्वर की भली इच्छा के अधीन करें, और प्रार्थना करें कि वह हमें सह ले, और फिर हमें दृढ़ करे, ताकि हम उसके वचन में भली-भाँति स्थिर हो जाएँ।
यही वह रीति है जिससे हमें चलना चाहिए; और ऐसा करते हुए हम अनुभव करेंगे कि यह केवल राजा हिजकिय्याह के व्यक्ति के लिए नहीं लिखा गया था, वरन् परमेश्वर ने अपनी सारी कलीसिया के लिए एक साझा शिक्षा देना चाहा—ताकि अपने क्लेशों में, जब हम चरम सीमा तक, यहाँ तक कि अधोलोक की गहराइयों तक भी पहुँच गए हों, तब भी हम जानें कि हमें उसी की शरण लेनी चाहिए जो हमें इतनी कोमलता से बुलाता और न्योता देता है, इस आशा के साथ कि वह अपनी सामर्थ्य प्रकट करेगा, भले ही कुछ समय के लिए वह हमसे दूर लगे और हमें उसका कोई चिह्न दिखाई न दे, और इस प्रकार वह हमें अपनी महिमा करने का कारण देगा। और इसी प्रकार हमें यह भी सिखाया जाता है कि हम अपना सारा जीवन परमेश्वर के नाम को धन्य कहने और उसकी स्तुति के गीत गाने में लगा दें, उस भलाई के अनुसार जो हमने उससे पाई है।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख दण्डवत् करें, अपने दोषों को मानते हुए, यह प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उनका और अधिक अनुभव कराए, ताकि हम उसके सामने पूरी तरह दीन और नम्र हो जाएँ, और जो दुर्गुण हमसे युद्ध करते हैं उनसे हम लड़ें, यह जानते हुए कि हमारे प्रभु ने हमें इस संघर्ष के लिए ठहराया है जब तक कि हम पूरी तरह नए न हो जाएँ और उसकी धार्मिकता का वस्त्र न पहन लें, और कोई विरोध हमें उसकी भली इच्छा मानने से न रोके। वह कृपा करके यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् सब जातियों और राष्ट्रों को भी दे, इत्यादि।
