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धोखा न खाओ: परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता। हम सब इतने समय तक जी चुके हैं कि जानते हैं कि धोखा खाना क्या होता है। हमें अपने मित्रों ने, अपने शत्रुओं ने, अपने पड़ोसियों ने, अपने सम्बन्धियों ने धोखा दिया है। भक्तिहीन साथियों ने हमें धोखा दिया है। जीवन के हर मोड़ पर किसी न किसी रीति से हमें छला गया है। झूठे शिक्षक हमारे मार्ग में आए हैं, और हमारी भलाई करने के बहाने उन्होंने हमारे मन को भ्रम से विषैला कर दिया है। उन्होंने हमें ऐसी आशाएँ दिलाई हैं जो झूठी सिद्ध हुई हैं; सदोम के सेब, जो बाहर से सुन्दर परन्तु भीतर राख से भरे होते हैं। उन्होंने हमसे कहा है कि न कोई परमेश्वर है, न कोई भावी जीवन, न कोई आनेवाला न्याय; या उन्होंने कहा है कि सब मनुष्य उद्धार पाएँगे, कि पश्चाताप करने के लिये बहुत समय पड़ा है, कि हम अपनी ओर से भरसक अच्छा करके उद्धार पा सकते हैं। पाप ने हमें धोखा दिया है। हर पापी एक भ्रम में पड़ा है। पाप मुस्कराता हुआ उससे मिलता है, और उसके सामने ऐसे सुख और आनन्द रखता है जो न शुद्ध हैं और न टिकाऊ। बॉस्टन में हमारी सभाओं के दौरान एक युवक टैबरनेकल में आया। उसने चारों ओर देखा, और मन में सोचा कि जो लोग वहाँ आते हैं वे बड़े मूर्ख हैं—वे लोग जिनके पास काम-धन्धा था, आरामदेह घर थे, और अच्छे कपड़े थे। उसके पास तो
संसार में कुछ भी नहीं था—वह एक आवारा था, और अपने आप को गरम रखने के लिये वहाँ चला आया था। परन्तु यह सोचना कि जिन लोगों के पास घर हैं वे आकर मेरे प्रचार की ऐसी बातें सुनने में अपना समय बिताएँगे, उसकी समझ से बाहर था। एक रात, जब उसे वहाँ आते हुए दो सप्ताह हो चुके थे, संयोग से मैंने ठीक उसी ओर उँगली उठाई जहाँ वह बैठा था, और कहा, “हे युवक, धोखा न खा!” परमेश्वर ने उस वचन को एक तीर के समान प्रयोग किया। वह अपने विषय में सोचने लगा। उसका मन उस समय की ओर लौट गया जब बॉस्टन में उसकी अच्छी नौकरी थी; जब वह एक युवक के रूप में अच्छा वेतन पाता था; जब वह अच्छे समाज में उठता-बैठता था, और उसके बहुत-से मित्र थे। फिर उसने अपनी वर्तमान दशा को देखा। उसके मित्र सब चले गए थे, उसके कपड़े चले गए थे, उसका धन चला गया था; और वहाँ वह उस नगर में एक ठुकराया हुआ व्यक्ति बनकर पड़ा था। उसने अपने आप से कहा, “मैंने धोखा खाया है,” और उसी घड़ी परमेश्वर ने उसे जगा दिया। वह चाहता था कि मित्र उसके लिये प्रार्थना करें; परन्तु वह न तो कागज़ का एक टुकड़ा खरीद सकता था और न डाक-टिकट के पैसे दे सकता था, इसलिये उसने कागज़ का एक पुराना मैला टुकड़ा लिया, सड़क पर खड़े-खड़े टैबरनेकल में पढ़े जाने के लिये एक निवेदन लिखा कि यदि परमेश्वर उसके जैसे एक दीन, खोए हुए मनुष्य का उद्धार करे, तो वह उद्धार पाना चाहता है। वह प्रार्थना सुनी गई। नबूकदनेस्सर के समान, उसके मित्र फिर से उसके चारों ओर इकट्ठे हो गए, और प्रभु ने उसे फिर से पद और समाज में स्थापित कर दिया। उसकी आँखें खुल गईं, और उसने देखा कि उसने कैसा धोखा खाया था।
शैतान। संसार भर में कितने ही मनुष्य इस संसार के ईश्वर के द्वारा धोखा खा रहे हैं! कहा गया है कि हाल ही के फ्रांस-जर्मनी युद्ध के दौरान जर्मन ढोल बजानेवाले और बिगुल बजानेवाले अपने शत्रुओं को धोखा देने के लिये फ्रांसीसी ढोल-ताल और बिगुल-संकेत बजाया करते थे। “रुको” या “गोलीबारी बन्द करो” का आदेश बहुधा
जर्मनों द्वारा दिया जाता था, ऐसा कहा गया है, और इस प्रकार फ्रांसीसी सैनिक ऐसे स्थानों में पहुँचा दिए जाते थे जहाँ उन्हें पशुओं के समान गोलियों से भूना जा सकता था। शैतान हमारे प्राणों का प्रधान शत्रु है, और उसने अपने झूठ के द्वारा बहुधा हमारी बुद्धि को अन्धा और हमारे विवेक को धोखा दिया है। वह बहुधा ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धरकर आया है, और उधार लिए हुए लबादे के नीचे अपनी घिनौनी कुरूपता को छिपाए रहा है। वह एक युवक से कहता है: “जवानी में मनमानी कर ले। बूढ़े होने पर धार्मिक बनने के लिये बहुत समय है।” वह युवक इस झूठी आशा में कि उसे सच्ची सन्तुष्टि मिलेगी, अपने आप को फ़िज़ूलख़र्ची और असंयम के जीवन में सौंप देता है; और भला है यदि वह इस धोखे के प्रति तब जाग जाए, इससे पहले कि उसकी लालसाएँ अत्याचारी स्वामी बनकर उसे अभाव और दुःख की गहराइयों में घसीट ले जाएँ। शैतान अपने शिकारों से उनकी अभिलाषाओं की पूर्ति में बड़ी-बड़ी बातों की प्रतिज्ञा करता है, परन्तु वे प्रतिज्ञाएँ कभी पूरी होती नहीं देखते। प्रतिज्ञा किया हुआ सुख पीड़ा निकलता है, प्रतिज्ञा किया हुआ स्वर्ग नरक। सावधान रहिए कि कहीं शैतान आपको वैसे ही धोखा न दे जैसे उसने आरम्भ में हव्वा को धोखा दिया था। “उसमें सत्य है ही नहीं। जब
वह झूठ बोलता, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है; क्योंकि वह झूठा है, वरन् झूठ का पिता है।” हमारा हृदय। परन्तु सबसे अधिक तो हमें अपने ही हृदय ने धोखा दिया है। किसने पवित्रशास्त्र के इस वचन की सच्चाई को परखकर नहीं देखा: “मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?” कितनी बार हमने कहा है कि हम अमुक काम फिर कभी नहीं करेंगे, और फिर चौबीस घण्टों के भीतर ही उसे कर बैठे हैं! मनुष्य सोच सकता है कि उसने उसकी गहराइयों की थाह ले ली है, परन्तु वह पाता है कि और भी गहराइयाँ हैं जहाँ तक वह पहुँचा ही नहीं। इसके कारण कैसा घोर आत्म-छल होता है! सुलैमान ने कहा, “जो अपने मन पर भरोसा रखता है, वह मूर्ख है।” लूथर ने एक बार कहा था कि वह पोप और सब कार्डिनलों से अधिक अपने ही हृदय से डरता है। कितनी ही रोती हुई पत्नियाँ अपने पति के विषय में मेरे पास आकर कहती हैं: “वह हृदय से तो अच्छा है।” सच तो यह है कि—वही उसमें सबसे बुरी जगह है। यदि हृदय अच्छा होता, तो बाकी सब कुछ ठीक होता। जीवन के स्रोत हृदय ही से निकलते हैं। मसीह ने कहा: “भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से, बुरे बुरे विचार, परस्त्रीगमन, व्यभिचार, हत्या, चोरी, लोभ, दुष्टता, छल, लुचपन, कुदृष्टि, निन्दा, अभिमान, और मूर्खता निकलती हैं।” यह नया जन्म न पाए हुए हृदय के विषय में स्वयं मसीह का कथन है। कुछ वर्ष पहले लंदन में एक विलक्षण चित्र प्रदर्शित किया गया था। जब आप उसे दूर से देखते, तो आपको
ऐसा प्रतीत होता कि एक मठवासी प्रार्थना में लीन है, उसके हाथ जुड़े हैं, उसका सिर झुका है। परन्तु जब आप और निकट आकर चित्र को और ध्यान से देखते, तो पाते कि वास्तव में वह एक पंच के कटोरे में नींबू निचोड़ रहा है! मनुष्य के हृदय का यह कैसा चित्र है! ऊपर-ऊपर से देखने पर उसे मनुष्य में जो कुछ अच्छा, श्रेष्ठ और मनभावना है, उस सब का आसन समझा जाता है; जबकि वास्तव में, जब तक पवित्र आत्मा के द्वारा उसका नया जन्म न हो, वह सारी भ्रष्टता का आसन है। “और दण्ड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना।” एक यहूदी रब्बी ने एक बार अपने शिष्यों से पूछा कि मनुष्य को सीधे मार्ग पर बनाए रखने के लिये उसके पास सबसे अच्छी वस्तु क्या हो सकती है। एक ने कहा, अच्छा स्वभाव; दूसरे ने, अच्छा साथी; एक और ने कहा कि बुद्धि ही वह सबसे अच्छी वस्तु है जिसकी वह कामना कर सकता है। अन्त में एक शिष्य ने उत्तर दिया कि उसके विचार में अच्छा हृदय सबसे उत्तम है। रब्बी ने कहा, “ठीक है, जो कुछ दूसरों ने कहा है वह सब तुमने इसमें समेट लिया है। क्योंकि जिसका हृदय अच्छा है, उसका स्वभाव भी अच्छा होगा, वह अच्छा साथी भी होगा, और बुद्धिमान भी। इसलिये हर एक मनुष्य हर समय हृदय की सच्चाई और खराई को बढ़ाता रहे, और यह उसे बहुत-से दुःखों से बचा लेगी।” हमें दाऊद की यह प्रार्थना करने की आवश्यकता है: “हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर!”
परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता। स्मरण रखिए, बाइबल के परमेश्वर ने कभी किसी को धोखा नहीं दिया, और न कभी दे सकता है, और न कभी देगा; बाइबल के परमेश्वर और इस संसार के ईश्वर में यही अन्तर है। वह मनुष्यों की चाल-चलन देखता है; वह उनके हृदयों में झाँकता है; वह उनके गुप्त मार्गों को जानता है; उन्हें उसे बताने या उससे कुछ छिपाने का प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं। हम अपने आप को या दूसरों को चाहे कितनी ही सफलता से धोखा दें, या अपने आप से या दूसरों से धोखा खाएँ, हम उसे धोखा नहीं दे सकते। आदम और हव्वा ने अदन में यही प्रयत्न किया जब वे बारी के वृक्षों के बीच यहोवा की उपस्थिति से छिप गए। शाऊल ने यही प्रयत्न किया जब उसने अमालेकियों की सबसे अच्छी भेड़-बकरियों और गाय-बैलों को परमेश्वर के लिये बलि चढ़ाने के बहाने बचा रखा। हनन्याह और सफ़ीरा ने यही प्रयत्न किया जब उन्होंने बेची हुई भूमि के दाम में से कुछ रख छोड़ा। “शैतान ने तेरे मन में यह बात क्यों डाली है कि तू पवित्र आत्मा से झूठ बोले (उसे धोखा दे)? * * * तू मनुष्यों से नहीं, परन्तु परमेश्वर से झूठ बोला है।” मनुष्य हर दिन यही प्रयत्न करते हैं। उन्होंने अपने मन में यह बात बैठा ली है कि परमेश्वर को ठट्ठों में उड़ाया जा सकता है। क्योंकि वे अपने पास्टर को, अपने मालिक को और अपने मित्रों को धोखा दे सकते हैं, इसलिये वे सोचते हैं कि वे परमेश्वर को भी धोखा दे सकते हैं। वे झूठा दिखावा करते हैं, वे खोखले शब्द बोलते हैं, वे अवास्तविक सेवा करते हैं, वे व्यर्थ बहाने बनाते हैं, वे हर प्रकार के कपट में लिप्त रहते हैं। परन्तु इससे कुछ लाभ नहीं। परमेश्वर को छला नहीं जा सकता। वह चूना फिरी हुई कब्र के भीतर की सड़ाहट को देखता है।
मसीहियों को चेतावनी। यह ध्यान देने योग्य है कि यह चेतावनी पौलुस ने मसीही लोगों को दी थी—गलातिया की कलीसिया के विश्वासियों को। आख़िरकार, मनुष्य घोर पापों के विषय में तो हर समय धोखे में नहीं रहता। पियक्कड़ अपने होश के क्षणों में समझ लेता है कि मद्यपान के मार्ग का अन्त क्या होगा। आत्म-सम्मान और मित्रों के आदर का खो जाना, वे चिह्न जो शीघ्र ही उसकी देह पर दिखने लगते हैं—काँपते हाथ और बिगड़ा हुआ रंग-रूप—ये बातें मतवालेपन की तुरन्त आनेवाली फ़सल हैं, और पकते समय इन्हें सहज ही पहचाना जा सकता है। लम्पट मनुष्य भी देह के रोगों के रूप में अपने पाप का पहला फल काटता है, जो बहुधा ऐसे ख़तरनाक मार्ग पर चलते रहने के विरुद्ध प्रभावशाली चेतावनियाँ होते हैं। परन्तु “प्रतिष्ठित” पापों के साथ बात दूसरी है। एक मनुष्य वर्षों तक बोता रह सकता है, और स्वयं उसे इसका पता भी न चले। आपको स्मरण होगा कि बोनेवाले के दृष्टान्त में कुछ बीज झाड़ियों में गिरे, और झाड़ियों ने बढ़कर उन्हें दबा डाला। हमारे स्वामी ने इस दृष्टान्त की व्याख्या करते हुए कहा: “जो झाड़ियों में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनता है, पर इस संसार की चिन्ता और धन का धोखा वचन को दबाता है, और वह फल नहीं लाता।” संसार से या धन से ऐसे परिणाम की अपेक्षा कौन करता? परन्तु यह कहा गया है कि मसीह ने धन के विषय में चेतावनी के शब्दों के सिवा और कभी कुछ नहीं कहा। आज हम उसे उस दृष्टि से देखने के अभ्यस्त नहीं हैं। मनुष्य धन की खोज में
एक-दूसरे को रौंदते जा रहे हैं। “धोखा न खाओ।” जो अपना मन धन पर लगाता है वह शरीर के लिये बो रहा है, और शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा। “विपत्ति ने अपने हज़ारों को मारा है, परन्तु समृद्धि ने अपने दसियों हज़ारों को।” “इस जायदाद का मूल्य क्या है?” एक सज्जन ने दूसरे से पूछा, जब वे उपजाऊ और सुन्दर खेतों से घिरे एक शानदार भवन के पास से गुज़र रहे थे। “मैं नहीं जानता कि इसका मूल्य कितना आँका गया है; मैं यह जानता हूँ कि इसके पिछले स्वामी को इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ी।” “कितनी?” “उसका प्राण।” एक अंग्रेज़ पादरी को अपनी पल्ली के एक धनी सदस्य की मृत्यु-शय्या पर बुलाया गया। मरते हुए मनुष्य के पास घुटने टेककर पास्टर ने उससे कहा कि जब वह उस गम्भीर घड़ी में उसे सँभाले रखने के लिये प्रार्थना करे, तब वह उसका हाथ थाम ले, परन्तु उसने हाथ देने से इन्कार कर दिया। अन्त हो जाने के बाद जब उन्होंने ओढ़ना हटाया, तो पाया कि उसके अकड़े हुए हाथ मृत्यु की पकड़ में तिजोरी की चाबी को जकड़े हुए थे। हृदय और हाथ अन्त तक अपनी सम्पत्ति से चिपके रहे, परन्तु वह उसे अपने साथ नहीं ले जा सका। मनुष्य घमण्डी हो सकता है, और उसका यही पाप एक सद्गुण गिना जा सकता है। सुनिए, परमेश्वर का वचन क्या कहता है: “चढ़ी आँखें और घमण्डी मन पाप है”; “सब मन के घमण्डियों से यहोवा घृणा करता है।” यही वे भूलें हैं जो मनुष्य करते हैं। वे प्रतिष्ठित जीवन बिता रहे हैं, और सोचते हैं कि सब कुछ ठीक है। वे अपने हृदय की बहुत-सी सबसे प्रिय वस्तुओं पर लगे भ्रष्टता के दाग़ को नहीं पहचानते।
मसीही होने का दावा करनेवालों को सबसे अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है कि कहीं वे धोखा तो नहीं खा रहे। उपेक्षा। मनुष्यों को अपने विचारों, अपने आचरण, अपनी भावनाओं के प्रति कितना चौकस रहना चाहिए! धोखे का कारण अधिकतर उपेक्षा ही है। मनुष्य रुककर अपने आप को नहीं जाँचते, अपने हृदय और मन को मानो परमेश्वर की दृष्टि में खोलकर नहीं रखते, और उसकी परम पवित्र इच्छा के अनुसार अपने आप को नहीं परखते। आत्महत्या करने के लिये मनुष्य को अपने आप को गोली मारने की आवश्यकता नहीं: उसे केवल पोषण के उचित साधनों की उपेक्षा करनी है, और वह शीघ्र ही मर जाएगा। जहाँ शत्रु बलवान और आक्रामक हो, वहाँ किसी सेना की निश्चित पराजय और बन्दी बनाया जाना तय है, जब तक कि कड़ी चौकसी न रखी जाए और हर सैनिक अपने कर्तव्य के स्थान पर पूरी तरह जागता न रहे। यह देखा गया है कि स्विट्ज़रलैंड में तूफ़ानी मौसमों की अपेक्षा सुहावने मौसमों में अधिक दुर्घटनाएँ होती हैं। लोग ऐसी यात्राओं पर निकल पड़ते हैं जो वे कम अनुकूल परिस्थितियों में न करते, और वे अपने आचरण में कम सावधान रहते हैं। इसी प्रकार नैतिक और आत्मिक विपत्ति साधारणतः मनुष्यों पर तब आ पड़ती है जब वे असावधान होते हैं, परीक्षा के प्रति लापरवाह होते हैं। समृद्धि के दिनों में वे घमण्डी और आत्म-निर्भर हो जाते हैं, जबकि विपत्ति उन्हें मार्गदर्शन और शान्ति के लिये जीवते परमेश्वर की ओर ले जाती है। डॉ. जॉनसन ने एक बार कहा था कि संसार में जो इतना झूठ है वह जान-बूझकर झूठ बोलने से उतना नहीं, जितना सत्य के विषय में लापरवाही से है।
इसीलिये निरन्तर चौकसी आवश्यक है। फ़ारसियों का एक वार्षिक पर्व होता था जिसमें वे जितने साँप और विषैले जीव पा सकते थे सब को मार डालते थे; परन्तु फिर जब तक वह पर्व दोबारा न आता, वे उन्हें पहले की तरह तेज़ी और स्वतन्त्रता से बढ़ने देते थे। यह बड़ी मूर्खतापूर्ण नीति थी। पाप भी साँपों के समान शीघ्रता से बढ़ते हैं, और उन पर निरन्तर दृष्टि रखने की आवश्यकता है। और हमें हर ओर से चौकसी करनी चाहिए। कितने ही मनुष्य ठीक उसी स्थान पर गिरे हैं जहाँ वे अपने आप को सबसे सुरक्षित समझते थे। मूसा की नम्रता एक कहावत बन गई है। फिर भी वह प्रतिज्ञा के देश से वंचित रह गया, क्योंकि उसने इस्राएलियों को अपने आप को भड़काने दिया, और “वह बिन सोचे बोल उठा।” पतरस चेलों में सबसे अधिक उत्साही और निडर था, साहसी और स्पष्टवादी; फिर भी थोड़े समय के लिये वह गिरकर एक झूठ बोलनेवाला, शपथ खानेवाला, दुबकनेवाला कायर बन गया, जो एक दासी से डर गया। एक पुरानी कहानी है कि एक हिरनी, जिसकी केवल एक ही आँख थी, समुद्र के निकट चरा करती थी; और सुरक्षित रहने के लिये वह अपनी अन्धी आँख पानी की ओर रखती थी, जिस ओर से उसे किसी संकट की आशंका न थी, जबकि अपनी अच्छी आँख से वह भूमि की ओर निगरानी करती थी। कुछ मनुष्यों ने यह देखकर एक नाव ली और समुद्र की ओर से उस पर आ पहुँचे और उसे मार गिराया। अपनी अन्तिम साँस में उसने कहा: “हाय! कैसा कठोर भाग्य! कि मुझे उस ओर से मृत्यु का घाव मिला जिस ओर से मुझे किसी हानि की आशंका न थी, और जिस ओर मैं सबसे अधिक संकट की आशंका करती थी उस ओर मैं सुरक्षित रही।” संकट और आवश्यकता आपको परमेश्वर के और निकट ले आएँ। वह न कभी ऊँघता है और न सोता है, और उसकी रक्षा में आप
सुरक्षित रहेंगे। प्रार्थना में उसे दृढ़ता से थामे रहिए। “जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो।” मसीही धर्म उत्तरदायी नहीं। मसीही धर्म उस धोखे के लिये उत्तरदायी नहीं है जो उसके अंगीकार करनेवाले शिष्यों में पाया जाता है। यह उदाहरण पहले भी दिया जा चुका है कि ऐसा करना उतना ही तर्कसंगत होगा जितना किसी यात्री की आत्महत्या के लिये, जो समुद्र में उनके किसी जहाज़ से कूद पड़ता है, क्यूनार्ड कम्पनी को उत्तरदायी ठहराना। यदि वह व्यक्ति जहाज़ पर ही बना रहता, तो सुरक्षित रहता; और यदि वह शिष्य अपने सिद्धान्तों के प्रति सच्चा बना रहता, तो वह कभी कपटी न निकलता। क्या कभी किसी ने कपट की निन्दा मसीह से अधिक कठोरता से की है? क्या आप जानना चाहते हैं कि क्यों रह-रहकर कलीसिया किसी प्रमुख कलीसिया-सदस्य या सब्त-स्कूल के अधीक्षक की पोल खुलने से कलंकित होती है? इसका कारण उसका मसीही होना नहीं, वरन् उसमें मसीहियत का अभाव है। कोई गुप्त पाप वृक्ष के हृदय को भीतर ही भीतर खाता रहा है, और किसी संकट की घड़ी में वह आँधी से गिर पड़ता है और उसकी सड़ाहट प्रकट हो जाती है। धोखा सदा नहीं टिक सकता। धोखे का सदा बना रहना असम्भव है। लिंकन की एक कहावत थी कि आप सब लोगों को कुछ समय तक धोखा दे सकते हैं, और कुछ लोगों को सब समय धोखा दे सकते हैं, परन्तु आप सब लोगों को सब समय धोखा नहीं दे सकेंगे। यदि
धोखा पहले ही न पकड़ा गया हो, तो मृत्यु उसे उघाड़ देगी; और वह अभागा शिकार, जिसका धोखा अब दूर हो चुका होगा, उस परमेश्वर की उपस्थिति में खड़ा होगा जो ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता।
जब मनुष्य बोता है, तो वह काटने की आशा रखता है।
“देखो, गृहस्थ पृथ्वी के बहुमूल्य फल की आशा रखता हुआ प्रथम और अन्तिम वर्षा होने तक धीरज धरता है।”—याकूब 5:7।
