यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
यह दिखाना कि सच्चे अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों के चिन्ह कौन-से हैं।
अब मैं धार्मिक मनोभावों की परीक्षा से सम्बन्धित उस दूसरी बात पर आता हूँ, जो प्रस्तावित की गई थी, अर्थात् उन बातों पर ध्यान देना, जिनमें वे मनोभाव जो आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, उनसे भिन्न हैं जो ऐसे नहीं हैं।
परन्तु इससे पहले कि मैं सीधे उन विशिष्ट लक्षणों की ओर बढ़ूँ, मैं पहले कुछ बातें कहना चाहूँगा, जिन पर मैं चाहता हूँ कि उन चिन्हों के विषय में, जिन्हें मैं आगे प्रस्तुत करूँगा, ध्यान दिया जाए।
1. यह कि मैं अनुग्रहमय मनोभावों के ऐसे चिन्ह देने का उपक्रम करने से बहुत दूर हूँ, जो किसी को भी दूसरों में सच्चे मनोभाव को झूठे से निश्चयपूर्वक पहचानने में समर्थ बनाने के लिए पर्याप्त हों; अथवा निश्चयपूर्वक यह निर्धारित करने के लिए कि उनके पड़ोसियों में से कौन सच्चे अंगीकार करनेवाले हैं, और कौन कपटी हैं।
ऐसा करने में, मैं उसी अहंकार का दोषी ठहरूँगा, जिसकी मैं निन्दा करता आया हूँ। यद्यपि यह स्पष्ट है कि मसीह ने सब मसीहियों को ऐसे नियम दिए हैं, जिनसे वे धर्म के उन अंगीकार करनेवालों के विषय में न्याय कर सकें, जिनसे उनका सम्बन्ध है, जहाँ तक यह उनकी अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक है, और उन्हें झूठे शिक्षकों और धर्म के झूठे ढोंगियों द्वारा फन्दे में फँसाए जाने से बचाने के लिए; और यद्यपि यह भी सन्देह से परे है कि पवित्रशास्त्र ऐसे नियमों से भरपूर है, जो पादरियों के लिए, उन प्राणों को, जो उनकी देख-रेख में सौंपे गए हैं, उनकी आत्मिक और अनन्त दशा से सम्बन्धित बातों में सलाह देने और चलाने में अत्यन्त उपयोगी हो सकते हैं; तौभी यह भी स्पष्ट है, कि परमेश्वर की योजना कभी भी हमें ऐसे नियम देने की नहीं रही, जिनसे हम निश्चयपूर्वक जान सकें कि हमारे साथी अंगीकार करनेवालों में से कौन उसके अपने हैं, और भेड़ों तथा बकरियों के बीच पूर्ण और स्पष्ट भेद कर सकें; वरन, इसके विपरीत, परमेश्वर की योजना यह थी कि वह इसे अपने ही अधिकार के रूप में अपने पास सुरक्षित रखे। और इसलिए ऐसे कोई विशिष्ट चिन्ह, जो मसीहियों या पादरियों को यह करने में समर्थ बनाएँ, जगत के अन्त तक कभी अपेक्षित नहीं किए जाने चाहिए: क्योंकि परमेश्वर के वचन में पाए जानेवाले, या उससे संगृहीत किए गए, किसी भी चिन्ह से उससे अधिक कभी अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए, जितना मसीह ने उन्हें उसके लिए बनाया था।
2. ऐसे कोई चिन्ह अपेक्षित नहीं हैं, जो उन संतों को, जो अनुग्रह में बहुत दुर्बल हैं, अथवा जो परमेश्वर से बहुत दूर हट गए हैं, और मृत, शारीरिक तथा अमसीही दशा में गिर गए हैं, अपनी अच्छी दशा को निश्चयपूर्वक पहचानने में समर्थ बनाने के लिए पर्याप्त हों। यह परमेश्वर की योजना के अनुकूल नहीं है (जैसा पहले देखा जा चुका है) कि ऐसे लोग अपनी अच्छी दशा को जानें: न ही यह वांछनीय है कि वे जानें; वरन, इसके विपरीत, हर रीति से यही उत्तम है कि वे न जानें; और हमें परमेश्वर का धन्यवाद करने का कारण है, कि उसने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की है, कि ऐसे लोग अपनी दशा को निश्चयपूर्वक जान सकें, सिवाय इसके कि वे पहले उस बुरी दशा और मार्ग से बाहर निकलें, जिसमें वे हैं। वास्तव में यह ठीक-ठीक परमेश्वर के वचन में दिए गए चिन्हों की त्रुटि के कारण नहीं है, कि हर जीवित संत, चाहे वह बलवन्त हो या दुर्बल, और जो बुरी दशा में हैं, वे भी उतना ही, जितना अन्य, उनके द्वारा अपनी अच्छी दशा को निश्चयपूर्वक नहीं जान सकते। क्योंकि नियम अपने आप में निश्चित और अचूक हैं, और हर संत में वे बातें हैं, या रही हैं, जो अनुग्रह के निश्चित प्रमाण हैं; क्योंकि अनुग्रह का हर, यहाँ तक कि सबसे छोटा कार्य भी ऐसा ही है। परन्तु यह उस व्यक्ति की त्रुटि के कारण है, जिसे ये चिन्ह दिए गए हैं। उस संत में, जो अनुग्रह में बहुत दुर्बल है, या बुरी दशा में है, दो प्रकार की त्रुटि है, जो उसके लिए यह असम्भव बना देती है कि वह सबसे अच्छे चिन्हों और नियमों के द्वारा भी निश्चयपूर्वक जान सके, कि उसमें सच्चा अनुग्रह है। पहली, देखी और परखी जानेवाली वस्तु में ही, भाग 3। एक त्रुटि है। मेरा अभिप्राय किसी सारभूत त्रुटि से नहीं है; क्योंकि मैं मानता हूँ कि वह व्यक्ति एक सच्चा संत है; परन्तु मात्रा में एक त्रुटि है: अनुग्रह इतना अल्प होने के कारण, स्पष्ट और निश्चयपूर्वक न तो पहचाना जा सकता है, न भेद किया जा सकता है।
जो वस्तुएँ बहुत छोटी होती हैं, हम उनके रूप को स्पष्ट रूप से नहीं पहचान सकते, न ही उन्हें एक-दूसरे से भेद कर सकते हैं; यद्यपि, जैसी वे अपने आप में हैं, उनका रूप बहुत भिन्न हो सकता है। इसमें सन्देह नहीं कि मनुष्य की देह और अन्य पशुओं की देहों में, गर्भ में पहले गर्भाधान के समय, बड़ा अन्तर है: परन्तु फिर भी यदि हम विभिन्न भ्रूणों को देखें, तो वस्तु की अपूर्ण दशा के कारण, हमारे लिए उस अन्तर को पहचानना सम्भव न हो; परन्तु जैसे-जैसे वह अधिक पूर्णता को प्राप्त होता है, अन्तर बहुत स्पष्ट होता जाता है। अत्यन्त विपरीत गुणोंवाले प्राणियों के बीच का अन्तर, जब वे बहुत छोटे होते हैं, उतनी स्पष्टता से नहीं देखा जा सकता; यहाँ तक कि उनके वास्तव में जन्म लेने के बाद भी, जितनी स्पष्टता उनकी अधिक पूर्ण दशा में होती है। जब कबूतर और कौवे, या कबूतर और गिद्ध, अंडे से पहली बार निकलते हैं, तब उनके बीच का अन्तर उतना स्पष्ट नहीं होता; परन्तु जैसे-जैसे वे अपनी पूर्णता को बढ़ते हैं, वह अत्यन्त बड़ा और प्रगट हो जाता है। जिन लोगों के विषय में मैं बात कर रहा हूँ, उनके अनुग्रह में एक और त्रुटि यह जुड़ी है, कि वह इतनी अधिक भ्रष्टता के साथ मिश्रित है, जो उसे धुंधला और छिपा देती है, और उसे निश्चयपूर्वक जाना जाना असम्भव बना देती है।
यद्यपि हमारे सामने की विभिन्न वस्तुओं में, अपने आप में, एक-दूसरे से पूर्णतः भेद करनेवाले अनेक चिन्ह हो सकते हैं; तौभी यदि हम उन्हें केवल घने धुएँ में देखें, तो फिर भी उनमें भेद करना असम्भव हो सकता है। एक स्थिर तारा साफ आकाश में एक पुच्छल तारे से सरलता से भेद किया जा सकता है; परन्तु यदि हम उन्हें बादल के आर-पार देखें, तो अन्तर देखना असम्भव हो सकता है। जब सच्चे मसीही बुरी दशा में होते हैं, तो दोष विवेक पर बना रहता है; जिससे भय उत्पन्न होता है, और इस प्रकार निश्चित आशा की शान्ति और आनन्द में बाधा पड़ती है।
दूसरी। ऐसी दशा में दृष्टि में भी एक त्रुटि होती है। जैसे अनुग्रह की दुर्बलता और भ्रष्टता की प्रबलता वस्तु को धुंधला कर देती है; वैसे ही यह दृष्टि को भी दुर्बल कर देती है; यह सब आत्मिक वस्तुओं के प्रति दृष्टि को अंधकारमय कर देती है, जिनमें से अनुग्रह भी एक है। पाप आँखों के कुछ रोगों के समान है, जो वस्तुओं को उनके वास्तविक रंगों से भिन्न रंगों में दिखाई देते हैं, और अन्य अनेक रोगों के समान भी, जो मुँह के स्वाद को बिगाड़ देते हैं, जिससे वह अच्छे और स्वास्थ्यकर भोजन को बुरे से भेद करने में असमर्थ हो जाता है, वरन सब कुछ कड़वा प्रतीत होता है।
भ्रष्ट और शारीरिक दशा में पड़े मनुष्यों की आत्मिक इन्द्रियाँ, आत्मिक वस्तुओं का न्याय करने और उनमें भेद करने के लिए, बहुत ही दुर्बल दशा में होती हैं।
इन कारणों से, जो भी चिन्ह दिए जाएँ, वे वास्तव में ऐसी दशा के लोगों को सन्तुष्ट नहीं करेंगे: दिए गए चिन्ह चाहे कितने ही अच्छे, अचूक और स्पष्ट रूप से प्रस्तुत क्यों न हों, वे उनके काम नहीं आएँगे। यह किसी मनुष्य को अंधकार में दिखाई देनेवाली वस्तुओं में भेद करने के नियम देने के समान है; वस्तुएँ स्वयं बहुत भिन्न हो सकती हैं, और उनका अन्तर उसे बहुत अच्छी तरह और स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है; तौभी यह सब उसे उनमें भेद करने में समर्थ बनाने के लिए अपर्याप्त है, क्योंकि वह अंधकार में है। और इसलिए ऐसी दशा के अनेक लोग निष्फल परिश्रम में समय बिताते हैं, बीते हुए अनुभवों पर ध्यान लगाते हुए, और स्वयं को उन चिन्हों से परखते हुए, जो वे मंच से सुनते हैं, या पुस्तकों में पढ़ते हैं; जबकि उनके लिए और भी काम है, जिसकी उनसे कहीं अधिक अपेक्षा की जाती है; जिसे वे उपेक्षित करते हुए, उनकी सारी आत्म-परीक्षाएँ प्रतीत होती हैं कि
भाग 3। व्यर्थ हों, चाहे वे उन पर कितना ही समय क्यों न बिताएँ। शापित वस्तु को उनकी छावनी से नष्ट किया जाना है, और आकान को मार डाला जाना है; और जब तक यह न हो, वे कष्ट में रहेंगे।
यह परमेश्वर की योजना नहीं है कि मनुष्य भ्रष्टता को मृत करने, अनुग्रह में बढ़ने, और उसके सजीव अभ्यासों को प्राप्त करने के अतिरिक्त किसी और रीति से निश्चय प्राप्त करें।—और यद्यपि आत्म-परीक्षा एक बड़े उपयोग और महत्त्व का कर्तव्य है, और किसी भी रीति से उपेक्षित नहीं की जानी चाहिए; तौभी यह वह प्रमुख साधन नहीं है, जिसके द्वारा संत अपनी अच्छी दशा का सन्तोष प्राप्त करते हैं।
निश्चय आत्म-परीक्षा से उतना प्राप्त नहीं होता, जितना कार्य से होता है। प्रेरित पौलुस मुख्यतः इसी रीति से निश्चय खोजता था, अर्थात् "जो बातें पीछे रह गई हैं, उन्हें भूलकर, और आगे की बातों की ओर बढ़ते हुए, मसीह यीशु में परमेश्वर की ऊपर की बुलाहट के इनाम के लिये निशाने की ओर दौड़ते हुए; कि यदि किसी रीति से मृतकों में से जी उठने को प्राप्त कर सके।" और मुख्यतः इसी साधन से उसने निश्चय प्राप्त किया: 1 कुरिन्थियों 9:26,
"इसलिये मैं यों दौड़ता हूं, कि निश्चय दौड़ूं।" उसने पुरस्कार जीतने का निश्चय, विचार करने से अधिक, दौड़ने से प्राप्त किया। उसकी चाल की तीव्रता ने, उसकी परीक्षा की कठोरता से कहीं अधिक, उसे विजय का निश्चय दिलाया। विश्वास में सद्गुण, आदि जोड़ते हुए, अनुग्रह में बढ़ने का पूरा परिश्रम करना, वह निर्देश है, जो प्रेरित पतरस हमें देता है, "अपनी बुलाहट और चुने जाने को निश्चित करने," और "मसीह के अनन्त राज्य में उदारता से प्रवेश पाने" के लिए; जिससे वह हमें यह प्रगट करता है, कि इसके बिना, हमारी आँखें धुंधली रहेंगी, और हम अंधकार में पड़े मनुष्यों के समान होंगे, जो बीती या आनेवाली बातों को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, न तो अपने बीते हुए पापों की क्षमा को, न ही अपनी स्वर्गीय मीरास को, जो भविष्य में और दूर है, 2 पतरस।
इसलिए, यद्यपि सच्चे अनुग्रह को नकली से भेद करने के अच्छे नियम, कपटियों को कायल करने की प्रवृत्ति रख सकते हैं, और अनेक बातों में संतों के लिए बड़े उपयोग के हो सकते हैं; और अन्य लाभों के साथ-साथ उनके लिए अनेक अनावश्यक शंकाओं को दूर करने और उनकी आशा को स्थिर करने में बड़े उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं; तौभी मैं ऐसे किसी भी नियम को प्रस्तुत करने का दावा करने से बहुत दूर हूँ, जो अपने आप में, बिना अन्य साधनों के, सब सच्चे संतों को उनकी अच्छी दशा देखने में समर्थ बनाने के लिए पर्याप्त हों, अथवा यह मानते हुए कि वे उनके सन्तोष के प्रमुख साधन होने चाहिए।
3. न ही वर्तमान या बीते समयों के अनुभव में, सच्चे और झूठे मनोभावों के बीच भेद करने के लिए नियम या चिन्ह प्रस्तुत करने का बहुत प्रोत्साहन है, इस आशा में कि उस प्रकार के कपटियों की किसी बड़ी संख्या को कायल किया जा सके, जो बड़े झूठे प्रकाशनों और मनोभावों से धोखा खा चुके हैं, और एक बार झूठे भरोसे में, और अपने कल्पित बड़े अनुभवों और विशेषाधिकारों के उच्च अभिमान में स्थिर हो चुके हैं। ऐसे कपटी अपनी ही बुद्धि पर इतने अभिमानी, और अत्यन्त बड़े आत्म-धार्मिकता से इतने अंधे और कठोर हो जाते हैं (परन्तु 36 अपनी भक्ति को जानने का मार्ग यह है कि अनुग्रह के प्रगट अभ्यासों को नया करते रहो।—जितना अधिक अनुग्रह के प्रगट अभ्यास नए किए जाते हैं, उतना ही अधिक तुम निश्चित होगे। जितनी बार ये क्रियाएँ नई की जाती हैं, उतना ही अधिक तुम्हारा निश्चय स्थिर और पक्का होता जाएगा। मनुष्यों का अनुग्रह जितना बढ़ता है, उतनी ही उनकी शान्ति भी बढ़ती है; 2 पतरस 1:2, "परमेश्वर, और हमारे प्रभु यीशु
मसीह के ज्ञान के द्वारा, अनुग्रह और शान्ति तुम्हें बहुतायत से मिलती रहे।" स्टॉडर्ड की Way to know Sincerity and Hypocrisy, पृ. 139 और 142।
भाग 3। अत्यन्त सूक्ष्म और गुप्त रूप से (बड़ी नम्रता के आवरण के नीचे), और अपनी बड़ी उन्नति की मनभावन कल्पना के प्रति इतने अजेय मोह से, कि उनके सामने उनके कपट के सबसे कायल करनेवाले प्रमाण रखना प्रायः कुछ भी अर्थ नहीं रखता। उनकी दशा वास्तव में शोचनीय है, और उन लोगों के निकट है, जिन्होंने अक्षम्य पाप किया है। इस प्रकार के कुछ लोग कायल होने और पश्चाताप के साधनों की पहुँच से सबसे अधिक बाहर प्रतीत होते हैं। परन्तु फिर भी अच्छे नियम प्रस्तुत करना ऐसे कपटियों को रोकने का, और अन्य प्रकार के अनेक कपटियों को कायल करने का साधन हो सकता है; और परमेश्वर इस प्रकार के लोगों को भी कायल करने में समर्थ है, और उसका अनुग्रह सीमित नहीं किया जाना चाहिए, न ही साधनों की उपेक्षा की जानी चाहिए। और इसके अतिरिक्त, ऐसे नियम सच्चे संतों के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं, उन झूठे मनोभावों को पकड़ने के लिए, जिन्हें उन्होंने सच्चे मनोभावों के साथ मिला लिया हो; और उनके धर्म को अधिक शुद्ध बनाने का, और आग में परखे गए सोने के समान बनाने का साधन हो सकते हैं।
इन बातों को पहले कहकर, अब मैं सीधे उन बातों पर ध्यान देने के लिए आगे बढ़ता हूँ, जिनमें सच्चे धार्मिक मनोभाव झूठों से भेद किए जाते हैं।
I. सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से उत्पन्न होते हैं… I. सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों और हृदय पर होनेवाली उन क्रियाओं से उत्पन्न होते हैं, जो आत्मिक, अलौकिक और ईश्वरीय हैं।
मैं स्पष्ट करूँगा कि इन शब्दों से मेरा क्या अभिप्राय है, जिससे यह प्रगट होगा कि वे उन मनोभावों में भेद करने के लिए, जो आत्मिक हैं, और जो ऐसे नहीं हैं, किस प्रकार उपयोगी हैं।
हम पाते हैं कि सच्चे संत, अर्थात् वे व्यक्ति जो परमेश्वर के आत्मा से पवित्र किए गए हैं, नये नियम में आत्मिक व्यक्ति कहलाते हैं। और उनका आत्मिक होना उनके विशिष्ट लक्षण के रूप में कहा गया है, और वह बात है जिसमें वे उन लोगों से भेद किए जाते हैं, जो पवित्र नहीं किए गए हैं।
यह इसलिए स्पष्ट है, क्योंकि जो आत्मिक हैं, वे स्वाभाविक मनुष्यों और शारीरिक मनुष्यों के विरुद्ध रखे गए हैं। इस प्रकार आत्मिक मनुष्य और स्वाभाविक मनुष्य एक-दूसरे के विरुद्ध रखे गए हैं,
1 कुरिन्थियों 2:14, 15: "शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातों को ग्रहण नहीं करता; क्योंकि वे उसकी दृष्टि में मूर्खता हैं; और वह उन्हें जान भी नहीं सकता, क्योंकि वे आत्मिक रीति से परखी जाती हैं। परन्तु आत्मिक मनुष्य सब बातों को परखता है।" पवित्रशास्त्र स्वयं यह स्पष्ट करता है, कि स्वाभाविक मनुष्य से अभिप्राय एक भक्तिहीन मनुष्य, अथवा ऐसे व्यक्ति से है, जिसमें कोई अनुग्रह नहीं है: इस प्रकार प्रेरित यहूदा, कुछ भक्तिहीन मनुष्यों के विषय में, जो संतों के बीच बिना जाने घुस आए थे, अपनी पत्री की आयत 4 में कहकर, कहता है, 5:19, "ये शारीरिक मनुष्य हैं, जिनमें आत्मा नहीं है।" प्रेरित इसे इस कारण के रूप में देता है, कि वे क्यों इस प्रकार दुष्टता से व्यवहार करते थे, जैसा उसने वर्णन किया था। यहाँ जिस शब्द का अनुवाद "शारीरिक" किया गया है, वह मूल भाषा में ψυχικοι [psychikoi] है, जो ठीक वही शब्द है, जो 1
कुरिन्थियों अध्याय 2 में "स्वाभाविक" अनुवाद किया गया है। इसी प्रकार, उसी विवेचन के आगे, एक आयत छोड़कर अगली आयत में, आत्मिक मनुष्यों को शारीरिक मनुष्यों के विरुद्ध रखा गया है; जिसे सन्दर्भ स्पष्ट रूप से दिखाता है कि इसका वही अर्थ है, जो पिछली आयतों में आत्मिक मनुष्यों और स्वाभाविक मनुष्यों का है; "और हे भाइयो, मैं तुम से आत्मिक मनुष्यों की नाईं नहीं, वरन शारीरिक मनुष्यों ही की नाईं बातें कर सका"; अर्थात्, बड़ी मात्रा में अपवित्र मनुष्यों की नाईं। कि प्रेरित का "शारीरिक" से अभिप्राय भ्रष्ट और अपवित्र मनुष्य है, यह रोमियों 7:25, और 8:1, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 19, 13, गलातियों 5:16 से अन्त तक, कुलुस्सियों 2:18 से अत्यन्त स्पष्ट है। अब इसलिए, यदि इन वचनों में "स्वाभाविक" और "शारीरिक" से अभिप्राय अपवित्र मनुष्य है, तो निःसन्देह इसके विरुद्ध रखे गए "आत्मिक" से अभिप्राय पवित्र और अनुग्रहमय मनुष्य है।
और जैसे संत पवित्रशास्त्र में आत्मिक कहलाते हैं, वैसे ही हम यह भी पाते हैं कि कुछ ऐसे गुण, विशेषताएँ और तत्त्व हैं, जिन्हें यही विशेषण दिया गया है। इस प्रकार हम "आत्मिक मन" के विषय में पढ़ते हैं, रोमियों 8:6, 7, और "आत्मिक बुद्धि" के विषय में, कुलुस्सियों 1:9, और "आत्मिक आशीषों" के विषय में,
अब यह देखा जा सकता है, कि "आत्मिक" विशेषण, इन तथा नये नियम के अन्य समानान्तर वचनों में, व्यक्तियों या वस्तुओं के मनुष्य के आत्मा या प्राण से किसी सम्बन्ध को, अर्थात् मनुष्य के आत्मिक भाग को, देह के विरुद्ध, जो उसका भौतिक भाग है, प्रगट करने के लिए प्रयुक्त नहीं होता। गुणों को आत्मिक इसलिए नहीं कहा जाता, क्योंकि उनका निवास प्राण में है, देह में नहीं: क्योंकि कुछ ऐसे गुण हैं, जिन्हें पवित्रशास्त्र शारीरिक अथवा देहसम्बन्धी कहता है, जिनका निवास उतना ही प्राण में है, जितना उन गुणों का जिन्हें आत्मिक कहा जाता है। इस प्रकार अभिमान और आत्म-धार्मिकता, और मनुष्य का अपनी ही बुद्धि पर भरोसा रखना है, जिसे प्रेरित शारीरिक कहता है, कुलुस्सियों 2:18। न ही वस्तुएँ इसलिए आत्मिक कहलाती हैं, क्योंकि वे उन वस्तुओं से सम्बन्धित हैं, जो अभौतिक हैं, और शारीरिक नहीं। क्योंकि ऐसी ही बुद्धिमान पुरुषों की बुद्धि थी,
I. सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से उत्पन्न होते हैं… और इस जगत के हाकिमों की, जो आत्माओं और अभौतिक प्राणियों से सम्बन्धित थी; जिनके विषय में तौभी प्रेरित स्वाभाविक मनुष्य कहकर बोलता है, जो आत्मिक वस्तुओं से पूर्णतः अनजान हैं, 1 कुरिन्थियों अध्याय 2। परन्तु यह पवित्र आत्मा, अथवा परमेश्वर के आत्मा के सम्बन्ध में है, कि व्यक्ति या वस्तुएँ नये नियम में आत्मिक कहलाती हैं। "आत्मा," जैसा यह शब्द त्रिएकता के तीसरे व्यक्ति को प्रगट करने के लिए प्रयुक्त होता है, वह संज्ञा है, जिससे पवित्र
शास्त्रों में "आत्मिक" विशेषण बनता है। इस प्रकार मसीही आत्मिक व्यक्ति कहलाते हैं, क्योंकि वे आत्मा से जन्मे हैं, और उनमें परमेश्वर के आत्मा के निवास और पवित्र प्रभावों के कारण। और वस्तुएँ परमेश्वर के आत्मा से सम्बन्धित होने के कारण आत्मिक कहलाती हैं; 1 कुरिन्थियों 2:13, 14, "इन्हीं बातों को हम मनुष्य की बुद्धि की सिखाई हुई बातों में नहीं, वरन पवित्र आत्मा की सिखाई हुई बातों में, आत्मिक बातों की उपमा आत्मिक बातों से देते हुए, कहते हैं। परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातों को ग्रहण नहीं करता।" यहाँ प्रेरित स्वयं स्पष्ट रूप से प्रगट करता है, कि आत्मिक बातों से उसका अभिप्राय परमेश्वर के आत्मा की बातों से है, और वे बातें, जिन्हें पवित्र आत्मा सिखाता है। यही बात सारे सन्दर्भ को देखने से और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। फिर, रोमियों 8:6, "शारीरिक मनसा तो मृत्यु है; परन्तु आत्मिक मनसा जीवन और शान्ति है।" प्रेरित 9वीं आयत में आगे यह स्पष्ट करता है कि शारीरिक और आत्मिक मनसा से उसका क्या अभिप्राय है, और दिखाता है कि आत्मिक मनसा रखने से उसका अभिप्राय हृदय में परमेश्वर के आत्मा के निवास और पवित्र प्रभावों का होना है: "परन्तु तुम शरीर में नहीं, वरन आत्मा में हो, यदि परमेश्वर का आत्मा सचमुच तुम में बसा हुआ है। और यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं, तो वह उसका नहीं है।" यही बात सारे सन्दर्भ से स्पष्ट है। परन्तु इसका सारा प्रमाण, जो नये नियम में है, प्रस्तुत करने के लिए समय नहीं है।
और यहाँ यह देखा जाना चाहिए, कि यद्यपि व्यक्ति और वस्तुएँ परमेश्वर के आत्मा और उसके प्रभावों के सम्बन्ध में ही आत्मिक कहलाती हैं; तौभी वे सब व्यक्ति, जो परमेश्वर के आत्मा के किसी भी प्रकार के प्रभाव के अधीन हैं, नये नियम में साधारणतः आत्मिक नहीं कहलाते। जिनमें केवल परमेश्वर के आत्मा के सामान्य प्रभाव हैं, वे उपर्युक्त स्थानों में इस नाम से नहीं पुकारे जाते, वरन केवल वे, जिनमें परमेश्वर के आत्मा के विशेष, अनुग्रहमय और उद्धारक प्रभाव हैं; जैसा स्पष्ट है, क्योंकि यह पहले ही सिद्ध किया जा चुका है, कि आत्मिक मनुष्यों से अभिप्राय भक्त मनुष्य हैं, स्वाभाविक, शारीरिक और अपवित्र मनुष्यों के विरुद्ध। और यह अत्यन्त स्पष्ट है, कि प्रेरित रोमियों 8:6 में आत्मिक मनसावाला होने से अनुग्रहमय मनसावाला होना अभिप्रेत करता है। और यद्यपि आत्मा के असाधारण वरदान, जो स्वाभाविक मनुष्यों में भी हो सकते हैं, कभी-कभी आत्मिक कहलाते हैं, क्योंकि वे आत्मा से हैं; तौभी स्वाभाविक मनुष्य, चाहे उनमें आत्मा के कोई भी वरदान क्यों न हों, नये नियम की सामान्य भाषा में आत्मिक व्यक्ति नहीं कहलाते थे।
क्योंकि मनुष्य आत्मिक इसलिए नहीं कहलाते थे, कि उनमें आत्मा के वरदान थे, वरन इसलिए, कि उनमें आत्मा के सद्गुण थे; जैसा गलातियों 6:1 से प्रगट है: "हे भाइयो, यदि कोई मनुष्य किसी अपराध में पकड़ा जाए, तो तुम, जो आत्मिक हो, नम्रता की आत्मा से ऐसे को सुधारो।"
नम्रता उन सद्गुणों में से एक है, जिनके विषय में प्रेरित ठीक पहले, ठीक पिछली आयतों में, आत्मा के फलों को दिखाते हुए बात कर चुका था। नये नियम की भाषा में वे ही गुण आत्मिक कहलाते हैं, जो सचमुच अनुग्रहमय और पवित्र हैं, और संतों के लिए विशिष्ट हैं।
I. सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से उत्पन्न होते हैं… इस प्रकार, जब हम आत्मिक बुद्धि और समझ के विषय में पढ़ते हैं (जैसा कुलुस्सियों 1:9 में, "हम चाहते हैं कि तुम उसकी इच्छा के ज्ञान से, सारी बुद्धि और आत्मिक समझ में, भरपूर हो जाओ"), इससे वह बुद्धि अभिप्रेत है, जो अनुग्रहमय है, और परमेश्वर के आत्मा के पवित्र करनेवाले प्रभावों से है। क्योंकि, निःसन्देह, आत्मिक बुद्धि से वह अभिप्रेत है, जो उसके विपरीत है, जिसे पवित्रशास्त्र स्वाभाविक बुद्धि कहता है; जैसे आत्मिक मनुष्य स्वाभाविक मनुष्य के विरुद्ध रखा गया है।
और इसलिए आत्मिक बुद्धि निःसन्देह वही है, जो "ऊपर से आनेवाली बुद्धि" है, जिसके विषय में प्रेरित याकूब बोलता है, याकूब 3:17: "परन्तु जो बुद्धि ऊपर से आती है, वह पहले तो पवित्र है, फिर मिलनसार, कोमल," आदि, क्योंकि प्रेरित इसे स्वाभाविक बुद्धि के विरुद्ध रखता है, आयत 15: "यह बुद्धि ऊपर से नहीं उतरती, वरन पार्थिव, शारीरिक है" — मूल भाषा में अन्तिम शब्द वही है, जो 1 कुरिन्थियों 2:14 में "स्वाभाविक" अनुवाद किया गया है।
अतः यद्यपि स्वाभाविक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा के अनेक प्रभावों के अधीन हो सकते हैं, जैसा अनेक पवित्रशास्त्रों से स्पष्ट है, जैसे गिनती 24:2, 1 शमूएल 10:10, और 11:6, और 16:14, 1
कुरिन्थियों 13:1, 2, 3, इब्रानियों 6:4, 5, 6, और अन्य अनेक स्थानों से; तौभी वे, पवित्रशास्त्र के अर्थ में, आत्मिक व्यक्ति नहीं हैं; न ही उन पर परमेश्वर के आत्मा के प्रभाव से उत्पन्न कोई भी परिणाम, सामान्य वरदान, गुण, अथवा मनोभाव, आत्मिक वस्तुएँ कहलाते हैं। बड़ा अन्तर इन दो बातों में निहित है।
1. परमेश्वर का आत्मा सच्चे संतों को उनमें, उसके अपने स्थायी निवास स्थान के रूप में, बसने के लिए दिया जाता है; और उनके हृदयों को, नये स्वभाव के तत्त्व के रूप में, अथवा जीवन और कार्य के दिव्य अलौकिक स्रोत के रूप में, प्रभावित करने के लिए। पवित्रशास्त्र पवित्र आत्मा को न केवल संतों को हिलाते और कभी-कभी प्रभावित करते हुए, वरन उनमें उसके मन्दिर, उसके अपने निवास स्थान, और अनन्त निवास के रूप में बसते हुए भी दिखाता है, 1 कुरिन्थियों 3:16, 2 कुरिन्थियों 6:16, यूहन्ना 14:16, 17। और उसे वहाँ प्राण की सामर्थ्यों से इस प्रकार संयुक्त हुआ दिखाया गया है, कि वह वहाँ नये स्वभाव और जीवन का एक तत्त्व अथवा स्रोत बन जाता है।
इस प्रकार संतों के विषय में कहा जाता है कि वे मसीह के अपने भीतर जीवित रहने से जीवित हैं, गलातियों 2:20। मसीह अपने आत्मा से न केवल उनमें है, वरन उनमें जीवित रहता है; और इस प्रकार वे उसके जीवन से जीवित हैं; इस प्रकार उसका आत्मा उनसे संयुक्त है, उनमें जीवन के एक तत्त्व के रूप में; वे केवल जीवन का जल नहीं पीते, वरन यह "जीवन का जल," प्राण में, "एक कूआँ अथवा जल का सोता बन जाता है," "जो आत्मिक और अनन्त जीवन के लिए उमड़ता है," यूहन्ना 4:14, और इस प्रकार उनमें जीवन का एक तत्त्व बन जाता है। इस जीवन के जल को, यह सुसमाचार-लेखक स्वयं परमेश्वर के आत्मा के अभिप्राय से स्पष्ट करता है, अध्याय 7:38, 39। धार्मिकता के सूर्य का प्रकाश उन पर न केवल चमकता है, वरन उन्हें इस प्रकार दिया जाता है कि वे भी चमकते हैं, और उस सूर्य की छोटी प्रतिमाएँ बन जाते हैं, जो उन पर चमकता है; सच्ची दाखलता का रस उनमें न केवल इस प्रकार पहुँचाया जाता है, जैसे वृक्ष का रस किसी पात्र में पहुँचाया जा सकता है, वरन इस प्रकार पहुँचाया जाता है, जैसे रस वृक्ष से उसकी किसी जीवित डाली में पहुँचता है, जहाँ वह जीवन का एक तत्त्व बन जाता है। परमेश्वर का आत्मा इस प्रकार संतों को दिया और उनसे संयुक्त होने के कारण, वे उसी से ठीक-ठीक अपना नाम पाते हैं, और आत्मिक कहलाते हैं।
दूसरी ओर, यद्यपि परमेश्वर का आत्मा स्वाभाविक मनुष्यों को अनेक रीतियों से प्रभावित कर सकता है; तौभी क्योंकि वह उन्हें इस प्रकार, एक निवासी तत्त्व के रूप में, नहीं दिया जाता, वे उससे कोई नाम या लक्षण प्राप्त नहीं करते: क्योंकि कोई संयोग न होने के कारण, वह उनका अपना नहीं है।
I. सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से उत्पन्न होते हैं… प्रकाश किसी अत्यन्त अंधेरी अथवा काली वस्तु पर चमक सकता है; और यद्यपि वह वस्तु प्रकाश का विषय हो, तौभी, क्योंकि प्रकाश उसमें प्रकाश का कोई तत्त्व नहीं बनता, जिससे वह वस्तु चमकने लगे, इसलिए वह वस्तु उससे ठीक-ठीक अपना नाम प्राप्त नहीं करती, कि वह प्रकाशमान वस्तु कहलाए। इसी प्रकार परमेश्वर का आत्मा केवल प्राण पर कार्य करते हुए, बिना अपने आपको उसमें एक सक्रिय तत्त्व के रूप में दिए, उसे आत्मिक नाम नहीं दे सकता। जो वस्तु काली बनी रहती है, उसके विषय में कहा जा सकता है कि उसमें प्रकाश नहीं है, यद्यपि प्रकाश उस पर चमकता है: इसी प्रकार स्वाभाविक मनुष्यों के विषय में कहा जाता है कि उनमें "आत्मा नहीं है," यहूदा 19, शारीरिक अथवा स्वाभाविक (जैसा यह शब्द अन्यत्र अनुवाद किया गया है), जिनमें आत्मा नहीं है।
2. एक और कारण, जिससे संत और उनके सद्गुण आत्मिक कहलाते हैं (जो प्रमुख बात है), यह है, कि परमेश्वर का आत्मा, उनके प्राणों में जीवनदायी तत्त्व के रूप में बसते हुए, वहाँ वे परिणाम उत्पन्न करता है, जिनमें वह अपने आप को अपने ही स्वभाव में प्रगट और सम्प्रेषित करता है। पवित्रता परमेश्वर के आत्मा का स्वभाव है, इसलिए वह पवित्रशास्त्र में पवित्र आत्मा कहलाता है। पवित्रता, जो मानो ईश्वरीय स्वभाव की सुन्दरता और मिठास है, उतनी ही पवित्र आत्मा का अपना स्वभाव है, जितनी ऊष्मा आग का स्वभाव है, अथवा जितनी मिठास उस पवित्र अभिषेक के तेल का स्वभाव थी, जो मूसा की व्यवस्था में पवित्र आत्मा का प्रमुख प्रतिरूप था; वरन, मैं यह कहना अधिक उचित समझता हूँ, कि पवित्रता उतनी ही पवित्र आत्मा का अपना स्वभाव है, जितनी मिठास उस अभिषेक की सुगन्ध का स्वभाव थी। परमेश्वर का आत्मा संतों के हृदयों में इस प्रकार बसता है, कि वह वहाँ, जीवन के बीज अथवा सोते के रूप में, अपने इसी मधुर और ईश्वरीय स्वभाव में अपने आप को प्रगट और सम्प्रेषित करता है, प्राण को परमेश्वर की सुन्दरता और मसीह के आनन्द का भागी बनाते हुए, जिससे संत को पिता के साथ, और उसके पुत्र यीशु मसीह के साथ, इस प्रकार पवित्र आत्मा की संगति अथवा सहभागिता रखते हुए, सचमुच संगति प्राप्त होती है।
संतों के हृदयों में जो अनुग्रह है, वह उसी स्वभाव का है, जो ईश्वरीय पवित्रता का है, जहाँ तक वह पवित्रता, जो मात्रा में अनन्तगुणा कम है, ऐसी हो सकती है; जैसे उस हीरे में जो चमक होती है, जिस पर सूर्य चमकता है, वह उसी स्वभाव की है, जो सूर्य की चमक का है, परन्तु केवल इतना अन्तर है कि मात्रा में वह उसके सामने कुछ भी नहीं है। इसलिए मसीह कहता है,
यूहन्ना 3:6, "जो आत्मा से जन्मा है वह आत्मा है"; अर्थात्, वह अनुग्रह, जो संतों के हृदयों में उत्पन्न होता है, उस आत्मा के समान ही किसी स्वभाव का है, और इसलिए ठीक ही आत्मिक स्वभाव कहलाता है; उसी रीति से, जैसे जो शरीर से जन्मा है वह शरीर है, अथवा जो भ्रष्ट स्वभाव से जन्मा है वह भ्रष्ट स्वभाव है।
परन्तु परमेश्वर का आत्मा स्वाभाविक मनुष्यों के मनों को इस रीति से कभी प्रभावित नहीं करता।
यद्यपि वह उन्हें अनेक रीतियों से प्रभावित कर सकता है, तौभी वह अपने किसी भी प्रभाव में, अपने आप को उन्हें अपने ही स्वभाव में कभी नहीं देता। वास्तव में वह संतों के मनों पर हो या पापियों के, अपने स्वभाव के विरुद्ध कभी कार्य नहीं करता: परन्तु परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों पर अपने स्वभाव के अनुकूल कार्य कर सकता है, और फिर भी उनके मनों के कार्यों और अभ्यासों में अपने स्वभाव को प्रगट न करे: परमेश्वर का आत्मा इस प्रकार कार्य कर सकता है, कि उसके कार्य उसके स्वभाव के अनुकूल हों, और फिर भी वह उस कार्य के परिणाम में अपने आप को अपने स्वभाव में बिलकुल भी न दे।
इस प्रकार, उदाहरण के लिए, परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर गति करता था, और उस क्रिया में उसके स्वभाव के विरुद्ध कुछ भी न था; परन्तु फिर भी उसने अपने आपको बिलकुल भी नहीं दिया
I. सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से उत्पन्न होते हैं… उस क्रिया में; जल की उस गति में पवित्र आत्मा के अपने स्वभाव का कुछ भी न था। और इसी प्रकार वह मनुष्यों के मनों पर अनेक रीतियों से कार्य कर सकता है, और अपने आप को उतना ही कम दे सकता है, जितना वह निर्जीव वस्तुओं पर कार्य करते समय देता है।
इस प्रकार, न केवल आत्मा का, जो कार्य करनेवाला है, अपने कार्यों के विषय से सम्बन्ध की रीति भिन्न है; जैसे आत्मा संतों में इस प्रकार कार्य करता है, कि वह उनमें बसा हुआ, कार्य के स्थायी तत्त्व के रूप में, है, जबकि वह पापियों पर इस प्रकार कार्य नहीं करता; वरन प्रभाव और कार्य स्वयं भिन्न है, और उत्पन्न होनेवाला परिणाम अत्यन्त भिन्न है। इसलिए न केवल व्यक्ति आत्मिक कहलाते हैं, इसलिए कि उनमें परमेश्वर का आत्मा बसा हुआ है; वरन वे गुण, मनोभाव और अनुभव भी, जो आत्मा द्वारा उनमें उत्पन्न किए जाते हैं, आत्मिक हैं, और इसमें वे उस सब से, जिसका स्वाभाविक मनुष्य, जब तक वह स्वाभाविक दशा में रहता है, विषय है अथवा हो सकता है, अपने स्वभाव और प्रकार में अत्यन्त भिन्न हैं; और उस सब से भी, जिसके रचयिता मनुष्य अथवा शैतान हो सकते हैं। यह इस उच्च अर्थ में एक आत्मिक कार्य है; और इसलिए सब अन्य कार्यों से बढ़कर परमेश्वर के आत्मा के लिए विशिष्ट है। ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो इतना उच्च और उत्कृष्ट हो; क्योंकि ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिसमें परमेश्वर अपने आप को इतना अधिक देता है, और जिसमें केवल एक सृजित प्राणी को, इतने उच्च अर्थ में, परमेश्वर की सहभागिता प्राप्त होती है; इसलिए पवित्रशास्त्र में संतों के विषय में कहा गया है कि वे "ईश्वरीय स्वभाव के भागी बनाए जाते हैं," 2 पतरस 1:4, और "परमेश्वर उनमें बसा हुआ है, और वे परमेश्वर में," 1 यूहन्ना 4:12, 15, 16, और अध्याय 3:21; "और मसीह उनमें है,"
यूहन्ना 17:21, रोमियों 8:10; "जीवित परमेश्वर के मन्दिर होना," 2 कुरिन्थियों 6:16; "मसीह के जीवन से जीवित रहना," गलातियों 2:20; "परमेश्वर की पवित्रता के भागी बनाए जाना," इब्रानियों 12:10; "मसीह का प्रेम उनमें बसा होना," यूहन्ना 17:26; "उसका आनन्द उनमें पूरा होना," यूहन्ना 17:13; "परमेश्वर के प्रकाश में प्रकाश देखना, और परमेश्वर के आनन्द की नदी में से पिलाया जाना," भजन संहिता 36:8, 9; "परमेश्वर के साथ संगति रखना, अथवा उसके साथ सहभागी और भागी होना (जैसा यह शब्द प्रगट करता है)," 1
यूहन्ना 1:3। यह नहीं, कि संत परमेश्वर के सत्त्व के भागी बनाए जाते हैं, और इस प्रकार, कुछ पाखण्डियों की घृणित और निन्दात्मक भाषा और धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर के साथ "ईश्वरीकृत," और मसीह के साथ "मसीहीकृत" हो जाते हैं: वरन, पवित्रशास्त्र के शब्दों का प्रयोग करते हुए, वे परमेश्वर की परिपूर्णता के भागी बनाए जाते हैं, इफिसियों 3:17, 18, 19, यूहन्ना 1:16, अर्थात्, परमेश्वर की आत्मिक सुन्दरता और प्रसन्नता के, एक सृजित प्राणी की मात्रा और सामर्थ्य के अनुसार; क्योंकि पवित्रशास्त्र की भाषा में "परिपूर्णता" शब्द का यही अभिप्राय स्पष्ट है। संतों के हृदयों में अनुग्रह, इसलिए, परमेश्वर का सबसे महिमामय कार्य होने के कारण, जिसमें वह अपने स्वभाव की भलाई का सम्प्रेषण करता है, निःसन्देह उसका विशिष्ट कार्य है, और विशिष्ट रीति से सब सृजित प्राणियों की सामर्थ्य से बढ़कर है। और इसमें परमेश्वर के आत्मा के प्रभाव, इस प्रकार परमेश्वर के लिए विशिष्ट होने के कारण, और वे होने के कारण, जिनमें
परमेश्वर इतनी उच्च रीति से अपने आप को देता है, और सृजित प्राणी को ईश्वरीय स्वभाव का भागी बनाता है (परमेश्वर का आत्मा अपने आप को अपने ही स्वभाव में देते हुए); यही वह है जिसका अभिप्राय मैं उन प्रभावों से रखता हूँ, जो ईश्वरीय हैं, जब मैं कहता हूँ कि "सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से उत्पन्न होते हैं, जो आत्मिक और ईश्वरीय हैं।"
केवल सच्चे संतों में ही वह है, जो आत्मिक है; औरों में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो ईश्वरीय हो, उस अर्थ में जिसका वर्णन किया गया है। उनमें न केवल परमेश्वर के आत्मा के ये सम्प्रेषण संतों जितनी उच्च मात्रा में नहीं हैं, वरन उस स्वभाव अथवा प्रकार का कुछ भी नहीं है। क्योंकि I. सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से उत्पन्न होते हैं… प्रेरित याकूब हमें बताता है, कि स्वाभाविक मनुष्यों में आत्मा नहीं है; और मसीह इससे नये जन्म की, अथवा आत्मा से जन्म लेने की, आवश्यकता सिखाता है, कि जो शरीर से जन्मा है, उसमें केवल शरीर है, आत्मा नहीं, यूहन्ना 3:6। उनमें परमेश्वर का आत्मा किसी भी मात्रा में बसा हुआ नहीं है; क्योंकि प्रेरित सिखाता है, कि जिनमें भी परमेश्वर का आत्मा बसा हुआ है, वे सब उसी के हैं, रोमियों 8:9-11। और परमेश्वर के आत्मा का होना एक निश्चित चिन्ह के रूप में कहा गया है, कि व्यक्तियों को अनन्त मीरास प्राप्त होगी; क्योंकि इसे उसके बयाने के रूप में कहा गया है, 2
कुरिन्थियों 1:29, और 5:5, इफिसियों 1:14; और आत्मा में से कुछ भी होना, मसीह में होने के निश्चित चिन्ह के रूप में कहा गया है, 1 यूहन्ना 4:13: "इससे हम जानते हैं, कि हम उसमें बने रहते हैं, क्योंकि उसने अपने आत्मा में से हमें दिया है।" भक्तिहीन मनुष्यों में न केवल संतों जितना ईश्वरीय स्वभाव नहीं है, वरन वे उसके भागी भी नहीं हैं; जिसका अर्थ है कि उनमें उसका कुछ भी नहीं है; क्योंकि ईश्वरीय स्वभाव का भागी होना सच्चे संतों के विशिष्ट विशेषाधिकार के रूप में कहा गया है, 2 पतरस।
1:4। भक्तिहीन मनुष्य "परमेश्वर की पवित्रता के भागी" नहीं हैं, इब्रानियों 12:10। स्वाभाविक मनुष्य को आत्मिक वस्तुओं में से किसी का भी अनुभव नहीं है: प्रेरित हमें सिखाता है, कि वह इससे इतना दूर है, कि वह उनके विषय में कुछ भी नहीं जानता, वह उनसे पूर्णतः अपरिचित है, ऐसी बातों की चर्चा उसके लिए सर्वथा मूर्खता और व्यर्थ की बात है, वह नहीं जानता कि इसका क्या अर्थ है; 1 कुरिन्थियों 2:14,
"शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातों को ग्रहण नहीं करता; क्योंकि वे उसकी दृष्टि में मूर्खता हैं: और वह उन्हें जान भी नहीं सकता, क्योंकि वे आत्मिक रीति से परखी जाती हैं।" और इसी अभिप्राय से मसीह हमें सिखाता है, कि जगत परमेश्वर के आत्मा से पूर्णतः अपरिचित है,
यूहन्ना 14:17: "अर्थात् सत्य का आत्मा, जिसे जगत ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न तो उसे देखता है, न ही उसे जानता है।" और यह आगे स्पष्ट है, कि स्वाभाविक मनुष्यों में संतों के सच्चे अनुग्रह जैसा कुछ भी स्वभाव नहीं है, क्योंकि प्रेरित हमें सिखाता है, कि उनमें से जो धर्म में सबसे आगे बढ़ जाते हैं, उनमें भी प्रेम, अर्थात् सच्चा मसीही प्रेम, नहीं है, 1 कुरिन्थियों अध्याय 13।
इसी प्रकार मसीह अन्यत्र फरीसियों को, धर्म के उन बड़े ढोंगियों को, यह कहकर डाँटता है, कि "उनमें परमेश्वर का प्रेम नहीं है," यूहन्ना 5:42। इसलिए स्वाभाविक मनुष्यों की मसीह के साथ कोई संगति अथवा सहभागिता नहीं है, अथवा उसके साथ कोई भागीदारी नहीं है (जैसा इन शब्दों का अभिप्राय है), क्योंकि इसे संतों के विशिष्ट विशेषाधिकार के रूप में कहा गया है, 1 यूहन्ना 1:3, आयत 6, 7 के साथ, और 1 कुरिन्थियों 1:8, 9। और पवित्रशास्त्र प्राण में अनुग्रहमय तत्त्व के वास्तविक होने की बात करता है, यद्यपि उसकी पहली शुरुआत में, वहाँ बोए गए एक बीज के रूप में, मनुष्य के पापी होने के साथ असंगत होने की, 1 यूहन्ना 3:9।
और स्वाभाविक मनुष्यों को पवित्रशास्त्र में इस प्रकार दिखाया गया है, कि उनमें कोई आत्मिक प्रकाश नहीं, कोई आत्मिक जीवन नहीं, और कोई आत्मिक अस्तित्व नहीं है; और इसलिए मन-परिवर्तन की तुलना प्रायः अन्धों की आँखें खोलने से, मुर्दों को जिलाने से, और सृष्टि के कार्य से (जिसमें प्राणी बिलकुल नए बनाए जाते हैं), और नवजात शिशु बनने से की जाती है।
इन बातों से यह स्पष्ट है, कि जिन अनुग्रहमय प्रभावों के संत विषय हैं, और परमेश्वर के आत्मा के जिन परिणामों का वे अनुभव करते हैं, वे पूर्णतः स्वभाव से ऊपर हैं, और उस सब से सर्वथा भिन्न प्रकार के हैं, जो मनुष्य अपने स्वभाव से, अथवा केवल स्वाभाविक तत्त्वों के अभ्यास से, अपने भीतर पाते हैं; और ऐसी बातें हैं, जिन तक मनुष्यों को उन गुणों, अथवा स्वाभाविक तत्त्वों के किसी सुधार से, उन्हें उच्चतर मात्राओं तक बढ़ाने अथवा ऊँचा उठाने से, और उनकी किसी प्रकार की संरचना से, कभी नहीं लाया जा सकता; क्योंकि वे न केवल उस से भिन्न हैं, जो
I. सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से उत्पन्न होते हैं… स्वाभाविक है, और उस सब से, जिसका स्वाभाविक मनुष्य अनुभव करते हैं, मात्रा और परिस्थितियों में, वरन प्रकार में भी भिन्न हैं; और कहीं अधिक उत्कृष्ट स्वभाव के हैं। और यही वह है, जिसका अभिप्राय मैं "अलौकिक" से रखता हूँ, जब मैं कहता हूँ, कि अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से हैं, जो अलौकिक हैं।
इससे यह निकलता है, कि उन अनुग्रहमय अभ्यासों और मनोभावों में, जो परमेश्वर के आत्मा के उद्धारक प्रभावों के द्वारा संतों के मनों में उत्पन्न किए जाते हैं, उनके मनों की एक नई आन्तरिक प्रतीति अथवा अनुभूति होती है, जो अपने स्वभाव और प्रकार में उस सब से पूर्णतः भिन्न है, जिसका विषय उनके मन कभी भी, पवित्र किए जाने से पहले, रहे थे। क्योंकि निःसन्देह यदि परमेश्वर अपनी सामर्थ्यशाली शक्ति से कोई ऐसी वस्तु उत्पन्न करता है, जो नई है, न केवल मात्रा और परिस्थितियों में, वरन अपने सम्पूर्ण स्वभाव में, और जो पहले से विद्यमान किसी वस्तु को ऊँचा उठाने, बदलने, अथवा मिलाने से, अथवा उसमें उसी प्रकार की कोई वस्तु जोड़ने से, उत्पन्न नहीं की जा सकती थी; मैं कहता हूँ, यदि परमेश्वर किसी मन में, जो प्रतीति करने, सोचने, और चेतन वस्तु है, इस प्रकार कुछ नया उत्पन्न करता है; तो निःसन्देह कुछ बिलकुल नया अनुभव किया जाता है, अथवा प्रतीत होता है, अथवा सोचा जाता है; अथवा, जो वही बात है, मन में कोई नई अनुभूति अथवा प्रतीति होती है, जो पूर्णतः एक नए प्रकार की है, और जो मन की उस प्रकार की प्रतीतियों अथवा अनुभूतियों को, जो उसमें पहले थीं, ऊँचा उठाने, बदलने, अथवा मिलाने से, उत्पन्न नहीं की जा सकती थी; अथवा, जिसे कुछ तत्त्वमीमांसक "नई सरल धारणा" कहते हैं, वह है। यदि अनुग्रह, उस अर्थ में जो ऊपर वर्णन किया गया है, एक पूर्णतः नए प्रकार का तत्त्व है, तो उसके अभ्यास भी पूर्णतः एक नए प्रकार के अभ्यास हैं। और यदि प्राण में एक नए प्रकार के अभ्यास हों, जिनका वह सचेत है, जिनके विषय में प्राण पहले कुछ भी नहीं जानता था, और जिन्हें उस वस्तु के, जिसके प्रति वह पहले सचेत अथवा सुग्राह्य था, किसी सुधार, संरचना, अथवा प्रबन्ध से, अथवा उसके समान किसी वस्तु से, उत्पन्न नहीं किया जा सकता था; तो यह निकलता है, कि मन में एक पूर्णतः नए प्रकार की प्रतीति अथवा अनुभूति है; और यहाँ, मानो, मन में एक नई आत्मिक इन्द्रिय है, अथवा एक नए प्रकार की प्रतीति अथवा आत्मिक अनुभूति का तत्त्व है, जो अपने सम्पूर्ण स्वभाव में मन की किसी भी पूर्व प्रकार की अनुभूति से भिन्न है, जैसे स्वाद अन्य सब इन्द्रियों से भिन्न है; और एक सच्चा संत, मन की इस नई इन्द्रिय के अभ्यास में, आत्मिक और ईश्वरीय वस्तुओं में, कुछ ऐसा प्रतीत करता है, जो उस सब से पूर्णतः भिन्न है, जो स्वाभाविक मनुष्य उनमें प्रतीत करते हैं, जैसे मधु का मीठा स्वाद उन धारणाओं से भिन्न है, जो मनुष्यों को मधु के केवल देखने और छूने से प्राप्त होती हैं। इसलिए एक पवित्र और आत्मिक व्यक्ति की जो आत्मिक प्रतीतियाँ होती हैं, वे स्वाभाविक मनुष्यों की प्रतीतियों से न केवल उस रीति से भिन्न हैं, जिस रीति से एक ही इन्द्रिय की धारणाएँ अथवा प्रतीतियाँ एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं, वरन उस रीति से, जिस रीति से विभिन्न इन्द्रियों की धारणाएँ और अनुभूतियाँ भिन्न होती हैं। इसलिए नये जन्म में परमेश्वर के आत्मा के कार्य की तुलना पवित्रशास्त्र में प्रायः एक नई इन्द्रिय देने से, देखने के लिए आँखें और सुनने के लिए कान देने से, बहरों के कान खोलने से, और जन्म से अन्धों की आँखें खोलने से, और अन्धकार से ज्योति की ओर फिरने से की जाती है। और क्योंकि यह आत्मिक इन्द्रिय अत्यन्त उत्कृष्ट और श्रेष्ठ है, और उसके बिना प्रतीति के अन्य सब तत्त्व, और हमारी सब सामर्थ्यें व्यर्थ और निष्फल हैं; इसलिए यह नई इन्द्रिय देना, प्राण में उसके धन्य फलों और परिणामों के साथ, मुर्दों को जिलाने से, और एक नई सृष्टि से, तुलना की जाती है।
I. सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से उत्पन्न होते हैं… यह नई आत्मिक इन्द्रिय, और इसके साथ आनेवाले नए स्वभाव, कोई नई सामर्थ्यें नहीं हैं, वरन स्वभाव के नए तत्त्व हैं। मैं "तत्त्व" शब्द का प्रयोग इसलिए करता हूँ, कि इससे अधिक निश्चित अर्थवाला कोई शब्द नहीं है। इस स्थान पर स्वभाव के तत्त्व से मेरा अभिप्राय उस आधार से है, जो स्वभाव में, चाहे पुराने अथवा नए, प्राण की सामर्थ्यों के किसी विशेष रीति अथवा प्रकार के अभ्यास के लिए रखा जाता है; अथवा कार्य के लिए एक स्वाभाविक अभ्यास अथवा आधार, जो किसी निश्चित प्रकार के अभ्यासों में सामर्थ्यों को प्रगट करने के लिए व्यक्तिगत सामर्थ्य और स्वभाव देता है; ताकि उस प्रकार के अभ्यासों में सामर्थ्यों को प्रगट करना उसका स्वभाव कहा जा सके। इस प्रकार यह नई आत्मिक इन्द्रिय बुद्धि की कोई नई सामर्थ्य नहीं है, वरन प्राण के स्वभाव में रखा गया एक नया आधार है, उसी बुद्धि की सामर्थ्य के एक नए प्रकार के अभ्यासों के लिए। इसी प्रकार हृदय का वह नया पवित्र स्वभाव, जो इस नई इन्द्रिय के साथ आता है, इच्छा की कोई नई सामर्थ्य नहीं है, वरन प्राण के स्वभाव में रखा गया एक आधार है, उसी इच्छा की सामर्थ्य के एक नए प्रकार के अभ्यासों के लिए।
परमेश्वर का आत्मा, स्वाभाविक मनुष्यों के मनों पर अपने सब कार्यों में, केवल स्वाभाविक तत्त्वों को हिलाता, प्रभावित करता, सहायता देता, सुधारता, अथवा किसी रीति से उन पर कार्य करता है; परन्तु कोई नया आत्मिक तत्त्व नहीं देता। इस प्रकार जब परमेश्वर का आत्मा किसी स्वाभाविक मनुष्य को दर्शन देता है, जैसा उसने बिलाम को दिया, वह केवल एक स्वाभाविक तत्त्व को, अर्थात् देखने की इन्द्रिय को, प्रभावित करता है, उस इन्द्रिय की धारणाओं को तुरन्त उत्तेजित करते हुए; परन्तु वह कोई नई इन्द्रिय नहीं देता; न ही उसमें कुछ भी अलौकिक, आत्मिक, अथवा ईश्वरीय है। इसी प्रकार यदि परमेश्वर का आत्मा किसी मनुष्य की कल्पना पर, चाहे स्वप्न में, अथवा जागते समय, किसी इन्द्रिय की कोई बाहरी धारणा, चाहे स्वर, अथवा आकार और रंग, प्रभावित करता है, तो यह केवल उसी प्रकार की धारणाओं को उत्तेजित करना है, जो उसे स्वाभाविक तत्त्वों और इन्द्रियों से प्राप्त हैं। इसी प्रकार यदि परमेश्वर किसी स्वाभाविक मनुष्य पर कोई गुप्त तथ्य प्रगट करता है: जैसे, उदाहरण के लिए, कुछ ऐसा, जो वह आगे देखेगा अथवा सुनेगा; तो यह किसी नए आत्मिक तत्त्व का समावेश अथवा अभ्यास नहीं है, न ही किसी नई आत्मिक इन्द्रिय की धारणाएँ देना है; यह केवल असाधारण रीति से उन धारणाओं को प्रभावित करना है, जो आगे देखने और सुनने से प्राप्त होंगी।—इसी प्रकार परमेश्वर के आत्मा के पापियों के हृदयों पर अधिक साधारण प्रभावों में, वह केवल स्वाभाविक तत्त्वों को सहायता देता है, कि वे वही कार्य, जो वे स्वयं स्वभाव से करते हैं, अधिक मात्रा में करें। इस प्रकार परमेश्वर का आत्मा अपने सामान्य प्रभावों से मनुष्यों की स्वाभाविक कुशलता को सहायता दे सकता है, जैसे उसने निवासस्थान के कुशल कार्यों में बसलेल और ओहोलीआब की सहायता की: इसी प्रकार वह राजनैतिक मामलों में मनुष्यों की स्वाभाविक सामर्थ्यों की सहायता कर सकता है, और उनके साहस और अन्य स्वाभाविक गुणों को सुधार सकता है, जैसा कहा गया है कि उसने सत्तर प्राचीनों पर, और शाऊल पर अपना आत्मा रखा, यहाँ तक कि उसे एक और हृदय दिया: इसी प्रकार परमेश्वर स्वाभाविक मनुष्यों की बुद्धि को, सांसारिक बातों के विषय में, अथवा धर्म के सिद्धान्तों के विषय में, उनके विचार-विमर्श में, बड़ी सहायता दे सकता है, और अनेक रीतियों में धर्म की बातों के विषय में उनकी समझ और धारणाओं की स्पष्टता को बड़ी रीति से बढ़ा सकता है, बिना कोई आत्मिक इन्द्रिय दिए। इसी प्रकार उन जागरणों और दोषी होने के बोध में, जो स्वाभाविक मनुष्यों में हो सकते हैं, परमेश्वर केवल विवेक को, जो एक स्वाभाविक तत्त्व है, सहायता देता है, कि वह वही कार्य, जो वह स्वभाव से करता है, आगे और अधिक मात्रा में करे।
विवेक स्वभाव से मनुष्यों को उचित और अनुचित का बोध देता है, और उचित और अनुचित के बीच के सम्बन्ध, और प्रतिफल का संकेत देता है: परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों के विवेक को यह अधिक मात्रा में करने में सहायता देता है, सांसारिक वस्तुओं और उनकी अभिलाषाओं के सुन्न करनेवाले प्रभाव के विरुद्ध विवेक की सहायता करता है। और भी अनेक रीतियाँ बताई जा सकती हैं, जिनमें I. सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव उन प्रभावों से उत्पन्न होते हैं… आत्मा स्वाभाविक तत्त्वों पर कार्य करता, सहायता देता, और उन्हें हिलाता है; परन्तु अन्ततः यह स्वभाव के हिलाए, कार्यान्वित, और सुधारे जाने से अधिक कुछ नहीं है; यहाँ कुछ भी अलौकिक और ईश्वरीय नहीं है। परन्तु परमेश्वर का आत्मा अपने संतों के हृदयों पर अपने आत्मिक प्रभावों में, नए, ईश्वरीय, और अलौकिक तत्त्वों का समावेश अथवा अभ्यास करते हुए, कार्य करता है; ऐसे तत्त्व, जो वास्तव में एक नया और आत्मिक स्वभाव हैं, और ऐसे तत्त्व, जो स्वाभाविक मनुष्यों में जो कुछ है, उस सब से कहीं अधिक उदात्त और उत्कृष्ट हैं।
जो कुछ अब तक कहा गया है उससे यह निष्कर्ष निकलता है, कि सारे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव मन की किसी ऐसी प्रतीति, विचार या अनुभूति के साथ होते हैं और उन्हीं से उत्पन्न होते हैं, जो अपने सम्पूर्ण स्वभाव में उस सब से भिन्न, वरन अत्यन्त भिन्न है, जो स्वाभाविक मनुष्य के मन में है या हो सकता है; और जिसे स्वाभाविक मनुष्य कुछ भी नहीं पहचानता, और जिसका उसे कोई विचार नहीं (1 कुरिन्थियों 2:14 के अनुसार), और वह उसकी उतनी ही कल्पना कर सकता है, जितनी एक ऐसा मनुष्य जिसमें स्वाद-शक्ति नहीं, मधु के मीठे स्वाद की कल्पना कर सकता है, या एक ऐसा मनुष्य जिसमें सुनने की शक्ति नहीं, किसी सुर की मधुरता की कल्पना कर सकता है, या एक जन्मान्ध मनुष्य इन्द्रधनुष की सुन्दरता का बोध रख सकता है।
परन्तु इसे ठीक-ठीक समझने के लिये यहाँ दो बातें ध्यान में रखनी होंगी।
1. एक ओर तो यह देखना होगा, कि जो कुछ भी किसी प्रकार आत्मिक मनोभावों से सम्बन्ध रखता है, वह सब का सब नया और स्वाभाविक मनुष्यों की कल्पना तथा अनुभव से पूर्णतः भिन्न नहीं है; कुछ बातें अनुग्रहमय मनोभावों में और अन्य मनोभावों में समान हैं; बहुत सी परिस्थितियाँ, संलग्न बातें और परिणाम समान होते हैं। इस प्रकार एक संत के परमेश्वर के प्रति प्रेम में बहुत सी ऐसी बातें सम्मिलित हैं, जो एक मनुष्य के अपने किसी निकट सम्बन्धी के प्रति स्वाभाविक प्रेम में भी पाई जाती हैं; परमेश्वर के प्रति प्रेम मनुष्य में परमेश्वर के आदर की लालसा और उसे प्रसन्न करने की इच्छा उत्पन्न करता है; वैसे ही एक स्वाभाविक मनुष्य का अपने मित्र के प्रति प्रेम भी उसमें उसके आदर की लालसा और उसे प्रसन्न करने की इच्छा उत्पन्न करता है; परमेश्वर के प्रति प्रेम मनुष्य को परमेश्वर के विचारों में आनन्दित होने, परमेश्वर की उपस्थिति में आनन्दित होने, परमेश्वर के अनुरूप बनने की और परमेश्वर के भोग की लालसा करने देता है; और मनुष्य के अपने मित्र के प्रति प्रेम में भी ऐसा ही होता है; और भी बहुत सी बातें कही जा सकती हैं जो दोनों में समान हैं। परन्तु फिर भी वह विचार जो संत को परमेश्वर की मनोहरता का है, और वह अनुभूति, और उस दर्शन में उसका वह आनन्द, जो मानो उसके प्रेम का सार और निचोड़ है, वह विशिष्ट है, और उस हर बात से पूर्णतः भिन्न है जो एक स्वाभाविक मनुष्य के पास है या जिसका उसे कोई बोध हो सकता है। और उन बातों में भी जो समान प्रतीत होती हैं, कुछ विशिष्ट है; आत्मिक और स्वाभाविक दोनों प्रकार के प्रेम अपने प्रिय विषय के लिये लालसाएँ उत्पन्न करते हैं; परन्तु ये एक ही प्रकार की लालसाएँ नहीं हैं: परमेश्वर से प्रेम करनेवाले की आत्मिक लालसाओं में प्राण की एक ऐसी अनुभूति है, जो सारी स्वाभाविक लालसाओं से पूर्णतः भिन्न है: आत्मिक प्रेम और स्वाभाविक प्रेम दोनों के साथ अपने प्रिय विषय में आनन्द होता है; परन्तु आनन्द की अनुभूतियाँ एक समान नहीं, वरन पूर्णतः और अत्यन्त भिन्न हैं। स्वाभाविक मनुष्यों को आत्मिक मनोभावों के विषय में बहुत सी बातों की कल्पना हो सकती है; परन्तु उनमें कुछ ऐसा है जो मानो उनकी गुठली या मींगी है, जिसकी कल्पना उन्हें उतनी ही कम है जितनी एक जन्मान्ध व्यक्ति को रंगों की।
इसे इस दृष्टान्त से स्पष्ट किया जा सकता है: मान लीजिये दो मनुष्य हैं; एक स्वाद-शक्ति के बिना जन्मा है, दूसरे में वह शक्ति है; दूसरा मधु से प्रेम करता है, और उसमें बहुत आनन्दित होता है, क्योंकि वह उसका मीठा स्वाद जानता है; पहला कुछ ध्वनियों और रंगों से प्रेम करता है; इनमें से हर एक का प्रेम
I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो… में बहुत सी ऐसी बातें सम्मिलित हैं जो समान हैं; यह दोनों में अपने प्रिय विषय के लिये लालसा और आनन्द उत्पन्न करता है, और उसके अनुपस्थित होने पर शोक उत्पन्न करता है, इत्यादि, परन्तु फिर भी वह विचार या अनुभूति जो मधु का स्वाद जाननेवाले को उसकी उत्तमता और मिठास की है, जो उसके प्रेम की नींव है, वह उस हर बात से पूर्णतः भिन्न है जो दूसरे के पास है या हो सकती है; और मधु में जो आनन्द उसे है, वह उस हर बात से सर्वथा भिन्न है जिसकी दूसरा कल्पना कर सकता है, यद्यपि दोनों अपने-अपने प्रिय विषय में आनन्दित होते हैं। इसी प्रकार ये दोनों व्यक्ति किसी दृष्टि से एक ही विषय से प्रेम कर सकते हैं: एक किसी स्वादिष्ट फल से प्रेम कर सकता है, जो देखने में सुन्दर और स्वाद में मीठा है; न केवल इसलिये कि उसने उसके मनोहर रंग देखे हैं, वरन इसलिये भी कि वह उसका मीठा स्वाद जानता है; दूसरा, इससे सर्वथा अनजान, उससे केवल उसके सुन्दर रंगों के कारण प्रेम करता है: कई बातें किसी दृष्टि से दोनों में समान दिखाई देती हैं; दोनों प्रेम करते हैं, दोनों लालसा करते हैं, और दोनों आनन्दित होते हैं; परन्तु एक का प्रेम, लालसा और आनन्द दूसरे से सर्वथा भिन्न है। एक स्वाभाविक मनुष्य और एक आत्मिक मनुष्य के प्रेम में भी कुछ ऐसा ही अन्तर है; केवल यह ध्यान रखना होगा, कि एक दृष्टि से यह अन्तर कहीं अधिक बड़ा है, अर्थात यह कि आत्मिक विषयों में इन भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यक्तियों द्वारा जो उत्तमता देखी जाती है, वह अपने आप में उस भिन्नता से कहीं अधिक भिन्न है जो स्वादिष्ट फल में, स्वाद लेनेवाले और स्वादहीन मनुष्य द्वारा देखी गई भिन्न-भिन्न उत्तमता में है; और दूसरी दृष्टि से यह अन्तर उतना बड़ा न भी हो, अर्थात इसलिये कि आत्मिक मनुष्य में उस दिव्य और अत्यन्त विशिष्ट उत्तमता को केवल छोटे आरम्भ में और बहुत अपूर्ण मात्रा में ही परखने के लिये कोई आत्मिक इन्द्रिय या स्वाद हो सकता है।
2. दूसरी ओर यह देखना होगा, कि एक स्वाभाविक मनुष्य में भी वे धार्मिक प्रतीतियाँ और मनोभाव हो सकते हैं, जो अनेक दृष्टि से उसके लिये अत्यन्त नये और चकित करनेवाले हों, और जिनकी उसने पहले कभी कल्पना न की हो; और फिर भी जो वह अनुभव करता है, वह किसी नये स्वभाव के सिद्धान्त के प्रयोग, या किसी नई आत्मिक इन्द्रिय की अनुभूति के समान कुछ भी नहीं। उसके मनोभाव अत्यन्त नये हो सकते हैं, इसलिये कि उसके स्वाभाविक सिद्धान्त असाधारण रूप से एक बिलकुल नई मात्रा में, बहुत सी नई परिस्थितियों के साथ, स्वाभाविक मनोभावों के एक नये सहयोग के साथ, और विचारों की एक नई रचना के साथ हिला दिये गये हों; यह शैतान के किसी असाधारण शक्तिशाली प्रभाव और किसी बड़े भ्रम से हो सकता है; परन्तु उसमें स्वभाव के असाधारण रूप से क्रियाशील होने के सिवाय कुछ भी नहीं है। मानो कोई निर्धन मनुष्य, जो सदा एक झोंपड़ी में रहा हो, और जिसने अपने जन्म के अज्ञात गाँव के परे कभी दृष्टि न डाली हो, यदि किसी परिहास में उसे किसी भव्य नगर और राजकुमार के दरबार में ले जाया जाये, और वहाँ राजसी वस्त्र पहनाकर सिंहासन पर बिठा दिया जाये, उसके सिर पर राजमुकुट रखा जाये, सामन्त और कुलीन उसके सामने झुकें, और उसे यह विश्वास दिला दिया जाये कि अब वह एक तेजस्वी राजा है; तो जो विचार उसके मन में आयेंगे, और जो मनोभाव वह अनुभव करेगा, वे अनेक दृष्टि से अत्यन्त नये होंगे, ऐसे जिनकी उसने पहले कभी कल्पना तक न की थी; परन्तु यह सब स्वाभाविक सिद्धान्तों को असाधारण रूप से उभारने और जगाने, और उन्हीं विचारों को, जो उसके पास स्वभाव से हैं, नये ढंग से ऊँचा उठाने, बदलने और संयोजित करने के सिवाय कुछ भी नहीं; यहाँ उसे कोई नई इन्द्रिय दिये जाने जैसा कुछ भी नहीं है।
कुल मिलाकर, मेरी समझ में यह स्पष्ट प्रकट है, कि सारे सचमुच अनुग्रहमय मनोभाव पवित्र आत्मा के विशेष और विशिष्ट प्रभावों से उत्पन्न होते हैं, जो संतों के प्राणों में वह अनुभवगम्य प्रभाव या अनुभूति उत्पन्न करते हैं, जो उस हर बात से पूर्णतः भिन्न है जो किसी स्वाभाविक मनुष्य के लिये सम्भव है
I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो… अनुभव कर सके, वह केवल मात्रा और परिस्थिति में ही भिन्न नहीं, वरन अपने सम्पूर्ण स्वभाव में भिन्न है; यहाँ तक कि स्वाभाविक मनुष्य न केवल वह अनुभव नहीं कर सकता जो उसके साथ तत्त्वतः एक ही है, वरन उसके सिवाय कुछ भी अनुभव नहीं कर सकता जो अपने प्रकार में अत्यन्त भिन्न और उससे बहुत नीचे हो; और जिसके समान कुछ भी, या उसी स्वभाव की कोई भी वस्तु उत्पन्न करने की क्षमता मनुष्यों या दुष्टात्माओं की शक्ति में नहीं है।
मैंने इस विषय पर विस्तार से बल दिया है, क्योंकि इसका बड़ा महत्व और उपयोग है, ताकि झूठे धार्मिक मनोभावों के अनेक प्रकारों में शैतान के भ्रमों को स्पष्ट रूप से पहचाना और प्रमाणित किया जा सके, जिनसे असंख्य लोग भरमाये गये हैं, और सम्भवतः मसीही कलीसिया के सब युगों में भरमाये जाते रहे हैं; और परमेश्वर की आत्मा की क्रियाओं तथा सच्चे अनुग्रह के स्वभाव के विषय में अनेक सिद्धान्तों को सुनिश्चित और निर्धारित किया जा सके।
अब, इसलिये, इन बातों को इस प्रवचन के उद्देश्य पर लागू करते हैं।
इससे स्पष्ट होता है, कि जो प्रभाव कुछ लोगों ने अपनी कल्पना पर डाले हैं, या जो काल्पनिक विचार उन्हें परमेश्वर या मसीह, या स्वर्ग, या धर्म से सम्बन्धित किसी वस्तु के विषय में हैं, उनमें कुछ भी ऐसा नहीं जो आत्मिक हो, या सच्चे अनुग्रह के स्वभाव का हो। यद्यपि ऐसी बातें आत्मिक बातों के साथ हो सकती हैं, और उनके साथ मिली हुई हो सकती हैं, तौभी अपने आप में उनमें कुछ भी आत्मिक नहीं, और न ही वे अनुग्रहमय अनुभव का कोई भाग हैं।
यहाँ, साधारण लोगों के लाभ के लिये, मैं यह स्पष्ट करूँगा कि कल्पना पर प्रभावों और काल्पनिक विचारों से क्या अभिप्राय है। कल्पना मन की वह शक्ति है जिससे वह किसी बाह्य या बाहरी स्वभाव की वस्तुओं की (अर्थात ऐसी वस्तुओं की जो बाह्य इन्द्रियों के विषय हैं) प्रतीति या विचार कर सकता है, जब वे वस्तुएँ वहाँ उपस्थित न हों, और इन्द्रियों द्वारा अनुभव में न आ रही हों। इसे 'कल्पना' (अंग्रेज़ी में 'इमेजिनेशन', जो 'इमेज' अर्थात प्रतिबिम्ब शब्द से बना है) इसलिये कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा मनुष्य अपने मन में किसी बाह्य वस्तु का एक प्रतिबिम्ब बना सकता है, जबकि वह वस्तु वास्तव में वहाँ उपस्थित नहीं होती, और न ही उसके समान कुछ होता है। जिन सब वस्तुओं का हम अपनी पाँच बाह्य इन्द्रियों—देखने, सुनने, सूँघने, चखने और छूने—से अनुभव करते हैं, वे बाह्य वस्तुएँ हैं: और जब किसी मनुष्य के मन में इन प्रकार की किसी वस्तु का विचार या चित्र होता है, जबकि वे वहाँ उपस्थित नहीं हैं, और जब वह उन्हें सचमुच न देखता, न सुनता, न सूँघता, न चखता, और न छूता है; तो यही उनकी कल्पना करना है, और ये विचार काल्पनिक विचार कहलाते हैं: और जब इस प्रकार के विचार मन पर प्रबल रूप से अंकित हो जाते हैं, और मन में उनका चित्र इतना सजीव हो जाता है मानो कोई उन्हें सचमुच देख रहा हो, या सुन रहा हो, इत्यादि, तो उसे कल्पना पर प्रभाव कहा जाता है। इस प्रकार रंग और आकृतियाँ, और मुखाकृति, ये बाह्य वस्तुएँ हैं; क्योंकि ये उस प्रकार की वस्तुएँ हैं जो देखने की बाह्य इन्द्रिय का विषय हैं; और इसलिये जब किसी मनुष्य के मन में किसी आकृति, रंग, या मुखाकृति का सजीव विचार होता है; तो यही उन वस्तुओं की कल्पना करना है। इसी प्रकार यदि उसे उस प्रकार के उजाले या अन्धकार का विचार हो, जैसा वह देखने की इन्द्रिय से अनुभव करता है; तो यह बाह्य उजाले का विचार है, और इस प्रकार यह भी कल्पना है। इसी प्रकार यदि उसे कागज़ पर बने किसी चिह्न का, मान लीजिये किसी पुस्तक में लिखे अक्षरों और शब्दों का विचार हो; तो यह उस प्रकार की वस्तुओं का, जिन्हें हम कभी-कभी अपनी शारीरिक आँखों से देखते हैं, एक बाह्य और काल्पनिक विचार रखना है। और जब हमें उस प्रकार की वस्तुओं का विचार होता है जिन्हें हम किसी अन्य इन्द्रिय से अनुभव करते हैं, जैसे किसी ध्वनि या बोले गये शब्दों का;
I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो… यह केवल बाहरी वस्तुओं का विचार रखना है, अर्थात उस प्रकार की वस्तुओं का जो सुनने की बाह्य इन्द्रिय द्वारा अनुभव में आती हैं, और इसलिये यह भी कल्पना ही है: और जब ये विचार इतने सजीव रूप से अंकित हो जाते हैं मानो उन्हें सचमुच कानों से सुना जा रहा हो, तो यह कल्पना पर प्रभाव रखना है। और इसी प्रकार मैं आगे बढ़कर सूँघने, चखने और छूने की शेष तीन इन्द्रियों से सम्बन्धित वस्तुओं के विचारों का भी उदाहरण दे सकता हूँ।
बहुतों ने, जिन्हें ऐसी बातें हुई हैं, बड़ी अज्ञानता से यह मान लिया है कि ये आत्मिक प्रकाशनों के स्वभाव की हैं। किसी को किसी बाह्य आकृति और सुन्दर मुखाकृति के सजीव विचार हुए हैं; और वे इसे मसीह को आत्मिक रीति से देखना कहते हैं। किसी पर किसी बड़े बाहरी प्रकाश के विचार अंकित हुए हैं; और वे इसे परमेश्वर या मसीह की महिमा का आत्मिक प्रकाशन कहते हैं। किसी को मसीह के क्रूस पर लटकने, और उसके घावों से लहू बहने के विचार हुए हैं; और वे इसे क्रूस पर चढ़े मसीह का, और उसके लहू द्वारा उद्धार के मार्ग का आत्मिक दर्शन कहते हैं। किसी ने उसे अपनी बाँहें फैलाये, उन्हें गले लगाने को तैयार देखा है; और वे इसे मसीह के अनुग्रह और प्रेम की पर्याप्तता का प्रकाशन कहते हैं। किसी को स्वर्ग के, और वहाँ अपने सिंहासन पर बैठे मसीह के, और संतों तथा स्वर्गदूतों की चमकती पंक्तियों के सजीव विचार हुए हैं; और वे इसे अपने लिये खुला हुआ स्वर्ग देखना कहते हैं। किसी को समय-समय पर एक सुन्दर मुखाकृतिवाले व्यक्ति के, जो उन पर मुस्कुरा रहा हो, सजीव विचार हुए हैं; और वे इसे अपने प्राणों के लिये मसीह के प्रेम का आत्मिक प्रकाशन, और मसीह के प्रेम को चखना कहते हैं। और वे इसे इस बात का पर्याप्त प्रमाण मानते हैं कि ये बातें आत्मिक प्रकाशन हैं, और वे इन्हें आत्मिक रीति से देखते हैं, क्योंकि वे कहते हैं कि वे इन वस्तुओं को अपनी शारीरिक आँखों से नहीं, वरन अपने हृदय में देखते हैं; क्योंकि वे इन्हें अपनी आँखें बन्द करके भी देख सकते हैं। और इसी प्रकार, कुछ लोगों की कल्पना पर सुनने की इन्द्रिय के विचार अंकित हुए हैं; उन्हें शब्दों के विचार हुए हैं, मानो वे उनमें उतर गये हों, कभी-कभी वे पवित्रशास्त्र के शब्द होते हैं, और कभी-कभी अन्य शब्द: उन्हें मसीह द्वारा उन्हें शान्तिदायक शब्द कहे जाने के विचार हुए हैं।
इन बातों को वे मसीह का आन्तरिक बुलावा पाना, अपने हृदय में मसीह का शब्द आत्मिक रीति से सुनना, आत्मा की गवाही पाना, और मसीह के प्रेम की आन्तरिक साक्षी पाना इत्यादि कहते हैं।
साधारण और कम विचारशील तथा कम समझदार प्रकार के लोग इस भ्रम में सरलता से पड़ जाते हैं कि ये बातें आत्मिक हैं, क्योंकि आत्मिक वस्तुएँ अदृश्य होने के कारण, और ऐसी न होने के कारण जिन्हें उँगली से दिखाया जा सके, हम उनके विषय में बोलते समय लाक्षणिक शब्दों का प्रयोग करने, और बाह्य तथा इन्द्रियगोचर वस्तुओं से नाम उधार लेकर उनका द्योतन करने के लिये विवश हैं। इस प्रकार हम आत्मिक बातों की स्पष्ट प्रतीति को 'प्रकाश' के नाम से पुकारते हैं; और ऐसी या वैसी बातों की ऐसी प्रतीति रखने को उन्हें 'देखना' कहते हैं; और सुसमाचार में मसीह के वचन द्वारा बुद्धि का कायल होना, और इच्छा का मनाया जाना, हम मसीह का बुलावा 'आत्मिक रीति से सुनना' कहकर व्यक्त करते हैं: और पवित्रशास्त्र स्वयं ऐसे ही लाक्षणिक शब्दों से भरपूर है। लोग इन शब्दों को बार-बार प्रयोग होते सुनकर, और अपनी आँखें खुलने, और आत्मिक वस्तुओं का प्रकाशन पाने, और मसीह को उसकी महिमा में देखने, और आन्तरिक बुलावा पाने, तथा इसी प्रकार की अन्य बातों की आवश्यकता पर उन पर बल डाला जाना सुनकर, वे अज्ञानतावश उसी प्रकार के बाह्य प्रकाशनों और काल्पनिक दृश्यों की—जिनकी चर्चा (I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो…) ऊपर की गई है—प्रतीक्षा करते और उन्हें देखते हैं; और जब उन्हें ये मिल जाती हैं तो वे निश्चित हो जाते हैं, कि अब उनकी आँखें खुल गई हैं, अब मसीह ने अपने आप को उन पर प्रकट किया है, और वे उसकी सन्तान हैं; और इसी कारण वे अपने उद्धार और सुख से अत्यन्त प्रभावित और उल्लसित हो जाते हैं, और उनमें एक साथ अनेक प्रकार के मनोभाव प्रचण्ड रूप से हिलोरें लेने लगते हैं।
परन्तु यह अत्यन्त स्पष्ट है कि ऐसे विचारों में कुछ भी ऐसा नहीं जो आत्मिक और ईश्वरीय हो, उस अर्थ में जिसमें यह प्रमाणित किया जा चुका है कि सारे अनुग्रहमय अनुभव आत्मिक और ईश्वरीय हैं। ये बाह्य विचार किसी भी रीति से ऐसे नहीं हैं, कि वे पूर्णतः और अपने सम्पूर्ण स्वभाव में उस सब से भिन्न हों जो मनुष्यों को स्वभाव से प्राप्त है, अथवा पूर्णतः भिन्न और उस किसी अनुभूति से कहीं ऊपर हों जो मनुष्य को किसी स्वाभाविक इन्द्रिय या सिद्धान्त द्वारा प्राप्त हो सकती है, यहाँ तक कि उन्हें पाने के लिये मनुष्य को एक नई आत्मिक और ईश्वरीय इन्द्रिय दी जानी आवश्यक हो, ताकि वह उस प्रकार की कोई अनुभूति पा सके: इसके विपरीत, ये उसी प्रकार के विचार हैं जो हमें बाह्य इन्द्रियों से प्राप्त होते हैं, जो मानव-स्वभाव की कुछ निम्न शक्तियाँ हैं: ये केवल बाह्य वस्तुओं के विचार हैं, या उसी स्वभाव के, उसी बाहरी, इन्द्रियगोचर प्रकार के विचार हैं: मन की वही प्रकार की अनुभूतियाँ (मात्रा में नहीं, केवल परिस्थिति में भिन्न) जो हमें उन स्वाभाविक सिद्धान्तों से प्राप्त होती हैं जो हममें और पशुओं में समान हैं, अर्थात पाँच बाह्य इन्द्रियाँ। आत्मिक इन्द्रिय की यह एक निम्न और दयनीय धारणा है, यह मान लेना कि यह केवल उसी प्रकार के विचारों की कल्पना या संकल्पना है जो हमें अपनी पशु-सुलभ इन्द्रियों से प्राप्त होते हैं, जो इन्द्रियाँ पशुओं में भी उतनी ही पूर्णता से हैं जितनी हममें; यह मानो मसीह को, या प्राण में ईश्वरीय स्वभाव को, एक निरे पशु में बदल देना है। प्राण में, जैसा वह स्वभाव से है, बिना किसी नये सिद्धान्त के, इन सब बाह्य विचारों का विषय बनने की योग्यता रखने के लिये कुछ भी कमी नहीं है। एक स्वाभाविक मनुष्य आकृतियों, रंगों और ध्वनियों के अनुपस्थित होने पर भी उनका विचार, वरन सजीव विचार रखने की उतनी ही योग्यता रखता है जितनी एक पुनर्जन्म पाया हुआ मनुष्य रखता है: अतः उनमें कुछ भी अलौकिक नहीं है। और यह भरपूर अनुभव से ज्ञात है, कि मानव-स्वभाव का उन्नत या सिद्ध होना नहीं, वरन इसके विपरीत, शरीर और मन की दुर्बलता, और शरीर के रोग ही, लोगों को ऐसे सजीव और प्रबल काल्पनिक विचारों के लिये कहीं अधिक ग्रहणशील बनाते हैं।37
सच्चे आत्मिक अनुभूति के विषय में, न केवल उसका मन में आने का ढंग असाधारण है, वरन वह अनुभूति स्वयं भी उस सबसे पूर्णतः भिन्न है जो मनुष्यों को स्वाभाविक अवस्था में प्राप्त है, या हो सकती है, जैसा दिखाया जा चुका है। परन्तु इन बाह्य विचारों के विषय में, यद्यपि उनके मन में आने का ढंग कभी-कभी असामान्य होता है, तौभी वे विचार अपने आप में इससे कुछ बेहतर नहीं बन जाते; वे अब भी उससे किसी भिन्न प्रकार के नहीं हैं जो मनुष्यों को अपनी इन्द्रियों से प्राप्त होते हैं; वे 37 कल्पना की सनकें और तरंगें दुर्बल बुद्धिवाले मनुष्यों, बालकों, और जिनकी समझ बिगड़ी हुई है उनमें सबसे अधिक पाई जाती हैं; बुद्धि की दृढ़ता उन्हें वैसे ही दूर कर देती है जैसे सूर्य कुहरे और भाप को दूर कर देता है। परन्तु जो अनुग्रहमय व्यक्ति जितना अधिक बुद्धिमान होता है, वह उतना ही अधिक धर्म की नींव में स्थिर, दृढ़ और सन्तुष्ट होता है; वरन धर्म में सबसे उच्च और सबसे शुद्ध बुद्धि है; और जब मनुष्यों में यह परिवर्तन किया जाता है, तो वह बुद्धिसंगत रीति से किया जाता है। यशायाह 1:18, यूहन्ना 19:9।" फ्लेवल का 'प्रिपरेशन फॉर सफ़रिंग्स', अध्याय 6।
I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो… किसी उच्चतर प्रकार की, या तनिक भी बेहतर नहीं। उदाहरण के लिये, मसीह के क्रूस पर लटकने और अपना लहू बहाने का जो बाह्य विचार आज किसी मनुष्य को है, वह अपने आप में उस बाह्य विचार से बेहतर नहीं जो उसके शत्रु यहूदियों को था, जो उसके क्रूस के चारों ओर खड़े होकर इसे अपनी शारीरिक आँखों से देख रहे थे। परमेश्वर की बाह्य चमक और महिमा का जो काल्पनिक विचार आज मनुष्यों को है, वह उस विचार से बेहतर नहीं जो उस दुष्ट मण्डली को जंगल में सीनै पर्वत पर प्रभु की बाह्य महिमा का था, जब उन्होंने उसे अपनी शारीरिक आँखों से देखा था; और न ही उस विचार से बेहतर है जो न्याय के दिन लाखों शापित लोगों को मसीह की बाह्य महिमा का होगा, जो मसीह की उस बाह्य महिमा को, जो किसी मनुष्य की कल्पना में अब तक कल्पित से दस हज़ार गुना अधिक होगी, देखेंगे और उसका अत्यन्त सजीव विचार रखेंगे;38 वरन, मसीह का जो चित्र मनुष्य अपनी कल्पना में बनाते हैं, वह अपने स्वभाव में उस विचार से किसी भी प्रकार श्रेष्ठ नहीं जो पोपमती अपनी कलीसियाओं में देखी जानेवाली उसकी सुन्दर और भावपूर्ण मूर्तियों द्वारा मसीह के विषय में बनाते हैं (यद्यपि उनके यह विचार पाने का ढंग उतना बुरा न हो); और न ही जो मनोभाव उन्हें, यदि प्रमुखतः ऐसी कल्पनाओं पर आधारित हों, प्राप्त होते हैं, वे उन मनोभावों से बेहतर हैं जो अज्ञानी लोगों में उन मूर्तियों को देखकर उत्पन्न होते हैं, जो प्रायः बहुत प्रबल होते हैं; विशेषतः जब पुजारियों की चतुराई से ये मूर्तियाँ हिलने, बोलने, रोने, और इसी प्रकार की अन्य क्रियाएँ करती हुई बनाई जाती हैं।39 विचारों को पानेवाले व्यक्तियों का ढंग मात्र उन काल्पनिक विचारों के, जो पाये जाते हैं, स्वभाव को नहीं बदल देता; वे चाहे जिस ढंग से पाये जायें, वे तब भी केवल बाह्य विचार, या बाहरी रूप-रंग के विचार ही हैं, और इसलिये आत्मिक नहीं हैं। वरन, यदि मनुष्य परमप्रधान परमेश्वर की प्रत्यक्ष शक्ति से अपने मन में सचमुच ऐसे बाह्य विचार पायें भी, तो भी वे आत्मिक नहीं होंगे, वे परमेश्वर की आत्मा के एक सामान्य कार्य से अधिक कुछ नहीं होंगे; जैसा बिलाम के उदाहरण में वस्तुतः प्रकट है, जिसके मन पर परमेश्वर ने स्वयं एक स्पष्ट और सजीव
38 "यदि कोई मनुष्य मसीह को सचमुच और प्रत्यक्ष रीति से देखे और निहारे, तो भी यह उसका उद्धारक ज्ञान नहीं है।
मैं जानता हूँ कि संत मसीह को ऐसे जानते हैं मानो वह प्रत्यक्ष उपस्थित हो; वे उससे दूरी के कारण अजनबी नहीं हैं: यदि औरों ने उसे इससे भी अधिक प्रत्यक्ष रीति से देखा है, तो मैं इसका खण्डन नहीं करूँगा। परन्तु यदि उन्होंने प्रभु यीशु को उतनी ही प्रत्यक्षता से देखा है मानो वह यहीं पृथ्वी पर हो, तो भी कफरनहूम ने उसे उसी प्रकार देखा था; वरन उनमें से कुछ तो कुछ समय के लिये चेले थे, और उसके पीछे हो लिये थे, यूहन्ना
6। और फिर भी प्रभु उनकी आँखों से छिपा रहा। वरन, सारा संसार उसे उसकी महिमा में देखेगा, जो उन्हें चकित कर देगी; और फिर भी यह उस उद्धारक ज्ञान से बहुत कम है, जिसे प्रभु चुने हुए लोगों को प्रदान करता है। इसलिये यद्यपि तुम प्रभु को इतनी सचाई से देख लो, कि तुम उससे परिचित हो जाओ, तौभी, लूका 13:26: 'हे प्रभु, क्या हम ने तेरे साथ खाया-पीया नहीं?' इत्यादि—और इस प्रकार नष्ट हो जाओ।" शेपर्ड का 'दस कुँवारियों का दृष्टान्त', भाग 1, पृष्ठ 197, 198।
39 शैतान ज्योति के दूत का रूप धारण कर लेता है: और इसी कारण हमने सुना है कि किन्हीं ने शब्द सुने हैं; किन्हीं ने मसीह के लहू को अपने ऊपर टपकते और उसकी पसली के घावों को देखा है: किन्हीं ने कमरे में एक बड़ी ज्योति चमकते देखी है, किन्हीं को अपने स्वप्नों से अद्भुत रूप से प्रभावित किया गया है; किन्हीं को बड़े क्लेश में यह आन्तरिक साक्षी मिली है, 'तेरे पाप क्षमा हुए'; और इसी कारण ऐसी स्वतन्त्रता और आनन्द होता है, कि वे कमरे में उछलने-कूदने को तैयार हो जाते हैं। हे व्यभिचारी पीढ़ी! यह मनुष्यों में स्वाभाविक और साधारण बात है, वे यीशु को देखना चाहते हैं, और उसे अपने पास पाकर शान्ति चाहते हैं; और इसी कारण पोपमतियों के पास उसकी मूर्तियाँ हैं। हाय उन पर जिनके पास और कोई प्रकट
मसीह नहीं, केवल यही एक है।" शेपर्ड का 'दस कुँवारियों का दृष्टान्त', भाग 1, पृष्ठ 198।
I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो… यीशु मसीह का बाह्य निरूपण या विचार अंकित किया, अर्थात "याकूब में से उदय होनेवाला वह तारा, जब उसने परमेश्वर के वचन सुने, और परमप्रधान का ज्ञान जाना, और सर्वशक्तिमान का दर्शन पाया, मूर्छित होकर गिर पड़ा," गिनती 24:16, 17, तौभी उसे मसीह का किसी भी प्रकार का आत्मिक प्रकाशन नहीं हुआ; वह भोर का तारा उसके हृदय में आत्मिक रीति से कभी उदय नहीं हुआ, क्योंकि वह केवल एक स्वाभाविक मनुष्य था।
और जैसे इन बाह्य विचारों के स्वभाव में कुछ भी ईश्वरीय या आत्मिक नहीं है, और इनमें कुछ भी ऐसा नहीं जिसकी योग्यता स्वाभाविक मनुष्यों में, बिना किसी नये सिद्धान्त के, न हो; उसी प्रकार इनके स्वभाव में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसकी उत्पत्ति के लिये परमेश्वर की महिमामयी शक्ति के उस विशिष्ट, अनुपम और अद्वितीय प्रयोग की आवश्यकता हो, जो, जैसा दिखाया जा चुका है, सच्चे अनुग्रह की उत्पत्ति में है। इनके स्वभाव में शैतान की शक्ति से ऊपर कुछ भी प्रतीत नहीं होता।
निश्चय ही मनुष्यों के मन में विचार डालना शैतान की शक्ति से ऊपर नहीं है; क्योंकि अन्यथा वह उन्हें पाप के लिये परीक्षा में नहीं डाल सकता था। और यदि वह कुछ भी विचार या भाव डाल सकता है, तो निःसन्देह काल्पनिक विचार, या बाह्य वस्तुओं के विचार, उसकी शक्ति से ऊपर नहीं हैं;40 क्योंकि मनुष्यों में जो बाह्य विचार होते हैं वे सबसे निम्नतम प्रकार के विचार हैं। ये विचार केवल शरीर पर प्रभाव डालकर, प्राणिक आत्माओं को हिलाकर, और मस्तिष्क पर छाप छोड़कर उत्पन्न किये जा सकते हैं।—भरपूर अनुभव निश्चय ही यह दिखाता है, कि शरीर में परिवर्तन मन में काल्पनिक या बाह्य विचारों को जगा देते हैं; जैसा प्रायः तेज़ बुखार, विषाद, इत्यादि की दशा में होता है। ये बाह्य विचार प्राण के अधिक बौद्धिक कार्यों से उतने ही नीचे हैं, जितना शरीर मनुष्य का प्राण से कम आदरणीय भाग है।
और न केवल इन बाह्य विचारों या बाहरी रूप-रंग की कल्पनाओं के स्वभाव में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे हम यह अनुमान लगायें कि ये शैतान की शक्ति से ऊपर हैं; वरन यह भी निश्चित है कि शैतान ऐसे विचार उत्पन्न कर सकता है, और प्रायः उत्पन्न करता भी रहा है। ये वे बाह्य विचार थे जो उसने प्राचीनकाल के झूठे भविष्यद्वक्ताओं के स्वप्नों और दर्शनों में उत्पन्न किये, जो झूठ बोलनेवाली आत्माओं के प्रभाव में थे, जिनके विषय में हम पवित्रशास्त्र में प्रायः पढ़ते हैं, जैसे व्यवस्थाविवरण 13:1,
1 राजा 22:22, यशायाह 33:7, यहेजकेल 13:7। और ये वे बाह्य विचार थे जो उसने अन्यजाति पुजारियों, तांत्रिकों और टोन्हों के मनों में उनके दर्शनों और मोहाविष्ट अवस्थाओं में प्रायः उत्पन्न किये, और ये वे बाह्य विचार थे जो उसने मनुष्य यीशु मसीह के मन में उत्पन्न किये, जब उसने उसे संसार के सारे राज्य, उनकी महिमा के सहित, दिखाये, जबकि वे राज्य वस्तुतः दृष्टिगोचर नहीं थे।
और यदि शैतान या कोई भी सृजी हुई वस्तु मन पर बाहरी रूप अंकित करने की शक्ति रखती है, तो किसी भी विशेष प्रकार के बाहरी रूप को ईश्वरीय शक्ति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कल्पना में मनुष्य की आकृति को अंकित करने के लिये किसी अन्य वस्तु की आकृति की अपेक्षा अधिक सर्वशक्तिमान शक्ति की आवश्यकता नहीं है: मस्तिष्क में एक शारीरिक आकृति या रंग को दूसरे की अपेक्षा बनाने के लिये किसी उच्चतर प्रकार की शक्ति की आवश्यकता नहीं है: इसके लिये उतनी ही महिमामयी शक्ति चाहिये जितनी
40 "विचार करो कि यह कैसे कठिन, वरन असम्भव है कि यह निश्चित किया जाये कि ऐसा कोई शब्द, दर्शन, या प्रकाशन परमेश्वर की ओर से है, और यह कि शैतान उसका बहाना या नक़ल नहीं कर सकता: क्योंकि उसने ऐसा कोई निश्चित चिन्ह नहीं छोड़ा जिससे हम एक आत्मा को दूसरी से पहचान सकें।" फ्लेवल का 'मानसिक भयों के कारण और उपचार', कारण 14।
I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो… मनुष्य के शरीर के रूप को अंकित करने के लिये किसी लकड़ी के टुकड़े या डण्डे के रूप की अपेक्षा; चाहे वह अत्यन्त सुन्दर मानव-शरीर हो, जिसके मुख पर मधुर मुस्कान हो, या बाँहें फैली हों, या हाथों, पैरों और पसली से लहू बह रहा हो: जो शक्ति कल्पना में कालेपन या अन्धकार को अंकित कर सकती है, वह सफेदी और चमकती उजियाली को भी अंकित कर सकती है: जो शक्ति और कुशलता कागज़ या कैनवास के टुकड़े पर एक तिनके या लकड़ी के डण्डे को भली-भाँति और यथार्थतः चित्रित कर सकती है; वही प्रकार की शक्ति, सम्भवतः और अधिक निपुण होकर, मनुष्य के शरीर को बड़ी सुन्दरता और राजसी वैभव में, या सोने से मढ़ी हुई, चमक से भरी एक भव्य नगरी, और एक तेजस्वी सिंहासन, इत्यादि चित्रित करने के लिये पर्याप्त होगी। इसलिये मस्तिष्क में इनमें से एक को दूसरे की अपेक्षा चित्रित करने के लिये उसी प्रकार की शक्ति से अधिक कुछ भी आवश्यक नहीं। जो शक्ति कागज़ पर स्याही लगा सकती है, वही सोने का वर्क भी लगा सकती है। इसलिये यह प्रमाण के रूप में स्पष्ट है, कि यदि हम मान लें कि कल्पना पर किसी भी प्रकार का बाह्य निरूपण उत्पन्न करना शैतान की शक्ति में है (जैसा निःसन्देह है, और जिसने भी यह विश्वास किया है कि कोई शैतान है जिसका मानवजाति के साथ कोई सम्बन्ध है, उसने इसे कभी संदिग्ध नहीं माना): मैं कहता हूँ, यदि ऐसा है, तो यह प्रमाणतः स्पष्ट है, कि एक सृजी हुई शक्ति मन में सब प्रकार के बाहरी रूप-रंगों और विचारों तक फैल सकती है। इससे फिर स्पष्ट होता है, कि ऐसी किसी भी बात में कुछ भी ऐसा नहीं है जो आत्मिक, अलौकिक, और ईश्वरीय हो, उस अर्थ में जिसमें यह प्रमाणित किया जा चुका है कि सारे सच्चे अनुग्रहमय अनुभवों में है। और यद्यपि मनुष्य की बनावट और स्वभाव के कारण, बाह्य विचार साधारणतः कुछ मात्रा में आत्मिक अनुभवों के साथ होते हैं, तौभी ये विचार उनके आत्मिक अनुभव का कोई भाग नहीं हैं, उतना ही नहीं जितना अनुभवों के साथ होनेवाला रक्त-संचार और नाड़ी की धड़कन आत्मिक अनुभव का भाग है। और यद्यपि निःसन्देह, मनुष्यों की वर्तमान अवस्था की दुर्बलता के कारण, और विशेषतः कुछ व्यक्तियों की दुर्बल शारीरिक बनावट के कारण, अत्यन्त प्रबल अनुग्रहमय मनोभाव कल्पना में सजीव विचार उत्पन्न कर देते हैं; तौभी यह भी निश्चित है, कि जब व्यक्तियों के मनोभाव कल्पनाओं पर आधारित होते हैं, जैसा प्रायः होता है, तो वे मनोभाव केवल स्वाभाविक और साधारण होते हैं, क्योंकि वे एक ऐसी नींव पर बने हैं जो आत्मिक नहीं है; और इसलिये वे अनुग्रहमय मनोभावों से पूर्णतः भिन्न हैं, जो, जैसा प्रमाणित किया जा चुका है, सर्वदा उन क्रियाओं से उत्पन्न होते हैं जो आत्मिक और ईश्वरीय हैं।
ये कल्पनाएँ प्रायः मनुष्यों के शारीरिक मनोभावों को अत्यन्त ऊँचाई तक उभार देती हैं:41 और इसमें कोई अचम्भा नहीं, जब इनके भोगनेवालों में एक अज्ञानी, परन्तु असंदिग्ध
41 श्रीमान जॉन स्मिथ का, अपने संकलित प्रवचनों के 'फरीसी धार्मिकता की क्षणभंगुरता' नामक प्रवचन में, पृष्ठ 370, 371 पर, एक उल्लेखनीय अंश है, जिसमें वे उस प्रकार के धर्म का वर्णन करते हैं जो उसी नींव पर बना है जिसकी मैं यहाँ चर्चा कर रहा हूँ। मैं उसे पूरा उद्धृत किये बिना नहीं रह सकता। एक ऐसे प्रकार के मसीहियों की बात करते हुए, जिनका जीवन कल्पना की प्रबल ऊर्जा के सिवाय कुछ भी नहीं, वे कहते हैं: "ऐसा न हो कि उनका धर्म बहुत खुले रूप से एक कला की रचना मात्र प्रकट हो जाये, इसलिये कभी-कभी उनके भीतर ऐसी असाधारण हलचलें उठाई जा सकती हैं, जो उनके अपने सारे विचारों को दबा दें, ताकि वे ईश्वरीय जीवन का सच्चा कार्य प्रतीत हों; जबकि यह सब उनके अपने आत्म-प्रेम की ऊर्जा के सिवाय कुछ भी नहीं, जो ईश्वरीय बातों की किन्हीं शारीरिक प्रतीतियों से छू लिया गया और उभारा गया है। हमारे मसीही धर्म में ऐसी बातें हैं, जिन्हें जब कोई शारीरिक, अपवित्र मन अपनी गद्दी पर बिठाकर उनका वर्णन करने लगता है, तो वे मनुष्यों की शारीरिक अभिलाषाओं को अत्यन्त सुखद प्रतीत हो सकती हैं; सेंत-मेंत के अनुग्रह और धर्मी ठहराये जाने के कुछ सिद्धान्त और धारणाएँ, परमेश्वर के पुत्रों और स्वर्ग के वारिसों की भव्य उपाधियाँ, जो सदा प्रवाहित होती
I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो… इस विश्वास से रहती हैं, कि ये ईश्वरीय प्रकाशन हैं, जिन्हें महान यहोवा स्वयं प्रत्यक्ष रीति से उनके प्राणों पर करता है, जिनमें वह उन्हें अपने उच्च और विशिष्ट अनुग्रह की असाधारण रीति से साक्षी देता है। आनन्द और सुख की वे धाराएँ जिनमें धन्य प्राण अनन्तकाल तैरते रहेंगे, आनेवाले संसार में एक तेजस्वी स्वर्गलोक जो सदा सुगन्धित और मनोहर सुन्दरताओं से उमड़ता रहेगा, सोने से मढ़ा और तारों से जड़ा हुआ एक नया यरूशलेम, जिसके विशाल घेरे में इतनी अनगिनत विविधताएँ समाई हुई हैं, कि एक व्यस्त जिज्ञासा अनन्तकाल तक उसमें अपने को व्यय कर सकती है। मुझे सन्देह नहीं कि कभी-कभी सबसे अधिक शारीरिक और सांसारिक मनुष्य भी, जो अपनी महत्वाकांक्षा में इस संसार के ठाट-बाट की ओर उड़ते हैं, इन बातों की कल्पनाओं से इतने मोहित हो सकते हैं, कि वे आनेवाले संसार की शक्तियों में सहभागी बना दिये गये प्रतीत हों। मुझे सन्देह नहीं कि वे इनसे बहुत उन्नत हो सकते हैं, जैसे कभी-कभी उन्मत्त या विक्षिप्त व्यक्तियों के प्राण प्रतीत होते हैं, जब उनकी कल्पनाएँ उन तीव्र और चंचल आत्माओं के साथ खेलती हैं, जिन्हें शरीर की एक रोगग्रस्त बनावट और सिर में अस्वाभाविक गर्मी उनमें उत्पन्न कर देती है। इस प्रकार ये चमकते हुए धूमकेतु चन्द्रमा से भी ऊपर उठ सकते हैं, और सूर्य से भी ऊँचे चढ़ सकते हैं, जो फिर भी, क्योंकि उनमें अपनी कोई ठोस स्थिरता नहीं, और वे एक निकृष्ट और सांसारिक धातु के बने हैं, शीघ्र ही लुप्त होकर फिर गिर जायेंगे, क्योंकि वे केवल किसी बाहरी बल से ही ऊपर उठाये गये थे। वे स्वयं को उन आदरणीय मसीहियों से भी ऊँचा पहुँचा हुआ मान सकते हैं, जो सच्ची भलाई के स्वाभाविक बल से धीरे-धीरे प्रेरित होते हैं: वे स्वयं को उनसे अधिक 'प्लेनियोरेस डेओ' (अर्थात परमेश्वर से अधिक भरपूर) प्रतीत करा सकते हैं, जो वस्तुतः दिव्य आत्मा से प्रबुद्ध और प्रेरित हैं, और स्वर्ग की ओर के मार्ग में स्थिरता और निरन्तरता से आगे बढ़ते रहते हैं। जैसे पथरीली भूमि में बोया गया बीज, अच्छी और उपजाऊ भूमि में बोये गये बीज से भी तेज़ी से उगकर अपनी कोंपल फैलाता है। और जैसे हमारी इन्द्रियों, कल्पना और वासनाओं की हलचलें, जब तक हमारे प्राण इस नश्वर अवस्था में हैं और शरीर में गहरे धँसे हुए हैं, प्रायः प्राण की उन उच्चतर शक्तियों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रबल होती हैं, और हम पर अधिक गहरी छाप छोड़ती हैं, जो शक्तियाँ अधिक सूक्ष्म और इन मिश्रित पशु-सुलभ अनुभूतियों से दूर हैं: वहाँ स्थित भक्ति में उस भक्ति से अधिक ऊर्जा और जीवन प्रतीत हो सकता है, जो धीरे-धीरे और अधिक सूक्ष्म स्पर्श से समझ पर फैलती है, और वहाँ से हमारी इच्छा और मनोभावों में धीमे-धीमे व्याप्त होती है। परन्तु यद्यपि पहली कुछ समय के लिये अधिक उग्र हो सकती है, तौभी दूसरी अधिक स्थिर, मूलभूत और फलती-फूलती प्रकृति की है।
क्योंकि वह भक्ति, जो वास्तव में परमेश्वर और सच्चे सुख की केवल एक इन्द्रियगत और शारीरिक प्रतीति से उत्पन्न होती है, स्वभाव से क्षणिक और म्लान होनेवाली है, और ज्यों-ज्यों इन्द्रियगत शक्तियाँ और सामर्थ्य निर्बल पड़ती जाती हैं, या ईश्वरीय ज्योति का सूर्य हम पर अधिक चमकीली रीति से चमकने लगता है, त्यों-त्यों ये सांसारिक भक्तियाँ, हमारी रसोई की आग की भाँति, अपनी उष्णता और उत्साह को घटा देती हैं। परन्तु सच्ची स्वर्गीय ऊष्मा कभी नहीं बुझती, क्योंकि वह अमर स्वभाव की है; और मनुष्यों के प्राणों में एक बार सजीव रूप से बस जाने पर, वह उसकी सारी हलचलों को उचित रीति से नियंत्रित और व्यवस्थित करती है, जैसे जीवित प्राणियों के हृदयों में जड़ जमाई हुई स्वाभाविक ऊष्णता सारे शरीर पर अपना अधिकार और व्यवस्था रखती है।
सच्चा धर्म किसी कारीगरी की रचना नहीं है, न यह हमारी कल्पना-शक्तियों का उबाल है, न वासना की धधकती गर्मी, यद्यपि इन्हें प्रायः ही धर्म समझ लिया जाता है, जब हम धर्म के अपने छल-कपट में अपनी ही आँखों के आगे धुंध डाल देते हैं: परन्तु यह मनुष्यों के प्राणों को गढ़नेवाला एक नया स्वभाव है; यह आत्मा की एक ईश्वर-सदृश बनावट है, जो सबसे अधिक शान्त और स्वच्छ मनों में, गहरी दीनता में, नम्रता में, आत्म-त्याग में, परमेश्वर और सारी सच्ची भलाई के प्रति सार्वभौमिक प्रेम में, बिना पक्षपात के, और बिना पाखण्ड के प्रकट होती है, जिसके द्वारा हमें परमेश्वर को जानना, और उसे जानकर उससे प्रेम करना, और जितना सम्भव हो उस सम्पूर्ण सिद्धता के अनुरूप अपने आप को ढालना सिखाया जाता है, जो उसमें चमकती है।
I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो… फिर, जो कुछ अनुग्रहमय क्रियाओं और हृदय में उनके प्रभावों के आत्मिक, अलौकिक और ईश्वरीय होने के ढंग के विषय में देखा और प्रमाणित किया गया है, उससे यह स्पष्ट है, कि मन में पवित्रशास्त्र के शब्दों का प्रत्यक्ष रूप से आ जाना, अपने आप में कुछ भी आत्मिक नहीं है।
इस विषय में मैं पहले भी कुछ कह चुका हूँ; और जो कहा जा चुका है वह इसे सिद्ध करने के लिये पर्याप्त हो सकता है; परन्तु यदि पाठक आत्मिक प्रभावों और परिणामों के स्वभाव के विषय में कही गई बातों को स्मरण रखे, तो यह और भी स्पष्ट प्रकट होगा कि यह कोई आत्मिक परिणाम नहीं है। क्योंकि मुझे नहीं लगता कि साधारण समझवाला कोई भी व्यक्ति यह कहेगा या समझेगा कि मन में शब्दों का लाया जाना (चाहे वे जो भी शब्द हों) उस स्वभाव का परिणाम है, जिसका विषय एक स्वाभाविक मनुष्य का मन, जब तक वह स्वाभाविक अवस्था में रहता है, बनना असम्भव है, या उसके समान कुछ भी असम्भव है; या कि इसके लिये प्राण में किसी नई ईश्वरीय इन्द्रिय की आवश्यकता है; या कि मन में ध्वनियों या अक्षरों का लाया जाना इतने उच्च, पवित्र और उत्तम स्वभाव का परिणाम है, कि किसी भी सृजी हुई शक्ति का इसका कारण होना असम्भव है।
क्योंकि मन में पवित्रशास्त्र के शब्दों का लाया जाना केवल मन में कुछ ध्वनियों या अक्षरों के विचार जगाना है; इसलिये यह कल्पना में विचार जगाने का केवल एक ढंग है; क्योंकि ध्वनियाँ और अक्षर बाह्य वस्तुएँ हैं, जो देखने और सुनने की बाह्य इन्द्रियों के विषय हैं। कागज़ पर बने कुछ चिन्हों के विचार, जैसे किन्हीं चौबीस अक्षरों के, किसी भी क्रम में, या स्वर की किन्हीं ध्वनियों के विचार, उतने ही बाह्य विचार हैं, जितने किसी अन्य आकृति या ध्वनि के हो सकते हैं; और इसलिये, इन बाह्य विचारों के विषय में जो पहले कहा जा चुका है, उससे स्पष्ट है कि इनमें कुछ भी आत्मिक नहीं है; और यदि कभी परमेश्वर की आत्मा मन में ये अक्षर या ध्वनियाँ लाती भी है, तो यह उस आत्मा का एक सामान्य प्रभाव है, न कि कोई विशेष या अनुग्रहमय प्रभाव। और इसलिये जो पहले प्रमाणित किया जा चुका है उससे यह निकलता है, कि जिन मनोभावों की नींव यह प्रभाव है, वे आत्मिक या अनुग्रहमय मनोभाव नहीं हैं।
परन्तु ध्यान रहे कि मैं क्या कह रहा हूँ, अर्थात, जब यह प्रभाव—अर्थात पवित्रशास्त्र के शब्दों का मन में प्रत्यक्ष और असाधारण ढंग से आना—ही वह वस्तु है जो मनोभावों को जगाती है, और ठीक-ठीक उनकी नींव है, तो ऐसे मनोभाव आत्मिक नहीं हैं। ऐसा हो सकता है, कि व्यक्तियों को अपने मन में आनेवाले पवित्रशास्त्र के वचनों के साथ अनुग्रहमय मनोभाव हों, और परमेश्वर की आत्मा उन वचनों का उपयोग उन्हें जगाने के लिये करे; जब उन्हें उन वचनों में निहित ईश्वरीय और उत्तम बातों का कोई आत्मिक बोध, स्वाद या रस प्राप्त होता है, जो उनके मनोभावों को जगानेवाली वस्तु है, न कि शब्दों के उनके मन में असाधारण और अचानक लाये जाने का ढंग। वे उस शिक्षा से प्रभावित होते हैं जो उन्हें शब्दों से मिलती है, और परमेश्वर या मसीह की महिमामयी बातों के, तथा उनसे सम्बन्धित उन बातों के दर्शन से, जो वे धारण किये और सिखाते हैं; न कि इसलिये कि शब्द अचानक आ गये, मानो किसी व्यक्ति ने उन्हें कहा हो, और इसलिये यह निष्कर्ष निकालते हुए कि परमेश्वर ने मानो उनसे प्रत्यक्ष रीति से बात की। व्यक्ति प्रायः इसी नींव पर अत्यन्त प्रभावित होते हैं; पवित्रशास्त्र की कुछ बड़ी और उच्च प्रतिज्ञाओं के शब्द अचानक उनके मन में आ जाते हैं, और वे उन शब्दों को परमेश्वर द्वारा प्रत्यक्ष रीति से उनकी ओर निर्देशित मानते हैं, (I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो…) मानो वे शब्द उसी क्षण परमेश्वर के मुख से निकलकर उनसे कहे गये हों: इस प्रकार वे इसे परमेश्वर की ओर से एक वाणी मानते हैं, जो उन्हें प्रत्यक्ष रीति से उनकी सुखी परिस्थिति प्रकट करती है, और उन्हें ऐसी-ऐसी बड़ी बातों की प्रतिज्ञा देती है: और यही वह है जो उन्हें प्रभावित और उन्नत करता है। पवित्रशास्त्र में निहित ईश्वरीय बातों की कोई निकट आत्मिक समझ, या बाइबल के उस भाग में सिखाई गई महिमामयी बातों का कोई नया आत्मिक बोध, उनके मनोभाव से पहले नहीं होता, और उसकी नींव नहीं बनता। जो नई समझ वे छोड़ते हैं, या समझते हैं कि उन्हें है, और जिसे वे अपने मनोभाव की नींव मानते हैं, वह केवल यह है, कि शब्द उनसे कहे गये हैं, क्योंकि वे इतने अचानक और असाधारण रीति से आये। और इस प्रकार यह मनोभाव पूरी तरह बालू पर बना है! क्योंकि यह एक ऐसे निष्कर्ष पर बना है जिसका उनके पास कोई आधार नहीं।
क्योंकि, जैसा दिखाया जा चुका है, शब्दों का अचानक मन में आ जाना इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि इस ढंग से उन्हें मन में लाया जाना परमेश्वर की ओर से था। और यदि यह सच भी होता कि परमेश्वर ने शब्दों को उनके मन में लाया, और वे इसे निश्चय जानते, तो भी यह आत्मिक ज्ञान न होता; यह बिना किसी आत्मिक बोध के भी हो सकता है: बिलाम शायद यह जानता हो कि जो शब्द परमेश्वर ने उसके मन में डाले, वे सचमुच परमेश्वर द्वारा ही उसके मन में डाले गये थे, और फिर भी उसे कोई आत्मिक ज्ञान न रहा हो। इसलिये जो मनोभाव इस धारणा पर बने हैं, कि पवित्रशास्त्र के वचन उन्हें परमेश्वर की ओर से प्रत्यक्ष भेजे गये हैं, वे किसी आत्मिक नींव पर बने नहीं हैं, और व्यर्थ तथा भ्रामक हैं। जिन व्यक्तियों के मनोभाव इस प्रकार उभारे गये हैं, यदि उनसे पूछा जाये कि क्या उन्हें उन वचनों में निहित उत्तमता का कोई नया बोध है, तो वे शायद बिना हिचक हाँ ही कहेंगे: परन्तु यह इसके सिवाय और कुछ सच नहीं, कि उन्होंने यह धारणा अपना ली है कि वचन उनसे प्रत्यक्ष रीति से कहे गये हैं, जिससे वे उन्हें मीठे प्रतीत होते हैं, और वे उन बातों को, जो ये वचन उनसे कहते हैं, उत्तम और अद्भुत बातें मान लेते हैं। उदाहरण के लिये मान लीजिये ये शब्द उनके मन में अचानक आये, 'मत डर, तेरे पिता को यह अच्छा लगा है कि वह तुझे राज्य दे'; वे विश्वासपूर्वक यह धारणा अपना लेते हैं कि ये शब्द मानो स्वर्ग से प्रत्यक्ष रीति से उनसे कहे गये हैं, मानो यह एक प्रत्यक्ष प्रकाशन हो कि परमेश्वर उनका पिता है, और उसने राज्य उन्हें दे दिया है, वे इससे बहुत प्रभावित होते हैं, और वचन उन्हें मीठे प्रतीत होते हैं; और, ओह, वे कहते हैं, "इन वचनों में कैसी उत्तम बातें निहित हैं!"
परन्तु प्रतिज्ञा उन्हें उत्तम इसलिये प्रतीत होती है, केवल इसलिये कि वे सोचते हैं कि यह प्रत्यक्ष रीति से उनसे की गई है; उन्हें इसमें जो भी महिमा का बोध है, वह केवल आत्म-प्रेम से, और वचनों में अपने कल्पित हिस्से से उत्पन्न होता है; न कि इसलिये कि उन्हें स्वर्गराज्य के पवित्र और महिमामय स्वभाव का, और उस देनेवाले परमेश्वर की आत्मिक महिमा का, और पापी मनुष्यों के प्रति उसके उत्तम अनुग्रह का, जिससे वह अपनी ही इच्छा से, उनके इन बातों में कल्पित हिस्से के होने से पहले ही, यह राज्य उन्हें प्रस्तुत और प्रदान करता है, कोई दर्शन या बोध हुआ हो, जो उनसे प्रभावित होने और उनके मनोभाव तथा उनमें हिस्सा होने की आशा की नींव बना हो। इसके विपरीत, वे पहले यह कल्पना कर लेते हैं कि उनका इसमें हिस्सा है, और फिर उससे बहुत प्रभावित होते हैं, और तब उन बातों को उत्तम मान लेते हैं। इसलिये पवित्रशास्त्र का उनके मन में अचानक और असाधारण रीति से आना ही स्पष्टतः इस सारे की पहली नींव है; जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वे किस दयनीय भ्रम में हैं।
I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो… बहुतों का पहला शान्तिदायक अनुभव, जिसे वे अपना मन-फिराव कहते हैं, इस प्रकार होता है: जागृति और भय के पश्चात, पवित्रशास्त्र की कोई शान्तिदायक मीठी प्रतिज्ञा उनके मन में अचानक और अद्भुत रीति से आ जाती है; और उसके आने का ढंग उन्हें यह निष्कर्ष निकालने पर विवश करता है कि यह परमेश्वर की ओर से उनके पास आई है; और यही वह बात है जो उनके विश्वास, आशा और शान्ति की सम्पूर्ण नींव है: इसी से वे परमेश्वर और मसीह पर भरोसा रखने के लिये अपना पहला प्रोत्साहन पाते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि परमेश्वर ने, इस प्रकार लाये गये किसी पवित्रशास्त्र द्वारा, अब उन्हें प्रकट कर दिया है कि वह उनसे प्रेम करता है, और उसने उन्हें अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा दे दी है, जो अत्यन्त अनुचित है; क्योंकि धर्म के सिद्धान्तों का साधारण ज्ञान रखनेवाला हर कोई जानता है, कि परमेश्वर की रीति यह है कि वह अपना प्रेम मनुष्यों पर, और प्रतिज्ञाओं में उनके हिस्से को, उनके विश्वास करने के बाद प्रकट करता है, न कि पहले, क्योंकि प्रतिज्ञाओं के प्रकट किये जाने में उनका कोई हिस्सा होने से पहले उन्हें पहले विश्वास करना ही होगा। परमेश्वर की आत्मा सत्य की आत्मा है, झूठ की नहीं: वह मनुष्यों के मनों में पवित्रशास्त्र इसलिये नहीं लाता कि उन्हें यह प्रकट करे कि परमेश्वर के अनुग्रह और प्रतिज्ञाओं में उनका हिस्सा है, जबकि उनका कोई हिस्सा नहीं है, क्योंकि वे अभी विश्वास ही नहीं लाये हैं: ऐसा ही होता, यदि परमेश्वर का मनुष्यों के मनों में पवित्रशास्त्र के वचन लाना, उन्हें यह प्रकट करने के लिये कि उनके पाप क्षमा हो गये हैं, या यह कि परमेश्वर को यह भाया कि वह उन्हें राज्य दे, या इसी प्रकार की कोई और बात, उनके पहले विश्वास से पहले होता, और उसकी नींव बनता। अनुग्रह की वाचा की कोई भी प्रतिज्ञा किसी भी मनुष्य की तब तक नहीं है, जब तक वह पहले मसीह पर विश्वास न कर ले; क्योंकि केवल विश्वास ही के द्वारा हमारा मसीह में, और उसमें बनी नई वाचा की प्रतिज्ञाओं में, हिस्सा होता है: और इसलिये जो भी आत्मा उस वाचा की प्रतिज्ञाओं को किसी ऐसे व्यक्ति पर, जिसने पहले विश्वास नहीं किया, यह मानकर लागू करती है कि वे पहले से ही उसकी हैं, वह अवश्य ही एक झूठ बोलनेवाली आत्मा है, और जो विश्वास प्रतिज्ञाओं के ऐसे प्रयोग पर पहले-पहल बना है, वह एक झूठ पर बना है। परमेश्वर की रीति यह नहीं कि वह मनुष्यों को उनके भरोसे का विश्वास मिलने से पहले ही उसके प्रेम का, और यह कि वे सुखी होंगे, निश्चय दिलाने के लिये शान्तिदायक पवित्रशास्त्र के वचन लाये।42 और यदि जो पवित्रशास्त्र किसी व्यक्ति के मन में आता है, वह ठीक-ठीक एक 42 श्रीमान स्टॉडर्ड अपनी पुस्तक 'गाइड टू क्राइस्ट' के पृष्ठ 8 पर कहते हैं, कि "कभी-कभी मनुष्यों को, कुछ समय क्लेश में रहने के बाद, कुछ प्रतिज्ञाएँ बड़ी शान्ति के साथ मिलती हैं; और वे आशा करते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें ग्रहण कर लिया है": और कहते हैं कि, "इस दशा में, उपदेशक उन्हें बता सकता है, कि परमेश्वर कभी भी निश्चय का विश्वास देने से पहले भरोसे का विश्वास देता है; क्योंकि वह अपना प्रेम तब तक प्रकट नहीं करता जब तक मनुष्य अनुग्रह और मेल-मिलाप की अवस्था में नहीं आ जाते, जो भरोसे के विश्वास द्वारा होती है। जब मनुष्यों को शान्तिदायक पवित्रशास्त्र मिलते हैं, तो वे उन्हें परमेश्वर के प्रेम के चिन्ह मानने लगते हैं: परन्तु मनुष्यों को ऐसे प्रकाशनों के योग्य होने से पहले, सुसमाचार के प्रस्ताव को स्वीकार करके मसीह में लाया जाना आवश्यक है। परमेश्वर की रीति पहले प्राण को अनुग्रह के प्रस्तावों को स्वीकार कराना है, और फिर उस पर अपनी अच्छी दशा प्रकट करना है।" और पृष्ठ 76 पर, उनके विषय में बोलते हुए "जो परमेश्वर के चरणों में पड़े हुए प्रतीत होते हैं, और मसीह के साथ अपने मेल का, और यह कि परमेश्वर ने उन पर मसीह को प्रकट किया है, और उनके हृदयों को उसकी ओर खींचा है, और वे मसीह को ग्रहण करते हैं, इसका वर्णन करते हैं," वे कहते हैं: "इस दशा में, यह जाँचना सबसे अच्छा है कि जो ज्योति उसे दी गई, उसके द्वारा उसने मसीह और उद्धार को अपने लिये प्रस्तावित देखा, या उसने यह देखा कि परमेश्वर उससे प्रेम करता है, या उसे क्षमा कर चुका है: क्योंकि अनुग्रह का प्रस्ताव और हमारा उसे ग्रहण करना क्षमा से पहले होता है, और इसलिये उसके ज्ञान से तो और भी पहले।" श्रीमान शेपर्ड अपने 'दस कुँवारियों के दृष्टान्त', भाग 2, पृष्ठ 15 पर कहते हैं, कि "अनुग्रह और मसीह का प्रेम (सूर्य के नीचे के सबसे सुन्दर रंग) बनावटी हो सकते हैं; परन्तु यदि तुम इस रूप में यह ग्रहण करो कि परमेश्वर पहले एक निरपेक्ष प्रतिज्ञा द्वारा अपने प्रेम की गवाही देता है, तो वहाँ सावधान रहो; क्योंकि इस रूप में तुम, (I. जो मनोभाव सचमुच आत्मिक और अनुग्रहमय हैं, वे उन बातों से उत्पन्न होते हैं जो…) प्रतिज्ञा को, एक आमन्त्रण के रूप में ग्रहण कर सकते हो; तौभी यदि वह आमन्त्रणों के अपने मन में आने के अचानक या असामान्य ढंग को ही वह आधार बना ले जिस पर वह विश्वास करता है कि उसे आमन्त्रित किया गया है, तो यह सच्चा विश्वास नहीं; क्योंकि यह उस पर बना है जो विश्वास का सच्चा आधार नहीं है। सच्चा विश्वास किसी अनिश्चित नींव पर नहीं बना होता: परन्तु यह निर्णय, कि ऐसे किसी विशेष अंश के शब्द परमेश्वर की प्रत्यक्ष शक्ति से, ऐसे किसी समय, मन में इस रीति से डाले गये मानो उस समय परमेश्वर ने उसे कहे और उसकी ओर निर्देशित किये, केवल इसलिये कि शब्द इस ढंग से आये, पूर्णतः एक अनिश्चित और असुरक्षित निर्णय है, जैसा अब दिखाया जा चुका है; और इसलिये विश्वास के लिये एक झूठा और बालू का आधार है; और तदनुसार जो विश्वास इस पर बना है वह झूठा है। किसी भी व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का एकमात्र निश्चित आधार, कि उसे सुसमाचार के आशीषों में भाग लेने का आमन्त्रण है, यह है, कि परमेश्वर का वचन घोषित करता है कि जो व्यक्ति उसके समान योग्यतावाले हैं, वे आमन्त्रित हैं, और जो परमेश्वर इसे घोषित करता है, वह सत्य है, और झूठ नहीं बोल सकता। यदि कोई पापी एक बार परमेश्वर की सत्यता का, और यह कि पवित्रशास्त्र उसका वचन है, निश्चय कर ले, तो उसे यह विश्वास दिलाने और सन्तुष्ट करने के लिये और कुछ नहीं चाहिये कि वह आमन्त्रित है; क्योंकि पवित्रशास्त्र पापियों के लिये, वरन पापियों में से बड़े से बड़े पापी के लिये भी, सुसमाचार के आशीषों में भाग लेने आने के आमन्त्रणों से भरपूर है; उसे परमेश्वर की ओर से किसी और वाणी की आवश्यकता न रहेगी; जो उसने पहले ही कह दिया है वही उसके लिये पर्याप्त होगा।
जिस प्रकार बहुत से लोगों के पहले सुख का, और उनके तथाकथित मन फिराव के समय के उनके मनोभावों का आधार ऐसी ही बातों पर होता है जिनका उल्लेख किया जा चुका है; वैसे ही समय-समय पर बाद में भी उनके आनन्द, आशाएँ और अन्य मनोभाव इन्हीं बातों पर आधारित होते हैं। उन्हें अक्सर पवित्रशास्त्र के विशेष वचन, मीठी घोषणाएँ और प्रतिज्ञाएँ सुझाई जाती हैं, जो उनके आने के ढंग के कारण, वे यह सोचते हैं कि उस समय परमेश्वर की ओर से सीधे उन्हें भेजी गई हैं, और जिन्हें वे उन्हें ग्रहण करने का अपना अधिकार-पत्र मानते हैं, और जिन्हें वे वास्तव में अपने ऊपर लागू करने का, उनमें सुख पाने का, और उनसे मिलनेवाले भरोसे का मुख्य आधार बना लेते हैं। इस प्रकार वे यह कल्पना करते हैं कि परमेश्वर और उनके बीच मानो एक प्रकार की बातचीत चल रही है; और यह कि परमेश्वर समय-समय पर मानो सीधे उनसे बोलता है, उनकी शंकाओं का समाधान करता है, उनसे अपने प्रेम की गवाही देता है, उन्हें ऐसी-ऐसी परिस्थितियों में सहायता, आपूर्ति और अपनी आशीष देने की प्रतिज्ञा करता है, और अनन्त आशीषों में उनके भाग को उन पर स्पष्ट रूप से प्रगट करता है। और इस प्रकार वे प्रायः ऊँचे उठाए जाते हैं, और उन्हें अचानक तथा उद्वेलित प्रकार के आनन्द की एक धारा मिलती है, जो एक दृढ़ भरोसे के साथ मिली हुई है, और उच्च वरदान, जो तुरन्त प्रकाशन ले आते हैं, और जिनके कारण वे आगे चलकर पवित्रशास्त्र को त्याग बैठते हैं।” और भाग 1 के पृष्ठ
86, वे कहते हैं, “क्या मसीह तेरा है? हाँ, मैं यह देखता हूँ। कैसे? किसी वचन या प्रतिज्ञा के द्वारा? नहीं; यह तो भ्रम है।” और पृष्ठ 136 पर, उन लोगों की बात करते हुए जिनके पास शान्ति का कोई ठोस आधार नहीं है, वे उन्हें ऐसे गिनते हैं “जो प्रभु के प्रेम के प्रकाशन से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं, बिना किसी कार्य को देखे, या उस पर ध्यान दिए बिना।” और उसके तुरन्त बाद वे कहते हैं, “आत्मा की गवाही किसी मनुष्य को अधिक मसीही नहीं बनाती, परन्तु केवल उसे प्रमाणित करती है; क्योंकि किसी साक्षी का स्वभाव यह नहीं कि वह किसी बात को सच बना दे, परन्तु यह कि वह उसे स्पष्ट करे और प्रमाणित करे।” और पृष्ठ 140 पर, उन लोगों की बात करते हुए जो कहते हैं कि उनके पास आत्मा की गवाही है, जो उनमें और कपटियों में अन्तर करती है, वे कहते हैं, “आत्मा की गवाही पहला अन्तर उत्पन्न नहीं करती: क्योंकि पहले मनुष्य विश्वासी होता है, और मसीह में होता है, और धर्मी ठहराया जाता है, बुलाया जाता है और पवित्र किया जाता है, इससे पहले कि आत्मा उसकी गवाही दे; नहीं तो आत्मा एक झूठी और असत्य बात की गवाही देता।”
...और न अपने बारे में ऐसी अच्छी धारणा से; जबकि वास्तव में इन आनन्दों और इस भरोसे का मुख्य आधार वह नहीं है जो इन पवित्रशास्त्रों में निहित है या सिखाया गया है, जैसा वे बाइबल में लिखे हैं, परन्तु उनके मन में आने की रीति ही है; और यही उनके भ्रम का निश्चित प्रमाण है। परमेश्वर के वचन में ऐसी कोई विशेष प्रतिज्ञा नहीं जो केवल किसी एक संत की हो, या किसी और रीति से उसे दी गई हो, या उससे कही गई हो, बजाय इसके कि अनुग्रह की वाचा की सब प्रतिज्ञाएँ उसकी हैं, और उसे दी गई हैं तथा उससे कही गई हैं;43 यद्यपि यह सच है कि इनमें से कुछ प्रतिज्ञाएँ औरों से अधिक विशेष रूप से उसकी स्थिति के अनुकूल हो सकती हैं, और परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा उसे कुछ को औरों से बेहतर समझने में सक्षम बना सकता है, और उनमें निहित आशीषों की बहुमूल्यता, महिमा और उपयुक्तता का अधिक भाव दे सकता है।
परन्तु यहाँ कोई यह कहने को तैयार हो सकता है, कि क्या परमेश्वर के आत्मा के द्वारा पवित्रशास्त्र की प्रतिज्ञाओं का कोई विशेष आत्मिक प्रयोग नहीं होता? मैं उत्तर देता हूँ, निःसन्देह मनुष्यों के प्राणों पर पवित्रशास्त्र के निमंत्रणों और प्रतिज्ञाओं का एक आत्मिक और उद्धारक प्रयोग होता है; परन्तु यह भी निश्चित है कि बहुत से लोग इसकी प्रकृति को पूरी तरह गलत समझते हैं, जिससे उनके अपने प्राण बड़े जाल में फँस जाते हैं, और शैतान को उनके विरुद्ध, तथा धर्म और परमेश्वर की कलीसिया के हित के विरुद्ध बड़ी बढ़त मिल जाती है।
पवित्रशास्त्र की किसी प्रतिज्ञा का आत्मिक प्रयोग इसमें नहीं है कि वह किसी बाहरी कारक के द्वारा तुरन्त विचारों में सुझाई जाए, और इस दृढ़ धारणा के साथ मन में ला दी जाए कि वह उस समय विशेष रूप से उनसे कही गई है और उनकी ओर निर्दिष्ट है; इस प्रभाव में परमेश्वर के हाथ का कोई प्रमाण नहीं है, जैसा कि बहुत से कुख्यात उदाहरणों में घटनाओं ने सिद्ध कर दिया है; और यह पवित्रशास्त्र के आत्मिक प्रयोग की एक तुच्छ धारणा है; इसकी प्रकृति में ऐसा कुछ भी नहीं जो शैतान की शक्ति से परे हो, यदि परमेश्वर उसे रोक न रखे; क्योंकि इस प्रभाव की प्रकृति में ऐसा कुछ भी आत्मिक नहीं है जो परमेश्वर के किसी सजीव सम्पर्क को दर्शाता हो। परमेश्वर के वचन का सचमुच आत्मिक प्रयोग एक बहुत ही उच्चतर प्रकृति का है; उतना ही शैतान की शक्ति से परे, जितना परमेश्वर के वचन को किसी मृत शव पर लगाकर उसे जीवित कर देना, या किसी पत्थर को स्वर्गदूत में बदल देना। परमेश्वर के वचन का आत्मिक प्रयोग उसे हृदय पर लागू करने में है, अर्थात् आत्मिक रूप से प्रकाशमान करनेवाले, पवित्र करनेवाले प्रभावों में।
सुसमाचार के किसी निमंत्रण या प्रस्ताव का आत्मिक प्रयोग इसमें है कि प्राण को उन पवित्र और दिव्य आशीषों का, जो देने को कहा गया है, एक आत्मिक बोध या स्वाद दिया जाए, और देनेवाले के उस मीठे और अद्भुत अनुग्रह का जिसके द्वारा उसने ऐसा अनुग्रहमय प्रस्ताव किया, और उसकी पवित्र उत्तमता और विश्वासयोग्यता का,
43 श्री शेपर्ड अपनी पुस्तक साउण्ड बिलीवर में, बॉस्टन के हाल के संस्करण के पृष्ठ 159 पर, कहते हैं, “अपनी छाती से केवल कुछ थोड़ी प्रतिज्ञाओं को ही नहीं, वरन सब को लगा ले।” और फिर वे यह प्रश्न पूछते हैं, “एक मसीही बिना धृष्टता के कब किसी प्रतिज्ञा को अपने लिए कही गई मानकर ग्रहण कर सकता है?” वे उत्तर देते हैं, “नियम बहुत मीठा है, परन्तु निश्चित है; जब वह सारे पवित्रशास्त्र को ग्रहण करता है, और उसे अपने लिए कहा गया मानकर अपनाता है, तब वह किसी भी विशेष प्रतिज्ञा को साहस से ग्रहण कर सकता है। मेरा अभिप्राय यह है, कि जब एक मसीही परमेश्वर को पकड़ लेता है, और नए
नियम की सब प्रतिज्ञाओं की पूर्ति के लिए उससे मल्लयुद्ध करता है, जब वह सब आज्ञाओं को अपने आगे एक दिशासूचक और मार्गदर्शक के समान रखता है जिनके पीछे वह चले, जब वह सब चेतावनियों को इसलिए लागू करता है कि वे उसे मसीह के, जो उनका अन्तिम लक्ष्य है, और निकट ले आएँ। यह कोई भी कपटी नहीं कर सकता; यह संत करेंगे; और इसी से वे जान सकते हैं कि प्रभु कब विशेष रूप से उनसे बोल रहा है।”
उसे जो अर्पण करता है उसे पूरा करने में, और उसके लिए उसकी महिमामय पर्याप्तता का; इस प्रकार हृदय को उस प्रस्ताव को अपनाने के लिए ले जाना और खींचना; और इस प्रकार मनुष्य को अर्पित वस्तु पर अपने अधिकार का प्रमाण देना।
और इस प्रकार संतों की शान्ति के लिए पवित्रशास्त्र की प्रतिज्ञाओं का आत्मिक प्रयोग इसमें है कि उनके मन को प्रकाशमान किया जाए ताकि वे प्रतिज्ञा की गई आशीषों की पवित्र उत्तमता और मिठास को, और साथ ही प्रतिज्ञा करनेवाले की पवित्र उत्तमता, उसकी विश्वासयोग्यता और पर्याप्तता को देख सकें; इस प्रकार उनके हृदयों को प्रतिज्ञा करनेवाले और प्रतिज्ञा की गई वस्तु को अपनाने के लिए खींचना; और इस रीति से अनुग्रह के संवेद्य कार्यों को देकर, उन्हें अपने अनुग्रह को, और इस प्रकार प्रतिज्ञा पर अपने अधिकार को देखने योग्य बनाना। ऐसा प्रयोग जो इस दिव्य बोध और मन के प्रकाशन में नहीं, वरन केवल इसमें है कि वचन विचारों में इस प्रकार ला दिया जाए मानो वह उसी समय कहा गया हो, और इस प्रकार लोगों को बिना किसी और आधार के यह विश्वास दिला दिया जाए कि प्रतिज्ञा उनकी है, वह एक अंधा प्रयोग है, और वह अन्धकार की आत्मा का है, न कि ज्योति की।
जब लोगों के मनोभाव इस रीति से उभारे जाते हैं, तो वे मनोभाव वास्तव में परमेश्वर के वचन से नहीं उभरते; पवित्रशास्त्र उनका आधार नहीं है; उनके मनोभावों को उभारनेवाली कोई भी बात उन पवित्रशास्त्रों में निहित नहीं जो उनके मन में आते हैं; बल्कि वास्तव में वह प्रभाव, अर्थात् वचन के उनके मन में सुझाए जाने की विचित्र रीति, और उससे उनके द्वारा ग्रहण किया गया एक कथन, जो सचमुच न तो उस पवित्रशास्त्र में और न किसी और में निहित है; जैसे कि उसके पाप क्षमा कर दिए गए हैं, या यह कि पिता को यह भाना कि उसे विशेष रूप से राज्य दे, या ऐसा ही कुछ। बाइबल में ऐसे कथन मिलते हैं जो घोषित करते हैं कि ऐसे-ऐसे गुणोंवाले लोग क्षमा किए गए और परमेश्वर के प्रिय हैं: परन्तु बाइबल में ऐसा कोई कथन नहीं मिलता जो घोषित करे कि ऐसे-ऐसे विशेष व्यक्ति, बिना किसी गुण के पूर्व ज्ञान के, क्षमा किए गए और परमेश्वर के प्रिय हैं: और इसलिए, जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे कथन से शान्ति पाता और प्रभावित होता है, तो वह एक और वचन के द्वारा होता है, एक नए गढ़े हुए वचन के द्वारा, न कि बाइबल में निहित परमेश्वर के किसी वचन के द्वारा।44 और इस प्रकार बहुत से लोग व्यर्थ में प्रभावित होते और भ्रमित होते हैं।
फिर, जो कुछ प्रमाणित किया जा चुका है उससे यह स्पष्ट प्रगट होता है, कि तुरन्त सुझाव के द्वारा गुप्त तथ्यों का कोई भी प्रकाशन उस अर्थ में आत्मिक और दिव्य नहीं है जिस अर्थ में अनुग्रहमय प्रभाव और कार्य होते हैं।
गुप्त तथ्यों से मेरा अभिप्राय उन बातों से है जो हो चुकी हैं, या घटित हो चुकी हैं, या आगे चलकर घटित होंगी, जो इस अर्थ में गुप्त हैं कि वे न तो इन्द्रियों को प्रगट होती हैं, और न ही
44 कुछ मसीहियों ने मसीह के बिना ही किसी कार्य पर भरोसा रखा है, जो घृणित है: परन्तु मनुष्य के मसीह में हो जाने के बाद, कार्य के आधार पर न आँकना, पहले तो वचन के आधार पर न आँकने के समान है। क्योंकि यद्यपि एक ऐसा वचन है, जो मनुष्य को बिना किसी कार्य का अनुभव किए मसीह पर निर्भरता दे सकता है, हाँ जब वह पूर्ण प्रतिज्ञाओं के रूप में कोई कार्य अनुभव नहीं करता: तो भी कोई भी वचन निश्चय नहीं देता, सिवाय उसके जो किसी कार्य से सम्बन्धित हो, अर्थात् जो विश्वास करता है या आत्मा में दीन है, आदि, जब तक वह कार्य देखा न जाए, उस प्रतिज्ञा से उसे कोई निश्चय नहीं।” शेपर्ड की पैरेबल ऑफ द टेन वर्जिन्स, भाग 1, पृष्ठ 86। “यदि परमेश्वर किसी संत से कह दे कि उसके पास अनुग्रह है, तो वह परमेश्वर के वचन पर विश्वास करके इसे जान सकता है: परन्तु भक्त लोग इस रीति से नहीं जानते कि उनके पास अनुग्रह है: यह वचन में प्रगट नहीं किया गया, और परमेश्वर का आत्मा विशेष व्यक्तियों से इसकी गवाही नहीं देता।” स्टॉडर्ड की नेचर ऑफ सेविंग कन्वर्शन, पृष्ठ 84, 85।
किसी तर्क से, या तर्क के किसी प्रमाण से जानी जाती हैं, और न ही किसी और रीति से, वरन केवल उस प्रकाशन से जो मन में उनके विचारों को तुरन्त सुझाकर दिया जाता है। इस प्रकार उदाहरण के लिए, यदि मुझ पर यह प्रगट किया जाए, कि अगले वर्ष इस देश पर फ्रांस के एक बेड़े का आक्रमण होगा, या कि ऐसे-ऐसे व्यक्ति तब मन फिराएँगे, या कि मैं स्वयं तब मन फिराऊँगा; न तो इसलिए कि मुझे विधान में अभी जो कुछ प्रगट हो रहा है उससे इन घटनाओं का अनुमान लगाने में समर्थ बनाया जाए, वरन इसलिए कि इन तथ्यों की धारणा या विचार असाधारण रीति से तुरन्त मेरे मन में सुझाए और ला दिए जाएँ, और मेरे मन पर यह दृढ़ सुझाव या प्रभाव पड़े, कि इसमें मेरा स्वयं का कोई हाथ नहीं, कि ये बातें घटित होंगी: या यदि मुझ पर यह प्रगट किया जाए, कि आज यूरोप में ऐसी-ऐसी शक्तियों की सेनाओं के बीच एक युद्ध लड़ा जा रहा है; या कि यूरोप का कोई राजकुमार आज मन फिरा चुका है, या अब मन फिराई हुई दशा में है, पहले से मन फिराया हुआ होकर, या कि मेरे पड़ोसियों में से कोई मन फिरा चुका है, या कि मैं स्वयं मन फिरा चुका हूँ; न तो इन तथ्यों में से किसी का कोई और प्रमाण पाकर, जिससे मैं उनका अनुमान लगाऊँ, वरन इन विचारों का तुरन्त और असाधारण सुझाव या उभार पाकर, और मेरे मन पर उनका एक दृढ़ प्रभाव पाकर: यह गुप्त तथ्यों का तुरन्त सुझाव द्वारा एक प्रकाशन है, उतना ही जितना कि यदि वे तथ्य भविष्य के होते; क्योंकि तथ्यों का भूत, वर्तमान या भविष्य होना स्थिति को नहीं बदलता, जब तक वे गुप्त हैं और मेरी इन्द्रियों तथा बुद्धि से छिपे हैं, और पवित्रशास्त्र में उनकी चर्चा नहीं है, और मुझे तुरन्त सुझाव के अतिरिक्त किसी और रीति से ज्ञात नहीं। यदि मुझ पर यह प्रगट किया जाए, कि तुर्क साम्राज्य में आज ऐसी कोई क्रान्ति घटित हुई है, तो यह ठीक वैसा ही प्रकाशन है जैसा यह प्रगट किया जाना कि वहाँ आज से एक वर्ष बाद ऐसी कोई क्रान्ति घटित होगी; क्योंकि, यद्यपि एक वर्तमान है और दूसरी भविष्य, फिर भी दोनों समान रूप से मुझसे छिपी हैं, तुरन्त प्रकाशन के अतिरिक्त किसी और रीति से। जब शमूएल ने शाऊल से कहा कि जिन गदहियों को वह ढूँढ़ने गया था वे मिल गई हैं, और कि उसके पिता ने गदहियों की चिन्ता छोड़कर उसके लिए शोक करना आरम्भ कर दिया है; यह उसी प्रकार के प्रकाशन से था, जिस प्रकार से उसने शाऊल से कहा था, कि ताबोर के मैदान में उसे तीन मनुष्य मिलेंगे जो बेतेल में परमेश्वर के पास जा रहे होंगे (1 शमूएल 10:2-3), यद्यपि इनमें से एक बात भविष्य की थी, और दूसरी नहीं। इसी प्रकार जब एलीशा ने इस्राएल के राजा को वे बातें बताईं जो अराम के राजा ने अपने शयनकक्ष में कही थीं, तो यह उसी प्रकार के प्रकाशन से था जिससे उसने आनेवाली बहुत सी बातें पहले से बताई थीं।
यह स्पष्ट है कि तुरन्त सुझावों द्वारा गुप्त तथ्यों का यह प्रकाशन, पूर्वोक्त अर्थ में, आत्मिक और दिव्य कार्य की प्रकृति का कुछ भी नहीं रखता; उन बोधों या विचारों की प्रकृति में, जो मन में उभारे जाते हैं, ऐसा कुछ भी नहीं जो दिव्य रूप से उत्तम हो, और इस प्रकार स्वाभाविक मनुष्यों के सब विचारों से बहुत ऊपर हो; यद्यपि विचारों को उभारने की रीति असाधारण हो। जो बातें आत्मिक हैं, जैसा दिखाया जा चुका है, उनमें न केवल प्रभाव उत्पन्न करने की रीति, वरन उत्पन्न प्रभाव भी दिव्य होता है, और इस प्रकार किसी भी अपवित्र मन में जो कुछ हो सकता है उससे कहीं ऊपर होता है। अब केवल तथ्यों का विचार रखना, उन विचारों को उत्पन्न करने की रीति को अलग रखते हुए, दुष्ट मनुष्यों के मन जिसके योग्य हो सकते हैं, बिना उनमें किसी भलाई के, उससे कुछ अधिक नहीं है; और वे सब, या तो रखते हैं या रखेंगे,
उन सबसे बड़े और सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्यों की सच्चाई का ज्ञान, जो हो चुके हैं, हैं, या होंगे।
और जहाँ तक तथ्यों के विचारों या बोध को उत्पन्न करने की असाधारण रीति की बात है, चाहे वह तुरन्त सुझाव के द्वारा ही क्यों न हो, इसमें ऐसा कुछ भी नहीं जिसके योग्य स्वाभाविक मनुष्यों के मन, जब तक वे स्वाभाविक मनुष्य ही हैं, न हों, जैसा बिलाम में, और पवित्रशास्त्र में वर्णित औरों में स्पष्ट है। और इसलिए यह प्रगट होता है कि गुप्त तथ्यों के इस तुरन्त सुझाव में ऐसा कुछ भी सम्बद्ध नहीं जो उस अर्थ में आत्मिक हो जिसमें यह प्रमाणित किया जा चुका है कि अनुग्रहमय कार्य होते हैं। यदि विचारों में ही ऐसा कुछ नहीं जो पवित्र और दिव्य हो, और इस प्रकार ऐसा कुछ भी नहीं जो किसी अपवित्र मन में न हो सके, तो परमेश्वर उन्हें बिना मन को पवित्र किए, अपनी तुरन्त सामर्थ्य से मन में डाल सकता है। जिस प्रकार इन्द्रधनुष के विचार में ही ऐसा कुछ नहीं जो पवित्र और दिव्य स्वभाव का हो; इसलिए कोई बाधा नहीं कि एक अपवित्र मन उस विचार को ग्रहण न कर सके; उसी प्रकार परमेश्वर, यदि वह चाहे, और जब वह चाहे, तुरन्त, और असाधारण रीति से, एक अपवित्र मन में वह विचार उभार सकता है। इसी प्रकार, जैसे इस विचार या ज्ञान में कि ऐसे-ऐसे विशेष व्यक्ति परमेश्वर से क्षमा किए गए और ग्रहण किए गए हैं, और स्वर्ग के अधिकारी हैं, ऐसा कुछ नहीं जो अपवित्र मन न्याय के दिन बहुतों के विषय में न रख सकें या न रखेंगे; उसी प्रकार परमेश्वर, यदि वह चाहे, असाधारण और तुरन्त रीति से, अभी एक अपवित्र मन को यह सुझा सकता है, और उस पर यह अंकित कर सकता है: एक अपवित्र मन में ऐसा कोई सिद्धान्त नहीं जिसकी कमी हो जिससे वह ऐसे सुझाव या प्रभाव के योग्य बने, और न ही उसमें ऐसा कुछ है जो ऐसे सुझाव को रोके, या अनिवार्यतः उसे रोकना आवश्यक बनाए।
और यदि गुप्त तथ्यों के ये सुझाव पवित्रशास्त्र के उन वचनों के साथ हों, जो किन्हीं और तथ्यों के विषय में, जो किसी दृष्टि से मिलते-जुलते जान पड़ते हैं, तुरन्त और असाधारण रीति से मन में लाए जाते हैं, तो इससे यह कार्य आत्मिक और दिव्य प्रकृति का नहीं बन जाता। क्योंकि पवित्रशास्त्र के वचनों का वह सुझाव, स्वयं तथ्यों के सुझाव से अधिक दिव्य नहीं है; जैसा अभी-अभी प्रमाणित किया जा चुका है: और दो प्रभाव मिलकर, जिनमें से कोई भी आत्मिक नहीं, एक ऐसा संयुक्त प्रभाव नहीं बना सकते जो आत्मिक हो।
इससे यह परिणाम निकलता है, जो पहले ही दिखाया जा चुका है, और बार-बार दोहराया जा चुका है, कि जो मनोभाव गुप्त तथ्यों के ऐसे तुरन्त सुझावों, या माने गए सुझावों पर, ठीक-ठीक आधारित हैं, वे अनुग्रहमय मनोभाव नहीं हैं। यह नहीं कि ऐसे सुझाव अनुग्रहमय मनोभावों का अवसर या आकस्मिक कारण नहीं बन सकते; क्योंकि एक भूल और भ्रम भी ऐसा बन सकता है; परन्तु यह कभी भी ठीक-ठीक अनुग्रहमय मनोभावों का आधार नहीं है: क्योंकि अनुग्रहमय मनोभाव, जैसा दिखाया जा चुका है, उस प्रभाव और कार्य के सब परिणाम हैं जो आत्मिक, अलौकिक और दिव्य है। परन्तु बहुत से मनोभाव, और ऊँचे मनोभाव, जो कुछ लोगों में हैं, उनका आधार ही ऐसे सुझाव या प्रकाशन हैं: वे इन्हें आत्मिक खोज मानते हैं, जो एक घोर भ्रम है, और यह भ्रम ही सचमुच वह स्रोत है जहाँ से उनके मनोभाव बहते हैं।
यहाँ यह देखना उचित होगा, कि जो कुछ कहा जा चुका है उससे यह अत्यन्त स्पष्ट है, कि जिसे बहुत से लोग आत्मा की यह गवाही कहते हैं कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं, उसमें कुछ भी आत्मिक और दिव्य नहीं है; और परिणामस्वरूप उस पर आधारित मनोभाव
व्यर्थ और भ्रामक हैं। जिसे बहुत से लोग आत्मा की गवाही कहते हैं, वह उस तथ्य के, जो अन्यथा गुप्त है, एक तुरन्त सुझाव और प्रभाव के अतिरिक्त कुछ नहीं, अर्थात् यह कि वे मन फिरा चुके हैं, या परमेश्वर की सन्तान बनाए गए हैं, और इस प्रकार उनके पाप क्षमा कर दिए गए हैं, और परमेश्वर ने उन्हें स्वर्ग का अधिकार दे दिया है। इस प्रकार का ज्ञान, अर्थात् यह जानना कि कोई विशेष व्यक्ति मन फिरा चुका है, और नरक से छुड़ाया गया है, और स्वर्ग का अधिकारी है, स्वयं में किसी भी प्रकार का दिव्य ज्ञान नहीं है। इस प्रकार का तथ्य ऐसा नहीं जिसे मन पर अंकित करने के लिए किसी उच्चतर या अधिक दिव्य प्रकार के सुझाव की आवश्यकता हो, बजाय किसी और तथ्य के जो बिलाम के मन पर अंकित किया गया था। किसी मनुष्य के लिए अपने स्वयं के मन फिराव की धारणा को अपने ऊपर अंकित होते पाना, किसी उच्चतर प्रकार के विचार या अनुभूति की माँग नहीं करता, बजाय इसके कि वह उसी रीति से अपने पड़ोसी के मन फिराव की धारणा को अंकित होते पाए: परन्तु परमेश्वर, यदि वह चाहे, इस तथ्य के ज्ञान को, कि उसने अपने पड़ोसी के पापों को क्षमा कर दिया है, और उसे स्वर्ग का अधिकार दे दिया है, किसी और तथ्य के समान ही, बिना अपनी पवित्रता के किसी सम्पर्क के, अंकित कर सकता है: तथ्य की उत्तमता और महत्त्व, एक स्वाभाविक मनुष्य के मन को उसके तुरन्त सुझाव और प्रभाव के योग्य होने से किसी भी रीति से नहीं रोकते। बिलाम के मन पर इसके समान ही उत्तम, महत्त्वपूर्ण और महिमामय तथ्य, बिना किसी अनुग्रहमय प्रभाव के, तुरन्त अंकित किए गए थे; विशेष रूप से, मसीह का आगमन, और उसके द्वारा अपने महिमामय राज्य की स्थापना, और आत्मिक इस्राएल का उसकी विशेष कृपादृष्टि में धन्य होना, और उनका जीते और मरते हुए सुखी होना। हाँ, पलिश्तियों के राजा अबीमेलेक पर, परमेश्वर की एक विशेष व्यक्ति के प्रति, अर्थात् अब्राहम के प्रति, विशेष कृपा प्रगट की गई,
(उत्पत्ति 20:6-7)। इसी प्रकार ऐसा जान पड़ता है कि उसने लाबान पर याकूब के प्रति अपनी विशेष कृपा प्रगट की, देखें उत्पत्ति 31:24, और भजन संहिता 105:15। और यदि किसी सचमुच भले मनुष्य को परमेश्वर की ओर से इसी प्रकार का, अपने पड़ोसी या स्वयं के प्रति उसकी कृपा के विषय में, कोई तुरन्त प्रकाशन या सुझाव मिले; तो यह किसी उच्चतर प्रकार का प्रभाव नहीं होगा; यह परमेश्वर के आत्मा के एक साधारण प्रकार के प्रभाव से अधिक नहीं होगा; जैसा भविष्यद्वाणी का वरदान है, और जैसा तुरन्त सुझाव द्वारा हर प्रकाशन है; देखें 1
कुरिन्थियों 13:2। और यद्यपि यह सच है, कि यह सम्भव नहीं कि किसी स्वाभाविक मनुष्य को परमेश्वर के आत्मा की ओर से यह विशेष सुझाव मिले, कि वह मन फिरा चुका है, क्योंकि यह सच नहीं है; तो भी यह प्रभाव की प्रकृति के कारण नहीं है, और न ही इसलिए कि ऐसे उत्तम तथ्यों को सुझानेवाला वह प्रकार का प्रभाव उसके लिए बहुत ऊँचा है; वरन केवल इसलिए कि जिस तथ्य को प्रगट किया जाना है वही नहीं है। जो प्रभाव इस तथ्य को, जब यह सच हो, तुरन्त सुझाता है, वह किसी भी अन्य प्रकार का नहीं जो अन्य सच्चे तथ्यों को तुरन्त सुझाता है: और इस प्रकार प्रभाव का प्रकार और प्रकृति उससे ऊपर नहीं जो स्वाभाविक मनुष्यों में, भले मनुष्यों के साथ, साधारण है।
परन्तु परमेश्वर के आत्मा की उस गवाही की, जो उसके प्रिय बालकों को दी जाती है, यह एक तुच्छ, हीन धारणा है, यह सोचना कि परमेश्वर के आत्मा के उस प्रभाव के प्रकार और प्रकृति में, इस उच्च और महिमामय आशीष को देने में, ऐसा कुछ नहीं जो स्वाभाविक मनुष्यों में साधारण न हो, या जिसके योग्य मनुष्य न हों, और साथ ही पूर्णतः अपवित्र और नरक की सन्तान बने रहें; और इसलिए यह कि आशीष या वरदान में ही परमेश्वर के आत्मा की पवित्र प्रकृति का कुछ भी नहीं, उस आत्मा के किसी सजीव सम्पर्क का कुछ भी नहीं। यह धारणा आत्मा के उस उच्च और सबसे महान प्रकार के प्रभाव और कार्य को बहुत हीन बना देती है, जो
आत्मा की सच्ची गवाही में है।45 जिसे रोमियों 8 में आत्मा की गवाही कहा गया है, नए नियम में अन्यत्र उसे आत्मा की मुहर कहा गया है, 2 कुरिन्थियों 1:22, इफिसियों 1:13, और 4:13, जो राजाओं की उस मुहर का सन्दर्भ देता है जो किसी दस्तावेज़ पर लगाई जाती थी, जिसके द्वारा वे अपनी किसी प्रजा को राज्य में किसी उच्च सम्मान और प्रतिष्ठा, या विशेष अधिकार तक बढ़ाते थे, अपनी विशेष कृपा के चिन्ह के रूप में। यह इस बात का प्रमाण है कि राजाओं के राजा के आत्मा का प्रभाव, अपने प्रिय जनों पर मुहर लगाने में, किसी साधारण प्रकार का होने से बहुत दूर है; और यह कि परमेश्वर के आत्मा का ऐसा कोई भी प्रभाव नहीं जो अपनी प्रकृति में इससे अधिक दिव्य हो; इससे अधिक पवित्र, विशेष, अननुकरणीय और दिव्यता को अलग करनेवाला कुछ भी नहीं: जैसे राजकीय मुहर से अधिक राजसी कुछ भी नहीं; किसी राजा की किसी वस्तु से अधिक पवित्र, और उसकी अपनी वस्तु को विशेष रूप से दर्शानेवाला कुछ भी नहीं; क्योंकि इसका उद्देश्य ही यह है कि वह राजसी अधिकार की सबसे विशेष छाप और पुष्टि हो, और भेद की एक बड़ी पहचान हो, जिससे जो कुछ राजा से निकलता है, या उसका है, वह हर वस्तु से अलग पहचाना जा सके। और इसलिए निःसन्देह स्वर्ग और पृथ्वी के महान राजा की वह मुहर, जो हृदय पर अंकित की जाती है, अपनी प्रकृति में कुछ उच्च और पवित्र है, दिव्य सुन्दरता और महिमा के अनन्त स्रोत से कोई उत्तम सम्पर्क है; और केवल प्रकाशन या सुझाव के द्वारा किसी गुप्त तथ्य को जताना ही नहीं है; जो परमेश्वर के आत्मा के प्रभाव का एक ऐसा प्रकार है जिसके अधीन शैतान की सन्तान भी अक्सर रही हैं। आत्मा की मुहर हृदय पर परमेश्वर के आत्मा का एक ऐसा प्रभाव है, जिसके अधीन होने की क्षमता से स्वाभाविक मनुष्य, जब तक वे ऐसे ही हैं, इतने दूर हैं; कि उन्हें इसका कोई भी विचार या धारणा नहीं हो सकती, जैसा प्रकाशितवाक्य 2:17 के अनुरूप है: “जो जय पाए, मैं उसे गुप्त मन्ना में से दूँगा, और उसे एक उजला पत्थर दूँगा, और उस पत्थर पर एक नया नाम लिखा हुआ है, जिसे उस पानेवाले के सिवाय और कोई नहीं जानता।” यह सोचने का पूरा कारण है कि यहाँ जिसकी चर्चा है, वही चिन्ह, प्रमाण, या विशेष कृपा का धन्य चिन्ह है, जिसे अन्यत्र आत्मा की मुहर कहा गया है।
45 स्वर्गीय आदरणीय स्टॉडर्ड ने, अपनी युवावस्था में, कुछ औरों के मत से सहमत होकर, आत्मा की गवाही की इस धारणा को तुरन्त सुझाव के रूप में ग्रहण किया था; परन्तु अपने जीवन के उत्तरार्ध में, जब उन्होंने बातों को अधिक गहराई से तौला, और उन्हें अधिक अनुभव प्राप्त हुआ, तो उन्होंने इसे पूर्णतः अस्वीकार कर दिया; जैसा उनके ग्रन्थ नेचर ऑफ सेविंग कन्वर्शन, पृष्ठ 84 से प्रगट होता है: “परमेश्वर का आत्मा विशेष व्यक्तियों को यह गवाही नहीं देता कि वे भक्त हैं।—कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर का आत्मा कुछ लोगों को गवाही देता है; और वे इसका आधार रोमियों 8:16 पर रखते हैं, ‘आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।’ वे सोचते हैं कि आत्मा इसे एक आन्तरिक गवाही देकर प्रगट करता है; और कुछ भक्त लोग सोचते हैं कि उन्हें इसका अनुभव हुआ है: परन्तु वे सरलता से भूल कर सकते हैं जब परमेश्वर का आत्मा विश्वास की आत्मा को विशेष रूप से जगाता है, और हृदय में परमेश्वर का प्रेम उण्डेल देता है, तो इसे गवाही मान लेना सरल है। और यह पौलुस के वचनों का अर्थ नहीं है। आत्मा हम पर बातें इस रीति से प्रगट करता है, कि वह हमारी आँखें खोल देता है ताकि हम वह देख सकें जो वचन में प्रगट किया गया है; परन्तु आत्मा नए सत्य प्रगट नहीं करता, जो वचन में प्रगट नहीं किए गए। आत्मा मसीह में परमेश्वर के अनुग्रह को प्रगट करता है, और इस प्रकार विश्वास और प्रेम के विशेष कार्यों को बाहर लाता है, जो प्रमाणस्वरूप हैं; परन्तु यह गवाही की रीति में कार्य नहीं करता। यदि परमेश्वर केवल हमें वचन में की गई प्रकाशनाओं को ग्रहण करने में सहायता दे, तो नई प्रकाशनाओं के बिना ही हमें पर्याप्त शान्ति मिल जाएगी।”
जिस बात ने बहुतों को परमेश्वर के आत्मा के उस प्रभाव के विषय में, जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं, धारणा में भरमाया है, वह है ‘गवाही’ शब्द, अर्थात् उसे आत्मा की गवाही कहा जाना। इसलिए उन्होंने इसे हृदय पर आत्मा के किसी प्रभाव या कार्य के रूप में नहीं लिया, जो प्रमाण दे, जिससे मनुष्य यह तर्क कर सकें कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं; वरन एक आन्तरिक तुरन्त सुझाव के रूप में, मानो परमेश्वर मनुष्य से भीतर ही भीतर बोलता हो, और उसे गवाही देता हो, और उसे किसी गुप्त आवाज़ या प्रभाव के द्वारा बताता हो कि वह उसकी सन्तान है: यह न देखते हुए कि नए नियम में ‘गवाही’ या ‘साक्षी’ शब्द किस रीति से प्रयोग किया जाता है, जहाँ ऐसे शब्द अक्सर न केवल किसी बात को सच घोषित करने और दावा करने का, वरन ऐसा प्रमाण प्रस्तुत करने का अर्थ रखते हैं जिससे किसी बात को तर्क द्वारा सिद्ध किया जा सके। इस प्रकार इब्रानियों 2:4 में, परमेश्वर के विषय में कहा गया है कि उसने “चिन्हों, और अद्भुत कामों, और नाना प्रकार की सामर्थ्य के कामों, और पवित्र आत्मा के वरदानों के द्वारा गवाही दी।”
अब यहाँ वर्णित ये चमत्कार परमेश्वर की गवाही इसलिए नहीं कहलाते कि वे दावों की प्रकृति के हैं, वरन इसलिए कि वे प्रमाण और साक्ष्य हैं। इसी प्रकार प्रेरितों के काम 14:3: “तौभी वे बहुत दिन तक वहाँ रहे, और प्रभु के भरोसे साहस से बोलते रहे, और वह अपने अनुग्रह के वचन की गवाही देता, और उनके हाथों से चिन्ह और अद्भुत काम दिखाता था।” और यूहन्ना 5:36: “परन्तु जो गवाही मेरे पास है, वह यूहन्ना की गवाही से बड़ी है, क्योंकि जो काम पिता ने मुझे पूरे करने को दिए हैं, वे ही काम जो मैं करता हूँ, मेरे गवाह हैं, कि पिता ने मुझे भेजा है।” फिर, अध्याय 10:25:
“जो काम मैं अपने पिता के नाम से करता हूँ, वे ही मेरे गवाह हैं।” इसी प्रकार जल और लहू के विषय में कहा गया है कि वे गवाही देते हैं, 1 यूहन्ना 5:8, न कि इसलिए कि उन्होंने कुछ कहा या दावा किया, वरन इसलिए कि वे प्रमाण और साक्ष्य थे। इसी प्रकार वर्षा और फलदायी ऋतुओं में परमेश्वर के विधान के कार्यों को परमेश्वर के अस्तित्व और भलाई के साक्षी कहा गया है, अर्थात् वे इन बातों के प्रमाण हैं। और जब पवित्रशास्त्र आत्मा की मुहर की बात करता है, तो यह एक ऐसी अभिव्यक्ति है जो ठीक-ठीक किसी तुरन्त आवाज़ या सुझाव को नहीं, वरन आत्मा के किसी कार्य या प्रभाव को दर्शाती है, जो प्राण पर एक दिव्य चिन्ह के रूप में छोड़ दिया जाता है, ताकि वह एक ऐसा प्रमाण हो जिससे परमेश्वर की सन्तान पहचानी जा सकें। राजाओं की मुहरें राजाओं की विशेष पहचान हुआ करती थीं: और इस प्रकार
परमेश्वर की मुहर को परमेश्वर के चिन्ह के रूप में कहा गया है, प्रकाशितवाक्य 7:3: “जब तक हम अपने परमेश्वर के दासों के माथों पर मुहर न कर लें, तब तक पृथ्वी, या समुद्र, या पेड़ों को हानि मत पहुँचाओ”; इसके साथ यहेजकेल 9:4 भी,
“उन मनुष्यों के माथों पर चिन्ह लगा दे जो उन सब घिनौने कामों के कारण जो उसके बीच किए जाते हैं आहें भरते और चिल्लाते हैं।” जब परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा किसी मनुष्य के हृदय पर अपनी मुहर लगाता है, तो आत्मा के द्वारा हृदय पर कोई पवित्र छाप, कोई प्रतिमा अंकित होकर छूट जाती है, जैसे मोम पर मुहर से होता है। और यह पवित्र छाप, या अंकित प्रतिमा, विवेक को स्पष्ट प्रमाण देती हुई कि उसका विषय परमेश्वर की सन्तान है, वही बात है जिसे पवित्रशास्त्र में आत्मा की मुहर, और आत्मा की गवाही या प्रमाण कहा गया है। और परमेश्वर की सन्तान के हृदयों पर आत्मा के द्वारा अंकित यह प्रतिमा, उसी की अपनी प्रतिमा है; यही वह प्रमाण है जिससे वे परमेश्वर की सन्तान जानी जाती हैं, कि लेपालक होने के आत्मा के द्वारा उनके हृदयों पर उनके पिता की प्रतिमा अंकित की गई है। प्राचीन काल में मुहरों पर दो बातें उत्कीर्ण होती थीं, अर्थात् जिसकी मुहर हो उसकी प्रतिमा और नाम। इसलिए जब मसीह अपनी वधू से कहता है, श्रेष्ठगीत 8:6, “मुझे अपने हृदय पर मुहर की नाईं, और अपनी बाँह पर मुहर की नाईं धारण कर”; तो इसका अर्थ यही है कि मेरा नाम और प्रतिमा वहाँ अंकित रहे। राजाओं की मुहरों पर
उनकी प्रतिमा होना सामान्य था; जिससे जिस किसी वस्तु पर वे अपनी मुहर और राजचिन्ह लगाते थे, उस पर उनकी प्रतिमा छूट जाती थी। प्राचीन राजाओं की यह रीति थी कि वे अपनी प्रतिमा अपने रत्नों और बहुमूल्य पत्थरों पर उत्कीर्ण करवाते थे; और किसी बहुमूल्य पत्थर पर उत्कीर्ण अगस्तुस की प्रतिमा, मसीह और प्रेरितों के समय में, रोमी सम्राटों की मुहर के रूप में प्रयोग की जाती थी।46 और संत ही उस महान अधिपति यीशु मसीह के रत्न हैं, जिसके अधिकार में समस्त सृष्टि का साम्राज्य है; और इन रत्नों पर उसकी प्रतिमा उसकी राजमुद्रा से अंकित है, जो पवित्र आत्मा है। और निःसन्देह पवित्रशास्त्र का यही अर्थ है जब वह आत्मा की मुहर की बात करता है; विशेष रूप से जब यह इतनी स्पष्ट और सुन्दर रीति से अंकित हो, कि विवेक की आँख के लिए साफ़ हो; जिसे पवित्रशास्त्र हमारा आत्मा कहता है। यह सचमुच एक ऐसा प्रभाव है जो आत्मिक, अलौकिक और दिव्य है। यह अपने आप में पवित्र प्रकृति का है, क्योंकि यह दिव्य स्वभाव और सौन्दर्य का एक सम्पर्क है। आत्मा का वह प्रकार का प्रभाव जो हृदय पर यह छाप देता और छोड़ता है, ऐसा है कि कोई भी स्वाभाविक मनुष्य इसके समान किसी भी बात के अधीन नहीं हो सकता। यह आत्मा की गवाही का सबसे उच्च प्रकार है, जिसके अधीन प्राण हो सकता है: यदि तुरन्त सुझाव या प्रकाशन द्वारा आत्मा की कोई गवाही होती भी, तो यह उससे कहीं अधिक उत्तम और श्रेष्ठ होती, और उतनी ही उससे ऊपर होती जितना स्वर्ग पृथ्वी से ऊपर है। इसकी नकल शैतान नहीं कर सकता; जहाँ तक परमेश्वर के आत्मा के आन्तरिक सुझाव की बात है, किसी गुप्त बोलती हुई आवाज़ के द्वारा, और तुरन्त किसी तथ्य का दावा करने और उसे प्रगट करने की बात है, वह इसके समान वह कर सकता है जो हज़ार गुना उतना ही मिलता-जुलता है, जितना वह उस पवित्र और दिव्य प्रभाव, या परमेश्वर के आत्मा के कार्य के समान कर सकता है, जिसकी अभी चर्चा हुई है।
एक और बात जो इसका पूरा प्रमाण है कि आत्मा की मुहर तुरन्त सुझाव द्वारा किसी तथ्य का प्रकाशन नहीं, वरन प्राण में स्वयं अनुग्रह है, यह है, कि पवित्रशास्त्र में आत्मा की मुहर को आत्मा का बयाना कहा गया है। यह अत्यन्त स्पष्ट है कि आत्मा की मुहर वही वस्तु है जो आत्मा का बयाना है, जैसा 2 कुरिन्थियों 1:22 से प्रगट होता है: “उसी ने हम पर छाप भी की है, और बयाने के रूप में आत्मा को हमारे मनों में दिया है”; और इफिसियों 1:13-14, “जिसमें तुम भी, विश्वास करने के बाद, प्रतिज्ञा के उस पवित्र आत्मा से मुहरबन्द किए गए, जो हमारी मीरास का बयाना है, जब तक कि मोल लिए हुए लोग छुड़ाए न जाएँ, उसकी महिमा की स्तुति के लिए।” अब बयाना उस राशि का वह भाग है जिस पर सहमति हुई है, जो हाथ में दिया जाता है, समस्त राशि के चिन्ह के रूप में, जो उचित समय पर चुकाई जानी है; प्रतिज्ञा की गई मीरास का वह भाग जो अभी दे दिया गया है, आगे चलकर सम्पूर्ण अधिकार के चिन्ह के रूप में। परन्तु निश्चय ही परमेश्वर के आत्मा का वह प्रकार का सम्पर्क, जो अनन्त महिमा की प्रकृति का है, सम्पर्क का सबसे उच्च और सबसे उत्तम प्रकार है, अपनी प्रकृति में कुछ ऐसा जो आत्मिक, पवित्र और दिव्य है, और साधारण किसी भी बात से बहुत दूर है: और इसलिए वह परमेश्वर के आत्मा की प्रेरणा, या सुझाव के द्वारा गुप्त तथ्यों के प्रकाशन की प्रकृति की किसी भी बात से बहुत ऊपर है, जो बहुत से स्वाभाविक मनुष्यों को मिला है। महिमा का बयाना और आरम्भ और क्या है सिवाय स्वयं अनुग्रह के, विशेष रूप से उसके अधिक जीवन्त और स्पष्ट कार्यों में? यह न तो भविष्यद्वाणी है, न भाषाएँ, न ज्ञान, वरन वह अधिक उत्तम दिव्य वस्तु,
अर्थात् “वह प्रेम जो कभी टलता नहीं,” जो स्वर्ग की उस ज्योति, मिठास और 46 चैम्बर्स डिक्शनरी में “एनग्रेविंग” शब्द के अन्तर्गत देखें।
उस धन्यता का भाग है, वह प्रेम या दान का लोक। यह अनुग्रह ही है जो हृदय में महिमा का बीज और महिमा की भोर है, और इसलिए यह अनुग्रह ही है जो भविष्य की मीरास का बयाना है। प्राण में अनन्त जीवन का आरम्भ या बयाना और क्या है, सिवाय आत्मिक जीवन के; और वह क्या है सिवाय अनुग्रह के? वह मीरास जो मसीह ने चुने हुए लोगों के लिए मोल ली है, परमेश्वर का आत्मा है; किसी असाधारण वरदानों में नहीं, वरन हृदय में उसके सजीव निवास में, वहाँ अपने आप को, अपनी ही उचित, पवित्र और दिव्य प्रकृति में, कार्यरत करने और सम्पर्क करने में; और यही वह पूर्ण मीरास है जो मसीह ने चुने हुए लोगों के लिए मोल ली। क्योंकि हमारे छुटकारे के विषय में बातें इस प्रकार बनाई गई हैं, कि पिता उद्धारकर्ता या मोल लेनेवाले को प्रदान करता है, और उसी के द्वारा मोल लिया जाता है; और पुत्र मोल लेनेवाला और मूल्य दोनों है; और पवित्र आत्मा वह महान आशीष या मोल ली गई मीरास है, जैसा गलातियों 3:13-14 में सूचित किया गया है; और इसलिए आत्मा को अक्सर सुसमाचार में प्रतिज्ञा की गई आशीषों का सार कहा जाता है, लूका 24:49, प्रेरितों के काम
1:4, और अध्याय 2:38-39, गलातियों 3:14, इफिसियों 1:13। यह मीरास वह महान धरोहर थी जो मसीह ने अपने अन्तिम वसीयतनामे में अपने चेलों और कलीसिया के लिए छोड़ी, यूहन्ना अध्याय 14, 15, 16। यही अनन्त जीवन की आशीषों का सार है, जो स्वर्ग में दी जाएँगी। (तुलना करें यूहन्ना
7:37-39, और यूहन्ना 4:14, प्रकाशितवाक्य 21:6, और 22:1, 17 से।) संतों को स्वर्ग में अपनी सारी ज्योति, जीवन, पवित्रता, सुन्दरता और आनन्द आत्मा के सजीव सम्पर्क और निवास के द्वारा ही मिलते हैं; और उसी
आत्मा के सजीव सम्पर्क और निवास के द्वारा संतों को पृथ्वी पर भी सारी ज्योति, जीवन, पवित्रता, सुन्दरता और शान्ति मिलती है; परन्तु केवल घटी हुई मात्रा में। और संतों में आत्मा का यह सजीव निवास, इस घटी हुई मात्रा और छोटे आरम्भ में, वही है जिसे प्रेरित “आत्मा का बयाना, भविष्य की मीरास का बयाना, और आत्मा का पहला फल” कहता है, रोमियों 8:22, जहाँ “आत्मा के पहले फल” से प्रेरित का अभिप्राय निःसन्देह उसी सजीव, अनुग्रहमय सिद्धान्त से है जिसकी वह इस अध्याय के पूर्ववर्ती भाग में चर्चा करता है, जिसे वह आत्मा कहता है, और शरीर या भ्रष्टता के विरुद्ध रखता है।—इसलिए आत्मा का यह बयाना, और आत्मा का पहला फल, जो दिखाया जा चुका है कि आत्मा की मुहर के समान ही है, आत्मा का सजीव, अनुग्रहमय, पवित्र करनेवाला सम्पर्क और प्रभाव है, न कि आत्मा के द्वारा तथ्यों का कोई तुरन्त सुझाव या प्रकाशन।47
और वस्तुतः प्रेरित, जब रोमियों 8:16 में, वह आत्मा की इस गवाही की बात करता है कि हमारी आत्मा के साथ वह गवाही देता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो वह स्वयं को पर्याप्त रूप से स्पष्ट कर देता है, यदि उसके वचनों पर ध्यान दिया जाए। यहाँ जो कहा गया है वह पिछली दो आयतों से जुड़ा हुआ है, मानो प्रेरित ने वहाँ जो कहा था उसका परिणाम हो, जैसा हर पाठक देख सकता है। तीनों आयतें
47 “मनुष्य के मसीह में हो जाने के बाद, कार्य के आधार पर न आँकना, आत्मा के आधार पर न आँकना है। क्योंकि प्रेरित आत्मा के बयाने को ही मुहर बनाता है।—अब बयाना उस राशि का भाग है जिस पर सहमति हुई है, स्वर्ग का आरम्भ है, उसकी ज्योति और जीवन का। जो यह नहीं देखता कि प्रभु इसके द्वारा उसका है, वह अपने किसी भी परमेश्वर को बिलकुल नहीं देखता। इसलिए, हे प्रिय, प्रगट करने के लिए किसी वचन के बिना आत्मा को न ढूँढ़ो, और न ही किसी कार्य को पहले देखे और अनुभव किए बिना प्रगट करने के लिए वचन को। मैं प्रभु का धन्यवाद करता हूँ, मुझे तो उन पर तरस ही आता है जो अन्यथा सोचते हैं। यदि मसीह की भेड़ हो, तो अचम्भा मत करो।” शेपर्ड की
मिलकर इस प्रकार हैं: “क्योंकि जितने परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं: क्योंकि तुम्हें फिर भय उत्पन्न करनेवाली दासत्व की आत्मा नहीं मिली; वरन तुम्हें लेपालक होने की आत्मा मिली, जिससे हम अब्बा, हे पिता, कहकर पुकारते हैं: आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।” यहाँ, प्रेरित जो कहता है, यदि हम उसे एक साथ लें, तो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि जब वह कहता है कि आत्मा हमें गवाही या प्रमाण देता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो उसका सम्बन्ध इससे है कि वह हम में निवास करता है, और हमें लेपालक होने की आत्मा, या सन्तान की आत्मा के रूप में अगुवाई करता है, जो हमें परमेश्वर के प्रति पिता के समान व्यवहार करने के लिए प्रवृत्त करता है। यही वह गवाही या प्रमाण है जिसकी प्रेरित बात करता है कि हम सन्तान हैं, कि हमारे पास सन्तान की आत्मा, या लेपालक होने की आत्मा है। और वह क्या है सिवाय प्रेम की आत्मा के? प्रेरित दो प्रकार की आत्माओं की बात करता है, दास की आत्मा या दासत्व की आत्मा, जो भय है; और सन्तान की आत्मा, या लेपालक होने की आत्मा, जो प्रेम है। प्रेरित कहता है, हमें दासत्व की, या दासों की आत्मा, जो भय की आत्मा है, नहीं मिली; वरन हमें सन्तान की अधिक उदार और उत्तम आत्मा, प्रेम की आत्मा मिली है, जो स्वाभाविक रूप से हमें परमेश्वर के पास सन्तान के समान पिता के पास जाने के लिए, और परमेश्वर के प्रति सन्तान के समान व्यवहार करने के लिए प्रवृत्त करती है। और यही वह प्रमाण या गवाही है जो परमेश्वर का आत्मा हमें देता है कि हम उसकी सन्तान हैं। यही प्रेरित का स्पष्ट अभिप्राय है; और इस प्रकार निःसन्देह वह यहाँ उसी रीति की बात कर रहा है जिससे सन्देह, भय और दासत्व की आत्मा को दूर किया जाता है, जिसकी चर्चा प्रेरित यूहन्ना 1 यूहन्ना 4:18 में करता है, अर्थात् प्रेम की विजय के द्वारा, जो सन्तान की आत्मा है। दासत्व की आत्मा भय के द्वारा कार्य करती है, दास कोड़े से डरता है: परन्तु प्रेम पुकारता है, अब्बा, हे पिता; यह हमें परमेश्वर के पास जाने, और सन्तान के समान परमेश्वर के प्रति व्यवहार करने के लिए प्रवृत्त करता है; और यह हमें परमेश्वर के साथ, उसकी सन्तान के रूप में, हमारी एकता का स्पष्ट प्रमाण देता है, और इस प्रकार भय को दूर करता है। इस प्रकार यह प्रगट होता है कि आत्मा की जिस गवाही की प्रेरित बात करता है, वह किसी फुसफुसाहट, या तुरन्त सुझाव या प्रकाशन से बहुत दूर है; वरन संतों के हृदयों में परमेश्वर के आत्मा का वह अनुग्रहमय पवित्र प्रभाव है, अर्थात् सन्तान का स्वभाव और मनोवृत्ति, जो परमेश्वर के प्रति मीठे बालसुलभ प्रेम में प्रगट होती है, जो भय, या दास की आत्मा को दूर करती है।
और यही बात सम्पूर्ण प्रसंग से भी स्पष्ट है: यह स्पष्ट है कि प्रेरित बार-बार आत्मा की बात करता है, जो संतों के हृदयों में एक अनुग्रहमय सिद्धान्त के रूप में निवास करता है, और शरीर या भ्रष्टता के विरुद्ध रखा गया है: और वह उन वचनों में भी ऐसा ही करता है जो हमारे इस अंश से ठीक पहले आते हैं, आयत 13, “क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार जीवन बिताओगे, तो मरोगे: परन्तु यदि तुम आत्मा के द्वारा शरीर के कामों को मार डालो, तो जीवित रहोगे।”
वस्तुतः मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं, कि प्रेरित का विशेष सम्बन्ध अनुग्रह की आत्मा, या प्रेम की आत्मा, या सन्तान की आत्मा से है, उसके अधिक जीवन्त कार्यों में; क्योंकि यह पूर्ण प्रेम, या केवल दृढ़ प्रेम ही है, जो इस रीति से गवाही या प्रमाण देता है कि हम सन्तान हैं, यहाँ तक कि भय को दूर कर देता है, और दासत्व की आत्मा से पूरी तरह छुड़ा लेता है। परमेश्वर के प्रति बालसुलभ, सुसमाचार-सम्बन्धी, दीन प्रेम की आत्मा के दृढ़ और जीवन्त कार्य, परमेश्वर के साथ प्राण के सन्तान के समान सम्बन्ध का स्पष्ट प्रमाण देते हैं; जो प्राण को अत्यन्त और सीधे सन्तोष देता है। और यद्यपि यह सच्चाई से बहुत दूर है कि प्राण इस दशा में केवल बिना किसी चिन्ह या प्रमाण के एक तुरन्त गवाही से ही निर्णय करता है; क्योंकि वह सबसे बड़े चिन्ह और सबसे स्पष्ट प्रमाण से निर्णय करता और निश्चय पाता है; फिर भी इस दशा में संत को बहुत से चिन्हों, या उन पर किसी लम्बी युक्ति की आवश्यकता नहीं। और यद्यपि परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्धगत एकत्व की, और उसकी कृपादृष्टि में होने की, उसकी दृष्टि बिना किसी माध्यम के नहीं है, क्योंकि वह इसे उस माध्यम के द्वारा देखता है, अर्थात् अपने प्रेम के द्वारा; फिर भी परमेश्वर के साथ अपने हृदय के एकत्व की उसकी दृष्टि तुरन्त है: प्रेम, जो एकत्व का बन्धन है, अन्तर्ज्ञान से देखा जाता है: संत अपने प्राण और परमेश्वर के बीच के एकत्व को स्पष्ट रूप से देखता और अनुभव करता है; यह इतना दृढ़ और जीवन्त है, कि वह इसमें सन्देह नहीं कर सकता। और इसलिए उसे निश्चय हो जाता है कि वह एक सन्तान है। वह कैसे सन्देह कर सकता है कि वह परमेश्वर के साथ सन्तान के समान सम्बन्ध में खड़ा है, जब वह परमेश्वर और अपने प्राण के बीच एक बालसुलभ एकत्व स्पष्ट रूप से देखता है, और इसलिए साहस से, और मानो स्वाभाविक और अनिवार्य रीति से पुकारता है, अब्बा,
और जहाँ प्रेरित कहते हैं, कि आत्मा हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है; यहाँ हमारी 'आत्मा' से अभिप्राय हमारे विवेक से है, जिसे 'मनुष्य की आत्मा' कहा गया है, नीतिवचन 20:17, "मनुष्य की आत्मा यहोवा का दीपक है, जो अन्तःकरण के सब भीतरी भागों को खोजती है।" हम अपनी इसी आत्मा की गवाही के विषय में और कहीं भी पढ़ते हैं: 2 कुरिन्थियों 1:12, "क्योंकि हमारा घमण्ड यह है, कि हमारे विवेक की यह गवाही है।" और 1 यूहन्ना 3:19, 20, 21: "और इसी से हम जान लेंगे, कि हम सत्य के हैं, और उसके साम्हने अपने-अपने मन को ढाढ़स देंगे। क्योंकि यदि हमारा मन हमें दोषी ठहराए, तो परमेश्वर हमारे मन से बड़ा है, और सब कुछ जानता है। हे प्रियो, यदि हमारा मन हमें दोषी न ठहराए, तो परमेश्वर के साम्हने हमें साहस होता है।" जब प्रेरित पौलुस यह कहते हैं कि परमेश्वर का आत्मा हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, तो इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि ये दो अलग, समानान्तर, स्वतंत्र गवाह हैं; वरन एक ही के द्वारा हम दूसरे की गवाही पाते हैं: परमेश्वर का आत्मा परमेश्वर के प्रेम को, अर्थात पुत्रत्व की आत्मा को, हृदय में उंडेलकर और भरकर प्रमाण देता है, और हमारी आत्मा, अर्थात हमारा विवेक, इस प्रमाण को ग्रहण करके हमारे आनन्द के लिये उसकी घोषणा करता है।
आत्मा की गवाही की उस झूठी और भरमानेवाली धारणा से बहुत हानियाँ हुई हैं, कि यह मानो परमेश्वर की ओर से मनुष्य के भीतर की कोई आवाज़, सुझाव, या घोषणा है, कि वह उसका प्रिय है, और उसे क्षमा किया गया, चुन लिया गया, या ऐसा ही कुछ, कभी पवित्रशास्त्र के किसी वचन के साथ, और कभी बिना किसी वचन के; और इससे बहुत से झूठे और व्यर्थ (यद्यपि बहुत ऊँचे) मनोभाव उत्पन्न हुए हैं। और आशंका है कि इसके कारण बहुत सी आत्माएँ सदा के लिये नष्ट हो गई हैं। इसी कारण मैंने इस विषय पर कुछ अधिक बल दिया है। परन्तु अब मैं अनुग्रहमय मनोभावों के दूसरे लक्षण की ओर बढ़ता हूँ।
2. अनुग्रहमय मनोभावों का प्रथम वस्तुगत आधार ईश्वरीय बातों का, जैसी वे स्वयं में हैं, वह असीम उत्कृष्ट और मनोहर स्वभाव है; न कि उनका स्वयं से या स्वार्थ से माना गया कोई सम्बन्ध।
मैं कहता हूँ, कि ईश्वरीय बातों का सर्वोत्कृष्ट स्वभाव ही सच्चे संतों के आत्मिक मनोभावों का प्रथम, अर्थात प्रधान और मूल वस्तुगत आधार है; क्योंकि मैं यह नहीं मानता कि ईश्वरीय बातों का अपने आप से और अपने विशेष हित से जो सम्बन्ध है, वह उनके अनुग्रहमय मनोभावों पर सर्वथा प्रभावरहित है। क्योंकि इसका उन मनोभावों में, जो सचमुच पवित्र और आत्मिक हैं, एक गौण और परिणामस्वरूप प्रभाव हो सकता है, और वास्तव में होता भी है, जैसा मैं आगे चलकर दिखाऊँगा।
पहले यह बताया जा चुका है कि प्रेम का मनोभाव मानो समस्त मनोभावों का सोता है; और विशेष करके यह कि मसीही प्रेम सब अनुग्रहमय मनोभावों का सोता है: अब परमेश्वर और यीशु मसीह, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के कार्यों, और परमेश्वर के मार्गों आदि की ईश्वरीय उत्कृष्टता और महिमा ही वह प्रधान कारण है, जिससे एक सच्चा संत इन बातों से प्रेम करता है; न कि उनमें उसका कोई कल्पित हित, या उनसे उसे मिला या मिलनेवाला कोई सोचा हुआ लाभ, या उनका उसके हित से कोई ऐसा कल्पित सम्बन्ध, जिसके कारण यह कहा जा सके कि स्व-प्रेम ही इन बातों के प्रति उसके प्रेम का प्रथम आधार है।
कुछ लोग कहते हैं कि सब प्रेम स्व-प्रेम से ही उत्पन्न होता है; और यह वस्तुओं की प्रकृति में असम्भव है कि कोई मनुष्य परमेश्वर से, या किसी अन्य प्राणी से, ऐसा प्रेम रखे, जिसका आधार स्वयं से प्रेम न हो। परन्तु मैं नम्रतापूर्वक मानता हूँ कि वे यह बात सोच-विचार की कमी के कारण कहते हैं। उनका तर्क यह है, कि जो कोई परमेश्वर से प्रेम रखता है, और इस प्रकार उसकी महिमा या उसके सुख-भोग की कामना करता है, वह इन बातों को अपने ही सुख के रूप में चाहता है; परमेश्वर की महिमा, और उसके गुणों को देखना और उनका आनन्द लेना, उसे मनभावने और उसे सुखी करनेवाली बातें मानी जाती हैं; वह अपना सुख इन्हीं में रखता है, और इन्हें ऐसी वस्तुओं के रूप में चाहता है, जो (यदि प्राप्त हो जाएँ) उसे आनन्दित करेंगी, या उसे आनन्द और हर्ष से भर देंगी, और इस प्रकार उसे सुखी करेंगी। और इसी से, वे कहते हैं, स्व-प्रेम से, अर्थात अपने ही सुख की कामना से, वह यह चाहता है
कि परमेश्वर की महिमा हो, और वह उसके महिमामय गुणों को देखने और उनका आनन्द लेने की कामना करता है। परन्तु उन्हें इससे कुछ आगे बढ़कर विचार करना चाहिए, और यह ढूँढ़ना चाहिए कि मनुष्य ने परमेश्वर की महिमा में और उसके गुणों के चिन्तन और आनन्द में अपना सुख रखना कैसे आरम्भ किया।—इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब परमेश्वर की महिमा, और उसके गुणों को देखना, उसे इतना मनभावन हो जाता है कि वह इन्हीं बातों में अपना सर्वोच्च सुख रखता है, तब वह इन्हें वैसे ही चाहेगा, जैसे वह अपने सुख को चाहता है। परन्तु ये बातें उसे इतनी मनभावन कैसे हुईं, कि वह परमेश्वर की महिमा करने आदि को अपना सर्वोच्च सुख मानने लगा? क्या यह प्रेम का ही फल नहीं? मनुष्य को पहले परमेश्वर से प्रेम करना होगा, या उसका हृदय उससे संयुक्त होना होगा, इससे पहले कि वह परमेश्वर की भलाई को अपनी समझे, और परमेश्वर की महिमा और उसके सुख-भोग को अपना सुख मानकर चाहे। यह पुष्ट तर्क नहीं है कि क्योंकि मनुष्य का हृदय प्रेम में परमेश्वर से संयुक्त होने के बाद, उसके फलस्वरूप, वह उसकी महिमा और सुख-भोग को अपने सुख के रूप में चाहता है, इसलिये अपने इसी सुख की कामना ही अवश्य उसके प्रेम का कारण और आधार होगी; जब तक यह भी पुष्ट तर्क न माना जाए, कि क्योंकि पिता ने पुत्र को जन्म दिया, इसलिये निश्चय ही पुत्र ने पिता को जन्म दिया। यदि मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करने और अपना हृदय उससे इस प्रकार संयुक्त करने के बाद, कि वह परमेश्वर को अपना परम हित और परमेश्वर की भलाई को अपनी भलाई मानने लगे, तो इसका परिणाम और फल यह होगा कि स्व-प्रेम भी, अर्थात अपने ही सुख से प्रेम भी, उसे परमेश्वर की महिमा और सुख-भोग की कामना कराएगा; इससे यह नहीं निकलता कि स्व-प्रेम का यही व्यवहार उसके परमेश्वर-प्रेम से पहले हुआ, और उसका परमेश्वर-प्रेम उसी का परिणाम और फल था। इसका कारण स्व-प्रेम से सर्वथा भिन्न कोई और बात हो सकती है, अर्थात उसके मन के दृष्टिकोण और हृदय की रुचि में हुआ एक परिवर्तन; जिसके द्वारा वह परमेश्वर के स्वभाव में, जैसा वह स्वयं में है, एक सौन्दर्य, महिमा, और परम भलाई को ग्रहण करता है। सम्भव है कि यही वह बात हो, जो पहले उसके हृदय को परमेश्वर की ओर खींचती है, और उसके हृदय को उससे संयुक्त करती है, उसके अपने हित या सुख के हर विचार से पहले, यद्यपि इसके बाद, और इसके फलस्वरूप, वह अवश्य ही परमेश्वर में अपना हित और सुख ढूँढ़ता है।
मनुष्य के मन में व्यक्तियों या वस्तुओं के प्रति एक ऐसा प्रेम या मनोभाव भी हो सकता है, जो सचमुच स्व-प्रेम से उत्पन्न होता है; उसका किसी के प्रति पहले से माना हुआ सम्बन्ध, या दूसरे के द्वारा उसे पहले ही दिखाया गया कोई आदर, या पहले से प्राप्त या आशा की हुई कोई सहायता, ही वास्तव में उसके प्रेम का प्रथम आधार होता है, और उसका मनोभाव सर्वथा इसी से उत्पन्न होता है; और यह उस प्रिय व्यक्ति में निहित स्वभाव और गुणों के, सुन्दर और मनोहर होने के नाते, किसी भी रस या आनन्द से पहले होता है। परन्तु जब किसी मनुष्य के मन में दूसरे के प्रति सद्भाव जगानेवाली पहली बात यह हो, कि उसमें वे विशेषताएँ और गुण दिखाई दें, जो स्वयं में उसे मनोहर प्रतीत हों; और इसी कारण उनका धारक आदर और सद्भावना के योग्य जान पड़े, तो प्रेम बिलकुल भिन्न रीति से उत्पन्न होता है, बजाय इसके कि वह पहले किसी दूसरे के द्वारा दिए गए या उससे आशा किए गए किसी उपहार से उत्पन्न हो, जैसे कोई न्यायाधीश उस मनुष्य से प्रेम और पक्षपात करता है, जिसने उसे घूस दी हो; या उस सम्बन्ध से, जो वह मानता है कि दूसरे का उससे है, जैसे कोई मनुष्य दूसरे से इसलिये प्रेम करता है, क्योंकि वह उसे अपनी सन्तान मानता है। जब दूसरे के प्रति प्रेम इस रीति से उत्पन्न होता है, तो वह सचमुच और वास्तव में स्व-प्रेम से ही उत्पन्न होता है।
परमेश्वर या यीशु मसीह के प्रति वह मनोभाव, जो इस प्रकार वास्तव में स्व-प्रेम से उत्पन्न होता है, सच्चा अनुग्रहमय और आत्मिक प्रेम नहीं हो सकता, जैसा कि पहले कही गई बातों से स्पष्ट है: क्योंकि स्व-प्रेम पूर्णतः एक स्वाभाविक सिद्धांत है, और दुष्टात्माओं के हृदयों में भी उतना ही है, जितना स्वर्गदूतों के हृदयों में; और इसलिये निश्चय ही जो कुछ केवल इसी का परिणाम है, वह पहले बताई गई रीति से अलौकिक और ईश्वरीय नहीं हो सकता।(48) मसीह स्वयं इस प्रकार के प्रेम के विषय में स्पष्ट कहते हैं, कि यह दुष्ट मनुष्यों के प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं है: लूका 6:32, "यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिये क्या श्रेय है? पापी भी तो अपने प्रेम रखनेवालों से प्रेम रखते हैं।" और शैतान स्वयं जानता था कि परमेश्वर के प्रति वह आदर, जो इतना स्वार्थपूर्ण हो कि केवल प्राप्त या आशा किए गए लाभों के लिये हो (जो एक ही बात है), परमेश्वर की दृष्टि में व्यर्थ है; नहीं तो वह परमेश्वर के साम्हने अय्यूब के विरुद्ध ऐसा दोषारोपण कभी न करता, जैसा अय्यूब 1:9, 10 में है: "क्या अय्यूब बिना कारण परमेश्वर का भय मानता है? क्या तू ने उसकी और उसके घर की चारों ओर बाड़ा नहीं बान्धा," आदि। और परमेश्वर भी कभी
48 "मसीह के प्रति एक स्वाभाविक प्रेम है, जैसे उसके प्रति जो तेरा भला करता है, और अपने ही स्वार्थ के लिये; और एक आत्मिक प्रेम है, उसी के लिये, जिसमें केवल प्रभु ही महान माना जाता है।" शेपर्ड की 'दस कुँवारियों का दृष्टान्त', भाग 1, पृ. 25।
इस दोषारोपण को यदि सच होता, तो अप्रत्यक्ष रीति से भी सही नहीं मानता, कि उस बात की परीक्षा हो, और अय्यूब के साथ ऐसा बर्ताव किया जाए, जिससे परिणाम में यह प्रगट हो जाए, कि अय्यूब का परमेश्वर के प्रति आदर सचमुच इतना स्वार्थपूर्ण था या नहीं, और उसके आदर की सच्चाई और भलाई की परीक्षा इसी परिणाम पर छोड़ दी जाए।
यह मानने के अतिरिक्त और कुछ मानना अनुचित है, कि परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का प्रथम आधार वह बात है, जिसके कारण वह स्वयं में मनोहर, या प्रेम के योग्य है, अर्थात उसके स्वभाव की सर्वोच्च मनोहरता। निश्चय ही यही बात उसे मुख्यतः प्रिय बनाती है। किसी मनुष्य या किसी भी सृष्टि को मुख्यतः मनोहर बनानेवाली बात उसकी उत्कृष्टता ही है; और इसी प्रकार परमेश्वर को मुख्यतः मनोहर बनानेवाली, और सच्चे प्रेम का मुख्य आधार अवश्य ही उसकी उत्कृष्टता है। परमेश्वर का स्वभाव, अर्थात उसकी दिव्यता, अनन्त रूप से उत्कृष्ट है; वरन वह स्वयं अनन्त सौन्दर्य, तेज, और महिमा है। परन्तु इस उत्कृष्ट और मनोहर स्वभाव का सच्चा प्रेम वह कैसे हो सकता है, जो उसकी सच्ची मनोहरता के आधार पर स्थापित न हो? सौन्दर्य और तेज का सच्चा प्रेम वह कैसे हो सकता है, जो सौन्दर्य और तेज के ही लिये न हो? उस वस्तु का सच्चा मूल्यांकन वह कैसे हो सकता है, जो स्वयं में अनन्त रूप से योग्य और अनमोल है, यदि वह उसकी योग्यता और अनमोलता के लिये न हो? परमेश्वर के स्वभाव की यह अनन्त उत्कृष्टता, जैसी वह स्वयं में है, ही परमेश्वर में हर प्रकार से जो कुछ भला है, उसका सच्चा आधार है; परन्तु मनुष्य सच्चाई और उचित रीति से परमेश्वर से प्रेम कैसे कर सकता है, यदि वह उसकी उस उत्कृष्टता के लिये उससे प्रेम न करे, जो उसमें किसी भी रीति से भले या वांछनीय हर बात का आधार है? जिनका परमेश्वर के प्रति मनोभाव पहले उसकी उनके लिये उपयोगिता पर आधारित है, उनका मनोभाव गलत सिरे से आरम्भ होता है; वे परमेश्वर का सम्मान केवल ईश्वरीय भलाई की धारा की उस अन्तिम सीमा के लिये करते हैं, जहाँ वह उन्हें छूती है, और उनके हित तक पहुँचती है; और परमेश्वर के स्वभाव की उस अनन्त महिमा का उन्हें कोई सम्मान नहीं, जो मूल भलाई है, और समस्त भलाई का सच्चा सोता है, हर प्रकार की मनोहरता का प्रथम सोता है, और इस प्रकार समस्त सच्चे प्रेम का प्रथम आधार है।
स्व-प्रेम का एक स्वाभाविक सिद्धांत परमेश्वर और मसीह के प्रति बड़े-बड़े मनोभावों का आधार हो सकता है, बिना ईश्वरीय स्वभाव के सौन्दर्य और महिमा में से कुछ भी देखे। एक ऐसी कृतज्ञता भी होती है, जो केवल स्वाभाविक बात है। कृतज्ञता मनुष्य के प्राण के स्वाभाविक मनोभावों में से एक है, जैसे क्रोध भी है, और एक ऐसी कृतज्ञता होती है, जो स्व-प्रेम से उत्पन्न होती है, ठीक उसी रीति से जैसे क्रोध उत्पन्न होता है। मनुष्यों में क्रोध वह मनोभाव है, जो किसी दूसरे के विरुद्ध, या उसके विरोध में इसलिये उभरता है, कि उसमें कुछ ऐसा है, जो स्व-प्रेम के आड़े आता है: कृतज्ञता वह मनोभाव है, जो किसी के प्रति इसलिये होता है, कि उसने प्रेम किया, या प्रसन्न किया, या उसमें कुछ ऐसा है, जो स्व-प्रेम के अनुकूल है। और सच्चे और उचित प्रेम के बिना भी एक प्रकार की कृतज्ञता हो सकती है: जैसे सच्चे बैर के बिना भी क्रोध हो सकता है, जैसे माता-पिता अपनी सन्तान पर, जिन पर वे क्रोधित हो सकते हैं, और फिर भी साथ-साथ उनसे दृढ़ और स्थायी प्रेम रख सकते हैं।
यही कृतज्ञता वह सिद्धांत है, जो दुष्ट मनुष्यों में क्रियाशील होता है, जिसके विषय में मसीह लूका के छठे अध्याय में कहते हैं, कि पापी अपने प्रेम रखनेवालों से प्रेम रखते हैं; और जिसके विषय में वे उन चुंगी लेनेवालों के बारे में भी कहते हैं, जो सबसे अधिक शारीरिक और लम्पट प्रकार के मनुष्यों में से थे, मत्ती 5:46। यही वह सिद्धांत है, जिस पर अन्यायी न्यायाधीशों में घूस काम करती है; और यह एक ऐसा सिद्धांत है, जिसका अभ्यास मूक पशु भी करते हैं; एक कुत्ता
अपने उस स्वामी से प्रेम करता है, जो उस पर दया करता है। और हम अनगिनत उदाहरणों में देखते हैं कि केवल स्वभाव ही मनुष्यों में कृतज्ञता जगाने, या प्राप्त की गई दयालुताओं के लिये उनके हृदयों को दूसरों के प्रति धन्यवाद से प्रभावित करने के लिये पर्याप्त है; और कभी-कभी उनके प्रति भी, जिनके विरुद्ध उनका उसी समय स्थायी बैर है। इस प्रकार शाऊल एक बार नहीं, अनेक बार दाऊद के प्रति, अपना प्राण बचाए जाने के कारण, कृतज्ञता से बहुत प्रभावित हुआ, वरन पिघल भी गया, फिर भी वह उसका स्थायी शत्रु ही बना रहा। और जैसे मनुष्य, केवल स्वभाव से, मनुष्यों के प्रति इस प्रकार प्रभावित हो सकते हैं; वैसे ही वे परमेश्वर के प्रति भी हो सकते हैं। इसमें कोई रुकावट नहीं कि वही स्व-प्रेम मनुष्यों के प्रति जैसा काम करता है, वैसा ही परमेश्वर के प्रति भी करे। और हमें इसके स्पष्ट उदाहरण पवित्रशास्त्र में मिलते हैं; जैसे इस्राएल की सन्तान, जिन्होंने लाल समुद्र के तट पर परमेश्वर का स्तुतिगान किया, परन्तु शीघ्र ही परमेश्वर के कार्यों को भूल गए: और अरामी नामान, जो अपने कोढ़ के अद्भुत रीति से चंगे किए जाने से इतना प्रभावित हुआ, कि उसका हृदय आगे से उसी परमेश्वर की आराधना करने में लग गया, जिसने उसे चंगा किया था, और उसी की, सिवाय उस समय के, जब इससे उसके सांसारिक हित को हानि पहुँचने की सम्भावना होती।
इसी प्रकार नबूकदनेस्सर भी परमेश्वर की उस भलाई से बहुत प्रभावित हुआ, जिसके द्वारा उसने पशुओं के बीच रहने के बाद उसे उसकी बुद्धि और उसका राज्य लौटा दिया।
कृतज्ञता का इस प्रकार एक स्वाभाविक सिद्धांत होना, कृतघ्नता को और भी अधिक घृणित और जघन्य बना देता है; क्योंकि यह दुष्टता के भयानक प्रभुत्व को दिखाता है, जब वह मानव-स्वभाव के इन उत्तम सिद्धांतों को भी दबा और नियंत्रित कर देती है: जैसे यह बहुत से अन्यजातियों की दुष्टता की उच्च मात्रा के प्रमाण के रूप में कहा गया है, कि वे स्वाभाविक स्नेह से रहित थे, रोमियों 2:31। परन्तु कृतज्ञता या स्वाभाविक स्नेह की कमी का दुष्टता की उच्च मात्रा का प्रमाण होना, इस बात का कोई प्रमाण नहीं, कि सब कृतज्ञता और स्वाभाविक स्नेह में सद्गुण, या उद्धारक अनुग्रह का स्वभाव है।
स्व-प्रेम, केवल स्वाभाविक कृतज्ञता के प्रयोग द्वारा, अनेक रीतियों से परमेश्वर के प्रति एक प्रकार के प्रेम का आधार बन सकता है। एक प्रकार का प्रेम परमेश्वर की उस झूठी धारणा से उत्पन्न हो सकता है, जिसमें मनुष्यों की शिक्षा हुई है, या जिसे उन्होंने किसी रीति से ग्रहण कर लिया है; मानो वह केवल भलाई और दया ही है, और बदला लेनेवाला न्याय नहीं; या मानो उसकी भलाई के कार्य आवश्यक हैं, न कि स्वतंत्र और प्रभुसत्तात्मक; या मानो उसकी भलाई उनमें जो कुछ है, उस पर निर्भर है, और मानो वे उसे विवश करते हैं। ऐसे आधारों पर मनुष्य अपनी कल्पना में गढ़े हुए एक परमेश्वर से प्रेम कर सकते हैं, जबकि वे उस परमेश्वर से प्रेम करने से बहुत दूर होते हैं, जो स्वर्ग में राज्य करता है।
फिर, स्व-प्रेम मनुष्यों में परमेश्वर के प्रति एक मनोभाव का आधार इसलिये भी बन सकता है, कि परमेश्वर के सम्बन्ध में उनकी दशा के प्रति उनमें बड़ी असंवेदनशीलता है, और उनके विवेक में इस बात का बोध कराने के लिये दोषी होने का बोध नहीं, कि उन्होंने परमेश्वर को क्रोधित करने के लिये कैसा भयानक उकसाया है; उन्हें पाप की जघन्यता का, परमेश्वर के विरुद्ध होने के नाते, और उसके विरुद्ध परमेश्वर के पवित्र स्वभाव के अनन्त और भयंकर विरोध का कोई बोध नहीं होता: और इस प्रकार, अपने मन में अपने अनुकूल एक परमेश्वर गढ़कर, और परमेश्वर को अपने ही समान, उन पर कृपादृष्टि रखनेवाला और उनसे सहमत मानकर, वे उसे बहुत पसन्द कर सकते हैं, और उसके प्रति एक प्रकार का प्रेम अनुभव कर सकते हैं, जबकि वे सच्चे परमेश्वर से प्रेम करने से बहुत दूर हैं। और मनुष्यों के मनोभाव स्व-प्रेम के कारण परमेश्वर की ओर, उससे प्राप्त किसी उल्लेखनीय बाहरी लाभ के द्वारा भी बहुत उभारे जा सकते हैं; जैसा नामान, नबूकदनेस्सर, और लाल समुद्र के तट पर इस्राएल की सन्तान के साथ हुआ।
फिर, मनुष्यों में परमेश्वर के प्रति एक बहुत ऊँचा मनोभाव इस धारणा से भी उत्पन्न हो सकता है, और प्रायः होता भी है, कि परमेश्वर की उनके प्रति कृपादृष्टि और प्रेम है, और यही धारणा उनके परमेश्वर-प्रेम का प्रथम आधार बन जाती है।
नरक के भय के कारण जागृति और संकट के बाद, उन्हें अपनी कल्पना पर पड़े किसी प्रभाव के द्वारा, या पवित्रशास्त्र के किसी वचन के साथ या बिना वचन के तत्काल किसी सुझाव के द्वारा, या किसी और साधन के द्वारा, अचानक यह धारणा हो सकती है, कि परमेश्वर उनसे प्रेम करता है, और उसने उनके पाप क्षमा कर दिए हैं, और उन्हें अपनी सन्तान बना लिया है; और यही वह पहली बात है, जो उनके मनोभावों को यह प्रवाहित करती है
परमेश्वर और यीशु मसीह की ओर: और इसके बाद, और इसी आधार पर, परमेश्वर की बहुत सी बातें उन्हें मनोहर प्रतीत हो सकती हैं, और मसीह उन्हें उत्कृष्ट लग सकते हैं। और यदि ऐसे व्यक्तियों से पूछा जाए, कि क्या परमेश्वर स्वयं में मनोहर और प्रिय प्रतीत होता है, तो वे सम्भवतः तुरन्त 'हाँ' कह देंगे; जबकि सच तो यह है, कि यदि इस बात की गहराई से जाँच की जाए, तो परमेश्वर के विषय यह अच्छी धारणा उन असाधारण और अनन्त लाभों के बदले पहले ही मोल ले ली गई थी, जो वे कल्पना करते थे कि परमेश्वर से प्राप्त हुए हैं: और वे परमेश्वर को स्वयं में मनोहर इसी बात से मानते हैं, कि उसने उन्हें क्षमा किया है, उन्हें ग्रहण किया है, और संसार में सबसे अधिक उनसे प्रेम रखता है, और अपनी सारी अनन्त शक्ति और बुद्धि को उन्हें प्राथमिकता देने, आदरणीय बनाने, और ऊँचा उठाने में लगाने का वचन दिया है, और उनके लिये ठीक वैसा ही करेगा, जैसा वे उससे चाहें। जब वे एक बार इस धारणा में दृढ़ हो जाते हैं, तो परमेश्वर और मसीह को मनोहर और महिमामय मानना, और उनकी प्रशंसा और गुणगान करना उनके लिये सरल हो जाता है। उनके लिये यह मानना सरल हो जाता है कि मसीह एक मनोहर व्यक्ति हैं, और संसार में सबसे उत्तम हैं, जब वे पहले ही इस बात में दृढ़ हो जाते हैं कि वह, यद्यपि सारे विश्व के प्रभु हैं, उनके प्रेम में मोहित हैं, और उनका हृदय उन्हीं में लीन है, और वे उन्हें अपने अधिकांश पड़ोसियों से कहीं अधिक बहुमूल्य मानते हैं, और अनादि काल से उनसे प्रेम करते रहे हैं, और उनके लिये मरे, और स्वर्ग में अपने साथ अनन्त महिमा में राज्य करने देंगे। जब शारीरिक मनुष्यों की यही दशा होती है, तो उनकी अपनी वासनाएँ ही उन्हें मनोहर प्रतीत कराती हैं: अहंकार स्वयं उन्हें उस बात के पक्ष में पूर्वाग्रहग्रस्त कर देता है, जिसे वे कहते हैं
मसीह: स्वार्थी, अहंकारी मनुष्य स्वभाव से उसी को मनोहर कहता है, जो उसके हित में बहुत योगदान देता है, और उसकी महत्वाकांक्षा को तृप्त करता है।
और जैसे इस प्रकार के लोग आरम्भ करते हैं, वैसे ही आगे भी बढ़ते चलते हैं। उनके मनोभाव समय-समय पर मुख्यतः स्व-प्रेम के इसी आधार पर, और परमेश्वर के प्रेम के विषय अपनी अभिमानपूर्ण धारणा पर उभरते हैं। बहुतों को परमेश्वर के साथ संगति की एक झूठी धारणा होती है, मानो वह प्रेरणाओं, फुसफुसाहटों, और उनकी कल्पना पर तत्काल हुए बाहरी चित्रणों के द्वारा चलती हो। उनके साथ अक्सर ऐसा होता है; जिसे वे परमेश्वर के अपने प्रति महान प्रेम की अभिव्यक्तियाँ, और मानव-जाति के अन्य लोगों से ऊँचा उठाए जाने के प्रमाण मानते हैं; और इस प्रकार उनके मनोभाव प्रायः नए सिरे से उभरते रहते हैं।
जबकि संतों में सच्चे और पवित्र प्रेम का व्यवहार एक भिन्न रीति से उत्पन्न होता है। वे पहले यह नहीं देखते कि परमेश्वर उनसे प्रेम करता है, और फिर देखते हैं कि वह मनोहर है, वरन वे पहले देखते हैं कि परमेश्वर मनोहर है, और मसीह उत्कृष्ट और महिमामय है, और उनके हृदय पहले इसी दृष्टि से मोहित हो जाते हैं, और उनके प्रेम का व्यवहार समय-समय पर यहीं से आरम्भ होता है, और मुख्यतः इन्हीं दृष्टियों से उत्पन्न होता है; और फिर, परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर का प्रेम, और उसकी महान
कृपादृष्टि देखते हैं।(49) संत के मनोभाव परमेश्वर से आरम्भ होते हैं; और स्व-प्रेम का इन मनोभावों में हाथ केवल परिणामस्वरूप और गौण रूप में होता है। इसके विपरीत, वे झूठे मनोभाव स्वयं से आरम्भ होते हैं, और परमेश्वर में उत्कृष्टता की स्वीकृति, और उससे प्रभावित होना, केवल परिणामस्वरूप और आश्रित होता है। सच्चे संत के प्रेम में परमेश्वर सबसे नीचे की नींव है; उसके स्वभाव की उत्कृष्टता का प्रेम ही उन सब मनोभावों का आधार है, जो बाद में आते हैं, जिनमें स्व-प्रेम एक दासी के समान सम्मिलित रहता है: इसके विपरीत, कपटी स्वयं को सबसे नीचे, प्रथम आधार के रूप में रखता है, और परमेश्वर को उसके ऊपर की इमारत के रूप में रखता है; और परमेश्वर की महिमा की उसकी स्वीकृति भी उसके निजी हित के प्रति उसके ध्यान पर निर्भर करती है।
स्व-प्रेम मनुष्यों को न केवल इस बात से प्रभावित कर सकता है, कि वे परमेश्वर की उनके प्रति अलग-अलग दयालुता से प्रभावित हों; वरन इस बात से भी, कि वे एक समुदाय के अंश के रूप में परमेश्वर की दयालुता से प्रभावित हों: जैसे स्व-प्रेम का एक स्वाभाविक सिद्धांत, बिना किसी और सिद्धांत के, किसी मनुष्य को अपने राष्ट्र के हित के प्रति चिन्तित करने के लिये पर्याप्त हो सकता है: जैसे उदाहरणस्वरूप, वर्तमान युद्ध में, स्व-प्रेम स्वाभाविक मनुष्यों को अपने राष्ट्र की सफलताओं में आनन्दित, और उसकी हानियों पर दुःखी कर सकता है, क्योंकि वे इस शरीर के अंगों के रूप में चिन्तित हैं। इसी प्रकार यही स्वाभाविक सिद्धांत और आगे बढ़कर, वरन सारी मानव-जाति तक विस्तृत हो सकता है, और पृथ्वी के निवासियों को मिले लाभों से, अन्य ग्रहों के निवासियों के लाभों से आगे, प्रभावित हो सकता है, यदि हमें ज्ञात हो कि ऐसे निवासी हैं, और उनकी दशा कैसी है। इसी प्रकार यह सिद्धांत मनुष्यों को उन लाभों से प्रभावित कर सकता है, जो मानव-जाति को गिरे हुए स्वर्गदूतों से अधिक मिले हैं। और इसी से मनुष्य, इसी सिद्धांत के कारण, मानव-जाति के प्रति परमेश्वर की अद्भुत भलाई से, अर्थात गिरे हुए मनुष्य के लिये अपने पुत्र को मरने के लिये देने में उसकी महान भलाई से, और हमारे लिये इतनी बड़ी बातें सहने में मसीह के अद्भुत प्रेम से, और उस महान महिमा से, जो उन्होंने सुना है कि परमेश्वर ने हमारे लिये स्वर्ग में तैयार की है, बहुत प्रभावित हो सकते हैं; अपने आप को इस बात से सम्बद्ध और हितग्रस्त व्यक्ति मानते हुए, कि वे इतने अधिक कृपापात्र इस जाति के प्राणियों में से कुछ हैं: यहाँ भी स्वाभाविक कृतज्ञता का वही सिद्धांत मनुष्यों को प्रभावित कर सकता है, जैसे व्यक्तिगत लाभों के मामले में होता है।
परन्तु जो बातें मैंने कही हैं, उनका किसी भी रीति से यह अर्थ नहीं, कि परमेश्वर के प्रति सब कृतज्ञता केवल एक स्वाभाविक बात है, और कोई आत्मिक कृतज्ञता जैसी वस्तु नहीं, जो एक पवित्र और ईश्वरीय मनोभाव है: उनका इतना ही अर्थ है, कि एक ऐसी कृतज्ञता है, जो केवल स्वाभाविक है, और जब व्यक्तियों के मनोभाव परमेश्वर के प्रति केवल या मुख्यतः प्राप्त हुए लाभों के लिये होते हैं, तो उनका मनोभाव केवल स्वाभाविक कृतज्ञता का व्यवहार है। निःसन्देह एक ऐसी अनुग्रहमय कृतज्ञता भी है, जो उस सब कृतज्ञता से बहुत भिन्न है, जिसका अनुभव स्वाभाविक मनुष्य करते हैं। यह निम्नलिखित बातों में भिन्न है:
1. परमेश्वर की हम पर दयालुता के लिये सच्ची कृतज्ञता या धन्यवाद, उस आधार से उत्पन्न होता है, जो पहले से रखा गया है, अर्थात परमेश्वर के प्रति उसके स्वयं में जैसा है, उसके लिये प्रेम; जबकि स्वाभाविक कृतज्ञता का ऐसा कोई
49 "मसीह को देखना एक ऐसा भी है, जो मनुष्य के विश्वास करने के बाद होता है, अर्थात मसीह को उसके प्रेम में देखना, आदि। परन्तु मैं उस पहली दृष्टि की बात कर रहा हूँ, जो विश्वास के दूसरे कार्य से पहले होती है, और वह उसे उसकी महिमा में, जैसा वह है, प्रत्यक्ष रूप से, अथवा वास्तविक रूप से देखना है।"
शेपर्ड की 'दस कुँवारियों का दृष्टान्त', भाग 1, पृ. 74।
पूर्व आधार नहीं होता। परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ मनोभाव की अनुग्रहमय हलचलें, प्राप्त हुई दयालुता के लिये, सदा उस प्रेम के भण्डार से उत्पन्न होती हैं, जो पहले से ही हृदय में है, और सबसे पहले अन्य आधारों पर, अर्थात परमेश्वर की अपनी उत्कृष्टता पर स्थापित है; और इसी कारण मनोभाव परमेश्वर की दयालुता के अवसरों पर प्रवाहित होने के लिये तत्पर रहते हैं। संत, परमेश्वर की महिमा देखकर, और उससे अभिभूत होकर, और इस कारण उसके प्रेम में मोहित होकर, उसका हृदय इसी से कोमल हो जाता है, और प्राप्त दयालुताओं से सरलता से प्रभावित होता है। यदि किसी मनुष्य को दूसरे से प्रेम नहीं है, फिर भी किसी असाधारण दयालुता से उसकी कृतज्ञता जग सकती है; जैसे शाऊल दाऊद के प्रति: परन्तु यह उस बात के समान नहीं, जैसे किसी प्रिय मित्र के प्रति मनुष्य की कृतज्ञता होती है, जिसके लिये उसका हृदय पहले से ही उच्च आदर और प्रेम से भरा हो; जिसका हृदय इसी कारण उसके प्रति कोमल हो जाता है, और कृतज्ञता से अधिक सरलता से, और एक भिन्न रीति से प्रभावित होता है। अनुग्रहमय कृतज्ञता में स्व-प्रेम को बहिष्कृत नहीं किया जाता; संत परमेश्वर से उसकी उन पर की गई दयालुता के लिये प्रेम करते हैं:
भजन संहिता 116:1, "मैं यहोवा से प्रेम रखता हूँ, क्योंकि उस ने मेरी बिनती का शब्द सुना है।" परन्तु इसमें कुछ और भी सम्मिलित है; और एक और प्रेम मार्ग तैयार करता है, और इन कृतज्ञ मनोभावों के लिये आधार रखता है।
2. अनुग्रहमय कृतज्ञता में मनुष्य परमेश्वर की भलाई और स्वतंत्र अनुग्रह के गुण से न केवल इसलिये प्रभावित होते हैं, कि वे उसमें सम्बद्ध हैं, या वह उनके हित को प्रभावित करता है, वरन इसलिये भी, कि वह परमेश्वर के स्वभाव की महिमा और सौन्दर्य का एक अंश है। परमेश्वर का वह अद्भुत और अद्वितीय अनुग्रह, जो छुटकारे के कार्य में प्रगट होता है, और यीशु मसीह के मुख पर चमकता है, स्वयं में अनन्त रूप से महिमामय है, और स्वर्गदूतों को भी वैसा ही प्रतीत होता है; यह परमेश्वर के स्वभाव की नैतिक सिद्धता और सौन्दर्य का एक बड़ा अंश है। यह महिमामय होता, चाहे यह हमारे प्रति प्रगट किया जाता या नहीं; और जो संत इसके लिये अनुग्रहमय धन्यवाद करता है, वह इसे ऐसा ही देखता है, और इसी रूप में इसमें आनन्दित होता है: यद्यपि इसमें उसका अपना सम्बन्ध उसके मन को और अधिक संलग्न करने, और ध्यान तथा मनोभाव को बढ़ाने में सहायक होता है; और यहाँ स्व-प्रेम एक दासी के समान सहायता करता है, ऊँचे सिद्धांतों के अधीन रहकर, मन को दर्शन और चिन्तन की ओर ले जाने में, और ध्यान को संलग्न और स्थिर करने में, और आनन्द तथा प्रेम को बढ़ाने में।—परमेश्वर की उन पर दयालुता एक दर्पण है, जो परमेश्वर उनके साम्हने रखता है, जिसमें वे परमेश्वर की भलाई के गुण के सौन्दर्य को देख सकें: इस प्रकार इस गुण के व्यवहार और प्रदर्शन उनके निकट लाए जाते हैं, और उनके ठीक साम्हने रख दिए जाते हैं। इसलिये परमेश्वर के प्रति पवित्र धन्यवाद में, परमेश्वर की भलाई में हमारे हित का सम्बन्ध उससे हमारे प्रभावित होने का प्रथम आधार नहीं है; वह पहले से ही हृदय में उस प्रेम के भण्डार में रखा गया था, जो परमेश्वर के प्रति, उसकी स्वयं में उत्कृष्टता के लिये था, जो हृदय को कोमल और उसकी हम पर की भलाई से ऐसे प्रभावों को ग्रहण करने योग्य बनाता है। हमारा अपना हित, या हमें प्राप्त लाभ, मनोभाव के वर्तमान व्यवहार का न तो एकमात्र, और न ही मुख्य वस्तुगत आधार है, वरन परमेश्वर की भलाई, उसके स्वभाव के सौन्दर्य के अंश के रूप में; यद्यपि उस मनोहर गुण की अभिव्यक्तियाँ, जो हमारे लिये उसके व्यवहार में हमारी आँखों के ठीक साम्हने रखी जाती हैं, उस समय मन का ध्यान उस सौन्दर्य की ओर खींचने का विशेष अवसर होती हैं, और ध्यान को स्थिर करने, तथा मनोभाव को बढ़ाने में सहायक होती हैं।
सम्भव है कि कुछ लोग अब तक कही गई इस सारी बात के विरुद्ध, वह वचन प्रस्तुत करने को तैयार हों, 1
यूहन्ना 4:19: "हम इसलिये प्रेम रखते हैं, कि पहले उस ने हम से प्रेम रखा," मानो इसका अर्थ यह हो कि सच्चे संतों के प्रति परमेश्वर का प्रेम ही उनके परमेश्वर-प्रेम का प्रथम आधार है।
इसके उत्तर में, मैं यह कहना चाहूँगा, कि प्रेरित का इन शब्दों में अभिप्राय, परमेश्वर के हमारे प्रति प्रेम को इस बात से महिमामय दिखाना है, कि उसने हमसे प्रेम किया, जब हमें उससे कोई प्रेम न था; जैसा उस पर स्पष्ट हो जाएगा, जो इस वचन और अगले दो वचनों की तुलना 9वें, 10वें, और 11वें वचनों से करेगा। और यह कि परमेश्वर ने हमसे प्रेम किया, जब हमें उससे कोई प्रेम न था, इसे प्रेरित इस तर्क से सिद्ध करते हैं, कि चुने हुए लोगों के प्रति परमेश्वर का प्रेम ही उनके परमेश्वर-प्रेम का आधार है। और यह तीन रीतियों में है।—1. संतों का परमेश्वर-प्रेम परमेश्वर के उनके प्रति प्रेम का फल है, क्योंकि यह उसी प्रेम का दान है। परमेश्वर ने उन्हें अपने प्रति प्रेम की आत्मा दी, क्योंकि उसने अनादि काल से उनसे प्रेम किया। और इस दृष्टि से चुने हुए लोगों के प्रति परमेश्वर का प्रेम उनके परमेश्वर-प्रेम का प्रथम आधार है, जैसे यह उनके नए जन्म का, और उनके सम्पूर्ण छुटकारे का आधार है। 2. पापी मनुष्यों के प्रति परमेश्वर ने यीशु मसीह के द्वारा, छुटकारे के कार्य में, अपने अद्भुत प्रेम के जो व्यवहार और प्रकाशन किए हैं, वे स्वर्गदूतों और मनुष्यों दोनों के आगे, परमेश्वर की नैतिक सिद्धता की महिमा के प्रमुख प्रकाशनों में से एक हैं; और इसलिये दोनों के परमेश्वर-प्रेम का एक मुख्य वस्तुगत आधार है; जो पहले कही गई बात के पूर्णतः अनुकूल है। 3. किसी विशेष चुने हुए व्यक्ति के प्रति परमेश्वर का प्रेम, जो उसके मन फिराने से प्रगट होता है, उसके लिये परमेश्वर की नैतिक सिद्धता और महिमा का एक महान प्रकाशन है, और पवित्र कृतज्ञता के प्रेम को जगाने का उचित अवसर है, जैसा पहले कहा जा चुका है। और यह कि संत इन दृष्टियों से परमेश्वर से प्रेम करते हैं, क्योंकि उसने पहले उनसे प्रेम किया, प्रेरित के उस स्थान के तर्क के उद्देश्य को पूर्णतः पूरा करता है। इसलिये इससे कोई अच्छा तर्क संतों के उस आत्मिक और अनुग्रहमय प्रेम के विरुद्ध नहीं निकाला जा सकता, जो मुख्यतः ईश्वरीय बातों की उत्कृष्टता से उत्पन्न होता है, जैसी वे स्वयं में हैं, न कि उनके हित से माने गए किसी सम्बन्ध से।
और जैसे संतों के प्रेम के साथ है, वैसे ही उनके आनन्द, और आत्मिक हर्ष और सुख के साथ भी है: इसका प्रथम आधार ईश्वरीय बातों में उनके हित का कोई विचार या धारणा नहीं है; वरन यह मुख्यतः उस मीठे आनन्द में है, जो उनके मन को इन बातों की ईश्वरीय और पवित्र सुन्दरता के, जैसी वे स्वयं में हैं, चिन्तन के दर्शन में प्राप्त होता है। और यही वास्तव में कपटी के आनन्द, और सच्चे संत के आनन्द के बीच मुख्य अन्तर है। पहला अपने आप में आनन्दित होता है; उसके आनन्द का प्रथम आधार स्वयं है: दूसरा परमेश्वर में आनन्दित होता है। कपटी का मन सबसे पहले अपने ही विशेषाधिकार से, और उस सुख से प्रसन्न और आनन्दित होता है, जो उसे लगता है कि उसने प्राप्त कर लिया है, या प्राप्त करेगा। सच्चे संतों का मन सबसे पहले परमेश्वर की बातों के महिमामय और मनोहर स्वभाव के मीठे विचारों से अवर्णनीय रूप से प्रसन्न और आनन्दित होता है। और यही उनके सब सुखों का सोता, और उनके सब आनन्दों का सार है: यही उनके आनन्द का आनन्द है। ईश्वरीय बातों के सुन्दर और आनन्ददायक स्वभाव के दर्शन में जो मीठा और मोहक आनन्द उन्हें मिलता है, वही उस आनन्द का आधार है, जो उन्हें बाद में, इस विचार से मिलता है कि ये बातें उनकी हैं। परन्तु कपटियों के मनोभावों की निर्भरता एक विपरीत क्रम में है: वे पहले इससे आनन्दित और उत्साहित होते हैं, कि परमेश्वर उनका इतना ध्यान रखता है; और फिर इसी आधार पर वह उन्हें एक प्रकार से मनोहर प्रतीत होता है।
सच्चे संत को परमेश्वर में जो आनन्द मिलता है, उसका प्रथम आधार परमेश्वर की अपनी सिद्धता है; और मसीह में उसे जो आनन्द मिलता है, उसका प्रथम आधार मसीह की अपनी सुन्दरता है; वह उसे स्वयं में दस हज़ारों में श्रेष्ठ, और सर्वथा मनोहर दिखाई देते हैं। मसीह के द्वारा उद्धार का मार्ग उसके लिये एक आनन्ददायक मार्ग है, क्योंकि इसमें ईश्वरीय सिद्धताओं की मीठी और अद्भुत अभिव्यक्तियाँ हैं: सुसमाचार के पवित्र सिद्धान्त, जिनके द्वारा परमेश्वर की महिमा और मनुष्य का दीनीकरण होता है, पवित्रता का आदर और प्रचार होता है, और पाप को बहुत लज्जित और हतोत्साहित किया जाता है, और स्वतंत्र तथा प्रभुसत्तात्मक प्रेम प्रगट होता है, उसकी दृष्टि में महिमामय सिद्धान्त हैं, और उसके स्वाद के लिये मीठे हैं, इन बातों में अपने हित की किसी भी धारणा से पहले। सच तो यह है, कि संत परमेश्वर में अपने हित में, और इस बात में कि मसीह उनके हैं, आनन्दित होते हैं: और इसका उन्हें बड़ा कारण भी है, परन्तु यह उनके आनन्द का प्रथम सोता नहीं है। वे पहले परमेश्वर में, उसके स्वयं में महिमामय और उत्कृष्ट होने के कारण आनन्दित होते हैं, और फिर गौण रूप से इस बात में आनन्दित होते हैं, कि इतना महिमामय परमेश्वर उनका है।—उनका हृदय पहले मसीह की उत्कृष्टता, और उसके अनुग्रह की उत्कृष्टता, और उसके द्वारा उद्धार के मार्ग की सुन्दरता के दर्शन से मिठास से भर जाता है, और फिर उन्हें इस बात में एक गौण आनन्द मिलता है, कि ऐसा उत्कृष्ट उद्धारकर्ता, और ऐसा उत्कृष्ट अनुग्रह उनका है।(50) परन्तु जो सच्चे संत की इमारत है, वही कपटी की नींव है। जब वे सुसमाचार की अद्भुत बातें, परमेश्वर के अपने पुत्र को भेजने में उसके महान प्रेम, पापियों के प्रति मसीह के दिव्य प्रेम, और मसीह ने संतों के लिये जो महान बातें मोल ली हैं और वचन दी हैं, इन बातों को सुनते हैं, और इन्हें सजीव और वाक्पटुतापूर्ण रीति से प्रस्तुत होते सुनते हैं; तो वे बड़े सुख के साथ इन्हें सुन सकते हैं, और जो सुनते हैं, उससे उत्साहित हो सकते हैं; परन्तु यदि उनके आनन्द की जाँच की जाए, तो पता चलेगा कि उसका इसके अतिरिक्त कोई और आधार नहीं, कि वे इन बातों को अपनी समझते हैं, यह सब उन्हें ऊँचा उठाता है, वे मसीह के उस महान प्रेम के विषय सुनना पसन्द करते हैं, जो कुछ को दूसरों से इतना अलग करता है; क्योंकि स्व-प्रेम, वरन अहंकार भी उन्हें दूसरों से बड़ा भेद चाहनेवाला बना देता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं, कि अपनी दशा के विषय इस दृढ़ धारणा में, वे ऐसे सिद्धान्त के अधीन अच्छा अनुभव करते हैं, और यह सुनकर कि परमेश्वर और मसीह उनका कितना ध्यान रखते हैं, अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। इसलिये उनका आनन्द वास्तव में अपने ही आप में आनन्द है, न कि परमेश्वर में।
और क्योंकि कपटियों का आनन्द अपने ही आप में है, इसलिये यह होता है कि अपने आनन्द और उत्साह में, वे अपनी दृष्टि स्वयं पर ही रखने के आदी होते हैं: जिन्हें वे आत्मिक प्रकाशन या अनुभव कहते हैं, उन्हें प्राप्त करके, उनके मन उन्हीं में लगे रहते हैं, अपने ही अनुभवों की प्रशंसा करते हुए; और जिससे वे मुख्यतः ग्रस्त और उत्साहित होते हैं, वह नहीं है 50 डॉ. ओवन, 'आत्मा पर', पृ. 199, आत्मा के एक सामान्य कार्य के विषय बोलते हुए, कहते हैं, "इस कार्य का मन पर, जो इससे प्रभावित होनेवाला प्रथम विषय है, प्रभाव इतना आगे नहीं बढ़ता कि उसे प्रगट की गई बातों के मनोहर आत्मिक स्वभाव और उत्कृष्टता में आनन्द, सन्तोष, और तृप्ति मिले। उद्धारक ज्योति का सच्चा स्वभाव इसमें है, कि यह मन को आत्मिक बातों में ऐसी प्रत्यक्ष, सहज अन्तर्दृष्टि और झलक देती है, कि वे अपने ही आत्मिक स्वभाव में उसके अनुकूल हों, उसे भाएँ, और उसे तृप्त करें; इस प्रकार कि वह उन्हीं में रूपान्तरित हो जाए, उन्हीं के साँचे में ढल जाए, और उन्हीं में विश्राम पाए।"
परमेश्वर की महिमा, या मसीह की सुन्दरता, वरन उनके अपने अनुभवों की सुन्दरता है। वे अपने आप से सोचते रहते हैं, यह कैसा उत्तम अनुभव है! यह कैसा महान प्रकाशन है! मुझे कैसी अद्भुत बातें मिली हैं! और इस प्रकार वे मसीह के स्थान पर, और उसकी सुन्दरता और पूर्णता के स्थान पर, अपने अनुभवों को रख देते हैं; और मसीह यीशु में आनन्दित होने के बजाय, वे अपने अद्भुत अनुभवों में आनन्दित होते हैं; अपने प्राणों को उस बात के दर्शन से पोषित करने और तृप्त करने के बजाय, जो उनसे बाहर है, अर्थात सुसमाचार में प्रगट की गई बातों की सहज, मीठी, ताज़गी देनेवाली मनोहरता से, उनकी आँखें इन बातों से हट जाती हैं, या कम-से-कम वे इन्हें केवल तिरछी दृष्टि से देखते हैं; परन्तु जो विषय उनके चिन्तन को बाँधे रखता है, वह उनका अनुभव है; और वे अपने प्राणों को पोषित कर रहे हैं, और स्वार्थी सिद्धांत को अपने प्रकाशनों के दर्शन से भोज दे रहे हैं: वे मसीह को, जो प्रगट हुआ है, उसकी अपेक्षा अपने प्रकाशनों में अधिक सान्त्वना पाते हैं, यही अनुभवों और मनोदशाओं पर जीने की सच्ची धारणा है, न कि अनुभवों को उन चिन्हों के रूप में उपयोग करना, जिन पर वे अपनी अच्छी दशा के प्रमाण के लिये निर्भर रहते हैं, जिसे कुछ लोग अनुभवों पर जीना कहते हैं; यद्यपि यह देखने योग्य है, कि उनमें से कुछ, जो ऐसा करते हैं, अनुभवों पर जीने के, इसके सच्चे अर्थ में, सबसे कुख्यात हैं।
कपटियों के मनोभाव प्रायः इसी रीति से होते हैं; वे पहले अपनी कल्पना पर पड़े किसी प्रभाव से, या किसी ऐसी प्रेरणा से बहुत प्रभावित होते हैं, जिसे वे परमेश्वर की ओर से उसके प्रेम, उनके सुख, और किसी दृष्टि से उनके ऊँचे विशेषाधिकारों का तत्काल सुझाव या साक्षी समझ लेते हैं, चाहे पवित्रशास्त्र के किसी वचन के साथ हो, या बिना वचन के; वे इसे एक महान प्रकाशन मानकर बहुत मोहित हो जाते हैं, और इससे ऊँचे मनोभाव उत्पन्न होते हैं। और जब उनके मनोभाव उभर जाते हैं, तब वे उन ऊँचे मनोभावों को देखते हैं, और उन्हें महान और अद्भुत अनुभव कहते हैं; और उनकी यह धारणा होती है कि परमेश्वर उन मनोभावों से बहुत प्रसन्न है; और इससे वे और भी प्रभावित होते हैं; और इस प्रकार वे अपने ही मनोभावों से प्रभावित होते हैं। और इस प्रकार उनके मनोभाव ऊँचे-से-ऊँचे उठते जाते हैं, यहाँ तक कि कभी-कभी वे पूर्णतः उसी में डूब जाते हैं: और साथ ही आत्म-अभिमान, और उग्र उत्साह उभरता है; और यह सब हवा में बने महल के समान, कल्पना, स्व-प्रेम, और अहंकार के अतिरिक्त किसी और आधार पर नहीं बना होता।
और जैसे इस प्रकार के लोगों के विचार होते हैं, वैसी ही उनकी बातचीत होती है; क्योंकि मन की भरपूरी से मुँह बोलता है। जैसे अपने ऊँचे मनोभावों में वे अपनी दृष्टि अपने अनुभवों की सुन्दरता, और अपनी उपलब्धियों की महानता पर रखते हैं; वैसे ही वे अपने ही विषय में बहुत बोलनेवाले होते हैं।—सच्चा संत, जब बड़े आत्मिक मनोभावों के अधीन होता है, तो अपने हृदय की भरपूरी से, परमेश्वर के, और उसकी महिमामय सिद्धताओं और कार्यों के, और मसीह की सुन्दरता और मनोहरता के, और सुसमाचार की महिमामय बातों के विषय बहुत बोलने को तैयार रहता है: परन्तु कपटी, अपने ऊँचे मनोभावों में, उस वस्तु की अपेक्षा, जो प्रगट हुई है, प्रकाशन के विषय अधिक बोलते हैं; वे उन महान बातों के विषय बातें करते नहीं थकते, जो उन्हें मिली हैं, उन अद्भुत प्रकाशनों के विषय, जो उन्हें हुए हैं, कि वे परमेश्वर के अपने प्रति प्रेम के विषय कितने निश्चिन्त हैं, उनकी दशा कितनी सुरक्षित है, और वे कैसे जानते हैं कि वे स्वर्ग जाएँगे, आदि।
सच्चा संत, जब परमेश्वर और मसीह की मीठी महिमा के सच्चे प्रकाशनों का आनन्द ले रहा होता है, तो उसका मन उस बात से, जिसे वह अपने से बाहर देखता है, इतना मोहित और संलग्न होता है, कि उस समय वह रुककर स्वयं को, और अपनी उपलब्धियों को देख ही नहीं सकता: अपने चिन्तन के मोहक विषय से अपनी दृष्टि हटाकर, अपने अनुभव का निरीक्षण करना, और अपने आप से यह सोचने में समय बिताना, कि यह कैसी बड़ी उपलब्धि है, और अब दूसरों को सुनाने के लिये मेरे पास कैसी अच्छी कहानी है, उसके लिये एक ऐसा ध्यान-भंग और हानि होगी, जिसे वह सहन नहीं कर सकता। और न ही उस समय उसके मन का सुख और मिठास मुख्यतः अपनी दशा की सुरक्षा के विचार से, या अपनी योग्यताओं, अनुभवों, या परिस्थितियों के दर्शन में उसे जो कुछ मिलता है, उससे उत्पन्न होती है; वरन उस ईश्वरीय और सर्वोच्च सुन्दरता से, जो अपने से बाहर उसके प्रत्यक्ष दर्शन का विषय है; जो उसके मन को मीठे रूप से लुभाती है, और दृढ़ता से बाँधे रखती है।
जैसे कपटियों का प्रेम और आनन्द सब स्व-प्रेम के सोते से है, वैसे ही उनके अन्य मनोभाव भी, अर्थात पाप के लिये उनका शोक, उनकी दीनता और समर्पण, उनकी धार्मिक अभिलाषाएँ और उत्साह भी: मानो सब कुछ पहले ही से इस बात से भुगता दिया गया है, कि परमेश्वर उनकी कल्पना के अनुसार, उनके स्व-प्रेम और उनकी वासनाओं को उनका इतना ध्यान रखकर, और उन्हें इतना ऊँचा उठाकर, अत्यन्त सन्तुष्ट करता है। भ्रष्ट होते हुए भी, स्वभाव के लिये यह सरल है, कि पहले से ही स्वर्ग के सबसे बड़े कृपापात्रों में से एक होने की धारणा के अधीन, और ऐसा परमेश्वर पाकर, जो उनकी उनके पापों में इस प्रकार रक्षा और सहायता करता है, इस कल्पित परमेश्वर से प्रेम करे, जो उन्हें इतना भाता है, और उसकी स्तुति करे, उसके अधीन हो जाए, और उसके लिये उग्र और उत्साही हो जाए। बहुतों के ऊँचे मनोभाव इसी कल्पना पर बने होते हैं, कि वे प्रतिष्ठित संत हैं। यदि वह धारणा, जो वे अपने विषय रखते हैं, हटा ली जाए, यदि वे यह सोचें कि वे संतों के निम्न वर्ग में से कुछ हैं
(यद्यपि वे अब भी अपने आप को सच्चे संत मानें), तो उनके ऊँचे मनोभाव धराशायी हो जाएँगे। यदि वे अपने ही हृदयों की पापमयता और नीचता, और अपनी सर्वोत्तम सेवाओं और सर्वोत्तम मनोभावों के बीच अपनी विकृति की, थोड़ी भी झलक देख लें, तो यह उनके मनोभावों को समाप्त कर देगा; क्योंकि उनके मनोभाव स्वयं पर बने हैं, इसलिये आत्म-ज्ञान उन्हें नष्ट कर देगा। परन्तु सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों की बात अलग है, वे कहीं और बने हैं; उनका आधार स्वयं से बाहर, परमेश्वर और यीशु मसीह में है; और इसलिये स्वयं का, अपनी विकृति का, और अपने अनुभवों की नीचता का बोध, यद्यपि उनके मनोभावों को शुद्ध करेगा, तौभी उन्हें नष्ट नहीं करेगा, वरन कुछ दृष्टियों से उन्हें और मीठा और ऊँचा करेगा।
3. जो मनोभाव सचमुच पवित्र हैं, वे मुख्यतः ईश्वरीय बातों की नैतिक उत्कृष्टता की मनोहरता पर आधारित हैं। अथवा (इसे दूसरी रीति से कहें तो) ईश्वरीय बातों से उनकी नैतिक उत्कृष्टता के सौन्दर्य और मिठास के लिये प्रेम ही सब पवित्र मनोभावों का प्रथम आरम्भ और सोता है।
यहाँ, कम पढ़े-लिखे पाठक की सहायता के लिये, मैं यह स्पष्ट करूँगा कि 'ईश्वरीय बातों की नैतिक उत्कृष्टता' से मेरा क्या अभिप्राय है।
और यह देखना चाहिए, कि यहाँ 'नैतिक' शब्द को उस साधारण और सामान्य अर्थ में नहीं समझना चाहिए, जिसमें मनुष्य 'नैतिकता' और 'नैतिक आचरण' की बात करते समय इसका प्रयोग करते हैं; अर्थात नैतिक व्यवस्था के कर्तव्यों के, और विशेष रूप से (आज्ञाओं की) दूसरी पटिया के कर्तव्यों के, बाहरी अनुरूपण का अभिप्राय; या अधिक-से-अधिक, उन प्रतीयमान सद्गुणों से अधिक कुछ नहीं, जो स्वाभाविक सिद्धांतों से उत्पन्न होते हैं, उन सद्गुणों के विपरीत, जो अधिक आन्तरिक, आत्मिक, और ईश्वरीय हैं; जैसे बहुत से अन्यजातियों की सच्चाई, न्यायप्रियता, उदारता, सुशीलता, और लोकहित की भावना को नैतिक सद्गुण कहा जाता है, सच्चे मसीहियों के पवित्र विश्वास, प्रेम, नम्रता, और स्वर्गीय-मनोवृत्ति से भिन्न करके: मैं कहता हूँ, कि यहाँ 'नैतिक' शब्द को इस रीति से नहीं समझना चाहिए।
परन्तु जो अभिप्राय है उसे ठीक-ठीक समझने के लिये यह देखना आवश्यक है, कि धर्मशास्त्री साधारणतः नैतिक भलाई-बुराई और स्वाभाविक भलाई-बुराई में भेद करते हैं। नैतिक बुराई से उनका अभिप्राय पाप की बुराई से है, अर्थात् वह बुराई जो कर्तव्य के विरुद्ध है, और जो उचित तथा यथोचित के विपरीत है। स्वाभाविक बुराई से उनका अभिप्राय उस बुराई से नहीं है जो ठीक-ठीक कर्तव्य के विरुद्ध हो; वरन उससे है जो केवल स्वभाव के विपरीत है, बिना किसी कर्तव्य के नियम के सम्बन्ध के। इसलिये दुःख भोगने की बुराई को स्वाभाविक बुराई कहा जाता है, जैसे पीड़ा और यातना, अपमान, और इसी प्रकार की अन्य बातें: ये वस्तुएँ केवल स्वभाव के विपरीत हैं, बुरे और भले दोनों के स्वभाव के विपरीत हैं, और दुष्ट मनुष्यों तथा दुष्टात्माओं को भी उतनी ही घृणित लगती हैं जितनी भले मनुष्यों और स्वर्गदूतों को। इसी प्रकार स्वाभाविक दोषों को भी स्वाभाविक बुराइयाँ कहा जाता है, जैसे यदि कोई बालक शारीरिक रूप से विकृत हो या जन्म से मूर्ख हो; ये स्वाभाविक बुराइयाँ हैं, परन्तु नैतिक बुराइयाँ नहीं, क्योंकि इनमें ठीक-ठीक पाप की बुराई का स्वभाव नहीं है। दूसरी ओर, जैसे नैतिक बुराई से धर्मशास्त्रियों का अभिप्राय पाप की बुराई से है, अर्थात् जो उचित के विपरीत है; वैसे ही नैतिक भलाई से उनका अभिप्राय उस भलाई से है जो पाप के विपरीत है, अर्थात् वह भलाई जो इच्छा और चुनाव रखनेवाले प्राणियों में है, जिसके द्वारा वे, स्वेच्छाचारी कर्ता होने के नाते, वैसे ही होते और कार्य करते हैं जैसा उन्हें होना और करना चाहिये, अर्थात् जो सबसे अधिक उचित, उपयुक्त और मनोहर है। स्वाभाविक भलाई से उनका अभिप्राय उस भलाई से है जो पवित्रता या सद्गुण से सर्वथा भिन्न प्रकार की है, अर्थात् वह जो स्वभाव को सिद्ध करती या उसके अनुकूल है, स्वभाव को किसी भी पवित्र या अपवित्र गुण से अलग करके, और उचित-अनुचित के किसी नियम या माप से बिना किसी सम्बन्ध के विचार करते हुए।
इस प्रकार सुख एक स्वाभाविक भलाई है; वैसे ही सम्मान भी है, वैसे ही बल भी है; वैसे ही चिन्तनात्मक ज्ञान, मानवीय विद्या, और नीति-कुशलता भी है।—इस प्रकार मनुष्यों के पास जो स्वाभाविक भलाई है, और उनकी नैतिक भलाई के बीच भेद करना है; और स्वर्ग के स्वर्गदूतों की स्वाभाविक और नैतिक भलाई के बीच भी भेद करना है: उनकी बुद्धियों की महान क्षमता, और उनका महान बल, और परमेश्वर के राज्य के महान सेवकों के रूप में उनकी सम्मानित स्थिति, जिस कारण वे सिंहासन, प्रभुता, प्रधानता, और सामर्थ्य कहलाते हैं, 3. जो मनोभाव सचमुच पवित्र हैं, वे प्रमुखतः… पर आधारित होते हैं। यही उनकी वह स्वाभाविक भलाई है, जो उनके पास है; परन्तु उनकी सिद्ध और महिमामयी पवित्रता और भलाई, परमेश्वर, संतों, और एक दूसरे के प्रति उनका शुद्ध और प्रज्वलित प्रेम, उनकी नैतिक भलाई है। इसी प्रकार धर्मशास्त्री परमेश्वर की स्वाभाविक और नैतिक सिद्धताओं में भेद करते हैं: परमेश्वर की नैतिक सिद्धताओं से उनका अभिप्राय उन गुणों से है जिन्हें परमेश्वर एक नैतिक कर्ता के रूप में प्रयोग करता है, अर्थात् जिनके द्वारा परमेश्वर का हृदय और इच्छा भला, उचित, और अनन्त रूप से उपयुक्त और मनोहर है; जैसे उसकी धार्मिकता, सत्य, विश्वासयोग्यता, और भलाई; अथवा, एक शब्द में, उसकी पवित्रता। परमेश्वर के स्वाभाविक गुणों या सिद्धताओं से उनका अभिप्राय उन गुणों से है, जिनमें, परमेश्वर के विषय में हमारी सोचने की रीति के अनुसार, परमेश्वर की पवित्रता या नैतिक भलाई नहीं, वरन उसकी महानता निहित है, जैसे उसकी सामर्थ्य, उसका ज्ञान, जिससे वह सब कुछ जानता है, और उसका अनादि अनन्त होना, युग-युग से युग-युग तक, उसकी सर्वव्यापकता, और उसका भययोग्य और भयानक प्रताप।
किसी बुद्धिमान स्वेच्छाचारी प्राणी की नैतिक उत्कृष्टता अधिक प्रत्यक्ष रूप से नैतिक कर्ताओं के हृदय या इच्छा में निहित होती है। वह बुद्धिमान प्राणी, जिसकी इच्छा सचमुच उचित और मनोहर है, नैतिक रूप से भला या उत्कृष्ट है।
किसी बुद्धिमान प्राणी की यह नैतिक उत्कृष्टता, जब वह सच्ची और वास्तविक हो, न कि केवल बाहरी या केवल दिखावटी और नकली, तब वह पवित्रता कहलाती है। इसलिये पवित्रता ही बुद्धिमान प्राणियों की सारी सच्ची नैतिक उत्कृष्टता को समाहित करती है: वास्तविक पवित्रता के अतिरिक्त और कोई सच्चा सद्गुण नहीं है।
पवित्रता एक भले मनुष्य के सारे सच्चे सद्गुण को समाहित करती है, अर्थात् उसका परमेश्वर से प्रेम, मनुष्यों के प्रति उसका अनुग्रहमय प्रेम, उसका न्याय, उसकी दानशीलता, और उसकी करुणा की अन्तड़ियाँ, उसकी अनुग्रहमय नम्रता और सज्जनता, और उसके सारे अन्य सच्चे मसीही सद्गुण, ये सब उसकी पवित्रता के अन्तर्गत आते हैं। इसी प्रकार परमेश्वर की पवित्रता, इस शब्द के अधिक व्यापक अर्थ में, और उस अर्थ में जिसमें यह शब्द पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के विषय में साधारणतः, यदि सार्वभौमिक रूप से नहीं तो, प्रयोग किया जाता है, दिव्य स्वभाव की नैतिक उत्कृष्टता के समान ही है, अर्थात् एक नैतिक कर्ता के रूप में उसकी शुद्धता और सुन्दरता, जो उसकी सारी नैतिक सिद्धताओं, उसकी धार्मिकता, विश्वासयोग्यता, और भलाई को समाहित करती है। जैसे पवित्र मनुष्यों में उनकी दानशीलता,
मसीही दयालुता और करुणा उनकी पवित्रता के अन्तर्गत आती हैं; वैसे ही परमेश्वर की दयालुता और करुणा भी उसकी पवित्रता के अन्तर्गत आती हैं। मनुष्य में पवित्रता परमेश्वर की पवित्रता का प्रतिरूप मात्र है; प्रतिरूप में उससे अधिक सद्गुण नहीं हैं जितने मूल में हैं: व्युत्पन्न पवित्रता में उससे अधिक कुछ नहीं है जितना उस अव्युत्पन्न पवित्रता में है, जो उसका स्रोत है: प्रतिरूप में अनुग्रह मूल के अनुग्रह के अनुरूप ही है, अर्थात् अनुग्रह के बदले अनुग्रह से अधिक कुछ नहीं है।
जैसे परमेश्वर के विषय में हमारी सोचने की रीति के अनुसार परमेश्वर में दो प्रकार के गुण हैं, अर्थात् उसके नैतिक गुण, जो उसकी पवित्रता में समाहित हैं, और उसके स्वाभाविक गुण जैसे बल, ज्ञान, आदि, जो परमेश्वर की महानता को बनाते हैं; वैसे ही मनुष्य में परमेश्वर का दुगुना प्रतिरूप है, उसका नैतिक या आत्मिक प्रतिरूप, जो उसकी पवित्रता है, अर्थात् परमेश्वर की नैतिक उत्कृष्टता का प्रतिरूप (जो पतन के कारण खो गया), और परमेश्वर का स्वाभाविक प्रतिरूप, जो मनुष्य के तर्क और बुद्धि, उसकी स्वाभाविक सामर्थ्य, और सृष्टि पर उसके अधिकार में निहित है, जो परमेश्वर के स्वाभाविक गुण का प्रतिरूप है।
जो कुछ कहा गया है उससे यह आसानी से समझा जा सकता है कि जब मैं कहता हूँ कि दिव्य वस्तुओं के प्रति उनकी नैतिक उत्कृष्टता की सुन्दरता के कारण प्रेम रखना, आरम्भ और स्रोत है
3. जो मनोभाव सचमुच पवित्र हैं, वे प्रमुखतः… पर आधारित होते हैं। सारे पवित्र मनोभावों का। पिछले शीर्षक के अन्तर्गत यह पहले ही दिखाया जा चुका है, कि सारे पवित्र मनोभावों का पहला वस्तुगत आधार दिव्य वस्तुओं की, जैसी वे अपने आप में और अपने स्वभाव में हैं, सर्वोच्च उत्कृष्टता है; अब मैं आगे बढ़कर अधिक विशेष रीति से कहता हूँ, कि दिव्य वस्तुओं के स्वभाव की वह उत्कृष्टता, जो सारे पवित्र मनोभावों का पहला वस्तुगत आधार है, उनकी नैतिक उत्कृष्टता, अर्थात् उनकी पवित्रता है। पवित्र जन, पवित्र मनोभावों के अभ्यास में, दिव्य वस्तुओं से प्रमुखतः उनकी पवित्रता के कारण प्रेम रखते हैं: वे सबसे पहले परमेश्वर से उसकी पवित्रता अथवा नैतिक सिद्धता की सुन्दरता के कारण प्रेम रखते हैं, क्योंकि वह अपने आप में सर्वोच्च रीति से मनोहर है।
यह नहीं कि संत, अनुग्रहमय मनोभावों के अभ्यास में, परमेश्वर से केवल उसकी पवित्रता के कारण ही प्रेम रखते हैं; उसके सारे गुण उनकी दृष्टि में मनोहर और महिमामय हैं; वे परमेश्वर की हर दिव्य सिद्धता में आनन्दित होते हैं; परमेश्वर की अनन्त महानता, सामर्थ्य, ज्ञान, और भयानक प्रताप का चिन्तन उन्हें भाता है। परन्तु उसकी पवित्रता के कारण परमेश्वर से उनका प्रेम ही उनके प्रेम में सबसे मौलिक और अनिवार्य तत्व है। यहीं से परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम आरम्भ होता है; दिव्य वस्तुओं के प्रति अन्य सारा पवित्र प्रेम यहीं से बहता है: यह वह सबसे अनिवार्य और विशिष्ट तत्व है, जो परमेश्वर के प्रति पवित्र प्रेम के आधार के विषय में, उससे सम्बन्धित है। परमेश्वर के नैतिक गुणों की सुन्दरता के कारण परमेश्वर से प्रेम, अनिवार्य रूप से उसके सारे गुणों के कारण उसमें आनन्द उत्पन्न करता है; क्योंकि उसके नैतिक गुण उसके स्वाभाविक गुणों के बिना नहीं हो सकते: क्योंकि अनन्त पवित्रता अनन्त बुद्धि, और अनन्त क्षमता तथा महानता को अपेक्षित करती है; और परमेश्वर के सारे गुण मानो एक दूसरे को अपेक्षित करते हैं।
सारे बुद्धिमान प्राणियों की सच्ची सुन्दरता और मनोहरता प्रमुखतः और सबसे अनिवार्य रूप से उनकी नैतिक उत्कृष्टता अथवा पवित्रता में निहित है। इसी में स्वर्गदूतों की मनोहरता निहित है, जिसके बिना, उनकी सारी स्वाभाविक सिद्धताओं, उनके बल, और उनके ज्ञान के होते हुए भी, उनमें दुष्टात्माओं से अधिक कोई मनोहरता न होती। केवल नैतिक उत्कृष्टता ही है, जो अपने आप में और अपने ही कारण, बुद्धिमान प्राणियों की उत्कृष्टता है: यही वह है जो उनकी स्वाभाविक सिद्धताओं और गुणों को सुन्दरता देती है, अथवा यों कहें कि वही उनकी सुन्दरता है। नैतिक उत्कृष्टता स्वाभाविक उत्कृष्टताओं की उत्कृष्टता है। स्वाभाविक गुण उत्कृष्ट हैं या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि वे नैतिक उत्कृष्टता से जुड़े हैं या नहीं। बल और ज्ञान, पवित्रता के बिना, किसी भी प्राणी को मनोहर नहीं बनाते, वरन और भी अधिक घृणित बनाते हैं; यद्यपि पवित्रता के साथ जुड़ने पर वे उन्हें अधिक मनोहर बना देते हैं। इस प्रकार चुने हुए स्वर्गदूत अपने बल और ज्ञान के कारण अधिक महिमामय हैं, क्योंकि उनकी ये स्वाभाविक सिद्धताएँ उनकी नैतिक सिद्धता से पवित्र की गई हैं। परन्तु यद्यपि दुष्टात्माएँ अत्यन्त बलवन्त हैं, और उनमें बड़ी स्वाभाविक बुद्धि है, तौभी वे अधिक मनोहर नहीं हैं: वे वास्तव में अधिक भयानक हैं, परन्तु अधिक प्रिय नहीं; वरन इसके विपरीत, अधिक घृणित हैं। किसी बुद्धिमान प्राणी की पवित्रता ही उसकी सारी स्वाभाविक सिद्धताओं की सुन्दरता है। और परमेश्वर में भी ऐसा ही है, दिव्य सत्ता के विषय में हमारी सोचने की रीति के अनुसार: पवित्रता ही विशेष रीति से दिव्य स्वभाव की सुन्दरता है। इसी कारण हम प्रायः पवित्रता की शोभा के विषय में पढ़ते हैं, भजन संहिता 29:2, भजन संहिता 96:9, और 110:3। यही उसके सारे अन्य गुणों को महिमामय और मनोहर बनाती है। यह परमेश्वर की बुद्धि की महिमा है, कि वह एक पवित्र बुद्धि है, न कि कोई दुष्ट चतुराई और धूर्तता। यही उसके प्रताप को मनोहर बनाती है; और केवल
3. जो मनोभाव सचमुच पवित्र हैं, वे प्रमुखतः… पर आधारित होते हैं। भयानक और डरावना नहीं बनाती, वरन एक पवित्र प्रताप बनाती है। परमेश्वर की अपरिवर्तनीयता की महिमा यह है, कि वह एक पवित्र अपरिवर्तनीयता है, न कि दुष्टता में एक हठीली अटलता।
और इसलिये यह अवश्यम्भावी है, कि परमेश्वर की मनोहरता का दर्शन यहीं से आरम्भ होना चाहिये। परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम उसकी पवित्रता में आनन्द के साथ आरम्भ होना चाहिये, न कि किसी अन्य गुण में आनन्द के साथ; क्योंकि इसके बिना कोई भी अन्य गुण सचमुच मनोहर नहीं है, और अन्यथा नहीं, सिवाय इसके कि (परमेश्वर के विषय में हमारी सोचने की रीति के अनुसार) वह अपनी मनोहरता इसी से प्राप्त करता है; और इसलिये यह असम्भव है कि अन्य गुण अपनी सच्ची मनोहरता में मनोहर प्रतीत हों, जब तक यह न देखा जाए; और यह असम्भव है कि दिव्य स्वभाव की कोई भी सिद्धता सच्चे प्रेम से प्रेम की जाए, जब तक इससे प्रेम न किया जाए। यदि परमेश्वर की सारी सिद्धताओं की सच्ची मनोहरता उसकी पवित्रता की मनोहरता से उत्पन्न होती है; तो उसकी सारी सिद्धताओं का सच्चा प्रेम भी उसकी पवित्रता के प्रेम से उत्पन्न होता है।
जो लोग परमेश्वर की पवित्रता की महिमा नहीं देखते, वे उसकी दया और अनुग्रह की सच्ची महिमा में से कुछ भी नहीं देख सकते: वे उन गुणों की महिमा में से कुछ भी नहीं देखते, जो परमेश्वर के स्वभाव की, अपने आप में, कोई उत्कृष्टता हो; यद्यपि वे उनसे प्रभावित हो सकते हैं, और उनसे प्रेम कर सकते हैं, जहाँ तक वे उनके हित से सम्बन्धित हैं: क्योंकि ये गुण, परमेश्वर के स्वभाव की उत्कृष्टता का, जैसी वह अपने आप में उत्कृष्ट है, कोई भाग नहीं हैं, सिवाय इसके कि वे उसकी पवित्रता में, अधिक व्यापक अर्थ में, सम्मिलित हैं; अथवा जहाँ तक वे उसकी नैतिक सिद्धता का भाग हैं।
जैसे दिव्य स्वभाव की सुन्दरता प्रमुखतः परमेश्वर की पवित्रता में निहित है, वैसे ही सारी दिव्य वस्तुओं की सुन्दरता भी है। इसी में संतों की सुन्दरता निहित है, कि वे संत, अर्थात् पवित्र जन हैं; उनमें परमेश्वर का नैतिक प्रतिरूप ही उनकी सुन्दरता है; और वह उनकी पवित्रता है। इसी में स्वर्ग के स्वर्गदूतों की सुन्दरता और चमक निहित है, कि वे पवित्र स्वर्गदूत हैं, और इस प्रकार दुष्टात्माएँ नहीं। दानिय्येल 4:13, 17, 23; मत्ती 25:31, मरकुस 8:38, प्रेरितों के काम 10:22, प्रकाशितवाक्य
14:10। इसी में मसीही धर्म की सुन्दरता, अन्य सारे धर्मों से बढ़कर, निहित है, कि वह इतना पवित्र धर्म है। इसी में परमेश्वर के वचन की उत्कृष्टता निहित है, कि वह इतना पवित्र है:
भजन संहिता 119:140, “तेरा वचन बहुत ही पवित्र किया हुआ है, इसलिये तेरा दास उस से प्रीति रखता है।” आयत 128, “इसलिये मैं तेरे सब उपदेशों को सब बातों में ठीक जानता हूं; और सब झूठे मार्गों से बैर रखता हूं।” आयत 138, “तू ने अपनी चितौनियों को धर्म से, और बड़ी सच्चाई से दिया है।” और 172, “मेरी जीभ तेरे वचन के विषय गाएगी, क्योंकि तेरी सब आज्ञाएं धर्ममय हैं।” और भजन संहिता
19:7-10, “यहोवा की व्यवस्था सिद्ध है, वह प्राण को बहाल करती है; यहोवा की चितौनी अटल है, वह भोलों को बुद्धिमान बनाती है। यहोवा के उपदेश सिद्ध हैं, वह मन को आनन्दित करते हैं; यहोवा की आज्ञा निर्मल है, वह आंखों को ज्योति देती है। यहोवा का भय पाक है, वह सदा बना रहता है; यहोवा के नियम सत्य हैं, और पूरी रीति से धर्ममय हैं। वे सोने से, वरन बहुत कुन्दन सोने से भी बढ़कर, चाहने योग्य हैं: वे मधु से, वरन टपकते हुए छत्ते के मधु से भी अधिक मीठे हैं।” इसी में प्रभु यीशु की मनोहरता और सुन्दरता प्रमुखतः निहित है, जिस कारण वह दस हजार में उत्तम, और सर्वांग मनोहर है, अर्थात् इसमें भी कि वह परमेश्वर का पवित्र जन है, प्रेरितों के काम 3:14, और परमेश्वर का पवित्र सेवक है, प्रेरितों के काम 4:27, और वह जो पवित्र है और सत्य है,
प्रकाशितवाक्य 3:7। उसकी मानवीय प्रकृति की सारी आत्मिक सुन्दरता, जो उसकी नम्रता, दीनता, धीरज, स्वर्गीयता, परमेश्वर से प्रेम, मनुष्यों से प्रेम, तुच्छों और नीचों के प्रति समर्पण, और दुःखियों के प्रति करुणा में निहित है, आदि, यह सब उसकी पवित्रता में समाहित है। और उसकी
3. जो मनोभाव सचमुच पवित्र हैं, वे प्रमुखतः… पर आधारित होते हैं। दिव्य स्वभाव की सुन्दरता, जिसका प्रतिरूप और प्रतिबिम्ब उसकी मानवीय प्रकृति की सुन्दरता है, भी प्रमुखतः उसकी पवित्रता में निहित है। इसी में सुसमाचार की महिमा प्रमुखतः निहित है, कि वह एक पवित्र सुसमाचार है, और परमेश्वर तथा यीशु मसीह की पवित्र सुन्दरता का इतना उज्ज्वल प्रवाह है: इसी में उसके सिद्धान्तों की आत्मिक सुन्दरता निहित है, कि वे पवित्र सिद्धान्त हैं, अर्थात् भलाई के अनुरूप सिद्धान्त। और इसी में यीशु मसीह द्वारा उद्धार के मार्ग की आत्मिक सुन्दरता निहित है, कि वह इतना पवित्र मार्ग है। और इसी में मुख्यतः स्वर्ग की महिमा निहित है, कि वह पवित्र नगर, पवित्र यरूशलेम, परमेश्वर की पवित्रता का, और इस प्रकार उसकी महिमा का निवासस्थान है,
यशायाह 63:15। नये यरूशलेम की सारी सुन्दरताएँ, जैसा उसका वर्णन प्रकाशितवाक्य के अन्तिम दो अध्यायों में किया गया है, इसी की विभिन्न झलकियाँ मात्र हैं। देखिये अध्याय 21:2, 10, 11, 18, 21, 27, अध्याय
और इसलिये यह प्रमुखतः इसी प्रकार की उत्कृष्टता के कारण है, कि संत इन सारी वस्तुओं से प्रेम रखते हैं। इस प्रकार वे परमेश्वर के वचन से प्रेम रखते हैं, क्योंकि वह अत्यन्त पवित्र है। इसी कारण वे संतों से प्रेम रखते हैं; और मुख्यतः इसी कारण स्वर्ग उन्हें मनोहर, और परमेश्वर के वे पवित्र निवासस्थान उनकी दृष्टि में प्रिय प्रतीत होते हैं: इसी कारण वे प्रेम रखते हैं
परमेश्वर से; और प्रमुखतः इसी कारण वे मसीह से प्रेम रखते हैं, और उनके हृदय सुसमाचार के सिद्धान्तों में आनन्दित होते हैं, और उसमें प्रकट किए गए उद्धार के मार्ग में मधुरता से सन्तुष्ट रहते हैं।51
अनुग्रहमय मनोभावों के पहले विशिष्ट लक्षण के शीर्षक के अन्तर्गत, मैंने यह देखा था, कि जिन्हें नया जन्म मिला है, उन्हें एक नई अलौकिक इन्द्रिय दी जाती है, जो मानो एक निश्चित दिव्य आत्मिक स्वाद है, जो अपने सम्पूर्ण स्वभाव में मन की किसी भी पूर्व प्रकार की अनुभूति से भिन्न है, जैसे स्वाद चखना अन्य इन्द्रियों से भिन्न है; और संत, मन की इस नई इन्द्रिय के अभ्यास में, आत्मिक और दिव्य वस्तुओं में वह अनुभव करता है जो स्वाभाविक मनुष्यों द्वारा उनमें जो कुछ अनुभव किया जाता है उससे सर्वथा भिन्न है, जैसे मधु का मीठा स्वाद उन धारणाओं से भिन्न है जो मनुष्य मधु को देखकर या छूकर प्राप्त करते हैं। अब यह जिसकी मैं बात कर रहा हूँ, अर्थात् पवित्रता की सुन्दरता, आत्मिक और दिव्य वस्तुओं में वह वस्तु है, जिसे इस आत्मिक इन्द्रिय द्वारा अनुभव किया जाता है, जो स्वाभाविक मनुष्यों द्वारा उनमें अनुभव की गई हर वस्तु से इतनी भिन्न है; इस प्रकार की सुन्दरता वह गुण है, जो इस आत्मिक इन्द्रिय का प्रत्यक्ष विषय है; यही वह मिठास है, जो इस आत्मिक स्वाद का उचित विषय है। पवित्रशास्त्र प्रायः पवित्रता की सुन्दरता और मिठास को आत्मिक स्वाद और आत्मिक भूख के महान विषय के रूप में प्रस्तुत करता है। यही यीशु मसीह के पवित्र प्राण का मीठा भोजन था, यूहन्ना 4:32, 34: “मेरे पास खाने को ऐसा भोजन है, जिसे तुम नहीं जानते।”51 “मसीह के व्यक्तित्व से सही रीति से जुड़ने के लिये, यह सदैव आवश्यक है, कि पाप की कड़वाहट को सबसे बड़ी बुराई के रूप में चखा जाए: अन्यथा मनुष्य कभी मसीह से नहीं जुड़ेगा, अर्थात् उसमें और उससे उसकी पवित्रता के लिये, सबसे बड़ी भलाई के रूप में। क्योंकि हमने तुम्हें बताया था, कि मसीह से उसी के लिये सही रीति से जुड़ना तभी होता है, जब वह उसकी पवित्रता के लिये हो। किसी वेश्यावृत्तिपूर्ण हृदय से पूछो, कि वह मसीह के व्यक्तित्व में कौन-सी सुन्दरता देखता है; वह, उसके राज्य, उसकी धार्मिकता, और उसके सारे कार्यों को देखने के बाद, उनमें एक सुन्दरता देखेगा, क्योंकि वे उसके काम आते हैं, केवल उसे शान्ति देने के लिये। किसी कुँवारी से पूछो, वह सब में अपनी प्रसन्नता देखेगी; परन्तु जो प्रभु को मनोहर बनाता है, वह उसकी पवित्रता है, जो उसमें है ताकि वह उसे भी पवित्र बना सके। जैसे विवाह में, व्यक्तिगत सुन्दरता ही हृदय को खींचती है। और इसी कारण मैंने यह उचित समझा है, कि जो अपने भाइयों से थोड़े-से अनुग्रह के लिये प्रेम रखता है, वह मसीह से कहीं अधिक प्रेम रखेगा।” शेपर्ड रचित पैरेबल, भाग 1, पृ. 84।
3. जो मनोभाव सचमुच पवित्र हैं, वे प्रमुखतः… पर आधारित होते हैं। —मेरा भोजन यह है, कि जिसने मुझे भेजा है उसकी इच्छा पर चलूँ, और उसका काम पूरा करूँ।” मैं पवित्रशास्त्र के किसी भी भाग को नहीं जानता, जहाँ सच्ची और निष्कपट भक्ति का स्वभाव और उसके प्रमाण इतने विशेष उद्देश्य से, और इतनी पूर्णता और विस्तार से समझाए और चित्रित किए गए हों, जितने 119वें भजन में हैं; भजनकार अपने भजन की पहली आयतों में अपना उद्देश्य प्रकट करता है, और वह अन्त तक इस उद्देश्य पर अपनी दृष्टि बनाए रखता है, और उसका पीछा करता है: परन्तु इस भजन में पवित्रता की उत्कृष्टता को परमेश्वर की व्यवस्था के आत्मिक स्वाद, रुचि, भूख, और आनन्द के प्रत्यक्ष विषय के रूप में प्रस्तुत किया गया है; परमेश्वर के स्वभाव की पवित्रता का वह महान प्रकटीकरण और प्रवाह, और प्राणी के लिये पवित्रता की वह आज्ञा, सर्वत्र भोजन और मनोरंजन के रूप में, और अनुग्रहमय स्वभाव के प्रेम, भूख, प्रसन्नता, और आनन्द के महान विषय के रूप में प्रस्तुत की गई है, जो परमेश्वर की आज्ञाओं को सोने से, वरन उत्तम सोने से भी बढ़कर मूल्यवान मानता है, और जिसके लिये वे मधु और मधुकोश से भी अधिक मीठी हैं; और यह उनकी पवित्रता के कारण है, जैसा मैंने पहले देखा। वही भजनकार यह घोषित करता है, कि यही वह मिठास है जिसे आत्मिक स्वाद परमेश्वर की व्यवस्था में चखता है: भजन संहिता 19:7, 8, 9, 10, “यहोवा की व्यवस्था सिद्ध है; यहोवा की आज्ञा निर्मल है; यहोवा का भय पाक है; यहोवा के नियम सीधे हैं, वे मन को आनन्दित करते हैं;—यहोवा के न्याय सत्य हैं, और पूरी रीति से धर्ममय हैं; वे सोने से, वरन बहुत कुन्दन सोने से भी बढ़कर, चाहने योग्य हैं; और मधु तथा मधुकोश से भी अधिक मीठे हैं।”
एक पवित्र प्रेम का एक पवित्र विषय होता है। प्रेम की पवित्रता विशेष रूप से इसी में निहित है, कि वह उस वस्तु का प्रेम है जो पवित्र है, पवित्र होने के नाते, अथवा उसकी पवित्रता के कारण; इस प्रकार वह विषय की पवित्रता ही वह गुण है, जिस पर वह टिकता और समाप्त होता है। एक पवित्र स्वभाव अनिवार्य रूप से पवित्र वस्तुओं में मुख्यतः उसी से प्रेम करेगा, जो उसे स्वयं सबसे अधिक अनुकूल हो; परन्तु निश्चय ही दिव्य वस्तुओं में जो वस्तु, अन्य सब से बढ़कर, पवित्र स्वभाव के अनुकूल है, वह पवित्रता है, क्योंकि पवित्रता को अन्य सब वस्तुओं से बढ़कर पवित्रता के अनुकूल होना ही चाहिये; क्योंकि किसी भी स्वभाव के लिये स्वयं से बढ़कर अनुकूल कुछ नहीं हो सकता; पवित्र स्वभाव को अन्य सब वस्तुओं से बढ़कर पवित्र स्वभाव के अनुकूल होना चाहिये: और इसलिये परमेश्वर और मसीह का पवित्र स्वभाव, और परमेश्वर का वचन, और अन्य दिव्य वस्तुएँ, संतों में जो पवित्र स्वभाव है, उसके लिये अन्य सब वस्तुओं से बढ़कर अनुकूल होनी चाहिये।
और फिर, एक पवित्र स्वभाव निःसन्देह पवित्र वस्तुओं से प्रेम रखता है, विशेष रूप से उसी कारण से जिसके लिये पापी स्वभाव उनसे शत्रुता रखता है; परन्तु जिस कारण मुख्यतः पापी स्वभाव पवित्र वस्तुओं से शत्रुता रखता है, वह उनकी पवित्रता है; इसी कारण शारीरिक मन परमेश्वर से, और परमेश्वर की व्यवस्था से, और परमेश्वर की प्रजा से शत्रुता रखता है। अब यह विपरीतताओं से तर्क करना मात्र है; विपरीत कारणों से विपरीत परिणामों तक; विपरीत स्वभावों से विपरीत प्रवृत्तियों तक। हम जानते हैं कि पवित्रता दुष्टता के सर्वथा विपरीत स्वभाव की है; इसलिये जैसे दुष्टता का स्वभाव मुख्यतः पवित्रता का विरोध करना और उससे घृणा करना है; वैसे ही पवित्रता का स्वभाव मुख्यतः पवित्रता की ओर झुकना और उसमें आनन्दित होना होना चाहिये।
स्वर्ग में संतों और स्वर्गदूतों में जो पवित्र स्वभाव है (जहाँ उसकी सच्ची प्रवृत्ति सबसे अच्छी तरह प्रगट होती है) वह प्रमुखतः दिव्य वस्तुओं की पवित्रता से आकर्षित होता है। यही वह दिव्य सुन्दरता है, जो चमकते और जलते हुए सराप की ध्यानाकर्षण, प्रशंसा, और स्तुति को मुख्यतः आकर्षित करती है: यशायाह 6:3, “और वे एक दूसरे को पुकार-पुकार के कहते थे, पवित्र, पवित्र, पवित्र, सेनाओं का यहोवा है, 3. जो मनोभाव सचमुच पवित्र हैं, वे प्रमुखतः… पर आधारित होते हैं। सारी पृथ्वी उसकी महिमा से भरपूर है।” और प्रकाशितवाक्य 4:8, “वे रात दिन बिना विश्राम किए कहते रहते हैं, पवित्र, पवित्र, पवित्र, प्रभु परमेश्वर सर्वशक्तिमान, जो था, और जो है, और जो आनेवाला है।” इसी प्रकार महिमान्वित संत अध्याय 15:4 में कहते हैं, “हे प्रभु, कौन तुझ से न डरेगा, और कौन तेरे नाम की महिमा न करेगा? क्योंकि केवल तू ही पवित्र है।”
और पवित्रशास्त्र पृथ्वी पर के संतों को प्रमुखतः इसी कारण परमेश्वर की आराधना करते हुए, और परमेश्वर के सारे गुणों की प्रशंसा और स्तुति करते हुए दिखाता है, चाहे वे उसकी पवित्रता से मनोहरता प्राप्त करते हों, या उसका ही एक भाग हों। इस प्रकार जब वे परमेश्वर की सामर्थ्य के लिये उसकी स्तुति करते हैं, तब उसकी पवित्रता ही वह सुन्दरता है जो उन्हें आकर्षित करती है: भजन संहिता 98:1, “यहोवा के लिये नया गीत गाओ, क्योंकि उसने आश्चर्यकर्म किए हैं: उसके दाहिने हाथ ने, और उसकी पवित्र भुजा ने, उसका उद्धार किया है।” इसी प्रकार जब वे उसके न्याय और भयानक प्रताप के लिये उसकी स्तुति करते हैं: भजन संहिता 99:2, 3, “यहोवा सिय्योन में महान है, और सब देशों के ऊपर ऊँचा है। वे तेरे बड़े और भययोग्य नाम का धन्यवाद करें; क्योंकि वह पवित्र है।”
आयत 5, “हमारे परमेश्वर यहोवा की बड़ाई करो, और उसके चरणों की चौकी के आगे दण्डवत करो; क्योंकि वह पवित्र है।” आयत 8, 9, “तू ऐसा परमेश्वर था जो उन्हें क्षमा करता था, यद्यपि तू उनके कामों का पलटा भी लेता था।”
हमारे परमेश्वर यहोवा की बड़ाई करो, और उसके पवित्र पर्वत पर दण्डवत करो; क्योंकि हमारा परमेश्वर यहोवा पवित्र है।” इसी प्रकार जब वे परमेश्वर की दया और विश्वासयोग्यता के लिये उसकी स्तुति करते हैं: भजन संहिता 97:11, 12, “धर्मी के लिये ज्योति, और सीधे मन वालों के लिये आनन्द बोया हुआ है। हे धर्मियों, यहोवा में आनन्दित हो, और उसकी पवित्रता का स्मरण करके धन्यवाद करो।” 1 शमूएल 2:2, “यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं है; क्योंकि तेरे सिवा कोई है ही नहीं; और हमारे परमेश्वर के तुल्य कोई चट्टान नहीं है।”
इसलिये इसी के द्वारा सब कोई अपने मनोभावों को, और विशेष रूप से अपने प्रेम और आनन्द को परख सकते हैं। विभिन्न प्रकार के प्राणी अपने स्वभावों का अन्तर बहुत हद तक इसी में दिखाते हैं, कि वे किन-किन वस्तुओं को अपनी उचित भलाई मानकर उनमें आनन्द लेते हैं, एक उससे आनन्दित होता है जिससे दूसरा घृणा करता है। सच्चे संतों और स्वाभाविक मनुष्यों के बीच ऐसा ही अन्तर है: स्वाभाविक मनुष्यों को पवित्र वस्तुओं की भलाई और उत्कृष्टता का, कम से कम उनकी पवित्रता के लिये, कोई बोध नहीं है; उस प्रकार की भलाई के लिये उनमें कोई स्वाद नहीं है; और इसलिये कहा जा सकता है कि वे उस दिव्य भलाई को न जानते हैं, न देखते हैं; वह उनसे पूर्णतः छिपी हुई है; परन्तु संतों को, परमेश्वर की सामर्थ्यवान शक्ति से, यह प्रकट कर दी गई है; उन्हें वह अलौकिक, सबसे उत्तम और दिव्य इन्द्रिय दी गई है, जिसके द्वारा वे उसे अनुभव करते हैं; और यही वह है जो उनके हृदयों को मोह लेता है, और उन्हें सब वस्तुओं से बढ़कर आनन्दित करता है; यह एक सच्चे संत के हृदय के लिये सबसे प्रिय और मीठी वस्तु है, जो स्वर्ग या पृथ्वी में पाई जा सकती है; जो अन्य सब से बढ़कर उसके प्राण को आकर्षित और संलग्न करती है; और जिसमें वह सब वस्तुओं से बढ़कर अपनी प्रसन्नता रखता है, और जिस पर वह इस जगत में अपने मन की शान्ति और आनन्द के लिये, और दूसरे जगत में पूर्ण सन्तोष और धन्यता के लिये निर्भर रहता है। इसी के द्वारा, आप परमेश्वर, यीशु मसीह, और परमेश्वर के वचन के प्रति अपने प्रेम को, और उनमें अपने आनन्द को, और साथ ही परमेश्वर की प्रजा के प्रति अपने प्रेम को, और स्वर्ग के लिये अपनी अभिलाषाओं को परख सकते हैं; कि क्या वे इस प्रकार की सुन्दरता में एक सर्वोच्च आनन्द से उत्पन्न होती हैं, बिना इसके कि वे प्रमुखतः आपके कल्पित हित या उनसे अपनी प्रत्याशाओं से प्रेरित हों। ऐसे अनेक उच्च मनोभाव, महान प्रतीत होनेवाला प्रेम, और उल्लासपूर्ण आनन्द हैं, जिनमें इस पवित्र स्वाद का कुछ भी अंश नहीं है।
विशेष रूप से, जो कुछ कहा गया है उसके द्वारा आप परमेश्वर के अनुग्रह और प्रेम की महिमा के अपने अनुभवों को, और उनसे उत्पन्न अपने मनोभावों को परख सकते हैं। परमेश्वर का अनुग्रह दो रीतियों से मनोहर प्रतीत हो सकता है; या तो bonum utile के रूप में, अर्थात् मेरे लिये एक लाभदायक भलाई, जो मेरे हित की बड़ी सेवा करती है,
3. जो मनोभाव सचमुच पवित्र हैं, वे प्रमुखतः… पर आधारित होते हैं। और इस प्रकार मेरे आत्म-प्रेम के अनुकूल है; अथवा bonum formosum के रूप में, अर्थात् अपने आप में एक सुन्दर भलाई, और दिव्य स्वभाव की नैतिक तथा आत्मिक उत्कृष्टता का भाग। इसी दूसरी दृष्टि से सच्चे संतों के हृदय प्रभावित होते हैं, और सबसे पहले परमेश्वर के निःशुल्क अनुग्रह के द्वारा उनका प्रेम मोहित होता है।
जो कुछ कहा गया है उससे यह प्रगट होता है, कि यदि मनुष्यों को परमेश्वर की स्वाभाविक सिद्धताओं का गहरा बोध हो, और वे उनसे अत्यन्त प्रभावित हों, अथवा उन्हें परमेश्वर का कोई अन्य दर्शन या बोध हो, जो उसकी नैतिक सिद्धताओं की सुन्दरता के बोध में निहित न हो या उसे सूचित न करता हो, तो यह अनुग्रह का निश्चित चिन्ह नहीं है; जैसे विशेष रूप से मनुष्यों को परमेश्वर की भयानक महानता और डरावने प्रताप का गहरा बोध होना; क्योंकि यह केवल परमेश्वर की स्वाभाविक सिद्धता है, और जिसे मनुष्य देख सकते हैं, तौभी उसकी नैतिक सिद्धता की सुन्दरता के प्रति सर्वथा अन्धे रह सकते हैं, और उस आत्मिक स्वाद का कुछ भी अंश उनमें नहीं होता, जो इस दिव्य मिठास का रसास्वादन करता है।
अनुग्रहमय मनोभावों के पहले विशिष्ट चिन्ह के विषय में जो कहा गया, उसमें यह पहले ही दिखाया जा चुका है, कि जो आत्मिक है, वह अपने स्वभाव में उस सब से सर्वथा भिन्न है, जिसका विषय कोई भी अनुग्रहरहित व्यक्ति, जब तक वह अनुग्रहरहित बना रहता है, हो सकता है। परन्तु यह सम्भव है कि जो पूर्णतः अनुग्रह से रहित हैं, उन्हें परमेश्वर की महानता, उसकी सामर्थ्यवान शक्ति, और भयानक प्रताप का स्पष्ट दर्शन और अत्यन्त गहरा तथा प्रभावशाली बोध हो; क्योंकि यह वही है जो दुष्टात्माओं के पास है, यद्यपि उन्होंने परमेश्वर का वह आत्मिक ज्ञान खो दिया है, जो उसकी नैतिक सिद्धताओं की मनोहरता के बोध में निहित है; वे उस प्रकार की सुन्दरता के किसी भी बोध या रसास्वादन से पूर्णतः रहित हैं, तौभी उन्हें परमेश्वर की स्वाभाविक महिमा का (यदि मैं ऐसा कह सकूँ), अर्थात् उसकी भयानक महानता और प्रताप का, बहुत गहरा ज्ञान है; इसे वे देखते हैं, और इसकी प्रतीति से प्रभावित होते हैं, और इसलिये उसके सामने काँपते हैं। परमेश्वर की इस महिमा को सब लोग न्याय के दिन देखेंगे; परमेश्वर सब बुद्धिमान प्राणियों को, स्वर्गदूतों और दुष्टात्माओं, संतों और पापियों को, इसे बड़ी मात्रा में देखने के लिये विवश करेगा: मसीह अपनी अनन्त महानता और भयानक प्रताप को हर एक पर, सबसे खुली, स्पष्ट, और कायल करनेवाली रीति से, और ऐसे प्रकाश में प्रगट करेगा जिसका कोई विरोध नहीं कर सकेगा, “जब वह अपने पिता की महिमा में आएगा, और हर एक आंख उसे देखेगी;” जब वे पहाड़ों से पुकारेंगे कि वे उन पर गिर पड़ें, और उन्हें सिंहासन पर बैठनेवाले के मुख से छिपा लें, तब वे परमेश्वर के प्रताप की महिमा देखते हुए दिखाए गए हैं, यशायाह 2:10, 19,
21। परमेश्वर अपने सारे शत्रुओं को इसे देखने के लिये, और अनन्तकाल तक नरक में इसका सबसे स्पष्ट और प्रभावशाली दर्शन करते हुए जीने के लिये विवश करेगा। परमेश्वर ने प्रायः यह घोषित किया है कि उसका अपरिवर्तनीय उद्देश्य है कि उसके सारे शत्रु उसे इस विषय में जानें, इसलिये वह अपनी उनके विरुद्ध घोषित धमकियों के साथ प्रायः ये शब्द जोड़ता है: “और वे जान लेंगे कि मैं यहोवा हूँ;” वरन उसने यह शपथ खाई है कि सब मनुष्य इस विषय में उसकी महिमा देखेंगे: गिनती 14:21, “निश्चय जैसा मैं जीवित हूँ, सारी पृथ्वी यहोवा की महिमा से परिपूर्ण होगी।” और परमेश्वर के इस प्रकार के प्रकटीकरण की चर्चा पवित्रशास्त्र में प्रायः इस रूप में की गई है कि वह इस जगत में परमेश्वर के शत्रुओं के सामने किया गया है, अथवा किया जाएगा, निर्गमन 9:16, और अध्याय 14:18, और 15:16, भजन संहिता 66:3, और 46:10, और अनगिनत अन्य स्थानों में। यह वह प्रकटीकरण था जो परमेश्वर ने सीनै पर्वत पर उस दुष्ट मण्डली के सामने अपने आपको दिखाकर किया; उन्हें इससे गहराई से प्रभावित करते हुए; यहाँ तक कि छावनी के सारे लोग काँप उठे। दुष्ट मनुष्य और दुष्टात्माएँ हर उस वस्तु को देखेंगे, और उसका गहरा बोध रखेंगे,
3. जो मनोभाव सचमुच पवित्र हैं, वे प्रमुखतः… पर आधारित होते हैं। जो परमेश्वर की महिमा से सम्बन्धित है, सिवाय उसकी नैतिक सिद्धता की सुन्दरता के; वे उसकी अनन्त महानता और प्रताप, उसकी अनन्त सामर्थ्य देखेंगे, और उसकी सर्वज्ञता, उसकी अनन्तता और अपरिवर्तनीयता के पूर्ण रूप से कायल होंगे; और वे उसके नैतिक गुणों से सम्बन्धित हर वस्तु को देखेंगे और जानेंगे, सिवाय उनकी सुन्दरता और मनोहरता के; वे देखेंगे और जानेंगे कि वह पूर्णतः न्यायी, धर्मी, और सच्चा है, और कि वह एक पवित्र
परमेश्वर, जिसकी आंखें इतनी पवित्र हैं कि वह बुराई को नहीं देख सकता, और अधर्म पर दृष्टि नहीं कर सकता; और वे संतों के प्रति उसकी अनन्त भलाई और निःशुल्क अनुग्रह के आश्चर्यकर्मों को देखेंगे; और उनकी आंखों से कुछ भी नहीं छिपाया जाएगा, सिवाय इन नैतिक गुणों की सुन्दरता के, और उससे उत्पन्न होनेवाली अन्य गुणों की उस सुन्दरता के। और इस प्रकार इस जगत के स्वाभाविक मनुष्य परमेश्वर से सम्बन्धित बाकी हर वस्तु का बहुत गहरा बोध रख सकते हैं, केवल इसी को छोड़कर। नबूकदनेस्सर को परमेश्वर की अनन्त महानता और भयानक प्रताप का, उसके सर्वोच्च और पूर्ण अधिकार का, उसकी सामर्थ्यवान और अजेय शक्ति का, और उसकी सर्वसत्ता का बहुत गहरा और प्रभावशाली बोध था, और यह भी कि वह स्वयं, और पृथ्वी के सारे निवासी, उसके सामने कुछ भी नहीं थे; और उसके विवेक में उसकी न्यायपरायणता का भी बड़ा विश्वास था, और उसकी महान भलाई का एक प्रभावशाली बोध था, दानिय्येल 4:1, 2, 3, 34, 35, 37। और दारा को परमेश्वर की सिद्धताओं का जो बोध था, वह भी उसके समान ही प्रतीत होता है, दानिय्येल 6:25, आदि। परन्तु संत और स्वर्गदूत परमेश्वर की उस महिमा को देखते हैं, जो उसकी पवित्रता की सुन्दरता में निहित है; और यही दर्शन है, जो मनुष्यों के हृदयों को पिघला देता और दीन बना देता है, उन्हें जगत से छुड़ाता है, उन्हें परमेश्वर की ओर खींचता है, और उन्हें प्रभावी रीति से बदल देता है। परमेश्वर की भयानक महानता का दर्शन मनुष्यों की शक्ति पर हावी हो सकता है, और उनकी सहनशक्ति से भी अधिक हो सकता है; परन्तु यदि परमेश्वर की नैतिक सुन्दरता छिपी रहे, तो हृदय की शत्रुता अपनी पूरी शक्ति में बनी रहेगी, कोई भी प्रेम प्रज्वलित नहीं होगा, और कुछ भी इच्छा को जीतने में प्रभावी नहीं होगा, वरन वह अटल बनी रहेगी; जबकि परमेश्वर की नैतिक और आत्मिक महिमा की पहली झलक हृदय में चमकते ही, मानो सर्वशक्तिमान सामर्थ्य के साथ ये सारे प्रभाव उत्पन्न करती है, जिसका कोई भी विरोध नहीं कर सकता।
स्वाभाविक मनुष्यों को परमेश्वर की भयानक महानता का जो बोध हो सकता है, वह उन्हें विभिन्न रीतियों से प्रभावित कर सकता है; वह न केवल उन्हें भयभीत कर सकता है, वरन उनकी परिस्थितियों के अनुसार उन्हें उठा भी सकता है, और उनके आनन्द और स्तुति को बढ़ा सकता है। यह इसका स्वाभाविक परिणाम होगा, जब परमेश्वर से किसी असाधारण दया की वास्तविक या कल्पित प्राप्ति के अधीन, केवल स्वभाव के सिद्धान्तों के प्रभाव से। यह पहले ही दिखाया जा चुका है, कि दयालुता प्राप्त होने से, स्वाभाविक सिद्धान्तों के प्रभाव से, हृदय परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता और स्तुति से प्रभावित हो सकता है; परन्तु यदि कोई व्यक्ति, परमेश्वर से उल्लेखनीय दयालुता प्राप्त करते समय, साथ ही उसकी अनन्त महानता का भी बोध रखता है, और यह कि वह स्वयं उसकी तुलना में कुछ भी नहीं है, तो निश्चय ही यह स्वाभाविक रूप से, अपने से इतने निम्न किसी को दिखाई गई दयालुता के लिये, उसकी कृतज्ञता और स्तुति को और भी अधिक बढ़ा देगा। परमेश्वर की महानता के बोध का यह प्रभाव नबूकदनेस्सर पर पड़ा, जब उसे मनुष्यों में से निकाले जाने और पशुओं के साथ निवास करने के बाद, अपनी पुनर्स्थापना का वह असाधारण अनुग्रह प्राप्त हुआ: परमेश्वर की असीम महानता के बोध ने उसकी कृतज्ञता को बहुत ऊँचा उठा दिया; यहाँ तक कि वह अत्यन्त उच्च शब्दों में परमेश्वर की स्तुति और महिमा करता है, और सारे जगत को अपने साथ ऐसा करने के लिये पुकारता है; और इससे भी कहीं अधिक, यदि कोई स्वाभाविक मनुष्य, परमेश्वर की अनन्त
3. जो मनोभाव सचमुच पवित्र हैं, वे प्रमुखतः… पर आधारित होते हैं। महानता और प्रताप से अत्यन्त प्रभावित होते हुए, यह दृढ़ भ्रम भी रखता है कि इस महान परमेश्वर ने उसे अपना पुत्र और विशेष प्रिय बना लिया है, और अपने सर्वोच्च प्रेम में उसे अनन्त महिमा की प्रतिज्ञा दी है, तो स्वभाव के क्रम के अनुसार, इसकी प्रवृत्ति उसके आनन्द और स्तुति को बहुत ऊँचाई तक बढ़ाने की होगी।
इसलिये इसमें कोई सन्देह नहीं, कि हाल ही में अनेक व्यक्तियों ने परमेश्वर की महानता, भयानक प्रताप, और स्वाभाविक सिद्धता के इस रीति से कार्य करनेवाले अनुभवों पर, परमेश्वर के पवित्र प्रताप के किसी वास्तविक दर्शन के बिना, अत्यधिक भार डाला है। और अनुभव इस विषय में तर्क और पवित्रशास्त्र जो घोषित करते हैं उसकी भरपूर साक्षी देता है; क्योंकि ऐसे अनेक व्यक्ति रहे हैं, जो परमेश्वर की महानता और प्रताप से अभिभूत प्रतीत हुए, और परिणामस्वरूप जिस रीति से बताया गया है उस रीति से उठाए गए, परन्तु जो किसी भी अनुपात में मसीही आत्मा और स्वभाव के लक्षणों से, अथवा किसी भी रीति से उपयुक्त व्यावहारिक फलों से बहुत दूर रहे; वरन उनके अनुभवों ने सच्चे आत्मिक अनुभवों के कार्य के सर्वथा विपरीत रीति से कार्य किया।
यह नहीं कि परमेश्वर की महानता और स्वाभाविक गुणों का बोध अत्यन्त उपयोगी और आवश्यक नहीं है। क्योंकि, जैसा मैंने पहले देखा, यह परमेश्वर की पवित्रता की सुन्दरता के प्रकटीकरण में अन्तर्निहित है। यद्यपि वह इससे कुछ आगे की बात है, तौभी वह इसे अपेक्षित करता है, जैसे बड़ी वस्तु छोटी वस्तु को अपेक्षित करती है। और यद्यपि स्वाभाविक मनुष्यों को परमेश्वर की स्वाभाविक सिद्धताओं का बोध हो सकता है; तौभी निःसन्देह यह संतों में स्वाभाविक मनुष्यों की अपेक्षा अधिक बार और अधिक साधारण रूप से पाया जाता है; और अनुग्रह मनुष्यों को इन बातों को स्वाभाविक मनुष्यों की अपेक्षा बेहतर रीति से देखने में सक्षम बनाता है; और न केवल उन्हें परमेश्वर के स्वाभाविक गुणों को देखने में सक्षम बनाता है, वरन उन गुणों की उस सुन्दरता को भी, जो (परमेश्वर के विषय में हमारी सोचने की रीति के अनुसार) उसकी पवित्रता से उत्पन्न होती है।
4. अनुग्रहमय मनोभाव मन के प्रबुद्ध होने से, प्रचुरता से… 4. अनुग्रहमय मनोभाव इससे उत्पन्न होते हैं कि मन प्रचुरता से और आत्मिक रीति से प्रबुद्ध होकर दिव्य वस्तुओं को समझे या ग्रहण करे।
पवित्र मनोभाव बिना प्रकाश के ताप नहीं हैं; वरन सदैव बुद्धि की सूचना से, मन को प्राप्त होनेवाले किसी आत्मिक उपदेश से, किसी प्रकाश या वास्तविक ज्ञान से उत्पन्न होते हैं। परमेश्वर की सन्तान अनुग्रहमय रीति से प्रभावित होती है, क्योंकि वह पहले की अपेक्षा दिव्य वस्तुओं के विषय में कुछ अधिक देखती और समझती है, परमेश्वर या मसीह के, और सुसमाचार में प्रगट की गई महिमामय बातों के विषय में अधिक; उसे पहले की अपेक्षा, जब वह प्रभावित नहीं थी, कहीं अधिक स्पष्ट और उत्तम दृष्टि प्राप्त होती है: या तो उसे दिव्य वस्तुओं की कोई ऐसी समझ प्राप्त होती है जो उसके लिये नई है; अथवा उसका पहले का ज्ञान, जिसकी दृष्टि धुँधली पड़ गई थी, नया कर दिया जाता है: 1 यूहन्ना 4:7, “जो कोई प्रेम रखता है, वह परमेश्वर को जानता है।” फिलिप्पियों 1:9, “मैं यह प्रार्थना करता हूँ, कि तुम्हारा प्रेम ज्ञान, और सब प्रकार के विवेक के साथ, और अधिक बढ़ता जाए।” रोमियों 10:2, “उन में परमेश्वर के लिये धुन तो है, परन्तु ज्ञान के अनुसार नहीं।” कुलुस्सियों 3:10, “नया मनुष्यत्व, जो ज्ञान में नया बनता जाता है।” भजन संहिता 43:3, 4, “अपना प्रकाश और सत्य फैला, कि वे मेरी अगुवाई करें; वे मुझे तेरे पवित्र पर्वत तक पहुँचाएं।”
यूहन्ना 6:45, “भविष्यद्वक्ताओं के लेखे में यह लिखा है, कि सब परमेश्वर की ओर से सिखाए हुए होंगे। इसलिये जिस किसी ने पिता से सुना, और सीखा है, वह मेरे पास आता है।” ज्ञान ही वह कुञ्जी है, जो सबसे पहले कठोर हृदय को खोलती है, और मनोभावों को बढ़ाती है, और इस प्रकार मनुष्यों के लिये स्वर्ग के राज्य में जाने का मार्ग खोलती है; लूका 11:52, “तुम ने ज्ञान की कुञ्जी छीन ली है।”
अब ऐसे अनेक मनोभाव हैं, जो बुद्धि में किसी भी प्रकाश से उत्पन्न नहीं होते।
और जब ऐसा होता है, तो यह एक निश्चित प्रमाण है कि ये मनोभाव आत्मिक नहीं हैं, चाहे वे कितने भी ऊँचे क्यों न हों।52 वास्तव में उन्हें कुछ नई प्रतीतियाँ होती हैं, जो उन्हें पहले नहीं थीं। मनुष्य का स्वभाव ऐसा है, कि यह असम्भव है कि उसका मन प्रभावित हो, जब तक वह किसी ऐसी वस्तु से न हो जिसे वह प्रतीत करता है, या जिसकी उसका मन कल्पना करता है। परन्तु अनेक व्यक्तियों में जो प्रतीतियाँ या कल्पनाएँ होती हैं, जिनसे वे प्रभावित होते हैं, उनमें ज्ञान या उपदेश का कुछ भी स्वभाव नहीं होता। उदाहरण के लिये, जब कोई व्यक्ति किसी आकृति के, अथवा किसी अत्यन्त सुन्दर और मनभावन मुखाकृति के, अथवा किसी चमकते हुए प्रकाश, अथवा अन्य किसी महिमामय बाहरी दृश्य के, मन में अचानक उठे हुए किसी सजीव विचार से प्रभावित होता है: यहाँ मन द्वारा कुछ प्रतीत या कल्पित किया गया है; परन्तु इसमें उपदेश का कुछ भी स्वभाव नहीं है; ऐसी वस्तुओं से व्यक्ति न तो अधिक बुद्धिमान बनते हैं, न परमेश्वर के विषय में, न परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ के विषय में, न मसीह द्वारा उद्धार के मार्ग के विषय में, और न ही सुसमाचार के किसी सिद्धान्त में निहित किसी भी बात के विषय में अधिक जानकार बनते हैं। इन बाहरी विचारों से व्यक्तियों को परमेश्वर के स्वभाव के किसी भी गुण या सिद्धता के विषय में कोई आगे का परिचय नहीं मिलता; न ही उन्हें उसके वचन की, अथवा उसके किसी भी मार्ग या कार्य की कोई आगे की समझ प्राप्त होती है। सच्चे आत्मिक और अनुग्रहमय मनोभाव इस रीति से उत्पन्न नहीं होते; ये बुद्धि के प्रबुद्ध होने से52 “अनेक ऐसे हैं, जिनमें आरम्भिक मनफिराव के समय अत्यन्त प्रबल मनोभाव थे, परन्तु बाद में वे सूख जाते हैं, मुरझा जाते हैं, क्षीण होते जाते हैं, घुलते जाते हैं, और नष्ट हो जाते हैं: और अब उनका कपट प्रगट हो चुका है; यदि सारे जगत के सामने खुले अधर्म द्वारा नहीं, तो कम से कम जीवित मसीहियों की विवेकी आँखों के सामने एक औपचारिक, बंजर, नीरस, निष्फल हृदय और चाल-चलन के द्वारा; क्योंकि उन्हें अब तक कायल होने के लिये पर्याप्त प्रकाश कभी नहीं मिला।”
4. अनुग्रहमय मनोभाव मन के प्रबुद्ध होने से, प्रचुरता से… उत्पन्न होते हैं, जिससे परमेश्वर और मसीह द्वारा सिखाई गई बातों को एक नई रीति से समझा जाता है, परमेश्वर के उत्कृष्ट स्वभाव और उसकी अद्भुत सिद्धताओं की एक नई समझ प्राप्त होती है, मसीह का उसकी आत्मिक उत्कृष्टताओं और परिपूर्णता में कोई नया दर्शन होता है, अथवा मसीह द्वारा उद्धार के मार्ग से सम्बन्धित बातें उसके सामने एक नई रीति से खोली जाती हैं, जिससे वह अब देखता है कि यह कैसे है, और उन दिव्य तथा आत्मिक सिद्धान्तों को समझता है, जो कभी उसके लिये मूर्खता थे। बुद्धि के ऐसे प्रबोधन, अपने स्वभाव में, आकृतियों और रंगों, बाहरी चमक और महिमा, अथवा ध्वनियों और स्वरों के प्रबल विचारों से सर्वथा भिन्न वस्तुएँ हैं। यह कि सारे अनुग्रहमय मनोभाव किसी उपदेश या बुद्धि के प्रबोधन से उत्पन्न होते हैं, इसलिये इस बात का एक और प्रमाण है, कि जो मनोभाव कल्पना पर ऐसे प्रभाव से उत्पन्न होते हैं, वे अनुग्रहमय मनोभाव नहीं हैं, इसके अतिरिक्त उन बातों के जो पहले देखी गई हैं, जो इसे स्पष्ट करती हैं।
इससे यह भी प्रगट होता है, कि मन में पवित्रशास्त्र के वचनों के आने से उत्पन्न मनोभाव व्यर्थ हैं, जब मनोभाव का आधार उन वचनों से बुद्धि को प्राप्त कोई उपदेश, अथवा उन वचनों में सिखाई गई कोई भी बात नहीं है, वरन उनके मन में आने की रीति है। जब मसीह पवित्रशास्त्र को हृदय के अनुग्रहमय मनोभाव से जलने का साधन बनाता है, तो वह उनकी बुद्धियों पर पवित्रशास्त्र को खोलकर ऐसा करता है; लूका 24:32, “क्या मार्ग में जब वह हम से बातें करता था, और हमें पवित्रशास्त्र का अर्थ समझाता था, तो हमारा हृदय हमारे भीतर जल नहीं रहा था?”
यह भी प्रगट होता है, कि पवित्रशास्त्र के किसी वचन के आने से उत्पन्न मनोभाव भी व्यर्थ होना चाहिये, जब वह मनोभाव किसी ऐसी बात पर आधारित हो, जिसे उस वचन द्वारा सिखाया गया माना जाता है, परन्तु जो वास्तव में उसमें, अथवा किसी अन्य पवित्रशास्त्र में, निहित नहीं है; क्योंकि ऐसा कल्पित उपदेश वास्तविक उपदेश नहीं है, वरन मन की एक भूल और भ्रान्ति है। उदाहरण के लिये, जब लोग यह मान लेते हैं कि मन में आए किसी पवित्रशास्त्र के वचन द्वारा उन्हें स्पष्ट रूप से यह सिखाया गया है, कि वे विशेष रूप से परमेश्वर के प्रिय हैं, अथवा उनके पाप क्षमा हो गए हैं, कि परमेश्वर उनका पिता है, और इसी प्रकार की अन्य बातें, तो यह एक भूल या भ्रान्ति है; क्योंकि पवित्रशास्त्र कहीं भी उन विशेष व्यक्तियों को, जो प्रिय हैं, स्पष्ट रूप से प्रगट नहीं करता; वरन केवल परिणाम द्वारा, अर्थात् उन व्यक्तियों के गुणों को प्रगट करके, जो परमेश्वर के प्रिय हैं: और इसलिये यह बात पवित्रशास्त्र से केवल परिणाम द्वारा, और इन्हीं गुणों से सीखी जा सकती है, किसी अन्य रीति से नहीं; क्योंकि बातें पवित्रशास्त्र से किसी अन्य रीति से नहीं सीखी जा सकतीं, सिवाय उस रीति के जिसमें वे पवित्रशास्त्र में सिखाई गई हैं।
इन उल्लिखित उदाहरणों में, और इसी प्रकार कुछ अन्य उदाहरणों में भी जिनका उल्लेख किया जा सकता है, मनोभाव वास्तव में उपदेश से नहीं, वरन अज्ञान से उत्पन्न होते हैं। जैसे कुछ लोग, जब वे प्रार्थना में अपने आपको स्वच्छन्द वाणी से बोलते हुए पाते हैं, तो वे इसे परमेश्वर का उनके साथ होना कहते हैं; और इससे वे और अधिक प्रभावित होते हैं; और इस प्रकार उनके मनोभाव उत्तेजित और बढ़ते हैं; जबकि वे इस स्वच्छन्द वाणी के कारण की ओर ध्यान नहीं देते, जो परमेश्वर की आत्मिक उपस्थिति के अतिरिक्त और भी अनेक रीतियों से उत्पन्न हो सकती है। इसी प्रकार कुछ लोग पवित्रशास्त्र के विषय में मन में आए किसी उपयुक्त विचार से बहुत प्रभावित होते हैं, और उसे परमेश्वर की आत्मा का उन्हें सिखाना कहते हैं। इस प्रकार वे अपने ही मन की अनेक क्रियाओं का, जिनके विषय में उनका ऊँचा मत है, और जिनसे वे प्रसन्न और मोहित हैं, श्रेय परमेश्वर की आत्मा के विशेष प्रत्यक्ष प्रभावों को देते हैं; और इस प्रकार अत्यन्त प्रभावित होते हैं
4. अनुग्रहमय मनोभाव मन के प्रबुद्ध होने से, प्रचुरता से… अपने विशेषाधिकार से। और कुछ ऐसे उदाहरण भी हैं, जिनमें ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है, कि उनके मनोभाव का पहला आधार कोई शारीरिक अनुभूति है। किसी कारण से (और सम्भवतः कभी-कभी शैतान के द्वारा) प्राणिक आत्माएँ अचानक और अकारण एक अत्यन्त सुखद गति में डाल दी जाती हैं, जिससे व्यक्तियों को अपने शरीर में सुखद अनुभूति होती है; प्राणिक आत्माएँ ऐसी गति में डाली जाती हैं जैसी सामान्यतः मन के उल्लास से जुड़ी होती है; और प्राण, प्राण तथा देह के मिलन की व्यवस्थाओं के कारण, इससे सुख का अनुभव करता है। प्राणिक आत्माओं की यह गति पहले कभी मन के किसी भी मनोभाव या प्रतीति से उत्पन्न नहीं होती; वरन जो पहली वस्तु अनुभव की जाती है, वह प्राणिक आत्माओं का उल्लास है, और सम्भवतः उनकी छाती में कोई सुखद बाहरी अनुभूति है। इससे अज्ञानतावश वह व्यक्ति चकित होकर यह सोचने लगता है, कि निश्चय ही यह पवित्र आत्मा उसमें आ रहा है। और तब मन प्रभावित और उत्तेजित होने लगता है। पहले बड़ा आनन्द होता है; और फिर अनेक अन्य मनोभाव, अत्यन्त उथल-पुथल भरी रीति से, सारे स्वभाव को, देह और मन दोनों को, एक भारी हलचल में डाल देते हैं। क्योंकि यद्यपि, जैसा मैंने पहले देखा, केवल प्राण ही मनोभावों का निवासस्थान है; तौभी यह इसमें बाधा नहीं डालता कि शारीरिक अनुभूतियाँ, इस रीति से, मन में मनोभावों का अवसर बन सकें।
और यदि मनुष्यों के धार्मिक मनोभाव सचमुच समझ में किसी शिक्षा या ज्योति से उत्पन्न होते भी हों, तो भी वह मनोभाव अनुग्रहमय नहीं है, जब तक कि जो ज्योति उसका आधार है वह आत्मिक न हो। मनोभाव उस समझ से भी उभर सकते हैं, जो मनुष्य केवल मानवीय शिक्षा से और मन की शक्तियों के सामान्य विकास द्वारा प्राप्त करते हैं।
मनुष्य धर्म की बातों के उस ज्ञान से जो वे इस रीति से प्राप्त करते हैं बहुत प्रभावित हो सकते हैं; जैसे कुछ दार्शनिक गणित और प्राकृतिक दर्शनशास्त्र में की गई अपनी खोजों से इतने प्रबल रूप से प्रभावित हुए हैं कि मानो वे अपने आप से बाहर उठा लिए गए हों। इसी प्रकार मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की सामान्य ज्योति से भी बहुत प्रभावित हो सकते हैं, जिसमें परमेश्वर मनुष्यों की शक्तियों को धार्मिक विषयों की उस प्रकार की समझ में कुछ अधिक मात्रा में सहायता देता है, जो समझ उन्हें अपनी ही शक्तियों के सामान्य उपयोग और विकास द्वारा भी कुछ मात्रा में प्राप्त होती है।
ऐसी ज्योति मन को बहुत प्रभावित कर सकती है; जैसे उन बहुतों में जिनके विषय में हम पवित्रशास्त्र में पढ़ते हैं, कि वे एक बार ज्योति पाकर प्रकाशित हुए थे; परन्तु ऐसे मनोभाव आत्मिक नहीं होते।
यदि पवित्रशास्त्र हमें कुछ भी सिखाने के लिए कुछ काम का है, तो दिव्य बातों की एक आत्मिक, अलौकिक समझ भी अवश्य है, जो केवल संतों के लिए विशेष है, और जिसमें से जो संत नहीं हैं उनके पास कुछ भी नहीं है। यह निश्चय ही दिव्य बातों की एक ऐसी समझ, ग्रहण करने या पहचानने की रीति है, जिसमें से स्वाभाविक मनुष्यों के पास कुछ भी नहीं है, जिसकी चर्चा प्रेरित 1 कुरिन्थियों 2:14 में करता है: “परन्तु स्वाभाविक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातों को ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उसकी दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं; और न वह उन्हें जान सकता है, क्योंकि उनकी जाँच आत्मिक रीति से होती है।”
यह निश्चय ही आत्मिक बातों को देखने या पहचानने की एक ऐसी रीति है जो संतों के लिए विशेष है, जिसकी चर्चा 1 यूहन्ना 3:6 में की गई है: “जो कोई पाप करता है, उसने न उसे देखा है, न उसे जाना है।” 3 यूहन्ना
11, “जो कोई बुराई करता है, उसने परमेश्वर को नहीं देखा।” और यूहन्ना 6:40, “यह उसकी इच्छा है जिसने मुझे भेजा है, कि जो कोई पुत्र को देखे, और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए।” अध्याय
14:19, “जगत मुझे फिर न देखेगा, परन्तु तुम मुझे देखोगे।” अध्याय 17:3, “अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ एकमात्र सच्चे परमेश्वर को, और यीशु मसीह को जिसे तूने भेजा है, जानें।” मत्ती
11:27, “पुत्र को पिता के सिवाय कोई नहीं जानता; और न पिता को पुत्र के सिवाय कोई जानता है, और वह भी जिस पर पुत्र उसे प्रगट करना चाहे।” यूहन्ना 12:45, “जो मुझे देखता है, वह उसे देखता है जिसने मुझे भेजा है।” भजन संहिता 9:10, “जो तेरा नाम जानते हैं, वे तुझ पर भरोसा रखेंगे।”
फिलिप्पियों 3:8, “मैं सब कुछ को हानि समझता हूं, इस कारण कि मेरे प्रभु मसीह यीशु की पहचान का ज्ञान सब से बढ़कर उत्तम है”—पद 10, “कि मैं उसे जान लूं।” और बाइबल में और भी अनगिनत स्थान हैं जो यही बात दिखाते हैं। और यह कि दिव्य बातों की एक ऐसी समझ है, जो अपनी प्रकृति और प्रकार में स्वाभाविक मनुष्यों के समस्त ज्ञान से पूर्णतः भिन्न है, इस बात से स्पष्ट है, कि दिव्य बातों की एक ऐसी समझ है जिसे पवित्रशास्त्र आत्मिक समझ कहता है, कुलुस्सियों 1:9, “हम भी...तुम्हारे लिये प्रार्थना करने से नहीं चूकते, कि तुम सारे ज्ञान और आत्मिक समझ में उसकी इच्छा की पहचान से परिपूर्ण हो जाओ।”
यह पहले ही दिखाया जा चुका है, कि जो कुछ आत्मिक है, नये नियम में उस शब्द के सामान्य प्रयोग के अनुसार, वह अपनी प्रकृति और प्रकार में उस सब से पूर्णतः भिन्न है, जिसका अनुभव स्वाभाविक मनुष्य कर सकते हैं या करते हैं।
इससे निश्चय के साथ यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आत्मिक समझ किस बात में है। क्योंकि यदि संतों में एक ऐसी प्रकार की ग्रहणशक्ति या बोध है, जो अपनी प्रकृति में उस सब से पूर्णतः भिन्न है जो स्वाभाविक मनुष्यों में है, या जब तक उन्हें नया स्वभाव न मिले तब तक हो सकता है; तो यह अवश्य इस बात में है कि उनमें मन के एक विशेष प्रकार के विचार या अनुभव हों, जो उस सब से बिलकुल भिन्न हों जो स्वाभाविक मनुष्यों के मन में है या हो सकता है। और यह कहना उतना ही है जितना यह कहना, कि यह एक नई आत्मिक इन्द्रिय के अनुभवों में है, जो स्वाभाविक मनुष्यों के प्राणों में नहीं है; जैसा कि इससे पहले बार-बार दिखाया जा चुका है।
परन्तु मैं पहले ही दिखा चुका हूं कि वह नई आत्मिक इन्द्रिय क्या है जो संतों को नये जन्म में दी जाती है, और उसका विषय क्या है। मैं दिखा चुका हूं कि उसका तत्काल विषय दिव्य बातों की प्रकृति की सर्वोच्च सुंदरता और उत्कृष्टता है, जैसी वे अपने आप में हैं।
और यह पवित्रशास्त्र के अनुरूप है; प्रेरित बहुत स्पष्टता से सिखाता है, कि आत्मिक ज्योति द्वारा प्रगट की गई और आत्मिक ज्ञान द्वारा समझी गई महान बात, दिव्य बातों की महिमा है, 2 कुरिन्थियों 4:3-4, “पर यदि हमारा सुसमाचार छिपा भी है, तो नाश होनेवालों ही से छिपा है, जिनके अविश्वासी मन को इस संसार के ईश्वर ने अंधा कर दिया है, कि मसीह के तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उन पर न चमके।” पद 6 के साथ:
“क्योंकि परमेश्वर जिसने अंधियारे में से ज्योति चमकने की आज्ञा दी, उसी ने हमारे हृदयों में चमककर, यीशु मसीह के मुख की पहचान से परमेश्वर की महिमा के ज्ञान की ज्योति उत्पन्न की है।” और अध्याय
3:18, पूर्ववर्ती वचन में: “पर हम सब खुले मुंह से मानो दर्पण में प्रभु की महिमा को देखते हुए, प्रभु के आत्मा के द्वारा उसी प्रतिरूप में महिमा से महिमा तक बदलते जाते हैं।” और ऐसा होना ही चाहिए, क्योंकि जैसा पहले भी देखा जा चुका है, पवित्रशास्त्र बार-बार सिखाता है कि सारा सच्चा धर्म संक्षेप में दिव्य बातों के प्रेम में है। और इसलिए वह समझ या ज्ञान, जो सच्चे धर्म की उचित नींव है, अवश्य दिव्य बातों की मनोहरता का ज्ञान होना चाहिए। क्योंकि निःसंदेह, वह ज्ञान जो प्रेम की उचित नींव है, मनोहरता का ज्ञान है। दिव्य बातों की वह सुंदरता क्या है,
जो मन की आत्मिक इन्द्रिय का उचित और तत्काल विषय है, वह पिछले शीर्षक में दिखाई जा चुकी है, अर्थात् यह कि वह उनकी नैतिक सिद्धता की सुंदरता है। इसलिए आत्मिक समझ प्रत्यक्षतः और मुख्यतः इसी के दर्शन या बोध में है। और वास्तव में यह स्पष्ट है कि यह और कुछ नहीं हो सकती; क्योंकि (जैसा दिखाया जा चुका है) दिव्य बातों से संबंधित उनकी नैतिक उत्कृष्टता की सुंदरता, और दिव्य बातों के वे गुण-धर्म जिनकी यह सुंदरता नींव है, इनके अतिरिक्त और कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे स्वाभाविक मनुष्य और शैतान न देख और जान सकें, और अनन्तकाल तक पूरी तरह और स्पष्टता से न जानेंगे।
अतः जो कुछ कहा गया है उससे हम अनिवार्य रूप से इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, कि आत्मिक समझ किस बात में है, अर्थात् यह “दिव्य बातों की पवित्रता या नैतिक सिद्धता की सर्वोच्च सुंदरता और मिठास के हृदय के बोध में है, साथ ही धर्म की उन सब बातों की पहचान और ज्ञान में भी है, जो इस बोध पर निर्भर हैं और इसी से उत्पन्न होती हैं।”
आत्मिक समझ मुख्यतः उस आत्मिक सुंदरता के हृदय के बोध में है। मैं कहता हूं, हृदय का बोध; क्योंकि इस प्रकार की समझ में केवल विचारशक्ति ही सम्मिलित नहीं है; और न इस विषय में बुद्धि और इच्छा नामक दोनों शक्तियों के बीच, मानो वे अलग-अलग और स्वतंत्र रूप से कार्य करती हों, कोई स्पष्ट भेद किया जा सकता है। जब मन किसी वस्तु की मीठी सुंदरता और मनोहरता का बोध पाता है, तो इसका अर्थ यह है कि उस वस्तु के विचार की उपस्थिति में मिठास और आनंद का बोध भी है: और सुंदरता की इस मनोहरता या आनंददायकता के बोध में, अपने स्वभाव से ही हृदय का बोध सम्मिलित है; अर्थात् वह प्रभाव और छाप जिसका विषय प्राण है, मानो वह स्वाद, झुकाव और इच्छा से युक्त एक पदार्थ हो।
एक केवल वैचारिक समझ, जिसमें मन विचारशक्ति के प्रयोग द्वारा केवल वस्तुओं को देखता है; और हृदय के बोध के बीच, जिसमें मन केवल विचार और अवलोकन ही नहीं करता, वरन उसमें रस लेता और उसका अनुभव भी करता है, एक भेद किया जाना चाहिए। जिस प्रकार के ज्ञान से मनुष्य को मनोहरता और घृणा का, या मिठास और वितृष्णा का बोधगम्य अनुभव होता है, वह उस प्रकार के ज्ञान के समान नहीं है जिससे वह जानता है कि त्रिभुज क्या है और चतुर्भुज क्या है। एक केवल वैचारिक ज्ञान है, दूसरा बोधगम्य ज्ञान है, जिसमें केवल बुद्धि से अधिक कुछ सम्मिलित है; इसका उचित विषय हृदय है, अर्थात् प्राण, एक ऐसे प्राणी के रूप में जो केवल देखता ही नहीं, वरन जिसमें झुकाव है, और जो प्रसन्न या अप्रसन्न होता है। और फिर भी इसमें शिक्षा की प्रकृति भी है; जैसे जिसने शहद का मीठा स्वाद चख लिया है, वह उसके बारे में उससे कहीं अधिक जानता है जिसने केवल उसे देखा और छुआ है।
प्रेरित धर्म की बातों के केवल वैचारिक ज्ञान और आत्मिक ज्ञान के बीच भेद करता प्रतीत होता है, जब वह पहले को व्यवस्था में ज्ञान और सत्य का रूप कहता है, रोमियों 2:20, “जिसके पास व्यवस्था में ज्ञान और सत्य का रूप है।” दूसरे को प्रायः रस लेने, सूंघने या चखने के रूप में दर्शाया गया है, 2 कुरिन्थियों 2:14, “परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो मसीह में हमें सदा जय के उत्सव में लिए फिरता है, और हर एक जगह हमारे द्वारा अपने ज्ञान की सुगंध फैलाता है।” मत्ती 16:23, “तू परमेश्वर की बातों पर नहीं, परन्तु मनुष्यों ही की बातों पर मन लगाता है।” 1 पतरस 2:2-3, “नये जन्मे हुए बच्चों के समान वचन के निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो, कि उसके द्वारा बढ़ते जाओ; यदि सचमुच तुम ने चख लिया है कि प्रभु भला है।” श्रेष्ठगीत 1:3, “तेरे इत्रों की सुगंध के कारण तेरा नाम उंडेला हुआ इत्र सा है, इसी कारण कुंवारियां तुझ से प्रेम रखती हैं;” इसकी तुलना 1 यूहन्ना 2:20 से करें, “पर तुम उस पवित्र से अभिषिक्त हुए हो, और सब बातें जानते हो।”
आत्मिक समझ मुख्यतः दिव्य बातों की नैतिक सुंदरता के इस स्वाद के बोध में है; इसलिए किसी भी ज्ञान को आत्मिक तभी तक कहा जा सकता है जब तक वह इसी से उत्पन्न होता है, और इसे अपने में रखता है। परन्तु गौणतः इसमें धर्म की उन सब बातों की पहचान और ज्ञान भी सम्मिलित है, जो इस बोध पर निर्भर हैं और इसी से उत्पन्न होती हैं।
जब दिव्य बातों में जो पवित्रता या सच्ची नैतिक भलाई है, उसकी सच्ची सुंदरता और मनोहरता प्राण पर प्रगट होती है, तो यह मानो उसकी दृष्टि के लिए एक नये संसार को खोल देती है। इससे परमेश्वर की समस्त सिद्धताओं की, और दिव्य सत्ता से संबंधित हर बात की महिमा दिखाई देती है। क्योंकि, जैसा पहले देखा जा चुका है, सारी सुंदरता परमेश्वर की नैतिक सिद्धता से ही उत्पन्न होती है। इससे परमेश्वर के सारे कार्यों की, सृष्टि और परमेश्वर की व्यवस्था दोनों की, महिमा दिखाई देती है। क्योंकि उनकी विशेष महिमा यही है, कि उनमें परमेश्वर की पवित्रता, धार्मिकता, विश्वासयोग्यता और भलाई इस प्रकार प्रगट होती है; और इन नैतिक सिद्धताओं के बिना, जिस सामर्थ्य और कुशलता से वे कार्य किए गए हैं उसमें कोई महिमा न होती। परमेश्वर की नैतिक सिद्धताओं की महिमा करना ही, परमेश्वर के हाथों के सब कार्यों का विशेष उद्देश्य है। दिव्य बातों की नैतिक सुंदरता के इस बोध से ही मध्यस्थ के रूप में मसीह की पर्याप्तता समझी जाती है; क्योंकि केवल मसीह की नैतिक सिद्धता की सुंदरता के प्रगट होने से ही विश्वासी उसके व्यक्तित्व की उत्कृष्टता के ज्ञान में प्रवेश पाता है, ऐसा कि वह उसके विषय में शैतानों से अधिक कुछ जान सके; और केवल मसीह के व्यक्तित्व की उत्कृष्टता के ज्ञान से ही कोई मध्यस्थ के रूप में उसकी पर्याप्तता को जानता है; क्योंकि यह उत्तरार्ध पहले पर ही निर्भर है और उसी से उत्पन्न होता है। मसीह के व्यक्तित्व की उत्कृष्टता को देखने से ही संत उसके लहू के अनमोल होने का, और पाप के प्रायश्चित के लिए उसकी पर्याप्तता का बोध पाते हैं; क्योंकि मसीह के लहू की अनमोलता इसी में है, कि वह इतने उत्कृष्ट और मनोहर व्यक्ति का लहू है। और इसी पर उसकी आज्ञाकारिता की पुण्यता, और उसकी मध्यस्थ-प्रार्थना की पर्याप्तता और प्रबलता निर्भर है। दिव्य बातों की नैतिक सुंदरता के इस दर्शन से ही मसीह द्वारा उद्धार के मार्ग की सुंदरता दिखाई देती है; क्योंकि वह परमेश्वर की नैतिक सिद्धताओं की सुंदरता में है, जो उद्धार की इस विधि के आरंभ से अंत तक हर कदम में अद्भुत रीति से चमकती है। इससे इस मार्ग की उपयुक्तता और औचित्य दिखाई देता है: क्योंकि यह पूर्णतः इस बात में है कि यह हमें पाप और नरक से छुड़ाने की, और उस सुख तक पहुंचाने की प्रवृत्ति रखता है जो नैतिक भलाई के अधिकार और आनंद में है, ऐसी रीति से जो परमेश्वर की नैतिक सिद्धताओं से मिठास के साथ मेल खाती है। और इस मार्ग का इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इस प्रकार रचा जाना ही, उस मार्ग की उत्कृष्ट बुद्धिमानी है। इससे परमेश्वर के वचन की उत्कृष्टता दिखाई देती है। वचन में से सारी नैतिक सुंदरता और मिठास हटा दो, तो बाइबल पूर्णतः एक मरा हुआ अक्षर, एक सूखी, निर्जीव, स्वादहीन वस्तु ही रह जाती है। इससे हमारे कर्तव्य की सच्ची नींव दिखाई देती है, अर्थात् परमेश्वर की यह योग्यता कि उसे वैसा ही आदर, सम्मान, प्रेम, समर्पण और सेवा दी जाए जैसी वह हमसे मांगता है, और स्वयं उन कर्तव्यों की मनोहरता जो हमसे मांगे गए हैं। और इससे पाप की सच्ची बुराई भी दिखाई देती है; क्योंकि जो व्यक्ति
पवित्रता की सुंदरता देखता है, वह अनिवार्यतः उसके विपरीत पाप की घृणितता को भी देखता है। इससे मनुष्य स्वर्ग की सच्ची महिमा को समझते हैं, जो पवित्रता में निहित सुंदरता और सुख में है। इससे संतों और स्वर्गदूतों दोनों की मनोहरता और सुख भी दिखाई देता है। जो पवित्रता की, अर्थात् सच्ची नैतिक भलाई की सुंदरता देखता है, वह संसार की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण वस्तु देखता है, जो सब वस्तुओं की परिपूर्णता है, जिसके बिना सारा संसार खाली है, कुछ भी नहीं के समान, वरन कुछ भी नहीं से भी बदतर है। जब तक यह न देखा जाए, तब तक कुछ भी ऐसा नहीं देखा जाता जो देखने योग्य हो; क्योंकि इसके अतिरिक्त कोई और सच्ची उत्कृष्टता या सुंदरता है ही नहीं। जब तक यह न समझा जाए, तब तक कुछ भी ऐसा नहीं समझा जाता जो समझ की उस उत्तम शक्ति के प्रयोग के योग्य हो।
यही परमेश्वरत्व की सुंदरता है, और (यदि मैं ऐसा कह सकूं) परमेश्वरत्व की भी परमेश्वरता है, भलाई के अनन्त सोते की भलाई है; जिसके बिना, परमेश्वर स्वयं भी (यदि यह संभव होता) एक अनन्त बुराई होता; जिसके बिना हमारे लिए कभी अस्तित्व में न आना ही बेहतर होता; और जिसके बिना किसी भी सत्ता का न होना ही बेहतर होता। इसलिए जो इसे नहीं जानता, वह वास्तव में कुछ भी नहीं जानता; उसका ज्ञान केवल ज्ञान की छाया है, या ज्ञान का रूप मात्र है, जैसा प्रेरित इसे कहता है। इसलिए पवित्रशास्त्र ठीक ही उन लोगों को, जो उस आत्मिक बोध से रहित हैं जिसके द्वारा पवित्रता की सुंदरता का अनुभव होता है, पूर्णतः अंधे, बहरे और बोधशून्य, वरन मरे हुए बताता है। और यह भी ठीक ही है कि नये जन्म को, जिसमें सृष्टिकर्ता प्राण को यह दिव्य बोध देता है, अंधी आंखों के खोले जाने, मरे हुओं के जिलाए जाने, और किसी व्यक्ति के एक नये संसार में लाए जाने के रूप में दर्शाया जाए। क्योंकि यदि जो कहा गया है उस पर विचार किया जाए, तो यह स्पष्ट होगा, कि जब किसी व्यक्ति को यह बोध और ज्ञान दिया जाता है, तो वह किसी भी वस्तु को वैसा नहीं देखेगा जैसा पहले देखता था; यद्यपि पहले वह सब कुछ “शरीर के अनुसार” जानता था, परन्तु अब से वह उन्हें उस रीति से फिर कभी न जानेगा; और वह एक नई सृष्टि बन गया है; “पुरानी बातें बीत गईं, देखो, सब बातें नई हो गई हैं”; यह 2 कुरिन्थियों 5:16-17 के अनुरूप है।
और जिन बातों का उल्लेख पहले किया जा चुका है उनके अतिरिक्त, आत्मिक सुंदरता के इस बोध से ही धर्म का सारा सच्चा अनुभवसिद्ध ज्ञान उत्पन्न होता है, जो अपने आप में मानो ज्ञान का एक नया संसार है। जो पवित्रता की सुंदरता नहीं देखता, वह नहीं जानता कि परमेश्वर के आत्मा के अनुग्रहों में से एक भी क्या है, वह प्राण के सब अनुग्रहमय कार्यों का, और सब पवित्र सांत्वनाओं और आनंदों का, और हृदय पर परमेश्वर के आत्मा के उद्धार-कारी प्रभावों के सब परिणामों का कोई भी विचार या धारणा नहीं रखता; और इस प्रकार वह परमेश्वर के सबसे बड़े कार्यों से, अर्थात् प्राणी पर उसकी सामर्थ्य के सबसे महत्वपूर्ण और गौरवशाली परिणामों से अनजान रहता है; और वह संतों को संत के रूप में भी पूरी तरह नहीं जानता, वह नहीं जानता कि वे क्या हैं; और वास्तव में सारे आत्मिक जगत से अनजान रहता है।
बातें ऐसी होने से, यह स्पष्ट प्रगट होता है, कि परमेश्वर द्वारा जिस आत्मिक अलौकिक बोध की चर्चा हुई है उसका मनुष्य में डाला जाना, मनुष्य में एक बड़ा परिवर्तन ला देता है। और यदि यह न होता कि यह बोध आरंभ में सामान्यतः जितनी अपूर्ण मात्रा में दिया जाता है, या यह गौरवशाली ज्योति जितनी छोटी मात्रा में पहले-पहल प्राण पर उदय होती है; तो मन-परिवर्तन में इस आत्मिक रीति से आंखें खुलने से जो बदलाव आता, वह हर प्रकार से उससे कहीं अधिक बड़ा और उल्लेखनीय होता, जितना कि यदि कोई मनुष्य, जो जन्म से अंधा हो, और जिसके पास केवल अन्य चार इन्द्रियां ही हों, वह लंबे समय तक ऐसा ही बना रहे, और फिर अचानक ही उसे देखने की इन्द्रिय, सूर्य के स्पष्ट प्रकाश के बीच, दृश्य वस्तुओं के एक संसार को उजागर करते हुए दे दी जाए। क्योंकि यद्यपि दृष्टि
अन्य सब बाह्य इन्द्रियों से अधिक उत्तम है, फिर भी जिस आत्मिक बोध की चर्चा हुई है, वह उससे, या मनुष्य में स्वाभाविक रूप से पाई जानेवाली किसी भी अन्य पहचान-शक्ति से अनंत गुणा अधिक उत्तम है, और इस बोध का विषय भी अनंत गुणा अधिक महान और महत्वपूर्ण है।
इस प्रकार की समझ या ज्ञान ही दिव्य बातों का वह ज्ञान है जिससे सारे सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उत्पन्न होते हैं; और इसी के द्वारा इसलिए सब मनोभावों को परखा जाना चाहिए।
जो मनोभाव पूर्णतः किसी अन्य प्रकार के ज्ञान से उत्पन्न होते हैं, या मन की किसी अन्य प्रकार की ग्रहणशक्ति से निकलते हैं, वे व्यर्थ हैं।
जो कुछ कहा गया है उससे यह सीखा जा सकता है, कि वह सबसे मूलभूत भेद किस बात में है, जो उस ज्योति या समझ के बीच है जो परमेश्वर के आत्मा के सामान्य प्रभावों द्वारा स्वाभाविक मनुष्यों के हृदयों पर दी जाती है, और उस उद्धार-कारी शिक्षा के बीच जो संतों को दी जाती है।
उत्तरार्ध मुख्यतः और सबसे मूलभूत रीति से दिव्य बातों में जो पवित्र सुंदरता है उसके दर्शन में है; जो एकमात्र सच्ची नैतिक भलाई है, और जिसके प्रति पतित मनुष्य का प्राण स्वभाव से पूर्णतः अंधा है। पूर्वार्ध केवल स्वाभाविक सिद्धांतों की सहायता से उन बातों की और अधिक समझ में है, जिन्हें मनुष्य अपनी शक्तियों के केवल सामान्य प्रयोग से भी कुछ मात्रा में जान सकते हैं। और यह ज्ञान केवल धर्म से संबंधित उन बातों के ज्ञान में है, जो स्वाभाविक हैं। इस प्रकार उदाहरण के लिए, विवेक के उन जागरणों में, जिनके अधीन स्वाभाविक मनुष्य प्रायः आते हैं, परमेश्वर का आत्मा दिव्य बातों में जो सच्ची नैतिक सुंदरता है उसका कोई ज्ञान नहीं देता; परन्तु केवल मन को पाप के दोष का, या दंड से उसके संबंध का, और दुख की बुराई से उसके जुड़ाव का
(इसकी नैतिक बुराई या पाप के रूप में इसकी घृणितता को देखे बिना), स्पष्ट बोध देता है, और परमेश्वर की स्वाभाविक सिद्धताओं का स्पष्ट बोध देता है, जिसमें उसकी पवित्र सुंदरता और महिमा नहीं, वरन उसकी भयानक और भयंकर महानता निहित है। इसी का स्पष्ट दर्शन है जो न्याय के दिन दुष्ट मनुष्यों के विवेक को बिना किसी आत्मिक ज्योति के पूरी तरह जगा देगा। और इसी की कुछ कम मात्रा है जो इस संसार में बिना आत्मिक ज्योति के स्वाभाविक मनुष्यों के विवेक को जगाती है। वही प्रगटीकरण कुछ मात्रा में इस संसार में एक जागृत पापी के विवेक में दिए जाते हैं, जो न्याय के दिन पापियों के विवेक में और भी पूर्णता से दिए जाएंगे। परमेश्वर का वही प्रकार का दर्शन या बोध, कुछ कम मात्रा में, इस संसार के जागृत पापियों को इतने महान और भयंकर परमेश्वर के विरुद्ध पाप के भयानक दोष का बोध कराता है, और उसके अद्भुत दंड का बोध कराता है, और उन्हें दिव्य क्रोध की भयभीत करनेवाली आशंकाओं से भर देता है, जो सब दुष्ट मनुष्यों को पाप की अनंत भयानक प्रकृति और दोष का पूरी तरह कायल कर देगी, और जब मसीह अपनी सामर्थ्य और वैभव की महिमा में आएगा, और हर आंख उसे देखेगी, और पृथ्वी के सब कुल उसके कारण विलाप करेंगे, तब उन्हें क्रोध की आशंकाओं से चकित कर देगी। और उन सामान्य ज्योतियों में, जो कभी-कभी स्वाभाविक मनुष्यों को दी जाती हैं, और उनमें किसी प्रकार की धार्मिक इच्छा, प्रेम और आनंद जगाती हैं, मन को केवल दिव्य बातों में जो स्वाभाविक भलाई है उसका स्पष्ट बोध कराने में सहायता मिलती है। इस प्रकार कभी-कभी, सामान्य ज्योति के अधीन, मनुष्य स्वर्ग में जो स्वाभाविक भलाई है उसके विचारों से उत्साहित हो जाते हैं; जैसे उसकी बाह्य महिमा; उसका सुख, उसका आदर और उन्नति, वहां परमेश्वर की महती कृपादृष्टि और मनुष्यों तथा स्वर्गदूतों के महान सम्मान का विषय होना, इत्यादि। इस प्रकार बहुत सी बातें प्रगट की जाती हैं
सुसमाचार में परमेश्वर और मसीह के विषय में, और उद्धार के मार्ग के विषय में, जिनमें एक स्वाभाविक भलाई है, जो आत्म-प्रेम के स्वाभाविक सिद्धांत के अनुकूल बैठती है। इस प्रकार पापियों के प्रति परमेश्वर की उस महान भलाई में, और मसीह के अद्भुत मरणकारी प्रेम में, एक स्वाभाविक भलाई है जिसे सब मनुष्य वैसे ही प्रेम करते हैं जैसे वे स्वयं को प्रेम करते हैं; उसी के साथ एक आत्मिक और पवित्र सुंदरता भी है, जो केवल नया जन्म पाए हुओं को ही दिखाई देती है। इसलिए सुसमाचार में सुनाए गए परमेश्वर के अनुग्रह के वचन से संबंधित बहुत सी बातें हैं, जो स्वाभाविक मनुष्यों को, जब वे उन्हें सुनते हैं, तुरंत आनंद के साथ ग्रहण करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। स्वाभाविक मनुष्यों का परमेश्वर और मसीह से, और मसीही सद्गुणों से, और भले मनुष्यों से जो भी प्रेम है, वह इन बातों की पवित्रता की मनोहरता, या सच्ची नैतिक उत्कृष्टता के किसी दर्शन से नहीं है; परन्तु केवल इसलिए है क्योंकि इनमें एक स्वाभाविक भलाई है। स्वाभाविक मनुष्यों की पाप से जो घृणा है, वह उतनी ही स्वभाव के सिद्धांतों से है, जितनी मनुष्यों की किसी बाघ से उसकी क्रूरता के कारण घृणा, या किसी सर्प से उसके विष और हानिकारकता के कारण अरुचि; और मसीही सद्गुण के प्रति उनका सारा प्रेम, इससे बढ़कर किसी उच्चतर सिद्धांत से नहीं है, जितना किसी मनुष्य के भले स्वभाव के प्रति उनका प्रेम, जो स्वाभाविक मनुष्यों को मनोहर प्रतीत होता है; परन्तु उससे अधिक नहीं, जितना चांदी और सोना किसी व्यापारी की दृष्टि में मनोहर प्रतीत होता है, या जितनी मिट्टी की कालिमा किसी किसान की दृष्टि में सुंदर प्रतीत होती है।
आत्मिक समझ की प्रकृति के विषय में जो कुछ कहा गया है उससे यह प्रगट होता है, कि आत्मिक समझ किसी नए सैद्धांतिक ज्ञान में, या मन में कोई ऐसा नया कथन सुझाए जाने में नहीं है, जो पहले न पढ़ा या सुना गया हो; क्योंकि यह स्पष्ट है कि नए कथनों का यह सुझाया जाना, मन को सुंदरता और मिठास का एक नया स्वाद या रस देने से पूर्णतः भिन्न बात है।53 यह भी स्पष्ट है कि आत्मिक ज्ञान पवित्रशास्त्र के किसी भी भाग की किसी नई सैद्धांतिक व्याख्या में नहीं है; क्योंकि यह भी अंततः सैद्धांतिक ज्ञान ही है, अर्थात् कथनों का ज्ञान; पवित्रशास्त्र के किसी भाग की सैद्धांतिक व्याख्या करना, केवल हमें यह समझाना है कि पवित्रशास्त्र के उस भाग में कौन-कौन से कथन सम्मिलित हैं या सिखाए गए हैं।
इससे यह प्रगट होता है, कि पवित्रशास्त्र की आत्मिक समझ, उसके दृष्टान्तों, प्रतिरूपों और रूपकों में पवित्रशास्त्र के गूढ़ अर्थ को मन पर खोलने में नहीं है; क्योंकि यह तो पवित्रशास्त्र की केवल एक सैद्धांतिक व्याख्या ही है। जो यह व्याख्या करता है कि पथरीली भूमि का, और बीज के अचानक उग आने और शीघ्र सूख जाने का क्या अर्थ है, वह केवल यह बताता है कि उसमें कौन-कौन से कथन या सिद्धांत सिखाए गए हैं। इसी प्रकार जो यह व्याख्या करता है कि याकूब की सीढ़ी, और उस पर परमेश्वर के स्वर्गदूतों का चढ़ना-उतरना किसका प्रतिरूप है, या यहोशू का इस्राएल को यरदन के पार ले जाना किसका प्रतिरूप था, वह केवल यही दिखाता है कि उसमें कौन-कौन से कथन
53 कैल्विन अपनी “इंस्टीट्यूट्स” में, पुस्तक 1, अध्याय 9, धारा 1 में कहता है, “जो आत्मा हमें प्रतिज्ञा किया गया है, उसका कार्य नई और पहले अनसुनी प्रकटताएं करना, या किसी नए प्रकार के सिद्धांत की रचना करना नहीं है, जो हमें सुसमाचार के स्वीकृत सिद्धांत से दूर खींचता हो; वरन उसी सिद्धांत को हम पर मुहर लगाकर पक्का करना है, जो सुसमाचार के द्वारा है।” और उसी स्थान पर वह उन कुछ लोगों की बात करता है जो उन दिनों विपरीत धारणा रखते थे, “यह दावा करते हुए कि वे तत्काल आत्मा द्वारा अगुवाई पाते हैं, मानो वे एक अत्यंत घमंडी आत्म-अभिमान से संचालित व्यक्ति हों: और उन्हें ठीक से केवल एक भूल के अधीन कार्य करनेवाले के रूप में नहीं, वरन एक प्रकार के उन्मादपूर्ण पागलपन से प्रेरित के रूप में देखा जाना चाहिए।”
इन वचनों में छिपे हैं। और बहुत से मनुष्य इन प्रतिरूपों की व्याख्या कर सकते हैं जिनमें कोई आत्मिक ज्ञान नहीं है। यह संभव है कि कोई मनुष्य बाइबल के सब प्रतिरूपों, दृष्टान्तों, रहस्यमय बातों और रूपकों की व्याख्या करना जानता हो, और फिर भी उसके मन में आत्मिक ज्योति की एक भी किरण न हो; क्योंकि हो सकता है कि उसमें दिव्य बातों की पवित्र सुंदरता के उस आत्मिक बोध का, जिसकी चर्चा हुई है, लेशमात्र भी न हो, और इन रहस्यों में से किसी में भी, या पवित्रशास्त्र के किसी अन्य भाग में भी, उसे इस प्रकार की महिमा का कुछ भी दिखाई न दे। प्रेरित की बात से यह स्पष्ट है, कि कोई मनुष्य इन सब रहस्यों को समझ सकता है, और फिर भी उसमें उद्धार-कारी अनुग्रह न हो, 1 कुरिन्थियों 13:2, “और यदि मुझे भविष्यद्वाणी का वरदान हो, और मैं सब भेदों और सारे ज्ञान को जानता होऊं...परन्तु प्रेम न रखूं, तो मैं कुछ भी नहीं।” इसलिए वे बहुत मूर्ख हैं, जो पवित्रशास्त्र के इन-उन वचनों के गूढ़ अर्थ के विषय अपने मन में आनेवाली धारणाओं के कारण, अपनी आत्मिक उपलब्धियों की राय में फूल उठते हैं, मानो यह इन वचनों की एक आत्मिक समझ हो, जो परमेश्वर के आत्मा द्वारा उन्हें तत्काल दी गई हो, और इसी से उनके मनोभाव अत्यधिक उभर आते हैं; और जो कुछ कहा गया है उससे ऐसे मनोभावों की व्यर्थता प्रगट होती है।
जो कुछ कहा गया है उससे यह भी स्पष्ट है, कि लोगों को उनके कर्तव्य की सूचना इस रीति से मिलना कि उनके मन में तत्काल यह सुझाव आ जाए कि अमुक-अमुक बाह्य कार्य या क्रियाएं परमेश्वर की इच्छा हैं, यह आत्मिक ज्ञान नहीं है। यदि हम यह मान भी लें कि परमेश्वर की सचमुच यही रीति है कि वह अपने लोगों को तत्काल आंतरिक सुझावों द्वारा अपनी इच्छा प्रगट करे, तो भी ऐसे सुझावों में आत्मिक ज्योति की प्रकृति का कुछ भी नहीं है। इस प्रकार का ज्ञान केवल एक प्रकार का सैद्धांतिक ज्ञान ही होगा; परमेश्वर की इच्छा के विषय एक कथन, धर्म का उतना ही उचित सिद्धांत है, जितना परमेश्वर की प्रकृति, या परमेश्वर के किसी कार्य के विषय एक कथन; और इनमें से किसी भी प्रकार के कथन, या किसी अन्य कथन का किसी मनुष्य को, चाहे वाणी द्वारा या आंतरिक सुझाव द्वारा, बताया जाना, प्राण पर दिव्य बातों की पवित्र सुंदरता के प्रगट होने से बहुत भिन्न है, जिसमें आत्मिक ज्ञान सबसे मूलभूत रूप से निहित है।
इस प्रकार बिलाम में कोई आत्मिक ज्योति नहीं थी; यद्यपि उसे परमेश्वर के आत्मा द्वारा समय-समय पर तत्काल यह सुझाव मिलता था कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, अर्थात् उसे किस मार्ग जाना चाहिए, और उसे क्या करना और क्या कहना चाहिए।
इसलिए यह स्पष्ट है, कि इस रीति से अगुवाई और निर्देशन पाना, परमेश्वर के आत्मा की वह पवित्र और आत्मिक अगुवाई नहीं है, जो केवल संतों के लिए विशेष है, और परमेश्वर की सन्तानों का एक विशिष्ट चिन्ह है, जिसकी चर्चा रोमियों 8:14 में है, “क्योंकि जितने परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई से चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं।” गलातियों 5:18, “पर यदि तुम आत्मा के चलाए चलते हो, तो व्यवस्था के आधीन नहीं।”
और यदि लोगों को उनके कार्यों के विषय परमेश्वर की इच्छा का सुझाव, पवित्रशास्त्र के किसी वचन द्वारा मिलता है, जो अचानक और असाधारण रीति से उनके मन में ला दिया जाता है, और जो वचन, जैसा वह बाइबल में उनके मन में आने से पहले लिखा था, किसी अन्य व्यक्ति के कार्य और आचरण से संबंधित था, परन्तु वे यह मान लेते हैं कि, चूंकि परमेश्वर ने वे वचन उन्हें भेजे हैं, इसलिए उसका अभिप्राय उनसे कुछ आगे की बात है, और उसका अर्थ उनका वह विशेष कार्य है; मैं कहता हूं, यदि लोगों को इस रीति से पवित्रशास्त्र के वचनों के साथ परमेश्वर की इच्छा का सुझाव मिले, तो भी इससे बात नहीं बदलती।
सुझाव का पवित्रशास्त्र के किसी उपयुक्त वचन के साथ होना, उस सुझाव को आत्मिक शिक्षा की प्रकृति का नहीं बना देता। उदाहरण के लिए, यदि न्यू इंग्लैंड में कोई व्यक्ति, किसी अवसर पर, इस दुविधा में हो कि क्या उसका कर्तव्य किसी पोप-सम्प्रदाय के या अन्यजातीय देश में जाना है, जहां उसे बहुत सी कठिनाइयों और खतरों का सामना करना पड़े, और वह परमेश्वर से प्रार्थना करे कि वह उसे उसके कर्तव्य का मार्ग दिखाए; और उत्कट प्रार्थना के बाद, उसके मन में अचानक और असाधारण रीति से वे वचन आ जाएं जो परमेश्वर ने याकूब से कहे थे, उत्पत्ति 46, मानो वे उससे ही कहे गए हों, “मिस्र को जाने से मत डर; क्योंकि मैं तेरे साथ चलूंगा, और निश्चय तुझे फिर ऊपर ले आऊंगा।” इन वचनों में, यद्यपि जैसा वे बाइबल में उसके मन में आने से पहले लिखे थे, वे केवल याकूब और उसके आचरण से संबंधित थे; फिर भी वह यह मान लेता है कि परमेश्वर का अभिप्राय इससे आगे कुछ और है, क्योंकि वे उसके पास लाकर उस पर लागू किए गए हैं; कि इस प्रकार उन्हें एक नए अर्थ में समझा जाना चाहिए, कि मिस्र से अभिप्राय उस विशेष देश से है जो उसके मन में है, और अभिप्रेत कार्य उसका वहां जाना है, और प्रतिज्ञा का अर्थ यह है कि परमेश्वर उसे फिर से न्यू इंग्लैंड में वापस ले आएगा। इसमें परमेश्वर के आत्मा की आत्मिक या अनुग्रहमय अगुवाई की प्रकृति का कुछ भी नहीं है; क्योंकि इसमें आत्मिक समझ की प्रकृति का कुछ भी नहीं है। इस रीति से पवित्रशास्त्र के वचनों को समझना, उनकी आत्मिक समझ रखना नहीं है। पवित्रशास्त्र को आत्मिक रीति से समझने का अर्थ है, पवित्रशास्त्र में जो है उसे सही रीति से समझना, और जो उसके समझे जाने से पहले भी उसमें था उसे समझना: इसका अर्थ है सही रीति से यह समझना, कि उसके अर्थ में पहले से क्या था, न कि कोई नया अर्थ बना लेना। जब मन आत्मिक रीति से और सही रीति से पवित्रशास्त्र को समझने के लिए प्रकाशित होता है, तो वह उस बात को पवित्रशास्त्र में देखने योग्य बनाया जाता है, जो पहले अंधेपन के कारण नहीं देखी जाती थी। परन्तु यदि यह अंधेपन के कारण था, तो यह इस बात का प्रमाण है कि वही अर्थ पहले भी उसमें था, अन्यथा उसे न देख पाना अंधापन ही न होता; किसी ऐसे अर्थ को न देखना जो वहां है ही नहीं, अंधापन नहीं है। पवित्रशास्त्र को समझने के लिए आंखों का आत्मिक रीति से प्रकाशित होना, आंखों का खोला जाना है: भजन संहिता 119:18, “मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं”; जो यह दर्शाता है कि पहले पवित्रशास्त्र में वही बात क्यों नहीं देखी जाती थी, इसका कारण यह था कि आंखें बंद थीं; जो कि ऐसा न होता, यदि जो अर्थ अब समझा जा रहा है वह पहले उसमें न होता, वरन अब पवित्रशास्त्र के मन में आने की रीति से नया-नया जोड़ा गया होता। पवित्रशास्त्र को इस प्रकार नया अर्थ देना, पवित्रशास्त्र को नया बना देने के समान ही है; यह वास्तव में वचन में जोड़ना है, जिसके लिए इतना भयानक श्राप दिया गया है। पवित्रशास्त्र को आत्मिक रीति से समझने का अर्थ है, मन की आंखों का खोला जाना, ताकि उसके सच्चे अर्थ में निहित गौरवशाली बातों की अद्भुत आत्मिक उत्कृष्टता को देखा जा सके, जो उसके लिखे जाने के समय से सदैव उसमें रही हैं; ताकि दिव्य सिद्धताओं के मनोहर और उज्ज्वल प्रकटीकरणों को, और मसीह की उत्कृष्टता और पर्याप्तता को, और मसीह द्वारा उद्धार के मार्ग की उत्कृष्टता और उपयुक्तता को, और पवित्रशास्त्र की आज्ञाओं और प्रतिज्ञाओं की आत्मिक महिमा को देखा जा सके, इत्यादि, जो बातें बाइबल में हैं, और सदैव थीं, और यदि अंधेपन के कारण न होता तो पहले भी देखी जा चुकी होतीं, बिना किसी नए बोध के जुड़े, जो वचनों के परमेश्वर द्वारा किसी विशेष व्यक्ति के पास भेजे जाने, और नए अर्थ के साथ उससे नए सिरे से कहे जाने से आया हो।
और जहां तक आत्मा की अनुग्रहमय अगुवाई की बात है, वह दो बातों में है: कुछ तो किसी व्यक्ति को आत्मा द्वारा उसके कर्तव्य की शिक्षा देने में, और कुछ उसे उस शिक्षा को मानने के लिए सामर्थ्य से प्रेरित करने में। परन्तु जहां तक आत्मा की अनुग्रहमय अगुवाई शिक्षा में निहित है, वह इस बात में है कि व्यक्ति उस चीज़ के प्रति एक आत्मिक और विशिष्ट स्वाद द्वारा निर्देशित हो, जिसमें सच्ची नैतिक सुंदरता है। मैं दिखा चुका हूं कि आत्मिक ज्ञान मुख्यतः उस वस्तु की मनोहरता और सुंदरता के एक स्वाद या रस में है, जो सचमुच भली और पवित्र है: यह पवित्र रुचि एक ऐसी बात है जो बिना तर्क की एक शृंखला के परिश्रम के, भले और बुरे के बीच, पवित्र और अपवित्र के बीच पहचान और भेद करती है। जैसे जिस व्यक्ति को बाह्य सुंदरता की सच्ची रुचि है, वह देखते ही जान लेता है कि क्या सुंदर है; उसे यह निर्धारित करने के लिए कि जो वह देखता है वह सुंदर चेहरा है या नहीं, अंगों के अनुपात के विषय तर्क की किसी शृंखला की आवश्यकता नहीं होती; उसे केवल अपनी दृष्टि की एक झलक ही चाहिए, और कुछ नहीं। जिसका संगीत का कान सुधरा हुआ है, वह जान लेता है कि जो ध्वनि वह सुनता है वह सच्चा सुर-सामंजस्य है या नहीं; उसे पहले स्वरों के अनुपात के विषय किसी गणितज्ञ के तर्क के परिश्रम की आवश्यकता नहीं होती। जिसकी जीभ सुधरी हुई है, वह चखते ही, बिना किसी वैद्य के तर्क के, जान लेता है कि अच्छा भोजन क्या है। जैसे चेहरों और ध्वनियों में एक स्वाभाविक सुंदरता है, और भोजन में मिठास है, वैसे ही वचनों और कार्यों में भी एक पवित्र सुंदरता और मिठास है:
अय्यूब 12:11, “क्या कान बातें नहीं परखता, जैसा जीभ भोजन चखकर परखती है?” जब किसी पवित्र प्राण के विचारों में कोई पवित्र और मनोहर कार्य सुझाया जाता है, तो वह प्राण, यदि अपने आत्मिक स्वाद के सजीव प्रयोग में हो, तुरंत उसमें एक सुंदरता देखता है, और इस प्रकार उसकी ओर झुकता है, और उसे अपना लेता है। इसके विपरीत, यदि उसे कोई अयोग्य, अपवित्र कार्य सुझाया जाए, तो उसकी पवित्र आंख उसमें कोई सुंदरता नहीं देखती, और उससे प्रसन्न नहीं होती; उसकी पवित्र रुचि उसमें कोई मिठास नहीं पाती, वरन इसके विपरीत, वह उसे घिनौना लगता है। वरन, उसका पवित्र स्वाद और भूख उसे उसी की ओर सोचने के लिए ले जाती है जो सचमुच मनोहर है, और स्वाभाविक रूप से उसे सुझाती है; जैसे एक स्वस्थ स्वाद और भूख स्वाभाविक रूप से अपनी उपयुक्त वस्तु का विचार सुझाती है। इस प्रकार एक पवित्र व्यक्ति आत्मा द्वारा अगुवाई पाता है, क्योंकि वह अपने पवित्र स्वाद और हृदय के स्वभाव द्वारा शिक्षा और अगुवाई पाता है; जिससे, अनुग्रह के सजीव प्रयोग में, वह सरलता से भले और बुरे में भेद करता है, और तुरंत जान लेता है कि इस स्थिति में और उस स्थिति में, परमेश्वर और मनुष्य के प्रति उपयुक्त मनोहर आचरण क्या है, और मानो स्वतः ही, और अपने आप से, देखी गई सुंदरता और चखी गई भलाई के अतिरिक्त किसी अन्य तर्क के बिना, यह न्याय करता है कि सही क्या है। इस प्रकार मसीह फरीसियों को यह कहकर उलाहना देता है कि वे “अपने आप ही यह न्याय क्यों नहीं करते कि क्या ठीक है,” उसे सिद्ध करने के लिए किसी चमत्कार की आवश्यकता के बिना, लूका 12:57। प्रेरित रोमियों 12:2 में इसी प्रकार आत्मिक सुंदरता का न्याय करने की इस रीति की ओर स्पष्टतः संकेत करता प्रतीत होता है, “तुम अपने मन के नए हो जाने से बदलते जाओ, कि परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा को जांच लो।”
स्वाभाविक सुंदरता की एक अच्छी रुचि भी होती है (जिसकी विद्वान प्रायः चर्चा करते हैं) जो सांसारिक बातों के विषय, उनका न्याय करने में प्रयोग होती है, जैसे किसी भाषण की उचितता, शैली की उत्तमता, किसी कविता की सुंदरता, आचरण की सुघड़ता आदि के विषय में। हमारे देश के हाल ही के एक महान दार्शनिक इस पर इस प्रकार लिखते हैं:54 “रुचि रखने का अर्थ है वस्तुओं को उनका सच्चा मूल्य देना, भलाई से प्रभावित होना, बुराई से आहत होना; चकाचौंध में न आना
54 चैम्बर्स डिक्शनरी, शब्द ‘टेस्ट’ (रुचि) के अंतर्गत।
झूठी चमक से, सब रंगों और हर उस वस्तु के बावजूद जो धोखा दे या मन बहलाए, सही न्याय करना। रुचि और निर्णय, तब, एक ही वस्तु होने चाहिए; फिर भी उनमें भेद पहचानना आसान है। निर्णय अपनी राय चिंतन से बनाता है: इस अवसर पर तर्कशक्ति अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मानो एक चक्कर लगाती है; वह सिद्धांतों को मानती है, परिणाम निकालती है, और निर्णय करती है; परन्तु मामले के पूर्ण ज्ञान के बिना नहीं; इसलिए जब वह अपना निर्णय सुना चुकी होती है, तो वह अपने निर्णयों का कारण देने के लिए तैयार होती है। अच्छी रुचि इनमें से किसी औपचारिकता का पालन नहीं करती; उसे विचार करने का समय मिलने से पहले ही, वह अपना पक्ष ले चुकी होती है; जैसे ही वस्तु सामने आती है, प्रभाव पड़ जाता है, भावना बन जाती है, इससे अधिक कुछ मत पूछो। जैसे कान किसी कर्कश ध्वनि से आहत होता है, जैसे घ्राण किसी सुखद सुगंध से शांत होती है, इससे पहले कि तर्कशक्ति उन वस्तुओं का न्याय करने के लिए उनमें हस्तक्षेप करे, वैसे ही रुचि स्वयं तुरंत खुल जाती है, और सारे चिंतन को रोक देती है। वे बाद में इसकी पुष्टि करने, और इसके आचरण के गुप्त कारणों को खोजने के लिए आ सकते हैं; परन्तु उनकी प्रतीक्षा करना उसकी सामर्थ्य में नहीं था। प्रायः ऐसा होता है कि वह उन्हें बिल्कुल नहीं जानती, और वह चाहे जितना भी परिश्रम करे, यह पता नहीं लगा सकती कि उसने वैसा ही सोचने का निर्णय क्यों किया। यह आचरण उससे बहुत भिन्न है जो निर्णय अपने फैसलों में करता है: जब तक हम यह न कहना चाहें, कि अच्छी रुचि मानो सही तर्कशक्ति की एक पहली गति, या एक प्रकार की सहज प्रवृत्ति है, जो शीघ्रता से आगे बढ़ती है और उन सारे तर्कों से जो वह कर सकती है, अधिक सुरक्षित रीति से ले जाती है; यह आंख की एक पहली झलक है, जो एक क्षण में हमें वस्तुओं की प्रकृति और उनके परस्पर संबंध प्रगट कर देती है।”
अब जैसे मन की एक ऐसी रुचि है, जिसकी दार्शनिक चर्चा करते हैं, जिसके द्वारा लोग वचनों और कार्यों की स्वाभाविक सुंदरता, सुघड़ता, औचित्य, महानता और उदात्तता का न्याय करने में निर्देशित होते हैं, जिससे वे मानो आंख की एक झलक से, या आंतरिक अनुभूति से, और वस्तु के पहले प्रभाव से न्याय करते हैं; वैसे ही एक दिव्य रुचि भी है, जो संतों के हृदयों में परमेश्वर के आत्मा द्वारा दी और बनाए रखी जाती है, जिससे वे उसी प्रकार कार्यों की सच्ची आत्मिक और पवित्र सुंदरता को पहचानने और भेद करने में अगुवाई और निर्देशन पाते हैं; और वे इसे उतनी ही सरलता, शीघ्रता और शुद्धता से करते हैं, जितना उनमें परमेश्वर का आत्मा अधिक या कम मात्रा में वास करता है। और इस प्रकार “परमेश्वर के पुत्र संसार में अपने आचरण में परमेश्वर के आत्मा द्वारा अगुवाई पाते हैं।”
जहां अनुग्रह प्रबल और सजीव है, वहां एक पवित्र स्वभाव और आत्मिक रुचि प्राण को यह निर्धारित करने में समर्थ बनाएगी कि कौन से कार्य सही और मसीहियों के योग्य हैं, न केवल इसके बिना की सबसे बड़ी योग्यताओं से अधिक शीघ्रता से, वरन कहीं अधिक शुद्धता से भी। इसे इस रीति से स्पष्ट किया जा सकता है कि किस प्रकार मन की कुछ आदतें, और हृदय के स्वभाव, जो सच्चे अनुग्रह से निम्न प्रकृति के हैं, फिर भी मनुष्य को उसके कार्यों में शिक्षा और अगुवाई देते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई मनुष्य बहुत भले स्वभाव का हो, तो उसका भला स्वभाव उसे मनुष्यों के बीच भलाई से कार्य करना उससे कहीं बेहतर सिखाएगा, और हर अवसर पर उसे उन वचनों और कार्यों की ओर निर्देशित करेगा जो भलाई के नियमों के अनुकूल हों, बजाय इसके कि सबसे प्रबल तर्कशक्ति एक चिड़चिड़े स्वभाव के मनुष्य को सिखा सके। इसी प्रकार यदि किसी मनुष्य का हृदय किसी अन्य के प्रति संपूर्ण मित्रता और अत्यंत प्रिय स्नेह के प्रभाव में हो; यद्यपि वह साधारण योग्यता का मनुष्य हो, फिर भी उसके मन की यह आदत उसे कहीं अधिक शीघ्रता और शुद्धता से किसी वचन और आचरण, या व्यवहार की रीति की ओर निर्देशित करेगी,
जो हर दृष्टि से मीठा और दयालु हो, और हृदय के परोपकारी स्वभाव के अनुकूल हो, बजाय इसके कि उसके बिना सबसे बड़ी योग्यता ऐसा कर सके। उसमें मानो एक आत्मा है जो उसके भीतर उसे निर्देशित करती है; उसके मन की आदत एक रुचि से युक्त होती है, जिससे वह तुरंत उस भाव-भंगिमा में आनंद लेता है जो परोपकारी है, और उसके विपरीत से अरुचि रखता है, और इससे वह एक क्षण में दोनों के बीच भेद कर लेता है, इससे भी अधिक शुद्धता से जितना सबसे सटीक तर्क कई घंटों में खोज पाएं। जैसे किसी पत्थर, या किसी अन्य भारी वस्तु की प्रकृति और आंतरिक प्रवृत्ति, जिसे ऊंचाई से गिराया जाए, पृथ्वी के केंद्र का मार्ग एक क्षण में उससे कहीं अधिक शुद्धता से दिखा देती है, जितना सबसे कुशल गणितज्ञ, उसके बिना, अपने सबसे सटीक अवलोकनों से, एक पूरे दिन में निर्धारित कर सके। इस प्रकार एक आत्मिक स्वभाव और रुचि मनुष्य को संसार में उसके आचरण में सिखाती और निर्देशित करती है। इसी प्रकार एक अत्यंत नम्र, या दीन, या दानशील स्वभाव, साधारण योग्यता के व्यक्ति को नम्रता, दीनता और दान के मसीही नियमों के अनुकूल ऐसे आचरण की ओर, उस मनुष्य के सबसे परिश्रमी अध्ययन और विस्तृत तर्कों से कहीं अधिक शीघ्रता और शुद्धता से निर्देशित करेगा, जिसकी शक्तियां सबसे प्रबल हों परन्तु जिसके भीतर मसीही आत्मा न हो। इसी प्रकार परमेश्वर के प्रति प्रेम की आत्मा, और परमेश्वर के प्रति पवित्र भय और आदर, और परमेश्वर में पुत्रवत भरोसा, और एक स्वर्गीय स्वभाव भी, मनुष्य को उसके आचरण में सिखाएगा और निर्देशित करेगा।
किसी दुष्ट मनुष्य के लिए, जिसके हृदय में उसे निर्देशित करने के लिए मसीही सिद्धांत नहीं हैं, यह जानना कि सच्चे पवित्र, दीन, मसीह-सम्मत आचरण के जीवन और सुंदरता, और स्वर्गीय मिठास के साथ अपने को मसीही के समान कैसे प्रदर्शित करे, एक अत्यंत कठिन बात है। वह नहीं जानता कि इन वस्त्रों को कैसे पहने, और न ही वे उसे फबते हैं: सभोपदेशक 10:2-3, “बुद्धिमान का मन उसकी दाहिनी ओर, परन्तु मूर्ख का मन उसकी बाईं ओर रहता है। वरन जब मूर्ख मार्ग पर चलता है, तब उसकी बुद्धि उसका साथ छोड़ देती है, और वह सब से कहता है, कि मैं मूर्ख हूं”; पद 15 के साथ,
"मूर्ख का परिश्रम उसे इतना थका देता है कि वह नगर को जाना भी नहीं जानता।" नीतिवचन 10:32, "धर्मी के होंठ वही जानते हैं जो ग्रहणयोग्य है।" अध्याय 15:2, "बुद्धिमान की जीभ ज्ञान का सही उपयोग करती है, परन्तु मूर्खों का मुँह मूर्खता उण्डेलता है।"
और अध्याय 16:23, "धर्मी का मन उसके मुँह को सिखाता है, और उसके होंठों में शिक्षा बढ़ाता है।" संत जब इस प्रकार किसी आत्मिक स्वाद के द्वारा कर्मों को परखते हैं, तो उनके सामने आने वाले हर शब्द और कर्म के भले-बुरे को परखने के लिए वे परमेश्वर के वचन के किसी विशेष स्पष्ट नियम की खोज नहीं करते; तौभी उनका यह स्वाद स्वयं, सामान्य रूप से, परमेश्वर के वचन के नियम के अधीन है, और उसी के द्वारा तथा उस पर सही चिन्तन के द्वारा परखा जाना चाहिए। जैसे शुद्ध रुचि वाला मनुष्य अपने स्वाद से किसी विशेष कौर को परखता है; तौभी उसकी रुचि स्वयं ठीक है या नहीं, यह कुछ नियमों और कारणों के द्वारा परखा जाना चाहिए। परन्तु प्राण का आत्मिक स्वाद, परमेश्वर के वचन पर विचार करने में, और उसके नियमों के सच्चे अर्थ को परखने में, प्राण की बड़ी सहायता करता है: क्योंकि यह भ्रष्ट भूख के पूर्वाग्रहों को दूर करता है, और स्वाभाविक रूप से विचारों को सही दिशा में ले जाता है, परमेश्वर के वचन पर प्रकाश डालता है, और पवित्र किए गए प्राण के स्वभाव व रुचि तथा परमेश्वर के वचन के नियमों के सच्चे अर्थ के बीच जो सामंजस्य है, उसके द्वारा सच्चे अर्थ को अत्यन्त स्वाभाविक रीति से मन में ले आता है। हाँ, यह सामंजस्य उचित अवसरों पर वचनों को स्वयं मन में ले आने की प्रवृत्ति रखता है; जैसे पेट और रुचि की विशेष अवस्था उन विशेष भोजन-पदार्थों और पेयों को मन में ले आने की प्रवृत्ति रखती है, जो उस अवस्था के अनुकूल हों। "इस प्रकार परमेश्वर की सन्तान परमेश्वर के आत्मा के द्वारा चलाई जाती है," कर्मों को परखने में, और परमेश्वर के पवित्र वचन के नियमों पर मनन करने, उन्हें परखने और लागू करने में: और इस प्रकार परमेश्वर "उन्हें अपनी विधियाँ सिखाता है, और उन्हें अपने आदेशों का मार्ग समझने देता है;" जिसके लिए भजनकार बारम्बार प्रार्थना करता है।
परन्तु आत्मा का यह चलाना उस चीज़ से नितान्त भिन्न है, जिसे कुछ लोग यही नाम देते हैं; जिसमें परमेश्वर की उन विधियों और आदेशों को सिखाना सम्मिलित नहीं, जो उसने पहले ही दे दिए हैं; बल्कि तत्काल भीतरी वाणी या सुझाव के द्वारा नए आदेश देना सम्मिलित है, और इसमें वस्तुओं की सच्ची उत्तमता का कोई स्वाद, या वस्तुओं के स्वभाव को परखना या समझना बिलकुल नहीं है। वे परमेश्वर की इच्छा क्या है, यह किसी स्वाद या रुचि से, या वस्तुओं के स्वभाव को परखने की किसी रीति से नहीं, बल्कि किए जाने वाले काम के विषय में तत्काल दिए गए आदेश से निश्चित करते हैं; इस मामले में किसी प्रकार की समझ या बुद्धि जैसी कोई चीज़ नहीं होती। जबकि आत्मा के उस चलाने में, जो परमेश्वर की सन्तान के लिए विशिष्ट है, वह सच्ची बुद्धि और पवित्र विवेक दिया जाता है, जिसकी चर्चा परमेश्वर के वचन में बारम्बार की गई है; जो उस दूसरी रीति से उतना ही ऊँचा है जितने तारे किसी जुगनू से ऊँचे हैं; और जो बिलाम और शाऊल (जो कभी-कभी उस दूसरी रीति से आत्मा के द्वारा चलाए गए थे) के पास कभी नहीं था, और जो स्वभाव के बदले बिना कोई भी स्वाभाविक मनुष्य नहीं पा सकता।
आत्मिक समझ के स्वभाव के विषय में जो कुछ कहा गया है, कि वह मुख्य रूप से मन के एक दिव्य अलौकिक बोध और स्वाद में सन्निहित है, वह न केवल यह दिखाता है कि आत्मा के इस झूठे कथित चलाने में, जिसकी अभी चर्चा हुई, इसका कुछ भी नहीं है; बल्कि यह आत्मिक समझ, और उन्माद के सब प्रकार व रूपों, परमेश्वर, मसीह और स्वर्ग के सब कल्पित दर्शनों, आत्मा की सब कथित साक्षी, और तत्काल भीतरी सुझाव के द्वारा परमेश्वर के प्रेम की गवाहियों के बीच के अन्तर को भी दिखाता है: और भविष्य की घटनाओं के सब प्रकार के प्रभाव, और किसी भी गुप्त तथ्य के तत्काल प्रकाशनों को भी; पवित्रशास्त्र के वचनों के सब उन्मादी प्रभाव और प्रयोगों को भी, मानो वे अभी परमेश्वर के द्वारा किसी विशेष व्यक्ति से एक नए अर्थ में तत्काल कहे गए हों, और उनमें बाइबल में पड़े शब्दों से अधिक कुछ और समाया हो; और पवित्रशास्त्र के रहस्यमय अर्थ की सब कथित तत्काल प्रकाशन द्वारा की गई व्याख्याओं को भी। इनमें से कोई भी वस्तु मन के उस दिव्य बोध और स्वाद में सन्निहित नहीं, जो दिव्य वस्तुओं की पवित्र सुन्दरता और उत्तमता का बोध है; न ही उनका ऐसे किसी बोध से कुछ लेना-देना है; बल्कि ये सब मस्तिष्क में पड़ने वाले प्रभावों में सन्निहित हैं; ये सब कल्पना-शक्ति पर पड़ने वाले प्रभावों की श्रेणी में गिने जाने चाहिए, और मन में बाहरी प्रतिरूपों को उभारने में सन्निहित हैं, चाहे वे बाहरी आकारों और रंगों के प्रतिरूप हों, या बोले गए शब्दों, या लिखे गए अक्षरों के, या बाहरी और इन्द्रियगोचर वस्तुओं के प्रतिरूप हों, जो किए गए कर्मों या हुई या होने वाली घटनाओं से सम्बन्धित हों। परमेश्वर के प्रेम का एक उन्मादी कथित प्रकाशन, किसी मुस्कराते मुख, या किसी अन्य सुखद बाहरी रूप के प्रतिरूप को उभारकर, या कल्पना में उभारे गए सुखद बोले या लिखे गए शब्दों के प्रतिरूप के द्वारा, या किसी सुखद शारीरिक अनुभूति के द्वारा किया जाता है। इस प्रकार जब व्यक्तियों को किसी गुप्त तथ्य का काल्पनिक प्रकाशन होता है, तो यह बाहरी प्रतिरूपों को उभारकर होता है; या तो कुछ शब्दों के, जिनसे
उस तथ्य की घोषणा हो, या ऐसे किसी तथ्य की कुछ दृश्य या इन्द्रियगोचर परिस्थितियों के। इसी प्रकार आत्मा का वह कथित चलाना, जो बाहरी व्यवहार में परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए होता है, या तो उनके मन में शब्दों (जो बाहरी वस्तुएँ हैं) के प्रतिरूप उभारकर किया जाता है, चाहे वे पवित्रशास्त्र के शब्द हों या अन्य शब्द, जिन्हें वे परमेश्वर की तत्काल आज्ञा मान लेते हैं; या फिर बाहरी कर्मों के ही प्रतिरूपों को प्रबल रूप से उभारकर व उन पर प्रभाव डालकर किया जाता है। इसी प्रकार जब पवित्रशास्त्र के किसी प्रतीक या रूपक की व्याख्या तत्काल, किसी असाधारण रीति से, प्रबल रूप से सुझाई जाती है, तो यह शब्दों को सुझाकर होता है, मानो कोई गुप्त रूप से फुसफुसाकर अर्थ बता रहा हो, या कल्पना में अन्य प्रतिरूप उभारकर होता है।
इस प्रकार के अनुभव और कथित प्रकाशन प्रायः उनके मनोभावों को, जो इनसे भरमाए जाते हैं, बड़ी ऊँचाई तक उभार देते हैं, और प्राण तथा देह दोनों में बड़ा कोलाहल मचा देते हैं।
और संसार में एक युग से दूसरे युग तक जो झूठा धर्म रहा है, उसका बहुत बड़ा भाग इन्हीं प्रकार के कथित प्रकाशनों में, और उनसे उत्पन्न होने वाले मनोभावों में सन्निहित है। अन्यजातियों में प्राचीन पाइथागोरसवादियों के, और उनमें से बहुतों के अनुभव इन्हीं बातों में सन्निहित थे, जिन्हें विचित्र आनन्दातिरेक और उन्माद होते थे, और जो दिव्य प्रेरणा तथा स्वर्ग से तत्काल प्रकाशन का दावा करते थे। इन्हीं बातों में प्रतीत होता है कि एस्सेन नामक प्राचीन यहूदी सम्प्रदाय के अनुभव सन्निहित थे, जो प्रेरितों के समय और उसके बाद विद्यमान था। इन्हीं बातों में प्राचीन ग्नोस्टिकों, मॉन्टेनिस्टों, और आदिम मसीही कलीसिया के अनेक अन्य पाखण्डी सम्प्रदायों के अनुभव सन्निहित थे। और रोमी कलीसिया में जो साधु, वैरागी, और एकान्तवासी पहले बहुतायत से थे, उनके परमेश्वर, मसीह, तथा स्वर्ग के संतों और स्वर्गदूतों के साथ कथित तत्काल संवाद इन्हीं बातों में सन्निहित थे। सुधार (रिफार्मेशन) के बाद संसार में जो उन्मादी सम्प्रदायों के झुण्ड फैले, उनके कथित उच्च अनुभव और बड़ी आत्मिकता इन्हीं बातों में सन्निहित थी; जैसे कि पुनर्बपतिस्मावादी, प्रतिव्यवस्थावादी, और फैमिलिस्ट, तथा एन. स्टॉर्क, टी. मुन्त्सर, यो. बेकोल्ड, हेनरी फ़ाइसर, डेविड जॉर्ज, कास्पर श्वेंकफ़ेल्ड के अनुयायी,
हेनरी निकोलस योहानेस एग्रीकोला ईज़्लेबियस के, तथा वे अनेक उन्मत्त उन्मादी जो ऑलिवर क्रॉमवेल के दिनों में इंग्लैण्ड में थे; और न्यू इंग्लैण्ड में श्रीमती हचिन्सन के अनुयायी; जैसा कि उस विशिष्ट पवित्र पुरुष श्री सैमुएल रदरफ़ोर्ड द्वारा अपनी पुस्तक "डिस्प्ले ऑफ़ द स्पिरिचुअल एण्टीक्राइस्ट" में इन सब सम्प्रदायों का दिया गया विशेष और विस्तृत विवरण दिखाता है। और हाल के फ्रांसीसी भविष्यद्वक्ताओं और उनके अनुयायियों के अनुभव इन्हीं बातों में सन्निहित थे।
और इन्हीं बातों में आज के अनेक प्रकार के उन्मादियों का धर्म प्रतीत होता है। मुख्यतः इसी प्रकार के धर्म के द्वारा शैतान स्वयं को ज्योति के स्वर्गदूत का रूप देता है: और मसीही कलीसिया के आरम्भ से आज तक, आशाजनक और सुखद धार्मिक पुनर्जागरणों को उलझाने के लिए उसने सबसे अधिक सफलतापूर्वक इसी का उपयोग किया है। जब परमेश्वर का आत्मा उण्डेला जाता है, कि कोई गौरवशाली कार्य आरम्भ हो, तब वह पुराना सर्प, यथासम्भव शीघ्रता से और सब उपायों से, इस नाजायज़ धर्म को भीतर ले आता है, और उसे सच्चे धर्म के साथ मिला देता है; जिससे समय-समय पर सब कुछ शीघ्र ही भ्रम में पड़ गया है। इसका हानिकारक परिणाम सहज ही कल्पना में या समझ में नहीं आता, जब तक हम इसके भयानक प्रभावों को, और इसके द्वारा किए गए विनाश को देखकर चकित नहीं हो जाते। यदि सच्चे धर्म का पुनर्जागरण
अपने आरम्भ में अत्यन्त महान हो, तौभी यदि यह नाजायज़ सन्तान भीतर आ जाए, तो आशंका है कि वह वही करेगी जो गिदोन के नाजायज़ पुत्र अबीमेलेक ने किया, जिसने अपने सत्तर सच्चे-जन्मे भाइयों में से एक को छोड़कर, जो भागने पर विवश हुआ, शेष सबको मार डालने तक चैन नहीं लिया। इसलिए विशेषतः बड़े जागरण के समय, सेवकों को ऐसी बातों के विरुद्ध बड़ी और कड़ी चौकसी और रखवाली रखनी चाहिए: क्योंकि मनुष्य, विशेषतः साधारण लोग, ऐसी बातों से सहज ही मोहित हो जाते हैं; क्योंकि उनमें उच्च धर्म का ऐसा चमकदार और झलकता दिखावा होता है, और शैतान अपने असली रूप को छिपाकर ज्योति के स्वर्गदूत के रूप में प्रकट होता है, ताकि लोग उससे न डरें, बल्कि उसकी आराधना करें।
कल्पना-शक्ति या मनोकल्पना ही वह स्थान प्रतीत होती है, जिसमें शैतान के वे सब भ्रम बनते हैं, जिनमें वे बह जाते हैं जो झूठे धर्म, तथा नकली अनुग्रहों और मनोभावों के प्रभाव में होते हैं। यही शैतान का प्रमुख छिपने का स्थान है, अशुद्ध और भरमानेवाली आत्माओं का घोंसला। इसमें बड़ा सन्देह है कि क्या शैतान मनुष्य के प्राण तक कभी भी पहुँचकर उस पर प्रभाव डाल सकता है, या उसमें कोई विचार, या हलचल उत्पन्न कर सकता है, या उसमें कोई भी प्रभाव उत्पन्न कर सकता है, इसके अतिरिक्त कि मनोकल्पना के द्वारा; जो प्राण की वह शक्ति है, जिसके द्वारा वह बाहरी और इन्द्रियगोचर वस्तुओं के प्रतिरूप या स्वरूप ग्रहण करता है, और उनका पात्र बनता है।
अशरीरी आत्माओं के परस्पर सम्पर्क और संचार के लिए सृष्टिकर्ता ने जो नियम और साधन ठहराए हैं, उनके विषय में हम कुछ नहीं जानते; हम नहीं जानते कि वे किस माध्यम से अपने विचार एक-दूसरे पर प्रकट करती हैं, या एक-दूसरे में विचार उत्पन्न करती हैं। परन्तु जो आत्माएँ देहों से जुड़ी हैं, उनके लिए परमेश्वर ने जिन देहों से उन्हें जोड़ा है, वे ही उनके संचार का माध्यम हैं। अन्य प्राणियों पर प्रभाव डालने, या उनसे प्रभावित होने के लिए, उनके पास देह के अतिरिक्त कोई अन्य माध्यम नहीं है। इसलिए यह मानना उचित नहीं कि शैतान मनुष्य के प्राण में कोई विचार उत्पन्न कर सकता है, या कोई प्रभाव डाल सकता है, इसके अतिरिक्त कि प्राणिक आत्माओं की किसी गति के द्वारा, या देह से सम्बन्धित किसी वस्तु में कोई गति या परिवर्तन उत्पन्न करके। यह मानने का यह कारण है कि शैतान प्राण में तत्काल विचार उत्पन्न नहीं कर सकता, या देह के माध्यम के अतिरिक्त किसी अन्य रीति से नहीं, अर्थात्, वह प्राण के विचारों को तत्काल देख या जान नहीं सकता: पवित्रशास्त्र में यह बारम्बार घोषित किया गया है कि यह करना केवल सर्वज्ञ परमेश्वर के लिए विशिष्ट है। परन्तु यह सम्भव नहीं कि शैतान कोई ऐसा प्रभाव तत्काल उत्पन्न कर सके, जो उसकी तत्काल दृष्टि की पहुँच से बाहर हो। यह मान लेना अनुचित प्रतीत होता है कि उसकी तत्काल क्रिया उसकी अपनी दृष्टि से बाहर हो, या यह असम्भव हो कि वह स्वयं जो तत्काल करता है, उसे देख सके। क्या यह मान लेना अनुचित नहीं कि कोई आत्मा या बुद्धिमान अभिकर्ता, अपनी इच्छा के कार्य से, अपनी समझ के अनुसार, या अपने ही विचारों के अनुरूप, प्रभाव उत्पन्न करे, और वह भी तत्काल, और फिर भी उत्पन्न प्रभाव उसकी समझ की पहुँच से बाहर हो, या जहाँ उसे कोई तत्काल बोध या समझ बिलकुल न हो? परन्तु यदि यह सच है, कि शैतान प्राण में तत्काल विचार उत्पन्न नहीं कर सकता, या प्राणिक आत्माओं या देह के माध्यम के अतिरिक्त किसी अन्य रीति से नहीं, तो यह निकलता है कि वह प्राण में कभी भी कुछ नहीं करता, सिवाय कल्पना-शक्ति या मनोकल्पना के द्वारा, या बाहरी प्रतिरूप उभारकर। क्योंकि हम जानते हैं कि देह में हुए परिवर्तन मन में तत्काल किसी अन्य प्रकार के प्रतिरूप नहीं उभारते, सिवाय बाहरी प्रतिरूपों के, या बाहरी
इन्द्रियों के प्रतिरूपों के, या उसी बाहरी स्वभाव के प्रतिरूपों के। जहाँ तक मनन, अमूर्तीकरण, तर्क-वितर्क,
इत्यादि की बात है, और वे विचार तथा भीतरी हलचलें जो मन की इन क्रियाओं का फल हैं, वे देह पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रत्यक्ष परिणाम नहीं हैं। इसलिए यह केवल कल्पना-शक्ति के द्वारा ही हो सकता है, कि शैतान प्राण तक पहुँचकर उसे परखे और भरमाए, या उसे कुछ सुझाए।55 और यही कारण प्रतीत होता है कि जो व्यक्ति उदासी (मेलंकली) के रोग से ग्रस्त होते हैं, वे शैतान के सुझावों और परीक्षाओं के दृश्य व उल्लेखनीय रूप से अधीन पाए जाते हैं; क्योंकि यह रोग विशेष रूप से प्राणिक आत्माओं को प्रभावित करता है, और उस देह-भाग की दुर्बलता के साथ जुड़ा होता है, जो प्राणिक आत्माओं का स्रोत है, अर्थात् मस्तिष्क, जो मानो मनोकल्पना का आसन है। मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों के द्वारा ही, प्राणिक आत्माओं की गति से, या देह में किए गए किसी परिवर्तन से, मन में कोई प्रतिरूप उभारे जाते हैं। इस प्रकार जब मस्तिष्क दुर्बल और रोगग्रस्त हो जाता है, तो वह प्राण की उच्चतर शक्तियों के कम अधीन रह जाता है, और बाहरी प्रभावों के आगे अधिक सहज ही झुक जाता है, और प्राणिक आत्माओं की अव्यवस्थित गतियों से अभिभूत हो जाता है; और इस प्रकार शैतान को मनोकल्पना पर काम करके मन को प्रभावित करने का अधिक अवसर मिल जाता है। और इसी प्रकार शैतान, जब वह अनेक उदास व्यक्तियों के मन में वे भयानक सुझाव डालता है, जिनमें उनका स्वयं कोई हाथ नहीं होता, तो वह ऐसा या तो किन्हीं भयानक शब्दों या वाक्यों के, या अन्य भयानक बाहरी प्रतिरूपों के काल्पनिक चित्र उभारकर करता है। और जब वह अन्य व्यक्तियों को, जो उदास नहीं हैं, परीक्षा में डालता है, तो वह मनोकल्पना के सामने, जीवन्त और लुभावनी रीति से,
55 "मनोकल्पना ही प्राण का वह कक्ष है जिसमें शैतान प्रायः प्रकट होता है। वास्तव में (ठीक-ठीक कहें तो) शैतान का मनुष्य के बुद्धिसंगत भाग पर कोई प्रभावकारी अधिकार नहीं है: वह इच्छा को नहीं बदल सकता, वह मनुष्य के हृदय को नहीं पलट सकता। इसलिए किसी मनुष्य को पाप की परीक्षा में डालने में वह अधिक से अधिक जो कर सकता है, वह केवल फुसलाना और सुझाव देना है। परन्तु शैतान यह कैसे करता है? वह मनोकल्पना पर काम करके ही ऐसा करता है। वह मनुष्य के स्वभाव और शारीरिक बनावट को देखता है; और तदनुसार उसकी कल्पना को सुझाव देता है, और उसमें अपने अग्निमय बाण डालता है, जिससे मन पर प्रभाव पड़ने लगता है। शैतान का, यद्यपि तेरी इच्छा पर कोई अधिकारपूर्ण प्रभाव नहीं, तौभी क्योंकि वह इस प्रकार तेरी कल्पना को उभार और हिला सकता है, और तू स्वभाव से अनुग्रह से वंचित होने के कारण इन सुझावों का सामना नहीं कर सकता: इसलिए तेरी कल्पना में जो भी पाप हो, चाहे वह प्राण के केवल बाहरी कार्यों में ही क्यों न हो, वह शीघ्र ही सब पर अपनी पकड़ बना लेता है। और सचमुच, इसी उपाय से, धर्म की अनेक भ्रान्त रीतियों में जो भयानक भ्रम पाए जाते हैं, वे उत्पन्न होते हैं; यह सब इसलिए है क्योंकि उनकी कल्पनाएँ भ्रष्ट हैं। हाँ, कितनी बार मनोकल्पना के ये शैतानी भ्रम परमेश्वर के आत्मा के अनुग्रहमय कार्य के रूप में लिए जाते हैं! यहीं से बहुतों ने उन्मादी दावे किए हैं: वे पवित्रशास्त्र को छोड़कर पूर्णतः उसी पर ध्यान देते हैं जो वे अपने भीतर अनुभव करते और महसूस करते हैं।" बर्जेस, मूल पाप पर, पृष्ठ 369। महान टुरेटीन, इस प्रश्न पर बोलते हुए, कि स्वर्गदूतों की शक्ति क्या है, कहता है, "जहाँ तक देहों का प्रश्न है, इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे सब प्रकार के तात्विक और आकाशीय पिण्डों पर बहुत कुछ कर सकते हैं, कि उन्हें स्थान से हटाएँ और विविध रीति से हिलाएँ-डुलाएँ। यह भी निश्चित है कि वे बाहरी और भीतरी इन्द्रियों पर काम कर सकते हैं, कि उन्हें उभार सकें या रोक सकें। परन्तु जहाँ तक बुद्धिसंगत प्राण का प्रश्न है, वे उस पर तत्काल कुछ नहीं कर सकते; क्योंकि यह केवल परमेश्वर के लिए है, जो हृदयों को जानता और परखता है, और जिसके हाथ में वे हैं, कि वह उन्हें जहाँ चाहे झुकाए और हिलाए। परन्तु स्वर्गदूत बुद्धिसंगत प्राण पर केवल परोक्ष रूप से, मनोकल्पनाओं के द्वारा ही काम कर सकते हैं।" थियोलॉजिया इलेंक्टिका, भाग 7, प्रश्न 7।
उनकी वासनाओं की वस्तुओं की, या शब्दों के प्रतिरूप उभारकर, और इस प्रकार उनके द्वारा विचार उभारकर; या बाहरी कर्मों, घटनाओं, परिस्थितियों आदि की कल्पना को बढ़ावा देकर करता है। मनोकल्पना में बाहरी प्रतिरूप उभारकर मन को सब प्रकार की बुरी सोच की ओर ले जाने के अनगिनत उपाय हैं।
यदि व्यक्ति शैतान के इन प्रवेश-द्वारों पर, जिनसे उसे प्राण तक पहुँचकर उसे परखने और भरमाने का अवसर मिलता है, कोई पहरा नहीं रखते, तो सम्भावना है कि उन्हें उसका पर्याप्त अनुभव हो जाएगा। और विशेषतः, यदि वे उससे बचाव करने के बजाय स्वयं को उसके लिए खुला छोड़ दें, और उसे खोजें और आमन्त्रित करें, क्योंकि वह ज्योति के स्वर्गदूत के रूप में प्रकट होता है, और परमेश्वर के आत्मा की ज्योतियों तथा अनुग्रहों की नकल करता है, भीतरी फुसफुसाहटों, तथा तथ्यों और घटनाओं के तत्काल सुझावों, सुखद ध्वनियों, सुन्दर प्रतिरूपों, और मनोकल्पना पर अन्य प्रभावों के द्वारा। ऐसे बहुत से लोग हैं जो ऐसी बातों से भरमाए जाते हैं, और उनसे फूल उठते हैं, और उन्हें खोजते हैं, जिन्हें ये निरन्तर मिलती रहती हैं, और वे प्रायः जब चाहें इन्हें पा सकते हैं; विशेषतः जब उनके अभिमान और मिथ्या गौरव को इनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है, कि वे लोगों के सामने इनका प्रदर्शन कर सकें। उनके साथ कुछ-कुछ वैसा ही होता है जैसा उन लोगों के साथ होता है, जो अपनी कल्पना पर पड़े प्रभावों के द्वारा खोई हुई वस्तुओं का पता बताने की कला के पण्डित कहलाते हैं; वे स्वयं को शैतान के लिए खुला छोड़ देते हैं, और वह सदैव उन्हें वांछित प्रभाव देने के लिए तैयार रहता है।
इससे पहले कि मैं मनोकल्पनाओं के इस विषय पर, जो आत्मिक ज्योति और उससे उत्पन्न मनोभावों की नकल करती हैं, अपनी बात समाप्त करूँ, मैं पहले कही गई बात की गलतफहमी से बचने के लिए, पुनः यह स्पष्ट करना चाहूँगा, कि मैं यह निश्चित करने से कोसों दूर हूँ कि जो भी मनोभाव काल्पनिक प्रतिरूपों के साथ होते हैं, वे कोई भी आत्मिक नहीं हो सकते। मनुष्य का स्वभाव ऐसा है, कि वह किसी भी वस्तु के विषय में गहनता से सोचते समय, किसी न किसी बाहरी प्रतिरूप के बिना, कठिनाई से ही सोच पाता है। वे मनुष्य के विचारों के प्रवाह में अनिवार्य रूप से उठते और हस्तक्षेप करते हैं; यद्यपि प्रायः वे बहुत धुँधले होते हैं, और वे नहीं होते जिन पर मन ध्यान देता है। जब मन अत्यधिक व्यस्त हो, और विचार गहन हों, तो प्रायः कल्पना-शक्ति अधिक प्रबल हो जाती है, और बाहरी प्रतिरूप अधिक जीवन्त हो जाता है, विशेषतः कुछ विशेष शारीरिक बनावट वाले व्यक्तियों में। परन्तु इन दो बातों में बड़ा अन्तर है, अर्थात्, प्रबल मनोभावों से उत्पन्न जीवन्त कल्पनाएँ, और जीवन्त कल्पनाओं से उत्पन्न प्रबल मनोभाव। पहली दशा सम्भव है, और निःसन्देह प्रायः सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के मामले में होती भी है। मनोभाव कल्पना-शक्ति से उत्पन्न नहीं होते, न ही उस पर निर्भर करते हैं; बल्कि इसके विपरीत, कल्पना-शक्ति मानवीय स्वभाव की दुर्बलता के कारण, मनोभाव का केवल आकस्मिक परिणाम या फलस्वरूप है।
परन्तु जब दूसरी दशा हो, जैसा कि प्रायः होता है, कि मनोभाव कल्पना-शक्ति से उत्पन्न होकर उसी पर आधारित हो, न कि किसी आत्मिक प्रकाशन या ज्योति पर, तो वह मनोभाव, चाहे कितना भी उच्च क्यों न हो, निरर्थक और व्यर्थ है। और यही उस बात का सार है जो अभी मनोकल्पना पर पड़ने वाले प्रभावों के विषय में कही गई है। यह देख लेने के बाद, मैं अनुग्रहमय मनोभावों के एक और चिन्ह की ओर बढ़ता हूँ।
V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव, परमेश्वरीय बातों की वास्तविकता और निश्चितता के विषय में निर्णयशक्ति के एक युक्तिसंगत और आत्मिक कायल हो जाने के साथ होते हैं।
यह उस वचन में निहित प्रतीत होता है, जिसे इस प्रवचन की नींव के रूप में रखा गया था:
"जिससे तुम बिना देखे प्रेम रखते हो, और यद्यपि अब उसे नहीं देखते, तौभी उस पर विश्वास करके ऐसे आनन्द से भरते हो, जो अवर्णनीय और महिमा से परिपूर्ण है।"
जितने भी सच्चे अनुग्रहमय व्यक्ति हैं, उन्हें सुसमाचार की महान बातों की सच्चाई का एक ठोस, पूर्ण, गहन और प्रभावी कायल हो जाना प्राप्त है; मेरा अर्थ है कि वे अब दो विचारों के बीच डगमगाते नहीं रहते; सुसमाचार के महान सिद्धान्त अब उनके लिए सन्दिग्ध बातें, या राय के विषय नहीं रह जाते, जो सम्भाव्य तो हों परन्तु विवादास्पद भी हों; बल्कि उनके लिए वे निश्चित और तय किए गए बिन्दु हैं, निःसन्देह और निर्विवाद, इतने कि वे इनकी सच्चाई पर अपना सर्वस्व दांव पर लगाने से नहीं डरते। उनका कायल हो जाना एक प्रभावी कायल हो जाना है; इसलिए सुसमाचार की महान आत्मिक, रहस्यमय और अदृश्य बातें उन पर वास्तविक और निश्चित बातों जैसा प्रभाव डालती हैं; उनके हृदयों में इनका भार और सामर्थ्य वास्तविक बातों जैसा है; और तदनुसार वे उनके मनोभावों पर राज्य करती हैं, और उनके जीवन भर उन्हें संचालित करती हैं। मसीह के परमेश्वर का पुत्र और जगत का उद्धारकर्ता होने के विषय में, और उन महान बातों के विषय में जो उसने अपने और अपने पिता, और दूसरे लोक के बारे में प्रकट की हैं, उनके पास केवल यह प्रधान राय ही नहीं कि ये बातें सच हैं, और इस प्रकार वे अपनी सहमति दें, जैसा वे अन्य सन्दिग्ध विचार-विमर्श के विषयों में करते हैं; बल्कि वे देखते हैं कि यह वास्तव में ऐसा ही है; उनकी आँखें खुल जाती हैं, ताकि वे देख सकें कि यीशु सचमुच मसीह है, जीवित परमेश्वर का पुत्र। और जिन बातों को मसीह ने प्रकट किया है, अर्थात् पतित मनुष्य के विषय में परमेश्वर के अनन्त उद्देश्यों और योजनाओं के, तथा दूसरे लोक में सन्तों के लिए तैयार गौरवशाली और अनन्त बातों के विषय में, वे देखते हैं कि वे सचमुच ऐसी ही हैं; और इसलिए ये बातें उनके लिए बड़ा भार रखती हैं, और उनके हृदयों पर प्रबल सामर्थ्य रखती हैं, और उनके आचरण पर, कुछ मात्रा में उनके अनन्त महत्त्व के अनुरूप, प्रभाव डालती हैं।
कि सब सच्चे मसीही सुसमाचार की बातों की सच्चाई का ऐसा ही कायल हो जाना रखते हैं, यह पवित्रशास्त्र से भरपूर रीति से प्रकट है। मैं अनेक स्थानों में से कुछ का उल्लेख करूँगा:
मत्ती 16:15, 16, 17, "परन्तु तुम क्या कहते हो, मैं कौन हूँ? शमौन पतरस ने उत्तर दिया, तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है। यीशु ने उत्तर देकर उससे कहा, हे शमौन
बरयोना, तू धन्य है;—मेरे पिता ने, जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है।" यूहन्ना 6:68, 69 "तेरे ही पास अनन्त जीवन की बातें हैं। और हमने विश्वास किया, और जान गए हैं, कि तू वही मसीह, जीवते परमेश्वर का पुत्र है।" यूहन्ना 17:6, 7, 8, "जो लोग तूने जगत में से मुझे दिए थे, मैंने तेरा नाम उन पर प्रगट किया। अब वे जान गए हैं, कि जो कुछ तूने मुझे दिया है, वह सब तेरी ओर से है। क्योंकि जो वचन तूने मुझे दिए, वे मैंने उन्हें दे दिए, और उन्होंने उन्हें ग्रहण किया, और निश्चय जान लिया है, कि मैं तेरी ओर से निकला, और उन्होंने विश्वास किया, कि तूने मुझे भेजा।" प्रेरितों के काम 8:37, "यदि तू अपने सारे मन से विश्वास करता है, तो हो सकता है।" 2.
कुरिन्थियों 4:11, 12, 13, 14, "हम जो जीवित हैं, यीशु के कारण सर्वदा मृत्यु के हाथ सौंपे जाते हैं।—मृत्यु तो हम में कार्य करती है।—हम में विश्वास की वही आत्मा है, जिसके अनुसार लिखा है, कि मैंने विश्वास किया, इसलिए मैं बोला; हम भी विश्वास करते हैं, इसलिए बोलते हैं; यह जानते हुए, कि जिसने प्रभु यीशु को
जिलाया, वह हमें भी यीशु के द्वारा जिलाएगा, और तुम्हारे साथ हमें भी उपस्थित करेगा।" और साथ ही पद 16, "इस कारण हम साहस नहीं छोड़ते।" और पद 18 "क्योंकि जो देखी जाती हैं, उनकी ओर हम नहीं देखते," इत्यादि। और अध्याय 5:1, "क्योंकि हम जानते हैं, कि यदि हमारी पृथ्वी की इस डेरे रूपी घर का नाश भी हो जाए, तौभी परमेश्वर की ओर से हमारे लिये एक घर है।" और पद 6, 7, 8, "इसलिए हम सर्वदा साहस बांधे रहते हैं, और यह जानते हैं, कि जब तक हम देह में रहते हैं, तब तक प्रभु से अलग रहते हैं; क्योंकि हम विश्वास से चलते हैं, दर्शन से नहीं। हमें साहस है, और हम देह से अलग होकर, प्रभु के साथ रहना अधिक पसन्द करते हैं।" 2 तीमुथियुस 1:12, "इसी कारण मैं यह दुःख भी उठाता हूं; फिर भी लज्जित नहीं होता; क्योंकि मैं जानता हूं, कि मैंने किस पर विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है, कि वह मेरी थाती की उस दिन तक रखवाली करने में समर्थ है।" इब्रानियों 3:6, "जिसके घर के हम हैं, यदि हम उस साहस और आशा के घमण्ड को अन्त तक दृढ़ता से थामे रहें।" इब्रानियों 11:1, "अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और बिना देखी हुई वस्तुओं का प्रमाण है;" उसके साथ वह पूरा अध्याय भी। 1 यूहन्ना 4:13, 14, 15, 16, "इसी से हम जानते हैं, कि हम उस में बने रहते हैं, और वह हम में; क्योंकि उसने अपने आत्मा में से हमें दिया है। और हमने देखा है, और गवाही देते हैं, कि पिता ने पुत्र को जगत का उद्धारकर्ता होने के लिये भेजा। जो कोई मान लेगा, कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है, परमेश्वर उस में बना रहता है, और वह परमेश्वर में। और हमने उस प्रेम को जान लिया है, और उस पर विश्वास किया है, जो परमेश्वर हम से रखता है।" अध्याय 5:4, 5, "क्योंकि जो कोई परमेश्वर से जन्मा है, वह संसार पर जय पाता है; और यह वही जय है, जिसने संसार पर जय पाई है, अर्थात् हमारा विश्वास। कौन है जो संसार पर जय पाता है, केवल वही न जो विश्वास करता है, कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है?"
इसलिए सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार की बातों की सच्चाई के, तथा उनके प्रमाण और वास्तविकता के दर्शन के, ऐसे ही कायल हो जाने और विश्वास के साथ होते हैं, जैसा इन और अन्य पवित्रशास्त्रों में कहा गया है।
अनेक धार्मिक मनोभाव ऐसे हैं, जो निर्णयशक्ति के ऐसे कायल हो जाने के साथ नहीं होते। कुछ लोगों में ऐसी अनेक धारणाएँ और विचार होते हैं, जिन्हें वे दिव्य प्रकाशन कहते हैं, जो प्रभावित तो करते हैं, परन्तु कायल नहीं करते। यद्यपि थोड़े समय के लिए वे धर्म की बातों की सच्चाई के विषय में पहले से अधिक विश्वस्त प्रतीत हो सकते हैं, और मसीह के अनेक श्रोताओं के समान, जिन्होंने कुछ समय के लिए विश्वास किया, तत्परता से सहमति दे सकते हैं; तौभी उनके पास कोई गहन और प्रभावी कायल हो जाना नहीं होता; न ही इस विषय में उनमें कोई बड़ा स्थायी परिवर्तन होता है, कि जबकि पहले वे सुसमाचार की महान बातों को वास्तविक नहीं मानते थे, अब ये बातें वास्तविकता और निश्चितता की दृष्टि से उन्हें नई प्रतीत हों, और वे इन्हें बिलकुल भिन्न दृष्टिकोण से देखें, जैसे वे पहले देखा करते थे। ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो धार्मिक मनोभावों से अत्यन्त उभारे गए हैं, और सोचते हैं कि वे मन फिराए गए हैं, परन्तु जो संसार में पहले से अधिक सुसमाचार की सच्चाई के विषय में कायल होकर नहीं चलते; या कम-से-कम, इसमें कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होता: वे ऐसे मनुष्य नहीं हैं जो सुसमाचार द्वारा प्रकट अनन्त और असीम बातों के वास्तविक कायल हो जाने के प्रभाव और सामर्थ्य के अधीन जीवन बिताते हों; यदि वे ऐसे होते, तो उनके लिए वैसा जीना असम्भव होता जैसा वे जीते हैं। क्योंकि उनके मनोभाव मन के गहन कायल हो जाने के साथ नहीं होते, वे बिलकुल भी भरोसे योग्य नहीं हैं; चाहे वे कितना भी बड़ा दिखावा और कोलाहल क्यों न करें, यह सूखी घास की लपट, या कँटीली झाड़ी के कड़कड़ाने के समान है,
या पथरीली भूमि पर उगे उस उतावले लहलहाते अंकुर के समान, जिसकी कोई जड़ नहीं, न मिट्टी की गहराई, जिससे वह अपना जीवन बनाए रख सके।
कुछ व्यक्ति, उच्च मनोभावों तथा अपनी अच्छी अवस्था के आत्मविश्वासपूर्ण विश्वास के अधीन, इस रीति से वह पाते हैं, जिसे वे अत्यन्त अज्ञानतापूर्वक परमेश्वर के वचन की सच्चाई को देखना कहते हैं, और जो उससे बहुत दूर है; उनके मन में पवित्रशास्त्र का कोई वचन अचानक और असाधारण रीति से आ जाता है, जो उन्हें (जैसा वे मानते हैं) तत्काल यह घोषित करता है कि उनके पाप क्षमा हो गए हैं, या कि परमेश्वर उनसे प्रेम रखता है, और उनका उद्धार करेगा; और सम्भव है कि पवित्रशास्त्र के वचनों की एक शृंखला एक के बाद एक इसी अर्थ में उनके मन में आती जाए; और वे कायल हो जाते हैं कि यह सत्य है; अर्थात्, वे निश्चित हो जाते हैं कि निश्चय यही सच है, कि उनके पाप क्षमा हो गए हैं, और परमेश्वर उनसे प्रेम रखता है, इत्यादि—वे कहते हैं कि वे इसे जानते हैं; और जब पवित्रशास्त्र के वचन उन्हें सुझाए जाते हैं, और जैसा वे मानते हैं, परमेश्वर द्वारा इसी अर्थ में तत्काल उनसे कहे जाते हैं, तो वे पुकार उठने को तैयार हो जाते हैं, सत्य! सत्य! यह निश्चय ऐसा ही है! परमेश्वर का वचन सत्य है! और इसी को वे परमेश्वर के वचन की सच्चाई का देखना कहते हैं। जबकि उनका सारा विश्वास इससे अधिक कुछ नहीं, कि उनकी अपनी अच्छी अवस्था के विषय में एक दृढ़ विश्वास, और इस कारण यह विश्वास कि ये वचन सत्य हैं, जो उन्हें (जैसा वे मानते हैं) बताते हैं कि वे अच्छी अवस्था में हैं: जबकि वास्तव में
(जैसा पहले दिखाया गया) कोई भी पवित्रशास्त्र-वचन प्रत्यक्ष रूप से यह घोषित नहीं करता कि कोई विशेष व्यक्ति अच्छी अवस्था में है, सिवाय अनुमान के मार्ग से। इसलिए यह, परमेश्वर के वचन की सच्चाई के सच्चे दर्शन के बजाय, केवल एक भ्रम-मात्र का दर्शन है, और सर्वथा एक धोखा है।
परमेश्वर के वचन की सच्चाई को सचमुच देखना, सुसमाचार की सच्चाई को देखना है; जो कि परमेश्वर के वचन में समाया वह गौरवशाली सिद्धान्त है, जो परमेश्वर, और यीशु मसीह, और उसके द्वारा उद्धार के मार्ग, और उस गौरव के लोक के विषय में है, जिसमें वह प्रवेश कर चुका है, और जिसे उसने उन सब के लिए मोल लिया है जो विश्वास करते हैं; न कि यह प्रकाशन कि अमुक-अमुक विशेष व्यक्ति सच्चे
मसीही हैं, और स्वर्ग जाएँगे। इसलिए वे मनोभाव जो परमेश्वर के वचन की सच्चाई के इसके अतिरिक्त किसी और कायल हो जाने से उत्पन्न होते हैं, भ्रम से उत्पन्न होते हैं, न कि सच्चे कायल हो जाने से; और परिणामस्वरूप वे स्वयं भी भ्रामक और व्यर्थ हैं।
परन्तु यदि व्यक्तियों के धार्मिक मनोभाव सचमुच मसीही धर्म की सच्चाई के एक प्रबल विश्वास से उत्पन्न होते हैं, तो भी उनके मनोभाव तब तक उत्तम नहीं, जब तक उनका विश्वास एक युक्तिसंगत विश्वास या कायल हो जाना न हो। युक्तिसंगत कायल हो जाने से मेरा अभिप्राय है, ऐसा कायल हो जाना जो वास्तविक प्रमाण पर, या उस पर आधारित हो, जो कायल होने का उचित कारण या सम्यक् आधार हो।
मनुष्यों को यह प्रबल विश्वास हो सकता है कि मसीही धर्म सत्य है, जबकि उनका यह विश्वास किसी प्रमाण पर बिलकुल आधारित नहीं, बल्कि सर्वथा शिक्षा-दीक्षा और दूसरों की राय पर आधारित हो; जैसे अनेक मुहम्मदी लोग मुहम्मदी धर्म की सच्चाई का प्रबल विश्वास रखते हैं, क्योंकि उनके पूर्वज, पड़ोसी, और राष्ट्र इसे मानते हैं। मसीही धर्म की सच्चाई का वह विश्वास, जो उन्हीं आधारों पर बना हो जिन पर एक मुहम्मदी का मुहम्मदी धर्म पर विश्वास बना है, वही प्रकार का विश्वास है। और यद्यपि जिस बात पर विश्वास किया गया है, वह संयोगवश उत्तम है, तौभी इससे विश्वास स्वयं उत्तम प्रकार का नहीं बन जाता; क्योंकि यद्यपि जिस बात पर विश्वास किया गया है, वह संयोगवश सत्य है, तौभी उस पर विश्वास इस सत्यता के कारण नहीं, बल्कि शिक्षा-दीक्षा के कारण है। इसलिए जैसे यह कायल हो जाना मुहम्मदी के कायल हो जाने से उत्तम नहीं; वैसे ही जो मनोभाव इससे उत्पन्न होते हैं, वे स्वयं में मुहम्मदियों के धार्मिक मनोभावों से उत्तम नहीं।
परन्तु यदि मसीही सिद्धान्तों का वह विश्वास, जिससे व्यक्तियों के मनोभाव उत्पन्न होते हैं, केवल शिक्षा-दीक्षा से नहीं, बल्कि सचमुच दिए गए कारणों और तर्कों से हो, तो इससे यह अनिवार्यतः नहीं निकलता कि उनके मनोभाव सचमुच अनुग्रहमय हैं: क्योंकि इसके लिए आवश्यक है कि जिस विश्वास से उनके मनोभाव उत्पन्न होते हैं, वह न केवल युक्तिसंगत हो, बल्कि आत्मिक विश्वास या कायल हो जाना भी हो। मुझे लगता है कि इसमें किसी को सन्देह नहीं होगा कि कुछ स्वाभाविक मनुष्य भी मसीही धर्म की सच्चाई के प्रति अपनी निर्णयशक्ति की एक प्रकार की सहमति, उसे सिद्ध करने के लिए दिए गए युक्तिसंगत प्रमाणों या तर्कों से देते हैं। यहूदा ने, निःसन्देह, जो कुछ उसने देखा और सुना, उससे यीशु को मसीहा माना; तौभी वह आद्यन्त एक शैतान ही था। इसी प्रकार यूहन्ना 2:23, 24, 25 में हम अनेकों के विषय में पढ़ते हैं, जिन्होंने मसीह के नाम पर विश्वास किया, जब उन्होंने वे आश्चर्यकर्म देखे जो उसने किए; तौभी मसीह जानता था कि उनमें वह बात नहीं थी, जिस पर भरोसा किया जा सके। इसी प्रकार शमौन जादूगर ने भी विश्वास किया, जब उसने किए गए आश्चर्यकर्मों और चिन्हों को देखा; तौभी वह कड़वाहट के पित्त और अधर्म के बन्धन में ही बना रहा, प्रेरितों के काम
8:13, 23। और यदि कुछ स्वाभाविक मनुष्यों में निर्णयशक्ति का ऐसा विश्वास या सहमति होती है, तो इसमें किसी को सन्देह नहीं हो सकता कि धार्मिक मनोभाव उस सहमति या विश्वास से उत्पन्न हो सकते हैं; जैसा हम कुछ लोगों के विषय में पढ़ते हैं, जिन्होंने थोड़े समय के लिए विश्वास किया, जो बहुत प्रभावित हुए, और तुरन्त आनन्द के साथ वचन को ग्रहण कर लिया।
यह स्पष्ट है कि सुसमाचार की बातों की सच्चाई का एक आत्मिक विश्वास या कायल हो जाना ऐसी वस्तु है, अर्थात् एक ऐसा विश्वास जो केवल उन्हीं के लिए विशिष्ट है जो आत्मिक हैं, या जो नया जन्म पा चुके हैं, और जिनमें परमेश्वर का आत्मा अपने पवित्र संचारों में, एक जीवनदायी सिद्धान्त के रूप में वास करता है। इसलिए उनका जो कायल हो जाना है, वह न केवल अपने साथ आने वाली बातों में, अर्थात् इस बात में कि वह अच्छे कर्मों के साथ होता है, स्वाभाविक मनुष्यों के कायल हो जाने से भिन्न है; बल्कि विश्वास स्वयं भिन्न है, निर्णयशक्ति की सहमति और कायल हो जाना उन्हीं के लिए विशिष्ट प्रकार का है जो आत्मिक हैं, और जिससे स्वाभाविक मनुष्य सर्वथा वंचित हैं। यह पवित्रशास्त्र से स्पष्ट है, यदि कुछ भी स्पष्ट है तो यह है: यूहन्ना 17:8, "उन्होंने विश्वास किया है, कि तूने मुझे भेजा।"
तीतुस 1:1, "परमेश्वर के चुने हुए लोगों के विश्वास के अनुसार, और उस सत्य को जान लेने के अनुसार जो भक्ति के अनुकूल है।" यूहन्ना 16:27, "पिता तो आप ही तुम से प्रेम रखता है, क्योंकि तुम ने मुझ से प्रेम रखा है, और विश्वास किया है, कि मैं परमेश्वर की ओर से निकला।" 1 यूहन्ना 4:15, "जो कोई मान लेगा, कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है, परमेश्वर उस में बना रहता है, और वह परमेश्वर में।" अध्याय 5:1, "जो कोई विश्वास करता है, कि यीशु ही मसीह है, वह परमेश्वर से जन्मा है।" पद 10, "जो परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करता है, वह अपने ही मन में इसकी गवाही रखता है।"
निर्णयशक्ति का आत्मिक कायल हो जाना क्या है, यह हम स्वाभाविक रीति से उस बात से निर्णीत करने को प्रेरित होते हैं, जो आत्मिक समझ के पूर्व शीर्षक के अन्तर्गत पहले ही कही जा चुकी है। निर्णयशक्ति का कायल हो जाना समझ के प्रकाशित होने से उत्पन्न होता है; वस्तुओं पर सही निर्णय देना, वस्तुओं की सही समझ या धारणा रखने पर निर्भर करता है। और इसलिए यह निकलता है, कि सुसमाचार की महान बातों की सच्चाई का आत्मिक कायल हो जाना, ऐसा कायल हो जाना है, जो मन में उन बातों का एक आत्मिक बोध या धारणा रखने से उत्पन्न होता है। और यह पवित्रशास्त्र से भी स्पष्ट है, जो प्रायः यह दर्शाता है, कि सुसमाचार में हमारे सामने प्रस्तावित और प्रदर्शित बातों की वास्तविकता और दिव्यता का उद्धारक विश्वास, परमेश्वर के आत्मा द्वारा मन को प्रकाशित करने से उत्पन्न होता है, कि वह उन बातों के स्वभाव की सही धारणा रखे, और इस प्रकार मानो बातों पर से परदा उठाए, या उन्हें प्रकट करे, और मन को समर्थ बनाए कि वह उन्हें वैसा ही देखे और समझे जैसी वे हैं। लूका 10:21, 22, "हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं, कि तू ने ये बातें ज्ञानियों और बुद्धिमानों से छिपाकर बालकों पर प्रगट कीं: हां, हे पिता, क्योंकि तुझे यही अच्छा लगा। सब कुछ मेरे पिता ने मुझे सौंप दिया है: और कोई नहीं जानता कि पुत्र कौन है, केवल पिता; और पिता कौन है, केवल पुत्र, और वह जिस पर पुत्र प्रगट करना चाहे।" यूहन्ना 6:40, "और उसकी जो इच्छा है जिसने मुझे भेजा यही है, कि जो कोई पुत्र को देखे, और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए।" जिससे यह स्पष्ट है, कि सच्चा विश्वास मसीह के एक आत्मिक दर्शन से उत्पन्न होता है। और यूहन्ना
17:6, 7, 8, "जो लोग तूने जगत में से मुझे दिए थे, मैंने तेरा नाम उन पर प्रगट किया।
अब वे जान गए हैं, कि जो कुछ तूने मुझे दिया है, वह सब तेरी ओर से है। क्योंकि जो वचन तूने मुझे दिए, वे मैंने उन्हें दे दिए, और उन्होंने उन्हें ग्रहण किया, और निश्चय जान लिया है, कि मैं तेरी ओर से निकला, और उन्होंने विश्वास किया, कि तूने मुझे भेजा।"
जहाँ मसीह का चेलों पर परमेश्वर का नाम प्रगट करना, अर्थात् उन्हें दिव्य बातों की सच्ची धारणा और बोध देना, वही था जिसके द्वारा वे जान गए कि मसीह का उपदेश परमेश्वर की ओर से था, और मसीह स्वयं उसी की ओर से था, और उसी के द्वारा भेजा गया था: मत्ती 16:16, 17, "शमौन पतरस ने कहा,
तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है। यीशु ने उत्तर देकर उससे कहा, हे शमौन बरयोना तू धन्य है: क्योंकि यह बात तुझ पर मांस और लोहू ने नहीं, परन्तु मेरे स्वर्गीय पिता ने प्रगट की है।" 1 यूहन्ना 5:10, "जो परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करता है, वह अपने ही मन में इसकी गवाही रखता है।" गलातियों 1:14, 16, 16, "अपने बाप-दादों की परम्पराओं के लिये अत्यधिक उत्साही होकर।
परन्तु जब परमेश्वर को, जिसने मुझे मेरी माता के गर्भ ही से अलग किया, और अपने अनुग्रह से मुझे बुलाया, यह भाया, कि अपने पुत्र को मुझ में प्रगट करे, कि मैं अन्यजातियों में उसका प्रचार करूं; तो मैंने तुरन्त मांस और लोहू से सलाह नहीं ली।"
यदि यह ऐसा है, कि सुसमाचार में प्रदर्शित बातों की दिव्यता और वास्तविकता का आत्मिक कायल हो जाना वही है, जो उन बातों की आत्मिक समझ से उत्पन्न होता है; तो मैं पहले ही दिखा चुका हूं कि वह क्या है, अर्थात्, उन बातों की दिव्य, सर्वोच्च और पवित्र उत्तमता तथा सुन्दरता का एक बोध और स्वाद। इसलिए मन तब सुसमाचार की महान बातों की दिव्यता और सच्चाई का आत्मिक रूप से कायल होता है, जब वह कायल हो जाना, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, उनकी उस दिव्य उत्तमता और महिमा के, जो वहाँ प्रदर्शित है, ऐसे बोध या दर्शन से उत्पन्न होता है।
यह उन बातों से स्पष्ट रूप से निकलता है, जो पहले ही कही जा चुकी हैं: और इसके लिए पवित्रशास्त्र अत्यन्त स्पष्ट और साफ है, 2 कुरिन्थियों 4:3-6: "परन्तु यदि हमारा सुसमाचार छिपा हुआ है, तो उन्हीं के लिये छिपा हुआ है, जो नाश हो रहे हैं। इनमें अविश्वासियों के मन को इस संसार के ईश्वर ने अन्धा कर दिया है, ताकि मसीह के महिमा के सुसमाचार का प्रकाश, जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उन पर न चमके। क्योंकि हम अपने आप को नहीं, वरन् मसीह यीशु को प्रभु करके, और अपने आप को यीशु के कारण तुम्हारा दास करके प्रचार करते हैं। क्योंकि परमेश्वर जिसने अन्धकार में से ज्योति चमकने की आज्ञा दी, उसने हमारे हृदयों में चमककर, हमें यह ज्ञान का प्रकाश दिया है, कि परमेश्वर की महिमा यीशु मसीह के मुख पर प्रगट होती है।" साथ ही
पिछले अध्याय की अन्तिम आयत के साथ, जो इसकी भूमिका बांधती है, "परन्तु हम सब खुले मुंह से, दर्पण में की नाईं, प्रभु की महिमा को देखते हुए, प्रभु की ही आत्मा के द्वारा महिमा से महिमा तक उसी की समानता में बदलते जाते हैं।" इससे अधिक स्पष्ट कुछ नहीं हो सकता, कि यहां प्रेरित सुसमाचार के उद्धारक विश्वास की चर्चा करता है, जो मन के प्रकाशित होकर उन बातों की दिव्य महिमा को देखने से उत्पन्न होता है, जो वह प्रकट करता है।
सुसमाचार में हमारे सामने प्रदर्शित बातों की इस दिव्य महिमा, और अद्वितीय सुन्दरता का यह दर्शन या बोध, मन को उनकी दिव्यता का कायल करने की प्रवृत्ति दो रीति से रखता है; प्रत्यक्ष रूप से, और अधिक परोक्ष तथा दूर की रीति से। 1. इस दिव्य महिमा का दर्शन प्रत्यक्ष रूप से मन को इन बातों की दिव्यता का कायल करता है, क्योंकि यह महिमा स्वयं में इसका एक प्रत्यक्ष, स्पष्ट, और सर्वजयी प्रमाण है; विशेषतः जब यह स्पष्ट रूप से प्रकट हो, या जब यह अलौकिक बोध पर्याप्त मात्रा में दिया गया हो।
जिस व्यक्ति की निर्णयशक्ति इस प्रकार सुसमाचार की बातों की दिव्यता के विषय में, उनकी दिव्य महिमा के स्पष्ट दर्शन के द्वारा, प्रत्यक्ष रूप से कायल और आश्वस्त हो जाती है, उसका कायल हो जाना एक युक्तिसंगत कायल हो जाना है; उसका विश्वास और आश्वासन सर्वथा युक्ति के अनुकूल है; क्योंकि दिव्य वस्तुओं की दिव्य महिमा और सुन्दरता, स्वयं में, दिव्यता का वास्तविक प्रमाण है, और सबसे प्रत्यक्ष तथा प्रबल प्रमाण है। जो व्यक्ति दिव्य वस्तुओं की उस दिव्य, उत्कृष्ट, सर्वोच्च महिमा को सचमुच देखता है, वह मानो उनकी दिव्यता को सहज बोध से जान लेता है: वह न केवल यह तर्क करता है कि वे दिव्य हैं, बल्कि वह देखता है कि वे दिव्य हैं; वह उनमें वही देखता है, जिसमें दिव्यता मुख्यतः निहित है, क्योंकि इस महिमा में, जो कृत्रिम वस्तुओं की महिमा से, और अन्य सब महिमा से इतनी विशाल और अवर्णनीय रीति से भिन्न है, ही दिव्यता की सच्ची धारणा मुख्यतः निहित है। परमेश्वर परमेश्वर है, और अन्य सब प्राणियों से भिन्न और उनसे ऊपर उठा हुआ है, मुख्यतः अपनी दिव्य सुन्दरता के द्वारा, जो अन्य सब सुन्दरता से अनन्त रीति से भिन्न है।—इसलिए जो लोग दिव्य वस्तुओं में इस महिमा की छाप देखते हैं, वे उनमें दिव्यता देखते हैं, वे उनमें परमेश्वर को देखते हैं, और उन्हें दिव्य देखते हैं; क्योंकि वे उनमें वही देखते हैं, जिसमें दिव्यता की सबसे सच्ची धारणा निहित है। इस प्रकार एक प्राण को सुसमाचार में प्रदर्शित बातों की दिव्यता का एक प्रकार का सहज बोध हो सकता है; इसका अर्थ यह नहीं कि वह सुसमाचार के सिद्धान्तों को परमेश्वर की ओर से बिना किसी तर्क या निष्कर्ष के ही निर्णीत करता है; बल्कि यह बिना किसी लम्बी तर्क-शृंखला के होता है; तर्क केवल एक ही है, और प्रमाण प्रत्यक्ष है; मन सुसमाचार की सच्चाई तक केवल एक ही कदम में पहुंचता है, और वह है उसकी दिव्य महिमा।
यह अत्यन्त विचित्र होगा, यदि कोई अपने को मसीही कहने वाला व्यक्ति इसे असम्भव मान ले, कि दिव्य वस्तुओं में एक ऐसी उत्तमता हो सकती है, जो इतनी उत्कृष्ट और अन्य वस्तुओं में पाई जाने वाली उत्तमता से इतनी भिन्न है, कि यदि वह देखी जाए, तो स्पष्ट रूप से उन्हें अन्य वस्तुओं से अलग कर देगी।
हम युक्तिसंगत रीति से इस बात पर सन्देह नहीं कर सकते, कि जो वस्तुएं दिव्य हैं, जो परमप्रधान सत्ता से सम्बन्धित हैं, वे मानवीय वस्तुओं से अत्यन्त भिन्न हैं: कि उनमें एक ईश्वरीय, उच्च, और महिमामय उत्कृष्टता है, जो उन्हें मनुष्यों की वस्तुओं से इस प्रकार पृथक करती है कि यह भेद अनिवार्य है; और इसलिये ऐसी हैं, कि यदि देखी जाएं, तो किसी पर भी यह सबसे कायल करनेवाला, सन्तोषजनक प्रभाव डालेंगी, कि वे वही हैं जो वे हैं, अर्थात् दिव्य। निःसन्देह दिव्य सत्ता में वह महिमा और उत्कृष्टता है, जिसके द्वारा वह इतनी अनन्ततः पृथक की गई है
V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ बुद्धि का एक युक्तिसंगत और आत्मिक… अन्य सब सत्ताओं से, कि यदि वह देखी जाए, तो उसके द्वारा वह पहचाना जा सके। इसलिये यह मानने से इन्कार करना अत्यन्त अयुक्तिसंगत होगा, कि परमेश्वर के लिये यह सम्भव है कि वह उन वस्तुओं में, जिनके द्वारा वह अपने आपको प्रगट करना चाहता है, इस पृथककारी उत्कृष्टता के प्रकाशन दे; और कि यह पृथककारी उत्कृष्टता उनमें स्पष्ट रूप से देखी जा सके। कुछ स्वाभाविक उत्कृष्टताएं हैं, जो हर उस व्यक्ति के लिये जो उन्हें देखता है, अपने विषयों या रचयिताओं को अत्यन्त स्पष्ट रूप से पृथक करनेवाली हैं।
एक समझदार मनुष्य की वाणी एक छोटे बालक की वाणी से कितनी अधिक भिन्न है! और होमर, सिसरो जैसे कुछ महान प्रतिभाशाली पुरुषों की वाणी अन्य कितने ही समझदार पुरुषों की वाणी से कितनी अधिक विशिष्ट है,
मिल्टन, लॉक, एडिसन, और अन्यों की! वाणी में मानसिक उत्कृष्टता के प्रकाशन की मात्रा की कोई सीमा नियत नहीं की जा सकती। परन्तु परमेश्वर के स्वाभाविक सिद्धगुणों के प्रकाशन, जो वह अपने आपको प्रगट करते समय करता है, निःसन्देह धूल के इन कीड़ों की उन उत्कृष्टताओं के प्रकाशनों से, जिनमें वे एक दूसरे से भिन्न हैं, अकथनीय रूप से कहीं अधिक स्पष्टतः पृथककारी हो सकते हैं।
जो मनुष्यजाति और उनके कार्यों से भली-भांति परिचित है, वह सूर्य को देखकर जान सकता है कि यह मनुष्य का कार्य नहीं है। और यह मानना युक्तिसंगत है, कि जब मसीह जगत के अन्त में अपने पिता की महिमा में आएगा, तो वह ऐसे अवर्णनीय दिव्य प्रकाशनों के साथ होगा, कि जगत के निवासियों को, यहां तक कि सबसे हठी अविश्वासियों को भी, इसमें कोई सन्देह न रहेगा कि जो प्रगट हुआ है वह एक दिव्य व्यक्ति है। परन्तु सबसे बढ़कर, दिव्य सत्ता की नैतिक और आत्मिक महिमा के प्रकाशन (जो दिव्यता की वास्तविक सुन्दरता है) अपना ही प्रमाण लाते हैं, और हृदय को निश्चय दिलाते हैं। इस प्रकार चेलों को यह निश्चय हुआ कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है, "क्योंकि हम ने उसकी महिमा ऐसी देखी जैसी पिता के एकलौते की महिमा, अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण," यूहन्ना 1:14। जब मसीह अपने रूपान्तरण की महिमा में अपने चेलों को प्रगट हुआ, उस बाहरी महिमा के साथ जो उनकी शारीरिक आंखों के लिये उसकी आत्मिक महिमा का एक मीठा और अद्भुत प्रतीक और सादृश्य था, साथ ही उसकी आत्मिक महिमा भी, जो उनके मनों पर प्रगट हुई; महिमा का वह प्रकाशन ऐसा था, जिसने उन्हें पूर्ण रूप से, और सम्पूर्ण औचित्य के साथ, उसकी दिव्यता का निश्चय दिलाया; जैसा कि उनमें से एक, अर्थात् प्रेरित पतरस, इसके विषय में कहता है, 2 पतरस 1:16-18, "क्योंकि हम ने अपने प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ, और आगमन का समाचार तुम्हें चतुराई से गढ़ी हुई कहानियों के आधार पर नहीं दिया, वरन हम ने आप उसके प्रताप को देखा था। क्योंकि उस ने पिता परमेश्वर से आदर, और महिमा पाई, जिस समय उस उत्तम तेजोमय महिमा में से यह शब्द आया, कि यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिस से मैं प्रसन्न हूं। और यह शब्द जो स्वर्ग से आया, हम ने उसके साथ पवित्र पहाड़ पर होकर सुना।" प्रेरित उस पहाड़ को पवित्र पहाड़ कहता है, क्योंकि मसीह के जो प्रकाशन वहां उनके मनों पर हुए, और जिनसे उनके मन विशेष रूप से प्रभावित और मुग्ध हुए, वे उसकी पवित्रता की महिमा थे, अर्थात् उसकी नैतिक उत्कृष्टता की सुन्दरता; या, जैसा इन चेलों में से एक और, जिसने इसे देखा, इसे व्यक्त करता है, "उसकी महिमा, अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण।"
अब दिव्य सत्ता की यह पृथककारी महिमा अपना सबसे उज्ज्वल स्वरूप और प्रकाशन उन वस्तुओं में पाती है, जो सुसमाचार में हमारे सामने प्रस्तुत और प्रदर्शित की जाती हैं, उन सिद्धान्तों में जो वहां सिखाए जाते हैं, उस वचन में जो वहां कहा जाता है, और उन दिव्य मंत्रणाओं, कार्यों और क्रियाओं में जो वहां प्रगट की जाती हैं। ये
V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ बुद्धि का एक युक्तिसंगत और आत्मिक… वस्तुओं में परमेश्वर के नैतिक सिद्धगुणों की महिमा के सबसे स्पष्ट, सबसे अद्भुत, और सबसे पृथककारी निरूपण और प्रदर्शन हैं, जो कभी जगत के सामने किए गए। और यदि सुसमाचार में दिव्य महिमा का ऐसा पृथककारी, प्रमाणकारी प्रकाशन है, तो यह मानना युक्तिसंगत है कि उसे देखा जाना सम्भव है। ऐसा क्या है जो उसे देखे जाने में बाधा डाले? यह कोई तर्क नहीं है कि उसे देखा नहीं जा सकता, इस कारण कि कुछ लोग उसे नहीं देखते; चाहे वे लौकिक मामलों में विवेकी पुरुष क्यों न हों। यदि सुसमाचार में ऐसी अवर्णनीय, पृथककारी, प्रमाणकारी उत्कृष्टताएं हैं, तो यह मानना युक्तिसंगत है, कि वे ऐसी हैं जिन्हें केवल परमेश्वर के आत्मा के विशेष प्रभाव और प्रबोधन द्वारा ही पहचाना जा सकता है। महान प्रतिभा के रचयिताओं के कार्यों की पृथककारी उत्कृष्टताओं को पहचानने के लिये मन के असाधारण बल की आवश्यकता है: मिल्टन में वे बातें, जो साधारण न्यायकर्ताओं को नीरस और त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती हैं, उन लोगों की दृष्टि में जिनकी समझ अधिक और रुचि उत्तम है, उसकी अनुपम उत्कृष्टताएं हैं। और यदि कोई पुस्तक है, जिसका रचयिता परमेश्वर है, तो यह मानना अत्यन्त युक्तिसंगत है, कि उसके वचन की पृथककारी महिमाएं ऐसी प्रकार की हैं कि मनुष्यों के हृदयों की भ्रष्टता, जो सबसे बढ़कर मनुष्यों को ईश्वरत्व से पराया कर देती है, और हृदय को उन बातों के प्रति, जिनमें दिव्य सिद्धगुणों की नैतिक महिमा निहित है, किसी भी बोध या रुचि के लिये मन्द और जड़ बना देती है: मैं कहता हूं, यह मानना ही युक्तिसंगत है, कि यह मनुष्यों को ऐसी पुस्तक की सुन्दरताओं को पहचानने से अन्धा कर देगी; और इसलिये वे उन्हें तब तक नहीं देखेंगे, जब तक कि परमेश्वर उन्हें प्रबुद्ध करना और एक पवित्र रुचि बहाल करना, दिव्य सुन्दरताओं को पहचानने और उनका रसास्वादन करने के लिये, अपनी प्रसन्नता न समझे।
दिव्य वस्तुओं की आत्मिक उत्कृष्टता और सुन्दरता का यह बोध, मन को सुसमाचार की सच्चाई का प्रत्यक्ष रूप से भी कायल करता है, क्योंकि सुसमाचार में घोषित अत्यन्त महत्वपूर्ण बातों में से बहुत सी ऐसी हैं, जो स्वाभाविक मनुष्यों की आंखों से छिपी रहती हैं, जिनकी सच्चाई वास्तव में इसी उत्कृष्टता में निहित है, या इस पर इतनी तत्काल निर्भर और इससे इस प्रकार उत्पन्न होती है, कि इस उत्कृष्टता के देखे जाने में ही उन बातों की सच्चाई देखी जाती है। जैसे ही आंखें दिव्य वस्तुओं में निहित पवित्र सुन्दरता और मनोहरता को देखने के लिये खोली जाती हैं, सुसमाचार के अनेक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त जो इस पर निर्भर हैं (जो सब स्वाभाविक मनुष्यों को अनोखे और अन्धकारमय प्रतीत होते हैं) तत्काल सत्य देखे जाते हैं। उदाहरण के लिये, इससे यह सत्य प्रगट होता है जो परमेश्वर का वचन पाप की अत्यधिक बुराई के विषय में घोषित करता है; क्योंकि वही आंख जो पवित्रता की अलौकिक सुन्दरता को पहचानती है, उसी में अनिवार्यतः पाप की अत्यधिक घृणितता को भी देखती है: वही स्वाद जो सच्चे नैतिक भले की मिठास का रसास्वादन करता है, नैतिक बुराई की कड़वाहट भी चखता है। और इसी साधन से मनुष्य अपनी स्वयं की पापपूर्णता और घृणितता को देखता है; क्योंकि अब उसमें इस प्रकार की वस्तुओं को पहचानने की एक इन्द्रिय है; और इस प्रकार वह उस सत्य को देखता है जो परमेश्वर का वचन मनुष्यजाति की अत्यधिक पापपूर्णता के विषय में घोषित करता है, जिसे वह पहले नहीं देखता था। अब वह अपने हृदय के भयानक कलंक को, और अपने स्वभाव की चरम भ्रष्टता को, एक नई रीति से देखता है; क्योंकि उसके प्राण को अब ऐसे रोग की पीड़ा को अनुभव करने की एक इन्द्रिय दी गई है; और यह उसे वह सत्य दिखाता है जो पवित्रशास्त्र मनुष्य के स्वभाव की भ्रष्टता, उसके मूल पाप, और मनुष्य की सर्वनाशी, बिगड़ी हुई दशा, और उसे एक उद्धारकर्ता की आवश्यकता, अपने हृदय को नया बनाने और अपने स्वभाव को बदलने के लिये परमेश्वर की सामर्थी शक्ति की आवश्यकता के विषय में प्रगट करता है।
पवित्रता की सच्ची उत्कृष्टता को देखकर मनुष्य उन सब बातों की महिमा देखते हैं, जिन्हें V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ बुद्धि का एक युक्तिसंगत और आत्मिक… दोनों बुद्धि और पवित्रशास्त्र दिव्य सत्ता में दिखाते हैं; क्योंकि यह दिखाया जा चुका है, कि उनकी महिमा इसी पर निर्भर है: और इससे वे उस सब सत्य को देखते हैं जो पवित्रशास्त्र इनके विषय में घोषित करता है: परमेश्वर की महिमामय उत्कृष्टता और प्रताप, उसका सब भलाई का सोता होना, प्राणी का एकमात्र सुख होना, इत्यादि। और यह पुनः मन को वह सत्य दिखाता है जो पवित्रशास्त्र ऐसे महिमामय परमेश्वर के विरुद्ध पाप की बुराई के विषय में सिखाता है; और साथ ही वह सत्य भी जो यह उस भयानक दण्ड के, जो वह प्रगट करता है, पाप के न्यायसंगत योग्य होने के विषय में सिखाता है; और साथ ही यह भी कि हमारे लिये किसी सन्तोष, या ऐसी अनन्ततः बुरी और जघन्य वस्तु के लिये पर्याप्त प्रायश्चित अर्पित करना असम्भव है। और यह पुनः उस सत्य को दिखाता है जो पवित्रशास्त्र पाप के लिये अनन्त मूल्य का प्रायश्चित अर्पित करने हेतु एक उद्धारकर्ता की आवश्यकता के विषय में प्रगट करता है। और आत्मिक सुन्दरता का यह बोध जिसकी बात की गई है, प्राण को उन बातों की महिमा देखने में समर्थ बनाता है, जो सुसमाचार मसीह के व्यक्तित्व के विषय में प्रगट करता है; और इस प्रकार उसे उसके व्यक्तित्व की अत्यधिक सुन्दरता और गरिमा देखने में समर्थ बनाता है, जो सुसमाचार में उसके वचन, कार्यों, क्रियाओं, और जीवन में प्रदर्शित होती है: और उसके व्यक्तित्व की सर्वोच्च गरिमा का यह बोध वह सत्य दिखाता है जो सुसमाचार उसके लहू और धार्मिकता के मूल्य के विषय में घोषित करता है, और इस प्रकार उस भेंट की अनन्त उत्कृष्टता, जो उसने हमारे लिये परमेश्वर को अर्पित की है, और इस प्रकार हमारे पापों का प्रायश्चित करने और हमें परमेश्वर के समक्ष ग्रहणयोग्य बनाने के लिये उसकी पर्याप्तता। और इस प्रकार परमेश्वर का आत्मा मसीह के द्वारा उद्धार के मार्ग को प्रगट करता है; इस प्रकार प्राण उद्धार के इस मार्ग की उपयुक्तता और अनुकूलता, इसकी योजना के अद्भुत ज्ञान, और सुसमाचार जो प्रावधान (हमारे लिये बनाया गया) प्रदर्शित करता है, उसके हमारी आवश्यकताओं के प्रति पूर्ण अनुरूपता को देखता है। सच्ची दिव्य सुन्दरता का बोध प्राण को दिया जाने पर, प्राण सुसमाचार की योजना के हर भाग की सुन्दरता को पहचानता है। यह प्राण को वह सत्य भी दिखाता है जो परमेश्वर का वचन मनुष्य के प्रमुख सुख के विषय में घोषित करता है, कि वह पवित्र क्रियाओं और भोगों में निहित है। यह वह सत्य दिखाता है जो सुसमाचार स्वर्गीय दशा की अकथनीय महिमा के विषय में घोषित करता है। और पुराने नियम की भविष्यवाणियां और प्रेरितों के लेख मसीहा के राज्य की महिमा के विषय में जो कुछ घोषित करते हैं, वह अब सब स्पष्ट है; और साथ ही वह भी जो पवित्रशास्त्र हमारे कर्तव्य के कारणों और आधारों के विषय में सिखाता है। पवित्रशास्त्र में प्रगट की गई इन सब बातों की, और और भी अनेक बातों की, जिनका उल्लेख किया जा सकता है, सच्चाई प्राण के सामने केवल दिव्य सुन्दरता के उस आत्मिक स्वाद के प्रदान किए जाने से ही प्रगट होती है, जिसकी बात की गई है; क्योंकि वे इससे पहले प्राण के लिये छिपी हुई बातें थीं।
और इन सब के अतिरिक्त, उन सब बातों की सच्चाई, जो पवित्रशास्त्र प्रयोगात्मक धर्म के विषय में कहता है, इससे ज्ञात होती है; क्योंकि वे अब अनुभव में आ चुकी हैं। और यह प्राण को कायल करता है, कि जिसने मनुष्य के हृदय को हमसे अधिक भली-भांति जाना, जितना हम अपने ही हृदयों को जानते हैं, और जिसने सद्गुण और पवित्रता के स्वभाव को पूर्णतः जाना, वही पवित्रशास्त्र का रचयिता था। और सुसमाचार में अद्भुत और महिमामय सत्य के ऐसे संसार का, जो पहले अज्ञात था, स्वाभाविक आंख की दृष्टि से सर्वथा परे था, परन्तु अब इतनी स्पष्टता और चमक से प्रगट है, इतनी स्पष्टता से खुल जाना, प्राण पर सुसमाचार की दिव्यता का विश्वास दिलाने के लिये एक सामर्थी और अजेय प्रभाव डालता है।
V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ बुद्धि का एक युक्तिसंगत और आत्मिक… जब तक मनुष्य सुसमाचार की सच्चाई के विषय में, उसके आन्तरिक प्रमाणों द्वारा, उस रीति से जिसकी बात की गई है, अर्थात् उसकी महिमा को देखकर, एक युक्तिसंगत, ठोस निश्चय और कायलपन तक न पहुंचें; तब तक यह असम्भव है कि जो अनपढ़ हैं, और इतिहास से अपरिचित हैं, उन्हें इसका कोई पूर्ण और प्रभावशाली कायलपन कभी हो सके। इसके बिना वे इसकी बहुत सम्भावना देख सकते हैं; उनके लिये यह युक्तिसंगत हो सकता है कि वे विद्वान पुरुषों और इतिहासकारों की बातों पर बहुत विश्वास करें; और वे उन्हें इतना बता सकते हैं, कि उन्हें यह अत्यन्त सम्भाव्य और युक्तिसंगत प्रतीत हो, कि मसीही धर्म सत्य है; और इतना, कि इस मत को न मानना उनके लिये अत्यन्त अयुक्तिसंगत होगा। परन्तु ऐसा कायलपन, जो इतना स्पष्ट, प्रमाणित, और आश्वस्त करनेवाला हो, कि उन्हें साहस के साथ सब कुछ बेच देने, सब वस्तुओं की हानि का दृढ़तापूर्वक और निर्भय होकर जोखिम उठाने, और अत्यन्त तीव्र तथा दीर्घकालीन यातनाएं सहने, और जगत को पांव तले रौंदने, और मसीह के लिये सब वस्तुओं को कूड़ा गिनने के लिये प्रेरित करने के लिये पर्याप्त हो, इतिहास से जो प्रमाण उन्हें मिल सकता है, वह पर्याप्त नहीं हो सकता।
यह असम्भव है कि जिन मनुष्यों को ऐतिहासिक जगत का, या युग-युग के इतिहास के क्रम का, कोई सामान्य दृष्टिकोण प्राप्त नहीं है, वे इतिहास से लिये गए मसीही धर्म की सच्चाई के तर्कों के बल को उस मात्रा तक पहुंच सकें, कि वे प्रभावशाली रीति से उन्हें अपना सब कुछ इस पर दांव पर लगाने के लिये प्रेरित करें। विद्वान पुरुषों द्वारा उनसे कही गई सब बातों के बाद भी, उनके मनों में अनगिनत सन्देह बने रहेंगे; जब उनके विश्वास की कोई बड़ी परीक्षा उन्हें कष्ट देगी, तो वे यह कहने को तैयार होंगे, "मुझे यह, या वह, कैसे मालूम हो? मुझे कैसे मालूम हो कि ये इतिहास कब लिखे गए?
विद्वान पुरुष मुझे बताते हैं कि इन इतिहासों की उनके समय में इस-इस प्रकार पुष्टि की गई थी; परन्तु मुझे कैसे मालूम हो कि उस समय ऐसी पुष्टियां हुई भी थीं? वे मुझे बताते हैं कि इन तथ्यों पर विश्वास करने का उतना ही कारण है, जितना उन किसी भी अन्य तथ्यों पर, जो इतनी दूरी पर वर्णित किए गए हैं; परन्तु मुझे कैसे मालूम हो कि उन युगों के विषय में वर्णित अन्य तथ्य कभी हुए भी थे? जिनके पास ऐतिहासिक घटनाओं के क्रम का, और युग-युग में मनुष्यजाति की दशा का, कोई सामान्य दृष्टिकोण नहीं है, वे दूर के युगों में तथ्यों की सच्चाई का इतिहास से स्पष्ट प्रमाण नहीं देख सकते; वरन अनन्त सन्देह और शंकाएं बनी रहेंगी।
परन्तु सुसमाचार केवल विद्वान पुरुषों के लिये नहीं दिया गया था। जिनके लिये पवित्रशास्त्र लिखा गया, उनमें से कम से कम बीस में से उन्नीस, यदि सौ में से निन्यानवे न हों, ऐसे हैं, जो विद्वान पुरुषों द्वारा प्रयोग किए गए ऐसे तर्कों से पवित्रशास्त्र के दिव्य अधिकार का कोई निश्चित या प्रभावशाली कायलपन प्राप्त करने में सक्षम नहीं हैं। यदि मूर्तिपूजा में पले-बढ़े मनुष्यों को मसीही धर्म की सच्चाई का स्पष्ट और निश्चित कायलपन तब तक प्रतीक्षा करनी पड़े, जब तक उन्हें इतनी विद्वता और अधिक सभ्य जातियों के इतिहास से इतना परिचय न हो जाए, कि वे ऐसे तर्कों के बल को स्पष्ट रूप से देख सकें; तो यह सुसमाचार के प्रमाण को उनके लिये अत्यन्त बोझिल बना देगा, और उनके बीच सुसमाचार के प्रचार को अनन्ततः कठिन बना देगा।
हूसातुनक इंडियनों, और अन्यों की, जिन्होंने हाल ही में मसीही धर्म में शिक्षा पाने की इच्छा प्रगट की है, दशा अत्यन्त दयनीय है, यदि इस मार्ग को छोड़ किसी अन्य रीति से उन्हें मसीही धर्म की सच्चाई का ऐसा प्रमाण प्राप्त न हो सके, जो उन्हें मसीह के लिये सब कुछ बेच देने के लिये प्रेरित करने हेतु पर्याप्त हो।
V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ बुद्धि का एक युक्तिसंगत और आत्मिक… यह मानना अयुक्तिसंगत है, कि परमेश्वर ने अपने लोगों के लिये सुसमाचार की सच्चाई का केवल सम्भाव्य प्रमाण ही दिया है। उसने बड़ी सावधानी के साथ, अनुग्रह की वाचा में अपनी विश्वासयोग्यता का सबसे कायल करनेवाला, आश्वस्त करनेवाला, सन्तोषजनक और बहुविध प्रमाण उन्हें प्रचुरता से प्रदान किया और दिया है; और जैसा दाऊद कहता है, "उसने एक वाचा बान्धी है जो सब बातों में ठीक और स्थिर है।" इसलिये यह युक्तिसंगत मानना है, कि साथ ही उसने मामले को ऐसा ठहराने में कोई कमी नहीं की होगी, कि इस बात का उतना ही बड़ा और स्पष्ट प्रमाण न रहे, कि यह उसकी वाचा है, और ये प्रतिज्ञाएं उसकी प्रतिज्ञाएं हैं; अर्थात्, यही बात है कि मसीही धर्म सत्य है, और सुसमाचार उसका वचन है। अन्यथा उसकी वाचा में अपनी विश्वासयोग्यता के वे महान आश्वासन, जो उसने अपनी शपथ से इसकी पुष्टि करके, और इस प्रकार अनेक रीति से मुहरों और प्रतिज्ञाचिन्हों द्वारा इसे स्थापित करके दिए हैं, व्यर्थ होंगे। क्योंकि यह प्रमाण कि यह उसकी वाचा है, वास्तव में वह नींव है जिस पर उन अन्य आश्वासनों का सारा बल और प्रभाव टिका है। इसलिये हम निःसन्देह यह मान और निष्कर्ष निकाल सकते हैं, कि परमेश्वर ने इस बात का कि यह वाचा, और ये प्रतिज्ञाएं उसकी हैं, किसी न किसी प्रकार का प्रमाण दिया है, जो निरी सम्भावना से परे है; कि इसके आश्वासन के कुछ आधार प्रस्तुत किए गए हैं, जो, यदि हम उनसे अन्धे न हों, तो इतिहास, मानवीय परम्पराओं इत्यादि से किसी भी तर्क से, जो अनपढ़ और इतिहास से अपरिचित व्यक्ति प्राप्त कर सकते हैं, कहीं अधिक ऊंचा निश्चय देने की प्रवृत्ति रखते हैं; हां, वह जो किसी भी मामले में मनुष्यजाति के पास उपलब्ध सबसे उच्च और सबसे सम्पूर्ण आश्वासन का उत्तम आधार है, प्रेरित के उन उच्च वाक्यों के अनुरूप जिन्हें वह प्रयोग करता है,
इब्रानियों 10:22, "आओ हम विश्वास के पूरे निश्चय के साथ परमेश्वर के समीप जाएं।" और कुलुस्सियों 2:2, "कि उनके मन शान्ति पाएं, और प्रेम में एक साथ गुंथे जाकर, समझ के पूरे निश्चय के सारे धन तक, परमेश्वर, और पिता, और मसीह के भेद की पहचान तक पहुंचें।" यह मानना युक्तिसंगत है, कि परमेश्वर उन बातों का, जो सबसे महान हैं, और जिनकी सच्चाई हमारे लिये सबसे बड़े महत्व की है, सबसे बड़ा प्रमाण देगा: और इसलिये हम, यदि हम बुद्धिमान हैं, और युक्तिसंगत रीति से कार्य करते हैं, तो इसका पूर्ण, निःसन्देह और सम्पूर्ण आश्वासन पाने की सबसे बड़ी इच्छा रखेंगे। परन्तु यह निश्चित है, कि जो लोग सुसमाचार के अधीन जीते हैं, उनमें से अधिकांश प्राचीन परम्पराओं, इतिहासों, और स्मारकों से लिये गए तर्कों द्वारा ऐसा आश्वासन प्राप्त नहीं कर सकते।
और यदि हम तथ्य और अनुभव पर आएं, तो यह मानने का तनिक भी कारण नहीं है, कि सच्चे मसीहियों में से, जिन्होंने मसीह के लिये सब कुछ बेच देने का मन रखा है, सौ में से एक भी सुसमाचार की सच्चाई का अपना कायलपन इस मार्ग से प्राप्त हुआ हो। यदि हम सुधार के आरम्भ से लेकर मसीह के लिये शहीद हुए हजारों लोगों के इतिहास पढ़ें, जिन्होंने सुसमाचार की सच्चाई के निश्चय में अत्यन्त यातनाएं आनन्दपूर्वक सहीं, और उनकी परिस्थितियों और सुविधाओं पर विचार करें; तो उनमें से कितने कम थे, जिनके विषय में हम युक्तिसंगत रूप से मान सकते हैं, कि उन्हें अपना निश्चित विश्वास कभी इस मार्ग से प्राप्त हुआ; या वास्तव में जिनके लिये यह सम्भव था, कि वे ऐसे तर्कों से इतना पूर्ण और दृढ़ आश्वासन युक्तिसंगत रीति से प्राप्त करें! उनमें से अनेक निर्बल स्त्रियां और बालक थे, और उनमें से अधिकांश अनपढ़ व्यक्ति थे, जिनमें से बहुत से पोपमतीय अज्ञानता और अन्धकार में पले-बढ़े थे, और उससे अभी-अभी बाहर निकले थे, और उन समयों में जीए और मरे, जिनमें वे तर्क
V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ बुद्धि का एक युक्तिसंगत और आत्मिक… जो प्राचीनता और इतिहास से मसीही धर्म की सच्चाई के लिये थे, तब तक अत्यन्त अपूर्ण रीति से ही प्रस्तुत किए गए थे। और वास्तव में, यह बहुत हाल ही की बात है, कि ये तर्क, स्वयं विद्वान पुरुषों द्वारा भी, स्पष्ट और कायल करनेवाले प्रकाश में प्रस्तुत किए गए हैं: और जब से यह किया गया है, तब से जो सच्चे धर्म में शिक्षित हुए हैं, उनमें कभी इतने कम पूर्ण विश्वासी नहीं रहे; किसी भी युग में अविश्वास इतना प्रबल कभी नहीं रहा, जितना इस युग में, जिसमें ये तर्क सबसे अधिक लाभ के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं।
यीशु मसीह के सच्चे शहीद वे नहीं हैं, जो केवल यह मत रखने में दृढ़ रहे हैं कि मसीह का सुसमाचार सत्य है, वरन वे हैं जिन्होंने उसकी सच्चाई को देखा है; जैसा कि शहीद या गवाह नाम ही (जिससे उन्हें पवित्रशास्त्र में पुकारा गया है) दर्शाता है। जो केवल यह घोषित करते हैं कि उनका मत बहुत यह है कि कोई बात सत्य है, वे किसी भी बात की सच्चाई के गवाह कहलाने के अत्यन्त अनुपयुक्त हैं। केवल वे ही उचित गवाह हैं, जो गवाही दे सकते हैं, और देते हैं, कि उन्होंने जिस बात का दावा करते हैं, उसकी सच्चाई देखी है: यूहन्ना 3:11, "हम जो जानते हैं वही कहते हैं, और जो देखा है उसकी गवाही देते हैं।" यूहन्ना 1:34, "और मैं ने देखा है, और गवाही दी है, कि यही परमेश्वर का पुत्र है।" 1 यूहन्ना 4:14, "और हम ने देखा है, और गवाही देते हैं, कि पिता ने पुत्र को जगत का उद्धारकर्ता होने के लिये भेजा है।" प्रेरितों के काम 22:14, 15, "हमारे बापदादों के परमेश्वर ने तुझे पहिले से ठहराया है, कि तू उसकी इच्छा को जाने, और उस धर्मी को देखे, और उसके मुख की बात सुने; क्योंकि तू जो कुछ तू ने देखा और सुना है, उसके विषय में सब मनुष्यों के आगे उसका गवाह होगा।" परन्तु यीशु मसीह के सच्चे शहीद उसके गवाह कहलाते हैं; और सब संत, जो अपने पवित्र आचरण द्वारा बड़ी परीक्षाओं में उस विश्वास को घोषित करते हैं, जो आशा की हुई बातों का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है, गवाह कहलाते हैं, इब्रानियों 11:1, और 12:1, क्योंकि अपने अंगीकार और आचरण द्वारा, वे सुसमाचार की सच्चाई और दिव्यता का अपना निश्चय घोषित करते हैं, क्योंकि उनके मनों की आंखें सुसमाचार में दिव्यता को देखने के लिये, या उसमें चमकती हुई उस अनुपम, अकथनीय रूप से उत्कृष्ट, और सचमुच दिव्य महिमा को देखने के लिये प्रबुद्ध की गई हैं, जो सर्वथा पृथककारी, प्रमाणकारी, और कायल करनेवाली है: यहां तक कि वे सच्चाई से कह सकते हैं कि उन्होंने इसमें परमेश्वर को देखा है, और यह देखा है कि यह वास्तव में दिव्य है; और इस प्रकार वे गवाहों की भाषा में बोल सकते हैं; और न केवल यह कहते हैं, कि उन्हें लगता है कि सुसमाचार दिव्य है, वरन यह कहते हैं, कि यह दिव्य है, इसे अपनी गवाही के रूप में देते हुए, क्योंकि उन्होंने इसे ऐसा देखा है। निःसन्देह पतरस, याकूब और यूहन्ना, पहाड़ पर मसीह की उस उत्कृष्ट महिमा को देखने के बाद, नीचे आने पर गवाहों की भाषा में बोलने, और निश्चयपूर्वक यह कहने को तैयार होते, कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है; जैसा पतरस कहता है, कि वे प्रत्यक्षदर्शी थे, 2 पतरस 1:16। और इसी प्रकार सब जातियां न्याय के दिन उसकी महिमा देखने पर, यह निश्चयपूर्वक कहने को तैयार होंगी; यद्यपि जो सार्वभौमिक रूप से देखा जाएगा, वह केवल उसकी स्वाभाविक महिमा होगी, न कि उसकी नैतिक और आत्मिक महिमा, जो कहीं अधिक पृथककारी है। परन्तु फिर भी यह ध्यान देने योग्य है, कि जिनके पास सुसमाचार की दिव्य महिमा का आत्मिक दर्शन है, उनमें भी विश्वास के बल की मात्राओं में बड़ी विविधता है, जैसे इस महिमा के दर्शनों की स्पष्टता की मात्राओं में भी बड़ी विविधता है: परन्तु सुसमाचार की सच्चाई का ऐसा कोई सच्चा और उद्धारक विश्वास, या बुद्धि का आत्मिक कायलपन नहीं है, जिसमें इसके आन्तरिक प्रमाण का यह प्रकाशन किसी न किसी मात्रा में न हो। धन्य परमेश्वर का सुसमाचार अपने प्रमाण के लिये उतना भिखारी बनकर विदेश नहीं जाता, जितना कुछ लोग
V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ बुद्धि का एक युक्तिसंगत और आत्मिक… सोचते हैं; इसका सबसे ऊंचा और सबसे उचित प्रमाण इसी में निहित है। यद्यपि बाहरी तर्कों का बड़ा उपयोग किया जा सकता है, उन्हें उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए, वरन अत्यन्त मूल्यवान और आदरणीय माना जाना चाहिए; क्योंकि वे अविश्वासियों को जगाने, और उन्हें गम्भीर विचार तक लाने, और सच्चे संतों के विश्वास की पुष्टि करने में बड़े उपयोगी हो सकते हैं; हां, वे किसी सीमा तक मनुष्यों में उद्धारक विश्वास उत्पन्न करने में सहायक भी हो सकते हैं। यद्यपि जो पहले कहा गया है वह सत्य बना रहता है, कि बुद्धि का कोई आत्मिक कायलपन नहीं है, सिवाय उसके जो दिव्य वस्तुओं की आत्मिक सुन्दरता और महिमा के बोध से उत्पन्न होता है: क्योंकि, जैसा देखा गया है, यह बोध या दृष्टि मन को सुसमाचार की सच्चाई का कायल करने की प्रवृत्ति दो रीति से रखती है, या तो प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से। इसलिये अब मैंने पहले ही देख लिया है कि यह प्रत्यक्ष रूप से कैसे करता है, अब मैं आगे बढ़ता हूं,
2. यह देखने के लिये, कि इस दिव्य महिमा की दृष्टि मन को मसीही धर्म की सच्चाई का अधिक अप्रत्यक्ष रीति से कैसे कायल करती है।
पहला, यह इस प्रकार करती है, कि इससे दिव्य वस्तुओं की सच्चाई के विरुद्ध हृदय के पूर्वाग्रह दूर हो जाते हैं, जिससे मन उन दिए गए तर्कों के बल के लिये खुला रहता है।
मनुष्य का मन स्वभाव से सुसमाचार के सिद्धान्तों के विरुद्ध शत्रुता से भरा है; जो उन तर्कों के लिये हानिकारक है जो उनकी सच्चाई सिद्ध करते हैं, और उन्हें मन पर अपना बल खोने का कारण बनाता है; परन्तु जब किसी व्यक्ति पर मसीही सिद्धान्तों की दिव्य उत्कृष्टता प्रगट हो जाती है, तो यह उस शत्रुता को नष्ट कर देती है, और पूर्वाग्रहों को दूर करती है, और बुद्धि को पवित्र बनाती है, और उसे खुला और स्वतन्त्र बना देती है। इसी से मन को कायल करने के लिये तर्कों के बल में बड़ा अन्तर होता है। इसी से मसीह के चमत्कारों का चेलों को कायल करने में जो प्रभाव था, वह शास्त्रियों और फरीसियों को कायल करने में उनके प्रभाव से अत्यन्त भिन्न था: इसलिये नहीं कि उनके पास अधिक प्रबल तर्क थे या उनकी बुद्धि अधिक उन्नत थी; वरन उनकी बुद्धि पवित्र की गई थी, और वे अन्धा करनेवाले पूर्वाग्रह, जिनके अधीन शास्त्री और फरीसी थे, मसीह और उसके सिद्धान्त की उत्कृष्टता के उस बोध से दूर हो गए थे जो उनमें था।
दूसरा, यह न केवल बुद्धि की बाधाओं को दूर करता है, वरन बुद्धि की सकारात्मक सहायता भी करता है। यह वैचारिक धारणाओं को भी अधिक सजीव बनाता है। यह मन के ध्यान को उस प्रकार की वस्तुओं की ओर सहायता और संलग्न करता है, जिससे उसे उनकी अधिक स्पष्ट दृष्टि प्राप्त होती है, और उनके पारस्परिक सम्बन्धों को अधिक स्पष्टता से देख पाता है। स्वयं धारणाएं, जो अन्यथा धुंधली और अस्पष्ट रहती हैं, इस साधन से उन पर प्रकाश पड़ता है, और वे अधिक बल के साथ अंकित होती हैं, जिससे मन उनका बेहतर निर्णय कर सकता है; जैसे वह जो पृथ्वी के धरातल की वस्तुओं को देखता है, जब उन पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है, तो उसे उनके सच्चे रूपों, और पारस्परिक सम्बन्धों में उन्हें पहचानने का, और उनकी रचना में दिव्य बुद्धि और कौशल के प्रमाणों को देखने का, कहीं अधिक लाभ प्राप्त होता है, उससे जो उन्हें मन्द तारों के प्रकाश, या सन्ध्या के धुंधलके में देखता है।
जो कुछ कहा गया है, वह कुछ सीमा तक दिव्य वस्तुओं की सच्चाई और वास्तविकता के विषय में बुद्धि के आत्मिक कायलपन के स्वभाव को दिखाने के लिये, और इस प्रकार सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों को अन्यों से पृथक करने के लिये उपयोगी हो सकता है; क्योंकि अनुग्रहमय मनोभाव सदैव बुद्धि के ऐसे कायलपन के साथ होते हैं।
परन्तु इस शीर्षक को समाप्त करने से पहले, इस विषय में जिन रीतियों से कुछ लोग धोखा खा जाते हैं, उन्हें देखना आवश्यक होगा; और कुछ ऐसी बातों पर ध्यान देना, जो कभी-कभी
V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ बुद्धि का एक युक्तिसंगत और आत्मिक… धर्म की बातों की सच्चाई के आत्मिक और उद्धारक विश्वास समझ ली जाती हैं, जो वास्तव में उससे अत्यन्त भिन्न हैं।
1. धर्म की बड़ी बातों की सच्चाई का एक निश्चित मात्रा का कायलपन है, जो परमेश्वर के आत्मा के सामान्य प्रबोधनों से उत्पन्न होता है। धर्म की बातों का वह अधिक सजीव और सुग्राह्य बोध, जो उनके उस स्वाभाविक पक्ष के विषय में है, जैसा स्वाभाविक मनुष्यों को होता है जो जागृति और सामान्य प्रबोधन के अधीन हैं, दिव्य वस्तुओं की सच्चाई का एक निश्चित मात्रा का कायलपन देगा, उससे कहीं आगे, जो उन्हें इस प्रकार प्रबुद्ध होने से पहले था। क्योंकि इससे वे पवित्रशास्त्र में की गई प्रकाशना में, और उस प्रकाशना में प्रदर्शित बातों में, परमेश्वर के स्वाभाविक सिद्धगुणों के, जैसे उसकी महानता, सामर्थ्य, और भयानक प्रताप के, प्रकाशनों को देखते हैं; जो मनों को कायल करने की प्रवृत्ति रखता है कि यह किसी महान और भयानक परमेश्वर का वचन है। परमेश्वर की महानता और प्रताप के जो चिन्ह उसके वचन और कार्यों में हैं, जिनका उन्हें परमेश्वर के आत्मा के सामान्य प्रभाव से बड़ा बोध होता है, उनसे उन्हें कहीं अधिक बड़ा कायलपन हो सकता है कि ये वास्तव में किसी अत्यन्त महान अदृश्य सत्ता के वचन और कार्य हैं। और परमेश्वर की महानता का सजीव बोध, जो स्वाभाविक मनुष्यों को हो सकता है, उन्हें उस बड़े दोष का बोध कराने की प्रवृत्ति रखता है, जो ऐसे परमेश्वर के विरुद्ध पाप लाता है, और पाप के लिये उसके क्रोध की भयानकता का। और यह उन्हें पवित्रशास्त्र द्वारा किए गए एक अन्य जगत के, और वहां पापियों पर लगाए जाने की धमकी दी गई चरम दुर्दशा के, प्रकाशन पर अधिक सरलता और पूर्णता से विश्वास करने के लिये प्रवृत्त करता है।
और इस प्रकार धर्म की बातों में जो महान स्वाभाविक भलाई है, उसके उस बोध से, जो कभी-कभी सामान्य प्रबोधनों में दिया जाता है, मनुष्य धर्म की सच्चाई पर विश्वास करने के लिये और अधिक प्रवृत्त हो सकते हैं। व्यक्तियों में ये बातें हो सकती हैं, फिर भी उनमें धर्म की बातों में निहित नैतिक और पवित्र उत्कृष्टता की सुन्दरता और मनोहरता का कोई बोध नहीं हो सकता; और इसलिये उनकी सच्चाई का कोई आत्मिक कायलपन नहीं। परन्तु फिर भी ऐसे कायलपनों को कभी-कभी उद्धारक कायलपन समझ लिया जाता है, और उनसे उत्पन्न मनोभावों को, उद्धारक मनोभाव।
2. कुछ व्यक्तियों की कल्पनाओं पर बनाए गए वे असाधारण प्रभाव, दर्शनों में, और उन तात्कालिक प्रबल आवेगों और सुझावों में, जो उन्हें होते हैं, मानो उन्होंने दृश्य देखे हों, और उनसे शब्द कहे गए हों, अदृश्य वस्तुओं की सच्चाई का एक प्रबल विश्वास उत्पन्न कर सकते हैं, और प्रायः करते भी हैं। यद्यपि ऐसी बातों की सामान्य प्रवृत्ति, अपने अन्तिम परिणाम में, मनुष्यों को परमेश्वर के वचन से दूर खींचना, और उन्हें सुसमाचार को अस्वीकार करने के लिये प्रेरित करना, और अविश्वास और नास्तिकता को स्थापित करना है; फिर भी वर्तमान में, वे पवित्रशास्त्र में प्रगट की गई कुछ बातों की सच्चाई का एक विश्वस्त विश्वास उत्पन्न कर सकते हैं, और प्रायः करते भी हैं; तथापि उनका विश्वास भ्रम पर आधारित है, और इसलिये किसी मोल का नहीं। उदाहरण के लिये, यदि किसी व्यक्ति की कल्पना पर किसी अदृश्य कर्ता के द्वारा, तात्कालिक और प्रबल रीति से, एक चमकते हुए प्रकाश, और सिंहासन पर बैठे किसी व्यक्ति के महिमामय स्वरूप का, महान बाहरी प्रताप और सुन्दरता के साथ, कुछ उल्लेखनीय शब्द बड़े बल और सामर्थ्य से बोलते हुए, प्रभाव डाला जाए; तो जिस व्यक्ति पर ऐसा प्रभाव पड़ा है, वह इससे विश्वस्त हो सकता है, कि अदृश्य कर्ता, आत्मिक सत्ताएं हैं, अपने अनुभव से, यह जानते हुए कि उसका स्वयं इस असाधारण प्रभाव में, जिसे उसने अनुभव किया है, कोई हाथ नहीं था: और वह यह भी
V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ बुद्धि का एक युक्तिसंगत और आत्मिक… विश्वस्त हो सकता है, कि यह वही मसीह है जिसे उसने देखा और बोलते हुए सुना: और इससे वह विश्वस्त हो सकता है कि मसीह है, और मसीह स्वर्ग में सिंहासन पर राज्य करता है, जैसा उसने उसे देखा; और विश्वस्त हो सकता है कि जो शब्द उसने उसे बोलते हुए सुना, वे सत्य हैं, इत्यादि।—उसी रीति से, जैसे पोपमतीयों के झूठे चमत्कार वर्तमान में अज्ञानी भ्रमित लोगों के मनों में, नए नियम में घोषित अनेक बातों की सच्चाई का एक प्रबल विश्वास उत्पन्न कर सकते हैं। इस प्रकार जब पोपमतीय गिरजाघरों में मसीह की मूर्तियां, कुछ असाधारण अवसरों पर, पुरोहितों की चतुराई से लोगों को ऐसी प्रतीत कराई जाती हैं, मानो वे रोई हों, और ताजा लहू बहाया हो, और हिली हों, और ऐसे-ऐसे शब्द बोले हों; तो लोग सचमुच विश्वस्त हो सकते हैं कि यह स्वयं मसीह द्वारा किया गया चमत्कार है; और इससे विश्वस्त हो सकते हैं कि मसीह है, और उसकी मृत्यु और दुखों, और पुनरुत्थान, और स्वर्गारोहण, और जगत के वर्तमान शासन के विषय में जो उन्हें बताया गया है, वह सत्य है; क्योंकि वे इस चमत्कार को इन सब बातों के एक निश्चित प्रमाण के रूप में, और उनके एक प्रकार के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में देख सकते हैं। इन झूठे आश्चर्यकर्मों का वर्तमान में यही प्रभाव हो सकता है; यद्यपि उनकी सामान्य प्रवृत्ति यह कायल करना नहीं है कि यीशु मसीह शरीर में आया है, वरन अन्ततः नास्तिकता को बढ़ावा देना है।
यहां तक कि जो सम्बन्ध शैतान का टोन्हों से है, और उनका प्रायः उसकी तात्कालिक शक्ति का अनुभव करना, उन्हें धर्म के कुछ सिद्धान्तों की सच्चाई का कायल करने की प्रवृत्ति रखता है; विशेष रूप से एक अदृश्य जगत, या आत्माओं के जगत की वास्तविकता का, सदूकियों के सिद्धान्त के विपरीत। शैतान के प्रभाव की सामान्य प्रवृत्ति भ्रम है: परन्तु फिर भी वह अपने झूठों में कुछ सच्चाई मिला सकता है, कि उसके झूठ इतनी सरलता से पकड़ में न आएं।
ऐसे अनेक लोग हैं, जो एक नकली विश्वास से भ्रमित हैं, जो उनकी कल्पना पर उस रीति से बने प्रभावों से उत्पन्न है, जिसकी अभी बात की गई है। वे कहते हैं कि वे जानते हैं कि परमेश्वर है, क्योंकि उन्होंने उसे देखा है; वे जानते हैं कि मसीह परमेश्वर का पुत्र है, क्योंकि उन्होंने उसे उसकी महिमा में देखा है; वे जानते हैं कि मसीह पापियों के लिये मरा, क्योंकि उन्होंने उसे क्रूस पर लटकते, और उसके घावों से लहू बहते देखा है; वे जानते हैं कि स्वर्ग और नरक हैं, क्योंकि उन्होंने नरक में शापित प्राणों की दुर्दशा, और स्वर्ग में संतों और स्वर्गदूतों की महिमा देखी है (जिसका अर्थ है उनकी कल्पना पर प्रबल रीति से अंकित कुछ बाहरी प्रतिरूप); वे जानते हैं कि पवित्रशास्त्र परमेश्वर का वचन है, और विशेष रूप से ऐसी-ऐसी प्रतिज्ञाएं उसका वचन हैं, क्योंकि उन्होंने उसे उन्हें अपने से कहते सुना है, वे अचानक और तत्काल परमेश्वर की ओर से उनके मनों में आ गईं, बिना इसमें उनका कोई हाथ हुए।
3. व्यक्तियों को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि धर्म की बातों की सच्चाई में उनका विश्वास बहुत बढ़ गया है, जबकि इसका आधार केवल यह विश्वास है, जो उन्हें इन बातों में अपने हिस्से के विषय में प्राप्त हुआ है। वे पहले, किसी न किसी साधन से, यह विश्वास ग्रहण कर लेते हैं, कि यदि मसीह और स्वर्ग है, तो वे उनके हैं; और यह उन्हें उनकी सच्चाई के पक्ष में और अधिक पूर्वाग्रहित करता है।
जब वे धर्म की महान और महिमामय बातें सुनते हैं, तो यह इस धारणा के साथ होता है, कि ये सब बातें उनकी हैं; और इसलिये सरलता से विश्वस्त हो जाते हैं कि वे सत्य हैं; वे यह मानते हैं कि उनका सत्य होना उनके बड़े हित में है। यह अत्यन्त स्पष्ट है कि मनुष्यों के हित और झुकावों का उनके निर्णयों पर कितना प्रबल प्रभाव है। जबकि एक स्वाभाविक मनुष्य यह सोचता है, कि यदि स्वर्ग और नरक हैं, तो उत्तरार्ध, न कि पूर्वार्ध, उसका है;
V. सच्चे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ बुद्धि का एक युक्तिसंगत और आत्मिक… तब उसे कठिनाई से यह विश्वास होगा कि स्वर्ग या नरक है: परन्तु जब वह यह विश्वस्त हो जाता है, कि नरक केवल अन्य लोगों का है, न कि उसका, तब वह सरलता से नरक की वास्तविकता को मान सकता है, और उससे बचने के साधनों की उपेक्षा में औरों की मूर्खता और मूढ़ता पर चिल्ला सकता है: और यह विश्वस्त होकर कि वह परमेश्वर की सन्तान है, और परमेश्वर ने उससे स्वर्ग की प्रतिज्ञा की है, वह इसकी वास्तविकता के विश्वास में दृढ़ प्रतीत हो सकता है, और इसे नकारनेवाले उस अविश्वास के विरुद्ध बड़ा उत्साह रख सकता है।
परन्तु मैं अनुग्रहमय मनोभावों के एक और पृथककारी चिन्ह की ओर आगे बढ़ता हूं।
VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है।
VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है। सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता वह बोध है, जो एक मसीही को अपनी पूर्ण अपर्याप्तता, तुच्छता, और घृणितता का होता है, जिसके साथ हृदय की एक अनुरूप अवस्था भी होती है।
व्यवस्था-आधारित और सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के बीच एक भेद किया जाना चाहिए। पहली वह है जिसके अधीन मनुष्य तब भी हो सकते हैं, जब वे अभी स्वाभाविक दशा में हों, और उनमें कोई अनुग्रहमय मनोभाव न हो; दूसरी सच्चे संतों के लिये विशिष्ट है: पहली परमेश्वर के आत्मा के सामान्य प्रभाव से आती है, जो स्वाभाविक सिद्धान्तों की, और विशेष रूप से स्वाभाविक विवेक की, सहायता करता है; दूसरी परमेश्वर के आत्मा के विशेष प्रभावों से आती है, जो अलौकिक और दिव्य सिद्धान्तों को रोपित और सक्रिय करता है: पहली मन को धर्म की बातों का, उनके स्वाभाविक गुणों और लक्षणों के विषय में, और विशेष रूप से परमेश्वर के स्वाभाविक सिद्धगुणों का, जैसे उसकी महानता, भयानक प्रताप, इत्यादि, जो सीनै पर्वत पर व्यवस्था दिए जाते समय इस्राएल की मण्डली पर प्रगट किए गए थे, अधिक बोध पाने में सहायता मिलने से आती है; दूसरी दिव्य वस्तुओं की उनके नैतिक गुणों में अलौकिक सुन्दरता के बोध से आती है: पहली में, परमेश्वर की भयानक महानता, और स्वाभाविक सिद्धगुणों, और उसकी व्यवस्था की कठोरता का बोध, मनुष्यों को कायल करता है कि वे अत्यन्त पापी, और दोषी हैं, और परमेश्वर के क्रोध के अधीन हैं, जैसे न्याय के दिन दुष्ट मनुष्यों और दुष्टात्माओं के साथ होगा; परन्तु वे पाप के कारण अपनी घृणितता को नहीं देखते; वे पाप के घृणित स्वभाव को नहीं देखते; इसका बोध सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता में, परमेश्वर की पवित्रता और नैतिक सिद्धता की सुन्दरता के प्रकाशन द्वारा दिया जाता है। व्यवस्था-आधारित दीनता में, मनुष्यों को यह बोध कराया जाता है कि वे महान और भयानक परमेश्वर के सामने छोटे और कुछ भी नहीं हैं, और वे बिगड़ गए हैं, और अपनी सहायता करने में सर्वथा असमर्थ हैं; जैसा न्याय के दिन दुष्ट मनुष्यों के साथ होगा: परन्तु उनमें हृदय की अनुरूप अवस्था नहीं होती, जो अपने आपको नम्र बनाने, और केवल परमेश्वर को महान बनाने की प्रवृत्ति में निहित हो; यह प्रवृत्ति केवल सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता में दी जाती है, परमेश्वर की पवित्र सुन्दरता के प्रकाशन द्वारा हृदय को जीतकर, और उसके झुकाव को बदलकर: व्यवस्था-आधारित दीनता में, विवेक कायल होता है; जैसे न्याय के दिन सब के विवेक सबसे पूर्ण रूप से होंगे; परन्तु क्योंकि उसमें कोई आत्मिक समझ नहीं है, इच्छा नहीं झुकती, न झुकाव बदलता है: यह केवल सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता में होता है। व्यवस्था-आधारित दीनता में, मनुष्य अपनी सहायता करने की निराशा तक लाए जाते हैं; सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता में, वे स्वेच्छा से अपने आपको नकारने और त्यागने तक लाए जाते हैं: पहली में, वे दबा दिए जाते हैं और भूमि पर गिराए जाते हैं; दूसरी में, वे मधुरता से समर्पित होने, और स्वतन्त्रतापूर्वक तथा आनन्द के साथ परमेश्वर के चरणों में गिर जाने के लिये लाए जाते हैं।
व्यवस्था-आधारित दीनता में कोई आत्मिक भलाई नहीं है, सच्चे सद्गुण के स्वभाव की कोई वस्तु नहीं है; जबकि सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता वह है जिसमें मसीही अनुग्रह की उत्कृष्ट सुन्दरता बहुत कुछ निहित है। व्यवस्था-आधारित दीनता उपयोगी है, सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता की ओर एक साधन के रूप में; जैसे धर्म की बातों का सामान्य ज्ञान आत्मिक ज्ञान की ओर एक आवश्यक साधन है। मनुष्य व्यवस्था-आधारित रीति से दीन किए जा सकते हैं और उनमें कोई दीनता न हो: जैसे न्याय के दिन दुष्ट पूरी तरह कायल होंगे कि उनमें कोई धार्मिकता नहीं है, वरन वे सर्वथा पापी, और अत्यन्त दोषी हैं, और न्यायसंगत रीति से अनन्त दण्ड के अधीन हैं, और पूर्णतः बोध करेंगे
VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है। अपनी स्वयं की असहायता का, अपने हृदयों के अभिमान के तनिक भी मरण के बिना: परन्तु सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता का सार ऐसी दीनता में निहित है, जो एक ऐसे प्राणी के योग्य है, जो स्वयं में अत्यन्त पापी है, अनुग्रह की व्यवस्था के अधीन; जो अपने आपको तुच्छ आंकने में निहित है, कि वह स्वयं में कुछ भी नहीं है, और सर्वथा तिरस्करणीय और घृणित है; जिसके साथ अपने आपको ऊंचा उठाने की प्रवृत्ति का मरण, और अपनी स्वयं की महिमा का स्वतन्त्र त्याग होता है।
यह सच्चे धर्म में एक महान और सबसे अनिवार्य बात है। सुसमाचार की सारी संरचना, और नई वाचा से सम्बन्धित हर वस्तु, और परमेश्वर के पतित मनुष्य के प्रति सारे व्यवहार, इस प्रभाव को मनुष्यों के हृदयों में उत्पन्न करने के लिये ठहराए गए हैं। जो इससे रहित हैं, उनमें कोई सच्चा धर्म नहीं है, चाहे वे कैसा भी अंगीकार क्यों न करें, और उनके धार्मिक मनोभाव कितने भी ऊंचे क्यों न हों: हबक्कूक 2:4, "देख, जो अभिमानी है उसका मन सीधा नहीं; परन्तु धर्मी अपने विश्वास के द्वारा जीवित रहेगा"; अर्थात्, वह परमेश्वर की धार्मिकता और अनुग्रह पर अपने विश्वास से जीवित रहेगा, न कि अपनी भलाई और उत्कृष्टता से। परमेश्वर ने अपने वचन में प्रचुरता से यह प्रगट किया है, कि अपने संतों में उसकी विशेष दृष्टि इसी पर है, और इसके बिना उसे कुछ भी ग्रहणयोग्य नहीं है। भजन संहिता 34:18, "यहोवा टूटे मनवालों के निकट रहता है, और खेदित मनवालों को बचाता है।" भजन संहिता 51:17, "परमेश्वर के ग्रहणयोग्य बलिदान तो टूटा हुआ मन है; हे परमेश्वर तू टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ न जानेगा।" भजन संहिता 138:6, "यद्यपि यहोवा महान है तौभी वह दीन जन पर दृष्टि करता है।" नीतिवचन 3:34, "वह नम्र लोगों पर अनुग्रह करता है।" यशायाह 57:15, "क्योंकि जो अति महान और अनादिकाल से विराजमान है, जिसका नाम पवित्र है, वह यों कहता है, मैं ऊंचे और पवित्रस्थान में रहता हूं, और उसके संग भी रहता हूं जो खेदित और नम्र मन का हो, कि मैं नम्र मनवालों के मन को हियाव दूं, और खेदित मनवालों के मन में जीवन डालूं।" यशायाह
66:1, 2, "यहोवा यों कहता है, स्वर्ग मेरा सिंहासन, और पृथ्वी मेरे पांवों की चौकी है: परन्तु जो दीन और खेदित मन का है, और मेरे वचन से थरथराता है, उसी पर मैं दृष्टि करूंगा।" मीका 6:8, "हे मनुष्य, उस ने तुझे बताया है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तेरा
परमेश्वर तुझ से क्या चाहता है? इसके सिवाय कुछ नहीं, कि तू न्याय से काम करे, और अनुग्रह से प्रेम रखे, और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चले?"
मत्ती 5:3, "धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।" मत्ती 18:3, 4, "मैं तुम से सच कहता हूं, कि यदि तुम न फिरो, और बालकों के समान न बनो, तो स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे। इसलिये जो कोई अपने आप को इस बालक की नाईं दीन करे, वही स्वर्ग के राज्य में बड़ा है।" मरकुस 10:15, "मैं तुम से सच कहता हूं,
जो कोई परमेश्वर के राज्य को बालक की नाईं ग्रहण न करे, वह उस में प्रवेश करने न पाएगा।"
शतपति, जिसका वृत्तान्त हमें मिलता है, लूका 7, ने अंगीकार किया कि वह इस योग्य नहीं कि मसीह उसकी छत के नीचे आए, और कि वह स्वयं उसके पास आने के भी योग्य नहीं। देखिए उस स्त्री के मसीह के पास आने की रीति, जो एक पापिन थी, लूका 7:37, इत्यादि: "और देखो, उस नगर में एक स्त्री थी, जो पापिन थी, और यह जानकर, कि वह उस फरीसी के घर में भोजन करने बैठा है, संगमरमर के पात्र में इत्र लाई, और उसके पीछे उसके पांवों के पास खड़ी हो, रोती हुई उसके पांव आंसुओं से भिगोने और अपने सिर के बालों से पोंछने लगी।" उसने अपने सिर के बाल, जो एक स्त्री का स्वाभाविक मुकुट और गौरव हैं (1 कुरिन्थियों 11:15), मसीह के पांव पोंछने के लिये बहुत उत्तम समझने में सन्देह न किया। यीशु ने अत्यन्त अनुग्रहपूर्वक उसे ग्रहण किया, और उससे कहा, "तेरे विश्वास ने तुझे बचाया है; कुशल से चली जा।" कनान की स्त्री ने मसीह के सामने समर्पण किया, VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है। उसके इस कहने पर, "बालकों की रोटी लेकर कुत्तों के आगे डालना अच्छा नहीं," और मानो यह स्वीकार किया कि वह कुत्ता कहलाने योग्य है; जिस पर मसीह ने उससे कहा, "हे नारी, तेरा विश्वास बड़ा है; जैसा तू चाहती है, तेरे लिये वैसा ही हो," मत्ती 15:26, 27, 28। उड़ाऊ पुत्र ने कहा, "मैं उठकर अपने पिता के पास जाऊंगा, और उस से कहूंगा, हे पिता, मैं ने स्वर्ग के विरुद्ध और तेरी दृष्टि में पाप किया है, अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊं; मुझे अपने मजदूरों में से एक की नाईं रख ले," लूका 15:18, इत्यादि। देखिए लूका 18:9, इत्यादि भी: "फिर उस ने कितनों से जो अपने पर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं, और औरों को तुच्छ जानते थे, यह दृष्टान्त कहा, इत्यादि। वह चुंगी लेनेवाला दूर खड़ा हुआ, आंखें उठाकर स्वर्ग की ओर देखना भी नहीं चाहता था, परन्तु अपनी छाती पीट पीटकर कहता था, हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर। मैं तुम से कहता हूं, कि यह मनुष्य दूसरे की नाईं नहीं परन्तु धर्मी ठहरकर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।" मत्ती 28:9, "और वे उसके पास आईं और उसके पांव पकड़कर उसे दण्डवत् किया।" कुलुस्सियों 3:12, "परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं, दीनता को पहिन लो।" यहेजकेल 20:41, 42, "मैं सुखदायक सुगन्ध जानकर तुम्हें ग्रहण करूंगा, जब मैं तुम्हें लोगों में से निकाल लाऊंगा, इत्यादि। और वहां तुम अपने मार्गों, और अपने उन सब कामों को, जिन में तुम अशुद्ध हुए हो, स्मरण करोगे, और अपनी उन सब बुराइयों के कारण जो तुम ने की हैं, अपनी ही दृष्टि में अपने आप से घृणा करोगे।" अध्याय 36:26, 27, 31, "मैं तुम्हें नया मन भी दूंगा—और अपना आत्मा तुम्हारे भीतर समवाऊंगा, और ऐसा करूंगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे, इत्यादि। तब तुम अपने बुरे मार्गों, और अपने कामों को जो अच्छे नहीं थे, स्मरण करोगे, और अपने अधर्म के कामों और अपने घृणित कामों के कारण अपनी ही दृष्टि में अपने आप से घृणा करोगे।" अध्याय 16:63, "जिस से तू स्मरण करे, और लज्जित हो, और अपनी सब निन्दा के कारण फिर कभी अपना मुंह न खोले, जब मैं तेरे उन सब कामों के लिये तुझ से प्रसन्न हो जाऊंगा जो तू ने किए हैं, प्रभु यहोवा की यही वाणी है।" अय्यूब 42:6, "इसलिये मैं अपने आप से घृणा करता हूं, और मिट्टी और राख में पश्चाताप करता हूं।"
इसलिए, जैसा हमें सच्चे धर्म की प्रकृति को परखने में, और अपनी धार्मिक योग्यताओं और अवस्था को जाँचने में, पवित्रशास्त्र को ही अपना नियम बनाना चाहिए; वैसे ही हमारे लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि हम इस दीनता को सच्चे मसीही धर्म से संबंधित सबसे अनिवार्य बातों में से एक मानकर देखें।56 यह आत्म-त्याग के महान मसीही कर्तव्य का प्रमुख अंग है। वह कर्तव्य दो बातों में निहित है, अर्थात्, पहला, मनुष्य का अपनी सांसारिक अभिलाषाओं का त्याग करना, और सब सांसारिक वस्तुओं और भोगविलासों को छोड़ देना तथा उनका परित्याग करना; और दूसरा, अपने स्वाभाविक आत्म-गौरव का त्याग करना, और अपनी गरिमा तथा महिमा का त्याग करके स्वयं को रिक्त कर देना; जिससे वह स्वतंत्रतापूर्वक और अपने हृदय की गहराई से, मानो अपने आप को त्याग दे, और अपने आप को मिटा दे। इस प्रकार मसीही व्यक्ति सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता में करता है। और यह उत्तरार्ध सबसे महान
56 कैल्विन अपने Institutes में, पुस्तक 2, अध्याय 2, अनुच्छेद 11 में कहते हैं, “मुझे क्रिसोस्टम की उस उक्ति से सदैव अत्यंत प्रसन्नता हुई है, ‘हमारे दर्शनशास्त्र की नींव दीनता है;’ और अगस्तीन की उस उक्ति से और भी अधिक प्रसन्नता हुई है: ‘जैसे,’ वे कहते हैं, ‘जब वाक्पटुता के नियमों के विषय में वक्ता से पूछा गया कि पहली बात क्या है, तो उसने उत्तर दिया, उच्चारण; दूसरी क्या है, तो फिर उत्तर दिया, उच्चारण; तीसरी क्या है, तो तब भी उसने उत्तर दिया, उच्चारण। इसी प्रकार यदि आप मुझसे मसीही धर्म के उपदेश के विषय में पूछें, तो मैं उत्तर दूँगा, पहला, दूसरा, और तीसरा, और सदैव, दीनता।’”
6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं। और आत्म-त्याग का सबसे कठिन अंग है: यद्यपि ये सदैव साथ-साथ चलते हैं, और जहाँ एक सच्चाई से नहीं होता, वहाँ दूसरा भी कभी सच्चाई से नहीं होता; तथापि स्वाभाविक मनुष्य पहले के बहुत निकट पहुँच सकते हैं, परन्तु दूसरे के निकट उतना नहीं। बहुत से वैरागियों और एकांतवासियों ने संसार के धन, सुखभोग, और सामान्य भोगविलासों का त्याग किया है (यद्यपि बिना किसी सच्चे मर्दन के), जो अपनी गरिमा और अपनी धार्मिकता का त्याग करने से बहुत दूर थे; उन्होंने मसीह के लिये कभी अपने आप का त्याग नहीं किया, बल्कि केवल एक वासना को बेचकर दूसरी को खिलाया, एक पशु-सदृश वासना को बेचकर एक शैतानी वासना को पालपोसकर बड़ा किया; और इस प्रकार वे कभी बेहतर नहीं हुए, बल्कि उनका अंत उनके आरंभ से भी बुरा हुआ; उन्होंने एक काले शैतान को निकालकर सात श्वेत शैतानों को भीतर आने दिया, जो देखने में तो अधिक सुंदर थे परन्तु पहले से भी बुरे थे। यह अवर्णनीय है, और लगभग अकल्पनीय है, कि मनुष्य में स्वाभाविक रूप से स्व-धार्मिकता और आत्म-गौरव की प्रवृत्ति कितनी प्रबल है; और वह उसे पालने-पोसने और तृप्त करने के लिये क्या-क्या नहीं करेगा और क्या-क्या नहीं सहेगा: और यहूदियों में एस्सेनियों और फरीसियों ने, और अंगीकार करनेवाले मसीहियों में पापिस्टों, अनेक पाषण्ड-सम्प्रदायों और उत्साहियों ने, और अनेक मुहम्मदियों ने, और पाइथागोरियन दार्शनिकों तथा अन्यजातियों में औरों ने, अन्य बातों में आभासी आत्म-त्याग में कैसे-कैसे लंबे कदम बढ़ाए हैं; और यह सब आत्मिक अभिमान या स्व-धार्मिकता के इस मोलेक को बलि चढ़ाने के लिये; और इसलिए कि उनके पास परमेश्वर के सामने और अपने साथी प्राणियों से ऊपर अपने आप को ऊँचा उठाने के लिये कुछ हो।
जिस दीनता का वर्णन किया गया है, उसमें वे सबसे शानदार कपटी, जो संसार के सामने मर्दन का सबसे भव्य प्रदर्शन करते हैं, और उच्च धार्मिक मनोभाव दिखाते हैं, सर्वथा असफल रहते हैं। यदि पवित्रशास्त्र में इस पर सच्चे अनुग्रह की एक सबसे अनिवार्य बात के रूप में इतना बल न दिया गया होता, तो कोई यह सोचने के लिये ललचा जाता कि अनेक अन्यजाति दार्शनिक सचमुच अनुग्रहमय थे, जिनमें अनेक सद्गुणों की इतनी उज्ज्वल झलक थी, और साथ ही महान ज्योतियाँ, और मन के आन्तरिक उत्साह और उत्थान भी थे, मानो वे सचमुच दिव्य अवतरणों और स्वर्गीय संचारों के भागी हों।57 यह सच है कि अनेक कपटी
57 यद्यपि पाइथागोरियन लोग इस प्रकार यहूदी रहस्यमय ज्ञान के लिये, और अनेक नैतिक तथा स्वाभाविक उपलब्धियों के लिये भी प्रसिद्ध थे, तथापि वे डींग मारने और अभिमान से मुक्त नहीं थे; जो वास्तव में सब दार्शनिकों में सबसे अधिक फैला हुआ, और मानो सहज दुर्गुण था; परन्तु विशेष रूप से पाइथागोरियनों में। इसी प्रकार होर्नियस अपने Hist. Philosoph. पुस्तक 3, अध्याय 11 में कहता है। पाइथागोरियनों का आचरण डींग मारने से मुक्त नहीं था। वे सब ऐसे थे जो अपनी उत्कृष्टताओं की भावना और प्रशंसा में भरपूर थे, और डींग मारने में लगभग निर्लज्जता और उद्दंडता की सीमा तक पहुँचे हुए थे, जैसा कि महान हाइन्सियस ने Horat. पर अपनी टिप्पणी में सही देखा है। इस प्रकार वस्तुतः अभिमानी स्वभाव अपनी ही आग की चिंगारियों में विचरण करने में आनन्द लेता है। और यद्यपि इन प्राचीन दार्शनिकों में से अनेक अपनी स्वयं की ज्योतियों और उष्णताओं के बल से, कुछ साधारण आत्मिक उत्थानों और उभारों के साथ (सम्भवतः आत्मा की कुछ असाधारण, यद्यपि विशेष और उद्धारक नहीं, सहायता से), अनेक स्थूल दुर्गुणों का त्याग कर सकते थे; तथापि वे सब आत्मिक अभिमान की उस दुःखद और शापित अथाह गर्त में गहराई से डूबे हुए थे, यहाँ तक कि उनकी सब स्वाभाविक, नैतिक और दार्शनिक उपलब्धियाँ उनके हृदयों की इस नरक-जनित महामारी को खिलातीं, पोषण देतीं, सशक्त करतीं, और उसे अत्यंत जड़ जमाई हुई बना देती थीं। हाँ, उनमें से जो सबसे अधिक विनम्र प्रतीत होते थे, जैसे अकादमीवासी, जो यह दावा करते थे कि वे कुछ नहीं जानते, और सिनिक, जो शब्दों और वेशभूषा दोनों में दूसरों के अभिमान की कड़ी निन्दा करते थे, फिर भी वे स्वयं सबसे कुख्यात और स्पष्ट अभिमान से भरपूर थे। आत्मिक अभिमान की यह विषैली जड़, स्रोत और महामारी, भ्रष्ट स्वभाव के लिये इतनी सहज और नैतिक रूप से अनिवार्य है; विशेष रूप से जहाँ कोई
6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं। दीनता का, तथा अन्य अनुग्रहों का भी, बड़ा दिखावा करते हैं; और बहुधा ऐसा कुछ भी नहीं होता जिसका वे इससे ऊँचा दावा करते हों। वे वचन और व्यवहार में दीनता का बड़ा प्रदर्शन करने का प्रयत्न करते हैं; परन्तु सामान्यतः वे इसमें भद्दा काम करते हैं, यद्यपि अपनी ही दृष्टि में यह भव्य काम होता है। वे यह पता नहीं लगा पाते कि दीन वचन और व्यवहार क्या होता है, या कैसे बोलें और कैसे कार्य करें कि उनके कहने और करने में सचमुच मसीही दीनता की सुगंध हो: वह मीठी, दीन शैली और मुखमुद्रा उनकी कला से परे है, क्योंकि वे आत्मा के द्वारा संचालित नहीं होते, और न ही अपने भीतर के दीन आत्मा के बल से पवित्र दीनता के अनुकूल व्यवहार की ओर स्वाभाविक रूप से निर्देशित होते हैं। और इसलिये उनमें से अनेकों के पास इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं रह जाता, कि वे बहुत करके यह घोषित करते रहें कि वे दीन हैं, और यह बताते रहें कि वे अमुक-अमुक समयों पर धूल में कैसे दीन किये गये, और अपने विषय अत्यंत बुरे शब्दों का भरपूर प्रयोग करें; जैसे, “मैं सब संतों में सबसे छोटा हूँ, मैं एक दीन नीच प्राणी हूँ, मैं तनिक भी दया के योग्य नहीं, कि परमेश्वर मुझ पर दृष्टि करे! ओह, मेरा हृदय कैसा भयानक दुष्ट है! मेरा हृदय शैतान से भी बुरा है! ओह, मेरा यह शापित हृदय,” आदि। ऐसे वचन बहुधा प्रयोग किये जाते हैं, न तो टूटे हुए हृदय से, न आत्मिक विलाप से, न उस स्त्री के आँसुओं के साथ जिसने यीशु के पाँव धोए थे, न इस रीति से कि “स्मरण करके लज्जित हों, और अपने लज्जा के कारण फिर कभी अपना मुँह न खोलें, जब परमेश्वर शान्त हो जाए,” जैसा यहेजकेल में वाक्यांश है,
यहेजकेल 16:63; परन्तु हल्की-फुल्की शैली से, मुखमुद्रा पर मुस्कान लिये हुए, या फरीसी बनावटीपन के साथ: और हमें उनकी अपनी ही बात के भरोसे यह मानना पड़ता है कि वे इतने दीन हैं, और अपने आप को इतना नीच देखते हैं; क्योंकि उनके आचरण और कार्यों की रीति में दीनता की किसी भी सुगंध का कुछ भी प्रकट नहीं होता। ऐसे बहुत हैं जो अपनी नीचता के वचनों से भरपूर हैं, फिर भी अपेक्षा रखते हैं कि दूसरे उन्हें अपने अधिकार के रूप में उत्कृष्ट और तेजस्वी संत मानें; और किसी के लिये इसके विपरीत तनिक भी संकेत करना, या उनके प्रति ऐसा व्यवहार करना जो उन्हें मसीहियों में से किसी प्रमुख के रूप में न देखे, खतरनाक है।
ऐसे बहुत हैं जो बहुत करके अपने दुष्ट हृदयों, अपनी बड़ी त्रुटियों और निकम्मेपन के विरुद्ध चिल्लाते रहते हैं, और ऐसे बोलते हैं मानो वे अपने आप को संतों में सबसे नीच मानते हों; परन्तु यदि कोई सेवक निजी रूप से गम्भीरता से उन्हें यही बातें कहे, और यह प्रकट करे कि उसे भय है कि वे बहुत निम्न और दुर्बल मसीही हैं, और यह सोचे कि उन्हें अपने बड़े बंजरपन और निकम्मेपन पर, और अनेकों से इतना पीछे रह जाने पर, गम्भीरतापूर्वक विचार करने का कारण है, तो यह उनसे पचाया न जा सकेगा; वे अपने आप को अत्यंत ठेस पहुँचाई गई मानेंगे; और उनके भीतर ऐसे सेवक के विरुद्ध एक जड़ जमाए हुए पूर्वाग्रह का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
कुछ ऐसे हैं जो व्यवस्था-आधारित सिद्धान्तों, व्यवस्था-आधारित प्रचार, और व्यवस्था-आधारित आत्मा के विरुद्ध बहुत बोलते हैं, परन्तु जिस बात के विरुद्ध वे बोलते हैं उसे वे बहुत कम समझते हैं। व्यवस्था-आधारित आत्मा वह जितना समझते हैं उससे कहीं अधिक सूक्ष्म वस्तु है; यह उनके लिये बहुत ही सूक्ष्म है। यह उनके हृदयों में छिपी रहती है, कार्य करती है, और प्रबल रहती है, और वे स्वयं इसके सबसे प्रकट रूप से दोषी होते हैं, ठीक उसी समय जब स्वाभाविक, नैतिक, या दार्शनिक उत्कृष्टता इसी को पोषण देती है। इसीलिए, ऑगस्टीन ने ठीक ही यह निर्णय दिया कि ये सब दार्शनिक सद्गुण केवल शानदार पाप हैं। गेल का Court of the Gentiles, भाग 2, पुस्तक 2, अध्याय 10, अनुच्छेद 17।
6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं। वे इसी के विरुद्ध कड़ी निन्दा कर रहे होते हैं। जहाँ तक मनुष्य अपने आप से, और अपनी धार्मिकता तथा भलाई से, चाहे किसी भी रूप या आकार में हो, रिक्त नहीं हुआ है, वहाँ तक वह व्यवस्था-आधारित आत्मा का है। मनुष्य की अपनी धार्मिकता, नैतिकता, पवित्रता, मनोभाव, अनुभव, विश्वास, दीनता, या किसी भी प्रकार की भलाई के अभिमान की आत्मा, व्यवस्था-आधारित आत्मा है। पतन से पूर्व आदम के लिये व्यवस्था-आधारित होना कोई अभिमान नहीं था; क्योंकि उसकी परिस्थितियों के कारण, वह अपनी धार्मिकता के द्वारा ग्रहण किये जाने की खोज कर सकता था। परन्तु एक पतित, पापी प्राणी में व्यवस्था-आधारित आत्मा, आत्मिक अभिमान के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकती; और इसके विपरीत भी, आत्मिक रूप से अभिमानी आत्मा एक व्यवस्था-आधारित आत्मा है। संसार में ऐसा कोई जीवित मनुष्य नहीं जो अपने अनुभवों और प्रकाशनों के अहंकार से फूला हुआ हो, और उनके कारण अपनी ही दृष्टि में चमकता हो, परन्तु वह अपने अनुभवों पर भरोसा न रखता हो, और उन्हें अपनी धार्मिकता न बनाता हो; चाहे वह दीन शब्दों का प्रयोग करे, और अपने अनुभवों की बात इस रीति से करे मानो वे परमेश्वर के उसके लिये किये गये महान कार्य हों, और सम्भव है कि वह दूसरों से उनके लिये परमेश्वर की महिमा करने का आह्वान भी करे; फिर भी जो अपने अनुभवों पर घमण्ड करता है, वह अपने आप को कुछ मानता है, मानो उसके अनुभव उसकी कोई गरिमा हों। और यदि वह उन्हें अपनी गरिमा मानता है, तो वह अनिवार्यतः यह भी सोचता है कि परमेश्वर भी उन्हें वैसे ही देखता है; क्योंकि वह अनिवार्यतः अपनी ही राय को उनके विषय सत्य मानता है; और फलस्वरूप निर्णय करता है कि परमेश्वर भी उन्हें वैसे ही देखता है जैसे वह स्वयं देखता है; और इस प्रकार वह अनिवार्यतः यह कल्पना करता है कि परमेश्वर उसके अनुभवों को उसमें एक गरिमा के रूप में देखता है, जैसे वह स्वयं उन्हें देखता है; और यह कि वह परमेश्वर की दृष्टि में उतना ही चमकता है जितना वह अपनी ही दृष्टि में चमकता है। और इस प्रकार वह उस पर भरोसा रखता है जो उसमें अन्तर्निहित है, ताकि वह परमेश्वर की दृष्टि में चमके, और परमेश्वर के सामने अनुशंसित हो: और इसी प्रोत्साहन के साथ वह प्रार्थना में परमेश्वर के सामने जाता है; और यही उसे परमेश्वर से बहुत कुछ आशा रखने पर उकसाता है; और यही उसे यह सोचने पर उकसाता है कि मसीह उससे प्रेम करता है, और वह उसे अपनी धार्मिकता पहनाने को तैयार है; क्योंकि वह मान लेता है कि मसीह उसके अनुभवों और अनुग्रहों से प्रसन्न है। और यह अपनी ही धार्मिकता पर जीने की उच्च मात्रा है; और ऐसे लोग नरक के राजमार्ग पर हैं। बेचारे भ्रमित अभागे, जो सोचते हैं कि वे परमेश्वर की दृष्टि में इतने चमकीले दिखते हैं, जबकि वे उसकी नाक में धुआँ हैं, और उनमें से अनेक उसकी दृष्टि में सदोम के सबसे अशुद्ध पशु से भी अधिक घृणित हैं, जो धर्म का कोई दावा भी नहीं करता! इनके समान करना ही, अनुभवों की सच्ची धारणा के अनुसार, अनुभवों पर जीना है; न कि उनके समान करना जो आत्मिक अनुभवों का उपयोग केवल अनुग्रह की अवस्था के प्रमाण के रूप में करते हैं, और इस रीति से उनसे आशा और शान्ति प्राप्त करते हैं।
एक प्रकार के लोग हैं, जो सचमुच कार्यों की भरपूर निन्दा करते हैं, और कार्यों के विपरीत विश्वास की भरपूर प्रशंसा करते हैं, और व्यवस्था-आधारित आत्मावालों के विपरीत अपने आप को बहुत करके सुसमाचार-सम्बन्धी व्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत करते हैं, और मसीह और सुसमाचार, तथा मुफ्त अनुग्रह के मार्ग को आगे बढ़ाने का भला प्रदर्शन करते हैं; जो वास्तव में मुफ्त अनुग्रह के सुसमाचार-मार्ग के सबसे बड़े शत्रुओं में से, और शुद्ध दीन मसीही धर्म के सबसे खतरनाक विरोधियों में से कुछ हैं।
एक बनावटी बड़ी दीनता है, और व्यवस्था के प्रति मरा होना, और आत्म से रिक्त होना, जो संसार में सबसे बड़ी और सबसे फूली हुई बातों में से एक है। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अपने हृदयों पर व्यवस्था के पूर्ण कार्य के अनुभव का, और कार्यों से पूर्णतः हटाए जाने का, बड़ा दावा किया है; जिनके आचरण में मैंने जितने भी देखने का अवसर पाया है उन सबमें सबसे अधिक स्व-धार्मिकता की आत्मा की सुगंध पाई है। और कुछ ऐसे हैं जो अपने आप को पूर्णतः
6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं। अपने आप से रिक्त हुआ मानते हैं, और यह विश्वास रखते हैं कि वे धूल में गिराए गए हैं, वे अपनी ही दीनता की महिमा से जितना भर सकते हैं उतना भरे हुए हैं, और अपनी ही दीनता के ऊँचे विचार के साथ स्वर्ग तक उठाए हुए हैं। उनकी दीनता एक फूली हुई, आत्म-अहंकारी, आत्मविश्वासी, दिखावटी, शोरगुल भरी, दावा करनेवाली दीनता है। ऐसा प्रतीत होता है कि आत्मिक अभिमान का स्वभाव ही यह है कि वह मनुष्यों को अपनी दीनता के विषय अहंकारी और दिखावटी बना देता है। यह उस मनुष्यों की सन्तानों में अभिमान के पहलौठे में प्रकट होता है, जो अपने आप को पवित्रता कहलाना चाहता है, अर्थात् वह पाप का मनुष्य, जो अपने आप को हर उस वस्तु से ऊपर उठाता है जो परमेश्वर कहलाती या पूजी जाती है; वह अपने आप को दासों का दास कहता है; और दीनता का प्रदर्शन करने के लिये, अपने अभिषेक के समय अनेक निर्धन पुरुषों के पाँव धोता है।
लोगों का सचमुच अपने आप से रिक्त होना, और आत्मा में दीन होना, और हृदय से टूटा होना, एक बिलकुल भिन्न बात है, और इसके प्रभाव भी वैसे नहीं जैसे बहुत से लोग कल्पना करते हैं। यह चकित करनेवाली बात है कि इस विषय में कितने लोग अपने आप को कितना बड़ा धोखा देते हैं, अपने आप को सबसे दीन कल्पना करते हुए, जब वे सबसे अधिक अभिमानी होते हैं, और उनका आचरण वास्तव में सबसे उद्दंड होता है। मनुष्य के हृदय की छल-कपटता किसी और बात में इतनी प्रकट नहीं होती जितनी इस आत्मिक अभिमान और स्व-धार्मिकता में होती है। शैतान की चतुराई इसी पाप के विषय लोगों को संभालने में अपनी पराकाष्ठा पर प्रकट होती है। और सम्भवतः इसका एक कारण यह हो कि यहाँ उसे सबसे अधिक अनुभव है; वह इसके भीतर आने का मार्ग जानता है; वह इसके गुप्त स्रोतों से परिचित है: यह उसका अपना ही पाप था।—अनुभव प्राणों को, चाहे भलाई में हो चाहे बुराई में, ले जाने में बहुत बड़ी सहायता देता है।
परन्तु यद्यपि आत्मिक अभिमान इतना सूक्ष्म और गुप्त अधर्म है, और सामान्यतः बड़ी दीनता के बहाने के अन्दर प्रकट होता है; तथापि दो बातें हैं जिनके द्वारा इसे (सम्भवतः सार्वभौमिक रूप से और निश्चय ही) पहचाना और अन्य से भिन्न किया जा सकता है।
पहली बात यह है; जो इस रोग के प्रभाव में है, वह दूसरों से अपनी तुलना करते हुए, धर्म में अपनी उपलब्धियों के विषय ऊँचा विचार रखने की ओर झुका रहता है। उसके लिये यह स्वाभाविक है कि वह अपने विषय यह सोचने लगे कि वह एक विशिष्ट संत है, कि वह संतों में बहुत ऊँचा है, और उसके पास विशिष्ट रूप से अच्छे और महान अनुभव हैं। उसके हृदय की गुप्त भाषा यही है: लूका 18:11, “हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं कि मैं अन्य मनुष्यों की नाईं नहीं।” और यशायाह 65:5, “मैं तुझ से पवित्र हूं।” इसलिये ऐसे लोग परमेश्वर के लोगों में अपने आप को आगे बढ़ाने, और मानो उनमें ऊँचा स्थान ग्रहण करने की ओर झुके रहते हैं, मानो इसमें कोई सन्देह ही नहीं कि यह उन्हीं का है। वे, मानो स्वाभाविक रूप से, वही करते हैं जिसकी मसीह निन्दा करता है, लूका 14:7, आदि, अर्थात् सबसे ऊँचा स्थान ग्रहण करना। यह वे प्रधान के स्थान और कार्य को अपने ऊपर लेने में आगे बढ़कर करते हैं; मार्गदर्शन करने, सिखाने, निर्देश देने, और प्रबन्ध करने में; “उन्हें विश्वास है कि वे अन्धों के मार्गदर्शक हैं, अंधकार में पड़े हुओं की ज्योति, मूर्खों के प्रशिक्षक, बालकों के गुरु,”
रोमियों 2:19,20। उनके लिये यह मान लेना स्वाभाविक है कि धर्म के विषयों में तानाशाहों और स्वामियों की भूमिका निभाना उन्हीं का काम है; और इस प्रकार वे परोक्ष रूप से यह चाहते हैं कि मनुष्य उन्हें रब्बी कहकर पुकारें, जिसका अर्थ है गुरु, जैसा फरीसियों ने किया, मत्ती 23:6,7, अर्थात्, वे
6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं। फिर भी यह अपेक्षा रखने की ओर झुके रहते हैं कि दूसरे उन्हें धर्म के विषयों में स्वामियों के रूप में मानें, और उनके सामने झुक जाएं।58
परन्तु जिसका हृदय मसीही दीनता के अधिकार में है, वह इसके विपरीत स्वभाव का होता है।
यदि पवित्रशास्त्र पर तनिक भी भरोसा किया जा सकता है, तो ऐसा व्यक्ति धर्म में अपनी उपलब्धियों को तुलनात्मक रूप से तुच्छ मानने, और अपने आप को संतों में नीचा, और संतों में सबसे छोटों में से एक आंकने की ओर झुका रहता है। दीनता, अर्थात् मन की सच्ची नम्रता, लोगों को दूसरों को अपने से अच्छा मानने की प्रवृत्ति देती है: फिलिप्पियों 2:3, “मन की नम्रता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।”
इसलिये वे यह मानने की ओर झुके रहते हैं कि सबसे नीचा स्थान उन्हीं का है, और उनका आन्तरिक स्वभाव स्वाभाविक रूप से उन्हें हमारे उद्धारकर्ता की उस आज्ञा का पालन करने की ओर ले जाता है, लूका 14:10। उनके लिये गुरुओं की भूमिका अपने ऊपर लेना स्वाभाविक नहीं; बल्कि इसके विपरीत, वे यह सोचने की ओर झुके रहते हैं कि वे इस काम के व्यक्ति नहीं, कि दूसरे उनसे अधिक इसके योग्य हैं; जैसा मूसा और यिर्मयाह के साथ हुआ (निर्गमन 3:11, यिर्मयाह 1:6), यद्यपि वे ऐसे विशिष्ट संत और महान ज्ञानवाले थे। उनके लिये यह सोचना स्वाभाविक नहीं कि सिखाना उन्हीं का काम है, बल्कि सिखाया जाना; वे दूसरों को आदेश देने से कहीं अधिक उत्सुक होते हैं सुनने, और दूसरों से शिक्षा ग्रहण करने के लिये: याकूब 1:19, “सुनने में फुर्तीले, और बोलने में धीरे हो।” और जब वे बोलते हैं, तो उनके लिये दृढ़, स्वामी-सुलभ शैली से बोलना स्वाभाविक नहीं; बल्कि दीनता उन्हें काँपते हुए बोलने की ओर झुकाती है। होशे 13:1, “जब एप्रैम कांपते हुए बोलता था, तब वह इस्राएल में महान बन गया; परन्तु जब उसने बाल के विषय अपराध किया, तब वह मर गया।” वे अधिकार अपने हाथ में लेने, और प्रधान प्रबन्धकों और स्वामियों की भूमिका अपने ऊपर लेने की ओर झुके नहीं होते; बल्कि इसके विपरीत, दूसरों के अधीन रहने की ओर: याकूब 3:1,2,
“बहुत गुरु न बनो।” 1 पतरस 5:5, “तुम सब एक दूसरे के अधीन रहकर दीनता को धारण किए रहो।” इफिसियों 5:21, “परमेश्वर के भय से एक दूसरे के आधीन रहो।”
कुछ लोगों के अनुभव स्वाभाविक रूप से इस प्रकार कार्य करते हैं कि वे उनके विषय ऊँचा विचार रखने लगें; और वे प्रायः स्वयं अपने अनुभवों को अत्यंत महान और असाधारण बताकर बोलते हैं; वे स्वतंत्रतापूर्वक उन महान बातों की चर्चा करते हैं जो उन्हें प्राप्त हुई हैं। यह भले अर्थ में भी कहा और समझा जा सकता है। एक अर्थ में, उद्धारकारी दया की प्रत्येक मात्रा एक महान बात है: यह सचमुच एक महान, वरन् अनन्त रूप से महान बात है, कि परमेश्वर हम जैसे कुत्तों को, जो हम अपने आप में हैं, बालकों की रोटी का तनिक-सा टुकड़ा भी दे दे; और जो व्यक्ति जितना अधिक दीन होता है और आशा रखता है कि परमेश्वर ने उस पर ऐसी दया की है, वह उतना ही अधिक इसे इस अर्थ में एक महान बात कहने की ओर झुका रहेगा जो उसे प्राप्त हुई है। परन्तु यदि वे जिन महान बातों का अनुभव करने की बात कहते हैं उनका अर्थ तुलनात्मक रूप से महान आत्मिक अनुभव, या दूसरों के अनुभवों की तुलना में महान, या साधारण से परे हो, जो स्पष्टतः प्रायः ऐसा ही होता है; तो किसी व्यक्ति के लिये यह कहना, कि मुझे महान बातें प्राप्त हुई हैं, ठीक वही कहना है, कि मैं एक विशिष्ट संत हूं, और मेरे पास साधारण से अधिक अनुग्रह है: क्योंकि महान अनुभव रखना, यदि वे अनुभव सच्चे हों और बताने योग्य हों, तो यह महान अनुग्रह रखने के ही समान है: कोई सच्चा अनुभव नहीं है, सिवाय 58 “दो बातें हैं जिनसे यह प्रकट होता है कि किसी मनुष्य में केवल साधारण वरदान हैं, और कोई आन्तरिक सिद्धान्त नहीं। 1.
ये वरदान सदैव फुलाते हैं, और मनुष्य को अपनी ही दृष्टि में कुछ बना देते हैं, जैसे कुरिन्थ का ज्ञान करता था, और अनेक साधारण मनुष्य अपने आप को सेवक बनने के योग्य समझते हैं।” शेपर्ड का Parable, भाग 1, पृ. 181, 182।
6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं। अनुग्रह के प्रयोग के, और सच्चे अनुभव की मात्रा के ठीक अनुरूप ही अनुग्रह और पवित्रता की मात्रा होती है। जो लोग अपने अनुभवों के विषय इस प्रकार बात करते हैं, जब वे उनका वर्णन करते हैं, तो अपेक्षा रखते हैं कि दूसरे उनकी प्रशंसा करें। वास्तव में वे अपने अनुभवों के विषय इस रीति से बात करने को डींग मारना नहीं कहते, और न ही इसे अभिमान का कोई चिन्ह मानते हैं; क्योंकि वे कहते हैं, “वे जानते हैं कि यह उन्होंने नहीं किया, यह मुफ्त अनुग्रह था, ये वे बातें हैं जो परमेश्वर ने उनके लिये की हैं, वे उस बड़ी दया को स्वीकार करेंगे जो परमेश्वर ने उन पर की है, और उसे हल्के में नहीं लेंगे।” परन्तु उस फरीसी के साथ भी ऐसा ही था जिसकी चर्चा मसीह हमें बताता है, लूका
18. उसने शब्दों में परमेश्वर को यह महिमा दी कि उसने उसे अन्य मनुष्यों से भिन्न बनाया; परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं, वह कहता है, कि मैं अन्य मनुष्यों के समान नहीं।59 उनका मौखिक रूप से यह परमेश्वर के अनुग्रह के मत्थे मढ़ना, कि वे अन्य संतों से अधिक पवित्र हैं, उनकी इस उतावली को नहीं रोकता कि वे अपनी पवित्रता के विषय इतना ऊँचा सोचें, जो उनके मनों के अभिमान और घमण्ड का निश्चित प्रमाण है। यदि वे दीन आत्मा के प्रभाव में होते, तो धर्म में उनकी उपलब्धियाँ उनकी अपनी दृष्टि में इतनी चमकने की ओर झुकी न होतीं, और न ही वे अपनी ही सुन्दरता की इतनी प्रशंसा करते। जो मसीही सचमुच सबसे विशिष्ट संत हैं, और इसलिये सबसे उत्कृष्ट अनुभव रखते हैं, और स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़े हैं, वे अपने आप को एक छोटे बालक के समान दीन करते हैं, मत्ती 8:4; क्योंकि वे अपने आप को अनुग्रह में केवल छोटे बालक मानते हैं, और अपनी उपलब्धियों को केवल मसीह में शिशुओं की उपलब्धियाँ मानते हैं, और अपने प्रेम, अपनी कृतज्ञता, और परमेश्वर के अपने अल्प ज्ञान की निम्न मात्रा से चकित होते हैं, और लज्जित होते हैं।
मूसा, जब वह पहाड़ पर परमेश्वर से बातें कर चुका था, और उसका मुख दूसरों की दृष्टि में इतना उज्ज्वल चमकता था कि उनकी आँखें चौंधिया जाती थीं, तब उसे यह मालूम न था कि उसका मुख चमकता है। कुछ लोग हैं जो उच्च अंगीकारकर्ता के नाम से जाने जाते हैं, और कुछ अपने आप को उच्च अंगीकारकर्ता मानेंगे: परन्तु वे विशिष्ट रूप से दीन संत, जो स्वर्ग में सबसे उज्ज्वल चमकेंगे, स्वयं को उच्च अंगीकार करने की ओर तनिक भी झुके नहीं होते। मुझे विश्वास नहीं कि संसार में कोई विशिष्ट संत ऐसा हो जो उच्च अंगीकारकर्ता हो। ऐसे लोग अपने आप को सब संतों में सबसे छोटा अंगीकार करने की, और यह सोचने की कहीं अधिक सम्भावना रखते हैं कि प्रत्येक संत की उपलब्धियाँ और अनुभव उसके अपने से ऊँचे हैं।60
59 कैल्विन, अपने Institutes में, पुस्तक 3, अध्याय 12, अनुच्छेद 7 में, इस फरीसी की चर्चा करते हुए कहते हैं, “कि अपने बाहरी अंगीकार में, वह यह स्वीकार करता है कि जो धार्मिकता उसके पास है वह परमेश्वर का वरदान है, परन्तु (वे कहते हैं) क्योंकि वह इस भरोसे में है कि वह धर्मी है, इसलिये वह परमेश्वर की उपस्थिति से अस्वीकृत और घृणित होकर चला जाता है।”
60 लूथर, जैसे उनके शब्द रदरफ़ोर्ड द्वारा अपने Display of the Spiritual Antichrist, पृ. 143,144 में उद्धृत किये गये हैं, यों कहते हैं: “मसीही का जीवन ऐसा है, कि जिसने आरम्भ किया है वह अपने आप को कुछ भी न रखता हुआ प्रतीत होता है; परन्तु प्रयत्न करता और आगे बढ़ता है, कि वह पकड़ ले: जहाँ से पौलुस कहता है, मैं अपने आप को यह नहीं मानता कि मैंने पकड़ लिया है। क्योंकि सचमुच किसी विश्वासी के लिये इससे अधिक हानिकारक कुछ नहीं, कि वह यह अनुमान कर ले, कि उसने पहले ही पकड़ लिया है, और उसे आगे खोजने की कोई आवश्यकता नहीं। इसीलिये अनेक पीछे गिर जाते हैं, और आत्मिक निश्चिन्तता तथा आलस्य में क्षीण हो जाते हैं। इसी प्रकार बर्नार्ड कहते हैं, ‘परमेश्वर के मार्ग में खड़े रह जाना, पीछे लौटना है।’ इसलिये जिसने मसीही बनना आरम्भ किया है, उसके लिये यही शेष रहता है, कि वह यह सोचे कि वह अभी मसीही नहीं है, बल्कि यह खोजे कि वह मसीही बने, ताकि वह पौलुस के साथ घमण्ड कर सके, ‘मैं नहीं हूं, परन्तु होना चाहता हूं;’ एक ऐसा मसीही जो अभी पूर्ण नहीं हुआ, बल्कि केवल अपने आरम्भ में है। इसलिये वह मसीही नहीं जो मसीही है, अर्थात्, जो अपने आप को एक पूर्ण मसीही मानता है, उसे यह बोध नहीं कि वह कितना कम पड़ता है। हम स्वर्ग की ओर पहुंचने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु हम स्वर्ग में नहीं हैं। हाय उस पर, जो पूर्णतः नया बना दिया गया है, अर्थात्, जो अपने आप को ऐसा मानता है।
6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं।
अनुग्रह और सच्ची आत्मिक ज्योति का स्वभाव ऐसा है, कि वे स्वाभाविक रूप से वर्तमान अवस्था में संतों को यह प्रवृत्ति देते हैं कि वे अपने अनुग्रह और भलाई को तुच्छ, और अपनी विकृति को महान मानें। और जिनके पास इस संसार में किसी से भी अधिक अनुग्रह और आत्मिक ज्योति है, उनमें यह प्रवृत्ति सबसे अधिक होती है। जैसा कि किसी भी व्यक्ति को, जो गम्भीरता और पूर्णता से बातों की प्रकृति और कारण को तौलता है, और आगे की बातों पर विचार करता है, अत्यंत स्पष्ट और सुस्पष्ट प्रतीत होगा।
वह अनुग्रह और पवित्रता तुच्छ कहलाने योग्य है, अर्थात्, जितनी उसे होनी चाहिये उसकी तुलना में तुच्छ। और ऐसा ही उसे प्रतीत होता है जो सचमुच अनुग्रहमय है: क्योंकि ऐसे व्यक्ति की दृष्टि अपने कर्तव्य के नियम पर लगी रहती है; उसके अनुरूप होना ही वह लक्ष्य है जिसका वह पीछा करता है; उसकी आत्मा उसी के लिये संघर्ष करती और उसी तक पहुंचने का प्रयत्न करती है; और उसी के द्वारा वह अपने किये हुए कार्य, और अपने पास जो कुछ है, उसका आकलन और निर्णय करता है।
एक अनुग्रहमय आत्मा को, और विशेष रूप से एक विशिष्ट रूप से अनुग्रहमय आत्मा को, वह पवित्रता तुच्छ प्रतीत होती है, जो उतनी नहीं जितनी उसे होनी चाहिये; उतनी तुच्छ जितने अनन्त कारण और उत्तरदायित्व वह देखता है। यदि उसकी पवित्रता उसे इससे बहुत दूर प्रतीत होती है, तो वह स्वाभाविक रूप से उसकी दृष्टि में तुच्छ प्रतीत होती है, और उसमें किसी सुन्दरता या मनोहरता के रूप में उल्लेख किये जाने योग्य नहीं रहती।
उसी कारण से जैसे एक भूखा मनुष्य स्वाभाविक रूप से यह मानता है कि जो उसके सामने रखा गया है वह केवल थोड़ा-सा भोजन है, एक छोटी-सी बात है, उल्लेख के योग्य नहीं, जो उसकी भूख की तुलना में कुछ भी नहीं है। या जैसे किसी बड़े राजकुमार की सन्तान, जो अपने पिता के सम्मान के लिये उत्सुक है, और देखता है
जो सम्मान मनुष्य उसे दिखाते हैं, वह उस सम्मान और आदर को स्वाभाविक रूप से बहुत तुच्छ मानता है, और ध्यान देने योग्य नहीं मानता, क्योंकि वह उस सम्मान की तुलना में कुछ भी नहीं जिसकी मांग उसके पिता की गरिमा करती है।
परन्तु सच्चे अनुग्रह और आत्मिक ज्योति का स्वभाव यही है, कि वह व्यक्ति की दृष्टि के सामने उस अनन्त कारण को खोल देता है जो यह मांग करता है कि वह उच्च मात्रा में पवित्र हो। और जितना अधिक अनुग्रह उसके पास है, उतना ही अधिक यह दृष्टि के सामने खुलता है, उतनी ही अधिक उसे दिव्य सत्ता की अनन्त उत्कृष्टता और महिमा का, और मसीह के व्यक्तित्व की अनन्त गरिमा का, और पापियों के प्रति मसीह के प्रेम की असीम लम्बाई-चौड़ाई, गहराई और ऊँचाई का बोध होता है। और जैसे-जैसे अनुग्रह बढ़ता है, वह क्षेत्र दूर की दृष्टि तक अधिकाधिक खुलता जाता है, यहाँ तक कि आत्मा उस विषय की विशालता में समा जाती है, और वह व्यक्ति यह सोचकर चकित हो जाता है कि इस परमेश्वर से, और इस महिमामय छुड़ानेवाले से, जिसने मनुष्य से इतना प्रेम किया है, प्रेम करना उसे कितना उचित है, और वह कितना कम प्रेम करता है। और इस प्रकार, जितना अधिक वह समझता है, उतना ही अधिक उसके अनुग्रह और प्रेम की तुच्छता उसे विचित्र और अद्भुत प्रतीत होती है: और इसलिये वह यह मानने के लिये अधिक तत्पर हो जाता है कि दूसरे उससे आगे हैं। क्योंकि अपने ही अनुग्रह की तुच्छता पर चकित होते हुए, वह लगभग विश्वास नहीं कर पाता कि दूसरे संतों के साथ भी ऐसी ही विचित्र बात होती है: उसे यह आश्चर्यजनक लगता है, कि जो सचमुच परमेश्वर की सन्तान है, और जिसने मसीह के उस अवर्णनीय प्रेम के उद्धारकारी लाभों को वास्तव में प्राप्त किया है, वह इससे अधिक प्रेम क्यों न करे: और वह इसे अपने ही लिये विशेष, एक विचित्र और अपवाद स्वरूप घटना मानने की ओर झुका रहता है; क्योंकि वह अन्य मसीहियों का केवल बाहरी रूप देखता है, परन्तु अपना भीतरी रूप देखता है।
उस मनुष्य ने, बिना सन्देह, नया बनाया जाना आरम्भ भी कभी नहीं किया, और न ही उसने कभी यह चखा कि मसीही होना क्या है।
6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं।
यहाँ पाठक सम्भवतः यह आपत्ति कर सकता है, कि परमेश्वर के प्रति प्रेम वास्तव में उतना ही बढ़ता है जितना परमेश्वर का ज्ञान बढ़ता है; तो फिर संत में ज्ञान की वृद्धि उसके प्रेम को, जो कुछ जाना गया है उसकी तुलना में, कम कैसे प्रतीत करा सकती है? इसका उत्तर मैं यह देता हूं, कि यद्यपि संतों में अनुग्रह और परमेश्वर का प्रेम, परमेश्वर के ज्ञान या दर्शन की मात्रा के अनुरूप होता है; तथापि यह देखे और जाने गये विषय के अनुपात में नहीं होता। संत की आत्मा, परमेश्वर का कुछ अंश दृष्टि के लिये खुल जाने के कारण, जो देखा गया है उससे कहीं अधिक का बोध पा लेती है। कुछ ऐसा है जो देखा जाता है, जो अद्भुत है; और वह दृष्टि अपने साथ किसी बहुत परे की वस्तु का दृढ़ बोध लेकर आती है, जो तुरन्त दिखाई नहीं देती। इसलिये आत्मा, उसी समय, अपने अज्ञान पर चकित होती है, कि वह इतना कम जानती है, और साथ ही यह भी कि वह इतना कम प्रेम करती है। और जैसे आत्मा, आत्मिक दृष्टि में, उस विषय में अनन्त रूप से अधिक का, जो अब भी दृष्टि से परे है, बोध पाती है; वैसे ही वह आत्मा की उस क्षमता का भी बोध पाती है, कि यदि बादल और अन्धकार हट जाएं तो वह कहीं अधिक जान सकती है। जिसके कारण आत्मा, आत्मिक दृष्टि के आनन्द में, आत्मिक अज्ञान और प्रेम की कमी की बड़ी शिकायत करती है, और अधिक ज्ञान और अधिक प्रेम के लिये लालायित होकर उसका पीछा करती है।
इस संसार में सबसे विशिष्ट संतों में भी अनुग्रह और परमेश्वर का प्रेम, सचमुच उससे बहुत तुच्छ है जितना उसे होना चाहिये। क्योंकि इस जीवन में जो सर्वोच्च प्रेम कोई भी कभी प्राप्त कर पाता है, वह दीन, ठण्डा, अत्यंत निम्न है, और इस तुलना में नाम लिये जाने योग्य भी नहीं है कि हमारे उत्तरदायित्व, इन दो बातों पर संयुक्त रूप से विचार करने से, कैसे प्रतीत होते हैं, अर्थात्: 1. वह कारण
जो परमेश्वर ने हमें उससे प्रेम करने के लिये दिया है, अपनी अनन्त महिमा के उन प्रकटनों में, जो उसने अपने वचन में, और अपने कार्यों में किये हैं; और विशेष रूप से अपने पुत्र के सुसमाचार में, और उसके द्वारा उसने पापी मनुष्य के लिये जो कुछ किया है उसमें। और, 2. मनुष्य की आत्मा में जो क्षमता है, उन बौद्धिक शक्तियों के द्वारा जो परमेश्वर ने उसे दी हैं, इन कारणों को देखने और समझने की, जो परमेश्वर ने हमें उससे प्रेम करने के लिये दिये हैं। पृथ्वी पर सबसे विशिष्ट संत का प्रेम भी, इन बातों की संयुक्त मांग की तुलना में, सचमुच कितना अल्प है! और यह अनुग्रह मनुष्यों को इसका बोध कराने की ओर प्रवृत्त करता है, विशेष रूप से विशिष्ट अनुग्रह; क्योंकि अनुग्रह ज्योति की प्रकृति का है, और सत्य को दृष्टि में लाता है। और इसलिये जिसके पास बहुत अनुग्रह है, वह दूसरों से कहीं अधिक उस महान ऊँचाई को समझ लेता है जिस तक उसके प्रेम को उठना चाहिये; और वह दूसरों से बेहतर देख लेता है, कि वह उस ऊँचाई की ओर कितना कम ऊपर उठा है। और इसलिये अपने प्रेम को अपने कर्तव्य की सम्पूर्ण ऊँचाई से आंकते हुए, यह उसकी दृष्टि में चकित करनेवाली रीति से तुच्छ और नीचा प्रतीत होता है।
और विशिष्ट संत, उस उच्च मात्रा का ऐसा बोध रखते हुए जिसमें उसे परमेश्वर से प्रेम करना चाहिये, इससे उसे न केवल अपने अनुग्रह की तुच्छता, बल्कि अपनी शेष भ्रष्टता की महानता भी दिखाई देती है। यह आंकने के लिये कि हम में कितनी भ्रष्टता या पाप शेष है, हमें अपना माप उस ऊँचाई से लेना होगा जहाँ तक हमारे कर्तव्य का नियम फैला हुआ है: उस ऊँचाई से हम जितनी दूरी पर हैं, वह सब पाप है: क्योंकि कर्तव्य में चूक जाना पाप है; अन्यथा हमारा कर्तव्य हमारा कर्तव्य ही नहीं है, और हम जितना अधिक अपने कर्तव्य से कम पड़ते हैं, उतना ही अधिक पाप हम में है। पाप और कुछ नहीं है सिवाय इसके, कि एक नैतिक कर्ता अपने कर्तव्य की व्यवस्था या नियम के प्रतिकूल हो। और इसलिये पाप की मात्रा का निर्णय इस नियम से किया जाना है: नियम के जितने अधिक प्रतिकूल, उतना ही अधिक पाप, चाहे वह कमी में हो या अधिकता में। इसलिये यदि मनुष्य, अपने
6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं। परमेश्वर के प्रति प्रेम में, उस ऊँचाई के आधे मार्ग तक भी नहीं पहुंचते जो कर्तव्य मांगता है, तो उनके हृदयों में अनुग्रह से अधिक भ्रष्टता है; क्योंकि जितनी भलाई वहाँ है उससे अधिक भलाई की कमी है: और जो कुछ कम है वह सब पाप है: यह एक घृणित त्रुटि है; और संतों को ऐसी ही प्रतीत होती है; विशेष रूप से उन्हें जो विशिष्ट हैं; उन्हें यह अत्यंत घृणित प्रतीत होती है, कि मसीह से इतना कम प्रेम किया जाए, और उसके मरणपर्यन्त प्रेम के लिये इतना कम धन्यवाद दिया जाए: यह उनकी दृष्टि में घृणित कृतघ्नता है।
और तब अनुग्रह की वृद्धि की एक और प्रवृत्ति होती है, कि वह संतों को अपनी विकृति को अपनी भलाई से कहीं अधिक मानने पर उकसाती है: यह न केवल उन्हें यह विश्वास दिलाने की ओर प्रवृत्त करती है कि उनकी भ्रष्टता उनकी भलाई से कहीं अधिक है, जो वास्तव में सच है; बल्कि यह भी करती है कि छोटे से छोटे पाप में, या भ्रष्टता की सबसे छोटी मात्रा में जो विकृति है, वह इतनी बड़ी प्रतीत हो कि उनकी सबसे बड़ी पवित्रता में जो भी सुन्दरता है उस सबसे कहीं अधिक भारी पड़ जाए; क्योंकि यह भी वास्तव में सच है। क्योंकि एक अनन्त परमेश्वर के विरुद्ध छोटे से छोटे पाप में भी अनन्त घृणास्पदता या विकृति है, परन्तु एक सृष्ट प्राणी की पवित्रता की सर्वोच्च मात्रा में भी अनन्त मनोहरता नहीं है: और इसलिये उसकी मनोहरता, छोटे से छोटे पाप की विकृति की तुलना में, कुछ भी नहीं के समान है। कि प्रत्येक पाप में अनन्त विकृति और घृणास्पदता है, यह सबसे अधिक प्रमाणिक रूप से स्पष्ट है; क्योंकि पाप की बुराई, या अधर्म, या घृणास्पदता में जो निहित है, वह एक उत्तरदायित्व का उल्लंघन है, अर्थात् वह होना या करना जो हमें जो होना या करना चाहिये, या जिसके हम बाध्य हैं, उसके विपरीत है। और इसलिये जितना बड़ा वह उत्तरदायित्व है जिसका उल्लंघन किया गया है, उतनी ही बड़ी उस उल्लंघन की अधर्मिता और घृणास्पदता है। परन्तु निश्चय ही किसी सत्ता से प्रेम और आदर करने का हमारा उत्तरदायित्व उसकी मनोहरता और आदरणीयता के, अर्थात् हमारे द्वारा प्रेम और आदर पाने की उसकी योग्यता के, कुछ अनुपात में होता है; जो एक ही बात है। हम निश्चय ही अधिक मनोहर सत्ता से प्रेम करने के लिये कम मनोहर की तुलना में अधिक उत्तरदायी हैं; और यदि कोई सत्ता अनन्त रूप से मनोहर है या हमारे द्वारा प्रेम किये जाने योग्य है, तो उससे प्रेम करने के हमारे उत्तरदायित्व अनन्त रूप से महान हैं; और इसलिये, जो कुछ भी इस प्रेम के विपरीत है, उसमें अनन्त अधर्मिता, विकृति और अयोग्यता है। परन्तु दूसरी ओर, हमारी पवित्रता या परमेश्वर के प्रति प्रेम के विषय में, उसमें कोई अनन्त योग्यता नहीं है। परमेश्वर के विरुद्ध सृष्ट प्राणी का पाप, परमेश्वर और सृष्ट प्राणी के बीच जो दूरी है उसके अनुपात में दोषपूर्ण और घृणास्पद है: विषय की महानता, और आधार की तुच्छता तथा हीनता, इसे और भी गंभीर बना देती है। परन्तु परमेश्वर के प्रति सृष्ट प्राणी के आदर की योग्यता के विषय में यह उल्टा है; वह आधार की तुच्छता के अनुपात में मूल्यहीन और अयोग्य है। परमेश्वर और सृष्ट प्राणी के बीच जितनी बड़ी दूरी है, उतना ही कम सृष्ट प्राणी का आदर परमेश्वर के ध्यान या विचार के योग्य है। श्रेष्ठता की महान मात्रा हीन को श्रेष्ठ का आदर करने के उत्तरदायित्व को बढ़ा देती है; और इस प्रकार आदर की कमी को अधिक घृणास्पद बना देती है। परन्तु हीनता की महान मात्रा हीन के आदर के मूल्य को घटा देती है; क्योंकि वह जितना अधिक हीन है, उतना ही कम वह ध्यान देने योग्य है; वह जितना छोटा है, उतना ही कम उसके द्वारा प्रस्तुत किये जाने योग्य का मूल्य है; क्योंकि वह अपना सर्वोत्तम आदर अर्पित करते हुए अपने आप से अधिक कुछ भी अर्पित नहीं कर सकता; और इसलिये जैसे वह छोटा और अल्पमूल्य है, वैसे ही उसका आदर भी अल्पमूल्य है। और व्यक्ति के पास जितना अधिक सच्चा अनुग्रह और आत्मिक ज्योति है, उतना ही अधिक यह उसे ऐसा प्रतीत होगा; 6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं। उतना ही अधिक वह अपने आप को पाप के कारण अनन्त रूप से विकृत प्रतीत होगा, और उतनी ही कम उसके अनुग्रह में, या भले अनुभव में, जो भलाई है, वह उसकी तुलना में प्रतीत होगी। क्योंकि सचमुच यह उसकी तुलना में कुछ भी नहीं है; यह समुद्र की तुलना में एक बूंद से भी कम है; क्योंकि सांत का अनन्त से कोई भी अनुपात नहीं बनता। परन्तु व्यक्ति के पास जितनी अधिक आत्मिक ज्योति है, उतना ही अधिक बातें उसे, इस विषय में, जैसी वे वास्तव में हैं वैसी ही प्रतीत होती हैं।—इसलिये यह सबसे अधिक प्रमाणिक रूप से प्रकट होता है, कि सच्चे अनुग्रह की प्रकृति ऐसी है, कि व्यक्ति के पास शेष भ्रष्टता के साथ जितना अधिक अनुग्रह है, उतनी ही कम उसकी भलाई और पवित्रता उसकी विकृति के अनुपात में प्रतीत होती है; और न केवल उसकी भूतकालीन विकृति के अनुपात में, बल्कि उसकी वर्तमान विकृति के अनुपात में भी, अर्थात् उस पाप में जो अब उसके हृदय में प्रकट होता है, और उसके उच्चतम और उत्तम मनोभावों तथा सबसे उज्ज्वल अनुभवों की घृणित त्रुटियों में।
अनेक ऊँचे और धार्मिक मनोभावों, और बड़े प्रकाशनों (जैसा उन्हें कहा जाता है) का, जो मैंने अनेक परिचित व्यक्तियों में देखे हैं, स्वभाव यह है कि वे उनके हृदयों की भ्रष्टता को छिपा देते और ढक देते हैं, और उन्हें ऐसा प्रतीत कराते हैं मानो उनका सब पाप जाता रहा हो, और उन्हें अपने भीतर शेष किसी घृणास्पद बुराई की शिकायत से रहित छोड़ देते हैं (यद्यपि सम्भव है कि वे अपनी भूतकालीन अयोग्यता के विषय बहुत चिल्लाते रहें); जो इस बात का निश्चित और पक्का प्रमाण है कि उनके प्रकाशन (जैसा वे उन्हें कहते हैं) अन्धकार हैं, ज्योति नहीं। यह अन्धकार ही है जो मनुष्यों की गन्दगी और विकृति को छिपाता है; परन्तु हृदय में आने दी गई ज्योति उसे प्रकट करती है, उसे उसके गुप्त कोनों में खोज निकालती है, और उसे स्पष्ट रूप से प्रकट कर देती है; विशेष रूप से परमेश्वर की पवित्रता और महिमा की वह भेदक, सब कुछ खोज निकालनेवाली ज्योति। यह सच है, कि उद्धारकारी प्रकाशन एक अर्थ में वर्तमान समय के लिये भ्रष्टता को छिपा सकते हैं; वे उसके सक्रिय प्रयोगों को, जैसे द्वेष, ईर्ष्या, लोभ, कामुकता, कुड़कुड़ाना, आदि को रोकते हैं, परन्तु वे भ्रष्टता को उस रूप में ज्योति में लाते हैं जो अभावात्मक है, अर्थात्, कि अब और अधिक प्रेम नहीं, और अधिक दीनता नहीं, और अधिक कृतज्ञता नहीं। जिन कमियों को वे लोग सबसे अधिक घृणास्पद देखते हैं जिनमें अनुग्रह का सबसे विशिष्ट प्रयोग है; और वे उनके लिये बहुत बोझिल हैं, और संतों को अपनी दुर्बलता, और घृणित अभिमान तथा कृतघ्नता के विरुद्ध चिल्लाने पर उकसाती हैं। और भ्रष्टता के जो भी सक्रिय प्रयोग किसी भी समय उठ खड़े होते हैं, और अनुग्रह की विशिष्ट क्रियाओं के साथ मिल जाते हैं, अनुग्रह उनके दृश्य को अत्यंत बड़ा कर देगा, और उनके स्वरूप को कहीं अधिक जघन्य और भयानक बना देगा।
संत जितने ही अधिक विशिष्ट हैं, और उनकी आत्माओं में स्वर्ग की ज्योति जितनी अधिक है, उतना ही अधिक वे अपने आप को वैसा ही प्रतीत होते हैं जैसे इस संसार के सबसे विशिष्ट संत स्वर्ग के संतों और स्वर्गदूतों को प्रतीत होते हैं। हम युक्तिसंगत रूप से यह कैसे मान सकते हैं कि पृथ्वी के सबसे विशिष्ट संत उन्हें, यदि मसीह की धार्मिकता से ढके हुए, और उनकी विकृतियाँ उसकी भरपूर महिमा और प्रेम की किरणों की चमक में समाई और छिपी हुई, न देखे जाएं, तो और किसी रूप में प्रतीत होंगे? हम यह कैसे मान सकते हैं कि हमारा सबसे उत्कट प्रेम और स्तुति उन्हें कैसा प्रतीत होता है, जो परमेश्वर की सुन्दरता और महिमा को बिना किसी परदे के देखते हैं? मसीह के मरणपर्यन्त प्रेम के लिये हमारी सबसे उच्च कृतज्ञता उन्हें कैसी प्रतीत होती है, जो मसीह को जैसा वह है वैसा देखते हैं, जो वैसे ही जानते हैं जैसे वे जाने गये हैं, और उसकी महिमा को, जो मरा, और उसके मरणपर्यन्त प्रेम के आश्चर्यों को, बिना किसी अन्धकार के बादल के देखते हैं? और वे उस गहनतम श्रद्धा और दीनता को कैसे देखते हैं, जिससे पृथ्वी की धूल के कीड़े उस अनन्त महिमा के पास पहुंचते हैं जिसे वे देखते हैं? क्या यह उन्हें महान प्रतीत होता है, या इतना भी कि श्रद्धा
6. अनुग्रहमय मनोभाव सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के साथ होते हैं। और दीनता के नाम के योग्य भी, उनमें जिन्हें वे उस महान और पवित्र परमेश्वर से, जिसकी महिमामय उपस्थिति में वे हैं, ऐसी अनन्त दूरी पर देखते हैं? इसका कारण कि पृथ्वी के संतों की सर्वोच्च उपलब्धियाँ भी उन्हें इतनी तुच्छ प्रतीत होती हैं, यह है कि वे परमेश्वर की महिमा की ज्योति में निवास करते हैं, और परमेश्वर को जैसा वह है वैसा देखते हैं। और इस विषय में पृथ्वी के संतों के साथ भी वैसा ही है जैसा स्वर्ग के संतों के साथ है, इस अनुपात में कि वे अनुग्रह में जितने अधिक विशिष्ट हैं।
मैं यह समझा नहीं जाना चाहता, कि पृथ्वी के संत, जब उनमें अनुग्रह के सबसे अधिक प्रयोग होते हैं, तब हर बात में अपने आप के विषय सबसे बुरी राय रखते हैं। अनेक बातों में यह इसके विपरीत है।
भ्रष्टता के सक्रिय प्रयोगों के विषय में, वे अपने आप को तब सबसे अधिक स्वतंत्र और उत्तम प्रतीत हो सकते हैं जब अनुग्रह सबसे अधिक क्रियाशील है, और सबसे बुरे तब जब अनुग्रह की क्रियाएं सबसे निम्न हों। और जब वे अपनी तुलना भिन्न समयों पर अपने आप से करते हैं, तो वे यह जान सकते हैं कि जब अनुग्रह जीवंत रूप से क्रियाशील होता है, तब उनकी दशा पहले से बेहतर है (यद्यपि पहले, उस समय में, उन्होंने उतनी बुराई नहीं देखी थी जितनी वे अब देखते हैं) और जब बाद में वे अपने मनों की दशा में फिर से गिर जाते हैं, तो वे जान सकते हैं कि वे गिर रहे हैं, और उन्हें अपनी बड़ी शेष भ्रष्टता का एक नया तर्क, और पहले देखी गई से अधिक नीचता का एक युक्तिसंगत बोध प्राप्त होता है; और अनेकों में अपराधबोध की भावना, और एक प्रकार से अपनी पापिष्ठता का व्यवस्था-आधारित बोध, अनुग्रह के जीवंत प्रयोग के समय की तुलना में कहीं अधिक होता है। परन्तु फिर भी यह सच है, और पूर्वोक्त बातों से प्रमाणित है, कि परमेश्वर की सन्तानें अपनी विकृति का इतना संवेदनशील और आत्मिक बोध, और अपनी वर्तमान नीचता तथा घृणास्पदता का इतना बड़ा, तीव्र और दीन करनेवाला बोध, कभी उतना नहीं रखतीं जितना तब जब वे सच्चे और शुद्ध अनुग्रह के प्रयोग में सबसे ऊँचे होते हैं; और वे कभी भी अपने आप को मसीहियों में उतना नीचा रखने की ओर उतनी झुकी हुई नहीं होतीं जितनी तब होती हैं। और इस प्रकार जो राज्य में सबसे बड़ा है, या मसीह की कलीसिया में सबसे विशिष्ट है, वही वह है जो अपने आप को उनमें सबसे छोटे शिशु के समान दीन करता है; मसीह की उस महान उक्ति के अनुरूप, मत्ती 18:4।
एक सच्चा संत यह जान सकता है कि उसमें कुछ सच्चा अनुग्रह है: और जितना अधिक अनुग्रह है, उतनी ही सरलता से यह जाना जाता है, जैसा पहले देखा और प्रमाणित किया जा चुका है। परन्तु फिर भी इससे यह नहीं निकलता, कि एक विशिष्ट संत सरलता से यह अनुभव कर ले कि वह दूसरों की तुलना में एक विशिष्ट संत है।
मैं इस बात से इनकार नहीं करूंगा कि यह संभव है कि जिसके पास बहुत अनुग्रह हो, और जो एक श्रेष्ठ संत हो, वह इसे जान सके। परन्तु वह इसे जानने के लिये प्रवृत्त नहीं होगा; यह उसके लिये कोई प्रत्यक्ष बात नहीं होगी: कि वह औरों से अच्छा है, और उसके अनुभव तथा उपलब्धियां ऊंची हैं, यह उसका प्रथम विचार नहीं होता; न ही यह ऐसी बात है जो समय-समय पर सहज ही उसके मन में आती रहे; यह ऐसी बात है जो उसके मार्ग में नहीं पड़ती, बल्कि उसकी दृष्टि से बहुत दूर पड़ी रहती है; उसे इसके विषय में स्वयं को मनाने के लिये परिश्रम करना पड़ता है; स्वयं को मनाने के लिये बुद्धि पर बड़ा नियंत्रण, और तर्क करने में कठोरता तथा सावधानी की उच्च मात्रा की आवश्यकता होगी। और यदि वह अपने अनुभवों पर बड़ी कठोरता से विचार करके, तथा उनकी तुलना कुछ अन्य संतों में अनुग्रह की निम्न मात्रा के बड़े-बड़े प्रकटनों से करके, बुद्धिपूर्वक इस बात के लिये मना भी लिया जाए, तो भी उसे यह बात मुश्किल से ही वास्तविक जान पड़ेगी कि उसके पास उनसे अधिक अनुग्रह है; और वह उस विश्वास को, जो उसने परिश्रम से प्राप्त किया था, प्रायः खो बैठेगा: न ही उसे उस मान्यता पर कार्य करना कुछ भी स्वाभाविक जान पड़ेगा। और इस बात को एक अचूक सिद्धान्त के रूप में रखा जा सकता है, “कि जो व्यक्ति औरों की तुलना में स्वयं को एक अत्यन्त श्रेष्ठ, बहुत विशिष्ट संत मानने के लिये प्रवृत्त हो,
VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है। मसीही अनुभव में, जिसके लिये यह एक ऐसा पहला विचार है जो स्वयं उठता है, और स्वाभाविक रूप से सामने आता है — वह निश्चय ही भूल में है; वह कोई श्रेष्ठ संत नहीं, वरन एक अभिमानी और स्वधर्मी आत्मा के बड़े प्रभाव के अधीन है।” और यदि यह उस मनुष्य में अभ्यस्त हो जाए, और स्थिरता से उसके मन का प्रचलित स्वभाव बना रहे, तो वह कदापि कोई संत नहीं; उसमें किसी सच्ची
मसीही अनुभव की मात्रा भी नहीं है; जितना निश्चय परमेश्वर का वचन सत्य है।
और उस प्रकार के अनुभव, जो ऐसी प्रवृत्ति के प्रतीत होते हैं, और जिनका समय-समय पर यह प्रभाव देखा जाता है कि वे अपने विषय को उन अनुभवों के बड़े अभिमान से फुला देते हैं, निश्चय ही व्यर्थ और भ्रामक हैं। वे कथित प्रकाशन, जो स्वभावतः मनुष्य को अपने प्रकाशनों की श्रेष्ठता के प्रशंसा-भाव से फुला देते हैं, और उसे इस अभिमान से भर देते हैं कि अब उसने देख लिया है, और अधिकांश अन्य मसीहियों से अधिक जानता है, उनमें सच्ची आत्मिक ज्योति की प्रकृति का कुछ भी नहीं है। सारा सच्चा आत्मिक ज्ञान ऐसी प्रकृति का होता है कि मनुष्य के पास जितना अधिक हो, वह अपनी ही अज्ञानता के प्रति उतना ही अधिक सचेत होता जाता है; जैसा 1 कुरिन्थियों 8:2 से स्पष्ट है:
“यदि कोई समझे, कि मैं कुछ जानता हूं, तो अभी उतना भी नहीं जानता, जितना जानना चाहिए।”
आगूर ने, जब उसे परमेश्वर का बड़ा प्रकाशन, और उसकी महिमा की अद्भुत ऊंचाई का, और उसके आश्चर्यकर्मों का बोध हुआ, और वह उसकी महानता और अगम्यता के विषय पुकार उठा; उसी समय, उसे अपनी पशु-सी अज्ञानता का सबसे गहरा बोध था, और वह स्वयं को सब संतों में सबसे अधिक अज्ञानी मानता था। नीतिवचन 30:2, 3, 4: “निश्चय मैं किसी भी मनुष्य से अधिक पशु सरीखा हूं, और मुझ में मनुष्य की सी समझ नहीं। न मैं ने बुद्धि सीखी है, और न मुझे परमपवित्र का ज्ञान प्राप्त है। कौन स्वर्ग पर चढ़ गया, और उतर आया है? किस ने अपनी मुट्ठियों में वायु को बटोर रखा है? किस ने वस्त्र में जल को बान्ध रखा है? किस ने पृथ्वी की सारी सीमाओं को स्थिर किया है? उसका नाम क्या है, और उसके पुत्र का नाम क्या है, यदि तू बता सके?”
किसी मनुष्य का अपने आत्मिक और दिव्य ज्ञान पर अत्यधिक अभिमान करना, यदि कुछ और नहीं तो, अपनी ही दृष्टि में बुद्धिमान बनना है। और इसलिये यह उन निषेधों के अन्तर्गत आता है: नीतिवचन
3:7, “अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न बन।” रोमियों 12:16, “अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न बनो;” और मनुष्यों को उस हाय के अधीन ले आता है, यशायाह 5:21: “हाय उन पर जो अपनी दृष्टि में बुद्धिमान, और अपनी ही समझ में चतुर हैं।” जो इस प्रकार अपनी दृष्टि में बुद्धिमान हैं, वे संसार में किसी से भी भलाई पाने की सबसे कम आशा रखनेवालों में से हैं। अनुभव इस बात की सत्यता को दिखाता है, नीतिवचन 26:12: “क्या तू ने किसी मनुष्य को अपनी दृष्टि में बुद्धिमान देखा है? उससे तो मूर्ख के लिये अधिक आशा है।”
इस पर कोई यह आपत्ति उठा सकता है कि भजनकार, जब हमें यह मानना चाहिए कि वह एक पवित्र मनोदशा में था, अपने ज्ञान की बात असाधारण रूप से महान, और अन्य संतों के ज्ञान से कहीं अधिक महान बताता है:
भजन 119:99, 100, “मैं अपने सब गुरुओं से अधिक समझ रखता हूं, क्योंकि तेरी चितौनियां मेरा ध्यान हैं। मैं पुरनियों से भी अधिक समझ रखता हूं, क्योंकि मैं तेरे उपदेशों को पकड़े रहता हूं।”
इसका मैं दो बातों में उत्तर देता हूं:
(1.) परमेश्वर के आत्मा पर इस विषय में कोई रोक नहीं लगाई जा सकती कि वह अपनी कलीसिया के लाभ के लिये किसी भविष्यद्वक्ता पर, जो प्रत्यक्ष प्रेरणा के अधीन बोल या लिख रहा हो, क्या प्रकट करे। परमेश्वर का आत्मा ऐसे व्यक्ति पर प्रकट कर सकता है, और उसे यह आदेश दे सकता है कि वह औरों को ऐसी गुप्त बातें बताए, जिन्हें अन्यथा उसके लिये जान पाना कठिन, वरन असम्भव होता। जैसे वह उस पर ऐसे भेद प्रकट कर सकता है, जो अन्यथा उसकी बुद्धि की पहुंच से परे होते; अथवा VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है। किसी दूरस्थ स्थान की बातें, जिन्हें वह देख नहीं सकता; अथवा भविष्य की घटनाएं, जिन्हें जानना और घोषित करना उसके लिये असम्भव होता, यदि वे उस पर असाधारण रीति से प्रकट न की जातीं; उसी प्रकार परमेश्वर का आत्मा दाऊद पर यह विशिष्ट आशीष प्रकट कर सकता था, जो उसने परमेश्वर की चितौनियों के साथ बहुत संगति रखने से पाई थी; और उसे औरों के लाभ के लिये इसे लिखने का माध्यम बना सकता था, ताकि वे उसी कर्तव्य के लिये प्रेरित हों, और ज्ञान पाने के लिये वही साधन काम में लाएं। परमेश्वर के आत्मा के साधारण अनुग्रहकारी प्रभावों की स्वाभाविक प्रवृत्ति के विषय में इससे कुछ भी संग्रह नहीं किया जा सकता कि दाऊद परमेश्वर के आत्मा के असाधारण प्रभावों के अधीन, जो प्रेरणा द्वारा सीधे उसे दिव्य मन बताते और दाऊद को अपनी कलीसिया के लाभ के लिये जो चाहे लिखने का माध्यम बनाते थे, अपने विशिष्ट ज्ञान की जो घोषणा करता है — उससे उतना ही कम, जितना हम युक्तिसंगत रूप से यह तर्क कर सकते हैं कि औरों को श्राप देना, और उन पर जो भी सबसे भयानक दुख सोचा जा सके उसकी कामना करना, अनुग्रह की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, क्योंकि
दाऊद, प्रेरणा के अधीन, प्रायः औरों को श्राप देता है, और प्रार्थना करता है कि ऐसा दुख उन पर आ पड़े।
(2.) यह निश्चित नहीं कि यहां दाऊद जिस ज्ञान की बात करता है, वह वही आत्मिक ज्ञान है, जिसमें पवित्रता मूल रूप से निहित है। परन्तु यह वह बड़ा प्रकाशन हो सकता है, जो परमेश्वर ने उसे मसीहा के विषय में, और उसके भावी राज्य की बातों के विषय में दिया, और सुसमाचार के भेदों तथा सिद्धान्तों का वह कहीं अधिक स्पष्ट और विस्तृत ज्ञान, जो उसके पास औरों से अधिक था; यह परमेश्वर की चितौनियों को मानने के प्रतिफल के रूप में था। इसमें, भजन संहिता की पुस्तक से यह स्पष्ट है, कि दाऊद अपने से पहले हुए सब लोगों से कहीं आगे था।
दूसरे, एक और बात जो आत्मिक अभिमान का अचूक चिन्ह है, वह यह है कि लोग अपनी दीनता के विषय में ऊंचा विचार रखने के लिये प्रवृत्त होते हैं। झूठे अनुभवों के साथ सामान्यतः एक कपटी दीनता जुड़ी रहती है। और कपटी दीनता का यह स्वभाव ही है कि वह स्वयं के विषय में अत्यधिक अभिमानी हो।
झूठे धार्मिक मनोभावों में सामान्यतः यही प्रवृत्ति होती है, विशेष रूप से जब वे बड़ी ऊंचाई तक उठाए जाते हैं, कि लोगों को यह विचार दिलाएं कि उनकी दीनता महान है, और तदनुसार वे इस विषय में अपनी बड़ी उपलब्धियों पर बहुत ध्यान दें, और उन्हें सराहें। परन्तु श्रेष्ठ अनुग्रहमय मनोभावों की (मैं इसे कहने में संकोच नहीं करता) सदैव इसके विपरीत प्रवृत्ति होती है, और जिनमें वे होते हैं उन सब में सार्वभौमिक रूप से इसके विपरीत प्रभाव उत्पन्न करते हैं। वे वास्तव में उन्हें यह भली-भांति सचेत कराते हैं कि उन्हें गहराई से दीन होने का कितना कारण है, और उन्हें इसके लिये गम्भीरता से प्यासा और लालायित करते हैं; परन्तु वे उनकी वर्तमान दीनता को, अथवा जो कुछ वे पहले ही प्राप्त कर चुके हैं उसे, छोटा प्रकट करते हैं; और उनके शेष अभिमान को महान, और अत्यन्त घृणित प्रकट करते हैं।
जिस कारण से एक अभिमानी व्यक्ति अपनी दीनता को महान मानने के लिये प्रवृत्त होता है, और जिस कारण से एक अत्यन्त दीन व्यक्ति अपनी दीनता को छोटा मानता है, उसे सरलता से समझा जा सकता है, यदि यह विचार किया जाए कि लोगों के लिये अपनी दीनता की मात्रा को आंकने में यह स्वाभाविक है कि वे अपना मापदण्ड उस ऊंचाई से लें, जिसे वे अपनी उचित ऊंचाई मानते हैं, अथवा उस प्रतिष्ठा से, जिस पर वे उचित रूप से खड़े हैं। जो एक में बड़ी दीनता हो सकती है, वह दूसरे में कोई दीनता ही नहीं है; क्योंकि जिस सम्मान अथवा महत्त्व की मात्रा पर प्रत्येक उचित रूप से खड़ा है, वह बहुत भिन्न होती है। क्योंकि किसी महान पुरुष के लिये किसी अन्य महान पुरुष के, अपने समान व्यक्ति के, जूतों का बन्धन खोलने के लिये झुकना, अथवा उसके पांव धोना, VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है। उसमें एक दीनता के कार्य के रूप में देखा जाएगा; और वह स्वयं भी, अपनी प्रतिष्ठा के प्रति सचेत होने के कारण, इसे उसी दृष्टि से देखेगा। परन्तु यदि किसी दीन दास को किसी महान राजकुमार के जूते खोलने के लिये झुकते देखा जाए, तो कोई भी इसे उसमें दीनता के किसी कार्य, अथवा दीनता की किसी बड़ी मात्रा के चिन्ह के रूप में नहीं लेगा: न ही वह दास स्वयं ऐसा मानेगा, जब तक कि वह भयानक रूप से अभिमानी और हास्यास्पद रूप से अपने विषय में घमण्डी न हो: और यदि यह कर लेने के बाद, वह अपनी बातचीत और व्यवहार में यह दिखाए कि उसने इसमें अपनी दीनता को बड़ा माना, और इस पर अपना मन बहुत लगाए रखा, यह मानते हुए कि यह उसके अत्यन्त दीन होने का प्रमाण है; तो क्या सब लोग उस पर यह कहकर न चिल्ला उठेंगे, “तू अपने आप को क्या समझता है, कि तू यह मानने लगे कि तूने ऐसी गहरी दीनता की है?” इससे यह प्रमाण की भांति स्पष्ट हो जाएगा कि यह दास अभिमान और मन के घमण्ड की एक बड़ी मात्रा से फूला हुआ था, उतना ही जितना यदि उसने साफ शब्दों में कह दिया होता, “मैं अपने आप को कोई बड़ा व्यक्ति मानता हूं।” और बात उतनी ही स्पष्ट और निश्चित है, जब धूल के निकम्मे, नीच और घृणित कीड़े परमेश्वर के सामने अपने दीनता के कार्यों पर ऐसा ही अर्थ लगाने के लिये प्रवृत्त होते हैं; और यह मानते हैं कि उनका, अपने मनोभावों के अधीन, स्वयं को इतना नीच और अयोग्य स्वीकार करने, और स्वयं को ऐसे निम्नतर लोगों के समान बरतने के लिये इतना तैयार पाना, उनकी बड़ी दीनता का चिन्ह है। इसका वास्तविक कारण, कि ऐसे बाहरी कार्य, और ऐसे भीतरी अभ्यास, ऐसे व्यक्ति में बड़ी दीनता जैसे प्रतीत होते हैं, यही है कि उसे अपने विषय में बड़ा अभिमान है। जबकि यदि वह अपने विषय में अधिक न्यायसंगत ढंग से सोचे, तो ये बातें उसे कुछ भी प्रतीत न होंगी, और इनमें उसकी दीनता किसी सम्मान के योग्य न होगी; बल्कि वह अपने अभिमान पर चकित होगा, कि जो इतना असीम रूप से तुच्छ और नीच है वह परमेश्वर के सामने और नीचा नहीं लाया गया।—जब वह अपने हृदय में कहता है, “यह दीनता का एक बड़ा कार्य है; यह निश्चय ही मुझमें बड़ी दीनता का चिन्ह है, कि मैं ऐसा अनुभव करूं और ऐसा करूं;” तो उसका अर्थ यह होता है, “यह मेरे लिये, ऐसे व्यक्ति के लिये जो मैं हूं, जो इतना महत्त्वपूर्ण और योग्य है, बड़ी दीनता है।” वह विचार करता है कि वह अब कितना नीचे लाया गया है, और इसकी तुलना उस प्रतिष्ठा की ऊंचाई से करता है, जिस पर वह अपने हृदय में सोचता है कि वह उचित रूप से खड़ा है, और यह दूरी उसे बहुत बड़ी प्रतीत होती है, और वह इस सबको मात्र दीनता कहता है, और इस रूप में इसकी प्रशंसा करता है। जबकि, जो सचमुच दीन है, और परमेश्वर के सामने अपनी नीचता और घृणितता को वास्तव में देखता है, उसमें यह दूरी विपरीत दिशा में प्रतीत होती है। जब वह सबसे नीचे लाया जाता है, तो उसे यह प्रतीत नहीं होता कि वह अपने उचित स्थान से नीचे लाया गया है, बल्कि यह कि वह अभी उस तक पहुंचा ही नहीं है; वह स्वयं को अब भी उससे कहीं ऊपर पाता है, वह और नीचे जाने के लिये लालायित रहता है, ताकि वह उस तक पहुंच सके, परन्तु वह अपने आप को उससे बहुत दूर पाता है। और इसी दूरी को वह अभिमान कहता है। और इसलिये उसे अपना अभिमान बड़ा प्रतीत होता है, न कि अपनी दीनता। क्योंकि यद्यपि वह अपने पूर्व स्तर से कहीं अधिक नीचे लाया गया है, तथापि उसे यह दीनता के नाम के योग्य प्रतीत नहीं होता, कि जो इतना असीम रूप से नीच और घृणित है, वह उस स्थान तक उतरे, जो यद्यपि उस स्तर से नीचा है जिसे वह पहले अपनाता था, तथापि उससे कहीं ऊंचा है जो उसके लिये उचित है। जैसे लोग किसी तुच्छ दास में, जो पहले राजकुमार होने का दिखावा करता था, उसकी आत्मा को इतना नीचे लाए जाने को, कि वह एक कुलीन का स्थान ग्रहण कर ले, दीनता के नाम के योग्य कदाचित ही मानेंगे; जबकि यह अब भी उसके उचित स्थान से इतना ऊपर है।
संसार के सब मनुष्य, अपनी और औरों की दीनता की मात्रा को, जो उनके किसी कार्य में प्रकट होती है, आंकने में, दो बातों पर विचार करते हैं, अर्थात, वह वास्तविक प्रतिष्ठा की मात्रा जिस पर वे खड़े
VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है। हैं; और वह दीनता की मात्रा, तथा उस वास्तविक प्रतिष्ठा से उसका जो सम्बन्ध है। इस प्रकार एक ही निम्न स्थान अथवा निम्न कार्य को स्वीकार करना एक में बड़ी दीनता का प्रमाण हो सकता है, जो दूसरे में बहुत थोड़ी अथवा कोई भी दीनता प्रमाणित नहीं करता। परन्तु सच्चे दीन मसीही अपनी वास्तविक प्रतिष्ठा के विषय में इतनी नीची राय रखते हैं, कि उनकी सारी आत्म-दीनता, जब उससे सम्बन्धित करके और उसके साथ तुलना करके देखी जाए, तो उन्हें अत्यन्त छोटी प्रतीत होती है। उन्हें यह कोई बड़ी दीनता, अथवा कोई ऐसी दीनता प्रतीत नहीं होती जिसकी बड़ाई की जाए, कि उन जैसे दीन, नीच, तुच्छ प्राणी परमेश्वर के चरणों में पड़े रहें।
दीनता की मात्रा को दीनता की मात्रा और दीन होने के कारण की मात्रा से आंका जाना चाहिये: परन्तु जो सचमुच और श्रेष्ठ रूप से दीन है, वह उस कारण पर विचार करते हुए अपनी दीनता को कभी महान नहीं मानता। उसके दीन होने का कारण उसे इतना बड़ा प्रतीत होता है, और उसके हृदय की मनोदशा की दीनता उससे इतनी कम पड़ती है, कि वह अपनी दीनता की अपेक्षा अपने अभिमान पर कहीं अधिक ध्यान देता है।
जिस किसी ने भी पाप के बोध के अधीन प्राणों के साथ व्यवहार किया है, वह जानता है कि जो पाप का गहरा बोध रखते हैं, वे स्वयं को गहरा बोध रखनेवाला मानने के लिये प्रवृत्त नहीं होते। और इसका कारण यह है: मनुष्य अपने पाप के बोध की मात्रा को दो बातों को साथ मिलाकर आंकते हैं, अर्थात, दोष और मलिनता का जो बोध उन्हें है उसकी मात्रा, और उनकी वास्तविक पापिष्ठता की मात्रा में, ऐसे बोध के लिये उनके पास जो कारण है उसकी मात्रा। कुछ मनुष्यों का स्वयं को संसार के अधिकांश औरों से बढ़कर पापी मानना वास्तव में पाप के किसी गहरे बोध का प्रमाण नहीं है; क्योंकि वे सचमुच वैसे ही हैं, बिलकुल स्पष्ट और सर्वविदित रूप से। और इसलिये पाप का कहीं कम बोध भी ऐसे व्यक्ति को दूसरे की अपेक्षा ऐसा सोचने के लिये प्रवृत्त कर सकता है; उसे इसके प्रति सचेत न होने के लिये सचमुच बहुत अंधा होना पड़ेगा। परन्तु जो सचमुच पाप के गहरे बोध के अधीन है, वह स्वाभाविक रूप से इसे अपनी ही दशा मानता है। उसे यह प्रतीत होता है कि दोष और मलिनता के प्रति सचेत होने का जो कारण उसके पास है, वह औरों के पास मौजूद कारण से बड़ा है; और इसलिये वह अपने इस बोध का श्रेय अपने पाप की महानता को देता है, न कि अपनी सम्वेदनशीलता की महानता को।
जो गहरे बोध के अधीन है, उसके लिये यह स्वाभाविक है कि वह स्वयं को वास्तव में सबसे बड़े पापियों में से एक माने, और यह भी माने कि यह बात बिलकुल स्पष्ट और प्रत्यक्ष है; क्योंकि उसका बोध जितना गहरा होता है, यह उसे उतना ही अधिक स्पष्ट और प्रत्यक्ष प्रतीत होता है। और इसलिये उसे यह अनिवार्य रूप से इतना स्पष्ट और इतना सहज प्रतीत होता है कि इसे बिना अधिक बोध के भी देखा जा सकता है। वह मनुष्य गहरे बोध के अधीन है, जिसका बोध उसके पाप के अनुपात में महान हो। परन्तु जो सचमुच गहरे बोध के अधीन है, वह किसी भी स्थिति में अपने बोध को अपने पाप के अनुपात में महान नहीं मानता।
क्योंकि यदि वह ऐसा माने, तो यह निश्चित चिन्ह है कि वह भीतर ही भीतर अपने पापों को छोटा मानता है। और यदि ऐसा हो, तो यह निश्चित प्रमाण है कि उसका बोध छोटा है। और यह, संयोगवश, वह मुख्य कारण है कि जब लोग दीनता के कार्य के अधीन होते हैं, तो वे उस समय इसके प्रति सचेत नहीं होते।
और जैसा पाप के बोध के विषय में है, ठीक वैसा ही, समान तर्क से, लोगों के अपनी नीचता और घृणितता, अपने अंधेपन, अपनी असमर्थता के बोध अथवा सचेतता के विषय में भी है, और उस सारी दीन भावना के विषय में भी है जो एक मसीही सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के अभ्यास में अपने विषय में रखता है। इसलिये इसकी उच्च मात्रा में, संत कभी भी यह मानने के लिये प्रवृत्त नहीं होते कि VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है। अपनी नीचता, मलिनता, असमर्थता आदि के प्रति उनका बोध महान है; क्योंकि उस कारण पर विचार करते हुए यह उन्हें कभी भी महान प्रतीत नहीं होता।
एक श्रेष्ठ संत स्वयं को किसी भी बात में श्रेष्ठ मानने के लिये प्रवृत्त नहीं होता; उसके सब अनुग्रह और अनुभव उसे तुलनात्मक रूप से छोटे प्रतीत होने को तत्पर रहते हैं; परन्तु विशेष रूप से उसकी दीनता।
मसीही अनुभव और सच्ची भक्ति से सम्बन्धित ऐसी कोई बात नहीं जो उसकी दृष्टि से उतनी दूर हो जितनी उसकी अपनी दीनता। वह अपने अभिमान को पहचानने में अपनी दीनता को पहचानने की अपेक्षा हज़ार गुना अधिक तीक्ष्ण-दृष्टि रखता है: उसे वह सरलता से पहचान लेता है, और उस पर बहुत ध्यान देने के लिये प्रवृत्त होता है, परन्तु अपनी दीनता को शायद ही पहचान पाता है। इसके विपरीत, वह भ्रमित कपटी, जो आत्मिक अभिमान के प्रभाव के अधीन है, अपने अभिमान के प्रति जितना अंधा है उतना और किसी बात के प्रति नहीं; और उसमें जो दीनता के दिखावे हैं, उनके प्रति जितना तीक्ष्ण-दृष्टि रखता है उतना और किसी बात के प्रति नहीं।
दीन मसीही औरों के अभिमान की अपेक्षा अपने ही अभिमान में दोष निकालने के लिये अधिक प्रवृत्त होता है।
वह औरों की बातों और व्यवहार पर सबसे अच्छा अर्थ लगाने के लिये प्रवृत्त होता है, और यह मानता है कि उसके समान अभिमानी कोई नहीं है। परन्तु अभिमानी कपटी इस विषय में अपने भाई की आंख के तिनके को शीघ्र पहचान लेता है; जबकि वह अपनी ही आंख के लट्ठे को कुछ भी नहीं देखता। वह प्रायः बहुत औरों के अभिमान पर चिल्लाता रहता है, औरों के वस्त्रों और जीवन-शैली में दोष निकालता है; और अपने पड़ोसी की अंगूठी या फीते से उतना ही, बल्कि उससे दस गुना अधिक, प्रभावित होता है जितना अपने ही हृदय की सारी मलिनता से।
कपटियों में जो यह स्वभाव है कि वे अपनी दीनता के विषय में ऊंचा विचार रखें, उससे यह होता है कि कपटी दीनता स्वयं को दिखाने के लिये आगे बढ़ती है। जिनमें यह होती है, वे अपनी दीनताओं की बहुत चर्चा करने के लिये, और उन्हें ऊंचे शब्दों में प्रस्तुत करने के लिये, और बनावटी दृष्टि, भाव-भंगिमा, अथवा बोलने के ढंग, अथवा वस्त्रों की सादगी, अथवा किसी बनावटी विशिष्टता में दीनता का बड़ा बाहरी दिखावा करने के लिये प्रवृत्त होते हैं। प्राचीन समय में झूठे भविष्यद्वक्ताओं के साथ भी ऐसा ही था,
जकर्याह 13:4; कपटी यहूदियों के साथ भी ऐसा ही था, यशायाह 57:5, और मसीह हमें बताते हैं कि फरीसियों के साथ भी ऐसा ही था, मत्ती 6:16। परन्तु सच्ची दीनता के साथ इसके विपरीत है; जिनमें यह होती है, वे इसे प्रकट करने में अपनी वाक्पटुता दिखाने के लिये, अथवा अपनी दीनता की मात्रा को कठोर शब्दों में कहने के लिये प्रवृत्त नहीं होते।61 यह वस्त्रों की किसी विशिष्ट बाहरी सादगी, अथवा जीवन-शैली में स्वयं को दिखाने का प्रयत्न नहीं करती; जैसा मत्ती 6:17 में निहित है, “परन्तु जब तू उपवास करे, तो अपने सिर पर तेल मल, और अपना मुंह धो।” कुलुस्सियों 2:23, “ये बातें स्ववरीत भक्ति, और दीनता, और देह के दमन में ज्ञान का सा नाम तो रखती हैं।” न ही सच्ची दीनता कोई शोरगुल की वस्तु है; यह ऊंची और उत्पाती नहीं है। पवित्रशास्त्र इसे इसके विपरीत स्वभाव की बताता है।
अहाब में, जब उसमें एक दृश्य दीनता थी, सच्ची दीनता की एक झलक, वह धीरे-धीरे चला, 1 राजा 61 श्री जोन्स का, अपने नये नियम की प्रामाणिक पुस्तकों के उत्कृष्ट ग्रन्थ में, यह अवलोकन है, कि सुसमाचार-लेखक मरकुस, जो प्रेरित पतरस का साथी था, और जिसके विषय माना जाता है कि उसने अपना सुसमाचार उसी प्रेरित के निर्देशन में लिखा, जब वह अपने स्वामी का इन्कार करने के बाद पतरस के पश्चाताप का उल्लेख करता है, तो अन्य सुसमाचार-लेखकों की भांति उसे प्रकट करने के लिये उतने कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं करता; वह केवल ये शब्द काम में लाता है, “जब उसने इस पर सोचा, तो रोया,” मरकुस 14:72; जबकि अन्य सुसमाचार-लेखक यों कहते हैं, “वह बाहर जाकर फूट-फूटकर रोया,” मत्ती 26:75, लूका
VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है।
21:27। एक पश्चातापी व्यक्ति को, सच्ची दीनता के अभ्यास में, स्थिर और मौन दिखाया गया है, विलापगीत
3:28, “वह एकाकी बैठा रहे, और चुप रहे, क्योंकि यह भार उस पर परमेश्वर ने डाला है।” और मौन को दीनता के साथ रहनेवाली बात के रूप में बताया गया है, नीतिवचन 30:32, “यदि तू ने अपने को बढ़ाने के लिये मूर्खता की हो, अथवा बुरी युक्ति की हो, तो अपने मुंह पर हाथ रख।”
इस प्रकार मैंने विशेष रूप से और विस्तार से उस सच्ची दीनता के स्वभाव को दिखाया है जो पवित्र मनोभावों के साथ रहती है, जैसा यह लोगों को धर्म में अपनी उपलब्धियों को, औरों की उपलब्धियों की तुलना में, विशेष रूप से दीनता में अपनी उपलब्धियों को, नीचा मानने की प्रवृत्ति में प्रकट होता है: और मैंने आत्मिक अभिमान की विपरीत प्रवृत्ति भी दिखाई है, जो लोगों को इन विषयों में अपनी उपलब्धियों को महान मानने के लिये प्रवृत्त करती है। मैंने इस पर कुछ अधिक बल दिया है, क्योंकि मैं इसे बड़े महत्त्व की बात मानता हूं, क्योंकि यह सच्ची और कपटी दीनता के बीच एक निश्चित भेद प्रदान करता है; और साथ ही इसलिये भी कि कपटियों की यह प्रवृत्ति, कि वे स्वयं को औरों से अच्छा मानें, वही है जिसे परमेश्वर ने अपने लिये अत्यन्त घृणित घोषित किया है, “मेरे नथुनों में धूआं, और सारे दिन जलनेवाली आग,” यशायाह 65:5। इसे उस पवित्र नगर (जैसा वह कहलाता था) यरूशलेम के निवासियों के अभिमान के एक उदाहरण के रूप में उल्लेख किया गया है, कि वे स्वयं को सदोम के लोगों से कहीं अच्छा मानते थे, और इसलिये उन्हें अपने द्वारा उपेक्षित और तुच्छ जानने योग्य समझते थे: यहेजकेल 16:56, “क्योंकि तेरी बहिन सदोम की चर्चा तेरे मुंह से तेरे अभिमान के दिनों में नहीं हुई थी।”
पाठक इन बातों को अपने ऊपर लागू करने में हलके में न ले। यदि आपने एक बार यह ग्रहण कर लिया है, कि किसी व्यक्ति का स्वयं को औरों से अच्छा संत मानने के लिये प्रवृत्त होना बुरा चिन्ह है, तो आपके अपने पक्ष में एक अंधा करनेवाला पूर्वाग्रह उठ खड़ा होगा; और सम्भवतः यह निर्धारित करने के लिये कि क्या आपके साथ भी ऐसा है, आत्म-परीक्षा की बड़ी कठोरता की आवश्यकता होगी। यदि इस प्रश्न के उठाए जाने पर आप उत्तर दें, “नहीं, मुझे तो लगता है, मेरे समान बुरा और कोई नहीं,” तो इस बात को यों ही न जाने दें; बल्कि फिर से परखें, कि क्या आप इसी बात के कारण स्वयं को औरों से अच्छा नहीं मानते, क्योंकि आप कल्पना करते हैं कि आप अपने विषय में इतनी नीची राय रखते हैं। क्या आपकी इस दीनता के विषय में ऊंची राय नहीं है? और यदि आप फिर उत्तर दें, “नहीं; मेरी अपनी दीनता के विषय में कोई ऊंची राय नहीं है; मुझे तो लगता है मैं शैतान के समान अभिमानी हूं;” तो भी फिर से परखें, कि क्या इस आवरण के नीचे आत्म-अभिमान नहीं उठता; कि क्या इसी बात के कारण, कि आप स्वयं को शैतान के समान अभिमानी मानते हैं, आप स्वयं को अत्यन्त दीन नहीं मानते।
सच्ची और कपटी दीनता के स्वभाव के बीच, उनके धारकों का स्वयं के प्रति जो आदर होता है उस विषय में, जो यह विरोध है, उससे स्वभाव और व्यवहार में अनेक प्रकार की विपरीतता उत्पन्न होती है।
एक सच्चा दीन व्यक्ति, अपनी धार्मिकता और पवित्रता के विषय में ऐसी नीची राय रखते हुए, मन का दीन होता है। किसी व्यक्ति का मन का दीन होना यह है कि वह अपने भीतर जो कुछ है उसके विषय में अपनी ही समझ और बोध में दीन हो, और उसी के अनुरूप स्वभाव का हो। इसलिये एक सच्चा दीन व्यक्ति, विशेष रूप से जो श्रेष्ठ रूप से दीन है, स्वाभाविक रूप से अनेक बातों में स्वयं को एक कंगाल मनुष्य के समान बरतता है। “कंगाल गिड़गिड़ाकर बोलता है, परन्तु धनी कठोरता से उत्तर देता है।” एक कंगाल मनुष्य धनवानों के बीच होने पर शीघ्र और ऊंचे क्रोध के लिये प्रवृत्त नहीं होता: वह औरों के आगे झुकने के लिये प्रवृत्त होता है,
VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है। क्योंकि वह जानता है कि दूसरे उससे ऊपर हैं; वह हठी और अपनी ही इच्छा पर अड़ा रहनेवाला नहीं होता; वह कठिन भोजन में धीरज रखता है; वह तुच्छ जाने जाने के सिवा और कुछ की आशा नहीं रखता, और इसे धैर्यपूर्वक सह लेता है; उसे यह बुरा नहीं लगता कि उसकी उपेक्षा की जाती है और उस पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है; वह निम्न स्थान में रहने के लिये तैयार रहता है; वह सहजता से अपने से बड़ों का आदर करता है; वह डांट को चुपचाप सह लेता है; वह औरों को अपने से ऊपर मानकर सहजता से उनका आदर करता है; वह सरलता से सिखाया जाना स्वीकार करता है, और अपनी समझ तथा अपने निर्णय पर बहुत दावा नहीं करता; वह अत्यधिक नाज़ुक अथवा तुनकमिज़ाज नहीं होता, और उसकी आत्मा कठिन बातों के प्रति वश में की गई है, वह घमण्डी नहीं है, न ही अपने ऊपर बहुत कुछ ले लेने के लिये प्रवृत्त है, बल्कि औरों के अधीन रहना उसके लिये स्वाभाविक है। दीन मसीही के साथ ऐसा ही है। दीनता (जैसा महान् मास्ट्रिक्ट इसे व्यक्त करता है) एक प्रकार की पवित्र लघु-आत्मता है।
जो मनुष्य अत्यन्त दीन है वह भिखारी है; वैसा ही वह भी है जो मन का दीन है। जो मनोभाव अनुग्रहमय हैं, और जो झूठे हैं, उनमें बड़ा अन्तर है: पहले के अधीन, व्यक्ति सदैव परमेश्वर के द्वारों पर एक दीन भिखारी बना रहता है, अत्यन्त रीता और अभावग्रस्त; परन्तु दूसरे मनुष्यों को अपनी ही दृष्टि में धनी, और वस्तुओं से भरपूर, और बहुत अभावग्रस्त न होने का आभास कराते हैं; उनके पास अपनी ही कल्पना में अपने निर्वाह के लिये बड़ा भण्डार होता है।
एक दीन मनुष्य अपनी बातचीत और व्यवहार में विनम्र होता है; वैसा ही, और उससे कहीं अधिक, और अधिक निश्चय तथा सार्वभौमिक रूप से, वह भी होता है जो मन का दीन है; वह मनुष्यों के बीच अपने व्यवहार में दीन और विनम्र होता है। किसी के लिये यह दिखावा करना व्यर्थ है कि वह दीन है, और परमेश्वर के सामने छोटे बालकों के समान है, जब वह मनुष्यों के बीच अपने व्यवहार में घमण्डी, दिखावटी और ढीठ हो। प्रेरित हमें बताता है कि सुसमाचार की योजना यह है कि सारी शेखी को न केवल परमेश्वर के सामने, वरन मनुष्यों के सामने भी काट डाला जाए, रोमियों 4:1, 2। कुछ लोग बड़ी दीनता का दिखावा करते हैं, जो अपने बाहरी रूप-रंग और व्यवहार में अत्यन्त घमण्डी, ढीठ और दिखावटी हैं: परन्तु उन्हें उन पवित्रशास्त्रों पर विचार करना चाहिये, भजन 131:1, “हे यहोवा, मेरा मन घमण्डी नहीं, और न मेरी आंखें ऊंची हैं; न मैं बड़े-बड़े कामों में, और न ऐसी बातों में जो मेरी पहुंच से परे हैं, हाथ लगाता हूं।” नीतिवचन 6:16, 17, “इन छः बातों से यहोवा बैर रखता है, वरन सात हैं जो उसके लिये घृणित हैं: घमण्ड से भरी आंखें, आदि।”—अध्याय
62 “यह आत्मा मनुष्य को सदैव अपनी ही दृष्टि में दीन, नीच और रीता बनाए रखती है।—जब मनुष्य को कुछ ज्ञान मिल जाता है, और वह भली-भांति बातचीत कर सकता है, और उसे स्वर्गीय वरदान का कुछ स्वाद, अनुग्रह की कुछ मीठी अनुभूतियां मिल जाती हैं, और इस प्रकार उसका विवेक कुछ शान्त हो जाता है: और यदि उसे अपनी प्रार्थनाओं के कुछ उत्तर मिल गए हों, और उसमें मीठे मनोभाव हों, तो वह भरपूर हो जाता है: और अपने विवेक को चैन मिलने पर, वह सचेतता को त्याग देता है, और पाप के अधीन प्रतिदिन कराहना छोड़ देता है। और इससे प्रार्थना की आत्मा मर जाती है: वह परमेश्वर की विधियों के प्रति अपना आदर खो बैठता है, उनकी वैसी आवश्यकता अनुभव नहीं करता; अथवा उनसे कोई भलाई नहीं पाता, उनसे कोई जीवन या सामर्थ्य अनुभव नहीं करता।—यह कुछ लोगों की दुखद दशा है; परन्तु वे इसे जानते नहीं। परन्तु अब जो आत्मा से भरपूर है, उसे प्रभु रीता करता है; और वह जितना अधिक जीता है उतना ही अधिक। इसलिये यद्यपि दूसरे यह सोचते हैं कि उसे अधिक अनुग्रह की आवश्यकता नहीं, तथापि वह स्वयं को सबसे दीन गिनता है।” शेपर्ड की दस कुंवारियों का दृष्टान्त, भाग 2, पृ. 132।
“सब भरपूरियों के बाद भी, सदैव रीता, भूखा, और आवश्यकता का अनुभव करनेवाला बना रह, और अधिक के लिये प्रार्थना करता रह।” वही, पृ. 151।
“सचमुच, भाइयो, जब मैं परमेश्वर के श्राप को बहुत से मसीहियों पर देखता हूं, जो अब अपनी योग्यताओं, वरदानों, शान्ति, शान्त्वना, क्षमताओं, कर्तव्यों से भरपूर हो गए हैं, तो मैं प्रभु की दया के धन की, कंगाल विश्वासियों की एक छोटी सी मुट्ठी भर संख्या के प्रति, चकित होकर आराधना करता हूं, न केवल इसलिये कि उसने उन्हें रीता किया, वरन इसलिये भी कि उसने उन्हें उनके सारे दिनों तक ऐसा ही रखा।” शेपर्ड का साउंड बिलीवर, बॉस्टन का नवीनतम संस्करण, पृ. 158, 159।
VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है।
21:4, “ऊंची आंखें और घमण्डी मन पाप ही हैं।” भजन 18:27, “तू घमण्डी आंखोंवालों को नीचा करेगा।”
और भजन 101:5, “जिसकी आंखें घमण्डी और जिसका मन अहंकारी है, उसे मैं सहने का नहीं।” 1 कुरिन्थियों
13:4, “प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, फूलता नहीं, अनुचित व्यवहार नहीं करता।” एक प्रकार की मनोहर विनम्रता और भय है जो मनुष्यों के बीच मसीही व्यवहार से सम्बन्धित है, जो दीनता से उत्पन्न होती है, जिसकी पवित्रशास्त्र प्रायः चर्चा करता है, 1 पतरस 3:15, “जो कोई तुम से तुम्हारी आशा का कारण पूछे, उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहो — नम्रता और भय के साथ।” रोमियों 13:7, “जिसे भय चाहिए, उसका भय मानो।” 2 कुरिन्थियों 7:15, “और वह तुम सब की आज्ञाकारिता को स्मरण करते हुए, कि तुम ने कैसे भय और कांपते हुए उसे ग्रहण किया,”
इफिसियों 6:5, “हे दासो, भय और कांपते हुए, अपने शारीरिक स्वामियों की आज्ञा मानो।” 1 पतरस 2:18, “हे दासो, सम्पूर्ण भय के साथ अपने स्वामियों के अधीन रहो।” 1 पतरस
3:2, “जब वे तुम्हारे भय-सहित पवित्र चालचलन को देखेंगे।” 1 तीमुथियुस 2:9, “कि स्त्रियां लज्जा और संयम के साथ सभ्य वस्त्र पहिनें।” इस विषय में एक मसीही एक छोटे बालक के समान है; एक छोटा बालक मनुष्यों के सामने विनम्र होता है, और उसका हृदय उनके बीच भय और श्रद्धा से भरा रहने के लिये प्रवृत्त होता है।
यही आत्मा एक मसीही को सब मनुष्यों का आदर करने के लिये प्रवृत्त करेगी: 1 पतरस 2:17, “सब का आदर करो।”
एक दीन मसीही केवल अपने व्यवहार में संतों का ही आदर करने के लिये प्रवृत्त नहीं होता; वरन औरों का भी, उन सब रीतियों में जो उनके पापों की प्रत्यक्ष स्वीकृति का अर्थ न रखें। इस प्रकार अब्राहम, विश्वासियों का महान आदर्श, हित्तियों की सन्तान का आदर करता था: उत्पत्ति 23:7, “अब्राहम उठा, और उस देश के लोगों को दण्डवत करके प्रणाम किया।” यह उनके प्रति दीन व्यवहार का एक उल्लेखनीय उदाहरण था जो मसीह से बाहर थे, और जिन्हें अब्राहम शापित जानता था: और इसलिये वह किसी भी रीति से अपने सेवक को यह अनुमति न देता कि वह उनमें से अपने पुत्र के लिये पत्नी ले आए; और एसाव की पत्नियां, जो इन्हीं हित्तियों की सन्तान में से थीं, इसहाक और रिबका के मन के लिये दुख का कारण थीं।
इसी प्रकार पौलुस ने फेस्तुस का आदर किया: प्रेरितों के काम 26:25, “हे महाप्रतापी फेस्तुस, मैं पागल नहीं।” मसीही दीनता लोगों को न केवल उन दुष्ट मनुष्यों का आदर करने के लिये प्रवृत्त करेगी जो दृश्य कलीसिया से बाहर हैं, वरन झूठे भाइयों और सतानेवालों का भी। जैसे याकूब ने, जब वह एक उत्तम मनोदशा में था, अभी-अभी सारी रात परमेश्वर से मल्लयुद्ध करके आशीष पाकर, अपने झूठे और सतानेवाले भाई एसाव का आदर किया: उत्पत्ति 33:3, “और वह आप उनके आगे-आगे चला, और अपने भाई एसाव के निकट पहुंचने तक सात बार भूमि पर गिरकर दण्डवत करता गया।” इस प्रकार उसने उसे स्वामी कहा; और अपने सारे घराने को आज्ञा दी कि वे भी उसी रीति से उसका आदर करें।
इस प्रकार मैंने यह वर्णन करने का प्रयत्न किया है कि जो व्यक्ति सच्ची अनुग्रहमय दीनता के अधीन शासित होता है, उसका हृदय और व्यवहार कैसा होता है, यथासम्भव पवित्रशास्त्र के ठीक अनुरूप।
अब, ऐसे ही हृदय से सारे सच्चे पवित्र मनोभाव प्रवाहित होते हैं। मसीही मनोभाव मरियम के उस बहुमूल्य इत्र के समान हैं, जिसे उसने मसीह के सिर पर उंडेला, और जिसने सारे घर को सुगन्ध से भर दिया। वह सुगन्धित तेल संगमरमर की एक कुप्पी से उंडेला गया था; इसी प्रकार अनुग्रहमय मनोभाव एक शुद्ध हृदय से मसीह की ओर प्रवाहित होते हैं। वह एक टूटी हुई कुप्पी से उंडेला गया था; जब तक कुप्पी टूटती नहीं, तब तक इत्र न तो बह सकता था, न अपनी सुगन्ध फैला सकता था; इसी प्रकार अनुग्रहमय मनोभाव एक टूटे हुए हृदय से प्रवाहित होते हैं। अनुग्रहमय मनोभाव मरियम मगदलीनी के मनोभावों के समान भी हैं (लूका 7 के अन्त में), जो भी संगमरमर की एक टूटी हुई कुप्पी से मसीह पर बहुमूल्य इत्र उंडेलती है, और उससे यीशु के पांवों का अभिषेक करती है, जब उसने उन्हें अपने आंसुओं से धोया, और पोंछा
VI. अनुग्रहमय मनोभावों के साथ सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता होती है। उन्हें अपने सिर के बालों से। सारे अनुग्रहमय मनोभाव, जो मसीह के लिये सुगन्ध हैं, और जो मसीही के प्राण को स्वर्गीय मिठास और सुगन्ध से भर देते हैं, टूटे हुए हृदय के मनोभाव होते हैं। एक सच्चा मसीही प्रेम, चाहे परमेश्वर के प्रति हो या मनुष्यों के प्रति, एक दीन, टूटे हुए हृदय का प्रेम होता है।
संतों की अभिलाषाएं, चाहे कितनी ही उत्कट क्यों न हों, दीन अभिलाषाएं होती हैं। उनकी आशा एक दीन आशा है; और उनका आनन्द, चाहे वह अवर्णनीय और महिमा से भरपूर हो, एक दीन, टूटे हुए हृदय का आनन्द है, जो मसीही को और अधिक मन का दीन बना देता है; और और अधिक एक छोटे बालक के समान बना देता है, और उसे व्यवहार में सर्वव्यापी नम्रता के लिये और अधिक प्रवृत्त करता है।
VII. एक और बात, जिसमें अनुग्रहमय मनोभाव औरों से भिन्न होते हैं,... VII. एक और बात, जिसमें अनुग्रहमय मनोभाव औरों से भिन्न होते हैं, यह है, कि उनके साथ स्वभाव का परिवर्तन होता है।
सारे अनुग्रहमय मनोभाव एक आत्मिक समझ से उत्पन्न होते हैं, जिसमें प्राण के सामने दिव्य वस्तुओं की उत्कृष्टता और महिमा प्रकट की जाती है, जैसा पहले दिखाया जा चुका है। परन्तु सारे आत्मिक प्रकाशन रूपान्तरकारी होते हैं; और वे न केवल प्राण के वर्तमान अभ्यास, सम्वेदना और मनोदशा में परिवर्तन लाते हैं, वरन उनमें ऐसी सामर्थ्य और प्रभावशीलता है, कि वे प्राण के स्वभाव में ही परिवर्तन ला देते हैं: 2 कुरिन्थियों 3:18, “पर हम सब अनावरण मुंह से प्रभु की महिमा को दर्पण में देखते हुए, प्रभु की आत्मा के द्वारा उसी की समानता के अनुसार महिमा से महिमा तक बदलते जाते हैं।” ऐसी सामर्थ्य वास्तव में दिव्य सामर्थ्य है, और यह प्रभु के आत्मा के लिये विशिष्ट है: अन्य सामर्थ्य मनुष्यों की वर्तमान मनोदशाओं और भावनाओं में परिवर्तन ला सकती है: परन्तु केवल सृष्टिकर्ता की सामर्थ्य ही स्वभाव को बदल सकती है, अथवा एक नया स्वभाव दे सकती है। और कोई भी प्रकाशन अथवा प्रबोधन, सिवाय उनके जो दिव्य और अलौकिक हैं, यह अलौकिक प्रभाव नहीं रखते। परन्तु जो प्रकाशन सचमुच दिव्य हैं, उन सब में यह प्रभाव होता है।
प्राण इन प्रकाशनों से गहराई से प्रभावित होता है, और इस प्रकार प्रभावित होता है कि रूपान्तरित हो जाता है।
उन मनोभावों के साथ भी ऐसा ही है जिनका प्राण अपने परिवर्तन में विषय होता है। परिवर्तन के पवित्रशास्त्रीय वर्णन स्वभाव के परिवर्तन को दृढ़ता से इंगित और संकेत करते हैं: जैसे “नया जन्म पाना; नई सृष्टि बनना; मरे हुओं में से उठना; मन की आत्मा में नया बनाया जाना; पाप के लिये मरना, और धार्मिकता के लिये जीना; पुराने मनुष्यत्व को उतार डालना, और नये मनुष्यत्व को पहन लेना; एक नये वृक्ष में कलम की जाना; हृदय में एक दिव्य बीज बोया जाना; ईश्वरीय स्वभाव में भागी बनाया जाना,” आदि।
इसलिये यदि जो लोग मानते हैं कि उन्होंने परिवर्तन के कार्य का अनुभव किया है, उनमें कोई बड़ा और उल्लेखनीय स्थायी परिवर्तन न हो, तो उनकी सारी कल्पनाएं और दावे व्यर्थ हैं, चाहे वे कितना ही प्रभावित हुए हों।63 परिवर्तन मनुष्य का एक बड़ा और सर्वांगीण परिवर्तन है, जो उसे पाप से परमेश्वर की ओर फेरता है। परिवर्तित होने से पहले मनुष्य को पाप से रोका जा सकता है; परन्तु जब वह परिवर्तित हो जाता है, तो न केवल वह पाप से रोका जाता है, वरन उसका हृदय और स्वभाव ही उससे पवित्रता की ओर फिर जाता है: यहां तक कि उसके बाद वह एक पवित्र व्यक्ति, और पाप का शत्रु बन जाता है। इसलिये यदि किसी व्यक्ति के अपने कथित प्रथम परिवर्तन में उच्च मनोभावों के बाद, थोड़े ही समय में यह देखा जाए कि उन बुरे गुणों और दुष्ट स्वभावों में, जो पहले उसमें दिखाई देते थे, उसमें कोई सुस्पष्ट अथवा उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं है, और वह सामान्यतः उसी प्रकार के स्वभावों के प्रभाव में है जैसा वह पहले हुआ करता था, और वही बात उसके चरित्र से जुड़ी प्रतीत होती है; वह पहले के समान ही स्वार्थी, शारीरिक, मूढ़, और हठी, अमसीही और नीरस प्रतीत होता है; तो यह उसके विरुद्ध, अनुभवों की चाहे कितनी ही उज्ज्वल कहानी क्यों न सुनाई गई हो, उससे कहीं बड़ा प्रमाण है। क्योंकि मसीह यीशु में न खतना कुछ है, न खतनारहित होना,
63 “मैं सारे प्राण के मसीह के पास आने का न्याय अचानक आई पीड़ाओं से उतना नहीं करूंगा जितना भीतरी रुझान से। क्योंकि सारा प्राण, स्नेहपूर्ण अभिव्यक्तियों और कार्यों में, मसीह की ओर ले जाया जा सकता है; परन्तु इस रुझान और मनोभावों के परिवर्तन के बिना होना, अस्वस्थ है।” शेपर्ड का दृष्टान्त, भाग 1, पृ. 203।
VII. एक और बात, जिसमें अनुग्रहमय मनोभाव औरों से भिन्न होते हैं,... न ऊंचा अंगीकार, न नीचा अंगीकार, न कोई सुन्दर कहानी, न कोई टूटी हुई कहानी, कुछ भी काम की है; परन्तु एक नई सृष्टि होना ही काम की बात है।
यदि किसी व्यक्ति में कुछ समय के लिये एक बहुत बड़ा दृश्य परिवर्तन हो; परन्तु यदि वह स्थायी न हो, बल्कि वह बाद में नियमित रूप से लगभग वैसा ही बन जाए जैसा वह पहले था; तो यह स्वभाव का परिवर्तन प्रतीत नहीं होता; क्योंकि स्वभाव एक स्थायी वस्तु है। एक सूअर, जो मलिन स्वभाव का होता है, धोया जा सकता है, परन्तु सूअर का स्वभाव बना रहता है; और एक कबूतर, जो स्वच्छ स्वभाव का होता है, मैला किया जा सकता है, परन्तु उसका स्वच्छ स्वभाव बना रहता है।64
वास्तव में स्वाभाविक स्वभाव के लिये कुछ छूट दी जानी चाहिये; परिवर्तन स्वाभाविक स्वभाव को पूर्णतः जड़ से नहीं उखाड़ता; जिन पापों की ओर मनुष्य अपने परिवर्तन से पहले अपनी स्वाभाविक बनावट के कारण सबसे अधिक प्रवृत्त था, वह अब भी उन्हीं में गिरने के लिये सबसे अधिक प्रवृत्त हो सकता है। परन्तु फिर भी परिवर्तन इन पापों के सम्बन्ध में भी एक बड़ा परिवर्तन लाएगा। यद्यपि अनुग्रह, जब तक अपूर्ण है, किसी दुष्ट स्वाभाविक स्वभाव को जड़ से नहीं उखाड़ता, तथापि उसे सुधारने के सम्बन्ध में उसमें बड़ी सामर्थ्य और प्रभावशीलता होती है। परिवर्तन में जो परिवर्तन किया जाता है, वह एक सर्वांगीण परिवर्तन है; अनुग्रह मनुष्य को उन सब बातों के सम्बन्ध में बदल देता है जो उसमें पापपूर्ण हैं; पुराना मनुष्यत्व उतार दिया जाता है, और नया मनुष्यत्व पहना दिया जाता है, वह सर्वांग रूप से पवित्र किया जाता है; और मनुष्य एक नई सृष्टि बन जाता है, पुरानी बातें बीत जाती हैं, और सब कुछ नया हो जाता है; सारे पाप मार डाले जाते हैं, स्वाभाविक बनावट के पाप भी उतने ही जितने अन्य। यदि कोई मनुष्य अपने परिवर्तन से पहले अपनी स्वाभाविक बनावट के कारण विशेष रूप से कामुकता, अथवा मतवालेपन, अथवा द्वेष की ओर प्रवृत्त था; तो परिवर्तनकारी अनुग्रह इन दुष्ट प्रवृत्तियों के सम्बन्ध में उसमें एक बड़ा परिवर्तन लाएगा; यहां तक कि यद्यपि वह अब भी इन पापों के सबसे बड़े खतरे में हो सकता है, तथापि वे अब उस पर प्रभुता नहीं करेंगे; न ही वे अब उसके स्वभाव का उचित अंग रह जाएंगे। हां, सच्चा पश्चाताप कुछ बातों में मनुष्य को विशेष रूप से उसकी अपनी उस बुराई के विरुद्ध कर देता है, जिसमें वह सबसे अधिक दोषी रहा है, और जिससे उसने परमेश्वर का सबसे अधिक अनादर किया है। जो अन्य पापों को त्यागता है, परन्तु अपने प्रमुख पाप को, उस बुराई को जिसकी ओर वह मुख्य रूप से प्रवृत्त है, बचा लेता है, वह उस शाऊल के समान है, जब उसे परमेश्वर के शत्रु अमालेकियों के विरुद्ध, यह कड़ा आदेश देकर भेजा गया था कि उनमें से किसी को भी जीवित न छोड़े, वरन छोटे-बड़े सभी को पूरी तरह नष्ट कर दे; जिसने निम्न लोगों को तो पूरी तरह नष्ट कर दिया, परन्तु उनके राजा को, जो उन सब में मुखिया था, जीवित बचा लिया।
कुछ लोग मूर्खतापूर्वक इसे अपने प्रकाशनों और मनोभावों के पक्ष में एक तर्क बना लेते हैं, कि जब वे बीत जाते हैं, तो वे पूर्णतः बिना किसी जीवन या सम्वेदना के, अथवा जो उनके पास पहले से था उससे बढ़कर कुछ भी बिना रह जाते हैं। वे इसे इस बात का प्रमाण मानते हैं कि जो कुछ उन्होंने अनुभव किया वह पूर्णतः परमेश्वर की ओर से था, न कि अपनी ओर से, क्योंकि (वे कहते हैं) जब परमेश्वर चला जाता है, तो सब कुछ चला जाता है; वे कुछ भी देख या अनुभव नहीं कर सकते, और वे उससे बेहतर नहीं हैं जैसे वे पहले हुआ करते थे।
64 “प्राण के साथ भी वैसा ही है जैसा जल के साथ; सारी ठण्डक जा सकती है, परन्तु ठण्डक का मूल सिद्धान्त फिर भी बना रहता है।
तू वासनाओं की जलन को दूर कर सकता है, स्वभाव की कालिमा को नहीं। जहां पाप का बल है, विवेक का निश्चिन्तता से भय की ओर परिवर्तन, जीवन का अभक्तिपूर्णता से शिष्टता की ओर परिवर्तन, और संसार की चाल-ढाल, उसकी मलिनताओं से बचने के लिये, वासनाओं का परिवर्तन, इन्हें कुछ समय के लिये बुझा सकता है: परन्तु सबसे उत्तम कपटी में भी स्वभाव कभी नहीं बदला जाता।” शेपर्ड का दृष्टान्त, भाग 1, पृ. 194।
VII. एक और बात, जिसमें अनुग्रहमय मनोभाव औरों से भिन्न होते हैं,... यह अत्यन्त सत्य है, कि संतों के हृदयों में सारा अनुग्रह और भलाई पूर्णतः परमेश्वर की ओर से है; और वे इसके लिये पूर्णतः और प्रत्यक्ष रूप से उसी पर आश्रित हैं। परन्तु फिर भी ये लोग इस विषय में भूल करते हैं कि परमेश्वर किस रीति से प्राण को उद्धारक अनुग्रह देने में स्वयं को और अपने पवित्र आत्मा को सम्प्रेषित करता है। वह अपने आत्मा को प्राण की शक्तियों से संयुक्त होने के लिये, और वहां एक स्वाभाविक सिद्धान्त की रीति से निवास करने के लिये देता है; ताकि प्राण, अनुग्रह से युक्त होते हुए, एक नये स्वभाव से युक्त हो जाए: परन्तु स्वभाव एक स्थायी वस्तु है। अनुग्रह के सारे अभ्यास पूर्णतः मसीह की ओर से हैं: परन्तु वे अभ्यास मसीह से इस रीति से नहीं आते, मानो कोई ऐसी वस्तु हो जो जीवित हो, हिलती-डुलती हो, जबकि वह स्वयं बिना जीवन के हो, और बिना जीवन के ही रहती हो; बल्कि इस रीति से कि उसमें जीवन का संचार किया गया हो; ताकि, मसीह की सामर्थ्य से, उसमें स्वयं एक जीवन्त स्वभाव अन्तर्निहित हो।
जिस प्राण में मसीह उद्धारकारी रीति से है, वहां वह जीवित रहता है। वह न केवल इसके बाहर रहकर इसे बलपूर्वक सक्रिय करता है, वरन वह इसके भीतर रहता है, ताकि वह भी जीवित हो जाए। प्राण में अनुग्रह उतना ही मसीह से है, जितना सूर्य की किरणों में रखे गए कांच में प्रकाश सूर्य से है। परन्तु यह प्राण को अनुग्रह के सम्प्रेषण की रीति को केवल आंशिक रूप से दर्शाता है; क्योंकि कांच वैसा ही बना रहता है जैसा था, उसका स्वभाव तनिक भी नहीं बदलता, वह अपने स्वभाव में पहले जितना ही प्रकाशरहित रहता है। परन्तु एक संत का प्राण धार्मिकता के सूर्य से इस रीति से प्रकाश ग्रहण करता है, कि उसका स्वभाव ही बदल जाता है, और वह ठीक रीति से एक प्रकाशमान वस्तु बन जाता है; सूर्य केवल संतों में चमकता ही नहीं, वरन वे स्वयं भी छोटे-छोटे सूर्य बन जाते हैं, जो अपने प्रकाश के स्रोत के स्वभाव में भागी होते हैं। इस सम्बन्ध में, उनके प्रकाश पाने की रीति, किसी परावर्तक कांच की रीति के बजाय, निवासस्थान के दीपकों की रीति के समान है; जो, यद्यपि स्वर्ग से आई अग्नि से जलाए गए थे, तथापि इससे वे स्वयं भी जलते-चमकते वस्तु बन गए।
संत केवल उस जीवन के जल को ही नहीं पीते, जो मूल स्रोत से बहता है; वरन यह जल उनमें एक जल का स्रोत बन जाता है, जो वहां फूट निकलता है, और उनसे बहकर बाहर आता है,
यूहन्ना 4:14, और अध्याय 7:38, 39। अनुग्रह की तुलना एक बोए गए बीज से की गई है, जो न केवल भूमि में होता है, वरन उसे पकड़े रहता है, वहां जड़ जमाता है, और वहां बढ़ता है, और वहां जीवन तथा स्वभाव का एक स्थायी सिद्धान्त बना रहता है।
जैसा प्रथम परिवर्तन के समय दिए गए आत्मिक प्रकाशनों और मनोभावों के साथ है, वैसा ही उस प्रकार के सारे प्रबोधनों और मनोभावों के साथ है, जिनका लोग बाद में विषय होते हैं; वे सब रूपान्तरकारी होते हैं। उनमें प्रथम प्रकाशनों के समान ही एक दिव्य सामर्थ्य और शक्ति होती है; और वे अब भी हृदय की गहराई तक पहुंचते हैं, और जितनी मात्रा में वे दिए जाते हैं, उसी अनुपात में प्राण के स्वभाव को ही प्रभावित और परिवर्तित करते हैं। और स्वभाव का रूपान्तरण इनके द्वारा जीवन के अन्त तक निरन्तर चलता और आगे बढ़ता रहता है, जब तक कि वह महिमा में सिद्ध न हो जाए। इसलिये संतों के हृदयों में अनुग्रह के कार्य की प्रगति को पवित्रशास्त्र में स्वभाव के निरन्तर परिवर्तन और नवीनीकरण के रूप में दर्शाया गया है। इसी कारण प्रेरित रोम में रहनेवालों को, जो “परमेश्वर के प्रिय, संत होने के लिये बुलाए गए” थे, और जो परमेश्वर की उद्धारक करुणा के विषय थे, यह उपदेश देता है कि वे “अपने मन के नये हो जाने से रूपान्तरित हों”: रोमियों 12:1, 2, “इसलिये हे भाइयो, मैं परमेश्वर की दया से तुम से बिनती करता हूं, कि अपने अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ; और इस संसार के सदृश न बनो, परन्तु मन के नये हो जाने से रूपान्तरित हो जाओ,” जिसकी तुलना अध्याय 1:7 से की जा सकती है। इसी प्रकार प्रेरित, “मसीह यीशु में जो संत और विश्वासी” थे, उन्हें लिखते हुए, जो
7. एक और बात, जिसमें अनुग्रहमय मनोभाव औरों से भिन्न होते हैं,… इफिसुस में रहनेवाले (इफिसियों 1:1), और जो कभी अपने अपराधों और पापों में मरे हुए थे, परन्तु अब जिलाए जाकर मसीह में स्वर्गीय स्थानों में एक साथ बिठाए गए, और भले कामों के लिये मसीह यीशु में सिरजे गए, जो कभी दूर थे, परन्तु अब मसीह के लहू के द्वारा निकट लाए गए, और अब न तो परदेशी और न मुसाफिर रहे, वरन पवित्र लोगों के संगी नागरिक और परमेश्वर के घराने के हो गए, और आत्मा के द्वारा परमेश्वर के निवास होने के लिये एक साथ बनाए जा रहे हैं; मैं कहता हूं, प्रेरित इन्हीं को लिखते हुए कहता है, "कि वह उनके लिये प्रार्थना करना नहीं छोड़ता, कि परमेश्वर मसीह की पहचान में उन्हें बुद्धि और प्रकाश का आत्मा दे; कि उनके मन की आंखें ज्योतिर्मय हों, जिससे वे जानें, अर्थात अनुभव करें, कि उसकी सामर्थ्य विश्वास करनेवालों की ओर कितनी महान है, उसकी प्रबल शक्ति के प्रभाव के अनुसार, जो उसने मसीह में उस समय प्रगट की जब उसे मरे हुओं में से जिलाकर स्वर्गीय स्थानों में अपनी दाहिनी ओर बिठाया," इफिसियों 1:16, अन्त तक। इसमें प्रेरित का ध्यान आत्मा के मन फिराने और नया बनाने के परमेश्वर के महिमामय सामर्थ्य और कार्य की ओर है; जैसा कि आगे के वचनों से पूर्णतः स्पष्ट है। इसी प्रकार प्रेरित उन्हीं लोगों को उपदेश देता है
"कि पुराने मनुष्यत्व को, जो धोखा देनेवाले अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है, उतार डालो; और अपनी बुद्धि की आत्मा में नये बनते जाओ; और नये मनुष्यत्व को पहन लो, जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है," इफिसियों 4:22, 23, 24।
कुछ लोगों को समय-समय पर एक प्रकार के ऊँचे मनोभाव होते हैं, जो उनमें किसी भी प्रकार का स्थायी प्रभाव प्रकट किए बिना जाते रहते हैं। वे अचानक उतर जाते हैं; यहाँ तक कि अपने आवेग की चरम सीमा और प्रतीत होनेवाले उल्लास से वे एकाएक बिलकुल निर्जीव, और सारी सुधि-बुधि और क्रियाशीलता से रहित हो जाते हैं। निश्चय ही ऊँचे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ ऐसा होना स्वाभाविक नहीं है;65 वे हृदय पर दिव्य वस्तुओं की एक मीठी सुगन्ध और स्वाद छोड़ जाते हैं, और आत्मा का परमेश्वर और पवित्रता की ओर एक दृढ़तर झुकाव छोड़ जाते हैं। जैसे मूसा का मुख न केवल उस समय चमकता था जब वह पर्वत पर असाधारण रीति से परमेश्वर से बातें कर रहा था, वरन पर्वत से उतर आने के बाद भी चमकता रहा। जब मनुष्य असाधारण रीति से मसीह से बातचीत करते रहे हैं, तो उसका एक अनुभव करने योग्य प्रभाव उन पर बना रहता है; उनके स्वभाव और मनोदशा में कुछ विशेष होता है, जिसे यदि हम पहचान लें, और उसके कारण तक जा पहुँचें, तो हम पाएँगे कि यह इसलिए है कि वे यीशु के साथ रहे हैं, प्रेरितों के काम 4:13।
65 "क्या तुम सोचते हो कि पवित्र आत्मा किसी मनुष्य पर वैसे ही उतरता है जैसे बिलाम पर, प्रत्यक्ष क्रिया द्वारा, और फिर उसे छोड़ देता है, और तब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रहता?" शेपर्ड का "पैराबल," भाग 1, पृष्ठ 126।
8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… 8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से, जो झूठे और भ्रमजनक हैं, इस बात में भिन्न हैं, कि वे यीशु मसीह के मेम्ने-समान और कबूतर-समान आत्मा और स्वभाव की ओर ले जाते हैं, और उसके साथ रहते हैं
; अर्थात, दूसरे शब्दों में, वे स्वभाव से ही प्रेम, नम्रता, शान्ति, क्षमा और दया की उस आत्मा को उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं, जो मसीह में प्रकट होती है।
इसका प्रमाण पवित्रशास्त्र में बहुत अधिक है। यदि हम मसीही धर्म की प्रकृति और सुसमाचार की उचित आत्मा का न्याय परमेश्वर के वचन से करें, तो यही आत्मा है जिसे विशेष रीति से मसीही आत्मा कहा जा सकता है; और इसे मसीहियों के हृदयों की, मसीहियों के रूप में, सच्ची और भिन्न पहचान करानेवाली प्रवृत्ति माना जा सकता है। जब मसीह के कुछ चेलों ने असावधानी और निर्बलता के कारण ऐसी बात कही जो इस आत्मा के अनुकूल न थी, तो मसीह ने उनसे कहा, कि वे नहीं जानते कि वे कैसी आत्मा के हैं,
लूका 9:55, जिससे यह संकेत मिलता है कि जिस आत्मा की मैं बात कर रहा हूँ, वही उसके धर्म और राज्य की उचित आत्मा है। जितने सचमुच भक्त हैं, और मसीह के वास्तविक चेले हैं, उन सब में यह आत्मा है; और केवल यही नहीं, वरन वे इसी आत्मा के हैं; यही वह आत्मा है जिसके अधीन और वश में वे इस प्रकार रहते हैं, कि यह उनका सच्चा और उचित लक्षण बन जाता है। यह उस बात से स्पष्ट है जो बुद्धिमान पुरुष कहता है, नीतिवचन 17:27 (जो स्पष्ट रीति से ऐसी ही आत्मा की ओर संकेत करता है): "समझवाला मनुष्य उत्तम आत्मावाला होता है।" और उस विशेष वर्णन से भी, जो मसीह उन लोगों के गुणों और स्वभाव का देता है जो सचमुच धन्य हैं, जिन पर दया होगी, और जो परमेश्वर की सन्तान और वारिस हैं:
मत्ती 5:5, 7, 9, "धन्य हैं वे जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के वारिस होंगे। धन्य हैं दयावन्त, क्योंकि उन पर दया की जाएगी। धन्य हैं मेल करानेवाले, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएँगे।" और यह कि यह आत्मा परमेश्वर के चुने हुओं का विशेष लक्षण है, यह कुलुस्सियों
3:12, 13: "इसलिये तुम परमेश्वर के चुने हुए, पवित्र और प्रिय लोगों की नाईं, करुणा की तरुणाई, कृपा, दीनता, नम्रता, और सहनशीलता पहिन लो; एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे को क्षमा करते रहो।" और प्रेरित, उस स्वभाव और प्रवृत्ति की चर्चा करते हुए, जिसे वह मसीही धर्म में सबसे उत्तम और अनिवार्य वस्तु कहता है, और जिसके बिना कोई भी सच्चा
मसीही नहीं है, और सबसे तेजस्वी प्रतिज्ञा और वरदान भी व्यर्थ हैं (इस आत्मा को वह प्रेम का नाम देकर), उसका वर्णन इस प्रकार करता है, 1 कुरिन्थियों 13:4, 5: "प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, फूलता नहीं, कुरूप व्यवहार नहीं करता, अपनी भलाई नहीं ढूंढ़ता, झुंझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता।" और वही प्रेरित,
गलातियों 5 में, मसीही अनुग्रह के भिन्न पहचान करानेवाले चिन्हों और फलों का जानबूझकर वर्णन करते हुए, मुख्य रूप से उन्हीं बातों पर बल देता है जो उस स्वभाव और आत्मा से सम्बन्ध रखती हैं जिसकी मैं चर्चा कर रहा हूँ, पद 22, 23: "पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम है।" और प्रेरित याकूब भी सच्चे अनुग्रह, अर्थात उस ज्ञान का वर्णन करते समय, जो ऊपर से है, इसी उद्देश्य को घोषित करते हुए, कि जो लोग विपरीत आत्मा के हैं वे स्वयं को धोखा न दें, और मसीही होने का दावा करते हुए, जब वे नहीं हैं, सत्य के विरुद्ध झूठ न बोलें, याकूब 3:14-17: "पर यदि तुम्हारे मन में कड़वी डाह और विरोध है, तो सत्य के विरुद्ध घमण्ड मत करो, और झूठ मत बोलो। यह ज्ञान ऊपर से उतरनेवाला नहीं, वरन सांसारिक, स्वाभाविक और शैतानी है। क्योंकि जहां डाह और विरोध होता है, वहां बलवा और हर एक प्रकार का बुरा काम पाया जाता है।
8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… पर जो ज्ञान ऊपर से है, वह पहले तो पवित्र है, फिर मिलनसार, कोमल, सहज ही मनाया जा सकनेवाला, दया और अच्छे फलों से भरपूर।"
हृदय की पवित्रता से सम्बन्धित हर एक बात सचमुच सच्चे मसीही धर्म की प्रकृति और मसीहियों के लक्षण से सम्बन्ध रखती है; परन्तु पवित्रता की जो आत्मा कुछ विशेष अनुग्रहों में प्रकट होती है, उसे विशेष रीति से मसीही आत्मा या स्वभाव कहा जा सकता है। कुछ ऐसे मनोहर गुण और सद्गुण हैं, जो विशेष रीति से सुसमाचार की व्यवस्था और मसीही अंगीकार की प्रकृति के अनुकूल हैं; क्योंकि उनमें उन दिव्य गुणों के साथ एक विशेष मेल है जिन्हें परमेश्वर ने यीशु मसीह द्वारा किए गए छुटकारे के काम में, जो मसीही प्रकाशितवाणी का प्रधान विषय है, विशेष रीति से प्रकट और महिमान्वित किया है; और उन सद्गुणों के साथ भी एक विशेष मेल है जिन्हें यीशु मसीह ने उस कार्य में हमारे प्रति इतनी अद्भुत रीति से किया, और जिनका धन्य आदर्श उसने हमारे लिये उसमें रखा है; और साथ ही इसलिये भी कि वे छुटकारे के काम के विशेष उद्देश्य और अभिप्राय के, और उससे हमें मिलनेवाले लाभों के, और उस सम्बन्ध के जिसमें वह हमें परमेश्वर और एक दूसरे के साथ लाता है, विशेष रीति से अनुकूल हैं। और ये सद्गुण हैं—दीनता, नम्रता, प्रेम, क्षमा, और दया। इसलिये ये बातें विशेष रीति से मसीहियों के, मसीहियों के रूप में, लक्षण से सम्बन्ध रखती हैं।
इन बातों की चर्चा विशेष रीति से स्वयं यीशु मसीह के, जो मसीही कलीसिया का महान सिर है, लक्षण के रूप में की गई है। पुराने
नियम के भविष्यद्वाणियों में की गई है; जैसे उस उद्धृत वचन मत्ती 21:5 में: "सिय्योन की बेटी से कहो, देख तेरा राजा तेरे पास आता है, वह नम्र है, और गदही पर, वरन गदही के बच्चे, बछेड़े पर चढ़ा हुआ है।" इसी प्रकार मसीह स्वयं भी उनकी चर्चा करता है, मत्ती 11:29: "मुझसे सीखो, क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ।" यही बात उस नाम से भी प्रकट होती है जिससे मसीह को पवित्रशास्त्र में बार-बार पुकारा गया है, अर्थात मेम्ना। और जैसे ये बातें विशेष रीति से मसीह का लक्षण हैं, वैसे ही ये विशेष रीति से मसीहियों का भी लक्षण हैं। मसीही लोग मसीह के समान होते हैं; कोई भी मसीही कहलाने योग्य नहीं है जो अपने प्रधान लक्षण में ऐसा नहीं है। "नये मनुष्यत्व को पहिन लिया है, जो अपने सृजनेवाले के स्वरूप के अनुसार नया बनता जाता है," कुलुस्सियों 3:10। सब सच्चे मसीही लोग प्रभु की महिमा को दर्पण में देखते हुए, उसी की आत्मा के द्वारा उसी स्वरूप में बदलते जाते हैं, 2 कुरिन्थियों 3:18। चुने हुए सब लोग पहले ही से परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप के अनुसार बनने के लिये ठहराए गए हैं, ताकि वह बहुत भाइयों में पहलौठा हो, रोमियों
8:29। जैसे हमने उस पहले मनुष्य का, जो मिट्टी का है, स्वरूप धारण किया है, वैसे ही हमें उस स्वर्गीय का भी स्वरूप धारण करना है; क्योंकि जैसा वह मिट्टी का बना है, वैसे ही वे भी हैं जो मिट्टी के बने हैं; और जैसा वह स्वर्गीय है, वैसे ही वे भी हैं जो स्वर्गीय हैं, 1 कुरिन्थियों 15:47, 48, 49।—मसीह अनुग्रह से परिपूर्ण है; और सब मसीही लोग उसकी परिपूर्णता में से पाते हैं, और अनुग्रह पर अनुग्रह; अर्थात मसीहियों में वह अनुग्रह है जो मसीह के अनुग्रह के अनुरूप है, ऐसा ही मेल जैसा मोम और मुहर के बीच होता है; लक्षण के बदले लक्षण है: जैसे अनुग्रह, जैसी आत्मा और स्वभाव, वे ही बातें जो मसीह के लक्षण से सम्बन्ध रखती हैं, उन्हीं के लक्षण से भी सम्बन्ध रखती हैं। जिस स्वभाव में मसीह का लक्षण विशेष रीति से निहित है, उसी में उसका स्वरूप भी विशेष रीति से निहित है।
जो मसीही धार्मिकता के सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके चमकते हैं, वे उसी प्रकार की चमक से, उन्हीं कोमल, मधुर और सुहावनी किरणों से चमकते हैं। आत्मिक मन्दिर के ये दीपक, जो स्वर्ग से आई हुई अग्नि से जलाए गए हैं, उसी प्रकार की ज्वाला से जलते हैं।
8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… डाली तने और जड़ के साथ एक ही स्वभाव की होती है, उसी रस को रखती है, और उसी प्रकार का फल लाती है। अंगों में सिर के साथ उसी प्रकार का जीवन होता है। यह अचम्भे की बात होगी यदि मसीही लोग उसी स्वभाव और आत्मा के न हों जिसके मसीह है; जबकि वे उसका मांस और उसकी हड्डी हैं, वरन उसके साथ एक आत्मा हैं, 1 कुरिन्थियों 6:17; और इस प्रकार जीते हैं, कि अब वे नहीं जीते, वरन मसीह उनमें जीता है। मसीही आत्मा मसीह की वह छाप है जो वह अपने लोगों के प्राणों पर लगाता है, उनके माथों पर उसकी मुहर है, जो उसका स्वरूप और नाम लिये हुए है।—मसीही लोग मसीह के अनुयायी हैं; और वे इसलिए ऐसे हैं, कि वे मसीह के उस बुलावे के आधीन हैं, मत्ती
11:28, 29, "मेरे पास आओ—और मुझसे सीखो, क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं।" वे उसके पीछे मेम्ने के समान चलते हैं: प्रकाशितवाक्य 14:4, "ये वे हैं जो मेम्ने के पीछे पीछे जहां कहीं वह जाता है चलते हैं।"
सच्चे मसीही लोग मानो मसीह के नम्र, शान्त, और प्रेममय स्वभाव को पहने हुए हैं; क्योंकि जितने मसीह में हैं, उन्होंने मसीह को पहिन लिया है। और इसी दृष्टि से कलीसिया सूर्य से वस्त्रधारी है, न केवल इसलिए कि वह उसकी गिनी हुई धार्मिकता से वस्त्रधारी है, वरन इसलिए भी कि वह उसके अनुग्रहों से अलंकृत है, रोमियों 13:14। मसीह, जो महान चरवाहा है, स्वयं भी एक मेम्ना है, और विश्वासी भी मेम्ने हैं; सारा झुण्ड मेम्नों का है: यूहन्ना 21:15, "मेरे मेम्नों को चरा।" लूका 10:3, "मैं तुम्हें मेम्नों की नाईं भेड़ियों के बीच में भेजता हूं।" शैतान की शक्ति से मसीह द्वारा कलीसिया के छुटकारे को प्राचीन समय में दाऊद के सिंह और भालू के मुख से मेम्ने को छुड़ा लेने के द्वारा दर्शाया गया था।
जिस प्रकार के सद्गुण की चर्चा की गई है, वह मसीही आत्मा की, अर्थात मसीह में और उसके अंगों में कार्य करनेवाली आत्मा की, ठीक प्रकृति है, और उसकी भिन्न पहचान करानेवाली प्रकृति इससे स्पष्ट है, कि कबूतर ही वह चिन्ह या प्रतीक है जिसे परमेश्वर ने इसे दर्शाने के लिये चुना है। वे वस्तुएँ ही दूसरी वस्तुओं के सबसे उपयुक्त प्रतीक होती हैं, जो उनकी प्रकृति की सबसे भिन्न पहचान करानेवाली विशेषता को सबसे अच्छी रीति से दर्शाती हैं। जो आत्मा मसीह पर उतरी, जब वह पिता के द्वारा अभिषिक्त किया गया, वह कबूतर के समान उस पर उतरी। कबूतर नम्रता, निर्दोषता, शान्ति और प्रेम का एक प्रसिद्ध प्रतीक है। परन्तु वही आत्मा जो कलीसिया के सिर पर उतरी, अंगों पर भी उतरती है। "परमेश्वर ने अपने पुत्र की आत्मा हमारे हृदयों में भेजी है," गलातियों 4:6। और "यदि किसी में मसीह की आत्मा नहीं, तो वह उसका नहीं है," रोमियों 8:9।
सारी रहस्यमय देह के लिये, सिर और अंगों दोनों के लिये, एक ही आत्मा है, 1 कुरिन्थियों 6:17, इफिसियों
4:4। मसीह अपनी आत्मा अपने चेलों पर फूंकता है, यूहन्ना 20:22। जैसे मसीह पवित्र आत्मा से अभिषिक्त किया गया, जो कबूतर के समान उस पर उतरा, वैसे ही मसीही लोग भी "उस पवित्र पुरुष की ओर से अभिषेक पाए हुए हैं," 1 यूहन्ना 2:20, 27। और वे उसी तेल से अभिषिक्त हैं; यह वही
"बहुमूल्य तेल है, जो सिर पर डाला जाता है, और वस्त्रों के छोर तक बहता चला जाता है।" और दोनों पर, यह शान्ति और प्रेम की आत्मा है। भजन संहिता 133:1, 2, "देख, भाइयों का एका में रहना कैसी भली और मनोहर बात है! यह उस उत्तम तेल के समान है, जो सिर पर डाला गया हो, और दाढ़ी, अर्थात हारून की दाढ़ी पर बहता हुआ, उसके वस्त्र के छोर तक पहुंचता हो।"
हारून के वस्त्रों पर लगा तेल उसके सिर के तेल जैसी ही मीठी और अनुपम सुगन्ध रखता था; उन्हीं मीठे मसालों की गन्ध, अर्थात मसीही मनोभाव और मसीही चाल-चलन, मसीह के मीठे इत्रों की सुगन्ध का बहाव मात्र है। क्योंकि कलीसिया का स्वभाव और प्रवृत्ति कबूतर के समान है, इसलिए उसके विषय में कहा गया है कि उसकी आंखें कबूतर की सी हैं, श्रेष्ठगीत 1:15: "देख,
8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… तू सुन्दरी है, मेरी प्रिया, देख तू सुन्दरी है, तेरी आँखें कबूतर की सी हैं।" और अध्याय 4:1, "देख तू सुन्दरी है, मेरी प्रिया, देख तू सुन्दरी है, तेरे घूँघट के पीछे तेरी आँखें कबूतर की सी हैं।" वही बात मसीह के विषय में भी कही गई है, अध्याय 6:12: "उसकी आँखें कबूतर की आँखों की सी हैं।" और पवित्रशास्त्र में कलीसिया की तुलना बार-बार कबूतर से की गई है: श्रेष्ठगीत 2:14, "हे मेरी कबूतरी, तू जो चट्टान की दरारों में है।" अध्याय 5:2, "मेरे लिये द्वार खोल, हे मेरी प्रिया, मेरी कबूतरी।" और अध्याय 6:9, "मेरी कबूतरी, मेरी सिद्ध, एक ही है।" भजन 68:13, "तुम कबूतरी के पंखों के समान हो जाओगे, जो चान्दी से मढ़े हुए हैं, और उसके पर पीले सोने के समान हैं।" और 74:19, "हे परमेश्वर, अपनी पिण्डुकी के प्राण को दुष्टों की भीड़ के हवाले न कर।" वह कबूतरी जिसे नूह ने जहाज़ में से भेजा, और जिसके पाँव के तलवे को विश्राम का कोई स्थान न मिला, जब तक वह लौट न आई, एक सच्चे संत का चिन्ह था।
नम्रता इतनी अधिक संतों का लक्षण है, कि नम्र और भक्त पवित्रशास्त्र में समानार्थी शब्दों के रूप में प्रयोग किए जाते हैं: इसी प्रकार भजन संहिता 37:10, 11 में दुष्ट और नम्र को एक दूसरे के विरोध में रखा गया है, मानो दुष्ट और भक्त हों: "क्योंकि थोड़े ही दिनों में दुष्ट लोग रहेंगे ही नहीं; परन्तु नम्र लोग पृथ्वी के अधिकारी होंगे।" इसी प्रकार भजन 147:6, "यहोवा नम्र लोगों को सम्भालता है; और दुष्टों को मिट्टी में मिला देता है।"
निःसन्देह बहुत कुछ इसी कारण मसीह अपने सब चेलों को, स्वर्ग के सब वारिसों को, छोटे बालकों के रूप में दर्शाता है: मत्ती 19:14, "बालकों को मेरे पास आने दो, और उन्हें मना मत करो, क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है।" मत्ती 10:42, "और जो कोई इन छोटों में से किसी एक को चेले के नाम से एक कटोरा ठण्डा पानी ही पिलाए, मैं तुम से सच कहता हूं, वह अपना प्रतिफल कभी न खोएगा।" मत्ती 18:6, "जो कोई इन छोटों में से किसी एक को ठोकर खिलाए, &c." पद 10, "चौकस रहो, कि तुम इन छोटों में से किसी को तुच्छ न जानो।" पद
14, "तुम्हारे स्वर्गीय पिता की इच्छा नहीं, कि इन छोटों में से एक भी नाश हो।" यूहन्ना 13:33, "हे बालको, मैं और थोड़ी देर तुम्हारे साथ हूं।" छोटे बालक निर्दोष और निरुपद्रवी होते हैं; वे संसार में अधिक उपद्रव नहीं करते; मनुष्यों को उनसे डरने की आवश्यकता नहीं; वे किसी प्रकार से खतरनाक व्यक्ति नहीं होते; उनका क्रोध अधिक समय तक नहीं ठहरता, वे चोटों को गहरी और जड़ जमाई हुई द्वेष-भावना में रखते हुए मन में संचित नहीं करते। इसी प्रकार मसीही लोग, द्वेष में, बालक हैं, 1 कुरिन्थियों 14:20। छोटे बालक कपटी और धोखेबाज़ नहीं होते, वरन सीधे-सादे होते हैं; वे बनावट और छल की कला में निपुण नहीं होते; और चतुराई के भेस से अनजान होते हैं। वे मानने और झुकने योग्य होते हैं, हठी और ज़िद्दी नहीं होते; अपनी ही समझ पर भरोसा नहीं रखते, वरन माता-पिता और उनसे बड़ी समझवालों की शिक्षाओं पर निर्भर रहते हैं। इसलिए यह मेम्ने के अनुयायियों का एक उपयुक्त और जीवन्त प्रतीक है। इस प्रकार छोटे बालकों के समान होना, न केवल एक अत्यन्त प्रशंसनीय बात है, जिसे मसीही लोग स्वीकार करते और जिसका लक्ष्य रखते हैं, और जिसमें कुछ लोग असाधारण निपुणता प्राप्त करते हैं: वरन यह उन सभी का सार्वभौमिक लक्षण है, और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिये पूर्णतः अनिवार्य है:
मत्ती 18:3, "मैं तुम से सच कहता हूं, यदि तुम न फिरो, और बालकों के समान न बनो, तो स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे।" मरकुस 10:15, "मैं तुम से सच कहता हूं, जो कोई परमेश्वर के राज्य को बालक की नाईं ग्रहण न करे, वह उसमें प्रवेश करने न पाएगा।"
8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… परन्तु यहाँ कोई यह कहने को तैयार हो सकता है, क्या मसीही धैर्य, और मसीह के लिये साहस, मसीही युद्ध में अच्छे सिपाही होना, और मसीह और उसके लोगों के शत्रुओं के विरुद्ध निडरता से निकल खड़े होना, ऐसी कोई वस्तु नहीं है?
जिसका मैं यह उत्तर देता हूं, कि निःसन्देह ऐसी वस्तु है। सारा मसीही जीवन एक युद्ध से तुलना किया गया है, और उचित रीति से। और सबसे उत्कृष्ट मसीही लोग ही सबसे अच्छे सिपाही होते हैं, जो मसीही धैर्य की सबसे बड़ी मात्रा से युक्त हैं। और परमेश्वर के लोगों का यह कर्तव्य है, कि जो लोग मसीह के राज्य और धर्म के हित को उलट देने का प्रयत्न कर रहे हैं, उनकी योजनाओं और मार्गों का विरोध करने में स्थिर और ओजस्वी रहें। परन्तु फिर भी बहुत से लोग मसीही धैर्य की प्रकृति के विषय में पूर्णतः भ्रमित प्रतीत होते हैं। यह पशुतुल्य क्रूरता, या शिकारी पशुओं के साहस से अत्यन्त भिन्न वस्तु है। सच्चा मसीही धैर्य मन की उस शक्ति में निहित है, जो अनुग्रह के द्वारा, दो बातों में प्रयुक्त होती है; मन की बुरी और अनियंत्रित लालसाओं और मनोभावों पर शासन करने और उन्हें दबाने में; और बिना पापमय भय, या शत्रुओं के विरोध से रुकावट खाए, स्थिरता और स्वतंत्रता से अच्छे मनोभावों और प्रवृत्तियों को प्रयोग में लाने और उनका अनुसरण करने में। परन्तु जो लालसाएँ इस मसीही शक्ति और धैर्य के प्रयोग में रोकी और दबाई जाती हैं, वे वही लालसाएँ हैं जो मसीह के लिये झूठे साहस में जोश और उग्रता से प्रयुक्त होती हैं। और जो मनोभाव सच्चे धैर्य में जोश से प्रयुक्त होते हैं, वे वे ही मसीही, पवित्र मनोभाव हैं जो उनके ठीक विपरीत हैं।
यद्यपि मसीही धैर्य उन शत्रुओं का सामना करने और उनका विरोध करने में प्रकट होता है जो हमारे बाहर हैं; तौभी यह इससे कहीं अधिक उन शत्रुओं का सामना करने और उन्हें दबाने में प्रकट होता है जो हमारे भीतर हैं; क्योंकि वे हमारे सबसे बुरे और सबसे शक्तिशाली शत्रु हैं, और हमारे विरुद्ध सबसे अधिक लाभ रखते हैं। यीशु मसीह के अच्छे सिपाही की शक्ति और किसी बात में इतनी प्रकट नहीं होती, जितनी इस दुष्ट और अविवेकी संसार के सब तूफानों, चोटों, विचित्र व्यवहार, और चौंका देनेवाली घटनाओं और घटनाक्रमों के बीच अपने मन की पवित्र शान्ति, नम्रता, मधुरता, और भलमनसाहत को स्थिरता से बनाए रखने में। पवित्रशास्त्र यह संकेत देता प्रतीत होता है कि सच्चा धैर्य मुख्यतः इसी में निहित है: नीतिवचन 16:32, "क्रोध के धीरे-धीरे करनेवाला शूरवीर से, और अपने मन को वश में रखनेवाला, नगर के जीतनेवाले से भी उत्तम है।"
संसार में परमेश्वर के शत्रुओं से युद्ध करने में पवित्र धैर्य क्या है, इसका सही निर्णय करने का सबसे सीधा और सबसे निश्चित मार्ग यह है, कि परमेश्वर की सब सेनाओं के सेनापति, और हमारे महान अगुवे और आदर्श की ओर देखा जाए, और यह देखा जाए कि उसका धैर्य और वीरता उसके प्रधान संघर्ष में, और उस सबसे बड़े युद्ध के समय, जो इन शत्रुओं के साथ कभी लड़ा गया या कभी लड़ा जाएगा, कहाँ प्रकट हुई, जब उसने उनसे अकेले युद्ध किया, और उन लोगों में से कोई भी उसके साथ न था, और उसने अपने धैर्य को उस उच्चतम मात्रा में प्रयोग में लाया जितना उसने कभी किया था, और वह गौरवमय विजय प्राप्त की जो सारी अनन्तता में स्वर्ग की सब सेनाओं की स्तुति और विजयोल्लास में मनाई जाएगी; अर्थात यीशु मसीह में, उसके अन्तिम दुःखों के समय, जब पृथ्वी और नरक में उसके शत्रुओं ने उस पर अपना सबसे उग्र आक्रमण किया, उसे चारों ओर से घेरकर, मानो फाड़नेवाले और गरजनेवाले सिंहों के समान। निःसन्देह यहाँ हम परमेश्वर के उद्देश्य में एक पवित्र योद्धा और शूरवीर के धैर्य को उसकी उच्चतम सिद्धता और सबसे बड़ी चमक में देखेंगे, और उन सिपाहियों के अनुसरण करने योग्य एक आदर्श पाएंगे जो इस सेनापति के अधीन युद्ध करते हैं। परन्तु उसने उस समय अपना पवित्र साहस और 8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… वीरता किस प्रकार दिखाई? किसी उग्र लालसा के प्रयोग में नहीं; न तो उग्र और हिंसक वचनों में, और विरोधियों की असहनीय दुष्टता के विरुद्ध कड़वे शब्दों में जोर-शोर से बोलने और चिल्लाने में, स्पष्ट शब्दों में उन्हें उन्हीं के समान उत्तर देने में: वरन दुःखित और सताए जाने पर अपना मुंह न खोलने में, मेम्ने के समान वध होने के लिये जाने में, और भेड़ के समान जो अपने बाल कतरनेवालों के आगे गूंगी रहती है, अपना मुंह न खोलने में; यह प्रार्थना करने में कि पिता उसके क्रूर शत्रुओं को क्षमा करे क्योंकि वे नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं; औरों का लहू न बहाकर, वरन सम्पूर्ण विजयी धीरज और प्रेम के साथ, अपना ही लहू बहाने में। सचमुच उसके एक चेले ने, जिसने मसीह के लिये साहस का उतावला दिखावा किया था, और विश्वासपूर्वक घोषित किया था कि वह उसे नकारने से पहले मसीह के साथ मर जाना अधिक पसन्द करेगा, तलवार लेकर वार करना आरम्भ कर दिया: परन्तु मसीह ने नम्रता से उसे डांटा, और जो घाव उसने दिया था उसे चंगा किया। और मसीह के धीरज, नम्रता, प्रेम, और क्षमा का इतना गौरवमय प्रकटीकरण कभी नहीं हुआ, जितना उस समय हुआ। वह कभी इतना मेम्ना प्रतीत नहीं हुआ, और कभी उसने इतनी कबूतर-समान आत्मा नहीं दिखाई, जितनी उस समय। इसलिये यदि हम मसीह के अनुयायियों में से किसी को, परमेश्वर और उसके अपने शत्रुओं के सबसे उग्र, अविवेकी, और दुष्ट विरोध के बीच, इस सारे प्रलोभन के अधीन भी, मेम्ने की दीनता, शान्ति, और सज्जनता, और कबूतर की निरुपद्रविता, प्रेम और मधुरता को बनाए रखते देखें, तो हम भली-भांति यह निर्णय कर सकते हैं कि यहाँ यीशु मसीह का एक अच्छा सिपाही है।
जब मनुष्य उग्र और हिंसक होते हैं, और अपनी तीखी और कड़वी लालसाओं को प्रयोग में लाते हैं, तो यह शक्ति और धैर्य के बदले निर्बलता को दर्शाता है। 1 कुरिन्थियों 3 के आरम्भ में, "और हे भाइयो, मैं आत्मिक जानकर तुम से बातें न कर सका, परन्तु शारीरिक जानकर, वरन मसीह में बच्चे जानकर। क्योंकि तुम अब तक शारीरिक हो: इसलिये कि जब तुम में डाह और झगड़ा और फूट है, तो क्या तुम शारीरिक नहीं, और मनुष्यों की रीति पर नहीं चलते?"
मसीह के लिये एक ऐसा दिखावटी साहस भी है, जो घमण्ड से बढ़कर किसी उत्तम सिद्धान्त से उत्पन्न नहीं होता।
मनुष्य घमण्ड के कारण संसार की अप्रसन्नता को अपने ऊपर लाने में, वरन उन्हें उकसाने में भी, उतावला हो सकता है। क्योंकि आत्मिक घमण्ड का यह स्वभाव है कि वह मनुष्यों को विशिष्टता और भिन्नता ढूंढ़ने के लिए प्रेरित करता है; और इस प्रकार प्रायः वे उन लोगों के विरुद्ध, जिन्हें वे शारीरिक कहते हैं, अपने आपको युद्ध में डाल देते हैं, ताकि वे अपने ही दल में और अधिक ऊँचा उठाए जाएँ। मसीह के लिये सच्चा साहस सार्वभौमिक है, और सब पर विजय पाता है, और मनुष्यों को मित्रों और शत्रुओं दोनों की अप्रसन्नता से ऊपर ले जाता है; यहाँ तक कि वे मसीह के सिवाय सब कुछ त्याग देंगे; और मसीह को अप्रसन्न करने की अपेक्षा सब दलों को अप्रसन्न करना, और सबके द्वारा तुच्छ समझा जाना अधिक अच्छा समझेंगे। और वह कर्तव्य जो यह परखता है कि क्या कोई मनुष्य अपने ही दल के लोगों द्वारा तुच्छ जाना जाने, और उनके द्वारा सबसे कम आदर के योग्य समझा जाने के लिए तैयार है, मसीह के लिये उसके साहस की कहीं अधिक उपयुक्त परख है, बनिस्बत उसके कि वह विरोधियों की निन्दा सहने के लिये उतावला हो। प्रेरित ने न तो अन्यजातियों और यहूदियों से, वरन मसीहियों से भी महिमा नहीं चाही; जैसा वह घोषित करता है, 1 थिस्सलुनीकियों 2:6।66 वह मसीह के लिये साहसी है, जिसमें इतना मसीही धैर्य है कि जब उसने ऐसा अपराध किया हो जो इसकी मांग करता हो, तो वह उसे खुले रूप से स्वीकार करे,66 श्री शेपर्ड, कपटियों की प्रशंसा-प्रियता की चर्चा करते हुए, कहते हैं, "इसलिये मनुष्य अपने मित्रों को त्याग देते हैं और संसार के उपहासों को पैरों तले रौंद डालते हैं: उन्हें कहीं और साख प्राप्त है। भक्त मनुष्यों के प्रेम में अपना हित बनाए रखने के लिये, वे बहुत कुछ सहते हैं।" "दस कुंवारियों का दृष्टान्त," भाग 1, पृष्ठ 180।
8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… और मानो विरोधियों के सामने अपने घुटनों के बल झुक जाए।
ऐसी बातें विरोधियों का दृढ़ता और उग्रता से सामना करने की अपेक्षा पवित्र साहस का कहीं अधिक बड़ा प्रमाण हैं।
जैसे कुछ लोग मसीह के लिये सच्चे साहस की प्रकृति के विषय में बहुत भ्रमित हैं, वैसे ही वे मसीही उत्साह के विषय में भी भ्रमित हैं। यह सचमुच एक ज्वाला है, परन्तु एक मीठी ज्वाला; या यूं कहें कि यह एक मीठी ज्वाला की गर्मी और तीव्रता है। क्योंकि जिस ज्वाला की यह गर्मी है, वह दिव्य प्रेम, या मसीही प्रेम के सिवाय और कुछ नहीं है; जो मनुष्य या स्वर्गदूत के हृदय में जो कुछ है, या हो सकता है, उनमें सबसे मीठी और सबसे भलमनसाहत से भरी वस्तु है। उत्साह इसी ज्वाला की तीव्रता है, जैसे वह अपनी वस्तु, अर्थात भलाई की ओर, उसकी अभिलाषाओं और उसकी खोज में, उत्सुकता और जोश से बढ़ती है, और परिणामस्वरूप, उस बुराई के विरोध में जो इसके विपरीत है, और इसमें बाधा डालती है। इसमें सचमुच विरोध और तीव्र विरोध है, जो इसका एक भाग है, या यूं कहें कि इसका एक सहचर है; परन्तु यह वस्तुओं के विरुद्ध है, व्यक्तियों के विरुद्ध नहीं। मनुष्यों के व्यक्तित्व के विरुद्ध कड़वाहट इसका कोई भाग नहीं है, वरन इसके बिलकुल विपरीत है; यहाँ तक कि सच्चा उत्साह जितना अधिक गर्म होता है, और जितना ऊँचा उठाया जाता है, उतना ही व्यक्ति ऐसी कड़वाहट से दूर होते हैं, और उतना ही अधिक बुराई और भलाई दोनों के प्रति प्रेम से भरपूर होते हैं। जैसा कि अभी जो कहा गया उससे स्पष्ट है, यह अपनी प्रकृति और सार में मसीही प्रेम की आत्मा की तीव्रता के सिवाय और कुछ नहीं है।
और जहाँ तक वस्तुओं के विरुद्ध इसमें जो विरोध है, यह पहले और मुख्य रीति से उस मनुष्य में ही की बुरी बातों के विरुद्ध है, जिसमें यह उत्साह है: अर्थात परमेश्वर और पवित्रता के उन शत्रुओं के विरुद्ध, जो उसके अपने ही हृदय में हैं (क्योंकि ये सबसे अधिक उसकी दृष्टि में रहते हैं, और उससे उसका सबसे अधिक सरोकार है); और केवल गौण रीति से औरों के पापों के विरुद्ध। और इसलिए सच्चे मसीही उत्साह में ऐसी कोई बात नहीं जो उस नम्रता, सज्जनता, और प्रेम की आत्मा के विपरीत हो, जिसकी चर्चा की गई है, अर्थात छोटे बालक, मेम्ने और कबूतर की आत्मा; वरन यह इसके पूर्णतः अनुकूल है, और इसे बढ़ाने की प्रवृत्ति रखता है।
परन्तु इस मसीही आत्मा के विषय में, जिसकी मैं चर्चा कर रहा हूँ, विशेष रीति से कुछ कहने के लिये, जैसा कि यह इन तीन बातों में प्रयोग होती है, अर्थात क्षमा, प्रेम, और दया; मैं यह देखना चाहूँगा कि पवित्रशास्त्र प्रत्येक मसीही के स्वभाव और लक्षण से सम्बन्धित इनमें से प्रत्येक की पूर्ण आवश्यकता के विषय में बहुत स्पष्ट और प्रत्यक्ष है।
क्षमाशील आत्मा के, अर्थात चोटों की उपेक्षा करने और उन्हें क्षमा करने की प्रवृत्ति के विषय में भी यही बात है। मसीह इसे हमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रमाण के रूप में देता है; और वह स्पष्ट रीति से हमें यह सिखाता है, कि यदि हम ऐसी आत्मा के हैं, तो यह इस बात का चिन्ह है कि हम स्वयं क्षमा और अनुग्रह की दशा में हैं: और यदि हम ऐसी आत्मा के नहीं हैं, तो हमें परमेश्वर की ओर से क्षमा नहीं मिली है; और वह विशेष सावधानी बरतता प्रतीत होता है कि हम इस पर भली-भांति ध्यान दें, और इसे सदा अपने मन में रखें: मत्ती 6:12, 14,
15, "और जिस तरह हम अपने कर्जदारों को क्षमा करते हैं, तू भी हमारे कर्ज़ हमें क्षमा कर। क्योंकि यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा करो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता तुम्हें भी क्षमा करेगा। परन्तु यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करो, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा।" मसीह इसी बात को एक और समय पर फिर कहता है,
मरकुस 11:25, 26, और फिर मत्ती 18:22, अन्त तक, उस दास के दृष्टान्त में जो अपने स्वामी का दस हज़ार तोड़े रुपयों का ऋणी था, और जिसने अपने संगी दास के सौ दीनार क्षमा नहीं किए; और इसलिये यातना देनेवालों के हाथ सौंप दिया गया। उस दृष्टान्त के प्रयोग में मसीह कहता है,
8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… पद 35, "इसी रीति से मेरा स्वर्गीय पिता भी तुम से करेगा, यदि तुम अपने अपने भाई को हृदय से क्षमा न करोगे।"
और यह कि सब सच्चे संत प्रेमी, भलमनसाहत से भरे, और उपकारी स्वभाव के होते हैं, इसके विषय में पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट और भरपूर है। इसके बिना, प्रेरित हमें बताता है, चाहे हम मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियाँ बोलें, हम बजते हुए पीतल, या झंझनाते हुए झाँझ के समान हैं; और चाहे हमारे पास भविष्यद्वाणी का वरदान हो, और हम सब भेदों, और सारे ज्ञान को समझते हों, तौभी इस आत्मा के बिना हम कुछ भी नहीं हैं। और मन की ऐसी कोई सद्गुण या प्रवृत्ति नहीं है, जिस पर नये नियम में सच्चे मसीहियों को पहचानने के लिये रखे गए चिन्हों में इतनी बार, और इतनी स्पष्टता से बल दिया गया हो। यह प्रायः एक विशेष रीति से भिन्न पहचान करानेवाले चिन्ह के रूप में दिया गया है, जिससे सब लोग मसीह के चेलों को पहचान सकें, और जिससे वे स्वयं को भी पहचान सकें; और यह प्रायः नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रमाण के रूप में रखा गया है। मसीह प्रेम की व्यवस्था को, विशेष रीति से, अपनी आज्ञा कहता है: यूहन्ना 13:34, "मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूं, कि एक दूसरे से प्रेम रखो; जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो।" और अध्याय 15:12,
"मेरी आज्ञा यह है, कि जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो।" और पद 17, "मैं तुम्हें यही आज्ञा देता हूं, कि एक दूसरे से प्रेम रखो।" और अध्याय 13:35 में कहता है, "यदि तुम आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो।" और अध्याय 14:21
(फिर भी उसी आज्ञा की ओर विशेष रीति से संकेत करते हुए, जिसे वह अपनी आज्ञा कहता है), "जिसके पास मेरी आज्ञाएं हैं, और वह उन्हें मानता है, वही मुझसे प्रेम रखता है।" वह प्रिय चेला, जिसमें स्वयं इस मीठे स्वभाव की इतनी अधिकता थी, अपनी पत्रियों में इस पर बहुत बल देता है। सब प्रेरितों में से किसी ने भी उसके समान, अंगीकार करनेवालों के अपने आपको परखने के लिये, अनुग्रह के स्पष्ट चिन्ह इतनी अधिकता से नहीं रखे; और अपने चिन्हों में, वह लगभग किसी और बात पर नहीं, वरन मसीही प्रेम की आत्मा, और उसके अनुकूल व्यवहार पर बल देता है: 1 यूहन्ना 2:9, 10, "जो कोई कहता है, कि मैं ज्योति में हूं, और अपने भाई से बैर रखता है, वह अब तक अन्धकार ही में है। जो अपने भाई से प्रेम रखता है, वही ज्योति में बना रहता है, और उसमें ठोकर खाने का कोई कारण नहीं।" अध्याय 3:14, "हम जानते हैं, कि हम मृत्यु में से निकलकर जीवन में पहुंच गए हैं, क्योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं: जो अपने भाई से प्रेम नहीं रखता, वह मृत्यु की दशा में रहता है।"
पद 18, 19, "हे बालको, हम वचन या जीभ ही से नहीं, वरन काम और सच्चाई से प्रेम रखें। और इसी से हम जान लेंगे, कि हम सत्य के हैं, और उसके सामने अपने अपने मन को दृढ़ करेंगे।"
पद 23, 24, "उसकी आज्ञा यह है, कि हम आपस में प्रेम रखें। और जो उसकी आज्ञाओं को मानता है, वह उस में बना रहता है, और वह उस में; और इसी से, अर्थात उस आत्मा से जो उसने हमें दिया है, हम जानते हैं कि वह हम में बना रहता है।" अध्याय 4:7, 8, "हे प्रियो, हम आपस में प्रेम रखें, क्योंकि प्रेम परमेश्वर की ओर से है; और जो कोई प्रेम रखता है, वह परमेश्वर से जन्मा है, और परमेश्वर को जानता है। जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता; क्योंकि परमेश्वर प्रेम है।" पद 12, 13, "परमेश्वर को कभी किसी ने नहीं देखा। यदि हम आपस में प्रेम रखें, तो परमेश्वर हम में बना रहता है, और उसका प्रेम हम में सिद्ध हो जाता है। इसी से हम जानते हैं, कि हम उस में बने रहते हैं, क्योंकि उसने अपने आत्मा में से हमें दिया है।" पद 16, "परमेश्वर प्रेम है; और जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में बना रहता है, और परमेश्वर उस में बना रहता है।" पद 20, "यदि कोई कहे, कि मैं प्रेम रखता हूं
परमेश्वर से, और अपने भाई से बैर रखता है, तो वह झूठा है; क्योंकि जो अपने भाई से, जिसे उसने देखा है, प्रेम नहीं रखता, वह उस परमेश्वर से, जिसे उसने नहीं देखा, कैसे प्रेम रख सकता है?"
8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… और पवित्रशास्त्र जहां तक हो सके उतना ही स्पष्ट है, कि सच्चे संत केवल वे ही हैं, जिनका सच्चा लक्षण यह है, कि वे अपने संगी प्राणियों पर, जो कंगाल, दरिद्र, और दुःखित हैं, दया करने और उनकी सहायता करने की प्रवृत्ति के हैं: भजन 37:21, "धर्मी अनुग्रह करता, और देता ही रहता है।" पद 26, "वह सर्वदा अनुग्रह करता, और उधार देता है।" भजन 112:5, "भला मनुष्य अनुग्रह करता, और उधार देता है।" पद 9, "उसने बिखेरकर कंगालों को दिया है।" नीतिवचन 14:31,
"जो परमेश्वर का आदर करता है, वह दरिद्र पर दया करता है।" नीतिवचन 21:26, "धर्मी बिना रोक-टोक दान देता है।" यिर्मयाह 22:16, "उसने दीन दरिद्र का न्याय चुकाया, तब उसका भला हुआ। क्या यह मुझे जानना नहीं था? यहोवा की यही वाणी है।" याकूब 1:27, "परमेश्वर पिता के निकट शुद्ध और निर्मल भक्ति यह है, कि अनाथों और विधवाओं के क्लेश में उनकी सुधि लें," &c. होशे
6:6, "क्योंकि मैं बलिदान को नहीं, परन्तु दया को चाहता हूं, और होमबलियों की अपेक्षा परमेश्वर के ज्ञान को अधिक चाहता हूं।" मत्ती 5:7, "धन्य हैं दयावन्त, क्योंकि उन पर दया की जाएगी।" 2 कुरिन्थियों 8:8, "मैं यह आज्ञा के तौर पर नहीं, परन्तु औरों के उत्साह के कारण, और तुम्हारे प्रेम की सच्चाई परखने के लिये कहता हूं।" याकूब 2:13-16, "क्योंकि जिस ने दया नहीं की, उसका न्याय बिना दया के होगा। हे मेरे भाइयो, यदि कोई कहे, कि मुझे विश्वास है, परन्तु उसके कर्म न हों, तो उस से क्या लाभ? क्या ऐसा विश्वास उसे बचा सकता है? यदि कोई भाई या बहन नंगे हों और उन्हें प्रतिदिन के भोजन की घटी हो, और तुम में से कोई उन से कहे, कुशल से जाओ, तुम गर्म रहो और तृप्त रहो, परन्तु जो वस्तुएं देह के लिये आवश्यक हैं, वे उन्हें न दो, तो क्या लाभ?"
1 यूहन्ना 3:17, "पर जिसके पास संसार की सम्पत्ति हो, और वह अपने भाई को कंगाल जाने, और उस पर तरस न खाए, तो उसमें परमेश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है?" मसीह न्याय के दिन के जिस वर्णन को हमें देता है, मत्ती 25 में (जो बाइबल में हमारे पास सबसे विस्तृत वर्णन है), उसमें वह यह दर्शाता है कि उस दिन न्याय इसी के अनुसार किया जाएगा, कि मनुष्य दयालु आत्मा और व्यवहार के पाए गए या नहीं। उस दिन की प्रक्रिया का ऐसा वर्णन देने में मसीह का उद्देश्य स्पष्ट रूप से अपने सब अनुयायियों को इस बोध से भर देना है, कि यदि यही उनकी आत्मा और व्यवहार न हो, तो उस दिन उसके द्वारा ग्रहण किए जाने और अपनाए जाने की कोई आशा नहीं है। इसलिए यह वह बोध है जिससे हमें भरा हुआ होना चाहिए। हम पवित्रशास्त्र में पाते हैं, कि धर्मी मनुष्य, और दयालु मनुष्य समानार्थी वाक्यांश हैं, यशायाह 57:1, "धर्मी नाश हो जाता है, और कोई भी इस बात पर ध्यान नहीं देता; भक्ति करनेवाले उठाए जाते हैं, और कोई विचार नहीं करता कि धर्मी आनेवाली विपत्ति में से उठा लिया जाता है।"
इस प्रकार हम देखते हैं कि पवित्रशास्त्र से यह प्रमाण कितना भरपूर, स्पष्ट, और प्रचुर है, कि जो सचमुच अनुग्रहमय हैं, वे यीशु की उस मेम्ने-समान और कबूतर-समान आत्मा के शासन के अधीन हैं
मसीह के, और यह कि यही सुसमाचार के उद्धारक अनुग्रह की मूल और विशेष प्रकृति है, और सच्चे मसीही धर्म की उचित आत्मा है। इसलिए हम निःसन्देह यह निर्णय कर सकते हैं, कि सब सच्चे मसीही मनोभावों के साथ ऐसी ही आत्मा रहती है, और यह सच्चे मसीहियों के भय और आशा, शोक और आनन्द, भरोसे और उत्साह की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।
कोई भी मुझे यह न समझे, कि सच्चे मसीहियों में विपरीत आत्मा का कोई भी अवशेष नहीं रहता, और वे कभी भी, किसी भी अवसर पर, ऐसी आत्मा के विपरीत व्यवहार के दोषी नहीं हो सकते। परन्तु मैं यह 8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… दावा करता हूँ, और तब तक करता रहूँगा जब तक मैं यह न कह दूँ कि बाइबल किसी काम की नहीं, कि मसीहियों में जो कुछ भी सच्चे मसीही धर्म से सम्बन्ध रखता है, वह इसी प्रवृत्ति का है, और इसी रीति से कार्य करता है; और पृथ्वी पर कोई भी सच्चा मसीही ऐसा नहीं जो ऐसी आत्मा की प्रबल शक्ति के अधीन इस प्रकार न हो, कि वह उचित रीति से इसी से पहचाना जाता है, और यह सचमुच और न्यायसंगत रीति से उसका लक्षण है, और इसलिए पादरियों, और औरों को, मसीह की ओर से ऐसा कोई अधिकार नहीं कि वे विपरीत लक्षण और व्यवहार के लोगों को यह सोचने के लिये प्रोत्साहित करें कि वे परिवर्तित हो गए हैं, क्योंकि वे ज्योतियों और प्रकाशनों की एक भली कहानी सुनाते हैं। ऐसा करने में, वे मसीह के ज्ञान के विरुद्ध अपने ही ज्ञान को खड़ा कर देंगे, और उस नियम के बाहर, और उसके विरुद्ध न्याय करेंगे, जिसके द्वारा मसीह ने घोषित किया है कि सब लोग उसके चेलों को पहचानें। कुछ लोग धर्म को कुछ क्षणिक ज्योतियों और प्रभावों में (विशेषकर यदि वे किसी विशेष रीति और क्रम में हों) इतना अधिक, और उस आत्मा और स्वभाव में जिसके व्यक्ति होते हैं इतना कम रखते हैं, कि वे धर्म को बहुत बिगाड़ देते हैं, और मसीही धर्म की ऐसी धारणाएँ बना लेते हैं जो पवित्रशास्त्र में वर्णित उससे बिलकुल भिन्न हैं।
पवित्रशास्त्र ऐसे किसी सच्चे मसीही को नहीं जानता, जो नीच, स्वार्थी, चिड़चिड़े और झगड़ालू स्वभाव का हो। इससे बड़ी कोई मूर्खता गढ़ी नहीं जा सकती, जितनी एक चिड़चिड़े, कठोर, कंजूस, घमण्डी, द्वेषी, सच्चे मसीही की कल्पना है। हमें मनुष्यों को नियमों के अनुसार ढालने का मार्ग सीखना है, न कि नियमों को मनुष्यों के अनुसार ढालना, अर्थात परमेश्वर के वचन के नियमों को इतना खींचना और तानना कि उनमें हम स्वयं, और हमारे कुछ पड़ोसी समा जाएँ, यहाँ तक कि हम उन्हें पूर्णतः निष्प्रभावी बना दें।
यह सच है, कि इन बातों में भी, जैसा और बातों में, मनुष्यों के स्वाभाविक स्वभाव के लिये कुछ छूट देनी चाहिए; परन्तु ऐसी छूट नहीं, कि जो लोग कभी भेड़िए और सांप थे, उन्हें अब उनके मन की आत्मा में किसी भी उल्लेखनीय परिवर्तन के बिना ही परिवर्तित मान लिया जाए। सच्चे मन-फिराव से हुआ परिवर्तन सामान्यतः उसी बात के सम्बन्ध में सबसे अधिक उल्लेखनीय और अनुभव करने योग्य होता है, जो पहले उस व्यक्ति की सबसे कुख्यात दुष्टता थी। अनुग्रह में उन पापों को, जो उस आत्मा के विपरीत हैं जिसकी चर्चा की गई है, उतनी ही रोकने और मार डालने की प्रवृत्ति है, जितनी मतवालेपन या कामुकता को मार डालने की है। वरन, पवित्रशास्त्र सुसमाचार के अनुग्रह द्वारा किए गए परिवर्तन को विशेष रीति से इसी पहले प्रकार के परिवर्तन में प्रकट होते हुए दर्शाता है: यशायाह 11:6-9, "तब भेड़िया भेड़ के बच्चे के संग रहेगा, चीता बकरी के बच्चे के संग बैठा करेगा; बछड़ा और जवान सिंह और पाला हुआ पशु इकट्ठे रहेंगे, और एक छोटा लड़का उनको हांकेगा। गाय और रीछनी एक संग चरेंगी, उनके बच्चे एक संग बैठा करेंगे; और सिंह बैल की नाईं भूसा खाया करेगा। दूध पीता बालक नाग के बिल के पास खेला करेगा, और दूध छुड़ाया हुआ बालक करैत के बिल में हाथ डाला करेगा। मेरे सारे पवित्र पर्वत में न वे हानि करेंगे और न कुछ नाश करेंगे; क्योंकि पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भरपूर होगी जैसे समुद्र जल से भरपूर है।" और यशायाह 65:25 भी इसी अर्थ का है। तदनुसार हम पाते हैं, कि मसीही कलीसिया के प्रारम्भिक समयों में, मतान्तरित लोग इसी सम्बन्ध में उल्लेखनीय रीति से बदले गए थे: तीतुस 3:3, &c., "क्योंकि हम भी पहले निर्बुद्धि, और आज्ञा न माननेवाले, और भरमाए हुए, तरह-तरह की अभिलाषाओं और सुखविलास के दास थे, बुराई और डाह में जीवन बिताते हुए, घृणित थे, और एक दूसरे से बैर रखते थे। पर जब हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर की करुणा और मनुष्यों के प्रति प्रेम प्रगट हुआ—तो उसने नये जन्म के स्नान, और पवित्र आत्मा के नये करने के द्वारा हमें बचाया।" और 8. सच्चे अनुग्रहमय मनोभाव उन मनोभावों से भिन्न हैं जो झूठे हैं… कुलुस्सियों 3:7, 8, "जिनमें तुम भी, जब उनके अनुसार जीवन बिताते थे, चलते थे। पर अब तुम भी इन सब को, अर्थात क्रोध, चिढ़, बैरभाव, निन्दा, और अपने मुंह से गंदी बातें निकालना, त्याग दो।"
9. अनुग्रहमय मनोभाव हृदय को कोमल बनाते हैं, और उनके साथ… 9. अनुग्रहमय मनोभाव हृदय को कोमल बनाते हैं, और उनके साथ मसीही सुकुमारता की आत्मा रहती है, और वह उनका परिणाम भी होती है।
झूठे मनोभाव, चाहे नए रहते हुए व्यक्ति उनसे पिघले हुए प्रतीत हों, तौभी अन्त में हृदय को कठोर बनाने की प्रवृत्ति रखते हैं। कुछ प्रकार की लालसाओं की ओर एक प्रवृत्ति स्थापित हो सकती है; जैसे कि स्वार्थ-खोज, आत्म-उन्नति, और औरों का विरोध। परन्तु झूठे मनोभाव, उनके साथ रहनेवाले भ्रम के साथ, अन्ततः मन को सुन्न करने, और उसे उन मनोभावों के विरुद्ध बन्द करने की प्रवृत्ति रखते हैं जिनमें हृदय की सुकुमारता निहित है: और उनका अन्तिम परिणाम यह होता है, कि व्यक्ति अपने मन की स्थिर दशा में, अपने वर्तमान और भूतकाल के पापों से कम प्रभावित होते जाते हैं, और भविष्य के पापों के सम्बन्ध में कम सावधान होते जाते हैं, परमेश्वर के वचन की चेतावनियों और सतर्कताओं से, या परमेश्वर की व्यवस्था में उसके ताड़नाओं से कम प्रभावित होते हैं, अपने हृदयों की दशा, और अपने व्यवहार के ढंग और प्रवृत्ति के प्रति अधिक लापरवाह होते जाते हैं, पाप को पहचानने में कम तीव्र-दृष्टि रखते हैं, बुराई के आभास से उतना नहीं डरते जितना वे व्यवस्था-आधारित जागरण और नरक के भय के अधीन रहते हुए डरते थे। अब जबकि वे ऐसी-ऐसी छापों और मनोभावों के भागी रहे हैं, और अपने विषय में ऊँची राय रखते हैं, और अपनी दशा को सुरक्षित मानते हैं; वे पहले से कहीं अधिक सुगमता से उन कर्तव्यों की उपेक्षा में जी सकते हैं जो कष्टकर और असुविधाजनक हैं; और कठिन आज्ञाओं का पालन करने में कहीं अधिक धीमे और अधूरे हैं; अपने ही दोषों और अपराधों के प्रकट होने से किसी भी मात्रा में उतने चिन्तित नहीं हैं; अपने चाल-चलन में परिश्रम, और पीड़ादायक सावधानी और यथार्थता के सम्बन्ध में स्वयं को अधिक छूट देने का साहस रखते हैं, और प्रलोभनों और अपनी लालसाओं के आग्रह के आगे अधिक सुगमता से झुक जाते हैं; और सार्वजनिक या एकान्त आराधना के समय, जब वे परमेश्वर की पवित्र उपस्थिति में आते हैं, तो अपने व्यवहार की बहुत कम चिन्ता रखते हैं। सम्भव है कि पहले, व्यवस्था-आधारित कायल होने के अधीन, उन्होंने धर्म में बहुत परिश्रम किया हो, और बहुत सी बातों में स्वयं को नकारा हो: परन्तु अब जब वे स्वयं को नरक के खतरे से बाहर मानते हैं, तो वे क्रूस के बोझ को बहुत हद तक उतार फेंकते हैं, और कठिन कर्तव्यों के कष्ट से स्वयं को बचा लेते हैं, और अपने आराम और अपनी लालसाओं का आनन्द लेने में स्वयं को अधिक छूट देते हैं।
ऐसे लोग मसीह को अपने पाप से उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करने के बदले, उसे अपने पापों के उद्धारकर्ता के रूप में मानकर उस पर भरोसा रखते हैं; और अपने आत्मिक शत्रुओं से बचने के लिये उसकी शरण लेने के बदले, वे उसका उपयोग परमेश्वर से बचाव के लिये अपने आत्मिक शत्रुओं की ढाल के रूप में करते हैं, और उन्हीं शत्रुओं को उसके विरुद्ध बलवन्त बनाने के लिये करते हैं। वे मसीह को पाप का सेवक, और शैतान का बड़ा अधिकारी और उपप्रधान बना देते हैं, जिससे उसका हित बढ़े, और वह सब वस्तुओं से बढ़कर यहोवा के विरुद्ध बलवन्त हो जाए; ताकि वे बड़े साहस से और बिना किसी भय के उसके विरुद्ध पाप कर सकें, और उसकी अत्यन्त गम्भीर चितावनियों और भयानक धमकियों की रोक-टोक से पूरी तरह सुरक्षित रहें। वे मसीह पर इसलिये भरोसा रखते हैं कि वह उनके लिये उनके पापों के निश्चिन्त भोग को बनाए रखे, और परमेश्वर की नाराज़गी से बचाव के लिये उनकी ढाल बने; जबकि वे उसके निकट, वरन उसकी गोद तक, जो उसकी सन्तान का स्थान है, आते हैं, ताकि अपने घातक हथियार, जो छिपाए हुए
IX. अनुग्रहमय मनोभाव हृदय को कोमल बनाते हैं, और उनके साथ रहते तथा उन्हीं से उत्पन्न होते हैं… अपनी पोशाक के नीचे छिपाए हुए थे।67 तौभी इनमें से कुछ लोग उसी समय परमेश्वर के प्रति प्रेम का बड़ा दावा, उसके अनुग्रह के निश्चय का दावा, और उसके प्रेम की मिठास चखने में बड़े आनन्द का दावा करते हैं।
इसी रीति से उन लोगों ने मसीह पर भरोसा रखा, जिनकी चर्चा प्रेरित यहूदा करता है, जो पवित्र लोगों में अनजाने में घुस आए थे; परन्तु वास्तव में भक्तिहीन मनुष्य थे, जो परमेश्वर के अनुग्रह को लुचपन में बदल देते थे, यहूदा 4। ये वे लोग हैं जो अपने धर्मी होने पर भरोसा रखते हैं; और चूंकि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि धर्मी निश्चय जीवित रहेगा, अर्थात निश्चय उद्धार पाएगा, इसलिये वे अधर्म करने का साहस करते हैं—जिन्हें परमेश्वर यहेजकेल 33:13 में चितावनी देता है: “जब मैं धर्मी से कहूं, कि तू निश्चय जीवित रहेगा, और वह अपनी धार्मिकता पर भरोसा करके कुटिलता करने लगे, तो उसका कोई भी धर्मकर्म स्मरण न किया जाएगा, वरन जो कुटिलता उसने की है उसी के कारण वह मर जाएगा।”
अनुग्रहमय मनोभावों की प्रवृत्ति इसके सर्वथा विपरीत होती है; वे पत्थर के हृदय को अधिकाधिक मांस के हृदय में बदल देते हैं। पवित्र प्रेम और आशा ऐसे तत्त्व हैं जो हृदय पर नरक के दास-तुल्य भय से कहीं अधिक प्रभावकारी ढंग से काम करते हैं, ताकि वह कोमल बने, और पाप के, अथवा जो कुछ परमेश्वर को अप्रसन्न व नाराज़ करे उसके, भय से भर जाए, और सतर्कता, सावधानी और कड़ाई में लगा रहे। जैसा पहले देखा गया, अनुग्रहमय मनोभाव पिसे हुए हृदय से, अर्थात् (जैसा कि इस शब्द का अर्थ है) चूर-चूर हुए हृदय से उत्पन्न होते हैं, जो ईश्वरीय शोक से चूर-चूर होकर टूट गया हो; और इससे हृदय वैसे ही कोमल हो जाता है जैसे चोट खाया हुआ मांस कोमल और सहज ही घायल होने योग्य होता है। ईश्वरीय शोक हृदय को कोमल बनाने में मात्र स्वार्थपूर्ण तत्त्वों से उत्पन्न व्यवस्था-आधारित शोक की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभाव रखता है।
सच्चे मसीही के हृदय की कोमलता को हमारे उद्धारकर्ता ने बड़ी सुन्दरता से इस बात में प्रकट किया है कि उसने ऐसे व्यक्ति की तुलना एक छोटे बालक से की। छोटे बालक का मांस अत्यन्त कोमल होता है; वैसे ही नये जन्मे हुए व्यक्ति का हृदय भी कोमल होता है। यह बात उस विवरण में दर्शाई गई है जो हमें नामान के कोढ़ के यरदन में नहाकर चंगे होने के विषय में बताया गया है; जो निःसन्देह नये जन्म के हौद में नहाकर प्राण के नये किए जाने का एक प्रतिरूप था। हमें 2 राजाओं 5:14 में बताया गया है, “अतः उसने जाकर परमेश्वर के भक्त के वचन के अनुसार सात बार यरदन में डुबकी लगाई, और उसका मांस फिर छोटे बालक के मांस के समान हो गया।” छोटे बालक का न केवल मांस कोमल होता है, वरन उसका मन भी कोमल होता है। छोटे बालक का हृदय सहज ही प्रभावित, प्रेरित और झुकाया जा सकता है; वैसे ही आत्मिक बातों में मसीही का हृदय भी होता है। छोटा बालक सहज ही सहानुभूति से प्रभावित हो जाता है, रोनेवालों के साथ रोता है, और दूसरों को दुःख में देखना उससे सहा नहीं जाता: मसीही के साथ भी ऐसा ही है, यूहन्ना 11:25, रोमियों 12:15, 1 कुरिन्थियों 12:26। छोटा बालक कृपा से सहज ही जीत लिया जाता है: मसीही भी वैसा ही है। छोटा बालक सांसारिक विपत्तियों से सहज ही शोकित हो जाता है, और उसका हृदय
67 “ये वे कपटी हैं जो विश्वास तो करते हैं, परन्तु सुसमाचार और प्रभु यीशु के उपयोग के सम्बन्ध में चूक जाते हैं। और इन्हीं की चर्चा हम यहूदा 3 में पढ़ते हैं, अर्थात् उन मनुष्यों की, जिन्होंने अनुग्रह को लुचपन में बदल दिया। क्योंकि इसी में मनुष्य के हृदय की अत्यधिक दुष्टता प्रकट होती है, कि न केवल व्यवस्था, वरन प्रभु यीशु का महिमामय सुसमाचार भी उसमें सब प्रकार की अधर्मता उत्पन्न कर देता है। और मनुष्यों के लिये यह बहुत ही साधारण बात है कि मन-फिराव के आरम्भिक कार्य के समय तो वे अनुग्रह और मसीह के लिये पुकारें, और बाद में स्वच्छन्द हो जाएं, व्यवस्था को तोड़ते हुए जीवन बिताएं, और अपने ऐसे चालचलन का औचित्य सुसमाचार में से ही ढूंढ़ें!” शेपर्ड का पैरेबल, भाग 1, पृ. 126।
IX. अनुग्रहमय मनोभाव हृदय को कोमल बनाते हैं, और उनके साथ रहते तथा उन्हीं से उत्पन्न होते हैं… पिघल जाता है और रो पड़ता है: इस प्रकार मसीही का हृदय पाप की बुराई के प्रति कोमल होता है। छोटा बालक बाहरी बुराइयों के प्रकट होने से, अथवा किसी ऐसी वस्तु से जो उसे हानि पहुंचाने की धमकी दे, सहज ही डर जाता है: वैसे ही मसीही भी नैतिक बुराई के प्रकट होने से, और जो कुछ प्राण को हानि पहुंचाने की धमकी दे उससे, घबरा उठता है। छोटा बालक जब शत्रुओं या हिंसक पशुओं का सामना करता है, तो अपनी ही शक्ति पर भरोसा नहीं करता, वरन अपने माता-पिता की शरण में भाग जाता है: वैसे ही सन्त आत्मिक शत्रुओं का सामना करते समय आत्म-निर्भर नहीं होता, वरन मसीह की शरण लेता है। छोटा बालक संकट के स्थानों में बुराई की आशंका रखता है, अन्धेरे से डरता है, अकेला छोड़े जाने से, या घर से दूर होने से डरता है: वैसे ही सन्त भी अपने आत्मिक संकटों के प्रति सचेत रहता है, अपने ही विषय में शंकालु रहता है, जब उसे अपना मार्ग साफ़ नहीं दिखाई देता तो भय से भर जाता है, अकेला छोड़े जाने से, और परमेश्वर से दूर होने से डरता है: नीतिवचन 28:14, “धन्य है वह मनुष्य जो सर्वदा डरता रहता है, परन्तु जो अपने मन को कठोर करता है वह विपत्ति में गिरेगा।” छोटा बालक बड़ों से डरता है, उनके क्रोध से भयभीत रहता है, और उनकी घुड़की और धमकियों से कांप उठता है: वैसे ही सच्चा सन्त परमेश्वर के प्रति होता है: भजन
संहिता 119:120, “तेरे भय से मेरा तो मांस कांप उठता है, और मैं तेरे न्यायदण्डों से डरता हूं।” यशायाह 66:2, “मैं ऐसे ही मनुष्य की ओर दृष्टि करूंगा, अर्थात् जो दीन है और मेरे वचन से कांपता है।” पद 5, “हे यहोवा के वचन से कांपनेवालो, उसका वचन सुनो।” एज्रा 9:4, “तब इस्राएल के परमेश्वर की बातों से जितने कांपते थे, वे सब मेरे पास इकट्ठे हुए।” अध्याय 10:3; “अपने प्रभु की सम्मति के अनुसार, और जो हमारे परमेश्वर की आज्ञा से कांपते हैं उनकी सम्मति के अनुसार।” छोटा बालक बड़ों के पास श्रद्धा के साथ जाता है: वैसे ही सन्त लोग पवित्र श्रद्धा और आदर के साथ परमेश्वर के पास जाते हैं: अय्यूब 13:2, “क्या उसका माहात्म्य तुम को न डराएगा? और उसका डर तुम पर न बैठ जाएगा?”
पवित्र भय सच्ची भक्ति की प्रकृति में इतना अधिक समाया हुआ है, कि पवित्रशास्त्र में इसे किसी और नाम से इतनी बार नहीं पुकारा गया, जितनी बार 'परमेश्वर के भय' के नाम से पुकारा गया है।
इसलिये अनुग्रहमय मनोभाव मनुष्यों को ढीठ, आगे बढ़नेवाला, कोलाहलपूर्ण और उद्दण्ड नहीं बनाते; वरन उन्हें कांपते हुए बोलने के लिये प्रवृत्त करते हैं: होशे 13:1, “जब एप्रैम कांपते हुए बोलता था, तब वह इस्राएल में महान गिना जाता था; परन्तु जब वह बाल की उपासना करने का दोषी हुआ, तब वह मर गया”; और परमेश्वर तथा मनुष्य के प्रति अपने सारे व्यवहार में एक प्रकार का पवित्र भय धारण करने के लिये प्रवृत्त करते हैं; यह भजन संहिता 2:11, 1 पतरस 3:15, 2 कुरिन्थियों 7:15 के अनुकूल है,
इफिसियों 6:5, 1 पतरस 3:2, रोमियों 11:20।
परन्तु यहां कोई यह आपत्ति उठाकर कह सकता है, कि क्या प्रार्थना में, और ईश्वरीय आराधना के कर्तव्यों में, पवित्र साहस जैसी कोई वस्तु नहीं होती? मैं उत्तर देता हूं, निःसन्देह ऐसी वस्तु है; और यह मुख्य रूप से उन प्रतिष्ठित सन्तों में पाई जाती है, जो विश्वास और प्रेम की बड़ी मात्रा रखते हैं। परन्तु यह पवित्र साहस श्रद्धा के तनिक भी विपरीत नहीं है; यद्यपि यह फूट और दासतापूर्ण भय के विपरीत अवश्य है। यह उस मनोवृत्ति को मिटा देता है या घटा देता है जो नैतिक दूरी या अलगाव से, और सम्बन्ध की दूरी से, जैसे दास के सम्बन्ध की दूरी से, उत्पन्न होती है; परन्तु उस दूरी को कदापि नहीं मिटाता जो उस स्वाभाविक दूरी के अनुकूल है जिससे हम अनन्त रूप से निम्न हैं। धूल के दीन पापी कीड़ों में, जिन्हें परमेश्वर और अपने आप का सही दर्शन प्राप्त है, ऐसा कोई साहस नहीं होगा जो उन्हें उन निष्कलंक और तेजोमय स्वर्गदूतों से कम भय और श्रद्धा के साथ परमेश्वर के पास आने के लिये प्रेरित करे, जो उसके सिंहासन के आगे अपने मुंह ढांप लेते हैं, यशायाह 6, आरम्भ में। रिबका (जो इसहाक के साथ अपने विवाह में, लगभग हर परिस्थिति में, स्पष्ट रूप से कलीसिया की, अर्थात् मसीह की दुल्हन की, एक बड़ी प्रतिरूप थी) जब इसहाक से भेंट करती है, तो अपने ऊंट पर से उतरती है, और घूंघट लेकर अपने आप को ढांप लेती है; यद्यपि वह
IX. अनुग्रहमय मनोभाव हृदय को कोमल बनाते हैं, और उनके साथ रहते तथा उन्हीं से उत्पन्न होते हैं… वह उसकी दुल्हन बनकर उसके पास लाई जा रही थी, ताकि उसके साथ उस निकटतम सम्बन्ध और घनिष्ठतम एकता में रहे, जिसमें मनुष्यजाति कभी भी एक दूसरे से जुड़ी है।68 एलिय्याह, वह महान भविष्यद्वक्ता, जिसे परमेश्वर के साथ इतनी अधिक पवित्र घनिष्ठता प्राप्त थी, परमेश्वर के विशेष निकट होने के समय, अर्थात् जब वह पर्वत पर उससे बातचीत कर रहा था, तब भी उसने अपना मुंह अपनी चद्दर से ढांप लिया। यह इसलिये नहीं था कि वह उस भयानक आंधी, भूकम्प और आग से किसी दास-तुल्य भय के मारे भयभीत हो गया था; वरन यह तब हुआ जब ये सब बीत चुके थे, और परमेश्वर उससे एक मित्र के समान, एक दबे हुए धीमे शब्द में बोला: 1 राजा 19:12,
13, “और आग के बाद एक दबा हुआ धीमा शब्द सुनाई दिया; और ऐसा हुआ, कि जब एलिय्याह ने उसे सुना, तो उसने अपना मुंह अपनी चद्दर से ढांप लिया।” और मूसा, जिससे परमेश्वर आमने-सामने ऐसे बोलता था जैसे कोई मनुष्य अपने मित्र से बोलता है, और जो परमेश्वर के साथ उस घनिष्ठता में, जिसमें उसे प्रवेश दिया गया था, सब भविष्यद्वक्ताओं से भिन्न ठहराया गया था; उस समय जब वह सबसे अधिक निकट लाया गया, जब परमेश्वर ने उसे उसी पर्वत पर अपनी महिमा दिखाई जहां उसने बाद में एलिय्याह से बात की: “उसने फुर्ती से भूमि की ओर सिर झुकाकर दण्डवत् किया,” निर्गमन 34:8। कुछ लोगों में महान यहोवा के सम्मुख अपने निवेदन प्रस्तुत करने में एक अत्यन्त अनुचित और असहनीय साहस पाया जाता है, जो पवित्र साहस का दिखावा और असाधारण निकटता तथा घनिष्ठता का प्रदर्शन मात्र है; जिसका विचार मात्र ही, यदि वे परमेश्वर और अपने बीच की दूरी को देखें, तो उन्हें आतंक और लज्जा से मिटाकर कुछ भी नहीं कर देगा। वे उस फरीसी के समान हैं, जो अपनी पवित्रता की श्रेष्ठता के भरोसे में बड़े साहस से निकट आया। जबकि, यदि वे अपनी नीचता को देखें, तो वे उस चुंगी लेनेवाले के अधिक समान होते, जो “दूर खड़ा रहा, और आंखें भी स्वर्ग की ओर उठाने का साहस न कर सका; परन्तु अपनी छाती पीट-पीटकर कहता था, हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर।” हम जैसे पापी प्राणियों के लिये यही उचित है, कि हम एक पवित्र परमेश्वर के पास (यद्यपि विश्वास के साथ, और बिना आतंक के, तथापि) अनुताप, और पश्चातापपूर्ण लज्जा और मुंह की उदासी के साथ जाएं। भविष्यद्वाणी की गई है कि कलीसिया की यही मनोवृत्ति उस समय होगी, जब वह पृथ्वी पर अपने अन्तिम दिनों की महिमा के सर्वोच्च विशेषाधिकारों के समय में होगी, जब परमेश्वर अपनी वाचा की दया उस पर प्रकट करके उसे अद्भुत रीति से शान्ति देगा, यहेजकेल 16:60 से अन्त तक: “मैं तेरे साथ अपनी सदा की वाचा बान्धूंगा। तब तू अपनी चालचलन का स्मरण करके लज्जित होगी।—और मैं तेरे साथ अपनी वाचा बान्धूंगा, और तू जान लेगी कि मैं यहोवा हूं; जिससे जब मैं तेरे उन सब कामों के विषय में जो तूने किए हैं तुझ से क्षमा करूं, तब तू स्मरण करके लज्जित हो, और अपनी लज्जा के मारे फिर कभी मुंह न खोले, प्रभु यहोवा की यही वाणी है।” वह स्त्री जिसकी चर्चा हम लूका के सातवें अध्याय में पढ़ते हैं, जो एक प्रतिष्ठित सन्त थी, और जिसमें मसीह की अपनी गवाही के अनुसार, पद 47, उस सच्चे प्रेम की बहुतायत थी जो भय को बाहर निकाल देता है, वह मसीह के पास एक मनोहर और स्वीकार्य रीति से आई, जब वह उस दीन नम्रता, श्रद्धा और लज्जा के साथ आई, जब वह उसके पांवों के पास खड़ी होकर उसके पीछे रोती रही, यह समझकर कि वह उसके सम्मुख आने के योग्य नहीं है, और अपने आंसुओं से उसके पांव धोए।
एक कारण जिससे अनुग्रहमय मनोभावों के साथ आत्मा की यह सुकुमारता होती है, जिसकी चर्चा की जा चुकी है, यह है कि सच्चा अनुग्रह विवेक के दोषी होने के बोध को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति रखता है। मनुष्य
68 डॉ. एम्स अपने कैसेज़ ऑफ कॉन्शंस, पुस्तक 3, अध्याय 4 में, परमेश्वर की आराधना में एक पवित्र दीनता की चर्चा सच्ची नम्रता के एक चिन्ह के रूप में करते हैं।
IX. अनुग्रहमय मनोभाव हृदय को कोमल बनाते हैं, और उनके साथ रहते तथा उन्हीं से उत्पन्न होते हैं… किसी भी अनुग्रह के प्राप्त होने से पहले विवेक के दोषी होने के बोध का अनुभव करते हैं: और यदि बाद में वे सचमुच मन फिराएं, और उन्हें सच्चा पश्चाताप, और विश्वास करने में आनन्द तथा शान्ति प्राप्त हो; तो इसकी प्रवृत्ति भ्रमों का अन्त करने की तो होती है, परन्तु पाप के बोध का अन्त करने की कदापि नहीं होती, वरन उन्हें बढ़ाने की होती है। यह मनुष्य के विवेक को सुन्न नहीं करता; वरन उसे अधिक संवेदनशील बना देता है, जिससे वह पाप की पापपूर्णता को अधिक सहजता और गहराई से पहचानता है, और पाप की जघन्यता और भयानक प्रकृति का अधिक गहरा बोध प्राप्त करता है, और अधिक शीघ्रता और गहराई से उसका अनुभव करने योग्य बनता है, और अपने ही हृदय की पापपूर्णता तथा दुष्टता के प्रति अधिक निश्चय पाता है; और फलस्वरूप वह अपने हृदय के प्रति अधिक शंकालु बनने की प्रवृत्ति रखता है। अनुग्रह प्राण को पाप के विषय उन्हीं बातों का, जिनका बोध उसे परमेश्वर के आत्मा के व्यवस्था-आधारित कार्य के अन्तर्गत पहले हुआ था, आगे और उत्तम बोध देने की प्रवृत्ति रखता है; अर्थात्, परमेश्वर की इच्छा, व्यवस्था और आदर के प्रति उसका महान विरोध, उसके प्रति परमेश्वर के बैर और अप्रसन्नता की महानता, और वह भयानक दण्ड जिसके योग्य वह ठहरता है और जिसका वह पात्र है। और केवल यही नहीं, वरन यह प्राण को पाप के विषय में कुछ और भी बोध देता है, जिसे वह मात्र व्यवस्था-आधारित बोधों के अन्तर्गत रहते हुए कुछ भी नहीं देख पाता था; और वह है पाप की अनन्त रूप से घृणित प्रकृति, और उसी कारण उसकी भयानकता। और यह पाप के प्रति हृदय को कोमल बना देता है; जैसे दाऊद का हृदय, जो शाऊल का वस्त्र काटने के बाद उसे धिक्कारने लगा। सच्चे पश्चातापी का हृदय उस जले हुए बालक के समान होता है जो आग से भय खाता है। इसके विपरीत, जिसने बनावटी पश्चाताप, और झूठी शान्ति व आनन्द का अनुभव किया है, वह उस लोहे के समान है जिसे अचानक तपाकर बुझा दिया गया हो; वह पहले से कहीं अधिक कठोर हो जाता है। झूठा मन-फिराव विवेक के दोषी होने के बोध का अन्त कर देता है; और इस प्रकार उस सचेतता को, जो व्यवस्था के कार्य के अन्तर्गत प्रकट हुई थी, या तो पूरी तरह मिटा देता है, या बहुत अधिक घटा देता है।
सभी अनुग्रहमय मनोभाव हृदय की इस मसीही सुकुमारता को, जिसकी चर्चा की जा चुकी है, बढ़ावा देने की प्रवृत्ति रखते हैं; न केवल ईश्वरीय शोक, वरन अनुग्रहमय आनन्द भी: भजन संहिता 2:11, “यहोवा का भय मानकर उसकी उपासना करो, और कांपते हुए मगन हो।” वैसे ही अनुग्रहमय आशा भी: भजन संहिता 33:18, “देखो, यहोवा की आंख उन पर लगी रहती है जो उसका भय मानते हैं, और जो उसकी करुणा की आशा रखते हैं।” और भजन संहिता 147:11, “यहोवा उन्हीं से जो उसका भय मानते हैं, और जो उसकी करुणा की आशा रखते हैं, प्रसन्न होता है।” वरन जो आशा सबसे अधिक निश्चित और दृढ़ हो, यदि वह सचमुच अनुग्रहमय हो, तो उसमें भी यही प्रवृत्ति होती है।
पवित्र आशा जितनी ऊंची उठाई जाती है, उतनी ही यह मसीही सुकुमारता भी बढ़ती जाती है। पवित्र निश्चय के द्वारा दास-तुल्य भय के दूर होने के साथ-साथ श्रद्धामय भय में समानुपाती वृद्धि होती है। भविष्य के दण्ड में परमेश्वर की नाराज़गी के फलों के भय के घटने के साथ-साथ उसकी नाराज़गी के ही भय में समानुपाती वृद्धि होती है; नरक के भय के घटने के साथ पाप के भय में वृद्धि होती है। व्यक्ति की स्थिति के विषय शंकाओं के मिटने के साथ-साथ उसके हृदय के विषय, अर्थात् उसकी शक्ति, बुद्धि, स्थिरता, विश्वासयोग्यता आदि के अविश्वास में, शंकाओं में समानुपाती वृद्धि होती है। वह जितना कम प्राकृतिक विपत्ति से डरने योग्य होता है—क्योंकि उसका हृदय स्थिर है, परमेश्वर पर भरोसा रखता है, और इसलिये बुरे समाचार से नहीं डरता—उतना ही अधिक वह नैतिक बुराई, अर्थात् पाप की बुराई, के प्रकट होने से घबरा उठने योग्य होता है। जितना अधिक उसमें पवित्र साहस होता है, उतना ही कम उसमें आत्म-भरोसा, और अगुआई करनेवाला ढीठ साहस होता है, और उतनी ही अधिक नम्रता होती है। वह जितना अधिक औरों से बढ़कर नरक से छुटकारे का निश्चय रखता है, उतना ही अधिक उसमें
IX. अनुग्रहमय मनोभाव हृदय को कोमल बनाते हैं, और उनके साथ रहते तथा उन्हीं से उत्पन्न होते हैं… उसके योग्य दण्ड का भाव होता है। वह औरों से कम विश्वास में डगमगाने योग्य होता है; परन्तु औरों से अधिक गम्भीर चितावनियों से, परमेश्वर की घुड़की से, और दूसरों की विपत्तियों से प्रभावित होने योग्य होता है।
उसे सबसे दृढ़ शान्ति प्राप्त होती है, परन्तु उसका हृदय सबसे कोमल होता है: वह औरों से धनी होता है, परन्तु आत्मा में सबसे दीन होता है: वह सन्तों में सबसे ऊंचा और सबसे बलवन्त होता है, परन्तु उन्हीं में सबसे छोटा और सबसे कोमल बालक होता है।
X. एक और बात, जिसमें सच्चे अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव… X. एक और बात, जिसमें सच्चे अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव झूठे मनोभावों से भिन्न होते हैं, वह है सुंदर सन्तुलन और अनुपात।
यह नहीं कि इस जीवन में सन्तों के सद्गुणों और अनुग्रहमय मनोभावों का सन्तुलन पूर्ण होता है: वह प्रायः अनुग्रह की अपूर्णता के कारण, उचित शिक्षा के अभाव के कारण, निर्णय की भूलों के कारण, अथवा स्वाभाविक स्वभाव की किसी विशेष दुर्बलता के कारण, या शिक्षा-दीक्षा में कमी के कारण, और अन्य अनेक बाधाओं के कारण, जिनकी चर्चा की जा सकती है, अनेक बातों में त्रुटिपूर्ण होता है। परन्तु तौभी सन्तों में अनुग्रहमय मनोभावों और सच्चे धर्म के विभिन्न अंगों के बीच कदापि वह भयंकर असन्तुलन नहीं पाया जाता, जो कपटियों के झूठे धर्म और नकली अनुग्रहों में सामान्यतः देखा जाता है।
सन्तों के सचमुच पवित्र मनोभावों में वह अनुपात पाया जाता है, जो उनके पवित्रीकरण की सार्वभौमिकता का स्वाभाविक परिणाम है। उन पर मसीह की पूरी प्रतिमा होती है: उन्होंने पुराने मनुष्यत्व को उतार दिया है, और नये मनुष्यत्व को उसके सब अंगों और सदस्यों सहित पूरी तरह धारण कर लिया है। पिता को यह अच्छा लगा कि मसीह में सारी परिपूर्णता वास करे: उसमें हर एक अनुग्रह है; वह अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण है: और जो मसीह के हैं, वे “उसकी परिपूर्णता में से अनुग्रह पर अनुग्रह पाते हैं” (यूहन्ना 1:14, 16); अर्थात्, उनमें वे सब अनुग्रह हैं जो मसीह में हैं; अनुग्रह पर अनुग्रह; अर्थात् अनुग्रह के अनुरूप अनुग्रह: मसीह में ऐसा कोई अनुग्रह नहीं जिसकी प्रतिमा विश्वासियों में उसके अनुरूप न हो: वह प्रतिमा एक सच्ची प्रतिमा है; और उस प्रतिमा में मूल के समान ही वही सुंदर अनुपात कुछ हद तक विद्यमान है; उसमें रूप के बदले रूप, और अंग के बदले अंग है। परमेश्वर की कारीगरी में सन्तुलन और सौन्दर्य है। जो प्राकृतिक देह परमेश्वर ने बनाई है, वह अनेक अंगों से बनी है; और सब सुंदर अनुपात में हैं: वैसे ही नये मनुष्यत्व में भी है, जो विभिन्न अनुग्रहों और मनोभावों से बना है। जो बालक पूर्ण जन्मा हो, उसकी देह किसी रोग के कारण, या उसके कुछ अंगों की दुर्बलता और घावों के कारण, ठीक अनुपात से चूक सकती है; तौभी वह असन्तुलन उन अंगहीन जन्मे राक्षसों के असन्तुलन के समान किसी भी रीति से नहीं होता।
कपटियों के साथ वैसा ही है जैसा प्राचीन काल में एप्रैम के साथ था, उस समय जब परमेश्वर उनके कपट की बड़ी शिकायत करता है, होशे 7:8: “एप्रैम वह रोटी है जो पलटी नहीं गई,” अर्थात् आधी भुनी और आधी कच्ची: सामान्यतः उनके मनोभावों में किसी भी प्रकार की एकरूपता नहीं होती।
उनमें से अनेकों में विभिन्न प्रकार के धार्मिक मनोभावों के सम्बन्ध में बड़ी पक्षपातपूर्णता पाई जाती है; कुछ बातों में बड़े मनोभाव, और अन्य बातों में किसी प्रकार का अनुपात नहीं। सन्तों में पवित्र आशा और पवित्र भय साथ-साथ रहते हैं, जैसा कि भजन संहिता 33:18 और 147:11 से देखा जा चुका है। परन्तु इनमें से कुछ में सबसे अधिक विश्वासपूर्ण आशा तो होती है, जबकि वे श्रद्धा, आत्म-सन्देह और सावधानी से रहित होते हैं, और बड़ी हद तक भय को त्याग देते हैं। सन्तों में आनन्द और पवित्र भय साथ-साथ रहते हैं, चाहे आनन्द कितना ही बड़ा क्यों न हो: जैसा कि चेलों के साथ मसीह के पुनरुत्थान की उस आनन्दमय सुबह हुआ, मत्ती 28:8: “और वे X. एक और बात, जिसमें सच्चे अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव… भय और बड़े आनन्द के साथ कब्र से तुरन्त चली गईं।”69 परन्तु इनमें से अनेक बिना कांपे आनन्दित होते हैं: उनका आनन्द उस प्रकार का होता है, जो ईश्वरीय भय के सर्वथा विपरीत है।
परन्तु सन्तों और कपटियों के बीच विशेष रूप से एक बड़ा अन्तर यह है, कि पहले वाले का आनन्द और शान्ति ईश्वरीय शोक और पाप के लिये विलाप के साथ-साथ रहता है। उन्हें न केवल अपनी पहली शान्ति के लिये तैयार करने वाला शोक होता है, वरन शान्ति पाने और आनन्द स्थिर हो जाने के बाद भी वह होता है। जैसा कि परमेश्वर की कलीसिया के विषय भविष्यद्वाणी की गई है, कि बन्धुआई से लौटकर, और कनान देश में, अर्थात् विश्राम के देश में, और दूध और मधु बहानेवाले देश में बस जाने के बाद, वे अपने पापों के लिये विलाप करेंगी और अपने आप से घृणा करेंगी, यहेजकेल
20:42, 43: “और जब मैं तुम को इस्राएल के देश में, अर्थात् जिस देश के देने की मैं ने तुम्हारे पितरों से शपथ खाई थी, उस में पहुंचाऊंगा, तब तुम जान लोगे कि मैं यहोवा हूं। और वहां तुम अपनी चालचलन और अपने सब कामों को स्मरण करोगे, जिन से तुम अशुद्ध हुए, और अपनी की हुई सब बुराइयों के कारण अपनी ही दृष्टि में अपने आप से घृणा करोगे।” वैसे ही यहेजकेल 16:61, 62, 63 में भी। सच्चा सन्त इस बात में एक छोटे बालक के समान होता है; नये सिरे से जन्म पाने से पहले उसे कभी कोई ईश्वरीय शोक नहीं होता; परन्तु उसके बाद उसे यह प्रायः बना रहता है: जैसे छोटा बालक जन्म लेने से पहले, और अन्धकार में रहते हुए, कभी नहीं रोता; परन्तु ज्यों ही वह प्रकाश देखता है, त्यों ही रोने लगता है; और उसके बाद प्रायः रोता रहता है। यद्यपि मसीह ने हमारे दुःखों को उठा लिया है, और हमारे शोकों को अपने ऊपर ले लिया है, जिससे हम दण्ड के शोक से मुक्त हो गए हैं, और अब उन शान्तिदायक बातों पर मधुरता से भोजन कर सकते हैं जो मसीह ने हमारे लिये मोल ली हैं; तथापि इससे यह नहीं रुकता कि इन शान्तिदायक बातों पर हमारा भोजन करना पश्चाताप के शोक के साथ-साथ हो। जैसे प्राचीन काल में, इस्राएल की सन्तान को आज्ञा दी गई थी कि वे सर्वदा फसह के मेम्ने को कड़वे सागपात के साथ खाएं। सच्चे सन्तों की चर्चा पवित्रशास्त्र में न केवल उन लोगों के रूप में की गई है जिन्होंने पाप के लिये विलाप किया है, वरन उन लोगों के रूप में भी जो विलाप करते ही रहते हैं, जिनका स्वभाव ही अब तक विलाप करना है: मत्ती 5:4, “धन्य हैं वे जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएंगे।”
कपटियों में न केवल प्रायः विभिन्न प्रकार के धार्मिक मनोभावों के सम्बन्ध में एक मौलिक कमी पाई जाती है, वरन उन्हीं मनोभावों में, विभिन्न विषयों के सम्बन्ध में, एक विचित्र पक्षपातपूर्णता और असन्तुलन भी पाया जाता है।
इस प्रकार, प्रेम के मनोभाव के विषय में, कुछ लोग परमेश्वर और मसीह के प्रति प्रेम का बड़ा दावा और बड़ा दिखावा करते हैं, और सम्भव है, उनके विषय में जो कुछ उन्होंने सुना या सोचा है उससे बहुत प्रभावित भी हुए हों: परन्तु उनमें मनुष्यों के प्रति प्रेम और भलाई की आत्मा नहीं होती, वरन वे झगड़े, ईर्ष्या, बदला और बुरी बोली की ओर प्रवृत्त होते हैं; और सम्भव है, किसी पड़ोसी के प्रति पुरानी रंजिश को अपने हृदय में सात वर्ष तक, यदि चौदह वर्ष तक नहीं, तो सात वर्ष तक बनाए रखें; और उसके प्रति वास्तविक द्वेष और आत्मा की कड़वाहट में जीते रहें: और सम्भव है, अपने पड़ोसियों के साथ व्यवहार में इस नियम का पालन करने में बहुत सतर्क और सच्चे न हों, कि “दूसरों के साथ वैसा ही करो जैसा चाहते हो कि वे तुम्हारे साथ करें।” और दूसरी ओर,
69 “आत्मा की मुहर के बाद नई सावधानी और तत्परता आती है। अब प्राण मसीह के चरणों में वैसे ही है जैसे मरियम कब्र के पास भय और बड़े आनन्द के साथ थी। जो कोई अपने साथ बड़ा धन लेकर यात्रा करता है, वह हर झाड़ी में चोर से डरता है।” फ्लेवल का सैक्रामेन्टल मेडिटेशन्स, मेडिटेशन 4।
X. एक और बात, जिसमें सच्चे अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव… ऐसे भी अन्य लोग हैं जो मनुष्यों के प्रति बड़ी भलाई रखते हुए प्रतीत होते हैं, अपनी रीति में बड़े सुशील और उदार होते हैं, परन्तु उनमें परमेश्वर के प्रति कोई प्रेम नहीं होता।
और मनुष्यों के प्रति प्रेम के विषय में, कुछ ऐसे हैं जिनमें कुछ लोगों के प्रति बहता हुआ प्रेम पाया जाता है; परन्तु उनका प्रेम उतना व्यापक और सार्वभौमिक स्वभाव का कदापि नहीं होता, जितना सच्चा मसीही प्रेम होता है। वे कुछ लोगों के प्रति स्नेह से परिपूर्ण होते हैं, और दूसरों के प्रति कड़वाहट से परिपूर्ण होते हैं। वे अपने ही दल से, अर्थात् उनसे जो उन्हें सराहते, उनसे प्रेम करते और उनकी प्रशंसा करते हैं, बंधे रहते हैं; परन्तु उनके विरुद्ध उग्र होते हैं जो उनका विरोध करते और उन्हें नापसन्द करते हैं। मत्ती 5:45, 46, “अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान बनो; क्योंकि वह भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है। क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हें क्या फल मिलेगा? क्या चुंगी लेनेवाले भी ऐसा ही नहीं करते?” कुछ लोग अपने पड़ोसियों के प्रति बड़ा प्रेम दिखाते हैं, और बाहर परमेश्वर की सन्तान की संगति से मुग्ध होने का दिखावा करते हैं; और उसी समय घर पर अपनी पत्नियों और अन्य निकट सम्बन्धियों के प्रति असहज और रूखे होते हैं, और सम्बन्धगत कर्तव्यों में बहुत लापरवाह होते हैं। और पापियों तथा धर्म के विरोधियों के प्रति उस बड़े प्रेम के विषय में, और उनके प्राणों की उस बड़ी चिन्ता के विषय में, जिसका आभास कुछ लोगों में, वरन अत्यधिक व्याकुलता और वेदना तक, पाया जाता है, जिसमें भीड़ में से किसी विशेष व्यक्ति को अपना लक्ष्य बनाया जाता है, जबकि उसी समय समान रूप से दुर्दशाग्रस्त अन्य पापियों के प्रति कोई सामान्य करुणा नहीं होती, वरन जो कुछ है वह भयंकर असन्तुलन में है; यह अनुग्रहमय मनोभाव की प्रकृति का प्रतीत नहीं होता। यह नहीं कि मैं इसे कुछ भी विचित्र मानता हूं, कि नष्ट होते पापियों के प्राणों के प्रति दया वेदना की सीमा तक पहुंचे; यदि अन्य बातें उसके अनुरूप हों: अथवा यह कि प्राणों के प्रति सच्चा अनुग्रहमय करुणाभाव समान रूप से दुर्दशाग्रस्त दूसरों की अपेक्षा कुछ व्यक्तियों के प्रति कहीं अधिक प्रयोग किया जाए, विशेष रूप से कुछ विशेष अवसरों पर: ऐसे समय में किसी विशेष व्यक्ति के सम्बन्ध में मन को स्थिर करने और हृदय को प्रभावित करने के लिये अनेक बातें घटित हो सकती हैं; और निःसन्देह कुछ सन्त किसी विशेष व्यक्ति के प्राण के लिये इतनी बड़ी व्याकुलता में रहे हैं कि मानो वे उसके लिये प्रसव-पीड़ा में हों; परन्तु जब कुछ लोग विशेष समयों में किसी एक व्यक्ति के प्राण के लिये ऐसी असह्य वेदना में दिखाई देते हैं, जो प्रतिष्ठित सन्तों में प्रायः सुनी या पढ़ी गई बातों से कहीं अधिक हो, परन्तु स्वयं ऐसे व्यक्ति प्रतीत होते हैं जिनमें सामान्यतः मनुष्यजाति के प्रति नम्र और उत्कट प्रेम, दान और करुणा की आत्मा उनसे कहीं कम मात्रा में है: तो मैं कहता हूं, ऐसी वेदनाओं पर पहले दिए गए कारणों से बड़ा सन्देह किया जाना चाहिए; अर्थात् यह कि परमेश्वर का आत्मा अनुग्रहों और अनुग्रहमय मनोभावों को सुंदर सन्तुलन और अनुपात में देने का स्वभाव रखता है।
और जैसे कुछ लोगों के प्रेम में, विभिन्न व्यक्तियों के प्रति उसके प्रयोग में, भयंकर असन्तुलन पाया जाता है, वैसे ही उन्हीं व्यक्तियों के प्रति उनके प्रेम के प्रतीत होनेवाले प्रयोगों में भी पाया जाता है।—कुछ मनुष्य दूसरों के प्रति उनके बाहरी मनुष्यत्व के सम्बन्ध में प्रेम दिखाते हैं, वे अपने सांसारिक धन के विषय उदार होते हैं, और प्रायः दरिद्रों को देते हैं; परन्तु उनमें मनुष्यों के प्राणों के प्रति न कोई प्रेम है, न कोई चिन्ता। अन्य लोग मनुष्यों के प्राणों के प्रति बड़े प्रेम का दावा करते हैं, जो उनकी देहों के प्रति करुणामय और उदार नहीं होते। प्राणों के लिये प्रेम, दया और व्याकुलता का बड़ा दिखावा करना उन्हें कुछ भी नहीं पड़ता; परन्तु मनुष्यों की देहों पर दया दिखाने के लिये उन्हें अपनी जेब से धन देना पड़ता है। परन्तु हमारे भाइयों के प्रति सच्चा मसीही प्रेम प्राणों और देहों, दोनों तक फैलता है; और इसमें वह यीशु मसीह के प्रेम और करुणा के समान है। उसने X. एक और बात, जिसमें सच्चे अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव… मनुष्यों के प्राणों पर दया दिखाई, उनके लिये परिश्रम करके, उन्हें सुसमाचार सुनाकर; और उनकी देहों पर दया दिखाई, भलाई करते हुए घूम-घूमकर, और लोगों में हर प्रकार की बीमारी और रोगों को चंगा करके। हमारे पास मरकुस 6:34, आदि में मसीह के प्राणों और देहों दोनों पर एक साथ करुणा करने, और दोनों को भोजन देकर करुणा दिखाने का एक उल्लेखनीय उदाहरण है: “और यीशु ने बाहर निकलकर बड़ी भीड़ देखी, और उन पर तरस खाया, क्योंकि वे उन भेड़ों के समान थे जिनका कोई चरवाहा न हो; और वह उन्हें बहुत सी बातें सिखाने लगा।”
यहां उसकी प्राणों के प्रति करुणा प्रकट होती है। और आगे हमें उसकी उनकी देहों के प्रति करुणा का विवरण मिलता है, क्योंकि वे बहुत देर से कुछ खाए बिना थे; उसने पांच हज़ार लोगों को पांच रोटियों और दो मछलियों से खिलाया। और यदि मसीही होने का अंगीकार करनेवालों की करुणा
दूसरों के प्रति उन्हीं रीतियों में काम नहीं करती, तो यह इस बात का चिन्ह है कि यह सच्ची मसीही करुणा नहीं है।
और इसके अतिरिक्त, यह इस बात का चिन्ह है कि मनोभाव उचित प्रकार के नहीं हैं, यदि लोग अपने संगी मसीहियों की बुरी विशेषताओं से, जैसे अन्य सन्तों की उदासीनता और निर्जीवता से, बहुत अधिक प्रभावित होते प्रतीत होते हैं, परन्तु अपनी ही त्रुटियों और भ्रष्टताओं से उस अनुपात में तनिक भी प्रभावित नहीं होते।
सच्चा मसीही अन्य सन्तों की उदासीनता और नीरसता से प्रभावित हो सकता है, और उस पर बहुत विलाप कर सकता है: परन्तु उसी समय, वह अपने ही हृदय की बुराई से जितना प्रभावित होने योग्य होता है, उतना किसी और के हृदय की बुराई से नहीं होता; यही उसकी सबसे अधिक दृष्टि में रहती है; इसी को वह सबसे तीव्र दृष्टि से पहचानता है; इसी की सबसे अधिक गम्भीरताओं को वह देखता है, और इसी पर सबसे अधिक विलाप करने को तैयार रहता है। और उसे अपने ऊपर दया करने, और अपनी ही विपत्तियों की चिन्ता करने के लिये, दूसरों की विपत्तियों से सही रीति से प्रभावित होने की अपेक्षा, कम मात्रा में सद्गुण की आवश्यकता होती है। और यदि मनुष्यों ने छोटी बात को प्राप्त नहीं किया है, तो हम निश्चय कर सकते हैं कि उन्होंने बड़ी बात को कभी प्राप्त नहीं किया।
और यहां प्रसंगवश, मैं यह टिप्पणी करना चाहूंगा, कि इसे एक सामान्य नियम के रूप में रखा जा सकता है, कि यदि लोग धर्म में बड़ी उपलब्धियों तक पहुंचने का दावा करते हैं, परन्तु अभी तक छोटी उपलब्धियों तक भी नहीं पहुंचे हैं, तो यह एक व्यर्थ दावे का चिन्ह है। जैसे यदि लोग यह दावा करें कि वे मात्र नैतिकता से आगे बढ़कर एक आत्मिक और ईश्वरीय जीवन जीने लगे हैं; परन्तु वास्तव में इतने भी नैतिक व्यक्ति नहीं बन पाए हैं: अथवा यह दावा करें कि वे अपने हृदयों की दुष्टता से बहुत प्रभावित होते हैं, परन्तु अपने आचरण में परमेश्वर की आज्ञाओं के स्पष्ट उल्लंघनों से प्रभावित नहीं होते, जो कि इससे छोटी उपलब्धि है: अथवा यदि वे यह दावा करें कि वे परमेश्वर की महिमा के लिये दण्डित होने को भी तैयार हो गए हैं, परन्तु अपने कर्तव्य के लिये अपनी सम्पत्ति, अपने नाम और सांसारिक सुविधा में थोड़ा भी दुःख सहने की तत्परता नहीं रखते: अथवा यह दावा करें कि वे अपने प्राणों को मसीह पर दांव लगाने से, और अपना सब कुछ परमेश्वर को सौंपकर, अपने अनन्त कल्याण के लिये उसके निरे वचन और उसकी प्रतिज्ञाओं की विश्वासयोग्यता पर भरोसा रखने से नहीं डरते; परन्तु उसी समय, परमेश्वर पर इतना भरोसा नहीं रखते कि अपनी सम्पत्ति का थोड़ा सा भी भाग, भक्ति और दान के कार्यों में देने के लिये, उस पर भरोसा करने का साहस करें; मैं कहता हूं, जब लोगों की स्थिति ऐसी होती है, तो उनके दावे स्पष्ट रूप से व्यर्थ हैं।
जो यात्रा पर है, और यह कल्पना करता है कि वह अपने मार्ग में किसी स्थान से बहुत आगे निकल गया है, जबकि वह वहां तक कभी पहुंचा ही नहीं, वह अवश्य ही भ्रम में है; और जो अभी आधे मार्ग तक भी नहीं पहुंचा, वह पहाड़ी की चोटी तक कभी नहीं पहुंचा। परन्तु यह तो प्रसंगवश की बात है।
X. एक और बात, जिसमें सच्चे अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव… जो कुछ प्रेम के मनोभाव के विषय में देखा गया है, वही अन्य धार्मिक मनोभावों के विषय में भी देखा जाना चाहिए। जो सच्चे होते हैं, वे उन विभिन्न वस्तुओं तक, जो उनके उचित और वास्तविक विषय हैं, कुछ अनुपात में फैलते हैं; परन्तु जब वे झूठे होते हैं, तो सामान्यतः विचित्र रूप से असन्तुलित होते हैं। यही बात धार्मिक अभिलाषाओं और लालसाओं के विषय में भी है: सन्तों में ये उन वस्तुओं के प्रति होती हैं जो सामान्यतः आत्मिक और उत्कृष्ट हैं, और वह भी उनकी उत्कृष्टता, महत्त्व या आवश्यकता, अथवा उनसे निकट सम्बन्ध के कुछ अनुपात में; परन्तु झूठी लालसा में प्रायः इसके सर्वथा विपरीत होता है। वे विचित्र रीति से, अधीर उत्कटता के साथ, किसी कम महत्त्वपूर्ण वस्तु के पीछे दौड़ते हैं, जबकि अधिक महत्त्वपूर्ण अन्य वस्तुओं की उपेक्षा की जाती है।—इस प्रकार उदाहरण के लिये, कुछ लोगों में समय-समय पर दूसरों को अपने अनुभव बताने, और दूसरों को उपदेश देने की एक उत्कट प्रवृत्ति और अकथनीय प्रबल दबाव पाया जाता है; जबकि उसी समय, अन्य बातों के प्रति, जिनकी ओर सच्चा मसीही धर्म उतनी ही, वरन उससे भी अधिक प्रवृत्ति रखता है—जैसे एकान्त में परमेश्वर के सम्मुख अपना प्राण उंडेलकर सच्ची प्रार्थना और स्तुति करना, उसके अनुरूप अधिक होना, और उसकी महिमा के लिये अधिक जीना, आदि—उसके तुल्य किसी भी मात्रा में कोई प्रवृत्ति नहीं होती। हम पवित्रशास्त्र में “ऐसी कराहों की, जो कही नहीं जा सकतीं, और लालसा के कारण प्राण के टूटने की, और लालसाओं, प्यासों और हांफने” की चर्चा इन बाद की बातों के लिये कहीं अधिक बार पढ़ते हैं, बजाय पहली बातों के।
और वैसे ही बैर और उत्साह के विषय में भी; जब ये सही सिद्धान्तों से उत्पन्न होते हैं, तो सामान्यतः पाप के विरुद्ध होते हैं, उसकी पापपूर्णता की मात्रा के कुछ अनुपात में: भजन संहिता 119:104, “इसलिये मैं हर एक अनुचित मार्ग से बैर रखता हूं।” वैसे ही पद 128 में भी। परन्तु पाप के विरुद्ध झूठा बैर और उत्साह केवल किसी विशेष पाप के विरुद्ध ही होता है।
इस प्रकार कुछ लोग अभक्ति और वस्त्रों में अभिमान के विरुद्ध बड़े उत्साही प्रतीत होते हैं, जो स्वयं लोभ, कंजूसी, और सम्भवतः पीठ पीछे बुराई करने, बड़ों के प्रति ईर्ष्या, शासकों के प्रति उग्र आत्मा, और जिन्होंने उन्हें हानि पहुंचाई है उनके प्रति जड़ जमाए हुए द्वेष के लिये कुख्यात होते हैं। झूठा उत्साह दूसरों के पापों के विरुद्ध होता है, जबकि मनुष्यों में अपने ही पापों के विरुद्ध कोई उत्साह नहीं होता। परन्तु जिसमें सच्चा उत्साह होता है, वह इसे मुख्य रूप से अपने ही पापों के विरुद्ध प्रयोग करता है; यद्यपि वह दूसरों में प्रबल और घातक अधर्म के विरुद्ध भी उचित उत्साह दिखाता है। और कुछ लोग अपने हृदय के पापों से बड़ी घृणा रखने का दावा करते हैं, और अपनी आन्तरिक भ्रष्टता की बड़ी दुहाई देते हैं; तथापि व्यवहार में पापों को हल्के में लेते हैं, और उन्हें बिना अधिक रोक-टोक या पछतावे के करते प्रतीत होते हैं; यद्यपि इनमें हृदय और जीवन, दोनों में पाप निहित है।
जैसे विभिन्न विषयों के सम्बन्ध में झूठे मनोभावों के प्रयोग में सच्चों की अपेक्षा कहीं अधिक असन्तुलन होता है, वैसे ही विभिन्न समयों के सम्बन्ध में भी होता है। क्योंकि यद्यपि सच्चे मसीही सदैव एक समान नहीं होते; वरन विभिन्न समयों में उनमें बहुत बड़ा अन्तर होता है, और सबसे उत्तम मसीहियों के पास भी अपनी अस्थिरता पर बहुत लज्जित होने का कारण होता है; तथापि उन सच्ची कुंवारियों के हृदयों में, “जो मेम्ने के पीछे जहां कहीं वह जाए चलती हैं,” वह अस्थिरता और चंचलता कदापि नहीं होती, जो झूठे हृदयवाले अंगीकार करनेवालों में होती है। धर्मी मनुष्य को सचमुच वह कहा गया है जिसका हृदय स्थिर है, और जो परमेश्वर पर भरोसा रखता है, भजन संहिता 112:7, और जिसका हृदय अनुग्रह से स्थिर किया गया है, इब्रानियों 13:9, और जो अपने मार्ग पर बना रहता है, अय्यूब 17:9: “धर्मी अपना मार्ग पकड़े रहेगा, और शुद्ध हाथवाला अधिक बलवन्त होता जाएगा।” यहूदी कलीसिया के कपट के एक चिन्ह के रूप में यह कहा गया है, कि वे एक वेगवान ऊंटनी के समान थीं, जो अपने मार्गों में इधर-उधर भटकती फिरती थी।
X. एक और बात, जिसमें सच्चे अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव… इसलिये यदि लोग केवल दौरों और झोंकों में धार्मिक होते हैं; यदि वे कभी-कभी अपने मनोभावों में मानो बादलों तक उठाए हुए प्रतीत होते हैं, और फिर अचानक गिर पड़ते हैं, सब कुछ खो देते हैं, और बिल्कुल लापरवाह और शारीरिक बन जाते हैं, और धर्म का पालन करने की उनकी यही रीति है; यदि वे केवल असाधारण अवसरों में, अर्थात् आत्मा के किसी उल्लेखनीय उंडेले जाने के समय, अथवा विधान की किसी असाधारण व्यवस्था के समय, अथवा किसी बड़ी दया के वास्तविक या कल्पित प्राप्त होने पर, अर्थात् जब उन्हें कोई असाधारण सांसारिक दया प्राप्त हुई हो, या वे यह मानते हों कि वे नये-नये मन फिराए हैं, अथवा हाल ही में उनका तथाकथित कोई बड़ा प्रकाशन हुआ हो—तभी बड़े प्रभावित और धर्म में प्रबल रूप से संलग्न प्रतीत होते हैं; परन्तु शीघ्र ही ऐसी दशा में लौट आते हैं, कि उनके हृदय मुख्यतः अन्य वस्तुओं पर लगे रहते हैं, और उनके हृदयों की प्रबल प्रवृत्ति और उनके मनोभावों की धारा सामान्यतः इस संसार की वस्तुओं की ओर होती है; तब वे जंगल में इस्राएल की सन्तान के समान होते हैं, जिनके मनोभाव लाल समुद्र पर परमेश्वर के किए हुए कामों को देखकर बहुत ऊंचे उठ गए थे, और उन्होंने उसकी स्तुति गाई, परन्तु शीघ्र ही मिस्र की मांस की हांडियों के लिये लालसा करने लगे; परन्तु फिर, जब वे सीनै पर्वत पर आए, और वहां परमेश्वर के अपने आपको प्रकट करने के महान कार्यों को देखा, तो फिर से बहुत संलग्न प्रतीत हुए, और परमेश्वर के साथ वाचा में बंधने के लिये बड़े उत्सुक होकर कहने लगे, “जो कुछ यहोवा ने कहा है वही हम करेंगे, और आज्ञाकारी रहेंगे,” परन्तु फिर शीघ्र ही उन्होंने अपने लिये एक सोने का बछड़ा बना लिया; मैं कहता हूं, जब लोगों की दशा ऐसी होती है, तो यह उनके मनोभावों की खोखलेपन का चिन्ह है।70 वे उस जल के समान हैं जो वर्षा की झड़ी के समय, झड़ी के दौरान और उसके थोड़ी देर बाद तक, नाले के समान बहता और भरपूर बहाव में रहता है; परन्तु शीघ्र ही बिल्कुल सूख जाता है; और जब दूसरी झड़ी आती है, तब फिर से बहने लगता है। जबकि सच्चा सन्त एक जीवित सोते से निकली धारा के समान है; जो वर्षा की झड़ी से बहुत बढ़ सकती है, और सूखे के समय घट सकती है, तथापि निरन्तर बहती रहती है: यूहन्ना 4:14, “जो जल मैं उसे दूंगा, वह उस में एक सोता बन जाएगा, जो उमड़ता रहेगा,” आदि; अथवा उस वृक्ष के समान जो ऐसी धारा के किनारे लगाया गया हो, जिसकी जड़ को निरन्तर जल मिलता रहे, और जो बड़े से बड़े सूखे के समय भी सदा हरा-भरा रहे: यिर्मयाह 17:7, 8, “धन्य है वह पुरूष जो यहोवा पर भरोसा रखता है, और जिसका आसरा यहोवा ही है। क्योंकि वह उस वृक्ष के समान होगा जो जल के पास लगाया गया हो, और अपनी जड़ें नदी की ओर फैलाए हो, और जब घाम पड़े तब भी न डरे, वरन उसकी पत्तियां
70 डॉ. ओवेन (आत्मा पर, पुस्तक 3, अध्याय 2, अनुभाग 18) आत्मा के एक सामान्य कार्य की चर्चा करते हुए कहते हैं, “यह कार्य मनोभावों पर बड़ी शक्ति से काम करता है: हमने भय, शोक, आनन्द और आत्मिक बातों के विषय हर्ष के उदाहरण दिए हैं, जो इसके द्वारा उभारे और क्रियान्वित होते हैं: परन्तु तथापि यह मनोभावों पर एक सम्पूर्ण कार्य होने में दो बातों में कम पड़ जाता है। क्योंकि पहले, यह उन्हें स्थिर नहीं करता। और दूसरे, यह उन्हें भरता नहीं है।” “वहां है (जैसा कि कहते हैं
डॉ. प्रेस्टन) एक ऐसा प्रेम, जो झोंकों में होता है, जिसे परमेश्वर स्वीकार नहीं करता: जब मनुष्य आकर परमेश्वर को समुद्र की लहरों के समान, पहाड़ों जितनी बड़ी, महान प्रतिज्ञाएं देते हैं: आह, वे सोचते हैं कि वे परमेश्वर के लिये बहुत कुछ करेंगे! परन्तु उनके मन बदल जाते हैं; और वे उन ऊंची लहरों के समान बन जाते हैं, जो अन्ततः अन्य जल के समतल हो जाती हैं।” श्री फ्लेवल इन परिवर्तनशील अंगीकार करनेवालों की चर्चा करते हुए कहते हैं, “इन अंगीकार करनेवालों में सूर्य से अधिक चन्द्रमा का अंश है: थोड़ा प्रकाश, कम ऊष्मा, और अनेक परिवर्तन। वे अनेकों को धोखा देते हैं, वरन अपने आप को भी धोखा देते हैं, परन्तु परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकते। उनमें वह बोझ और स्थिरता नहीं है, जो उन्हें कसा हुआ और दृढ़ बनाए रखती।” टचस्टोन ऑफ सिन्सैरिटी,
X. एक और बात, जिसमें सच्चे अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव… हरी ही रहेंगी, और सूखे वर्ष में भी वह चिन्तित न होगा, और न फल देना उससे कभी बन्द होगा।” अनेक कपटी उन धूमकेतुओं के समान होते हैं जो कुछ समय के लिये बड़ी चमक के साथ दिखाई देते हैं; परन्तु अपनी गति में अत्यन्त अस्थिर और अनियमित होते हैं (और इसीलिये उन्हें भटकते हुए तारे कहा गया है, यहूदा
13), और उनकी चमक शीघ्र ही लुप्त हो जाती है, और वे बहुत लम्बे अन्तराल के बाद ही एक बार दिखाई देते हैं। परन्तु सच्चे सन्त उन स्थिर तारों के समान हैं, जो चाहे उदय और अस्त होते हों, और प्रायः बादलों से ढके रहते हों, तथापि अपनी कक्षा में दृढ़ रहते हैं, और सचमुच यह कहा जा सकता है कि वे निरन्तर प्रकाश से चमकते हैं। कपटपूर्ण मनोभाव एक उग्र गति के समान होते हैं; जैसे वायु की गति जो आंधियों से उत्पन्न होती है (यहूदा 12), परन्तु अनुग्रहमय मनोभाव अधिक स्वाभाविक गति के होते हैं; जैसे किसी नदी की धारा, जो चाहे इधर-उधर बहुत मोड़ लेती हो, और बाधाओं से टकराती हो, और कहीं अधिक स्वतन्त्रता व तेज़ी से बहती हो और कहीं धीरे, तथापि सामान्यतः एक स्थिर और निरन्तर प्रवाह के साथ, समुद्र तक पहुंचने तक, उसी दिशा में बढ़ती रहती है।
और जैसे झूठे मनोभावों में विभिन्न समयों पर विचित्र असमानता और असन्तुलन पाया जाता है, वैसे ही प्रायः विभिन्न स्थानों में भी पाया जाता है। कुछ लोग समय-समय पर संगति में रहते हुए बहुत प्रभावित होते हैं; परन्तु एकान्त में, गहन मनन, गुप्त प्रार्थना, और सर्वसंसार से अलग होकर अकेले परमेश्वर से बातचीत करने में, उसके किसी भी अनुपात के तुल्य कुछ भी नहीं होता।71 सच्चा मसीही निःसन्देह धार्मिक संगति और मसीही वार्तालाप में आनन्द लेता है, और उसमें अपने हृदय को प्रभावित करनेवाली बहुत सी बातें पाता है; परन्तु वह कभी-कभी सारी मनुष्यजाति से हटकर एकान्त स्थानों में परमेश्वर से बातचीत करने में भी आनन्द लेता है। और इसमें भी उसके हृदय को स्थिर करने और उसके मनोभावों को संलग्न करने के विशेष लाभ हैं। सच्चा धर्म मनुष्यों को पवित्र मनन और प्रार्थना के लिये एकान्त स्थानों में बहुत समय बिताने की प्रवृत्ति देता है। इसहाक में भी ऐसा ही हुआ, उत्पत्ति 24:63।
और, जो कहीं बढ़कर है, यीशु मसीह में भी ऐसा ही हुआ। हम कितनी ही बार पढ़ते हैं कि वह अपने पिता से पवित्र वार्तालाप के लिये पहाड़ों और एकान्त स्थानों में चला जाता था! बड़े मनोभावों को छिपाना कठिन होता है, तथापि अनुग्रहमय मनोभाव नकली मनोभावों की अपेक्षा कहीं अधिक मौन और गुप्त प्रकृति के होते हैं। सन्तों के अनुग्रहमय शोक के साथ भी ऐसा ही है। उनके अपने पापों के शोक के साथ भी ऐसा ही है। इस प्रकार सच्चे पश्चातापियों का भावी अनुग्रहमय विलाप, अन्तिम दिनों की महिमा के आरम्भ में, इतना गुप्त बताया गया है, कि वह उनके अपने ही घनिष्ठ साथियों से भी छिपा रहेगा, जकर्याह 12:12, 13, 14: “और वह देश विलाप करेगा, एक एक कुल अलग-अलग होकर,”
71 प्रभु को गुप्त में उपेक्षित किया जाता है, तथापि खुलेआम आदर दिया जाता है; क्योंकि उनके कक्षों में उनकी पालों को फुलाने के लिये कोई हवा नहीं है, और इसलिये वहां वे स्थिर खड़े रह जाते हैं। इसीलिये अनेक मनुष्य अपना अंगीकार बनाए रखते हैं, जब वे अपना मनोभाव खो चुके होते हैं। उन्हें इस अंगीकार के द्वारा जीवित होने का नाम मिल जाता है (और यही उनके लिये पर्याप्त है) यद्यपि उनके हृदय मृत हों। और इसीलिये जब तक तुम उनसे प्रेम करते और उनकी प्रशंसा करते हो, तब तक वे तुमसे प्रेम करते हैं; परन्तु यदि नहीं, तो वे तुम्हें त्याग देंगे। वे केवल दूसरे की आग से गरम हुए थे, और इसीलिये, अपने भीतर जीवन का कोई तत्त्व न होने के कारण, शीघ्र ही मृत हो जाते हैं। यही वह जल है जो किसी फरीसी की चक्की को चलाता है।” शेपर्ड का पैरेबल, भाग 1, पृ. 180। “कपटी (जैसा श्री फ्लेवल कहते हैं) एकान्त कक्ष के लिये नहीं, वरन आराधनालय के लिये होता है, मत्ती 6:5, 6। संसार के कोलाहल से हटकर गुप्त में परमेश्वर का आनन्द लेना उसका भोजन और जल नहीं है।” टचस्टोन ऑफ सिन्सैरिटी, अध्याय 7, अनुभाग 2। डॉ. एम्स अपने कैसेज़ ऑफ कॉन्शंस, पुस्तक 3, अध्याय 5 में, इसे उस बात के रूप में बताते हैं जिससे सच्चाई पहचानी जा सकती है, “कि लोग देखनेवालों की अनुपस्थिति में भी उतने ही आज्ञाकारी हों जितने उनकी उपस्थिति में; गुप्त में भी उतना ही, वरन सार्वजनिक की अपेक्षा और भी अधिक:” और इसके लिये फिलिप्पियों 2:12 और मत्ती 6:6 का हवाला देते हैं।
10. एक और बात जिसमें सचमुच अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव… दाऊद के घराने का कुल अलग, और उनकी स्त्रियाँ अलग; नातान के घराने का कुल अलग, और उनकी स्त्रियाँ अलग; लेवी के घराने का कुल अलग, और उनकी स्त्रियाँ अलग; शिमी के घराने का कुल अलग, और उनकी स्त्रियाँ अलग; और जितने कुल बचे हैं, एक-एक कुल अलग, और उनकी स्त्रियाँ अलग।” दूसरों के पापों के लिये उनके शोक का भी यही हाल है। पापियों के प्राणों के लिये संतों की पीड़ा और प्रसव-वेदना मुख्यतः गुप्त स्थानों में होती है: यिर्मयाह 13:17, “यदि तुम यह न सुनोगे, तो तुम्हारे घमण्ड के कारण मेरा प्राण गुप्त स्थानों में रोएगा, और मेरी आँख फूट-फूटकर आँसू बहाएगी, क्योंकि यहोवा की भेड़-बकरियाँ बंधुआई में की गई हैं।” अनुग्रहमय आनन्द के साथ भी यही बात है: इस दृष्टि से भी, औरों की भाँति, वे छिपा हुआ मन्ना हैं, प्रकाशितवाक्य 2:17।
भजनकार अपने सबसे मीठे शांतिदायक अनुभवों के विषय में मानो यह कहता प्रतीत होता है कि वे गुप्त स्थान में ही प्राप्त होते थे: भजन संहिता 63:5, 6, “मेरा प्राण मानो चर्बी और चिकनाई से तृप्त होगा, और मेरा मुख आनन्द भरे होंठों से तेरी स्तुति करेगा; जब मैं बिछौने पर तुझे स्मरण करूं, और रात के पहरों में तेरा ध्यान करूं।” मसीह अपनी दुल्हन को संसार से दूर, एकांत स्थानों में बुलाता है, ताकि वह उसे अपना सबसे मीठा प्रेम दे सके: श्रेष्ठगीत 7:11, 12, “हे मेरे प्रिय, आ, हम मैदान में निकल चलें; हम गाँवों में टिकें: वहाँ मैं तुझे अपना प्रेम दूंगा।” पवित्रशास्त्र में हम जिन परमेश्वर की सबसे उत्तम कृपाओं के विषय में पढ़ते हैं, जो संतों को प्राप्त हुईं, वे उनके एकांतवास में ही मिलीं।
अब्राहम पर परमेश्वर ने अपने आप को और अपनी वाचा की दया को जो प्रमुख रूप से प्रगट किया, वह तब हुआ जब वह अकेला था, अपने बड़े परिवार से अलग; जो भी उसका इतिहास ध्यान से पढ़ेगा, वह इस बात को समझ जाएगा। इसहाक को परमेश्वर की ओर से वह विशेष वरदान, अर्थात् रिबका, जो उसके लिये इतनी बड़ी शान्ति थी, और जिसके द्वारा उसे प्रतिज्ञा किया हुआ वंश मिला, तब प्राप्त हुआ जब वह मैदान में अकेला ध्यान करता हुआ फिर रहा था। याकूब गुप्त प्रार्थना के लिये एकांत में गया हुआ था, जब मसीह उसके पास आया, और वह उससे मल्लयुद्ध करके आशीष पा गया। परमेश्वर ने मूसा को झाड़ी में तब अपने आप को प्रगट किया, जब वह जंगल के एक एकांत स्थान में, होरेब पर्वत पर था, निर्गमन 3 के आरम्भ में। और बाद में, जब परमेश्वर ने उसे अपनी महिमा दिखाई, और वह परमेश्वर के साथ उस उच्चतम संगति में सम्मिलित हुआ जो उसे कभी प्राप्त हुई; तब भी वह उसी पर्वत पर अकेला था, और वहाँ चालीस दिन और चालीस रात रहा, और तब अपने चमकते हुए मुख के साथ नीचे उतरा। परमेश्वर उन महान भविष्यद्वक्ताओं, एलिय्याह और एलीशा, के पास आया, और उनसे स्वतंत्रतापूर्वक बातचीत की, मुख्यतः उनके एकांतवास में। एलिय्याह ने सीनै पर्वत पर परमेश्वर से अकेले बातचीत की, जैसे मूसा ने की थी। और जब
यीशु मसीह को अपनी भावी महिमा का सबसे बड़ा पूर्वास्वाद तब मिला, जब वह रूपान्तरित हुआ; यह तब नहीं हुआ जब वह भीड़ के साथ था, या बारहों चेलों के साथ था, बल्कि तब हुआ जब वह केवल तीन चुने हुए चेलों के साथ एक पहाड़ पर एकांत स्थान में गया, और उन्हें आज्ञा दी कि जब तक वह मरे हुओं में से जी न उठे, तब तक वे यह किसी को न बताएं। जब स्वर्गदूत गबरिएल धन्य कुँवारी के पास आया, और जब पवित्र आत्मा उस पर उतरा, और परम प्रधान की सामर्थ्य ने उस पर छाया की, तब ऐसा जान पड़ता है कि वह अकेली थी, और इस बात में संसार से छिपी हुई थी; उसका सबसे निकट और प्रिय सांसारिक मित्र यूसुफ, जिसने उससे मंगनी की थी (यद्यपि वह धर्मी पुरुष था), इस बात को कुछ नहीं जानता था। और वह स्त्री, जिसने मसीह के जी उठने के आनन्द में सबसे पहले भाग लिया, कब्र के पास मसीह के साथ अकेली थी, यूहन्ना 20। और जब उस प्रिय चेले को मसीह के और कलीसिया तथा संसार के प्रति उसकी भावी व्यवस्थाओं के उन अद्भुत दर्शनों का अनुग्रह मिला, तब वह पतमुस टापू में अकेला था। यह नहीं कि हमारे पास बड़े विशेषाधिकारों के दृष्टान्त नहीं हैं
10. एक और बात जिसमें सचमुच अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव… जो संतों को दूसरों के साथ रहते हुए प्राप्त हुए हैं; और न ही यह कि मसीही संगति, और सामाजिक तथा सार्वजनिक आराधना में संतों के हृदयों को बहुत ताज़ा और आनन्दित करने की क्षमता नहीं है। परन्तु इतना कहने से मेरा उद्देश्य केवल यह दिखाना है कि सच्चे अनुग्रह का यह स्वभाव है कि यद्यपि वह अपने स्थान पर मसीही संगति से प्रेम करता है, तथापि वह विशेष रूप से एकांतवास और परमेश्वर के साथ गुप्त वार्तालाप में आनन्दित होता है। इसलिये यदि लोग सामाजिक धर्म में बहुत लगे हुए दिखते हों, परन्तु एकांत कक्ष के धर्म में बहुत कम, और जब दूसरों के साथ हों तो प्रायः बहुत भावुक होते हों, परन्तु जब उनके पास बात करने के लिये केवल परमेश्वर और मसीह ही हों तब बहुत कम प्रभावित होते हों, तो यह उनके धर्म पर बहुत अंधकारमय छाया डालता है।
11. अनुग्रहमय मनोभावों और अन्य मनोभावों के बीच एक और बड़ा और बहुत विशिष्ट अन्तर… 11. अनुग्रहमय मनोभावों और अन्य मनोभावों के बीच एक और बड़ा और बहुत विशिष्ट अन्तर यह है, कि अनुग्रहमय मनोभाव जितने ऊँचे उठते हैं, उतनी ही अधिक आत्मिक उपलब्धियों के लिये आत्मा की आत्मिक भूख और लालसा बढ़ती जाती है। इसके विपरीत, झूठे मनोभाव अपने आप में ही सन्तुष्ट हो जाते हैं।72
सच्चा संत परमेश्वर से जितना अधिक अनुग्रहमय प्रेम रखता है, उतना ही अधिक वह उससे प्रेम करने की लालसा रखता है, और उससे अपने प्रेम की कमी पर उतना ही अधिक बेचैन रहता है; वह पाप से जितना अधिक घृणा करता है, उतना ही अधिक उससे घृणा करने की लालसा रखता है, और विलाप करता है कि उसमें पाप के प्रति अब भी इतना प्रेम शेष है; वह पाप के लिये जितना अधिक शोक करता है, उतना ही अधिक पाप के लिये शोक करने की लालसा रखता है; उसका हृदय जितना अधिक टूटता है, उतना ही अधिक वह चाहता है कि वह और टूटे; वह परमेश्वर और पवित्रता के लिये जितना अधिक प्यासा और लालायित रहता है, उतना ही अधिक वह लालायित होने की लालसा रखता है, और परमेश्वर के लिये लालसा में अपना प्राण ही उंडेल देना चाहता है: अनुग्रहमय मनोभावों का सुलगना और भड़कना आग सुलगाने के समान है; वह जितनी ऊँची उठती है, उतनी ही अधिक प्रचण्ड होती है; और वह जितना अधिक जलती है, उतनी ही अधिक उग्रता से जलने का यत्न करती है। इसलिये पवित्रता के लिये आत्मिक भूख, और पवित्र मनोभावों की वृद्धि, उन लोगों में जो पवित्रता में उत्कृष्ट हैं, दूसरों की अपेक्षा कहीं अधिक जीवन्त और तीव्र होती है, और जब अनुग्रह और पवित्र मनोभाव अपने सबसे जीवन्त अभ्यास में हों, तब अन्य समयों की अपेक्षा अधिक होती है। जितना यह नये जन्मे हुए बालक का स्वभाव है कि वह माता के स्तन के लिये प्यासा रहे, उतना ही यह आत्मिक रीति से नया जन्मे हुए व्यक्ति का स्वभाव है कि वह पवित्रता में बढ़ने के लिये प्यासा रहे; और जो सबसे अच्छे स्वास्थ्य में होता है, उसी की भूख सबसे तीव्र होती है। 1 पतरस
2:2, 3, “नये जन्मे हुए बालकों के समान वचन के निर्मल दूध की लालसा रखो, ताकि उसके द्वारा बढ़ो: यदि सचमुच तुमने चख लिया है कि प्रभु दयालु है।” इस जगत में संतों को अधिक से अधिक जो कुछ प्राप्त है, वह केवल उस भावी महिमा का एक स्वाद, एक पूर्वास्वाद है, जो उनकी वास्तविक परिपूर्णता है; वह केवल उनके हृदयों में उनकी भावी मीरास का बयाना है, 2 कुरिन्थियों 1:22, और 5:5, और इफिसियों 1:14। इस दशा में सबसे उत्कृष्ट संत भी अपने भविष्य की तुलना में, जो उनकी वास्तविक परिपक्वता और सिद्धता की दशा है, केवल बालक ही हैं; जैसा प्रेरित 1 कुरिन्थियों 13:10, 11 में देखता है। इस जगत में संत जिस सबसे बड़ी उत्कृष्टता तक पहुँचते हैं, उसमें तृप्ति की, या अधिक की लालसा को घटाने की कोई प्रवृत्ति नहीं होती; बल्कि इसके विपरीत, वह उन्हें आगे बढ़ने के लिये और अधिक उत्सुक बनाती है; जैसा प्रेरित के वचनों से स्पष्ट है, फिलिप्पियों 3:13, 14, 15: “जो बातें पीछे रह गई हैं, उन्हें भूलकर, और जो आगे हैं, उनकी ओर बढ़ते हुए, मैं निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं।—इसलिये हम में से जितने सिद्ध हैं, वे ऐसा ही मन रखें।”
इसका कारण यह है, कि लोगों में जितने अधिक पवित्र मनोभाव होते हैं, उतना ही अधिक उनमें वह आत्मिक स्वाद होता है, जिसकी चर्चा मैं अन्यत्र कर चुका हूं; जिसके द्वारा वे पवित्रता की उत्कृष्टता को पहचानते, और उसकी ईश्वरीय मधुरता का आस्वादन करते हैं। और वे जितना अधिक अनुग्रह रखते हैं, उतना ही, इस अपूर्ण दशा में रहते हुए, वे अपनी अपूर्णता और रिक्तता, और जो होना चाहिए उससे अपनी दूरी को देखते हैं: और इस प्रकार वे अनुग्रह की अपनी आवश्यकता को उतना ही अधिक देखते हैं; जैसा मैंने पहले सुसमाचार-सम्बन्धी दीनता के स्वभाव के विषय में बोलते हुए विस्तार से दिखाया है। और इसके अतिरिक्त, अनुग्रह, जब तक वह अपूर्ण है, बढ़ते जाने के स्वभाव का और बढ़ती हुई दशा में होता है। और हम देखते हैं कि सब जीवित
72 “सच तो यह है कि मसीह का कोई भी सच्चा काम ऐसा नहीं है (श्री शेपर्ड कहते हैं) जो आत्मा को उसकी और अधिक लालसा करने के लिये प्रेरित न करे।” दस कुंवारियों का दृष्टान्त, भाग 1, पृष्ठ 136।
11. अनुग्रहमय मनोभावों और अन्य मनोभावों के बीच एक और बड़ा और बहुत विशिष्ट अन्तर… वस्तुओं का यह स्वभाव है, कि जब तक वे अपूर्ण दशा में और बढ़ती हुई दशा में रहती हैं, उनका स्वभाव वृद्धि की खोज करता है; और वे जितनी अधिक स्वस्थ और समृद्ध होती हैं, उतना ही अधिक।
इसलिये हर सच्चे अनुग्रह की पुकार, सच्चे विश्वास की उस पुकार के समान है, मरकुस 9:24: “हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूं; मेरे अविश्वास का उपाय कर।” और सच्चे मसीही को जितने अधिक आत्मिक प्रकाशन और मनोभाव प्राप्त होते हैं, उतना ही अधिक वह अनुग्रह और आत्मिक भोजन के लिये, कि वह बढ़ सके, एक आतुर भिखारी बन जाता है; और उतनी ही अधिक सरगर्मी से वह उपयुक्त साधनों और प्रयत्नों के उपयोग में उसका पीछा करता है; क्योंकि पवित्रता के लिये सच्ची और अनुग्रहमय लालसाएं कोई निठल्ली, निष्फल इच्छाएं नहीं हैं।
परन्तु यहां कोई आपत्ति करके कह सकता है, यह उस बात से कैसे मेल खाता है, जिसे सब स्वीकार करते हैं, कि आत्मिक भोग आत्मा को तृप्त करने वाले स्वभाव के होते हैं?
मैं उत्तर देता हूं, कि यदि इस बात पर विचार किया जाए कि आत्मिक भोगों को किस रीति से आत्मा को तृप्त करने वाले स्वभाव का कहा जाता है, तो यह बात ऊपर कही गई बातों से बिलकुल असंगत नहीं दिखेगी। निश्चय ही वे इस अर्थ में ऐसे नहीं हैं, कि वे इतने अघाने वाले स्वभाव के हों, कि जिसे उनका कुछ भी, चाहे बहुत ही अपूर्ण मात्रा में, प्राप्त हो जाए, वह और अधिक की लालसा न रखे। परन्तु आत्मिक भोग निम्नलिखित बातों में आत्मा को तृप्त करने वाले स्वभाव के हैं। 1. वे अपनी प्रकृति और स्वभाव में, मनुष्य की आत्मा के स्वभाव, सामर्थ्य और आवश्यकता के पूर्णतः अनुकूल हैं। इसलिये जिन्हें वे प्राप्त होते हैं, वे किसी और प्रकार के भोगों की लालसा नहीं रखते; वे उस प्रकार के सुख से, जो उन्हें प्राप्त है, पूरी तरह सन्तुष्ट होकर बैठ जाते हैं, न कोई परिवर्तन चाहते हैं, न इससे आगे कहीं और भटकने की ओर झुकते हैं, यह कहते हुए, “हमें कौन कुछ भलाई दिखाएगा?” आत्मा कभी अघाती नहीं, कभी थकती नहीं; बल्कि निरन्तर अपने आप को, अपनी सारी सामर्थ्यों सहित, इस सुख के लिये समर्पित करती जाती है। परन्तु ऐसा नहीं कि जिन्हें इस सुख का कुछ अंश प्राप्त है, वे उसी सुख की और अधिक लालसा न रखें। 2. वे इस बात में भी तृप्त करने वाले हैं, कि वे भूख की प्रत्याशा को पूरा करते हैं। जब किसी वस्तु के लिये भूख प्रबल होती है, तो उसके अनुसार प्रत्याशा भी प्रबल होती है। किसी विशेष वस्तु के लिये भूख, अपने स्वभाव में प्रत्याशा को शामिल किए रहती है। यह प्रत्याशा सांसारिक भोगों से पूरी नहीं होती; मनुष्य को सुख की बड़ी वृद्धि की आशा रहती है, परन्तु वह निराश हो जाता है। परन्तु आत्मिक भोगों के साथ ऐसा नहीं है; वे प्रत्याशा को पूर्णतः पूरा करते और तृप्त करते हैं। 3. आत्मिक भोगों का सन्तोष और आनन्द स्थायी है। सांसारिक भोगों के साथ ऐसा नहीं है। वे एक अर्थ में विशेष भूखों को तृप्त करते हैं: परन्तु वह भूख, तृप्त होते-होते, अघा जाती है, और तब आनन्द समाप्त हो जाता है: और ज्यों ही वह समाप्त होता है, सुख के लिये मानव स्वभाव की सामान्य भूख फिर लौट आती है; परन्तु वह खाली रहती है, और उसे तृप्त करने के लिये कुछ नहीं होता। इस प्रकार किसी विशेष भूख का अघाना, मानव स्वभाव की सामान्य प्यास को केवल घटाकर खाली छोड़ जाता है।
4. आत्मिक भलाई तृप्त करने वाली है, क्योंकि यदि बाधाएं दूर कर दी जाएं, और भोग करने वाली सामर्थ्य को उचित रीति से लगाया जाए, तो उसमें आत्मा को मात्रा के अनुसार तृप्त करने के लिये पर्याप्त है। यहां आत्मा के फैलने के लिये पर्याप्त स्थान है; यहां उसका अनन्त समुद्र है। यदि मनुष्य सुख की मात्रा में यहां तृप्त नहीं होते, तो इसका कारण वे स्वयं हैं; यह इसलिये है कि वे अपना मुंह पर्याप्त चौड़ा नहीं खोलते।
परन्तु इन बातों से यह सिद्ध नहीं होता कि जिस आत्मा ने थोड़ा चखा है, उसमें उसी वस्तु की और अधिक लालसा उत्पन्न नहीं होती; या कि वह जितना अधिक चखेगी, उसकी भूख उतनी ही नहीं बढ़ेगी, जब तक कि वह भोग की परिपूर्णता तक न पहुंच जाए: जैसे वे पिण्ड, जो पृथ्वी के गोले की ओर आकर्षित होते हैं, उसकी ओर उतने ही अधिक बल से बढ़ते हैं
11. अनुग्रहमय मनोभावों और अन्य मनोभावों के बीच एक और बड़ा और बहुत विशिष्ट अन्तर… जितने अधिक निकट वे उस आकर्षण करने वाले पिण्ड के आते जाते हैं, और केन्द्र से बाहर उन्हें कहीं विश्राम नहीं मिलता।
आत्मिक भलाई तृप्त करने वाले स्वभाव की है; और इसी कारण, जो आत्मा उसे चखती और उसके स्वभाव को जानती है, वह उसके लिये, और उसकी परिपूर्णता के लिये, ताकि वह तृप्त हो सके, प्यासी रहेगी। और वह जितना अधिक इस उत्कृष्ट, अनुपम, उत्तम और तृप्त करने वाली मधुरता का अनुभव करता, और उसे जानता है, उतनी ही अधिक सरगर्मी से वह और अधिक के लिये भूखा और प्यासा रहेगा, जब तक कि वह सिद्धता तक न पहुंच जाए।
और इसलिये आत्मिक मनोभावों का यह स्वभाव है, कि वे जितने बड़े होते हैं, अनुग्रह और पवित्रता के लिये भूख और लालसा भी उतनी ही बड़ी होती है।
परन्तु उन आनन्दों, और अन्य धार्मिक मनोभावों के साथ, जो झूठे और नकली हैं, बात इससे उलटी है। यदि पहले, अनुग्रह के लिये किसी प्रकार की बड़ी लालसा थी; तो जैसे-जैसे ये मनोभाव उठते हैं, वह लालसा समाप्त हो जाती है, या घट जाती है। हो सकता है कि पहले, जब मनुष्य व्यवस्था के भय में दोषी होने का बोध रखता था, और नरक से बहुत डरता था, तो वह उत्कट लालसा रखता था कि उसे अपनी समझ में आत्मिक ज्योति, और मसीह पर विश्वास, और परमेश्वर से प्रेम प्राप्त हो: परन्तु अब, जब ये झूठे मनोभाव उठ चुके हैं, जो उसे धोखा देते और उसे यह विश्वास दिलाते हैं कि वह मन फिराया हुआ है, और उसकी दशा अच्छी है, तो अब ज्योति और अनुग्रह के लिये कोई उत्कट लालसा शेष नहीं रहती; क्योंकि उसका उद्देश्य पूरा हो चुका है; उसे विश्वास है कि उसके पाप क्षमा कर दिए गए हैं, और वह स्वर्ग जाएगा; और इसलिये वह सन्तुष्ट है।
और विशेष रूप से जब झूठे मनोभाव बहुत ऊंचे उठाए जाते हैं, तो वे अनुग्रह और पवित्रता के लिये लालसाओं का अन्त कर देते हैं। अब वह मनुष्य अपने आप को एक दीन, रिक्त प्राणी के रूप में देखने से बहुत दूर है; इसके विपरीत, वह अपने आप को धनी, और सम्पत्ति में बढ़ा हुआ समझता है, और जो कुछ उसने पहले ही प्राप्त कर लिया है, उससे अधिक उत्कृष्ट किसी बात की वह मुश्किल से कल्पना कर पाता है।
इसलिये बहुत से लोगों की खोज में उत्कट सरगर्मी का अन्त उस समय हो जाता है, जब वे एक बार उसे प्राप्त कर लेते हैं, जिसे वे अपना मन फिराव कहते हैं; या कम से कम, जब उन्हें वे ऊंचे मनोभाव प्राप्त हो जाते हैं, जो उन्हें इस बारे में पूरा भरोसा दिला देते हैं। इससे पहले, जब वे अपने आप को स्वाभाविक मनुष्य की दशा में मानते थे, तो वे परमेश्वर और मसीह की खोज में लगे रहते, और अनुग्रह के लिये उत्कटता से पुकारते, और साधनों के उपयोग में प्रयत्न करते थे: परन्तु अब वे ऐसा व्यवहार करते हैं मानो उनका काम पूरा हो चुका हो; वे अपने आरम्भिक काम पर, या कुछ बीती हुई ऊंची अनुभूतियों पर जीवन बिताते हैं; और परमेश्वर तथा अनुग्रह के लिये उनकी पुकार और प्रयत्न का अन्त हो जाता है। जबकि वे पवित्र सिद्धान्त, जो एक सच्चे संत को प्रेरित करते हैं, उसे परमेश्वर और पवित्रता की खोज में उत्कटता के लिये उभारने में, दास-तुल्य भय की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिशाली प्रभाव रखते हैं। इसलिये परमेश्वर की खोज करना संतों के विशिष्ट लक्षणों में से एक कहा गया है, और परमेश्वर के खोजी होना पवित्रशास्त्र में भक्तों को दिए गए नामों में से एक है: भजन संहिता 24:6, “यह उन्हीं की पीढ़ी है जो उसको ढूंढ़ते हैं, जो हे याकूब, तेरे दर्शन का यत्न करते हैं!” भजन संहिता 69:6, “जो तुझे ढूंढ़ते हैं, वे मेरे कारण लज्जित न हों।” पद 32, “नम्र लोग यह देखकर आनन्दित होंगे: और तुम्हारा हृदय जीवित रहेगा, तुम जो ढूंढ़ते हो
परमेश्वर, को।” और 70:4, “जो तुझे ढूंढ़ते हैं, वे सब तुझ में मगन और आनन्दित हों: और जो तेरे उद्धार से प्रेम रखते हैं, वे निरन्तर कहते रहें, यहोवा की बड़ाई हो।” और पवित्रशास्त्र सब जगह मसीही की खोज, प्रयत्न और परिश्रम को उसके मन फिराव के बाद की मुख्य बात के रूप में, और उसके मन फिराव को उसके काम के केवल आरम्भ के रूप में प्रस्तुत करता है। और नये नियम में जो कुछ मनुष्यों के जागते रहने, अपने आप पर उत्कटता से ध्यान देने, अपने सामने रखी हुई दौड़ को दौड़ने, प्रयत्न और संघर्ष करने, मांस और लहू से नहीं परन्तु 11. अनुग्रहमय मनोभावों और अन्य मनोभावों के बीच एक और बड़ा और बहुत विशिष्ट अन्तर… प्रधानताओं और सामर्थ्यों से मल्लयुद्ध करने, लड़ने, परमेश्वर का सारा हथियार-बस्तर धारण करने, और खड़े रहने, सब कुछ करके खड़े रहने, आगे बढ़ने, आगे की ओर हाथ बढ़ाने, प्रार्थना में लगातार बने रहने, दिन-रात परमेश्वर की दोहाई देने के विषय में कहा गया है; मैं कहता हूं, इन बातों के विषय में नये नियम में जो कुछ कहा गया है, वह लगभग सब संतों से ही कहा गया, और उन्हीं की ओर निर्देशित है। जहां ये बातें एक बार पापियों के मन फिराव की खोज पर लागू होती हैं, वहां वे संतों के अपनी उच्च बुलाहट के महान कार्य को आगे बढ़ाने पर दस बार कही गई हैं। परन्तु आजकल बहुत से लोग एक विचित्र, पवित्रशास्त्र-विरुद्ध रीति में पड़ गए हैं, कि उनका सारा प्रयत्न और संघर्ष मन फिराव से पहले ही समाप्त हो जाता है; और इस प्रकार बाद में उनके लिये सुगमता रहती है, कि वे बैठकर अपने आलस्य और सुस्ती का आनन्द लें; मानो अब उनकी आवश्यकताओं की आपूर्ति हो चुकी हो, और वे धनी और तृप्त हो गए हों। परन्तु जब प्रभु “भूखों को अच्छी वस्तुओं से तृप्त करता है, तो ये धनी लोग खाली हाथ भेजे जाने वाले हैं,” लूका 1:53।
परन्तु निःसन्देह कुछ कपटी लोग ऐसे हैं, जिनमें केवल झूठे मनोभाव ही हैं, जो सोचेंगे कि वे इस परीक्षा में खरे उतर सकते हैं; और सहज ही कह देंगे, कि वे बीती हुई उपलब्धियों से सन्तुष्ट होकर बैठे रहने के बजाय आगे बढ़ने की इच्छा रखते हैं, वे अधिक की लालसा रखते हैं, वे परमेश्वर और मसीह के लिये लालायित रहते हैं, और अधिक पवित्रता की इच्छा रखते और उसकी खोज करते हैं। परन्तु सच यह है, कि उनकी इच्छाएं ठीक रीति से पवित्रता के लिये, उसके अपने ही कारण, या उसमें निहित नैतिक उत्कृष्टता और पवित्र मधुरता के कारण, भूख की इच्छाएं नहीं हैं; बल्कि केवल स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों के लिये हैं। वे स्पष्टतर प्रकाशनों के लिये लालायित रहते हैं, ताकि वे अपने प्राणों की दशा के विषय में बेहतर रीति से सन्तुष्ट हो सकें; या इसलिये कि बड़े प्रकाशनों में स्वयं को यह जानकर सन्तोष मिलता है कि परमेश्वर उन्हें इतना महत्व देता है, और वे दूसरों से इतने ऊंचे उठाए गए हैं; वे परमेश्वर के प्रेम को अधिक चखने की लालसा रखते हैं (जैसा वे इसे कहते हैं) इसकी अपेक्षा कि उन्हें परमेश्वर से अधिक प्रेम हो। या, हो सकता है, उनमें एक प्रकार की जबरदस्ती की, काल्पनिक, या बनावटी लालसाएं हों; क्योंकि वे सोचते हैं कि उन्हें अधिक अनुग्रह के लिये लालायित रहना ही चाहिए, नहीं तो यह उन पर एक अंधकारमय चिन्ह ठहरेगा। परन्तु ऐसी बातें, परमेश्वर और पवित्रता के लिये नये मनुष्य की स्वाभाविक, और मानो अनिवार्य भूख और प्यास से बहुत भिन्न हैं। संत में पवित्रता के लिये एक भीतरी जलती हुई लालसा होती है, जो नई सृष्टि के लिये उतनी ही स्वाभाविक है, जितनी शरीर के लिये जीवनदायी ऊष्मा। पवित्र आत्मा के लिये एक पवित्र हांफना और हांफते हुए तरसना होता है, ताकि पवित्रता बढ़े, जो पवित्र स्वभाव के लिये उतना ही स्वाभाविक है, जितना जीवित शरीर के लिये सांस लेना। और पवित्रता या पवित्रीकरण, परमेश्वर के प्रेम और अनुग्रह के किसी भी प्रकटीकरण की अपेक्षा, इसका कहीं अधिक प्रत्यक्ष लक्ष्य है। यही वह भोजन और पेय है, जो आत्मिक भूख का लक्ष्य है: यूहन्ना 4:34, “मेरा भोजन यह है कि मैं अपने भेजनेवाले की इच्छा पूरी करूं, और उसका काम पूरा करूं।”
जहां हम पवित्रशास्त्र में संतों की इच्छाओं, लालसाओं और प्यास के विषय में पढ़ते हैं, वहां धार्मिकता और परमेश्वर की व्यवस्थाओं का उल्लेख उनके लक्ष्य के रूप में किसी भी और वस्तु से कहीं अधिक बार किया गया है। संत वचन के निर्मल दूध की इच्छा इतनी अधिक इसलिये नहीं रखते कि उन पर परमेश्वर का प्रेम प्रमाणित हो, बल्कि इसलिये कि वे उसके द्वारा पवित्रता में बढ़ें। मैं पहले दिखा चुका हूं, कि पवित्रता ही वह भलाई है जो आत्मिक स्वाद का प्रत्यक्ष लक्ष्य है। परन्तु निःसन्देह वही मधुरता, जो आत्मिक स्वाद का मुख्य लक्ष्य है, आत्मिक भूख का भी मुख्य लक्ष्य है। अनुग्रह भक्त मनुष्य का खजाना है: यशायाह 32:6, “यहोवा का भय उसका खजाना है।” भक्ति वह लाभ है जिसका वह लोभी और लालची है। 1 तीमुथियुस 6:6। कपटी लोग प्रकाशनों के लिये उनके सामर्थ्यदायक प्रभाव के लिये उतना नहीं, जितना उस प्रकाशन के तात्कालिक सुख, और उसमें परमेश्वर के प्रेम के उच्च प्रकटीकरण के लिये लालायित रहते हैं। परन्तु न तो बड़े प्रकाशनों के लिये लालसा, और न ही बड़े
11. अनुग्रहमय मनोभावों और अन्य मनोभावों के बीच एक और बड़ा और बहुत विशिष्ट अन्तर… परमेश्वर के प्रेम के स्वादों के लिये लालसा, न स्वर्ग में होने की लालसा, न मरने की लालसा, किसी भी मात्रा में सच्चे संतों के उतने विशिष्ट चिन्ह हैं, जितनी एक अधिक पवित्र हृदय और अधिक पवित्र जीवन जीने की लालसा है।
परन्तु अब मैं पवित्र मनोभावों के उस अन्तिम विशिष्ट चिन्ह पर आ पहुंचा हूं, जिसका मैं उल्लेख करूंगा।
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का अभ्यास और फल मसीही… 12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का अभ्यास और फल मसीही आचरण में होता है।—मेरा अभिप्राय यह है, कि उनका उस पर, जिसमें वे पाए जाते हैं, ऐसा प्रभाव और सामर्थ्य होता है, कि वे यह कराते हैं कि एक ऐसा आचरण, जो सर्वथा मसीही नियमों के अनुरूप और उनके द्वारा निर्देशित हो, उसके जीवन का आचरण और मुख्य कार्य बन जाए।
इसमें तीन बातें शामिल हैं: 1. यह कि संसार में उसका आचरण या व्यवहार सर्वथा मसीही नियमों के अनुरूप और उनके द्वारा निर्देशित हो। 2. यह कि वह ऐसे पवित्र आचरण को सब बातों से बढ़कर अपना मुख्य कार्य बनाए; कि यह वह कार्य हो जिसमें वह मुख्य रूप से लगा हुआ और समर्पित हो, और जिसे वह सबसे उत्कट सरगर्मी और परिश्रम के साथ करता हो: ताकि यह कहा जा सके कि वह धर्म के इस आचरण को विशिष्ट रूप से अपना काम और व्यवसाय बनाता है। और 3. यह कि वह जीवन के अन्त तक इसमें स्थिर बना रहे: ताकि यह न केवल कुछ निश्चित मौसमों का, विश्राम के दिनों का, या कुछ असाधारण समयों का, या एक महीने, या एक वर्ष, या सात वर्षों का, या कुछ विशेष परिस्थितियों के अधीन उसका काम कहा जाए; बल्कि उसके जीवन का काम कहा जाए; यह वह काम हो जिसमें वह सब परिवर्तनों में, और सब परीक्षाओं के अधीन, जब तक वह जीवित है, स्थिर बना रहे।
इन तीनों में से हर एक की, सब सच्चे मसीहियों में, आवश्यकता परमेश्वर के वचन में अत्यन्त स्पष्ट और पूर्ण रूप से सिखाई गई है।
1. यह आवश्यक है कि मनुष्य सर्वथा आज्ञाकारी हों: 1 यूहन्ना 3:3 इत्यादि, “और जो कोई उस पर यह आशा रखता है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है जैसा वह पवित्र है।—और तुम जानते हो कि वह हमारे पापों को दूर करने के लिये प्रगट हुआ; और उसमें पाप नहीं। जो कोई उसमें बना रहता है, वह पाप नहीं करता; जो कोई पाप करता है, उसने न उसे देखा, न उसे जाना है। जो धार्मिकता के काम करता है, वह धर्मी है, जैसा वह धर्मी है: जो पाप करता है, वह शैतान की ओर से है।” अध्याय 5:18, “हम जानते हैं कि जो कोई परमेश्वर से जन्मा है, वह पाप नहीं करता, परन्तु जो परमेश्वर से जन्मा है, वह अपने आप को बचाए रखता है, और वह दुष्ट उसे छूता नहीं।” यूहन्ना 15:14, “यदि तुम वह सब कुछ करो जो मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं, तो तुम मेरे मित्र हो।”
यदि केवल एक ही अंग बिगड़ा हुआ हो, और हम उसे न काट डालें, तो वह सारी देह को नरक में ले जाएगा, मत्ती 5:29, 30। शाऊल को आज्ञा दी गई थी कि वह परमेश्वर के सब शत्रुओं, अमालेकियों, को मार डाले; और उसने अगाग को छोड़ बाकी सबको मार डाला, और उसे जीवित छोड़ देना ही उसके विनाश का कारण बना। कालेब और यहोशू परमेश्वर के प्रतिज्ञा किए हुए विश्राम में इसलिये प्रवेश कर पाए, क्योंकि उन्होंने प्रभु का पूरी रीति से अनुसरण किया, गिनती 14:24, और 32:11, 12,
व्यवस्थाविवरण 1:36। यहोशू 14:6, 8, 9, 14। नामान का कपट इस बात में प्रगट हुआ कि, यद्यपि वह अपने कोढ़ के चंगे होने के लिये परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता से बहुत भावुक दिखाई देता था, और उसकी सेवा करने के लिये वचनबद्ध था, तो भी वह एक बात में क्षमा चाहता था। और हेरोदेस, यद्यपि वह यूहन्ना से डरता था, और उस पर ध्यान देता था, और उसे आनन्द से सुनता था, और बहुत सी बातें करता था; तो भी वह इसलिये दोषी ठहराया गया, कि एक बात में वह उसकी नहीं सुनता था, अर्थात् अपनी प्रिय हेरोदियास को त्यागने में। इसलिये यह आवश्यक है कि मनुष्य अपने सबसे प्रिय अधर्मों को, जो उनके दाहिने हाथ और दाहिनी आंख के समान हैं, उन पापों को जो उन्हें सबसे सहज ही घेर लेते हैं, और जिनके प्रति वे अपने स्वाभाविक झुकावों, बुरी रीतियों, या विशेष परिस्थितियों के कारण, दूसरों की भांति ही, सबसे अधिक उजागर रहते हैं, त्याग दें। जैसे यूसुफ ने अपने आप को अपने भाइयों पर, जिन्होंने उसे बेच डाला था, तब तक प्रगट नहीं किया, जब तक कि बिन्यामीन, परिवार का प्रिय बालक, जिसे त्यागना सबसे कठिन था, सौंपा न गया; उसी प्रकार
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का अभ्यास और फल मसीही… मसीह हम पर अपना प्रेम तब तक प्रगट नहीं करेगा, जब तक हम अपनी सबसे प्रिय वासनाओं को त्याग न दें, और जब तक हम उन सबसे कठिन कर्तव्यों को, जिनके प्रति हमें सबसे अधिक अरुचि है, मानने के लिये न ले आए जाएं।
और यह ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बात है, कि किसी मनुष्य को सचमुच सर्वथा आज्ञाकारी कहलाने के लिये, उसकी आज्ञाकारिता केवल नकारात्मक बातों में, अर्थात् कर्म के पापों से युक्त दुष्ट आचरणों से सर्वथा बचने में ही नहीं, बल्कि धर्म की सकारात्मक बातों में भी सर्वथा होनी चाहिए। लोप के पाप भी उतने ही परमेश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन हैं जितने कर्म के पाप। मसीह, मत्ती 25 में, बाईं ओर वालों को लोप के पापों के कारण दण्डित और अनन्त आग के लिये शापित बताता है। “मैं भूखा था, और तुमने मुझे खाने को न दिया,” इत्यादि। इसलिये किसी मनुष्य को केवल इसलिये सर्वथा आज्ञाकारी, और मसीही आचरण वाला नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह न चोर है, न अंधेर करने वाला, न छल करने वाला, न पियक्कड़, न मधुशाला में मंडराने वाला, न व्यभिचारी, न उपद्रवी, न रात में घूमने वाला, न अशुद्ध, न अपनी भाषा में अपवित्र, न निन्दक, न झूठा, न क्रोधी, न द्वेषी, न गाली देने वाला। जो व्यक्ति यहीं तक जाकर आगे नहीं बढ़ता, उसे सुसमाचार के योग्य आचरण वाला कहना झूठ है; परन्तु इसके लिये यह भी आवश्यक है कि वह गम्भीर, धर्मपरायण, भक्त, नम्र, दीन, क्षमाशील, शान्तिप्रिय, आदरपूर्ण, विनम्र, परोपकारी, दयालु, उदार और भला चालचलन तथा व्यवहार रखने वाला भी हो। ऐसी बातों के बिना, वह मसीह की व्यवस्थाओं का पालन नहीं करता, वे व्यवस्थाएं जिन पर उसने और उसके प्रेरितों ने अत्यन्त महत्व और आवश्यकता की बातों के रूप में बहुत बल दिया।
2. मनुष्यों के सच्चे मसीही होने के लिये यह आवश्यक है, कि वे धर्म के काम, और परमेश्वर की सेवा को बड़ी उत्कटता और परिश्रम से आगे बढ़ाएं, मानो वह वह काम हो जिसके लिये वे अपने आप को समर्पित करते हैं, और जिसे वे अपने जीवन का मुख्य कार्य बनाते हैं। मसीह की विशेष प्रजा न केवल भले काम करती है, बल्कि भले कामों के लिये उत्साही है, तीतुस 2:14। कोई भी मनुष्य एक साथ दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। जो परमेश्वर के सच्चे सेवक हैं, वे अपने आप को उसकी सेवा में समर्पित कर देते हैं, और उसे मानो अपना सम्पूर्ण कार्य बना लेते हैं, जिसमें वे अपना पूरा हृदय, और अपनी सामर्थ्य का सर्वोत्तम भाग लगाते हैं: फिलिप्पियों 3:13, “यह एक काम मैं करता हूं।” मसीही अपनी प्रभावशाली बुलाहट में, आलस्य के लिये नहीं, बल्कि परमेश्वर की दाख की बारी में परिश्रम करने के लिये, और अपने दिनों को एक बड़ी और परिश्रमपूर्ण सेवा में बिताने के लिये बुलाए गए हैं। सब सच्चे मसीही इस बुलाहट का पालन करते हैं (जैसा कि इसके प्रभावशाली बुलाहट होने में निहित है), और मसीहियों का काम करते हैं; जिसकी तुलना नये
नियम में सर्वत्र उन कामों से की गई है, जिनमें मनुष्य अपनी सामर्थ्य को सबसे बड़ी उत्कटता के साथ लगाया करते हैं, जैसे दौड़ना, मल्लयुद्ध करना, युद्ध करना। सब सच्चे मसीही यीशु मसीह के अच्छे और विश्वासयोग्य सिपाही हैं, और “विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़ते” हैं; क्योंकि जो ऐसा करते हैं, केवल वही “अनन्त जीवन को पकड़े रहते हैं।” जो “हवा को पीटने वालों के समान लड़ते हैं,” वे कभी विजय का मुकुट नहीं पाते। “जो दौड़ में दौड़ते हैं, वे सब दौड़ते हैं, परन्तु इनाम एक ही पाता है,” और जो अपनी दौड़ में ढीले और लापरवाह हैं, वे “ऐसे नहीं दौड़ते कि पा सकें।” स्वर्ग का राज्य बलपूर्वक ही लिया जाता है। उत्कटता के बिना उस सकरे मार्ग पर, जो जीवन की ओर ले जाता है, आगे बढ़ना सम्भव नहीं है; और इसलिये उस महिमामय जीवन और सुख की दशा तक पहुंचना भी सम्भव नहीं, जिस तक वह ले जाता है। उत्कट परिश्रम के बिना सिय्योन की खड़ी और ऊंची पहाड़ी पर चढ़ना सम्भव नहीं है, और इसलिये उसकी चोटी पर स्थित स्वर्गीय नगर तक पहुंचना भी सम्भव नहीं। निरन्तर
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का अभ्यास और फल मसीही… परिश्रमशीलता के बिना उस तेज़ धारा के विरुद्ध बहना सम्भव नहीं, जिसमें हम तैर रहे हैं, ताकि हम कभी उस जीवन के जल के सोते तक पहुंच सकें, जो उसके उद्गम पर है। यह आवश्यक है कि हम “सदा जागते और प्रार्थना करते रहें, ताकि हम उन भयानक बातों से बच सकें जो भक्तिहीनों पर आने वाली हैं, और मनुष्य के पुत्र के सामने खड़े होने के योग्य गिने जाएं।” यह आवश्यक है कि हम
“परमेश्वर का सारा हथियार-बस्तर धारण करें, और सब कुछ करके खड़े रहें,” ताकि हम सम्पूर्ण विनाश से बच सकें, और “शैतान के जलते हुए तीरों” से पूरी तरह नाश न हो जाएं। यह आवश्यक है कि हम “उन बातों को भूल जाएं जो पीछे रह गई हैं, और जो आगे हैं उनकी ओर बढ़ते जाएं, और मसीह में परमेश्वर की ऊपर की बुलाहट के इनाम के लिये निशाने की ओर दौड़ें
हमारे प्रभु यीशु में,” ताकि हम उस इनाम को पा सकें। परमेश्वर के अंगीकार किए हुए सेवकों में उसकी सेवा में आलस्य, खुले विद्रोह के समान ही दण्डनीय है; क्योंकि आलसी सेवक एक दुष्ट सेवक है, और उसे बाहर के अंधकार में, परमेश्वर के खुले शत्रुओं के बीच डाल दिया जाएगा, मत्ती 25:26, 30।
जो आलसी हैं, वे “उनके अनुयायी नहीं हैं जो विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञाओं के वारिस होते हैं।” इब्रानियों 6:11, 12, “और हम यह चाहते हैं कि तुम में से हर एक अन्त तक आशा की पूरी निश्चयता के लिये वैसी ही सरगर्मी दिखाए; कि तुम आलसी न बनो, बल्कि उनके अनुयायी बनो, जो विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञाओं के वारिस होते हैं।” और वे सब जो स्वर्ग को आगे जा चुके साक्षियों के उस बादल का अनुसरण करते हैं, “हर एक बोझ को, और उस पाप को जो सहज ही उलझा लेता है, उतार डालते हैं, और धीरज के साथ उस दौड़ को दौड़ते हैं जो उनके सामने रखी हुई है,” इब्रानियों 12:1। वह सच्चा विश्वास, जिसके द्वारा लोग मसीह की धार्मिकता पर, और उसने उनके लिये जो काम किया है उस पर भरोसा रखते हैं, और सचमुच उस पर भोजन करते और जीवन बिताते हैं, सदा मसीही काम और मार्ग में इस प्रकार की उत्कटता की आत्मा के साथ होता है। जिसका पुराने समय में इस्राएल की सन्तान के फसह के मेम्ने खाने की रीति में पूर्वाभास दिया गया था; जिन्हें यह आज्ञा दी गई थी कि वे उसे उन लोगों के समान खाएं जो जल्दी में हों, अपनी कमर बांधे, अपने पांवों में जूते पहने, और हाथ में लाठी लिए हुए, निर्गमन 12:11।
3. हर सच्चा मसीही सर्वथा आज्ञाकारिता, और परमेश्वर की परिश्रमपूर्ण तथा उत्कट सेवा के इस मार्ग में, अपने जीवन के अन्त तक, उन सब प्रकार की परीक्षाओं के होते हुए भी जिनका उसे सामना होता है, स्थिर बना रहता है। यह कि सब सच्चे संत, सब वे लोग जो अनन्त जीवन प्राप्त करते हैं, इस प्रकार धर्म के आचरण और परमेश्वर की सेवा में स्थिर बने रहते हैं, यह एक ऐसी शिक्षा है जो पवित्रशास्त्र में इतनी प्रचुरता से सिखाई गई है, कि उसे सूचित करने वाले सब वचनों को विशेष रूप से गिनाना अंतहीन होगा; मैं हाशिये में दिए गए कुछ वचनों का उल्लेख करने से ही सन्तुष्ट रहूंगा।73
परन्तु आज्ञाकारिता में वह स्थिर बने रहना, जिस पर पवित्रशास्त्र में अनुग्रह की सच्चाई के एक विशेष चिन्ह के रूप में मुख्यतः बल दिया गया है, वह है धर्म का दावा करने वालों का अपने कर्तव्य के आचरण में बने रहना, और उन विभिन्न परीक्षाओं के होते हुए भी, जिनका उन्हें सामना होता है, एक पवित्र चाल-चलन में स्थिर रहना।
73 व्यवस्थाविवरण 5:29; व्यवस्थाविवरण 32:18, 19, 20; 1 इतिहास 28:9; भजन संहिता 78:7, 8, 10, 11, 35, 36, 37, 41, 56, इत्यादि; भजन संहिता 106:3. 12-15; भजन संहिता 125:4, 5; नीतिवचन 26:11, यशायाह 64:5, यिर्मयाह 17:13, यहेजकेल 3:20, और 18:24, और 33:12, 13; मत्ती 10:22, और 13:4-8, पदों 19-23 के साथ, और 25:8, और 24:12, 13, लूका 9:62, और 12:35, इत्यादि, और 22:28, और 17:32; यूहन्ना 8:30, 31, और 15:6,
7, 8, 10, 16; प्रकाशितवाक्य 2:7, और 40:22; कुलुस्सियों 1:22, 23, इब्रानियों 3:6, 12, 14, और 6:11, 12, और 10:35, इत्यादि; याकूब 1:25; प्रकाशितवाक्य 2:13,
26, और 2:10; 2 तीमुथियुस 2:15; 2 तीमुथियुस 4:4-8।
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का अभ्यास और फल मसीही… यहां परीक्षाओं से मेरा अभिप्राय उन बातों से है, जो घटित होती हैं, और जिनका सामना धर्म का दावा करने वाले को अपने मार्ग में करना पड़ता है, जो विशेष रूप से परमेश्वर के प्रति उसके कर्तव्य और विश्वासयोग्यता में स्थिर बने रहना, स्वभाव के लिये कठिन बना देती हैं। इन बातों को पवित्रशास्त्र में समय-समय पर परीक्षाओं, या प्रलोभनों के नाम से पुकारा गया है (जो एक ही अर्थ के शब्द हैं)। ये विभिन्न प्रकार की हैं: बहुत सी बातें ऐसी हैं जो लोगों के अपने कर्तव्य के मार्ग में बने रहना, उनकी वासनाओं और भ्रष्टताओं को पोषित करने और भड़काने, या उभारने और उकसाने की प्रवृत्ति से कठिन बना देती हैं। बहुत सी बातें, चिपकने वाले स्वभाव की होने, और लोगों को पाप के लिये लुभाने की प्रवृत्ति रखने, या रोक-टोक हटाकर उन्हें अधर्म में साहसी बनाने की प्रवृत्ति के कारण, कर्तव्य के मार्ग में बने रहना कठिन बना देती हैं। अन्य बातें धर्म का दावा करने वालों की सच्चाई और स्थिरता की परीक्षाएं हैं, उनके कर्तव्य को उनके लिये भयानक दिखाने, और इस प्रकार उन्हें डराकर उससे दूर भगाने की प्रवृत्ति से; जैसे वे दुःख जिनके सामने उनका कर्तव्य उन्हें ला खड़ा करेगा; पीड़ा, बुरी भावना, तिरस्कार, और निन्दा, या बाहरी सम्पत्ति और सुखों की हानि। यदि लोग, धर्म का दावा करने के बाद, इस जगत में, जो इतने परिवर्तनों और इतनी बुराई से भरा हुआ है, कुछ अच्छे समय तक जीवित रहें, तो यह असम्भव है कि उन्हें अपनी सच्चाई और स्थिरता की बहुत सी परीक्षाओं का सामना न करना पड़े। और इसके अतिरिक्त, यह परमेश्वर की अपनी प्रोवीडेंस में यह रीति है, कि वह अपने दावा करने वाले मित्रों और सेवकों पर जानबूझकर परीक्षाएं लाए, ताकि वह उन्हें प्रगट कर सके, और उनकी अपनी अन्तरात्मा को, और प्रायः जगत को, उनकी दशा के दोषी होने के बोध के लिये पर्याप्त सामग्री दिखा सके; जैसा अनगिनत
सच्चे संत कुछ प्रकार और मात्रा में पीछे हट जाने के दोषी हो सकते हैं, और विशेष प्रलोभनों से हार सकते हैं, और पाप में, हां बड़े पापों में भी, गिर सकते हैं; परन्तु वे कभी इस प्रकार गिर नहीं सकते कि धर्म से, और परमेश्वर की सेवा से थक जाएं, और आदतन उससे अरुचि रखें और उसकी उपेक्षा करें, चाहे उसके अपने कारण से, या उसके साथ आने वाली कठिनाइयों के कारण; जैसा गलातियों 6:9, रोमियों 2:7, इब्रानियों 10:36, यशायाह 43:22, मलाकी 1:13 से स्पष्ट है। वे कभी इस प्रकार पीछे नहीं हट सकते, कि वे सर्वथा आज्ञाकारिता के मार्ग में आगे बने न रहें; या ऐसा हो कि मसीहियत के सब नियमों का पालन करना, और चाहे कितनी ही कठिन परिस्थितियों में हो, सब आवश्यक कर्तव्य करना, उनकी रीति न रह जाए। यह उन बातों से बहुतायत से स्पष्ट है जो पहले ही देखी जा चुकी हैं।
वे कभी इस प्रकार भी नहीं गिर सकते, कि आदतन धर्म के काम की अपेक्षा किसी और बात में अधिक लगे रहें; या ऐसा हो कि परमेश्वर की अपेक्षा किसी और वस्तु की सेवा करना उनकी रीति और स्वभाव बन जाए; या ऐसा हो कि वे परमेश्वर की उतनी उत्कटता और परिश्रम से सेवा करना नियमित रूप से बन्द कर दें, जिससे वे धर्म के काम में आदतन समर्पित और सौंपे हुए बने रहें; जब तक कि मसीह के वे वचन झूठे न पड़ जाएं, “तुम दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकते,” और प्रेरित के वे वचन, “जो जगत का मित्र बनना चाहता है, वह परमेश्वर का शत्रु ठहरता है;” और जब तक कोई संत अपने परमेश्वर को बदल न ले, और फिर भी सच्चा संत बना रहे। और न ही कोई सच्चा संत कभी इस प्रकार गिर सकता है, कि सामान्यतः उसके मन फिराव के बाद के चाल-चलन और व्यवहार में, पहले की अपेक्षा, कोई उल्लेखनीय अन्तर न रह जाए। जो सचमुच मन फिराए हुए हैं, वे नये मनुष्य हैं, नई सृष्टि हैं; नये न केवल भीतर से, बल्कि बाहर से भी; वे आत्मा, प्राण और देह में सर्वथा पवित्र किए गए हैं; पुरानी बातें बीत गईं, सब कुछ नया हो गया; उनके नये हृदय हैं, और 12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का अभ्यास और फल मसीही… नई आंखें, नये कान, नई जीभ, नये हाथ, नये पांव हैं; अर्थात्, एक नया आचरण और व्यवहार; और वे नये जीवन में चलते हैं, और जीवन के अन्त तक ऐसा करते रहते हैं। और जो गिर जाते हैं, और स्पष्ट रूप से ऐसा करना छोड़ देते हैं, यह इस बात का चिन्ह है कि वे मसीह के साथ कभी जी उठे ही नहीं थे। और विशेष रूप से जब मनुष्यों की यह धारणा कि वे मन फिराए हुए हैं, और इसलिये एक सुरक्षित दशा में हैं, इस स्थिति तक पहुंचने का कारण बनती है, तो यह उनके कपट का सबसे स्पष्ट चिन्ह है। और यह बात चाहे उनका गिरना पहले के पापों में हो, या किसी नये प्रकार की दुष्टता में, जिसमें स्वभाव की भ्रष्टता को मार डालने के बजाय, केवल एक नई दिशा में मोड़ दिया गया हो। जैसे जब वे लोग, जो अपने आप को मन फिराया हुआ मानते हैं, यद्यपि वे पहले की अभद्रता और कामुकता की ओर नहीं लौटते; तो भी अपने अनुभवों, अनुग्रहों और विशेषाधिकारों के विषय में अपनी ऊंची धारणा के कारण, धीरे-धीरे एक स्व-धार्मिक और आत्मिक रूप से घमण्डी मनोवृत्ति में, और उससे स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले ऐसे ही व्यवहार में बसते जाते हैं। जब मनुष्यों की दशा ऐसी होती है, तो चाहे वे अपने पहले के बुरे कामों से कितने ही दूर दिखाई दें, यही अकेली बात उन्हें दोषी ठहराने के लिये पर्याप्त है, और उनकी अन्तिम दशा को पहली से कहीं अधिक बुरी बना सकती है। क्योंकि यह उस पीढ़ी के यहूदियों की ठीक वही दशा प्रतीत होती है, जिनके विषय में मसीह मत्ती 12:43, 44, 45 में बोलता है, जो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के प्रचार से जागृत हुए, और अपने पहले के व्यभिचारपूर्ण मार्गों से सुधार की ओर लाए गए, जिससे अशुद्ध आत्मा मानो निकाल दी गई, और घर झाड़ा-बुहारा और सजाया गया; तो भी, परमेश्वर और अनुग्रह से खाली रहकर, वे अपने आप से भर गए, और अपनी ही धार्मिकता और उत्कृष्ट पवित्रता की अत्यन्त ऊंची धारणा में ऊंचे उठाए गए, और उसी के अनुरूप आत्म-गौरव करने वाले व्यवहार के अभ्यस्त हो गए; इस प्रकार चुंगी लेने वालों और वेश्याओं के पापों को फरीसियों के पापों से बदलकर; और अन्त में, उनमें पहले से भी बुरी सात दुष्टात्माएं समा गईं।
इस प्रकार मैंने यह स्पष्ट किया है कि जब मैं कहता हूं कि अनुग्रहमय मनोभावों का अभ्यास और फल मसीही आचरण में होता है, तो मेरा अभिप्राय किस अभ्यास और फल से है।
अनुग्रहमय मनोभावों में ऐसी प्रवृत्ति और प्रभाव होने का कारण, इस प्रवचन के पूर्ववर्ती भागों में पहले ही देखी गई बहुत सी बातों से स्पष्ट होता है।
इसका कारण इस बात से स्पष्ट होता है, कि अनुग्रहमय मनोभाव उन क्रियाओं और प्रभावों से उत्पन्न होते हैं जो आत्मिक हैं, और वह भीतरी सिद्धान्त जिससे वे प्रवाहित होते हैं, कोई ईश्वरीय वस्तु है, परमेश्वर का एक सम्प्रेषण, ईश्वरीय स्वभाव में सहभागिता, हृदय में बसा हुआ मसीह, वहां वास करने वाला पवित्र आत्मा, जो आत्मा की सामर्थ्यों के साथ मिलकर, एक भीतरी जीवनदायी सिद्धान्त के रूप में, उन सामर्थ्यों के अभ्यास में अपने ही स्वभाव को प्रकट करता है।
यह हमें दिखाने के लिये पर्याप्त है कि सच्चे अनुग्रह में ऐसी सक्रियता, सामर्थ्य, और प्रभावशीलता क्यों होनी चाहिए।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो कुछ ईश्वरीय है, वह सामर्थी और प्रभावशाली है; क्योंकि उसके पक्ष में सर्वशक्तिमानता है। यदि परमेश्वर हृदय में वास करता है, और उससे जीवनरूप में संयुक्त है, तो वह अपनी क्रिया की प्रभावशीलता से यह दिखाएगा कि वह परमेश्वर है। मसीह किसी संत के हृदय में कब्र के समान, या किसी मरे हुए उद्धारकर्ता के समान, जो कुछ नहीं करता, नहीं है; बल्कि अपने मन्दिर के समान, और मरे हुओं में से जीवित हुए किसी के समान है।
क्योंकि जिस हृदय में मसीह उद्धारक रीति से है, वहां वह जीवित रहता है, और अपने पुनरुत्थान में प्राप्त हुए उस अनन्त जीवन की सामर्थ्य के अनुसार अपने आप को प्रगट करता है। इस प्रकार हर संत, जो मसीह के दुःख उठाने के लाभ का भागी है, उसके पुनरुत्थान 12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का अभ्यास और फल मसीही… की सामर्थ्य को जानने और अनुभव करने के लिये बनाया जाता है। मसीह का आत्मा, जो हृदय में अनुग्रह का प्रत्यक्ष सोता है, सम्पूर्ण जीवन, सम्पूर्ण सामर्थ्य, सम्पूर्ण क्रिया है: 1 कुरिन्थियों 2:4, “आत्मा और सामर्थ्य के प्रमाण में।” 1 थिस्सलुनीकियों 1:5, “हमारा सुसमाचार तुम्हारे पास केवल वचन में ही नहीं, परन्तु सामर्थ्य में, और पवित्र आत्मा में भी आया।” 1 कुरिन्थियों
4:20, “क्योंकि परमेश्वर का राज्य वचन में नहीं, परन्तु सामर्थ्य में है।” इसलिये उद्धारक मनोभाव, यद्यपि वे प्रायः दूसरों के समान बड़ा शोर और दिखावा नहीं करते, तो भी उनमें एक गुप्त दृढ़ता, जीवन, और सामर्थ्य होती है, जिसके द्वारा वे हृदय को पकड़ लेते हैं, और उसे मानो एक प्रकार की बंधुआई में ले जाते हैं, 2 कुरिन्थियों 10:5, परमेश्वर और पवित्रता के लिये इच्छा का एक पूर्ण और दृढ़ निश्चय प्राप्त करते हुए। भजन संहिता 110:3, “तेरी सामर्थ्य के दिन तेरी प्रजा अपनी इच्छा से आएगी।” और इस प्रकार पवित्र मनोभावों का मनुष्य के जीवन के मार्ग पर शासन करने वाला प्रभाव होता है। एक मूर्ति देखने में एक सच्चे मनुष्य, और एक सुन्दर मनुष्य के समान लग सकती है; हां, वह आंखों को देखने में एक अत्यन्त जीवन्त, बलवान, और सक्रिय मनुष्य की समानता रख सकती है; परन्तु फिर भी उसमें जीवन और सामर्थ्य का भीतरी सिद्धान्त नहीं होता; और इसलिये वह कुछ नहीं करती, वह कुछ पूरा नहीं करती, उस दिखावे के अनुरूप कोई क्रिया या कार्य नहीं होता। झूठे प्रकाशन और मनोभाव मनुष्यों के कामों और आचरण के सोते तक पहुंचने और उस पर शासन करने के लिये पर्याप्त गहरे नहीं जाते। पथरीली भूमि में पड़े बीज में मिट्टी की गहराई नहीं थी, और जड़ फल लाने के लिये पर्याप्त गहरी नहीं गई।
परन्तु अनुग्रहमय मनोभाव हृदय की अत्यन्त गहराई तक जाते हैं, और जीवन तथा क्रियाशीलता के सबसे भीतरी सोतों को पकड़ लेते हैं।
इसी में सच्ची भक्ति की सामर्थ्य मुख्य रूप से प्रगट होती है, अर्थात्, उसके प्रभावशाली आचरण होने में।
और इस दृष्टि से भक्ति की प्रभावशीलता ही वह बात है, जिसकी ओर प्रेरित का ध्यान है, जब वह भक्ति की सामर्थ्य की बात करता है, 2 तीमुथियुस 3:5, जैसा बिलकुल स्पष्ट है; क्योंकि वहां वह विशेष रूप से यह बता रहा है, कि धर्म का दावा करने वाले कुछ लोग किस प्रकार उसके आचरण में स्पष्ट रीति से असफल होंगे, और तब 5वें पद में यह देखता है, कि इस प्रकार अपवित्र आचरण के होने में, वे भक्ति की सामर्थ्य का इनकार करते हैं, यद्यपि उनमें उसका रूप है। सचमुच भक्ति की सामर्थ्य पहले स्थान पर आत्मा के भीतर, वहां अनुग्रहमय मनोभावों के सुबोध, जीवन्त अभ्यास में प्रगट होती है। तो भी भक्ति की इस सामर्थ्य का मुख्य प्रमाण, पवित्र मनोभावों के उन अभ्यासों में है जो व्यावहारिक हैं, और उनके व्यावहारिक होने में है; इच्छा को जीतने में, और मनुष्यों की वासनाओं और भ्रष्टताओं को जीतने में, और मनुष्यों को सब प्रलोभनों, कठिनाइयों, और विरोध के होते हुए भी, पवित्रता के मार्ग पर आगे ले जाने में।
फिर, अनुग्रहमय मनोभावों का अभ्यास और प्रभाव मसीही आचरण में होने का कारण, इस बात से भी स्पष्ट होता है (जो पहले भी देखा जा चुका है), कि “अनुग्रहमय मनोभावों का पहला वस्तुनिष्ठ आधार, ईश्वरीय वस्तुओं का, जैसी वे अपने आप में हैं, वह असाधारण रूप से उत्कृष्ट और मनोहर स्वभाव है, न कि स्वयं से, या स्वार्थ से उनका कोई कल्पित सम्बन्ध।” यह दिखाता है कि पवित्र मनोभाव मनुष्यों को उनके आचरण में सर्वथा पवित्र क्यों बनाता है।
मनुष्यों को धर्म के विषय में पक्षपाती वह बात बनाती है, कि वे अपने धर्म में परमेश्वर को नहीं वरन अपने आप को ढूँढ़ते हैं; और वे धर्म को उसके उत्कृष्ट स्वभाव के कारण नहीं, वरन केवल अपना मतलब सिद्ध करने के लिए अपनाते हैं। जो व्यक्ति धर्म को केवल मतलब सिद्ध करने के लिए अपनाता है, वह उतना ही धर्म अपनाएगा जितना उसे लगता है कि उस मतलब को पूरा करता है; परन्तु जो व्यक्ति धर्म को उसके उत्कृष्ट और मनोहर स्वभाव के कारण अपनाता है, वह उस स्वभाव से युक्त सब कुछ अपना लेता है: जो व्यक्ति धर्म को उसी के लिए अपनाता है, वह — 12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — सम्पूर्ण धर्म को अपना लेता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अनुग्रहमय मनोभाव मनुष्यों को दृढ़ता से और सर्वदा धर्म का पालन करने के लिए क्यों प्रेरित करते हैं। समय के बीतने के साथ धर्म, मनुष्यों के निजी स्वार्थ के अनुकूल होने की दृष्टि से, अनेक बातों में बहुत बदल सकता है; इसलिए जो व्यक्ति केवल स्वार्थी दृष्टिकोण से धर्म को मानता है, वह समय बदलने पर उसे त्याग सकता है; परन्तु धर्म का उत्कृष्ट स्वभाव, जैसा वह अपने आप में है, अपरिवर्तनीय है; वह सब समयों में और सब परिवर्तनों के बीच सदैव एक-सा रहता है; वह किसी भी बात में कभी नहीं बदलता।
अनुग्रहमय मनोभाव पवित्र आचरण में क्यों परिणत होते हैं, इसका कारण उस प्रकार की उत्कृष्टता से भी और स्पष्ट होता है जो दिव्य वस्तुओं में है, और जिसे, जैसा देखा जा चुका है, सब पवित्र मनोभावों की नींव कहा गया है, अर्थात् "उनकी नैतिक उत्कृष्टता, या उनकी पवित्रता की सुन्दरता।" इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि पवित्रता ही के लिए पवित्रता से प्रेम रखना मनुष्यों को पवित्रता का, और जो कुछ पवित्र है उस सबका, अभ्यास करने की ओर प्रवृत्त करता है। चूँकि पवित्रता ही वह मुख्य वस्तु है जो सब अनुग्रहमय मनोभावों को उभारती, खींचती और नियंत्रित करती है, इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसे सब मनोभाव पवित्रता की ओर उन्मुख होते हैं। जिस वस्तु से मनुष्य प्रेम करते हैं, उसे पाने और उससे जुड़ने और उसके अधिकारी होने की उनमें लालसा होती है। जिस सुन्दरता में मनुष्य आनन्दित होते हैं, उससे सुसज्जित होने की उनमें लालसा होती है। जिन कार्यों में मनुष्य आनन्दित होते हैं, उन्हें करने के लिए वे अनिवार्यतः प्रवृत्त होते हैं।
और परमेश्वर के आत्मा की उस दिव्य शिक्षा और अगुवाई के विषय में जो देखा जा चुका है, जो अनुग्रहमय मनोभावों में पाई जाती है, वह ऐसे मनोभावों की सर्वथा पवित्र आचरण की ओर इस प्रवृत्ति का कारण दर्शाती है। क्योंकि, जैसा देखा जा चुका है, परमेश्वर का आत्मा अपनी इस दिव्य शिक्षा और अगुवाई में प्राण को उस मिठास का एक स्वाभाविक स्वाद देता है जो पवित्र वस्तु में है, और उस हर वस्तु में है जो पवित्र है, जहाँ तक वह दृष्टि में आती है, और साथ ही हर उस वस्तु के प्रति अरुचि और घृणा उत्पन्न करता है जो अपवित्र है।
यही बात उस आत्मिक ज्ञान की प्रकृति के विषय में देखी गई बात से भी स्पष्ट होती है, जो सब पवित्र मनोभावों की नींव है, और जिसमें दिव्य वस्तुओं की उस उत्कृष्टता का बोध और दर्शन सम्मिलित है, जो सर्वोच्च और सर्वातिशायी है। क्योंकि इसी के द्वारा ये वस्तुएँ अन्य सब वस्तुओं से बढ़कर, चुने जाने और दृढ़ता से थामे रखने के योग्य प्रतीत होती हैं। मसीह की सर्वातिशायी महिमा को देखकर सच्चे मसीही उसे अनुगमन के योग्य देखते हैं; और इस प्रकार सामर्थ्य के साथ उसकी ओर खिंचे चले जाते हैं; वे उसे इस योग्य देखते हैं कि उसके लिए सब कुछ त्याग दें: उस सर्वोत्कृष्ट मनोहरता को देखकर वे पूर्णतः उसके अधीन होने के लिए तैयार हो जाते हैं, और उसकी सेवा में गम्भीरता और सक्रियता से परिश्रम करने के लिए संलग्न हो जाते हैं, और उसके निमित्त सब कठिनाइयों में से होकर जाने के लिए इच्छुक बन जाते हैं। और मसीह की इस दिव्य उत्कृष्टता का यह प्रकाशन ही है जो उन्हें उसके प्रति स्थिर बनाए रखता है: क्योंकि यह उनके मन पर ऐसी गहरी छाप छोड़ता है कि वे उसे भूल नहीं सकते; और वे जहाँ कहीं भी वह जाए, उसके पीछे चलेंगे, और किसी के लिए भी उन्हें उससे दूर खींचने का प्रयत्न करना व्यर्थ है।
अनुग्रहमय मनोभावों की इस व्यावहारिक प्रवृत्ति और परिणाम का कारण इससे भी स्पष्ट होता है जो देखा जा चुका है, कि ऐसे मनोभावों के साथ "दिव्य वस्तुओं की वास्तविकता और निश्चितता के विषय में विवेक-बुद्धि के पूर्ण बोध" का होना पाया जाता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो लोग कभी इस बात के पूर्ण रूप से निश्चित नहीं हुए कि धर्म की बातों में कोई वास्तविकता है, वे धर्म के ऐसे गम्भीर, सर्वांगीण और स्थिर आचरण के परिश्रम और कष्ट में कभी नहीं पड़ेंगे,
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — उस वस्तु पर भरोसा रखकर जिसके विषय वे निश्चित नहीं हैं, सब कठिनाइयों, आत्म-त्यागों और दुःखों में से होकर जाने के। परन्तु दूसरी ओर, जो लोग उन बातों की निश्चित सच्चाई के विषय में पूर्ण रूप से निश्चित हैं, वे अपने आचरण में उनके द्वारा अवश्य ही संचालित होंगे; क्योंकि परमेश्वर के वचन में प्रकट की गई बातें इतनी महान हैं, और अन्य सब वस्तुओं से अनन्त गुणा अधिक महत्वपूर्ण हैं, कि यह मानवीय स्वभाव के विपरीत होगा कि कोई मनुष्य उनकी सच्चाई पर पूर्ण विश्वास करे, और फिर भी अपने आचरण में सब वस्तुओं से बढ़कर उनसे प्रभावित न हो।
फिर, पवित्र मनोभावों की इस अभिव्यक्ति और आचरण में इस प्रभाव का कारण इससे स्पष्ट होता है जो देखा जा चुका है, कि "स्वभाव का परिवर्तन ऐसे मनोभावों के साथ होता है।" स्वभाव के परिवर्तन के बिना मनुष्यों का आचरण पूर्णतः नहीं बदलेगा। जब तक वृक्ष उत्तम न बनाया जाए, फल उत्तम नहीं होगा। मनुष्य कँटीली झाड़ियों से अंगूर, न ऊँटकटारे से अंजीर बटोरते हैं। सूअर को नहलाया जा सकता है और वह थोड़ी देर के लिए स्वच्छ दिखाई दे सकता है, परन्तु फिर भी, स्वभाव के परिवर्तन के बिना, वह फिर भी कीचड़ में लोटता रहेगा। स्वभाव कार्य का एक ऐसा सामर्थी सिद्धान्त है जो उसके विरोध करनेवाली किसी भी वस्तु से अधिक बलवान है: यद्यपि उसे कुछ समय के लिए बलपूर्वक रोका जा सकता है, अन्ततः वह अपने रोकनेवाले पर विजयी होगा: वह नदी की धारा के समान है, उसे कुछ समय के लिए बाँध से रोका जा सकता है, परन्तु यदि स्रोत को सुखाने के लिए कुछ न किया जाए, तो वह सदा रुका नहीं रहेगा; उसे अपना मार्ग बनाना ही होगा, चाहे अपने पुराने मार्ग में, चाहे किसी नए मार्ग में। स्वभाव उन सब वस्तुओं से कहीं अधिक स्थिर और स्थायी वस्तु है, जो शारीरिक मनुष्यों के सुधार और धार्मिकता की नींव हैं।
जब कोई स्वाभाविक मनुष्य अपनी वासना का त्याग करता है, और कठोर, धार्मिक जीवन जीता है, और धर्म में दीन, परिश्रमी और गम्भीर प्रतीत होता है, तो यह स्वाभाविक नहीं है; यह सब स्वभाव के विरुद्ध किया गया बलपूर्वक प्रयत्न है; जैसे जब किसी पत्थर को बलपूर्वक ऊपर की ओर फेंका जाता है; परन्तु वह बल धीरे-धीरे क्षीण हो जाएगा; तौभी स्वभाव अपने पूरे बल में बना रहेगा, और इस प्रकार फिर से प्रबल हो जाता है, और पत्थर नीचे की ओर लौट आता है। जब तक भ्रष्ट स्वभाव को मृत नहीं किया गया, वरन उसका सिद्धान्त मनुष्य में पूरा बना रहता है, तब तक यह आशा करना व्यर्थ है कि वह शासन नहीं करेगा। परन्तु यदि पुराना स्वभाव सचमुच मृत कर दिया जाए, और एक नया और स्वर्गीय स्वभाव भर दिया जाए, तो यह भली-भाँति आशा की जा सकती है कि मनुष्य जीवन की नवीनता में चलेंगे, और अपने दिनों के अन्त तक ऐसा करते रहेंगे।
पवित्र मनोभावों के इस व्यावहारिक प्रभाव और परिणाम का कारण उस दीनता की आत्मा से भी आंशिक रूप से देखा जा सकता है, जिसका उल्लेख किया जा चुका है, जो उनके साथ रहती है। दीनता वह वस्तु है जिसमें आज्ञाकारिता की आत्मा बहुत अंश तक निहित है। घमण्डी आत्मा विद्रोही आत्मा है, परन्तु दीन आत्मा एक समर्पणशील, अधीन, आज्ञाकारी आत्मा है। हम मनुष्यों में देखते हैं कि जो सेवक अहंकारी आत्मा का होता है, वह हर बात में अपने स्वामी की इच्छा के प्रति समर्पित और आज्ञाकारी होने में सक्षम नहीं होता; परन्तु उस सेवक के साथ ऐसा नहीं होता जो दीन आत्मा का होता है।
और वह मेम्नेतुल्य, कबूतरतुल्य आत्मा, जिसका उल्लेख किया जा चुका है, जो सब अनुग्रहमय मनोभावों के साथ रहती है, (जैसा प्रेरित रोमियों 13:8, 9, 10 और गलातियों 5:14 में बताता है) व्यवस्था की दूसरी पटिया के सब कर्तव्यों को पूरा करती है; जिनमें मसीही आचरण बहुत अंश तक निहित है, और जिनमें मसीहियत का बाह्य आचरण मुख्यतः निहित है।
और अनुग्रहमय मनोभावों के साथ वह कठोर, सर्वांगीण और निरन्तर आज्ञाकारिता क्यों रहती है जिसका उल्लेख किया जा चुका है, इसका कारण इससे भी स्पष्ट होता है जो देखा जा चुका है, कि सच्चे संतों के मनोभावों के साथ आत्मा की एक कोमलता रहती है, जो उनमें उत्पन्न करती है
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — नैतिक बुराई की उपस्थिति से पीड़ा का ऐसा तीव्र और सजीव बोध, और बुराई के आभास से ऐसा भय।
और मसीही आचरण, जो अनुग्रहमय मनोभावों से उत्पन्न होता है, सर्वांगीण, निरन्तर और स्थिर क्यों है, इसका एक बड़ा कारण इससे स्पष्ट होता है जो उन्हीं मनोभावों के विषय में देखा जा चुका है, जिनसे यह आचरण उत्पन्न होता है, कि वे मनोभाव स्वयं सब प्रकार के पवित्र अभ्यासों में, सब वस्तुओं के प्रति, और सब परिस्थितियों तथा सब ऋतुओं में, एक सुन्दर सामंजस्य और अनुपात के साथ सर्वांगीण और निरन्तर हैं।
और पवित्र मनोभाव पवित्र आचरण में ऐसी गम्भीरता, सक्रियता, तत्परता और दृढ़ता के साथ, जिसका उल्लेख किया जा चुका है, क्यों व्यक्त और प्रकट होते हैं, इसका बहुत कुछ कारण इससे स्पष्ट होता है जो देखा जा चुका है, कि धर्म में आगे की उपलब्धियों के लिए एक आत्मिक भूख और लालसा सच्चे मनोभाव के साथ सदैव बनी रहती है, और वह घटती नहीं, वरन जैसे-जैसे वे मनोभाव बढ़ते हैं, वैसे-वैसे बढ़ती जाती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि पवित्र मनोभावों की ऐसे मसीही आचरण की ओर प्रवृत्ति, जैसा समझाया जा चुका है, पवित्र मनोभाव की उन सब विशेषताओं में से प्रत्येक से कैसे स्पष्ट होती है जिनका उल्लेख पहले किया जा चुका है।
और इस बात को इससे और भी स्पष्ट और पुष्ट किया जा सकता है, यदि यह ध्यान में रखा जाए कि पवित्रशास्त्र धर्म में सच्चाई और खराई को बहुतायत से इसमें रखता है: परमेश्वर को अपने एकमात्र प्रभु और भाग के रूप में पूर्ण रूप से चुनने में, उसके लिए सब कुछ त्यागने में, और मोल आँकने के बाद परमेश्वर और मसीह के लिए इच्छा के पूर्ण निर्णय में; अपने हृदय के यीशु मसीह के धर्म को, उससे सम्बन्धित सब बातों सहित, अपनाने और उसके अनुरूप चलने में, उसकी सब कठिनाइयों सहित उसे ग्रहण करने में, मानो मसीह के लिए अपने अत्यन्त प्रिय सांसारिक सुखों से, वरन अपने ही जीवन से भी, बैर रखने में, अपने आपको, अपनी सब वस्तुओं सहित, सर्वथा और सदा के लिए मसीह को सौंप देने में, बिना कुछ रोके या कोई आरक्षण किए; अथवा, एक ही शब्द में, मसीह के लिए आत्म-त्याग के महान कर्तव्य में; अथवा अपने आपको नकारने में, अर्थात्, मानो उसके लिए अपने आपको त्यागने और अस्वीकार करने में, अपने आपको कुछ भी न बनाकर, कि वह सब कुछ हो। इस विषय के प्रमाण-वचन हाशिये में देखें।74 अब निश्चय ही मसीह के लिए सब कुछ त्यागने का मन रखना, जहाँ अवसर हो और परीक्षा हो, वास्तव में उसी के लिए सब कुछ त्यागने की ओर प्रवृत्त करता है। मसीह के लिए अपने आपको नकारने का मन रखना, जब मसीह और स्वार्थ आपस में स्पर्धा में हों, तब सचमुच अपने आपको नकारने की ओर प्रवृत्त करता है। अपने हृदय में, बिना कोई आरक्षण किए, अपने आपको अपनी सब वस्तुओं सहित सौंप देना, हमें सर्वांगीण रूप से उसी के समान, उसकी इच्छा के अधीन, और उसके उद्देश्यों के लिए समर्पित होकर आचरण करने की ओर प्रवृत्त करता है। हमारे हृदय का यीशु के धर्म को, उससे सम्बन्धित सब बातों सहित, और उसकी सब कठिनाइयों सहित, सोच-समझकर मोल आँकने के बाद, पूर्णतः अपनाना, कार्य और व्यवहार में उसी को सर्वांगीण रूप से अपनाने की, और धर्म के मार्ग में आनेवाली सब कठिनाइयों में से वास्तव में होकर जाने की, और इस प्रकार धीरज और दृढ़ता के साथ डटे रहने की ओर प्रवृत्त करता है।
74 मत्ती 5:29, 30; 6:24; 8:19-22; 4:18-22; 9:37, 38, 39; 13:44, 45, 46; 16:24, 25, 26; 18:8, 9; 19:21, 27, 28, 29; 10:42; 12:33, 34; 14:16-20, 25-33; 16:13; प्रेरितों के काम
4:34, 35, तथा 5:1-11; रोमियों 6:3-8; गलातियों 2:20; 6:14; फिलिप्पियों 3:7।
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — हृदय में अनुग्रह की पवित्र आचरण की ओर प्रवृत्ति अत्यन्त सीधी है, और यह सम्बन्ध अत्यन्त स्वाभाविक, घनिष्ठ और अनिवार्य है। सच्चा अनुग्रह निष्क्रिय वस्तु नहीं है; स्वर्ग या पृथ्वी में इससे अधिक सक्रिय स्वभाव की कोई वस्तु नहीं, क्योंकि वह स्वयं जीवन है, और सबसे सक्रिय प्रकार का जीवन है, अर्थात् आत्मिक और दिव्य जीवन। यह निष्फल वस्तु नहीं है; सृष्टि में अपने स्वभाव में इससे अधिक फल की ओर प्रवृत्ति रखनेवाली कोई वस्तु नहीं। हृदय में भक्ति का आचरण से वैसा ही सीधा सम्बन्ध है जैसा सोते का धारा से, या सूर्य के प्रकाशमान स्वभाव का उससे निकलनेवाली किरणों से, या जीवन का श्वास लेने से, या नाड़ी की धड़कन से, या किसी अन्य प्राणसम्बन्धी क्रिया से; या जैसा किसी स्वभाव या क्रिया के सिद्धान्त का उस क्रिया से; क्योंकि यह अनुग्रह का ही यथार्थ स्वभाव और तात्पर्य है कि वह पवित्र क्रिया या आचरण का एक सिद्धान्त है। नया जन्म, जो परमेश्वर का वह कार्य है जिसमें अनुग्रह भरा जाता है, आचरण से सीधा सम्बन्ध रखता है; क्योंकि यही उसका यथार्थ उद्देश्य है, जिस दृष्टि से यह सम्पूर्ण कार्य किया जाता है; प्राण में किए गए इस महान और बहुविध परिवर्तन में सब कुछ इस उद्देश्य की ओर सीधे प्रवृत्त होने के लिए योजित और गढ़ा गया है। इफिसियों 2:10, "क्योंकि हम उसी के बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में भले कामों के लिये सृजे गए हैं।" हाँ, यही मसीह के छुटकारे का यथार्थ उद्देश्य भी है: तीतुस 2:14, "जिस ने अपने आप को हमारे लिये दे दिया, कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ाए, और शुद्ध करके अपने लिये एक ऐसी विशेष प्रजा बनाए जो भले कामों में सरगर्म हो।" इफिसियों 1:4, "जैसा उस ने जगत की उत्पत्ति से पहिले मसीह में हमें चुन लिया, कि हम प्रेम में उसके सामने पवित्र और निर्दोष ठहरें।" 2:10, "भले कामों के लिये सृजे गए हैं, जिन्हें परमेश्वर ने पहिले से हमारे लिये ठहराया था, कि हम उनमें चलें।" पवित्र आचरण उतना ही परमेश्वर के अपने संतों के विषय किए गए सब कार्य का उद्देश्य है, जितना फल किसान के अपने खेत या दाख की बारी की बढ़ोतरी के विषय किए गए सब कार्य का उद्देश्य है; जैसा यह बात पवित्रशास्त्र में बार-बार दर्शाई गई है, मत्ती 3:10, अध्याय 13:8,
23, 30, 38, अध्याय 21:19, 33, 34, लूका 13:6, यूहन्ना 15:1, 2, 4, 5, 6, 8, 1 कुरिन्थियों 3:9, इब्रानियों 6:7, 8, यशायाह
5:1-8, श्रेष्ठगीत 8:11, 12, यशायाह 27:2, 3।75 और इसलिए एक सच्चे मसीही में सब कुछ इसी उद्देश्य तक पहुँचने के लिए योजित है। पवित्र आचरण का यह फल वही है जिसकी ओर हर अनुग्रह, हर प्रकाशन, और मसीही अनुभव से सम्बन्धित हर एक वस्तु की सीधी प्रवृत्ति है।
सच्चे संतों में मसीही सिद्धान्त और अंगीकार का उनके जीवन में पवित्र आचरण के फल के साथ जो निरन्तर और अटूट सम्बन्ध है, वह पुराने समय में मन्दिर की सोने की दीवट की बनावट में चिन्हित किया गया था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह सोने की दीवट, अपनी सात शाखाओं और सात दीपकों सहित, मसीह की कलीसिया का एक प्रतिरूप थी।
पवित्र आत्मा ने स्वयं यह उचित समझा कि इस बात को सन्देह से परे रखे, अपनी कलीसिया को ऐसी सोने की दीवट, सात दीपकों सहित, द्वारा दर्शाकर, चौथे अध्याय में — 75 "बहुत जानने का दावा करना सहज है; परन्तु अपने मनोभावों को अधीन करना, वासनाओं से जूझना, हर अवसर पर अपनी इच्छाओं और अपने आपको काटना, यह कठिन है। प्रभु यह देखता है कि हमारे जीवन में हम उसके और मनुष्यों के लिए उपयोगी हों। जो भीतर है, उससे प्रभु और हमारे भाई कभी लाभान्वित नहीं होते: परन्तु उससे उत्पन्न होनेवाली बाहरी आज्ञाकारिता परमेश्वर की महिमा करती है, और मनुष्यों का भला करती है। प्रभु यही चाहता है कि यह किया जाए। हमारे रोपने और सींचने का और क्या उद्देश्य है, सिवाय इसके कि वृक्ष रस से भर जाएँ? और उस रस का क्या उद्देश्य है, सिवाय इसके कि वृक्ष फल लाएँ? किसान को पत्तों और निष्फल वृक्षों से क्या सरोकार?" डॉ. प्रेस्टन, चर्च्स कैरिज।
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — जकर्याह की, और एशिया की सात कलीसियाओं को सात सोने की दीवटों द्वारा दर्शाकर, प्रकाशितवाक्य के पहले अध्याय में। मन्दिर की वह सोने की दीवट अपनी सम्पूर्ण बनावट में सर्वत्र गोलों और फूलों से बनी थी: निर्गमन 25:31 से अन्त तक, और अध्याय 37:17-24। जिस शब्द का अनुवाद "गोल" किया गया है, वह मूल भाषा में सेब या अनार का अर्थ रखता है।
एक गोल और एक फूल था, एक गोल और एक फूल: जहाँ कहीं फूल था, वहाँ उसके साथ एक सेब या अनार भी था: फूल और फल सदैव, बिना चूके, जुड़े हुए थे। फूल में फल का सिद्धान्त और उसकी एक सुन्दर, आशाजनक झलक निहित थी; और यह कभी भी छलपूर्ण झलक नहीं थी; फल के सिद्धान्त या स्वरूप के साथ सदैव वास्तविक फल भी रहता था, या उसके पश्चात आता था। कलीसिया में भी ऐसा ही है: हृदय में अनुग्रह में फल का सिद्धान्त है; और दीवट के खुले फूलों द्वारा दर्शाया गया एक मनोहर अंगीकार है; और इस सिद्धान्त और अंगीकार के साथ पवित्र आचरण में तदनुरूप फल सदैव बना रहता है। सोने के सेबों और फूलों से बनी सोने की दीवट की हर शाखा, अपने ऊपर एक जलते, चमकते दीपक से सुशोभित थी। क्योंकि इसी माध्यम से संत जगत में ज्योतियों के समान चमकते हैं, अर्थात् धर्म का एक निर्मल और भला अंगीकार करके, और अपने अंगीकार को सदैव आचरण के तदनुरूप फल के साथ जोड़कर: जैसा हमारे उद्धारकर्ता का वह वचन कहता है, मत्ती 5:15, 16, "और लोग दीया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं, परन्तु दीवट पर रखते हैं; तब वह घर भर के लोगों को उजियाला देता है। इसी रीति से तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने चमके, कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे स्वर्गीय पिता की महिमा करें।" एक निर्मल और सुन्दर अंगीकार, और उसके साथ रहनेवाले सोने के फल, मसीह की सच्ची कलीसिया के मनोहर आभूषण हैं। इसलिए हम पाते हैं कि सेब और फूल न केवल मन्दिर की दीवटों के, वरन स्वयं मन्दिर के भी आभूषण थे, जो कलीसिया का एक प्रतिरूप है; जिसके विषय प्रेरित हमें बताता है कि वह "जीवते परमेश्वर का मन्दिर" है। देखें 1 राजा 6:18: "और भवन के भीतर देवदार की लकड़ी पर कलियां और खिले हुए फूल खुदे हुए थे।" मन्दिर के द्वार पर के खम्भों के आभूषण और शिखर भी उसी प्रकार के थे: वे सोसन के फूल और अनार, अर्थात् फूल और फल मिले-जुले हुए थे,
1 राजा 7:18, 19। ऐसा ही उन सबके साथ है जो "परमेश्वर के मन्दिर में खम्भों के समान" हैं, "जो फिर कभी बाहर नहीं निकलेंगे," अर्थात् घुसपैठियों के समान कभी बाहर नहीं निकाले जाएँगे; जैसा सब सच्चे संतों के साथ है: प्रकाशितवाक्य 3:12, "जो जय पाए, उसको मैं अपने परमेश्वर के मन्दिर में खम्भा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा।"
लगभग यही बात हारून, महायाजक, के वस्त्र अर्थात् एपोद के दामन पर के आभूषणों द्वारा भी दर्शाई गई प्रतीत होती है; जो सोने की घंटियाँ और अनार थे।—यह स्पष्ट है कि हारून के वस्त्र के ये दामन कलीसिया, या संतों को (जो मानो मसीह का वस्त्र हैं) दर्शाते हैं; क्योंकि उनके विषय स्पष्ट रूप से यह कहा गया है, भजन संहिता 133:1, 2: "देखो, भाइयों का एका होकर रहना क्या ही भला और मनोहर है! यह उस उत्तम तेल के समान है, जो सिर पर डाला गया, और दाढ़ी पर, हाँ, हारून की दाढ़ी पर, चूता हुआ उसके वस्त्र के दामन तक पहुँचा।" हारून का वह एपोद हमारे महान महायाजक मसीह के बिना सीवन के वस्त्र के समान ही बात दर्शाता था। जैसे मसीह के वस्त्र में कोई सीवन नहीं थी, वरन वह ऊपर से नीचे तक बुना हुआ था, वैसे ही एपोद के साथ था, निर्गमन 29:22। जैसे परमेश्वर ने अपने विधान में यह ध्यान रखा कि मसीह का वस्त्र फटे नहीं; वैसे ही परमेश्वर ने विशेष रूप से यह ध्यान रखा कि एपोद भी न
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — फटे, निर्गमन 28:32, और अध्याय 39:23। इस एपोद पर की सोने की घंटियाँ, अपने बहुमूल्य पदार्थ और मनोहर ध्वनि के द्वारा, संतों के भले अंगीकार को भली-भाँति दर्शाती हैं; और अनार उस फल को जो वे लाते हैं। और जैसे एपोद के दामन में घंटियाँ और अनार सदैव जुड़ी हुई थीं, जैसा बार-बार देखा गया है, एक सोने की घंटी और एक अनार, एक सोने की घंटी और एक अनार, निर्गमन 28:34, और अध्याय 39:26, वैसे ही सच्चे संतों में है; उनका भला अंगीकार और उनका भला फल सदैव एक दूसरे के साथ रहते हैं: वे जीवन में जो फल लाते हैं, वह सदैव उनके अंगीकार की मनोहर ध्वनि के अनुरूप होता है।
फिर, मसीह द्वारा अपनी दुल्हन के वर्णन में भी ठीक यही बात दर्शाई गई है, श्रेष्ठगीत 7:2: "तेरा पेट गेहूँ के ढेर के समान है, जो सोसन के फूलों से घिरा हो।" यहाँ भी सुन्दर फूल और भला फल एक दूसरे के साथ हैं। सोसन के फूल सुन्दर और मनोहर फूल थे, और गेहूँ भला फल था।
जैसे मसीही आचरण का यह फल सच्चे संतों में, जैसा उन्हें अवसर और परीक्षा मिलती है, सदैव पाया जाता है, वैसे ही यह केवल उन्हीं में पाया जाता है; सच्चे मसीहियों को छोड़ कोई भी ऐसा आज्ञाकारी जीवन नहीं जीता, अपने कर्तव्य के प्रति इतना सर्वांगीण रूप से समर्पित, और मसीही होने के व्यवसाय के लिए इतना सौंपा हुआ, जैसा समझाया जा चुका है। सब अपवित्र मनुष्य अधर्म के करनेवाले हैं: वे अपने पिता शैतान के हैं, और अपने पिता की वासनाओं को ही वे पूरा करेंगे। ऐसा कोई कपटी नहीं जो धर्म के व्यवसाय को पूरा करेगा, और आरम्भ से अन्त तक उस यात्रा को समाप्त करेगा: वे उन परीक्षाओं को सहन नहीं करेंगे जिन्हें परमेश्वर धर्म के अंगीकार करनेवालों पर लाया करता है, वरन अपने टेढ़े मार्गों की ओर मुड़ जाएँगे: वे अपने आचरण में मसीह के प्रति पूर्णतः विश्वासयोग्य नहीं रहेंगे, और वह जहाँ कहीं भी जाए, उसका अनुसरण नहीं करेंगे। धर्म में वे चाहे किसी भी सीमा तक क्यों न चले जाएँ, और चाहे वे कुछ समय के लिए अत्यन्त कठोर और परमेश्वर की सेवा में बहुत संलग्न प्रतीत हों; तौभी वे पाप के दास हैं: उनके पुराने स्वामियों की बेड़ियाँ टूटी नहीं हैं: उनकी वासनाओं का उनके हृदयों पर अब भी शासक सामर्थ्य है; और इसलिए वे फिर इन्हीं स्वामियों के आगे झुक जाएँगे।76 दानिय्येल 12:10, "बहुतेरे अपने आप को शुद्ध करेंगे, और उजले किए जाएँगे, और परखे जाएँगे; परन्तु दुष्ट लोग दुष्टता ही करते रहेंगे; और दुष्टों में से कोई भी न समझेगा।" यशायाह 26:10,
"दुष्ट पर अनुग्रह किया जाए, तौभी वह धर्म को नहीं सीखता; सिधाई के देश में वह कुटिलता करता है।" यशायाह 35:8, "और वहाँ एक राजमार्ग होगा, और एक मार्ग, और वह पवित्रता का मार्ग कहलाएगा; अशुद्ध उस पर होकर न चलेगा।" होशे 14:9, "यहोवा के मार्ग सीधे हैं, और धर्मी उनमें चलते हैं, परन्तु अपराधी उनमें ठोकर खाकर गिरते हैं।"
अय्यूब 27:8, 9, 10, "क्योंकि जब परमेश्वर उसके प्राण ले लेता है, तब भक्तिहीन मनुष्य की क्या आशा रह जाती है, चाहे उसने कुछ भी प्राप्त किया हो? क्या वह सर्वशक्तिमान में आनन्दित होगा?
क्या वह सदैव परमेश्वर को पुकारेगा?" कोई अपवित्र मनुष्य अपने पाप को छिपा सकता है, और अनेक बातों में, तथा कुछ समय के लिए, पाप से रुक सकता है; परन्तु उसे अन्ततः अपने
76 कोई भी बिना नया जन्म पाया हुआ मनुष्य, चाहे वह कितनी ही दूर तक क्यों न चला जाए, चाहे वह कितना ही कुछ क्यों न करे, फिर भी वह किसी न किसी पाप में जीता है, गुप्त हो या प्रगट, छोटा हो या बड़ा। यहूदा बहुत दूर तक गया, परन्तु वह लोभी था; हेरोदेस बहुत दूर तक गया, परन्तु वह अपनी
हेरोदियास से प्रेम करता था। हर कुत्ते का अपना घर होता है, हर सूअर का अपना जूठन होता है; और हर दुष्ट मनुष्य की अपनी वासना होती है।" शेपर्ड्स सिनसियर कनवर्ट, प्रथम संस्करण, पृष्ठ 96।
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — पाप को त्यागने, और उसे त्याग-पत्र देने के लिए नहीं ला सकता; पाप उसे इतना प्रिय है कि वह इसके लिए इच्छुक नहीं हो सकता:
"यद्यपि बुराई उसे मुँह में मीठी लगती है, और वह उसे अपनी जीभ के नीचे छिपा रखता है, उसे बचाए रखता है, और छोड़ता नहीं, वरन उसे अपने मुँह ही में रखे रहता है," अय्यूब 20:12, 13। इसी में मुख्यतः उस फाटक की सँकराई, और उस मार्ग की तंगी निहित है, जो जीवन की ओर ले जाता है; जिसके कारण शारीरिक मनुष्य उसमें प्रवेश नहीं करना चाहते, अर्थात् यह कि वह सब भक्तिहीनता को पूर्णतः नकारने और अन्ततः त्यागने का मार्ग है, और इस प्रकार आत्म-त्याग या आत्म-अस्वीकृति का मार्ग है।
बहुत से स्वाभाविक मनुष्य, उन साधनों के अधीन जो उन पर प्रयोग किए जाते हैं, और परमेश्वर के उन प्रयत्नों के अधीन जिनसे वह उन्हें उनके पापों को त्यागने के लिए लाना चाहता है, अपने पापों के साथ वैसा ही करते हैं जैसा फिरौन ने अपने अहंकार और लोभ के साथ किया, जिन्हें वह इस्राएलियों को दासत्व में रखकर सन्तुष्ट करता था, जब परमेश्वर उससे प्रयत्न कर रहा था कि वह प्रजा को जाने दे। जब परमेश्वर का हाथ फिरौन पर भारी पड़ा, और वह परमेश्वर के आनेवाले क्रोध के भय से व्याकुल हुआ, तब उसने प्रजा को जाने देने के कुछ विचार किए, और वादा किया कि वह ऐसा करेगा; परन्तु जब वह देखता कि राहत मिली है, तो वह बार-बार अपने वादे तोड़ देता था। जब परमेश्वर ने मिस्र को गरज और बिजली से भर दिया, और आग भूमि पर दौड़ने लगी, तब फिरौन प्रत्यक्ष दीनता के साथ अपने पाप को मान लेने, और प्रजा को जाने देने का बड़ा संकल्प करने पर लाया गया। निर्गमन 9:27, 28, "तब फिरौन ने मूसा और हारून को बुलवाकर उनसे कहा, इस बार मैं ने पाप किया है; यहोवा धर्मी है, और मैं और मेरी प्रजा दुष्ट हैं। यहोवा से बिनती करो (क्योंकि बहुत हो चुका है) कि अब गरजना और ओले न पड़ें; तब मैं तुम्हें जाने दूँगा, और तुम फिर न रुकोगे।" इसी प्रकार पापी लोग कभी-कभी, गरज-बिजली और व्यवस्था के बड़े भय से, दीनता के एक प्रत्यक्ष कार्य पर, और दिखावे में अपने पापों को छोड़ने पर लाए जाते हैं; परन्तु उन्हें त्यागने की मनोवृत्ति पर उससे अधिक पूर्ण रूप से नहीं लाया जाता, जितना फिरौन प्रजा को जाने देने पर लाया गया था। फिरौन, अपने विवेक और अपनी वासनाओं के बीच के संघर्ष में, यह उपाय करना चाहता था कि परमेश्वर की सेवा भी हो जाए, और वह प्रजा की दासता से मिलनेवाली अपनी वासनाओं की तृप्ति भी भोगता रहे। मूसा ने आग्रह किया कि इस्राएल के परमेश्वर की सेवा और उसे बलिदान चढ़ाया जाना चाहिए: फिरौन इसके लिए सहमत होने को तैयार था; परन्तु चाहता था कि यह प्रजा से अलग हुए बिना हो: "जाकर अपने
परमेश्वर के लिये इसी देश में बलिदान चढ़ाओ," वह कहता है, निर्गमन 8:25। इसी प्रकार, बहुत से पापी यह उपाय करना चाहते हैं कि परमेश्वर की सेवा भी हो, और वे अपनी वासनाओं का भोग भी करते रहें। मूसा ने फिरौन के इस प्रस्ताव को मानने के विरुद्ध आपत्ति की, कि सेवा
परमेश्वर की, और साथ ही मिस्र में अपने कठोर स्वामियों के अधीन बने रहना, आपस में मेल नहीं खाता था, और एक दूसरे के विपरीत था (परमेश्वर की सेवा करना, और साथ ही परमेश्वर के ऐसे शत्रुओं के दास बने रहना, एक साथ सम्भव नहीं)। इसके बाद फिरौन प्रजा को जाने देने पर सहमत हुआ, बशर्ते कि वे दूर तक न जाएँ: वह उन्हें अन्ततः छोड़ने को तैयार नहीं था, और इसलिए उन्हें अपनी पहुँच के भीतर रखना चाहता था। बहुत से कपटी लोग भी अपने पापों के विषय में ऐसा ही करते हैं।—इसके बाद
फिरौन इस बात पर सहमत हुआ कि पुरुषों को जाने दे, यदि वे स्त्रियों और बालकों को छोड़ जाएँ, निर्गमन
10:8, 9, 10। और फिर उसके बाद, जब परमेश्वर का हाथ उस पर और भी भारी पड़ा, तब वह इस बात पर सहमत हुआ कि वे जाएँ, स्त्रियाँ और बालक भी, पुरुषों के साथ, बशर्ते कि वे अपने पशु पीछे छोड़ जाएँ! परन्तु वह इसके लिए तैयार नहीं था कि वे और उनका सब कुछ चला जाए, निर्गमन 10:24।
पापियों के साथ प्रायः ऐसा ही होता है; वे अपने कुछ पापों को छोड़ने को तैयार होते हैं, परन्तु सबको नहीं; वे पाप के अधिक घोर कार्यों को छोड़ने पर तो लाए जाते हैं, परन्तु — 12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — उनकी वासनाओं की छोटी-छोटी तृप्तियों को छोड़ने पर नहीं। जबकि हमें अपने सब पापों को, छोटे और बड़े, छोड़ना अवश्य है; और उनसे सम्बन्धित सब कुछ, पुरुष, स्त्रियाँ, बालक और पशु; उन्हें ऐसे जाने देना होगा, "अपने जवानों और बूढ़ों समेत, अपने बेटों और बेटियों समेत, अपनी भेड़-बकरियों और गाय-बैलों समेत, एक खुर भी पीछे नहीं छूटना चाहिए;" जैसा मूसा ने फिरौन से इस्राएलियों के विषय में कहा था। अन्ततः, जब बात चरम सीमा तक पहुँची, फिरौन प्रजा को, और उनके सब कुछ को, जाने देने पर सहमत हो गया; परन्तु वह इस विचार में स्थिर नहीं रहा, वह शीघ्र ही पछताया और फिर उनका पीछा करने लगा, और इसका कारण यह था कि अहंकार और लोभ की वे वासनाएँ, जो प्रजा पर फिरौन के प्रभुत्व और उनकी सेवा से मिलनेवाले लाभ से तृप्त होती थीं, उसमें कभी सचमुच मृत नहीं की गई थीं, वरन केवल बलपूर्वक रोकी गई थीं। और इस प्रकार, परमेश्वर की आज्ञाओं के प्रत्यक्ष पालन के बाद पीछे हट जाने का दोषी होकर, वह बिना किसी उपाय के नष्ट हो गया। इस प्रकार परमेश्वर की आज्ञाओं की अवज्ञा के मार्गों से बलपूर्वक अलग होना हो सकता है, जो थोड़े समय के लिए, जो कुछ प्रत्यक्ष होता है उसकी दृष्टि से, सर्वांगीण प्रतीत हो सकता है; परन्तु क्योंकि यह पाप के भीतरी सिद्धान्त को मृत किए बिना केवल एक बलपूर्वक क्रिया है, वे उसमें स्थिर नहीं रहेंगे; वरन कुत्ते के समान अपनी उलटी की ओर लौट आएँगे; और इस प्रकार अपने ऊपर भयानक और असाध्य विनाश ले आएँगे। मसीह के समय में बहुत से झूठे चेले थे, जो कुछ समय के लिए उसके पीछे चले; परन्तु उनमें से कोई भी अन्त तक उसके पीछे नहीं चला; वरन किसी न किसी अवसर पर वे पीछे हट गए और फिर उसके साथ नहीं चले।77
जो कुछ कहा जा चुका है उससे यह स्पष्ट है, कि मसीही आचरण, या पवित्र जीवन, सच्चे और उद्धारक अनुग्रह का एक महान और विशिष्ट चिन्ह है। परन्तु मैं इससे भी आगे जाकर यह कह सकता हूँ, कि यह अनुग्रह के सब चिन्हों में मुख्य है, दोनों ही रूप में — अंगीकार करनेवालों की सच्चाई के प्रमाण के रूप में दूसरों के लिए, और उनके अपने विवेक के लिए भी।
परन्तु फिर यह आवश्यक है कि इसे ठीक ढंग से समझा जाए, और यह भली-भाँति समझा और देखा जाए, कि किस अर्थ और रीति में मसीही आचरण अनुग्रह का सबसे बड़ा चिन्ह है। इसलिए इस विषय को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने के लिए, मैं विशेष रूप से और स्पष्टता से यह प्रमाणित करने का प्रयत्न करूँगा, कि मसीही आचरण वह मुख्य चिन्ह है जिससे मसीही अपनी और दूसरों की भक्ति की सच्चाई का न्याय करते हैं; साथ ही कुछ बातों पर भी ध्यान देते हुए, जिन्हें इस विषय की सही समझ के लिए विशेष रूप से नोट करना आवश्यक है।
77 "मूर्ख कुँवारियों का बनावटी और सामान्य अनुग्रह, गौरवपूर्ण अंगीकार के कुछ समय के बाद, निश्चय ही बुझ जाएगा और पूर्णतः समाप्त हो जाएगा। वह उपयोग में, चमकने में, और जलने में ही चुक जाता है—जो लोग सबसे आगे रहे हैं, वे ही क्षीण होते हैं: उनके वरदान क्षीण होते हैं, जीवन क्षीण होता है। अंगीकार के कुछ समय बाद ऐसा ही होता है: क्योंकि आरम्भ में वह क्षीण और मुरझाने के बजाय बढ़ता है, परन्तु बाद में जब उन्हें उसकी पर्याप्त मात्रा मिल चुकी होती है, तो वह मुरझा जाता है और मर जाता है। परमेश्वर का आत्मा बहुत से कपटियों पर जागृति के अनुग्रह की भरपूर और प्रचुर मात्रा में उतरता है: वह उन पर वैसे ही उतरता है जैसे बिलाम पर उतरा था, और जैसे उमड़ते हुए जल में होता है, जो दूर तक फैलता है, और बहुत गहरा हो जाता है, और बहुत से खाली स्थानों को भर देता है। यद्यपि वह उन पर इस प्रकार उतरता है, तौभी वह कभी भीतर स्थिर होकर नहीं टिकता, कि वहाँ अपने लिए एक अनन्त निवास बना ले।—इसलिए वह थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होता जाता है, यहाँ तक कि अन्ततः पूर्णतः समाप्त हो जाता है। जैसे वर्षा के जल से भरे तालाब, जो उन पर आ पड़ता है; न कि सोते का जल, जो उनके भीतर से उठता है; वह थोड़ा-थोड़ा करके सूखता जाता है, यहाँ तक कि पूर्णतः सूख जाता है।" शेपर्ड्स पैरेबल, भाग 2, पृष्ठ 58, 59।
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — 1. मैं सबसे पहले मसीही आचरण और पवित्र जीवन पर विचार करूँगा, एक अंगीकार करनेवाले मसीही की सच्चाई के प्रकाशन और चिन्ह के रूप में, उसके पड़ोसियों और भाइयों की दृष्टि में।
और इस दृष्टि से यह अनुग्रह का मुख्य चिन्ह है, यह परमेश्वर के वचन से अत्यन्त स्पष्ट है। मसीह, जो दूसरों का न्याय करने के लिए हमें नियम देना सबसे भली-भाँति जानता था, ने बार-बार दोहराकर और मन में बिठाकर यह सिखाया कि हम उन्हें उनके फलों से पहचानें: मत्ती 7:16, "उनके फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे।" और फिर, इस बात पर तर्क करने के बाद, और स्पष्ट कारण देने के बाद कि क्यों मनुष्यों के फल ही यह जानने का मुख्य प्रमाण होने चाहिए कि वे किस प्रकार के हैं, अगली आयतों में, वह इस दावे को दोहराकर समाप्त करता है, आयत 20, "इसलिये तुम उन्हें उनके फलों ही से पहचान लोगे।"
फिर, अध्याय 12:33, "या तो पेड़ को अच्छा कहो और उसके फल को भी अच्छा; या पेड़ को निकम्मा कहो, और उसके फल को भी निकम्मा।" मानो यह कहना हो, कि यह मान लेना अत्यन्त निरर्थक बात है कि पेड़ अच्छा है परन्तु फल बुरा है, कि पेड़ एक प्रकार का है और फल दूसरे प्रकार का; क्योंकि पेड़ के स्वभाव का उचित प्रमाण उसका फल ही है। उस आयत के अन्तिम वाक्यांश, "क्योंकि पेड़ अपने फल ही से पहचाना जाता है," का इससे अधिक और कुछ अर्थ नहीं हो सकता, सिवाय इसके कि पेड़ मुख्यतः अपने फल से ही पहचाना जाता है, कि यही वह मुख्य और सबसे उचित परख है जिससे एक पेड़ दूसरे से अलग पहचाना जाता है। वैसे ही लूका 6:44, "हर एक पेड़ अपने फल ही से पहचाना जाता है।" मसीह कहीं भी यह नहीं कहता, कि तुम पेड़ को उसकी पत्तियों या फूलों से पहचानोगे, या तुम मनुष्यों को उनकी बातों से पहचानोगे, या तुम उन्हें उनके अनुभवों की भली कहानी से पहचानोगे, या तुम उन्हें उनके बोलने के ढंग और भाव-भंगिमा से, और उनकी अभिव्यक्ति के बल और करुणा से पहचानोगे, या उनके भावुकतापूर्वक बोलने से, या बहुत अधिक बातचीत द्वारा बड़ा दिखावा करने से, या बहुत आँसुओं और स्नेहपूर्ण शब्दों से, या अपने मन में उनके प्रति जो स्नेह तुम अनुभव करते हो उससे; परन्तु उनके फलों ही से तुम उन्हें पहचानोगे; पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है; हर एक पेड़ अपने ही फल से पहचाना जाता है। और जैसे यह वह प्रमाण है जिसे मसीह ने दूसरों के विषय में, उनका न्याय करते समय, मुख्यतः देखने के लिए हमें निर्देश दिया है, वैसे ही यह वह प्रमाण भी है जिसे मसीह ने मुख्यतः दूसरों को देने के लिए हमें निर्देश दिया है, जिससे वे हमारा न्याय कर सकें: मत्ती 5:16, "तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने ऐसा चमके, कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे स्वर्गीय पिता की महिमा करें।" यहाँ मसीह हमें निर्देश देता है कि हम अपनी भक्ति को दूसरों के सामने प्रकट करें। भक्ति मानो प्राण में चमकनेवाली एक ज्योति है। मसीह निर्देश देता है कि यह ज्योति न केवल भीतर चमके, वरन मनुष्यों के सामने बाहर भी चमके, कि वे उसे देख सकें। परन्तु यह किस रीति से होगा? यह हमारे भले कामों से होगा। मसीह यह नहीं कहता, कि दूसरे तुम्हारे भले कामों को सुनकर, या तुम्हारी भली कहानी, या तुम्हारे करुणापूर्ण शब्दों को सुनकर; परन्तु "दूसरे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे स्वर्गीय पिता की महिमा करें।"
निःसन्देह, जब मसीह हमें यह नियम देता है कि हम अपनी ज्योति को कैसे चमकाएँ, कि दूसरों को इसका प्रमाण मिल सके, तो उसका नियम सबसे उत्तम है जो पाया जा सकता है। और प्रेरितगण मसीही आचरण का उल्लेख लोगों को सच्चे मसीही मानने के अपने आदर के मुख्य आधार के रूप में करते हैं। जैसे प्रेरित
पौलुस, इब्रानियों के छठे अध्याय में। वहाँ प्रेरित, अध्याय के आरम्भ में, उन लोगों की बात करता है जिन्हें बड़ी सामान्य प्रकाशिति प्राप्त हुई है, जो "प्रकाशित हो चुके हैं, और स्वर्गीय वरदान का स्वाद चख चुके हैं, और पवित्र आत्मा के सहभागी बन चुके हैं, और परमेश्वर के उत्तम वचन का, और आनेवाले युग की सामर्थ्यों का स्वाद चख चुके हैं," जो बाद में भटक जाते हैं, और उस बंजर भूमि के समान हो जाते हैं, जो शाप के निकट है, और जिसका अन्त जलाया जाना है; और फिर तुरन्त — 12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — 9वीं आयत में यह जोड़ता है (मसीही इब्रानियों के प्रति अपनी कृपादृष्टि व्यक्त करते हुए, कि उनमें वह उद्धारक अनुग्रह है, जो इन सब सामान्य प्रकाशितियों से उत्तम है), "परन्तु हे प्रियो, यद्यपि हम इस प्रकार बोलते हैं, तौभी तुम्हारे विषय में हमें भरोसा है, कि तुम्हारी दशा उत्तम है, वरन उद्धार से भरी हुई है।" और फिर, अगली आयत में, वह उन्हें बताता है कि उसके मन में उनके विषय ऐसे भले विचार होने का क्या कारण था: वह यह नहीं कहता, कि यह इसलिए था कि उन्होंने उसे अपने प्राणों पर परमेश्वर के कार्य का भला वृत्तान्त दिया था, और अनुभव-सम्बन्धी बातें बहुत की थीं; परन्तु वह उनका कार्य और प्रेम का परिश्रम था; "क्योंकि परमेश्वर अन्यायी नहीं, कि तुम्हारे काम को, और उस प्रेम को भूल जाए, जो तुम ने उसके नाम के लिये दिखाया, कि तुम ने पवित्र लोगों की सेवा की, और अब तक करते हो।"
और वही प्रेरित आचरण में परमेश्वर की विश्वासयोग्य सेवा की बात करता है, इसके उचित प्रमाण के रूप में दूसरों के लिए कि मनुष्य मसीह से सबसे बढ़कर प्रेम रखते हैं, और उसके सम्मान को अपने निजी स्वार्थ से अधिक चाहते हैं:
फिलिप्पियों 2:21, 22, "क्योंकि सब अपने ही स्वार्थ की खोज में हैं, न कि यीशु मसीह की बातों की। परन्तु तुम उसकी परखी हुई खराई को जानते हो, कि जैसा पुत्र पिता के साथ सेवा करता है, वैसा ही उस ने मेरे साथ सुसमाचार के काम में सेवा की है।" इसी प्रकार प्रेरित यूहन्ना गयुस के विषय अपनी भली धारणा के आधार के रूप में यही बात कहता है, 3 यूहन्ना 3-6,
"क्योंकि जब भाइयों ने आकर तेरी उस सच्चाई की गवाही दी, जो तुझ में है, तो मैं बहुत आनन्दित हुआ।" परन्तु भाइयों ने गयुस में की सच्चाई की गवाही कैसे दी? और प्रेरित ने उसमें की सच्चाई का न्याय कैसे किया? यह इसलिए नहीं था कि उन्होंने गवाही दी कि उसने उन्हें अपने अनुभवों के चरणों का भला वृत्तान्त दिया था, और ऐसे बोला था मानो वह जो कह रहा है उसे अनुभव कर रहा हो, और उसकी भाषा ठीक एक मसीही की सी थी, वरन उन्होंने गवाही दी कि वह सच्चाई में चलता है; जैसा आगे लिखा है,
"कि तू सच्चाई में चलता है। मुझे इससे बढ़कर आनन्द नहीं होता, कि यह सुनूँ, कि मेरे बालक सच्चाई में चलते हैं। हे प्रिय, जो कुछ तू भाइयों और परदेशियों के लिये करता है, वह विश्वासयोग्यता से करता है; जिन्होंने कलीसिया के सामने तेरे प्रेम की गवाही दी है।" इस प्रकार प्रेरित यह स्पष्ट करता है कि भाइयों ने उसके सच्चाई में चलने की गवाही देते समय किस बात की गवाही दी थी। और प्रेरित इसी स्थान में, गयुस को यह नियम भी देता प्रतीत होता है कि वह दूसरों का न्याय कैसे करे; आयत 10 में, वह दियुत्रिफेस नामक एक व्यक्ति का उल्लेख करता है, जिसने भला आचरण नहीं किया, और दूसरों को अपने पीछे भटका लिया; और फिर 11वीं आयत में, वह गयुस को निर्देश देता है कि वह ऐसों से सावधान रहे, और उनका अनुसरण न करे; और उसे एक नियम देता है जिससे वह उन्हें पहचान सके, ठीक उसी नियम के अनुरूप जो मसीह ने पहले दिया था, "उनके फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे;" प्रेरित कहता है, "हे प्रिय, बुराई के नहीं परन्तु भलाई के अनुयायी हो। जो भला करता है, वह परमेश्वर की ओर से है; परन्तु जो बुरा करता है, उस ने परमेश्वर को नहीं देखा।" और मैं आगे यह भी देखना चाहूँगा, कि प्रेरित याकूब, अपने विश्वास और मसीहियत को अपने आचरण या कामों द्वारा दूसरों को दिखाने के इस मार्ग की, अपने विश्वास को कामों के बिना, या कामों के अतिरिक्त किसी अन्य मार्ग से दिखाने के साथ स्पष्ट रूप से तुलना करते हुए, स्पष्ट और भरपूर रूप से पहले को श्रेष्ठ मानता है: याकूब 2:18, "हाँ, कोई कह सकता है,
तुझे विश्वास है, और मुझे काम; तू अपना विश्वास बिना कामों के मुझे दिखा, और मैं अपना विश्वास कामों के द्वारा तुझे दिखाऊँगा।" कामों के बिना, या कामों से भिन्न किसी रीति से, अपने विश्वास का प्रकाशन, शब्दों में उसका प्रकाशन है, जिससे मनुष्य विश्वास का अंगीकार करता है। जैसा प्रेरित आयत 14 में कहता है, "हे मेरे भाइयो, यदि कोई कहे, कि मुझे विश्वास है, परन्तु उसके काम न हों, तो क्या लाभ?" इसलिए अपने पड़ोसी को यह दिखाने के दो मार्ग हैं कि हमारे हृदय में क्या है; एक हम जो कहते हैं उसके द्वारा, और दूसरा हम जो करते हैं उसके द्वारा। परन्तु प्रेरित दूसरे मार्ग को ही सबसे उत्तम प्रमाण मानकर भरपूर रूप से श्रेष्ठ ठहराता है।
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — अब निश्चय ही अपने विषय में शब्दों में दिए गए हमारे सब वृत्तान्त, यह कहना कि हमें विश्वास है, और हम मन फिराए हुए हैं, और यह बताना कि हमें विश्वास किस रीति से प्राप्त हुआ, और किन चरणों से होकर वह किया गया, और उसके साथ के प्रकाशन और अनुभव, ये सब अब भी केवल शब्दों द्वारा हमारे विश्वास का प्रकाशन ही हैं; यह केवल हमारे शब्दों द्वारा हमारे विश्वास को दिखाना है; जिसके विषय प्रेरित कहता है कि यह हमारे कामों द्वारा उसके प्रकाशन, और अपने कामों द्वारा विश्वास दिखाने से, बहुत कम है।
और जैसे पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से यह सिखाता है, कि आचरण अंगीकार करनेवाले मसीहियों की सच्चाई का सबसे उत्तम प्रमाण है; वैसे ही बुद्धि भी यही बात सिखाती है। बुद्धि दर्शाती है, कि मनुष्यों के कार्य उनके शब्दों से बढ़कर उनके मन के उत्तम और अधिक विश्वासयोग्य व्याख्याकार हैं। सब युगों और सब जातियों में सम्पूर्ण मानवजाति की सामान्य समझ उन्हें सिखाती है कि वे अन्य बातों में मनुष्यों के हृदयों का न्याय मुख्यतः उनके आचरण से करें; जैसे, कि कोई मनुष्य एक स्वामिभक्त प्रजाजन है, एक सच्चा प्रेमी है, एक आज्ञाकारी सन्तान है, या एक विश्वासयोग्य सेवक है। यदि कोई मनुष्य किसी दूसरे के प्रति बहुत अधिक प्रेम और मित्रता का अंगीकार करता है, तो बुद्धि सब मनुष्यों को सिखाती है, कि ऐसा अंगीकार उसके सच्चे और हार्दिक मित्र होने का उतना बड़ा प्रमाण नहीं है, जितना उसका कार्यों में मित्र प्रतीत होना; अर्थात् सम्पत्ति और विपत्ति दोनों में अपने मित्र के प्रति विश्वासयोग्य और स्थिर बने रहना, उसकी भलाई करने के लिए अपने आपको लगाने, अपने आपको नकारने, और अपने निजी हित में हानि सहने को तैयार रहना। एक बुद्धिमान मनुष्य मित्रता की सच्चाई के ऐसे प्रमाणों पर, हज़ार गम्भीर अंगीकारों और गम्भीर घोषणाओं, और शब्दों में मित्रता की अत्यन्त स्नेहपूर्ण अभिव्यक्तियों से कहीं अधिक, भरोसा करेगा। और उसी प्रकार का समान कारण है कि आचरण को भी इसके प्रति मित्रता का सबसे उत्तम प्रमाण माना जाए
मसीह के प्रति। बुद्धि वही कहती है जो मसीह ने यूहन्ना 14:21 में कहा, "जिसके पास मेरी आज्ञाएँ हैं और वह उन्हें मानता है, वही मुझसे प्रेम रखता है।" इस प्रकार यदि हम किसी मनुष्य को देखें, जो अपने जीवन के क्रम में मसीह का अनुसरण और अनुकरण करता प्रतीत होता है, और मसीह के सम्मान के लिए बड़े परिश्रम से अपने आपको लगाता और नकारता है, और जगत में उसके राज्य और हित को आगे बढ़ाता है; तो बुद्धि सिखाती है, कि यह मसीह के प्रति प्रेम का एक ऐसा प्रमाण है जिस पर अधिक भरोसा किया जा सकता है, बनिस्बत इसके कि कोई मनुष्य केवल यह कहे कि उसे मसीह से प्रेम है, और उसके प्रति प्रेम के अपने भीतरी अनुभवों को बताए, कि उसने कैसा प्रबल प्रेम अनुभव किया, और अमुक-अमुक समय पर उसका हृदय प्रेम में कैसे खिंच गया, जबकि उसके व्यवहार में मसीह का बहुत कम अनुकरण दिखाई देता है, और वह उसके लिए कुछ बड़ा करने में, या उसके राज्य को आगे बढ़ाने के लिए अपने मार्ग से हटने में, हिचकता प्रतीत होता है, वरन जब भी उसे मसीह के लिए अपने आपको नकारने के लिए बुलाया जाता है, तो वह अपने आपको बहाना देने में निपुण प्रतीत होता है। इसी प्रकार यदि कोई मनुष्य, अपने अनुभव बताते हुए, यह कहे कि उसने अपने हृदय को जगत से छुड़ाया हुआ पाया, और उसकी व्यर्थता देखी, यहाँ तक कि अमुक-अमुक समयों पर सब कुछ उसे व्यर्थ प्रतीत हुआ, और यह अंगीकार करे कि वह सब कुछ परमेश्वर को सौंप देता है, और स्वर्ग और पृथ्वी को इसका साक्षी बनाता है; परन्तु फिर भी अपने आचरण में जगत के पीछे प्रचण्डता से पड़ा रहे, और जो कुछ पाए उसे कसकर पकड़े रखे, और उसमें से अधिकांश को दान और धार्मिक कार्यों के लिए देने में अत्यन्त अनिच्छुक हो, मानो वह उसके हृदय के लहू के समान उससे निकलता हो। परन्तु एक और अंगीकार करनेवाला मसीही है, जो बहुत कुछ नहीं कहता, तौभी अपने व्यवहार में सब समयों में जगत को त्यागने के लिए तैयार दिखाई देता है, जब भी वह उसके कर्तव्य के मार्ग में आए, और धर्म और अपने साथी मनुष्यों की भलाई को आगे बढ़ाने के लिए किसी भी समय उसे त्यागने में स्वतन्त्र है। बुद्धि सिखाती है, कि दूसरा व्यक्ति — 12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल मसीही आचरण में प्रकट होता है — जगत से छुड़ाए गए हृदय का कहीं अधिक विश्वसनीय प्रकाशन देता है। और यदि कोई मनुष्य परमेश्वर और मनुष्यों के सामने दीनतापूर्वक चलता प्रतीत होता है, और उसकी बातचीत में एक टूटे हुए हृदय की सुगन्ध हो, और वह क्लेश में धीरजवन्त और परमेश्वर के प्रति समर्पित, और मनुष्यों के बीच नम्र व्यवहार करता प्रतीत हो; तो यह दीनता का एक उत्तम प्रमाण है, बनिस्बत इसके कि कोई व्यक्ति केवल यह बताए कि उसे अपनी अयोग्यता का कितना बड़ा बोध हुआ, कि वह कैसे धूल में पड़ा रहने पर लाया गया, और अपने आपसे पूर्णतः खाली हो गया, और अपने आपको कुछ भी नहीं और सर्वथा घिनौना और घृणित देखा आदि आदि, परन्तु फिर भी ऐसा व्यवहार करे मानो वह अपने आपको संतों में प्रथम और सबसे उत्तम मानता हो, और न्यायसंगत रूप से नगर के सब मसीहियों का प्रधान मानता हो, और अभिमानी, हठी, और थोड़े से भी विरोध या प्रतिवाद के प्रति असहनशील हो; ऐसी दशा में हम निश्चित हो सकते हैं, कि उस मनुष्य का आचरण उसके अंगीकार से उसके हृदय के निम्न स्थान से आता है। इसी प्रकार (अब और उदाहरण न देकर) यदि मसीहियत का कोई अंगीकार करनेवाला अपने व्यवहार में विपत्तिग्रस्त दूसरों के प्रति एक दयालु, कोमल आत्मा प्रकट करे, उनके साथ उनके बोझ उठाने को तैयार हो, उनके लिए अपनी सम्पत्ति व्यय करने को इच्छुक हो, और दूसरों के प्राणों और शरीरों की भलाई को आगे बढ़ाने के लिए अपने सांसारिक हित में अनेक असुविधाएँ सहने को तैयार हो; तो क्या यह मनुष्यों के प्रति प्रेम की आत्मा का, केवल यह बताने से कहीं अधिक विश्वसनीय प्रकाशन नहीं है कि उसने अमुक-अमुक समयों पर दूसरों के प्रति कैसा प्रेम अनुभव किया, कि उसे उनके प्राणों पर कैसी दया आई, कि उसका प्राण उनके लिए कैसे प्रसव-पीड़ा में था, और उसने अपने शत्रुओं के प्रति कैसा हार्दिक प्रेम और दया अनुभव की; जबकि अपने व्यवहार में वह एक अत्यन्त स्वार्थी आत्मा का प्रतीत होता है, संकीर्ण और कंजूस, सब कुछ अपने लिए और अपने पड़ोसियों के लिए कुछ भी नहीं, और सम्भवतः ईर्ष्यालु और झगड़ालू? भावावेश के आवेग में पड़े व्यक्ति यह सोच सकते हैं कि उनके हृदय में बड़ी बातों के लिए इच्छा है, कि वे बहुत कुछ करें और बहुत कुछ सहें, और इस प्रकार वे इसे अत्यन्त गम्भीरता और आत्मविश्वास से अंगीकार कर सकते हैं, जबकि वास्तव में उनके हृदय उससे बहुत दूर होते हैं। इस प्रकार अनेक लोगों ने अपने भावावेश के आवेगों में स्वयं को परमेश्वर की महिमा के लिए अनन्त काल तक दण्डित होने को इच्छुक समझा है। क्षणिक भावावेग सरलता से शब्द उत्पन्न करते हैं; और शब्द सस्ते हैं; और भक्ति को कार्यों की अपेक्षा शब्दों में बनावटी दिखाना कहीं अधिक सरल है। मसीही आचरण एक मूल्यवान, परिश्रमसाध्य वस्तु है। जो आत्म-त्याग मसीहियों से अपेक्षित है, और जो सँकरा मार्ग जीवन की ओर ले जाता है, वह शब्दों में नहीं, वरन आचरण में निहित है। कपटी लोग संतों के समान बातचीत करने पर तो कहीं अधिक सरलता से लाए जा सकते हैं, बनिस्बत संतों के समान आचरण करने पर।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि मसीही चालचलन ही एक अंगीकारी मसीही की सच्ची भक्ति का सबसे उत्तम चिन्ह अथवा प्रकटीकरण है, उसके पड़ोसियों की दृष्टि में।
परन्तु इस विषय को सही रीति से समझने के लिए निम्नलिखित बातों पर भली-भांति ध्यान दिया जाना चाहिए।
पहली बात, यह ध्यान देने योग्य है कि जब पवित्रशास्त्र मसीही चालचलन को दूसरों के लिए अनुग्रह की सच्चाई और निष्कपटता का सबसे उत्तम प्रमाण कहता है, तो इसमें मसीही होने का अंगीकार बाहर नहीं किया गया, वरन उसे पहले से मान लिया गया है। ऊपर बताए गए नियम मसीह के अनुयायियों को इसलिए दिए गए थे कि वे अंगीकारी मसीहियों के विषय में, और उन लोगों के विषय में जो अपने आप को उनकी संगति में सम्मिलित होने के लिए प्रस्तुत करते थे, अपने विचारों में उनका मार्गदर्शन कर सकें, जिससे वे उनके दावों की सच्चाई और उनके किए गए अंगीकार की निष्कपटता को परख सकें; न कि उन अन्यजातियों की परीक्षा के लिए, जो मसीही होने का कोई दावा नहीं करते थे, और जिनसे मसीहियों को कुछ लेना-देना न था। यह उस महान नियम में जितना स्पष्ट हो सकता है उतना ही स्पष्ट है, जो मसीह मत्ती के सातवें अध्याय में देता है, "उनके फलों से तुम
उन्हें पहचान लोगे।" वहां वह यह बताता है कि जो लोग मसीही होने का दावा करते हैं, वरन जो बहुत ऊंचा अंगीकार करते हैं, उन झूठे भविष्यद्वक्ताओं को, "जो भेड़ के भेस में" आते हैं, कैसे परखा जाए, जैसा कि पद
15 में कहा गया है। इसी प्रकार प्रेरित याकूब के वचन, याकूब 2:18 में भी है, "अपना विश्वास कर्मों बिना मुझे दिखा, और मैं अपने कर्मों से तुझे अपना विश्वास दिखाऊंगा।" यह स्पष्ट है कि ये दोनों प्रकार के लोग, जो अपने विश्वास के ये भिन्न-भिन्न प्रमाण देने की पेशकश करते हैं, विश्वास के अंगीकारी हैं: यह बात इसी में निहित है कि वे दोनों अपने अंगीकार किए हुए विश्वास के प्रमाण देने की पेशकश करते हैं। और पिछली आयतों से यह स्पष्ट है कि प्रेरित यीशु
मसीह में विश्वास करनेवाले अंगीकारियों की ही बात कर रहा है। इसलिए यह अत्यन्त स्पष्ट है कि प्रेरित यूहन्ना भी, अपनी तीसरी पत्री में जिन वचनों पर ध्यान दिया गया है, उनमें अंगीकारी मसीहियों की ही बात कर रहा है। यद्यपि इन नियमों में अंगीकारियों के मसीही चालचलन को उनके अंगीकार की निष्कपटता का सबसे बड़ा और सबसे विशिष्ट चिन्ह कहा गया है, जो उनके निरे अंगीकार से कहीं अधिक प्रमाणकारी है; तौभी मसीही होने का अंगीकार स्पष्ट रूप से पहले से मान लिया गया है: वह प्रमाण में मुख्य वस्तु नहीं है, न ही उसमें कुछ विशिष्ट है; तौभी वह प्रमाण में एक अनिवार्य और आवश्यक वस्तु है। जैसे प्राणी की देह का होना मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करनेवाली कोई विशिष्ट बात नहीं है, और न ही वह मानवता के प्रमाण में मुख्य वस्तु है, तौभी वह उस प्रमाण में एक अनिवार्य और आवश्यक वस्तु है।
इसलिए यदि कोई मनुष्य स्पष्ट रूप से यह कहे कि वह मसीही नहीं है, और यह विश्वास नहीं करता कि यीशु परमेश्वर का पुत्र, अथवा परमेश्वर का भेजा हुआ पुरुष है; तो मसीह और उसके प्रेरितों के ये नियम हमें कदापि यह बाध्य नहीं करते कि हम उसे निष्कपट मसीही समझें, चाहे उसका दृश्य चालचलन और सद्गुण कैसे भी क्यों न हों। और ये नियम केवल उस मनुष्य के सम्बन्ध में ही निरर्थक नहीं हैं जो स्पष्ट रूप से मसीही धर्म को नकारता है, और खुलकर ईश्वरवादी, यहूदी, अन्यजाति, अथवा प्रकट नास्तिक है; वरन उस मनुष्य के सम्बन्ध में भी जो केवल मसीही होने का अंगीकार करने से बचता है; क्योंकि ये नियम हमें केवल अंगीकारी मसीहियों को परखने के लिए दिए गए हैं: फलों को खुले हुए फूलों के साथ जुड़ा होना चाहिए; घंटियां और अनार साथ-साथ चलते हैं।
परन्तु यहां स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है, अर्थात, कब किसी मनुष्य के विषय में कहा जा सकता है कि वह मसीही होने का अंगीकार करता है, अथवा किस अंगीकार को उचित रीति से मसीही होने का अंगीकार कहा जा सकता है?
मैं इसका उत्तर दो बातों में देता हूं।
1. इसके लिए कि किसी मनुष्य के विषय में उचित रीति से कहा जा सके कि वह मसीही होने का अंगीकार करता है, निःसन्देह उन सब बातों का अंगीकार होना आवश्यक है जो उसके मसीही होने के लिए अनिवार्य हैं, अर्थात जो मसीही धर्म के सार से सम्बन्ध रखती हैं। मसीही धर्म में जो कुछ भी सारभूत है, उसका अंगीकार मसीही धर्म के अंगीकार में सारभूत है। अंगीकार उसी वस्तु का होना चाहिए जिसका अंगीकार किया जा रहा है। किसी मनुष्य के लिए मसीही धर्म का अंगीकार करना, यह घोषित करना है कि उसके पास वह है। और इसलिए किसी वस्तु से जितना सम्बन्ध रखनेवाली बात उसे सचमुच उस वस्तु का नाम दिए जाने के लिए आवश्यक होती है, उतनी ही बात उस वस्तु की घोषणा के लिए सारभूत होती है, ताकि उसे सचमुच उस वस्तु की घोषणा का नाम दिया जा सके — यदि हम मसीही धर्म का केवल एक भाग लें, और उसका वह भाग छोड़ दें जो उसके लिए सारभूत है, तो जो हमने लिया वह मसीही धर्म नहीं है; क्योंकि उसमें वह वस्तु नहीं है जो उसके सार से है। इसी प्रकार यदि हम केवल एक भाग का अंगीकार करें, और वह भाग छोड़ दें जो सारभूत है, तो जिसका हम अंगीकार करते हैं वह मसीही धर्म नहीं है। इस प्रकार, मसीही धर्म के अंगीकार के लिए, हमें यह अंगीकार करना चाहिए कि हम विश्वास करते हैं कि यीशु ही मसीह है, इस कारण, क्योंकि
ऐसा विश्वास मसीही धर्म के लिए सारभूत है। और इसी प्रकार हमें, चाहे स्पष्ट रूप से या अन्तर्निहित रीति से, यह अंगीकार करना चाहिए कि यीशु ने हमारे पापों का प्रायश्चित किया, और सुसमाचार की अन्य सारभूत शिक्षाओं का भी, क्योंकि इन बातों पर विश्वास करना भी मसीही धर्म के लिए सारभूत है। परन्तु धर्म के लिए शुद्ध सिद्धान्त पर विश्वास जितनी ही अन्य बातें भी सारभूत हैं; इसलिए यह उतना ही आवश्यक है कि हम उनका भी अंगीकार करें, ताकि सच में हमारे विषय में कहा जा सके कि हम मसीही धर्म का अंगीकार करते हैं। इस प्रकार मसीही धर्म के लिए यह सारभूत है कि हम अपने पापों से पश्चाताप करें, कि हम अपनी पापिष्ठता का बोध रखें, और यह अनुभव करें कि हमने परमेश्वर के क्रोध के योग्य होकर अपने आप को उचित रीति से उसके अधीन कर दिया है, और यह कि हमारे हृदय सारे पाप को त्याग दें, और यह कि हम अपने सम्पूर्ण हृदय से मसीह को अपने एकमात्र उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करें; और यह कि हम उससे सब कुछ से बढ़कर प्रेम रखें, और उसके लिए सब कुछ त्यागने को तैयार रहें, और यह कि हम अपने आप को सर्वदा और सम्पूर्ण रीति से उसी का होने के लिए सौंप दें, इत्यादि। ये बातें मसीही धर्म के सार से उतनी ही सम्बन्धित हैं, जितना सुसमाचार के किसी भी सिद्धान्त पर विश्वास; और इसलिए इनका अंगीकार भी मसीही अंगीकार से उतना ही सम्बन्धित है। यह नहीं कि अंगीकारी
मसीहियों के होने के लिए यह आवश्यक है कि मसीही अनुग्रह अथवा सद्गुण से सम्बन्धित हर एक व्यक्तिगत बात का स्पष्ट अंगीकार किया जाए: परन्तु निश्चय ही, धर्म के सार से सम्बन्धित बातों का अंगीकार, चाहे स्पष्ट हो या अन्तर्निहित, होना ही चाहिए। और जिन बातों को मसीहियों को अपने अंगीकार में व्यक्त करना चाहिए, उनके विषय में हमें परमेश्वर के वचन की आज्ञाओं से, अथवा परमेश्वर की प्रजा द्वारा समय-समय पर किए गए धर्म के सार्वजनिक अंगीकारों के पवित्रशास्त्रीय उदाहरणों से मार्गदर्शन लेना चाहिए। इस प्रकार उन्हें अपने पाप के पश्चाताप का अंगीकार करना चाहिए: जैसा प्राचीनकाल में, जब लोग अंगीकारियों के रूप में दीक्षित होते थे, तो वे अपने पापों को मानते हुए, अपने पाप के लिए दीनता प्रकट करते हुए आते थे, मत्ती 3:6। और जिस बपतिस्मा से उन्हें बपतिस्मा दिया जाता था, वह पश्चाताप का बपतिस्मा कहलाता था, मरकुस 1:4। और यूहन्ना ने, जब उन्हें बपतिस्मा दे दिया, तो उन्हें उकसाया कि वे पश्चाताप के योग्य फल लाएं, मत्ती 3:8, अर्थात उस पश्चाताप के अनुरूप जिसका उन्होंने अंगीकार किया था; उन्हें प्रोत्साहित करते हुए कि यदि वे ऐसा करें, तो वे आनेवाले क्रोध से बच जाएंगे, और गेहूं की नाईं परमेश्वर के खत्ते में इकट्ठे किए जाएंगे, मत्ती 3:7, 8, 9, 10, 12। इसी प्रकार प्रेरित पतरस यहूदियों से कहता है, प्रेरितों के काम
2:38, "मन फिराओ, और बपतिस्मा लो"; जिससे यह दिखता है कि पश्चाताप एक ऐसी योग्यता है जो बपतिस्मे के लिए दृश्य होनी चाहिए; और इसलिए इसका सार्वजनिक रूप से अंगीकार किया जाना चाहिए। इसी प्रकार जब बंधुआई से लौटे हुए यहूदी सार्वजनिक रूप से वाचा में बंधे, तो वह अपने पापों के पश्चाताप के अंगीकार अथवा सार्वजनिक अंगीकार के साथ था, नहेम्याह 9:2। पश्चाताप के इस अंगीकार में इस बात का अंगीकार भी सम्मिलित होना चाहिए, अथवा अन्तर्निहित होना चाहिए, कि हमारे दण्ड में परमेश्वर धर्मी ठहरेगा: देखें
नहेम्याह 9:33, साथ ही पद 35, और अगले अध्याय का आरम्भ भी। उन्हें यीशु मसीह में अपने विश्वास का अंगीकार करना चाहिए, और यह कि वे मसीह को ग्रहण करते हैं, और अपने सम्पूर्ण हृदय से उस पर अपने उद्धारकर्ता के रूप में भरोसा रखते हैं, और यह कि वे मसीह के सुसमाचार को आनन्द से स्वीकार करते हैं। इस प्रकार फिलिप्पुस ने खोजे को बपतिस्मा देने के लिए यह अपेक्षा की कि वह अंगीकार करे कि वह सम्पूर्ण हृदय से विश्वास करता है: और जो लोग उस आत्मा की महान वर्षा के समय, जो पिन्तेकुस्त के दिन आरम्भ हुई, दृश्य मसीहियों के रूप में ग्रहण किए गए, वे आनन्द से सुसमाचार ग्रहण करते हुए दिखाई दिए: प्रेरितों के काम 2:41,
"तब जिन्होंने आनन्द से वचन को ग्रहण किया, उन्होंने बपतिस्मा लिया; और उसी दिन उनमें कोई तीन हजार प्राण जुड़ गए।" उन्हें यह अंगीकार करना चाहिए कि वे केवल मसीह की धार्मिकता और सामर्थ्य पर भरोसा रखते हैं; और यह कि वे उसी के प्रति समर्पित हैं, अपने एकमात्र प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में, और यह कि वे उसी में अपनी एकमात्र धार्मिकता और भाग जानकर आनन्दित होते हैं। यह भविष्यवाणी की गई है कि सब जातियां सार्वजनिक रूप से यह अंगीकार करने के लिए लाई जाएंगी, यशायाह 45:29, अन्त तक: "हे पृथ्वी के दूर-दूर देशो, मेरी ओर दृष्टि करो, और उद्धार पाओ; क्योंकि परमेश्वर मैं ही हूं, और कोई दूसरा नहीं। मैंने अपनी ही शपथ खाई है, यह वचन धार्मिकता से मेरे मुख से निकला है, और नहीं टलेगा, कि मेरे सामने हर एक घुटना टिकेगा, और हर एक जीभ शपथ खाएगी। निश्चय एक जन कहेगा,
"यहोवा ही में मेरी धार्मिकता और सामर्थ्य है; उसी के पास मनुष्य आएंगे, और जो उससे रिसियाते हैं वे सब लज्जित होंगे। यहोवा ही में इस्राएल का सारा वंश धर्मी ठहरेगा, और घमण्ड करेगा।" उन्हें यह अंगीकार करना चाहिए कि वे अपने आप को पूरी रीति से मसीह को, और उसके द्वारा परमेश्वर को सौंप देते हैं; जैसे इस्राएल की सन्तानों ने, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से परमेश्वर के साथ अपनी वाचा को स्वीकार किया: व्यवस्थाविवरण 26:17, "तू ने आज यहोवा से अंगीकार कराया है, कि वह तेरा परमेश्वर ठहरे, और तू उसके मार्गों पर चले, और उसकी विधियों, और आज्ञाओं, और नियमों को माने, और उसकी बात सुने।" उन्हें धर्म को उसकी सब कठिनाइयों सहित हृदय से ग्रहण करने की तत्परता का अंगीकार करना चाहिए, और परमेश्वर की आज्ञा का पालन सर्वांगीण रीति से और स्थिरता से करते रहने का, निर्गमन
19:8, और 24:3, 7, व्यवस्थाविवरण 26:16, 17, 18, 2 राजा 23:3, नहेम्याह 10:28, 29, भजन संहिता 119:57, 106। उन्हें यह अंगीकार करना चाहिए कि उनके सारे हृदय और प्राण यहोवा के होने और सदा उसकी सेवा करने की इन प्रतिज्ञाओं में लगे हैं, 2 इतिहास 15:12, 13, 14। परमेश्वर की प्रजा का परमेश्वर से शपथ खाना, और उसके नाम की शपथ खाना, अथवा उसके नाम से (जैसा इसका अनुवाद किया जा सकता है) — जिससे यह प्रकट होता प्रतीत होता है कि वे गम्भीरता से अपने आप को वाचा में उसे सौंप देते थे, और यह प्रतिज्ञा करते थे कि वे उसे अपने परमेश्वर के रूप में ग्रहण करेंगे, और सम्पूर्ण रीति से उसी के होंगे, उसकी आज्ञा माननेवाले और उसकी सेवा करनेवाले होंगे — इसे परमेश्वर के सब
दृश्य इस्राएल द्वारा किए जानेवाले कर्तव्य के रूप में कहा गया है, व्यवस्थाविवरण 6:13, और 10:20, भजन संहिता 63:11, यशायाह 19:18, अध्याय 14:23, 24, रोमियों 14:11, और फिलिप्पियों 2:10, 11 से तुलना करें, यशायाह 48:1, 2, और 65:15, 16, यिर्मयाह 4:2, और 5:7, और 12:16,
होशे 4:16, और 10:4। इसलिए, इसके लिए कि लोग अपने पड़ोसियों की दृष्टि में निष्कपट अंगीकारी मसीही होने के नाते पूर्ण सम्मान और प्रेमपूर्ण विश्वास के अधिकारी ठहरें, मसीह और उसके प्रेरितों के उपर्युक्त नियमों के अनुसार, एक दृश्य पवित्र जीवन होना चाहिए, साथ ही ऐसा अंगीकार भी, जो अभी बताई गई बातों को या तो स्पष्ट रूप से व्यक्त करे या स्पष्ट रूप से अन्तर्निहित करे। हमें उन्हें उनके फलों से पहचानना है, अर्थात हमें उनके फलों से यह जानना है कि क्या वे वही हैं जो होने का वे अंगीकार करते हैं; यह नहीं कि हमें उनके फलों से यह जानना है कि उनमें ऐसा कुछ है जिसका वे दावा तक नहीं करते।
और इसके अतिरिक्त, 2. इन बातों का वह अंगीकार, जिसे उचित रीति से मसीही अंगीकार कहा जाता है, और जिसे उपर्युक्त नियमों का लाभ पाने के लिए मसीही चालचलन के साथ जुड़ा होना चाहिए, (जहां तक प्रकट होता है) समझदारी के साथ किया जाना चाहिए: अर्थात, वे ऐसे व्यक्ति दिखाई देने चाहिए जिन्हें धर्म के सिद्धान्तों में इतना सिखाया गया हो कि वे सामान्यतः यह समझने में समर्थ हों कि उनके अंगीकार में जो व्यक्त किया गया है उसका उचित अर्थ क्या है। क्योंकि शब्द तब तक किसी वस्तु के संकेत अथवा घोषणा नहीं होते, जब तक मनुष्य अपने ही शब्दों का अर्थ न समझें।
परन्तु इसके लिए कि लोग मसीही धर्म का उचित अंगीकार करें, जैसा पवित्रशास्त्र निर्देशित करता है और जैसा मसीह के अनुयायियों को अपेक्षा करनी चाहिए, ताकि अंगीकारियों को अपनी संगति के सदस्यों के रूप में पूर्ण प्रेमपूर्ण विश्वास से ग्रहण किया जा सके; उनके लिए यह आवश्यक नहीं कि वे उन विशेष चरणों और उस विधि का वर्णन दें जिनके द्वारा पवित्र आत्मा ने, उन्हें अनुभवगम्य रीति से, उनके हृदयों में मसीही धर्म की उन महान सारभूत बातों को उत्पन्न किया और सम्पन्न किया। पवित्रशास्त्र में इस बात का कोई निशान नहीं है कि प्रेरितों, अथवा आदिकालीन सेवकों और मसीहियों की ऐसी कोई रीति थी कि वे किसी को अपने पूर्ण अर्थ में मसीही भाई के रूप में ग्रहण करने और उसके साथ वैसा व्यवहार करने के लिए ऐसा कोई वर्णन अपेक्षित करते थे, अथवा पहले उनसे उनके अनुभवों की विशेष विधि और क्रम के विषय में जांच करते थे। उनसे किए गए कार्यों का अंगीकार अपेक्षित था; परन्तु उस कार्य के होने की रीति का कोई वर्णन उनसे अपेक्षित नहीं था। और न ही पवित्रशास्त्र में आदम से लेकर प्रेरित यूहन्ना की मृत्यु तक परमेश्वर की कलीसिया में ऐसी किसी रीति की तनिक भी छाया है।
मैं यह कहने से बहुत दूर हूं कि लोगों के लिए अपने भाइयों को अपने अनुभवों का किसी प्रकार का वर्णन देना आवश्यक नहीं है। क्योंकि जिन बातों में मसीही धर्म का सार निहित है, उनका अंगीकार करना, यह अंगीकार करने के ही समान है कि वे इन बातों का अनुभव करते हैं। इस प्रकार लोगों का गम्भीरता से यह अंगीकार करना, कि अपनी सम्पूर्ण पापिष्ठता, दुर्दशा, और असमर्थता के, और अपनी आप ही में पूर्णतः बिगड़ी हुई दशा के, और परमेश्वर के सम्पूर्ण त्याग और अनन्त क्रोध के अपने न्यायसंगत योग्य होने के पूर्ण बोध में, और यह कि उनकी अपनी धार्मिकता, अथवा उनमें जो कुछ भी है, वह ईश्वरीय न्याय को सन्तुष्ट करने अथवा उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह के योग्य ठहराने के लिए पूर्णतः असमर्थ है; वे प्रभु यीशु मसीह पर, और उसके प्रायश्चित और धार्मिकता पर पूरी रीति से निर्भर हैं; कि वे अपने सम्पूर्ण हृदय से मसीह के सुसमाचार की सच्चाई पर विश्वास करते हैं; और यह कि, सुसमाचार में प्रकट किए गए उद्धारकर्ता के रूप में उसकी पर्याप्तता और सिद्ध उत्तमता के पूर्ण बोध में, वे अपने सम्पूर्ण प्राण से उससे चिपके रहते हैं, और अपने प्राणों के शरणस्थान और विश्राम, और अपने सुख के स्रोत के रूप में उसी में सन्तुष्ट रहते हैं; कि वे अपने पापों से पश्चाताप करते हैं, और सारे पाप को पूर्णतः त्याग देते हैं, और अपने आप को सम्पूर्ण रीति से मसीह को सौंप देते हैं, अपने राजा के रूप में स्वेच्छा से उसके अधीन होते हुए; कि वे उसे अपना हृदय और अपना सम्पूर्ण मनुष्यत्व देते हैं; और परमेश्वर को अपना सम्पूर्ण और सनातन भाग बनाने के लिए तैयार और दृढ़संकल्प हैं; और स्वर्ग में उसके साथ भविष्य के अनन्त आनन्द की उसकी प्रतिज्ञाओं पर निर्भर रहते हुए, इस व्यर्थ जगत के सब सुखभोगों को त्यागकर, इस महान धन और भावी विरासत के लिए सब कुछ बेचकर, और परमेश्वर की हर एक आज्ञा को, चाहे वह कितनी ही कठिन और आत्म-त्यागपूर्ण क्यों न हो, माननेवाले होकर, अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर की सेवा में समर्पित करते हैं; और यह कि, अपने अपराधियों को क्षमा करने में, और मनुष्यजाति के प्रति सामान्य परोपकार में, उनके हृदय यीशु मसीह के लोगों के साथ, अपने ही लोगों के समान, जुड़े हुए हैं, ताकि वे उनसे चिपके रहें और उन्हें अपने भाइयों के समान प्रेम करें, और परमेश्वर की आराधना और सेवा करें, और उनके साथ एकता और सहभागिता में मसीह के पीछे चलें, परमेश्वर के उसी परिवार और मसीह की उस रहस्यमय देह के सदस्यों के नाते अपने सब कर्तव्यों को पूरा करने के लिए तैयार और दृढ़संकल्प रहें: मैं कहता हूं, लोगों का परमेश्वर की उपस्थिति में गम्भीरता से ऐसी बातों का अंगीकार करना, यह अंगीकार करने के ही समान है कि वे अपने हृदयों में इन बातों के प्रति सचेत हैं, अथवा इनका अनुभव करते हैं।
और न ही मैं यह मानता हूं कि लोगों का अपने अनुग्रह के विशेष कार्यों के अनुभव का, समय और परिस्थितियों सहित, वर्णन देना, उनकी दशा के विषय में निर्णय बनाने में दूसरों को कोई लाभ नहीं देता; अथवा यह कि कुछ मामलों में, विशेषकर बड़े महत्त्व के मामलों में, जहां लोगों की भक्ति के विषय में हर सम्भव सन्तोष विशेष रूप से चाहा और खोजा जाना चाहिए, जैसे किसी सेवक की नियुक्ति अथवा स्वीकृति के मामले में, लोगों से इन बातों के विषय में उचित रीति से पूछा नहीं जा सकता। यह कई दृष्टियों से निर्णय बनाने में लाभ दे सकता है; और अन्य बातों के साथ इसमें भी, कि इससे हम इस बात से अधिक सन्तुष्ट हो सकते हैं कि अंगीकारी अपने अंगीकार में जो कहता है उसे ईमानदारी और समझदारी से कहता है; और वह यह अंगीकार केवल औपचारिकतावश नहीं करता।
इसके लिए कि मसीही धर्म के अंगीकार को किसी भी उद्देश्य के लिए स्वीकार किया जाए, अंगीकार की परिस्थितियों से यह सोचने का पर्याप्त कारण होना चाहिए कि अंगीकारी ऐसा अंगीकार केवल किसी निर्धारित प्रारूप के प्रति रूढ़िगत अनुपालन में, बिना किसी स्पष्ट अर्थ के शब्दों का प्रयोग करते हुए, अथवा अत्यन्त ढीली और अस्पष्ट रीति से नहीं करता, जैसा प्रायः विश्वास के अंगीकार हस्ताक्षरित किए जाते हैं; वरन यह कि अंगीकारी समझदारी और ईमानदारी से वही प्रकट करता है जिसका वह अपने ही हृदय में सचेत है; अन्यथा उसका अंगीकार निरर्थक होगा, और उसे प्राणहीन वस्तुओं की ध्वनि से अधिक महत्त्व नहीं दिया जा सकता। परन्तु वास्तव में
(चाहे विशेष कार्यों के वर्णन से इसे परखने में कुछ भी लाभ मिले) यह अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए कि अंगीकारी का पहले अपने शिक्षकों द्वारा भली-भांति सिखाया जाना, और अपने पर्याप्त ज्ञान का अच्छा प्रमाण देना, साथ ही अपने अंगीकार के अनुरूप चालचलन रखना, इस बात का सबसे उत्तम प्रमाण है।
और न ही मैं यह मानता हूं कि यदि किसी व्यक्ति से, जिससे उसके मसीही अनुभवों के विशेष प्रसंगों, समयों, और परिस्थितियों के विषय में, अन्य बातों के साथ, पूछा जाता है, वह अपने पहले मन फिराव की रीति का ऐसा स्पष्ट वर्णन देने में समर्थ प्रतीत होता है, जैसी रीति सच्चे मन फिराव में प्रायः देखी जाती रही है, इस प्रकार कि बातें प्रकृति के क्रम के अनुसार, समय के क्रम में, अनुभवगम्य और स्पष्ट रीति से एक दूसरे के पीछे आती प्रतीत होती हैं; तो यह एक प्रकाशमय परिस्थिति है, जो अन्य बातों के साथ उस प्रमाण में चमक जोड़ती है जो वह अपने भाइयों को अपने अनुभवों की सच्चाई का देता है।
परन्तु जिस बात को मैं अपवित्रशास्त्रीय कहता हूं, वह है उस विशिष्ट विधि और चरणों के विशेष वर्णन पर बल देना, जिनमें परमेश्वर के आत्मा ने प्राण को पहली बार उद्धार की दशा में लाने में अनुभवगम्य रीति से कार्य किया, मानो यह किसी अंगीकारी को सच्चे मसीही के रूप में पूर्ण प्रेमपूर्ण विश्वास से ग्रहण करने के लिए एक अनिवार्य वस्तु हो; अथवा ऐसा वर्णन न होने के कारण, उन अन्य बातों की उपेक्षा करना जो लोग अपने पड़ोसियों को अपने मसीही होने के प्रमाण में देते हैं, और जो कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और सारभूत हैं।
दूसरी बात, इसके लिए कि हम सही रीति से समझ सकें कि मसीही चालचलन किस प्रकार एक अंगीकारी मसीही की निष्कपटता का दूसरों के लिए सबसे बड़ा प्रमाण है, यह आवश्यक है कि पहले जो कहा गया, कि मसीही चालचलन क्या है, वह स्मरण रखा जाए; और यह भी विचार किया जाए कि यह दूसरों को कहां तक दिखाई दे सकता है। केवल यह कि मसीही धर्म का कोई अंगीकारी सामान्यतः जिसे ईमानदार मनुष्य और नैतिक मनुष्य कहा जाता है, वैसा है (अर्थात, हमारे पास उस पर आरोप लगाने के लिए ऐसा कोई विशेष अपराध अथवा अधर्म नहीं है, जो उसके चरित्र पर धब्बा लगाए), उसके अंगीकार की निष्कपटता का कोई बड़ा प्रमाण नहीं है। यह उसकी ज्योति को मनुष्यों के सामने चमकाना नहीं है। यह वह प्रेम का कार्य और परिश्रम नहीं है, जो मसीह के नाम के प्रति दिखाया गया, जिसने प्रेरित को अंगीकारी इब्रानियों की निष्कपटता का ऐसा विश्वास दिलाया, इब्रानियों 6:9, 10। ऐसा हो सकता है कि हमें किसी मनुष्य में कुछ भी ऐसा न दिखे, केवल यह कि वह एक भला मनुष्य हो सकता है; उसके जीवन और चालचलन में उसकी भक्ति के विपरीत कुछ भी प्रकट न हो, तौभी उसके भक्त होने का भी कोई बड़ा सकारात्मक प्रमाण न हो। परन्तु मनुष्यों के दृश्य व्यवहार में पवित्रता का बड़ा सकारात्मक प्रकटीकरण भी हो सकता है। उनका जीवन परमेश्वर की सेवा का जीवन प्रतीत हो सकता है: वे यीशु मसीह के उदाहरण का अनुसरण करते हुए प्रतीत हो सकते हैं, और बहुत हद तक मत्ती के पांचवें, छठे, और सातवें अध्यायों, और रोमियों के बारहवें अध्याय, और नये नियम के कई अन्य भागों में दिए गए उन उत्तम नियमों तक पहुंचते प्रतीत हो सकते हैं: मसीह की आज्ञाओं और सुसमाचार के नियमों के प्रति उनकी सर्वांगीण आज्ञाकारिता का बड़ा प्रकटीकरण हो सकता है। वे पहली पटिया के कर्तव्यों को, परमेश्वर का भय और प्रेम प्रकट करते हुए, सर्वांगीण रीति से निभाते हुए प्रतीत हो सकते हैं; और वैसे ही मनुष्यों से प्रेम, पवित्र लोगों से प्रेम, और शत्रुओं से प्रेम के नियमों को; नम्रता और क्षमा के नियमों को; दया और करुणा के नियमों को, और न केवल अपनी ही वस्तुओं वरन दूसरों की वस्तुओं पर भी दृष्टि रखने के नियम को; मनुष्यों के प्राणों और देहों की, विशेष व्यक्तियों की और जनसाधारण की भलाई करने के नियमों को; संयम और मनोभावों के मर्दन, और दीन चालचलन के नियमों को; जीभ पर लगाम लगाने, और उसे परमेश्वर की महिमा करने और मनुष्यों को आशीष देने में लगाने के नियमों को सर्वांगीण रीति से पूरा करते हुए प्रतीत हो सकते हैं, यह दिखाते हुए कि उनकी जीभ पर करुणा की व्यवस्था है। वे हर स्थान में, और हर समय, परमेश्वर के भवन में, और अपने परिवारों में, और अपने पड़ोसियों के बीच, सब्त के दिनों में और प्रतिदिन, व्यापार में और वार्तालाप में, मित्रों और शत्रुओं के प्रति, बड़ों, छोटों, और समानों के प्रति, मसीहियों के समान चलते हुए प्रतीत हो सकते हैं। लोग अपने दृश्य चालचलन में परमेश्वर और मनुष्यजाति की सेवा में बड़ी उत्सुकता से लगे हुए, मसीही होने के इस कार्य में बहुत परिश्रम और स्वयं को व्यय करते हुए, और सब परिस्थितियों और परीक्षाओं में इसमें बहुत स्थिर और दृढ़ बने रहते हुए प्रतीत हो सकते हैं। अपने आप का इन्कार करने, और परमेश्वर और मसीह के लिए, और धर्म के हित तथा अपने भाइयों की भलाई के लिए दुःख उठाने की आत्मा के बड़े प्रकटीकरण हो सकते हैं। किसी मनुष्य के चालचलन में मसीह को त्यागने की अपेक्षा किसी भी वस्तु को त्याग देने, और हर वस्तु को उसके सम्मान के लिए स्थान देने की मनोवृत्ति के बड़े प्रकटीकरण हो सकते हैं। किसी मनुष्य के व्यवहार में ऐसे धर्म के, उसके तत्त्व होने के, और उसके जीवन के आनन्द और सुख को उसी में रखने के बड़े प्रकटीकरण हो सकते हैं; और उसका चालचलन ऐसा हो सकता है कि वह जहां कहीं भी जाए, अपने साथ मसीही अनुग्रहों और स्वर्गीय मनोवृत्तियों की मधुर सुगन्ध लिए फिरे। और जब मसीही धर्म के अंगीकारियों में ऐसा होता है, तो यह उनके अंगीकार की निष्कपटता का दूसरों के लिए ऐसा प्रमाण है, जिसकी तुलना में अन्य सब प्रकटीकरण तुच्छ ठहरते हैं।
निःसन्देह अंगीकारियों के अपने जीवन और चालचलन में प्रदर्शित निष्कपटता के प्रमाण की मात्रा में बड़ी विविधता होती है; जैसे लोगों द्वारा अपने अनुभवों की रीति और विधि के दिए गए वर्णनों की निष्पक्षता और स्पष्टता में भी विविधता होती है: परन्तु निःसन्देह चालचलन में मसीही आत्मा का ऐसा प्रकटीकरण, जैसा वर्णित किया गया है, अनुभव के विशेष चरणों और प्रसंगों की कभी सुनाई गई सबसे निष्पक्ष और सबसे उज्ज्वल कहानी से भी कहीं बढ़कर है। और सामान्यतः, चालचलन में मसीही अंगीकार की निष्कपटता का प्रकटीकरण, अनुभवों के वर्णन से कहीं बेहतर है। परन्तु फिर भी,
तीसरी बात, पहले कही गई बात के अनुरूप, यह ध्यान देने योग्य है कि संसार को दिखाई देनेवाले किसी भी बाह्य प्रकटीकरण और बाहरी रूप, अनुग्रह के अचूक प्रमाण नहीं हैं। ये जो प्रकटीकरण बताए गए हैं, वे सबसे उत्तम हैं जो मनुष्यजाति के पास हो सकते हैं; और वे ऐसे हैं जो मसीहियों को सर्वथा बाध्य करते हैं कि वे अंगीकारियों को पवित्र लोगों के रूप में ग्रहण करें, और उनसे प्रेम रखें, और उन्हें परमेश्वर की सन्तान जानकर उनमें आनन्दित हों, और वे उन्हें उनके विषय में उतना ही बड़ा सन्तोष देने के लिए पर्याप्त हैं, जितना उनके चालचलन में मार्गदर्शन करने के लिए, अथवा इस संसार में पूरे किए जाने योग्य किसी भी उद्देश्य के लिए कभी आवश्यक होता है। परन्तु अपने पड़ोसी में उन्हें जो कुछ भी दिखाई दे, वह उसके प्राण की दशा के विषय में पूर्ण निश्चितता उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता: क्योंकि वे उसका हृदय नहीं देखते, न ही वे उसका सारा बाह्य व्यवहार देख सकते हैं; क्योंकि उसमें से बहुत कुछ गुप्त है, और संसार की दृष्टि से छिपा हुआ है; और यह निश्चयपूर्वक निर्धारित करना असम्भव है कि कोई मनुष्य अनुग्रह के बाह्य रूपों और नकलों में, अन्य सिद्धान्तों के आधार पर, कहां तक जा सकता है। यद्यपि निःसन्देह, यदि दूसरे मनुष्यों के चालचलन से सम्बन्धित उतना कुछ देख सकते जितना उनका अपना विवेक उसमें देख सकता है, तो यह उनकी दशा का एक अचूक प्रमाण हो सकता था, जैसा आगे से प्रकट होगा।
इस प्रकार मसीही चालचलन को अंगीकारियों की निष्कपटता के दूसरों के लिए सबसे उत्तम प्रमाण के रूप में विचार करने के बाद, अब मैं आगे बढ़कर, 2. यह देखने के लिए बढ़ता हूं कि पवित्रशास्त्र मसीही चालचलन को लोगों के अपने ही विवेक के लिए भी अनुग्रह के एक विशिष्ट और निश्चित प्रमाण के रूप में कहता है। यह 1 यूहन्ना 2:3 में अत्यन्त स्पष्ट है:
"इससे हम जानते हैं, कि हम उसे जान गए हैं, कि हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं।" और हमारे भले कामों के विषय में हमारे विवेक की गवाही को उस वस्तु के रूप में कहा गया है जो हमें अपनी भक्ति का भरोसा दिला सकती है, 1 यूहन्ना 3:18, 19: "हे मेरे बालको, हम वचन या जीभ ही से नहीं, वरन काम और सच्चाई से प्रेम रखें। और इसी से हम जान लेंगे, कि हम सत्य से हैं, और उसके साम्हने अपने-अपने मन को धीरज दिलाएंगे।" और प्रेरित पौलुस, इब्रानियों अध्याय 6 में, इब्रानी मसीहियों के प्रेम के कार्य और परिश्रम की बात इस रूप में करता है, जिसने उसे यह विश्वास दिलाया कि उनमें उच्चतम सामान्य ज्योति से बढ़कर कुछ है, और साथ ही उस प्रमाण के रूप में भी जो उन्हें अपने विषय में आशा का उच्चतम भरोसा देने में सहायक था, पद 9,
इत्यादि: "परन्तु हे प्रियो, यद्यपि हम ऐसा कहते हैं, तौभी तुम्हारे विषय में हमें उत्तम बातों, वरन उद्धार पहुंचानेवाली बातों का भरोसा है। क्योंकि परमेश्वर अन्यायी नहीं, कि तुम्हारे काम को, और उस प्रेम को भूल जाए, जो तुमने उसके नाम के लिए दिखाया है, कि तुमने पवित्र लोगों की सेवा की, और अब भी करते हो। और हमारी लालसा है, कि तुम में से हर एक अन्त तक आशा की पूरी निश्चयता के लिए वैसी ही सरगर्मी दिखाए।" इसी प्रकार प्रेरित गलातियों को निर्देश देता है कि वे अपने व्यवहार अथवा चालचलन की जांच करें, ताकि उन्हें अपनी ही धन्य दशा में अपने आप में आनन्द मिल सके, गलातियों 6:4:
"पर हर एक अपने ही काम को जांचे, तब वह केवल अपने ही विषय में घमण्ड करने का कारण रखेगा, न कि दूसरे के विषय में।"
और भजनकार कहता है, भजन संहिता 119:6, "जब मैं तेरी सारी आज्ञाओं की ओर दृष्टि रखूंगा, तब मैं लज्जित न हूंगा"; अर्थात, तब मैं अपनी आशा में निडर, आश्वस्त, और स्थिर रहूंगा।
और हमारे उद्धारकर्ता के उस वचन में भी, मत्ती 7:19, 20: "जो-जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में झोंका जाता है। इसलिए तुम उन्हें उनके फलों ही से पहचान लोगे।" यद्यपि
मसीह इसे पहले तो दूसरों के विषय में हमारे न्याय करने के नियम के रूप में देता है, तौभी आगे आनेवाले वचनों में वह स्पष्ट रीति से दिखाता है कि उसका अभिप्राय इसे अपने ही विषय में हमारे न्याय करने के नियम के रूप में भी है: "जो कोई मुझसे, 'हे प्रभु, हे प्रभु' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा, परन्तु जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है वही प्रवेश करेगा। उस दिन बहुत लोग मुझसे कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु' इत्यादि — तब मैं उनसे खुलकर कह दूंगा, कि मैंने तुम्हें कभी नहीं जाना; हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ। इसलिए जो कोई मेरी ये बातें सुनता, और उन पर चलता है, वह उस बुद्धिमान मनुष्य के समान ठहरेगा, जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया। — और जो कोई मेरी ये बातें सुनकर उन पर नहीं चलता, वह उस मूर्ख मनुष्य के समान ठहरेगा, जिसने अपना घर बालू पर बनाया।" इसी बात को दिखाने के लिए मुझे आगे अन्य वचनों का उल्लेख करने का अवसर मिलेगा।
परन्तु इस विषय में अधिक स्पष्टता के लिए, मैं पहले यह दिखाना चाहूंगा कि जब पवित्रशास्त्र मसीही चालचलन, भले काम करने, अथवा मसीह की आज्ञाओं के पालन को, हमारे अपने विवेक के लिए इस बात के निश्चित चिन्ह के रूप में प्रस्तुत करता है कि हम सच्चे मसीही हैं, तो उसे किस रीति से समझा जाना चाहिए। और दूसरा, यह सिद्ध करूंगा कि यह उन सब प्रमाणों में मुख्य है जो मनुष्य अपनी निष्कपट भक्ति के विषय में पा सकते हैं।
पहला, मैं यह दिखाना चाहूंगा कि जब पवित्रशास्त्र मसीही चालचलन, अथवा मसीह की आज्ञाओं के पालन को, हमारे अपने विवेक के लिए इस बात के निश्चित प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है कि हम निष्कपट मसीही हैं, तो उसे किस रीति से समझा जाना चाहिए।
और यहां मैं यह देखना चाहूंगा कि हम उचित रीति से यह नहीं मान सकते कि जब पवित्रशास्त्र इस मामले में भले कामों, अच्छे फल, और मसीह की आज्ञाओं के पालन की बात करता है, तो उसका सम्बन्ध केवल उस बाह्य वस्तु से है, अर्थात देह की गति और क्रिया से, बिना किसी अन्य वस्तु को सम्मिलित किए, कर्ता के किसी उद्देश्य अथवा अभिप्राय से, अथवा उसकी बुद्धि या इच्छा के किसी कार्य से इसका कोई सम्बन्ध न रखते हुए। क्योंकि मनुष्यों के कार्यों को इस प्रकार समझें, तो वे किसी घड़ी की नियमित गतियों से अधिक भले काम अथवा आज्ञाकारिता के कार्य नहीं ठहरते; न ही वे मनुष्य के कार्यों के रूप में, न ही किसी प्रकार के मानवीय कार्यों के रूप में विचारे जाते हैं। इस प्रकार लिए गए देह के कार्य, न तो आज्ञाकारिता के कार्य हैं और न ही अवज्ञा के, इससे अधिक नहीं जितना मिर्गी के दौरे में देह की गतियां होती हैं। परन्तु जिस आज्ञाकारिता और फल की बात की जा रही है, वह मनुष्य की आज्ञाकारिता और फल है; और इसलिए न केवल देह के कार्य, वरन प्राण की आज्ञाकारिता भी, जो प्राण के कार्यों और चालचलन में निहित है। यह नहीं कि मैं यह मानता हूं कि जब पवित्रशास्त्र इस मामले में अनुग्रहमय कामों, फल, और चालचलन की बात करता है, तो इन शब्दों में हृदय की सारी आन्तरिक भक्ति और पवित्रता, दोनों सिद्धान्त और अभ्यास, दोनों आत्मा और चालचलन, सम्मिलित हैं: क्योंकि तब, इन बातों को हृदय में अनुग्रहमय सिद्धान्त के चिन्हों के रूप में दिए जाने में, वही वस्तु अपने ही चिन्ह के रूप में दी जाती, और जड़ तथा फल में कोई अन्तर न रहता। परन्तु इसका अभिप्राय केवल प्राण के अनुग्रहमय अभ्यास और पवित्र कार्य से है, जो पवित्र सिद्धान्त और अच्छी दशा के चिन्ह के रूप में दिया जाता है। न ही इसका अभिप्राय अनुग्रह के हर प्रकार के आन्तरिक अभ्यास से है; वरन उस व्यावहारिक अभ्यास से है, अर्थात प्राण के उस अभ्यास और आन्तरिक पवित्रता के उस प्रयोग से, जो किसी आज्ञापालनकारी कार्य में होता है; अथवा मन के उस प्रयोग, और अनुग्रह के उस कार्य से, जो इच्छा के उन कार्यों में परिणत होता और समाप्त होता है, जिन्हें वे इच्छा के आदेशात्मक कार्य कहते हैं; जिनमें प्राण द्वारा कुछ करने और व्यवहार में लाने का निर्देश और आदेश दिया जाता है।
यहां, अधिक स्पष्ट समझ के लिए, मैं यह देखना चाहूंगा कि अनुग्रह के अभ्यासों के दो प्रकार हैं। 1. कुछ ऐसे हैं जिन्हें कुछ लोग आन्तरिक कार्य कहते हैं, अर्थात, अनुग्रह के वे अभ्यास जो प्राण के भीतर ही रहते हैं, जो वहीं आरम्भ होते और वहीं समाप्त होते हैं, बिना बाह्य रूप से किए जानेवाली, अथवा व्यवहार में लाई जानेवाली किसी वस्तु से प्रत्यक्ष सम्बन्ध रखे। ऐसे हैं अनुग्रह के वे अभ्यास, जो पवित्र लोगों को प्रायः चिन्तन में होते हैं; जब हृदय में जो अभ्यास होता है वह मन के विचारों से परे किसी वस्तु की ओर सीधे न बढ़ता है, न उसमें समाप्त होता है; यद्यपि वे (जैसे अनुग्रह के सब अभ्यास करते हैं) अधिक दूर की रीति से चालचलन की ओर प्रवृत्त हो सकते हैं।
2. अनुग्रह के कार्यों का एक दूसरा प्रकार भी है, जिसे अधिक निश्चित रीति से व्यावहारिक, अथवा प्रभावकारी अभ्यास कहा जाता है, क्योंकि उनका किए जानेवाले किसी कार्य से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। ये इच्छा के आदेशात्मक कार्यों में अनुग्रह के प्रयोग हैं, जो बाह्य कार्यों का निर्देशन करते हैं। जैसे जब कोई पवित्र जन दान के अनुग्रह के अभ्यास में, और उसी से, किसी चेले को ठण्डे जल का एक कटोरा देता है; अथवा अपने कर्तव्य के मार्ग में स्वेच्छा से उत्पीड़न सहता है; मसीह के प्रति सर्वोच्च प्रेम के अभ्यास से प्रत्यक्ष रीति से। यहां अनुग्रह का प्रयोग बाह्य कार्यों में अपना प्रभाव उत्पन्न करता है।
अनुग्रह के ये अभ्यास व्यावहारिक हैं और भले कामों को उत्पन्न करनेवाले हैं, न केवल इस अर्थ में कि वे उत्पादक स्वभाव के हैं (क्योंकि सच्चे अनुग्रह के सब अभ्यास ऐसे ही हैं), वरन वे उत्पन्न करनेवाले कार्य हैं। यही ठीक रीति से इच्छा के कार्य में अनुग्रह का अभ्यास है; और यही ठीक रीति से प्राण का चालचलन है। और प्राण इसके अतिरिक्त किसी अन्य चालचलन का प्रत्यक्ष कर्ता नहीं है; देह की गतियां प्राण और देह के मिलाप की उन व्यवस्थाओं से होती हैं, जिन्हें परमेश्वर ने, न कि प्राण ने, स्थिर किया है और बनाए रखता है। प्राण का कार्य और अनुग्रह का अभ्यास, जो किसी भले काम के सम्पन्न करने में प्रयोग किया जाता है, वही भला काम है, जहां तक उसमें प्राण सम्बन्धित है, अथवा जहां तक वह प्राण का भला काम है। इच्छा के निर्णय ही वास्तव में हमारे कार्य हैं, जहां तक वे ठीक रीति से हमारे अपने हैं, जैसा डॉक्टर डॉडरिज देखते हैं।78
प्राण के इस चालचलन में प्राण का, जो कर्ता है, उद्देश्य और अभिप्राय भी सम्मिलित है।
क्योंकि न केवल हमें किसी मूर्ति की गतियों को, जो घड़ी की कल की भांति न्याय करती अथवा दान बांटती है, उस मूर्ति में मसीह की आज्ञाकारिता के किसी कार्य के रूप में नहीं देखना चाहिए; वरन कोई भी किसी मनुष्य के उन स्वैच्छिक कार्यों को, जो बाहरी और वस्तुगत रीति से मसीह की किसी आज्ञा के अनुरूप हों, मसीह की आज्ञाकारिता का नाम नहीं देगा, यदि उसने मसीह के विषय में, अथवा उसकी किसी आज्ञा के विषय में कभी सुना ही न हो, अथवा जो कुछ उसने किया उसमें उसकी आज्ञाओं का कोई विचार ही न रखा हो। यदि आज्ञाकारिता और अच्छे फल के जिन कार्यों की बात की जा रही है, उन्हें केवल देह की गतियों के रूप में नहीं, वरन प्राण के कार्यों के रूप में देखा जाए; तो उस कार्य में मन की आत्मा का सम्पूर्ण अभ्यास, जिस उद्देश्य के लिए वह किया गया, और प्राण का उस समय परमेश्वर के प्रति जो सम्बन्ध है, इत्यादि, सम्मिलित करके लिया जाना चाहिए, अन्यथा वे न तो आत्म-त्याग के कार्य हैं, न परमेश्वर की आज्ञाकारिता, न उसकी की गई सेवा, वरन कुछ और ही हैं। अनुग्रह के ऐसे प्रभावकारी अभ्यास, जैसे मैंने अभी वर्णन किए हैं, अनेक शहीदों ने उच्च मात्रा में अनुभव किए हैं। और सब सच्चे पवित्र लोग अनुग्रह के ऐसे ही कार्यों का जीवन जीते हैं; जैसे वे सब अनुग्रहमय कामों का जीवन जीते हैं, जिनके प्राण और जीवन अनुग्रह के ये प्रभावकारी प्रयोग हैं। और यही वह आज्ञाकारिता और फल है जिसे परमेश्वर मुख्य रीति से देखता है, जैसे वह देखता है (78 Scripture Doctrine of Salvation, Sermon I. p. 11)
प्राण को देह से अधिक, जितना प्राण मानव स्वभाव की संरचना में श्रेष्ठ भाग है। जैसे परमेश्वर मनुष्य की आज्ञाकारिता और चालचलन को देखता है, वह प्राण के चालचलन को देखता है; क्योंकि प्राण ही परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य है, "क्योंकि यहोवा मनुष्य की नाईं नहीं देखता; मनुष्य तो मुंह देखता है, परन्तु यहोवा मन को देखता है।"
और इस प्रकार आज्ञाकारिता, भले काम, अच्छे फल समझे जाने चाहिए, जब पवित्रशास्त्र में उन्हें अनुग्रह के सच्चे सिद्धान्त के हमारे अपने विवेक के लिए निश्चित प्रमाण के रूप में दिया जाता है: अर्थात, प्राण की आज्ञाकारिता और चालचलन को, जो देह के कार्यों से पहले होता और उन्हें संचालित करता है, सम्मिलित करते हुए। जब पवित्रशास्त्र में चालचलन को हमारी सच्ची
मसीही धर्म से तात्पर्य है हमारे उस चालचलन से, जो उन्हें दिखाई देता है, अर्थात हमारे बाह्य कार्य: परन्तु जब चालचलन को हमारे अपने विवेक के लिए हमारे सच्चे मसीही होने के निश्चित प्रमाण के रूप में दिया जाता है, तब तात्पर्य है हमारे उस चालचलन से, जो हमारे अपने विवेक को दिखाई देता है; जो केवल हमारी देह की गति नहीं, वरन प्राण का वह प्रयोग है, जो उस गति का निर्देशन और आदेश देता है; जो देह के कार्य से कहीं अधिक सीधे और तुरन्त हमारे अपने विवेक की दृष्टि के अधीन है। और यह कि यही पवित्रशास्त्र का अभिप्राय है, यह न केवल वस्तु के स्वभाव और तर्क से प्रकट होता है, वरन पवित्रशास्त्र से स्वयं भी स्पष्ट है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जब मसीह अपने पहाड़ी उपदेश के अन्त में अपने इन वचनों को करने अथवा उन पर चलने की बात, अंगीकारियों के सच्चे चेले होने के प्रधान चिन्ह के रूप में करता है, जिसके बिना वह उन्हें उस मनुष्य के समान ठहराता है जिसने अपना घर बालू पर बनाया, और जिसके साथ, उस मनुष्य के समान जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया; तो उसका सम्बन्ध न केवल बाह्य व्यवहार से है, वरन उस व्यवहार में मन के आन्तरिक अभ्यास से भी है: जैसा यह देखने से स्पष्ट होता है कि जब वह हमारे उन वचनों को करने अथवा उन पर चलने की बात करता है, तो वे कौन से पूर्ववर्ती वचन हैं जिनका वह उल्लेख करता है; और हम पाएंगे कि वे इस प्रकार के हैं: "धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं; धन्य हैं वे जो शोक करते हैं; धन्य हैं वे जो नम्र हैं; धन्य हैं वे जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं; धन्य हैं वे जो दयावन्त हैं; धन्य हैं वे जो मन के शुद्ध हैं; जो कोई अपने भाई पर व्यर्थ क्रोध करे, इत्यादि; जो कोई किसी स्त्री को कुदृष्टि से देखे, इत्यादि; अपने शत्रुओं से प्रेम रखो; अपने प्राण के लिए चिन्ता न करो," और इसी प्रकार की अन्य बातें, जो आन्तरिक अभ्यासों का अभिप्राय रखती हैं: और जब मसीह कहता है, यूहन्ना 14:2, "जिसके पास मेरी आज्ञाएं हैं और वह उन्हें मानता है, वही मुझसे प्रेम रखता है"; तो उसका स्पष्ट रूप से उस आज्ञा से विशेष सम्बन्ध है, जो उसी प्रवचन में कई बार दोहराई गई है (जिसे वह विशेष रीति से अपनी आज्ञा कहता है), कि वे एक दूसरे से वैसे ही प्रेम रखें जैसे उसने उनसे प्रेम रखा (देखें अध्याय 13:34, और अध्याय 15:10, 12, 13, 14)। परन्तु यह आज्ञा मुख्य रूप से मन अथवा हृदय के अभ्यास से सम्बन्धित है, यद्यपि वह चालचलन में प्रयुक्त होती है। इसी प्रकार जब प्रेरित यूहन्ना कहता है, 1 यूहन्ना 2:3, "इससे हम जानते हैं, कि हम उसे जान गए हैं, कि हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं"; तो उसका स्पष्ट रूप से उसी आज्ञा से प्रधान सम्बन्ध है, जैसा आगे के पद 7-11, और दूसरी पत्री के पद 5, 6 से प्रकट होता है; और जब पवित्रशास्त्र में हमें बताया जाता है कि अन्तिम दिन मनुष्यों का न्याय उनके कामों के अनुसार किया जाएगा, और सब अपनी देह में किए गए कामों के अनुसार पाएंगे, तो इसे केवल बाह्य कार्यों के विषय में नहीं समझा जाना चाहिए; क्योंकि यदि ऐसा होता, तो परमेश्वर के विषय में यह इतनी बार क्यों कहा जाता है कि वह हृदयों को खोजता और मन को परखता है, "ताकि वह हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला दे"? जैसा प्रकाशितवाक्य 2:23 में है, "और सारी कलीसियाएं जान लेंगी, कि मन और हृदय का ज्ञाता मैं ही हूं; और मैं तुम में से हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला दूंगा।" यिर्मयाह 17:9, 10, "मैं यहोवा मन को खोजता हूं, मैं हृदय को जांचता हूं, कि हर मनुष्य को उसकी चाल और उसके कामों के फल के अनुसार बदला दूं।" परन्तु यदि उसकी चाल, और उसके कामों के फल से तात्पर्य केवल उसकी देह के कार्यों से है, तो उन्हें जानने के लिए हृदय और मन को खोजने की क्या आवश्यकता है? हिजकिय्याह अपनी बीमारी में अपने चालचलन को परमेश्वर के अनुग्रह के अपने अधिकार के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है, न केवल अपने बाह्य कार्यों को, वरन जो उसके हृदय में था उसे भी सम्मिलित करते हुए: यशायाह 38:3, "हे यहोवा, मैं बिनती करता हूं, स्मरण कर, कि मैं तेरे सम्मुख सच्चाई और खरे मन से चला हूं।"
यद्यपि निष्कपटता के इस महान प्रमाण में, जो पवित्रशास्त्र हमें देता है, जो आन्तरिक है वही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है; तौभी जो बाह्य है वह भी सम्मिलित और अभिप्रेत है, क्योंकि वह इच्छा में अनुग्रह के व्यावहारिक प्रयोग से, जो देह के कार्यों का निर्देशन और आदेश देता है, जुड़ा हुआ है।
और इससे उन सब दावों को प्रभावी रीति से काट दिया जाता है, जो कोई भी मनुष्य भक्ति के प्रमाणों के विषय में कर सकता है, जो बाह्य रूप से दुष्टता का जीवन जीता है; क्योंकि वह महान प्रमाण उस आन्तरिक अभ्यास और प्राण के चालचलन में निहित है, जो इच्छा के उन कार्यों में है, जो बाह्य कार्यों को आदेश देते हैं।
परन्तु यह ज्ञात है कि इच्छा के ये आदेशात्मक कार्य एक दिशा में, और देह के अंगों के कार्य दूसरी दिशा में नहीं होते: क्योंकि प्रकृति की अपरिवर्तनीय व्यवस्था यह है कि जब तक प्राण और देह जुड़े हुए हैं, वे एकरूप रहें, और अंग इतने नष्ट न हों कि प्राण के आदेश की उन गतियों के करने में असमर्थ हो जाएं। इस प्रकार किसी मनुष्य के लिए यह दावा करना हास्यास्पद होगा कि उसकी इच्छा का आदेशात्मक कार्य सार्वजनिक आराधना में जाना था, जबकि उसके पैर उसे किसी मधुशाला अथवा वेश्यालय में ले जाते हैं; अथवा यह कि उसकी इच्छा का आदेशात्मक कार्य अपने हाथ में रखी हुई कोई धनराशि किसी दीन भिखारी को देना था, जबकि उसका हाथ उसी क्षण उसे रोके रखता, और दृढ़ता से पकड़े रहता।
दूसरी बात, मैं अब यह दिखाने के लिए आगे बढ़ता हूं कि मसीही चालचलन, उस अर्थ में लिया गया जो समझाया गया है, धर्म में उद्धारक निष्कपटता के उन सब प्रमाणों में मुख्य है, जो उसके अंगीकारियों के विवेक को मिल सकते हैं; और यह मन फिराव में प्रथम कायल होने, ज्योति पाने, और शान्ति पाने की विधि से, अथवा अनुग्रह की किसी भी आन्तरिक खोज अथवा अभ्यास से, जो केवल चिन्तन में आरम्भ और समाप्त हो, कहीं अधिक श्रेयस्कर है।79 इसका प्रमाण निम्नलिखित तर्कों से प्रकट होता है।
तर्क I—बुद्धि स्पष्ट रीति से यह दिखाती है कि जो बातें इस बात की परीक्षा करती हैं कि जब मनुष्यों को अपनी ही पसन्द और झुकाव के अनुसार चलने के लिए छोड़ दिया जाए, तो वे वास्तव में अपने चालचलन में किससे चिपके रहेंगे और किसे अधिक चाहेंगे, वे इस बात की उचित कसौटी हैं कि वे अपने हृदयों में वास्तव में किसे अधिक चाहते हैं। धर्म में निष्कपटता, जैसा पहले देखा जा चुका है, इसी में निहित है कि हृदय में परमेश्वर को सबसे ऊंचा स्थान दिया जाए, 79 "यूहन्ना पर दृष्टि करो, जो मसीह का प्रिय चेला और हृदय का साथी था! उसे उस सच्चे को जानने के लिए अभिषेक मिला था, और वह जानता था कि वह उसे जानता है, 1 यूहन्ना 2:3। परन्तु वह यह कैसे जानता था? वह धोखा खा सकता था;
(क्योंकि यह देखना अद्भुत है कि उदासी की कल्पना क्या कर सकती है, और उसके क्या प्रभाव होते हैं; जैसे ईमानदार मनुष्यों को दुर्बल-मस्तिष्क समझा जाता है, और उन्होंने कभी परमेश्वर के भेदों की गहराइयां नहीं देखीं;) उसका अन्तिम प्रमाण क्या है? 'क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।'" शेपर्ड की पैरेबल, भाग I, पृष्ठ 131।
XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… अन्य सब वस्तुओं से बढ़कर उसे चुनने में, और मसीह के लिये सब कुछ बेच देने का मन रखने में आदि प्रगट होता है। परन्तु मनुष्य के कार्य ही इस बात की उचित परीक्षा हैं कि उसका मन किसे अधिक चाहता है। उदाहरण के लिये, जब परमेश्वर और अन्य वस्तुएं एक दूसरे के विरुद्ध खड़ी हो जाती हैं, और परमेश्वर मानो मनुष्य के एक हाथ पर, और उसका सांसारिक लाभ या सुख दूसरे हाथ पर रखा जाता है (जैसा मनुष्य के जीवन में प्रायः होता रहता है), तो ऐसी दशा में उसका व्यवहार—अर्थात एक से वास्तव में चिपटे रहना और दूसरे को त्याग देना—ही इस बात की उचित परीक्षा है कि वह किसे अधिक चाहता है। सच्चाई इसी में है कि मन से मसीह के लिये सब कुछ त्याग दिया जाए; परन्तु मन से मसीह के लिये सब कुछ त्यागना, और मसीह के लिये सब कुछ त्यागने का मन रखना, ये दोनों एक ही बात हैं; परन्तु निश्चय ही इस बात की उचित परीक्षा कि मनुष्य के मन में मसीह के लिये सब कुछ त्यागने की इच्छा है या नहीं, यही है कि वह वास्तव में उस कसौटी पर कसा जाए, अर्थात मसीह और अन्य वस्तुएं एक दूसरे के विरुद्ध खड़ी हो जाएं, जिस से उसे वास्तव में या व्यवहार में एक से चिपटना और दूसरे को त्यागना पड़े। मन से मसीह के लिये सब कुछ त्यागना, और बुलाए जाने पर मसीह के लिये सब कुछ त्यागने का मन रखना, ये एक ही बात हैं; परन्तु अपने और दूसरों के सामने इसका सबसे बड़ा प्रमाण, कि हमारे मन में बुलाए जाने पर मसीह के लिये सब कुछ त्यागने की इच्छा है, यही है कि जब बुलाया जाए, या जहां तक बुलाया जाए, हम वास्तव में वैसा ही करें। मसीह के
पीछे चलना, मन से मसीह के पीछे चलने का मन रखना है। मन से मसीह के लिये अपने आप का इन्कार करना, और वास्तव में उसके लिये अपने आप का इन्कार करने का मन रखना, ये एक ही बात हैं। जिस बात के विषय में मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार चलने के, और जैसा चाहे वैसा करने या न करने के लिये स्वतंत्र है, उस बात के लिये उसके मन में इच्छा होने का सबसे मुख्य और सबसे उचित प्रमाण उसका उसे करना ही है। जब मनुष्य बोलने या चुप रहने के लिये स्वतंत्र हो, तो उसके मन में बोलने की इच्छा होने का सबसे उचित प्रमाण उसका बोलना ही है। जब मनुष्य चलने या बैठे रहने के लिये स्वतंत्र हो, तो उसके मन में चलने की इच्छा होने का उचित प्रमाण उसका चलना ही है। भक्ति परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का मन रखने में नहीं, वरन उसे पूरा करने में है। जंगल में इस्राएल की सन्तान के पास पहली बात तो थी, जिनके विषय हम व्यवस्थाविवरण 5:27-29 में पढ़ते हैं, "तू निकट जाकर सुन ले जो कुछ हमारा
परमेश्वर यहोवा कहे; और जो कुछ हमारा परमेश्वर यहोवा तुझ से कहे, उसे तू हम से कह देना, और हम उसे सुनकर मानेंगे। और यहोवा ने तुम्हारी बातों का शब्द सुनकर मुझ से कहा, कि मैं ने इन लोगों की बातों का शब्द, जो उन्होंने तुझ से कही हैं, सुना है; उन्होंने जो कुछ कहा वह अच्छा ही कहा। भला होता कि उनका ऐसा ही मन बना रहता, कि वे मेरा भय मानते, और मेरी सब आज्ञाओं को सदा मानते रहते, जिस से उनकी और उनके वंश की भलाई सर्वदा होती रहती!" इन लोगों ने यही प्रगट किया कि उनके मन में परमेश्वर की आज्ञाओं को मानने का इरादा था, और वे इन इरादों को बड़े उत्साह से प्रगट भी करते थे; परन्तु परमेश्वर प्रगट करता है कि यह उस बात से बहुत दूर था जो वह चाहता था, अर्थात जिस में सच्ची भक्ति है—अर्थात उन्हें वास्तव में मानने का मन।
इसलिये यह अत्यन्त निरर्थक, वरन हास्यास्पद है, कि कोई यह दावा करे कि उसका मन अच्छा है, जबकि वह दुष्ट जीवन बिताता है, या अपने व्यवहार में सर्वांगीण पवित्रता का फल नहीं लाता। क्योंकि इस से यह वास्तव में सिद्ध हो जाता है कि ऐसे मनुष्य परमेश्वर से सब से बढ़कर प्रेम नहीं रखते। स्पष्ट तथ्य और अनुभव के विरुद्ध विवाद करना मूर्खता है। जो लोग पाप के मार्गों में जीवन बिताते हैं, और फिर भी अपने आप को यह समझाते हैं कि वे स्वर्ग जाएंगे, या बिना पवित्र व्यवहार के भविष्य में पवित्र जनों के समान ग्रहण किए जाने की आशा रखते हैं, वे मानो यही आशा रखते हैं कि वे अपने न्यायी को मूर्ख बना देंगे।
यही बात उस में निहित है जो प्रेरित कहता है (जब वह मनुष्यों के भले काम करने और पवित्र जीवन बिताने की बात कहता है, XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… जिस से वे अनन्त जीवन के अपने अधिकार का प्रमाण देते हैं), गलातियों 6:7 में: "धोखा न खाओ, परमेश्वर तुच्छ नहीं किया जाता, क्योंकि जो कुछ मनुष्य बोता है वही काटेगा।" मानो यह कहा गया हो, "अपने आप को इस आशा से धोखा मत दो कि तुम भविष्य में अनन्त जीवन काटोगे, यदि तुम यहां आत्मा के लिये नहीं बोते; यह सोचना व्यर्थ है कि तुम परमेश्वर को मूर्ख बना सकोगे, कि वह ठोस वस्तुओं के बदले छायाओं से, और उस अच्छे फल के बदले जिसकी वह आशा रखता है, व्यर्थ दिखावे से छला और भरमाया जाएगा, जबकि तुम्हारे दावे के विपरीत बात तुम्हारे जीवन में उसके सामने स्पष्ट दिखाई देती है।" पवित्रशास्त्र में "तुच्छ करना" शब्द कभी-कभी इसी अर्थ में प्रयोग हुआ है। इसी प्रकार दलीला शिमशोन से कहती है, "देख, तू ने मुझे धोखा दिया, और मुझ से झूठ कहा है," न्यायियों 16:10, 13; अर्थात, "तू ने मुझे ऐसे भरमाया मानो तू मुझे मूर्ख बना देगा, मानो मैं सत्य के बदले किसी भी व्यर्थ बहाने से सहज ही टाली जा सकूं।" इसी प्रकार लूत के विषय कहा गया है कि जब उस ने अपने दामादों से कहा कि परमेश्वर उस स्थान को नाश करेगा, तो "वह अपने दामादों की दृष्टि में ठट्ठा करनेवाला सा जान पड़ा," उत्पत्ति 19:14; अर्थात, वह उन्हें ऐसा जान पड़ा मानो वह उनके साथ खेल कर रहा हो, मानो वे ऐसे भोले मूर्ख हों कि ऐसी डरावनी बातों को सच मान लें। परन्तु वह महान न्यायी, जिसकी आंखें आग की ज्वाला के समान हैं, बिना पवित्र जीवन के किसी दिखावे से न तो तुच्छ किया जाएगा और न भरमाया जाएगा। यदि मनुष्यों ने उसके नाम से भविष्यद्वाणी की हो, और आश्चर्यकर्म किए हों, और उनके पास ऐसा विश्वास रहा हो कि वे पहाड़ों को हटा सकें, और दुष्टात्माओं को निकाल सकें, और चाहे उनके धार्मिक मनोभाव कितने ही ऊंचे क्यों न रहे हों, चाहे उन में अनुग्रह की कितनी ही बड़ी झलक क्यों न रही हो, और चाहे उनका छिपने का स्थान इतना अन्धेरा और गहरा क्यों न रहा हो कि किसी मानवीय चतुराई या खोज से वे पाए न जा सकते, तौभी यदि वे अनर्थ काम करनेवाले या करते रहनेवाले हों, तो वे अपने न्यायी से अपने कपट को छिपा नहीं सकते: अय्यूब 34:22, "ऐसा कोई अन्धियारा वा घोर अन्धकार नहीं, जिस में अनर्थकारी छिप सकें।" क्या कोई बुद्धिमान राजा अपने आप को किसी प्रजाजन से मूर्ख बनाने और भरमाने देगा, जो यह दावा करे कि वह उसका वफादार प्रजाजन है, और अपने राजा से कहे कि उसका उस से पूरा स्नेह है, और अमुक-अमुक समय पर उसे इसका अनुभव हुआ, और उसने अपने मनोभावों को उसकी ओर बलपूर्वक कार्य करते हुए अनुभव किया, और यह आशा रखते हुए आए कि उसका राजा उसे इसी कारण अपने सबसे अच्छे मित्रों में से एक मानकर ग्रहण करेगा और प्रतिफल देगा, जबकि वह उसके विरुद्ध बलवा करता हुआ जीवन बिताता रहा, उसके सिंहासन के किसी दावेदार के पीछे चलता रहा, और समय-समय पर उसके विरुद्ध बलवा भड़काता रहा? या क्या कोई स्वामी अपने आप को किसी सेवक से धोखा खाने और भरमाए जाने देगा, जो अपने मन में उसके प्रति बड़े प्रेम और आदर के अनुभवों का, और उसकी योग्यता व दया की बड़ी समझ का दावा करे, जबकि वह साथ ही साथ उसकी आज्ञा मानने से इन्कार करता रहे, और स्वामी उस से कोई सेवा करा ही न सके?
तर्क २—जिस प्रकार बुद्धि यह दिखाती है कि जीवन में घटित होनेवाली वे बातें, जो इस बात की परीक्षा करती हैं कि मनुष्य व्यवहार में परमेश्वर को अन्य वस्तुओं से बढ़कर चाहेंगे या नहीं, उनके मन की खराई और सच्चाई की उचित परीक्षा हैं; उसी प्रकार पवित्रशास्त्र में भी वे ही बातें विश्वास का दावा करनेवालों की सच्चाई की उचित परीक्षा के रूप में दिखाई गई हैं। वहां हम पाते हैं कि ऐसी बातें ठीक इसी नाम से पुकारी जाती हैं, अर्थात परीक्षाएं या परखें (जो, जैसा मैं पहले कह चुका हूं, एक ही अर्थ के दो शब्द हैं)। जो बातें इसकी परीक्षा करती हैं कि मनुष्य व्यवहार में परमेश्वर को अन्य वस्तुओं से बढ़कर चाहेंगे या नहीं, वे भक्ति की कठिनाइयां हैं, अर्थात वे बातें जो कर्तव्य के पालन को कठिन बना देती हैं, और परमेश्वर के प्रेम के अतिरिक्त अन्य सिद्धान्तों के विरुद्ध पड़ती हैं; XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… क्योंकि उन में परमेश्वर और अन्य वस्तुएं दोनों मनुष्यों के सामने साथ-साथ उनके वास्तविक और व्यावहारिक चुनाव के लिये रखी जाती हैं; और बात यहां तक आ पहुंचती है कि हम दोनों को नहीं थाम सकते, वरन एक या दूसरे को त्यागना ही पड़ता है। और ये बातें पवित्रशास्त्र में सर्वत्र परीक्षा या परख के नाम से पुकारी गई हैं।80
और वे इस नाम से इसलिये पुकारी जाती हैं, क्योंकि इनके द्वारा विश्वास का दावा करनेवाले परखे और जांचे जाते हैं कि वे वास्तव में किस प्रकार के हैं, अर्थात क्या वे सचमुच वही हैं जो वे अपने आप को दावा करते और दिखाई देते हैं; और क्योंकि इनके द्वारा परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम की वास्तविकता प्रयोग और तथ्य की कसौटी पर लाई जाती है; ये वे उचित प्रमाण हैं जिनके द्वारा अनुभव से सचमुच यह निश्चित होता है कि मनुष्यों के मन में परमेश्वर से चिपटे रहने का पूरा झुकाव है या नहीं: व्यवस्थाविवरण 8:2, "और तू उस सारे मार्ग को स्मरण रखना जिस से तेरा परमेश्वर यहोवा इन चालीस वर्षों तक जंगल में तुझे लिये फिरा, कि वह तुझे नम्र बनाए, और तुझे जांचे, कि तू उसकी आज्ञाओं को मानेगा वा नहीं।" न्यायियों 2:21, 22, "इसलिये अब मैं भी यहोशू के मरने के समय जो जातियां रह गई थीं, उनको इस्राएलियों के आगे से फिर न निकालूंगा, कि इनके द्वारा मैं इस्राएल की परीक्षा करूं, कि वे यहोवा के मार्ग पर चलने में सचेत रहते हैं वा नहीं।"
इसी प्रकार अध्याय 3:1, 4, और निर्गमन 16:4 में भी है।
जब पवित्रशास्त्र भक्ति की इन कठिनाइयों को परीक्षा या परख के नाम से पुकारता है, तो वह स्वयं यह स्पष्ट करता है कि इस से उसका अभिप्राय उनके विश्वास की परख या परीक्षण से है: याकूब 1:2, 3, "हे मेरे भाइयो, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो उसे बड़े आनन्द की बात समझो; क्योंकि तुम जानते हो, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है।" 1 पतरस 1:6, 7, "इस से तुम बहुत आनन्दित होते हो, यद्यपि अभी थोड़ी देर के लिये नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण शोकित होते हो, ताकि तुम्हारे विश्वास की परीक्षा, जो आग में ताए हुए सोने से भी कहीं बहुमूल्य है,"
आदि, प्रगट हो। इसी प्रकार प्रेरित पौलुस दरिद्रों के लिये अपनी सम्पत्ति देने के उस महंगे कर्तव्य की बात, मसीहियों के प्रेम की सच्चाई के प्रमाण के रूप में करता है: 2 कुरिन्थियों 8:8। और भक्ति की कठिनाइयां पवित्रशास्त्र में प्रायः विश्वास का दावा करनेवालों की परीक्षा के रूप में उसी प्रकार दिखाई गई हैं जैसे भट्टी सोने और चांदी की उचित परीक्षा है: भजन संहिता 66:10, 11, "हे परमेश्वर, तू ने हमें जांचा है; तू ने हमें ऐसा ताया है जैसा चांदी ताई जाती है। तू ने हमें जाल में फंसाया, तू ने हमारी कमर पर भारी बोझ लाद दिया।" जकर्याह 13:9, "और मैं उस तिहाई को आग में डालूंगा, और उन्हें ऐसा निर्मल करूंगा जैसा चांदी निर्मल की जाती है, और ऐसा परखूंगा जैसा सोना परखा जाता है।" जिस वस्तु का रंग और रूप सोने के समान हो, उसे भट्टी में इसलिये डाला जाता है कि परखा जाए कि वह सचमुच वैसी ही है जैसी दिखाई देती है, अर्थात सच्चा सोना है या नहीं। इसी प्रकार भक्ति की कठिनाइयां परीक्षाएं कहलाती हैं, क्योंकि वे उन लोगों को परखती हैं जो संतों का दावा और रूप रखते हैं, कि क्या वे सचमुच वही हैं जो दिखाई देते हैं, अर्थात सच्चे संत।
यदि हम सच्चे सोने को भट्टी में डालें, तो हमें उसका बड़ा मूल्य और बहुमूल्यता ज्ञात होगी: उसी प्रकार सच्चे मसीही के गुणों की सच्चाई और अमूल्य मूल्य इन परीक्षाओं के अधीन प्रगट होता है: 1 पतरस 1:7, "ताकि तुम्हारे विश्वास की परीक्षा, जो नाश हो जानेवाले सोने से भी कहीं बहुमूल्य है, यीशु मसीह के प्रगट होने के समय प्रशंसा, आदर और महिमा के योग्य पाई जाए।" सच्चा और शुद्ध सोना भट्टी से पूरे तौल में निकलता है, वैसे ही सच्चे संत, जब परखे जाते हैं, तो सोने के समान निकलते हैं, अय्यूब 23:10।
80 2 कुरिन्थियों 8:2; इब्रानियों 11:36; 1 पतरस 1:7; अध्याय 4:12; उत्पत्ति 22:1; व्यवस्थाविवरण 8:2, 16; अध्याय 13:3; निर्गमन 15:25; अध्याय 16:4; न्यायियों 2:22; अध्याय 3:1, 4; भजन संहिता 66:10, 11; दानिय्येल 12:10; प्रकाशितवाक्य 3:10; अय्यूब 23:10; जकर्याह 13:9; याकूब 1:12; प्रकाशितवाक्य 2:10; लूका
8:13; प्रेरितों के काम 20:19; याकूब 1:2, 3; 1 पतरस 1:6।
XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… मसीह सच्चे अनुग्रह को नकली अनुग्रह से इस बात के द्वारा अलग करता है, कि वह आग में ताया हुआ सोना है, प्रकाशितवाक्य
3:17, 18। इस से यह स्पष्ट है, कि पवित्रशास्त्र में ये बातें मुख्यतः इसलिये परीक्षाएं कहलाती हैं, क्योंकि वे विश्वास का दावा करनेवालों की सच्चाई को परखती और सिद्ध करती हैं। और अब तक जो कुछ देखा गया है उस से यह स्पष्ट है कि वे उनकी सच्चाई की सबसे उचित परीक्षा या प्रमाण हैं; क्योंकि पवित्रशास्त्र में साधारणतया प्रयुक्त 'परीक्षा' शब्द का ठीक अर्थ ही वह कठिनाई है जो विश्वास का दावा करनेवाले के कर्तव्य के मार्ग में आती है, उसकी सच्चाई की परीक्षा या परख के रूप में। यदि 'सच्चाई की परीक्षा' ही भक्ति की इन कठिनाइयों का उचित नाम है, तो निःसन्देह भक्ति की ये कठिनाइयां ठीक और विशेष रूप से सच्चाई की परीक्षा हैं; क्योंकि निःसन्देह वे विशेष रूप से वही हैं जो पवित्र आत्मा उन्हें कहता है: परमेश्वर वस्तुओं को उनका नाम उस से देता है जो विशेष रूप से उनका स्वभाव है। और यदि ऐसा है, कि ये बातें विश्वास का दावा करनेवालों की सच्चाई की उचित और विशेष परीक्षा, प्रमाण या परख हैं, तो निश्चय ही उस परीक्षा या परख का परिणाम
(अर्थात ऐसी परीक्षाओं के अधीन मनुष्यों का व्यवहार या आचरण) उनकी सच्चाई का उचित और विशेष प्रमाण है; क्योंकि वे परीक्षा या प्रमाण केवल परिणाम के सम्बन्ध में कहलाती हैं, और इसलिये कि उनका परिणाम ही विशेष रूप से प्रमाण या साक्षी है। और यही उन लोगों के विवेक के लिये सबसे उचित प्रमाण और साक्षी है जो इन परीक्षाओं के अधीन होते हैं। क्योंकि जब कहा जाता है कि परमेश्वर इन बातों के द्वारा मनुष्यों को परखता और जांचता है, यह देखने के लिये कि उनके मन में क्या है, और वे उसकी आज्ञाओं को मानेंगे या नहीं; तो इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि यह उसकी अपनी जानकारी के लिये है, या कि वह स्वयं उनकी सच्चाई का प्रमाण प्राप्त करना चाहता है (क्योंकि उसे अपनी जानकारी के लिये किसी परीक्षा की आवश्यकता नहीं); वरन मुख्यतः उनके कायल होने के लिये, और उनके विवेक के सामने प्रमाण प्रगट करने के लिये है।81
इस प्रकार, जब कहा जाता है कि परमेश्वर ने जंगल में उनकी भेंट हुई कठिनाइयों के द्वारा, और कनान में उनके शत्रुओं से मिली कठिनाइयों के द्वारा इस्राएल को परखा, यह जानने के लिये कि उनके मन में क्या है, कि वे उसकी आज्ञाओं को मानेंगे वा नहीं; तो इसे यही समझना चाहिए कि यह उन्हें अपने आप को दिखाने के लिये था, ताकि वे स्वयं जान सकें कि उनके अपने मन में क्या है। इसी प्रकार जब परमेश्वर ने अब्राहम को अपने पुत्र को चढ़ाने की उस कठिन आज्ञा से परखा या जांचा, तो यह उसकी अपनी तसल्ली के लिये नहीं था कि अब्राहम परमेश्वर का भय मानता है या नहीं, वरन अब्राहम की अपनी अधिक बड़ी तसल्ली और शान्ति के लिये, और उस पर परमेश्वर के अनुग्रह के अधिक स्पष्ट रूप से प्रगट होने के लिये था। जब अब्राहम इस परीक्षा में सच्चा निकला, तो परमेश्वर उस से कहता है, "अब मुझे निश्चय हो गया, कि तू परमेश्वर का भय मानता है, क्योंकि तू ने अपने पुत्र, वरन अपने इकलौते पुत्र को भी, मुझ से रख न छोड़ा।"
इस से यह स्पष्ट रूप से निहित है, कि इस परीक्षा के अधीन अब्राहम के अनुग्रह के इस व्यावहारिक प्रकटीकरण में, उसके अनुग्रह की सच्चाई का पहले से कहीं अधिक स्पष्ट प्रमाण था; और यह अब्राहम के विवेक के लिये सबसे बड़ा प्रमाण था; क्योंकि परमेश्वर स्वयं इसे अब्राहम को उसकी शान्ति और आनन्द के लिये इसी रूप में देता है; और उस से इसकी बात इस प्रकार करता है मानो यह उसके विवेक के लिये अपने न्यायी की दृष्टि में खरा होने का सबसे बड़ा प्रमाण हो सकता है। इस से वह बात सिद्ध होती है जो मैं कह रहा हूं, अर्थात पवित्र व्यवहार,
81 "मुझे विश्वास है, जैसा कैल्विन को भी था, कि मनुष्यों की सब भांति की परीक्षाएं इसलिये होती हैं कि वे उन्हें अपने आप को, और जगत को, दिखा दें कि वे केवल नकली हैं; और संतों को स्वयं अपने आप को और अच्छी तरह जानने में सहायता दें, रोमियों 5:5। क्लेश परीक्षा उत्पन्न करता है, और परीक्षा आशा उत्पन्न करती है, नीतिवचन 17:3। यदि तुम जानना चाहते हो कि वह तौल में ठीक ठहरेगा या नहीं, तो परीक्षा ही तुम्हें बता देगी। शेपर्ड की
पैरेबल, भाग 1, पृष्ठ 191।
XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… परीक्षाओं के अधीन ही, विश्वास का दावा करनेवालों की सच्चाई का उनके अपने विवेक के लिये सबसे बड़ा प्रमाण है।
और हम पाते हैं कि मसीह ने भी समय-समय पर उन लोगों के विवेक को कायल करने के लिये, जो उसकी मित्रता का दावा करते थे, और उन्हें यह दिखाने के लिये कि वे वास्तव में क्या थे, यही रीति अपनाई। यही रीति उसने उस धनी जवान के साथ अपनाई, मत्ती 19:16 आदि। वह मसीह के प्रति बड़ा आदर दिखाता जान पड़ता था; वह घुटने टेककर उसके पास आया और उसे उत्तम गुरू कहा, और आज्ञाओं को मानने का बड़ा दावा किया; परन्तु मसीह ने उसे यह कहकर परखा कि वह जाकर अपना सब कुछ बेच दे, और दरिद्रों को दे दे, और आकर अपना क्रूस उठाकर उसके पीछे हो ले, और उस से कहा कि तब उसे स्वर्ग में धन मिलेगा। इसी प्रकार उसने एक और मनुष्य को परखा, जिसके विषय हम मत्ती 8:20 में पढ़ते हैं। उसने मसीह के प्रति बड़े आदर का दावा किया: उसने कहा, हे प्रभु, तू जहां कहीं जाएगा मैं तेरे पीछे हो लूंगा। मसीह ने तुरन्त उसकी मित्रता को यह कहकर कसौटी पर रखा, कि लोमड़ियों के भट होते हैं, और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं, परन्तु मनुष्य के पुत्र के सिर धरने की भी जगह नहीं। और इसी प्रकार मसीह अपनी प्रोवीडेंस में सामान्यतः विश्वास का दावा करनेवाले चेलों को अब भी परखता रहता है। जैसे हर प्रकार की भूमि में बोया गया बीज—पथरीली भूमि, कंटीली भूमि, और अच्छी भूमि—जब पहले-पहल उगता है तो सब में एक समान दिखाई देता है; तौभी सूर्य की तपती धूप के द्वारा वह परखा जाता है, और उनका भेद प्रगट हो जाता है।
इसलिये, चूंकि ये ही वे बातें हैं जिनका प्रयोग परमेश्वर हमें परखने के लिये करता है, तो निःसन्देह अपने आप पर सही न्याय करने का सबसे निश्चित उपाय यही है कि हम भी अपने आप को इन्हीं बातों से परखें। उसकी ये परीक्षाएं उसकी जानकारी के लिये नहीं, वरन हमारी जानकारी के लिये हैं; इसलिये हमें अपनी जानकारी वहीं से प्राप्त करनी चाहिए। अपने सोने को जानने का सबसे निश्चित उपाय यही है कि हम उसे परमेश्वर की भट्टी में देखें और जांचें, जहां वह उसे इसी उद्देश्य से परखता है, कि हम देख सकें कि वह क्या है। यदि हम यह जानना चाहें कि कोई भवन दृढ़ता से खड़ा है या नहीं, तो हमें उसे तब देखना होगा जब आंधी चलती है। यदि हम यह जानना चाहें कि जो वस्तु गेहूं के रूप में दिखाई देती है उस में वास्तव में गेहूं का सत्व है, या वह केवल भूसी है, तो हमें उसे तब देखना होगा जब वह फटका जाता है।
यदि हम यह जानना चाहें कि कोई लाठी मजबूत है, या सड़ा हुआ टूटा सरकंडा है, तो हमें उसे तब देखना होगा जब उस पर टेक ली जाती है, और उस पर भार डाला जाता है। यदि हम अपने आप को उचित रीति से तौलना चाहें, तो हमें अपने आप को परमेश्वर के उन्हीं तराजुओं में तौलना होगा जिनका प्रयोग वह हमें तौलने के लिये करता है।82 हमारे व्यवहार में आनेवाली ये परीक्षाएं मानो वे तराजू हैं जिन में हमारे मन तौले जाते हैं, अथवा जिन में मसीह और जगत, या मसीह और उसके प्रतिद्वंद्वी, हमारे मन में उनके प्रति आदर और सम्मान के विषय में, विरोधी पलड़ों में रखे जाते हैं, जिस से यह देखने का अवसर मिलता है कि कौन-सा पलड़ा भारी पड़ता है। जब मनुष्य ऐसे दोराहे पर लाया जाता है, जिस में से एक मार्ग मसीह की ओर, और दूसरा उसकी अभिलाषाओं की वस्तु की ओर जाता है, यह देखने के लिये कि वह किस मार्ग जाएगा, अथवा मानो मसीह और जगत के बीच, मसीह को दाहिने हाथ पर और जगत को बाएं हाथ पर रखकर खड़ा किया जाता है, ताकि यदि वह एक की ओर जाए तो उसे दूसरे को छोड़ना ही पड़े, यह देखने के लिये कि उसका मन
82 डॉ. सिब्स अपनी पुस्तक 'ब्रूज़्ड रीड' में कहते हैं, "जब मसीह की इच्छा किसी सांसारिक हानि या लाभ के साथ प्रतिस्पर्धा में आती है, तौभी यदि उस विशेष दशा में मन मसीह के आगे झुक जाए, तो यह सच्चा चिन्ह है। क्योंकि अनुग्रह के सामर्थ्य की सबसे सच्ची परीक्षा ऐसे ही विशेष अवसरों में है जो हमें सबसे निकट से छूते हैं, क्योंकि वहीं हमारा भ्रष्टाचार सबसे अधिक सिर उठाता है। जब मसीह ने सुसमाचार के उस जवान के पास आकर उसकी परीक्षा की, तो उसने अपना एक चेला खो दिया।"
XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… सबसे अधिक झुकता है, या उसके मन में कौन-सा पलड़ा भारी पड़ता है; यह ठीक वही बात है जो मसीह और जगत को दो विरोधी पलड़ों में रखने के समान है; और उसका एक की ओर जाना और दूसरे को छोड़ देना, ठीक वही बात है जो एक पलड़े का झुक जाना और दूसरे का ऊपर उठ जाना है। इसलिये परमेश्वर की प्रोवीडेंस की परीक्षाओं के अधीन मनुष्य का व्यवहार, उसके मन के अधिक बलवान झुकाव का उतना ही उचित प्रमाण है, जितना विरोधी पलड़ों में भिन्न-भिन्न भारों के साथ तराजू की गति अधिक भार की उचित परख है।
तर्क ३—एक और तर्क, कि जिस अर्थ में इसकी व्याख्या की गई है उस अर्थ में पवित्र व्यवहार, मसीहियों के विवेक के लिये अनुग्रह की सच्चाई का सबसे बड़ा प्रमाण है, यह है कि व्यवहार में ही, पवित्रशास्त्र की भाषा में, अनुग्रह को सिद्ध किया जाना, या पूरा किया जाना कहा गया है। इसी प्रकार प्रेरित याकूब कहता है, याकूब 2:22, "तो देख, विश्वास ने उसके कामों के साथ मिलकर प्रभाव किया, और कामों से विश्वास सिद्ध हुआ" (अर्थात, जैसा मूल भाषा का शब्द ठीक-ठीक बताता है, पूरा हुआ)?
इसी प्रकार परमेश्वर के प्रेम के विषय भी कहा गया है कि वह उसकी आज्ञाओं को मानने में सिद्ध, या पूरा किया जाता है।
1 यूहन्ना 2:4, 5, "जो कोई कहता है, कि मैं उसे जानता हूं, और उसकी आज्ञाओं को नहीं मानता, वह झूठा है, और उस में सत्य नहीं; पर जो कोई उसके वचन पर चलता है, उस में सचमुच परमेश्वर का प्रेम सिद्ध हो गया है।" मसीह की जिस आज्ञा की ओर प्रेरित का विशेष ध्यान है, जब वह यहां हमारे उसकी आज्ञाओं को मानने की बात कहता है, वह (जैसा मैं पहले कह चुका हूं) उसकी वही महान आज्ञा है, जो हमारे भाइयों के प्रति प्रेम के कामों से सम्बन्धित है, जैसा आगे की आयतों से प्रगट होता है।
फिर, परमेश्वर के प्रेम के विषय इसी अर्थ में सिद्ध किया जाना कहा गया है, अध्याय 4:12 में: "यदि हम एक दूसरे से प्रेम रखें, तो परमेश्वर हम में बना रहता है, और उसका प्रेम हम में सिद्ध हो गया है।" यहां निःसन्देह प्रेरित का ध्यान अब भी एक दूसरे से प्रेम रखने की ओर है, उसी रीति से जैसा उसने पिछले अध्याय में समझाया था, जब वह एक दूसरे से प्रेम रखने को परमेश्वर के प्रेम के चिन्ह के रूप में बताता है, आयत 17,
18: "जिसके पास संसार की सम्पत्ति हो, और वह अपने भाई को कंगाल जाने, और उस पर तरस न खाए, तो उस में परमेश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है? हे मेरे बालको, हम वचन या जीभ ही से नहीं, वरन काम में (या कार्य में) और सत्याई से प्रेम रखें।" इस प्रकार काम में प्रेम रखने से, प्रेरित कहता है, "हम में परमेश्वर का प्रेम सिद्ध हो जाता है।" अनुग्रह के विषय कहा जाता है कि वह पवित्र व्यवहार में सिद्ध किया जाता है, या पूरा किया जाता है, क्योंकि उस में वह अपने उचित परिणाम तक, और उस प्रकटीकरण तक पहुंचता है जो उस सिद्धान्त का लक्ष्य है; इसी में अनुग्रह की प्रवृत्ति और उद्देश्य पूरा होता है, और उसका कार्य पूर्ण होकर अपनी चोटी पर पहुंचता है। जैसे वृक्ष फल में सिद्ध होता है; वह बीज के भूमि में बोए जाने में सिद्ध नहीं होता; वह बीज के पहले-पहल अंकुरित होने में, और उसकी जड़ और अंकुर निकालने में सिद्ध नहीं होता; न वह तब सिद्ध होता है जब वह भूमि से बाहर निकलता है; न वह पत्ते निकालने में सिद्ध होता है; न ही फूल निकालने में; परन्तु जब वह अच्छा पका हुआ फल ले आता है, तभी वह सिद्ध होता है, तभी वह अपने लक्ष्य तक पहुंचता है, और वृक्ष का उद्देश्य पूरा हो जाता है: वृक्ष से सम्बन्धित सब कुछ फल में ही पूर्ण होकर अपने उचित परिणाम तक पहुंचता है। अनुग्रह भी अपने व्यावहारिक प्रकटीकरणों में ऐसा ही है। अनुग्रह के विषय कहा जाता है कि वह अपने काम या फल में सिद्ध किया जाता है, या पूरा किया जाता है, उसी रीति से जैसा पाप के विषय कहा गया है, याकूब 1:15, "फिर लालसा गर्भवती होकर पाप को जन्म देती है, और पाप जब पूरा हो जाता है, तो मृत्यु को उत्पन्न करता है।" यहां तीन चरण हैं; पहला, पाप अपने सिद्धान्त या स्वभाव में, अर्थात मन में लालसा का होना; और दूसरा, यहां उसका गर्भवती होना है, जिस में मन में उसके भीतरी प्रकटीकरण सम्मिलित हैं; और अन्त में, यहां वह फल है जो गर्भ में धारण किया गया था, और वास्तव में उत्पन्न
XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… हुआ, अर्थात दुष्ट काम और व्यवहार में प्रगट हुआ। और इसी को प्रेरित पाप का पूरा होना या सिद्ध होना कहता है: क्योंकि मूल भाषा में यह वही शब्द है जो उन पूर्वोक्त स्थानों में 'सिद्ध किया गया' अनुवाद किया गया है।
अब निश्चय ही, यदि ऐसा है, यदि अनुग्रह इस रीति से अपने फल में सिद्ध किया जाता है, यदि अनुग्रह के ये व्यावहारिक प्रकटीकरण ही वे प्रकटीकरण हैं जिन में अनुग्रह अपने उचित परिणाम और लक्ष्य तक पहुंचता है, और जिन में उसके उद्देश्य, प्रवृत्ति और कार्य से सम्बन्धित सब कुछ पूर्ण होकर अपनी चोटी पर पहुंचता है; तो निश्चय ही ये प्रकटीकरण अन्य सब प्रकटीकरणों से बढ़कर अनुग्रह के सबसे बड़े प्रमाण होने चाहिए। निःसन्देह प्रत्येक सिद्धान्त का उचित स्वभाव और प्रवृत्ति उसके सबसे सिद्ध प्रकटीकरणों में ही, अर्थात उन प्रकटीकरणों में जिन में उसका स्वभाव सबसे पूर्ण रूप से प्रगट होता है, और जिन में उसकी प्रवृत्ति अपने उचित परिणाम और लक्ष्य में सबसे पूर्ण रूप से सफल और चरितार्थ होती है, सबसे अच्छी और सबसे पूर्ण रीति से प्रगट होनी चाहिए। यदि हम किसी भी वस्तु का उचित स्वभाव देखना चाहें, और उसे अन्य वस्तुओं से पूर्ण रूप से भिन्न देखना चाहें; तो हमें उसे उसके पूरा होने में देखना चाहिए। प्रेरित याकूब कहता है, कि कामों से विश्वास सिद्ध होता है; और यह इस तर्क को सिद्ध करने के लिये प्रस्तुत करता है, कि काम ही विश्वास का मुख्य प्रमाण हैं, जिनके द्वारा विश्वास का दावा करनेवालों की सच्चाई ठहराई जाती है,
याकूब 2। और प्रेरित यूहन्ना, हमें एक बार नहीं वरन बार-बार यह बताने के बाद कि प्रेम मसीह की आज्ञाओं को मानने में सिद्ध किया जाता है, यह कहता है, 1 यूहन्ना 4:18, कि सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है; जिसका अर्थ (कम से कम आंशिक रूप से) इसी अर्थ में सिद्ध किया गया प्रेम है; यह उस बात के अनुरूप है जो उसने पिछले अध्याय में कही थी, कि काम में, या कार्य में प्रेम रखने से हम जानते हैं कि हम सत्य से हैं, और अपने हृदय को उसके सामने ढाढ़स देंगे, आयत 18, 19।
तर्क ४—एक और बात जो यह स्पष्ट करती है, कि पवित्र व्यवहार ही वह मुख्य प्रमाण है जिसका प्रयोग हमें अपनी और दूसरों की सच्चाई परखने में करना चाहिए, यह है कि पवित्रशास्त्र में इस प्रमाण पर अन्य सब प्रमाणों से बढ़कर बल दिया गया है। पवित्रशास्त्र से साधारण परिचय, और थोड़े ध्यान व निरीक्षण के साथ, किसी को भी यह दिखाने के लिये पर्याप्त होगा कि उत्पत्ति के आरम्भ से प्रकाशितवाक्य के अन्त तक, सारे पवित्रशास्त्र में इसी बात पर सच्ची भक्ति के चिन्ह के रूप में अन्य किसी भी बात से दस गुणा अधिक बल दिया गया है। और नये नियम में, जहां मसीह और उसके प्रेरित स्पष्ट रूप से और घोषित उद्देश्य से सच्ची भक्ति के चिन्ह प्रस्तुत करते हैं, वहां लगभग पूरी तरह इसी बात पर बल दिया गया है। यह देखा जा सकता है, कि मसीह और उसके प्रेरित न केवल भक्ति के महान सिद्धान्तों पर विचार करते समय प्रायः ऐसी बातें कहते हैं जो यह दिखाती हैं कि सच्ची भक्ति का स्वभाव क्या होना चाहिए, या जिन से उसका स्वभाव और चिन्ह उचित निष्कर्ष द्वारा निकाले जा सकते हैं, और प्रायः प्रसंगवश भक्ति से सम्बन्धित अनेक बातों का उल्लेख करते हैं; परन्तु वे प्रायः निश्चित उद्देश्य से विश्वास का दावा करनेवालों की परीक्षा के लिये चिन्ह और लक्षण भी देते हैं, और उन्हें उन्हीं चिन्हों से अपने आप को परखने के लिये प्रेरित करते हैं, और अपनी बात इन शब्दों के साथ आरम्भ करते हैं: "इसी से तुम जानोगे, कि तुम उसे जानते हो: इसी से परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान प्रगट होती है: जिसके पास यह है, वह अच्छी नींव पर बनाता है; जिसके पास यह नहीं, वह बालू पर बनाता है: इसी से हम अपने हृदय को ढाढ़स देंगे: वही मनुष्य है जो प्रेम रखता है
मसीह से," आदि। परन्तु मुझे ऐसा कोई स्थान नहीं मिलता, जहां मसीह या उसके प्रेरित इस रीति से भक्ति के चिन्ह देते हों (यद्यपि ऐसे स्थान बहुत हैं), परन्तु जहां ईसाई व्यवहार ही लगभग
XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… इस पर बल दिया गया है। सचमुच, इन में से अनेक स्थानों में भाइयों के प्रति प्रेम को भक्ति के चिन्ह के रूप में बताया गया है; और, जैसा मैं पहले कह चुका हूं, कोई भी एक सद्गुणी मनोभाव या प्रवृत्ति ऐसी नहीं जिसका सच्चे अनुग्रह के चिन्ह के रूप में इतनी बार स्पष्ट उल्लेख किया गया हो, जितना हमारे एक दूसरे से प्रेम रखने का; परन्तु फिर पवित्रशास्त्र स्वयं स्पष्ट करता है कि इस से उसका अभिप्राय मुख्यतः इस प्रेम से है जैसा वह व्यवहार में, अर्थात प्रेम के कामों में प्रगट और व्यक्त होता है। इसी प्रकार प्रेरित यूहन्ना, जो सब से बढ़कर भाइयों के प्रति प्रेम पर भक्ति के चिन्ह के रूप में बल देता है, 1 यूहन्ना 3:14 आदि में सबसे स्पष्ट रूप से स्वयं यह बताता है, "हम जानते हैं, कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुंच गए हैं, क्योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं; जो प्रेम नहीं रखता, वह मृत्यु में रहता है। जिसके पास संसार की सम्पत्ति हो, और वह अपने भाई को दरिद्र जाने, और उस पर तरस न खाए, तो उस में परमेश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है? हे मेरे बालको, हम वचन या जीभ ही से नहीं, वरन काम में (अर्थात प्रेम के कामों में) और सत्याई से प्रेम रखें। और इसी से हम जानते हैं, कि हम सत्य से हैं, और उसके सामने अपने हृदय को ढाढ़स देंगे।" इसलिये जब पवित्रशास्त्र हमारे एक दूसरे से प्रेम रखने पर, भक्ति के एक बड़े चिन्ह के रूप में, इतना बल देता है, तो हमें इस से मनुष्यों के परस्पर अनुभव किए जानेवाले मनोभाव के भीतरी हलचल को नहीं, वरन आत्मा के व्यवस्था की दूसरी तख्ती के सब कर्तव्यों का पालन करने को समझना चाहिए; जिन सब को नया नियम बार-बार यह बताता है कि एक दूसरे से सच्चा प्रेम रखने में सम्मिलित हैं, रोमियों 13:8, 10, गलातियों 5:14, मत्ती 22:39,
40। इसलिये, सचमुच नये नियम में ऐसा कोई स्थान नहीं जहां भक्ति के चिन्ह देने का घोषित उद्देश्य हो, परन्तु जहां पवित्र व्यवहार और मसीह की आज्ञाओं को मानना ही वह लक्षण हो जो अन्य सब में से चुनकर उस पर बल दिया गया हो। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है, कि यही भक्ति के सब प्रमाणों में मुख्य है: जब तक हम यह न मान लें कि जब मसीह और उसके प्रेरितों ने उद्देश्यपूर्वक चिन्ह देने के इस कार्य को अपने हाथ में लिया, जिनके द्वारा विश्वास का दावा करनेवाले
मसीही सब युगों में अपनी दशा निश्चित कर सकें; वे हमारे उनके लिये चुने हुए चिन्हों से बेहतर चिन्ह चुनना नहीं जानते थे। परन्तु यदि हम मसीह के वचन को अपना नियम बनाएं, तो निःसन्देह वे ही लक्षण, जिन्हें मसीह और उसके प्रेरितों ने मुख्यतः प्रस्तुत किया, और हमें दिया, कि हम उन से अपने आप को परखें, हमें विशेष रूप से ग्रहण करने चाहिए, और अपने आप को परखने में मुख्यतः प्रयोग करने चाहिए।83 और निःसन्देह जिन बातों पर मसीह और उसके प्रेरितों ने अपने दिए हुए नियमों में मुख्यतः बल दिया, उन्हीं पर सेवकों को अपने दिए हुए नियमों में मुख्यतः बल देना चाहिए। जिन बातों पर पवित्रशास्त्र थोड़ा बल देता है उन पर बहुत बल देना, और जिन बातों पर पवित्रशास्त्र बहुत बल देता है उन पर बहुत थोड़ा बल देना, खतरनाक बात है; क्योंकि यह परमेश्वर के मार्ग से हटकर चलना है, और अशास्त्रीय रीति से अपने आप का न्याय करना और दूसरों को मार्गदर्शन देना है। परमेश्वर जानता था कि आत्माओं को ले चलने और मार्गदर्शन देने का कौन-सा मार्ग उनके लिये सबसे सुरक्षित और सबसे अच्छा है: उसने कुछ बातों पर इतना बल इसलिये दिया, क्योंकि वह जानता था कि उन पर बल देना आवश्यक है; और एक बुद्धिमान परमेश्वर के समान उसने अन्य बातों को इतना नहीं छेड़ा, क्योंकि वह जानता था कि हमारे लिये यह अच्छा नहीं कि परीक्षा का भार वहां इतना अधिक रखा जाए। जैसे सब्त मनुष्य के लिये बनाया गया, वैसे ही पवित्रशास्त्र मनुष्य के लिये बनाया गया; और वह अनन्त बुद्धि के द्वारा 83 डॉ. प्रेस्टन कहते हैं, "यह एक निश्चित नियम है," कि "जिन बातों पर पवित्रशास्त्र बहुत शब्द व्यय करता है, उन पर हमें बहुत विचार करना चाहिए: और जिन बातों पर पवित्र आत्मा सब से अधिक बल देता है, उन्हें हमें सब से अधिक मूल्यवान समझना चाहिए।" चर्चेस कैरिज।
XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… हमारे उपयोग और भलाई के लिये उपयुक्त बनाया गया है। इसलिये हमें भक्ति के विषय में, और अपने आप के विषय में, अपने सब विचारों में उसी को अपना मार्गदर्शक बनाना चाहिए। और यह कि जिसे पवित्रशास्त्र छोटा मानता है उसे हम बड़ा बनाएं, और जिसे वह बड़ा मानता है उसे हम छोटा बनाएं, इस से हमें भक्ति की एक विकृत धारणा प्राप्त होती है; और (कम से कम अप्रत्यक्ष और धीरे-धीरे) हम सही नियम से, और अपने आप के विषय सही धारणा से, पूर्णतः भटक जाते हैं, और भ्रम व कपट को स्थापित करते हैं।
तर्क ५—ईसाई व्यवहार को परमेश्वर के वचन में स्पष्ट रूप से न केवल दूसरों के लिये, वरन मनुष्यों के अपने विवेक के लिये भी, अनुग्रह की सच्चाई के मुख्य प्रमाण के रूप में बताया गया है। इस पर न केवल अन्य चिन्हों से अधिक कहा और बल दिया गया है, वरन अनेक स्थानों में जहां इसकी चर्चा है, वहां इसे सब प्रमाणों में मुख्य बताया गया है। यह बात समय-समय पर व्यक्त की गई भाषा से स्पष्ट है। यदि परमेश्वर अब स्वर्ग से बोलकर भक्ति के चिन्हों के विषय हमारे सन्देहों को दूर करता, और कोई विशेष चिन्ह इस प्रकार के बल देनेवाले शब्दों में देता, कि उस से सब जान सकें कि वे सचमुच भक्त हैं या नहीं—जैसे कि जिस मनुष्य में ऐसी योग्यता या लक्षण है, "वही मनुष्य सच्चा संत है, वही असली मनुष्य है, इसी से तुम जान सकते हो, यही वह बात है जिस से यह प्रगट होता है कि कौन संत हैं और कौन पापी, ऐसे मनुष्य ही सचमुच संत हैं"—तो क्या हम इसे इस बात से परे नहीं मानेंगे, कि यह सच्ची भक्ति के एक विशेष और स्पष्ट भेद करनेवाले लक्षण के रूप में दिया गया था? परन्तु जिस अनुग्रह के चिन्ह की मैं बात कर रहा हूं उसके विषय में ठीक यही दशा है;
परमेश्वर ने अपने वचन में ईसाई व्यवहार के विषय ठीक इसी रीति से बार-बार अपनी बात कही है, जैसे यूहन्ना 14 में, "जिसके पास मेरी आज्ञाएं हैं, और वह उन्हें मानता है, वही मुझसे प्रेम रखता है।" इस प्रकार मसीह इस स्थान में चेलों को यह इसलिये नहीं देता कि वे इस से दूसरों का न्याय करना सीखें, वरन इसलिये कि वे अपने जाने के बाद इसे अपनी ही शान्ति के लिये अपने ऊपर लागू करें, जैसा प्रसंग के एक-एक शब्द से प्रगट होता है। और मार्ग में यह भी बताना चाहूंगा, कि न केवल वह बल उल्लेखनीय है जिसके साथ मसीह अपनी बात कहता है, वरन यह भी कि वह इस बात पर कितना बल देता और उसे दोहराता है, जैसा प्रसंग में दिखाई देता है: आयत 15, "यदि तुम मुझसे प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानो।" आयत 23, "यदि कोई मुझसे प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा।" और आयत 24, "जो मुझसे प्रेम नहीं रखता, वह मेरी बातों को नहीं मानता।" और अगले अध्याय में तो बार-बार: आयत 2,
"हर एक डाली, जो मुझ में फल नहीं लाती, वह उसे काट डालता है; और जो फल लाती है, उसे वह छांटता है, कि वह और भी फल लाए।" आयत 8, "मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ; इसी से तुम मेरे चेले ठहरोगे।" आयत 14, "यदि तुम वह सब कुछ करो जिस की मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं, तो तुम मेरे मित्र हो।" हमें यह लक्षण फिर उसी बल के साथ दिया गया है, यूहन्ना 8:31, "यदि तुम मेरे वचन पर बने रहो, तो सचमुच मेरे चेले ठहरोगे।" और फिर 1 यूहन्ना 2:3, "और इसी से हम जानते हैं, कि हम उसे जानते हैं, कि हम उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।" और आयत 5, "पर जो कोई उसके वचन पर चलता है, उस में सचमुच परमेश्वर का प्रेम सिद्ध हो गया है; इसी से हम जानते हैं, कि हम उस में हैं।" और अध्याय 3:18,
19, "हे बालको, हम वचन या जीभ ही से नहीं, वरन काम और सत्याई से प्रेम रखें; इसी से हम जान लेंगे, कि हम सत्य से हैं।" 'इसी से' का अनुवाद यदि मूल भाषा से और भी शाब्दिक रीति से किया गया होता तो कुछ अधिक बल के साथ होता, अर्थात 'इसी से हम जानते हैं।' और उसी अध्याय की आयत 10 में परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान के बीच भेद करनेवाले महान लक्षण के रूप में पवित्र व्यवहार की बात कितनी स्पष्टता से की गई है? "इसी से परमेश्वर की सन्तान और XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… शैतान की सन्तान पहचानी जाती है।" यह पवित्र और दुष्ट व्यवहार दोनों की बात करता है, जैसा पूरे प्रसंग से देखा जा सकता है; जैसे आयत 3, "और जिस किसी को उस पर यह आशा है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है, जैसा वह पवित्र है।" आयत 6-10, "जो कोई उस में बना रहता है, वह पाप नहीं करता; जो कोई पाप करता है, उस ने न उसे देखा है, और न उसे जाना है। हे बालको, कोई तुम्हें भरमाने न पाए; जो धार्मिकता के काम करता है वह उसी के समान धर्मी है, जैसा वह धर्मी है; जो पाप करता है, वह शैतान की ओर से है।—जो कोई परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह पाप नहीं करता।—जो कोई धार्मिकता के काम नहीं करता, वह परमेश्वर की ओर से नहीं है।" इसी प्रकार का बल हमें 2 यूहन्ना 6 में भी मिलता है: "और प्रेम यह है, कि हम उसकी आज्ञाओं के अनुसार चलें;" अर्थात (जैसा हमें समझना चाहिए), यही प्रेम का उचित प्रमाण है। इसी प्रकार 1 यूहन्ना 5:3, "क्योंकि परमेश्वर का प्रेम यह है, कि हम उसकी आज्ञाओं को मानें।" इसी प्रकार प्रेरित याकूब, सच्ची और शुद्ध भक्ति के उचित प्रमाणों की बात करते हुए कहता है, याकूब 1:27, "पिता परमेश्वर के निकट शुद्ध और निर्मल भक्ति यह है, कि अनाथों और विधवाओं की उनके क्लेश के समय सुधि लें, और अपने आप को जगत से निष्कलंक रखें।" इसी बात के विषय हमें पुराने नियम में भी इसी प्रकार के बल देनेवाले वचन मिलते हैं, अय्यूब 28:28: "और उसने मनुष्य से कहा, देख, प्रभु का भय मानना ही बुद्धि है, और बुराई से दूर रहना ही समझ है।" यिर्मयाह 22:16,
"क्या तेरे पिता ने खाया-पिया नहीं, और न्याय और धर्म के काम नहीं किए? उसने दीन और दरिद्र लोगों का मुकद्दमा चुकाया; क्या यही मुझे जानना नहीं कहलाता? यहोवा की यही वाणी है।" भजन संहिता 34:11 आदि, "हे बालको, आओ, मेरी सुनो; मैं तुम्हें प्रभु का भय मानना सिखाऊंगा।—अपनी जीभ को बुराई से, और अपने होठों को छल की बातें कहने से रोक; बुराई को छोड़ भलाई कर; मेल मिलाप का यत्न कर और उसमें लगा रह।" भजन संहिता 15 के आरम्भ में, "हे यहोवा, तेरे तम्बू में कौन रहेगा? तेरे पवित्र पर्वत पर कौन बसेगा? वह जो खरी चाल चलता है," आदि। भजन संहिता 24:3, 4, "यहोवा के पर्वत पर कौन चढ़ सके? और उसके पवित्रस्थान में कौन खड़ा हो सके? वह जिसके हाथ पवित्र और मन शुद्ध है," आदि। भजन संहिता 119:1,
"क्या ही धन्य हैं वे, जिनकी चाल-चलन खरी है, जो यहोवा की व्यवस्था पर चलते हैं।" आयत 6, "जब मैं तेरी सारी आज्ञाओं को स्मरण रखूंगा, तब मैं लज्जित न हूंगा।" नीतिवचन 8:13, "प्रभु का भय मानना बुराई से बैर रखना है।"
इस प्रकार पवित्रशास्त्र कपट और मन की खोटाई के किसी भी अन्य चिन्ह के विषय में उतने बल देनेवाले शब्दों का प्रयोग कभी नहीं करता, जितना अपवित्र व्यवहार के विषय में करता है। इस प्रकार गलातियों 6:7, "धोखा न खाओ; परमेश्वर तुच्छ नहीं किया जाता; क्योंकि जो कुछ मनुष्य बोता है वही काटेगा।" 1 कुरिन्थियों
6:9, 10, "धोखा न खाओ; न व्यभिचारी, न मूरतपूजक, आदि, परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे।" इफिसियों 5:5, 6, "क्योंकि तुम यह जानते हो, कि किसी व्यभिचारी, या अशुद्ध मनुष्य, आदि, का मसीह और परमेश्वर के राज्य में कोई भाग नहीं। कोई तुम्हें व्यर्थ बातों से धोखा न दे।" 1 यूहन्ना 3:7, 8, "हे बालको, कोई तुम्हें भरमाने न पाए; जो धार्मिकता के काम करता है वही धर्मी है, जैसा वह धर्मी है; जो पाप करता है, वह शैतान की ओर से है।" अध्याय 2:4, "जो कोई कहता है, कि मैं उसे जानता हूं, और उसकी आज्ञाओं को नहीं मानता, वह झूठा है, और उस में सत्य नहीं।" और अध्याय 1:6, "यदि हम कहें, कि उसके साथ हमारी संगति है, और अन्धकार में चलें, तो हम झूठ बोलते हैं, और सत्य पर नहीं चलते।" याकूब 1:26, "यदि कोई अपने आप को भक्त समझे, और अपनी जीभ को न रोके, वरन अपने ही मन को धोखा दे, तो उसकी भक्ति व्यर्थ है।" अध्याय 3:14,
15, "पर यदि तुम्हारे मन में कड़वी डाह और विरोध है, तो घमण्ड न करो, और सत्य के विरुद्ध झूठ न बोलो।
यह ज्ञान ऊपर से उतरनेवाला नहीं, वरन पार्थिव, प्राणिक और शैतानी है।" भजन संहिता 125:5, "परन्तु जो XII. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रभाव और फल ईसाई… टेढ़ी चाल में मुड़ जाते हैं, उनको यहोवा अनर्थकारियों के संग निकाल देगा।" यशायाह 35:8, "और वहां एक राजमार्ग होगा, और वह पवित्रता का मार्ग कहलाएगा; अशुद्ध उस पर से चलने न पाएगा।" प्रकाशितवाक्य 21:27, "और उस में कोई अशुद्ध वस्तु, वा घिनौने काम करनेवाला, वा झूठ का गढ़नेवाला कभी प्रवेश करने न पाएगा।" और अनेक स्थानों में, "मेरे पास से चले जाओ, मैं तुम्हें कभी नहीं जानता था, हे अनर्थकारियो।"
तर्क ६—एक और बात जो यह स्पष्ट करती है, कि पवित्र व्यवहार ही विश्वास का दावा करनेवालों की सच्चाई के सब चिन्हों में मुख्य है, न केवल जगत के लिये, वरन उनके अपने विवेक के लिये भी, यह है कि यही वह महान प्रमाण है जिसका प्रयोग भविष्य में परमेश्वर के न्याय आसन के सामने किया जाएगा; जिसके अनुसार उसका न्याय निर्धारित होगा, और भक्ति का दावा करनेवाले प्रत्येक जन की दशा अटल रूप से निश्चित की जाएगी। भविष्य के न्याय में, विश्वास का दावा करनेवालों की खुली परीक्षा होगी, और उस न्याय में प्रमाणों का प्रयोग किया जाएगा। क्योंकि मनुष्यों के अनन्त प्रतिफल के लिये परमेश्वर का भविष्य का न्याय, उसका अपने ही मन में मनुष्यों के मन की दशा को परखना, खोज निकालना, और उस पर निर्णय देना नहीं होगा; वरन यह एक घोषित न्याय होगा; और उसका उद्देश्य परमेश्वर का अपने भीतर कोई निर्णय बनाना नहीं होगा, वरन उसके न्याय का, और उसकी धार्मिकता का, मनुष्यों के अपने विवेक के सामने, और जगत के सामने प्रगटीकरण होगा। और इसी कारण न्याय के दिन को परमेश्वर के धर्ममय न्याय के प्रगट होने का दिन कहा गया है, रोमियों 2:6। और मनुष्यों के भविष्य के परीक्षण और न्याय का उद्देश्य, जहां तक प्रत्येक जन को न्याय में जो भाग मिलना है उसका सम्बन्ध है, विशेष रूप से उसके सम्बन्ध में परमेश्वर के धर्ममय न्याय का उसके विवेक के सामने स्पष्ट प्रगटीकरण होगा; जैसा मत्ती 18:31 से अन्त तक; अध्याय 20:8-15; अध्याय 22:11, 12, 13; अध्याय 25:19-30, और आयत 35 से अन्त तक; लूका 19:16-23 से प्रगट है। और इसलिये, यद्यपि परमेश्वर को अपने लिये सत्य को स्पष्ट करने के लिये किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं, तौभी मनुष्यों के भविष्य के न्याय में प्रमाणों का प्रयोग किया जाएगा। और निःसन्देह जो प्रमाण उनकी परीक्षा में प्रयोग किए जाएंगे, वे ऐसे होंगे जो न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिये सबसे उपयुक्त हों; अर्थात परमेश्वर के धर्ममय न्याय का, न केवल जगत के सामने, वरन मनुष्यों के अपने विवेक के सामने भी, प्रगटीकरण। परन्तु पवित्रशास्त्र हमें बहुतायत से यह सिखाता है, कि जिन महान प्रमाणों का प्रयोग न्यायी इस परीक्षा में इन्हीं उद्देश्यों के लिये करेगा, जिनके अनुसार प्रत्येक जन का न्याय निर्धारित होगा, और अटल दण्डाज्ञा सुनाई जाएगी, वे इस जगत में, यहीं, मनुष्यों के काम, या व्यवहार होंगे:
प्रकाशितवाक्य 20:12, “और मैं ने मरे हुओं को, क्या छोटे क्या बड़े, परमेश्वर के साम्हने खड़े देखा; और पुस्तकें खोली गईं;—और मरे हुओं का उन बातों के अनुसार जो उन पुस्तकों में लिखी थीं, उनके कामों के अनुसार न्याय किया गया।” इसी प्रकार पद 13, “और समुद्र ने अपने भीतर के मरे हुओं को दे दिया, और मृत्यु और अधोलोक ने अपने भीतर के मरे हुओं को दे दिया: और हर एक मनुष्य का उसके कामों के अनुसार न्याय किया गया।” 2 कुरिन्थियों 5:10, “क्योंकि अवश्य है, कि हम सब मसीह के न्याय आसन के साम्हने प्रगट हों, ताकि हर एक व्यक्ति अपने उन कामों का जो उस ने देह में करते हुए किए हों, चाहे भले हों चाहे बुरे, फल पाए।”
अतः मनुष्यों का व्यवहार ही वह एकमात्र प्रमाण है जिसके अनुसार मसीह भावी न्याय के दिन को शासित हुआ बताते हैं, जैसा कि न्याय के उस दिन के सबसे विस्तृत वर्णन में प्रकट है, जो हमें पवित्र
बाइबल में, मत्ती 25 के अंतिम भाग में मिलता है। साथ ही देखिए रोमियों 2:6, 13, यिर्मयाह 17:10, अय्यूब 34:11, नीतिवचन 24:12, यिर्मयाह
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… 32:19, प्रकाशितवाक्य 22:12, मत्ती 16:27, प्रकाशितवाक्य 2:23, यहेजकेल 33:20, 1 पतरस 1:17। न्याय के दिन न्यायाधीश (मनुष्यों के अपने विवेक को कायल करने के लिए, और उन्हें जगत के सामने प्रकट करने के लिए) उनसे यह पूछने नहीं बैठेगा कि उनके अनुभवों की रीति क्या थी, और न ही हर एक मनुष्य से यह कहलवाएगा कि उसके परिवर्तन की विधि क्या थी; बल्कि उसके काम ही इस बात के प्रमाण के रूप में सामने लाए जाएँगे कि वह क्या है; कि उसने अंधियारे में और उजियाले में क्या किया है: सभोपदेशक 12:14, “क्योंकि परमेश्वर एक एक काम का, वरन एक एक गुप्त बात का भी, चाहे भली हो चाहे बुरी, न्याय में लाएगा।” जिस परीक्षा के अधीन विश्वास का दावा करनेवाले भावी न्याय में रखे जाएँगे, उसमें परमेश्वर उन्हीं प्रमाणों का प्रयोग करेगा जिनसे वह उन्हें अपने ऊपर और जगत के सामने प्रकट करता है, जो वह अभी अपने विधान के प्रलोभनों या परीक्षाओं में उन्हें प्रकट करने के लिए काम में लाता है, अर्थात उनका व्यवहार, उन अवसरों में जहाँ मसीह और अन्य वस्तुएँ वास्तविक और प्रत्यक्ष स्पर्धा में आती हैं। न्याय के दिन परमेश्वर, अपने धर्मी न्याय को प्रकट करने के लिए, विश्वास का दावा करनेवालों को एक ऐसी तराजू में तौलेगा जो सबको दिखाई देगी। और वह तराजू वही होगी जिसमें वह अभी मनुष्यों को तौलता है, जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है।
अतएव हम निःसंकोच यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं, कि मनुष्यों के काम (उस अर्थ में लिए गए जो समझाया जा चुका है) वे सबसे बड़े प्रमाण हैं जिनसे उन्हें अपनी परख करनी चाहिए। निश्चय ही जिस वस्तु का प्रयोग हमारा सर्वोच्च न्यायाधीश हमारा न्याय करने के लिए प्रमुखता से करेगा, जब हम उसके सामने खड़े होंगे, उसी का प्रयोग हमें अपनी परख करने के लिए प्रमुखता से करना चाहिए।84 यदि यह प्रकट न किया गया होता कि न्यायाधीश भविष्य में किस रीति से और किस प्रमाण के आधार पर हमारे साथ बर्ताव करेगा, तो किसी के लिए यह कहना कितना स्वाभाविक होता, “काश मैं जानता कि अंतिम और निर्णायक न्याय में परमेश्वर मुख्य रूप से किस चिन्ह को देखेगा और उस पर बल देगा, और जिसे प्रस्तुत कर सकना वह हर एक से अपेक्षा रखता है जो तब उसके द्वारा ग्रहण किया जाए, और जिसके अनुसार दण्डाज्ञा दी जाएगी; ताकि मैं जान सकूँ कि अभी किस चिन्ह या प्रमाण को विशेष रूप से देखना और खोजना है, जिससे मैं निश्चिंत रहूँ कि तब चूक न जाऊँ।” और यह देखकर कि परमेश्वर ने यह चिन्ह या प्रमाण क्या है, इतनी स्पष्टता और प्रचुरता से प्रकट कर दिया है, निश्चय ही, यदि हम बुद्धिमानी से काम लें, तो हम इसे सबसे बड़े महत्व की वस्तु मानेंगे।
अब तक जो कुछ कहा गया है, उस सबसे मुझे यह पूर्णतः स्पष्ट प्रतीत होता है, कि मसीही व्यवहार ही विश्वास का दावा करनेवालों की अनुग्रहमय सच्चाई का सबसे उचित प्रमाण है, उनके अपने और औरों के सामने; और यह अनुग्रह के सब चिन्हों में प्रमुख है, चिन्हों का चिन्ह, और प्रमाणों का प्रमाण, जो अन्य सब चिन्हों को मुहर लगाकर पूर्ण करता है।—मैं यह चाहूँगा कि मेरे विवेक की यह गवाही हो, कि मेरे पक्ष में मेरे सर्वोच्च न्यायाधीश की ऐसी वाणी है, जैसा यूहन्ना 14:21 में है, “जिसके पास मेरी आज्ञाएँ हैं और वह उनको मानता है, वही मुझसे प्रेम रखता है;” बजाय इसके कि इन हजार वर्षों में जीनेवाले सब बुद्धिमान, सुदृढ़ और अनुभवी धर्मशास्त्रियों का निर्णय और पूर्ण अनुमोदन मुझे मेरे परिवर्तन की रीति के विषय मेरे अनुभवों की अत्यंत सूक्ष्म और गंभीर जाँच पर प्राप्त हो। यह नहीं कि अनुग्रह की दशा के और कोई अच्छे प्रमाण नहीं हैं, परन्तु 84 “जिस वस्तु को परमेश्वर अपने न्याय का नियम बनाता है, जिसके द्वारा वह हर एक मनुष्य का न्याय करता है, वही हर एक मनुष्य के लिए अपनी परख करने का निश्चित नियम है। जिसके अनुसार अंतिम दिन हमारा न्याय किया जाएगा, वही वर्तमान में अपने ऊपर लागू करने के लिए निश्चित नियम है। अब वह हमारी आज्ञाकारिता और कामों के द्वारा हमारा न्याय करता है। ‘वह हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा।’” डॉ. प्रेस्टन कृत चर्च्स कैरिज।
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… यह है। इन कार्यसाधक क्रियाओं के अतिरिक्त अनुग्रह की और भी क्रियाएँ हो सकती हैं, जिन पर संत मनन कर सकते हैं, और जो उन्हें बड़ा संतोष दे सकती हैं, तौभी यही प्रमुख और सबसे उचित प्रमाण है। इस बात के कि कोई वृक्ष अंजीर का वृक्ष है, कई अच्छे प्रमाण हो सकते हैं; परन्तु उसका सबसे बड़ा और सबसे उचित प्रमाण यह है कि वह वास्तव में अंजीर फलता है। यह संभव है कि किसी मनुष्य को अपने पहले परिवर्तन के समय ही अनुग्रह की दशा का अच्छा निश्चय हो जाए, इससे पहले कि उसे इस बड़े प्रमाण के द्वारा, जिसकी मैं बात कर रहा हूँ, निश्चय पाने का अवसर मिला हो।—यदि किसी मनुष्य को यह समाचार मिले कि किसी दूर स्थान में उसे एक बड़ा खजाना इस शर्त पर दिया जा रहा है कि वह उसे इतना अनमोल समझे कि अपने घर की संपत्ति छोड़ने, और मार्ग की चट्टानों और पहाड़ों को पार करके उस स्थान तक यात्रा करने को तैयार हो जाए, जहाँ वह है; तो यह संभव है कि प्रस्ताव मिलते ही उस मनुष्य को यह पूरा निश्चय हो जाए कि वह खजाने को उस मात्रा में महत्व देता है जिसकी बात कही गई है: वह अपने भीतर, बिना किसी संदेह के, खजाने के लिए जाने की इच्छा अनुभव कर सकता है; परन्तु फिर भी, इससे यह बाधा नहीं पड़ती कि उसके लिए वास्तव में कार्य करना ही, न केवल औरों के लिए, बल्कि स्वयं उसके लिए भी, उसकी इच्छा का सबसे बड़ा और सबसे उचित प्रमाण है। परन्तु स्वयं के लिए प्रमाण के रूप में, उसकी यात्रा में उसके बाहरी कार्यों और उसकी देह की गतियों को, उसके मन की क्रिया और उस बात के प्रति भीतर की सचेतनता से अलग करके नहीं देखा जाता, जो उसे प्रेरित करती है, और जिस उद्देश्य के लिए वह जाता है; अन्यथा उसकी देह की गति उसके लिए खजाने को अनमोल समझने का कोई प्रमाण नहीं है। इसी रीति से मसीही व्यवहार उस बहुमूल्य मोती और खेत में छिपे खजाने के उद्धारक मूल्य का सबसे उचित प्रमाण है।
मसीही व्यवहार इस अर्थ में चिन्हों का चिन्ह है, कि यह वह बड़ा प्रमाण है, जो भक्ति के अन्य सब चिन्हों की पुष्टि करता और उन्हें पूर्ण करता है। परमेश्वर के आत्मा का ऐसा कोई अनुग्रह नहीं, जिसकी सच्चाई का सबसे उचित प्रमाण मसीही व्यवहार न हो। जैसे हमारी देह के अंगों और हमारे सब उपकरणों के विषय है, कि उनकी दृढ़ता और उपयोगिता का उचित प्रमाण उनके प्रयोग में है: वैसे ही हमारे अनुग्रहों के विषय भी है (जो हमें व्यवहार में लाने के लिए उतने ही दिए गए हैं जितने हमारे हाथ-पाँव, या वे औजार जिनसे हम काम करते हैं, या वे हथियार जिनसे हम युद्ध करते हैं), उनकी उचित परीक्षा और प्रमाण उनके व्यवहार में क्रियाशील होने में है। हम जिन अधिकांश वस्तुओं का प्रयोग करते हैं, वे हमारे लिए उपयोगी होती हैं, और इसलिए उनकी उपयोगिता किसी दबाव, तनाव, हलचल या टकराव में सिद्ध होती है। यही बात धनुष, तलवार, कुल्हाड़ी, आरी, रस्सी, जंजीर, लाठी, पाँव, दाँत आदि के विषय भी सच है। और जो इतने दुर्बल होते हैं कि जिस तनाव या दबाव में हमें उन्हें डालने की आवश्यकता होती है, उसे सहन नहीं कर पाते, वे किसी काम के नहीं होते। यही बात मन के सब सद्गुणों के विषय भी सच है। उनकी उचित परीक्षा और प्रमाण उन प्रलोभनों और परीक्षाओं के अधीन क्रियाशील होने में है, जिनके अधीन परमेश्वर हमें अपने विधान के क्रम में लाता है, और ऐसी सेवा में लगाए जाने में है जो स्वभाव के सिद्धांतों पर कठोर दबाव डालती है।
व्यवहार परमेश्वर के सच्चे और उद्धारक ज्ञान का उचित प्रमाण है; जैसा कि प्रेरित के उस पहले उल्लेखित वचन से प्रकट है, “इसी से हम जानते हैं, कि हम उसे जानते हैं, कि हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं।” यह व्यर्थ है कि हम यह दावा करें कि हम परमेश्वर को जानते हैं, यदि हम अपने कामों में उसका इन्कार करते हैं,
तीतुस 1:16। और यदि हम परमेश्वर को जानते हैं, परन्तु उसे परमेश्वर जानकर उसकी महिमा नहीं करते; तो हमारा ज्ञान हमें केवल दोषी ठहराएगा, बचाएगा नहीं, रोमियों 1:21। उस ज्ञान का बड़ा लक्षण, जो बचाता और
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… धन्य बनाता है, यह है, कि वह व्यावहारिक है: यूहन्ना 13:17, “जब तुम ये बातें जानते हो, तो यदि उन पर चलो भी, तो धन्य हो।”
अय्यूब 28:28, “बुराई से दूर रहना ही समझ है।”
पवित्र व्यवहार पश्चाताप का उचित प्रमाण है। जब यहूदी पश्चाताप का दावा करते हुए, अपने पापों को मानते हुए, यूहन्ना के पास आए, जो पापों की क्षमा के लिए पश्चाताप के बपतिस्मे का प्रचार कर रहा था; तो उसने उन्हें उनके पश्चाताप की सच्चाई के उचित प्रमाण पाने और दिखाने का सही मार्ग बताया, जब उसने उनसे कहा, “पश्चाताप के योग्य फल लाओ,” मत्ती 3:8। यह प्रेरित पौलुस के व्यवहार के भी अनुकूल था; देखिए प्रेरितों के काम 26:20।
क्षमा और दया समय-समय पर उसे प्रतिज्ञा की गई है, जिसके पास सच्चे पश्चाताप का यह प्रमाण है, कि वह अपने पाप को त्याग देता है, नीतिवचन 28:13, और यशायाह 55:7, और अन्य कई स्थानों में।
पवित्र व्यवहार उद्धारक विश्वास का उचित प्रमाण है। यह स्पष्ट है कि प्रेरित याकूब कामों की बात इस रूप में करता है, कि वे विश्वास को प्रमुखता से धर्मी ठहराते हैं, या (जो एक ही बात है) विश्वास का दावा करनेवालों को धर्मी ठहराते, और उनके दावे की सच्चाई को, केवल जगत के सामने ही नहीं, वरन उनके अपने विवेक के सामने भी, सिद्ध और प्रकट करते हैं; जैसा कि उसके द्वारा दिए गए अब्राहम के उदाहरण से स्पष्ट है,
याकूब 2:21-24। और पद 20 और 26 में, वह विश्वास के व्यावहारिक और कार्यशील स्वभाव की बात करता है, मानो वह उसका प्राण और जीवन ही हो; उसी रीति से जैसे मनुष्य की देह में जो सक्रिय स्वभाव और तत्व है, वही उसका प्राण और जीवन है। और यदि ऐसा है, तो निःसंदेह व्यवहार ही सच्चे विश्वास के उस प्राण और जीवन का उचित प्रमाण है, जिसके द्वारा वह मृत विश्वास से अलग पहचाना जाता है। क्योंकि निःसंदेह, व्यावहारिक स्वभाव का सबसे उचित प्रमाण व्यवहार है, और कार्यशील स्वभाव का सबसे उचित प्रमाण कार्य है।
व्यवहार सत्य के उद्धारक विश्वास का सबसे अच्छा प्रमाण है। यही उस बात का उचित प्रमाण कहा गया है, कि सत्य किसी विश्वास का दावा करनेवाले मसीही में है, कि वह सत्य में चलता है, 3
यूहन्ना 3: “मैं बहुत आनन्दित हुआ, जब भाइयों ने आकर तेरी उस सच्चाई की गवाही दी, जो तुझ में है, अर्थात तू सत्य पर जिस रीति से चलता है।”
व्यवहार मसीह के पास सच्चे आगमन, और उसे ग्रहण करने, और उससे जुड़ने का सबसे उचित प्रमाण है। मसीह के पास सच्चा और उद्धारक आगमन (जैसा मसीह प्रायः सिखाता है) ऐसा आगमन है जिसमें उसके लिए सब कुछ त्याग दिया जाए। और जैसा पहले देखा जा चुका है, हृदय में मसीह के लिए सब कुछ त्यागना, वास्तव में सब कुछ त्यागने का हृदय रखने के ही समान है; परन्तु वास्तव में सब कुछ त्यागने का हृदय रखने का उचित प्रमाण यही है कि वास्तव में सब कुछ त्याग दिया जाए, जहाँ तक इसके लिए बुलाया गया हो। यदि कोई राजकुमार किसी दूर देश की स्त्री के सामने यह प्रस्ताव रखे, कि वह अपने लोगों और अपने पिता के घर को त्यागकर उसके पास आए और उसकी दुल्हन बने; तो राजकुमार के प्रस्ताव के साथ उसके हृदय की सहमति का उचित प्रमाण यही है कि वह वास्तव में अपने लोगों और अपने पिता के घर को त्यागकर उसके पास आए।—इसी से राजा के प्रस्ताव के साथ उसकी सहमति पूर्ण होती है, उसी अर्थ में जिसमें प्रेरित याकूब कहता है, कि कामों से विश्वास पूर्ण होता है।85 मसीह हमें अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा देता है, इस 85 “मसीह को वास्तव में ग्रहण करना हमारे कार्यों और कामों में प्रकट होता है: यशायाह 1:19। ‘यदि तुम मानो और आज्ञाकारी बनो, तो तुम देश के अच्छे पदार्थ खाओगे।’ अर्थात, यदि तुम यहोवा को अपना प्रभु और राजा मानने के लिए सहमत हो: सहमति देना पहली बात है; परन्तु यही पर्याप्त नहीं, बल्कि आज्ञाकारी भी बनना है। जो सहमति मन की भीतरी क्रिया में स्थित है, उसकी सच्चाई तुम्हारी आज्ञाकारिता में, तुम्हारे जीवन के कामों में देखी जाएगी। ‘यदि तुम मानो और आज्ञाकारी बनो, तो तुम
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… शर्त पर, कि हम उसके पास आएँ: परन्तु यह वैसा ही आगमन है जैसा उसने उस जवान को निर्देशित किया, जो यह पूछने आया था कि उसे क्या करना चाहिए कि वह अनन्त जीवन पाए; मसीह ने उससे कहा कि वह जाकर अपना सब कुछ बेच दे, और उसके पास आए, और उसके पीछे हो ले। यदि उसने अपने हृदय में इस प्रस्ताव को मान लिया होता, और इस प्रकार अपने हृदय में मसीह के पास आ गया होता, तो उसका उचित प्रमाण यही होता कि वह इसे वास्तव में करता; और इसी में मसीह के पास उसका आगमन पूर्ण हो जाता।
जब मसीह ने चुंगी लेनेवाले लेवी को बुलाया, जब वह चुंगी की चौकी पर बैठा हुआ, अपने सांसारिक लाभ के बीच में था; तो उसके उद्धारकर्ता के इस निमंत्रण के साथ लेवी के हृदय का जुड़ना, उसके वास्तव में उठकर, सब कुछ छोड़कर, उसके पीछे हो लेने से, प्रकट और पूर्ण हुआ, लूका 5:27, 28। मसीह, और अन्य वस्तुएँ, हमारे सामने एक साथ रखी जाती हैं, ताकि हम विशेष रूप से एक से जुड़ें और दूसरी को त्याग दें; ऐसी दशा में, व्यवहार में मसीह से जुड़ना, व्यवहार में मसीह को ग्रहण करना है; उतना ही जितना किसी भिखारी का अपना हाथ बढ़ाकर दिया गया उपहार ले लेना, उसके द्वारा उस उपहार को व्यवहार में ग्रहण करना है। वरन, प्राण की वह क्रिया जो व्यवहार में मसीह से जुड़ने में है, वही प्राण का मसीह के पास सबसे पूर्ण आगमन है।
व्यवहार उद्धार के लिए मसीह पर भरोसा रखने का सबसे उचित प्रमाण है। साधारण बोलचाल में और पवित्रशास्त्र में, ‘भरोसा’ शब्द का उचित अर्थ, अपने अधिक साधारण प्रयोग के अनुसार, मनुष्य के मन का इतना साहसी और उत्साहित होना है, कि वह व्यवहार में, या किसी और की पर्याप्तता और विश्वासयोग्यता के भरोसे पर किए गए किसी कार्य में, कोई जोखिम उठाए। और इसलिए, उसके भरोसा रखने का उचित प्रमाण वह जोखिम है, जो वह अपने कार्य में उठाता है। जो व्यक्ति किसी बात पर निर्भर होकर उस निर्भरता के आधार पर कुछ भी नहीं करता, या जिसका व्यवहार वैसा ही है जैसा होता यदि उसकी कोई निर्भरता ही न होती, उसके विषय ठीक से यह नहीं कहा जा सकता कि वह कोई जोखिम उठा रहा है। किसी और पर निर्भर होकर जोखिम उठाने का अर्थ है, उस निर्भरता के कारण ऐसा कुछ करना जिससे वह स्वयं को संकट में डालता प्रतीत हो, और जिसे वह उस निर्भरता के बिना कभी न करता। और इसलिए, अनन्त जीवन देने के लिए मसीह की पर्याप्तता और विश्वासयोग्यता पर भरोसा रखते हुए, मसीही व्यवहार की कठिनाइयों और प्रतीत होनेवाले संकटों को स्वीकार करने में ही, मनुष्यों के विषय कहा जाता है कि वे स्वयं को मसीह पर दांव पर लगाते हैं, और सुख और जीवन के लिए उस पर भरोसा रखते हैं। वे मत्ती की उस
10:39 जैसी प्रतिज्ञाओं पर निर्भर रहते हैं, “जो अपने प्राण को मेरे लिये खोएगा, वह उसे पाएगा।” और इस प्रकार वे मसीह की पर्याप्तता और सच्चाई पर भरोसा रखते हुए सब कुछ छोड़ देते हैं, और अपना सब कुछ दांव पर लगाते हैं। और यही मसीह पर भरोसा रखने की, उसमें उद्धारक विश्वास की क्रियाशीलता की, पवित्रशास्त्र की धारणा है। इसी प्रकार विश्वासियों का पिता अब्राहम मसीह पर भरोसा रखता था, और विश्वास के द्वारा उस अनुग्रह की वाचा पर निर्भर होकर, जो परमेश्वर ने उसके साथ बाँधी थी, अपना देश छोड़ दिया, इब्रानियों 11:8, 9। इसी प्रकार, “मूसा ने विश्वास के द्वारा फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया, और पाप के अल्पकालीन सुख भोगने के बदले परमेश्वर की प्रजा के साथ दुःख उठाना अधिक उचित समझा,” इब्रानियों 11:23, आदि। इसी प्रकार विश्वास के द्वारा, अन्य लोगों ने स्वयं को पत्थरवाह होने, आरी से चीरे जाने, या तलवार से मार डाले जाने के लिए उजागर किया; “क्रूर उपहास और कोड़ों की मार, बंधनों और बंदीगृहों की परीक्षा सही, और भेड़ों और 85 ‘यदि तुम मानो और आज्ञाकारी बनो, तो तुम देश के अच्छे पदार्थ खाओगे;’ अर्थात, तुम उसकी सब वस्तुओं में से जो तुम्हारे लिये उपयुक्त हैं, ग्रहण करोगे; क्योंकि तब तुम सच्चाई से उसके ब्याहे हुए हो, और उसकी सब संपत्ति में तुम्हारा भाग है।” डॉ. प्रेस्टन कृत चर्च्स कैरिज।
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… बकरियों की खालें पहने हुए, दरिद्र, संतप्त, और सताए हुए मारे-मारे फिरे।“ और इसी अर्थ में प्रेरित पौलुस ने भी विश्वास के द्वारा मसीह पर भरोसा रखा, और स्वयं को उसे सौंप दिया, बड़े उत्पीड़नों में, और सब कुछ खोने का दुःख उठाते हुए, अपने छुड़ानेवाले की सामर्थ्य और विश्वासयोग्यता पर निर्भर होकर, स्वयं को और अपना सब कुछ दांव पर लगाते हुए: 2 तीमुथियुस 1:12, ”जिस कारण मैं ये दुःख भी उठाता हूँ, फिर भी लज्जित नहीं होता, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं ने किस पर विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है, कि जो कुछ मैं ने उसे सौंपा है, उसकी रक्षा वह उस दिन तक कर सकता है।“
यदि किसी मनुष्य को किसी दूर द्वीप के राजा से यह समाचार मिले, कि वह उसे अपना वारिस बनाना चाहता है, और यदि यह समाचार पाते ही वह उस पर भरोसा रखते हुए, तुरन्त अपना देश, अपने मित्र, और जगत में जो कुछ उसके पास है, उसे छोड़कर उस देश को चला जाए; तो उसके विषय कहा जा सकता है कि उसने स्वयं को, और जगत में जो कुछ उसके पास है, उस पर दांव पर लगाया।
परन्तु, यदि वह केवल बैठा रहे, और प्रतिज्ञा किए गए लाभ की आशा करता रहे, और भीतर ही भीतर उसके विचार से स्वयं को प्रसन्न करता रहे; तो उसके विषय ठीक से यह नहीं कहा जा सकता कि उसने स्वयं को उस पर दांव पर लगाया; वह इस मामले में कोई जोखिम नहीं उठाता; वह वही करता है जो वह करता, यदि उसे ऐसा कोई समाचार मिला ही न होता, जिसके कारण, यदि सब कुछ विफल हो जाए, तो उसे किसी दुःख में पड़ना पड़े। इसी प्रकार जो व्यक्ति भावी लोक के विषय जो कुछ सुनता है, उस पर विश्वास करके, और जीवन और अमरता के विषय सुसमाचार के समाचार पर निर्भर होकर, सब कुछ त्याग देता है, या कम से कम जहाँ तक अवसर मिलता है वैसा करता है, और हर वस्तु को पूर्णतः अपने अनन्त हित के लिए स्थान देता है; वही, और केवल वही, ठीक रीति से यह कहा जा सकता है कि उसने सुसमाचार के समाचार पर स्वयं को दांव पर लगाया। और यही उद्धार के लिए मसीह पर सच्चे भरोसे का उचित प्रमाण है।
व्यवहार परमेश्वर और मनुष्यों दोनों के प्रति अनुग्रहमय प्रेम का उचित प्रमाण है। जो वचन इसे स्पष्ट रूप से सिखाते हैं, वे पहले इतनी बार उल्लेखित किए जा चुके हैं, कि उन्हें दोहराना अनावश्यक है।
व्यवहार दीनता का उचित प्रमाण है। हृदय की दीनता की वह अभिव्यक्ति और प्रकटीकरण, जिसकी बात परमेश्वर उसकी बड़ी अभिव्यक्ति के रूप में करता है, जिस पर वह बल देता है; जिसे हमें उसकी उचित अभिव्यक्ति और प्रकटीकरण मानना चाहिए: वह है दीनता से चलना। मीका 6:8, “हे मनुष्य, उस ने तुझे बताया है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रेम रखे, और नम्रता से अपने परमेश्वर के साथ चले?”
यह सच्चे परमेश्वर-भय का भी उचित प्रमाण है: नीतिवचन 8:13, “यहोवा का भय बुराई से बैर रखना है।” भजन संहिता 34:11, आदि, “हे बालको, आओ, मेरी सुनो; मैं तुम्हें यहोवा का भय मानना सिखाऊँगा। अपनी जीभ को बुराई से, और अपने होठों को छल की बातें बोलने से रोक: बुराई से हट, और भलाई कर; मेल मिलाप की खोज कर और उसका पीछा कर।” नीतिवचन 3:7, “यहोवा का भय मान, और बुराई से हट।” नीतिवचन 16:6, “यहोवा के भय से मनुष्य बुराई से हट जाते हैं।” अय्यूब 1:8, “क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर कुछ ध्यान दिया है, कि पृथ्वी भर में उसके तुल्य खरा और सीधा, और परमेश्वर का भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला कोई भी नहीं?” अध्याय 2:3, “क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर कुछ ध्यान दिया है, कि पृथ्वी भर में उसके तुल्य खरा और सीधा, और परमेश्वर का भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला कोई भी नहीं है? और यद्यपि तू ने मुझे उसके विरुद्ध बिना कारण उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।” भजन संहिता 36:1, “दुष्ट के अपराध के विषय मेरे मन में यह भावना उठती है,
कि उसकी आँखों के सामने परमेश्वर का कुछ भी भय नहीं।“
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… इसी प्रकार, प्राप्त उपकारों के अनुसार प्रत्युपकार करना, सच्चे कृतज्ञता का उचित प्रमाण है। भजन संहिता 116:12, “यहोवा ने जो उपकार मुझ पर किए हैं, उन सभों के बदले मैं उसको क्या दूँ?” 2 इतिहास 32:25, “परन्तु हिजकिय्याह ने उस उपकार के अनुसार जो उस पर किया गया था, प्रत्युपकार न किया।” परमेश्वर के लिए अपनी मन्नतें पूरी करना, और अपने आचरण को सीधा रखना, 50वें भजन, पद 14 में, सच्ची कृतज्ञता की उचित अभिव्यक्ति और प्रमाण के रूप में कहा गया प्रतीत होता है:
“परमेश्वर के लिये धन्यवाद बलिदान चढ़ा, और परमप्रधान के लिये अपनी मन्नतें पूरी कर।” पद 92, आदि; “जो धन्यवाद बलिदान चढ़ाता है वही मेरी महिमा करता है: और जो अपने चाल चलन को सीधा रखता है, उसको मैं परमेश्वर का उद्धार दिखाऊँगा।”
इसी प्रकार अनुग्रहमय अभिलाषाओं और लालसाओं का उचित प्रमाण, और वह जो उन्हें झूठी और व्यर्थ अभिलाषाओं से अलग करता है, यह है, कि वे आलसी इच्छाएँ और कामनाएँ नहीं, जैसी
बिलाम की थीं; बल्कि वे व्यवहार में प्रभावशाली होती हैं, कि मनुष्यों को उन वस्तुओं की गंभीरता और पूर्णता से खोज करने के लिए उभारें, जिनकी वे लालसा करते हैं। भजन संहिता 27:4 “मैं ने यहोवा से एक बात माँगी है, उसी की मैं खोज में रहूँगा।”
भजन संहिता 63:1, 2, “हे परमेश्वर तू मेरा परमेश्वर है, मैं भोर को तेरी खोज में रहूँगा; मेरा प्राण तेरे लिये प्यासा है, इस निर्जल और सूखी भूमि में मेरा मांस तेरे लिये तरसता है, कि तेरा सामर्थ्य और तेरी महिमा देखूँ।” पद 8, “मेरा प्राण तेरे पीछे हो लेता है।” श्रेष्ठगीत 1:4, “मुझे खींच ले, हम तेरे पीछे दौड़ेंगे।”
व्यवहार अनुग्रहमय आशा का उचित प्रमाण है: 1 यूहन्ना 3:3, “जिस किसी को उस पर यह आशा है, वह अपने आप को वैसे ही पवित्र करता है, जैसा वह पवित्र है।” मसीही जीवन की कठिनाइयों और परीक्षाओं में भलाई करते रहने में धीरज धरना, प्रायः मसीही आशा की उचित अभिव्यक्ति और फल के रूप में उल्लेखित है। 1 थिस्सलुनीकियों 1:3, “तुम्हारे विश्वास के काम, और प्रेम के परिश्रम, और हमारे प्रभु यीशु मसीह की आशा की धीरता को लगातार स्मरण करते हैं।” 1 पतरस 1:13, 14, “इसलिये अपनी अपनी बुद्धि की कमर बान्धकर, और सचेत रहकर, उस अनुग्रह की पूरी आशा रखो जो यीशु मसीह के प्रगट होने के समय तुम्हें दिया जाएगा, आज्ञाकारी बालकों की नाईं,” आदि। भजन संहिता 119:166, “हे यहोवा, मैं तेरे उद्धार की आशा में रहा हूँ, और तेरी आज्ञाओं को पूरी करता रहा हूँ।” भजन संहिता 78:7, “कि वे परमेश्वर पर अपनी आशा रखें, और परमेश्वर के कामों को न भूलें, बल्कि उसकी आज्ञाओं को माना करें।”
अपने कर्तव्य का प्रसन्नतापूर्वक व्यवहार करना, और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना, सच्चे पवित्र आनन्द का उचित प्रमाण है। यशायाह 64:5, “तू उससे मिलता है जो आनन्द करता, और धर्म के काम करता है।” भजन संहिता
119:111, 112, “तेरी चितौनियों को मैं ने सर्वदा के लिये अपना निज भाग समझकर ग्रहण किया है, क्योंकि वे मेरे मन का हर्ष हैं। मैं ने तेरी विधियों को सर्वदा और अन्त तक पूरा करने के लिये अपना मन लगाया है।” पद
14, “मैं तेरी चितौनियों के मार्ग में वैसा ही आनन्दित हुआ हूँ, जैसा सब प्रकार के धन में।” 1 कुरिन्थियों 13:6, “प्रेम कुधर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है।” 2 कुरिन्थियों 8:2, “उनके आनन्द की बहुतायत उनकी उदारता के धन में बढ़ गई।
व्यवहार मसीही धैर्यशीलता का भी उचित प्रमाण है। एक अच्छे सिपाही की परीक्षा उसके चूल्हे के कोने में नहीं, बल्कि युद्ध के मैदान में होती है, 1 कुरिन्थियों 9:25, 26, 2 तीमुथियुस 2:3, 4, 6।
और जैसे पवित्र व्यवहार का फल अनुग्रह की सच्चाई का प्रमुख प्रमाण है, वैसे ही जिस मात्रा में अनुभव किसी मनुष्य के व्यवहार को प्रभावित करते हैं, वही उसके अनुभवों में जो आत्मिक और दिव्य है, उसकी मात्रा का सबसे निश्चित प्रमाण है। मनुष्य चाहे बड़े-बड़े रहस्योद्घाटनों, बड़े प्रेम और आनन्द का कैसा भी दावा करें, उन्हें उतना ही मान्य समझा जाना चाहिए, जितना वे
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… उनके व्यवहार को प्रभावित करते हैं। यह नहीं कि स्वाभाविक स्वभाव के लिए कुछ छूट न दी जाए। परन्तु इससे यह बाधा नहीं पड़ती, कि अनुग्रह की मात्रा को व्यवहार में उसके प्रभाव की मात्रा से न्यायसंगत रीति से मापा जाए। क्योंकि अनुग्रह का प्रभाव उतना ही बड़ा है, और परिवर्तन उतना ही उल्लेखनीय है, किसी बहुत बुरे स्वाभाविक स्वभाववाले में, जितना किसी और में। यद्यपि ऐसे स्वभाव का व्यक्ति उतनी अच्छी तरह व्यवहार नहीं करेगा, जितना समान मात्रा के अनुग्रह के साथ कोई और करता है, तौभी परिवर्तन से पूर्व की दशा से अन्तर उतना ही बड़ा हो सकता है; क्योंकि अच्छे स्वाभाविक स्वभाव का व्यक्ति परिवर्तन से पूर्व वैसा बुरा व्यवहार नहीं करता था।
इस प्रकार मैं ने यह प्रमाण प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है, कि मसीही व्यवहार उद्धारक अनुग्रह के सब चिन्हों में प्रमुख है। और इस प्रवचन को समाप्त करने से पहले, मैं इस विषय पर कही गई बातों के विरुद्ध कुछ लोगों द्वारा संभवतः उठाई जा सकनेवाली दो आपत्तियों का संक्षेप में उत्तर देना चाहूँगा।
आपत्ति 1.—कुछ लोग यह कहने को तैयार हो सकते हैं, कि यह उस मत के विपरीत प्रतीत होता है, जो भले लोगों में इतना अधिक मान्य है; कि विश्वास का दावा करनेवालों को अपनी दशा का न्याय प्रमुखतः अपने भीतरी अनुभव से करना चाहिए, और यह कि आत्मिक अनुभव ही सच्चे अनुग्रह के मुख्य प्रमाण हैं।
मैं उत्तर देता हूँ, कि निःसंदेह यह एक सच्चा मत है, और उचित रीति से भले लोगों में बहुत अधिक मान्य है, कि विश्वास का दावा करनेवालों को प्रमुखतः अपने अनुभव से अपनी दशा का न्याय करना चाहिए। परन्तु यह एक बड़ी भूल है कि जो कहा गया है वह उस मत के विपरीत है। मसीहियों के विवेक के लिए अनुग्रह का प्रमुख चिन्ह मसीही व्यवहार होना, उस अर्थ में जो समझाया जा चुका है, और मसीही व्यवहार की सच्ची धारणा जो दिखाई गई है, उसके अनुसार, अनुग्रह के प्रमुख प्रमाण के रूप में मसीही अनुभव के साथ कदापि असंगत नहीं है। मसीही या पवित्र व्यवहार आत्मिक व्यवहार है; और यह किसी ऐसी देह की गति नहीं जो न जानती हो कि वह कैसे, कब, या क्यों गति करती है: बल्कि मनुष्य में आत्मिक व्यवहार आत्मा और देह दोनों का संयुक्त व्यवहार है, अर्थात एक आत्मा का व्यवहार जो उस देह को, जिससे वह जुड़ी है, और जिस पर सृष्टिकर्ता ने उसे शक्ति दी है, जीवन देती, आज्ञा देती, और सक्रिय करती है। और इसलिए, इस पवित्र व्यवहार में मुख्य बात मन की वह पवित्र क्रिया है, जो देह की गतियों को निर्देशित और नियंत्रित करती है। और देह की गतियों को मसीही व्यवहार का अंग केवल गौण रूप में समझा जाना चाहिए, इस रूप में कि वे प्राण के कार्यों पर निर्भर और उनके परिणामस्वरूप हैं। अनुग्रह की जो क्रियाएँ मसीही अपने भीतर पाते हैं, या जिनके प्रति वे सचेत होते हैं, वे ही हैं जिन्हें वे अपने भीतर अनुभव करते हैं; और इसी में इसलिए मसीही अनुभव निहित है: और यह मसीही अनुभव उतना ही इच्छाशक्ति की उन कार्यशील क्रियाओं में निहित है, जो देह के व्यवहार के प्रबंधन से सीधे संबंधित हैं, जितना अन्य क्रियाओं में। ये भीतरी क्रियाएँ मसीही अनुभव का अंग होने में इसलिए कम नहीं हो जातीं, क्योंकि इनके साथ बाहरी व्यवहार सीधे जुड़ा है। परमेश्वर के प्रति प्रेम की कोई सशक्त क्रिया आत्मिक अनुभव का अंग होने में इसलिए कम नहीं हो जाती, क्योंकि वही वह क्रिया है जो तुरन्त किसी आत्म-त्यागी और महंगे बाहरी कार्य को उत्पन्न और सम्पन्न करती है, जो परमेश्वर के आदर और महिमा के लिए बहुत उपयोगी है।
मसीही अनुभव और व्यवहार की बात इस प्रकार करना मानो वे दो पूर्णतः और सर्वथा भिन्न वस्तुएँ हों, बिना विचार या तर्क के एक भेद उत्पन्न करना है। वास्तव में, सारा
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… मसीही अनुभव ठीक रीति से व्यवहार नहीं कहलाता, परन्तु सारा मसीही व्यवहार ठीक रीति से अनुभव है। और उनके बीच जो भेद किया जाता है, वह न केवल अतर्कसंगत, बल्कि अशास्त्रीय भेद है। पवित्र व्यवहार मसीही अनुभव का एक प्रकार या अंग है; और तर्क और पवित्रशास्त्र दोनों इसे उसका प्रमुख, सबसे महत्वपूर्ण और सबसे विशिष्ट अंग बताते हैं। इसी प्रकार यह यिर्मयाह 22:15, 16 में दर्शाया गया है: “क्या तेरा पिता खाता-पीता नहीं था और न्याय और धर्म के काम नहीं करता था? उसने दीन और दरिद्र लोगों का मुकद्दमा चुकाया—क्या यही मुझे जानना नहीं था? यहोवा की यही वाणी है।” परमेश्वर के साथ हमारी भीतरी पहचान निश्चय ही अनुभवात्मक धर्म के अंतर्गत आती है: परन्तु परमेश्वर इसे प्रमुखतः उस अनुभव में स्थित बताता है, जो पवित्र व्यवहार में है। इसी प्रकार परमेश्वर के प्रेम और परमेश्वर के भय के उन अनुग्रहों की क्रियाएँ भी अनुभवात्मक धर्म का अंग हैं: परन्तु पवित्रशास्त्र इन्हें उन पूर्वोक्त वचनों में प्रमुखतः व्यवहार में स्थित बताता है: 1 यूहन्ना 5:3, “क्योंकि परमेश्वर का प्रेम यह है, कि हम उसकी आज्ञाओं को मानें।” 2 यूहन्ना 6, “और प्रेम यह है, कि हम उसकी आज्ञाओं के अनुसार चलें।”
भजन संहिता 34:11, आदि, “हे बालको, आओ, मेरी सुनो: मैं तुम्हें यहोवा का भय मानना सिखाऊँगा: बुराई से हट, और भलाई कर।” ऐसे ही अनुभवों में हिजकिय्याह ने अपनी बीमारी की खाट पर विशेष रूप से शान्ति पाई, जब उसने कहा, “हे यहोवा, स्मरण कर, मैं बिनती करता हूँ, कि मैं तेरे सम्मुख सच्चाई और खरे मन से किस प्रकार चलता रहा हूँ।” और भजनकार भी 119वें भजन में, और अन्यत्र, प्रमुखतः ऐसे ही अनुभवों पर बल देता है।
इसी प्रकार के अनुभवों पर प्रेरित पौलुस भी प्रमुखतः बल देता है, जब वह अपनी पत्रियों में अपने अनुभवों की बात करता है; जैसे, रोमियों 1:9, “परमेश्वर, जिसकी सेवा मैं अपनी आत्मा से उसके पुत्र के सुसमाचार में करता हूँ, मेरा गवाह है।” 2 कुरिन्थियों 1:12, “क्योंकि हमारा घमण्ड यह है, कि हमारे विवेक की यह गवाही है, कि—हम ने परमेश्वर के अनुग्रह से, जगत में अपना चाल चलन सीधा रखा है।” अध्याय 4:13,
“हमें विश्वास की वही आत्मा मिली है, जिसके अनुसार लिखा है, मैं ने विश्वास किया, इसलिये मैं ने बोला; हम भी विश्वास करते हैं, इसलिये बोलते भी हैं।” अध्याय 5:7, “क्योंकि हम विश्वास से चलते हैं, न कि देखने से।” पद 14, “मसीह का प्रेम हमें विवश करता है।” अध्याय 6:4-7, “वरन हर बात में अपने आप को परमेश्वर के सेवकों की नाईं प्रगट करते हैं, बड़े धीरज से, क्लेशों से, दरिद्रता से, संकटों से, परिश्रम से, जागते रहने से, उपवासों से। पवित्रता से, ज्ञान से, कृपालुता से, पवित्र
आत्मा से, निष्कपट प्रेम से, परमेश्वर की सामर्थ्य से।“ गलातियों 2:20, ”मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ; तौभी मैं जीवित हूँ; परन्तु अब मैं नहीं, बल्कि मसीह मुझ में जीवित है: और अब जो मैं शरीर में जीवन बिताता हूँ,
वह परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करने के द्वारा जीवन बिताता हूँ।“ फिलिप्पियों 3:7, 8, ”परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हें मैं ने मसीह के लिये हानि समझ लिया है। वरन मैं सब बातों को हानि समझता हूँ, इसलिये कि मेरे प्रभु मसीह यीशु की पहचान का ज्ञान सब बातों से बढ़कर है: जिसके लिये मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा ही समझता हूँ, कि मैं मसीह को प्राप्त करूँ।“
कुलुस्सियों 1:29, “जिसके लिये मैं भी उसकी उस शक्ति के अनुसार, जो मुझ में सामर्थ्य के साथ प्रभाव डालती है, परिश्रम करते हुए प्रयत्न करता हूँ।” 1 थिस्सलुनीकियों 2:2, “हम ने अपने परमेश्वर पर भरोसा रखकर बड़े विरोध के साथ परमेश्वर का सुसमाचार तुम्हें सुनाने का साहस किया।” पद 8, 9, 10, “इस रीति से हम तुम से स्नेह रखते हुए, न केवल परमेश्वर का सुसमाचार, वरन अपने प्राण भी तुम्हें देने के लिये तैयार थे, क्योंकि तुम हमें प्रिय हो गए थे। हे भाइयो, तुम्हें स्मरण होगा कि हम ने रात दिन परिश्रम करते हुए मेहनत और परिश्रम किया,
तुम और परमेश्वर भी गवाह हो, कि हम तुम विश्वासियों के बीच कैसी पवित्रता, और धार्मिकता, और निर्दोषता से रहे।“ और ऐसे ही अनुभव थे, जिनमें यह धन्य प्रेरित प्रमुखतः
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… अपनी शहादत के समय, अपने आप को शान्ति देता था, जब वह विचार में इनका ध्यान करता था: 2 तीमुथियुस 4:6, 7,
“क्योंकि अब मैं अर्घ की नाईं उंडेला जाता हूँ, और मेरे कूच का समय आ पहुँचा है। मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास को बनाए रखा है।”
और न केवल मसीही अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट अंग आत्मिक व्यवहार में स्थित है; बल्कि अनुग्रह की उन क्रियाओं की, जिनमें आत्मिक व्यवहार स्थित है, प्रकृति ऐसी है, कि ‘अनुभवात्मक धर्म’ नाम से इतनी उचित रीति से और कुछ नहीं पुकारा जा सकता। क्योंकि अनुग्रह की इन क्रियाओं में जो अनुभव है, जो परीक्षा के ठीक उसी बिन्दु पर, जहाँ परमेश्वर यह परखता है कि हम वास्तव में किससे जुड़े रहेंगे—मसीह से या अपनी वासनाओं से—पाई जाती और प्रभावशाली सिद्ध होती हैं, वही, जैसा पहले दिखाया जा चुका है, हमारी भक्ति की सच्चाई और सामर्थ्य का उचित परीक्षण है; जिसमें उसकी विजयी सामर्थ्य और प्रभावशीलता, अपने उचित परिणाम को उत्पन्न करने और अपने उद्देश्य तक पहुँचने में, अनुभव द्वारा पाई जाती है। यही ठीक रीति से मसीही अनुभव है, जिसमें संतों को यह अवसर मिलता है कि वास्तविक अनुभव और परीक्षा द्वारा देख सकें, कि उनके पास परमेश्वर की इच्छा पूरी करने, और मसीह के लिये अन्य वस्तुओं को त्यागने का हृदय है या नहीं। जिस प्रकार वह प्रयोगात्मक दर्शनशास्त्र कहलाता है, जो मतों और धारणाओं को तथ्य की कसौटी पर परखता है, उसी प्रकार वह उचित रीति से अनुभवात्मक धर्म कहलाता है, जो धार्मिक मनोभावों और अभिप्रायों को उसी प्रकार की कसौटी पर परखता है।
एक प्रकार का बाहरी धार्मिक व्यवहार है, जिसमें कोई भीतरी अनुभव नहीं होता, जिसका परमेश्वर की दृष्टि में कुछ भी हिसाब नहीं लिया जाता, बल्कि उसे बिलकुल निकम्मा समझा जाता है। और एक ऐसी वस्तु भी है जिसे ‘अनुभव’ कहा जाता है, जो व्यवहार से रहित है, जिसके साथ न तो मसीही आचरण जुड़ा होता है और न ही उसके पीछे आता है; और यह कुछ भी न होने से भी बुरा है। बहुत से लोगों की मसीही अनुभव और आत्मिक प्रकाश तथा प्रकटीकरणों के विषय में बड़ी गलत धारणाएँ प्रतीत होती हैं। जब भी कोई व्यक्ति परीक्षा के समय अपने भीतर परमेश्वर के साथ परमेश्वर के अनुरूप व्यवहार करने का हृदय पाता है, और अपने स्वभाव को उस परीक्षण में प्रभावशाली पाता है, तो वही सबसे उचित और सबसे विशिष्ट अनुभव है। और ऐसे समय दिव्य वस्तुओं का वह बोध, सत्य का, धर्म की वस्तुओं के महत्व और उत्कृष्टता का वह आभास रखना, जो उस समय उसके हृदय और हाथों पर हावी होकर उन्हें शासित करता है; यही सबसे उत्कृष्ट आत्मिक प्रकाश है, और यही सबसे विशिष्ट प्रकटीकरण हैं। धर्म बहुत कुछ पवित्र मनोभाव में स्थित है; परन्तु मनोभाव की वे क्रियाएँ जो सच्चे धर्म को सबसे अधिक विशिष्ट बनाती हैं, यही व्यावहारिक क्रियाएँ हैं।
पार्थिव मित्रों के बीच मित्रता भी बहुत कुछ स्नेह में स्थित है; परन्तु फिर भी, स्नेह की वे सशक्त क्रियाएँ, जो उन्हें वास्तव में एक दूसरे के लिये आग और जल में से निकाल ले जाती हैं, सच्ची मित्रता के सबसे बड़े प्रमाण हैं।
जो कुछ कहा गया है, उसमें कुछ भी उस मत के विपरीत नहीं है, जो कुछ सुदृढ़ धर्मशास्त्री कहते हैं; जब वे कहते हैं, कि अनुग्रह के कोई निश्चित प्रमाण नहीं हैं, केवल अनुग्रह के कार्य ही हैं। क्योंकि इससे यह बाधा नहीं पड़ती, कि ये कार्यसाधक, उत्पादक कार्य, अनुग्रह की वे क्रियाएँ जो व्यवहार में प्रभावशाली होती हैं, अनुग्रह के अन्य सब प्रकार के कार्यों से बढ़कर सबसे बड़े प्रमाण हो सकती हैं। और न ही इससे यह बाधा पड़ती है, कि जब इनमें से बहुत से कार्य और क्रियाएँ, एक के बाद एक क्रम से, हर प्रकार की विभिन्न परीक्षाओं के अधीन होती हैं, तो प्रमाण और भी अधिक हो जाता है; क्योंकि एक कार्य दूसरे की पुष्टि करता है। कोई मनुष्य, अपने पड़ोसी को केवल एक बार देखकर, उसकी
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… उपस्थिति का अच्छा प्रमाण पा सकता है; परन्तु उसे दिन-प्रतिदिन देखकर, और विभिन्न परिस्थितियों में उससे लगातार बातचीत करके, प्रमाण स्थिर हो जाता है। चेलों ने जब मसीह को उसके पुनरुत्थान के बाद पहली बार देखा, तो उनके पास इस बात का अच्छा प्रमाण था कि वह जीवित है; परन्तु चालीस दिन तक उसके साथ बातचीत करके, और उसके अनेक निश्चित प्रमाणों द्वारा स्वयं को जीवित दिखाने से, उन्हें और भी बड़ा प्रमाण मिला।86
जिस साक्षी या मुहर की बात पवित्रशास्त्र में हम पढ़ते हैं, वह निःसंदेह हृदय पर परमेश्वर के आत्मा के प्रभाव में, उसमें अनुग्रह के रोपण और क्रियाओं में स्थित है, और इस प्रकार अनुभव में स्थित है। और यह भी निःसंदेह है, कि आत्मा की यह मुहर, संतों के लेपालकपन का सबसे बड़ा प्रमाण है, जो उन्हें कभी प्राप्त होता है। परन्तु अनुग्रह की इन क्रियाओं में, जिनकी बात व्यवहार में की गई है, परमेश्वर सबसे स्पष्ट, प्रमुख और स्पष्ट रीति से साक्षी देता है, और अपनी मुहर लगाता है। मसीही कलीसिया के अनुभव से यह भली भांति सच पाया गया है, कि मसीह प्रायः अपने आत्मा द्वारा अपने संतों को उनके पुत्रत्व के सबसे बड़े और सबसे आनन्दमय प्रमाण, परीक्षाओं के अधीन अनुग्रह की उन प्रभावशाली क्रियाओं में देता है, जिनकी बात की जा चुकी है; जैसा कि बहुत से शहीदों के पूर्ण निश्चय और अवर्णनीय आनन्द में प्रकट होता है। इसके अनुरूप, 1 पतरस 4:14, “यदि मसीह के नाम के कारण तुम्हारी निन्दा होती है, तो तुम धन्य हो; क्योंकि महिमा की आत्मा अर्थात परमेश्वर की आत्मा तुम पर ठहरती है।” और रोमियों 5:2, 3 में, “हम परमेश्वर की महिमा की आशा में आनन्दित होते हैं, और क्लेशों में भी घमण्ड करते हैं।” और यह उससे भी मेल खाता है, जो प्रेरित पौलुस अपनी परीक्षाओं में अनुभव किए हुए के विषय बार-बार बताता है। और जब प्रेरित पतरस, मेरे इस वचन में, उस अवर्णनीय और महिमा से परिपूर्ण आनन्द की बात करता है, जिसे उन मसीहियों ने अनुभव किया जिन्हें उसने लिखा; तो उसका आशय उससे है जो उन्होंने उत्पीड़न के अधीन पाया, जैसा प्रसंग से स्पष्ट है। इस प्रकार अपने संतों के मित्र और उद्धारकर्ता के रूप में मसीह का स्वयं को प्रकट करना, जो परीक्षाओं के अधीन उससे जुड़े रहते हैं, प्राचीन काल में शद्रक, मेशक और अबेदनगो को भट्टी में आकर स्वयं को प्रकट करने के द्वारा दर्शाया गया प्रतीत होता है। और जब प्रेरित रोमियों 8:15, 16, 17 में आत्मा की साक्षी की बात करता है, तो उसका आशय अधिक सीधे उससे है जो मसीहियों ने उत्पीड़न सहते हुए, परमेश्वर के प्रेम की अपनी क्रियाओं में अनुभव किया; जैसा प्रसंग से स्पष्ट है। वह, पूर्ववर्ती पदों में, मसीही रोमियों को उनके दुःखों में यह कहकर प्रोत्साहित कर रहा है, कि यद्यपि पाप के कारण उनकी देह मृत है,
86 “अनुग्रह की इन दृश्य क्रियाओं का जितना अधिक नवीनीकरण होता है, उतना ही तुम्हें अधिक निश्चय होता जाएगा। ये क्रियाएँ जितनी बार-बार नई होती हैं, तुम्हारा निश्चय उतना ही स्थिर और दृढ़ होता जाएगा। जिस मनुष्य को अनुग्रह की ऐसी दृश्य क्रियाओं का निश्चय हुआ हो, वह शीघ्र ही बाद में यह संदेह कर सकता है कि कहीं वह भूल में तो नहीं था। परन्तु जब ऐसी क्रियाएँ बार-बार नई होती हैं, तो वह अपनी अच्छी दशा के विषय अधिक स्थिर और दृढ़ होता जाता है। यदि कोई मनुष्य किसी वस्तु को एक बार देख ले, तो इससे उसे निश्चय होता है; परन्तु यदि बाद में उसे भय हो कि वह धोखा खा गया था, तो जब वह उसे फिर देखता है, तो उसे और भी अधिक निश्चय होता है कि वह भूल में नहीं था। यदि कोई मनुष्य किसी पुस्तक में ऐसे वचन पढ़ता है, तो उसे निश्चय होता है कि यह ऐसा ही है। कुछ महीनों बाद, कोई उसे यह समझाकर झुका सकता है कि वह भूल में था, यहाँ तक कि वह स्वयं भी संदेह करने लगे; परन्तु जब वह उसे फिर देखता और पढ़ता है, तो वह भली भांति दृढ़ हो जाता है। मनुष्यों का अनुग्रह जितना बढ़ता है, उनकी शान्ति भी उतनी ही बढ़ती है:”
2 पतरस 1:2, “परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु को पहचानने से, अनुग्रह और शान्ति तुम्हें बहुतायत से मिलती रहे।” स्टॉडर्ड कृत वे टु नो सिन्सैरिटी एण्ड हिपॉक्रिसी।
बारहवाँ — अनुग्रहमय और पवित्र मनोभाव मसीही व्यवहार में अपनी क्रियाशीलता और फल रखते हैं… तौभी वे फिर जीवित किए जाएँगे। परन्तु यह ठीक अगले पद, पद 18 से और भी विशेष रूप से स्पष्ट है, “क्योंकि मैं यह समझता हूँ, कि इस वर्तमान समय के दुःख उस महिमा के योग्य नहीं, जो हम पर प्रगट होनेवाली है।” इस प्रकार प्रेरित का आशय स्पष्ट रूप से इस अध्याय के अन्त तक, जो कुछ वह कहता है, उन सब में, उनके उत्पीड़नों से है। इसी प्रकार जब प्रेरित 2 कुरिन्थियों 5:5 में उस आत्मा के बयाने की बात करता है, जो परमेश्वर ने उसे दिया था, तो प्रसंग स्पष्ट रूप से दिखाता है कि उसका आशय उससे है जो उसे उसकी बड़ी परीक्षाओं और दुःखों में दिया गया था। और प्रकाशितवाक्य 2:17 में उस श्वेत पत्थर और नये नाम की प्रतिज्ञा में, जो जय पानेवाले को दी गई है, यह स्पष्ट है कि
मसीह का विशेष आशय उस लाभ से है, जो मसीहियों को उस उत्पीड़न के दिन उनकी परीक्षा में जय पाकर प्राप्त होना था। यह पद 13 से, और आसिया की सात कलीसियाओं को लिखी गई इस पत्री के अन्य कई अंशों से स्पष्ट है।
आपत्ति 2.—कुछ लोग यह भी आपत्ति उठाने को तैयार हो सकते हैं, कि मसीही व्यवहार को अनुग्रह की सच्चाई का प्रमुख प्रमाण बताने के विषय जो कहा गया है, वह एक व्यवस्था-आधारित सिद्धांत है; और यह कि व्यवहार को धर्म में इतना बड़ा महत्व देना, कामों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है, और मनुष्यों को अपने कामों को अधिक महत्व देने की ओर ले जाता है, जिससे स्वतंत्र अनुग्रह की महिमा घट जाती है, और यह अकेले विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के बड़े सुसमाचार सिद्धांत के साथ ठीक से मेल नहीं खाता प्रतीत होता।
परन्तु यह आपत्ति सर्वथा निराधार है। यह किस रीति से परमेश्वर के अनुग्रह की स्वतंत्रता के विपरीत है, कि पवित्र व्यवहार परमेश्वर के अनुग्रह का चिन्ह हो? हमारे कामों का परमेश्वर की कृपा का मूल्य होना, न कि उसका चिन्ह होना, वही बात है जो उस कृपा की स्वतंत्रता के विपरीत है। निश्चय ही किसी भिखारी का अपने हाथ में पड़े रुपये को उस व्यक्ति की कृपा के चिन्ह के रूप में देखना, जिसने उसे वह दिया, उस कृपा की स्वतंत्रता के किसी भी प्रकार विपरीत नहीं है। उसके हाथ में किसी उपकार के मूल्य के रूप में रुपये का होना ही वह बात है, जो देनेवाले की स्वतंत्र कृपा के विपरीत है। पापियों के प्रति परमेश्वर के अनुग्रह की स्वतंत्रता की धारणा, जैसा सुसमाचार में प्रकट और सिखाया गया है, यह नहीं है कि हम में कोई पवित्र और मनोहर गुण या कार्य उस अनुग्रह का फल, और इस प्रकार चिन्ह, नहीं होगा; बल्कि यह है, कि हमारे किसी भी गुण या कार्य की योग्यता या मनोहरता ही वह नहीं है जो हमें उस अनुग्रह के लिये अनुशंसित करती है; कि कृपा अयोग्य और अमनोहर लोगों पर दिखाई जाती है; कि दिए गए उपकार में बड़ी उत्कृष्टता है, परन्तु उसके मूल्य के रूप में पात्र में कोई उत्कृष्टता नहीं; कि भलाई परमेश्वर के स्वभाव की परिपूर्णता से, भलाई के सोते की परिपूर्णता से, बिना पात्र में किसी मनोहरता के जो उसे खींच सके, निकलकर बहती है। और यही कामों के बिना धर्मी ठहराए जाने की धारणा है (जैसा यह सिद्धांत पवित्रशास्त्र में सिखाया गया है), कि हमारे कामों की, या हम में किसी वस्तु की, योग्यता या मनोहरता ही वह नहीं है, जो पाप के दोष के प्रतिकार के रूप में, या पापियों को जीवन के वारिस के रूप में उसकी स्वीकृति की अनुशंसा के रूप में, परमेश्वर के यहाँ किसी रीति से मान्य होती है। इस प्रकार हम केवल मसीह की धार्मिकता से धर्मी ठहराए जाते हैं, न कि अपनी धार्मिकता से। और जब इस विषय में कामों को विश्वास के विपरीत रखा जाता है, और कहा जाता है कि हम विश्वास से धर्मी ठहराए जाते हैं, कामों से नहीं; तो इसका अर्थ यह है, कि हमारे कामों की, या हम में किसी वस्तु की, योग्यता या मनोहरता ही वह नहीं है, जो हमें मसीह और उसके लाभों में हिस्सेदारी की अनुशंसा करती है; बल्कि यह हिस्सेदारी हमें केवल विश्वास से, या हमारे प्राणों द्वारा ग्रहण करने से प्राप्त होती है
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रयोग और फल मसीही व्यवहार में… मसीह से, अर्थात उससे जुड़े रहने और उसे थामे रहने में प्रगट होता है। परन्तु यह बात कि हम में की किसी वस्तु की योग्यता या मनोहरता हमें मसीह में भाग पाने की ओर अनुशंसित नहीं करती और न ही उस तक पहुँचाती है, इस बात का प्रमाण नहीं है कि हम में की कोई भी वस्तु मसीह में भाग होने का चिन्ह नहीं है।
यदि निःशुल्क अनुग्रह और केवल विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के सिद्धांत, पवित्र आचरण के अनुग्रह के चिन्ह होने के महत्व के साथ असंगत हों; तो वे उतने ही असंगत हैं हम में की किसी भी वस्तु के अनुग्रह के चिन्ह होने के महत्व के साथ, चाहे वह कोई पवित्रता हो, या हम में की कोई अनुग्रह हो, या धर्म के हमारे किसी अनुभव के साथ; क्योंकि यह निःशुल्क अनुग्रह और केवल विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के सिद्धांतों के उतना ही विरुद्ध है कि इनमें से कोई भी वह धार्मिकता हो जिससे हम धर्मी ठहराए जाते हैं, जितना कि यह कि पवित्र आचरण ऐसा हो। पवित्र कार्यों के साथ भी वैसा ही है जैसा पवित्र गुणों के साथ है; सुसमाचार के अनुग्रह की निःशुल्कता के साथ यह असंगत है कि मनुष्यों को उद्धार का अधिकार उनके किसी पवित्र गुण की मनोहरता के कारण दिया जाए, जितना कि यह असंगत है कि वह उनके कार्यों की पवित्रता के कारण दिया जाए। यह निःशुल्क अनुग्रह के सुसमाचार-सिद्धांत के साथ असंगत है कि मसीह में भाग और उसके लाभों को किसी मनुष्य की सच्ची पवित्रता की मनोहरता के कारण, उसके नए किए गए, पवित्र किए गए, स्वर्गीय हृदय की मनोहरता के कारण, परमेश्वर से उसके प्रेम और परमेश्वर के सदृश होने के कारण, या पवित्र आत्मा में उसके आनन्द के अनुभव, आत्म-रिक्तता, मसीह को सबसे ऊपर बड़ा करने और उसे सारी महिमा देने की आत्मा, तथा उसके प्रति समर्पित हृदय के कारण दिया जाए; मैं कहता हूँ कि यह निःशुल्क अनुग्रह के सुसमाचार-सिद्धांत के साथ असंगत है कि मसीह के लाभों का अधिकार इनमें से किसी की मनोहरता के प्रति सम्मान के कारण दिया जाए, या इनमें से कोई भी धर्मी ठहराए जाने के मामले में हमारी धार्मिकता हो। फिर भी यह मसीह में भाग के प्रमाण के रूप में इन बातों के महत्व में बाधा नहीं डालता। पवित्र कार्यों और कामों के सम्बन्ध में भी ठीक ऐसा ही है। कामों को हल्का समझना, इसलिए कि हम कामों से धर्मी नहीं ठहराए जाते, वास्तव में सारे धर्म को, सारे अनुग्रह और पवित्रता को, वरन सच्ची सुसमाचार-सम्बन्धी पवित्रता और सारे अनुग्रहमय अनुभव को हल्का समझने के समान है; क्योंकि जब पवित्रशास्त्र कहता है कि हम कामों से धर्मी नहीं ठहराए जाते, तो उसमें सब कुछ सम्मिलित है; क्योंकि इस मामले में कामों से अभिप्राय है हमारी अपनी सारी धार्मिकता, धर्म या पवित्रता, और हम में की हर वस्तु, वह सब भलाई जो हम करते हैं, और वह सब भलाई जिसका हमें बोध है, सारे बाहरी कार्य, और अनुग्रह के सारे आन्तरिक कार्य और अभ्यास, और सारे अनुभव, और वे सब पवित्र और स्वर्गीय बातें जिनमें धर्म का जीवन और सामर्थ्य, वरन उसका मूल सत्त्व निहित है, वे सब बड़ी बातें जिन पर मसीह और उसके प्रेरितों ने अपने प्रचार में मुख्य रूप से बल दिया और जिन्हें उन्होंने मनुष्यों के हृदयों और जीवनों में सबसे बड़े महत्व की मानकर बढ़ावा देने का प्रयत्न किया, और हर प्रकार के सारे भले स्वभाव, अभ्यास और गुण; और यहाँ तक कि विश्वास भी, जब उसे हमारी पवित्रता के एक अंश के रूप में देखा जाए। क्योंकि हम इनमें से किसी भी वस्तु से धर्मी नहीं ठहराए जाते; और यदि हम ठहराए जाते, तो पवित्रशास्त्र के अर्थ में हम कामों से ही धर्मी ठहराए जाते। और इसलिए यदि इनमें से किसी पर भी मसीह में भाग के प्रमाण के रूप में बड़े महत्व की वस्तु मानकर बल देना व्यवस्था-आधारित और कामों के बिना धर्मी ठहराए जाने के सुसमाचार-सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है; तो पवित्र आचरण के महत्व पर इस प्रकार बल देना भी वैसा नहीं है। यह मान लेना व्यवस्था-आधारित होगा कि पवित्र आचरण हमें मसीह के लाभों के अधिकार तक, उसके मूल्य के रूप में, या अपनी अनमोलता अथवा उत्कृष्टता के द्वारा उसकी अनुशंसा करके, धर्मी ठहराता है; परन्तु यह मान लेना व्यवस्था-आधारित नहीं है कि पवित्र आचरण किसी विश्वासी की सच्चाई को, उसके उचित प्रमाण के रूप में सिद्ध करता है। प्रेरित
12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रयोग और फल मसीही व्यवहार में… याकूब ने यह कहना व्यवस्था-आधारित नहीं समझा कि हमारा पिता अब्राहम इस अर्थ में कामों से धर्मी ठहराया गया। जिस आत्मा ने पवित्रशास्त्र की रचना करवाई, उसने इस सम्बन्ध में पवित्र आचरण के बड़े महत्व और परम आवश्यकता को अनुग्रह की निःशुल्कता के साथ असंगत नहीं माना; क्योंकि वह सामान्यतः दोनों को एक साथ सिखाता है; जैसे प्रकाशितवाक्य 21:6, 7 में परमेश्वर कहता है, “मैं प्यासे को जीवन के जल के सोते में से सेंत-मेंत पिलाऊँगा”; और फिर तुरन्त अगले ही शब्दों में जोड़ता है, “जो जय पाए, वह इन वस्तुओं का वारिस होगा।” मानो मसीही दौड़ और युद्ध में भले चालचलन रखना प्रतिज्ञा की शर्त हो। इसी प्रकार अगले अध्याय में, 14वीं और 15वीं आयतों में, मसीह कहता है, “धन्य हैं वे जो उसकी आज्ञाओं को मानते हैं, कि उन्हें जीवन के वृक्ष पर अधिकार मिले और वे फाटकों से होकर नगर में प्रवेश करें”; और फिर 15वीं आयत में यह घोषित करता है कि कैसे “जो बुरा चालचलन रखनेवाले हैं” वे बाहर रखे जाएँगे; और फिर भी अगली दो आयतों में बड़ी गम्भीरता के साथ सबको जीवन का जल सेंत-मेंत लेने के लिए आने का निमंत्रण देता है: “मैं दाऊद का मूल और वंश, और भोर का चमकता हुआ तारा हूँ। और आत्मा और दुल्हिन कहती हैं, आ। और जो सुने वह कहे, आ।
और जो प्यासा हो वह आए; और जो कोई चाहे वह आकर जीवन का जल सेंत-मेंत ले।” इसी प्रकार अध्याय 3:20, 21 में, “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ, और वह मेरे साथ भोजन करेगा।” परन्तु फिर अगले ही शब्दों में यह जोड़ा गया है, “जो जय पाए, उसे मैं अपने साथ अपने सिंहासन पर बैठने का अधिकार दूँगा।” और मसीह के उस महान निमंत्रण में, मत्ती 11 के अन्त में, “हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा”; मसीह अगले ही शब्दों में जोड़ता है,
“मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझसे सीखो, क्योंकि मैं नम्र हूँ और मन में दीन हूँ; और तुम अपने प्राणों के लिये विश्राम पाओगे; क्योंकि मेरा जूआ सहज, और मेरा बोझ हलका है”: मानो मसीह की सेवा का बोझ उठाना और उसके नमूने पर चलना, प्रतिज्ञा किए गए विश्राम को पाने के लिए आवश्यक हो। इसी प्रकार पापियों को निःशुल्क अनुग्रह ग्रहण करने के उस महान निमंत्रण में, यशायाह 55, “हे सब प्यासो, पानी के पास आओ, और जिसके पास पैसा नहीं है वह भी आए; मोल लो और खाओ; हाँ, आओ, बिना दाम और बिना मोल दाखमधु और दूध मोल लो”; वहाँ भी, उसी निमंत्रण की अगली बात में, पापी के बुरे चालचलन को त्यागने की बात दया पाने के लिए आवश्यक बताई गई है: आयत 7, “दुष्ट अपनी चाल-चलन, और अनर्थकारी अपनी युक्तियों को छोड़ दे; वह यहोवा की ओर फिरे, वह उस पर दया करेगा, और हमारे परमेश्वर की ओर फिरे, क्योंकि वह बहुतायत से क्षमा करेगा।” इसी प्रकार परमेश्वर के अनुग्रह के धन को, पापियों के धर्मी ठहराए जाने में, पवित्र आचरण की आवश्यकता के साथ प्रकट किया गया है, यशायाह 1:16 आदि: “अपने आप को धो लो, अपने आप को शुद्ध करो, अपने बुरे कामों को मेरी आँखों की ओट से दूर करो, बुराई करना छोड़ दो, भलाई करना सीखो, न्याय की खोज करो, पिसे हुए को छुड़ाओ, अनाथ का न्याय चुकाओ, विधवा का मुकद्दमा लड़ो। यहोवा कहता है, आओ, हम आपस में वाद-विवाद करें; तुम्हारे पाप लाल रंग के क्यों न हों, तौभी हिम के समान उजले हो जाएँगे; चाहे किरमजी के समान क्यों न हों, तौभी ऊन के समान श्वेत हो जाएँगे।”
और बुद्धि के उस अत्यन्त गम्भीर निमंत्रण में, नीतिवचन 9, जहाँ यह दिखाया गया है कि कैसी बड़ी तैयारी की गई, और कैसे सब कुछ तैयार था, घर बनाया गया, पशु मारे गए, दाखमधु मिलाया गया, मेज सजाई गई, और अतिथियों को नेवता देने के लिये सेवक भेजे गए; तब हमें वह निःशुल्क निमंत्रण मिलता है, आयत 4, 5, 6: “जो कोई भोला हो वह यहाँ फिरे; 12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रयोग और फल मसीही व्यवहार में… और जो निर्बुद्धि है (अर्थात जिसके पास धार्मिकता नहीं है) उससे वह कहती है, आओ, मेरी रोटी खाओ, और मेरे मिलाए हुए दाखमधु को पीओ।” परन्तु फिर अगले ही साँस में यह जुड़ता है, “निर्बुद्धि लोगों को त्याग दो, और जीवित रहो; और समझ के मार्ग में चलो”; मानो पाप को त्यागना और पवित्रता के मार्ग में चलना जीवन पाने के लिए आवश्यक हो। इसलिए अनुग्रह की निःशुल्कता और पवित्र आचरण की आवश्यकता, जो इस प्रकार पवित्रशास्त्र में बार-बार एक साथ जोड़े गए हैं, एक दूसरे के साथ असंगत नहीं हैं। और न ही इससे विश्वास की महिमा और महत्व कुछ भी घटता है कि आचरण में विश्वास के अभ्यास और परिणामों को उसके मुख्य चिन्ह माना जाए; जैसे जीवन के महत्व में कुछ भी कमी नहीं आती कि गति और हलचल को उसके मुख्य चिन्ह माना जाता है।
इसलिये सच्चाई के मुख्य चिन्ह के रूप में पवित्र आचरण के महत्व के विषय में जो कुछ कहा गया है, उसमें कुछ भी व्यवस्था-आधारित नहीं है, सुसमाचार के अनुग्रह की स्वतंत्रता और प्रभुसत्ता के विरुद्ध कुछ भी अपमानजनक नहीं है, व्यवस्था के कामों के बिना केवल विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के सुसमाचार-सिद्धांत से रंचमात्र भी नहीं टकराता, मध्यस्थ की महिमा और उसकी धार्मिकता पर हमारी निर्भरता को रंचमात्र भी घटाने की प्रवृत्ति नहीं रखता, हमारे उद्धार के मामले में विश्वास के विशेष अधिकारों में कोई बाधा नहीं डालता, परमेश्वर की महिमा और उसकी दया को किसी भी प्रकार कम नहीं करता, न मनुष्य को बड़ा करता है, और न ही उसकी निर्भरता और दायित्व को घटाता है। इसलिये यदि कोई पवित्र आचरण के इस प्रकार बताए गए महत्व के विरुद्ध हैं, तो यह केवल “कार्यों” शब्द के अक्षरों और ध्वनि के प्रति एक निरर्थक विरक्ति के कारण ही हो सकता है, जबकि इसके लिये संसार में कोई कारण नहीं दिया जा सकता, सिवाय इसके कि उतने ही बल के साथ यह भी कहा जा सकता है कि उन्हें पवित्रता, भक्ति, अनुग्रह, धर्म, अनुभव, और यहाँ तक कि विश्वास शब्दों के प्रति भी विरक्ति क्यों होनी चाहिए; क्योंकि इनमें से किसी को भी धार्मिकता बनाना उतना ही व्यवस्था-आधारित और नई वाचा के मार्ग के साथ असंगत है, जितना पवित्र आचरण को धार्मिकता बनाना है।
यह धर्म को बड़ी हानि पहुँचाता है कि लोग उन बातों को हल्का समझें और उन पर थोड़ा बल दें, जिन पर पवित्रशास्त्र सबसे अधिक बल देता है, अर्थात जो मसीह में हमारे भाग के प्रमाण में सबसे अधिक महत्व की हैं, इस धारणा के अधीन कि इन बातों पर भार देना व्यवस्था-आधारित है और पुरानी वाचा की रीति है; और इस प्रकार आचरण में अनुग्रह के अभ्यासों और प्रभावशाली कार्यों की उपेक्षा करें, और लगभग पूरी तरह प्रकाशनों, तथा विवेक और अनुग्रह के मनन में आन्तरिक अभ्यासों की विधि और रीति पर बल दें; और इन मामलों में सूक्ष्म भेद करने की क्षमता, और दर्शनशास्त्र या अनुभव से इनमें यथार्थ विवेचना करने की योग्यता पर निर्भर रहें।
पवित्रशास्त्र ने भक्ति के चिन्हों के रूप में जिन बातों का सबसे स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है, और जिन पर सबसे अधिक बारंबार बल दिया है, उनसे बेहतर या आगे कोई चिन्ह ढूँढ़ना व्यर्थ है। जो लोग चिन्ह बताने में अधिक यथार्थता का दावा करते हैं, या अपने असाधारण अनुभव या वस्तुओं की प्रकृति की अन्तर्दृष्टि के द्वारा, अधिक विशिष्ट चिन्ह देने का दावा करते हैं, जो कपटी को अधिक पूर्णता से खोज निकालेंगे और पकड़ेंगे, वे केवल अपने और दूसरों के मन को अंधकारमय करने में चतुर हैं; उनकी सूक्ष्मताएँ और बारीक विवेचनाएँ, परमेश्वर की दृष्टि में, केवल परिष्कृत मूर्खता और चतुर भ्रम हैं। यहाँ आगूर के वे वचन लागू होते हैं, नीतिवचन 30:5, 6, “परमेश्वर का एक एक वचन ताया हुआ है; जो उसकी शरण लेते हैं, उनकी वह ढाल है। उसके वचनों में मत जोड़, ऐसा न हो कि वह तुझे डाँटे, और तू झूठा ठहरे।” मनुष्यों के हृदयों के विषय में हमारी विवेचना 12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रयोग और फल मसीही व्यवहार में… बहुत विश्वसनीय नहीं है। हम प्राण की प्रकृति और मनुष्य के हृदय की गहराइयों में केवल थोड़ी ही दूर तक देख सकते हैं। इतने अनेक मार्ग हैं जिनसे बिना किसी अलौकिक प्रभाव के मनुष्यों के मनोभाव हिलाए जा सकते हैं, मनोभावों के स्वाभाविक स्रोत इतने विविध और इतने गुप्त हैं, कल्पना पर इतनी अनेक बातों का प्रायः संयुक्त प्रभाव पड़ता है, और वह भी असंख्य और अगम्य रीतियों से, स्वाभाविक स्वभाव, शिक्षा, परमेश्वर के आत्मा के सामान्य प्रभाव, प्रभावित करनेवाली परिस्थितियों का एक आश्चर्यजनक समागम, मनुष्यों के विचारों की धारा में वस्तुओं का एक असाधारण संयोग, साथ ही अदृश्य द्वेषी आत्माओं का चतुर प्रबन्धन — ये सब मिलकर ऐसे हैं कि कोई भी दर्शनशास्त्र या अनुभव, परमेश्वर ने अपने वचन में हमें जो सूत्र दिया है उसका निकटता से अनुसरण किए बिना, हमें इस भूलभुलैया और जाल में सुरक्षित रीति से मार्ग दिखाने के लिये कभी पर्याप्त नहीं होगा। परमेश्वर अपने ही कारण जानता है कि वह क्यों कुछ बातों पर बल देता है, और उन्हें स्पष्ट रूप से उन बातों के रूप में प्रस्तुत करता है जिनसे हमें दूसरों की अपेक्षा अपने आप को परखना चाहिए। हो सकता है कि इसका कारण यह हो कि वह जानता है कि इन बातों के साथ कम उलझन जुड़ी है, और हम दूसरों की अपेक्षा इनके द्वारा धोखा खाने की कम सम्भावना रखते हैं। वह हमारे स्वभाव को सबसे भली-भाँति जानता है; और वह अपने ही कार्यों की प्रकृति और रीति को जानता है; और वह हमारी सुरक्षा के मार्ग को सबसे भली-भाँति जानता है; वह जानता है कि अपनी कलीसिया की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं, विशेष व्यक्तियों के भिन्न-भिन्न स्वभावों, और अपने कार्यों की रीति में विविधताओं के लिये कितनी छूट देनी है, स्वभाव कहाँ तक अनुग्रह से मिलता-जुलता हो सकता है, और स्वभाव कहाँ तक अनुग्रह के साथ मिश्रित हो सकता है, कौन-से मनोभाव कल्पना से उत्पन्न हो सकते हैं, और कल्पना कहाँ तक आत्मिक ज्योति के साथ मिश्रित हो सकती है। और इसलिये हमारी बुद्धिमानी यही है कि हम उसका कार्य उसके हाथों से न छीनें, बल्कि उसका अनुसरण करें, और अपने आप को परखने का भार वहीं रखें जहाँ उसने हमें निर्देश दिया है। यदि हम अन्यथा करें, तो कोई आश्चर्य नहीं कि हम उलझन में पड़ें, घबरा जाएँ, और घातक रूप से भरमाए जाएँ। परन्तु यदि हम मुख्यतः उन बातों को देखने के मार्ग में लग जाएँ जिन पर मसीह और उसके प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं ने मुख्य रूप से बल दिया, और इस प्रकार अपने आप को और दूसरों को परखने में, अन्य बातों की उपेक्षा किए बिना, मुख्यतः अनुग्रह के व्यावहारिक अभ्यासों और परिणामों पर ध्यान दें; तो इसके अनेक शुभ परिणाम होंगे; यह सबसे बढ़कर भरमाए हुए कपटियों को दोषी ठहराने में, और उन लोगों के भरमाए जाने को रोकने में सहायक होगा जिनके हृदय कभी भी उस सीधे और सकरे मार्ग के, जो जीवन को ले जाता है, पूर्ण अनुसरण में नहीं लाए गए; यह अनुभव की विधियों और पड़ावों के विषय में पाई जानेवाली विविध असंगत योजनाओं से उत्पन्न अनगिनत उलझनों से हमें छुड़ाने में सहायक होगा; यह अंगीकार करनेवालों को जीवन की कठोरता की उपेक्षा करने से बड़ी सीमा तक रोकेगा, और उनकी मसीही चाल में उनकी तत्परता और गम्भीरता को बढ़ावा देगा; और मनुष्यों के लिये यह प्रचलन बन जाएगा कि वे अपनी मसीहियत को अपने अनुभवों की भरमार और अत्यधिक घोषणा के द्वारा नहीं, बल्कि एक मनोहर, विशिष्ट चालचलन के द्वारा दिखाएँ; और हम धर्म में जीवन्त प्रतीत होने के मार्ग में लग जाएँगे, अपनी जीभों की जीवन्तता और उतावलेपन के द्वारा नहीं, और अपने ही हृदयों के पवित्र और उत्कृष्ट कार्यों और अभ्यासों को अपने मुख से घर की छतों पर घोषित करने का व्यवसाय बनाने के द्वारा नहीं, बल्कि परमेश्वर की और अपनी पीढ़ी की सेवा में जीवन्त होने के द्वारा; और घनिष्ठ मित्र मसीही जन अपने अनुभवों और शान्ति की बातों को आपस में एक ऐसी रीति से बताएँगे जो अधिक उपयुक्त हो
मसीही दीनता और नम्रता के, और एक दूसरे के अधिक लाभ के लिए; उनकी जीभें आगे न दौड़तीं, 12. अनुग्रहमय और पवित्र मनोभावों का प्रयोग और फल मसीही व्यवहार में… बल्कि धन्य प्रेरित के बुद्धिमानी भरे उदाहरण के अनुसार, 2 कुरिन्थियों 12:6, उनके हाथों और पाँवों के पीछे-पीछे चलतीं, और आत्मिक अभिमान के अनेक अवसर कट जाते; और इस प्रकार शैतान के विरुद्ध एक बड़ा द्वार बन्द हो जाता; और अनुभवजन्य और सामर्थी धर्म के विरुद्ध अधिकांश मुख्य ठोकर के कारण दूर हो जाते; और धर्म ऐसी रीति से घोषित और प्रकट किया जाता कि, दर्शकों को कठोर बनाने और अविश्वास तथा नास्तिकता को बहुत बढ़ावा देने के बजाय, वह सबसे बढ़कर मनुष्यों को यह विश्वास दिलाने में सहायक होता कि धर्म में वास्तविकता है, और उन्हें बहुत जगाता, और उनके विवेक को धर्म के महत्व और उत्कृष्टता का विश्वास दिलाकर उन्हें जीत लेता। इस प्रकार अंगीकार करनेवालों की ज्योति मनुष्यों के सामने ऐसी चमकती, कि दूसरे उनके भले कामों को देखकर उनके स्वर्गीय पिता की महिमा करते।
आभार आभार इस पुस्तक के मुखपृष्ठ की कलाकृति http://www.flickr.com/photos/oslointhesummertime/99833154 की व्युत्पन्न कृति है और क्रिएटिव कॉमन्स एट्रिब्यूशन शेयर-अलाइक 3.0 लाइसेंस के अन्तर्गत उपयोग हेतु उपलब्ध है।
पवित्रशास्त्र संदर्भ सूची पवित्रशास्त्र संदर्भ सूची उत्पत्ति 15:12-13 19:14 20:6-7 22:1 23:7 24:63 31:24 33:3 46 निर्गमन 2:23 3 3:11 5:19 8:25 9:16 9:27 9:27 9:27-28 10:8-10 10:24 12:11 14:18 15:16
15:25 16:4 19:8 24:3 24:7 25:31 28:32 28:34 29:22 34:8 39:23 39:26
गिनती 14:21 14:24 14:39-40 23:9-10 24:1 24:2 24:16-17 32:11-12 व्यवस्थाविवरण 1:36 5:27-29 5:29 6:13 8:2 8:2 8:2 8:16 8:16 10:12 10:20 13:1 26:2 26:16-18
26:17 30:6 32:18-20 32:36-37 यहोशू 14:6 14:8 14:9 14:14
न्यायियों 2:21-22 2:22 7:2 16:10 16:13
1 शमूएल 2:2 10:2-3 16:7 24:16-17 24:16-17 25:16-19 26:21 26:21 31:21
1 राजा 6:18 7:18-19 19 19:12-13 21:27 21:27 22:22
2 राजा 5:14 5:15 10:16 17:32-33 20:3 22:19
2 इतिहास 15:12-14 32:25 36:13
नहेमायाह 9:2 9:33 10:28-29 अय्यूब 1:8 1:9-10 12:11 13:2 17:9 19:25 20:12-13 23:10 23:10 27:8-10 28:28 28:28 34:11
पवित्रशास्त्र संदर्भ सूची 2:1 2:11 2:11 9:10 15 18:27 19:7-9 19:7-10 19:10 21:1 24:3-4 24:6 26:8 27:4
27:4 29:2 31:24 33:1 33:18 33:18 33:18 34:11 34:11 34:11 34:18 34:18 36:1
36:8-9 37:4 37:9-10 37:10-11 37:21 37:21 37:21 37:29 38:10 42:1 42:1-2 43:3-4 46:10 51:17 51:17 55:12-14 55:17 63:1 63:1-2 63:1-2 63:3-5 63:5-6 63:6 63:7
63:11 66:3 66:3 66:10-11 66:10-11 68:3 68:13 69:6 69:32 69:35 69:36 71:23 72:6
73:25 78:7 78:7-8 78:10 78:11 78:35 78:36 78:37 78:41 78:56 84:1-2 84:1-2 84:2
84:2 84:2 89:15 89:15-16 95:7-10 96:9 97:10 97:11-12 97:12 98:1 99:2-3 101:2-3 101:5 105:15 106:3 106:12 110:3 112:5 112:7 116:1 116:12 119:1 119:6 119:14
119:18 119:20 119:57 119:81 119:97 119:99-100 119:104 119:104 119:106
119:111-112 119:120 119:120 119:120 119:131 119:136 119:140 119:166 125:4-5 125:5 130:6 131:1 133:1-2 133:1-2 135 138:6 139:14-15 139:21 139:21 139:29
143:6-7 146:5 147:6 147:11 147:11 147:11 149:2
नीतिवचन 3:7 3:7 3:34 4:18 6:16-17 8:13 8:13 8:13 9 10:32 14:21 14:31 16:6 16:32 17:3
17:27 20:17 20:17 21:26 24:12 25:2 25:24 26:11 26:12 28:13 28:14 28:14 30:2-4 30:5-6 30:32
सभोपदेशक 10:2-3 11:5 12:14
श्रेष्ठगीत 1:3 1:4 1:15 2:5 2:11-12 2:14 3:1-2 3:11 5:8 6:8 7:2 7:11-12 8:6 8:11-12 यशायाह 1:12-15 1:16 1:18 1:19 2:10 2:11-17 2:19 2:21 5:1-8 5:21 6 6:3 11:3 11:6-9
14:23-24 19:18 26:8 26:10 27:2-3 32 32:6 33:7 35:8 35:8 35:8 35:10 38:3 40:13
43:22 45:29 48:1-2 52:1 52:7 53:8 55 55:7 57:1 57:5 57:15 57:15 58 58:2 61:1-2 63:15 63:17 64:5 64:5 65:5 65:5 65:25 66:1-2 66:2 66:2 66:5 66:5
यिर्मयाह 1:6 3:10 3:23-25 4:2 4:3-4 5:7 7:11 12:16 13:17 17:7 17:7-8 17:9-10 17:10 17:13
22:15-16 22:16 22:16 22:16 32:19
विलापगीत 1:17 3:28
यहेजकेल 3:7 3:20 9:4 11:19 13:7 16:6 16:56 16:60 16:61 16:63 18:24 20:38 20:41-42 20:42-43 33:1 33:12-13 33:13 33:20 33:31-32 36:26 44:6-7 दानिय्येल 3:28-30 4:1-3 4:1-3 4:13 4:17 4:23 4:34 4:34-35 4:35 4:37 4:37 6:25 6:25-27 10
होशे 4:16 6:6 6:6 7:8 10:4 13:1 13:1 14:9
पवित्रशास्त्र संदर्भ सूची योएल 3:17
हबक्कूक 2:4 3:16 3:16
जकर्याह 9:9 12:12-14 13:4 13:9 13:9 14:21
मत्ती 3:6 3:7-9 3:8 3:8 3:10 3:10 3:12 5:3 5:4 5:4 5:5 5:6 5:7 5:7 5:7 5:9 5:12 5:12
5:15-16 5:16 5:29-30 5:29-30 5:45-46 5:46 6:5-6 6:6 6:12 6:14 6:15 6:16 6:17
7:16 7:19-20 8:4 8:20 8:24-26 9:8 9:13 9:36 10:22 10:39 10:42 11 11:27 11:28-29 11:29 12:7 12:43-45 12:49-50 13:4-8 13:19-23 13:20 13:26 14:14 15:22 15:26-28
15:31 15:32 16:15-17 16:16-17 16:23 16:27 18 18:3 18:3-4 18:4 18:6 18:22 18:31
19:14 19:16 21:5 22:37-40 22:39-40 23:6-7 23:23 24:10-13 24:12-13 24:12-13 25 25 25 25:8 25:26 25:30 25:31 26:1 26:41 26:75 28:8 28:8 28:9 34
मरकुस 1:4 2:12 3:5 3:5 6:20 6:34 6:34 8:38 9:24 10:15 10:15 11:25-26 14:72
लूका 1:53 2:27 4:15 5:26 5:27-28 6:23 6:32 6:44 7 7 7:13 7:16 7:37 8:13 8:43-44 9:55 9:62 10:3 10:21-22 11:52 12:35 12:57 13:6 13:26 14:7 14:10 15 15:18 17:32
18 18:9 18:11 19:16-23 19:41-42 22:15 22:28 22:62 24:32 24:32 24:49
यूहन्ना 1:14 1:14 1:16 1:16 1:34 2:17 2:23-25 3:6 3:6 3:11 3:29 4:14 4:14 4:14 4:14
4:14 4:32 4:34 4:34 5:35 5:35 5:35 5:36 5:42 6 6:40 6:40 6:40 6:40 6:45 6:47
6:50-51 6:54 6:58 6:68-69 7:37-39 7:38-39 8:30-31 8:31 9:40 11 11:25 12:18
12:19 12:40 12:45 13:17 13:33 13:34 14 14 14:2 14:16-17 14:17 14:21 14:21
15:1 15:1-2 15:4 15:5 15:6 15:6-8 15:8 15:10 15:11 15:14 15:16 16:27 17:6-8 17:6-8 17:8 17:13 17:21 17:26 19:9 20 20:22 20:29 21:15
प्रेरितों के काम 1:4 2:38 2:38-39 2:41 2:46-47 3:14 4:13 4:21 4:27 4:34-35 8:13 8:23 8:37 10:22
13:48 14:3 19:9 20:19 20:19 22:3 22:14-15 26:20 26:25
रोमियों 1:9 1:11 1:21 2:5 2:6 2:6 2:7 2:13 2:19-20 2:20 2:29 2:31 4:1-2 5:2-3 5:3 5:5
6:3-8 7:4-9 7:13 7:19 7:25 8 8:1 8:6 8:6 8:6-7 8:9 8:9-11 8:10 8:14 8:15-17 पवित्रशास्त्र संदर्भ सूची 8:16 8:16 8:22 8:24 8:24 8:29 8:36 9:2 9:18 10:2 10:2 11:20 12:1 12:1-2 12:2
12:11 12:15 12:16 13:7 13:8 13:8 13:8-10 13:10 13:14 14:6 14:11
1 कुरिन्थियों 1:8-9 1:27-29 2:4 2:12 2:13-14 2:14 2:14 2:14 2:14 2:14-15 3 3:2 3:16 4:5 4:20
6:9-10 6:17 6:17 8:2 9:2 9:25-26 9:26 9:26 11:15 13 13:1-3 13:2 13:2 13:4
13:4-5 13:6 13:8-12 13:10-11 13:13 14:20 15:47-49 2 कुरिन्थियों 1:1 1:8-10 1:12 1:12 1:12 1:19 1:22 1:22 1:22 1:24 1:29 2:4 2:4 2:4 2:14 2:14
3:18 3:18 3:18 4:3-4 4:3-6 4:5 4:6 4:7 4:18 5:5 5:5 5:5 5:7 5:10 5:14-15 5:16-17 6:10 6:11 6:16 7:4 7:7 7:9 7:13 7:15 7:15 7:16 8:2 8:2 8:8 8:8 8:16 10:5 11:2-3 12:6 12:9 12:19 13:5
गलातियों 1:14 1:14 1:16 1:16 2:20 2:20 2:20 2:20 2:20 3:1 3:13-14 3:14 3:15 4:6 4:11
4:15 4:15 4:19 5 5:14 5:14 5:14 5:16 5:18 5:21 6:1 6:4 6:7 6:7 6:9
इफिसियों 1:1 1:3 1:4 1:13 1:13 1:13-14 1:14 1:14 1:16 1:17-20 1:18-19 3:7 3:7 3:17-19 3:20 4:4 4:11-12 4:13 4:16 4:22-24 5:5-6 5:21 6:1 6:5 6:5 6:24
फिलिप्पियों 1:4 1:8 1:8 1:9 1:20 1:21 2:1 2:1 2:3 2:7 2:10-11 2:12 2:12 2:21 2:21 3:1 3:3
3:6 3:7 3:7-8 3:8 3:13 3:13-15 3:18-19 4:1 4:1-2 4:10
कुलुस्सियों 1:9 1:9 1:9 1:22-23 1:29 1:34 2:1 2:2 2:18 2:18 2:23 3:7-8 3:10 3:10 3:12 3:12
3:12-13 1 थिस्सलुनीकियों 1:3 1:5 2:2 2:6 2:7-8 2:8 3:9 5:8 5:16
2 थिस्सलुनीकियों 1:1 1:4
1 तीमुथियुस 1:5 2:9 3 4 5 6:6
2 तीमुथियुस 1:4 1:7 1:7 1:12 1:12 1:12 2:15 3:5 3:5 4:4-8 4:6-7 4:7-8 तीतुस 1:1 1:16 2:14 2:14 2:14 3:3
फिलेमोन 1:1 1:5 1:12 1:20
पवित्रशास्त्र संदर्भ सूची 2:4 3:6 3:6 3:8 3:12 3:14 6 6:4-5 6:4-6 6:7-8 6:9-10 6:11-12 6:11-12 6:17-18 6:18 6:19 9:9 10:22 10:35 10:36 11:1 11:1 11:1 11:1 11:3 11:8 11:8-9 11:13
11:17 11:23 11:27 11:29 11:36 12:1 12:1 12:10 12:10 13:9
याकूब 1:2-3 1:2-3 1:12 1:15 1:19 1:25 1:26 1:27 1:27 2 2:13-16 2:18 2:21-24 2:22
1 पतरस 1:3 1:6 1:6-7 1:7 1:7 1:8 1:13-14 2:2-3 2:2-3 2:17 2:18 3:2 3:15 4:14 5:5 5:12
1 यूहन्ना 1:3 1:3 2:3 2:3 2:3 2:3 2:3 2:4-5 2:9-10 2:19 2:20 2:20 2:27 3:3 3:3 3:6 3:7-8 3:9 3:14 3:16 3:17 3:18-19 3:19-21 4:7 4:12 4:13 4:13-15 4:14 4:15 4:15 4:16
4:16 4:18 4:18 4:18 4:19 5:3 5:3 5:8 5:10
3 यूहन्ना 1:3 1:3-6 1:11
यहूदा 1:3 1:4 1:12 1:13 1:19
प्रकाशितवाक्य 1 1:17 2:7 2:10 2:10 2:13 2:17 2:17 2:17 2:17 2:23 2:23 2:26 3:1 3:7 3:10
3:12 3:15-16 3:17-18 3:19 4:8 7:3 14:4 14:10 20:12 21:6 21:6 21:6-7 21:27 22:1
