हमारी बुलाहट की महानता: परमेश्वर के सहभागी
परमेश्वर के सहभागी
तीसरे अध्याय में, हम देखते हैं कि उसका उद्धार पाकर हम प्रभु यीशु मसीह के साथ किस प्रकार आत्मिक सहभागिता में प्रवेश करते हैं। न केवल हमारे पाप क्षमा किए जाते हैं और हमें स्वर्ग में स्थान मिलता है, बल्कि हम सब बातों में उसके साथ आत्मिक सहभागी भी बन जाते हैं। यह सहभागिता एक अनूठी सहभागिता है। बाइबल में अन्यत्र हमें परमेश्वर के सहकर्मी और सहभागी कहा गया है (1 Cor. 3:9; 2 Cor. 6:1। वह विशेषाधिकार स्वर्गदूतों को नहीं दिया गया, यद्यपि वे बलवान, तेजोमय और असंख्य हैं। पवित्रशास्त्र में कहीं भी स्वर्गदूतों को परमेश्वर के सहकर्मी और सहभागी नहीं कहा गया। परन्तु हम विश्वासी, जो प्रभु यीशु मसीह के अनमोल लहू से मोल लिए गए हैं, उसके सहभागी बन गए हैं, ताकि हम उसके लिये उसका अनन्त निवासस्थान बना सकें। यह एक महान रहस्य है। परमेश्वर इतना महान है कि स्वर्ग और उसकी भरपूरी भी उसे समा नहीं सकती। फिर भी वह चाहता है कि हम मनुष्य उसके लिये एक पवित्रस्थान या निवासस्थान बनाएँ। उसी उद्देश्य से वह अपने लोगों को मिस्र से कनान तक लाया। उसने मिस्र और फिरौन पर दस विपत्तियाँ भेजीं और अपने बलवन्त हाथ से इस्राएलियों को मिस्र से निकाल लाया। उसने अपने खम्भे को उनके आगे-आगे चलने और उनका मार्गदर्शन करने के लिये भेजा। रात में वे आग के खम्भे से, और दिन में बादल के खम्भे से अगुवाई पाते थे। आग के खम्भे ने इस्राएलियों को उजियाला और मिस्रियों को अंधकार दिया। उन्होंने देखा कि लाल समुद्र किस प्रकार विभाजित हुआ। उसने उनके लिये बहुत से चमत्कार किए। परन्तु इस सब के होते हुए भी वह उनके बीच नहीं रहता था। वह एक बलवन्त परमेश्वर है। उसने कहा, “वे मेरे लिये एक पवित्रस्थान बनाएँ, कि मैं उनके बीच में निवास करूँ” (निर्गमन 25:8)।
एक भवन और एक घर में अन्तर है। भवन का अर्थ है सामान से भरी एक इमारत, परन्तु घर वह स्थान है जहाँ लोग रहते हैं। हम कहते हैं, “मैं घर जा रहा हूँ।” हम अस्पताल, कॉलेज, कार्यशाला या विश्वविद्यालय को घर नहीं कहते। घर वह स्थान है जहाँ हमारी माता, पिता, पति या पत्नी और बच्चे रहते हैं। प्रेम ही घर बनाता है। यह भवन या सामान नहीं जो घर बनाता है। परमेश्वर प्रेम है। उसका प्रेम अनन्त है। उसका प्रेम बहुत महान है। Jer. 31:3वह कहता है, “मैंने तुझ से अनन्त प्रेम रखा है।” परमेश्वर का प्रेम हम में उंडेला जाता है। जैसे एक प्रेमी पिता अपने बच्चों पर अपना प्रेम उंडेलना चाहता है, वैसे ही परमेश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में उंडेला जाता है। परमेश्वर का प्रेम पहाड़ों पर, पेड़ों पर, सूर्य या चन्द्रमा पर नहीं उंडेला जा सकता। इसी प्रकार, उसका प्रेम स्वर्गदूतों को नहीं दिया गया। एक सेवक अच्छा और विश्वासयोग्य हो सकता है। परन्तु जो प्रेम पत्नी और बच्चों को दिखाया जाता है, वह सेवकों को नहीं दिखाया जाता। आप चाहे कितना भी प्रयत्न करें, एक पुरुष का अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति जो प्रेम है, वह किसी सेवक को नहीं दिया जा सकता। इसलिये परमेश्वर का प्रेम उन्हीं के लिये है जो प्रभु यीशु मसीह द्वारा मोल लिए गए हैं। नया जन्म पानेवालों के लिये स्वर्गदूत परमेश्वर की सेवा करनेवाली आत्माएँ होंगे। परमेश्वर अपने लिये एक अनन्त निवासस्थान चाहता है। प्रेरित हमें परमेश्वर का निवासस्थान या परमेश्वर का वासस्थान कहता है। हम परमेश्वर के वासस्थान के रूप में बनाए जा रहे हैं, “तुम भी जीवते पत्थरोंकी नाईं आत्मिक घर, और यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर को ग्रहणयोग्य आत्मिक बलिदान चढ़ानेवाले पवित्र याजकों का समाज बनते जाते हो” ( 1 Pet. 2:5। पवित्र आत्मा ने परमेश्वर के घर को पवित्रस्थान, परमेश्वर का निवासस्थान, परमेश्वर का मंदिर, और आत्मिक घर जैसे विभिन्न नाम दिए हैं। रहस्य यह है कि ऐसे अनन्त वासस्थान के लिये, परमेश्वर को मुझे और तुम्हें चाहिये। हम चाहे कितने भी निर्बल और मूर्ख क्यों न हों। परमेश्वर हमें ऐसे घर के लिये चाहता है। जब एक धनी व्यक्ति घर बनाता है, तो वह बहुत मूल्यवान सामग्री का उपयोग करता है। जब एक राजा अपना महल बनाता है, तो वह संसार के विभिन्न भागों से इकट्ठी की गई सर्वोत्तम सामग्री का उपयोग करता है। परन्तु प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का घर बनाने के लिये एक मैला चिथड़ा, एक अशुद्ध वस्तु और एक मुरझाया हुआ पत्ता चुनता है, जब हम उसके पास आए तब हमारी यही दशा थी। परन्तु क्योंकि हम उसके द्वारा मोल लिए गए, हम उसके लिये इतने अनमोल बन गए। और रहस्य यह है कि हम में से हर एक, चाहे कितना भी मूर्ख और निर्बल क्यों न हो, उसके अनन्त वासस्थान का एक भाग बन सकता है।
मूसा द्वारा बनाए गए घर को परमेश्वर द्वारा दिखाए गए प्रतिरूप के अनुसार बनाया गया था। वह घर उस घर की केवल एक छाया थी, जिसे अब प्रभु यीशु मसीह बना रहा है। परमेश्वर ने मूसा को अपनी बुद्धि से खाली करने के लिये चालीस वर्ष जंगल में और फिर चालीस दिन पहाड़ पर रखा। वहाँ, पहाड़ पर, परमेश्वर ने उसे बनाए जानेवाले घर का स्वर्गीय प्रतिरूप दिया और उसे चेतावनी भी दी कि सावधान रहकर दिखाए गए प्रतिरूप के अनुसार ही बनाए (निर्गमन 25:40)। मिलापवाले तम्बू के निर्माण का हर विवरण मूसा को दिखाया गया था। न मूसा और न ही कोई और उस प्रतिरूप को बदल सकता था। “जैसा यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी” ये शब्द निर्गमन के अध्याय 40 में आठ बार दोहराए गए हैं। तम्बू बनाने में, मूसा ने परमेश्वर द्वारा दिए गए हर विवरण का पालन किया। तभी परमेश्वर की महिमा तम्बू को भर सकी। अब प्रभु यीशु मसीह हमारी सहभागिता से आत्मिक घर बना रहा है। हम में से कोई भी उस योजना में कोई परिवर्तन नहीं कर सकता। यदि मूसा भौतिक घर बनाने में कोई परिवर्तन नहीं कर सका, तो हम आत्मिक घर के लिये कैसे परिवर्तन कर सकते हैं? परन्तु परमेश्वर के बहुत से सेवक कुछ परिवर्तन करते हैं, और मानवीय बुद्धि से परमेश्वर का कार्य करते हैं। इसीलिये उनके बीच हम हार, असफलता, बंजरपन और अंधकार देखते हैं। परमेश्वर के वचन से हमें उसके घर को बनाने में सावधान रहने की चेतावनी दी गई है। आजकल मसीही बैप्टिस्ट, मेथोडिस्ट, मेनोनाइट, एंग्लिकन और प्रेस्बिटेरियन जैसे अनेक सम्प्रदायों में बँट गए हैं। संविधान के नाम पर, लोगों ने बहुत से परिवर्तन ला दिए हैं। अंधकार और गलत शिक्षा भी कलीसिया में घुस आई है।
इसी प्रकार, यदि हम परमेश्वर के घर के निर्माण में कोई भाग लेना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें प्रभु यीशु मसीह के मुखियापन, प्रभुत्व और राजत्व के अधीन रहना चाहिये। एक बड़ी इमारत बनाने के लिये, मुख्य अभियन्ता के पास एक योजना होगी। राजगीर और अन्य कर्मचारी उसके अधीन होंगे। वह जो कुछ कहे, उन्हें वही करना होगा। उसी प्रकार, जब हमारा व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन और कलीसियाई जीवन प्रभु यीशु मसीह के पूर्ण प्रभुत्व, मुखियापन और राजत्व के अधीन लाया जाता है, तो हम अपने मार्गदर्शन के लिये प्रतिदिन परमेश्वर की वाणी सुन सकते हैं। परन्तु यदि हम किसी पाप से अशुद्ध हो जाएँ, तो हम आत्मिक रूप से बहरे हो जाते हैं और परमेश्वर की वाणी नहीं सुन पाते। इसीलिये बहुत से लोग आत्मिक रूप से बहरे हैं और उनके कान इतने कठोर हो गए हैं कि वे यह नहीं समझ पाते कि परमेश्वर क्या कहना चाहता है। वे आत्मिक रूप से अन्धे भी हो जाते हैं। वे परमेश्वर की योजना को नहीं जानते। हम अपने व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन और कलीसियाई जीवन में प्रभु यीशु मसीह के मुखियापन के अधीन रहकर ही परमेश्वर की इच्छा जान सकते हैं। तब हम परमेश्वर के अनन्त वासस्थान के निर्माण में सहभागी बनेंगे। साथ ही हम उसके घर में परमेश्वर की भरपूरी का आनन्द ले सकते हैं। परमेश्वर का प्रेम घर में पूरी तरह प्रकट होता है। हम में से हर एक की एक स्वर्गीय बुलाहट है कि वह प्रभु यीशु मसीह का सच्चा सहकर्मी बनकर, उसके मुखियापन के अधीन उसका अनन्त वासस्थान बनाए। हम — उस गौरवशाली पवित्रस्थान के निर्माण में अपना भाग ले सकते हैं, बशर्ते हम उसके मुखियापन और प्रभुत्व के अधीन आने को तैयार हों।
