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कैल्विनी ओपेरा की सम्पादकीय सूचना
कैल्विनी ओपेरा की सम्पादकीय सूचना
हमें कोलाडोन (कैल्विन का जीवन-चरित्र, खण्ड XI, पृ. 81) से ज्ञात होता है कि कैल्विन ने अपने नियमित साप्ताहिक उपदेशों के लिए भविष्यद्वक्ता यशायाह की पुस्तक को लिया, जिस पर वे कुछ वर्ष पहले कलीसिया में प्रचार कर चुके थे (हमारा अनुमान है कि शुक्रवार की सभाओं में) और जिस पर तब से पाठशाला में व्याख्यान भी देते रहे थे। इन उपदेशों को आशुलिपिकों ने संकलित किया था, और जेनेवा के पुस्तकालय में इनके छह खण्ड विद्यमान थे, जिनमें से हम केवल दूसरा खण्ड (अध्याय 13 से 29) पुनः प्राप्त कर सके हैं, जिसमें 22 फरवरी से 31 जुलाई, 1557 तक दिए गए 66 उपदेश हैं (628 पत्र); तथा चौथा खण्ड (अध्याय 42 से 51), जो 503 पत्रों का है और जिसमें 31 दिसम्बर, 1557 से 4 जून, 1558 तक दिए गए 56 उपदेश हैं। तीसरा खण्ड ब्रेसिंज [बेसिंज] के ट्रौंशिन पुस्तकालय में मिल गया है, जिसमें अध्याय 30 से 42 पर 67 उपदेश हैं, जो 4 अगस्त से 30 दिसम्बर, 1557 तक दिए गए थे। इस श्रृंखला में आगे ये भी सम्मिलित थे: खण्ड I, 66 उपदेश, जिनका आरम्भ 16 जुलाई, 1557 को हुआ; खण्ड V, 44 उपदेश, जिनका आरम्भ 14 जून, 1558 को हुआ; और खण्ड VI, 43 उपदेश, जिनका आरम्भ उसी वर्ष 22 सितम्बर को हुआ — कुल मिलाकर 343 उपदेश।
इन सब उपदेशों में से केवल चार ही कभी छपे हैं, जो अड़तीसवें अध्याय की आयत 9 से 22 पर हैं, और उनके साथ अध्याय 53 पर सात उपदेश भी हैं। यहाँ हम केवल पहले वर्ग की बात कर रहे हैं। इन्हें समाहित करनेवाली पुस्तिका की केवल दो प्रतियाँ बची हैं, दोनों पेरिस में — एक Bibliothèque Nationale में, दूसरी Bibliothèque Mazarine में, और यह दूसरी प्रति अन्य छोटी पुस्तिकाओं के साथ संख्या 23607 के अन्तर्गत जिल्दबन्द है, जिसका उल्लेख करने का अवसर हमें भजन संहिता 115 और 124 पर दिए गए उपदेशों के प्रसंग में पहले ही मिल चुका है।
यह 98 क्रमांकित पृष्ठों की एक छोटी अठपेजी पुस्तिका है; इसके फर्मे a से g तक चिह्नित हैं; पहले पाँच और अन्तिम नियमित रूप से 8-8 पत्रों के हैं, परन्तु छठे (f) में केवल दो पत्र हैं, फिर भी पाठ का कोई अंश छूटा नहीं है। सबसे अन्तिम पत्र कोरा है। शीर्षक यह है:
जीन कैल्विन के उपदेश उस गीत पर जो भला राजा हिजकिय्याह ने तब रचा जब वह परमेश्वर के हाथ से रोगी और पीड़ित हुआ था, जैसा कि वह यशायाह के अड़तीसवें अध्याय में दिया गया है। (एस्तीन का जैतून-वृक्ष वाला चिह्न।) जेनेवा में, फ्रांसुआ एस्तीन द्वारा, एमरान ले मेले के लिए। 1562।
पाठ के पहले यह सूचना दी गई है:
जाक रू की ओर से: विश्वासी पाठक को नमस्कार। यद्यपि उन सब क्लेशों में, जिनके द्वारा परमेश्वर अपने विश्वासियों को परखता है, शैतान उन्हें हिला देने और विश्वास से भटका देने के लिए अवसर और सामग्री पा लेता है — मानो ऐसे क्लेश उनके तिरस्कृत ठहरने की सबसे स्पष्ट और प्रत्यक्ष गवाही हों — तथापि उसका प्रकोप तब कहीं अधिक भड़का हुआ दिखाई देता है जब परमेश्वर, अपनों के विवेक को गहराई से जाँचते और बुलाते हुए, कुछ समय के लिए उनके विरोधी और कठोर न्यायी के रूप में प्रकट होता है, और उन्हें अपने न्याय-दण्डों का भय सचमुच अनुभव कराता है। अब ऐसी परीक्षाएँ अत्यन्त संकटपूर्ण होती हैं, क्योंकि परमेश्वर के वचन में साधारण उन्नति करनेवालों को भी यह किसी रीति से उचित नहीं लगता कि विश्वासी ऐसी परीक्षा के अधीन हों — इसलिए कि उनके सिर, हमारे प्रभु यीशु मसीह में, परमेश्वर का क्रोध एक ही बार सदा के लिए शान्त हो चुका है, और उसी के द्वारा वे इस संसार के अधिपति के अत्याचार से स्वतन्त्र और मुक्त किए गए हैं। इस कारण, पवित्र आत्मा की सम्मति के अनुसार, हमें पवित्र शास्त्र से उन लोगों के उदाहरण परिश्रम से एकत्र करने चाहिएँ जो परमेश्वर को प्रसन्न करनेवाले होने की अच्छी गवाही रखते हुए भी ऐसी भट्ठी में से होकर गुज़रे — ताकि उससे धीरज में दृढ़ होकर हम शैतान के ऐसे प्रत्येक प्रचण्ड आक्रमण का सामना कर सकें, और उसके घातक प्रयत्नों के विरुद्ध विजय प्राप्त कर सकें।
अब जिन लोगों का उल्लेख पवित्र शास्त्र करता है, उनमें भले राजा हिजकिय्याह का उदाहरण उत्कृष्ट है, जैसा कि वह स्वयं अपने गीत में थोड़े शब्दों में यथेष्ट रीति से बताता है, जिसे भविष्यद्वक्ता यशायाह ने लिखित रूप में दर्ज किया। प्रिय पाठक, यह गीत मैं तुझे इसकी सच्ची व्याख्या के साथ प्रस्तुत करता हूँ, जो यीशु मसीह के विश्वासयोग्य सेवक जीन कैल्विन के उपदेशों से ईमानदारी से संकलित की गई है, ठीक वैसी ही जैसी उसने सार्वजनिक रूप से प्रचार की थी, और जिसमें तब से न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया गया है; ताकि तू इससे और भी अच्छी रीति से लाभ उठा सके। फिर भी मुझे मानना होगा कि इसे प्रकाश में लाने के लिए उसकी सहमति मैं बड़ी कठिनाई से ही पा सका — जैसा कि वे सब लोग जो उसे निजी रूप से जानते हैं सहज ही मानेंगे, क्योंकि वे भली-भाँति जानते हैं कि उसकी इच्छा केवल उस झुण्ड की सेवा करने की रही है जिसे परमेश्वर ने उसे सौंपा है, उन्हें सहज और घरेलू ढंग से सिखाने की, न कि अवकाश के समय समूचे संसार की आँखों के सामने रखने के लिए धर्मोपदेश (Homilies) रचने की। परन्तु मेरा विचार है कि यह समझाने में समय लगाना कि उसने इस गीत का सच्चा और स्वाभाविक अर्थ कितनी निपुणता और प्रबलता से प्रकट किया है, और इन उपदेशों का पढ़ना तेरे लिए कितना लाभदायक होगा, अनावश्यक होगा — क्योंकि मुझे निश्चय है कि इन्हें पढ़ने से जो अनुभव और निश्चय तुझे मिलेगा, वह तुझे उससे अधिक सिखाएगा जितना मैं कभी कह सकता हूँ। अपनी ओर से मैं जानता हूँ कि परमेश्वर के इस भले दास की जीवित वाणी सुनकर मैं कैसे खिंच गया था, जो पवित्र आत्मा से चलाया और संचालित होता था, छल से रहित और मानवीय वाक्पटुता के किसी प्रदर्शन से रहित, केवल शुद्ध और सीधी — फिर भी जीवन्त और भेदनेवाली, जैसा परमेश्वर ने अपने अनुग्रह से मुझे सचमुच अनुभव कराया, एक अवर्णनीय सान्त्वना के साथ, उस बड़ी आवश्यकता के अनुसार जो मुझे उसकी थी, क्योंकि मैं उन दिनों वैसे ही आत्मिक संघर्ष में था, और उसी प्रकार की परीक्षा की अंकुश से उभारा जा रहा था, उतना ही जितना परमेश्वर ने मेरे लिए उचित जाना।
अब यद्यपि परमेश्वर अपनों को इतनी गहराई से जाँचता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनमोल उपकार किसी भी प्रकार से घट जाता या धुँधला पड़ जाता है, या कि उन्हें अपने स्वतन्त्र गोद लिए जाने और परमेश्वर के पितृवत् प्रेम पर सन्देह करना चाहिए — क्योंकि इसके विपरीत, इसी साधन से उसकी उत्कृष्टता और सामर्थ्य और भी भली-भाँति प्रकट होती है, इसलिए कि जितने क्लेश वे सहते हैं वे सब स्वर्ग की उस मीरास की ओर ले जानेवाली मानो सीढ़ियाँ हैं जो उसने उनके लिए इतने महँगे मूल्य पर प्राप्त की है। प्रिय पाठक, यही बात है जो मैंने तुझे बताना उचित समझा, क्योंकि मैंने तेरे लिए इन उत्तम उपदेशों के आनन्द जैसी बड़ी भलाई जुटाई है, जो अन्यथा उस भेड़शाला के घेरे में ही बन्द रह जाते जहाँ वे सुनाए गए थे — और मैं तुझसे विनती करता हूँ कि मेरे इस भले अभिप्राय को अच्छे मन से ग्रहण कर, और मेरे साथ हमारे भले परमेश्वर और पिता से प्रार्थना कर कि वह शीघ्र ही शैतान को लज्जित करे, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के राज्य को, जो आज इस युग के पुत्रों, सत्य के शत्रुओं द्वारा इतनी निर्लज्जता से सताया जा रहा है, और आगे बढ़ाए और बनाए रखे। ऐसा ही हो।
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जो 164 उपदेश अब भी केवल हस्तलिपि में बचे हैं, उन्हें प्रतिलिपि करने का मन हम नहीं बना सके। चूँकि कैल्विन की टीकाएँ विद्वत्तापूर्ण होने के बजाय व्यावहारिक स्वभाव की हैं, इसलिए उपदेशों को उस अन्य कार्य के साथ प्रकाशित करना अनावश्यक होता — यह कहने की तो आवश्यकता ही नहीं कि यशायाह की टीका के दो भिन्न संस्करणों से हम भली-भाँति जानते हैं, कि ये आशुलिपीय प्रतिलिपियाँ प्रायः कितनी अशुद्ध होती हैं। इसलिए हम यहाँ, जैसा कि अन्यत्र भी, केवल उसी को पुनः सम्पादित करने तक सीमित रहते हैं जो पहले छप चुका है, और वह भी प्रायः स्वयं लेखक की आँखों के सामने।
