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पाठक के नाम
इस विवाद को फिर से पढ़ने पर मैं देखता हूँ कि तर्क की गर्मी में मुझसे कुछ कठोर और तीखे शब्द निकल गए हैं, जो सम्भव है नाज़ुक कानों को अप्रिय लगें; और चूँकि मैं जानता हूँ कि कुछ भले मनुष्य हैं जिनके मन में इस सिद्धान्त का कोई अंश या तो अत्यधिक भोलेपन या पवित्रशास्त्र की अनभिज्ञता के कारण बैठा दिया गया है, जिससे वे उस समय ऐसे सशस्त्र न थे कि सामना कर सकें, इसलिए जहाँ तक वे मुझे करने देंगे, मैं उन्हें ठेस पहुँचाना नहीं चाहता, क्योंकि अपनी भूल में वे न हठी हैं न द्वेषी। अतः मैं ऐसों को पहले से चिताना चाहता हूँ कि जो कुछ कहा गया है उसे अपना अपमान न समझें, वरन् यह जान लें कि जब कभी मैं कुछ खुली बात कहता हूँ, तब मेरा संकेत एनाबैप्टिस्टों के उस दुष्ट झुण्ड की ओर है, जिनके सोते से, जैसा मैंने देखा, यह विषैली धारा पहले-पहल बही, और जिनके विरुद्ध मैंने जो कुछ कहा है वह उनके योग्य दण्ड के बराबर कहीं नहीं पहुँचता। यदि भविष्य में मुझे उनसे लड़ना पड़े, तो मैं निश्चय कर चुका हूँ कि वे मुझे, यदि अति कुशल नहीं, तो सत्य का एक निश्चय ही दृढ़, और परमेश्वर के अनुग्रह से, जैसा कहने का मैं साहस करता हूँ, अजेय रक्षक पाएँगे। फिर भी उनके विरुद्ध भी मैंने अपना क्रोध मर्यादा से बाहर नहीं उँडेला, वाणी की सारी धृष्टता और चपलता से सदा दूर रहा; अपनी लेखनी को ऐसा सधाया कि वह बलात् खींचने की अपेक्षा सिखाने के अधिक योग्य हो, और फिर भी उन्हें खींच ले जाने में समर्थ हो जो अनिच्छुक हैं। मेरा आशय निश्चय ही उन्हें क्रोध दिलाने से कहीं अधिक सबको सही मार्ग पर लौटा लाने का था।
जो भी पढ़ेंगे, उन सब से मैं परमेश्वर के और हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से विनती और आग्रह करता हूँ कि वे निष्पक्ष निर्णय और ऐसा मन लेकर आएँ जो मानो सत्य का आसन बनने के लिए तैयार हो। मैं जानता हूँ कि नयापन कुछ लोगों के कानों को गुदगुदाने की कैसी शक्ति रखता है; परन्तु हमें विचार करना चाहिए कि "सत्य की केवल एक ही वाणी है", वही जो हमारे प्रभु के होठों से निकलती है। जब उद्धार के सिद्धान्त का प्रश्न हो, तब केवल उसी के लिए हमें अपने कान खोलने चाहिए, और अन्य सब के लिए उन्हें बन्द रखना चाहिए। उसका वचन, मैं कहता हूँ, नया नहीं, वरन् वही है जो आदि से था, है, और सदा रहेगा। और जैसे वे भूल करते हैं जो परमेश्वर के वचन को, जो बिगड़ी हुई रीति या आलस्य के कारण एक ओर रख दिया गया था, जब वह प्रकाश में लाया जाता है तो उस पर नयेपन का दोष लगाते हैं; वैसे ही वे दूसरी ओर भूल करते हैं जो पवन से हिलाए गए नरकटों के समान हैं, वरन् हलकी से हलकी बयार में सिर हिलाने और झुकने लगते हैं! जब हम मसीह को सीखने की बात करते हैं, तो क्या हमारा तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के वचन का ध्यान किए बिना किसी भी सिद्धान्त को, चाहे वह सच्चा ही क्यों न हो, कान दें? यदि तुम उसे मनुष्य की ओर से मानकर ग्रहण करते हो, तो क्या उतनी ही सरलता से झूठ को भी न अपना लोगे? क्योंकि मनुष्य के पास अपना क्या है सिवा व्यर्थता के?
उनका आचरण ऐसा न था जिन्होंने वचन ग्रहण करके पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ा कि ये बातें ऐसी ही हैं या नहीं (प्रेरितों के काम 17:11) यह एक उत्तम उदाहरण है, यदि हम उसका अनुकरण करें; परन्तु हम, न जाने किस आलस्य से, या कहूँ अवहेलना से, परमेश्वर का वचन इस रीति से ग्रहण करते हैं कि जब हम तीन अक्षर सीख लेते हैं, तो तुरन्त बुद्धि के अभिमान से फूल उठते हैं, और अपने आप को धनवान और राजा समझने लगते हैं! इसी से तुम देखते हो कि इतने लोग, जो आप अनपढ़ हैं, युग की अज्ञानता पर नाटकीय ढंग से चिल्लाते रहते हैं! पर क्या किया जाए? वे मसीही कहलाते हैं, और मसीही समझे जाना चाहते हैं, क्योंकि उन्होंने कुछ साधारण बातों का थोड़ा-सा ज्ञान पा लिया है; और जैसे उन्हें किसी बात की अनभिज्ञता पर लज्जा आएगी, वैसे वे बड़े से बड़े भरोसे के साथ, मानो तिपाई पर बैठकर, सब बातों पर निर्णय सुनाते हैं। इसी से इतने फूट, इतनी भूलें, हमारे विश्वास के मार्ग में इतनी ठोकरें, जिनके कारण अभक्तों में परमेश्वर के नाम और वचन की निन्दा होती है। अन्त में, (यही बुराई की जड़ है!) जब वे हठपूर्वक उसकी रक्षा करते जाते हैं जो कुछ उन्होंने एक बार उतावली में बक दिया, तब वे परमेश्वर की वाणी से पूछने लगते हैं, ताकि वहाँ अपनी भूलों का सहारा पाएँ। तब, हे भले परमेश्वर! वे क्या नहीं बिगाड़ते, क्या नहीं मिलावट और भ्रष्टता करते, ताकि उसे, मैं मोड़ना नहीं कहता, वरन् मरोड़कर अपने मत के अनुकूल बना लें? जैसा कवि ने सच कहा है, "क्रोध शस्त्र जुटा देता है।"
क्या सीखने की यही रीति है, कि पवित्रशास्त्र को बार-बार उलटा-पलटा जाए, और अपनी अभिलाषा की सेवा करनेवाली किसी बात की खोज में उसे इधर-उधर मरोड़ा जाए, या उसे अपनी समझ के अधीन करने को विवश किया जाए? इससे अधिक बेतुका कुछ नहीं हो सकता, हे विनाशकारी महामारी! हे जंगली बीज, जो निश्चय ही शत्रु के हाथ से इसलिए बोए गए कि सच्चा बीज निकम्मा हो जाए! और क्या हम अब भी आश्चर्य करते हैं कि उन लोगों में इतने पंथ हैं जिन्होंने आरम्भ में सुसमाचार और पुनर्जीवित वचन के प्रति अपनी निष्ठा दी थी? मैं तो स्वयं इस भयानक चेतावनी से काँप उठता हूँ,
"परमेश्वर का राज्य तुम से ले लिया जाएगा, और ऐसी जाति को जो उसका फल लाए दिया जाएगा।"
(मत्ती 21:43।)
यहाँ, तथापि, मैं अपनी शिकायतें रोकता हूँ: क्योंकि यदि मैं इस युग की विकृति पर उचित शब्दों में भाषण देने लगूँ तो एक बड़ा ग्रन्थ लिखना पड़ेगा। हे भाइयो, आओ हम इतने उदाहरणों से चेताए जाकर अन्त में, चाहे देर से ही, बुद्धिमान बनें। आओ हम सदा अपने प्रभु के होठों पर कान लगाए रहें, और न उसकी बुद्धि में कुछ जोड़ें और न उसमें अपनी किसी बात की मिलावट करें, ऐसा न हो कि वह ख़मीर की नाईं सारे गूँधे हुए आटे को बिगाड़ दे, और उस नमक को भी जो हमारे भीतर है फीका कर दे। आओ हम ऐसे चेले बनकर दिखाएँ जैसे हमारा प्रभु चाहता है कि हों, कंगाल, रिक्त, और अपनी बुद्धि से शून्य: सीखने को उत्सुक पर कुछ न जानते हुए, और उसके सिखाए हुए के सिवा कुछ जानने की इच्छा भी न रखते हुए; और जो कुछ पराई उपज का हो उससे घोर विष की नाईं दूर रहते हुए।
मैं यहाँ उन लोगों की आपत्तियों को पहले ही दूर कर देना चाहता हूँ जो मेरे इस वर्तमान प्रयास पर दोष लगाएँगे, यह आरोप लगाकर कि मैं व्यर्थ बातों पर उग्र झगड़े उठा रहा हूँ, और तुच्छ मतभेदों को प्रचण्ड फूट का कारण बना रहा हूँ: क्योंकि ऐसे लोगों की कमी नहीं जो मुझे इस प्रकार निन्दित करते हैं। मेरा उत्तर यह है कि जब ईश्वरीय सत्य पर खुला आक्रमण हो, तब हमें उसके एक भी बिन्दु की मिलावट को सहना नहीं चाहिए। परमेश्वर की ज्योति को शैतान के अन्धकार से बुझते देखना निश्चय ही कोई तुच्छ बात नहीं; और इसके अतिरिक्त यह विषय बहुतों के समझने से कहीं अधिक महत्त्व का है। और यह भी सच नहीं, जैसा वे कहते हैं, कि जो दूसरों की भूलों में सहमत नहीं होता वह उनसे असहमत होकर घातक बैर दिखाता है। मैंने उन लोगों की जिज्ञासा की निन्दा की है जो ऐसे प्रश्न उठाते हैं जो सचमुच बुद्धि की यातना मात्र हैं, और कुछ नहीं। परन्तु जब वे इस कमारीना को हिला चुके, तब उनकी धृष्टता को दबाना ही चाहिए, ऐसा न हो कि वह सत्य पर प्रबल हो जाए। मैं इसमें सफल हुआ या नहीं, यह मैं नहीं जानता: मेरी इच्छा तो निश्चय यही थी, और मैंने जितना मुझसे हो सका किया। यदि दूसरे इससे उत्तम कर सकें, तो वे सर्वजनहित के लिए आगे आएँ!
बासेल, 1536।
