छठा दर्शन
छठा दर्शन (1 Cor. 15: 6)
छठा दर्शन पांच सौ भाइयों को हुआ, जैसा 1 Cor. 15: 6हम 1 कुरिन्थियों 15:6 में पढ़ते हैं। जैसे-जैसे उसके पुनरुत्थान का समाचार फैलता गया, विश्वासी उन विभिन्न स्थानों से इकट्ठे होने लगे जहां वे छिपे हुए थे। एक ही स्थान पर इकट्ठे हुए लोगों की संख्या उस गिनती तक पहुंच गई। इस दर्शन के द्वारा हम देखते हैं कि जब हम मनुष्यों द्वारा बनाए गए सारे भेदभावों पर विजय पाकर एक परिवार के रूप में इकट्ठे होते हैं, तो हम उसकी पुनरुत्थान की सामर्थ्य का अनुभव कैसे कर सकते हैं। प्रभु यीशु मसीह ने गतसमनी की वाटिका में जाने से पहले यह प्रार्थना की, "कि हे पिता, वे सब एक हों; जैसा तू मुझ में है और मैं तुझ में हूं, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिये कि जगत विश्वास करे कि तू ही ने मुझे भेजा है" (John 17: 21)। इस अध्याय में हमारे पास प्रभु यीशु मसीह की सबसे प्रेरणादायक प्रार्थना का लेखा है। वह हम विश्वासियों के बीच चौगुनी एकता के लिए प्रार्थना करता है। पहला, संबंध में एकता; दूसरा, प्रेम में एकता; तीसरा, सिद्धता में एकता; चौथा, महिमा में एकता। हम सब राष्ट्रीय, सामुदायिक और सामाजिक भेदभाव भूलकर जितना अधिक एक परिवार के रूप में साथ रहते हैं, उतना ही अधिक हम अपने प्रभु के निकट खिंचे चले जाते हैं। साथ ही प्रभु के और एक दूसरे के प्रति हमारी निकटता हमें अधिक दृढ़ विश्वास के साथ उसकी सामर्थ्य को ग्रहण करने में सहायता करती है। इन दिनों हम विश्वासियों को छोटी-छोटी बातों पर बंटा हुआ पाते हैं। इससे बहुतों को बड़ी आत्मिक हानि होती है और कुछ में लंबे समय तक आत्मिक बचपना बना रहता है। जहां कहीं भी विश्वासी प्रभु यीशु मसीह के शीर्षपन के अधीन, एक दूसरे के प्रति सहनशीलता और सच्चे प्रेम से एक दूसरे की सेवा करते हुए एक परिवार के रूप में इकट्ठे होते हैं, वहां हम बहुत आत्मिक बढ़ोतरी, परमेश्वर के वचन की गहरी समझ और उसकी स्थायी उपस्थिति का आनंद लेने की क्षमता पाते हैं। हम परमेश्वर के वचन से देखते हैं कि जहां कहीं भी आरंभिक मसीही एक परिवार के रूप में साथ आए, वहां प्रभु ने गहराई और स्वतंत्रता से काम किया। पिछले 34 वर्षों से, विशेष रूप से भारत के विभिन्न भागों में आयोजित पवित्र महासभाओं के दौरान, यही हमेशा हमारा अनुभव रहा है। संगति के इन समयों में हमें बिना किसी पक्षपात के सबका समान रूप से स्वागत करने और उनकी सेवा करने का सौभाग्य मिला है।
