बोना और काटना · अध्याय 8

चेतावनी

यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

चेतावनी देना प्रेम का चिह्न है। माँ के समान कौन चेतावनी देता है, और माँ के समान कौन प्रेम करता है? कदाचित आपकी माँ अब नहीं रहीं, और आपके पिता भी चल बसे हैं। मुझे उन दिवंगत जनों का स्थान लेने दीजिए, और चेतावनी की आवाज़ उठाने दीजिए। पौलुस के साथ मैं भी कहना चाहता हूँ: “मैं तुम्हें लज्जित करने के लिये ये बातें नहीं लिखता, परन्तु अपने प्रिय बालक जानकर तुम्हें चिताता हूं।” कम्बरलैंड नदी में एक स्टीमर को धारा के साथ नीचे ले जाते हुए एक पायलट (मार्गदर्शक नाविक) ने संकरी धारा के बीचों-बीच एक रोशनी देखी, जो देखने में किसी छोटी नाव की लगती थी। उसके मन में आया कि उस संकेत की परवाह न करे और नाव को रौंदता हुआ निकल जाए। जब वह निकट पहुँचा, तो एक आवाज़ ने चिल्लाकर कहा: “दूर रहो, दूर रहो।” बड़े क्रोध में उसने उसे कोसा, जिसे वह अपने रास्ते में अड़ा हुआ कोई नाविक समझ रहा था। अगले घाट पर पहुँचने पर उसे पता चला कि पहाड़ से एक विशाल चट्टान टूटकर नदी की तली में आ गिरी थी, और आनेवाली नावों को उस अनजाने खतरे से सावधान करने के लिये वहाँ एक संकेत-दीप रखा गया था। हाय! बहुत से लोग परमेश्वर की चेतावनियों को इसी प्रकार लेते हैं, और जो कोई उन्हें उनके मार्ग की चट्टानों के बारे में बताता है, उस पर क्रोधित होते हैं। अन्त में वे इसे बेहतर समझेंगे। इस्राएल की सन्तान का

मूसा से बढ़कर सच्चा मित्र कोई न था। वे जब भी भटके, उसने उन्हें चेतावनी दी; और उन पर विपत्ति तभी आई जब उसकी चेतावनियों की अनसुनी की गई। एलिय्याह अहाब का सबसे अच्छा मित्र था। काश, मैं भी वैसे ही चेतावनी दे पाता जैसे यीशु मसीह ने दी! जब वह जैतून के पहाड़ पर चढ़ रहा था, तो उसका हृदय बहुत द्रवित हुआ जान पड़ता था, और उसने पुकारकर कहा, “हे यरूशलेम, हे यरूशलेम! तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्हें पत्थरवाह करता है, कितनी ही बार मैं ने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठे करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठा कर लूं, परन्तु तुम ने न चाहा!” क्या उसने चेतावनी नहीं दी? यदि मेरा कोई मित्र किसी निकम्मी चाँदी की खान में पूँजी लगाने जा रहा हो, तो क्या आप सोचते हैं कि यदि मैं उसे इसके विरुद्ध सावधान न करूँ, तो मैं उसके प्रति सच्चा ठहरूँगा? और यदि मैं उसे ऐसे कामों के विरुद्ध चेतावनी देता हूँ जो दुःख और निराशा की फसल लाएँगे, तो क्या इससे उसके प्रति मेरा प्रेम कम प्रकट होता है? “तब जो कोई नरसिंगे का शब्द सुनने पर भी सावधान न हो और तलवार के चलने से मर जाए, उसका खून उसी के सिर पड़ेगा। उस ने नरसिंगे का शब्द सुना, परन्तु सावधान न हुआ; सो उसका खून उसी को लगेगा। परन्तु यदि वह सावधान हो जाता, तो अपना प्राण बचा लेता।” निश्चित कर लीजिए कि जो बीज आप बो रहे हैं, वह अच्छा बीज है। शरीर के लिये बोइए, तो अच्छी फसल असम्भव होगी। यदि अच्छे बीज और बुरे बीज को साथ-साथ बढ़ने दिया जाए, तो दोनों सफल नहीं हो सकते। एक दूसरे की कीमत पर फलता-फूलता है; और सम्भावना यही है कि बुरा बीज

ही हावी हो जाएगा। जंगली घास सदा अच्छे बीज की अपेक्षा अधिक तेज़ी से उगती और फैलती दिखाई देती है। वह जितने अधिक समय तक जीवित रहती है, उतनी ही दृढ़ता से उसकी जड़ें जमती जाती हैं। देर करना खतरनाक है। सन् 1691 में स्कॉटलैंड के हाइलैंड्स में एक घोषणा भेजी गई कि जो कोई भी स्थापित सरकार के विरुद्ध विद्रोह का दोषी रहा हो, उसे क्षमा कर दिया जाएगा, यदि वह वर्ष के अन्तिम दिन से पहले अपने हथियार डाल दे और विद्रोह बन्द करने की प्रतिज्ञा करे। बहुतों ने ऐसा ही किया; परन्तु मैकलैन नाम का एक सरदार सप्ताह-दर-सप्ताह अधीनता स्वीकार करना टालता रहा, यद्यपि उसका इरादा सदा यही रहता था कि बहुत देर होने से पहले वह अधीन हो जाएगा। परन्तु जब अन्ततः वह क्षमा स्वीकार करने के लिये निकला, तो एक बड़े तूफ़ान ने उसका रास्ता रोक लिया, और वह तब पहुँचा जब समय बीत चुका था। क्षमा का दिन बीत चुका था और पलटा लेने का दिन आ पहुँचा था; मैकलैन और उसके आदमी मार डाले गए। इसलिये बुद्धिमानी इसी में है कि जंगली घास को तुरन्त जड़ से मिटा दिया जाए। और पाप में अधिक समय तक बने रहने से सावधान रहिए। आप जितने गहरे धँसेंगे, आपका फिर से सुधरना उतना ही कड़वा होगा। क्यों अपने विवेक को दागते रहें, और और भी तीखे पछतावे के बीज बोते रहें? चाहे यह कितना ही पीड़ादायक क्यों न हो, पाप से तुरन्त नाता तोड़ लीजिए। प्रायः कठोर शल्य-क्रियाएँ आवश्यक होती हैं, क्योंकि कुशल शल्य-चिकित्सक जानता है कि रोग केवल ऊपर से लेप लगाने से ठीक नहीं हो सकता। किसान अपनी कुदाल, अपना फावड़ा और अपनी कुल्हाड़ी लेता है, और उन हानिकारक पौधों को काट डालता है, और उनकी जड़ों को आग से जलाकर भूमि में से मिटा देता है। यदि तेरी दाहिनी आंख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे; क्योंकि तेरे लिये यही भला है कि तेरे अंगों में से एक

नाश हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए। और यदि तेरा दाहिना हाथ तुझे ठोकर खिलाए, तो उसको काटकर अपने पास से फेंक दे, क्योंकि तेरे लिये यही भला है, कि तेरे अंगों में से एक नाश हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए। स्मरण रखिए कि यदि पहले नहीं, तो न्याय के दिन तो जंगली दाने और गेहूँ अलग किए ही जाएँगे। शरीर के लिये बोना और आत्मा के लिये बोना अनिवार्य रूप से अलग-अलग दिशाओं में जानेवाले मार्गों पर ले जाते हैं। कुल्हाड़ा पेड़ों की जड़ पर रखा जाएगा, और जो जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में झोंका जाएगा। खलिहान अच्छी रीति से साफ किया जाएगा, और गेहूँ खत्ते में इकट्ठा किया जाएगा, परन्तु भूसी उस आग में जलाई जाएगी जो बुझने की नहीं। अपनी आदतों से सावधान रहिए। हाल ही के एक लेखक ने कहा है: “यदि युवा लोग केवल यह समझ पाते कि वे कितनी जल्दी आदतों के चलते-फिरते गट्ठर मात्र बन जाएँगे, तो जब तक वे ढलने योग्य अवस्था में हैं, तब तक वे अपने आचरण पर अधिक ध्यान देते। हम अपना भाग्य आप ही कात रहे हैं, भला या बुरा, और वह फिर कभी उधेड़ा नहीं जा सकता। सद्गुण या दुर्गुण का हर छोटे से छोटा प्रहार अपना कुछ न कुछ निशान, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, छोड़ जाता है। जेफ़रसन के नाटक में पियक्कड़ रिप वैन विंकल हर नई चूक के लिये यह कहकर अपने को निर्दोष ठहरा लेता है, ‘इस बार मैं इसे नहीं गिनूँगा।’ अच्छा, वह चाहे इसे न गिने, और दयालु स्वर्ग भी चाहे इसे न गिने, फिर भी इसकी गिनती तो हो ही रही है। उसकी तंत्रिका-कोशिकाओं और तंतुओं के भीतर अणु इसे गिन रहे हैं, दर्ज कर रहे हैं और संचित कर रहे हैं, ताकि जब अगली परीक्षा आए, तब इसे उसके विरुद्ध काम में लाया जाए।

हम जो कुछ भी करते हैं, उसमें से कुछ भी, कड़े वैज्ञानिक अर्थ में, कभी मिटता नहीं। निःसन्देह, इसका एक अच्छा पक्ष भी है और एक बुरा पक्ष भी। जैसे हम इतने सारे अलग-अलग घूँटों के द्वारा पक्के पियक्कड़ बन जाते हैं, वैसे ही हम इतने सारे अलग-अलग कामों और परिश्रम के घंटों के द्वारा नैतिक क्षेत्र में संत, और व्यावहारिक तथा वैज्ञानिक क्षेत्रों में अधिकारी विद्वान और विशेषज्ञ बन जाते हैं।” परीक्षाओं से सावधान रहिए। हमारे प्रभु ने हमें यह प्रार्थना करना सिखाया: “हमें परीक्षा में न ला”; और फिर उसने कहा, “जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो, कि तुम परीक्षा में न पड़ो।” हम स्वभाव से निर्बल और पापी हैं, और हमारे लिये यह कहीं अधिक अच्छा है कि परीक्षा के हम पर आ पड़ने के बाद उसका सामना करने की शक्ति माँगने के बजाय हम उससे छुटकारे के लिये प्रार्थना करें। रोकथाम इलाज से बेहतर है। मिट्टी के नीचे वासना और दुष्टता के ऐसे बीज छिपे हो सकते हैं जो बस अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि फूट निकलें। जवान लोग बहाना बनाते हैं कि जीवन के दोनों पहलू देखना आवश्यक है। कैसी मूर्खता! मुझसे यह अपेक्षा नहीं की जाती कि यह देखने के लिये कि वह जलेगा या नहीं, मैं अपना हाथ आग में डालूँ। मिसिसिपी नदी में एक स्टीमबोट फँस गई, और कप्तान उसे निकाल नहीं पा रहा था। आख़िरकार रूखा-सा दिखनेवाला एक आदमी जहाज़ पर आया और बोला: “कप्तान, मैंने सुना है कि आपको इस मुसीबत से निकालने के लिये एक पायलट चाहिए?” कप्तान ने कहा, “क्या तुम पायलट हो?” “ख़ैर, लोग मुझे पायलट कहते हैं।” “क्या तुम जानते हो कि पानी में डूबे ठूँठ और रेत के टीले कहाँ-कहाँ हैं?” “नहीं, साहब।”

“तो फिर, यदि तुम यह नहीं जानते कि ठूँठ और रेत के टीले कहाँ हैं, तो तुम मुझे यहाँ से कैसे निकालने की आशा रखते हो?” उत्तर मिला, “मैं यह जानता हूँ कि वे कहाँ नहीं हैं!” जब बच्चे छोटे ही हों, तभी अच्छा बीज बोना आरम्भ कीजिए, और इस प्रकार जंगली घास को जड़ पकड़ने से रोकिए। शैतान उनके बड़े होने तक प्रतीक्षा नहीं करता, और हमें भी नहीं करनी चाहिए। मछली पकड़ने के बहुत से जाल इस प्रकार बनाए जाते हैं कि उनमें केवल पूरी बढ़ी हुई मछलियाँ ही पकड़ी जाएँ और छोटी, कच्ची मछलियाँ निकल भागें। शैतान के पास ऐसा कोई जाल नहीं है। वह सबसे निर्बल और सबसे छोटे को पकड़ता है। एक युवा संडे स्कूल शिक्षक ने कहा, “हमें अपने लड़कों की देखभाल करनी चाहिए, नहीं तो शैतान करेगा।” वृद्ध अधीक्षक ने उत्तर दिया, “शैतान तो हर हाल में उनकी देखभाल करेगा। चाहे हम उनकी उपेक्षा करें, शैतान उनकी उपेक्षा नहीं करेगा।” हमें यह विश्वास दिला देना कि बच्चे धर्म को नहीं समझ सकते, शैतान की एक बड़ी करामात है। यदि मसीह जानता कि बालक उसकी बातों को समझने के योग्य नहीं, तो क्या वह एक बालक को विश्वास का आदर्श ठहराता? बड़ों की अपेक्षा बच्चों के लिये प्रेम और भरोसा करना कहीं अधिक सरल है, इसलिये हमें मसीह को उनके सामने उनके चुनाव के सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में रखना चाहिए। अवसरों की उपेक्षा मत कीजिए। नेपोलियन कहा करता था: “हर युद्ध में एक निर्णायक घड़ी आती है—दस या पन्द्रह मिनट की—जिस पर युद्ध का परिणाम निर्भर करता है। इसे पा लेना विजय है; इसे खो देना पराजय है।” पाप से सावधान रहिए। उसकी मज़दूरी मृत्यु है, और (जैसा कहा गया है)

यह मज़दूरी कभी घटाई नहीं गई। पाप मनुष्यों को इस विषय में धोखा देता है कि उसमें कितनी तृप्ति मिलेगी, उसके लिये कौन-कौन से बहाने बनाए जा सकते हैं, और उसके बाद आनेवाला दण्ड कितना निश्चित है। यदि वह धोखा देनेवाला न होता, तो कभी आनन्ददायक न लगता। वह निर्दोष रूप धरकर आता है, और जीवन का लहू चूस लेता है, और मनुष्य से भलाई करने की नैतिक क्षमता छीन लेता है। कैनन विल्बरफ़ोर्स स्काई द्वीप पर टहल रहे थे, तब उन्होंने एक शानदार सुनहरे उकाब को ऊपर की ओर उड़ते देखा। वे रुककर उसकी उड़ान देखने लगे। शीघ्र ही उन्होंने देखा कि कुछ गड़बड़ है। वह गिरने लगा, और थोड़ी ही देर में उनके पैरों के पास मरा पड़ा था। उसकी मृत्यु का कारण जानने को उत्सुक होकर उन्होंने उसकी जाँच की, और उस पर गोली के घाव का कोई चिह्न न पाया; परन्तु उन्होंने उसके पंजों में एक छोटा सा नेवला (वीज़ल) देखा, जिसे उकाब ने उड़ान में अपने शरीर से सटा लिया था, और उसी ने उकाब की छाती से जीवन का लहू चूस लिया था। जो कोई हठपूर्वक पाप से चिपका रहता है, उसका अन्त ऐसा ही होता है। इस संसार के आकर्षण से धोखा न खाइए। यह आपको छलेगा और आपको नष्ट कर देगा। “द रेडाउटेबल” एक फ़्रांसीसी जहाज़ का नाम था जिसे लॉर्ड नेल्सन ने दो बार नष्ट होने से बचा लिया था; और उसी जहाज़ के रस्सों और मस्तूलों पर से वह घातक गोली चलाई गई जिसने उनकी जान ले ली। शैतान बहुत से पाप मधु में मिलाकर पिलाता है; परन्तु उसमें विष मिला होता है। सबसे सच्चे आनन्द धार्मिकता के अच्छे बीज से उपजते हैं—और कोई भी लाभदायक नहीं। अज्ञान और उदासीनता से सावधान रहिए। आप अपने प्राण की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकते। दाँव पर बहुत कुछ लगा है। मैंने किसी आलसी मनुष्य का कभी मन फिरते नहीं देखा।

जब तक वह जाग न उठे और अपनी खोई हुई और आशाहीन दशा को पहचान न ले, तब तक सर्वशक्तिमान परमेश्वर नीचे हाथ बढ़ाकर उसका हाथ नहीं थामेगा। एक बार समुद्र में एक जहाज़ बड़े खतरे में था, और एक मनुष्य को छोड़ सब घुटनों पर थे। उन्होंने उसे पुकारा कि आकर प्रार्थना में उनका साथ दे, परन्तु उसने उत्तर दिया: “मैं नहीं; जहाज़ की देखभाल करना तुम्हारा काम है। मैं तो केवल एक यात्री हूँ।” स्मरण रखिए कि केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। बहुत से मनुष्य सुसमाचार के उपदेशों और प्रतिज्ञाओं को

कंठस्थ जानते हैं, जिन्हें फिर भी

उद्धार देनेवाले अनुग्रह ने छुआ तक नहीं। ज्ञान प्रायः व्यर्थ, या सीधे हानिकारक होता है; हमें जिसकी आवश्यकता है वह यह है कि हम परमेश्वर की इच्छा को जानें और उसका पालन करें। अच्छे संकल्प भी पर्याप्त नहीं हैं। इसमें सन्देह नहीं कि अपने ढंग से वे सहायक होते हैं, परन्तु बाइबल हमें यह विश्वास करने की ओर नहीं ले जाती कि वे किसी मनुष्य का उद्धार कर सकते हैं। वह यह नहीं कहती: “जितनों ने उसे ग्रहण करने का संकल्प किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास करने का संकल्प करते हैं”; वह कहती है: “जितनों ने उसे ग्रहण किया * * * उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।” चौकस रहिए! निरन्तर पहरा देने की आवश्यकता है, कहीं ऐसा न हो कि हम पाप में गिर पड़ें। जब आक्रमण की आशंका थी, तब एक समझदार अफ़सर ने आदेश दिया, “आज रात उस स्थान पर दोहरा पहरा बैठाओ।” अच्छी से अच्छी दशा में भी गेहूँ के बीच कुछ जंगली दाने होंगे। हम सब अपने साथ ऐसी सामग्री लिये फिरते हैं जिस पर शैतान काम कर सकता है। पौलुस ने कहा: “क्योंकि मैं जानता हूं, कि मुझ में अर्थात मेरे शरीर में

कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती, इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझ से बन नहीं पड़ते। क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूं, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता, वही किया करता हूं। परन्तु यदि मैं वही करता हूं, जिस की इच्छा नहीं करता, तो उसका करनेवाला मैं न रहा, परन्तु पाप जो मुझ में बसा हुआ है। सो मैं यह व्यवस्था पाता हूं, कि जब भलाई करने की इच्छा करता हूं, तो बुराई मेरे पास आती है। क्योंकि मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूं। परन्तु मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था दिखाई पड़ती है, जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है, और मुझे पाप की व्यवस्था के बन्धन में डालती है जो मेरे अंगों में है। मैं कैसा अभागा मनुष्य हूं! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” परमेश्वर धन्य हो, वह यह भी जोड़ सका: “मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं।” परमेश्वर ने जो निर्णय का प्रश्न हमारे सामने रखा है, वह बिलकुल स्पष्ट है: “जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्वर का क्रोध उस पर रहता है।” कोई बीच का मार्ग नहीं है—“जो विश्वास करता है”—“जो नहीं मानता।” वह चुनाव हम पर छोड़ता है, और उत्तरदायित्व हम ही पर है। इसे चुनने में आपको बहुत से त्याग करने पड़ सकते हैं, और हृदय के बहुत से तार खिंचकर टूट सकते हैं, परन्तु मैं आपसे विनती करता हूँ कि आप अभी यह निर्णायक कदम उठाएँ। आपके प्राण का उद्धार अन्य सब बातों से बढ़कर भारी है। क्या आप किसी वर्तमान लाभ या सुख के लिये अपनी अनन्तता को जोखिम में डालेंगे? अपना सिर झुकाइए और कहिए: “हे स्वर्गीय पिता, मैं अब एक दीन, गिड़गिड़ानेवाले पापी के रूप में तेरे पास आना चुनता हूँ। मैं तेरे पुत्र पर विश्वास करता हूँ, जिसे तू ने

मेरा उद्धारकर्ता होने के लिये भेजा; और उसके लहू के गुणों पर भरोसा रखते हुए, जो मेरे पापों के प्रायश्चित के लिये बहाया गया, मैं पापों की क्षमा के निश्चय में विश्राम पाता हूँ।” सबसे नीच पापी के लिये भी आशा है। जहाँ कहीं जंगली घास उगती है, वहाँ अच्छे बीज के उगने की सम्भावना भी है। आपकी आवश्यकता जितनी बड़ी है, यीशु के पास आपका स्वागत उतना ही अधिक होगा। घमण्डी और आत्म-निर्भर लोगों को वह दूर ही से पहिचानता है, परन्तु टूटे मनवाले पापी की सबसे धीमी फुसफुसाहट भी उसका ध्यान खींच लेती है। हमारे प्रभु ने हमें चुनाव में सहायता के लिये एक सरल कसौटी दी। उसने कहा, “हर एक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है। कोई अच्छा पेड़ नहीं, जो निकम्मा फल लाए, और न तो कोई निकम्मा पेड़ है, जो अच्छा फल लाए।” हम में से बहुतों के पास उलझे हुए तर्कों को सुलझाने या गूढ़ सिद्धान्तों को समझने का न समय है न योग्यता। सत्य के कुछ पहलू प्रायः साधारण बुद्धि की पहुँच से बाहर होते हैं। परन्तु मसीह ने जो कसौटी दी, वह छोटी और व्यावहारिक है, और हम में से किसी की भी पहुँच के भीतर है। एक मिशनरी ने एक चीनी व्यक्ति से, जिसे उसने पहले अपने मिशन में नहीं देखा था, पूछा, “क्या तुमने कभी सुसमाचार सुना है?” उसने उत्तर दिया, “नहीं, परन्तु मैंने उसे देखा है। मैं एक मनुष्य को जानता हूँ जो अपने पड़ोस में आतंक बना हुआ था। वह बुरी तरह अफ़ीम पीता था और जंगली पशु के समान खतरनाक था; परन्तु वह पूरी तरह बदल गया। अब वह नम्र और भला है और उसने अफ़ीम छोड़ दी है।” इस कसौटी को नास्तिकता पर लागू कीजिए। उसके फल क्या हैं? उसके पीछे-पीछे अपराध चले आते हैं। समाज अस्त-व्यस्त हो जाता है। शुद्ध चरित्र, ईमानदारी और अन्य सद्गुणों की नींव खोखली हो जाती है। सारा जीवन मुरझा जाता है।

इंग्लैंड के एक कारागार में लिखे गए एक पत्र का यह छोटा सा अंश उस विश्वास-प्रणाली पर एक ज़बरदस्त अभियोग है जो परमेश्वर को स्वीकार नहीं करती: “मैं तेरह नास्तिकों में से एक हूँ। मेरे मित्र कहाँ हैं? चार को फाँसी दी जा चुकी है। एक मसीही बन गया। छः को अलग-अलग अवधि के कारावास का दण्ड मिला है, और एक इस समय ठीक मेरे सिर के ऊपरवाली कोठरी में बन्द है, जिसे आजीवन कारावास का दण्ड मिला है।” पूरी श्रद्धा के साथ हम इस वचन को स्वयं अपने प्रभु पर भी लागू कर सकते हैं। इसके लिये हमारे पास उसी का अधिकार है। एक अवसर पर जब यहूदियों ने उसके कामों में दोष निकाला, तो उसने कहा: “जो काम पिता ने मुझे पूरा करने को सौंपा है अर्थात यही काम जो मैं करता हूं, वे मेरे गवाह हैं, कि पिता ने मुझे भेजा है।” एक और अवसर पर उन्होंने उसे आ घेरा और पूछा, “तू हमारे मन को कब तक दुविधा में रखेगा? यदि तू मसीह है, तो हम से साफ कह दे।” यीशु ने उत्तर दिया: “मैं ने तुम से कह दिया, और तुम प्रतीति करते ही नहीं। जो काम मैं अपने पिता के नाम से करता हूं, वे ही मेरे गवाह हैं। * * * यदि मैं अपने पिता का काम नहीं करता, तो मेरी प्रतीति न करो। परन्तु यदि मैं करता हूं, तो चाहे मेरी प्रतीति न भी करो, परन्तु उन कामों की तो प्रतीति करो, ताकि तुम जानो, और समझो, कि पिता मुझ में है, और मैं पिता में हूं।” सरदार नीकुदेमुस ने ठीक ही कहा, “हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।” और पतरस ने भी: “हे इस्राएलियो, ये बातें सुनो: कि यीशु नासरी एक मनुष्य था जिस का परमेश्वर की ओर से होने का प्रमाण उन सामर्थ के कामों

और आश्चर्य के कामों और चिन्हों से प्रगट है, जो परमेश्वर ने तुम्हारे बीच उसके द्वारा कर दिखलाए, जिसे तुम आप ही जानते हो।” फ़िज़ूलख़र्ची के, घमण्ड के, लोभ के फल क्या हैं? और दूसरी ओर, प्रार्थना के, परमेश्वर का भय मानने और उसकी आज्ञाओं का पालन करने के फल क्या हैं? अन्यजातियों की मूर्तिपूजा के फल क्या हैं? अफ़्रीका और चीन और भारत और समुद्र के द्वीपों को देखिए, जहाँ काठ और पत्थर के देवता हैं। उन लोगों की बुद्धि और नैतिक बोध कैसा होगा जो ऐसी वस्तुओं की उपासना करते हैं? गैर-मसीही धर्मों में से सबसे अच्छा धर्म भी सदा असफल ही सिद्ध होगा। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि अन्यजाति दार्शनिकों के लेखों में बहुत से ऊँचे से ऊँचे सद्गुणों की शिक्षा दी गई है। और हो भी कैसे सकता था कि ऐसा न हो? नैतिकता मानवता के समान ही सार्वभौमिक है, और यह स्वाभाविक ही है कि यहाँ-वहाँ कोई विचारक सामान्य स्तर से आगे बढ़कर नीतिशास्त्र के मूल सत्यों की गहराई में उतर जाए। मेरे विचार में यह तथ्य केवल मानवीय और ईश्वरीय के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध को ही प्रमाणित करता है। मसीही धर्म ने कभी यह दावा नहीं किया कि वह नैतिकता की एक बिलकुल नई प्रणाली लेकर आया है। एक दूसरे विषय के सम्बन्ध में मसीह ने कहा: “यह न समझो, कि मैं व्यवस्था या भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूं; लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूं।” और इसलिये उसकी अपनी शिक्षा-प्रणाली की परिपूर्णता और सिद्धता में बहुत से ऐसे सिद्धान्तों का समाविष्ट होना अनिवार्य था जो अन्यजातियों की नैतिकता में पहले ही प्रकट हो चुके थे। परन्तु हमारे उद्धारकर्ता के हाथों में वे और अधिक व्यापक, और अधिक उज्ज्वल, और सामर्थ तथा अर्थ से और अधिक परिपूर्ण हो गए।

क्या ये गैर-मसीही धर्म इस कसौटी पर खरे उतरेंगे? स्तोइकी मत कदाचित यूनानी दर्शनों में सबसे उदात्त था, परन्तु वह शीघ्र ही पूरी निंदकता में बदल गया, और उसकी परिणति इस दावे में हुई कि सद्गुण को प्राप्त करना असम्भव है। इपिकूरी मत का आरम्भ तो ठीक-ठाक हुआ, परन्तु उसके संस्थापक के मरने से पहले ही उसने अपने लिये यह अपमानजनक उपाधि कमा ली कि वह केवल सूअरों के योग्य सिद्धान्त है। बौद्ध धर्म को देखिए, उसके घृणित अनुष्ठानों और क्रूर यातनाओं के साथ। ये सब प्रणालियाँ सिद्धान्त और व्यवहार के बीच संघर्ष प्रकट करती हैं। वे अपने उद्देश्य में असफल रहीं, क्योंकि उन्होंने कठिनाई को गलत ओर से पकड़ा। वे डालियों को छाँटती रहीं, यह न पहचानते हुए कि पेड़ भीतर से ही सड़ा हुआ है। केवल मसीही धर्म ही मनुष्य को गड्ढे में से उठाने की कसौटी पर खरा उतरेगा। और वह ऐसा कैसे करना चाहता है? खतरे और आवश्यकता को छोटा बताकर नहीं। वह कहता है: “सिर घावों से भर गया, और हृदय दुःख से भर गया है। नख से सिर तक कहीं भी कुछ आरोग्यता नहीं, केवल चोट और कोड़े की मार के चिन्ह और सड़े हुए घाव हैं।” वह पहली आवश्यकता के रूप में नये जन्म की, अर्थात पवित्र आत्मा के द्वारा नये सिरे से जन्म लेने की, माँग करता है। “तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।” वह पवित्रीकरण को धर्मी ठहराए जाने से पहले नहीं रखता, परन्तु पहले ऊपर से जीवन प्रदान करके, वह छुड़ाए हुए पापी को मसीह के प्रेम से और पवित्र आत्मा की संगति और मार्गदर्शन से घेर लेता है। मन फिराए हुए एक चीनी व्यक्ति ने एक बार कहा: “मैं एक गहरे गड्ढे में पड़ा था, आधा कीचड़ में धँसा हुआ, और पुकार रहा था कि कोई

मुझे बाहर निकालने में मेरी सहायता करे। जब मैंने ऊपर देखा, तो एक आदरणीय, पके बालोंवाले मनुष्य को नीचे मेरी ओर देखते पाया। ‘मेरे पुत्र,’ उसने कहा, ‘यह तो बड़ी भयानक जगह है।’ ‘हाँ,’ मैंने उत्तर दिया, ‘मैं इसमें गिर पड़ा; क्या आप मुझे बाहर निकलने में सहायता नहीं कर सकते?’ “‘मेरे पुत्र,’ उसका उत्तर था, ‘मैं कन्फ़्यूशियस हूँ। यदि तुमने मेरी पुस्तकें पढ़ी होतीं और उनकी शिक्षा पर चले होते, तो तुम यहाँ कभी न होते।’ “‘हाँ, पिता,’ मैंने कहा, ‘परन्तु क्या आप मुझे बाहर निकलने में सहायता नहीं कर सकते?’ “मैं देख ही रहा था कि वह चला गया। शीघ्र ही मैंने एक और आकृति को आते देखा, और एक दूसरा मनुष्य मेरे ऊपर झुका, इस बार आँखें बन्द किए और हाथ बाँधे हुए। वह मानो किसी दूर स्थान की ओर देख रहा था। “‘मेरे पुत्र,’ बुद्ध ने कहा, ‘बस अपनी आँखें बन्द कर लो और हाथ बाँध लो, और अपने बारे में सब कुछ भूल जाओ। विश्राम की अवस्था में आ जाओ। किसी ऐसी बात के बारे में मत सोचो जो तुम्हें विचलित कर सके। इतने शान्त हो जाओ कि कोई भी वस्तु तुम्हें हिला न सके। तब, मेरे बच्चे, तुम भी मेरी तरह ऐसे मधुर विश्राम में होगे।’ “‘हाँ, पिता,’ मैंने उत्तर दिया, ‘जब मैं भूमि के ऊपर पहुँच जाऊँगा, तब ऐसा ही करूँगा। क्या आप मुझे बाहर निकलने में सहायता नहीं कर सकते?’ परन्तु बुद्ध भी चला गया। “मैं निराशा में डूबने ही लगा था कि मैंने अपने ऊपर एक और आकृति देखी, जो दूसरों से भिन्न थी। उसके चेहरे पर दुःख सहने के चिह्न थे। मैंने उसे पुकारा: “‘हे पिता! क्या आप मेरी सहायता कर सकते हैं?’ “‘मेरे बच्चे,’ उसने कहा, ‘क्या बात है?’

“इससे पहले कि मैं उसे उत्तर दे पाता, वह नीचे कीचड़ में मेरे पास आ पहुँचा था। उसने अपनी बाँहें मेरे चारों ओर डालकर मुझे ऊपर उठा लिया; फिर उसने मुझे खिलाया और मुझे विश्राम दिया। जब मैं स्वस्थ हो गया, तो उसने यह नहीं कहा: ‘अब फिर ऐसा मत करना,’ परन्तु उसने कहा: ‘अब हम साथ-साथ चलेंगे’; और हम आज के दिन तक साथ-साथ चलते आ रहे हैं।” यह एक गरीब चीनी व्यक्ति का प्रभु यीशु के करुणामय प्रेम और सहायता का वर्णन करने का ढंग था। कुछ समय पहले मैं एक जवान के बारे में पढ़ रहा था जो अभी-अभी एक शराबख़ाने से निकलकर अपने घोड़े पर सवार हुआ था। जब एक डीकन गिरजाघर की ओर जाते हुए वहाँ से निकला, तो वह उसके पीछे हो लिया और बोला, “डीकन, क्या आप बता सकते हैं कि नरक यहाँ से कितनी दूर है?” डीकन का हृदय यह सोचकर दुःखी हुआ कि ऐसा एक जवान इतनी हल्की बात करे; वह आगे बढ़ गया और कुछ न बोला। जब वह मोड़ घूमकर गिरजाघर के पास पहुँचा, तो उसने पाया कि घोड़े ने उस जवान को पटक दिया था, और वह मर चुका था। इसी प्रकार आप भी जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक न्याय के दिन के निकट हो सकते हैं। जब मैं बहुत वर्ष पहले स्विट्ज़रलैंड में था, तब मैंने इस विषय में कुछ गम्भीर पाठ सीखे कि मृत्यु कितनी अचानक हम पर आ पड़ सकती है। मैंने कई ऐसे स्थान देखे जहाँ भूस्खलन हुए थे और पूरे-पूरे गाँव पूरी तरह नष्ट हो गए थे; या जहाँ हिमस्खलन पहाड़ों की ढलानों पर से नीचे बह आए थे और अपने पीछे विनाश छोड़ गए थे। सन् 1806 में गोल्डाउ नामक एक गाँव पर, जो रॉसबर्ग पर्वत की तलहटी में एक उपजाऊ घाटी में बसा था, एक भयानक विपत्ति आई। उस वर्ष

मौसम असामान्य रूप से गीला रहा था, और इस कारण फसलें और भी भरपूर हुई थीं। एक दिन तड़के एक जवान किसान एक बूढ़े की झोंपड़ी के पास से निकला, जिसे वह जानता था, और उसने उसे सूरज की पूरी धूप में द्वार पर बैठे देखा। उसने कहा, “सुप्रभात, पड़ोसी; लगता है आज दिन अच्छा रहेगा।” बूढ़ा बड़बड़ाया, “अब तो अच्छा दिन होना ही चाहिए; इधर बहुत दिनों से बारिश ही बारिश हो रही है।” दूसरे ने कहा, “क्या आपने वह खबर सुनी? जो लोग आज सबसे सवेरे उठे थे, वे कहते हैं कि उन्होंने बूढ़े रॉसबर्ग की चोटी को हिलते देखा।” बूढ़े ने कहा, “सच! हो सकता है। मेरी बात याद रखना, और यह मैं पहले भी बहुत बार कह चुका हूँ; मैं तो इसे देखने को जीवित नहीं रहूँगा, परन्तु जो अभी जवान हैं, वे मेरी आयु तक पहुँचने से पहले ही देखेंगे कि उस पहाड़ की चोटी उसी के पैरों में पड़ी है।” जवान ने कहा, “मैं आशा करता हूँ कि यह मेरे जीते जी न हो”; और वह आगे बढ़ गया, यह तनिक भी न सोचते हुए कि वह भविष्यवाणी पूरी होने के कितने निकट थी, और कि अनाज के पकते हुए खेत और रसीले अंगूरों के भरपूर गुच्छे कभी इकट्ठे न किए जाएँगे; परन्तु हुआ ऐसा ही। पहाड़ के भीतर के जल-स्रोत अत्यधिक वर्षा से आवश्यकता से अधिक भर गए थे, और उन्होंने सतह की ओर और नीचे घाटी की ओर अपना रास्ता बनाते हुए गोल चट्टानों के उन ढेरों को ढीला कर दिया था जो एक प्रकार की चिकनी मिट्टी से आपस में जुड़े हुए थे; पहाड़ का ऊपरी भाग इसी सामग्री से बना था। अन्त में ये विशाल ढेर खिसक गए

और सिर के बल घाटी में आ गिरे, और पूरे गाँव को और उसके लगभग आठ सौ निवासियों को अपने बोझ के नीचे दबा दिया। परन्तु उस बूढ़े का क्या हुआ? हाय! वह नहीं बचा। वह विश्वास तो करता था कि पहाड़ गिरेगा, परन्तु उसने यह नहीं सोचा था कि वह गिरना इतना निकट है। वह अपनी झोंपड़ी में बैठा आराम से अपना पाइप पी रहा था, जब वह जवान जल्दी-जल्दी लौटकर आया और चिल्लाया: “पहाड़ गिर रहा है!” बूढ़ा आराम से अपनी जगह से उठा, द्वार से बाहर झाँका, और यह कहते हुए: “मेरे पास अपना पाइप फिर से भरने का समय है,” वापस अपने घर में चला गया। जवान बच गया। बूढ़ा अपनी झोंपड़ी से निकलने से पहले ही नाश हो गया; झोंपड़ी और उसका स्वामी दोनों कुचल दिए गए, और बहकर घाटी की तली में जा पहुँचे। सन् 1881 में मैं इंग्लैंड के उत्तर में था, जब देश के उस भाग पर एक भयंकर तूफ़ान आया। मेरे एक मित्र आयमाउथ में पादरी थे, और उस स्थान के बहुत से मछुए उनकी मंडली में थे। मौसम बहुत तूफ़ानी रहा था, और मछुए एक सप्ताह से बन्दरगाह में ही रुके हुए थे। परन्तु एक दिन साफ़ नीले आकाश में सूरज चमक उठा; ऐसा लगा मानो तूफ़ान टल गया हो, और नावें मछली पकड़ने के स्थान की ओर चल पड़ीं। उस दिन इकतालीस नावें बन्दरगाह से निकलीं। उनके चलने से पहले बन्दरगाह-अधिकारी ने तूफ़ान का संकेत फहराया, और उन्हें आनेवाली आँधी के बारे में चेतावनी दी। उसने उनसे विनती की कि न जाएँ; परन्तु उन्होंने उसकी चेतावनी की उपेक्षा की, और वे

चल

पड़े। उन्हें आनेवाले तूफ़ान का कोई चिह्न दिखाई न दिया। परन्तु कुछ ही घंटों में वह उस तट पर टूट पड़ा, और उन मछुओं में से बहुत थोड़े लौटे। हर नाव में पाँच या छः आदमी थे, और उस भयानक आँधी में लगभग सब के सब नाश हो गए। मेरे मित्र जिस कलीसिया के पास्टर थे, उसमें, मेरे विचार से, केवल तीन पुरुष सदस्य बचे। वे लोग अनन्तता में पहुँचा दिए गए, क्योंकि उन्होंने चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया। मैं अभी तूफ़ान का संकेत फहराता हूँ, और आपको चेतावनी देता हूँ कि आनेवाले न्याय से बच निकलिए! बहुत वर्ष पहले एक बड़ी मुख्य रेल-लाइन के पास एक मनुष्य रहता था, जिसने एक रात देखा कि भूस्खलन ने पटरी को रोक दिया है। घड़ी देखकर उसने जाना कि रात की एक्सप्रेस को रुकवाने के लिये तार-घर तक पहुँचने का समय उसके पास नहीं है, इसलिये उसने एक लालटेन उठाई और पटरी के सहारे दौड़ पड़ा, यह सोचकर कि शायद वह रेलगाड़ी को रोकने के लिये समय पर पहुँच जाए। दौड़ते हुए वह गिर पड़ा और उसकी बत्ती बुझ गई। उसके पास दूसरी दियासलाई न थी, और उसे दूर से रेलगाड़ी के आने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। उसकी समझ में न आया कि क्या करे। अन्तिम उपाय के रूप में वह किनारे पर खड़ा हो गया, और जैसे ही रेलगाड़ी उसके बराबर आई, उसने अपनी पूरी शक्ति से वह लालटेन इंजन-चालक की ओर फेंकी। इंजन-चालक ने समझ लिया कि कुछ न कुछ गड़बड़ है, उसने चेतावनी मान ली, सीटी बजाकर ब्रेक लगवाए, और रुकावट से कुछ ही गज़ पहले रेलगाड़ी रोक दी। मैं अभी वह टूटी हुई लालटेन आपके पैरों पर फेंकता हूँ! मैं आपसे विनती करता हूँ कि चेतावनी मानिए, और चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े, पाप का पूरी तरह सफ़ाया कर दीजिए। चेतावनी मानिए! आपको या तो

पाप को छोड़ना होगा, या स्वर्ग की आशा को छोड़ना होगा। अपने आपको ऐसे स्थान पर रखिए जहाँ आप आशीष पा सकें। अभी मन में ठान लीजिए कि परमेश्वर के अनुग्रह से आप विजय प्राप्त करेंगे। “दुष्ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे, वह उस पर दया करेगा, वह हमारे परमेश्वर की ओर फिरे और वह पूरी रीति से उसको क्षमा करेगा।”

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