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एक मित्र के नाम जॉन कैल्विन की भूमिका।
एक मित्र के नाम जॉन कैल्विन की भूमिका।
बहुत समय हुआ, जब कुछ भक्त जनों ने मुझे आमन्त्रित किया, वरन् मुझसे आग्रह भी किया, कि मैं उन लोगों की उच्छृंखलता को रोकने के लिए कुछ प्रकाशित करूँ जो अज्ञानता और कोलाहल के साथ यह दावा करते हैं कि आत्मा मरती या सोती है; पर उनके सारे आग्रह से भी मैं राज़ी न हो सका, क्योंकि इस प्रकार के वाद-विवाद में पड़ने से मुझे इतनी अरुचि थी। उस समय निश्चय ही मैं निरुत्तर न था: कुछ तो इसलिए कि मुझे आशा थी कि वह बेतुका सिद्धान्त शीघ्र ही अपने आप मिट जाएगा, या कम से कम कुछ बकवादियों तक ही सीमित रहेगा; और कुछ इसलिए कि मैं ऐसे दल से भिड़ना उचित नहीं समझता था जिसके शिविर, शस्त्रों और चालों से मैं भली-भाँति परिचित भी न था। क्योंकि तब तक मेरे पास बड़बड़ाहट और भर्राई हुई आवाज़ों के सिवा कुछ नहीं पहुँचा था, इसलिए उनसे भिड़ना जो अभी अखाड़े में उतरे ही न थे, अन्धाधुन्ध हवा में प्रहार करने से अच्छा कुछ न जान पड़ता था। परन्तु परिणाम मेरी आशा से भिन्न निकला। इन बकवादियों ने इतनी सक्रियता से परिश्रम किया है कि वे हज़ारों को अपने उन्माद में खींच चुके हैं। और मुझे दिखाई देता है कि स्वयं वह भूल भी और बढ़ गई है। आरम्भ में कुछ लोग बिना यह बताए कि "निद्रा" से उनका क्या तात्पर्य है, केवल अस्पष्ट रूप से कहते थे कि आत्मा सोती है। बाद में वे yucokonoi उठ खड़े हुए, जो बिना घाव किए ही आत्माओं की हत्या करते हैं। पहलों की भूल तो निश्चय ही सही न जाने योग्य थी; पर मैं समझता हूँ कि पिछलों के पागलपन को कठोरता से दबाया जाना चाहिए। दोनों के पास न तर्क का आधार है न विवेक का; परन्तु उनकी मिथ्या बड़ाई का खुलकर खण्डन किए बिना और उसे, यों कहें, उन्हीं के सामने उघाड़े बिना दूसरों को यह समझाना इतना सरल नहीं। यह तभी हो सकता है जब उसे वैसा ही दिखाया जाए जैसा वह उनके लेखों में दिखाई देता है। कहा जाता है कि वे अपनी मूर्खताएँ एक प्रकार की छोटी पुस्तिकाओं में फैलाते हैं, जो मुझे कभी देखने को नहीं मिलीं। मुझे तो केवल एक मित्र से कुछ टिप्पणियाँ मिली हैं, जिसने उनके मुँह से जो कुछ सरसरी तौर पर सुना था उसे लिख लिया था, या किसी अन्य उपाय से एकत्र कर लिया था।
यद्यपि मेरे न लिखने का एक कारण इन टिप्पणियों से कुछ दूर हो गया है, तो भी दूसरा अब तक बना है। तथापि, जब वे लोग फुसफुसाहटों से और उस बकवाद से जिसके लिए वे प्रसिद्ध हैं, चुपके-चुपके घुसपैठ करते हैं, और अपनी भूल में उतने ही लोगों को फँसा लेते हैं जितनों को छपी हुई पुस्तकों का प्रसार फँसा सकता, तब मुझे लगता है कि यदि मैं ऐसी आवश्यकता की घड़ी में पीछे हटकर चुप रहूँ, तो सत्य के साथ विश्वासघात करनेवाला होने के दोष से अपना बचाव भली-भाँति न कर सकूँगा! और जबकि मुझे भरोसा है कि मेरा परिश्रम अधिक अनाड़ी और कम अनुभवी जनों के बहुत काम आएगा, और उन मध्यम रूप से शिक्षित जनों के लिए भी निरर्थक न होगा जिन्होंने इस विषय पर थोड़ा-बहुत ध्यान दिया है, तो मैं सब भले लोगों को अपने विश्वास का कारण बताने में नहीं झिझकूँगा, ऐसा कारण नहीं, सम्भव है, जो उन्हें रक्षा और शत्रुओं के शिविर में युद्ध ले जाने, दोनों के लिए पूरी तरह सज्जित कर दे, पर ऐसा जो उन्हें सर्वथा निहत्था न छोड़े। यदि इन लोगों का अपने स्वप्नों को जनसाधारण में फैलाने का आग्रह मुझे अनुमति देता, तो मैं इस प्रकार के संघर्ष से, जिसमें मिलनेवाला फल लगाए गए परिश्रम के बराबर नहीं, सहर्ष अलग रहता; क्योंकि यह उन्हीं मामलों में से एक है जिन पर प्रेरित की सचेत बुद्धि रखने की शिक्षा विशेष रूप से लागू होती है। पर जबकि हम इस संयम की अभिलाषा करते हैं, वे हमें उसका उपयोग करने नहीं देते। तथापि मेरा यत्न रहेगा कि विषय को संयम के साथ निपटाऊँ और उसे उचित सीमाओं में रखूँ।
मेरी इच्छा थी कि इस बुराई को, जो बहुत ही अधिक बढ़ती जाती है, काट डालने का कोई और उपाय निकाला गया होता, ताकि यह प्रतिदिन पाँव न जमाती और कैंसर की नाईं भीतर न खाती जाती। यह अब पहली बार प्रकट भी नहीं हुई है; क्योंकि हम पढ़ते हैं कि इसकी उत्पत्ति कुछ अरबी लोगों से हुई, जो कहते थे कि "आत्मा देह के साथ मरती है, और दोनों न्याय के दिन फिर जी उठेंगे।" (यूसेबियस, कलीसिया का इतिहास, पुस्तक 6 अध्याय 36; अगस्तीन, पाखण्डों पर, अध्याय 83, भेद 16; यूहन्ना 2:) कुछ समय पश्चात् रोम के धर्माध्यक्ष यूहन्ना ने इसे चलाया, और पेरिस की धर्मशास्त्र-संकाय ने उसे इसे वापस लेने पर विवश किया। (गेर्सोन, पहले पास्का-उपदेश में।) यह कई युगों तक सुलगती रही, पर हाल ही में एनाबैप्टिस्टों की कुछ तलछट के उभारने से चिंगारियाँ छोड़ने लगी है। इन्होंने दूर-दूर तक फैलकर मशालें जला दी हैं, और कितना अच्छा हो कि वे शीघ्र उस स्वेच्छा की वर्षा से बुझ जाएँ जिसे प्रभु ने अपने निज भाग के लिए अलग रखा है!
मैं इस मुकद्दमे की पैरवी किसी के प्रति घृणा के बिना, किसी का व्यक्तिगत अपमान किए बिना, संक्षेप में कहूँ तो गाली-गलौज की किसी कड़वाहट के बिना करूँगा, ताकि कोई यह शिकायत न कर सके कि उसे चोट पहुँची, या थोड़ी भी ठेस लगी। और तो भी आज ऐसे लोग दिखाई देते हैं जो छिद्रान्वेषी, काटनेवाले और उपहास करनेवाले स्वभाव को पूरी छूट देते हैं, और यदि तुम उन पर केवल अँगुली भी रख दो, तो शोक भरी दुहाई देने लगते हैं कि "कलीसिया की एकता टुकड़े-टुकड़े की जा रही है, और प्रेम का उल्लंघन हो रहा है!" ऐसे लोगों को हमारा उत्तर यह हो: पहला, कि हम मसीह के सिवा किसी एकता को नहीं मानते, और ऐसे किसी प्रेम को नहीं जिसका बन्धन वह न हो; और इसलिए प्रेम को बनाए रखने की मुख्य बात यह है कि विश्वास को पवित्र और सम्पूर्ण बनाए रखा जाए। दूसरा, कि यह विवाद प्रेम के किसी उल्लंघन के बिना चल सकता है, यदि वे जिन कानों से सुनते हैं वे उस जीभ के अनुरूप हों जिसका मैं उपयोग करता हूँ।
हे माननीय महाशय, मैंने उचित समझा कि इस छोटे से लघु-ग्रन्थ को आपके नाम समर्पित करूँ, अनेक कारणों से, पर विशेषकर एक कारण से, क्योंकि मैं देखता हूँ कि व्यर्थ मतों के उन कोलाहलों के बीच, जिनसे चंचल मन कलीसिया की शान्ति भंग करते हैं, आप बुद्धिमानी और संयम में दृढ़ और सम्पूर्ण खड़े हैं।
ओरलियन्स, 1534।
