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“धोखा न खाओ; परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा। क्योंकि जो अपने शरीर के लिये बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्त जीवन की कटनी काटेगा।” गलातियों 6:7, 8। मेरे विचार में इस वचन में ऐसे सत्य हैं जिनका इन्कार करने का साहस कोई भी अविश्वासी या संशयवादी नहीं करेगा। परमेश्वर के वचन में कुछ ऐसे अंश हैं जिन्हें उस प्रमाण के सिवा और किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं जो हम अपने प्रतिदिन के अनुभव में सहज ही पा सकते हैं। यह उन्हीं में से एक है। यदि बाइबल का अस्तित्व ही मिटा दिया जाए, तो भी जो शब्द मैंने उद्धृत किए हैं वे हमारे चारों ओर निरन्तर होनेवाली घटनाओं से भरपूर सिद्ध होते रहेंगे। उन्हें अपनी आँखों के सामने पूरा होते देखने के लिये हमें केवल दैनिक समाचार-पत्र उठाने की देर है। मुझे याद है कि एक बार मैंने यही पाठ पढ़कर सुनाया, तो श्रोताओं में से एक व्यक्ति सीधा उठ खड़ा हुआ और बोला: “मैं इसे नहीं मानता।” मैंने कहा, “मेरे मित्र, इससे सच्चाई नहीं बदल जाती। सत्य सत्य ही है चाहे आप उसे मानें या न मानें, और झूठ झूठ ही है चाहे आप उसे मानें या न मानें।” वह इसे मानना नहीं चाहता था। जब सभा समाप्त हुई, तो उसे गिरफ़्तार करने के लिये एक सिपाही द्वार पर खड़ा था।
उस पर मुक़दमा चला और चोरी के अपराध में उसे बारह महीने के लिये कारागार भेज दिया गया। मैं सचमुच विश्वास करता हूँ कि जब वह अपनी कोठरी में पहुँचा, तब उसने मान लिया कि जो उसने बोया था वही उसे काटना पड़ा। परमेश्वर के वचन में से इस सत्य को मिटाने का प्रयत्न करना वैसा ही है जैसे आकाश में से सूर्य को मिटाने का प्रयत्न करना। यह स्वर्ग का सनातन आदेश है। यह नियम छः हज़ार वर्ष से लागू होता आया है। क्या परमेश्वर ने आदम को अदन से निकलने से पहले ही काटने पर विवश नहीं किया? क्या कैन को अदन के बाहर काटना नहीं पड़ा? चाहे सिंहासन पर बैठा राजा हो, जैसे दाऊद, या वेदी के पीछे खड़ा याजक हो, जैसे एली; याजक और भविष्यद्वक्ता, प्रचारक और सुननेवाला, हर एक मनुष्य को वही काटना पड़ता है जो वह बोता है। दस वर्ष पहले भी मैं इस पर विश्वास करता था, परन्तु आज मैं इस पर सौ गुना अधिक विश्वास करता हूँ। मेरा यह पाठ व्यक्ति पर लागू होता है, चाहे वह संत हो या पापी, या ऐसा कपटी जो अपने को संत समझता है; यह परिवार पर लागू होता है; यह समाज पर लागू होता है; यह राष्ट्रों पर लागू होता है। मैं कहता हूँ कि कर्मों का परिणाम काटना ही पड़ता है, यह नियम जितना व्यक्तियों के लिये सत्य है उतना ही राष्ट्रों के लिये भी; वरन् किसी ने तो यह कहा है कि चूँकि राष्ट्रों का कोई भावी अस्तित्व नहीं होता, इसलिये राष्ट्रों के रूप में उन्हें दण्ड देने का एकमात्र स्थान यही वर्तमान संसार है। देखिए, परमेश्वर ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया है। देखिए, क्या उन्होंने वही नहीं काटा जो उन्होंने बोया था। अमालेक को लीजिए: “स्मरण रख कि जब तुम मिस्र से निकलकर आ रहे थे तब अमालेक ने तुझ से मार्ग में क्या किया; कि जब तू थका-मांदा था, तब उसने मार्ग में तुझ पर चढ़ाई करके तेरे सब से पीछे चलनेवालों को, अर्थात् जितने निर्बल होने के कारण पीछे रह गए थे उन सभों को मारा; और उसको परमेश्वर का भय न था।” इस आक्रमण का परिणाम क्या होना था?
क्या यह बिना दण्ड के रह जाता? परमेश्वर ने ठहराया कि अमालेकी जैसा बोएँ वैसा ही काटें, और राजा शाऊल के समय में वह जाति लगभग पूरी तरह मिटा दी गई। संसार के राजतन्त्रों और साम्राज्यों का क्या हुआ? बाबुल पर विनाश किस कारण आया? उसके राजा और प्रजा ने परमेश्वर की आज्ञा मानने से इन्कार किया, और उन पर विनाश आ पड़ा। यूनान और उसकी सारी शक्ति का क्या हुआ? कभी वह संसार पर राज्य करता था। रोम और उसकी सारी महानता का क्या हुआ? जब उनके अधर्म का कटोरा भर गया, तो वह भूमि पर पटककर चूर कर दिया गया। यहूदियों का क्या हुआ? उन्होंने उद्धार को ठुकराया, परमेश्वर के दूतों को सताया, और अपने छुड़ानेवाले को क्रूस पर चढ़ाया; और हम पाते हैं कि एक ही समय में उनमें से ग्यारह लाख लोग नाश हो गए। इस देश के इतिहास को देखिए। खुली बाइबल हाथ में होते हुए भी हमारे पुरखाओं ने दास-प्रथा का बीज बोया; परन्तु अन्त में न्याय आ ही पहुँचा। उत्तर या दक्षिण में ऐसा एक भी परिवार नहीं था जिसे अपने किसी प्रियजन के छिन जाने का शोक न मनाना पड़ा हो। फ्रांस का उदाहरण लीजिए। कहा जाता है कि एक शताब्दी पहले फ्रांस में लोग अविश्वास फैलानेवाले साहित्य के प्रकाशन और वितरण पर हर वर्ष लाखों खर्च कर रहे थे। उसकी फ़सल क्या निकली? क्या फ्रांस ने नहीं काटा? परिणाम पर ध्यान दीजिए: “बाइबल को दबा दिया गया। परमेश्वर का इन्कार किया गया। मानो नरक खुल पड़ा। पेरिस में जन्म लेनेवाले आधे बच्चे अवैध सन्तान थे। सितम्बर, 1792 और दिसम्बर, 1795 के बीच दस लाख से अधिक लोगों के सिर काटे गए, उन्हें गोली मारी गई, डुबोया गया, उन पर अत्याचार किए गए और उन्हें मार डाला गया। उस समय से फ्रांस में अस्सी वर्षों में तेरह क्रान्तियाँ हो चुकी हैं; और गणतन्त्र में औसतन हर नौ महीने में एक बार
तख़्ता पलटा है। पेरिस में होनेवाले जन्मों में से एक-तिहाई अवैध होते हैं; एक ही वर्ष में नगर के गन्दे नालों के मुहानों से दस हज़ार नवजात शिशु निकाले गए हैं; फ्रांस की मूल जनसंख्या घट रही है; मसीही जगत के किसी भी नगर की अपेक्षा पेरिस में आत्महत्याओं का अनुपात अधिक है; और फ्रांसीसी क्रान्ति के बाद से विभिन्न विद्रोहों में पेरिस की सड़कों पर इतने फ्रांसीसी स्त्री-पुरुष मारे जा चुके हैं कि उनका औसत हर वर्ष ढाई हज़ार से भी अधिक बैठता है!” जब पौलुस ने गलातियों को लिखी अपनी पत्री में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, तब यह न पवित्रशास्त्र में नया था और न इतिहास में। पौलुस इसे खेती-बाड़ी से ली गई भाषा का वस्त्र पहनाता है, परन्तु दूसरे वस्त्रों में बोने और काटने का यह नियम कारण और परिणाम के नियम में, प्रतिफल या प्रतिशोध के नियम में, और क्षतिपूर्ति के नियम में देखा जा सकता है। इस समय इन नामों में से किसी भी नाम के अन्तर्गत प्रकट होनेवाले इस नियम पर दार्शनिक विवेचन करना मेरा उद्देश्य नहीं है। हम देखते हैं कि यह नियम विद्यमान है। यह हर उचित विवाद से परे है। संशयवादी बाइबल की और चाहे जिस बात पर दोष निकालें और आलोचना करें, उन्हें इसकी सच्चाई तो माननी ही पड़ेगी। अपने समर्थन के लिये यह ईश्वरीय प्रकाशन पर निर्भर नहीं है; दार्शनिक इस पर उतने ही एकमत हैं जितने वे किसी भी और बात पर एकमत हैं।
नियम की सर्वोच्चता। तो भी यह आपत्ति उठाई जा सकती है कि भौतिक जगत में इसका लागू होना भले ही मान लिया जाए, पर आत्मिक क्षेत्र में यह इतना निश्चित नहीं है। ठीक यहीं आधुनिक अनुसन्धान आगे आता है। यह बहुत हद तक पहचान लिया गया है कि आत्मिक जगत के नियम वही हैं जो प्राकृतिक जगत में विद्यमान हैं। वरन् यह दावा भी किया जाता है कि आत्मिक पहले अस्तित्व में आया, प्राकृतिक उसके बाद आया, और जब परमेश्वर ने विश्व की रचना आरम्भ की, तब उसने पहले से खींची हुई रेखाओं पर ही काम किया। संक्षेप में, परमेश्वर ने उच्चतर नियमों को नीचे की ओर प्रक्षिप्त किया, जिससे प्राकृतिक जगत “अलौकिक का एक देहधारी रूप, एक दृश्य प्रतिरूप, एक चलता-फिरता नमूना” बन गया। “आत्मिक जगत में वही पहिये चलते हैं—केवल लोहे के बिना।” इस प्रकार हमारा सारा जीवन परमेश्वर के ठहराए और स्थापित किए हुए नियमों से घिरा और संचालित है, और यह कि मनुष्य जो बोता है वही काटता है, एक ऐसा नियम है जिसे सहज ही देखा और परखा जा सकता है, चाहे हम शरीर के लिये बोने की बात सोचें या आत्मा के लिये बोने की। पाप की बुरी फ़सल और धार्मिकता की अच्छी फ़सल बोने के बाद उतनी ही निश्चितता से आती हैं जितनी गेहूँ और जौ की फ़सल। “जीवन संयोग से नहीं, कारण से चलता है।” जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, हम देखेंगे कि इस नियम का कार्य बाइबल के इतिहास के आरम्भिक कालों में भी स्पष्ट दिखाई देता है। अय्यूब के तीनों मित्रों ने यह तर्क किया कि वह अवश्य कोई बड़ा पापी होगा, क्योंकि उन्होंने यह मान लिया था कि
जो विपत्तियाँ उस पर आ पड़ी थीं वे अवश्य उसकी दुष्टता का परिणाम होंगी। उनमें से एक ने कहा, “स्मरण कर, क्या कोई निर्दोष भी कभी नाश हुआ है? या कहीं धर्मी भी काट डाले गए? मेरे देखने में तो जो पाप को जोतते और दुष्टता बोते हैं, वही उसको काटते हैं।” नीतिवचन की पुस्तक में हम यह लिखा पाते हैं: “दुष्ट मिथ्या कमाई कमाता है, परन्तु जो धर्म का बीज बोता, उसको निश्चय फल मिलता है।” और फिर: “जो कुटिलता का बीज बोता है, वह अनर्थ ही काटेगा।” यशायाह में हम ये शब्द पाते हैं: “धर्मियों से कहो कि उनका भला होगा, क्योंकि वे अपने कामों का फल प्राप्त करेंगे। दुष्ट पर हाय! उसका बुरा होगा, क्योंकि उसके हाथों के कामों का फल उसको मिलेगा।” होशे ने इस्राएल के विषय में भविष्यद्वाणी की: “वे वायु बोते हैं, और वे बवण्डर लवेंगे।” उसने उन्हें सम्मति दी, “अपने लिये धर्म का बीज बोओ, तब करुणा के अनुसार खेत काटने पाओगे।” उपमा के द्वारा शिक्षा। बाइबल प्रकृति से ली गई उपमाओं से भरी है। जब मसीह पृथ्वी पर थे, तब स्वर्गीय सत्यों को पार्थिव वस्त्र पहनाकर पहुँचाना उनकी शिक्षा देने की प्रिय रीति थी। किसी ने लिखा है, “उनके होठों से सत्य केवल अधिकार के बल पर कहे जाकर नहीं निकलते थे, वरन् विश्व की उपमा पर आधारित होते थे। उनका मानवीय मन, जो उस ईश्वरीय मन के साथ, जिससे वह जुड़ा था, पूर्ण सामंजस्य में था,
वस्तुओं के आपसी सम्बन्ध को पहचानता था, और प्रकृति के सरलतम नियमों में सनातन इच्छा को पढ़ लेता था। उदाहरण के लिये, यदि यह प्रश्न होता कि क्या परमेश्वर माँगनेवालों को अपना आत्मा देगा, तो उसका उत्तर उनके अधिकार से प्रकट किए गए किसी सत्य के द्वारा नहीं दिया जाता था: उत्तर उन तथ्यों से निकाला जाता था जो सब मनुष्यों के देखने के लिये खुले पड़े थे। ‘आकाश के पक्षियों को देखो’; ‘जंगली सोसनों को देखो’—अपने प्रश्न का उत्तर उन्हीं से सीखो। वहाँ एक सिद्धान्त था। परमेश्वर उन आवश्यकताओं को पूरा करता है जिन्हें उसने स्वयं उत्पन्न किया है। वह कौवों को खिलाता है—वह सोसनों को पहिनाता है—वह अपनी सन्तान की लालायित आत्माओं को अपने आत्मा से तृप्त करेगा।” पौलुस इस पाठ में शिक्षा देने की यही रीति अपनाता है। वह बोने और काटने की सरल प्रक्रिया को लेता है, जो सब की जानी-पहचानी है, और उसमें एक गहरा आत्मिक और नैतिक अर्थ पढ़ता है। मानो वह कह रहा हो कि हर मनुष्य जीवन की यात्रा करते हुए हर कदम पर बीज बिखेरता जाता है। वह बीज उसके विचार, उसके वचन और उसके कर्म हैं। वे उससे निकल जाते हैं, और आगे चलकर (चाहे जल्दी या देर से) वे उगते और फल लाते हैं, और कटनी का समय आ पहुँचता है। जीवन बोने का समय है। इस उपमा में कुछ गम्भीर शिक्षाएँ हैं। जीवन को बोने का समय समझना चाहिए। हर एक का अपना खेत है जिसे उसे बोना है, जोतना-सँवारना है, और अन्त में काटना है। अपनी आदतों के द्वारा, अपने मित्रों और साथियों के साथ मेल-जोल के द्वारा, अपने आप को अच्छे या बुरे प्रभावों के सामने रखने के द्वारा,
हम आनेवाली फ़सल के लिये बीज को सींच-सँवार रहे हैं। जब बीज बढ़ता और विकसित होता है तब हम उसे देख नहीं सकते, परन्तु समय उसे प्रकट कर देगा। जैसे पूरी पकी हुई फ़सल सम्भावित रूप में बीज के भीतर ही समाई रहती है, वैसे ही पाप या पवित्रता के पूरे परिणाम सम्भावित रूप में पापपूर्ण या पवित्र कर्म के भीतर समाए रहते हैं। “फिर अभिलाषा गर्भवती होकर पाप को जनती है, और पाप जब बढ़ जाता है तो मृत्यु को उत्पन्न करता है।” जैसे हम अच्छी फ़सल तब तक नहीं काट सकते जब तक हमने अच्छा बीज न बोया हो, वैसे ही हम अनन्त जीवन तब तक नहीं काट सकते जब तक हमने आत्मा के लिये न बोया हो। जंगली घास उगाना आसान है। वह बिना बोए ही उग आती है। और पाप मनुष्य के हृदय में स्वाभाविक रूप से उग आता है। जब से हमारे आदि माता-पिता परमेश्वर से अलग हो गए, तब से मनुष्य का हृदय अपने आप में पूरी तरह भ्रष्ट रहा है, और उसके सब फल बुरे ही रहे हैं। “मनुष्यों का मन बुरा काम करने की इच्छा से भरा रहता है।” क्या आपको इसमें सन्देह है? यदि है, तो अपने आप से पूछिए कि यदि किसी बालक को उसके ही भरोसे छोड़ दिया जाए—न कोई प्रशिक्षण, न कोई मार्गदर्शन, न कोई शिक्षा—तो उसका क्या होगा। बच्चों के लिये इतना कुछ किए जाने पर भी, बहुधा बुराई ही हावी हो जाती है। अच्छा बीज बोना पड़ता है और उसकी देखभाल करनी पड़ती है, बहुधा परिश्रम और कष्ट के साथ; परन्तु फ़सल निश्चित होगी। क्या हम अपनी परीक्षा की घड़ियों में अपने संगी मनुष्यों का प्रेम चाहते हैं? तो हमें उनसे तब प्रेम करना चाहिए जब उन्हें उसके ढाढ़स देनेवाले प्रभाव की सबसे अधिक आवश्यकता हो। क्या हम अपने शोक और पीड़ा में सहानुभूति के लिये तरसते हैं? तो वह हमें तभी मिलेगी जब हमने भी रोनेवालों के साथ रोया हो। क्या हम अनन्त जीवन काटने की आशा रखते हैं? तो हमें
शरीर के लिये नहीं बोना चाहिए, नहीं तो हम विनाश काटेंगे, वरन् आत्मा के लिये बोना चाहिए; तब प्रतिज्ञा यह है कि हम उसके अमर फल काटेंगे। डॉ. चामर्स ने बोने के कार्य और काटने के कार्य के बीच के अन्तर की ओर ध्यान दिलाया है। वे कहते हैं, “ध्यान दिया जाए कि शरीर की अभिलाषाओं में लिप्त होना एक बात है, और उनमें लिप्त होने का प्रबन्ध करना दूसरी बात। जब कोई मनुष्य अचानक भड़काए जाने पर अपने अपमान करनेवाले पड़ोसी पर अपना रोष उतारता है, तब वह उस समय किसी शारीरिक भावना में लिप्त होने की तैयारी नहीं कर रहा, वरन् वास्तव में उसमें लिप्त हो रहा है। वह उस समय बो नहीं रहा, वरन् तृप्ति की एक फ़सल (जैसी भी वह हो) काट रहा है। यह भेद कुछ प्रकार के चरित्रों की भक्तिहीनता का अनुमान लगाने में हमारे विवेक की सहायता कर सकता है। वह भटकता हुआ विलासी, जो हर आवेग के साथ बह जाता है, और जिसकी मानसिक अनुशासन की सारी शक्तियाँ इतनी दुर्बल हो गई हैं कि वह हर प्रवृत्ति का दास बन गया है, आपराधिक तृप्ति की निरन्तर कटनी में जीता है। एक बेटी, जिसका एकमात्र आनन्द एक खर्चीले चकाचौंध भरे दृश्य से दूसरे दृश्य में तेज़ी से जाने में है, जो अपने चंचल समाज की निस्सार बातों और मोहक आकर्षणों के बीच हर चिन्ता को उड़ा देती है और हर घड़ी को भर देती है,—वह ऐसा जीवन बिताती है जिससे अधिक आनेवाले न्याय या आनेवाले अनन्तकाल की तैयारी के जीवन के विपरीत किसी जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर भी वह बोती नहीं, वरन् काटती है। वह धन, जिससे सब वस्तुएँ मोल ली जाती हैं, कमाना किसी और का काम है, और उस मोल ली हुई वस्तु के फलों का स्वाद लेना उसका।
बोनेवाला तो पिता है। वही है जो अपने व्यापारिक सौदों पर व्यस्त और चिन्तित होकर सोच में डूबा बैठा रहता है, जिसके माथे पर कदाचित् चिन्ता से झुर्रियाँ पड़ गई हैं, और जो बढ़ती आयु के कारण इतना गम्भीर हो गया है कि फ़ैशनवाले जीवन की चमक-दमक और तुच्छताओं से उसे पूरी अरुचि हो गई है।” पिता बोता है, और वह अपनी बेटी के जीवन में काटता है। “अनन्तकाल के लिये चित्र बनाना।” एक प्रसिद्ध चित्रकार इस बात के लिये भली-भाँति जाना जाता था कि वह अपना काम बड़ी सावधानी से करता था। जब किसी ने उससे पूछा कि वह इतना परिश्रम क्यों करता है, तो उसने उत्तर दिया: “क्योंकि मैं अनन्तकाल के लिये चित्र बना रहा हूँ।” यह सोचना एक गम्भीर बात है कि भविष्य वर्तमान की फ़सल होगा—कि मेरी मृत्यु की घड़ी में मेरी दशा आज के मेरे कर्मों पर निर्भर हो सकती है! भावी जीवन और आनेवाले न्याय में विश्वास वर्तमान के महत्त्व को और भी बढ़ा देता है। अनन्त परिणाम इसी पर निर्भर हैं। बोने का अवसर सदा नहीं रहेगा; वह पल-पल हमारी उँगलियों से फिसलता जा रहा है; और भविष्य केवल उसी बीज की फ़सल प्रकट कर सकता है जो अभी बोया जा रहा है। एक बार एक मूर्तिकार ने एक अतिथि को अपनी कार्यशाला दिखाई। वह देवताओं की मूर्तियों से भरी थी। उनमें से एक बहुत विचित्र थी। उसका चेहरा बालों से ढँका होने के कारण छिपा हुआ था, और उसके दोनों पैरों में पंख लगे थे। अतिथि ने पूछा, “इसका नाम क्या है?” उत्तर मिला, “अवसर।”
“इसका चेहरा क्यों छिपा है?” “क्योंकि जब यह मनुष्यों के पास आता है तो वे इसे बहुत कम पहचानते हैं।” “इसके पैरों में पंख क्यों हैं?” “क्योंकि यह शीघ्र चला जाता है, और एक बार चला जाए तो फिर कभी पकड़ा नहीं जा सकता।” इसलिये हमें उचित है कि परमेश्वर ने हमें जो अवसर दिए हैं उनका पूरा-पूरा लाभ उठाएँ। हमारा भविष्य कैसा होगा, यह बहुत कुछ हम पर ही निर्भर है। हम अच्छी फ़सल के लिये बो सकते हैं, या हम उन सू इंडियनों के समान कर सकते हैं जिन्हें एक बार जब संयुक्त राज्य अमेरिका के इंडियन मामलों के आयुक्त ने बोने के लिये अनाज की खेप भेजी, तो वे उसे खा गए। मनुष्य निरन्तर अपने अनन्त भविष्य को वर्तमान क्षण के क्षणिक सुख पर बलिदान करते रहते हैं; वे यह पहचानने में चूक जाते हैं या इसकी उपेक्षा करते हैं कि भविष्य वर्तमान पर निर्भर है। कुछ भी तुच्छ नहीं। इससे हम सीख सकते हैं कि पृथ्वी पर तुच्छ नाम की कोई वस्तु नहीं है। जब हम यह समझ लेते हैं कि हर विचार, हर वचन और हर कर्म का अनन्त प्रभाव होता है, और वह उसी रीति से हमारे पास लौट आएगा जैसे बीज फ़सल के रूप में लौट आता है, तो हमें उनकी ज़िम्मेदारी को अवश्य समझना चाहिए, चाहे वे कितने ही तुच्छ क्यों न दिखाई दें। छोटी बातों पर टिके परिणामों को हम अनदेखा कर देने के आदी हैं। गुरुत्वाकर्षण के नियम का विचार
एक सेब के गिरने से सूझा था। कहा जाता है कि कुछ वर्ष पहले हार्वर्ड के एक प्रोफ़ेसर
इस आशा में कुछ जिप्सी-मॉथ (पतंगे) इस देश में ले आए कि रेशम के कीड़ों के साथ उनका संकरण लाभदायक हो सकेगा। वे पतंगे संयोग से निकल भागे, और इतनी अधिकता से बढ़ गए कि मैसाचुसेट्स राज्य को उन्हें नष्ट करने के प्रयत्न में लाखों डॉलर खर्च करने पड़े हैं। जब एच. एम. स्टैनली अन्धकारमय अफ़्रीका के घने जंगलों में से अपना मार्ग बना रहे थे, तब उनका सामना जिन सबसे भयंकर शत्रुओं से हुआ, जिन्होंने उनके काफ़िले के सबसे अधिक लोगों की जान ली और जो उनके अभियान को पूरी तरह विफल करने के सबसे निकट पहुँच गए, वे छोटे-छोटे वाम्बुत्ती बौने थे। वे इतने दुःखदायी थे कि उनके निवास-स्थानों में से होकर बहुत धीरे-धीरे ही आगे बढ़ा जा सकता था। इन छोटे मनुष्यों के पास केवल छोटे धनुष और छोटे तीर थे जो बच्चों के खिलौनों जैसे दिखते थे, परन्तु इन नन्हे तीरों पर विष की एक छोटी-सी बूँद लगी होती थी जो हाथी या मनुष्य को उतनी ही शीघ्रता और निश्चितता से मार डालती थी जितनी विंचेस्टर राइफ़ल। उनकी रक्षा का साधन विष और फन्दे थे। वे जंगल के अन्धकार में दबे पाँव चलते और घात लगाकर बैठ जाते, और पता चलने से पहले ही अपने घातक तीर छोड़ देते। वे खाइयाँ खोदते और उन्हें पत्तों से सावधानी से ढँक देते। वे भूमि में नुकीली खूँटियाँ गाड़ देते, उनकी नोकों पर सबसे घातक विष लगा देते, और फिर उन्हें ढँक देते। इन खाइयों में और इन खूँटियों पर मनुष्य और पशु गिरकर या पैर रखकर मृत्यु को प्राप्त होते। एक बार एक महिला नौसेना के एक युवक को, जो उसके लिये लगभग अपरिचित था, पत्र लिखते हुए सोचने लगी: “क्या मैं इसे वैसे ही समाप्त कर दूँ जैसे
कोई भी करता, या अपने स्वामी के लिये एक बात कहूँ?” और क्षण भर अपना हृदय परमेश्वर की ओर उठाकर उसने लिखा कि उसका बार-बार दृश्य और स्थान बदलते रहना इस वचन का सटीक उदाहरण है, “यहाँ हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं,” और पूछा कि क्या वह कह सकता है: “मैं एक आनेवाले नगर की खोज में हूँ।” काँपते हाथों से उसने पत्र मोड़ा और भेज दिया। उत्तर लौटकर आया। “उन कृपालु शब्दों के लिये आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! मैं अनाथ हूँ, और बहुत वर्ष पहले मेरी माँ के मरने के बाद से किसी ने मुझसे इस प्रकार बात नहीं की।” अनुमान से छोड़ा गया तीर ठीक निशाने पर लगा, और थोड़े ही समय बाद वह युवक शान्ति के सुसमाचार की आशीष की परिपूर्णता में आनन्दित हुआ। एक अप्रसिद्ध व्यक्ति ने एक रविवार को इंग्लैंड के दक्षिण में एक मेथोडिस्ट चैपल में थोड़े-से लोगों को प्रचार किया। श्रोताओं में पन्द्रह वर्ष का एक लड़का था, जो बर्फ़ीले तूफ़ान के कारण चैपल में आ घुसा था। उस व्यक्ति ने अपने पाठ के लिये ये शब्द लिए, “मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ,” और जब वह जैसे-तैसे लड़खड़ाते हुए बोलता जा रहा था, स्वर्ग की ज्योति उस लड़के के हृदय में चमक उठी। वह उद्धार पाकर चैपल से बाहर निकला, और शीघ्र ही बालक-प्रचारक सी. एच. स्पर्जन के नाम से प्रसिद्ध हो गया। एक रात इंग्लैंड के एपवर्थ का पादरी-निवास आग की चपेट में आ गया, और एक बेटे को छोड़ सब रहनेवाले बचा लिए गए। वह लड़का एक खिड़की पर आया, और दो खेतिहर मज़दूरों ने, जिनमें से एक दूसरे के कन्धे पर खड़ा था, उसे सुरक्षित नीचे उतार लिया। वह लड़का जॉन वेस्ली था। यदि आप उस घटना के महत्त्व को
समझना चाहते हैं, यदि आप उस बचाव के परिणामों को मापना चाहते हैं, तो उन लाखों मेथोडिस्टों से पूछिए जो जॉन वेस्ली को अपने सम्प्रदाय का संस्थापक मानते हैं।
धोखा न खाओ; परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता।
“कोई तुम्हें धोखा न दे।”—इफिसियों 5:6। “जैसा कोई मनुष्य को ठट्ठों में उड़ाता है, क्या वैसा ही तुम उसको भी ठट्ठों में उड़ाओगे?”—अय्यूब 13:9।
