भाग 1 (2 में से)

पाप-क्षमा-पत्रों पर वाद-विवाद (अंग्रेज़ी)

यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

शीर्षक पृष्ठ डॉ. मार्टिन लूथर का पाप-क्षमा-पत्रों के अधिकार और प्रभाव पर वाद-विवाद डॉ. मार्टिन लूथर द्वारा, 1517 प्रकाशित:

मार्टिन लूथर की रचनाएँ एडोल्फ़ स्पेथ, एल.डी. रीड, हेनरी आइस्टर जैकब्स एवं अन्य, अनुवादक & सम्पादक।

(फ़िलाडेल्फ़िया: ए. जे. होल्मन कम्पनी, 1915), खण्ड 1, पृष्ठ 29-38।

[अंग्रेज़ी] पाप-क्षमा-पत्रों के अधिकार और प्रभाव पर वाद-विवाद डॉ. मार्टिन लूथर का पाप-क्षमा-पत्रों के अधिकार और प्रभाव पर वाद-विवाद 31 अक्टूबर, 1517 सत्य के प्रेम से और उसे प्रकाश में लाने की इच्छा से, निम्नलिखित प्रस्ताव विटेनबर्ग में, आदरणीय पिता मार्टिन लूथर की अध्यक्षता में, विचार-विमर्श के लिए रखे जाएँगे,

जो कला और पवित्र धर्मविज्ञान में मास्टर तथा उसी विषय के नियमित प्राध्यापक हैं।

अतः वे विनती करते हैं कि जो लोग उपस्थित होकर हमारे साथ मौखिक रूप से वाद-विवाद करने में असमर्थ हों, वे पत्र द्वारा ऐसा करें।

हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में। आमीन।

1. हमारे प्रभु और स्वामी यीशु मसीह ने जब यह कहा, “Poenitentiam agite” (पश्चाताप करो), तो उनकी इच्छा यह थी कि विश्वासियों का सम्पूर्ण जीवन पश्चाताप ही हो।

2. इस शब्द को संस्कारीय पश्चाताप (अर्थात् वह अंगीकार और प्रायश्चित जो याजकों द्वारा सम्पन्न कराया जाता है) के अर्थ में नहीं समझा जा सकता।

3. तथापि इसका अर्थ केवल आन्तरिक पश्चाताप ही नहीं है; बल्कि ऐसा कोई आन्तरिक पश्चाताप है ही नहीं जो बाहरी रूप से देह के नाना प्रकार के दमन को उत्पन्न न करे।

4. अतः [पाप का] दण्ड तब तक बना रहता है जब तक आत्म-घृणा बनी रहती है; क्योंकि यही सच्चा आन्तरिक पश्चाताप है, और यह हमारे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश तक बना रहता है।

5. पोप की न तो यह मंशा है, और न ही वह उन दण्डों के अतिरिक्त किसी अन्य दण्ड को क्षमा कर सकता है, जो उसने स्वयं अपने अधिकार से या कलीसियाई विधि के अधिकार से लगाए हों।

6. पोप किसी भी दोष को इसके अतिरिक्त क्षमा नहीं कर सकता कि वह घोषित करे कि वह परमेश्वर द्वारा क्षमा किया जा चुका है, और परमेश्वर की क्षमा पर सहमति दे; यद्यपि निश्चय ही वह उन मामलों में क्षमा प्रदान कर सकता है जो उसके निर्णय के लिए सुरक्षित रखे गए हैं। यदि ऐसे मामलों में क्षमा प्रदान करने के उसके अधिकार को तुच्छ जाना जाए, तो वह दोष पूरी तरह से अक्षमित ही रह जाएगा।

7. परमेश्वर किसी के भी दोष को उस समय तक क्षमा नहीं करता जब तक कि वह उसे साथ ही साथ सब बातों में दीन न करे और अपने प्रतिनिधि, अर्थात् याजक, के अधीन न ले आए। 8. पश्चातापीय विधियाँ केवल जीवितों पर ही लगाई जाती हैं, और उनके अनुसार, मरनेवालों पर कुछ भी नहीं लगाया जाना चाहिए।

9. इसलिए पोप में पवित्र आत्मा हम पर कृपालु है, क्योंकि वह अपने आदेशों में सदैव मृत्यु और आवश्यकता की दशा को अपवाद मानता है।

10. उन याजकों के कार्य अज्ञानतापूर्ण और दुष्ट हैं जो मरनेवालों के मामले में कलीसियाई विधि के प्रायश्चित को शुद्धिकरण-स्थान (पर्गेटरी) के लिए सुरक्षित रखते हैं।

11. कलीसियाई दण्ड को शुद्धिकरण-स्थान के दण्ड में इस प्रकार बदल देना स्पष्ट रूप से उन जंगली बीजों में से एक है जो बिशपों के सो जाने के समय बोए गए थे।

12. पूर्व समय में कलीसियाई दण्ड क्षमा-घोषणा के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले, सच्चे हृदय-पश्चाताप की परीक्षा के रूप में लगाए जाते थे।

13. मरनेवाले मृत्यु के द्वारा सब दण्डों से मुक्त हो जाते हैं; वे कलीसियाई नियमों के लिए पहले से ही मृत हैं, और उनसे मुक्त होने का अधिकार रखते हैं।

[अंग्रेज़ी] पाप-क्षमा-पत्रों के अधिकार और प्रभाव पर वाद-विवाद 14. मरनेवाले का अपूर्ण स्वास्थ्य [आत्मा का], अर्थात् अपूर्ण प्रेम, अनिवार्य रूप से अपने साथ बड़ा भय ले आता है; और प्रेम जितना कम होता है, भय उतना ही अधिक होता है।

15. यह भय और भीति अन्य बातों की तो बात ही छोड़, अपने आप में ही शुद्धिकरण-स्थान का दण्ड बनने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि यह निराशा की भीति के बहुत निकट है।

16. नरक, शुद्धिकरण-स्थान और स्वर्ग में वैसा ही भेद प्रतीत होता है जैसा निराशा, लगभग-निराशा और सुरक्षा के निश्चय में होता है।

17. शुद्धिकरण-स्थान में पड़ी आत्माओं के विषय में यह आवश्यक प्रतीत होता है कि भीति घटती जाए और प्रेम बढ़ता जाए।

18. यह न तो तर्क से और न ही पवित्रशास्त्र से सिद्ध होता प्रतीत है कि वे पुण्य की दशा से, अर्थात् बढ़ते हुए प्रेम की दशा से, बाहर हैं।

19. फिर, यह भी सिद्ध होता प्रतीत नहीं होता कि वे, या कम से कम उनमें से सभी, अपने धन्य होने के विषय में निश्चित या आश्वस्त हैं, चाहे हम इसके विषय में पूर्णतः निश्चित क्यों न हों।

20. अतः पोप “सब दण्डों की पूर्ण क्षमा” से वास्तव में “सबकी” क्षमा का अभिप्राय नहीं रखता, बल्कि केवल उन्हीं दण्डों की जो स्वयं उसने लगाए हैं।

21. अतः पाप-क्षमा-पत्र बेचनेवाले प्रचारक भूल में हैं जो यह कहते हैं कि पोप के पाप-क्षमा-पत्रों के द्वारा मनुष्य हर दण्ड से मुक्त होकर उद्धार पा लेता है;

22. जबकि वह शुद्धिकरण-स्थान की आत्माओं को उस दण्ड में से कुछ भी क्षमा नहीं करता जो कलीसियाई विधि के अनुसार उन्हें इस जीवन में चुकाना पड़ता। 23. यदि किसी को भी समस्त दण्डों की क्षमा प्रदान करना कदापि सम्भव है, तो यह निश्चित है कि यह क्षमा केवल सबसे सिद्ध व्यक्तियों को, अर्थात् बहुत ही थोड़े लोगों को दी जा सकती है।

24. इसलिए यह अवश्यम्भावी है कि अधिकांश लोग उस अविवेकपूर्ण और बड़े-बड़े शब्दों वाली दण्ड-मुक्ति की प्रतिज्ञा से धोखा खा जाते हैं।

25. जो अधिकार पोप को शुद्धिकरण-स्थान पर सामान्य रूप से प्राप्त है, वह ठीक वैसा ही है जैसा किसी भी बिशप या पल्ली-पुरोहित को अपने ही धर्मप्रान्त या पल्ली के भीतर विशेष रूप से प्राप्त होता है।

26. पोप तब भला करता है जब वह [शुद्धिकरण-स्थान की] आत्माओं को क्षमा प्रदान करता है, कुंजियों के अधिकार के द्वारा नहीं (जो उसके पास है ही नहीं), बल्कि मध्यस्थता के द्वारा।

27. जो लोग यह कहते हैं कि जैसे ही पैसा दान-पेटी में खनकता है, आत्मा [शुद्धिकरण-स्थान से] उड़ जाती है, वे मनुष्य की बात प्रचार करते हैं।

28. यह निश्चित है कि जब पैसा दान-पेटी में खनकता है, तो लाभ और लोभ बढ़ सकते हैं, परन्तु कलीसिया की मध्यस्थता का परिणाम केवल परमेश्वर के ही अधिकार में है।

29. कौन जानता है कि शुद्धिकरण-स्थान की सब आत्माएँ उससे मोल लेकर छुड़ाई जाना चाहती भी हैं या नहीं, जैसा कि संत सेवेरिनुस और पास्कल की कथा में बताया गया है।

30. कोई भी इस बात का निश्चय नहीं कर सकता कि उसका अपना हृदय-पश्चाताप सच्चा है; इससे भी कम यह कि उसने पूर्ण क्षमा प्राप्त कर ली है।

31. जितना दुर्लभ है वह मनुष्य जो सच्चे अर्थों में पश्चातापी है, उतना ही दुर्लभ है वह भी जो सच्चे अर्थों में पाप-क्षमा-पत्र मोल लेता है, अर्थात् ऐसे मनुष्य अत्यन्त ही दुर्लभ हैं।

32. जो लोग अपने पाप-क्षमा-पत्रों के होने के कारण अपने उद्धार का निश्चय समझते हैं, वे अपने शिक्षकों के साथ अनन्तकाल के लिए दण्डित होंगे।

[अंग्रेज़ी] पाप-क्षमा-पत्रों के अधिकार और प्रभाव पर वाद-विवाद 33. मनुष्यों को उन लोगों से सावधान रहना चाहिए जो कहते हैं कि पोप के पाप-क्षमा-पत्र परमेश्वर का वह अमूल्य वरदान हैं जिसके द्वारा मनुष्य उसके साथ मेल कर लेता है;

34. क्योंकि ये “क्षमा के अनुग्रह” केवल संस्कारीय प्रायश्चित के दण्डों से सम्बन्ध रखते हैं, और ये मनुष्य द्वारा नियुक्त किए गए हैं।

35. जो यह सिखाते हैं कि शुद्धिकरण-स्थान से आत्माओं को मोल लेकर छुड़ाने या अंगीकार-पत्र (कन्फ़ेशनालिया) मोल लेने के इच्छुक लोगों के लिए हृदय-पश्चाताप आवश्यक नहीं है, वे कोई मसीही सिद्धान्त नहीं सिखाते।

36. प्रत्येक सच्चे अर्थों में पश्चातापी मसीही को दण्ड और दोष की पूर्ण क्षमा का अधिकार है, चाहे उसके पास पाप-क्षमा-पत्र हों या न हों।

37. प्रत्येक सच्चा मसीही, चाहे जीवित हो या मृत, मसीह और कलीसिया के सब आशीषों में भागी है; और यह उसे परमेश्वर की ओर से दिया जाता है, चाहे पाप-क्षमा-पत्र हों या न हों।

38. फिर भी, वह क्षमा और सहभागिता [कलीसिया की आशीषों में] जो पोप के द्वारा प्रदान की जाती है, किसी भी रीति से तुच्छ नहीं जानी जानी चाहिए, क्योंकि वे, जैसा मैंने कहा है, दैवीय क्षमा की घोषणा हैं।

39. सबसे तीक्ष्ण-बुद्धि धर्मशास्त्रियों के लिए भी यह अत्यन्त कठिन है कि वे एक ही समय में लोगों के सम्मुख पाप-क्षमा-पत्रों की बहुतायत की और [सच्चे हृदय-पश्चाताप की आवश्यकता की] प्रशंसा करें।

40. सच्चा हृदय-पश्चाताप दण्डों को ढूँढ़ता और उनसे प्रेम करता है, परन्तु उदारतापूर्वक बाँटे गए पाप-क्षमा-पत्र केवल दण्डों को शिथिल करते और उनसे घृणा उत्पन्न करते हैं, या कम से कम [उनसे घृणा करने का] अवसर देते हैं।

41. प्रेरितीय पाप-क्षमा-पत्रों का प्रचार सावधानी से किया जाना चाहिए, ऐसा न हो कि लोग भूल से यह सोचने लगें कि वे प्रेम के अन्य भले कामों से श्रेष्ठ हैं।

42. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि पोप की यह मंशा नहीं है कि पाप-क्षमा-पत्र मोल लेने की तुलना किसी भी रीति से दया के कामों से की जाए।

43. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि जो दरिद्र को दान देता है या दीन को उधार देता है, वह पाप-क्षमा-पत्र मोल लेने से बेहतर काम करता है। 44. क्योंकि प्रेम के कामों से प्रेम बढ़ता है, और मनुष्य उत्तम बनता जाता है; परन्तु पाप-क्षमा-पत्रों से मनुष्य उत्तम नहीं बनता, केवल दण्ड से अधिक मुक्त होता है।

45. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि जो किसी दीन मनुष्य को देखकर उसकी उपेक्षा करता है, और [अपना धन] पाप-क्षमा-पत्रों के लिए देता है, वह पोप के पाप-क्षमा-पत्र नहीं, वरन् परमेश्वर का क्रोध मोल लेता है।

46. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि जब तक उनके पास अपनी आवश्यकता से अधिक न हो, वे अपने परिवार के लिए आवश्यक वस्तु को रोक रखने के लिए बाध्य हैं, और किसी भी रीति से उसे पाप-क्षमा-पत्रों पर न उड़ाएँ।

47. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि पाप-क्षमा-पत्र मोल लेना स्वतंत्र इच्छा का विषय है, न कि आज्ञा का।

48. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि पाप-क्षमा-पत्र प्रदान करने में पोप को उनके द्वारा लाए गए धन से कहीं अधिक उनकी भक्तिपूर्ण प्रार्थना की आवश्यकता है, और इसलिए वह उसी की कामना करता है।

49. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि पोप के पाप-क्षमा-पत्र उपयोगी हैं, यदि वे उन पर भरोसा न रखें; परन्तु सर्वथा हानिकारक हैं, यदि उनके द्वारा वे परमेश्वर का भय खो बैठें।

[अंग्रेज़ी] पाप-क्षमा-पत्रों के अधिकार और प्रभाव पर वाद-विवाद 50. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि यदि पोप पाप-क्षमा-पत्र बेचनेवालों की धन-उगाही को जानता, तो वह यही चाहता कि संत पतरस का गिरजाघर राख हो जाए, बजाय इसके कि वह उसकी भेड़ों की खाल, माँस और हड्डियों से बनाया जाए।

51. मसीहियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि पोप की यह इच्छा होगी, जैसा कि उसका कर्तव्य भी है, कि वह अपने ही धन में से उन बहुत से लोगों को दे जिनसे पाप-क्षमा-पत्र बेचनेवाले कुछ लोग छल से धन ऐंठते हैं, चाहे इसके लिए संत पतरस का गिरजाघर बेचना ही क्यों न पड़े।

52. पाप-क्षमा-पत्रों के द्वारा उद्धार का निश्चय व्यर्थ है, चाहे आयुक्त, वरन् स्वयं पोप भी, उस पर अपनी आत्मा की शपथ क्यों न खाए।

53. वे मसीह और पोप दोनों के शत्रु हैं, जो कुछ कलीसियाओं में परमेश्वर के वचन को पूर्णतः मौन रखने की आज्ञा देते हैं, ताकि अन्य कलीसियाओं में पाप-क्षमा-पत्रों का प्रचार किया जा सके।

54. परमेश्वर के वचन को हानि पहुँचती है जब एक ही प्रवचन में पाप-क्षमा-पत्रों पर उतना या उससे अधिक समय व्यय किया जाता है जितना इस वचन पर।

55. पोप का अभिप्राय अवश्य यही होना चाहिए कि यदि पाप-क्षमा-पत्र, जो एक अत्यन्त छोटी वस्तु हैं, एक घंटी, एक ही जुलूस और समारोह के साथ मनाए जाते हैं, तो सुसमाचार, जो सबसे बड़ी वस्तु है, सौ घंटियों, सौ जुलूसों और सौ समारोहों के साथ प्रचारित किया जाना चाहिए।

56. “कलीसिया के पुण्य-भण्डार”, जिनमें से पोप पाप-क्षमा-पत्र प्रदान करता है, मसीह के लोगों के बीच पर्याप्त रूप से न तो नामित हैं और न ही जाने गए हैं।

57. यह निश्चय ही स्पष्ट है कि वे सांसारिक भण्डार नहीं हैं, क्योंकि अनेक बेचनेवाले ऐसे भण्डारों को इतनी सरलता से उड़ेलते नहीं, बल्कि केवल बटोरते हैं।

58. न ही वे मसीह और संतों के पुण्य हैं, क्योंकि पोप के बिना भी, ये सदैव भीतरी मनुष्य के लिए अनुग्रह, और बाहरी मनुष्य के लिए क्रूस, मृत्यु और नरक का कार्य करते हैं।

59. संत लॉरेंस ने कहा था कि कलीसिया के भण्डार कलीसिया के दरिद्र लोग हैं, परन्तु उन्होंने अपने ही समय में उस शब्द के प्रचलित प्रयोग के अनुसार यह कहा था।

60. हम बिना किसी उतावलेपन के कहते हैं कि कलीसिया की कुंजियाँ, जो मसीह के पुण्य से दी गई हैं, वही पुण्य-भण्डार हैं। 61. क्योंकि यह स्पष्ट है कि दण्डों की और सुरक्षित रखे गए मामलों की क्षमा के लिए, पोप का अधिकार अपने आप में पर्याप्त है।

62. कलीसिया का सच्चा पुण्य-भण्डार परमेश्वर की महिमा और अनुग्रह का परम पवित्र सुसमाचार है।

63. परन्तु यह पुण्य-भण्डार स्वभावतः अत्यन्त अप्रिय है, क्योंकि यह पहलों को पिछले बना देता है।

64. दूसरी ओर, पाप-क्षमा-पत्रों का भण्डार स्वभावतः अत्यन्त ग्राह्य है, क्योंकि यह पिछलों को पहले बना देता है।

65. अतः सुसमाचार के भण्डार वे जाल हैं जिनसे पूर्व काल में धनवान मनुष्यों को पकड़ने का अभ्यास किया जाता था।

66. पाप-क्षमा-पत्रों के भण्डार वे जाल हैं जिनसे अब मनुष्यों के धन को पकड़ा जाता है।

[अंग्रेज़ी] पाप-क्षमा-पत्रों के अधिकार और प्रभाव पर वाद-विवाद 67. जिन पाप-क्षमा-पत्रों को प्रचारक “सबसे बड़े अनुग्रह” कहकर पुकारते हैं, वे सच में उतने ही बड़े जाने जाते हैं जितना वे लाभ को बढ़ावा देते हैं।

68. फिर भी वे वास्तव में परमेश्वर के अनुग्रह और क्रूस की भक्ति की तुलना में सबसे छोटे अनुग्रह हैं।

69. बिशप और पल्ली-पुरोहित प्रेरितीय पाप-क्षमा-पत्रों के आयुक्तों को पूर्ण आदर के साथ प्रवेश देने के लिए बाध्य हैं।

70. परन्तु इससे भी अधिक वे अपनी सब आँखों को साधने और अपने सब कानों से ध्यान देने के लिए बाध्य हैं, ऐसा न हो कि ये लोग पोप के आदेश के स्थान पर अपने ही स्वप्न प्रचार करें।

71. जो कोई प्रेरितीय पाप-क्षमा-पत्रों की सच्चाई के विरुद्ध बोलता है, वह अभिशप्त और शापित ठहरे!

72. परन्तु जो पाप-क्षमा-पत्र बेचनेवालों के लोभ और उच्छृंखलता से सावधान रहता है, वह धन्य ठहरे!

73. पोप न्यायपूर्वक उन लोगों के विरुद्ध गरजता है जो किसी भी युक्ति से पाप-क्षमा-पत्रों के व्यापार को हानि पहुँचाने की युक्ति रचते हैं।

74. परन्तु इससे कहीं अधिक उसका अभिप्राय उन लोगों के विरुद्ध गरजना है जो पाप-क्षमा-पत्रों के बहाने से पवित्र प्रेम और सत्य को हानि पहुँचाने की युक्ति रचते हैं।

75. यह सोचना कि पोप के पाप-क्षमा-पत्र इतने बड़े हैं कि वे किसी मनुष्य को उस समय भी मुक्त कर सकते हैं जब उसने कोई असम्भव पाप किया हो और परमेश्वर की माता का अपमान किया हो—यह पागलपन है।

76. इसके विपरीत हम कहते हैं कि पोप के पाप-क्षमा-पत्र सामान्य पापों में से सबसे छोटे पाप के दोष को भी दूर करने में समर्थ नहीं हैं।

77. यह कहा जाता है कि यदि संत पतरस भी अब पोप होते, तो वे इससे बड़े अनुग्रह प्रदान नहीं कर सकते थे; यह संत पतरस के और पोप के विरुद्ध निन्दा है।

78. इसके विपरीत हम कहते हैं कि वर्तमान पोप के पास, वरन् किसी भी पोप के पास, इससे भी बड़े अनुग्रह उपलब्ध हैं; अर्थात् सुसमाचार, सामर्थ, चंगाई के वरदान, आदि, जैसा 1. में लिखा है।

79. यह कहना कि वह क्रूस, जिस पर पोप के राजचिह्न अंकित हैं, जिसे [पाप-क्षमा-पत्र प्रचारकों द्वारा] खड़ा किया जाता है, मसीह के क्रूस के समान मूल्य का है, निन्दा है।

80. जो बिशप, पल्ली-पुरोहित और धर्मशास्त्री ऐसी बातों को लोगों के बीच फैलने देते हैं, उन्हें इसका लेखा देना होगा। 81. पाप-क्षमा-पत्रों का यह उच्छृंखल प्रचार विद्वान पुरुषों के लिए भी यह सरल कार्य नहीं छोड़ता कि वे पोप के प्रति उचित सम्मान को निन्दा से, या यहाँ तक कि साधारण जनों के चतुर प्रश्नों से भी, बचाकर रख सकें।

82. अर्थात्:—“पोप पवित्र प्रेम के कारण और वहाँ की आत्माओं की घोर आवश्यकता के कारण शुद्धिकरण-स्थान को खाली क्यों नहीं कर देता, यदि वह गिरजाघर बनाने के लिए तुच्छ धन के कारण अनगिनत आत्माओं को छुड़ा लेता है? पहला कारण अत्यन्त न्यायसंगत होता; दूसरा अत्यन्त तुच्छ है।”

83. फिर:—“मृतकों के लिए अन्त्येष्टि और वार्षिक मिस्सा (मास) क्यों जारी रखे जाते हैं, और वह उनकी ओर से स्थापित दान-निधियों को क्यों नहीं लौटाता या उन्हें वापस लेने की अनुमति क्यों नहीं देता, जबकि छुड़ाए हुओं के लिए प्रार्थना करना अनुचित है?”

[अंग्रेज़ी] पाप-क्षमा-पत्रों के अधिकार और प्रभाव पर वाद-विवाद 84. फिर:—“परमेश्वर और पोप की यह कैसी नई भक्ति है, कि वे धन के लिए किसी अभक्त और अपने शत्रु मनुष्य को परमेश्वर के किसी मित्र की भक्त आत्मा को शुद्धिकरण-स्थान से मोल लेकर छुड़ाने की अनुमति देते हैं, और उस भक्त तथा प्रिय आत्मा की अपनी ही आवश्यकता के कारण, निष्कपट प्रेम के निमित्त उसे मुक्त क्यों नहीं कर देते?”

85. फिर:—“पश्चातापीय विधियाँ, जो वास्तव में और अप्रयोग के कारण बहुत समय से रद्द और मृत हो चुकी हैं, अब पाप-क्षमा-पत्र प्रदान करके इस प्रकार क्यों पूरी की जाती हैं, मानो वे अब भी जीवित और प्रभावी हों?”

86. फिर:—“पोप, जिसका धन आज सबसे धनवानों के धन से भी बढ़कर है, दरिद्र विश्वासियों के धन के बजाय अपने ही धन से संत पतरस के इस एक गिरजाघर को क्यों नहीं बना देता?”

87. फिर:—“पोप क्षमा किसे करता है, और जो लोग सिद्ध हृदय-पश्चाताप के द्वारा पूर्ण क्षमा और सहभागिता के अधिकारी हैं, उन्हें वह कौन-सी सहभागिता प्रदान करता है?”

88. फिर:—“कलीसिया के लिए इससे बड़ी आशीष और क्या हो सकती है कि पोप जो अब एक बार करता है, वही दिन में सौ बार करे, और हर विश्वासी को ये क्षमाएँ और सहभागिताएँ प्रदान करे?”

89. “चूँकि पोप अपने पाप-क्षमा-पत्रों के द्वारा धन के बजाय आत्माओं के उद्धार को ही खोजता है, तो वह पहले प्रदान किए गए पाप-क्षमा-पत्रों और क्षमाओं को स्थगित क्यों करता है, जबकि इनका प्रभाव समान है?”

90. साधारण जनों के इन तर्कों और शंकाओं को केवल बलपूर्वक दबा देना, और कारण देकर उनका समाधान न करना, कलीसिया और पोप को उनके शत्रुओं के उपहास के लिए खुला छोड़ देना है, और मसीहियों को दुःखी बना देना है।

91. अतः यदि पाप-क्षमा-पत्रों का प्रचार पोप की आत्मा और मनसा के अनुसार किया जाए, तो ये सब सन्देह सहज ही दूर हो जाएँगे; वरन् वे उत्पन्न ही न होंगे।

92. अतः दूर हों वे सब भविष्यद्वक्ता जो मसीह के लोगों से कहते हैं, “शान्ति, शान्ति,” जबकि शान्ति है ही नहीं!

93. धन्य हों वे सब भविष्यद्वक्ता जो मसीह के लोगों से कहते हैं, “क्रूस, क्रूस,” जबकि क्रूस है ही नहीं!

94. मसीहियों को यह उपदेश दिया जाना चाहिए कि वे दण्डों, मृत्युओं और नरक में से होकर अपने शिरोमणि मसीह का अनुसरण करने में तत्पर रहें; 95. और इस प्रकार शान्ति के निश्चय के द्वारा नहीं, बल्कि अनेक क्लेशों में से होकर स्वर्ग में प्रवेश करने का भरोसा रखें।

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