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प्रथम उपदेश
प्रथम उपदेश
यशायाह 38
9. यहूदा के राजा हिजकिय्याह का लेख, जब वह रोगी हुआ था और अपने रोग से चंगा हो गया। 10. मैंने कहा, अपनी आयु के दोपहर में ही मुझे अधोलोक के फाटकों में जाना पड़ेगा: मैं अपने शेष वर्षों से वंचित किया गया हूँ। 11. मैंने कहा, मैं यहोवा को, हाँ यहोवा को, जीवितों की भूमि में फिर न देखने पाऊँगा; मैं मनुष्यों को, और संसार के निवासियों को फिर न देखूँगा। 12. मेरा जीवन चला गया, और चरवाहे के तम्बू के समान मुझसे उठा लिया गया है।
जैसे परमेश्वर का नाम अमर है, वैसे ही तुम्हें भी यत्न करना चाहिए कि हमारे पीछे आनेवाले लोग उसे पुकारें, और वह सदा आराध्य और महिमामय ठहरे। इसलिए यह पर्याप्त नहीं कि अपने जीवनकाल में हम परमेश्वर का आदर करने का प्रयास करें; वरन्, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमारी चिन्ता भविष्य तक पहुँचनी चाहिए, कि हम धर्म का कुछ बीज छोड़ जाएँ, इस प्रकार कि परमेश्वर का सत्य कभी मिटाया न जाए। और सबसे बढ़कर, जिन्हें परमेश्वर ने दूसरों की अगुवाई के किसी पद पर ठहराया है, उन्हें इसमें और भी अधिक लगना चाहिए। इसी प्रकार हम देखते हैं कि सन्त पतरस ने, यह घोषणा करते हुए कि उसका अन्त निकट है और उसे संसार से कूच करना है, यह भी जोड़ा कि जहाँ तक उसके वश में है, वह इस बात का ध्यान रखेगा कि जो शिक्षा उसने सुनाई थी वह सदा प्रचलित और स्मृति में बनी रहे, और उसकी मृत्यु के पश्चात् भी लोग उससे लाभ उठाएँ। इसी कारण हिजकिय्याह केवल यह घोषणा, जो हम यहाँ पढ़ते हैं, मुँह से कहकर सन्तुष्ट नहीं हुआ, वरन् उसे लिख डालना चाहा, ताकि जगत के अन्त तक लोग जानें कि अपने कष्ट में वह कितना पीड़ित हुआ था, और यह सब के लिए शिक्षा का काम दे — जैसे आज हम भी इससे भली-भाँति लाभ उठा सकते हैं। विशेष रूप से यह ध्यान देने योग्य है कि यह लेख तब रचा गया जब वह स्वस्थ हो चुका था। क्योंकि प्रायः जब हम रोग से या परमेश्वर की किसी और छड़ी से दबाए जाते हैं, तो बहुत सी प्रतिज्ञाएँ और घोषणाएँ करते हैं, परन्तु जैसे कहते हैं, एक बार छूट जाने पर हम केवल कान झटक देते हैं, और जो कुछ हमने मान लेने का दिखावा किया था वह सब शीघ्र भूल जाते हैं। परन्तु यहाँ हमें दिखाया गया है कि राजा हिजकिय्याह ने, स्वस्थ हो जाने पर, उस ताड़ना को नहीं भुलाया जो उसे परमेश्वर के हाथ से मिली थी, न उस वेदना को जिसमें वह पड़ा था, वरन् उस सब का अभिलेख रखना चाहा, ताकि उसके पीछे आनेवाले उससे शिक्षा पाएँ।
अब पहली दृष्टि में ऐसा लग सकता है कि यह लेख इसे पढ़नेवालों को कोई शिक्षा नहीं देगा, वरन् ठोकर का कारण बनेगा — क्योंकि हम एक ऐसे मनुष्य के अतिशय आवेग देखते हैं जो लगभग टूट चुका है, जो मृत्यु से इतना भयभीत है कि उसे लगता है कि जब परमेश्वर उसे संसार से उठा लेता है तब सब कुछ खो जाता है। और इसमें हमें अविश्वास के चिह्नों के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता: वह अपने आप को सताता और झुँझलाता है, जैसा प्रतीत होता है, एक ऐसे विद्रोह के साथ जो परमेश्वर के दास को शोभा नहीं देता। संक्षेप में, ऐसा लग सकता है कि इस गीत से हम इसके सिवा कुछ नहीं पा सकते कि हिजकिय्याह में जो भी विश्वास था वह केवल उसकी समृद्धि और सुख-चैन में ही था, और उसने अपने शोक की बागडोर इतनी ढीली छोड़ दी कि परमेश्वर की ही शिकायत करने लगा — जैसा कि हम देखेंगे कि वह परमेश्वर की तुलना सिंह से करता है। परन्तु जब सब कुछ ध्यान से विचारा जाए, तो हम पाएँगे कि हमारे लिए इससे उत्तम और उपयोगी शिक्षा कोई नहीं है; क्योंकि जब हम अपने भीतर जो कुछ है उसे भली-भाँति जाँच लेंगे, तो जान जाएँगे कि यह सीधे हम से सम्बन्ध रखता है।
परन्तु पहले यह ध्यान दो कि भले राजा हिजकिय्याह ने यहाँ अपने गुणों का प्रचार इसलिए नहीं किया कि संसार उसे सराहे — क्योंकि वह अपने संकटों का वर्णन छोड़कर केवल उस प्रार्थना का जो उसने परमेश्वर से की, और अपने विश्वास की दृढ़ता का वर्णन कर सकता था। फिर भी वह यह नहीं कहता कि वह उदारचित्त था, या कि उसने सब परीक्षाओं को बिना संघर्ष और प्रतिरोध के जीत लिया — ऐसा कुछ भी नहीं। इसके विपरीत, हम एक बेचारे मनुष्य को देखते हैं जो अन्त तक पीड़ित है, और इतना टूट चुका है कि उसे नहीं सूझता कि क्या करे। हम एक ऐसे मनुष्य को देखते हैं जो परमेश्वर के क्रोध से भयभीत है, और अपने क्लेश के सिवा कुछ नहीं देखता। जब हिजकिय्याह इस प्रकार अपने आपको खोल देता है, और अपनी निर्बलताओं को मानने में कोई संकोच नहीं करता, तो हम समझते हैं कि वह महत्त्वाकांक्षा या सांसारिक महिमा से प्रेरित नहीं था कि मनुष्यों में सम्मान या ख्याति पाए, वरन् वह लज्जा से लगभग दब जाने को भी तैयार था, ताकि परमेश्वर की महिमा हो।
तो फिर उसका अभिप्राय क्या है? एक ओर यह, कि हम जानें कि जब वह परमेश्वर को अपना विरोधी जान रहा था तब वह कैसा पीड़ित था; और फिर यह, कि इसमें हम परमेश्वर की भलाई को और भी स्पष्टता से पहचानें, कि परमेश्वर ने उसे दया करके फिर ग्रहण कर लिया और उसकी आवश्यकता में उसे छोड़ना न चाहा। इसलिए यहाँ हमें मानो दर्पण में अपनी निर्बलताओं को देखना है, ताकि हम में से प्रत्येक उस समय के लिए अपने आपको तैयार करे जब उसके विश्वास की परीक्षा हिजकिय्याह के समान हो, और परमेश्वर हमें अपने क्रोध का कोई चिह्न दे — ताकि यदि हम तब मानो खोए हुए हों, तो भी हम इस आशा को न छोड़ें कि परमेश्वर हमें हमारे क्लेश से निकलने का मार्ग देगा, जैसा उसने इस भले राजा को दिया। और आगे यह, कि हम अपने उद्धार की सारी स्तुति परमेश्वर की दया को देना सीखें, यह जानते हुए कि जैसे ही हम उससे वंचित किए जाएँगे, हम नाश हो जाएँगे और दुखियों से भी अधिक दुखी ठहरेंगे।
अब इस बीच देखें कि राजा हिजकिय्याह इतना पीड़ित कैसे और क्यों हुआ: इसका कारण यह था कि उसने मृत्यु को अपने निकट आते देखा। पहली दृष्टि में अवश्य ऐसा लग सकता है कि यह एक विश्वासी जन को शोभा नहीं देता। यह सच है कि स्वभाव से मृत्यु हम सब के लिए भयानक होगी, क्योंकि कोई ऐसा नहीं जो, जैसे कहते हैं, अस्तित्व में रहना न चाहता हो, और ऐसा प्रतीत होता है कि मृत्यु में हम नष्ट हो जाते हैं और मानो मिट जाते हैं। इसलिए स्वभाव से हम उससे भागेंगे और उसे घृणा से देखेंगे। इसी कारण सन्त पौलुस भी कुरिन्थियों के नाम अपनी दूसरी पत्री के पाँचवें अध्याय की आयत 4 में कहता है कि हम इस देह से उतारे जाना नहीं चाहते — क्योंकि मनुष्य के लिए अपनी दशा बदलने की इच्छा करना असम्भव है, मेरा अभिप्राय इस वर्तमान जीवन से है। और जो अपने आपको मार डालते हैं, उनमें स्वाभाविक स्नेह बिलकुल नहीं रहता, वरन् वे शैतान द्वारा ऐसे बहका ले जाए जाते हैं कि पूरी तरह अन्धे हो जाते हैं — ऐसे लोगों को राक्षस ही गिनना चाहिए, जिनमें प्रकृति की सारी व्यवस्था उलट गई है। संक्षेप में, यह निश्चित है कि मृत्यु हमारे लिए सदा भयानक रहेगी, केवल इसलिए नहीं कि हम जीने की इच्छा की ओर झुके हुए हैं, वरन् इसलिए भी कि परमेश्वर ने कोई ऐसी छाप छोड़ी है कि अन्यजाति और अविश्वासी भी यह अनुभव करने को विवश हैं कि मृत्यु परमेश्वर का श्राप है, जो आदम पर और उसके सारे वंश पर सुनाया गया।
इसलिए, चूँकि मृत्यु पाप के द्वारा संसार में आई, और परमेश्वर के क्रोध की गवाही है, जिसके द्वारा हम मानो उसके द्वारा त्यागे गए और उसके राज्य से — जो जीवन का राज्य है — निकाल दिए गए हैं, इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि हमारे पास विश्वास की कोई स्पष्ट ज्योति न होती, और हमने शिक्षा का एक शब्द भी कभी न सुना होता, तब भी हमारे मनों पर यह छाप रहती कि मृत्यु हमारी शत्रु है। इस प्रकार हम मृत्यु से भागने और जहाँ तक बन पड़े उससे पीछे हटने की ओर प्रवृत्त होते हैं: पहला, इसलिए कि हम अस्तित्व में रहना चाहते हैं; दूसरा, इसलिए कि हम उसमें परमेश्वर के क्रोध का कोई चिह्न देखते हैं। और मैं आगे जोड़ता हूँ कि किसी निश्चित शिक्षा के बिना भी परमेश्वर हमें इसकी कुछ छाप देता है जो हमारे हृदयों में छिपी रहती है।
फिर भी इस बीच विश्वासी इन दोनों भयों पर जय पाते हैं, और जब कभी परमेश्वर को भाए तब मरने के लिए अपने आपको तैयार करते हैं — इसलिए नहीं कि, जैसा हमने पहले सन्त पौलुस से देखा, वे बिना और विचार किए केवल मृत्यु की इच्छा करें, क्योंकि वह तो निराश लोगों का काम होगा, परन्तु वे इसलिए तैयार होते हैं कि जानते हैं कि उतारे जाने के बाद उन्हें फिर पहनाया जाएगा, कि यह देह एक निर्बल तम्बू है, सड़न के सिवा कुछ नहीं, और कि वे परमेश्वर के राज्य में पुनःस्थापित किए जाएँगे। इसलिए कि हम अपनी इस दी गई आशा पर ध्यान करते हैं, हम मृत्यु के आतंकों पर जय पाते हैं। और आगे, हम जानते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने उस उजाड़ और विनाश की मरम्मत कर दी है जो हमारे पिता आदम के पाप से हम पर आया। इसलिए, क्योंकि हम मृत्यु के बीच में जीवन को पकड़ते हैं, हम अब इतने भयभीत नहीं होते कि जब परमेश्वर हमें अपने पास बुलाए तब अपने आपको हटा न सकें — क्योंकि हम जानते हैं कि मृत्यु जीवन में जाने के मार्ग के सिवा कुछ नहीं। दूसरी ओर, हम जानते हैं कि हमारा सच्चा अस्तित्व क्या है: वह इस संसार में बसना नहीं है, क्योंकि यह संसार तो एक मार्ग मात्र है, और हमें सदा वह स्मरण रखना चाहिए जो कहा गया है, कि परमेश्वर मनुष्यों को यहाँ इसलिए रखता है कि उन्हें सँभाले और कुछ मोड़ों में से, जैसे कहते हैं, चलाए, और फिर लौटा ले। इसलिए जब हमें सिखाया जाता है कि हमारा जीवन दौड़ के सिवा कुछ नहीं, और कि संसार एक ऐसा क्षणभंगुर रूप है जो मिट जाता है, तब हम जान जाते हैं कि हमारा सच्चा अस्तित्व और स्थायी दशा स्वर्ग में है, यहाँ नीचे नहीं। इसलिए हम मृत्यु से और नहीं भागेंगे; वरन् हमारे पास उसकी इच्छा करने का कारण होगा, क्योंकि एक ओर हम निर्बल हैं, पाप की दासता में जकड़े हुए — हम अपने में इतना भ्रष्टाचार देखते हैं कि दया आती है। जब हम परमेश्वर की सेवा करना चाहते हैं तब भी हम पाँव घसीटते हैं, और जब एक पाँव यह सोचकर उठाते हैं कि एक कदम आगे बढ़ें, तो हम पीछे गिर जाते हैं, या ठोकर खाकर लड़खड़ाते हैं।
इसलिए अपने जीवन पर खेद करने का हमारे पास उचित कारण है — निराशा में नहीं, वरन् इसलिए कि हमें पाप से घृणा करनी और उसे घिनौना जानना चाहिए। हमें यह भी चाहना चाहिए कि परमेश्वर हमें इस दयनीय बन्धुआई से छुड़ाए जिसमें हम पड़े हैं, जैसा सन्त पौलुस अपने उदाहरण से हमें दिखाता है। वह अपने आपको अभागा मानता है, अपनी देह में ऐसे रहता हुआ जैसे कारागार में, और पूछता है कि वह इससे कैसे छुड़ाया जाएगा । और दूसरी ओर, हम जानते हैं कि हम अपने परमेश्वर के जितने निकट आते हैं, मृत्यु हमारे लिए उतनी ही अधिक वांछनीय होती जाती है। क्योंकि, जैसा उस उद्धृत अंश में कहा गया है, जब तक हम विश्वास से जीते हैं, तब तक हम मानो परमेश्वर से दूर हैं। अब हमारा सुख और हमारा सिद्ध आनन्द कहाँ है, यदि अपने परमेश्वर से सिद्धता से जुड़ने में नहीं? इसलिए, चूँकि हम मृत्यु के द्वारा उसके निकट आते हैं, यह हमारे लिए सुखद बात है, और ऐसी जो हमें आनन्दित करे। इसी कारण पौलुस फिलिप्पियों के पहले अध्याय की आयत 23 में कहता है कि स्वयं उसके लिए जीने की अपेक्षा मरना कहीं बड़ा लाभ होता, और यद्यपि उसका जीवन कलीसिया के लिए लाभदायक था, फिर भी यदि वह केवल अपने विषय में सोचता तो यहाँ से उठा लिए जाने की इच्छा करता। विश्वासियों की मनोदशा ऐसी ही होनी चाहिए।
अब राजा हिजकिय्याह की ओर आएँ। ऐसा लगता है कि उसने परमेश्वर की भलाई का सारा स्वाद खो दिया है, कि वह पुनरुत्थान के विषय में कुछ नहीं जानता, कि वह यह नहीं पहचानता कि छुड़ानेवाले के द्वारा वह पुनःस्थापित किया जाएगा — वह परमेश्वर के क्रोध और श्राप के सिवा कुछ नहीं समझता। उसका विश्वास कहाँ है? उसकी आज्ञाकारिता कहाँ है? पवित्र आत्मा की वह सान्त्वना कहाँ है, और वह अनमोल आनन्द जो हमें तब मिलना चाहिए जब परमेश्वर हमें उस प्रेम का निश्चय दिलाता है जो वह हम से रखता है? यदि उसमें यह धारणा भली-भाँति जड़ पकड़े हुए भी होती कि वह परमेश्वर की सन्तानों में है, तो क्या गोद लिया जाना अपने साथ मीरास नहीं लाता? परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान क्यों चुना है, यदि इसलिए नहीं कि हम उस स्वर्गीय जीवन में सहभागी हों जिसका वह हमें निमन्त्रण देता है?
अब हिजकिय्याह में हम इनमें से कुछ भी नहीं देखते। तो ऐसा लगता है कि वह बुद्धि और विवेक से पूरी तरह अलग हो गया है, कि उसने परमेश्वर को मन से निकाल दिया है, कि जो भी भली बातें उसने पहले सुनी थीं वे सब मिट गई हैं और अब उसके विचारों में नहीं रहीं। ये बातें पहली दृष्टि में सचमुच विचित्र लगेंगी। यह सच है कि उस समय स्वर्गीय प्रकाशन वैसा नहीं था जैसा आज हमारे पास सुसमाचार के द्वारा है; फिर भी हिजकिय्याह, और अन्य सब पवित्र राजा और भविष्यद्वक्ता, और अन्य सब विश्वासी, भली-भाँति समझते थे कि परमेश्वर ने उन्हें व्यर्थ नहीं चुना। क्योंकि यद्यपि यह वचन हमारे प्रभु यीशु मसीह द्वारा अभी नहीं कहा गया था, फिर भी यह सब विश्वासियों के हृदयों पर खुदा हुआ था, कि परमेश्वर मरे हुओं का परमेश्वर नहीं है। इसलिए वे सब जो उसकी प्रजा में गिने जाते हैं, उन्हें एक स्थायी जीवन का निश्चय दिया गया है जो सदा बना रहेगा। और अन्यत्र कहा गया है कि परमेश्वर अपने आपको अब्राहम, इसहाक और याकूब का परमेश्वर कहता है, उनकी मृत्यु के बहुत समय बाद। इसलिए वे अवश्य जीवित रहे होंगे। अतः विश्वासियों को यह निश्चय अवश्य रहा है कि परमेश्वर ने उन्हें इस संसार में पशुओं के समान नहीं पाला, वरन् अपनी भलाई का कुछ स्वाद उन्हें दिया, जब तक कि मृत्यु के पश्चात् वे उसका पूर्ण आनन्द न लें।
बिलाम तक ने, जिसने व्यवस्था के विषय में कभी कुछ नहीं जाना, फिर भी कहा: “मेरा प्राण धर्मियों की मृत्यु से मरे, और मेरा अन्त उन्हीं के समान हो!” वह अब्राहम के वंश से जुड़ना चाहता है, और फिर भी वह दुष्ट और निकम्मा मनुष्य था। और उसे ऐसा बोलने पर कौन बाध्य करता है? यह कि वह वहाँ मानो यातना-यन्त्र पर है, और परमेश्वर उससे यह मान लेना निचोड़ लेता है। अब यदि बिलाम, जो शैतान के वश में था कि परमेश्वर की प्रजा को श्राप देने के लिए अपनी जीभ किराए पर दे, इस प्रकार बोलने को विवश हुआ, तो उनके विषय में हम क्या सोचें जिन्होंने सचमुच परमेश्वर की व्यवस्था में उन्नति की थी? परन्तु जो भी हो, प्राचीन पूर्वजों को स्वर्गीय जीवन का वैसा स्पष्ट और सीधा ज्ञान न था जैसा आज हमें सुसमाचार में है। यह भी हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन तक के लिए रखा गया था। और यह उचित भी था, क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमारे जीवन की एक पक्की प्रतिज्ञा-राशि हमारे पास है, इस में कि वह जी उठा है — अपने लिए ही नहीं, वरन् अपनी सारी देह के लिए। अतः यहाँ एक पूर्ण निश्चय है जो परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में देता है, कि हम इस संसार में से होकर इसलिए गुज़रते हैं कि अनन्त जीवन तक पहुँचें। प्राचीन पूर्वज ऐसी श्रेणी तक नहीं पहुँचे थे; वे इतने आगे नहीं बढ़े थे; फिर भी स्वर्गीय जीवन का जो स्वाद उन्हें मिला वह उनके लिए पर्याप्त था, ताकि वे शान्ति से अपने आपको परमेश्वर को सौंप दें। और वास्तव में हम यह नहीं पढ़ते कि वे मृत्यु में बहुत पीड़ित हुए। उदाहरण के लिए, जब अब्राहम मरता है, तो राजा हिजकिय्याह के समान कोई विलाप, खेद या शिकायत नहीं होती, वरन् पवित्र शास्त्र कहता है कि वह जीवन से भरपूर और सन्तुष्ट था। इसहाक और याकूब के विषय में भी यही बात है। “हे मेरे परमेश्वर, मैं तेरे उद्धार की आशा रखूँगा,” वह अपना प्राण त्यागते हुए कहता है। यद्यपि यीशु मसीह अभी संसार में प्रकट नहीं हुआ था, फिर भी उसकी आशा दृढ़ और अटल थी, और वह अपने उद्धार के विषय में ऐसा निश्चित था मानो उसे अपने हाथ में लिए हो। इस प्रकार हम देखते हैं कि पवित्र पूर्वज सन्देह या अनिश्चितता में नहीं थे, वरन् सदा स्वर्गीय जीवन की अभिलाषा रखते थे, और उसे पाना उनकी सर्वोच्च इच्छा थी।
अब राजा हिजकिय्याह की ओर आएँ। हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि उसमें कोई विशेष कारण है कि उसने मृत्यु के विषय में ऐसी शिकायत की — जिसे हम दाऊद के व्यक्तित्व में और अच्छी तरह देखेंगे। दाऊद कभी-कभी ऐसी वेदना में होता है कि पुकार उठता है: “हाय, मेरे परमेश्वर, मृत्यु में कौन तेरा अंगीकार करेगा? और जब मैं एक सड़ती हुई बेचारी लाश बन जाऊँगा, तो तुझे मुझसे क्या लाभ होगा? जब तू मुझे राख कर देगा, तो तुझे क्या मिलेगा?” वह वहाँ अपनी शिकायतें करता है; फिर भी अन्त में वह शान्ति से मरता है, क्योंकि हम नहीं देखते कि अपने अन्तिम प्रयाण में वह इतना व्याकुल था, वरन् वह चुपचाप अपने आपको परमेश्वर के हाथों में सौंप देता है। तो फिर वह ऐसे क्यों चिल्लाता है? इसलिए कि वह परमेश्वर के क्रोध को समझता है, चाहे रोग में हो या किसी और क्लेश में — मानो नरक ही उसके सामने आ खड़ा हुआ हो। इसलिए उसकी अनुभूति ऐसी है, जो केवल मृत्यु की नहीं, वरन् इस भावना की है कि परमेश्वर उसे उसके पापों के लिए दण्ड देने का कोई चिह्न दे रहा है।
इसलिए, चूँकि दाऊद के व्यक्तित्व में हम यही संघर्ष देखते हैं, हमारे लिए राजा हिजकिय्याह के विषय में यह निष्कर्ष निकालना सरल होगा कि वह भी मृत्यु के सामने बहुत व्याकुल था — परन्तु इसलिए नहीं कि इस संसार को छोड़ना उसे खलता था, और न इसलिए कि वह इससे वैसा जुड़ा था जैसे बेचारे अविश्वासी होते हैं, जो किसी उत्तम जीवन की अभिलाषा नहीं रखते, जो मानो अपने सुखों में डूबे और ऐसे सुलाए गए हैं कि स्वर्गीय जीवन उनके लिए कुछ अर्थ नहीं रखता। हम देखते हैं कि हिजकिय्याह इतना निराश नहीं था; वरन् उसने पहचाना कि परमेश्वर उसके विरुद्ध है, जैसा हम और विस्तार से देखेंगे। और वास्तव में यह निराधार नहीं था कि भविष्यद्वक्ता यशायाह उसके पास भेजा गया, क्योंकि वह मानो एक सैन्य-दूत था जो उसे ललकारने भेजा गया था, यह घोषणा करते हुए: “देख, परमेश्वर जो तेरा शत्रु है; तुझे उसका पूरा कठोर दण्ड सहना होगा, क्योंकि तूने उसे अप्रसन्न किया है।” जब हिजकिय्याह यह सुनता है, तो वह केवल उस साधारण मृत्यु को नहीं देखता जिससे उसे गुज़रना है, वरन् उसे एक और चिन्ता है: कि वह इस संसार से एक श्रापित प्राणी के रूप में काटा जा रहा है, इस योग्य नहीं कि पृथ्वी उसे सँभाले। और जब परमेश्वर उसे सताता है, तो यह इस बात की गवाही है कि देश उजाड़ किया जाएगा, क्योंकि वह जानता है कि इस प्रजा की दशा क्या होगी — कि उसकी मृत्यु के बाद सब बिखर जाएँगे, जब तक परमेश्वर चमत्कार से कोई उपाय न करे। और वह यों सोचता है: “मेरी मृत्यु मुझे केवल नरक के गड्ढे में नहीं भेजेगी, वरन् हर कहीं जलप्रलय ला देगी, ऐसा कि सारे देश में उजाड़ के सिवा कुछ न रहेगा। क्या परमेश्वर की सेवा उलट दी जाए, और यह सब मुझ पर आ पड़े, क्योंकि मैंने अपने परमेश्वर को अप्रसन्न किया है? हाय, इसका क्या होगा?” इसलिए हम यह विचित्र न मानें कि हिजकिय्याह वैसा बोलता है जैसा हम उसे बोलते सुनते हैं — वरन् हम सदा स्मरण रखें कि केवल मृत्यु ही ने उसे इतना भयभीत नहीं किया। तो फिर क्या किया? परमेश्वर का क्रोध, जब वह अपने पापों को देखता है, और परमेश्वर उससे अपनी भलाई का सारा स्वाद ले लेता है, और उसकी ओर पीठ तक फेर लेता है, मानो वह परमेश्वर को अपने विरुद्ध सशस्त्र देखता हो, उसकी भुजा उसे मिटा देने को फैली हुई। जब हिजकिय्याह यह देखता है, तो वह इतना घबरा जाता है कि उसका मुँह बन्द हो जाता है — और निराधार नहीं।
अब यह बात बहुत ध्यान देने योग्य है: बहुत से मूर्ख लोग हैं, वरन् अधिकांश लोग, जो मृत्यु से डरते हैं, परन्तु इसलिए नहीं कि वे अनुभव करें कि परमेश्वर का श्राप उसमें प्रकट होता है। यह सच है, जैसा हम पहले कह चुके हैं, कि परमेश्वर मनुष्यों के विवेक में यह डंक सदा छोड़ता है; परन्तु उनके पास वैसा कोई विचार नहीं होता। तो फिर वे मृत्यु से क्यों डरते हैं? इसलिए कि, जैसा हर कोई कहेगा, मनुष्य अस्तित्व में रहना चाहता है। सचमुच, जब वे ऐसा कहते हैं, तो मानो वे कह रहे हों: “मैं बछड़ा, या गधा, या कुत्ता होना चाहूँगा” — क्योंकि पशुओं का अस्तित्व इसी संसार तक सीमित है। और मनुष्यों का अस्तित्व कहाँ है, यदि अपने परमेश्वर से जुड़ने में नहीं? अब हम इस समय मानो कारागार में हैं; क्योंकि जबकि यह संसार हमारे लिए पृथ्वी के स्वर्गलोक के समान होना चाहिए था, यदि हम परमेश्वर की आज्ञाकारिता में बने रहते, तो हम इसके बजाय मानो परदेश में हैं, जहाँ हम देश-निकाले और बन्दी जैसे हैं। यह सच है कि हम वहाँ अब भी परमेश्वर की भलाई के कुछ चिह्न देखते हैं, और बहुत से; फिर भी हम यहाँ तरसते रहते हैं — परन्तु थोड़े ही हैं जो यह पहचानते हैं। इसलिए उस शिक्षा पर हमें और भी ध्यान देना चाहिए जिसे मैं पहले छू चुका हूँ: कि मृत्यु में, जैसे अन्य सब क्लेशों में, हमें किसी भी कष्ट से जो हम अनुभव करें, अधिक परमेश्वर के क्रोध से व्याकुल और पीड़ित होना चाहिए। यदि कोई निर्धनता से पीड़ित हो, भूखा और प्यासा हो; दूसरा रोग से दबा हो और भारी यातनाएँ सह रहा हो; दूसरा मनुष्यों से सताया जा रहा हो और कोई राहत न पा रहा हो; और अन्त में मृत्यु हमारी आँखों के सामने आ खड़ी हो — तो हम जानें कि परमेश्वर के क्रोध और बदले से बढ़कर डरने योग्य कुछ नहीं। फिर भी सब कुछ इसके उलटा किया जाता है।
और इसी कारण मैंने कहा कि हमें इस शिक्षा पर और भी ध्यान देना चाहिए। क्योंकि हम देखेंगे कि बेचारे रोगी, और किसी भी प्रकार से पीड़ित लोग, हाय-हाय करेंगे — कोई अपनी बाँह पर रोता है, कोई अपनी टाँगों पर, कोई यह, कोई वह — और फिर भी वे कभी कष्ट के सच्चे मूल तक नहीं पहुँचते। यह उस कपट के कारण है जो हम में है, क्योंकि हम अपनी इन्द्रियों में मानो सुन्न हो गए हैं, ऐसा कि हम परमेश्वर के न्याय को पहचानने तक नहीं पहुँच पाते। इसलिए हमें और भी सीखना चाहिए कि जब हम ऐसी छड़ियों से मारे जाएँ, जैसा मैंने कहा है, तो उस कारण को देखें जिससे यह बुराई आती है — अर्थात् कि परमेश्वर चाहता है कि हम अपने पापों को अनुभव करें, कि वह हमें मानो अपने न्यायी के सम्मुख उपस्थित होने के लिए बुलाता है, और हमें वहाँ छिपाव या बहाने से नहीं, वरन् खुले और स्वतन्त्र अंगीकार के साथ आना चाहिए; और यह केवल होंठों से या औपचारिकता के लिए नहीं, वरन् हम हृदय की गहराई तक बेधे जाएँ, यह अनुभव करते हुए कि अपने परमेश्वर की इच्छा का उल्लंघन करना, उसे अपने विरुद्ध भड़काना, और उसके न्याय से लड़ना क्या होता है।
इसलिए जब हम देखते हैं कि राजा हिजकिय्याह ऐसी चरम वेदना में था क्योंकि परमेश्वर उसे उसके पापों के लिए पीड़ित कर रहा था, तब हमें यही स्मरण रखना है। वास्तव में यह और भी स्मरण रखने योग्य है, क्योंकि यद्यपि उसने पहले घोषणा की थी कि वह खराई और सीधाई से चला है, कि उसने जीवन भर परमेश्वर की आज्ञा मानने और उसे प्रसन्न करने का यत्न किया, फिर भी वह अपने गुणों या अपनी योग्यताओं पर नहीं ठहरता, न परमेश्वर से बहस में उतरता है — क्योंकि वह भली-भाँति देखता है कि उनमें से कुछ भी उसे लाभ नहीं दे सकता या कोई राहत नहीं पहुँचा सकता। वह यह सामने नहीं रखता कि उसका जीवन कैसा रहा था, वरन् पहचानता है कि वह न्यायसंगत रूप से पीड़ित है। इसलिए जब परमेश्वर को भाए कि हमें अपनी छड़ियों से ताड़ना दे, तो हम यह सीखें कि कुड़कुड़ाने न लगें, मानो वह हम पर अन्याय कर रहा हो, मानो उसे हमारी योग्यताओं का कोई ध्यान न हो, या वह हमारे साथ हमारे योग्य से अधिक कठोरता से व्यवहार कर रहा हो। ऐसी सब निन्दाएँ गिरा दी जाएँ, और हम मानें कि हमें दण्ड देने का उसके पास उचित कारण है — केवल इस संसार से उठा लेने तक ही नहीं, वरन् नरक की गहराइयों में डुबो देने तक भी।
हमारे साथ ऐसा ही व्यवहार होना योग्य है, जब हमने अपने सारे जीवन पर विचार किया हो। और इस बीच हम यह विचित्र न मानें कि परमेश्वर हमारे पास ऐसे क्लेश भेजता है जो हमें कठोर और पीड़ादायक लगते हैं, क्योंकि हम देखते हैं कि हिजकिय्याह हमारे आगे-आगे चलकर हमें मार्ग दिखा रहा है। बहुत से लोग तब चकित होते हैं जब परमेश्वर की सेवा करने की उनकी कोई अच्छी इच्छा और लगन रही हो, और वह उन्हें बहुत से दुष्टों से भी अधिक दण्ड देता है, और उन्हें लगता है कि उन्होंने अपना परिश्रम व्यर्थ गँवाया। यह परीक्षा बहुत सामान्य है, जैसा हम देखते हैं कि दाऊद भी इससे पीड़ित हुआ, जब वह कहता है: “यह क्या है? क्योंकि मैं देखता हूँ कि परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले फलते-फूलते और आनन्द मनाते और जय-जयकार करते हैं, जबकि मैं सन्ध्या से भोर तक वेदना का प्याला पीने के सिवा कुछ नहीं करता, कोई विश्राम नहीं पाता।” तो ऐसा लगेगा, कि परमेश्वर की सेवा करना समय की बरबादी है। इसलिए, मैं कहता हूँ, वह चरम तक गिराया गया होता, यदि परमेश्वर अपनी अद्भुत सामर्थ्य से उसे न सँभालता। और चूँकि हमारे साथ भी यही हो सकता है, इसलिए राजा हिजकिय्याह में हमारे सामने रखे गए उदाहरण को अपनी ढाल बना लें। क्योंकि हम पहले ही देख चुके हैं कि उसने अपना सारा जीवन परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार ढाला था: उसमें ऐसी धुन थी जो किसी में कम ही मिलती है, कि अपने सारे देश को हर अन्धविश्वास और मूर्तिपूजा से शुद्ध करे। उसके विरुद्ध बहुत से भय खड़े किए गए, और कुछ विद्रोह भी हो सकता था; परन्तु इसने उसे सच्चे और शुद्ध धर्म को पुनःस्थापित करने से नहीं फेरा, और अपने निजी जीवन में उसने इसके सिवा कुछ न चाहा कि सब बातों में और सब बातों के द्वारा परमेश्वर की महिमा हो। और फिर भी यहाँ परमेश्वर उस पर आक्रमण करने आता है, और वह भी विचित्र रीति से, क्योंकि वह सिंह के समान उसकी हड्डियाँ तोड़ता है। तो जब हम हिजकिय्याह के साथ ऐसा व्यवहार होते देखते हैं, तो क्या हमें परमेश्वर की भेजी हुई ताड़नाओं को धीरज से सहना न सीखना चाहिए? इस अंश से हमें यही स्मरण रखना है।
अब, हिजकिय्याह जो भी आवेग सहता है, और यद्यपि वह यहाँ मर्यादा से परे जाता प्रतीत होता है, फिर भी इस सब के बीच वह उस प्रेम को प्रकट करता है जो उसे परमेश्वर के प्रति था, और यह कि उसने इस वर्तमान जीवन की इच्छा उन लोगों की रीति पर नहीं की जो इसमें पशुवत् हैं, जो केवल खाना-पीना चाहते हैं और नहीं जानते कि वे क्यों सृजे गए, सिवाय इसके कि कुछ समय यहाँ मन बहलाएँ। इसलिए हिजकिय्याह भली-भाँति दिखाता है कि वह किसी और आत्मा से प्रेरित था। वह कहता है: “मैंने कहा, अपनी आयु के कट जाने में मैं कब्र के फाटकों में उतर जाऊँगा, मैं यहोवा को फिर न देखूँगा” — हाँ, यहोवा को। यहाँ वह अपने जीवन के विषय में अवश्य बोलता है कि वह उसकी यात्रा के बीच में ही कट जाएगा; परन्तु फिर भी वह दिखाता है कि वह केवल यहाँ आराम से रहने के लिए जीना नहीं चाहता। वह राजा था और उत्तम भोजन-व्यवस्था रख सकता था; वह इस संसार में बहुत से सुख और विलास भोग सकता था; संक्षेप में, वह हर विलासिता में अपने आपको डुबो सकता था। वह इनमें से किसी का खेद नहीं करता; परन्तु वह कहता है कि वह यहोवा को फिर न देखेगा — और एक बार कहकर सन्तुष्ट न होकर, अधिक बल देने के लिए उसे दोहराता है। वह कहता है: “यहोवा, हाँ, यहोवा।” इससे वह दिखाता है कि उसे अपना जीवन उतना ही वांछनीय था जितना वह यहाँ नीचे इस बात को जानने में लगा रहता था कि परमेश्वर उसका पिता है, और उस विश्वास में अपने आपको और अधिक दृढ़ करता था।
तो हम भली-भाँति ध्यान दें कि हमारे जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए: कि हम पहचानें कि परमेश्वर पहले ही, कुछ अंश में, हमारे लिए अपने आपको पिता के रूप में दिखाता है। यह सच है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, कि हम उससे दूर हैं, क्योंकि हमारा उद्धार विश्वास और आशा में है। इसलिए वह छिपा हुआ है, और हम उसे अपनी स्वाभाविक इन्द्रियों से नहीं देखते; फिर भी परमेश्वर यहाँ नीचे हमारे पास कुछ किरणें भेजने से नहीं चूकता कि हमें प्रकाशित करें, ताकि हम अनन्त जीवन की आशा की ओर खिंचें, और समझें कि परमेश्वर हम से इतना दूर नहीं कि उसका हाथ यहाँ नीचे हमारी देखभाल करने तक न पहुँचे, वह हमें अनुभव से दिखाता है कि वह हमें अपनी रखवाली में रखता है। क्योंकि जब सूर्य भोर को उगता है, तो क्या हम वह पितृवत् चिन्ता नहीं देखते जो परमेश्वर को हमारे लिए है? और जब वह साँझ को अस्त होता है, तो क्या हम नहीं देखते कि परमेश्वर को हमारी निर्बलता का ध्यान है, ताकि हम विश्राम पाएँ और कुछ राहत पाएँ? तो परमेश्वर, रात में इस प्रकार अपना सूर्य छिपाकर, क्या अपने आपको हमारा पिता नहीं दिखाता? और आगे, जब हम पृथ्वी को हमारे पोषण के लिए अपना फल उपजाते देखते हैं, जब हम वर्षा और वे सब परिवर्तन और बदलाव देखते हैं जो प्रकृति में होते हैं, तो क्या हम इस सब में नहीं समझते कि परमेश्वर किस प्रकार हमें निरन्तर अपनी ओर खींचने के लिए अपना हाथ बढ़ाता है, और हमारे प्रति अपने आपको पहले ही उदार पिता दिखाता है, ताकि हम उन अस्थायी उपकारों का आनन्द लेते हुए जो वह हमें देता है, उनके द्वारा किसी उच्चतर बात की ओर खिंचें — अर्थात् यह जानने की ओर कि उसने हमें गोद लिया है, ताकि जब हम उससे पूरी रीति से एक हो जाएँ तब हम आनन्द की परिपूर्णता और सम्पूर्ण सुख पाएँ?
हमारे सारे जीवन का लक्ष्य यही होना चाहिए, यदि हम नहीं चाहते कि वह श्रापित हो — ताकि चाहे जितने वर्ष, महीने, दिन, घण्टे और मिनट हम यहाँ नीचे जी चुके हों, यह सब मिलकर केवल हमारे विरुद्ध परमेश्वर के बदले को बढ़ाने और भड़काने का कारण न बने। इसलिए हम जानें कि हमें यहाँ परमेश्वर के कामों पर ध्यान करना है, क्योंकि इसीलिए हम इस संसार में रखे भी गए हैं। और इसी कारण, पाँचवें अध्याय में, जब भविष्यद्वक्ता यहूदियों को उनकी नीच पशुता के लिए डाँटना चाहता था, तो वह कहता है: “उन्होंने परमेश्वर के कामों पर ध्यान नहीं दिया।” वह उनकी मतवालेपन, पेटूपन और उच्छृंखलता की बात करता है, परन्तु उनकी बुराई की पराकाष्ठा यह है कि उन्होंने परमेश्वर के कामों पर ध्यान नहीं दिया। इसलिए अब भला राजा हिजकिय्याह हमें दिखाता है कि हम सब के लिए यह उत्तम होता कि मृत जन्मे होते, और जब हम माता के गर्भ से निकले तब पृथ्वी फट जाती और हमें निगल लेती, बजाय इसके कि हम यहाँ नीचे जीएँ — सिवाय इस अंश के कि हम वहाँ अपने परमेश्वर को पहले ही देखते हैं। ऐसा नहीं कि हमें उसका सिद्ध दर्शन है, परन्तु पहले वह अपने वचन के द्वारा (जो सच्चा दर्पण है) अपने आपको हम पर प्रकट करता है, और फिर हमारे पास, ऊँचे और नीचे, उसकी उपस्थिति और उस पितृवत् चिन्ता के इतने चिह्न हैं जो वह हमारे लिए रखता है, कि जब तक हम अत्यधिक मन्द और बुद्धि-विवेक से पूर्णतः रहित न हों, हमें उसे अवश्य देखना चाहिए। क्योंकि सारा संसार एक जीवित प्रतिमा के समान है जिसमें परमेश्वर अपनी सामर्थ्य और अपनी महिमा प्रदर्शित करता है; और आगे, कि हम उसके हाथ के अधीन शासित हैं, यह हमारे लिए उसके न्याय, उसके अनुग्रह और उसकी दया की एक और अधिक अन्तरंग गवाही है। इसलिए हम इन्हीं शर्तों पर जीना सीखें: उस परमेश्वर की आराधना में अपने आपको लगाएँ जिसने हमें रचा और गढ़ा, और उसे अपने पिता के रूप में आदर और श्रद्धा दें, और उन भली वस्तुओं का जो वह अभी हमें देता है स्वाद लेते हुए स्वर्गीय जीवन के विश्वास में दृढ़ किए जाएँ। और आगे, कि वह अपनी प्रोविडेंस (विधान) को यहाँ नीचे तक बढ़ाना, इस क्षणिक और निर्बल जीवन में हमारा संचालन करना, उचित समझता है, ताकि हमें सन्देह न हो कि जब हम उसके पास आएँगे तब आमने-सामने उसे देखेंगे जिसे अब हम केवल धुँधला और थोड़ा-सा देखते हैं।
और इस प्रकार राजा हिजकिय्याह सब कुछ परमेश्वर को सौंप देता है, मानो वह कहता: “हाय, यह सच है कि मैं यहाँ मानो परमेश्वर के अनुग्रहों को स्पष्टता से निहारने के लिए हूँ, परन्तु इस बीच मैं देखता हूँ कि यह सब मानो मुझसे छीना जा रहा है, क्योंकि ऐसा लगता है कि परमेश्वर ने मुझसे वह छीन लेना चाहा जो उसने मुझे पहले दिया था, और मेरे लिए पूर्ण निराशा के सिवा कुछ नहीं बचा, क्योंकि उसने मुझे छोड़ दिया और त्याग दिया है। उसने अपने भविष्यद्वक्ता को मेरे पास इस सन्देश के साथ भेजा है, कि मेरे लिए सब समाप्त है। हाय, जब मुझे अपने परमेश्वर की भलाई का कोई चिह्न नहीं दिखता, और न यह कि वह मेरे क्लेशों में मुझे राहत देने के लिए अपनी सामर्थ्य प्रकट करता है, जबकि मैं मृत्यु की वेदना में हूँ — तो क्या यह बड़ी दयनीय बात नहीं कि मेरे प्रभु ने मुझे वहाँ छोड़ दिया है, और मैं उससे कट गया हूँ?”
अब इससे हमें यह समझना चाहिए कि जीवन में हो या मृत्यु में, यही अनुग्रह हमारे लिए सदा पर्याप्त होना चाहिए — अर्थात् कि परमेश्वर हमें अपनी भलाई का अनुभव कराता है; और जब वह हमें दिखाता है कि वह हम पर प्रसन्न है, तो हम निडर होकर चलें, और यदि इस जीवन में हमें तरसना पड़े, तो धीरज से सहें। यह सच है कि पाप के इस कारागार में बन्दी होने पर हम कराह और आहें भर सकते हैं। और दूसरी ओर, परमेश्वर जो क्लेश यहाँ भेजता है उन्हें देखकर भी हम कराह सकते हैं; फिर भी हम सदा परमेश्वर के नाम को धन्य कहना और अपने सब कष्टों के बीच उसमें आनन्दित रहना न छोड़ेंगे, जब हम अनुभव करें कि वह हमारा पिता होगा, और हमें अपनी सन्तान के रूप में भी स्वीकार करेगा। मृत्यु में हम अनन्त जीवन को निहारेंगे, जो हमें सब खेद भुला देगा, ऐसा कि हम अब यह न कहेंगे, “हाय, मैं क्या करूँ? मैं कैसे निभाऊँ? मैं कहाँ जाऊँ?” हम ऐसे सब विचारों को काट देंगे। और न हम अब यह कहेंगे, “क्या मैं और न पीऊँगा, क्या मैं और न खाऊँगा?” — यह तो पशुओं की बात है — वरन् यह: “अब मैं अपने परमेश्वर को अपने निकट आते देखता हूँ; मैं जाकर उसके सम्मुख दण्डवत् करूँगा; मैं जाकर अपने आपको उसके हाथों में दूँगा, और उसे अपने पिता के रूप में अपने आपको सौंप दूँगा।” जब मैं कहता हूँ कि हम ऐसे ढल जाएँ, तब हम दाऊद के साथ कह सकेंगे: “हे प्रभु, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ।” दाऊद ने यह अपने जीवनकाल में कहा, परन्तु हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें दिखाता है कि जब परमेश्वर हमें इस संसार से उठा ले तब हमें भी यही कहना चाहिए।
और आगे, जब हम परमेश्वर की सब भलाइयों पर विचार करें, तो हम उसकी महिमा करना भी सीखें, क्योंकि ये बातें अलग नहीं की जा सकतीं। जिस मात्रा में परमेश्वर हमें अपने अनुग्रहों का भागी बनाता है, और पहले ही कुछ अंश में हमें दिखाता है कि हमारा सारा सुख उसकी सन्तानों की मण्डली का होने में है, उसी प्रकार हम में से प्रत्येक को उसे अपने पिता के रूप में आदर देने का यत्न करना चाहिए। इसी कारण योना भी, गहराइयों से निकाले जाने पर, कहता है: “मैं अपने परमेश्वर को धन्य कहूँगा” — वह यह नहीं कहता, “मैं खाने-पीने के लिए जीऊँगा,” वरन् “मैं मन्दिर में, अपने परमेश्वर के पवित्रस्थान में आऊँगा, और वहाँ इस छुटकारे के लिए उसकी स्तुति करूँगा” — अर्थात् कि उसने मुझे मृत्यु से लौटा लिया है। इसलिए हमें यही करना चाहिए।
अब, हिजकिय्याह अपने दिनों के कट जाने के विषय में जो कहता है, उसमें वह मानव जीवन के स्वाभाविक क्रम को देखता है, जिसका उल्लेख मूसा के गीत में है, क्योंकि उसने पच्चीस वर्ष की आयु में राज्य करना आरम्भ किया था। चौदहवें वर्ष में यरूशलेम नगर घेरा गया, और तभी वह इस रोग में पड़ा, जैसा हम देखते हैं। इसलिए वह उनतालीस वर्ष का था। अब वह कहता है कि उसका जीवन कट गया, क्योंकि वह वृद्धावस्था तक नहीं पहुँचा था। यह सच है कि मूसा वहाँ मनुष्यों की नश्वरता के विषय में कहता है: “मनुष्य क्या हैं? परमेश्वर उन्हें यहाँ तीन दिन घुमाकर फिर वे लौट जाते हैं।” सचमुच, जब मनुष्य साठ वर्ष का होता है तो वह पहले ही टूट चुका होता है, और यदि दस वर्ष और जोड़े जाएँ, तो कष्ट और शोक के सिवा कुछ नहीं; वह बोझ और लगभग निकम्मा हो जाता है, और उसका जीवन स्वयं उसे थका देता है। मूसा वहाँ हमें दिखाता है कि यह जीवन, इतना छोटा और निर्बल होने के कारण, हमें रोके नहीं रखना चाहिए। परन्तु जो भी हो, राजा हिजकिय्याह, कहें तो, अब भी अपनी आयु के फूल में था; वह चालीस वर्ष तक नहीं पहुँचा था। इसी दृष्टि से वह कहता है कि परमेश्वर उसके दिन काटता है — ऐसा नहीं कि हमारे लिए कोई निश्चित ठहराया हुआ समय है, क्योंकि क्या बच्चे कभी-कभी संसार में आने से पहले ही मर नहीं जाते? और जब वे आ जाते हैं, तो क्या मृत्यु उन्हें पहले ही घेर नहीं लेती? फिर भी वह उस वृद्धावस्था तक नहीं पहुँचा था जो मानव जीवन के साधारण क्रम की है।
इसलिए हिजकिय्याह इस पर विचार करता है, और सबसे बढ़कर वह भविष्यद्वक्ता यशायाह के सन्देश पर आँखें गड़ाए रखता है — अर्थात् कि परमेश्वर उसे उसके पापों के कारण पीड़ित कर रहा है। मानो वह अपने आप से कहता: “मैं भली-भाँति देखता हूँ कि परमेश्वर तुझे इस संसार में नहीं छोड़ना चाहता, क्योंकि यहाँ एक हिंसक दरार है। और यह कहाँ से आती है? तेरे दोषों और पापों से,” जैसा हम उसे शीघ्र ही जोड़ते देखेंगे। यह सच है कि वह सब कुछ परमेश्वर को अपने न्यायी के रूप में ठहराता है, परन्तु दोष अपने ऊपर लेता है और केवल अपने आपको अपराधी मानता है। इस प्रकार वह समझता है कि उसके दिन काटे गए हैं। जब वह कहता है कि वह कब्र के फाटकों तक आएगा, कि वह जीवितों को फिर न देखेगा — यह इसलिए कि वह परमेश्वर की सेवा में अपने आपको लगाने के लिए मनुष्यों से फिर बातचीत न करेगा। अब यह निराधार नहीं कि इसमें भी वह परमेश्वर के क्रोध को ही समझता है, यद्यपि वह वहाँ बहुत से भीड़-भाड़ के साथ घुला-मिला रहने को विवश था — क्योंकि यहूदिया में बहुत से कपटी, दुष्ट और उच्छृंखल लोग थे, परमेश्वर और उसकी व्यवस्था का उपहास करनेवाले; और अन्यजातियों में अधर्म और विद्रोह के सिवा कुछ नहीं था।
अब जब हिजकिय्याह यह देखता है, तो कहता है: “अब मैं जान गया कि मैं पृथ्वी पर बसने के योग्य नहीं, क्योंकि ये लोग अब भी संसार में रहते हैं, और परमेश्वर मुझे उसमें से काट देता है — वह भी बलवन्त हाथ से, मानो वह मेरे शत्रु के रूप में मुझ से खुला युद्ध करने के लिए शस्त्र बाँधकर आया हो।” इसलिए जब हिजकिय्याह की ऐसी आशंकाएँ हैं, तो हमें चकित न होना चाहिए कि वह ये शिकायतें करता है; परन्तु जो भी हो, यह सब इसी से जुड़ा है कि वह देखता है कि परमेश्वर उसे सता रहा है। यह उसके लिए इतना भारी बोझ है कि वह मानो उसके नीचे कुचला हुआ है। इसलिए हमें इस शिक्षा पर और भी ध्यान देना चाहिए, ताकि यदि परमेश्वर कभी हमें हमारी इच्छा से अधिक कठोरता से पीड़ित करे, तो हम यह पहचानना न छोड़ें कि वह हम से प्रेम रखता है, और उसकी भलाई की यह धारणा हमें सब परीक्षाओं पर जय पाने योग्य बनाए, जो अन्यथा हमें दबा देने के लिए पर्याप्त होतीं। और आगे, यदि वह हमें डाँटे और हमें हमारे पापों का अनुभव कराए, तो हम अपराध स्वीकार करने के लिए उसी की शरण में जाएँ — क्योंकि किसी बहाने से हमें कुछ न मिलेगा; यदि हम अपना मुकद्दमा लड़ना चाहें, तो भी जीतने वाला पक्ष सदा उसी का रहेगा। इसलिए जब हम देखें कि परमेश्वर हमें हमारे पापों के लिए दण्ड देने में न्यायी है, तो हम झुके सिर के साथ आएँ, ताकि उसकी दया से राहत पाएँ, और हमारे पास उद्धार के लिए इसके सिवा कोई और भरोसा या आशा न हो कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में हमें अनुग्रह में ग्रहण करना भाए, क्योंकि हम में पूर्ण दण्ड-योग्यता के सिवा कुछ नहीं है।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख दण्डवत् करें, अपने दोषों को मानते हुए, प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें अधिकाधिक अनुभव कराए, और हमें हमारी सब अशुद्धताओं से इस प्रकार शुद्ध करे कि हम अपनी जड़ता से सचमुच जाग उठें, ताकि हम कराहें और आहें भरें — केवल उन दुखों के लिए नहीं जो हम अपने पापों के कारण संसार में देखते हैं, वरन् इसलिए भी कि हम उन्हें, जहाँ तक हमारे वश में है, और भी बढ़ाने से नहीं रुकते। और इस बीच हम सदा अपने परमेश्वर की शरण लें, और चाहे ऐसा लगे कि वह हमें सताता है, और उसका हाथ हमारे प्रति कठोर और भयानक है, तब भी हम उसके निकट आना और उसकी भलाई को बड़ाई देना न छोड़ें, यह निश्चय रखते हुए कि वह हमारे सब दोषों और अपराधों पर प्रबल होगी। और यद्यपि हम उसमें कुछ कठोरता अनुभव करें, फिर भी हम यह पहचानें कि निराश बेचारों के समान उससे दूर जाने की अपेक्षा उसके घर में और उसकी अगुवाई में शरण लेना कहीं अच्छा है। वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् सब जातियों को भी देना भाए, इत्यादि।
