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अध्याय 7

आज्ञाकारिता-आशीष का भेद

मेरे सामने चल · बख्त सिंह

आज्ञाकारिता-आशीष का भेद

अध्याय सात: आज्ञाकारिता-आशीष का भेद

जब सारा ने इश्माएल को इसहाक का उपहास करते देखा तो उसने अब्राहम से कहा (उत्पत्ति 21:10) " इस दासी को और उसके पुत्र को निकाल दे, क्योंकि इस दासी का पुत्र मेरे पुत्र इसहाक के साथ वारिस नहीं होने पाएगा।" यह अब्राहम के लिए दुःखदायक था। इश्माएल के प्रति अपने स्वाभाविक स्नेह के कारण, इन शब्दों को सुनकर अब्राहम को दुःख और पीड़ा हुई। तब परमेश्वर उसे फिर, अठारहवीं बार दर्शन दिया। स्पष्ट है कि उस समय सारा पवित्र आत्मा के द्वारा संचालित हो रही थी, जबकि अब्राहम इश्माएल के प्रति अपने प्रेम और स्नेह से संचालित हो रहा था। यह गलातियों 5 पद 22-31 में स्पष्ट किया गया है। सारा पवित्र आत्मा से संचालित हो रही थी, यह पाठ उसने कड़वे अनुभव से सीखा था। उसने स्वयं हाजिरा को अब्राहम को दिया था (उत्पत्ति 16:1-11), जब वे कसदियों के देश से निकले उसके दस वर्ष बाद। परमेश्वर की प्रतिज्ञा पूरी होने की उसने दस वर्ष प्रतीक्षा की, परन्तु जब उसने देखा कि कुछ नहीं हुआ तो उसने अपनी दासी अब्राहम को दे दी। तब हमें बताया जाता है कि वह हाजिरा द्वारा तुच्छ जानी गई। उसने एक भूल की थी, और पुत्र पाने के लिए परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करने की बजाय अपने पुराने स्वभाव से संचालित हो गई थी।

अध्याय 21 पद 10 में हम अब्राहम को मानवीय स्नेह से संचालित होते देखते हैं। अपना स्वयं का कड़वा पाठ सीख चुकी सारा कहती है, "इस दासी को और उसके पुत्र को निकाल दे।" जो सब मसीही कहलाते हैं उन सबका ज्योति में पवित्र लोगों की विरासत में भाग नहीं है। नाममात्र के मसीही, चाहे बाहर से कितने ही अच्छे क्यों न हों, उसमें बिल्कुल भाग नहीं रखते। ऐसे अनेक नाममात्र के मसीही हैं जो स्वभाव से बहुत अच्छे हैं। वे बहुत प्रेमी और भले हैं। वे बड़े बलिदान करते हैं और प्रभु के काम में बहुत धन खर्च करते हैं। परन्तु दुःख की बात यह है कि वे नए सिरे से नहीं जन्मे। वे उद्धार के लिए अपनी ही धार्मिकता पर निर्भर रहते हैं।

परमेश्वर का एक सेवक सुसमाचार प्रचार अभियान के लिए किसी स्थान पर ठहरा हुआ था। वह एक बहुत अच्छे मसीही परिवार के साथ ठहरा हुआ था। जब वह उस स्थान से जा रहा था तो उसने प्रार्थना की, " प्रभु, मेरे मेज़बान और मेज़बानिन के लिए मुझे एक सन्देश दे। वे मेरे प्रति बहुत अच्छे रहे हैं, इसलिए कृपया एक बहुत अच्छा सन्देश दे।" परमेश्वर ने उसे वह सन्देश दिया, और वह था "तुझ में एक बात की घटी है।" परमेश्वर के उस सेवक ने कहा, "प्रभु, वे मेरे प्रति बहुत अच्छे रहे हैं। मैं उन्हें ऐसा सन्देश कैसे दे सकता हूँ?" वह जितना अधिक प्रार्थना करता उतना ही अधिक वही सन्देश उसे बार-बार दिया जाता: "तुझ में एक बात की घटी है" (लूका 18:11)। उसमें अपने मेज़बान और मेज़बानिन से सीधे यह कहने का साहस नहीं था। इसलिए उसने इसे एक कागज़ के टुकड़े पर लिख कर खिड़की के पर्दे पर टाँक दिया। फिर वह नीचे आया और अपने मेज़बान और मेज़बानिन का धन्यवाद करके चला गया। उसके जाने के बाद, घर की स्वामिनी ऊपर गई और खिड़की के पर्दे पर टँके हुए कागज़ के टुकड़े को पाया। उसने "तुझ में एक बात की घटी है" शब्दों को पढ़कर अपने पति को बुलाया, और बोली, "ये परमेश्वर के सेवक के हमें दिए गए अंतिम शब्द हैं।" इसलिए दोनों ने खिड़की के पास घुटने टेककर प्रार्थना की, "हे परमेश्वर; हमें उन शब्दों का अर्थ दिखा जो परमेश्वर के सेवक ने हमारे लिए छोड़े हैं"। जब उन्होंने इस प्रकार प्रार्थना की तो परमेश्वर ने उन्हें उसका अर्थ दिखाया, कि उस दिन तक वे नए सिरे से नहीं जन्मे थे, बल्कि धार्मिकता के लिए अपने ही भले कामों पर निर्भर थे। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में अनुभव करके ग्रहण नहीं किया था। बाहर से वे भले कामों से भरपूर बहुत अच्छे मसीही थे, सब सभाओं में उपस्थित होते और प्रभु के काम के लिए नियमित रूप से अपना धन देते थे। परन्तु वे नए सिरे से नहीं जन्मे थे। अपनी बुद्धि या अपनी सहानुभूति को अपने आपको धोखा न देने दें। यद्यपि अब्राहम को इश्माएल से बड़ा प्रेम था, फिर भी इश्माएल का परमेश्वर के राज्य में कोई भाग नहीं था। वह शरीर के अनुसार जन्मा था, परन्तु इसहाक आत्मा के अनुसार जन्मा था। इसहाक के जन्म से पहले प्रभु ने अब्राहम की देह में नया जीवन डाला था।

इसलिए इसहाक बाइबल में पुनरुत्थान की सामर्थ्य का एक प्रतिरूप है। जब तक हम अनुभव से पुनरुत्थान की सामर्थ्य को प्राप्त नहीं करते, तब तक परमेश्वर के राज्य में हमारा कोई भाग नहीं है। सुनिश्चित कर लें कि आप किस समूह के हैं: इश्माएल के समूह के या इसहाक के समूह के। अब अब्राहम उस समय बड़े आत्मिक खतरे में था क्योंकि वह इश्माएल के प्रति मानवीय स्नेह से संचालित हो रहा था। इसलिए परमेश्वर ने उसे दर्शन दिया और उससे कहा कि वह अपनी पत्नी की बात सुने, क्योंकि वह जो कुछ कह रही थी वह महत्वपूर्ण था। इस कारण कि हमने अतीत में परमेश्वर की इच्छा पूरी की, यह इस बात का प्रमाण नहीं कि हम भविष्य में भी वैसा ही करते रहेंगे। किसी भी समय भूल हो सकती है। जैसे-जैसे हमारी आयु बढ़ती है वैसे-वैसे संबंधियों और मित्रों के प्रति हमारा स्नेह भी बलवन्त होता जाता है, और अनेक लोग अपने बुढ़ापे में दूसरों के प्रति स्नेह के कारण परमेश्वर के प्रति असफल हो जाते हैं। अनेक माता-पिता, पत्नियाँ, पति और बच्चे किसी और के प्रति प्रेम के कारण परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं। इस मानवीय स्नेह को परमेश्वर के स्नेह के अधीन लाया जाना चाहिए। यद्यपि यह अधीनता बहुत पीड़ादायक है, फिर भी यह बहुत सुरक्षित है। अब्राहम को अपने पुत्र को अपने से दूर भेजना पड़ा, और यदि उसने आज्ञा न मानी होती तो परमेश्वर उसे दर्शन न देता। यद्यपि यह अब्राहम के लिए बहुत दुःखदायक था, फिर भी उसने परमेश्वर की आज्ञा मानी। परमेश्वर के वचन और परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना बहुत पीड़ादायक है, परन्तु अब्राहम परमेश्वर की डाँट के लिए खुला था। अध्याय 21 में परमेश्वर के अब्राहम को दर्शन देने का उद्देश्य यह दिखाना था कि हमें सदैव आत्मा से संचालित होना चाहिए, कभी भी शरीर से नहीं। यदि आप परमेश्वर के मित्र बनना चाहते हैं तो कभी किसी को परमेश्वर की आज्ञा मानने के मार्ग में न आने दें - चाहे वह पिता हो, माता हो, भाई हो, बहन हो, बच्चे हों, मित्र हो या पत्नी हो। सूक्ष्म रीति से शत्रु इन स्नेह की वस्तुओं को आपके सामने लाएगा, और कभी-कभी पत्नी या बच्चे को रुला कर आपको परमेश्वर की इच्छा पूरी करने से रोकने का प्रयत्न करेगा।

प्रभु की आज्ञा पाकर प्रेरित पौलुस यरूशलेम जाते हुए कैसरिया में कुछ समय के लिए रुका (प्रेरितों के काम 21:13)। भविष्यद्वक्ता अगबुस वहाँ आया और पौलुस की कमरबंद लेकर अपने ही हाथ-पैर बाँधकर बोला: "पवित्र आत्मा यह कहता है, कि इस कमरबंद के मालिक को यहूदी यरूशलेम में इसी रीति से बाँधकर अन्यजातियों के हाथ में सौंप देंगे।" जब पौलुस के मित्रों ने ये शब्द सुने तो वे रोने लगे। वे भले लोग थे, और पौलुस के घनिष्ठ मित्र थे। वे भी नए सिरे से जन्मे हुए लोग थे, परन्तु जब उन्होंने सुना कि पौलुस के साथ कैसा व्यवहार होने वाला है तो वे रोकर कहने लगे, "वहाँ मत जाओ। वहाँ मत जाओ।" परन्तु पौलुस ने उत्तर दिया, "तुम क्यों रोकर मेरा मन तोड़ते हो? क्योंकि मैं तो प्रभु यीशु के नाम के लिये यरूशलेम में बन्धुआ होने ही को नहीं, वरन मरने को भी तैयार हूँ।" पौलुस ने परमेश्वर की आज्ञा स्पष्ट रूप से सुनी थी और परमेश्वर की इच्छा के विषय में निश्चय था, इसलिए यद्यपि उसके मित्रों ने आँसुओं के साथ उससे विनती की और उसे जाने से रोकने का प्रयत्न किया, फिर भी वह दृढ़ बना रहा। हम में से अनेक इतने बलवन्त नहीं हैं। हम दूसरों के आँसुओं को परमेश्वर की इच्छा पूरी करने से हमें रोकने देते हैं।

ईमानदारी और सच्चाई से बताएँ, क्या ऐसा नहीं हुआ है कि जब आपने परमेश्वर की आज्ञा माननी चाही और आपके प्रियजन रोने लगे, तो आपने परमेश्वर की अवज्ञा की हो? यही कारण है कि अनेक लोगों ने सेवा के लिए परमेश्वर की बुलाहट का पालन नहीं किया। उसी प्रकार जब परमेश्वर ने उन्हें कहीं और जाने के लिए कहा तो अनेक लोगों ने जाने से इनकार कर दिया। कुछ ने बपतिस्मा लेने से इनकार कर दिया है। दूसरों ने परमेश्वर को वह नहीं दिया जो वह उनसे चाहता था। प्रियजनों के आँसू ही अवज्ञा का कारण बने हैं, और प्रभु को आपसे बात करके आपको डाँटना पड़ा है। वह व्यक्ति चाहे कितना ही प्रेमी और प्रिय क्यों न हो, आप परमेश्वर से अधिक किसी से प्रेम नहीं कर सकते। परमेश्वर का वचन कहता है, "जो कोई माता या पिता को मुझसे अधिक प्रेम करता है, वह मेरे योग्य नहीं; और जो कोई पति या पत्नी को मुझसे अधिक प्रेम करता है, वह मेरे योग्य नहीं।"

इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद, अब्राहम एक और परीक्षा से गुजर सका। हाजिरा और इश्माएल के मामले में वह भूल करने की कगार पर था, परन्तु परमेश्वर ने उससे बात की और उसने आज्ञा मानी। फिर अध्याय 22 में एक बहुत कठोर परीक्षा आई। इसलिए परमेश्वर ने उसे नौवीं बार दर्शन दिया, उसी वर्ष जिस वर्ष उत्पत्ति 22 की घटनाएँ हुईं। जैसे अध्याय 21 में अब्राहम इश्माएल के प्रति अपने स्नेह से संचालित हो रहा था, वैसे ही इसहाक के मामले में सारा के लिए भी वैसे ही संचालित होने का प्रलोभन था। इसलिए अब्राहम ने सारा को इसहाक के बारे में परमेश्वर की माँग के विषय में कुछ नहीं बताया। कुछ पति सोचते हैं कि उन्हें अपनी पत्नियों को सब कुछ बताना चाहिए, वे क्या सोचते हैं और क्या खाते हैं भी। वे अपनी कलीसिया की सब बातें अपनी पत्नियों को बताते हैं। पत्नियाँ भी अपने पतियों से पूछती रहती हैं: "मुझे बताओ, तुम कहाँ गए थे? तुमने क्या किया? तुमने क्या कहा? और उस प्राचीन ने क्या कहा?" दुर्बल मन वाले पति अपनी पत्नियों को सब कुछ बता देते हैं, और पत्नियाँ हर जगह गपशप करती फिरती हैं। इस प्रकार परमेश्वर के सेवकों की पत्नियाँ अपने पतियों की सेवकाई को बिगाड़ देती हैं। पति सोचते हैं कि इस तरह सब कुछ बताकर वे अपनी पत्नियों को अधिक प्रेम दिखा रहे हैं। अब्राहम को अनुभव से पता था कि अपनी पत्नी सारा को कुछ बातें बताने में कैसा खतरा है। वह जानता था कि यदि वह सारा को बताए कि परमेश्वर ने उससे इसहाक की बलि माँगी है, तो वह तुरंत रोने लगेगी और कहेगी: "हे मेरे पुत्र इसहाक, मेरे एकलौते पुत्र, निश्चय ही परमेश्वर हमसे ऐसी बात नहीं माँगेगा।" इसलिए, पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित अब्राहम, इस पूरे मामले के बारे में सारा को कुछ बिना बताए इसहाक को ले गया। पतियों, चेतावनी लें। अपनी पत्नी को सब कुछ मत बताओ। पत्नियाँ घंटों रो सकती हैं। जो बातें केवल तुम्हारे और परमेश्वर के बीच हैं, उनमें अपनी पत्नियों की मत सुनो, बल्कि परमेश्वर की इच्छा को पहला स्थान देना सीखो।

अध्याय 22 में मेढ़े को परमेश्वर स्वयं वहाँ लाया था। इस बात का कोई भय नहीं था कि मेढ़ा भाग जाएगा। परमेश्वर उसे वहाँ लाया था, और अब्राहम ने उसे एक झाड़ी में उसके सींगों से पकड़ा। परमेश्वर ने अब्राहम से मेढ़े की बलि चढ़ाने को क्यों कहा? एक उद्देश्य के लिए वह मेढ़ा झाड़ी में फँसाया गया था। परमेश्वर मानो अब्राहम से कह रहा था: "अब हे अब्राहम, तूने मेरी आवाज़ को पूरी तरह माना है। बिना किसी प्रश्न या संकोच के तूने अपने पुत्र को वेदी पर चढ़ाया। इसलिए जैसे झाड़ी में फँसा हुआ मेढ़ा है, वैसे ही मैं तुझ में फँसा हुआ और तुझसे बंधा हुआ हूँ। अब तू मुझे आज्ञा देगा और मैं तेरी आज्ञा मानूँगा।" कैसा भेद है! परमेश्वर अब्राहम से बंध गया। तुम्हें एहसास नहीं है कि परमेश्वर की आज्ञा मानना कैसा विशेषाधिकार है; कि ऐसा करना तुम्हारा अधिकार है। जब हम परमेश्वर की पूरे मन से आज्ञा मानते हैं तो हम परमेश्वर को आज्ञा दे सकते हैं। "मुझे आज्ञा दो", वह यशायाह 45:11 में कहता है। तब वह तुम्हारी सुनेगा।

यह वह दसवीं और अंतिम बार है जब परमेश्वर ने अब्राहम को दर्शन दिया। इस बार परमेश्वर ने अब्राहम को जो आशीष दी उसे देखिए। "चूँकि तूने मेरी आवाज़ सुनी और आज्ञा मानी, इसलिए मैं तुझ से बंध गया हूँ और तू मुझे आज्ञा दे सकता है। मैं तेरी सेवा में हूँ।" यह एक स्वर्गीय भेद है। जब हम परमेश्वर की पूरी तरह आज्ञा मानते हैं तो हम परमेश्वर के सारे राज्य के योग्य बन जाते हैं। (उत्पत्ति 22:17 लास्ट भाग): "तेरा वंश अपने शत्रुओं के फाटक का अधिकारी होगा।" परमेश्वर का उद्देश्य हमें सारा राज्य देना है - अपने शत्रुओं पर विजय और उसके कार्यों पर प्रभुत्व। "हे छोटे झुण्ड, मत डर; क्योंकि तुम्हारे पिता को प्रसन्नता हुई है कि राज्य तुम्हें दे।" छोटी-छोटी बातों में भी उसकी पूरी तरह आज्ञा मानो। उसके पूर्ण प्रभुत्व के अधीन आओ। तब उसका राज्य तुम्हारा राज्य होगा, उसकी महिमा तुम्हारी महिमा होगी, और जो कुछ उसके पास है वह सब तुम्हारा होगा।

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