सातवाँ प्रकटन
अध्याय छह: सातवाँ प्रकटन
देखें उत्पत्ति 18:1 में प्रभु मम्रे के मैदान में अब्राहम को सातवीं बार दर्शन दिया। उत्पत्ति 13:18 के अनुसार मम्रे हेब्रोन है, और हेब्रोन का अर्थ है संगति। अब्राहम अब परमेश्वर के साथ उस संगति का आनंद लेने का विशेषाधिकार सीख चुका था। अध्याय 19 में हम अब्राहम को बड़ी आशा के साथ अपने तम्बू के द्वार पर बैठे देखते हैं। वह ठीक प्रसन्न नहीं है, परन्तु आशान्वित है। वह किसी बात की प्रतीक्षा कर रहा है। जैसे-जैसे आप आत्मिक रूप से बढ़ते हैं, आपको आने वाली घटनाओं की चेतावनी दी जा सकती है। हृदय में कुछ ऐसा होता है जो आपको सचेत रहने की चेतावनी देगा।
इस प्रकार हम पहले से तैयार किए जाते हैं। अध्याय 18 पद 2 में अब्राहम को प्रभु एक साधारण मनुष्य के रूप में दर्शन दिया, परन्तु अध्याय 19 में लूत को परमेश्वर एक स्वर्गदूत के रूप में दर्शन दिया। अध्याय 18 पद 9 में तीन पुरुष अब्राहम से बातें करते हैं। और वे मिलकर एक प्रश्न पूछते हैं, परन्तु पद 10 और 13 में प्रभु अकेला अब्राहम के साथ है और उससे बातें कर रहा है। जब परमेश्वर अकेले में अब्राहम से बातें करने लगा, तो अब्राहम ने पहचान लिया कि वह परमेश्वर से ही बातें कर रहा है, यद्यपि वह अपने आपको एक स्वर्गदूत के वेश में छिपाए हुए था। लूत के मामले में केवल दो स्वर्गदूत उसके पास जाते हैं। यद्यपि वे साधारण पुरुषों के रूप में आए, फिर भी अब्राहम ने उनका बड़े आनंद से स्वागत किया। परन्तु लूत के मामले में, यद्यपि वे उसे स्वर्गदूतों के रूप में दिखाई दिए, फिर भी उसने उन्हें आधे मन से ही स्वागत दिया।
अध्याय 18 और 19 में दो पुरुषों को दिए गए स्वागत की तुलना करें। अब्राहम उनसे मिलने दौड़ता है। यह दिखाता है कि उन्हें प्राप्त करने में उसे कितना आनंद था। यद्यपि अब्राहम ने उन्हें साधारण पुरुषों के रूप में देखा, फिर भी वह आनंद से उनसे मिलने बाहर गया। लूत जानता था कि ये पुरुष स्वर्गदूत हैं, परन्तु वह उनका स्वागत करने के लिए वहीं खड़ा रहा जहाँ वह था। उत्पत्ति 18:3-5 में अब्राहम कहता है, "आइए, बैठिए। मैं भीतर जाकर आप तीनों के लिए भोजन तैयार करता हूँ।" परन्तु लूत उन्हें भोजन का कोई उल्लेख नहीं करता, यद्यपि वह उन्हें पैर धोने के लिए पानी देता है। उसने उन दूतों से कहा, " तुम यहीं ठहरो और सवेरे चले जाना"(उत्पत्ति 19:2)। शायद उसे भय था कि उसकी पत्नी उन्हें अस्वीकार कर दे और उन्हें भोजन देने से इनकार कर दे। उत्पत्ति 18:6 में, अब्राहम कितने बड़े आनंद के साथ झुंड की ओर दौड़ा और एक बछड़ा ले आया! उसने अपनी पत्नी से तीन सआह मैदा लेने को कहा। अब एक सआह मैदा तीन व्यक्तियों के लिए पर्याप्त है, परन्तु उन्होंने लगभग तीस व्यक्तियों के लिए भोजन तैयार किया। यद्यपि उसके पास तीन अतिथि थे, फिर भी उसका आनंद इतना अधिक था कि वह चाहता था कि उसका पूरा परिवार मिलकर संगति करे। जो कुछ वह तैयार कर सकता था वह सब भरपूर मात्रा में तैयार किया, और वे बड़े आनंद के साथ उसके पास आए।
परन्तु लूत के मामले में, उस दूत ने कहा, "हम गली में ही ठहरेंगे" (उत्पत्ति 19:2)। लूत के अर्धमन से दिए गए स्वागत के कारण वे पूरी रात गली में ठहरने के लिए पूरी तरह तैयार थे। वे जानते थे कि लूत की पत्नी और बच्चे उससे सहमत नहीं थे, इसलिए दूत भीतर जाने के लिए तैयार नहीं थे, और लूत को उन्हें भीतर आने के लिए दबाव डालना पड़ा। जब हम कुछ घरों में जाते हैं तो हमें लगता है कि प्रभु वहाँ है। ऐसे लोगों के साथ रहना हमें बड़ा आनंद देता है। परन्तु जब हम दूसरे घरों में जाते हैं तो हमें वहाँ कुछ मिनट भी रहना अच्छा नहीं लगता।
आपका घर कैसा घर है? आपका फर्नीचर या धन या भोजन नहीं है जो घर को सुखी बना सकता है। केवल प्रभु की उपस्थिति ही घर को सुखी बना सकती है। अब्राहम, सारा और पूरे परिवार ने मिलकर तीन अतिथियों को ग्रहण किया, और वे अतिथि उनके साथ रहकर बहुत प्रसन्न हुए। परन्तु लूत के मामले में उत्पत्ति 19:3में, बहुत मनाने के बाद ही वे दूत लूत के घर के भीतर आए। शायद लूत ने कहा, " वैसे, आपने कुछ खाया है?" औपचारिकता के लिए कुछ लोग यह प्रश्न पूछते हैं, आतिथ्य देने की इच्छा से नहीं। कई वर्ष पहले मैं अपनी बहन से मिलने गया था। उसने मुझसे पूछा, " क्या आप कुछ खाएँगे? मैंने उत्तर दिया, " जी हाँ, कृपया" तब उसने कहा, " आप इतने थके हुए लग रहे थे कि मैंने सोचा आप मना कर देंगे। हमारे घर में कुछ नहीं है।" शायद लूत भी वैसा ही कुछ कर रहा था। लूत की पत्नी का कोई उल्लेख नहीं है। शायद यदि लूत ने अपनी पत्नी से अतिथियों के लिए भोजन तैयार करने को कहा होता तो वह यह जवाब देती, " तुम स्वयं बना लो। वे मेरे अतिथि नहीं, तुम्हारे हैं।" हम पढ़ते हैं कि लूत ने स्वयं "अखमीरी रोटी पकाई, और उन्होंने खाया।"
लूत ने सदोम के बहुत निकट रहने का चुनाव किया था। पहले वह शायद सदोम के बाहर रहता होगा, परन्तु बाद में वह भीतर आ गया। फिर वह सदोम में एक प्राचीन बन गया, और इसका परिणाम यह हुआ कि उसके अपने लोग सांसारिक सुखों से भर गए। अनेक लोग सांसारिक सम्मान, धन और चमक-दमक से आकर्षित होकर अपना आनंद और सुख खो देते हैं। अब्राहम ने इन अतिथियों को इसलिए ग्रहण किया क्योंकि उसने सोचा कि वे परमेश्वर के दूत हैं। उसने पहले उन्हें अजनबियों के रूप में ग्रहण किया। शायद इब्रानियों 13:2 अब्राहम की ओर संकेत करता है। यह तभी हुआ जब उसने उनसे बातें करना आरम्भ किया कि उसे पता चला कि वे कौन हैं। यही हमारा भी रवैया होना चाहिए; अजनबियों को भी उसके नाम में बड़े आनंद के साथ ग्रहण करना।
अब्राहम के विश्वास को बलवन्त करने के लिए प्रभु ने उसे दर्शन दिया। प्रभु ने कहा, "तेरी पत्नी सारा को एक पुत्र होगा"। सारा अपने मन में हँसते हुए बोली: "मेरे बुढ़ापे में क्या मुझे सुख होगा, जब कि मेरा स्वामी भी बूढ़ा हो गया है?" प्रभु ने पूछा: "सारा क्यों हँसी?" देखो शैतान ने कैसे संदेह लाने का प्रयत्न किया। यह शैतान का ही काम है। परमेश्वर पहले से जानता था कि उनके मन में संदेह आएगा, इसलिए वह प्रेम से आकर उनके संदेहों को दूर करने आया। परमेश्वर निश्चय ही समय-समय पर दूत भेजेगा, ताकि जब उसके लोग निराशा से भरे हों तो उन्हें प्रोत्साहित और बलवन्त किया जा सके। यह पत्रों, किसी पुस्तक या दूतों के द्वारा हो सकता है।
देखें उत्पत्ति 18:16 में अब्राहम उन पुरुषों के साथ चला। जैसे हनोक परमेश्वर के साथ चला, वैसे ही वह उनके साथ चला, न कि किसी अनुग्रह को पाने के लिए बल्कि केवल उनके साथ संगति करने के लिए। फिर वे दोनों पुरुष सदोम की ओर गए और प्रभु पीछे रहकर अब्राहम से व्यक्तिगत रूप से बातें करने लगा। उसने कहा: "अब्राहम मेरा मित्र है। मैं उसे जानता हूँ और मैं उससे कोई भेद छिपा नहीं सकता। मैंने उसे देखा है और जानता हूँ कि वह अपने परिवार की देखभाल कैसे करता है। अब मैं उसे अपने हृदय का भेद बताने जा रहा हूँ। सदोम और गमोरा के लोगों का न्याय करने का मेरा समय आ गया है।" जब दूत सदोम और गमोरा की ओर आगे बढ़े, अब्राहम प्रभु के सामने खड़ा रहा, और यहोवा प्रभु ने अब्राहम से अकेले में बातें कीं। अब्राहम के मित्र के रूप में उसने उससे स्वतंत्रता से बातें कीं। उसने अब्राहम से बातें करने के लिए अपने दूतों को नहीं भेजा, बल्कि स्वयं आया। कुछ लोग जब हमसे बातें करना चाहते हैं तो अपने सेवकों को भेजते हैं। वे उनसे कहते हैं: " अमुक व्यक्ति के पास जाकर यह सन्देश दे दो"। यहाँ परमेश्वर कह रहा है, " मैं स्वयं अब्राहम से बातें करूँगा। मुझे उससे एक महत्वपूर्ण बात करनी है"। इसलिए उसने अपने दूतों को सदोम और गमोरा की ओर भेज दिया।
हमें कैसा विशेषाधिकार है, उसके मित्र होना कैसा बड़ा सम्मान है! कल्पना कीजिए कि प्रभु स्वयं हमसे बातें करने आ रहा है। परन्तु पहले हमें इस विशेषाधिकार के योग्य ठहरने के लिए परखा और स्वीकृत किया जाना चाहिए। उत्पत्ति 18:19 में प्रभु ने कहा, " मैं उसे जानता हूँ कि वह अपने बाद अपने बालकों और अपने घराने को आज्ञा देगा।" इसलिए प्रभु इतने समय से अब्राहम और उसके घराने को देख रहा था; कि वह अपने पूरे परिवार को कितनी विश्वासयोग्यता से परमेश्वर का सन्देश देता रहा। हर परिवार में नियमित रूप से पारिवारिक प्रार्थना होनी चाहिए। यदि हम अपने बच्चों को नियमित और विश्वासयोग्य रूप से परमेश्वर का वचन सिखाएँ तो हम भी परमेश्वर के मित्र बन सकते हैं, और जो दूतों से छिपाया गया है वह हम पर प्रगट किया जाएगा। जब परमेश्वर ने अब्राहम को आने वाली घटनाओं के बारे में बताया, तो अब्राहम ने सदोम और गमोरा के लोगों के लिए विनती की। परमेश्वर के मित्र के रूप में उसने साहस पाया। हम भी दूसरों के लिए विनती करने और अंधकार में रहने वालों के लिए अनुग्रह और दया माँगने का साहस और स्वतंत्रता पा सकते हैं। इस प्रकार हम परमेश्वर के सहकर्मी बन सकते हैं (पद 33)।
परमेश्वर स्वयं लूत के पास नहीं गया, बल्कि उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने दूतों को भेजा, क्योंकि अब्राहम ने लूत, उसकी पत्नी और उसकी दोनों पुत्रियों के लिए विनती की थी। प्रभु की लूत के साथ अपना भेद बाँटने की कोई इच्छा नहीं थी, क्योंकि लूत ने सदोम और गमोरा के निकट रहना पसन्द करके उसे दुःखी किया था। वह पास की उपजाऊ भूमि से धोखा खा गया था, और अंततः सदोम में एक प्राचीन बन गया था। यदि हम में से कोई भी लूत की तरह सांसारिक सुखों और सम्मान को पसन्द करे, तो प्रभु हमारे पास नहीं आएगा और न ही अपने भेद हम पर प्रगट करेगा। मैं अनेक विश्वासियों को जानता हूँ जो नए सिरे से जन्मे हैं। वे "परमेश्वर की कलीसिया" का अर्थ जानते हैं। परन्तु वे कहीं प्राचीन बनना चाहते हैं, और परमेश्वर के लोगों की संगति को तुच्छ जानते हैं। वे प्राचीनों द्वारा सम्मानित होना चाहते हैं, और नाममात्र के मसीही उनका स्वागत करने को तैयार रहते हैं। वे 'आग' से तो बचा लिए जाएँगे, परन्तु उन्होंने जो कुछ किया है वह सब 'लकड़ी, घास और भूसे' के समान जल जाएगा। हम चेतावनी लें, कहीं ऐसा न हो कि इस संसार की वस्तुएँ हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से अधिक प्रिय हो जाएँ।
