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Theol ogy i brary [अस्पष्ट मूल पाठ] क्लेयरमॉन्ट, कैलिफ़ोर्निया का धर्मविज्ञान विद्यालय (SCHOOL OF THEOLOGY AT CLAREMONT California) — प्रस्तावना।
इस ग्रन्थ की उत्पत्ति समझाने के लिए थोड़े-से शब्द पर्याप्त होंगे। फ्रांसीसी मेथोडिस्टों के पास वेस्ली का कोई प्रामाणिक जीवन-चरित्र न होने के कारण, फ्रांसीसी सम्मेलन ने यह विषय प्रतियोगिता के लिए खोल दिया और सर्वोत्तम रचना के लिए पुरस्कार की घोषणा की। निर्णायकों की सर्वसम्मति से विजय-पताका रेवरेंड मैथ्यू को दी गई।
हाल ही में इस देश में वेस्ली के कई जीवन-चरित्र प्रकाशित हुए हैं, परन्तु यह सोचा गया कि यह छोटी-सी रचना अपना एक अलग स्थान और मूल्य रखेगी। इसके संकलन में सर्वोत्तम प्रामाणिक स्रोतों से परामर्श लिया गया है और कथन की यथार्थता सुनिश्चित करने के लिए बड़ा परिश्रम किया गया है। लेखक अपने पाठकों के सामने एक ऐसे व्यक्ति का संक्षिप्त, फिर भी स्पष्ट और सजीव इतिहास रखने में सफल हुआ है जिसकी स्मृति का वह गहरा आदर करता है और जिसके चरित्र को वह उसकी सच्ची ऊँचाई पर आँकना जानता है। रेवरेंड ल्यूक टायरमैन द्वारा अपने जीवन-चरित्र में हाल ही में दिए गए अनेक विवरण, यद्यपि अत्यन्त रोचक हैं—जैसा कि वेस्ली से सम्बन्ध रखने वाली हर बात होनी ही चाहिए—
यहाँ दिए गए चित्र की किसी भी मूल विशेषता को नहीं बदलते। वास्तव में उनका चरित्र इतना पारदर्शी रूप से खरा था कि जितनी अधिक गहन जाँच की जाएगी,
उसकी अन्तर्निहित उत्कृष्टता और परिपूर्णता का विश्वास उतना ही दृढ़ होगा। फिर भी, जिनका यह कर्तव्य हो कि उसका वर्णन करें, उन्हें इसे कोमलता और विवेक के साथ छूना चाहिए। जीवनीकार में निष्पक्षता और श्रद्धा के इस सुखद मेल का साक्षी इस ग्रन्थ का प्रत्येक पृष्ठ है। यदि यह वेस्ली के अनुयायियों में से कुछ के मन में अपने पूजनीय संस्थापक के प्रति अधिक गहरी सराहना और स्नेह, और उसके पदचिह्नों पर चलने की अधिक सच्ची अभिलाषा जगाए, तो लेखक और अनुवादक दोनों का उद्देश्य भरपूर रूप से पूरा हो जाएगा।
Aad. ie, लेक हाउस, साउथ शील्ड्स के निकट। [अस्पष्ट मूल पाठ]
(1703—1738।) अध्याय 1.—एपवर्थ का पादरी-निवास, 1703—1714।
एक्सहोम्स द्वीप—जॉन वेस्ली का जन्म—उनके पूर्वज—उनके पिता सैमुएल वेस्ली का चरित्र—सुसन्ना वेस्ली : उनका चरित्र—पारिवारिक शिक्षा : उसके सिद्धान्त और विधियाँ—पारिवारिक परीक्षाएँ—पादरी-निवास में आग—जॉन वेस्ली का ईश्वरीय छुटकारा—उनकी बाल्यावस्था की भक्ति । Ps : : - पृष्ठ 1—9
अध्याय 2.—ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय, 1714—1735।
चार्टरहाउस विद्यालय में वेस्ली—ऑक्सफ़ोर्ड में वेस्ली—उनका अध्ययन-क्रम—उनकी प्रतिभाएँ—उनका अकेलापन—व्यथित करने वाले प्रश्न—माता की सलाहें—मसीह का अनुकरण—जेरेमी टेलर और विलियम लॉ की रचनाएँ—धर्मवैज्ञानिक विचार—
वेस्ली डीकन के पद पर—लिंकन कॉलेज के फ़ेलो—यूनानी साहित्य के प्राध्यापक—चार्ल्स वेस्ली—विद्यार्थियों का दल—मेथोडिस्ट कहलाए—एपवर्थ में जॉन वेस्ली—एकान्त की अभिलाषा—ऑक्सफ़ोर्ड लौटना—अपने मित्रों पर प्रभाव—तपस्या और कर्मठता—जॉर्ज व्हिटफ़ील्ड—विरोध—वेस्ली की बीमारी—
आत्मिक दशा । . : ' A A 4 4 - पृष्ठ 9—18 अध्याय 3.—अमेरिका में सेवा-कार्य। 1735—1737।
पल्ली-पद का प्रस्ताव : वेस्ली का इनकार—जॉर्जिया में सेवा-कार्य—समुद्री यात्रा—शारीरिक तपस्याएँ—समय की मितव्ययिता—मोरावियन—संकट के बीच उनका आचरण—उनका उदाहरण—आगमन—स्पैंगेनबर्ग से वार्तालाप—एक मोरावियन समुदाय
—रेड इंडियनों में सुसमाचार-प्रचार—सफलता में बाधाएँ—बसने वालों में सुसमाचार-प्रचार—सोसाइटियों का गठन—वेस्ली का प्रभाव—
असफलता के कारण—हिंसक विरोध—वेस्ली का प्रस्थान।
पृष्ठ 18—26 A3 vi विषय-सूची।
अध्याय 4.—मन-परिवर्तन। 1738।
वेस्ली की मानसिक निराशा—मन-परिवर्तन की आवश्यकता—बोहलर से भेंटें—तीव्र प्रगति—छुटकारे की खोज—मन-परिवर्तन के समय की परिस्थितियाँ—आत्मिक जीवन का विकास—चार्ल्स वेस्ली और व्हिटफ़ील्ड का मन-परिवर्तन—वेस्ली का मोरावियन बस्तियों में जाना—ज़िन्ज़ेनडॉर्फ़ से उनकी भेंटें—हेर्नहुत के विषय में प्रभाव
—क्रिश्चियन डेविड—मेथोडिज़्म और मोरावियन। पृष्ठ 26—36 अध्याय 5.—अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में इंग्लैंड की नैतिक और धार्मिक दशा।
अंग्रेज़ सुधार-आन्दोलन की अपूर्णता—कलीसिया और राज्य—प्यूरिटनवाद—अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैंड—बाहरी समृद्धि—उच्च वर्गों में सामान्य भ्रष्टाचार—रिश्वतखोरी,
विलासिता, अविश्वास—फ़ैशन बना अविश्वास—निम्न वर्गों की अधोगति—भीड़ की शक्ति—मोहॉक—मदिरापान,
अन्धविश्वास और अज्ञान—सुधार के प्रयास—निबन्धकार—आचार-सुधार सभा—धार्मिक सोसाइटियाँ—एंग्लिकन पादरी : उनकी उदासीनता और अनैतिकता—अपवाद—उनके प्रचार का सामान्य स्वरूप—भक्त कलीसियाई जनों की गवाही—नॉनकन्फ़ॉर्मिस्ट—वोल्तेयर की आलोचनाएँ—
वोल्तेयर और वेस्ली । : : ; : . पृष्ठ 36—53 खण्ड 2।
कार्य का आरम्भ।
(1738—1744।) अध्याय 1.—आन्दोलन का जन्म। 1738—1739। लंदन में मोरावियन सोसाइटियाँ—वेस्ली का कलीसियाओं में प्रचार करना—मंच बन्द कर दिए गए—कैदियों के बीच वेस्ली—
1739 का नववर्ष-दिवस—किंग्सवुड और ब्रिस्टल में व्हिटफ़ील्ड का खुले आकाश के नीचे प्रचार—वेस्ली का उनका अनुकरण करना—ब्रिस्टल में वेस्ली—विषय-सूची। vii "संयुक्त सोसाइटियों" की स्थापना—पहला प्रार्थनालय—
किंग्सवुड विद्यालय—उनकी यात्रा-सेवा की विशेषताएँ—उल्लेखनीय मन-परिवर्तन—शारीरिक लक्षण—मूरफ़ील्ड्स में वेस्ली—कैन्टरबरी के आर्चबिशप के सामने चार्ल्स वेस्ली—ब्रिस्टल के बिशप के सामने जॉन वेस्ली—1739 का अन्त। पृष्ठ 54—69
अध्याय 2.—आन्तरिक मतभेद : बाहरी प्रगति।
मोरावियनों की भूलें—वेस्ली का अलग होना—फ़ाउण्ड्री—मेल-मिलाप के निष्फल प्रयास—वेस्ली के प्रति लोगों की विविध भावनाएँ—ब्रिस्टल और लंदन में भीड़ें—वेस्ली का
साहस—पादरी-वर्ग—ब्रिस्टल सोसाइटी की प्रगति—सोसाइटियों की वृद्धि और विस्तार—उनकी उदारता—पूर्वनियति के विषय में वेस्ली और व्हिटफ़ील्ड का मतभेद—सदस्यों में विवाद—"मुफ़्त अनुग्रह" पर प्रवचन—व्हिटफ़ील्ड का उत्तर
—वेस्ली से अलग होना—विभाजन के परिणाम। पृष्ठ 69—80 अध्याय 3.—सामान्य जनों का प्रचार। उत्तर। 1742।
एक कठिन समस्या—सामान्य सहायक—थॉमस मैक्सफ़ील्ड—इस संकट में सुसन्ना वेस्ली का प्रभाव—इस सेवा-व्यवस्था का विकास—लंदन की कक्षाएँ—उत्तर में नेल्सन का परिश्रम—वेस्ली का उत्तर की ओर प्रस्थान—मार्ग की एक घटना—बर्स्टल में वेस्ली—
न्यूकैसल में वेस्ली—विशाल सभाएँ—एक सोसाइटी का गठन—एपवर्थ में वेस्ली—अपने पिता की समाधि-शिला पर प्रचार—मेथोडिस्ट और मजिस्ट्रेट—सुसन्ना वेस्ली की मृत्यु।
पृष्ठ 80—89 अध्याय 4.—संघर्ष और उत्पीड़न। 1743—1744।
उत्तर में वेस्ली—शारीरिक लक्षणों की जाँच—सर्किटों का गठन—प्लेसी में वेस्ली की यात्रा—लंदन में उपद्रव—मजिस्ट्रेटों का हस्तक्षेप—चार्ल्स वेस्ली
पर भीड़ का हमला—कॉर्नवॉल में कष्ट—वेडनेसबरी और वॉलसॉल की भीड़ों के बीच वेस्ली—संकट में उनकी निडरता—एक सरगना का मन-परिवर्तन—खोई हुई भेड़ का झुण्ड में लौटाया जाना—स्टैफ़र्डशायर में और उत्पीड़न—मजिस्ट्रेटों और पादरियों की मिलीभगत—प्रचारकों को ज़बरन भर्ती करना—वेस्ली के विषय में जनमत पृष्ठ 89—102 viii विषय-सूची।
अध्याय 5.—पहला सम्मेलन। 1744।
सम्मेलन की संरचना—प्रारम्भिक सेवाएँ—कार्यवाही के नियम—मेथोडिज़्म का सैद्धान्तिक आधार—प्रचार की विधि—
सोसाइटियों का स्थापित कलीसिया से सम्बन्ध—आन्तरिक अनुशासन—सोसाइटी के नियम—कक्षा-सभा—सामान्य जनों का प्रचार—वेस्ली का अपने प्रचारकों पर अधिकार—सम्मेलन का समापन—कार्य की दशा—संख्यात्मक और नैतिक परिणाम—
जनसाधारण का विरोध—पादरियों और नागरिक अधिकारियों की शत्रुता—एक नए युग का आरम्भ । : . F .. पृष्ठ 103—111 कार्य का विकास, (1744—1770।) अध्याय 1.—संघर्ष और सफलताएँ। 1744—1747।
ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के सामने वेस्ली का प्रचार—परिश्रम, संकट और कष्ट—मार्ग में सेवा-कार्य—कॉर्नवॉल—गिरफ़्तारी में वेस्ली—फ़ालमाउथ की भीड़—वेल्स : सुखद स्वागत—
सेना में और युद्धभूमि पर मेथोडिज़्म—फ़ॉन्टेनॉय का युद्ध—वेस्ली की देशभक्ति—ढोंगी दावेदार का आगमन—न्यूकैसल में वेस्ली—प्रेस का उनका उपयोग—झूठी शिक्षा—दक्षिण-पश्चिम में प्रगति—उत्तर में सफलताएँ—एक उदार सोसाइटी—वेस्ली
पर प्लिमथ में भीड़ का हमला—उनका साहस—कॉर्नवॉल में दृश्य-परिवर्तन । : : : : , . . पृष्ठ 112—125 अध्याय 2.—आयरलैंड में मेथोडिज़्म। 1747—1750।
आयरलैंड की धार्मिक दशा—वेस्ली का डबलिन पहुँचना—पहली छापें—उनके पहले परिश्रम के उत्साहवर्धक परिणाम—भयंकर
उत्पीड़न—दो आयरिश जनों का असाधारण मन-परिवर्तन—वेस्ली की दूसरी यात्रा—एथलोन और अन्य स्थानों पर उल्लेखनीय सफलता—विषय-सूची। ix वेस्ली और पादरी—कॉर्क में उत्पीड़न—बटलर, गाथा-गायक—मजिस्ट्रेटों की मिलीभगत—प्रार्थनालय की लूट—
निन्दनीय अति—भीड़ का नेतृत्व करता एक पादरी—संघर्ष का अन्त—आयरलैंड में मेथोडिज़्म की सफलता—एक आयरिश शहीद, थॉमस वॉल्श A é : : : : : . पृष्ठ 125—136 अध्याय 3.—तीव्र प्रगति। 1748—1760।
पादरी सहयोगी : थॉम्पसन, पेरोनेट, ग्रिम्शॉ, फ़्लेचर—"पादरियों को सम्बोधन"—कॉर्नवॉल में मेथोडिज़्म की प्रगति—
स्कॉटलैंड में वेस्ली—सारे राज्य में अद्भुत प्रगति :
बर्मिंघम, वेडनेसबरी, डार्लास्टन, वेकफ़ील्ड, हल, चेस्टर, चार्ल्टन, हॉर्नबी, मैनचेस्टर, लिवरपूल, कीघली, यॉर्क, शेफ़ील्ड,
वैंड्ज़वर्थ, एपवर्थ, न्यूकैसल—लगभग सर्वत्र विरोध पर विजय—अपवाद—भीड़ के प्रति वेस्ली का व्यवहार—सोसाइटियों के आन्तरिक मामले—वेस्ली और व्हिटफ़ील्ड—परमेश्वर के हाथ की वेस्ली द्वारा स्वीकृति—उनकी अथक कर्मठता—उनकी
मन की शान्ति—उनकी मितव्ययिता और उदारता—वेस्ली का विवाह—पारिवारिक कष्ट—खतरनाक बीमारी—व्हिटफ़ील्ड का पत्र—स्वास्थ्य-लाभ और साहित्यिक परिश्रम । पृष्ठ 136—155 ' अध्याय 4.—आन्तरिक और बाहरी उन्नति। अमेरिका।
वेस्ली का वृद्धावस्था की ओर बढ़ना—मसीही सिद्धता—इंग्लैंड और आयरलैंड की सोसाइटियों में महान पुनरुज्जीवन—सामान्य परिणाम—लंदन की सोसाइटियों में फूट—जॉर्ज बेल का निष्कासन—उन्माद—एक विभाजन—कार्य की सामान्य दशा—
खुले में प्रचार के समय विशाल सभाएँ—आयरलैंड और स्कॉटलैंड में सफलता—उपद्रवों पर रोक—भीड़ पर वेस्ली का अधिकार—मजिस्ट्रेटों की मित्रतापूर्ण भावना—पादरियों की द्वेषपूर्ण भावना और विरोध—बिशप लैविंग्टन और वार्बर्टन—
हर्वी के पत्र—ऑक्सफ़ोर्ड से छह विद्यार्थियों का निष्कासन—फ़्लेचर—अमेरिकी मेथोडिज़्म की स्थापना—उसका ईश्वरीय स्वरूप—व्हिटफ़ील्ड की मृत्यु : ; . पृष्ठ 156—170 अध्याय 5.—संगठन और अनुशासन।
आरम्भिक सम्मेलनों में चर्चित सैद्धान्तिक प्रश्न—सोसाइटियों का स्थापित कलीसिया से सम्बन्ध—वेस्ली के विचारों में परिवर्तन x विषय-सूची।
—पुनर्मिलन के प्रयास—सोसाइटियों द्वारा संस्कारों की माँग—1755 के सम्मेलन का निर्णय—एकता का दूसरा प्रयास—उसकी असफलता—वेस्ली के उद्देश्य की शुद्धता—प्रचारकों के प्रवेश सम्बन्धी नियम—उनके प्रति वेस्ली की चिन्ता
बौद्धिक विकास के लिए—उनकी यात्रा-सेवा—उनका आत्म-त्याग—वित्त-व्यवस्था—वेस्ली के सहायकों की उपयोगिता—भविष्य की तैयारी—सोसाइटियों की दशा—उनके संगठन की क्रमिक अवस्थाएँ
—वेस्ली की शक्ति—इस काल का अन्त।
पृष्ठ 171—184 खण्ड 4।
(1770—1791।) अध्याय 1.—वेस्ली की सशक्त वृद्धावस्था। 1770—1780।
आश्चर्यजनक शारीरिक बल, कर्मठता और प्रफुल्लता—सार्वभौमिक स्नेह और आदर—रोचक मन-परिवर्तन—सारे इंग्लैंड में सामाजिक और धार्मिक प्रगति—स्कॉटलैंड में वेस्ली—
आयरलैंड में वेस्ली—यात्रा की घटनाएँ—कार्य की दशा—विरोध पर विजय—उच्च वर्गों और पादरियों का रुख—
सोसाइटियों से वेस्ली का सम्बन्ध—वेस्ली और आत्माओं की देखभाल—वेस्ली और निर्धन—डॉ. डॉड—सिटी-रोड प्रार्थनालय, लंदन—अनेक प्रकाशन—महान कैल्विनवादी विवाद—विवादकर्ता के रूप में फ़्लेचर—इस दशक के परिणाम—नए प्रचारक—
भविष्य में वेस्ली का भरोसा । . . पृष्ठ 185—200 अध्याय 2.—अन्तिम वर्ष। 1780—1790।
वेस्ली का दीर्घकालीन बल—उनकी प्रकाशमान बुद्धि—उनके मन की शान्ति—वृद्धावस्था में वेस्ली का चित्र—सार्वभौमिक आदर और स्नेह—उनके प्रचार की अक्षुण्ण सफलता—कॉर्नवॉल—आयरलैंड में स्वागत—असाधारण लोकप्रियता—हृदयस्पर्शी दृश्य—अनुशासन के संचालन में वेस्ली—वेस्ली का
बच्चों से प्रेम—उनमें उनके परिश्रम की सफलता—रविवारीय विद्यालयों की स्थापना—पत्राचार—अन्तिम मिशनरी यात्राएँ
—हॉलैंड की दो यात्राएँ—चैनल द्वीपों की यात्रा—उत्पत्ति और विषय-सूची। xi द्वीपों में कार्य की प्रगति—जेन बिसन—चैनल
द्वीप और फ्रांसीसी मेथोडिज़्म—वेस्ली के शारीरिक बल का क्षीण होना—उनके प्रमुख सहकर्मियों की मृत्यु : फ़्लेचर ; चार्ल्स
वेस्ली—नए सदस्यों का जुड़ना—अन्त निकट । पृष्ठ 201—217 अध्याय 3.—अमेरिकी मेथोडिस्ट कलीसिया का संगठन। घोषणा-पत्र। 1784।
अमेरिका में मेथोडिज़्म की प्रगति—प्रचारकों का एंग्लिकन कलीसिया से सम्बन्ध—मेथोडिज़्म और अमेरिकी क्रान्ति—
क्रान्ति और एंग्लिकन कलीसिया—अमेरिकी सोसाइटियों की माँगें—एक कठिन समस्या—उसे सुलझाने के वेस्ली के प्रयास—वेस्ली के कलीसियाई विचारों की प्रगति—अमेरिकी मेथोडिस्ट एपिस्कोपल कलीसिया का संगठन—उसकी सफलता—अंग्रेज़ मेथोडिज़्म की कलीसियाई स्थिति—कानूनी बाधाएँ—घोषणा-पत्र : उसके लाभ और हानियाँ। पृष्ठ 217—227
अध्याय 4.—वेस्ली के अन्तिम परिश्रम : उनकी मृत्यु।
शारीरिक दुर्बलता—लंदन और उसके आसपास परिश्रम—उत्तर की अन्तिम यात्रा—जगा हुआ गहरा रस—सोसाइटियों की दशा—हैलिफ़ैक्स में हृदयस्पर्शी दृश्य—स्कॉटलैंड में वेस्ली—
न्यूकैसल—उल्लेखनीय छुटकारा—सत्तासीवें जन्मदिन पर वेस्ली के विचार—अन्तिम सम्मेलन—लंदन और उसके आसपास प्रचार—उनकी डायरी की अन्तिम प्रविष्टि—उनकी रोकड़-बही की अन्तिम प्रविष्टि—
अमेरिका को अन्तिम पत्र—अन्तिम प्रवचन—शक्ति का तेज़ी से क्षीण होना—अपनी मृत्यु से चार दिन पहले वेस्ली द्वारा विल्बरफ़ोर्स को लिखा गया पत्र
—अन्तिम विश्रामदिन—शिथिलता और दुर्बलता—अन्तिम शब्द—अन्तिम दृश्य—जॉन वेस्ली की मृत्यु—उनका अन्त्येष्टि-संस्कार।
पृष्ठ 228—246 अध्याय 5.—वेस्ली का चरित्र।
मनुष्य और मसीही के रूप में वेस्ली—उनकी पूर्ण निष्कपटता—उन पर लगाया गया भोलापन—उन पर लगाया गया महत्त्वाकांक्षा का आरोप—प्रभु की व्यवस्था पर उनका भरोसा
—उनकी भक्ति—उनकी सर्वव्यापी भावना—उनका स्वाभाविक स्वभाव—उनकी मिलनसारिता—प्रचारक के रूप में वेस्ली—उनका नैतिक अधिकार—उनका प्रबल तर्क—विवेक से उनकी अपीलें—उनके प्रयोग— xii विषय-सूची।
उनकी आश्चर्यजनक सफलता—राष्ट्र के चरित्र का सूचक—लेखक के रूप में वेस्ली—उनके प्रकाशनों की विशाल विविधता—प्रमुख
रचनाएँ—लेखक के रूप में उनके गुण—प्रशासक के रूप में वेस्ली—बकल और मैकॉले की गवाहियाँ—चरित्र की पूर्णता।
पृष्ठ 246—259 अध्याय 6.—वेस्ली का कार्य और उसके परिणाम।
वेस्ली के कार्य के प्रत्यक्ष परिणाम—धर्मविज्ञान : सुधार-आन्दोलन का धर्मविज्ञान—प्रायश्चित की सार्वभौमिकता—पश्चात्ताप, विश्वास, धर्मी ठहराया जाना, नया जन्म—पूर्ण पवित्रीकरण, अर्थात् मसीही सिद्धता—आत्मा की गवाही—अन्त तक स्थिर रहना सशर्त—
ऐसे धर्मविज्ञान का स्वरूप और प्रभाव—संगठन—सोसाइटी—कक्षा-सभा—सदस्यता का टिकट—अनुग्रह के विविध साधन—सोसाइटी के अधिकारी—प्रचारक—सर्किट—यात्रा-सेवा—सम्मेलन—वेस्ली की मृत्यु के समय और आज सोसाइटियों की संख्यात्मक शक्ति—अप्रत्यक्ष परिणाम—
इंग्लैंड का नवजीवन—उच्च और निम्न वर्ग—प्रिस्टली और मैकॉले की तथा श्रीमान शेरर, डी विट और सेंट-मार्क गिरार्डिन की गवाहियाँ—एंग्लिकन कलीसिया और असहमत समुदाय
—आधुनिक काल में इंग्लैंड—उपसंहार। पृष्ठ 260—274 वेस्ली का जीवन।
(1703—1738।) अध्याय 1।
एपवर्थ का पादरी-निवास।
लिंकनशायर की उत्तर-पश्चिमी सीमा की ओर भूमि का एक छोटा-सा भाग है, जिसे एक्सहोम्स द्वीप कहते हैं।
इसका क्षेत्रफल लगभग एक सौ बीस वर्ग मील है, और इसका नाम इस तथ्य से पड़ा है कि यह ट्रेंट, डॉन, आइडल नदियों के जल से और इन अन्तिम दो नदियों को जोड़ने वाली एक नहर से मानो करधनी की तरह घिरा हुआ है। जल से छुड़ाया गया और खेती से समृद्ध किया गया यह क्षेत्र देश के सबसे उपजाऊ भागों में से एक बन गया है। इसका मुख्य नगर एपवर्थ है, जिसकी आबादी दो हज़ार है : वह बेतरतीब बसा है, परन्तु एक पहाड़ी की ढलान पर सुहावने स्थान पर स्थित है।
यह नगर, बाज़ार के दिनों को छोड़कर जब आसपास के गाँवों से देहाती लोग उमड़ आते हैं, काफ़ी शान्त रहता है ; B 2 एपवर्थ का पादरी-निवास। और यदि यह मेथोडिज़्म के संस्थापक की जन्मभूमि न होता, जिनका जीवन हम वर्णन करने जा रहे हैं, तो इसे बहुत कम प्रसिद्धि मिलती। वहीं 17 जून, 1703 को जॉन वेस्ली का जन्म हुआ : वहीं उन्होंने अपने आरम्भिक वर्ष बिताए और उस कार्य के लिए, जिसके लिए परमेश्वर ने उन्हें बुलाया था, बिना जाने ही तैयारी करने लगे। उनके घर के प्रशिक्षण ने उनके चरित्र पर इतना सशक्त प्रभाव डाला कि उसकी विस्तृत जाँच आवश्यक हो जाती है।
वेस्ली याजकीय वंश के थे : उनके पिता और दोनों दादा भक्त और प्रतिष्ठित पादरी थे, जिन्होंने सत्रहवीं शताब्दी में राष्ट्र पर आए संघर्षों के बीच उत्तम गुण प्रकट किए थे। शैशव से ही वेस्ली की आत्मा का पोषण एक ऐसे परिवार की श्रेष्ठ परम्पराओं से हुआ, जिसमें भक्ति और चरित्र की दृढ़ता मानो
वंशानुगत थीं। अपने पूर्वजों के मसीही गुणों की स्मृति ने उन पर हितकर प्रभाव डाला होगा।
इसके अतिरिक्त, वे गुण उनकी आँखों के सामने ही उनके पिता और माता के जीवन में फिर से फले-फूले, जो दोनों सच्चे प्यूरिटन वंश से निकले थे।
उनके पिता सैमुएल वेस्ली सत्रहवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में से एक में रानी मरियम के संरक्षण से एपवर्थ पल्ली के रेक्टर बनाए गए थे।
यद्यपि वे नॉनकन्फ़ॉर्मिस्ट परिवार में जन्मे थे, वे जल्दी ही अपने माता-पिता के कलीसियाई विचारों से अलग हो गए, और अपनी असमय विकसित प्रतिभा तथा अद्भुत साहित्यिक कर्मठता से प्राप्त साधनों के अतिरिक्त किसी और सहारे के बिना उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड में अपना निर्वाह किया, जहाँ उन्होंने स्थापित कलीसिया की सेवकाई के लिए तैयारी की। इन संघर्षों में उन्होंने इच्छाशक्ति की जो ऊर्जा प्रकट की, वह उनके आगे के जीवन में भी कम नहीं हुई। उस युग के राजनीतिक और धार्मिक झगड़ों के बावजूद उन्होंने अपना मार्ग बनाया, पूर्ण स्वतन्त्रता से अपने मत बनाए और असाधारण बल से उनका बचाव किया। कभी पुस्तिका-लेखक, कभी पत्रकार और कभी वक्ता के रूप में, वे उस समय के सभी विवादों में कूद पड़े,
जन्म और पूर्वज। 3 और अपनी उत्साही और उदार आत्मा को जो भी उद्देश्य आकर्षित करता, उसे अपनी लेखनी और वाणी की सहायता देते रहे।
उनकी आत्म-क्षयकारी कर्मठता किसी भी कार्य के लिए पर्याप्त थी। उनके अनजान पादरी-निवास से सारे इंग्लैंड में अत्यन्त विविध रचनाएँ फैलीं, जिनमें राजनीतिक और धार्मिक पुस्तिकाएँ, समाचार-पत्र के लेख, कविताएँ, टीकाएँ और धर्मविज्ञान पर निबन्ध सम्मिलित थे। सैमुएल वेस्ली की सहानुभूतियाँ गहरी की अपेक्षा व्यापक थीं, फिर भी उन्होंने अपने पुत्रों में बड़े कार्यों की रुचि अवश्य उत्पन्न की होगी।
अपने उत्साही स्वभाव और अपनी बात पर अड़े रहने की आदत के अतिरिक्त उनमें और भी बहुत मूल्यवान गुण थे, जिनमें भलाई करने की सच्ची इच्छा कम महत्त्व की नहीं थी। उन्होंने अपने पास्टरीय कर्तव्यों के निर्वाह में अपने आप को पूरी शक्ति से लगा दिया। उनकी निष्ठा, जो कभी-कभी कठोरता तक पहुँच जाती थी, कुछ गम्भीर असुविधाएँ ले आई। एक अवसर पर उनके कुछ पल्लीवासियों ने बदला लेने के लिए एक छोटे-से कर्ज़ के कारण, जिसे वे उस समय चुका नहीं सकते थे, उन्हें जेल भिजवा दिया। अन्य लोगों ने, जैसा कि हम देखेंगे, अपनी दुर्भावना को यहाँ तक पहुँचाया कि पादरी-निवास में आग लगा दी।
सच है कि रेक्टर का धर्मविज्ञान बहुत अपूर्ण था। उनका युग भोर के झुटपुटे का युग था और वे अपने युग के थे। फिर भी उन्हें उस महत्त्वपूर्ण धार्मिक क्रान्ति का, जो फूट पड़ने वाली थी और जिसके मुख्य प्रेरित उनके पुत्र होने वाले थे, एक प्रकार का भविष्यसूचक पूर्वाभास था। अपनी मृत्यु-शय्या पर उन्होंने उभरते पुनरुज्जीवन की भोर का उत्साह से स्वागत किया और अपने पुत्र चार्ल्स के सिर पर हाथ रखकर कहा, "दृढ़ रहना : मसीही विश्वास इस राज्य में अवश्य पुनर्जीवित होगा ; तू उसे देखेगा, यद्यपि मैं नहीं देखूँगा।" वे उन थोड़े-से
मसीहियों में से थे जो अठारहवीं शताब्दी के इस आरम्भिक काल में ही अपने देश के लिए बड़े मिशनरी उद्यमों का सम्मान चाहते थे। उन्होंने तो पूर्व में अग्रणी मिशनरी के रूप में अपने आप को प्रस्तुत भी किया। परन्तु युग ऐसे आन्दोलन के लिए परिपक्व नहीं था : यह विचार जितना नया था उतना ही विचित्र लगा, और उसका कोई परिणाम नहीं निकला। B 2 4 एपवर्थ का पादरी-निवास।
एपवर्थ के रेक्टर अपने स्वभाव और अपने अनेक गुणों के कारण जॉन वेस्ली के प्रथम कदमों का मार्गदर्शन करने के योग्य थे ; और जॉन के जीवन में पैतृक प्रभाव के अनेक चिह्न बताना कठिन न होगा।
फिर भी, ये चिह्न जितने स्पष्ट हैं, हम आसानी से कह सकते हैं कि वेस्ली का नैतिक और धार्मिक विकास और भी अधिक उनकी माता के प्रभाव के कारण हुआ।
सुसन्ना वेस्ली एक असाधारण रूप से उच्च मन का नमूना प्रस्तुत करती हैं : वे अठारहवीं शताब्दी के बीच जड़ा हुआ एक प्राचीन आदर्श हैं। वे पिछले युग के सबसे प्रतिष्ठित धर्मविज्ञानियों में से एक डॉ. एनस्ली की पुत्री थीं ; प्यूरिटनवाद की पाठशाला में उन्होंने एक सुदृढ़ भक्ति का अभ्यास किया, जो किसी बलिदान से पीछे नहीं हटती थी, और उन्होंने पुरुषोचित दृढ़ता का चरित्र प्राप्त किया। विद्या और भक्ति में सुधार-आन्दोलन की महिलाओं की बराबरी करती हुई, वे अपने बच्चों की किसी भी क्षेत्र में बौद्धिक प्रगति के प्रति उदासीन नहीं रह सकती थीं। उनमें उन्नति की वह इच्छा, जो प्रबुद्ध मन की पहचान है, और उस सच्चे हृदय से निकलने वाली दृढ़, व्यावहारिक सूझ-बूझ, दोनों बराबर मात्रा में मिली हुई थीं। कोमल सम्प्रदाय में प्रायः जो देखा जाता है, उसके विपरीत, मानसिक शक्तियों के असामान्य विकास ने उनके नैतिक गुणों के विकास को किसी भी प्रकार नहीं रोका था।
बौद्धिक दृष्टि से असाधारण होते हुए भी, सुसन्ना वेस्ली पत्नी और माता के रूप में विशेष रूप से उत्कृष्ट थीं। यदि उनका प्रेमी हृदय अपने पति की परीक्षाओं में सहानुभूति से धड़कता था, तो वे अपने प्रभाव से उन पुरुषोचित संकल्पों को भी सहारा दे सकती थीं जिन्हें करने के लिए वे उन्हें प्रोत्साहित करती थीं। स्वयं उन्नीस बच्चों की माता होने के नाते, उनमें ऐसे पद के सभी गुण थे, और उसके सभी बोझ भी। अपने बच्चों के प्रति उनका स्नेह केवल स्वार्थपूर्ण सराहना नहीं था : वे उन्हें ऐसी क्यारियाँ मानती थीं जिन्हें ईर्ष्यालु चौकसी से सींचना उनका कर्तव्य था। और जब मृत्यु ने उनकी आँखों के सामने उस खेत को काट डाला जिसकी उन्होंने इतने स्नेह से देखभाल की थी, तब उन्होंने परमेश्वर की इच्छा के आगे सिर झुकाया ; और उनके
सुसन्ना वेस्ली। 5 चरित्र की रूपरेखा शायद उनके गहरे किन्तु सच्चे मसीही शोक में उनके सर्वोत्तम दिनों की अपेक्षा अधिक दृढ़ और स्पष्ट दिखाई देती है।
एपवर्थ के पादरी-निवास की विनम्र छत के नीचे पारिवारिक जीवन ने एक मनोहर कठोरता का रूप धारण कर रखा था। बच्चों की शिक्षा और प्रशिक्षण उस बुद्धिमती और भक्त माता पर था जिसकी हमने अभी चर्चा की। अपने उत्तरदायित्व की भावना से निरन्तर संचालित होकर, शैशव के संकटों से बचे बारह या तेरह बच्चों के नैतिक और शारीरिक विकास पर नज़र रखना उन्हीं का काम था ; इस छोटे-से शासन की बागडोर स्थिर हाथ से थामे रखना, हर बात पर दृष्टि रखना और हर बात पर अपने व्यवस्थित स्वभाव की छाप लगाना भी उन्हीं का काम था। श्रीमती वेस्ली इस बात से सावधानी से बचती थीं कि अपने बच्चों का संचालन संयोग पर छोड़ दें : शिक्षा की सर्वोत्तम विधियों पर अपने मन में विचार करके उन्होंने निश्चित नियम बनाए थे, जिनका वे पूर्ण यथार्थता से पालन करती थीं। इस प्रकार जॉन वेस्ली का मन कठोर रूप से
मसीही शिक्षा के साँचे में ढाला गया : इसी काल में उन्हें उनका सबसे प्रभावी प्रशिक्षण मिला। इसलिए अपनी माता की योजना का थोड़े शब्दों में वर्णन करना व्यर्थ का काम नहीं होगा।
इस आदर्श परिवार में बच्चे अपनी सबसे कोमल अवस्था से ही अनुशासन के अधीन रखे जाते थे। उनके सोने और खाने के समय नियम से निर्धारित थे, जिनका पालन शिशुओं को भी औरों के समान करना पड़ता था। आरम्भ में ही उन्होंने शान्त रहने की वे आदतें सीख लीं जो बड़े परिवारों में कम ही देखी जाती हैं : ऊँचे स्वर से रोना कठोरता से मना था। जैसे ही प्रत्येक बच्चे की इच्छा-शक्ति प्रकट होने लगती, वह विशेष ध्यान का विषय बन जाती। सुसन्ना वेस्ली कहा करती थीं, "यदि तुम अपने बच्चों को ठीक रीति से सिखाना चाहते हो, तो पहली बात यह करनी है कि उनकी इच्छा-शक्ति को जीत लिया जाए।" इस कठिन कार्य में बहुत कम माताएँ इतनी सफल हुई हैं। उनके साधारण तरीके कोमलता और समझाना थे, परन्तु आवश्यकता होने पर वे दण्ड का सहारा लेती थीं। दूसरी ओर, यह देखकर कि "दण्ड का भय प्रायः
6 एपवर्थ का पादरी-निवास। बच्चों को झूठ बोलने के लिए लुभाता है," उनकी रीति थी कि जो अपराध स्वीकार कर लिया जाता, उसे सदा क्षमा कर देतीं। ऐसे सिद्धान्तों से प्रेरित होकर श्रीमती वेस्ली ठीक ही ऐसे अधिकार के प्रति बिना शर्त आज्ञाकारिता माँगती थीं जो मातृ-प्रेम की गहरी प्रवृत्तियों से नियन्त्रित था।
अपने बच्चों की शिक्षा में भी उनके सिद्धान्त वही स्थिर थे। उदाहरण के लिए, किसी भी बहाने से किसी बच्चे को पाँचवें वर्ष तक पहुँचने से पहले पढ़ना सीखने की अनुमति नहीं थी,—यह एक उत्तम नियम था, जिसका उद्देश्य अपरिपक्व बुद्धि पर अधिक बोझ न डालना था। परन्तु पाँचवीं वर्षगाँठ के अगले दिन का परिवार के इतिहास में विशेष स्थान था : पाठ गम्भीरता से आरम्भ होते थे, और नया विद्यार्थी छह घण्टे विद्यालय-कक्ष में बिताता था, जिनके अन्त तक उससे वर्णमाला सीख लेने की अपेक्षा की जाती थी। लगभग हर उदाहरण में इतना संक्षिप्त समय इस कार्य की पूर्ति के लिए पर्याप्त होता था।
दूसरे पाठ में बाइबल खोली जाती थी और बच्चे को उत्पत्ति के पहले अध्याय का एक अंश वर्तनी करके पढ़ना सिखाया जाता था। श्रीमती वेस्ली कहती हैं कि इस प्रकार तीन महीने के अभ्यास के बाद बच्चे उतना ही अच्छा पढ़ सकते थे जितना बहुत-से वे लोग जो अच्छे पाठक माने जाते हैं। इन परिणामों को प्राप्त करने के लिए उन्होंने कोई कष्ट नहीं छोड़ा। एक दिन उनके पति ने उनसे कहा, "मैं तुम्हारे धैर्य की सराहना करता हूँ ; तुमने इस बच्चे को वही बात कम-से-कम बीस बार बताई है।"
उन्होंने उत्तर दिया, "यदि मैंने उसे केवल उन्नीस बार बताया होता तो मेरा परिश्रम व्यर्थ हो जाता, क्योंकि मुझे सफलता बीसवीं बार ही मिली।" अपनी निरन्तर कर्मठता से उन्होंने अपने बच्चों को समय का मूल्य सिखाया, और वे उस शिक्षा को कभी नहीं भूले।
सुसन्ना वेस्ली एक सच्ची मसीही थीं : उनके हृदय को अपने बच्चों की बौद्धिक प्रगति से अधिक उनकी आत्मिक उन्नति प्रिय थी। उनके बचपन में उन्होंने उन्हें पवित्रशास्त्र से परिचित कराने का प्रयत्न किया : जैसे ही उनके होंठ शब्द बोल सकते थे, उन्होंने उन्हें सरल प्रार्थनाएँ सिखाईं। वे चाहती थीं कि उनकी प्रारम्भिक धार्मिक शिक्षा स्वयं दें ; और उनके उपयोग के लिए उन्होंने जो एक प्रकार की पुस्तिका रची थी, वह आज भी विद्यमान है। परिवार-विद्यालय। वे हर सप्ताह नियमित रूप से एक या दो घण्टे बारी-बारी से हर बच्चे के साथ विशेष बातचीत के लिए देती थीं : यह छोटा-सा वार्तालाप घनिष्ठ संगति के लिए उल्लेखनीय था और उसने ऐसी खुली आत्मा को बढ़ावा दिया जिससे माता अपने बच्चों के मन की गतिविधियों का निकट से अनुसरण कर सकती थीं। इन वार्तालापों ने उनके पुत्र जॉन पर अत्यन्त हितकर प्रभाव डाला : बीस वर्ष बाद अपनी माता को लिखे एक पत्र में वे कृतज्ञता से उनका उल्लेख करते हैं, और उनसे अनुरोध करते हैं कि पहले की तरह गुरुवार की शाम उनके लिए अलग रखें।
पारिवारिक शिक्षा के जिस संक्षिप्त चित्र को हमने खींचा है, उसमें हमारे पाठकों ने व्यवस्था-प्रेम को अवश्य देखा होगा, जो आगे चलकर वेस्ली की इतनी प्रबल विशेषता बना और जो उन्हें अपनी माता से विरासत में मिला था। यह भी कहा जा सकता है कि इसी परिवार-विद्यालय में उन्होंने वे अधिकांश महान गुण प्राप्त किए जो उन्होंने अन्त में उस कार्य में प्रकट किए जिसके लिए परमेश्वर ने उन्हें बुलाया। अभी युवावस्था में ही उन्होंने जीवन और उसके कर्तव्यों के विषय में उच्च विचार आत्मसात कर लिए थे।
फिर भी वेस्ली का बचपन उन परीक्षाओं से मुक्त नहीं था, जो ईश्वरीय प्रबन्ध के क्रम में सभी चरित्रों के निर्माण में इतना महत्त्वपूर्ण भाग निभाती हैं। एक से अधिक बार उन्होंने घोर निर्धनता को परिवार की मेज़ पर बैठे देखा ; और उनकी माता द्वारा किए गए मितव्ययिता के चमत्कारों के बावजूद, उनके पिता कर्ज़ में डूबे हुए मरे। मृत्यु बार-बार उनके घर आई और निर्दय आघात किए। दो अलग-अलग अवसरों पर पादरी-निवास भी जला : पहली आग दुर्घटना से लगी थी और केवल आंशिक थी ; परन्तु दूसरी बार सारा घर लपटों में भस्म हो गया।
यह आग कुछ अड़ियल पल्लीवासियों की दुर्भावना के कारण लगी थी, जो अपने पास्टर की निष्ठा का बदला इस प्रकार लेने में आनन्द लेते थे कि उसके सिर पर उसका घर जला दें, और उसके परिवार को भयानक मृत्यु के संकट में डाल दें।
आग 9 फ़रवरी, 1709 को आधी रात के निकट भड़की। बारह वर्ष की एक छोटी लड़की ने, अपने पैरों के पास गिरते जलते टुकड़ों से जागकर, खतरे की
8 एपवर्थ का पादरी-निवास। घण्टी बजाई। उसी क्षण बाहर से आती चीखों ने घर के हर व्यक्ति को जगा दिया। समय पर जागे थे : भस्म करने वाला तत्त्व पहले ही काफ़ी आगे बढ़ चुका था और निकलने के लगभग सभी मार्ग बेकार कर चुका था। रेक्टर उस शयन-कक्ष की ओर दौड़े जहाँ उनके बच्चे सोते थे, और एक सेवक की सहायता से उन्हें खिड़कियों से तथा बगीचे की ओर जाने वाले द्वार से बाहर निकलने में समर्थ किया। उनकी पत्नी, छोटे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पीछे रुककर, लपटों के बीच से मार्ग बनाने को विवश हुईं। तीन बार लपटों की उग्रता ने उन्हें पीछे धकेला, परन्तु अन्त में अपनी शेष शक्ति बटोरकर और परमेश्वर पर भरोसा रखकर वे आग में से दौड़ पड़ीं और अपने चेहरे और हाथों पर कुछ जलने के अतिरिक्त और किसी हानि के बिना बच निकलीं।
फिर भी एक बच्चा अब भी गायब था। नन्हा जॉन अपने बिस्तर में गहरी नींद सोया हुआ था, और सामान्य हड़बड़ी में उसे भुला दिया गया था। उसके पिता ने उसकी अनुपस्थिति जानकर लपटों के बीच से निकलने के कई प्रयास किए, परन्तु उनके प्रकोप के आगे उन्हें पीछे हटना पड़ा। तब घुटनों के बल गिरकर उन्होंने अपने बच्चे की आत्मा को परमेश्वर के हाथों में सौंप दिया। इसी बीच लड़का नींद से जागकर खिड़की की ओर दौड़ा, जहाँ नीचे के लोगों ने शीघ्र ही उसे देख लिया।
सीढ़ी लाने का समय न होने के कारण, एक आदमी दूसरे के कन्धों पर चढ़ा, और उसने ठीक उसी क्षण बच्चे को बचा लिया जब छत गिरी और उस कमरे को ज़मीन पर पटक दिया। पिता ने अपने पुत्र को ग्रहण करते हुए पुकारा, "आओ, पड़ोसियो, हम घुटने टेकें ; आओ हम परमेश्वर का धन्यवाद करें : उसने मुझे मेरे सब आठों बच्चे दे दिए हैं ; बाकी सब जाने दो, मैं काफ़ी धनी हूँ।"
जॉन वेस्ली ने इस ईश्वरीय छुटकारे की स्मृति को अपने जीवन के अन्त तक सँजोए रखा। अपने एक चित्र के नीचे उन्होंने जलते हुए घर की तस्वीर और यह शिलालेख खुदवाया, "क्या यह आग में से निकाली हुई जलती लकड़ी नहीं है?"
उसी क्षण से उनकी भक्त माता ने, जैसा कि वे स्वयं बताती हैं, "आग में से निकाली हुई जलती लकड़ी।" 9 यह संकल्प किया कि "उस बालक पर विशेष सावधानी से दृष्टि रखूँगी जिसे परमेश्वर ने इतनी बड़ी दया से बचाया।" उन्होंने यह विश्वास जगाने का यत्न किया कि वह देह और आत्मा समेत उस परमेश्वर का है जिसका पितृवत हाथ उसकी रक्षा के लिए इतने स्पष्ट रूप से
बढ़ाया गया था। उनके प्रयासों का प्रतिफल बच्चे की बाल्यावस्था की भक्ति में मिला, जिसने उस अवस्था में जब दूसरे बच्चे बचपन के खेलों के सिवा कम ही कुछ सोचते हैं, प्रबल धार्मिक प्रभावों के अधीन होने का प्रमाण दिया। इसलिए उनके पिता ने अपना कर्तव्य समझा कि उसे केवल आठ वर्ष की आयु में ही पवित्र
प्रभु-भोज में सम्मिलित करें।
परन्तु वह घड़ी आ गई थी जब बालक को अपना शान्त घर छोड़कर अपनी पढ़ाई और जीवन की गम्भीर वास्तविकताओं में अधिक पूर्णता से प्रवेश करना था।
ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय।
1714 में, ग्यारह वर्ष की छोटी आयु में, जॉन वेस्ली ने उस पादरी-निवास को अलविदा कहा, जहाँ उनके पहले वर्ष इतनी शान्ति से बीते थे। चार्टरहाउस विद्यालय में, जहाँ उन्हें अब रखा गया था, वे अपनी बुद्धि और परिश्रमी आदतों के लिए उल्लेखनीय बने ; और अपने सहपाठियों के साथ मेल-जोल से उनका चरित्र सुदृढ़ हुआ। उन्होंने इस काल की सुखद स्मृतियाँ सदा बनाए रखीं, और आगे के जीवन में उस स्थान पर जाना उन्हें प्रिय था जो उन्हें उनके युवा दिनों की याद दिलाता था।
फिर भी, इस प्रारम्भिक अध्ययन-काल में उनके धार्मिक चरित्र की कोई प्रभावशाली विशेषता विकसित नहीं हुई।
वेस्ली के आत्मिक जीवन के निर्णायक संकट तक पहुँचने के लिए हमें उनके साथ ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय जाना होगा, जहाँ वे 1720 में पहुँचे और क्राइस्ट चर्च
कॉलेज में उनका नामांकन हुआ। उनके परिश्रम और बुद्धि ने शीघ्र ही 10 ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय। उन्हें सबसे प्रतिष्ठित विद्यार्थियों में से एक चिह्नित कर दिया। शास्त्रीय अध्ययन की अपनी स्वाभाविक रुचि का अनुसरण करते हुए उन्होंने विशेष रूप से प्राचीन लेखकों को अपनाया ; और महान आचार्यों से उनकी निरन्तर घनिष्ठता का परिणाम ऐसी रुचि के निर्माण में हुआ जो अपनी शुद्धता के लिए उल्लेखनीय थी, साथ ही एक व्यापक बुद्धि और एक सुघड़ तथा सशक्त शैली के निर्माण में भी। उत्तम कल्पना-शक्ति से सम्पन्न होने के कारण, वे असाधारण सहजता और सुरुचि के साथ पद्य रचते थे, और अपनी मातृभाषा में लातीनी काव्य की सुघड़ता, या इब्रानी स्तोत्रों के अधिक गम्भीर सुरों को उतारने का यत्न करते थे। साथ ही, उन्होंने अपनी मौलिक प्रतिभा को कलीसिया की उन्नति के लिए पवित्र भजनों की रचना में लगाया।
परन्तु केवल बौद्धिक वरदानों के अतिरिक्त, वेस्ली में एक असाधारण रूप से कोमल और गहन गम्भीर आत्मा थी।
जिस शान्त एकान्त में उसकी युवावस्था बीती थी, वहाँ से वह एक ऐसा चरित्र लेकर आया जो पहले ही गढ़ा जा चुका था और कर्तव्य के प्रति पवित्र आदर से ओत-प्रोत था। ऑक्सफ़ोर्ड उसके लिए एक दुःखद उद्घाटन का स्थान होने वाला था। वहाँ उसने कलीसिया के भावी पादरियों को नास्तिकतापूर्ण, यहाँ तक कि ईशनिन्दक विचार प्रकट करते देखा, और उनमें से बहुतों को खुलेआम अनियमित जीवन जीते पाया। हम सहज ही कल्पना कर सकते हैं कि आनन्द और दुराचार में लीन इन उद्दण्ड युवकों की भीड़ के बीच वह स्वयं को कितना अकेला और उजाड़ अनुभव करता होगा: उसके कठोर पालन-पोषण ने उसे ऐसे दृश्यों के लिए तैयार नहीं किया था जैसे अब उसकी आँखों के सामने थे। भ्रष्टता के इन दृश्यों का सामना करते हुए पहले तो उसका हृदय निपट विस्मय से, और फिर गहरी वेदना से भर गया। सौभाग्य से उसने अपने माता-पिता से सीखा था कि बुराई के साथ कभी समझौता न करे। उसकी शिक्षा, यह सच है, धार्मिक दृष्टि से केवल अच्छी इच्छाओं और आकांक्षाओं के निर्माण तक सीमित रही थी, परन्तु उसने उसके भीतर विरोध करने की असाधारण शक्ति भी विकसित कर दी थी।
ऐसे विरोध के बीच अकेले खड़े रहना किसी कम दृढ़ आत्मा को हतोत्साहित कर देता: परन्तु जब विवेक ने इसे कर्तव्य ठहराया, तो वेस्ली ऐसी ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से पीछे नहीं हट सकता था।
कॉलेज-जीवन का परिचय। 11
फिर भी उसे अब तक वे सच्ची नींवें नहीं मिली थीं जिन पर आत्मिक भवन खड़ा किया जाना था: उन्हें खोजने में अभी लम्बे वर्ष लगने थे। विश्वास द्वारा धर्मी ठहराया जाना, जो धर्मसुधार का केन्द्रीय सिद्धान्त था, विद्वत्तावादी सूक्ष्म तर्कों के उस जाल में उलझा होने के कारण उससे छिपा रहा: उसके धर्मविज्ञान का क्षितिज वही था जो उसके युग का था। परन्तु वेस्ली में परम्परा के शिष्य के साथ वह निष्कपट इस्राएली भी मिला हुआ था, जो परमेश्वर की सब आज्ञाओं का पालन करने का संकल्प पहले ही कर चुका था।
उसके लिए धर्मविज्ञान का अध्ययन वह नीरस प्रक्रिया नहीं था जो प्रायः बन जाता है:—जैसे-जैसे वह बाइबल के ज्ञान में आगे बढ़ा, वैसे-वैसे उसने अपने हृदय की गहराइयों को और अधिक टटोला। उसे जो बात कष्ट देती थी, वह यह थी कि उसने वहाँ परमेश्वर से एक गुप्त दूरी पाई। उसकी आत्मा और परमेश्वर के बीच, उस परमेश्वर के बीच जिसके लिए वह रची गई थी और जिसके बिना वह सुखी नहीं हो सकती थी, मेल-मिलाप फिर से कैसे स्थापित हो? क्या यह मेल-मिलाप ऐसा लक्ष्य नहीं था जिसका निरन्तर पीछा किया जाए, और क्या वह पूरी तरह प्राप्त हो भी सकता था? ये गम्भीर प्रश्न थे, जिनका सामना करते हुए वह युवा धर्मविज्ञानी व्याकुल हुआ, पर उनसे बच नहीं सकता था, क्योंकि उसकी आन्तरिक शान्ति उन्हीं के समाधान पर टिकी थी।
इस समय वेस्ली अपने पिता को जो पत्र लिखता था, उनमें केवल अमूर्त धर्मविज्ञान के प्रश्न होते थे, परन्तु अपनी माता के साथ वह अधिक खुला अनुभव करता था; और वह उन्हें अपने आन्तरिक जीवन की विभिन्न अवस्थाओं से अवगत कराता रहा। सदा सजग रहने वाली उसकी माता ने इस आत्मिक संकट का, जिसका महत्त्व वे भली-भाँति समझती थीं, आनन्द के साथ स्वागत किया।
"और अब," उन्होंने कहा, "पूरे मन से निश्चय करो कि धर्म को अपने जीवन का काम बनाओगे, क्योंकि अन्ततः कड़ाई से कहें तो आवश्यक तो यही एक बात है; बाकी सब कुछ जीवन के उद्देश्यों की तुलना में अपेक्षाकृत तुच्छ है। मैं हृदय से चाहती हूँ कि तुम अब अपनी कड़ी जाँच-परख आरम्भ करो, ताकि तुम जान सको कि यीशु मसीह के द्वारा उद्धार की तुम्हारी कोई उचित आशा है या नहीं। यदि है,
12 ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय। तो यह जान लेने का सन्तोष तुम्हारे परिश्रम का भरपूर प्रतिफल देगा; यदि नहीं है, तो तुम्हें रोने का इतना उचित कारण मिलेगा जितना किसी भी त्रासदी में नहीं मिल सकता।"
अपने जीवन के इस निर्णायक काल में वेस्ली को एक ऐसी पुस्तक से गहरा लगाव हो गया जो मनन करने वाले मनों को सदा आहार देती आई है, अर्थात् "यीशु मसीह का अनुकरण।"
इस पुस्तक में आदि से अन्त तक आध्यात्मिकता की साँस चलती है, फिर भी यह निश्चित है कि इसके पृष्ठों में मठ की गन्ध बसी है, क्योंकि ये मठ के एकान्त कोनों में ही लिखे गए थे: इसके अतिरिक्त, यद्यपि ये पहले से सुदृढ़ भक्ति को पोषण देने के योग्य हैं, फिर भी अपरिपक्व भक्ति को ये सरलता से भटका सकते हैं। आरम्भ में वेस्ली को "अनुकरण" रुचिकर नहीं लगा: उस पर उसके पहले प्रभाव प्रतिकूल थे। उसने अपनी माता से लेखक के कुछ विषयों पर, जैसे हँसी-ठिठोली और आमोद-प्रमोद पर, अतिवादी विचारों की शिकायत की। उनकी उदात्त और सुदृढ़ समझ उस उत्तर में प्रकट होती है जो उन्होंने उसे दिया। "जो कुछ भी तुम्हारी बुद्धि को दुर्बल करे, तुम्हारे विवेक की कोमलता को घटाए, परमेश्वर के प्रति तुम्हारी चेतना को धुँधला करे, या आत्मिक बातों के स्वाद को हर ले; संक्षेप में, जो कुछ भी तुम्हारे मन पर तुम्हारी देह की शक्ति और अधिकार को बढ़ाए, वह तुम्हारे लिए पाप है, चाहे वह अपने आप में कितना ही निर्दोष क्यों न हो।"
जेरेमी टेलर की "पवित्र जीवन और पवित्र मृत्यु के नियम," जिसे उसने लगभग उसी समय पढ़ा, उसका विश्वास अधिक सरलता से जीत सका: उससे उसे रहस्यवाद की ओर प्रबल झुकाव मिला। इस पुस्तक ने उसे "यीशु के अनुकरण" से भी मेल करा दिया; और बाद वाली रचना अनेक वर्षों तक उसकी सबसे प्रिय भक्ति-पुस्तिका बनी रही। विलियम लॉ की रचनाओं ने इस दिशा में उसके झुकाव को और भी दृढ़ किया। फिर भी, वेस्ली में आत्मा की स्वतन्त्रता इतनी थी कि वह अपने आत्मिक मार्गदर्शकों की अन्धी प्रशंसा में न डूबा, और अपने पत्राचार में वह अपने प्रिय लेखकों की कुछ मान्यताओं का दृढ़ता से खण्डन करता है,
आश्चर्य की बात है कि वह उस सिद्धान्त-प्रणाली की कुछ आधारशिलाएँ पहले ही रखता प्रतीत होता है जो आगे चलकर ~ रहस्यवादी। वेस्ली फ़ेलो चुना गया। 13
उसके नाम से जानी जाने वाली थी। अन्त तक स्थिर रहने, पूर्वनियति और उद्धार के निश्चय के विषय में बोलते हुए वह पहले ही उन विचारों का समर्थन करता है जिनका वह आधी शताब्दी से अधिक समय तक पक्षधर बनने वाला था। उदाहरण के लिए, निश्चय के बारे में उसके विचार इसलिए और भी उल्लेखनीय हैं कि वे उस समय के धार्मिक विश्वास से बहुत आगे थे: ये विचार बाइबल के ध्यानपूर्वक अध्ययन से उपजे थे, जिसका प्रभाव रहस्यवादी लेखकों से पड़ने वाले हानिकारक परिणामों को पहले ही अंशतः निष्प्रभावी कर रहा था।
सितम्बर 1725 में वेस्ली डीकन ठहराया गया, और अगले वर्ष ऑक्सफ़ोर्ड के लिंकन कॉलेज का फ़ेलो चुना गया। इस प्रकार स्वतन्त्र स्थिति में रखे जाने पर वह अपने दैनिक जीवन में अधिक नियमित पद्धति का पालन कर सका; और अजनबियों के बीच आ पड़ने पर उसने अपने नए साथियों का चुनाव सावधानी से किया, केवल अपनी भक्ति को बनाए रखने और बढ़ाने की इच्छा से प्रेरित होकर। उसने प्रतिदिन एक दैनिकी लिखने का भी निश्चय किया, ताकि अपनी आत्मिक दशा पर कड़ी निगरानी रख सके। वह सप्ताह में एक बार प्रभु-भोज में सम्मिलित होता, भरपूर दान देता, और आचरण की कठोर नियमितता के द्वारा पवित्रता पाने का प्रयत्न करता।
इस प्रकार मध्ययुगीन सन्तों के चिन्तनशील जीवन पर मोहित होकर और अपने सहपाठियों की भीड़ के बीच एकान्त खोजते हुए भी, उसकी प्रतिभा और सफलता ने इसी बीच सबका सम्मान जीत लिया था। सब दलों ने उसे प्रतिभाशाली और प्राचीन भाषाओं का उत्कृष्ट समालोचक माना; दार्शनिक वाद-विवाद में वह सबसे आगे रहता; कोई भी तर्कवाक्य का प्रयोग उससे अधिक कुशलता से नहीं करता था; और कोई भी प्रत्युत्तर में उससे अधिक तत्परता नहीं दिखाता था। इन विषयों में अधिकारियों की उसके विषय में जो ऊँची राय थी, वह शीघ्र ही सार्वजनिक रूप से इस प्रकार प्रकट हुई कि उसे चुना गया
यूनानी भाषा का व्याख्याता और "कक्षाओं का संचालक।" तब वह केवल तेईस वर्ष का था। फ़रवरी 1727 में उसने कला-स्नातकोत्तर (मास्टर ऑफ़ आर्ट्स) की उपाधि प्राप्त की।
उसी वर्ष अगस्त के महीने में, एपवर्थ 14 ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय। के पादरी ने, जो वृद्धावस्था की दुर्बलताओं से दबे हुए थे, अपने पुत्र जॉन से कहा कि वह घर लौट आए और उनके सहायक पादरी के रूप में उनकी सहायता करे। अगले वर्ष जॉन पुरोहित की दीक्षा लेने के उद्देश्य से ऑक्सफ़ोर्ड गया।
इसी बीच चार्ल्स वेस्ली, जो जॉन से पाँच वर्ष छोटा था, विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई कर रहा था, और उदासीनता तथा चंचलता के एक समय के बाद अपनी आत्मा के विषय में गम्भीर चिन्ता की ओर प्रेरित हुआ। उसने अपने विचार अपने कुछ सहपाठियों को बताए, जिन्होंने उसके साथ मिलकर एक छोटी सोसाइटी बनाई, आधी धार्मिक, आधी साहित्यिक। मित्रता के बन्धनों और आत्मिक आवश्यकताओं की साझा चेतना से बँधा विद्यार्थियों का यह संगठन अपने आप ही उठ खड़ा हुआ, और शीघ्र ही आत्मिक जीवन का केन्द्र बन गया। इसे अपने ऊपर तिरस्कार और सताव खींच लाने में भी देर नहीं लगी: इसे उपहास में कहा गया
"पवित्र मण्डली," और इसके सदस्यों को "मेथोडिस्ट" का उपनाम दिया गया। यह शब्द पहले भी धार्मिक पहचान के रूप में प्रयुक्त हो चुका था, और अब पहले वेस्ली के सीधे शिष्यों का, फिर हर सम्प्रदाय के उत्साही मसीहियों का सामान्य नाम बन गया, जिन पर संसार ने एक सा कलंक लगाया और एक सी निन्दा बरसाई। — जब उसका भाई ऑक्सफ़ोर्ड में इस प्रकार लगा हुआ था, तब जॉन
वेस्ली एपवर्थ में एकान्तवास में था, जहाँ उसने अपने पिता के पल्ली-जनों की संगति से भी अधिक अपने रहस्यवादी लेखकों की संगति को पसन्द किया। इस प्रभाव के अधीन, जो उस पर निरन्तर बढ़ता जा रहा था, वह पूर्ण एकान्त खोजने की ओर प्रवृत्त हुआ, और उसने यॉर्कशायर की किसी निर्जन और दूरस्थ घाटी में बसने के लिए कुछ कदम भी उठाए, जहाँ वह अपना जीवन युवाओं की शिक्षा में लगा सके। उसकी माता ने, जिनकी प्रबल व्यावहारिक बुद्धि ने ऐसे मार्ग का खतरा भाँप लिया, उसे इस योजना से यह कहकर रोका, "ऐसा जीवन तुम्हारे स्वभाव के अनुकूल नहीं होगा, और मुझे आशा है कि परमेश्वर ने तुम्हारे लिए इससे बड़ा काम रखा है।" उत्तर में रहने के इस प्रवास के दौरान उसकी भेंट "एक गम्भीर पुरुष" से हुई, जैसा कि वह उसे
"पवित्र मण्डली" की स्थापना। 15 कहता है, जिसने उसे इन अतिवादी संकल्पों को छोड़ने के लिए मना लिया। "महोदय," उसने कहा, "आप परमेश्वर की सेवा करना और स्वर्ग जाना चाहते हैं; स्मरण रखिए कि आप अकेले उसकी सेवा नहीं कर सकते: इसलिए आपको साथी ढूँढने या बनाने होंगे: बाइबल अकेले की जाने वाली भक्ति के विषय में कुछ नहीं जानती।"
लिंकन कॉलेज के रेक्टर के आग्रह पर, जिन्हें उसकी सहायता की आवश्यकता थी, और अपनी स्वाभाविक रुचियों से प्रेरित होकर, वेस्ली नवम्बर 1729 में ऑक्सफ़ोर्ड लौट आया और अपने कर्तव्य फिर से सँभाल लिए। चार्ल्स और उसके मित्र तुरन्त उसके चारों ओर एकत्र हो गए, अपनी छोटी सोसाइटी का संचालन अपने से अधिक सशक्त हाथों में सौंपकर प्रसन्न होते हुए। उस समय उसमें चार सदस्य थे: जॉन वेस्ली, चार्ल्स
वेस्ली, मॉर्गन और किर्कहैम। ये मित्र न केवल अपनी धार्मिक सहानुभूतियों में, बल्कि अपने अध्ययन में भी घनिष्ठता से बँधे थे। उन्होंने सहमति की कि सप्ताह में तीन या चार सन्ध्याएँ यूनानी नया नियम तथा यूनानी और लातीनी साहित्य पढ़ने में साथ बिताएँगे। रविवार की सन्ध्याओं को वे धर्मविज्ञान पढ़ते थे।" जॉन वेस्ली के संरक्षण में सोसाइटी ने कठोर नियमों की एक प्रणाली बनाई: उसके सदस्यों को सप्ताह में दो दिन उपवास करना था, नियमित रूप से कड़ी आत्म-परीक्षा करनी थी, और सप्ताह में एक बार प्रभु-भोज में सम्मिलित होना था। इन युवकों की तपस्वी प्रवृत्तियाँ, चाहे उन्हें प्रेरित करने वाला उद्देश्य कितना ही सराहनीय क्यों न हो, खतरे से खाली नहीं थीं; और अठारहवीं शताब्दी के धार्मिक आन्दोलन के लिए वे आरम्भ में ही घातक सिद्ध हो सकती थीं, यदि मसीही सक्रियता के एक अत्यन्त उल्लेखनीय विकास ने उनका सन्तुलन न किया होता।
ऑक्सफ़ोर्ड के इस छोटे दल में एक युवक ऐसा था जिसने, प्रतीत होता है, इस दिशा में आरम्भ में ही उसे एक अत्यन्त लाभदायक प्रेरणा दी। मॉर्गन की गहरी भक्ति, यह सच है, कुछ अतिशयोक्त कठोर तपस्या से जुड़ी थी: उसके स्वयं पर लगाए अभावों ने सचमुच उसका जीवन छोटा करने में योगदान दिया। फिर भी वही पहला था जो सुसमाचारीय सेवाओं में सक्रिय रूप से लगा; उसका हृदय और उसकी थैली सदा गरीबों के लिए खुले रहते थे; उसने अपने चारों ओर इकट्ठा किया
16 ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय। गरीब बच्चों को, जिन्हें वह शिक्षा देता और अच्छी पुस्तकें बाँटता था: वह मरणासन्न लोगों के बिछौने के पास प्रार्थना करता, और दुःखियों को सान्त्वना देता था। मॉर्गन के उदाहरण ने उसके साथियों को उसका अनुकरण करने के लिए प्रेरित किया; और उन्होंने बीमारों और बन्दियों से नियमित भेंट की योजना अपनाई, और उनमें से प्रत्येक ने इस काम के लिए सप्ताह में कई घण्टे देने का वचन दिया। परन्तु यह कार्य-पद्धति इतनी नई थी, और इतनी अनियमित प्रतीत होती थी, कि इसमें पूरी तरह लगने से पहले वेस्ली ने अपने पिता की सलाह लेने का निश्चय किया। उस आदरणीय वृद्ध ने उसकी योजनाओं को अपनी पूर्ण स्वीकृति दी। इस प्रकार प्रोत्साहित होकर उस युवा धर्मविज्ञानी ने स्वयं को आत्म-भस्म करने वाले उत्साह के साथ इस काम में झोंक दिया, इस आशा में कि इसी उपाय से उसे वह शान्ति मिलेगी जो अब तक उसके पास नहीं थी।
इसी बीच ऑक्सफ़ोर्ड का वह विश्वासयोग्य दल संख्या में बढ़ने लगा। 1735 में एक ऐसे सदस्य के जुड़ने से उसे बल मिला जिसका नाम आगे के पुनरुत्थान में अत्यन्त प्रमुख स्थान पाने वाला था। जॉर्ज व्हाइटफ़ील्ड एक निर्धन विद्यार्थी था जो अपने सहपाठियों की सेवा करके विश्वविद्यालय में अपना निर्वाह करता था। "अनुकरण" के पठन का उसके मन पर पहले ही गहरा प्रभाव पड़ चुका था, और उसने उसे अत्यन्त कठोर तपस्या की आदतों में डाल दिया था।
इसलिए वह वेस्ली और उसके साथियों से सहानुभूति रखने के लिए पूरी तरह तैयार था; उसमें उन्होंने एक उत्साही और गहन गम्भीर आत्मा का सशक्त सहायक पाया। वह उनके चरणों में बैठने को तैयार था, और उसने उनके सब नियम अपना लिए, कभी-कभी आत्मानुशासन की कठोरता में उनसे भी आगे बढ़ जाता था।
नवजात सोसाइटी पर शीघ्र ही सताव का तूफ़ान टूट पड़ा। विश्वविद्यालय में उदासीनता और अविश्वास का बोलबाला था, और वे सत्य की खोज में समर्पित होने के कारण वीर इस युवा दल की प्रगति से रुष्ट होने में देर न लगा सके। जब वे पवित्र प्रभु-भोज लेने के लिए सेंट मेरी के
गिरजाघर जाते, तो उन्हें अक्सर देखने वालों का उपहास सहना पड़ता। किसी ने उनका पक्ष नहीं लिया:
आत्म-त्याग और सताव। 17 प्राध्यापक उन्हें अतिवादिता के लिए दोष देते थे। अधिकारियों ने तो "पवित्र मण्डली" की सभाओं पर रोक लगाने का विचार भी किया। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं थी कि चारों ओर से ठुकराए जाने पर उसके कुछ सदस्य कहीं-कहीं छोड़ गए, और उसकी संख्या, जो एक समय पच्चीस से अधिक थी, घटकर पाँच रह गई। वेस्ली के लिए यह एक पीड़ादायक निराशा थी, जो यह मानने लगा था कि कलीसिया के भावी पादरियों के बीच शुद्ध धर्म के पुनरुत्थान के लिए परिश्रम करना शायद उसकी विशेष बुलाहट हो।
इसी विश्वास के कारण उसने पहले ही किसी पल्ली का भार लेने से इनकार कर दिया था। परन्तु वह हतोत्साहित नहीं हुआ, और अपने भाई की सहायता से अपने काम में डटा रहा।
उसके विश्वासों की दृढ़ता ने उसे भय से ऊपर उठा दिया: वह उपहास का सामना पूरी शान्ति से करता था, विशेष रूप से तब जब धार्मिक हित इसे उसका कर्तव्य बना देते। इसी भावना से प्रेरित होकर वह अपनी स्थिति के किसी व्यक्ति के लिए प्रचलित रीति से कहीं अधिक मितव्ययिता से रहता था, ताकि सब अनावश्यक व्यय से बच सके और निर्धनों की सहायता के लिए उसके पास कुछ बचा रहे। इसी कारण, गाड़ी के किराये का खर्च बचाने के लिए वह अपनी यात्राएँ पैदल करने का आदी हो गया, कभी-कभी सैकड़ों मील चलता हुआ, और इस प्रकार अनजाने ही अपने भावी परिश्रमों के लिए स्वयं को तैयार करता हुआ।
यद्यपि इस आत्म-त्यागी भावना की जितनी प्रशंसा की जाए कम है, परन्तु शारीरिक अभावों के विषय में, जिन्हें वेस्ली स्वयं पर लादता रहा, यही नहीं कहा जा सकता। इन्होंने, उसकी प्रबल शारीरिक और मानसिक सक्रियता के साथ मिलकर, उसके स्वास्थ्य को गम्भीर हानि पहुँचाई। वह अत्यन्त दुर्बलता की दशा में पहुँच गया, और उसे खून थूकना आरम्भ हो गया। एक रात उसकी एक रक्तवाहिनी फट गई, और उसने समझा कि उसका समय आ गया है। "हे प्रभु," उसने कहा, "अपने आगमन के लिए मुझे तैयार कर, और फिर जब चाहे आ!"
परन्तु उसकी देह की सामर्थ्य ने उसे सँभलने में सहायता दी, और एक योग्य चिकित्सक की देखभाल से वह स्वस्थ हो गया। जीवन की अल्पता के गहरे बोध के साथ उसने तुरन्त अपना काम फिर आरम्भ कर दिया।
वेस्ली को अब तक ज्योति नहीं मिली थी। उसका पत्राचार c 18 अमेरिका में मिशन। दिखाता है कि वह बारी-बारी से आशा और भय के झोंकों में डोलता था, और यह नहीं जानता था कि लंगर कहाँ डाले। प्रगति की इस अवस्था में वह दुर्भाग्य से धर्मी ठहराए जाने को पवित्रीकरण के साथ मिला बैठा, और व्यवस्था के कामों से वह पाना चाहता था जो केवल विश्वास का फल है। उसने पवित्र, नम्र और समर्पित होने के लिए परिश्रम किया; फिर भी वह असफल रहा, क्योंकि पवित्र आत्मा द्वारा उसका नया जन्म नहीं हुआ था। इस महान विषय पर उसके विचार उलझे हुए और स्वयं-विरोधी थे। पन्द्रह वर्ष से अधिक का समय ऑक्सफ़ोर्ड में मनन और अध्ययन में बीत चुका था, फिर भी उसने परम भलाई को अपने अधिकार में नहीं पाया था।
यह आन्तरिक शान्ति, जिसे वह विश्वविद्यालय में न पा सका था, अब वह मिशन-क्षेत्र की सक्रियता में खोजने जा रहा था।
अमेरिका में मिशन। ' op kno [अस्पष्ट मूल पाठ] वेस्ली अपने ऑक्सफ़ोर्ड के जीवन से अलग होने का इच्छुक कदापि नहीं था; उसकी कठोरता ने ही उसे मोह लिया था; वह स्वयं को एक विशेष बुलाहट द्वारा उस कार्य की ओर खिंचा हुआ अनुभव करता था जिसमें वह लगा हुआ था, अर्थात् विद्यार्थियों के बीच शुद्ध धर्म को पुनर्जीवित करना। वह सचमुच उसके परिश्रम के योग्य पल्ली थी।
वह इसके महत्त्व से इतना गहराई से प्रभावित था कि जब उसके पिता ने प्रस्ताव रखा कि वह उनका सहायक पादरी बने, तो उसने उसे अस्वीकार करना अपना कर्तव्य समझा; और जब अप्रैल 1735 में उनकी मृत्यु हुई, तो सारे परिवार के आग्रह के बावजूद* उसने उनका उत्तराधिकारी बनने से इनकार कर दिया। दो हज़ार से कम निवासियों वाली एक पल्ली की देखभाल उस समय उस व्यक्ति को घबरा देती थी जिसने कुछ वर्ष बाद पुकारकर कहा,
"संसार मेरी पल्ली है।" फिर भी यह कायरता का प्रमाण नहीं था, * उनकी माता को छोड़कर।—अनु.
जॉर्जिया की बुलाहट। 19 यह तो स्वयं पर और अपनी शक्तियों पर सच्चे अविश्वास से उपजा था। यह इस तथ्य से भली-भाँति प्रकट है कि इन प्रस्तावों को ठुकराने के कुछ ही सप्ताह बाद उसने स्वयं को एक छोटी देहाती पल्ली के काम से बहुत भिन्न कार्य हाथ में लेने के लिए बुलाया हुआ पाया। जिस क्षण उसने विश्वास किया कि प्रभु की व्यवस्था उसे इसकी ओर निर्देशित कर रही है, उसने उस स्थान से बाँधने वाले सब बन्धन तोड़ दिए जिसे वह प्रेम करता था, और परमेश्वर की वाणी का सीधे-सादे आज्ञापालन के साथ अनुसरण किया।
इससे लगभग तीन वर्ष पहले उत्तरी अमेरिका में सैवाना नदी के तट पर एक नई बस्ती बसाई गई थी। निजी उद्यम को सरकारी सहायता का साथ मिला था, और जॉर्जिया नाम की यह बस्ती तेज़ी से उन्नति कर रही थी। जिस कम्पनी के हाथ में आरम्भ में इसका प्रबन्ध था, वह इस उपक्रम को मसीही आधार पर खड़ा करना चाहती थी, और अब कुछ भक्त और उत्साही युवा पादरियों की खोज में थी जो बसने वालों और इण्डियनों दोनों के बीच सुसमाचार प्रचार में स्वयं को लगाने को तैयार हों। ऑक्सफ़ोर्ड के युवा मेथोडिस्ट विद्यार्थी ऐसे उपक्रम के लिए ठीक उपयुक्त प्रतीत हुए। फिर भी वेस्ली ने इस विषय में पहले प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया, यह आपत्ति करते हुए कि वह अपनी विधवा माता को छोड़ना नहीं चाहता, जिनका वह अब मुख्य सहारा था। और अधिक दबाव डाले जाने पर उसने इस शर्त पर अपनी सहमति दी कि उसकी माता भी सहमति दें। माता ने, जो सदा सर्वोच्च आत्म-बलिदान के लिए तैयार रहती थीं, उद्गार किया, "यदि मेरे बीस पुत्र होते, तो मुझे प्रसन्नता होती कि वे सब ऐसे ही काम में लगे हैं, चाहे मैं उन्हें फिर कभी न देख पाती।"
14 अक्टूबर 1735 को दोनों वेस्ली अपने दो मित्रों, चार्ल्स डेलामोट और बेंजामिन इंघम के साथ जॉर्जिया के लिए जहाज़ पर सवार होने के उद्देश्य से लंदन से ग्रेवज़ेंड के लिए रवाना हुए। उन्हें जहाज़ पर एक सौ चौबीस प्रवासी मिले; और इनमें छब्बीस
मोरावियन थे, जिनके साथ उनके बिशप डेविड निट्शमान थे।
आरम्भ से ही वेस्ली इन उत्कृष्ट मसीहियों की ओर तीव्रता से आकर्षित हुआ, जिन्हें उसके धार्मिक चरित्र पर इतना c a2 20 अमेरिका में मिशन। सशक्त प्रभाव डालना था। अपने स्वाभाविक उत्साह के साथ उसने तुरन्त
जर्मन सीखने में स्वयं को लगा दिया, ताकि वह उनकी अपनी भाषा में उनसे बातचीत कर सके।
उन दिनों अमेरिका की समुद्र-यात्रा में कई महीने लग जाते थे। वे अपने तैरते निवास में बसे ही थे कि वेस्ली और उसके तीन साथियों ने आत्म-दमन के अपने सिद्धान्तों को विस्तृत रूप में व्यवहार में लाने का निश्चय किया। वह अपनी दैनिकी में लिखता है, "यह मानते हुए कि अपने आप का इनकार, छोटी से छोटी बातों में भी, परमेश्वर की आशीष से हमारे लिए सहायक हो सकता है, हमने माँस और दाखमधु का सेवन पूरी तरह छोड़ दिया और अपने को शाकाहारी भोजन तक सीमित कर लिया,
—मुख्यतः चावल और बिस्कुट।" कुछ दिन बाद वह जोड़ता है, "यह देखकर कि शरीर को उतने बार-बार भोजन की आवश्यकता नहीं है जितना हम करते आए थे, हम सहमत हुए कि रात का भोजन छोड़ दें।"
एक रात, तूफ़ान से उसका बिछौना भीग जाने के कारण फ़र्श पर सोना पड़ा, तो वेस्ली ने पाया कि इसमें ऐसा कुछ नहीं जो स्वस्थ मनुष्य आसानी से सह न सके, और उसने निष्कर्ष निकाला कि भविष्य में "बिस्तर पर (जैसा कहा जाता है) सोना आवश्यक नहीं रहेगा।" ये सचमुच दया के योग्य भूलें थीं, फिर भी उन मनुष्यों में आश्चर्य की बात नहीं जो पवित्रता की सच्ची अभिलाषा से घायल थे, पर उसे अपनी ही धार्मिकता के अन्धकारमय मार्ग में खोज रहे थे।
समय के हर क्षण को मोल लेने पर तुले हुए वेस्ली और उसके मित्रों ने अपनी सब गतिविधियाँ सैनिक अनुशासन की कठोरता से नियमित कीं। प्रातः चार बजे से पहले उठकर वे एक घण्टा निजी प्रार्थना में लगाते थे। पाँच से सात बजे तक वे साथ मिलकर बाइबल का अध्ययन करते, उसकी तुलना मसीही कलीसिया-पिताओं के लेखों से सावधानी से करते। आठ बजे, सादे नाश्ते के बाद, वे सार्वजनिक आराधना कराते, जिसमें सब यात्रियों को आमन्त्रित किया जाता था। नौ से बारह बजे तक वेस्ली जर्मन सीखता, उसका भाई उपदेश लिखता,
डेलामोट यूनानी का अध्ययन करता, और इंघम बच्चों को पढ़ाता। बारह बजे वे अपनी योजनाओं पर खुलकर बातचीत करते।
दोपहर यात्रियों के बीच भलाई करने के नम्र प्रयासों में बीतती, जिनसे वे युवा मिशनरी बातचीत करते या भक्ति-पुस्तकें पढ़कर सुनाते। चार बजे फिर प्रार्थनाएँ पढ़ी जातीं। सन्ध्या भी पठन और बातचीत में लगती; और जब इतने भरे हुए दिन के बाद वे अपने कठिन परिश्रम से कमाए विश्राम के लिए चले जाते, तो "न समुद्र की गर्जना, न जहाज़ की हलचल उस ताज़गी भरी नींद को छीन सकती थी जो परमेश्वर उन्हें देता था।"
अपने इन स्वयं-आरोपित अभावों में ये युवक यीशु मसीह के शिष्यों से अधिक à केम्पिस और सेंट बर्नार्ड के शिष्य प्रतीत होते हैं। हम वही संघर्ष देखते हैं, अनुशासन और आत्म-त्याग द्वारा शरीर को वश में करने का, और मन को मनन की आदतों का अभ्यस्त बनाने का, जैसा हम ऑक्सफ़ोर्ड की सोसाइटी में पहले देख चुके हैं। परन्तु हम उनके भीतर एक उदात्त इच्छा को भी जागते देखते हैं, कि वे अपने समय का बड़ा भाग सुसमाचार-प्रचार के कार्य में लगाएँ। यहीं हम उनकी अस्थायी त्रुटियों का एक अत्यन्त मूल्यवान सुधारक पाते हैं।
यात्रा लम्बी और कष्टदायक थी: कई अवसरों पर तूफ़ानों ने उस जहाज़ को निगल जाने का भय दिखाया जिसमें वे सवार थे। संकट की इन घड़ियों में सब ओर घबराहट थी: वेस्ली स्वयं भी भय से मुक्त नहीं था; वह मृत्यु के निकट आने पर काँप उठा, और यह देखकर लज्जित हुआ कि आवश्यकता की घड़ी में उसका विश्वास उसे सँभालने के लिए अपर्याप्त है। मोरावियनों का शान्त और स्थिर रुख अन्य यात्रियों के रुख से विलक्षण भिन्न था, और इसने उसे चकित कर दिया।
जहाज़ पर चढ़ने के क्षण से ही उसने उनकी गहरी भक्ति को देखा था: उसने उन्हें सदा नम्र पाया था, अन्य यात्रियों के लिए अत्यन्त अपमानजनक सेवाएँ करने को तैयार, और हर प्रकार के अपमान को धीरज से सहने को सन्नद्ध। परन्तु तात्कालिक मृत्यु की सम्भावना के सामने उनका रुख ही था जिसने उसे सबसे अधिक चकित किया। एक दिन, ठीक जब जर्मन लोगों ने अपनी सभा आरम्भ की थी, अचानक तूफ़ान उठा: लहरें बड़ी प्रचण्डता से जहाज़ पर टूट पड़ीं, डेकों को पूरी तरह धोती हुई निकल गईं और मुख्य पाल (maina9 अमेरिका में मिशन।) को चिथड़े-चिथड़े कर दिया। बहुतों ने भय से चीख मारी। केवल मोरावियन अविचलित दिखाई दिए और अपना गाना गाते रहे।
बाद में वेस्ली ने उनमें से एक से पूछा, "क्या आप डरे नहीं?" उसने उत्तर दिया, "परमेश्वर का धन्यवाद, नहीं।" "परन्तु क्या आपकी स्त्रियाँ और बच्चे नहीं डरे?" "नहीं; हमारी स्त्रियाँ और बच्चे मरने से नहीं डरते।" वेस्ली ने अनुभव किया कि यह ऐसी बात थी जहाँ वह अब तक नहीं पहुँचा था।
6 फ़रवरी 1736 को, लगभग सुबह आठ बजे, उन्होंने पहली बार अमेरिकी भूमि पर पाँव रखा। नए संसार के तटों पर पहली बार उतरते समय क्रिस्टोफ़र कोलम्बस की भाँति वेस्ली घुटनों के बल गिर पड़ा; और यह भलीभाँति कहा जा सकता है कि जैसे पन्द्रहवीं शताब्दी का वह महान अन्वेषक अपनी खोज की विशालता से अनजान था, उससे भी कम अठारहवीं शताब्दी का वह महान मिशनरी इस बात से अवगत था कि उसके अनुयायियों को उस महाद्वीप पर, जो अब उसके सामने फैला था, कितना विशाल कार्य पूरा करना है।
उसके आगमन के अगले दिन उसकी भेंट एक मोरावियन पादरी से हुई। उस समुदाय की हर स्वीकृत बात में पूरा भरोसा रखते हुए, जिसका वह पहले ही आदर करना सीख चुका था, उसने उस कार्य के विषय में निर्देश माँगे जिसमें वह लगने वाला था। "मेरे भाई," मोरावियन ने कहा, "मुझे पहले आपसे एक-दो प्रश्न पूछने होंगे।
क्या आपके भीतर साक्षी है? क्या परमेश्वर का आत्मा आपकी आत्मा के साथ गवाही देता है कि आप परमेश्वर की सन्तान हैं?" सिखाने के अधिक अभ्यस्त, सीखने के नहीं,
वेस्ली इन सीधे प्रश्नों से चकित हुआ, और "नहीं जानता था कि क्या उत्तर दे।" उसकी उलझन देखकर उसका नया मित्र आगे बोला, "क्या आप यीशु मसीह2 को जानते हैं?"
वेस्ली ने उत्तर दिया, "मैं जानता हूँ कि वह जगत का उद्धारकर्ता है।" "सच है," उसने कहा, "परन्तु क्या आप जानते हैं कि उसने आपको बचाया है?" "मुझे आशा है कि वह मुझे बचाने के लिए मरा।" स्पैंगेनबर्ग ने एक और प्रश्न जोड़ा, "क्या आप स्वयं को जानते हैं?"
वेस्ली ने उत्तर दिया, "हाँ, जानता हूँ;" परन्तु वह जोड़ता है, "मुझे भय है कि वे व्यर्थ शब्द थे।" तब मोरावियन पादरी ने अपना व्यक्तिगत अनुभव और मन-परिवर्तन सुनाया: उस वृत्तान्त ने
मोरावियनों से सम्पर्क। 20 उस युवा मिशनरी पर गहरी छाप छोड़ी, और उसे और भी स्पष्टता से विश्वास दिला दिया कि कोई बात अभी अधूरी है। इन अच्छे जर्मनों के साथ निरन्तर संगति से ये छापें और भी गहरी हो गईं। डेलामोट के साथ उनकी छत के नीचे ठहरते हुए, वह उनके पवित्र जीवन की प्रशंसा किए बिना न रह सका। वह कहता है, "वे सदा काम में लगे रहते थे, स्वयं सदा प्रसन्न, और एक-दूसरे के साथ सद्भाव में; उन्होंने सब क्रोध, झगड़े, रोष, कड़वाहट, कोलाहल और बुरी बातें दूर कर दी थीं; वे उस बुलाहट के योग्य चलते थे जिसके लिए वे बुलाए गए थे, और सब बातों में हमारे प्रभु के सुसमाचार को शोभित करते थे।"
इन मसीहियों की संगति में उसके जमे हुए कलीसियाई पूर्वाग्रह धीरे-धीरे घिसते गए। एक दिन वह उनकी कलीसिया की एक सभा में उपस्थित था, जब कई घण्टे विचार-विमर्श और प्रार्थना में बिताने के बाद उन्होंने एक बिशप का चुनाव और अभिषेक किया। ऑक्सफ़ोर्ड का वह पूर्व विद्यार्थी इस सेवा की गम्भीरता और सादगी से प्रभावित हुआ, जो ऐसे अवसर पर एंग्लिकन
कलीसिया द्वारा अपनाई जाने वाली रीति से इतनी भिन्न थी। वह कहता है, "सब कुछ की अत्यन्त सादगी और साथ ही गम्भीरता ने मुझे लगभग बीच के सत्रह सौ वर्ष भुला दिए, और मुझे ऐसा लगा मानो मैं उन सभाओं में से किसी एक में हूँ जहाँ रूप और ठाठ-बाट न थे; बल्कि तम्बू बनाने वाला पौलुस या मछुआरा पतरस अध्यक्षता करता था; फिर भी आत्मा और सामर्थ्य के प्रदर्शन के साथ।"
वेस्ली ने इण्डियनों के सुसमाचार प्रचार पर विशेष ध्यान देने का वचन दिया था। इसलिए वह उन तक तुरन्त पहुँचने के लिए उत्सुक था; परन्तु उसकी योजनाओं के मार्ग में अनेक बाधाएँ थीं। उसने अनुभव से सीखा कि सभ्य समुदाय का पड़ोस ही अपने आप में विधर्मियों के मन-परिवर्तन के लिए एक भयंकर बाधा है। दूसरी ओर, वह अपना स्वामी स्वयं नहीं था, और बस्ती का गवर्नर नहीं चाहता था कि वह यूरोपीय बस्ती से अनुपस्थित रहकर 24 अमेरिका में मिशन।
इण्डियनों के पीछे उनके कच्चे डेरों तक जाए। फिर भी उसने जितना उसके वश में था उनकी भलाई करने का प्रयत्न किया, इस आशा में कि परिस्थितियाँ किसी दिन उसे अपनी पूरी शक्ति ऐसे काम में लगाने की अनुमति देंगी। फ़िलहाल बसने वाले लोग निरन्तर पास्टरीय देखभाल की माँग करते थे, इसलिए मिशनरियों ने उचित समझा कि उन्हीं से आरम्भ करें।
वेस्ली की दैनिकी दिखाती है कि उसने कितने उत्साह से स्वयं को इस काम में झोंक दिया। सैवाना में भी, ऑक्सफ़ोर्ड की भाँति, छोटे बच्चे ही थे जिन्होंने उसके सबसे गम्भीर प्रयासों का दावा किया: गरीब, बीमार और युवा उसकी विशेष देखभाल के पात्र थे।
उसे दासों में भी गहरी रुचि थी, जो उस समय भी अमेरिका में बहुत थे; और उसने उनकी दशा सुधारने का प्रयत्न किया। भाषाओं के लिए उसमें जो उल्लेखनीय प्रतिभा थी, वह संसार के हर कोने से यहाँ लाए गए प्रवासियों की भीड़ के बीच उसके काम आई। जर्मन में उसके हाल के अध्ययन ने उसे कुछ निर्धन प्रवासियों को, जो अन्यथा अनुग्रह के सब साधनों से वंचित रह जाते, कुछ परिचित प्रवचन देने में सक्षम बनाया।
सैवाना के कुछ फ़्रांसीसी बसने वालों के आग्रहपूर्ण अनुरोध पर उसने उनकी भाषा में धार्मिक सभाएँ चलाईं। पीडमॉण्ट के कई वाल्डेंसियों ने उससे इतालवी में सभा करने को कहा, जिसे करने का प्रयास करने पर भी वह सहमत हुआ। अन्त में, भाषाविद् के रूप में अपनी योग्यता और मिशनरी के रूप में अपने उत्साह के एक और प्रमाण के रूप में उसने स्पेनी भाषा सीखनी आरम्भ की, ताकि वह अपने "यहूदी पल्ली-जनों" से बातचीत कर सके, जिनमें से कुछ, उसके शब्दों में, "उस मन के, जो मसीह में था, उनमें से बहुतों की अपेक्षा अधिक निकट प्रतीत होते हैं जो उसे प्रभु कहते हैं।"
ऑक्सफ़ोर्ड की भाँति वेस्ली ने जिन थोड़े-से भक्त जनों से भेंट की, उन्हें छोटी सोसाइटियों में इकट्ठा करने का प्रयत्न किया, जो सप्ताह में एक या दो बार मिलती थीं, ताकि सदस्य स्वयं की जाँच कर सकें और एक-दूसरे को सिखा और समझा सकें। यह ध्यान देने योग्य है कि ये छोटी सभाएँ, जिन्होंने आगे चलकर उस संगठन में जिसका वह संस्थापक था इतनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसकी अपनी आत्मिक आवश्यकता थीं, इससे पहले कि वे बन पातीं
सैवाना में परिश्रम। 25 उस विशाल कलीसियाई संगठन का इतना महत्त्वपूर्ण तत्त्व जो उसका नाम धारण करता है।
उस मिशनरी ने जिस छोटी मंडली को अपने चारों ओर इकट्ठा किया था, उस पर अपने प्रभाव के अतिरिक्त, उपनिवेश की जनसंख्या के एक बड़े भाग पर भी उसका प्रभाव था, जो व्यापक तो था पर उतना गहरा नहीं। उसके चरित्र की पवित्रता ने, उसकी प्रतिभा से भी अधिक, उनका विश्वास और आदर जीतने में सहायता की। भीड़ की भीड़ उसके उपदेश सुनने उमड़ती थी, और उसका गहरा प्रभाव पड़ता था।
एक दिन उसने मंच से इस बात की शिकायत की कि लोग किसी सांसारिक उत्सव के योग्य पहनावे में कलीसिया में आते हैं; उस दिन से उसके श्रोताओं ने उसे दोष निकालने का कोई अवसर नहीं दिया, बल्कि वे सार्वजनिक आराधना में अधिक शालीन वस्त्र पहनकर आने लगे। एक संध्या को नगर के एक प्रमुख परिवार ने ठीक उसी समय नृत्य-समारोह आयोजित करने का निश्चय किया जब वेस्ली अपनी सभा कर रहा था; परिणाम की कुछ चिन्ता के साथ प्रतीक्षा की गई, परन्तु पास्टर की प्रतिष्ठा नृत्य-समारोह के आकर्षणों पर भारी पड़ी: समारोह सूना रहा, जबकि कलीसिया भरी हुई थी।
तथापि यह लोकप्रियता अधिक समय तक न टिकी। अपने अत्यधिक कलीसियाई विचारों से प्रभावित होकर वेस्ली ने कुछ अनुशासन-सम्बन्धी नियमों से अपने सदस्यों को खिझा दिया। कलीसिया की प्राचीन प्रथाओं को पुनर्जीवित करने की इच्छा से उसने, उदाहरण के लिए, डुबकी के अतिरिक्त किसी और रीति से बपतिस्मा देने से इनकार कर दिया। उसने ऐसे किसी भी सेवक द्वारा दिए गए बपतिस्मा की वैधता को भी मानने से इनकार किया जिसने बिशप के हाथों अभिषेक न पाया हो, और यहाँ तक बढ़ गया कि सच्चे भक्त लोगों को भी प्रभु-भोज से यह कहकर दूर कर दिया कि "उनका बपतिस्मा अवैध था।"
इस अति-कर्मकाण्डवाद के साथ-साथ वेस्ली और उसके मित्रों की निरन्तर तपस्या ने भी लोगों को अप्रसन्न किया।
यद्यपि यह सच है कि वेस्ली ने इस प्रकार अपने सदस्यों को कुछ वास्तविक कष्ट पहुँचाए, फिर भी यह कहना होगा कि उसे जिस तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा उसका मुख्य कारण सुसमाचार के प्रति वह बैर था जो मनुष्य के हृदय में अनुकूल भूमि पाता है, 26 मन-परिवर्तन। और विशेष रूप से ऐसे समुदाय में जो हर वर्ग के प्रवासियों और साहसिकों जैसे विषम तत्वों से मिलकर बना था। कुछ महीनों के बाद भीड़ का उत्साह उदासीनता में बदल गया, और वह शीघ्र ही खुले वैर में परिणत हो गया। वेस्ली ने सवाना के मुख्य न्यायाधीश के परिवार से सम्बन्धित एक युवती को प्रभु-भोज में सम्मिलित करने से इनकार करना अपना कर्तव्य समझा; इस पर विरोध ने इतना भयंकर रूप ले लिया कि उसने देखा कि उपनिवेश में अपनी सेवकाई जारी रखना असम्भव है, और उसे इंग्लैंड लौटने को विवश होना पड़ा। यह दिसम्बर 1737 की बात है। इससे पन्द्रह महीने पहले उसके भाई चार्ल्स को भी वहाँ से जाना आवश्यक लगा था।
इस प्रकार वह मिशनरी अभियान, जो इतने उत्साह से और इतने अनुकूल संकेतों के बीच आरम्भ हुआ था, अपमानजनक पराजय में समाप्त हुआ। फिर भी यह परीक्षा वेस्ली के चरित्र के विकास के लिए आवश्यक थी। इसने उसे दिखा दिया कि उसकी भक्ति किस दुर्बल नींव पर टिकी थी। इसने उस भवन को ढहा दिया जो उस पर इतने परिश्रम से खड़ा किया गया था; परन्तु इन खण्डहरों से एक और अधिक टिकाऊ भवन उठना था, जो हर आँधी-तूफ़ान को सह सकता था।
वे दो सप्ताह, जो वेस्ली ने उस जहाज़ पर बिताए जो उसे इंग्लैंड वापस ले जा रहा था, उसके लिए अत्यन्त मूल्यवान सिद्ध हुए।
अपनी पिछली यात्रा की तरह साथी यात्रियों की आत्मिक भलाई में लगे रहते हुए भी, उसकी अपनी दशा उसके लिए गहरी चिन्ता का विषय थी। उसकी डायरी दुखभरे अंगीकारों से भरी है, जिनमें उस शान्ति का कोई चिह्न नहीं जो सरल विश्वास से उत्पन्न होती है। इंग्लैंड वापसी। , 27 वह कहता है, "मैं अमेरिका गया था
"इण्डियनों को मसीही बनाने; पर हाय! मुझे कौन मन-फिराएगा?
अविश्वास के इस बुरे हृदय से मुझे कौन छुड़ाएगा, वह कौन है? मेरे पास एक अच्छा-सा ग्रीष्मकालीन धर्म है: मैं अच्छा बोल लेता हूँ; यही नहीं, जब तक कोई संकट पास नहीं होता तब तक मैं स्वयं भी विश्वास कर लेता हूँ 5 पर जब मृत्यु मेरे सामने आँखों में आँखें डालकर देखती है, तो मेरी आत्मा व्याकुल हो उठती है।
और न मैं कह सकता हूँ, 'मरना लाभ है।' . . . हाय! मृत्यु के इस भय से मुझे कौन छुड़ाएगा? मैं क्या करूँ? इससे बचकर मैं कहाँ भागूँ?"
पाँच दिन बाद वह लिखता है, "मुझे अपना देश छोड़े हुए अब दो वर्ष और लगभग चार महीने हो गए हैं, ताकि जॉर्जिया के इण्डियनों को मसीही धर्म का स्वरूप सिखाऊँ; परन्तु इस बीच मैंने स्वयं क्या सीखा 2
यही (जिसका मुझे सबसे कम सन्देह था) कि मैं, जो दूसरों को मन-फिराने अमेरिका गया था, स्वयं कभी परमेश्वर की ओर नहीं फिरा Godiereveus [अस्पष्ट मूल पाठ] पृथ्वी के छोर पर मैंने यह सीखा है—कि मैं 'परमेश्वर की महिमा से रहित हो गया हूँ': कि मेरा सारा हृदय 'सर्वथा भ्रष्ट और घृणित' है; और परिणामस्वरूप मेरा सारा जीवन भी (क्योंकि यह हो नहीं सकता कि 'बुरा पेड़' 'अच्छा फल लाए'): कि,
परमेश्वर के जीवन से 'अलग' होकर मैं 'क्रोध की सन्तान' और नरक का वारिस हूँ: कि मेरे अपने काम, मेरे अपने कष्ट, मेरी अपनी धार्मिकता एक अप्रसन्न परमेश्वर से मेल कराने में, या उन पापों में से सबसे छोटे के लिए भी प्रायश्चित्त करने में, जो 'मेरे सिर के बालों से भी अधिक हैं', इतने असमर्थ हैं कि उनमें जो सबसे सुन्दर दिखते हैं उन्हें भी स्वयं प्रायश्चित्त की आवश्यकता है, नहीं तो वे टिक नहीं सकते
उसके धर्ममय न्याय के सामने: कि अपने हृदय में 'मृत्यु की आज्ञा' पाए हुए, और अपने में या अपनी ओर से कुछ भी प्रस्तुत करने को न रखते हुए, मुझे एकमात्र यही आशा है कि 'उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है' मैं सेंतमेंत धर्मी ठहराया जाऊँ: मेरी बस यही आशा है कि यदि मैं ढूँढ़ूँगा तो मसीह को पाऊँगा, और 'उसमें पाया जाऊँगा, जिसमें मेरी अपनी वह धार्मिकता नहीं जो व्यवस्था से है, परन्तु वह जो मसीह पर विश्वास करने से है, अर्थात् वह धार्मिकता जो विश्वास के आधार पर परमेश्वर की ओर से मिलती है।'"
इन उद्धरणों से, जिन्हें बढ़ाना सरल होगा, 28 मन-परिवर्तन। हम देखते हैं कि वेस्ली अमेरिका से निराश और उदास होकर लौटा: उसने अन्ततः अपने आप को जान लिया था, और अपनी डायरी में वह कड़वी वाक्पटुता के साथ अपने आत्मिक जीवन के इस चरण का वर्णन करता है। इन थोड़ी-सी विषादपूर्ण पंक्तियों से हम उसके भीतरी संघर्षों की तीव्र पीड़ा को भली-भाँति समझ सकते हैं। यह कितना सच है कि जहाँ अनपढ़ और सरल लोगों पर सत्य प्रायः अचानक चमक उठता है, वहाँ विद्वान और शास्त्रज्ञ व्यक्ति के मामले में उसे पहले पूर्वाग्रह के मोटे पर्दे को भेदना पड़ता है।
फिर भी यह असम्भव था कि परमेश्वर ऐसी आत्मा को, जो उसे इतनी लगन से ढूँढ़ रही थी, देर तक अन्धकार में रहने देता। निर्णायक परिवर्तन लाने में, जिसने उसे मसीह यीशु में नया मनुष्य बना दिया, फिर मोरावियनों को ही साधन बनाया गया। अमेरिका से लौटने के बहुत शीघ्र बाद वेस्ली का इन उत्तम मसीहियों में से कई के साथ सम्पर्क हुआ, जो विनम्रता से उन गम्भीर प्रवृत्ति के लोगों में से, जिनसे उनकी भेंट होती थी, छोटी-छोटी सोसाइटियाँ बटोरने के कार्य में लगे थे। ये सोसाइटियाँ धार्मिक जीवन के सच्चे केन्द्र थीं, और वेस्ली की आत्मिक अवस्था के विशेष रूप से अनुकूल थीं। वह तुरन्त उनसे जुड़ गया, और इसी प्रकार उसकी जान-पहचान एक मोरावियन भाई से हुई, जिसे उसे उद्धार के मार्ग पर ले जाना था। पीटर बोहलर जर्मनी से अभी-अभी पहुँचा था: उसकी सरल और व्यावहारिक भक्ति, और शास्त्र के उसके ज्ञान ने, उसे उस महत्त्वपूर्ण सेवा के लिए भली-भाँति योग्य बनाया था जो परमेश्वर ने ठहराया था कि वह इस संकट की घड़ी में वेस्ली के लिए करे। उनकी जान-पहचान 7 फरवरी 1738 को आरम्भ हुई, जो "बहुत स्मरण रखने योग्य दिन था," जैसा वेस्ली ने सच ही कहा है। उस दिन से इस विशिष्ट मसीही के साथ उसकी भेंटें बार-बार होने लगीं; और उनमें वह एक छोटे बच्चे की नम्रता के साथ उसके चरणों में बैठता था,
ऑक्सफ़ोर्ड के इस धर्मविज्ञानी ने अपनी सारी कठिनाइयाँ अपने नए मित्र के सामने रखीं, जिसने उसे लातीनी में उत्तर दिया,—उसी भाषा में जिसमें वे बातचीत करते थे,— Wifrater, mi frater, excoquenda est
Peter Bohler. 29 asta twa philosophia. [लातीनी: तेरे इस दर्शनशास्त्र को शुद्ध करके निकालना होगा] "हे मेरे भाई, हे मेरे भाई, तेरे उस दर्शनशास्त्र को निकाल फेंकना होगा।" उसने उसे निकाल फेंका, और इतनी पूर्णता से कि शीघ्र ही वह इस दृढ़ धारणा पर पहुँचा कि सच्चे विश्वास के स्वरूप के विषय में वह अब तक भ्रम में था, जो उसे प्रकट किए हुए सत्य के प्रति केवल बौद्धिक सहमति मानता था। उसके मित्र ने उसे सिखाया कि जहाँ कहीं यह जीवित विश्वास होता है, वहाँ वह आनन्द और पवित्रता उत्पन्न करता है, और यह विश्वास स्वयं और कुछ नहीं बल्कि "वह दृढ़ भरोसा और निश्चय है जो मनुष्य को परमेश्वर पर होता है, कि मसीह की योग्यता के द्वारा उसके पाप क्षमा हुए, और वह परमेश्वर की कृपा से मेल-मिलाप पा चुका है।" ये विचार वेस्ली के लिए नए थे, और उसके मन में कुछ आपत्तियाँ उठाते थे; परन्तु बोहलर ने, जो नहीं चाहता था कि वह उसके अपने कथनों पर भरोसा करे, उसे पवित्रशास्त्र की ओर भेजा। वेस्ली ने यूनानी नया नियम फिर से पढ़ना आरम्भ किया, यह निश्चय करके कि वह व्यवस्था और साक्षी पर ही टिका रहेगा: वहाँ उसे अपने मित्र की शिक्षाओं का दृढ़ समर्थन मिला; ऐसे वचनों के सामने उसकी आपत्तियाँ एक-एक करके मिटती गईं, जैसे, "आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं;"
"जो परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करता है, वह अपने ही में गवाही रखता है;" 'जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता।' परन्तु वह "समझ नहीं पाता था कि यह विश्वास एक क्षण में कैसे दिया जा सकता है," और मन-परिवर्तन तत्क्षण कैसे हो सकता है।
तथापि ये सन्देह पवित्रशास्त्र के निष्ठापूर्वक अध्ययन से, और मोरावियनों के साथ बातचीत से दूर हो गए, जिन्होंने गवाही दी कि अपनी-अपनी आत्मा में उन्होंने कैसे विश्वास करने के द्वारा दण्ड की चेतना को एक क्षण में शान्ति और आनन्द से बदलते अनुभव किया था।
अब तक वेस्ली के पास केवल सेवक का विश्वास था: उसे अभी पुत्र का विश्वास नहीं मिला था। इस कमी के बोध से दबकर उसने उपदेश देना छोड़ देना चाहा।
बोहलर ने उसे ऐसा करने से दृढ़ता से रोका, और कहा, "विश्वास का प्रचार तब तक करो जब तक वह तुम्हारे पास न आ जाए; और तब, क्योंकि वह तुम्हारे पास होगा, तुम विश्वास का प्रचार करोगे।" इसके बाद उसने बड़ी निष्ठा से यही किया, केवल मंच से ही नहीं बल्कि 30 मन-परिवर्तन। दैनिक जीवन में, अपनी यात्राओं में, जिन सरायों में ठहरता वहाँ, और वास्तव में जहाँ कहीं अवसर मिले। जैसे-जैसे उसकी आवश्यकताओं का बोध गहरा होता गया, वह उन प्रार्थना-रूपों को छोड़ने लगा जिन्हें वह अपनी निजी भक्ति में प्रायः काम में लाता था, और अधिक खुलकर प्रार्थना करने लगा। साथ ही, मसीही संगति के अनेक लाभों को देखते हुए, उसने अपने आपको फ़ेटर लेन में मिलनेवाली छोटी सोसाइटी के साथ पूरी तरह एक कर लिया, जिसे बोहलर की सलाह से 1 मई 1738 को मोरावियन बन्धुत्व के नियमों के अनुसार संगठित किया गया था। सदस्यों को सप्ताह में एक बार मिलना था, "संत याकूब के द्वारा दी गई परमेश्वर की आज्ञा के पालन में, एक दूसरे के सामने अपने दोष मानने और एक दूसरे के लिए प्रार्थना करने के लिए।"
वेस्ली ने पाप से उस भीतरी छुटकारे को बड़ी उत्कट लालसा से खोजा, जिसका महत्त्व अब वह पूरी तरह समझ गया था। इसी समय के आसपास एक मित्र को लिखे पत्र में यह अंश मिलता है: "फिर भी मैं एक वाणी सुनता हूँ (और क्या यह परमेश्वर की वाणी नहीं?) जो कहती है, 'विश्वास कर, और तू उद्धार पाएगा।
जो विश्वास करता है वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।' .
हे मनुष्यों के उद्धारकर्ता, हमें तुझे छोड़ किसी और पर भरोसा करने से बचा! हमें अपने पीछे खींच ले! हमें अपने आप से रिक्त कर, और फिर विश्वास करने में सारी शान्ति और आनन्द से हमें भर दे; और समय में या अनन्तकाल में कोई भी वस्तु हमें तेरे प्रेम से अलग न करे।"
वह आगे कहता है, "इस वरदान को मैंने अन्त तक खोजने का निश्चय किया, 1.—अपने कामों या धार्मिकता पर, पूर्णतः या अंशतः, हर प्रकार की निर्भरता को पूर्ण रूप से त्यागकर; जिस पर वास्तव में मैंने अपनी युवावस्था से उद्धार की आशा टिका रखी थी, यद्यपि मैं यह जानता न था। 2.—अनुग्रह के अन्य सब साधनों के निरन्तर उपयोग के साथ, इसी बात के लिए निरन्तर प्रार्थना जोड़कर, अर्थात् धर्मी ठहरानेवाले, उद्धार करनेवाले विश्वास के लिए, मेरे लिए बहाए गए मसीह के लहू पर पूर्ण भरोसे के लिए; उस पर अपने मसीह के रूप में, अपने एकमात्र धर्मीकरण, पवित्रीकरण और छुटकारे के रूप में भरोसे के लिए।"
छुटकारे का दिन आख़िरकार उदय हुआ: वेस्ली इसका वर्णन महान छुटकारा। अपने ही शब्दों में इस प्रकार करता है: "मैं इसे इसी प्रकार खोजता रहा, (यद्यपि विचित्र उदासीनता, सुस्ती और ठण्डेपन के साथ, और असामान्य रूप से बार-बार पाप में गिरते हुए,) बुधवार तक,
24 मई। मेरा विचार है कि आज प्रातः लगभग पाँच बजे मैंने अपना नया नियम इन वचनों पर खोला, 'उसने हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएँ दी हैं, ताकि तुम इनके द्वारा उस स्वभाव के सहभागी हो जाओ जो परमेश्वर का है।' (2 पतरस 1:4)।
जैसे ही मैं बाहर निकला, मैंने उसे फिर खोला इन वचनों पर, 'तू परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं।' दोपहर के बाद मुझे सेंट पॉल्स जाने को कहा गया। भजन-गान था, 'हे प्रभु, मैंने गहिराइयों में से तुझे पुकारा है:
हे प्रभु, मेरी वाणी सुन। मेरी गिड़गिड़ाहट की ओर तेरे कान लगे रहें। हे प्रभु, यदि तू अपराधों का लेखा ले, तो हे प्रभु, कौन खड़ा रह सकेगा? परन्तु तेरे हाथ में क्षमा है; इसलिए तेरा भय माना जाएगा।
हे इस्राएल, प्रभु पर भरोसा रख: क्योंकि प्रभु के हाथ में करुणा है, और उसके पास पूर्ण छुटकारा है। और वही इस्राएल को उसके सब अधर्मों से छुड़ा लेगा।" सन्ध्या को मैं बड़े अनिच्छुक मन से ऑल्डर्सगेट स्ट्रीट की एक सोसाइटी में गया, जहाँ कोई रोमियों की पत्री की लूथर की भूमिका पढ़ रहा था। लगभग पौने नौ बजे, जब वह उस परिवर्तन का वर्णन कर रहा था जो परमेश्वर मसीह पर विश्वास के द्वारा हृदय में करता है, मुझे अपना हृदय विचित्र रीति से गर्म होता अनुभव हुआ। मैंने अनुभव किया कि मैं उद्धार के लिए मसीह पर, केवल मसीह पर भरोसा रखता हूँ; और मुझे यह निश्चय दिया गया कि उसने मेरे पाप, हाँ मेरे भी पाप, ले लिए हैं, और मुझे पाप और मृत्यु की व्यवस्था से बचा लिया है।
"मैं पूरी शक्ति से उनके लिए प्रार्थना करने लगा जिन्होंने विशेष रूप से मेरा अपमान किया था और मुझे सताया था। फिर मैंने वहाँ उपस्थित सब लोगों के सामने खुलकर गवाही दी कि मैंने अभी-अभी अपने हृदय में क्या अनुभव किया है। पर कुछ ही देर में शत्रु ने सुझाया, 'यह विश्वास नहीं हो सकता; क्योंकि तेरा आनन्द कहाँ है?' तब मुझे सिखाया गया कि हमारे उद्धार के अगुवे में विश्वास के लिए शान्ति और पाप पर जय अनिवार्य हैं: परन्तु जहाँ तक आनन्द के उन उमड़ते भावों का प्रश्न है जो प्रायः इसके 32 मन-परिवर्तन। आरम्भ में साथ होते हैं, विशेष रूप से उनमें जिन्होंने गहरा शोक किया है, परमेश्वर उन्हें कभी देता है, कभी रोक लेता है, अपनी ही इच्छा की युक्ति के अनुसार।" :
इस समय से वेस्ली, यद्यपि उसे अब भी अनेक भीतरी संघर्ष सहने पड़े, उस धन्य गवाही को दृढ़ता से थामे रहा जो उसे दी गई थी। अन्ततः उस बहुमूल्य मोती को पाकर, जिसे पाने में उसे इतने संघर्ष करने पड़े थे, उसने अपना सारा जीवन उसे अपने आसपास सब लोगों में घोषित करने और उसकी अनुशंसा करने में लगा दिया।
"आओ, अब तक पहुँचे हुए इस समय पर वेस्ली के भीतरी विकास पर एक दृष्टि डालें। उसने बाहरी धार्मिकता के मार्ग पर चलकर आरम्भ किया; परन्तु शीघ्र ही उसने पाया कि धर्म का आसन हृदय में है, और वह लगन से भीतरी पवित्रता के पीछे लगा। तब उसने परमेश्वर की व्यवस्था की माँगों की असीमता देखी, और जाना कि उन्हें कोई वस्तु सन्तुष्ट नहीं कर सकती सिवाय उस सिद्ध पवित्रता के जो भीतर और बाहर 'मसीह के मन' से पूर्ण अनुरूपता में है। परन्तु उसे पाने के उसके प्रयासों से न उद्धार का निश्चय मिला और न सच्चा सुख। उसमें जिस वस्तु का अभाव था वह एक आरम्भ-बिन्दु था जहाँ से वह आगे बढ़ सके, और एक अटल नींव जिस पर वह विश्राम कर सके।
इसके बाद उसने सीखा कि यह ठोस नींव भीतर नहीं बल्कि बाहर है; वह मसीह में परमेश्वर के अनुग्रह में है, और विश्वास ही एकमात्र साधन है जिसके द्वारा हम उस पर स्थिर हो सकते हैं। वेस्ली में हम वही भीतरी संघर्ष, व्यवस्था के कामों से विश्वास की ओर वही परिवर्तन देखते हैं, जो हम लूथर में देखते हैं। और व्यवस्था की दासता से यह मुक्ति, उद्धार के निश्चय और विश्वास के आनन्द के लिए प्रयत्न करती हुई आत्मा का यह छुटकारा, न कोई भ्रम है और न कट्टर उन्माद, जैसा कि उन लोगों ने प्रायः इसे कहा है जो वेस्ली को घृणा का पात्र ठहराना चाहते थे। यह उस दीर्घकाल से छिपे अंकुर का फूट निकलना है, जब वह अन्ततः अपने आवरण को फाड़ देता है। आत्मा, जो अन्त में व्यवस्था के जूए और पाप की दासता से छुड़ाई गई, उद्धार का निश्चय और विश्वास का आनन्द पाती है;
जर्मनी की यात्रा। 33 क्योंकि, जैसा लूथर कहता है, जहाँ पाप की क्षमा होती है, वहाँ जीवन और शान्ति भी आती है।"* चार्ल्स वेस्ली अपने भाई के समान ही लक्ष्य पर पहुँच चुका था, और एक वैसे ही मार्ग से। तीन दिन पहले उसने क्रूस के चरणों में क्षमा का निश्चय पाया था।
जॉर्ज व्हाइटफ़ील्ड, उनका पुराना ऑक्सफ़ोर्ड का मित्र, इसी मार्ग पर उनसे पहले चल चुका था: जब वे जॉर्जिया में अपने ही कामों से उद्धार खोज रहे थे, तब वह पहले ही नया मनुष्य बन चुका था। इस प्रकार परमेश्वर की व्यवस्था से उनके पवित्र
-कार्य के लिए वे तीन प्रमुख कार्यकर्ता तैयार किए गए, उस महान जागृति के लिए जो इंग्लैंड पर छाने वाली थी।
वेस्ली मोरावियनों का बहुत ऋणी था, क्योंकि उन्होंने उसका परिचय ऐसे मसीही धर्म से कराया जो जीवन्त ऊर्जा में उस धर्म से कहीं श्रेष्ठ था जिसे वह अब तक जानता था। उसे यह कलीसिया मसीही सत्य के जीवन्त और व्यावहारिक स्वरूप को अन्य किसी से बेहतर समझी हुई प्रतीत हुई; और वह उससे सन्तान-सुलभ स्नेह के साथ प्रेम करता था। अपने आत्मिक जीवन के उस निर्णायक काल में, जहाँ वह अब पहुँच चुका था, उसने सोचा कि अब वह समय आ गया है कि जॉर्जिया में बनाई हुई एक योजना को पूरा करे, अर्थात् उस मसीही समुदाय के घर जाकर उससे और अच्छी तरह परिचित हो। यह यात्रा, जिसमें धार्मिक तीर्थयात्रा और सन्तान-भक्ति के कार्य की विशेषताएँ थीं, उसने अब कई मित्रों के साथ आरम्भ की।
रॉटरडैम के निकट यसेलस्टाइन में उसे मोरावियनों की एक छोटी बस्ती मिली, जो ऑरेंज की विधवा राजकुमारी के क्षेत्र में बसी थी, और उसने भक्त बैरन डी वाटविल की छत के नीचे कुछ सुखद घण्टे बिताए। फ्रैंकफ़र्ट के निकट मारिएनबोर्न में उसकी भेंट काउंट ज़िन्ज़ेनडॉर्फ़ से हुई, जिनसे मिलने की उसे बहुत समय से इच्छा थी। इस प्रतिष्ठित
मसीही के साथ उसकी बातचीत उपयोगी और सुखद रही। "और यहाँ," वह कहता है, "मुझे निरन्तर वही मिला जिसे मैं ढूँढ़ता था, अर्थात् जीवित प्रमाण
* सी.एच. शिल, डॉ. हर्ज़ॉग के रीअल-एन्सिक्लोपेडी में "मेथोडिज़्म" लेख, खण्ड 9।
: D 34 मन-परिवर्तन। विश्वास की सामर्थ्य के: ऐसे लोग जो भीतरी और बाहरी दोनों पापों से बचाए गए थे, 'परमेश्वर के उस प्रेम के द्वारा जो उनके हृदयों में उंडेला गया है,' और सब सन्देह और भय से 'उन्हें दिए गए पवित्र आत्मा' की स्थायी गवाही के द्वारा।"
मारिएनबोर्न की छोटी बस्ती में बारह दिन बिताकर वेस्ली ने हेर्नहुट की ओर, जो प्रमुख मोरावियन समुदाय का केन्द्र था, अपनी यात्रा फिर आरम्भ की। उसने जर्मनी का बड़ा भाग पैदल पार किया, और अन्ततः 1 अगस्त 1738 को उस प्रसिद्ध गाँव में पहुँचा, जो बोहेमिया की सीमा पर स्थित है और जो कलीसिया के इतिहास में अनेक विख्यात नगरों से ऊँचा स्थान रखता है। यहाँ उसने ऐसे मसीही धर्म को पूरी सक्रियता में देखा जो अंग्रेज़ी कलीसिया के धर्म से, जिसे ही वह अब तक जानता था, तीव्र भिन्नता रखता था। मोरावियन कलीसिया से पहले ही आत्मिक सम्बन्ध से जुड़ा होने के कारण उसने उसका गहरी सहानुभूति से निकट अध्ययन किया; वह सहानुभूति ऐसी थी कि उस समय उसे इस एकान्तवासी समुदाय के कुछ कम सराहनीय पक्षों के विषय में स्वतन्त्र निर्णय बनाने से रोके रखा हो। अपने भाई सैमुएल को लिखते हुए वह कहता है,
"परमेश्वर ने अन्ततः मुझे मेरे हृदय की इच्छा दे दी है। मैं ऐसी कलीसिया के साथ हूँ जिसका निवास स्वर्ग में है, जिसमें मसीह का मन है, और जो वैसे चलती है जैसे वह चला।
जैसे उन सब का एक प्रभु और एक विश्वास है, वैसे ही वे सब एक ही आत्मा के भागी हैं, नम्रता और प्रेम की आत्मा, जो उनकी सारी बातचीत में एकसमान और निरन्तर प्रेरणा देती है। हाय! मसीही धर्म कितनी ऊँची और पवित्र वस्तु है, और उस वस्तु से कितनी दूर जिसे इस नाम से पुकारा जाता है, जबकि वह न हृदय को शुद्ध करता है और न हमारे धन्य छुटकारा देनेवाले के स्वरूप के अनुसार जीवन को नया करता है!"
मोरावियनों के साथ संगति से वेस्ली उस धर्मीकरण-सिद्धान्त में, जो उसने बोहलर से सीखा था, दृढ़ हुआ, जो विश्वास के द्वारा होता है। ऐसी कलीसिया को, जो इस सिद्धान्त के अनुसार जी रही थी, जिसकी उसके अपने देश में इतनी उपेक्षा हुई थी, देखकर उसे उसकी व्यावहारिक प्रभावशीलता का विश्वास हो गया। भक्त मसीही डेविड से बढ़कर उसके लिए बहुत कम लोग उपयोगी थे, जो हेर्नहुट की कलीसिया। 35 एक साथ कारीगर और पास्टर दोनों था, जिसने अपने हाथों से उस बस्ती के प्रथम घर बनाए थे, और जिसके उपदेश और उदाहरण ने उसकी आत्मिक उन्नति में बड़ा योगदान दिया था। उसकी बातचीत और प्रवचनों से वेस्ली के मन में नया प्रकाश आया। उसके नए जीवन के आरम्भ ही में ऐसे मसीहियों की संगति का उसके धार्मिक चरित्र और सेवकाई की उपयोगिता पर अत्यन्त शुभ प्रभाव पड़ना अनिवार्य था। उनसे उसने जीवित विश्वास की सामर्थ्य सीखी, और यह कि वह आत्मा में उद्धारकर्ता और सब मसीहियों के प्रति कैसा उत्कट प्रेम, और संसार तथा अपने आप का कैसा पूर्ण त्याग उत्पन्न करता है।
हेर्नहुट में जिस बात ने उसे विशेष रूप से प्रभावित किया, वह थी एक ऐसी सोसाइटी का वास्तविक रूप में साकार होना जो सच्चे मसीही आत्मा से ओत-प्रोत थी। निःसन्देह सब कुछ समान रूप से सराहनीय न था, पर कितनी ही बातें ऐसी थीं जो सर्वोच्च प्रशंसा के योग्य पाई गईं! वह कहता है, "मैं सहर्ष अपना जीवन यहीं बिता देता; परन्तु मेरे स्वामी ने मुझे अपनी दाख की बारी के अन्य भागों में परिश्रम करने को बुलाया, इसलिए मुझे इस सुखी स्थान से विदा लेनी पड़ी।" वह खेद के साथ वहाँ से चला, अपने साथ ऐसे पाठ और स्मृतियाँ ले जाते हुए जो आगे चलकर अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुईं। वास्तव में वेस्ली की धार्मिक और कलीसियाई उन्नति में इस भेंट के महत्त्व को बढ़ा-चढ़ाकर कहना कठिन होगा। जर्मनी के हृदय में उसने जो "परमेश्वर का नगर" देखा था, उसे इंग्लैंड में दोहराना उसके भाग्य में था, परन्तु उन अन्तरों के साथ जो अनिवार्य थे, क्योंकि एक ओर मूलतः चिन्तनशील स्वभाव का राष्ट्र था और दूसरी ओर सक्रिय और साहसी भावना से सम्पन्न राष्ट्र।
एक इतिहासकार कहता है, "मेथोडिज़्म मोरावियनवाद का विशेष रूप से ऋणी है। पहला, इसने वेस्ली को उस पुनर्जीवित आत्मिक जीवन में प्रवेश कराया, जिसकी सर्वोच्चता को सब कलीसियावाद और मतवाद के ऊपर प्रोटेस्टेंट जगत में फिर से स्थापित करना और बढ़ाना मेथोडिज़्म का ठहराया हुआ कार्य था। दूसरा, वेस्ली ने इससे उन धर्मवैज्ञानिक विचारों की अपनी कुछ सबसे स्पष्ट धारणाएँ पाईं जिन्हें उसे इसी आत्मिक जीवन से अनिवार्य रूप से सम्बद्ध मानकर फैलाना था; और अब वह हेर्नहुट से न केवल अपने नए धार्मिक अनुभव में, बल्कि इन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सैद्धान्तिक मतों में भी दृढ़ होकर लौटा। तीसरा, ज़िन्ज़ेनडॉर्फ़ के समुदाय स्पेनर की उस योजना पर आधारित थे जो स्थापित p d 2 36 इंग्लैंड की दशा। कलीसियाओं का सुधार करने की थी
उनके भीतर 'छोटी कलीसियाएँ' बनाकर, क्योंकि अन्यथा उनमें आत्मिक जीवन बनाए रखने की आशा नहीं थी; वेस्ली ने इसी प्रकार मेथोडिज़्म को अंग्रेज़ी कलीसिया के भीतर संगठित किया। और चौथा, केवल इस सामान्य समानता में ही नहीं, बल्कि उसके अनुशासन के अनेक विवरणों में भी हम मोरावियनवाद का प्रभाव खोज सकते हैं।" * अध्याय V.
अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में इंग्लैंड की नैतिक और धार्मिक दशा।
हम उस मनुष्य की, जिसे परमेश्वर इंग्लैंड के सोए हुए धार्मिक जीवन को जगाने के कार्य के लिए बुलाने वाला था, ईश्वरीय तैयारी पर विचार करते आए हैं। उस कार्य के इतिहास में प्रवेश करने से पहले यह उचित है कि हम उसकी आवश्यकता दिखाएँ, उस समय देश की नैतिक और धार्मिक स्थिति पर दृष्टि डालकर जब वेस्ली और उसके मित्रों ने अपना परिश्रम आरम्भ किया। यह एक ऐसा विषय है जो विस्तृत परीक्षण के योग्य है।
अंग्रेज़ प्रोटेस्टेंटवाद का मुख्य दोष यह था कि उसने सुधार के सिद्धान्तों को बहुत सीमित रूप में स्वीकार किया।
आन्दोलन की प्रगति उन राजनीतिक घटनाओं के कारण रुक गई जो उसके जन्म के साथ जुड़ी थीं। सबसे बड़ी बुराइयों में से एक * स्टीवन्स, मेथोडिज़्म का इतिहास, खण्ड 1, पृष्ठ 108, अमेरिकी संस्करण।
अंग्रेज़ प्रोटेस्टेंटवाद के दोष। 37 यह थी कि उसका अस्तित्व आंशिक रूप से हेनरी अष्टम की वासनाओं का ऋणी था। इस तथाकथित सुधारक के हाथों से वह मुश्किल से निकला ही था कि मरियम के हाथों में पड़ गया; और उसके सबसे प्रसिद्ध रक्षक क्रैनमर, लैटिमर,
हूपर और रिडली आग की लपटों में मारे गए। एलिज़ाबेथ के शासनकाल में वह पुनः जी उठा, परन्तु केवल राज्य के साथ बँध जाने के लिए, और उत्पीड़न की जंजीरों से भी अधिक अपमानजनक जंजीरें स्वीकार करने के लिए। जेम्स प्रथम, चार्ल्स प्रथम, गणतन्त्र, और पुनर्स्थापना के बाद आए दो विनाशकारी शासनों के अधीन उसके इतिहास के उतार-चढ़ाव भरे चित्र का वर्णन करना हमारा काम नहीं है।
इस प्रकार अंग्रेज़ सुधार, उस राजनीतिक सत्ता की गोद में पोषित और पाला-पोसा गया, जिसने एक से अधिक बार उसका गला घोंटने की धमकी दी थी, उस स्वतन्त्रता की भावना से रहित था जो उसकी सबसे दृढ़ सुरक्षा होती। मूल क्रान्ति के स्थान पर वह अतीत के साथ एक डरपोक समझौता बन गया। उसने रोमन कैथोलिक पद्धति पर आधारित पदानुक्रमित संगठन को बनाए रखा, और अपने सिद्धान्तों में भी उसके कुछ चिह्न सुरक्षित रखे।
सुधारे हुए पादरी, जिन्हें युग की आवश्यकताओं के अनुरूप होने के लिए प्रेरितों जैसा होना चाहिए था, किसी भी प्रकार अपने कर्तव्य के स्तर तक न पहुँचे। कुछ अपवादों को छोड़कर वे पूर्ण अज्ञान की दशा में थे; एलिज़ाबेथ के शासनकाल में बहुत-से सेवक पढ़ना भी नहीं जानते थे। उनकी सांसारिक दशा दयनीय थी: सप्ताह के दिनों में, साउदी के अनुसार, उन्हें दर्ज़ी, बढ़ई, बैरे बनना पड़ता था, या मैकॉले के अनुसार खेत-मज़दूर और सुअर-चरवाहे भी, और वे बहुत प्रसन्न होते थे जब बड़े घरों के नौकर
उन्हें ठण्डा मांस और बियर परोस देते।
/ उनकी नैतिक और धार्मिक दशा भी उतनी ही शोचनीय थी: अपने काम के लिए कुख्यात अयोग्यता के साथ उनमें भक्ति का पूर्ण अभाव भी जुड़ा था। उनकी संख्या भी इतनी अपर्याप्त थी कि कई पल्लियों में गिरजे का कार्य घण्टा बजानेवाला (सेक्स्टन) ही चलाता था। अधिकतर पादरियों की ऐसी ही दशा थी, जिनका कार्य अंग्रेज़ लोगों के मन में सुधार के सिद्धान्तों को बैठाना था
38 इंग्लैंड की दशा। इसलिए यह सहज ही देखा जा सकता है कि यह आन्दोलन देश का आत्मिक रूपान्तरण क्यों नहीं कर पाया।
प्यूरिटनवाद निःसन्देह उन असंख्य ईमानदार और समर्पित मनुष्यों का विरोध था जो राजनीतिक सत्ता पर आधारित एक अक्षम सुधार के विरुद्ध खड़े हुए थे। परन्तु इसके अतिरिक्त कि यह आन्दोलन जनसमूह में नहीं फैला, यह स्मरण रखना चाहिए कि वह बहुत शीघ्र पतन को प्राप्त हुआ। यद्यपि दीर्घकाल तक वह सद्गुण और पौरुषपूर्ण भक्ति की पाठशाला रहा, पर राजनीतिक संघर्षों में उलझ जाने से उसने शीघ्र ही अपना सच्चा स्वरूप खो दिया, और यह निश्चित है कि उसके द्वारा जन्मी अधिकांश कलीसियाएँ अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में राजकीय कलीसिया से शायद ही कम सुस्त दशा में थीं। अंग्रेज़
सुधार की ये अपूर्णताएँ उस नैतिक और आत्मिक पतन के सबसे प्रबल कारणों में थीं, जो हम पाएँगे कि अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पूरे राष्ट्र की विशेषता था। पिछली शताब्दी में राष्ट्र को हिला देनेवाले राजनीतिक परिवर्तनों ने भी इसी परिणाम में बहुत योगदान दिया। किसी जाति के आचरण और सिद्धान्तों को बार-बार होनेवाली क्रान्तियों के दृश्य से अधिक कुछ नहीं बिगाड़ता।
अठारहवीं शताब्दी के इंग्लैंड जैसे समृद्ध युग पहली दृष्टि में बहुत कम प्रतीत होते हैं। विदेशों में अंग्रेज़ी सेनाओं ने मार्लबरो के नेतृत्व में शानदार विजय पाई: देश में, जॉनसन, एडिसन,
स्विफ़्ट, पोप, यंग, ग्रे और प्रतिभाशाली लेखकों की भीड़ से साहित्य सुशोभित हुआ; जबकि आइज़ैक न्यूटन की प्रतिभा के कारण विज्ञान ने बड़ी छलाँगें लगाईं। परन्तु यदि इन बाहरी दिखावों को छोड़कर हम समाज के मर्मस्थल में प्रवेश करें, तो हम पाएँगे कि वे भयानक घावों से भरे थे, और यदि परमेश्वर हस्तक्षेप न करता तो पूरी देह नष्ट हो जाती।
/ सभी निष्पक्ष इतिहासकार इस काल में इंग्लैंड की नैतिक दशा को अत्यन्त गहरे रंगों में चित्रित करने पर सहमत हैं।
कुलीन वर्ग गहरे पतन में डूबा हुआ था, और अभिजात वर्ग का भ्रष्टाचार। 39 बुरा उदाहरण उनके द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा था जो देश के सर्वोच्च पदों पर थे। स्वयं राजपरिवार निर्दोष होने से बहुत दूर था: दरबार जुए और व्यभिचार से भरा था: जॉर्ज प्रथम और जॉर्ज द्वितीय के निजी दोषों ने राष्ट्र पर अत्यन्त घातक प्रभाव डाला।/ राजसत्ता की प्रतिष्ठा घट रही थी, और जब 1729 में मॉन्टेस्क्यू इंग्लैंड आया, तो उसने टिप्पणी की, "राजा का प्रभाव प्रतिदिन घटता जाता है।"
कुलीन लोग, ऐसे उदाहरण का अनुसरण करते हुए, पाप को घृणास्पद उदासीनता से देखते थे। उन दिनों के अभिलेख ऐसे रहस्योद्घाटनों से भरे हैं जो अविश्वसनीय लगते यदि वे सर्वोत्तम प्रमाणों से सिद्ध न होते। कलीसियाई व्यवस्था का हर विभाग भ्रष्टाचार से कलंकित था।» मार्लबरो का ड्यूक, उस युग का सबसे बड़ा सेनापति, बारी-बारी से हर दल के हाथ बिका, और यहाँ तक कि एक साथ सब दलों के हाथ भी, उसने ऑरेंज के विलियम से जेम्स द्वितीय के साथ विश्वासघात करने के लिए धन लिया, फिर जेम्स द्वितीय से ऑरेंज के विलियम के साथ विश्वासघात करने के लिए, और इस बीच अपने देश के शत्रुओं के साथ गुप्त षड्यन्त्र भी चलाता रहा। देश के सबसे प्रतिष्ठित लोग, रसेल,
बोलिंगब्रोक, श्रूसबरी, हैलिफ़ैक्स, बहुत कम बेहतर थे: वे स्टुअर्ट वंश और हनोवर के घराने के बीच डोलते रहे, दो-दो स्वामियों को साधने और दोनों से घूस लेने में उन्हें कोई संकोच न था; वे निर्लज्जता से अपनी शपथें तोड़ते, बिना पछतावे के राजद्रोह के षड्यन्त्र रचते, और इन अत्याचारों के बावजूद संसार में आगे बढ़ने में सफल होते रहे। रॉबर्ट
वालपोल, जो पन्द्रह वर्ष तक प्रधानमंत्री रहा, उसने भी नैतिकता के प्रति वैसी ही ढिलाई दिखाई: वह डींग मारा करता था कि वह किसी भी मनुष्य का विवेक खरीद सकता है, और उसने अपने विवेक का दाम ऊँचा रखा था। उसी के कारण राजकोष के कक्ष एक सचमुच का बाज़ार बन गए, जहाँ संसद का हर सदस्य अपना मत बेचने पहुँचता था। सुनियोजित रिश्वत के बल पर मंत्रिमंडल भारी बहुमत जुटा लेता था; और हाउस ऑफ़ कॉमन्स उसकी इच्छा का पूरी तरह पालन करता था।
धन की लालसा ने बहुतों के सिर घुमा दिए; यहाँ तक कि सामंत, मंत्री, और स्वयं प्रिंस ऑफ़ वेल्स भी धोखे से भरी सट्टेबाज़ियों में फँसे थे, जिनसे वे एक साथ अपमानित भी हुए और धनी भी। मॉन्टेस्क्यू, जो फ़्रांस से आया था जहाँ सबसे बड़ी बुराइयाँ फैली हुई थीं, वह भी स्तब्ध रह गया, और उसने लिखा, "यहाँ धन सर्वशक्तिमान है: सम्मान और सद्गुण की बहुत कम परवाह की जाती है।" 40 इंग्लैंड की दशा।
ऐसे तथ्य, जिन्हें बढ़ाना सरल होगा, यह प्रमाणित करते हैं कि प्रभावशाली वर्गों ने लोगों के सामने बुरे उदाहरण रखे, और लोगों ने उनका बहुत ही निष्ठा से अनुसरण किया। लंदन का फ़ैशनेबल जीवन वर्साय के जीवन जितना ही भ्रष्ट था, और उसमें वह बाहरी शालीनता भी नहीं थी जिससे फ़्रांसीसी शिष्टाचार अपनी अनियमितताओं को ढक लेता था: यहाँ पाप के साथ घृणित क्रूरता भी जुड़ी थी। व्यभिचार और मतवालापन व्यापक रूप से फैले हुए थे; और जो ऐसे कामों में लिप्त थे, वे अपनी लज्जा पर गर्व करते थे। एडिसन कहता है, "यह कोई असामान्य बात नहीं थी कि कोई मनुष्य, जो अच्छी संगति में नशे में धुत हो गया हो, या जिसने रात विलासिता में बिताई हो, अगली सुबह उन स्त्रियों के सामने अपने कारनामे सुनाए जिनका वह अत्यधिक आदर करता था।"
जो स्त्रियाँ ऐसी बातचीत सह सकती थीं, वे अपनी ही नैतिकता का अच्छा चित्र नहीं देतीं, और वास्तव में वह वैसी नहीं थी जैसी होनी चाहिए थी। परन्तु उन्हें जो शिक्षा मिली उससे और क्या परिणाम अपेक्षित हो सकता था: ऐसे घरों में जो अत्यंत शोचनीय ढिलाई से कलंकित थे,—उस रंगशाला में जिसे सैमुएल वेस्ली "कुख्यात" कहता है, और जहाँ कल्पना और हृदय घोर अश्लीलताओं से दूषित होते थे,—उस समय के साहित्य से, जिसे कामुक दृश्यों का चित्रण भाता था,—और यहाँ तक कि कलीसिया में भी, जहाँ उस नीरस नैतिकता के प्रति, जो उपदेश का सार हुआ करती थी, अधिकतम उदासीनता दिखाना अच्छे संस्कार का चिह्न माना जाता था?
वास्तव में उच्च वर्गों ने धर्म के प्रति सारा आदर खो दिया था; और जब वे विनाश के कगार पर पहुँच रहे थे तब उन्हें रोकने वाला कुछ भी न था। मॉन्टेस्क्यू फिर कहता है: "वहाँ
* मॉन्टेस्क्यू, इंग्लैंड पर टिप्पणियाँ।
अविश्वासी साहित्य। 41 इंग्लैंड में कोई धर्म नहीं है; हाउस ऑफ़ कॉमन्स के चार-पाँच सदस्य ही दैनिक प्रार्थनाओं में उपस्थित होते हैं। यदि कोई धर्म की बात करे, तो सब हँसने लगते हैं। जब एक व्यक्ति ने मेरी उपस्थिति में कहा, 'मैं यह वैसे ही मानता हूँ जैसे मैं विश्वास-वचन को मानता हूँ,' तो सब ठहाका मारकर हँस पड़े।" * इंग्लैंड और फ़्रांस की धार्मिक दशा की तुलना करते हुए मॉन्टेस्क्यू ने कहा, "फ़्रांस में मुझे बहुत कम धार्मिक समझा जाता है, पर इंग्लैंड में बहुत अधिक धार्मिक।"
इसी के पूर्ण अनुरूप एपवर्थ के पादरी सैमुएल वेस्ली की यह गवाही है, जिसने यह बिल्कुल नहीं सोचा था कि जब वह देश की धार्मिक दशा को ऐसे अन्धकारमय रंगों में चित्रित कर रहा है, तब उसके दो पुत्र, जो अभी जन्मे भी नहीं थे,— उसके सुधार में सबसे अधिक योगदान देंगे। वह कहता है, "हर पवित्र वस्तु का उपहास करना, और परमेश्वर के महिमामय और भययोग्य नाम को अपवित्र करना, अच्छे संस्कार का चिह्न, या कम-से-कम समझदारी और साहस का प्रमाण माना जाता है; और दूसरी ओर, हम पाते हैं कि ऐसे दुरुपयोगों को डाँटना, उनका पर्दाफ़ाश करना और उन्हें दबाना सबसे अधिक अप्रिय और अपमानजनक माना जाता है।†"
अविश्वास वास्तव में अंग्रेज़ अभिजात वर्ग में एक फ़ैशन और लगभग एक सनक बन गया था। उसके अपने लेखक थे जो उसकी रुचि को तृप्त करते थे, जैसे वोल्तेयर का मित्र लॉर्ड बोलिंगब्रोक, जिसे श्री तेन ने "ताने कसने वाला संशयवादी, और विवेक, विवाहों और शपथों का क्रय-विक्रय करने वाला" कहा, और जॉनसन ने "ऐसा विदूषक जिसने मसीहियत के विरुद्ध एक खिलौना-बन्दूक भरी, और ऐसा कायर जिसने उसे चलाने के लिए दूसरे व्यक्ति को आधा क्राउन दिया" कहा; कॉलिन्स, जिसने मसीहियत के विरुद्ध अपना उत्साह अन्याय की सीमा तक पहुँचा दिया, काल्पनिक पाठ गढ़कर और झूठे उद्धरण देकर; टिंडल, जिसकी अविश्वासपूर्ण पुस्तिकाएँ इतनी भयानक थीं कि संसद ने, जो सामान्यतः काफ़ी ढीली थी, उन्हें सार्वजनिक जल्लाद से जलवाने का आदेश दिया;
टोलैंड, जिसके लेखों का भी वही हश्र हुआ, जिसे स्विफ़्ट ने "अभागा कुतर्की" कहा, और जो सुसमाचार के विरुद्ध अपने क्रोध में * मॉन्टेस्क्यू, विविध विचार।
† नैतिकता-सुधार सोसाइटी के सामने दिया गया उपदेश।
42 इंग्लैंड की दशा। मधुशालाओं और सार्वजनिक स्थानों में जा-जाकर उसके सिद्धान्तों और रहस्यों की निन्दा करता फिरा, जब तक कि वह दरिद्र न हो गया और द्वार-द्वार भीख माँगकर रोटी खाने को विवश न हो गया।
अंग्रेज़ समाज के अधिक शिक्षित वर्ग की यह गहरी अवनति सभी इतिहासकारों द्वारा स्वीकार की गई है; और जब हम आज के इंग्लैंड के अभिजात वर्ग पर दृष्टि डालते हैं, जो तुलनात्मक रूप से इतना प्रबुद्ध और इतना धार्मिक है, और राष्ट्र की सामान्य उन्नति पर उसके लाभकारी प्रभाव को देखते हैं, तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ऐसा परिवर्तन लाने के लिए अठारहवीं शताब्दी का धार्मिक सुधार अत्यंत गहन रहा होगा।
/ दुर्भाग्य से, लोगों ने बड़े लोगों के दोषों की नकल बहुत शीघ्रता से कर ली। अठारहवीं शताब्दी में अंग्रेज़ जनता भयंकर रूप से पतित थी, विशेषकर बड़े नगरों में। जिन क्रान्तियों से वे गुज़रे थे, उन्होंने उनमें अव्यवस्था की एक विचित्र प्रवृत्ति और अनुशासन के प्रति असहिष्णुता उत्पन्न कर दी थी।
उस युग में यूरोप के अन्य निम्न वर्गों की तरह अज्ञानी होने के कारण, वे बारी-बारी से सबसे मनमाने आवेगों का पालन करते थे, कभी व्हिग दल के समर्थन में उठ खड़े होते, तो कभी टोरी दल को समर्थन देते। हुल्लड़ और पत्थरबाज़ी का हर अवसर उत्सुकता से पकड़ा जाता था, और लंदन तथा बड़े नगरों की सड़कें निरन्तर अव्यवस्था के ऐसे दृश्य देखती थीं जिन्हें रोकने का प्रयास अधिकारियों ने कभी नहीं किया। संसद के संघर्षों के प्रतिरूप प्रायः सड़कों पर दिखाई देते थे, जहाँ तर्क के स्थान पर पत्थर और मुक्के चलते थे। जनता की दो गहरी जमी हुई घृणाएँ थीं जिन्हें छिपाने की उन्होंने कभी परवाह नहीं की; एक पोप-पंथियों के विरुद्ध, और दूसरी असहमतिवादियों (डिसेन्टर्स) के विरुद्ध। 1710 में सरकार के विरुद्ध उपदेश देने के लिए डॉ. सैचेवरेल के मुक़दमे के अवसर पर एक भयंकर दंगा हुआ; और जनता ने असहमतिवादियों के कई प्रार्थना-भवनों को जलाकर और लूटकर डॉक्टर के प्रति अपनी सहानुभूति दिखाई। 1780 में एक और दंगा हुआ, जब "पोप-पंथ नहीं चाहिए" का नारा था: भीड़ ने कारागार तोड़ डाले और निम्न वर्गों की दशा। 43 क़ैदियों को छुड़ा लिया, और तीन दिन तक महानगर पर राज किया, जगह-जगह जलाती, लूटती और संहार करती रही। "जिन की पीपियाँ इतनी बड़ी संख्या में तोड़ी गईं कि उनकी सामग्री से सड़कें बाढ़ग्रस्त हो गईं। स्त्रियाँ और बच्चे घुटनों के बल गिरकर इतना पीते कि मर जाते। कुछ उससे पागल हो गए, कुछ सुन्न; और चारों ओर जलते हुए घर गिर पड़े और उन्हें अपने मलबे में दबा लिया।" जॉर्ज प्रथम का राज्याभिषेक इंग्लैंड के कई भागों में शत्रुतापूर्ण प्रदर्शनों से मनाया गया: कहीं स्वाँगधारी (प्रीटेंडर) के स्वास्थ्य के जाम पिए गए, कहीं राजा का पुतला जलाया गया: एक स्थान पर असहमतिवादियों के प्रार्थना-भवन नष्ट किए गए; दूसरे में उन यात्रियों का अपमान किया गया जिन्होंने "राजा जेम्स चिरंजीवी हो!" के नारे में साथ देने से इनकार किया। दूसरी ओर, ऐसी भीड़ें भी थीं जिन्होंने पोप और स्वाँगधारी का पुतला जलाया, और जैकोबाइटों के साथ आमने-सामने की लड़ाइयाँ लड़ीं।
एक से अधिक बार सार्वजनिक स्थानों में रक्त बहा।
श्री डी विट कहते हैं, "जब दलीय झगड़े थम भी गए, तब भी कॉफ़ी-घरों में आने वाले उपद्रवी और उच्छृंखल युवक जनता के लिए एक विपत्ति थे। वे सभ्य स्त्रियों और शान्तिप्रिय व्यक्तियों का अपमान करते, राहगीरों पर हमला करते और उन्हें नाली में फेंक देते; और ये उन अनियंत्रित लोगों के अपेक्षाकृत निर्दोष मनोरंजनों में से थे जो 'मोहॉक' नाम से लंदन के आतंक बन गए थे। रात में, शराब से स्वयं को उत्तेजित करके, वे हाथ में तलवार लिए सड़कों पर निकल पड़ते, और जो अभागे उनके सामने पड़ जाते उन्हें गिराते और घायल करते। जब वे किसी स्त्री पर हाथ डालते, तो उसे एक पीपे में ठूँस देते और पहाड़ी से नीचे लुढ़का देते। हर टोली का अपना प्रिय खेल और यातना देने का अपना विशेष ढंग था। एक टोली नाक चीरने या आँख फोड़ने में आनन्द लेती; दूसरी लोगों को वह देने में जिसे वे 'पसीना निकालना' कहते थे। इस खेल में पीड़ित के चारों ओर घेरा बनाया जाता, और उसे सब ओर से तलवारों की नोक से चुभोया जाता, ताकि उसका शरीर निरन्तर हिलता रहे जब वह
44 इंग्लैंड की दशा। उनसे बचने का प्रयास करता। ये मदोन्मत्त उत्सव कभी-कभी सबसे भयानक प्रकार का बदला लेने के लिए भी प्रयोग किए जाते थे।
"सूर्यास्त के बाद, प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए बिना मज़बूत संरक्षण के बाहर निकलना असम्भव था। यदि वे मोहॉकों से बच निकलते, तो उन्हें राजमार्ग के डाकुओं से सामना होने का भय रहता। 20 जनवरी से 10 फ़रवरी, 1720 तक, अकेले लंदन और उसके आसपास ही ऐसी तीस मुठभेड़ें समाचार-पत्रों में दर्ज की गईं।" मद्यपान [rance, अर्थात् Intemperance] ने निम्न वर्गों में भयंकर विनाश किया। जिन 1684 में लाया गया था, और आधी शताब्दी बाद इंग्लैंड में प्रतिवर्ष सत्तर लाख गैलन की खपत होती थी।
जिन की दुकानों के साइनबोर्ड निमंत्रण के रूप में लोगों को एक पैनी में नशे में धुत होने लायक, दो पैनी में बेसुध पड़ने लायक, और ऊपर से लेटने के लिए पुआल भी देने की पेशकश करते थे: जब वे इतने नशे में हो जाते कि उस सुविधा की आवश्यकता पड़ती, तो उन्हें तहखाने में ले जाया जाता कि वे वहाँ सोकर होश में आएँ। लंदन की सड़कों पर चलते हुए ऐसे अभागे प्राणियों से सामना हुए बिना नहीं रहा जा सकता था, जो फुटपाथ पर अचेत पड़े होते, और जिन्हें केवल राहगीरों की दया ही कीचड़ में दम घुटने या गाड़ियों के पहियों तले कुचले जाने से बचाती थी।" संसद ने इस तरल विष की बिक्री पर रोक लगाने का व्यर्थ प्रयास किया: इस वस्तु का गुप्त व्यापार इंग्लैंड के सब भागों में फूट निकला। यदि कोई सीमा-शुल्क की इन धोखाधड़ियों की सूचना देता, तो लोग उसे नदी में फेंक देते; और उनका रुख इतना धमकी भरा हो गया कि हाउस ऑफ़ कॉमन्स को वह क़ानून रद्द करना पड़ा।
हमने बड़े नगरों की नैतिक दशा और उनकी दंगे-फ़साद की प्रवृत्ति पर इसलिए अधिक विस्तार किया है कि वेस्ली ने अपने सुसमाचारीय परिश्रम का बहुत-सा भाग इन्हीं नगरों में लगाया: हमारे दिए हुए विवरण दिखाएँगे कि उसे कितनी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
ग्रामीण क्षेत्र, यद्यपि कम पतित थे, बर्बरता के निकट की दशा में थे। खदान-श्रमिक वर्ग, जो आज बहुत सुधर गया है, जंगलियों से बेहतर नहीं था। क्रूरता और असंयम। 45 मतवालापन और व्यभिचार सर्वत्र बेलगाम थे। ऐसी अवनति के बीच यह आश्चर्य की बात नहीं कि हर प्रकार के अन्धविश्वास फैले हुए थे। इनमें से बहुत-से पोप-पंथ के अवशेष थे, जो सुधार-आन्दोलन के दो शताब्दी बाद भी बने हुए थे। डेवनशायर के किसान अपने बच्चों को सन्तों से प्रार्थनाएँ सिखाते थे। अन्यत्र, जैसे वेल्स में, बहुत-सी द्रुइद रीतियाँ अब भी प्रचलित थीं।
लोगों में प्रचलित विश्वास था कि पुराने घरों में दुष्टात्माएँ बसती हैं: जादूगर, भविष्य बताने वाले और हर प्रकार के साहसी दिन-दहाड़े अपनी लाभदायक कलाओं का धन्धा करते थे। कम लोग पढ़ सकते थे, और लिखना तो एक सामंत के लिए ही विलास की बात थी। फिर भी पूरे न्याय के साथ हमें यह जोड़ना चाहिए कि इस समय यूरोप की सारी ग्रामीण जनसंख्या इससे अधिक उन्नत नहीं थी।
यह उन लोगों की दशा थी जिसे मेथोडिज़्म बदलने को था। ऐसा प्रतीत होता था कि सारा देश अवनति की उस चरम सीमा तक पहुँच गया था, जो किसी राष्ट्र के लिए पूर्ण विनाश के सिवा कोई विकल्प नहीं छोड़ती, जब तक कि वह नया जीवन आरम्भ करने को सहमत न हो। जिस नैतिक पतन का वर्णन हमने अभी किया है, वह एक आधुनिक लेखक के कथन को पूरी तरह उचित ठहराता है, जो स्वयं कलीसिया का सदस्य है और कहता है कि जब वेस्ली प्रकट हुआ तब इंग्लैंड पूर्णतः मूर्तिपूजक हो चुका था, और एक निष्पक्ष इतिहासकार के इस और भी आगे के कथन को कि वह रोमन साम्राज्य के पतन-काल या प्राचीन
परन्तु क्या इस दशा के उपचार के लिए कुछ नहीं किया गया?
हमारा उत्तर है, वास्तव में बहुत थोड़ा। फिर भी, आइए हम मेथोडिस्ट पुनरुत्थान से पहले किए गए सुधार के कुछ प्रयासों को बताने का प्रयत्न करें। उस युग का साहित्य अधिकांशतः राष्ट्र की नैतिक जड़ता में सहभागी था: कविता, उपन्यास और रंगमंच भी प्रायः भ्रष्टता फैलाने के प्रभावी साधन थे। फिर भी, शिविर में एक विभाजन था:
46 इंग्लैंड की दशा। स्टील, एडिसन, बर्कले और जॉनसन जैसे महान प्रतिभा वाले कुछ लोगों ने पाप के अतिक्रमणों के विरुद्ध एक अवरोध खड़ा करने का प्रयास किया। कुछ सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में, जो जीवंत और व्यंग्यपूर्ण शैली में लिखी जाती थीं, उन्होंने उस युग के दोषों और फ़िज़ूलख़र्चियों पर ऐसी स्वतंत्रता से कोड़े बरसाए जो उनके लिए सराहनीय है। इन रचनाओं को बड़ी लोकप्रियता मिली, और उस समय का सच्चा चित्र देखने के लिए हमें इन्हीं के पृष्ठों की ओर मुड़ना चाहिए। निबन्धकार (एसेयिस्ट्स), जैसा उन्हें कहा जाता है, ने अच्छा काम किया, परन्तु वह केवल ऊपरी था: पाप को उपहास्य बनाकर उन्होंने उसे लज्जित तो किया, पर उसे भगा नहीं सके।
यह लाभदायक प्रतिक्रिया केवल साहित्य में ही नहीं दिखाई देती। सत्रहवीं शताब्दी के अन्त की ओर एक रोचक आन्दोलन उठा, जिसका अस्तित्व ही यह प्रमाणित करने को पर्याप्त है कि राष्ट्र का एक भाग अब भी भ्रष्टता की प्रगति का सामना कर रहा था। स्थापित कलीसिया के कुछ प्रभावशाली सदस्यों ने क़ानूनी उपायों से पाप को दबाने के उद्देश्य से एक सोसाइटी बनाई। आन्दोलन फैला, और कलीसिया तथा राज्य के प्रतिष्ठित व्यक्तियों का संरक्षण पाया: स्वयं रानी मेरी उसकी सदस्य थी, और उसने आदेश दिया कि निन्दनीय पाप को दबाने के प्राचीन क़ानून कठोरता से लागू किए जाएँ। इस प्रकार संरक्षण पाकर नैतिकता-सुधार सोसाइटी शीघ्र ही इतनी सशक्त हो गई कि असुधार्य पाप से प्रभावी रूप से निपट सके: क़ानून के सम्पूर्ण अधिकार से सज्जित होकर, उसने न्यायाधिकारियों को अत्यंत सक्रिय सहायता दी। विशेषकर लंदन में, वह सैकड़ों वेश्यालयों को बन्द कराने में सफल रही, और अभिनेताओं, आदतन गाली देने वालों, मतवालों और उपद्रवियों की बड़ी संख्या को न्याय के कटघरे में लाई, जिन पर जुर्माना किया गया, जिन्हें कारावास दिया गया, या जिन्हें जल्लाद से सार्वजनिक रूप से कोड़े लगवाए गए। 'इन कठोर उपायों ने पाप को इतना रोका कि वह खुले में घूमने के बजाय छिपने की जगह खोजने लगा; परन्तु वे लोगों की नैतिकता सुधारने में शक्तिहीन थे। इसके अतिरिक्त, वे साधारण पापियों की भीड़ को तो दण्ड देते थे, पर उच्च श्रेणी के पापियों को प्रायः छोड़ देते थे,
नैतिकता-सुधार सोसाइटी। 47
डी फ़ो ने चतुराई से इन क़ानूनों की तुलना मकड़ी के जालों से की है जो छोटी मक्खियों को पकड़ लेते हैं और बड़ी को निकल जाने देते हैं। फिर भी, राष्ट्रीय विवेक का यह जागरण एक आशाजनक शकुन था, और नैतिकता के उस पतन के विरुद्ध एक सशक्त विरोध था जो राजतंत्र की पुनर्स्थापना के समय से आरम्भ हुआ था।
इस अच्छे कार्य से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई, और वास्तव में उससे कई वर्ष पहले की, छोटी धार्मिक सोसाइटियों की स्थापना थी, जो इंग्लैंड की कलीसिया के तीन भक्त पादरियों ने की,
हॉर्नेक, स्मिथीज़ और बेवरिज। उनके द्वारा बड़ी संख्या में युवाओं का मन फिराव होने पर, उन्होंने उन्हें परामर्श दिया कि "सप्ताह में एक बार मिलें और ऐसी बातचीत करें जो आपसी उन्नति के लिए हितकारी हो।"
उन्होंने तदनुसार ऐसा ही किया, और इसके अतिरिक्त परोपकार के कार्यों के लिए धन भी जुटाया। वे रोगियों और बन्दियों से मिलने जाते, बच्चों को पढ़ाते; और कहा जाता है कि उनके निरन्तर प्रयासों से लंदन और उसके आसपास सौ पाठशालाएँ स्थापित हुईं। कुछ समय तक ये छोटी सोसाइटियाँ उत्साही धार्मिक जीवन के केन्द्र रहीं, यद्यपि उनकी गतिविधि बहुत संकीर्ण सीमाओं में बँधी थी। यदि उनका स्वभाव अधिक आक्रामक और साहसी होता, तो वे राष्ट्र के धार्मिक जागरण को आधी शताब्दी आगे बढ़ा सकती थीं। दुर्भाग्य से, उन्होंने पादरियों के अधिकारों में दखल देने के भय से, यथार्थ अर्थ में सुसमाचारीय कार्य को लगभग पूरी तरह वर्जित कर दिया। वेस्ली ने, जैसा हम देखेंगे, उन्हें लगभग लुप्त पाया, और उनमें नया जीवन फूँकने में सफल हुआ। फिर भी यदि उसने हॉर्नेक के विचार का लाभ उठाया, तो केवल उसे विकसित करने और अधिक फलदायी बनाने के लिए।
यद्यपि इन धार्मिक सोसाइटियों ने धर्म का कोई सामान्य पुनरुत्थान उत्पन्न नहीं किया, फिर भी उन्होंने निस्सन्देह उसके लिए मार्ग तैयार किया।
उनका अस्तित्व और निरन्तरता उन बुराइयों के बीच, जिनका वर्णन हमने अभी किया है, सच्चे धार्मिक प्रभाव की उपस्थिति को प्रमाणित करती है। इंग्लैंड के कलीसियाई पादरियों को इस रोचक आन्दोलन को प्रोत्साहित और आगे बढ़ाना चाहिए था। परन्तु दुर्भाग्य से, वे ऐसा करने में समर्थ नहीं थे, जैसा कि उनकी धार्मिक दशा पर एक 48 इंग्लैंड की दशा। दृष्टि डालने से पर्याप्त रूप से प्रमाणित हो जाएगा।
पादरी वर्ग वास्तव में उन दिनों से बहुत सुधर चुका था जब, मैकॉले के अनुसार, वे बड़े घरानों के घरेलू सेवकों के सामाजिक स्तर से मुश्किल से ही ऊपर उठते थे।
अपनी वृत्तियों में पुनः स्थापित होकर और भरपूर बन्दोबस्त पाकर पादरी वर्ग के कोष फिर भर गए; और अंग्रेज़ युवाओं के श्रेष्ठ वर्ग ने उन पदों में सौभाग्य और सम्मान खोजा जो कलीसिया उन्हें देती थी। परन्तु यद्यपि उनकी सामाजिक स्थिति सुधर गई, उनका नैतिक और धार्मिक चरित्र उसी अनुपात में आगे नहीं बढ़ा। उस अनुशासन से, जो अप्रचलित हो चुका था, कोई भय न होने के कारण पादरी अपनी ही इच्छाओं के पीछे चलते थे; और वे पल्लियाँ भाग्यशाली थीं जिन्हें ऐसे चरवाहे मिले जिनमें घोर अनैतिकता के साथ सांसारिक उदासीनता न जुड़ी हो। समकालीन साक्ष्य इतना सशक्त है कि इन पतित पादरियों के पक्ष में कोई बचाव नहीं किया जा सकता। वोल्तेयर ने, जो 1726 में इंग्लैंड आया, कहा कि कुल मिलाकर इंग्लैंड के पादरी फ़्रांसीसी पादरियों से अधिक नैतिक थे, और पेरिस के किसी मठाधीश की तुलना में "इंग्लैंड की कलीसिया का कोई अधिकारी कैटो है।" परन्तु वह जोड़ता है, "इंग्लैंड की कलीसिया के पादरी मधुशालाओं में जाते हैं, क्योंकि प्रथा इसे मान्यता देती है, और यदि वे नशे में धुत हो जाएँ, तो गम्भीरता से हो जाते हैं, और उन पर कोई कलंक नहीं लगता।" इसके अनेक प्रमाण वेस्ली की डायरियों में मिलते हैं।
पादरियों की पंक्तियों में, वास्तव में, कुछ उच्च बुद्धि वाले मनुष्य पाए जाते थे। अवकाश और विद्या वाले होने के कारण वे औरों की अपेक्षा साहित्य में लगने और उन महान राजनीतिक प्रश्नों का अध्ययन करने में अधिक समर्थ थे जो राष्ट्र को उद्वेलित कर रहे थे; परन्तु इन कामों में उन्होंने वह समय और ऊर्जा लगाई जो उनके झुण्ड की थी। ये सब पुस्तिकाएँ लिखने वाले, उपन्यास लिखने वाले, कविताएँ रचने वाले पादरी, जिन्होंने स्टर्न और स्विफ़्ट की तरह अपनी प्रतिभा ऐसी रचनाएँ गढ़ने में लगाई जिनकी नैतिकता भी प्रायः संदिग्ध थी, केवल रोगी का मन बहला रहे थे और उन प्रबल औषधियों के प्रति, जो अकेली उसे स्वस्थ कर सकती थीं, अरुचि उत्पन्न कर रहे थे। इंग्लैंड के कलीसियाई पादरी। | 49 हम दुःख के साथ अपने से पूछते हैं कि जो मनुष्य सप्ताह भर "गुलिवर" या "ट्रिस्ट्रम शैंडी" लिखता रहा हो, वह रविवार को अपने सदस्यों को किस प्रकार का उपदेश दे सकता होगा। ऐसी सेवकाई, जिसके अवकाश के घंटे हास्यपूर्ण या अशुद्ध प्रकाशनों की तैयारी में बीतते हों, निश्चय ही उस कार्य के योग्य नहीं थी जो उचित रूप से उसका था।
फिर भी यह सामान्य पतन हर कहीं समान रूप से व्यापक नहीं था। हमारे उल्लिखित धार्मिक सोसाइटियों का उदय भक्त और समर्पित सेवकों के अस्तित्व को प्रमाणित करता है। दुर्भाग्य से, बेवरिज जैसे श्रेणी के मनुष्य,
हॉर्नेक और स्मिथीज़, तुलनात्मक रूप से दुर्लभ थे। अधिकांश लोग चुपचाप आहें भरने में सन्तुष्ट थे, सुधार के उपायों में पहल करने के लिए बहुत डरपोक। उनके मन में सुधार की इच्छाएँ थीं, परन्तु उन्हें वे केवल अस्पष्ट और असंगत अभिलाषाओं में ही प्रकट करते थे। यह छोटा-सा अल्पसंख्यक वर्ग निन्दा से इतना डरता था कि उन युवा सुधारकों की उदार नासमझियों का खुलकर पक्ष नहीं ले सका, जो व्यर्थ ही उन्हें अपने परिश्रम में रुचि दिलाने का प्रयास कर रहे थे। पादरी वर्ग में विद्या और हर प्रकार की प्रतिष्ठा की कमी नहीं थी, जिसकी पंक्तियों में विलियम शेरलॉक, डैनियल वाटरलैंड, बिशप बटलर और डीन प्राइडो जैसे मनुष्य थे।
जिसकी कमी थी, वह लोगों की आवश्यकताओं की समझ थी, और सबसे बढ़कर वह व्यावहारिक और सक्रिय विश्वास जो मनुष्यों के प्राणों को बचाने के लिए उन्हें खोजता है।
पादरियों का वर्णन करते हुए हमने वस्तुतः उनके उपदेशों का भी वर्णन कर दिया है। पादरियों का विशाल बहुमत अपने श्रोताओं को नैतिकता पर फीले विवेचन देकर सन्तुष्ट था, जिन्हें वे ठण्डे और औपचारिक ढंग से पढ़ देते थे। कुछ, विशेषकर बड़े नगरों में, जनता की रुचि की चापलूसी करके और प्राकृतिक धर्म के सरल विषयों को भावुक वाक्यांशों में सजाकर क्षणिक लोकप्रियता चाहते थे। अन्य, जैसे डॉ. सैमुएल
क्लार्क, बिशप होडली और विद्वान ह्विस्टन, खुलकर देववाद (डीइज़्म) या एरियस-मत की शिक्षा देते थे, और उन्होंने वोल्तेयर का ध्यान भी खींचा, जिसने उनके विषय में कहा, "एरियस-मत वालों ने अपने पुनरुत्थान के लिए अशुभ समय चुना है, अब जब संसार सम्प्रदायी विवादों से ऊब चुका है।" E 50 इंग्लैंड की दशा।
पिछली शताब्दी में उपदेश का एक और अनोखा ढंग उन सेवकों द्वारा अपनाया गया जो स्वयं उस समय के सार्वजनिक प्रश्नों में उलझे होने के कारण प्रायः मंच को राजनीतिक चबूतरे में बदल देते थे। इस श्रेणी के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से एक का यह चित्र एक कुशल हाथ ने खींचा है: 'उस समय की रीति के अनुसार सबसे परिष्कृत पादरियों में से एक रॉबर्ट साउथ था, जो सिर से पाँव तक शस्त्रसज्जित मनुष्य था, हठी राजतंत्रवादी और राजाओं के दैवी अधिकार तथा निष्क्रिय आज्ञाकारिता का पक्षधर, कटु विवादी, असहमतिवादियों का निन्दक, और सहिष्णुता अधिनियम का विरोधी; जिसने अपना क्रोध उग्र और गाली-गलौज की भाषा में निकालने में कभी संकोच नहीं किया। कोई उपमा उसके लिए इतनी अशिष्ट या इतनी उग्र नहीं थी कि वह प्रयोग न करे। वह निम्न जीवन को उसके सारे भद्दे और घिनौने विवरणों के साथ चित्रित करता है। वह सब कुछ करने का साहस करता है, किसी बात से नहीं झिझकता, वह ओछा है। वह व्यंग्यपूर्ण और ताने मारने वाला है, मंच का विदूषक और हास्य-अभिनेता। वह मनुष्यों को वैसा ही चित्रित करता है जैसा उसने उन्हें दैनिक जीवन में देखा है। जनता सड़कों पर इन असली व्यक्तियों को पहचान लेगी: चित्रों में बस नामों की कमी है।" * रूढ़िवादी उपदेश भी, तिल्लोट्सन, बुल और वाटरलैंड जैसे मनुष्यों द्वारा प्रस्तुत होने पर भी, सुसमाचारीय सामर्थ्य से रहित था। उनके पांडित्यपूर्ण हठधर्म ने श्रोता को ठण्डा और सुन्न कर दिया। सुसमाचार के प्राणदायी सिद्धान्त उनकी शिक्षाओं का आधार नहीं थे। जब उपदेश सच्चे अर्थ में सुसमाचारीय नहीं रहा, तो वह लोकप्रिय और प्रभावशाली भी नहीं रहा।
स्थापित कलीसिया के इस पतन ने बहुत समय से * तेन, अंग्रेज़ी साहित्य का इतिहास। [पाठक को यह स्मरण कराना न्यायसंगत है कि अन्य आलोचक, गम्भीर त्रुटियाँ स्वीकार करते हुए भी, साउथ में महान उत्कृष्टताएँ भी बताते हैं: वेस्ली स्वयं उसकी "सरल, सशक्त शैली" की प्रशंसा करता है।—अनुवादक।] असहमतिवादी (नॉनकन्फ़ॉर्मिस्ट)। 51 गम्भीर मनों का ध्यान आकर्षित किया था और गहरी चिन्ता जगाई थी। भक्त आर्चबिशप लेटन ने अपने जोशीले ढंग से कहा, "कलीसिया एक सुन्दर शव है जिसमें आत्मा नहीं।" बिशप बर्नेट का वाक्पटु विलाप प्रायः उद्धृत किया गया है, "मैं अपनी आयु के सत्तरवें वर्ष में हूँ, और जैसे मैं इस संसार में किसी भी रूप में अधिक समय तक नहीं बोल सकता, वैसे ही मैं इससे अधिक गम्भीर अवसर की आशा नहीं कर सकता कि पूरी स्वतंत्रता के साथ बोलूँ ..... जब मैं इस कलीसिया पर मँडराते निकट विनाश को देखता हूँ, तो गहरी चिन्ता के बिना देखता नहीं रह सकता।" फिर वह पादरियों की अज्ञानता, पवित्रशास्त्र के प्रति उनके हल्के आदर, और दलीय राजनीति में लगने तथा प्राणों की देखभाल की उपेक्षा करने की सामान्य प्रवृत्ति की बात करता है। आर्चबिशप सेकर और बिशप गिब्सन तथा बटलर उस समय की कलीसिया और पादरियों पर समान रूप से कठोर निर्णय देते हैं।
असहमतिवादी इतने गहरे पतन से बचे रहे थे, अपने सिद्धान्तों के कारण भी और उस सशक्त भक्ति-धारा के कारण भी जो अब भी उनकी पंक्तियों में व्याप्त थी। वे मृत कलीसियाएँ नहीं थीं जिनमें प्रसिद्ध भजन-रचयिता आइज़क वॉट्स, नैथेनियल
लार्डनर, प्रतिष्ठित समर्थक, और फ़िलिप डॉडरिज, जिन्होंने अभिषेक और भक्ति से भरी कई कृतियाँ लिखीं, जैसे मनुष्य गिने जाते थे।
दुर्भाग्य से, स्थापित कलीसिया के साथ संघर्ष की उत्तेजनाओं ने, जो प्रायः राजनीतिक स्वरूप की थीं, अन्तहीन आन्तरिक झगड़ों के साथ मिलकर, आत्मिक आक्रमण के कार्य के प्रति सामान्य उपेक्षा उत्पन्न कर दी। देववाद और एरियस-मत उन अनेक मंचों से भी गूँजे जिन्हें बेहतर रूप से सुरक्षित होना चाहिए था; और असहमतिवादियों के नेता वैसी ही खेदपूर्ण बातें कहते हैं जैसी उनके धर्माध्यक्षीय भाइयों के मुँह से निकलीं। डॉ.
गाइस कहता है, "प्राकृतिक धर्म हमारे युग के प्रिय विषय बने हुए हैं; और यीशु का धर्म केवल उसी के कारण, और केवल उतने ही अंश तक मूल्यवान माना जाता है जितना वह प्रकृति के प्रकाश को आगे बढ़ाता है, और उस प्रकार के प्रकाश का मात्र सुधार है।
जो कुछ विशिष्ट रूप से मसीही है या मसीह का अपना है, उसे टाल दिया गया है, निष्कासित और तुच्छ ठहराया गया है।" आइज़क वॉट्स, अब्राहम E 2 52 इंग्लैंड की दशा।
टेलर और जॉन हरियन इस विषय पर सब सहमत हैं।
एक दूसरे सुधार की आवश्यकता थी: परन्तु इस नए कार्य के लिए यह भी आवश्यक था कि परमेश्वर नए मनुष्य खड़े करे। ऐसा कुछ भी संकेत नहीं था कि राष्ट्र एक महान नैतिक क्रान्ति की पूर्वसन्ध्या पर है; और वोल्तेयर इंग्लैंड में थोड़े समय ठहरने के बाद कह सका, "इंग्लैंड में लोग इस प्रकार की बातों से इतने ऊब चुके हैं कि एक नया धर्म, या एक पुराना धर्म फिर से जीवित होकर, शायद ही अपना भाग्य बना पाए।" वोल्तेयर ग़लत था: घटनाओं ने शीघ्र ही उसके कथन का सशक्त खण्डन प्रस्तुत किया; क्योंकि उसी समय जब वह मसीहियत के पतन की घोषणा कर रहा था और उसके उखड़ जाने की भविष्यवाणी कर रहा था, ऑक्सफ़ोर्ड के कुछ भक्त विद्यार्थी एक संगति बना रहे थे जो, यदि "नए धर्म" का नहीं, तो "फिर से जीवित हुए पुराने धर्म" का पालना बनने वाली थी। कैसा अद्भुत संयोग! वे दो मनुष्य, जो अपने समकालीनों पर किसी भी अन्य से अधिक प्रबल प्रभाव डालने को नियत थे, एक ही क्षण में ब्रिटेन की भूमि पर चले,* और संशयवाद तथा भौतिकवाद से खोखली हुई एक महान जाति के सामने, ठीक विपरीत स्वरूप के संकल्प किए। एक ने, बुद्धिजीवियों की उच्छृंखलता को सच्ची स्वतंत्रता समझकर, इंग्लैंड के अविश्वास के सिद्धान्तों और तरीक़ों को फ़्रांस में आयात करने का निश्चय किया; दूसरे ने, अपने देश को कराहता हुआ जिन बुराइयों के नीचे देखकर गहराई से प्रभावित होकर, सुसमाचार के द्वारा उसके पुनर्जीवन का प्रयास करने का संकल्प लिया।
जो लोग सामाजिक मेल-मिलाप में पेरिस के उस युवा निर्वासित से, उसकी तीखी चतुराई के साथ, और ऑक्सफ़ोर्ड के उस युवा विद्यार्थी से, उसके गम्भीर आचरण के साथ, मिले, उन्हें इसमें सन्देह नहीं था कि वे ऐसे मनुष्यों को देख रहे हैं जो युग को हिला देंगे, यद्यपि विपरीत दिशाओं में, और जिनके परस्पर विरोधी परिश्रम सार्वभौमिक हलचल मचा देंगे। जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, उनके कार्य को परिणामों से आँकते हुए, हम यह कहने में हिचकिचाते नहीं कि हम अनन्त गुना
* वोल्तेयर का इंग्लैंड-प्रवास 1726 में आरम्भ हुआ और तीन वर्ष चला, इस प्रकार ऑक्सफ़ोर्ड में मेथोडिस्ट आन्दोलन के आरम्भ से ठीक मेल खाता है। वेस्ली और वोल्तेयर। 53 उस महान मिशनरी के कार्य को उस महान स्वतंत्र-चिन्तक के कार्य से अधिक पसन्द करते हैं; एक मनुष्यों के प्राणों को ऊँचा उठाने के लिए परिश्रम कर रहा था, दूसरा उन्हें नष्ट करने के लिए; एक परमेश्वर के लिए लड़ रहा था, दूसरा उसके विरुद्ध लड़ रहा था। और जहाँ प्रतिदिन वोल्तेयर के कार्य का हानिकारक स्वरूप अधिक पूर्ण रूप से प्रकट होता जा रहा है, वहाँ प्रतिदिन वेस्ली द्वारा किए गए कार्य की उत्कृष्टता और भी प्रभावशाली रूप से प्रमाणित होती जा रही है।
कार्य का आरम्भ।
आन्दोलन का जन्म।
वेस्ली सितम्बर 1738 के मध्य के लगभग जर्मनी से लौटा। उसका प्राण अपनी शक्तियाँ परमेश्वर को समर्पित करने की इच्छा से छलक रहा था, परन्तु अभी तक वह नहीं जानता था कि प्रभु उसे किस मार्ग से ले जाने वाला है। वास्तव में उसकी कोई पूर्व-निर्धारित योजना नहीं थी। परमेश्वर के विधान में दृढ़ विश्वास रखते हुए, उसकी आदत बन गई थी कि जिस मार्ग पर उसे चलना है, उसके संकेतों की निरन्तर प्रतीक्षा करे, कल के परिश्रम की उससे अधिक चिन्ता न करे जितनी कल की रोटी की, और परमेश्वर से आशा रखे कि वह दोनों को माप-माप कर दे।
वह तुरन्त अत्यंत उत्साह से कार्य में लग गया, उस सीमित क्षेत्र में जो उस समय उसके लिए खुला था। लंदन में अब भी हॉर्नेक और उसके मित्रों द्वारा स्थापित कई छोटी धार्मिक सोसाइटियाँ विद्यमान थीं, जिनमें से अधिकांश उस युग के आत्मिक पतन के कारण भंग हो चुकी थीं। जो बची थीं, उन्हें हाल ही में मोरावियनों ने पुनर्जीवित किया था,
धार्मिक जीवन के ये केन्द्र वेस्ली को उस समय अत्यंत आकर्षित करते थे जब वह आत्मिक
विश्वास द्वारा धर्मी ठहराया जाना। 55 उन्नति और भाईचारे की संगति की गहरी अभिलाषा रखता था। अपने पहले प्रेम की उत्कण्ठा से प्रज्वलित होकर, उसने अपनी उत्साहपूर्ण प्रेरणाओं से अपने भाइयों के विश्वास को जगाने में योगदान दिया।
परन्तु वेस्ली अपने जोश को इन छोटी सोसाइटियों की संकीर्ण सीमाओं में बाँधकर न रख सका। वह मानो किसी अदम्य मोहिनी से उन अज्ञानी और पतित जनसमूहों की ओर खिंचा चला जा रहा था जिनकी आत्माओं की चिन्ता कोई नहीं करता था। परन्तु इस वर्ग के लोग शायद ही कभी किसी गिरजाघर की दहलीज़ पार करते थे, और उन तक पहुँचने के लिए वेस्ली को कलीसिया छोड़नी ही पड़ती। फिर भी, ऐसा निर्णय लेने से पहले वह बहुत देर तक झिझकता रहता, यदि इंग्लैंड के कलीसिया ने अपने मंच उसके लिए बन्द करके इस निर्णय को शीघ्र न करा दिया होता। जर्मनी से लौटने पर उसने लन्दन और प्रान्तों में उसके अनेक पवित्रस्थानों में प्रचार किया, जैसा कि उसकी धर्माध्यक्षीय दीक्षा ने उसे वैध अधिकार दिया था। अपने उपदेशों में उसने रूढ़िगत प्रथा से पूरी तरह नाता तोड़ लिया, और नीरस नैतिकता के स्थान पर विश्वास द्वारा धर्मी ठहराए जाने के महान सुसमाचारीय सिद्धान्त की साहसपूर्वक घोषणा की, और उसे लोगों के मन में उस प्रबल गम्भीरता से बैठाया जो केवल उद्धार के व्यक्तिगत अनुभव से ही उत्पन्न हो सकती है। उन दिनों यह एक नई बात थी, और इससे जो कोलाहल मचा वह बहुत ऊँचा था। उस पर नवाचार और पाखण्ड का आरोप लगाया गया, और धमकी दी गई कि यदि वह इस नए-नवेले मत का प्रचार करता रहा तो उसे गिरजाघरों से निकाल दिया जाएगा। यह वही पुराना आरोप है, जो पतन के समय में सदा उन पर लगाया जाता है जो आदिम विश्वास को पुनर्जीवित करना चाहते हैं; परन्तु वेस्ली ने इसकी परवाह नहीं की। अनुशासन के सब विषयों में विनम्र और कलीसिया के हितों के प्रति समर्पित, और असहमति (डिसेंट) से इतना दूर कि उसके उल्लेख मात्र से उसका सिर चकराने लगता था, फिर भी उसने सिद्धान्त के विषय में झुकने से इनकार कर दिया; और उसने उस पतित युग के कलीसिया से हटकर क्रैनमर और लैटिमर के कलीसिया, अर्थात् उनतालीस अनुच्छेदों वाले कलीसिया, की ओर साहसपूर्वक अपील की। वह पुकार उठता है, "जिन सिद्धान्तों का हम प्रचार करते हैं,
वे इंग्लैंड के कलीसिया के सिद्धान्त हैं; वस्तुतः कलीसिया के मूल सिद्धान्त हैं। मैं उन पर टिके रहनेवालों से किसी बात में भिन्न नहीं हूँ; परन्तु मैं पादरियों के उस भाग से भिन्न हूँ जो कलीसिया से [fae — अस्पष्ट मूल पाठ] भागते हैं।" 56 आन्दोलन का जन्म।
एक के बाद एक वे मंच, जिन पर वेस्ली प्रचार करने का अभ्यस्त था, उसके लिए बन्द कर दिए गए। एक दिन, जब उसे एक ही स्थान पर दो बार प्रचार करना था, उसने प्रातःकालीन सभा में घोषणा की कि वह अपना विषय दोपहर बाद पूरा करेगा; परन्तु पहले उपदेश से घबराए हुए पादरी ने दूसरे उपदेश को रोकने के लिए हस्तक्षेप किया। वेस्ली कहता है, "यह एक अच्छी स्मृति है कि मुझे, यदि सम्भव हो, हर बार परमेश्वर की पूरी युक्ति सुनानी चाहिए।"
यद्यपि उसे पवित्रस्थानों से निकाल दिया गया, वेस्ली ने अपनी सक्रियता में ढिलाई नहीं आने दी। उसकी दैनन्दिनियों में हम उसे आत्माओं के उद्धार की उस धन्य लालसा से भरा हुआ देखते हैं जो उसके जीवन का प्रमुख जुनून बन गई। वह नियमित रूप से न्यूगेट के बन्दियों से मिलने जाता और उन्हें सुसमाचार सुनाता था।
इस विनम्र परिश्रम में उसे प्रायः सफलता का प्रतिफल मिलता था। नवम्बर 1738 में हम उसे घातक फाँसी के मंच पर एक दण्डित अपराधी के साथ पाते हैं, जो उसी के माध्यम से मन फिराकर चाहता था कि वेस्ली उसके अन्तिम घण्टों में उसके साथ रहे।
मरने से कुछ क्षण पहले जब उससे पूछा गया, "अब तुम अपने हृदय में कैसा अनुभव करते हो?" तो उस दण्डित अपराधी ने उत्तर दिया, "मैं ऐसी शान्ति अनुभव करता हूँ जिसका सम्भव होना मैं मान ही नहीं सकता था।
और मैं जानता हूँ कि यह परमेश्वर की वह शान्ति है जो सारी समझ से परे है।" चार्ल्स वेस्ली, जो अपने भाई के साथ गया था, ने भीड़ को कुछ उपदेश के शब्द कहे; और उसी दिन की सन्ध्या को वेस्ली ने अपनी दैनन्दिनी में लिखा, "हे मेरे पूर्वजों के प्रभु परमेश्वर, मुझे भी उनके बीच ग्रहण कर, और मुझे अपनी सन्तानों में से निकाल न दे!"
इन विनम्र सुसमाचार-प्रचार के परिश्रमों के बीच वेस्ली ने वर्ष 1738 पूरा किया। इस समय ऑक्सफ़ोर्ड के विद्यार्थियों के दल के प्रमुख सदस्य लंदन में एक साथ थे।
चार्ल्स वेस्ली, जो अपने भाई जॉन का अत्यन्त उत्साही सहयोगी था, उसी की तरह महानगर के मंचों से निष्कासित होने का सम्मान पा चुका था। व्हाइटफ़ील्ड, जो अभी-अभी अमेरिका से आया था जहाँ वह बहुत उपयोगी रहा था, उसी व्यवहार का अनुभव करनेवाला था। गिरजाघरों से निष्कासन। 57
जनवरी 1739 के पहले दिन दोनों वेस्ली, व्हाइटफ़ील्ड, इंगम, हॉल और किंचिन फ़ेटर लेन में प्रेम-भोज में लगभग साठ भाइयों के साथ उपस्थित थे।
जिस वर्ष को महान पुनर्जागरण का जन्म देखना था, उसका आरम्भ उन्होंने परस्पर प्रार्थना में किया। यह सभा, जैसा कि व्हाइटफ़ील्ड कहता है, "सचमुच पिन्तेकुस्त का समय" थी।
पाँच दिन बाद वे फिर मिले, ताकि जिन परिस्थितियों में वे अब अपने को पाते थे उनमें क्या करना सर्वोत्तम होगा, इस पर परस्पर विचार करें। उन्होंने वह दिन उपवास और प्रार्थना में बिताया, और व्हाइटफ़ील्ड के शब्दों में, "इस पूर्ण विश्वास के साथ" विदा हुए "कि परमेश्वर उनके बीच बड़े-बड़े कार्य करनेवाला है।"
जो अभियान आरम्भ होनेवाला था, उसके लिए अब भी उसका युद्धक्षेत्र नहीं था। यह मैदान खुली हवा में प्रचार ने प्रदान किया, और उसमें सबसे पहले उतरने का सम्मान व्हाइटफ़ील्ड को प्राप्त है। यद्यपि हज़ारों लोग उसे सुनने गिरजाघरों में उमड़ते थे, उसे भी वही व्यवहार सहना पड़ा जो उसके मित्रों को सहना पड़ा: तीन दिन में पाँच मंच उसके लिए बन्द कर दिए गए। इस बढ़ते हुए विरोध के सामने इस साहसी पच्चीस वर्षीय युवक ने अधिक देर तक संकोच नहीं किया: उसने खुली हवा में प्रचार करने का निश्चय किया। अपनी योजना को कार्यरूप देने का अवसर शीघ्र ही मिल गया। ब्रिस्टल से थोड़ी दूरी पर किंग्सवुड नाम का एक स्थान है, जहाँ कोयला-खदानों में काम करनेवाले लोग रहते थे। ये बेचारे लोग मुश्किल से सभ्य कहे जा सकते थे: उनके न गिरजाघर थे, न सेवक, और उनकी आत्माओं के हित की चिन्ता किसी को नहीं थी। अपने गृहनगर ब्रिस्टल की एक यात्रा के दौरान व्हाइटफ़ील्ड को पता चला कि बहुत-से लोगों ने उसके विषय में कहा था, "यदि वह विधर्मियों को मन फिराना चाहता है, तो किंग्सवुड के खदानियों के पास क्यों नहीं जाता?" ब्रिस्टल में, और अन्यत्र भी, पादरियों की दुर्भावना से अपने हाथ बँधे पाकर उसने ऐसा ही करने का निश्चय किया।
58 आन्दोलन का जन्म। एक सन्ध्या को उसके आगमन का समाचार किंग्सवुड में फैल गया, और उसने लगभग दो सौ खदानियों की मण्डली को अपनी प्रतीक्षा करते पाया, जिन्हें उसने एक पहाड़ी की चोटी से सुसमाचार सुनाया। यह शनिवार, 17 फरवरी 1739 था, जो अंग्रेज़ पुनर्जागरण के इतिहास में एक स्मरणीय तिथि है, क्योंकि उसी दिन वह भूमि चुनी गई जिस पर गौरवशाली विजयें प्राप्त की जानी थीं।
इस पहले प्रयास की सफलता से प्रोत्साहित होकर व्हाइटफ़ील्ड किंग्सवुड में खुली हवा में प्रचार करता रहा। अपनी दूसरी यात्रा में उसके दो हज़ार श्रोता थे,
तीसरी में चार से पाँच हज़ार, और संख्या शीघ्र ही दस, पन्द्रह और बीस हज़ार तक पहुँच गई। इससे अधिक हृदयस्पर्शी कुछ नहीं था कि ये विशाल भीड़ें उस महान
प्रचारक को मन्त्रमुग्ध होकर सुन रही हैं; और प्रायः खदानियों की आँखों से उमड़ते चुपचाप बहते आँसू उनके काले गालों पर अपने बहने के चिह्न छोड़ जाते थे, जो इस बात का प्रमाण थे कि उसका वचन उनके हृदयों में गूँजा है। अनेक लोगों के मन फिराव ने इस युवा मिशनरी के परिश्रम का प्रतिफल दिया।
कुछ समय बाद व्हाइटफ़ील्ड ने ब्रिस्टल में ही एक सार्वजनिक उद्यान में प्रचार किया, और इस प्रयोग को पूर्ण सफलता मिली। परन्तु वह अमेरिका लौटने से पहले, जहाँ अत्यावश्यक कर्तव्य उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे, इंग्लैंड के अन्य भागों में भी जाने को उत्सुक था। अपने नए मन फिराए हुए लोगों को बिना चरवाहे के छोड़ना न चाहते हुए, उसने अपने मित्र वेस्ली को लिखा और उससे विनती की कि वह इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए ब्रिस्टल आए। कुछ झिझक के बाद वेस्ली ने उसका अनुरोध स्वीकार किया, और
लंदन छोड़ दिया। ब्रिस्टल पहुँचकर वह अपने मन में विचार करने लगा कि क्या उसे भी अपने मित्र के उदाहरण का अनुसरण करके खुली हवा में प्रचार करना चाहिए। वह कहता है, "मैं खेतों में प्रचार करने के इस अनोखे ढंग से आरम्भ में अपने को मुश्किल से मना पाया,
क्योंकि मैं अपने सारे जीवन में (अभी हाल तक) शिष्टता और व्यवस्था से सम्बन्धित हर बात में इतना दृढ़ रहा था कि मैं आत्माओं के उद्धार को भी लगभग पाप समझता,
यदि वह किसी गिरजाघर में न किया गया होता।"
उसने अधिक देर तक संकोच नहीं किया: उसके बुलाहट की आवाज़ उसके पूर्वाग्रहों की आवाज़ से कहीं अधिक प्रबल थी, और अप्रैल की दूसरी तारीख को उसने ब्रिस्टल से सटे एक मैदान में तीन हज़ार लोगों को प्रचार किया। इसी क्षण से अठारहवीं शताब्दी का पुनर्जागरण अपने उचित मार्ग पर आ गया, जिसमें उसे गौरवशाली सफलता का आशीष मिलना था। नियमित मंच के स्थान पर सार्वजनिक स्थानों को अपनाकर मसीही प्रचार ने कृत्रिमता और बनावट को उतार फेंका, और वेस्ली लोगों से लोगों की ही भाषा में बोलने लगा।
अब ब्रिस्टल में उस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए बुलाया गया जिसे उसके मित्र व्हाइटफ़ील्ड ने आरम्भ किया था, उसने बड़े उत्साह से अपने को उसमें लगा दिया: वह उसे सुदृढ़ करना भी जानता था, उन थोड़े-से जागे हुए लोगों को एक अत्यन्त सरल संगठन के बन्धनों में बाँधकर। उसने उन्हें लंदन की सोसाइटियों के नमूने पर छोटी-छोटी सोसाइटियों में संगठित किया। ये पहली थीं जिन्हें उसने स्वयं स्थापित किया; और इन्हें पहली वर्ग-सभाएँ (क्लास-मीटिंग) माना जा सकता है, यद्यपि तब तक ये इस नाम से नहीं जानी जाती थीं। वेस्ली अपनी दैनन्दिनी में, 4 अप्रैल 1739 को, इनके विषय में इन शब्दों में कहता है: "सन्ध्या को तीन स्त्रियाँ साप्ताहिक रूप से एक साथ मिलने को सहमत हुईं, उसी उद्देश्य से जो लंदन की सभाओं का है, अर्थात् 'एक दूसरे के सामने अपने दोष मान लें, और एक दूसरे के लिए प्रार्थना करें, ताकि चंगे हो जाएँ।' आठ बजे चार युवक उसी योजना के अनुसार मिलने को सहमत हुए। कोई मनुष्य इसे (सार का विचार करें तो) परमेश्वर द्वारा ठहराया हुआ अनुग्रह का साधन होने से कैसे इनकार कर सकता है? जब तक कि वह (लूथर के साथ, उसके केवल-विश्वासवाद के क्रोध में) यह दावा न करे कि सन्त याकूब की पत्री भूसे की पत्री है।" इन छोटी सोसाइटियों की संख्या लगभग तुरन्त ही बढ़ने लगी, यहाँ तक कि वेस्ली को उनके स्थान के लिए एक उपासना-गृह बनाना आवश्यक प्रतीत हुआ। 12 मई 1739 को, "स्तुति और धन्यवाद के स्वर के साथ," उसने उस साधारण भवन की नींव विधिपूर्वक रखी - यह अब तक बना पहला मेथोडिस्ट उपासना-गृह था। ब्रिस्टल में उसके मित्र उसके पास कुछ छोटे-छोटे चन्दे लाए, और उसने साहसपूर्वक इस उद्यम का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया। 60 आन्दोलन का जन्म। वह कहता है, "यह सच है कि मेरे पास धन नहीं था, और उसे जुटाने की कोई मानवीय आशा या सम्भावना भी नहीं थी; परन्तु मैं जानता था कि 'पृथ्वी और उसकी भरपूरी यहोवा की है;' और उसी के नाम से मैं बिना किसी सन्देह के चल पड़ा।"
वेस्ली किंग्सवुड के खदानियों के बीच भी सक्रिय रूप से लगा रहा। जाने से पहले व्हाइटफ़ील्ड ने उनके बीच स्थापित होनेवाले एक विद्यालय की आधारशिला रखी थी। वेस्ली ने उसके निर्माण की देखरेख की और उसके पूरा होने पर एक शिक्षक और एक शिक्षिका को नियुक्त किया। यह सुसमाचार-प्रचार के कार्य की एक उत्तम नींव थी, और वह कार्य स्वयं भी बढ़ता रहा। लोगों ने उस सुसमाचार के आनन्ददायक सन्देश को हर्ष से ग्रहण किया जिससे वे अब तक अपरिचित थे; और किंग्सवुड शीघ्र ही एक बदला हुआ स्थान बन गया। वह अब पहले की तरह व्यभिचार और मतवालेपन का अड्डा नहीं रहा; लड़ाई-झगड़े का स्थान मेल और शान्ति ने ले लिया; अश्लील गीतों के स्थान पर पवित्र भजन आए, और निन्दा के स्थान पर प्रार्थना।
व्हाइटफ़ील्ड और वेस्ली के प्रचार के फलस्वरूप इन मन फिराए हुए खदानियों में नई आवश्यकताएँ उत्पन्न हुईं।
प्रभु-भोज में सहभागी होने की इच्छा से वे इतनी संख्या में ब्रिस्टल के गिरजाघरों में गए कि नियमित सेवकों ने, जो भक्ति की ऐसी अभिव्यक्तियों के आदी नहीं थे और इससे उत्पन्न अतिरिक्त परिश्रम से घबराए हुए थे, उन्हें इस बहाने से मेज़ से लौटा दिया कि वे उनके पल्ली के नहीं हैं। इस प्रकार अपने नियमित चरवाहों द्वारा त्याग दिए जाने पर खदानी उन उत्साही मिशनरियों से, जिन्होंने उन्हें आत्मिक नींद से जगाया था, पहले से भी अधिक घनिष्ठता से जुड़ गए। वेस्ली ने अपना पास्तरीय कार्य ब्रिस्टल के आसपास के नगरों और गाँवों तक बढ़ाया, और अब वह एक दूसरे से बहुत दूर स्थानों में दिन में तीन बार प्रचार करता था। खुली हवा में प्रचार से मिली नई सुविधाओं ने उसके लिए यह आवश्यक नहीं रहने दिया कि वह अपने को एक पल्ली की संकीर्ण सीमाओं में बाँधे, या उन पादरियों की सद्भावना की और भी संकीर्ण सीमाओं में, जो उसे अपने मंच का उपयोग करने दें। उन 61 ब्रिस्टल में वेस्ली।
उस समय से उसके प्रचार के आश्चर्यजनक प्रभाव होने लगे।
विशाल भीड़ें उन सार्वजनिक स्थानों में इकट्ठी होती थीं जहाँ वह प्रचार करता था: न वर्षा और न आँधी उन्हें तितर-बितर कर पाती थी, और सामान्यतः वे उसे धैर्य और गम्भीरता से सुनते थे। यह मैत्रीपूर्ण भावना ब्रिस्टल में उसके पहले मिशन की पूरी अवधि में बनी रही, जो कई महीनों तक चला: एक से अधिक बार लोगों ने उन लोगों से उसकी रक्षा करके अपनी सहानुभूति प्रकट की जो उसके प्रचार में बाधा डालना चाहते थे। एक अवसर पर दो व्यक्तियों ने गीत गाकर मण्डली में विघ्न डाला; वेस्ली ने एक भजन उठाया, जिसे पूरी सभा ने इतने उत्साह से गाया कि असन्तुष्टों के स्वर दब गए। बाथ में एक प्रसिद्ध व्यक्ति ने, जो अपने अनियमित जीवन और खाने-पीने के शौक के लिए जाना जाता था, उसका सामना करने का बीड़ा उठाया। वेस्ली कहता है, "बाथ में बड़ी प्रत्याशा थी
कि एक प्रसिद्ध व्यक्ति वहाँ मेरे साथ क्या करेगा; और मुझसे बहुत आग्रह किया गया कि मैं प्रचार न करूँ, क्योंकि कोई नहीं जानता था कि क्या हो जाए। इस समाचार से मुझे बहुत बड़े श्रोता भी मिले, जिनमें अनेक धनी और बड़े लोग थे।
मैंने उन्हें साफ़-साफ़ बताया कि पवित्रशास्त्र ने उन सब को पाप के अधीन बन्द कर दिया है - ऊँचे और नीचे, धनी और निर्धन, सब को एक साथ।
उनमें से बहुत-से कुछ चकित-से लगे और गम्भीरता में डूबते जा रहे थे, कि तभी उनका योद्धा प्रकट हुआ, और मेरे पास आकर पूछा कि मैं किस अधिकार से ये काम करता हूँ। मैंने उत्तर दिया, 'यीशु
मसीह के अधिकार से, जो मुझे (अब के) कैन्टरबरी के आर्चबिशप द्वारा दिया गया, जब उसने मुझ पर हाथ रखे और कहा, सुसमाचार का प्रचार करने का अधिकार ले।' उसने कहा, 'यह संसद के अधिनियम के विरुद्ध है: यह गुप्त सभा (कॉन्वेन्टिकल) है।' मैंने उत्तर दिया,
'महोदय, उस अधिनियम में उल्लिखित गुप्त सभाएँ (जैसा कि उसकी प्रस्तावना दिखाती है) राजद्रोही सभाएँ हैं; परन्तु यह ऐसी नहीं है; यहाँ राजद्रोह की छाया तक नहीं है; इसलिए यह उस अधिनियम के विरुद्ध नहीं है।' उसने उत्तर दिया, 'मैं कहता हूँ कि है: और इसके अतिरिक्त,
'आपका प्रचार लोगों को होश गँवाने तक डरा देता है।' 'महोदय, 62 आन्दोलन का जन्म। क्या आपने कभी मुझे प्रचार करते सुना है?' 'नहीं।' 'तब आप उसके विषय में कैसे निर्णय कर सकते हैं जो आपने कभी सुना ही नहीं?' 'महोदय, जनश्रुति से!' 'जनश्रुति पर्याप्त नहीं है। मुझे अनुमति दीजिए,
महोदय, पूछने के लिए कि क्या आपका नाम नैश नहीं है?' 'मेरा नाम नैश है।'
'महोदय, मैं जनश्रुति के आधार पर आपका न्याय करने का साहस नहीं करता: मैं इसे न्याय करने के लिए पर्याप्त नहीं समझता।' यहाँ वह कुछ देर रुका, और अपने को सँभालकर बोला, 'मैं जानना चाहता हूँ कि ये लोग यहाँ किसलिए आते हैं:' इस पर एक ने उत्तर दिया, 'महोदय, इसे मुझ पर छोड़ दीजिए: एक बूढ़ी स्त्री को इसका उत्तर देने दीजिए। आप,
श्री नैश, अपने शरीर की चिन्ता कीजिए; हम अपनी आत्माओं की चिन्ता करते हैं, और अपनी आत्माओं के भोजन के लिए हम यहाँ आते हैं।' उसने एक शब्द भी उत्तर नहीं दिया, बस वहाँ से चला गया।"
वेस्ली का लक्ष्य उत्साह के उस आवेग को जगाने से कहीं ऊँचा था जो शीघ्र ही क्षणभंगुर सिद्ध हो सकता था। इस मिशन के आरम्भ से ही उसने अनेक मन फिराव देखे थे। उसकी दैनन्दिनियों के पन्नों में भरे पड़े इन मन फिरावों के वृत्तान्तों में जो बात सबसे अधिक चौंकानेवाली दिखती है वह यह है कि वे प्रायः तत्काल होते थे: वे बिजली की कड़क के समान थे, और उनसे प्रेरितों के समय की कुछ समान घटनाओं का स्मरण हुए बिना नहीं रहा जाता। ये आन्तरिक अनुभव कभी-कभी अत्यधिक शारीरिक निढालता और सम्पूर्ण स्वभाव की एक प्रकार की ऐंठन के साथ होते थे। पूर्ण स्वस्थ पुरुष, जो जिज्ञासावश सभाओं में आए थे, वचन सुनकर पाप के विषय में कायल हो जाते, और घातक मूर्छा में भूमि पर गिर पड़ते, या पीड़ा में कराहते हुए पड़े रहते। वे घण्टों, कभी-कभी दिनों तक इसी अवस्था में रहते; और फिर एक क्षण में उनकी व्यथा की जगह गहरी शान्ति आ जाती।
लंदन में भी, जर्मनी से लौटने के कुछ ही समय बाद, वेस्ली ने अपने प्रचार से ऐसे ही प्रभाव उत्पन्न होते देखे।
एक दिन जब वह अपनी एक सभा में बोल रहा था, एक स्त्री ने पीड़ा की चीख निकाली। जब उसने कारण पूछा तो उसने बताया कि तीन वर्ष से उसका पीछा अपने पापों का बोध कर रहा है: उसके पति ने, जो उसके दुःख को समझ न सका, एक पादरी से और उसके बाद एक विलक्षण प्रभाव। 63 चिकित्सक से परामर्श किया, परन्तु दोनों में से किसी ने उसकी दशा नहीं समझी; परन्तु अब जो प्रचार उसने सुना उसने उसे उद्धार का मार्ग दिखा दिया। वेस्ली ने उसके साथ प्रार्थना की, और उसे शीघ्र ही शान्ति मिल गई। एक अन्य अवसर पर वह उन लोगों में से एक से मिला, जो उन दिनों बहुत थे, जो उसके कार्य को एक खतरनाक नवीनता कहकर कलंकित करते थे और उसके विरुद्ध बहुत क्रोधित प्रतीत होते थे। यह देखकर कि तर्क से उसका क्रोध और अधिक भड़कने के सिवाय कुछ नहीं होता, और यह सन्देह करके कि यह विरोध एक पहले से जागे हुए विवेक को दबाने के प्रयास से उपजा है, उसने प्रार्थना का प्रस्ताव रखा। वह कहता है, "कुछ ही मिनटों में वह शरीर और आत्मा दोनों की भारी पीड़ा में पड़ गई; और शीघ्र ही अत्यन्त गम्भीरता से चिल्ला उठी,
'अब मैं जानती हूँ कि मसीह के कारण मैं क्षमा की गई हूँ।' और उसी घड़ी से परमेश्वर ने उसके मुख को चकमक पत्थर के समान दृढ़ कर दिया कि वह उस विश्वास का प्रचार करे जिसे वह पहले सताती थी।"
ब्रिस्टल में उसके पहले प्रचार के परिणाम वैसे ही थे, और मन फिराव और भी विलक्षण चिह्नों के साथ हुए। सभाओं में दया माँगते हुए श्रोताओं की चीखों और सिसकियों से बार-बार बाधा पड़ती थी। मन फिराव अत्यन्त विविध और असाधारण घटनाओं के साथ हुए। एक बार एक माँ, जो अपनी बेटी के अचानक अचेत हो जाने से अप्रसन्न थी, स्वयं उसी प्रकार अचेत हो गई, परन्तु वेस्ली की प्रार्थनाओं से होश में आ गई, और अपनी बेटी के साथ आनन्द से भरी हुई घर लौटी।
एक अन्य अवसर पर फ़्रेंड्स की सोसाइटी (क्वेकर) का एक सदस्य इन बाहरी प्रकटीकरणों से रुष्ट हुआ, उन्हें केवल उपहास कहता था, और सब से कहता फिरता था कि जो उन पर विश्वास करते हैं वे सब कपटी हैं: एक दिन एक सभा में इस प्रकार बोलते हुए वह मानो बिजली के आघात से भूमि पर औंधे मुँह गिर पड़ा, और पीड़ा से तड़पने लगा। वेस्ली ने उसके लिए बिनती की, और जब वह व्यक्ति होश में आया तो वह पुकार उठा, "अब मैं जानता हूँ कि तू प्रभु का भविष्यद्वक्ता है।"
उसी सभा में एक जुलाहा उपस्थित था, जो कलीसिया का दृढ़ अनुयायी था और इन बातों की स्वयं जाँच करने आया था। वह अपने साथ एक बहुत प्रतिकूल
64 आन्दोलन का जन्म। धारणा लेकर गया, और सर्वत्र यह फैलाता रहा कि यह सब शैतानी भ्रम है। परन्तु वेस्ली के प्रचार ने उस पर उससे कहीं गहरी छाप छोड़ी थी जितनी वह स्वयं अपने आप से भी मानने को तैयार था। अगले दिन अपने मन में बहुत बेचैनी पाकर उसने विश्वास द्वारा उद्धार पर वेस्ली की एक पुस्तिका खोली: उसे पढ़ते-पढ़ते उसका रंग बदल गया और वह अवर्णनीय पीड़ा से दबा हुआ भूमि पर गिर पड़ा। पड़ोसी घबरा गए और घर की ओर दौड़े। उन्होंने उसे भूमि पर लोटते और निराशा की पीड़ा में चीखते पाया। दो-तीन पुरुषों ने उसे शान्त करने का प्रयास किया, परन्तु व्यर्थ। वे वेस्ली को बुलाने दौड़े: ज्यों ही उस बेचारे ने उसे देखा, वह चिल्ला उठा, "हाँ, यही वह है जिसे मैं लोगों का धोखेबाज़ कहता था। परन्तु परमेश्वर ने मुझे आ घेरा है।
मैंने कहा था कि यह सब भ्रम है; परन्तु यह भ्रम नहीं है।" फिर वह दहाड़ा, "हे तू शैतान! तू शापित शैतान! हाँ तू दुष्टात्माओं की सेना! तू ठहर नहीं सकता। मसीह तुझे निकाल देगा। मैं जानता हूँ कि उसका कार्य आरम्भ हो चुका है। यदि तू चाहे तो मुझे टुकड़े-टुकड़े कर दे; परन्तु तू मुझे हानि नहीं पहुँचा सकता।" वेस्ली ने प्रार्थना की: उसकी पीड़ा थम गई, और उसका शरीर और आत्मा दोनों स्वतन्त्र हो गए।
फिर भी यह कहना चाहिए कि इस अन्तिम जैसे असाधारण मामले वेस्ली की सेवकाई के आरम्भ में भी अत्यन्त दुर्लभ थे। इस समय जो दुर्लभ नहीं था, वह यह था कि उसके प्रचार में भीड़ की गहरी भावनाओं से बाधा पड़ती और उसकी आवाज़ पश्चात्ताप करनेवालों की कराहों में डूब जाती। कुछ समय बाद ये दृश्य कम होते गए, और परमेश्वर का आत्मा अधिक सौम्य और एकरस ढंग से कार्य करने लगा। वेस्ली अभी वर्णित जैसे तथ्यों को सावधानी से दर्ज करता है, परन्तु उनकी व्याख्या देने से सतर्कतापूर्वक परहेज़ करता है। मन फिराव के आवश्यक तत्वों के रूप में
मूर्छाओं को मानने से, जैसा कि बिना प्रमाण के कहा गया है, वह कोसों दूर था; वह उन्हें या तो दुष्ट आत्मा की चाल, या फिर आत्मा की गहरी आन्तरिक पीड़ा के स्वाभाविक परिणाम मानता था। इसलिए उसने इन प्रकटीकरणों को प्रोत्साहित करने से, उन्हें भड़काना तो दूर, सावधानी से परहेज़ किया।
शारीरिक प्रकटीकरण। 65 उसके प्रचार में कल्पना को भड़काने वाला कुछ नहीं था: वह सदा शान्त और संयमित था, उसने अपनी शक्ति [ee nee — अस्पष्ट मूल पाठ] में नहीं, बल्कि सत्य को प्रमाणित करने में लगाई।
जो इन दृश्यों से ठोकर खाते थे (और बहुत-से ऐसे थे), उनसे वह कहता था, "आओ और देखो।" ब्रिस्टल के एक चिकित्सक ने, जो इस कार्य के विरुद्ध पूर्वाग्रहों से भरा था, सत्य को स्वयं जानना चाहा और वेस्ली की एक सभा में आया।
उसकी जान-पहचान की एक स्त्री, जो पूर्ण स्वस्थ थी और जिसकी सत्यनिष्ठा पर उसे कोई सन्देह नहीं था, उसी दिन वचन से गिरा दी गई, और उसकी उपस्थिति में भारी शारीरिक और मानसिक पीड़ा की दशा में पड़ गई। चिकित्सक ने विविध लक्षणों को बड़े ध्यान से देखा, और जब कुछ मिनटों के बाद वह शान्ति और आनन्द से भर गई, तो वह उठकर यह घोषणा करता हुआ चला गया कि यह बात उसके सारे विज्ञान को हरा देती है, और उसमें उसने परमेश्वर की अँगुली को पहचाना।
अपने सबसे बड़े भाई सैमुएल को, जो इन तत्काल मन फिरावों से बहुत ठोकर खा चुका था और पूरे आन्दोलन की कड़ी आलोचना करता था, वेस्ली ने लिखा, "सारा प्रश्न मुख्यतः, यदि पूर्णतः नहीं, तो तथ्य की बात पर टिका है।
तुम इनकार करते हो कि परमेश्वर अब ये प्रभाव उत्पन्न करता है: कम से कम इस रीति से तो नहीं करता। मैं दोनों की पुष्टि करता हूँ, क्योंकि मैंने उन तथ्यों को अपने कानों से सुना और अपनी आँखों से देखा है। मैंने, जहाँ तक देखा जा सकता है, बहुत-से लोगों को एक क्षण में भय, डर और निराशा की आत्मा से आशा, आनन्द और शान्ति की आत्मा में बदलते देखा है; और उन पापमय अभिलाषाओं से, जो तब तक उन पर राज्य करती थीं, परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की शुद्ध अभिलाषा में। ... क्या तुमने उसे देखा जो तब तक सिंह था और अब मेमना है; वह जो पियक्कड़ था, परन्तु अब आदर्श रूप से संयमी है; वह जो व्यभिचारी था, और अब शरीर की अभिलाषाओं तक से घृणा करता है?
जो मैं कहता हूँ उसके ये मेरे जीवित प्रमाण हैं।"
निःसन्देह ये सर्वोत्तम प्रमाण हैं। फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि जो पुनर्जागरण आत्मिक जड़ता की लम्बी अवधियों के बाद आए हैं, उनमें सुसमाचार के प्रचार के साथ शारीरिक प्रकटीकरण लगभग सदा रहे हैं। 66 आन्दोलन का जन्म। अठारहवीं शताब्दी में विश्वास द्वारा उद्धार का प्रचार इंग्लैंड में एक नवीनता थी। इसीलिए इस सिद्धान्त को ग्रहण करनेवालों के मन में उसने आश्चर्य और हलचल उत्पन्न की। वेस्ली ने प्रेरितिक पद्धति के अनुसार सुसमाचार के साथ व्यवस्था का भी प्रचार किया। उसने पाप की घोरता, और उन शोचनीय परिणामों को जिनकी ओर वह इस संसार में और आनेवाले संसार में ले जाता है, प्रबल प्रकाश में रखा।
ऐसा प्रचार कल्पना या भावनाओं को सम्बोधित नहीं था: वह विवेक के प्रति एक निरन्तर आह्वान था।
कौन नहीं जानता कि प्रबल नैतिक भावनाओं का सामान्य प्रभाव शारीरिक विकार है? यह विशेष रूप से साधारण जनसमूहों के विषय में सच है, जिन्होंने अपनी भावनाओं को छिपाने की कला नहीं सीखी है।
जब वेस्ली ने ब्रिस्टल को केन्द्र बनाया जहाँ से वह अपना कार्य आसपास के सभी क्षेत्रों में फैला रहा था, तब उसका भाई चार्ल्स लंदन में व्हाइटफ़ील्ड के साथ मिलकर वैसा ही कार्य कर रहा था, जिसने अपने प्रचार में उमड़ती भीड़ों के कारण अमेरिका लौटना टाल दिया था, क्योंकि वे उसे जाने नहीं देती थीं। महानगर में, ब्रिस्टल की तरह ही, वह खुली हवा में प्रचार करनेवाला पहला व्यक्ति था, जिसने अपने कार्यक्षेत्र के रूप में मूरफ़ील्ड्स का विशाल मैदान चुना, जो मदारियों और खिलाड़ियों का सामान्य अड्डा था, और जहाँ वह कभी-कभी बीस या तीस हज़ार श्रोताओं को प्रचार करता था। जून मास के दौरान लंदन आकर वेस्ली ने वहाँ भी प्रचार किया, जिससे उसके मित्र को बड़ा आनन्द हुआ, जिसने उसी सन्ध्या अपनी दैनन्दिनी में लिखा, "मैं [T — अस्पष्ट मूल पाठ]
आनन्द से सोने गया कि शैतान के राज्य में एक और नया धावा किया गया है, श्री वेस्ली द्वारा लंदन में भी, ब्रिस्टल की तरह, मेरे पीछे खुली हवा में प्रचार करने से।"
इस नए कार्य ने पादरियों की ओर से प्रबल विरोध भड़काया। मेथोडिस्टों के विरुद्ध, जैसा कि अब उन्हें सामान्यतः कहा जाने लगा था, अनेक अत्यन्त कटु पर्चे पहले ही प्रकाशित हो चुके थे। नियमित पादरी, जिनकी शान्ति
वेस्ली-बन्धु और धर्माध्यक्ष। 67 नए मिशनरियों की सक्रियता से भंग हो गई थी, अपने मंचों से उनके विरुद्ध गरजे, यह घोषित करते हुए कि वे कर्मों के बिना विश्वास का प्रचार करते हैं, और इस प्रकार समस्त नैतिकता की नींव खोखली करते हैं। धर्माध्यक्ष भी उनकी प्रगति से घबरा गए। उन्होंने विस्मय से देखा कि एक आन्दोलन, जो आरम्भ में कुछ युवा उत्साहियों का स्वप्न प्रतीत होता था, एक ही वर्ष में इतनी तीव्र गति से बढ़ रहा है और सारे देश को समेट लेने की धमकी दे रहा है। चार्ल्स वेस्ली को कैन्टरबरी के आर्चबिशप के सामने अपने "अनियमित आचरण" का हिसाब देने के लिए बुलाया गया। उस प्रधान पादरी ने उसे कड़ी फटकार लगाई, और उसे समझा दिया कि यदि वह और उसका भाई कार्य की अपनी नई पद्धति को नहीं त्यागते, तो वे अपने को कलीसियाई नियमों के दण्ड के, यहाँ तक कि बहिष्कार के भी, भागी बना लेंगे। एक क्षण के लिए इन धमकियों ने चार्ल्स वेस्ली को डरा दिया। सौभाग्य से उत्साही
व्हाइटफ़ील्ड पास ही था, और उसकी सलाह से चार्ल्स अगले रविवार को मूरफ़ील्ड्स गया और पहली बार आकाश के खुले वितान तले दस हज़ार लोगों को प्रचार किया। प्रधान पादरी की धमकियों का वही सर्वोत्तम उत्तर था जो वह दे सकता था। इस साहसी आचरण से उसने पीछे हटने का हर सम्भव मार्ग काट दिया, और साहसपूर्वक घोषित कर दिया कि वह आर्चबिशप की आवाज़ से अधिक विवेक की आवाज़ को मानता है।
ब्रिस्टल के कलीसियाई अधिकारी भी कुछ अच्छे नहीं थे, और जॉन वेस्ली को अपनी बारी में उस धर्मप्रदेश के बिशप के सामने उपस्थित होने के लिए बुलाया गया। विश्वास द्वारा उद्धार पर एक धर्मशास्त्रीय चर्चा के बाद, जिसमें निश्चय ही बढ़त प्रधान पादरी की ओर नहीं थी, उसने वेस्ली और उसके मित्रों पर बड़ी कटुता से आक्रमण किया, उन पर यह दिखावा करने का आरोप लगाया कि उन्हें असाधारण प्रकाशन और पवित्र आत्मा के वरदान मिलते हैं: फिर उसने उसके भटकते मार्गों की कड़ी निन्दा की, और ऊँचे स्वर में कहा, 'महोदय, यहाँ आपका कोई काम नहीं है। आपको इस धर्मप्रदेश में प्रचार करने का अधिकार नहीं सौंपा गया है। इसलिए मैं आपको यहाँ से चले जाने की सलाह देता हूँ।' वेस्ली
F 2 68 आन्दोलन का जन्म। ने दृढ़ता से उत्तर दिया, "महोदय, पृथ्वी पर मेरा काम यह है कि जितनी भलाई कर सकूँ, करूँ। इसलिए जहाँ कहीं मैं समझता हूँ कि मैं सबसे अधिक भलाई कर सकता हूँ, वहीं मुझे रहना होगा, जब तक मैं ऐसा समझता हूँ। इस समय
मैं समझता हूँ कि मैं यहीं सबसे अधिक भलाई कर सकता हूँ; इसलिए मैं यहीं रहता हूँ। जहाँ तक यहाँ मेरे प्रचार करने का प्रश्न है, सुसमाचार की सेवा मुझे सौंपी गई है; और यदि मैं बसे हुए संसार में जहाँ कहीं भी हूँ सुसमाचार का प्रचार न करूँ तो मुझ पर हाय है। आपके महामान्य जानते हैं कि पुरोहित ठहराए जाने पर, उस समय मुझे मिले अधिकार-पत्र के द्वारा, मैं सार्वभौमिक कलीसिया का पुरोहित हूँ; और कॉलेज का फ़ेलो ठहराए जाने पर मैं किसी विशेष पल्ली तक सीमित नहीं किया गया था, वरन् मुझे इंग्लैंड के कलीसिया के किसी भी भाग में परमेश्वर का वचन सुनाने का अनिश्चित अधिकार प्राप्त है। इसलिए मैं नहीं मानता कि इस अधिकार-पत्र के अनुसार यहाँ प्रचार करने में मैं किसी मानवीय व्यवस्था को तोड़ता हूँ। जब मुझे विश्वास हो जाएगा कि मैं तोड़ता हूँ, तब यह पूछने का समय होगा, क्या मैं आज्ञा मानूँ
वेस्ली सचमुच सार्वभौमिक कलीसिया का सेवक था, और अपने परिश्रम को एक पल्ली की सीमाओं में बाँधने के लिए पहले से कहीं कम इच्छुक था। ब्रिस्टल से, जो फ़िलहाल उसका मुख्यालय बना रहा, उसने अपना कार्य न केवल पूरे निकटवर्ती पड़ोस में, वरन् वेल्स और डेवनशायर से होते हुए लंदन और ऑक्सफ़ोर्ड तक फैलाया, इस प्रकार सारे देश पर उस शान्तिपूर्ण चढ़ाई का पूर्वाभास देते हुए, जिसका वह आगामी वर्षों में नेता होनेवाला था: सर्वत्र उसने अपने चारों ओर भीड़ों को उमड़ते देखा, और सुसंगत रूप से कह सकता था कि अनेक आत्माएँ सुसमाचार के लिए पकी हुई हैं। इस प्रकार भ्रमणशील प्रचार की योजना की नींव पड़ी, जिसने उसे थोड़े-से मजदूरों की सहायता से अपना कार्य दूर-दूर तक फैलाने में समर्थ किया, और जो उसके कलीसियाई संगठन के घटक तत्वों में से एक बनने को था। इस विभाग के साथ भी वही हुआ जो शेष कार्य के साथ हुआ: यह उसकी स्थिति की अनिवार्यताओं से उत्पन्न हुआ।
वेस्ली द्वारा आत्म-क्षयकारी परिश्रम में बिताए गए इस स्मरणीय वर्ष, 1739, ने मेथोडिस्ट आन्दोलन की नींव को एक साथ अनेक सार्वभौमिक कलीसिया का एक सेवक। 69 स्थानों पर रखे जाते देखा। लंदन, ब्रिस्टल, किंग्सवुड, वेल्स ने इन उत्साही मिशनरियों से वचन सुन लिया था, और पुनर्जागरण ने ठोस स्थिरता का रूप लेना आरम्भ कर दिया था।
यदि इस समय तक वेस्ली को अपने सामने रखे कार्य की महानता की अधिक स्पष्ट धारणा हो गई थी, तो उसके पास उस कार्य की सफलता की आशा रखने का पहले से ही अच्छा कारण भी था।
आंतरिक विभाजन: बाहरी प्रगति।
अपने जन्म के क्षण से ही अठारहवीं शताब्दी का पुनर्जागरण आंतरिक संघर्षों से विचलित रहा, जो उसकी सक्रियता को पंगु कर देने और उसकी सफलता को निष्प्रभावी बना देने की धमकी दे रहे थे। ऊपरी एकता के नीचे वास्तव में अत्यन्त विपरीत प्रवृत्तियाँ छिपी हुई थीं, जो देर-सवेर खुलकर प्रकट हुए बिना नहीं रह सकती थीं। यद्यपि विश्वास द्वारा उद्धार के महान सिद्धान्त पर वे सहमत थे, फिर भी आन्दोलन के अगुवे कुछ गौण धर्मसिद्धान्तीय बातों पर भिन्न मत रखते थे; और मतभेद के ये स्वर अब प्रकट होने लगे।
लगभग दो वर्ष तक वेस्ली बन्धु मोरावियनों के साथ मिलकर कार्य करते रहे थे। विशेषकर राजधानी में, जो लोग उनके द्वारा जाग्रत किए गए थे, वे अधिकांशतः मोरावियन सोसाइटियों से जुड़ गए थे; और जब बन्धु लंदन में होते, तो वे स्वयं भी उनकी सभाओं में जाते थे। परन्तु सन् 1739 के अन्त में वेस्ली का ध्यान जर्मनी से हाल ही में आए कुछ शिक्षकों की शिक्षाओं की ओर खींचा गया, जिन्होंने फैलाना आरम्भ किया था
सोसाइटियों में अनियमवादी (एंटिनोमियन) और निष्क्रियतावादी (क्वायटिस्ट) भूलें। वेस्ली कहता है, "उन्होंने दृढ़ता से कहा कि हम सब अब भी गलत मार्ग पर हैं 0 आंतरिक विभाजन: बाहरी प्रगति। कि हममें बिलकुल विश्वास नहीं है; कि विश्वास की कोई मात्राएँ नहीं होतीं, और इसलिए निर्बल विश्वास विश्वास ही नहीं है; कि जब तक किसी का हृदय शुद्ध नहीं हो जाता और वह हर संदेह या भय से परे नहीं हो जाता, तब तक कोई धर्मी नहीं ठहरता। उन्होंने यह भी दृढ़ता से कहा कि नए नियम में 'विश्वास करने' के सिवा कोई आज्ञा नहीं है; कि हम पर और कोई कर्तव्य नहीं है; और जब मनुष्य विश्वास करता है, तब वहाँ दी गई किसी भी आज्ञा को मानने के लिए वह बाध्य या विवश नहीं है: विशेषकर यह कि वह विधियों के अधीन नहीं है, अर्थात् (जैसा उन्होंने इसे समझाया) वह प्रार्थना करने, प्रभु-भोज में सम्मिलित होने, पवित्रशास्त्र पढ़ने या सुनने के लिए बाध्य या विवश नहीं है; बल्कि जैसा उसका हृदय उसके लिए स्वतंत्र पाए (क्योंकि वह किसी बन्धन में नहीं है), उसके अनुसार इनमें से किसी को भी काम में ले सकता है या नहीं भी ले सकता है।
उन्होंने आगे यह भी दृढ़ता से कहा कि विश्वासी इनमें से किसी को भी अनुग्रह के साधन के रूप में प्रयोग नहीं कर सकता; कि वास्तव में अनुग्रह का कोई साधन होता ही नहीं, क्योंकि इस कथन का पवित्रशास्त्र में कोई आधार नहीं है; और यह कि अविश्वासी को, या जिसका हृदय शुद्ध नहीं है, इन्हें बिलकुल काम में नहीं लेना चाहिए; उसे न प्रार्थना करनी चाहिए, न पवित्रशास्त्र में खोजना चाहिए, न प्रभु-भोज में सम्मिलित होना चाहिए, बल्कि 'शान्त रहना' चाहिए, अर्थात् इन 'व्यवस्था के कामों' को छोड़ देना चाहिए; और तब वह निश्चय ही विश्वास पाएगा, जो वह तब तक नहीं पा सकता जब तक वह 'शान्त' नहीं हो जाता।"
ये गम्भीर भूलें, जिन्होंने विश्वास द्वारा उद्धार के सिद्धान्त को पूरी तरह निर्बल कर दिया था, पहले हेरन्हुट में जमीं, और अब मोल्थर तथा कुछ अन्य प्रचारकों के उत्साह के द्वारा इंग्लैंड में भी चल पड़ने का खतरा पैदा कर रही थीं।
उनका प्रभाव फ्रांसीसी निष्क्रियतावाद (क्वायटिज़्म) से और भी बढ़ गया, जो मादाम गुयों की रचनाओं के अनुवाद के द्वारा फैलाया जा रहा था। वेस्ली का उत्साह और समर्पण अब इतना ठोस हो चुका था कि उसे अपने पुराने मित्रों, रहस्यवादियों, के साँचे में नहीं ढाला जा सकता था; इसलिए मोरावियनों को उनकी भूलों का कायल करने का व्यर्थ प्रयत्न करने के बाद उसने उनसे अलग हो जाने का निश्चय किया। 20 जुलाई, 1740, रविवार को उसने फेटर लेन की सोसाइटी के सामने अपनी आपत्तियों और शिकायतों का एक वक्तव्य पढ़ा, और उससे अन्तिम विदा ले ली।
मोरावियनों से अलगाव। 7 rigs पिछले वर्ष वेस्ली ने लंदन में एक पुराना भवन मोल लिया था, जो बहुत समय से तोप ढालने के कारखाने के रूप में काम आता रहा था; और उसे सार्वजनिक आराधना के उपयोग के अनुकूल बना लिया था। मोरावियनों से अलग होने के बाद जो पच्चीस पुरुष और चालीस स्त्रियाँ उसके साथ बनी रहीं, उन्हें लेकर उसने यहीं शरण ली। चार्ल्स वेस्ली कहता है, "हमने अपने बिखरे हुए मलबे को समेटा, rari nantes in gurgite vasto [विशाल अथाह जल में यहाँ-वहाँ तैरते हुए], क्योंकि दस में से नौ 'निश्चलता' के मृत सागर में निगल लिए गए थे।"
उत्तम बोहलर, जो उस समय इंग्लैंड से बाहर था, यथाशीघ्र लौट आया और एकता को पुनः स्थापित करने का प्रयत्न किया; परन्तु उसके प्रयास सफल नहीं हुए, और स्पैंगेनबर्ग तथा स्वयं ज़िन्ज़ेनडॉर्फ के प्रयास भी नहीं हुए, जो इन दुःखद मतभेदों को, यदि सम्भव हो तो, शान्त करने के लिए जर्मनी से आए थे। उसके बाद हुई चर्चाओं का वर्णन करना हमारा काम नहीं है। यह समझौते का समय नहीं था, और पुनर्मिलन के सभी प्रयत्न विफल रहे। मसीहियों के बीच विभाजन निःसन्देह अपने आप में एक बुराई है; परन्तु क्या हम यह विश्वास नहीं कर सकते कि इस अवसर पर भी, जैसा अनेक अन्य अवसरों पर, परमेश्वर ने कलीसिया के अधिक भले के लिए बुराई में से भलाई निकाली?
यदि मेथोडिस्ट मत आरम्भ से ही मोरावियन समुदाय में विलीन हो गया होता, तो क्या वह संसार में इतना बड़ा कार्य सम्पन्न कर पाता? जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हम इसे निर्णीत प्रश्न मानते हैं, और हमें विश्वास है कि कलीसिया की इन दोनों शाखाओं का अपना-अपना विशेष उद्देश्य रहा है, और वे विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अस्तित्व में लाई गई हैं।
मोरावियनों के साथ संघर्ष से उत्पन्न गहरी चिन्ता ने वेस्ली की प्रचार-सम्बन्धी सक्रियता को किसी भी प्रकार कम नहीं किया। कार्य की बढ़ती माँगों को स्वयं पूरा न कर पाने के कारण, उसने शीघ्र ही अपनी सोसाइटियों के सबसे भक्त और योग्य सदस्यों को सहायक के रूप में लगाने का विचार किया। उसने जॉन सेनिक से अनुरोध किया कि वह उसकी अनुपस्थिति में किंग्सवुड सोसाइटी की देखभाल करे, और थॉमस मैक्सफ़ील्ड से कि वह लंदन सोसाइटी के लिए वही कार्य करे। लगभग इसी समय जॉन नेल्सन, एक राजमिस्त्री, जो लंदन में वेस्ली के माध्यम से मन फिराकर आया था, a emi a 72 ~~ आंतरिक विभाजन: बाहरी प्रगति। सार्वजनिक रूप से प्रचार करने लगा। वेस्ली, जो अब भी अपने कलीसियाई पूर्वाग्रहों से प्रभावित था, अभी तक साधारण विश्वासियों के प्रचार को प्रोत्साहन नहीं देता था, और हम देखेंगे कि केवल परिस्थितियों के दबाव से ही उसे बाद में इस प्रश्न पर विचार करने को विवश होना पड़ा।
कार्यकर्ता एक विस्तृत क्षेत्र में बिखरे हुए थे। व्हाइटफ़ील्ड अमेरिका में सफल अभियान चला रहा था; चार्ल्स वेस्ली अपने भाई का सामर्थ्य के साथ साथ दे रहा था; इंघम यॉर्कशायर में, हावेल हैरिस वेल्स में, जॉन बेनेट डर्बीशायर में, डेविड टेलर लेस्टरशायर में परिश्रम कर रहे थे। ये सब, शिक्षा और मतों में भिन्न होते हुए भी, एक ही कार्य में लगे थे, किसी मानवीय विधान का नहीं, वरन् ईश्वरीय बुलाहट का पालन करते हुए।
वेस्ली ने सन् 1740 और 1741 के वर्ष भी एक व्यापक भ्रमणशील सेवकाई के फलदायी परिश्रम में लगाए। उसके दैनिक वृत्तान्त दिखाते हैं कि उसने लंदन और ब्रिस्टल को अपने दो केन्द्र बनाया, जहाँ से वह बाथ, विंडसर, साउथैम्पटन,
लेस्टर, नॉटिंघम और वेल्स तक जाता था। जो सफलता उसके परिश्रम को पहले ही मिल चुकी थी, उसने उसे खुले में सभाएँ जारी रखने को प्रोत्साहित किया, जो अपनी नवीनता के कारण ही जिज्ञासा जगाती और रुचि उत्पन्न करती थीं। जैसे ही वह किसी नगर के निकट पहुँचता, कारीगर अपनी कार्यशालाएँ और खनिक अपनी खदानें छोड़कर उसे सुनने के लिए उमड़ पड़ते। निस्सन्देह, हर समय उसका ऐसा हार्दिक स्वागत नहीं होता था: प्रायः ऐसा होता कि पहली बार तो खुली बाँहों से उसका स्वागत किया जाता, परन्तु दूसरी बार पत्थरों की बौछार से। फिर भी वह उन लोगों को इतना जानता था जिनका वह भला करना चाहता था कि भावनाओं के इन अचानक उलटफेरों से चकित न हो; वह भली-भाँति जानता था कि उनका प्रिय और उनका नायक बनने के बाद उनकी घृणा का पात्र बन जाना (béte noire) सबसे स्वाभाविक बात थी।
यदि हमें उसकी आत्मा की निर्भीकता और उसके वचन के सामर्थ्य का कोई अनुमान लगाना है, तो हमें यह देखना होगा कि वेस्ली किस प्रकार क्रोधित और उग्र भीड़ का सामना कर सकता था। हम शीघ्र ही देखेंगे
लोकप्रियता और विरोध। rey fo कि कुछ समय बाद उसे कितने हिंसक आक्रमणों का सामना करना पड़ा।
परन्तु आरम्भ से ही वह अपनी सार्वजनिक सेवकाई के दौरान तीव्र विरोध का सामना करने का अभ्यस्त था। उदाहरण के लिए, ब्रिस्टल में सन् 1740 के आरम्भ में उपद्रवी भीड़ ने सभाओं को भंग करने के अनेक प्रयत्न किए। एक सन्ध्या को, "न केवल आँगन और गलियाँ, बल्कि ऊपर-नीचे सारी सड़क लोगों से भरी थी, जो चिल्ला रहे थे, कोस रहे थे और गाली दे रहे थे; और क्रोध तथा रोष में धरती को निगल जाने को तैयार थे। महापौर ने आदेश भेजा कि वे तितर-बितर हो जाएँ। परन्तु उन्होंने उसे तुच्छ जाना। फिर मुख्य सिपाही स्वयं आया, जो तब तक हमारे विरुद्ध काफ़ी पूर्वाग्रह रखता था। परन्तु उन्होंने उसका भी ऐसे भद्दे ढंग से अपमान किया कि मेरा विश्वास है उसकी आँखें पूरी तरह खुल गईं। अन्त में महापौर ने अपने कई अधिकारी भेजे, जिन्होंने सरगनाओं को हिरासत में ले लिया, और तब तक नहीं गए जब तक बाकी सब तितर-बितर न हो गए।" अधिकारियों की इस दृढ़ता ने बहुत समय तक ऐसे उपद्रवों को रोके रखा।
लंदन की भीड़ को वश में करना कठिन था, उनकी अवज्ञा की आदतें उन्हें सचमुच भयावह बना देती थीं; फिर भी वेस्ली लगभग हर बार अपनी उपस्थित-बुद्धि के बल पर उनके बुरे मनसूबों को विफल करने में सफल रहा। एक दिन उसने अपने चैपल के द्वार को एक कोलाहल मचाती भीड़ से घिरा पाया।
घबराने की बात तो दूर, उसने मार्ग बलपूर्वक निकालने का कोई प्रयत्न नहीं किया, बल्कि ऐसे अवसर के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करते हुए तुरन्त उस भीड़ को "धार्मिकता, संयम और आनेवाले न्याय" का प्रचार करने लगा। धीरे-धीरे कोलाहल थम गया, और जब उसने श्रोताओं से विदा ली, तो उन्होंने उसे "अनेक आशीषों के साथ" विदा किया।
इसके दो दिन बाद एक क्रोधित भीड़ ने चैपल पर अधिकार कर लिया; वे खुलेआम उसका अपमान करते और अपनी चिल्लाहट से प्रचारक की आवाज़ को दबा देते थे। परन्तु वह, जो सदा शान्त रहता था, तूफ़ान को अपना बल स्वयं समाप्त कर लेने देता और इस प्रकार प्रभाव पा लेता था: दृश्य शीघ्र ही बदल गया, आँसू बह निकले, और सिंह मेमने बन गए।
74. आंतरिक विभाजन: बाहरी प्रगति।
इस दृश्य के विषय में वेस्ली ने अपने दैनिक वृत्तान्त में लिखा, "मुझे आश्चर्य है कि शैतान में इतनी बुद्धि भी नहीं कि समझ सके कि वह अपना ही राज्य नष्ट कर रहा है। मेरा विश्वास है कि उसने कभी, एक बार भी, परमेश्वर के सत्य के विरुद्ध यह खुला विरोध इस प्रकार नहीं कराया कि अपने एक या अधिक सेवकों को न खोया हो, जो परमेश्वर को ढूँढ़ते भी न थे, फिर भी उसे पा गए।"
कुछ समय बाद वह लिखता है, "जब मैं घर आया, तो द्वार के चारों ओर एक असंख्य भीड़ पाई, जिसने मुझे देखते ही अपने सारे गले खोल दिए। मैंने अपने मित्रों से घर के भीतर जाने को कहा; और फिर लोगों के बीच में जाकर 'यहोवा, जो दयालु और अनुग्रहकारी है, और बुराई से पछतानेवाला है' इस नाम की घोषणा की। वे एक-दूसरे को घूरते खड़े रहे। मैंने उनसे कहा कि वे इस महान परमेश्वर के मुख से भाग नहीं सकते: इसलिए मैंने उनसे विनती की कि हम सब मिलकर उससे दया की दुहाई दें। इस पर वे तुरन्त सहमत हो गए: तब मैंने उन्हें उसके अनुग्रह को सौंप दिया, और बिना किसी बाधा के भीतर की छोटी मंडली के पास चला गया।"
वेस्ली की सेवकाई में विघ्न केवल भीड़ ही नहीं डालती थी, बल्कि प्रायः ऐसे व्यक्ति भी डालते थे जो उस पर अपमान की बौछार करते या छलभरे प्रश्नों से उसे उलझाने का प्रयत्न करते थे। एक बार ब्रिस्टल में सभा के बीच एक आदमी चिल्ला उठा, "तू कपटी है, शैतान है,
कलीसिया का शत्रु है। यह झूठी शिक्षा है। यह कलीसिया की शिक्षा नहीं है। यह विनाशकारी शिक्षा है। यह शैतानों की शिक्षा है।" वेस्ली अपना उपदेश जारी रखे रहा, इस निन्दक की चिल्लाहट से अविचलित, जो वेश बदले हुए एक रोमन कैथोलिक पादरी निकला। नॉटिंघम में, जब वह बाज़ार में प्रचार कर रहा था, एक आदमी पीछे से आया और बीच में टोकने लगा, विरोध और ईशनिन्दा की बातें बोलता हुआ।
वेस्ली ने मुड़कर उसकी ओर देखा, और वह एक खम्भे के पीछे चला गया और ओझल हो गया।
परन्तु उसके इनसे कहीं अधिक भयंकर विरोधी थे: पादरी-वर्ग उसके साथ सदा भगोड़े और धर्मत्यागी जैसा व्यवहार करता था, और उस पर यह दोष लगाता था कि वह अपने पद की गरिमा को खतरे में डाल रहा है और
पास्टरल aoe 75 अपने पवित्र वर्ग को तथा अपने पहने हुए चोगे को नीचा दिखा रहा है। ये बातें उसके लिए ठोकर का कारण नहीं बनीं: दुर्भाग्य से पादरियों की दुर्भावना केवल शब्दों तक सीमित नहीं रही, और वे अब पुनर्जागरण के प्रेरितों के विरुद्ध युद्ध छेड़ने ही वाले थे।
वेस्ली एक प्रचारक से कुछ अधिक था: वह एक आत्मिक चरवाहा भी था। अपनी निरन्तर यात्राओं के बावजूद वह नए मन फिराए हुओं से भेंट करने का समय निकाल लेता था, ताकि उन्हें दृढ़ बने रहने को प्रोत्साहित करे। रोगियों पर वह लगन से ध्यान देता था, और बहुतों ने प्रसन्नता से उसके उद्धार के सन्देश को ग्रहण किया। बन्दियों को भी उसने नहीं भुलाया, वह वर्ग जिस पर उसने ऑक्सफ़ोर्ड में अपना पहला परिश्रम किया था। वह जनवरी, 1740 में ब्रिस्टल में था, अभी एक यात्रा से लौटा ही था, और इरादा रखता था
कि कुछ समय तक इस महत्त्वपूर्ण स्थान को न छोड़े, कि तभी उसे एक युवक की ओर से, जो लंदन के कारागार में मृत्युदण्ड की आज्ञा पाए पड़ा था, इस आशय का सन्देश मिला:—"मैं तुझे जीवते परमेश्वर की शपथ देता हूँ कि मेरे यहाँ से जाने से पहले आकर मुझसे भेंट कर।" यह युवक, जिसने वेस्ली के प्रचार में कुछ अच्छे प्रभाव पाए थे और कुछ समय तक उसकी सेवा में रहा था, बुरे उदाहरणों से भटककर राजमार्ग पर डकैती कर बैठा था। यह सन्देश पाकर वेस्ली हिचकिचा नहीं सका: उसके और लंदन के बीच तीन दिन की यात्रा की दूरी होने पर भी वह तुरन्त चल पड़ा। उसने बन्दी को मन की रोचक दशा में पाया: उसने स्वीकार किया कि ब्रिस्टल में वेस्ली के साथ बिताए थोड़े-से समय में उसने अयोग्य रीति से उसके भरोसे का दुरुपयोग किया था और किंग्सवुड स्कूल के लिए एकत्र किए गए धन में से एक बड़ी रकम का गबन किया था। यह बात, जिसकी वेस्ली को अब तक कोई जानकारी नहीं थी, अपराधी में उसकी रुचि घटाने के बजाय उसके उद्धार की उसकी इच्छा को और बढ़ा गई। उसके परिश्रम का फल उसके मन-फिराव के रूप में निकला, और ~ कुछ समय बाद उस युवक को क्षमादान मिला, और अन्ततः उसकी सज़ा आजीवन देश-निकाले में बदल दी गई।
ब्रिस्टल के कारागारों में, जहाँ वेस्ली प्रायः जाया करता था, उसे 76 आंतरिक विभाजन: बाहरी प्रगति। वैसी ही सफलता मिली। अन्य लोगों के साथ एक गरीब सिपाही, जिसे फाँसी दी जाने वाली थी, उसके द्वारा मन फिराकर प्रभु की ओर आया। अन्य दण्डित अपराधियों ने भी उसकी सेवाएँ चाहीं, परन्तु बीचर नाम के एक नगर-पार्षद ने उनके अनुरोध का विरोध किया और उसे कारागार में प्रवेश देने से इनकार कर दिया। वेस्ली अपने दैनिक वृत्तान्त में इसका उल्लेख करता है, और जोड़ता है, "मैं पार्षद बीचर को मसीह के न्याय-आसन के सामने इन आत्माओं का उत्तर देने के लिए बुलाता हूँ।"
जिस समय वह सुसमाचार का कार्य कर रहा था, उसी समय नवजात सोसाइटियाँ भली-भाँति संगठित हो रही थीं और संख्या में बढ़ रही थीं, उन विभाजनों के बावजूद जिनका हम उल्लेख कर चुके हैं और जिनका हमें शीघ्र ही आगे भी उल्लेख करना होगा। मार्च, 1740 में अपनी ब्रिस्टल की सोसाइटियों के विषय में वेस्ली कहता है, "यहाँ देखना सरल था कि परमेश्वर अब कितने भिन्न ढंग से कार्य करता है, जैसा उसने पिछले वसन्त में किया था। तब वह तेज़ बाढ़ की तरह बहता हुआ अपने सामने सब कुछ बहा ले जाता था। जबकि अब वह अपना प्रभाव उँडेलने की कृपा करता है, गुप्त रूप से, शान्त ओस की तरह ताज़गी देता हुआ।
दोषबोध और गहरा और गहरा बैठता जाता है। प्रेम और आनन्द अधिक शान्त, समरस और स्थिर हैं। और परमेश्वर बहुतों में वृक्ष की जड़ पर कुल्हाड़ी चला रहा है, जिनके मन को तब तक चैन नहीं मिल सकता जब तक वे धार्मिकता और सच्ची पवित्रता में परमेश्वर के स्वरूप में पूरी तरह नए नहीं बना दिए जाते।"
मोरावियनों से अलग होते समय वेस्ली ने इस बात का ध्यान रखा कि उनके संगठन में जो कुछ उपयोगी जान पड़ा, उसे अपने पास रखे।
जो कुछ भी उसकी सोसाइटियों की आत्मिक उन्नति और सुदृढ़ीकरण में सहायक प्रतीत हुआ, उसे उसने उनमें अपना लिया। बैण्ड-सभाएँ और प्रेम-भोज ब्रिस्टल और लंदन दोनों में बहुत लोकप्रिय थे। वेस्ली ने "संयुक्त सोसाइटियों" में, जैसा कि वह अब उन्हें कहता था, कठोर अनुशासन बनाए रखा, उन सदस्यों को निकाल दिया जिनका आचरण उचित नहीं था, और साथ ही एकता और शान्ति बनाए रखने का प्रयत्न करता रहा। सोसाइटियाँ
मसीही अर्थव्यवस्था। Ct पहले ही संख्या में बढ़ चुकी थीं। सितम्बर, 1741 में, अर्थात् मोरावियनों से टूटने के एक वर्ष से कुछ ही अधिक समय बाद, अकेले लंदन में उनके लगभग एक हज़ार सदस्य थे। ये लगभग पूरी तरह निचले वर्गों में से एकत्र हुए थे। फिर भी,
वेस्ली ने उन्हें परमेश्वर के कार्य के निर्वाह के लिए त्याग करना सिखाने का प्रयत्न किया। 1740 का जाड़ा असाधारण रूप से कठोर था, इसलिए उसने ब्रिस्टल के अपने मित्रों से उन गरीबों के लिए अपील की जिनके पास रोटी नहीं थी, और इस प्रकार एकत्र किए धन से वह पाले के रहने तक प्रतिदिन उन लोगों में से, जिन्हें सबसे अधिक आवश्यकता थी, एक सौ और कभी-कभी एक सौ पचास को भोजन करा सका। लंदन में उसने डीकनों जैसी एक व्यवस्था स्थापित की, जिसमें बारह व्यक्ति थे और जिनका काम सबसे अधिक अभावग्रस्त मामलों में सहायता पहुँचाना था। इनमें से प्रत्येक के पास देखभाल के लिए एक निश्चित क्षेत्र था, जिसमें वह गरीबों से भेंट करता और उनकी सहायता करता या उनके लिए रोज़गार जुटाता, और इसके अतिरिक्त रोगियों पर विशेष ध्यान देता। सप्ताह में एक बार वे इसलिए मिलते थे कि जो कुछ उन्होंने किया उसका लेखा दें और आगे के लिए क्या करना है इसका परामर्श करें। आवश्यक साधन इस प्रकार जुटाए जाते थे कि सोसाइटी का प्रत्येक सदस्य प्रति सप्ताह एक पेनी का चन्दा देता, और इसके अतिरिक्त जो भी वस्त्र वे दे सकते, वे भी देता। निर्धन-कोष के अतिरिक्त नई सोसाइटियों पर और भी माँगें थीं जिनके लिए और त्याग आवश्यक थे। चैपलों और स्कूलों के रूप में उनके पास पहले से सम्पत्ति थी, जिन पर चढ़े ऋण को यथाशीघ्र चुकाना आवश्यक था। स्कूलों को पर्याप्त सहायता की आवश्यकता थी।
और यद्यपि वेस्ली के झुंड को उसकी सेवकाई का लाभ अपनी ओर से बिना किसी मूल्य के मिलता था, फिर भी उन्हें उस समय के लिए तैयार करना आवश्यक था जब उन्हें अपने प्रचारकों का भरण-पोषण स्वयं करने के लिए बुलाया जाए।
सर्वोच्च कोटि का प्रशासक होने के कारण वेस्ली अपनी सोसाइटियों के आन्तरिक प्रबन्ध की सारी बारीकियों में स्वयं लगा रहा; और इस प्रकार धीरे-धीरे और परिस्थितियों के बल से संस्थाओं का एक जाल खड़ा हुआ, जिस पर 78 आंतरिक विभाजन: बाहरी प्रगति: उसकी अपनी ऊर्जावान आत्मा की व्यक्तिगत छाप थी। परन्तु हाय! ठीक उसी समय जब यह संगठन इस प्रकार शान्तिपूर्वक स्थापित किया जा रहा था, एक तूफ़ान उठा जिसने उसे नष्ट कर देने की धमकी दी, और उसके साथ उस आत्मिक जीवन को भी, जिसका वह बाहरी रूप था।
वेस्ली और व्हाइटफ़ील्ड एक ही साधन के द्वारा उद्धार के आनन्द में पहुँचाए गए थे, और आरम्भ में उन्होंने पूर्ण सामंजस्य के साथ मिलकर परिश्रम किया था। परन्तु धर्मसिद्धान्त की बातों पर उनके मतों में शीघ्र ही एक भेद प्रकट हुआ, जो बढ़ता गया और अन्त में विभाजन में परिणत हुआ।
मतों का यह भेद पूर्वनियति के सिद्धान्त के विषय में था, जिसे व्हाइटफ़ील्ड ने कठोर केल्विनवादी अर्थ में, उसके तार्किक परिणामों सहित, स्वीकार किया था, जो परमेश्वर को पक्षपाती और अन्यायी ठहराते प्रतीत होते हैं। इस सिद्धान्त की व्यावहारिक असंगतियाँ वेस्ली के तार्किक मन को इतनी स्पष्ट थीं कि वह इसे स्वीकार नहीं कर सकता था; इसके अतिरिक्त, उसे यह पवित्रशास्त्र की स्पष्ट घोषणाओं का सीधा खण्डन करता प्रतीत होता था।
कुछ समय तक दोनों मित्रों ने शान्ति के हित में इस विवादित विषय पर पूर्ण मौन रखने पर सहमति बनाए रखी। दुर्भाग्य से उनके अनुयायियों ने वैसा संयम नहीं दिखाया। जैसे ही व्हाइटफ़ील्ड अमेरिका के लिए रवाना हुआ, उसके दल के कुछ लोगों ने लंदन और ब्रिस्टल के लोगों में फूट की आग भड़का दी। वेस्ली, जो अपनी सोसाइटियों के सभी सदस्यों को इस विषय पर पूर्ण मत-स्वतंत्रता देना चाहता था, परन्तु नहीं चाहता था कि वे कलह का अखाड़ा बन जाएँ, शान्ति पुनः स्थापित करने का प्रयत्न करता रहा, और असहमत लोगों से विनती की कि वे व्यर्थ विवादों से दूर रहें। परन्तु जब उसने देखा कि वे सोसाइटियों को परेशान करने पर अड़े हुए हैं और ऐसे फूट डालने वाले प्रश्नों को छोड़ने से इनकार करते हैं, तो सदस्यों के साथ सामूहिक रूप से परामर्श करने के बाद उसने विवाद करनेवालों को निकाल दिया।
कुछ समय बाद, जिसे वह ईश्वरीय प्रेरणा समझता था उसका पालन करते हुए, उसने ब्रिस्टल में अपना प्रसिद्ध उपदेश "मुफ़्त
अनुग्रह" पर दिया, जो उसके दिए सब उपदेशों में सबसे अधिक हृदयस्पर्शी और वाक्पटु था।
व्हाइटफ़ील्ड का अलगाव। wo नियति-आज्ञाओं के सिद्धान्त के विरुद्ध यह विरोध तुरन्त प्रकाशित हुआ और व्यापक रूप से बाँटा गया: उसकी एक प्रति अमेरिका में व्हाइटफ़ील्ड को भेजी गई, ताकि वह देख सके कि उसके और उसके मित्र के बीच दरार कितनी पूर्ण है।
न्यू इंग्लैंड के पादरियों के साथ उसके मेलजोल ने उसे अपने मतों में और दृढ़ कर दिया था, और इस विषय पर उसके और वेस्ली के बीच कई पत्र आ-जा चुके थे। उसने तुरन्त वेस्ली के उपदेश का उत्तर प्रकाशित कर दिया। उसका एक निजी पत्र, जो उसने अमेरिका में रहते हुए वेस्ली को लिखा था, कुछ बेईमान लोगों के हाथ लग गया, जिन्होंने उसे किसी भी पक्ष की अनुमति के बिना छाप दिया। एक
रविवार की सुबह, सभा से पहले, चैपल के द्वार पर लोगों के बीच उसकी बहुत-सी प्रतियाँ बाँटी गईं।
स्वयं वेस्ली ने, एक प्रति प्राप्त करके, समझाया कि वह पत्र कितने अनुचित ढंग से छापा गया था, और फिर जोड़ा, "मैं ठीक वही करूँगा जो मेरा विश्वास है श्री व्हाइटफ़ील्ड करते, यदि वे स्वयं यहाँ होते," और "उसे सबके सामने टुकड़े-टुकड़े कर दिया।" उपस्थित सभी ने उसका अनुकरण किया, और द्वार पर मिली अपनी-अपनी प्रतियाँ नष्ट कर दीं।
व्हाइटफ़ील्ड अपने अनुयायियों के आग्रह पर इंग्लैंड लौट आया, और 11 मार्च, 1741 को पहुँचा।
चार्ल्स वेस्ली से भेंट होने पर उसका पहला विचार यही था कि भाइयों के साथ मिलकर कटु मतभेदों से हुई हानि की भरपाई के लिए परिश्रम करे। परन्तु थोड़े ही समय में, अपने आसपास के प्रभावों के आगे झुककर, उसने अपने पुराने मित्रों से कह दिया कि वह और वे दो भिन्न सुसमाचारों का प्रचार करते हैं, और इसलिए वह न केवल उन्हें संगति का दाहिना हाथ नहीं देगा, बल्कि जहाँ कहीं भी प्रचार करेगा, वहाँ सार्वजनिक रूप से उनके विरुद्ध प्रचार करने का निश्चय कर चुका है। कुछ समय बाद उसने सचमुच सार्वजनिक रूप से वेस्ली का नाम लेकर उसकी निन्दा की, और वह भी फ़ाउंड्री से दूर नहीं, जहाँ उसी समय वेस्ली प्रचार कर रहा था। अन्य परिस्थितियाँ VSA\\\ घटीं, जो उतनी ही शोचनीय थीं, और जिन्होंने दरार को पूरा कर दिया।
इन महान प्रचारकों के इतिहास के इस अंश को बहुत भिन्न-भिन्न दृष्टियों से देखा गया है। जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, इससे इनकार किए बिना कि यह वाद-विवादात्मक संघर्ष दोनों ओर से कुछ कठोरता के साथ चलाया गया, 80 साधारण विश्वासियों का प्रचार। फिर भी निष्पक्ष जाँच के बाद हमें विश्वास है कि वाणी और कर्म दोनों में संयम की दृष्टि से लाभ वेस्ली के पक्ष में रहा।
यह फूट चाहे कितनी भी विनाशकारी रही, परमेश्वर ने इसे पुनर्जागरण को नष्ट करने नहीं दिया। मेथोडिस्ट मत दो शाखाओं में बँट गया; परन्तु कुल मिलाकर यह विभाजन दुर्बलता का नहीं, वरन् शक्ति का स्रोत बना। केवल कृत्रिम एकता से सम्भवतः आपसी कलह उत्पन्न होते, जिनमें न गरिमा होती, न कोई परिणाम; जबकि अपनी दो शाखाओं में, जो यद्यपि भिन्न रीति से संगठित थीं पर एक ही ध्वज के नीचे पंक्तिबद्ध थीं, वह छोटी टोली विजय पर विजय पाती हुई आगे बढ़ती गई।
इसके अतिरिक्त, वेस्ली और व्हाइटफ़ील्ड में शीघ्र ही मेल हो गया, और उन्होंने अतीत को विस्मृति में दफ़न हो जाने दिया: उन्होंने मित्रतापूर्ण अभिवादनों का आदान-प्रदान किया, और अन्ततः एक-दूसरे के पुलपिटों पर प्रचार किया। उनकी मित्रता इतनी ठोस नींव पर टिकी थी कि गौण असहमतियों से स्थायी रूप से टूट नहीं सकती थी, और उनके हृदय इतने मसीही थे कि धर्म के मूल सत्यों पर उनके बीच विद्यमान पूर्ण सहमति को वे अनुभव न करें, ऐसा नहीं हो सकता था।
अध्याय III. साधारण विश्वासियों का प्रचार। उत्तर।
1742. तीन वर्ष से अधिक समय से वेस्ली अपने मिशन के कार्य में लगा हुआ था, और उसके परिश्रम को पहले ही गौरवपूर्ण सफलता मिल चुकी थी। परन्तु यही सफलता कभी-कभी गहरी चिन्ता का कारण बन जाती थी। वह प्रायः अपने आप से पूछता था कि दो या तीन सेवक सारे इंग्लैंड में फूट पड़ रहे धार्मिक पुनर्जागरण की माँगों के लिए कैसे पर्याप्त हो सकते हैं।
सफलता की उलझनें। e | खुले में प्रचार ने सुसमाचार-प्रचार के कार्य के लिए अद्भुत सुविधाएँ प्रदान कीं: वेस्ली की निरन्तर यात्राओं और उसके सहकर्मियों की यात्राओं ने उन्हें अपना कार्यक्षेत्र हर दिशा में बढ़ाने में समर्थ किया, जबकि उनके सामर्थी विश्वास ने शानदार परिणाम प्राप्त किए। क्या ये सफलताएँ आवश्यक देखरेख के अभाव में दयनीय पतन में समाप्त होनी थीं?
उन आत्माओं को, जो प्रचार के द्वारा जाग उठी थीं, एकजुट करना, संगठित करना और उनकी रखवाली करना आवश्यक था: उनकी धार्मिक शिक्षा अभी आरम्भ होनी शेष थी: इन उत्तरदायित्वों को कौन उठाएगा? वेस्ली ने पहले आशा की थी कि उसे एंग्लिकन पादरियों में सहायक मिलेंगे, परन्तु इसमें उसे निराशा हुई: यहाँ-वहाँ कुछ डरपोक सहानुभूति दिखाई गई, परन्तु पादरियों का बहुमत आन्दोलन के स्पष्टतः विरुद्ध था। उन्होंने नवप्रवर्तकों के लिए अपने पुलपिट बन्द कर दिए, और उन लोगों का डटकर प्रतिरोध किया जिन्होंने उनकी शान्ति भंग करने का साहस किया था।
इस उलझन-भरी स्थिति से निकलने का केवल एक ही मार्ग था। वह था सरकारी सेवकाई के लगभग सूख चुके तने पर साधारण विश्वासियों का एक वर्ग कलम लगाना, जो नए मन फिराए हुओं में से चुना जाए और अपने भाइयों की आवश्यकताओं को समझने तथा उनकी सेवा करने में समर्थ हो। यह विचार इतना साहसी था कि आरम्भ में असम्भव प्रतीत हुआ। फिर भी इस कठिन प्रश्न का यही एकमात्र सम्भव समाधान था। वेस्ली धीरे-धीरे और अपनी इच्छा के विरुद्ध इसे अपनाने की ओर ले जाया गया। घटनाओं ने, या यों कहें कि स्वयं प्रभु की व्यवस्था ने, जो घटनाओं को होने देती है, उसकी पसन्द पर विजय पा ली।
हम देख चुके हैं कि वेस्ली ने लंदन, ब्रिस्टल और किंग्सवुड में अपनी सोसाइटियों की देखभाल समझदार साधारण विश्वासियों को कैसे सौंपी थी, जिनका काम उसकी अनुपस्थिति में उन्हें शिक्षा देना था
पवित्रशास्त्र पढ़कर और ऐसे विचार जोड़कर जो श्रोताओं के लिए उपयोगी हों। वह उन्हें प्रचार करने की अनुमति नहीं देता था, क्योंकि उसके अब तक के मतों के अनुसार यह पादरी-वर्ग के अधिकारों में दखल होता। फिर भी उसने उनके लिए जो सीमाएँ ठहराईं वे इतनी स्पष्ट नहीं थीं कि उनका पालन सरल या हर समय सम्भव हो सके
G 82 साधारण विश्वासियों का प्रचार। सहायकों में से एक, थॉमस मैक्सफ़ील्ड, अपने समर्पित उत्साह में इतना आत्म-विस्मृत हो गया कि शीघ्र ही उन सीमाओं को लाँघ गया, और लंदन में सोसाइटी की सभाओं में बहुत बड़ी सफलता के साथ प्रचार करने लगा। जैसे ही वेस्ली ने इसके विषय में सुना, वह ब्रिस्टल से जल्दी लौटा ताकि उस बात को रोक दे जिसे वह एक गम्भीर अव्यवस्था समझता था।
सौभाग्य से उसकी माता वहाँ थीं, और एक बार फिर उनकी सलाह अत्यन्त मूल्यवान सिद्ध हुई। वे अब फ़ाउंड्री में रहती थीं; अपने पुत्रों के कार्य के विरुद्ध आरम्भ में उनके जो पूर्वाग्रह थे वे जाते रहे थे, और वे अटल सहानुभूति के साथ उनकी प्रगति देखती थीं।
उसके पहुँचने पर उन्होंने देखा कि उसके चेहरे पर असन्तोष और चिन्ता झलक रही थी, और कारण पूछा।
"मैं देखता हूँ कि थॉमस मैक्सफ़ील्ड प्रचारक बन गया है," उसने असामान्य रूखेपन से कहा। "जॉन," उन्होंने उत्तर दिया, "तुम जानते हो कि मेरे विचार क्या रहे हैं। तुम मुझ पर ऐसी किसी बात का सहज ही समर्थन करने का सन्देह नहीं कर सकते। परन्तु उस युवक के विषय में जो कुछ करो, सोच-समझकर करना; क्योंकि वह प्रचार करने के लिए उतना ही निश्चय परमेश्वर की ओर से बुलाया गया है जितना तुम। देखो कि उसके प्रचार के फल क्या रहे हैं, और उसे स्वयं भी सुनो।" वेस्ली ने इस सलाह की उचित बात देखी, और जब उसने मैक्सफ़ील्ड को प्रचार करते सुन लिया, तो उसने उत्तर दिया,
"वह प्रभु है: जो उसे भला लगे वही करे।"
उसने इसमें ईश्वरीय व्यवस्था का संकेत देखा, जिसके सामने उसकी सारी आपत्तियाँ धरी रह गईं। साधारण विश्वासियों की सेवकाई अब स्थापित हो गई, और परिणाम ने सिद्ध किया कि यह संस्था उस समय की आवश्यकताओं को पूरा करती थी, और किसी गिरते हुए कार्य को सहारा देने के लिए गढ़ा गया कोई मात्र उपाय नहीं थी, जो उसकी शक्ति बढ़ाने के बजाय उसके पतन को ही शीघ्र करता। यह नई व्यवस्था शीघ्र ही बड़े अनुपात तक पहुँच गई।
सोसाइटियों को अपने ही बीच में से ऐसे लोगों को चुनना पड़ा जो अपने भाइयों की रखवाली कर सकें और सुसमाचार-प्रचार के कार्य का विस्तार कर सकें। ये लोग, जो उनके बीच से उठाए गए और वेस्ली द्वारा स्वीकार किए गए, भक्त और सरल-हृदय साधारण विश्वासी थे, जिन्होंने अपने सांसारिक व्यवसायों को छोड़े बिना अपना सारा खाली समय सुसमाचार के प्रचार में लगा दिया। Lay Preaching. 88 इस वर्ष के अन्त तक वेस्ली के निर्देशन में ऐसे बीस कार्यकर्ता थे।
अन्य रीतियों से भी सोसाइटियाँ तेज़ी से विकसित हुईं, और धीरे-धीरे नियमित संगठन का वह रूप धारण करने लगीं जिसने अन्ततः मेथोडिस्ट कलीसिया का स्वरूप गठित किया। 25 मार्च, 1742 को वेस्ली ने लंदन सोसाइटी को छोटे-छोटे वर्गों में बाँट दिया, जिससे "आत्माओं की देखभाल" का कार्य सरल हो गया: यही पहला अवसर था जब कक्षा-सभाओं (क्लास-मीटिंग) की प्रणाली अपनाई गई, जो मेथोडिस्ट संगठन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है। वह अपने दैनिक वृत्तान्त में इस प्रकार लिखता है: "मैंने कई गम्भीर और समझदार पुरुषों को अपने साथ मिलने के लिए बुलाया, जिन्हें मैंने वह बड़ी कठिनाई बताई जो मुझे बहुत समय से हो रही थी, कि मैं उन लोगों को कैसे जानूँ जो मेरी देखरेख में रहना चाहते थे।
बहुत चर्चा के बाद वे सब सहमत हुए कि प्रत्येक व्यक्ति का निश्चित, पूर्ण ज्ञान पाने का इससे उत्तम कोई उपाय नहीं हो सकता कि उन्हें ब्रिस्टल की तरह कक्षाओं में बाँट दिया जाए, उन लोगों की देखरेख में जिन पर मैं सबसे अधिक भरोसा कर सकूँ। यही लंदन में हमारी कक्षाओं का आरम्भ था, जिसके लिए मैं परमेश्वर की स्तुति कभी पर्याप्त नहीं कर सकता; क्योंकि तब से इस संस्था की अकथनीय उपयोगिता और अधिक प्रकट होती गई है।"
उन पहले प्रचारकों में से, जिन्हें परमेश्वर ने वेस्ली की सहायता के लिए उठाया, जॉन नेल्सन था, यॉर्कशायर का एक ईमानदार राजमिस्त्री, जो लंदन में अपने सांसारिक व्यवसाय में लगा हुआ था कि वेस्ली के प्रचार से एक अद्भुत रीति से मन फिराकर प्रभु की ओर आया।
अपने गृह-काउंटी को लौटकर, वह अपने पड़ोसियों को उस महान परिवर्तन के विषय में बताने को विवश हुआ जो उसमें किया गया था, और उन्हें सुसमाचार सुनाने लगा।
उसके सीधे-सादे और स्नेहपूर्ण प्रचार तथा उसकी अनुकरणीय भक्ति का उसके अपने नगर में अपार प्रभाव पड़ा, और उसे अनेक आत्माओं को यीशु तक पहुँचाने का आनन्द मिला। उसने वेस्ली को सलाह माँगने के लिए लिखा; जिसने उत्तर दिया कि वह शीघ्र ही उससे मिलने आएगा। तदनुसार उसने मई, 1742 में ऐसा ही किया।
यह उत्तरी काउंटियों में उनकी पहली मिशनरी यात्रा थी; पिछले चार वर्षों में उन्होंने अपना कार्य दक्षिणी ज़िलों तक ही सीमित रखा था, जिनका उन्होंने अक्षरशः कोना-कोना छान डाला था। उत्तर में उनके लिए शानदार सफलताएँ रखी थीं। वे लंदन से घोड़े पर सवार होकर निकले और छह दिन बाद बर्स्टल पहुँचे, वह नगर जहाँ जॉन
नेल्सन के कार्यों ने इतनी हलचल मचा दी थी। मार्ग में उनके साथ एक घटना हुई, जो उस समय के स्वभाव को दर्शाने के लिए पर्याप्त महत्त्वपूर्ण है। वे कहते हैं, "मैं एक गम्भीर व्यक्ति के पास पहुँचा, जिसके साथ मैं तुरन्त बातचीत में लग गया। उसने शीघ्र ही मुझे अपने विचार बता दिए; इसलिए मैंने उनके विरोध में कुछ नहीं कहा।
परन्तु इससे वह सन्तुष्ट नहीं हुआ: वह यह जानने के लिए बहुत बेचैन था कि क्या मैं भी पूर्वनिर्धारण के सिद्धान्त को उसी प्रकार मानता हूँ जैसे वह मानता है; पर मैंने उससे बार-बार कहा, 'हमारे लिए अच्छा होगा कि हम व्यावहारिक बातों पर ही टिके रहें, ऐसा न हो कि हम एक-दूसरे पर क्रोधित हो जाएँ।'
और हम दो मील तक ऐसा ही करते रहे, जब तक कि उसने मुझे अचानक पकड़कर विवाद में नहीं घसीट लिया, और मुझे पता भी न चला कि मैं कहाँ आ पहुँचा हूँ। फिर वह और भी गरम होता गया; उसने मुझसे कहा कि तुम हृदय से सड़े हुए हो, और मान लिया कि मैं जॉन वेस्ली के अनुयायियों में से एक हूँ। मैंने उससे कहा, 'नहीं, मैं स्वयं जॉन वेस्ली हूँ।'
इस पर,— 'Improvisum aspris veluti qui sentibus anguem Pressit, > [अर्थात् जैसे कोई काँटों के बीच अनजाने में साँप पर पैर रख दे*] वह सीधे भाग निकलना चाहता था। परन्तु दोनों में मेरा घोड़ा बेहतर था, इसलिए मैं उसके साथ-साथ चलता रहा और उसे उसके हृदय की दशा दिखाने का यत्न करता रहा, जब तक कि हम नॉर्थम्प्टन की गली में न आ गए।"
बर्स्टल में, जहाँ वेस्ली को एक भी मसीही मिलने की आशा न थी, उन्हें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहाँ एक छोटी सोसाइटी और एक उत्कृष्ट प्रचारक है। सामान्य जन द्वारा प्रचार के विषय में उन्हें जो भी सन्देह रहे हों, वे उस कार्य को देखकर पूरी तरह दूर हो गए होंगे जो
* "जैसे कोई, जिसने अनजाने में साँप पर पैर रख दिया हो।"
बर्स्टल और न्यूकैसल-अपॉन-टाइन। 85
नेल्सन ने सम्पन्न किया था। एक बड़ी भीड़ के सामने खुले में प्रचार करने और बर्स्टल की छोटी सोसाइटी की दशा की बारीकी से जाँच करने के बाद, वेस्ली ने अपनी यात्रा उत्तर की ओर जारी रखी, और जो कार्य उन्होंने आरम्भ किया था उसका संचालन नेल्सन के हाथों में छोड़ दिया।
मई की 28 तारीख को वे न्यूकैसल-अपॉन-टाइन पहुँचे, जो एक काफ़ी बड़ा नगर था और इंग्लैंड के सबसे समृद्ध कोयला-क्षेत्रों में से एक का केन्द्र था। वह भ्रष्टाचार और दुर्दशा का गढ़ भी था। उसी सन्ध्या वेस्ली नगर में घूमे, और उन्होंने देखा कि उन्होंने इतने थोड़े समय में कभी "इतनी मदिरापान, गाली-गलौज और कोसना-शपथ खाना, यहाँ तक कि छोटे बच्चों के मुँह से भी" न देखा था, न सुना था। उन्होंने मन में कहा, "निश्चय ही यह स्थान उसके लिए पक चुका है
जो 'धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराव के लिये बुलाने आया।'" उन्होंने किसी गम्भीर मनवाले व्यक्ति को ढूँढा, पर व्यर्थ। परन्तु वे पीछे हटनेवाले व्यक्ति न थे, और उन्होंने बिना विलम्ब अपना कार्य आरम्भ करने का निश्चय किया।
अगली (रविवार की) सुबह सात बजे, वे कहते हैं, "मैं सैंडगेट तक पैदल गया, जो नगर का सबसे दरिद्र और सबसे तुच्छ समझा जानेवाला भाग था; और जॉन टेलर के साथ गली के छोर पर खड़े होकर मैंने सौवाँ
भजन गाना आरम्भ किया। तीन-चार लोग यह देखने निकल आए कि क्या बात है; वे शीघ्र ही बढ़कर चार-पाँच सौ हो गए। मेरे प्रचार समाप्त करने से पहले मेरा अनुमान है कि बारह-पन्द्रह सौ लोग हो गए होंगे; जिनसे मैंने ये गम्भीर वचन कहे, 'वह हमारे अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारे मेल-मिलाप के लिये ताड़ना उस पर पड़ी, और उसके कोड़े खाने से हम चंगे हो गए।'
जब मैं कह चुका, तो मैंने देखा कि लोग बड़े गहरे अचम्भे से मुँह खोले मुझे घूर रहे हैं; मैंने उनसे कहा, 'यदि तुम जानना चाहते हो कि मैं कौन हूँ, तो मेरा नाम जॉन वेस्ली है। सायं पाँच बजे, परमेश्वर की सहायता से, मैं यहीं फिर प्रचार करने का विचार रखता हूँ।'" निर्धारित समय पर सारी श्रमिक जनता एक समूह में उन्हें सुनने के लिए एकत्र हुई। ब्रिस्टल या लंदन में भी वेस्ली ने कभी
86 उत्तर। इतनी बड़ी भीड़ को सम्बोधित नहीं किया था। एक पहाड़ी की ढलान पर पंक्तिबद्ध होकर वह एक विशाल पिरामिड-सी बन गई थी, जो सागर की लहरों की तरह उठती-गिरती थी, फिर भी अपने आचरण में शान्त और गम्भीर थी। प्रचारक शिखर पर खड़ा था, जहाँ वह सबको दिखाई दे सकता था, यद्यपि उनमें से आधे लोगों के लिए उसकी आवाज़ सुनना सम्भव न था।
उन्होंने फिर परमेश्वर की असीम दया की घोषणा की, और उनके सामर्थी वचन ने अनेक विवेकों को झकझोर दिया। जब वे समाप्त कर चुके, तो भीड़ के कारण वे अपने ठहरने के स्थान तक मुश्किल से पहुँच सके: वे चारों ओर से घिर गए थे, हर कोई उन्हें देखने और उनसे बात करने को इतना उत्सुक था कि वे भीड़ के पैरों तले लगभग कुचल ही गए थे। अपनी सराय को लौटने पर उन्होंने उसे लोगों से घिरा पाया, जो उनसे प्रार्थना करने आए थे कि वे कुछ दिन और उनके साथ रहें; परन्तु उनके कार्यक्रम पहले से तय थे, और वे उनका अनुरोध स्वीकार न कर सके।
कुछ समय बाद चार्ल्स वेस्ली ने न्यूकैसल का दौरा किया, और अपने भाई द्वारा इतने शुभ रूप से आरम्भ किए गए कार्य को आगे बढ़ाया।
जॉन स्वयं वर्ष के अन्त से पहले लौट आए, और उन्होंने छह सप्ताह इस नगर तथा आसपास के नगरों में सुसमाचार प्रचार के कार्य में लगाए। कहीं भी उन्हें इतना सौहार्दपूर्ण स्वागत नहीं मिला था: जिस उत्सुकता से लोग सुसमाचार का प्रचार सुनते थे, उसने उन्हें आनन्द से भर दिया।
उससे भी अधिक आनन्द का विषय वे अनेक और असाधारण मन-परिवर्तन थे जो उनके परिश्रम के साथ-साथ हुए: उनमें से कुछ के साथ वैसी ही शारीरिक अभिव्यक्तियाँ भी थीं जैसी उन्होंने दक्षिणी काउंटियों में देखी थीं।
परन्तु सामान्यतः कार्य अधिक शान्ति से आगे बढ़ा। वे कहते हैं, "मैंने किसी और स्थान पर परमेश्वर का कार्य इतने समान और क्रमिक रूप से होते नहीं देखा। वह निरन्तर, कदम-दर-कदम बढ़ता जाता है। एक ही समय में उतना अधिक होता नहीं दिखता जितना ब्रिस्टल या लंदन में प्रायः हुआ है; परन्तु हर समय कुछ-न-कुछ होता है। व्यक्तिगत आत्माओं के साथ भी ऐसा ही है।
मैंने किसी को विश्वास की उस विजय-उमंग में नहीं देखा, जो अन्य स्थानों में इतनी सामान्य रही है। परन्तु विश्वासी शान्त और स्थिर भाव से आगे बढ़ते जाते हैं। परमेश्वर जैसा उसे भला लगे वैसा करे।"
एपवर्थ में वेस्ली। न्यूकैसल छोड़ने से पहले वेस्ली ने ज़मीन का एक टुकड़ा ख़रीदा और अनाथ बच्चों के आश्रय-गृह सहित एक चैपल का निर्माण आरम्भ किया। वे आरम्भ से ही उस उपक्रम की व्यापकता और महत्त्व को समझते थे जिसमें वे लगे थे। यह उपक्रम भी विश्वास का कार्य था। "यह अनुमान लगाया गया कि जैसा भवन प्रस्तावित था, वह सात सौ पाउण्ड से कम में पूरा नहीं हो सकता; अनेक लोग निश्चित थे कि वह कभी पूरा ही नहीं होगा; अन्य यह कि मैं उसे छत पड़ा हुआ देखने तक जीवित न रहूँगा। मेरा विचार भिन्न था; मुझे तनिक भी सन्देह न था कि जब यह परमेश्वर के लिए आरम्भ किया गया है, तो उसे पूरा करने के लिए जो आवश्यक होगा वह स्वयं जुटाएगा।"
उत्तर से लौटते हुए उन्होंने अपने मार्ग में पड़नेवाले नगरों में प्रचार किया, और इस अवसर पर अपने जन्मस्थान एपवर्थ भी गए। यहाँ, अपने पिता के ही पल्ली में, उनके पिता के उत्तराधिकारी ने उन्हें मंच देने से इनकार कर दिया, और इतना ही नहीं, खुलेआम उनके विरुद्ध प्रचार भी किया। उपदेश के अन्त में वेस्ली ने, जो विरोध से डरनेवाले न थे, यह घोषणा करवाई कि वे कलीसिया के प्रांगण में प्रचार करेंगे। तदनुसार उन्होंने ऐसा ही किया, अपने पिता की समाधि के पत्थर पर खड़े होकर, और वहीं से एक बड़ी तथा सहानुभूतिपूर्ण श्रोता-मण्डली को सम्बोधित करते हुए। एक सप्ताह तक प्रतिदिन उन्होंने उसी स्थान पर प्रचार किया, और लोगों के मन पर गहरी छाप छोड़ी। अनेक लोग उद्धार की आशीषों की गम्भीरता से खोज करने के लिए जाग उठे। यहाँ तक कि अविश्वासी भी उनकी सामर्थी अपीलों से द्रवित हो गए। एक व्यक्ति, जो साहसी माना जाता था, और जो घमण्ड करता था कि तीस वर्षों से उसने कभी गिरजे में पैर नहीं रखा, जिज्ञासावश उन्हें सुनने आया। उसे मूर्ति की भाँति निश्चल खड़े और स्पष्टतः विचारों में डूबे देखकर,
वेस्ली उसके पास गए और अचानक उससे पूछा, "महाशय, क्या आप पापी हैं?" उसने गहरे और टूटे हुए स्वर में उत्तर दिया, "काफ़ी पापी हूँ," और ऊपर की ओर घूरता रहा, जब तक कि उसकी पत्नी और एक-दो सेवक, जो सब रो रहे थे, उसे उसकी गाड़ी में बिठाकर घर ले नहीं गए। दस वर्ष बाद,
वेस्ली ने उसे फिर देखा, और उसके अपने मुँह से जाना कि उस समय से वह बदला हुआ मनुष्य हो गया था, और अब वह बिना किसी सन्देह या भय के परमेश्वर में आनन्दित था, और उस स्वागत-योग्य घड़ी की बाट जोह रहा था जब वह यहाँ से विदा होकर मसीह के साथ होगा।
एपवर्थ में अपने ठहरने के दौरान वेस्ली एक शान्ति-न्यायाधीश से मिलने गए, जो सब प्रकार से उत्तम व्यक्ति था, और जिसके पास भीड़ "इन नए पाखण्डियों से भरी एक पूरी गाड़ी" लाई थी, ताकि वह उनके कर्मों के अनुसार उनसे निपटे। न्यायाधीश ने अत्यन्त गम्भीरता से पूछा कि उनका अपराध क्या था। इस पर गहरी चुप्पी छा गई, क्योंकि यह वह बात थी जो उन्हें लानेवाले भूल गए थे।
अन्त में एक ने कहा, "वे ढोंग करते हैं कि वे दूसरे लोगों से अच्छे हैं; और इसके अतिरिक्त वे सुबह से रात तक प्रार्थना करते रहते हैं।" न्यायाधीश ने पूछा, "परन्तु क्या उन्होंने इसके सिवा और कुछ नहीं किया?"
एक बूढ़े व्यक्ति ने कहा, "जी हाँ, हुज़ूर, अगर आप बुरा न मानें, तो उन्होंने मेरी घरवाली को 'कनवर्ट' कर दिया है। उनके बीच जाने से पहले उसकी ज़बान कैसी चलती थी! और अब वह मेमने की तरह शान्त है।" 'इन्हें वापस ले जाओ, इन्हें
वापस ले जाओ," न्यायाधीश ने उत्तर दिया, "और इन्हें नगर की सब झगड़ालू औरतों को कनवर्ट कर लेने दो।"
यह रोचक किस्सा दिखाता है कि एपवर्थ में भी, बर्स्टल की तरह, वेस्ली के आने से पहले मेथोडिस्ट मौजूद थे: उनके परिश्रम ने उन्हें प्रोत्साहित किया और उनकी संख्या बढ़ाई, और अपने प्रस्थान पर वे एक संगठित और स्वावलम्बी
इस यात्रा से वेस्ली मुश्किल से लौटे ही थे कि उन्हें अपनी माता की मृत्यु-शय्या पर बुलाया गया। उन्होंने उन्हें अनन्तकाल की देहरी पर पाया। "उनका चेहरा शान्त और निर्मल था, और उनकी आँखें ऊपर की ओर लगी थीं," जबकि उनके आसपास के लोग "उनकी आत्मा को परमेश्वर के हाथों सौंप रहे थे।" मरने से पहले उन्होंने उनसे कहा, "बच्चो, जैसे ही मैं छूट जाऊँ, परमेश्वर के लिए स्तुति का भजन गाना।" उन्होंने उनका अनुरोध पूरा किया, और शोक करनेवालों की सिसकियों से बाधित स्तुति का गीत उस कमरे में सुनाई दिया जिससे सूज़ाना वेस्ली की आत्मा
सूज़ाना वेस्ली की मृत्यु। 89 अभी-अभी स्वर्ग को उड़ चली थी। इतनी शान्त मृत्यु ने, जो इतने उपयोगी जीवन का मुकुट थी, वेस्ली को उतने ही मूल्यवान पाठ सिखाए जितने उन्होंने अपनी माता से कभी प्राप्त किए थे।
संघर्ष और सताव।
वेस्ली की मिशनरी यात्राएँ 1743 में बिना रुके जारी रहीं, परन्तु इस तिथि से वे एक अधिक व्यापक क्षेत्र में फैल गईं। उत्तरी काउंटियों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक था, जहाँ उनके पहले परिश्रम ने ऐसे परिणामों की आशा जगाई थी। ये यात्राएँ इतनी अनेक और इतनी तीव्र थीं कि उनका विस्तार से और क्रमवार वर्णन करना हमारे लिए असम्भव होगा। वेस्ली सर्वश्रेष्ठ अर्थों में भ्रमणशील प्रचारक थे। वे किसी एक स्थान पर विरले ही कुछ दिनों से अधिक ठहरते थे, प्रायः कुछ घण्टों से अधिक नहीं: वे निरन्तर देश भर में भ्रमण करते रहते थे, थकान और मौसम की कठोरता दोनों से बेपरवाह, आत्माओं को बचाने के एकमात्र विचार में लीन,
और इसी उद्देश्य से हर क्षण को मोल लेते हुए।
सन् 1743 के आरम्भ में वे फिर एपवर्थ में थे, जहाँ वह पादरी, जो अपना सब कुछ वेस्ली के पिता का ऋणी था, उनके साथ अपने अयोग्य ढंग से पेश आया, और उन्हें उसी गिरजे में प्रभु-भोज से दूर कर दिया जहाँ उन्होंने स्वयं अनेक बार सेवा की थी। फ़रवरी में उन्होंने न्यूकैसल की अपनी तीसरी यात्रा की, जहाँ उन्होंने जो शारीरिक और आत्मिक दरिद्रता देखी, उसने उनकी गहरी सहानुभूति जगाई। वे कहते हैं, "मैंने पाया कि हम उत्तर के ही किंग्सवुड में आ पहुँचे हैं। हमारे आते ही बीस-तीस जंगली बच्चे हमारे चारों ओर दौड़ने लगे, अचम्भे से घूरते हुए। उनके बारे में ठीक-ठीक यह नहीं कहा जा सकता था कि वे वस्त्र पहने हैं या नंगे हैं। उनमें से एक बड़ी (लगभग पन्द्रह वर्ष की एक लड़की) के शरीर पर किसी तरह एक फटे, गन्दे कम्बल का टुकड़ा लटका हुआ था, और सिर पर उसी कपड़े और रंग की एक प्रकार की टोपी थी। 90 संघर्ष और सताव। मेरा हृदय उनके प्रति अत्यन्त उमड़ आया; और वे ऐसे देख रहे थे मानो मुझे निगल ही जाएँगे।"
व्यक्तिगत अवलोकन और जाँच से वेस्ली के लिए यह स्पष्ट था कि न्यूकैसल का कार्य पूरी उन्नति पर है।
मन-परिवर्तन बढ़ते गए, और छोटी सोसाइटी अधिकाधिक सुदृढ़ होती गई। उन्होंने उन शारीरिक अभिव्यक्तियों पर विशेष ध्यान दिया जो प्रचार के साथ-साथ हुई थीं। वे यहाँ अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक बार हुई थीं, और उन्होंने इस विषय की गम्भीर जाँच की। यह पता चला कि जिन सब लोगों ने इन विचित्र दौरों का अनुभव किया था, वे पहले उत्तम स्वास्थ्य में थे, ये लक्षण उन पर बिना किसी पूर्व सूचना के एक क्षण में आ पड़े, और उन्होंने पूर्ण शारीरिक और मानसिक शिथिलता का रूप धारण किया, जिसके साथ तीव्र पीड़ा थी। इस पीड़ा का वर्णन उन लोगों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से किया जिनसे वेस्ली ने पूछताछ की। कुछ ने कहा कि उन्हें ऐसा लगा मानो कोई तलवार उनके आर-पार हो रही है: दूसरों ने कि उन्हें लगा कि उन पर कोई बड़ा बोझ पड़ा है, मानो वह उन्हें धरती में दबा देगा: और अन्य ने कि उनका गला ऐसा घुट गया था कि वे साँस नहीं ले पाते थे। हर स्थिति में गहरी आत्मिक वेदना शारीरिक लक्षणों के साथ थी, जो तभी थम गए जब उनकी आत्माएँ स्वतंत्र कर दी गईं। आसपास के स्थानों का दौरा करते समय ही वेस्ली ने देखा कि अपनी भ्रमण-सेवा को एक निश्चित योजना के अनुसार नियमित करना, और अपने प्रयासों को बहुत बड़े क्षेत्र में फैलाने के बजाय केन्द्रित करना आवश्यक है। उनके इसी निश्चय से सर्किटों के गठन का आरम्भ हुआ। विचार सरल था, परन्तु उसने तब से प्रचुर फल दिया है। यह एक केन्द्रीय स्थान के चारों ओर कुछ चौकियों को इकट्ठा करना था, और उन्हें एक या अधिक प्रचारकों की देखरेख में रखना था, जो इस प्रकार बने सर्किट का चक्कर लगाने में निरन्तर लगे रहते थे। सर्किट-प्रणाली का गठन। न्यूकैसल कार्य-संचालन के सबसे महत्त्वपूर्ण केन्द्रों में से एक बन गया, क्योंकि अनेक दूरस्थ स्थान वेस्ली ने उससे जोड़ दिए थे।
जिन स्थानों का उन्होंने अब पहली बार दौरा किया, उनमें से एक प्लेसी गाँव था, जो न्यूकैसल से दस मील उत्तर में था, जहाँ उन्हें एक और ऐसी जनसंख्या का नमूना मिला जो लगभग
असभ्य थी, फिर भी पहुँच के भीतर, जिसकी सहानुभूति जीतना वे इतनी अच्छी तरह जानते थे। वे कहते हैं, "वहाँ केवल कोयला-खनिक बसते हैं, और ऐसे लोग जो सदा हर प्रकार की असभ्य अज्ञानता और दुष्टता में अग्रणी रहे हैं। उनकी बड़ी सभा प्रभु के दिन होती थी; जिस दिन पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे इकट्ठे होकर नाचते, लड़ते, कोसते और शपथ खाते, और 'चक', गेंद, 'स्पैन-फ़ार्दिंग', या जो भी हाथ लगता उससे खेलते थे। जब से मैंने उनके बारे में पहली बार सुना, मुझे इन बेचारे प्राणियों पर बड़ी करुणा थी; और इसलिए और भी अधिक, कि सब लोग उनसे निराश प्रतीत होते थे।
(गुड फ्राइडे को) सात और आठ के बीच मैं अपने मार्गदर्शक जॉन हीली के साथ निकला। उत्तरी हवा असाधारण रूप से तेज़ थी, और वह हमारे मुँह पर ओले बरसा रही थी, जो गिरते-गिरते जम जाते थे और शीघ्र ही हमें ऊपर से ढक लेते थे। जब हम प्लेसी पहुँचे, तो हमारे लिए खड़ा होना भी बहुत कठिन था। जैसे ही हम थोड़ा सँभले,
मैं चौक में गया, और उसकी घोषणा की जो 'हमारे अपराधों के कारण घायल किया गया' और 'हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया।' बेचारे पापी शीघ्र ही इकट्ठे हो गए, और जो बातें कही गईं उन पर गम्भीरता से ध्यान दिया। और दोपहर बाद भी उन्होंने ऐसा ही किया, हवा और बर्फ़ के बावजूद, जब मैंने उनसे विनती की कि वे उसे अपने
राजा के रूप में ग्रहण करें; कि वे 'मन फिराएँ और सुसमाचार पर विश्वास करें।'"
कुछ दिन बाद वेस्ली ने वहाँ फिर प्रचार किया, और कुछ असाधारण मन-परिवर्तन हुए। उत्तर की अपनी चौथी यात्रा में, अगले जुलाई में, उन्होंने एक छोटी
सोसाइटी संगठित की, जिससे उन्हें बड़ा सन्तोष हुआ। और कई वर्ष बाद वे उनके विषय में कह सके, "यहाँ के कोयला-खनिकों की सोसाइटी इंग्लैंड की सब सोसाइटियों के लिए आदर्श हो सकती है। कोई भी कभी अपने बैण्ड या क्लास में अनुपस्थित नहीं रहता: उनके बीच किसी प्रकार का 92 संघर्ष और सताव। कलह नहीं है; वरन् वे एक हृदय और एक मन होकर
एक-दूसरे को प्रेम और भले कामों में उसकाते रहते हैं।'" जब कभी वे उत्तर जाते, तो "प्लेसी के ईमानदार और सरल हृदयवाले कोयला-खनिकों" के बीच रहकर प्रसन्न होते थे।
न्यूकैसल से लौटते हुए, बर्स्टल में वेस्ली के साथ उनके साहसी मित्र नेल्सन आ मिले, और उनके साथ उन्होंने लीड्स की अपनी पहली यात्रा की, वह स्थान जो इंग्लैंड के उत्तर में मेथोडिज़्म की एक राजधानी बनने वाला था। यहाँ उन्होंने एक छोटी सोसाइटी पहले से बनी पाई, सम्भवतः नेल्सन के माध्यम से।
हर स्थान पर वेस्ली और उनके सहकर्मियों को वैसा स्वागत नहीं मिला जैसा न्यूकैसल में मिला था। स्वयं लीड्स में उपद्रव के लक्षण प्रकट हुए, जिन्हें काबू में रखने के लिए उनके सारे अधिकार और उपस्थित-बुद्धि की आवश्यकता पड़ी। एक दिन जब एक नशे में धुत भीड़ चैपल में घुसकर प्रचार में बाधा डालने लगी, तो उन्होंने उनके लिए उस अदम्य उत्साह के साथ प्रार्थना करनी आरम्भ की जो वे उस पवित्र अभ्यास में सदा डालते थे। भीड़ उनके ऐसे अप्रत्याशित कदम से चौंक गई, और पूरी तरह परास्त होकर चुपचाप चली गई।
लंदन में भीड़ की बुरी भावनाएँ और भी अधिक हिंसा से फूट पड़ीं। एक दिन जब वेस्ली ग्रेट गार्डन्स नामक एक सार्वजनिक स्थान पर प्रचार कर रहे थे,
"लोगों के बहुत-से पशु-जैसे लोगों ने उन्हें विघ्न पहुँचाने के लिए बहुत परिश्रम किया जो अच्छी मनसा के थे। उन्होंने गायों का एक झुण्ड उनके बीच हाँक लाने का यत्न किया; पर वे पशु अपने स्वामियों से अधिक समझदार निकले। फिर उन्होंने पत्थरों की पूरी बौछारें फेंकीं, जिनमें से एक ठीक मेरी दोनों आँखों के बीच लगा; परन्तु मुझे तनिक भी पीड़ा न हुई; और जब मैंने लहू पोंछ लिया, तो ऊँची आवाज़ से यह गवाही देता रहा कि परमेश्वर ने विश्वास करनेवालों को 'भय की नहीं, परन्तु सामर्थ्य, और प्रेम, और संयम की आत्मा' दी है। और उस आत्मा के कारण जो अब सारी मण्डली में प्रकट हुई,
मैंने स्पष्ट देखा कि जब हमें, यहाँ तक कि निम्नतम मात्रा में भी, उसके नाम के लिये दुःख उठाने का सौभाग्य दिया जाता है, तो वह कैसी आशीष है।"
महानगर के एक और भाग में, चेल्सी में, लोगों ने उस कमरे में जंगली आग और अन्य ज्वलनशील पदार्थ फेंककर मनोरंजन किया जहाँ उनकी सोसाइटी शान्तिपूर्वक एकत्र थी। लगता है कि उस समय लंदन और उसके आसपास के लोगों का यह एक प्रिय मनबहलाव था।
विंडसर में, वेस्ली कहते हैं, "मुझे शीघ्र ही बताया गया कि गुण्डों की एक बड़ी संख्या ने आपस में गुट बना लिया है; और बार-बार घोषणा की है कि उस दिन वहाँ प्रचार नहीं होगा। सब कुछ पक्का करने के लिए उन्होंने कुछ दिन पहले ही पर्याप्त बारूद और अन्य वस्तुएँ जुटा ली थीं। परन्तु बीच में बर्नहम का मेला पड़ गया, तो उन्होंने तय किया कि पहले वहाँ जाकर थोड़ा मनोरंजन कर लें। तदनुसार वे गए, और अपने कुछ पटाखे वहाँ अपने भाई-भीड़ पर दाग दिए। परन्तु वे, जो मेथोडिस्ट
नहीं थे, इसे अच्छा न मानकर उन पर पलट पड़े और उन्हें खदेड़ा। उन्होंने एक घर में शरण ली। पर इससे भी काम न चला; क्योंकि बाहर के लोगों ने शीघ्र ही भीतर घुसने का रास्ता बना लिया, और जितनों को पा सके उन्हें पकड़ लिया, जिन्हें, शिकायत करने पर, जेल भेज दिया गया: शेष भाग गए; इसलिए जब मैं आया, तो किसी ने बाधा नहीं डाली, न रोका।"
लंदन और आसपास के क्षेत्र में इन उपद्रवों को देर तक बेरोक-टोक नहीं रहने दिया गया। अधिकारियों ने सरग़नाओं के विरुद्ध सक्रिय कार्रवाई की, और मिडिलसेक्स के मुख्य न्यायाधीश ने श्री वेस्ली से कहा,
"हमें आदेश मिला है कि जब कभी आप हमारी सुरक्षा माँगें, हम आपके साथ न्याय करें।" शीघ्र ही एक अवसर आया। निम्न श्रेणी की एक भीड़ ने उपासना-स्थानों में से एक पर पत्थरों की बौछारों से आक्रमण किया, जिनमें से कुछ ने छत तोड़ दी, और मण्डली पर गिरकर उनके प्राण तक संकट में डाल दिए। वेस्ली ने भीड़ को चेतावनी दी कि यदि वे उस स्थान को न छोड़ेंगे, तो वे उनमें से कुछ को मजिस्ट्रेटों के सामने ले आएँगे। यह देखकर कि उनकी चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया, उन्होंने सरग़नाओं में से एक को गिरफ़्तार करवाया और कड़ी निगरानी में न्यायालय तक पहुँचवाया। इस दृढ़ता से बड़ा लाभ हुआ, और शीघ्र ही इन उपद्रवों का अन्त हो गया,
94 संघर्ष और सताव। जहाँ तक राजधानी का सम्बन्ध था। इस अन्तिम घटना के दौरान एक अद्भुत बात हुई। एक पुरुष और उसकी पत्नी, जो दंगाइयों में अगुवाई कर रहे थे, और जो उन सबसे अधिक क्रोधित प्रतीत होते थे, चैपल में प्रवेश करते ही पीले पड़ गए और अचानक कायल होकर घुटनों के बल गिर पड़े और परमेश्वर से दया की दुहाई देने लगे।
फिर भी ये केवल छोटी-मोटी झड़पें थीं, उन भयंकर आक्रमणों की तुलना में जो सन् 1743 के दौरान मध्य और दक्षिणी काउंटियों में, विशेषकर स्टैफ़र्डशायर और कॉर्नवॉल में, मेथोडिस्टों पर किए गए। चार्ल्स
वेस्ली के साथ तो उनके भाई से भी अधिक कठोर व्यवहार हुआ।
वॉलसॉल में उन पर बार-बार पत्थर फेंके गए और वे भूमि पर गिरा दिए गए। शेफ़ील्ड में एक सैनिक अधिकारी के नेतृत्व में जनता उनकी एक सभा में घुस आई: प्रचारक अपने प्राणों को संकट में डालकर साहस के साथ अपने स्थान पर डटा रहा, और झगड़े के दौरान उसे कई घाव लगे।
अधिकारी ने उनकी दृढ़ता से क्रोधित होकर अपनी तलवार खींची और उसे प्रचारक की छाती की ओर तान दिया, पर उन्हें डराने में सफल न हुआ। असहिष्णु पादरियों के भाषणों से भड़की शेफ़ील्ड की भीड़ अत्यन्त उग्र उपद्रव तक जा पहुँची, और उसने चैपल को पूरी तरह ढहा दिया। कॉर्नवॉल में,
चार्ल्स वेस्ली का स्वागत इससे बेहतर न हुआ। सेंट आइव्स में एक क्रुद्ध भीड़ ने चैपल पर कब्ज़ा कर लिया, खिड़कियाँ तोड़ दीं और साज-सामान नष्ट कर दिया। पूल में, चर्चवार्डनों में से एक के नेतृत्व में भीड़ ने प्रचारक और उसके मित्रों को पल्ली से खदेड़ दिया।*
अपने भाई के लौटने के कुछ समय बाद जॉन वेस्ली नेल्सन के साथ कॉर्नवॉल गए और उस काउंटी में दो महीने रहे। उन्होंने कई ऐसे स्थानों पर प्रचार किया जहाँ वे पहले कभी नहीं गए थे। अथक परिश्रम के इस समय में उन्हें प्रायः जीवन की सामान्य आवश्यक वस्तुओं के अभाव का कष्ट उठाना पड़ा। उनका बिछौना प्रायः नंगे तख़्ते होते थे, और उनका एकमात्र तकिया एक पुराना बड़ा कोट। एक रात वे जागे
* पल्ली के रजिस्टर आज तक कैपेयर के नाम पर गाँव की सराय में "मेथोडिस्टों को खदेड़ने के लिए" दर्ज की गई एक प्रविष्टि सुरक्षित रखे हुए हैं।
"कॉर्नवॉल में वेस्ली और नेल्सन।— 95 और अपने साथी से कहा, 'भाई नेल्सन, आओ हम ढाढ़स बाँधें; मेरी तो अब भी एक पूरी करवट बची है; क्योंकि खाल तो केवल एक ओर से उतरी है।' एक से अधिक बार उन्हें ऐसे लोगों के बीच भूख की पीड़ा सहनी पड़ी जो आतिथ्य के कर्तव्य को समझने में धीमे थे। एक दिन वेस्ली ने अपना घोड़ा रोका और बाड़ में उगी ब्लैकबेरियाँ तोड़ने लगे, यह कहते हुए, "भाई
नेल्सन, हमें धन्यवादी होना चाहिए कि ब्लैकबेरियाँ बहुत हैं; क्योंकि भूख जगाने के लिए यह मेरे देखे सबसे उत्तम देश है, पर भोजन पाने के लिए सबसे बुरा। क्या ये लोग समझते हैं कि हम प्रचार करके जी सकते हैं?"
फिर भी ये परीक्षाएँ उतनी भयंकर न थीं जितनी उनके भाई को हाल में उसी काउंटी में झेलनी पड़ी थीं, और न उतनी जितनी स्टैफ़र्डशायर में स्वयं उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं, जहाँ वे
अब चार्ल्स द्वारा इतनी उत्तमता से आरम्भ किए गए कार्य को आगे बढ़ाने गए।
पहले एक अवसर पर वेस्ली ने वेडनेसबरी में बिना किसी उत्पीड़न के प्रचार किया था: कोयला-खनिक अनुकूल दिखाई देते थे, और धर्मान्तरित लोगों में से लगभग तीन-चार सौ की एक सोसाइटी एकत्र हुई थी। परन्तु इन सफलताओं ने वहाँ के पादरी का क्रोध भड़का दिया, जिसने मंच से कठोर शब्दों में मेथोडिस्टों के विरुद्ध गरजना की: स्थानीय अधिकारी अपना कर्तव्य भूल गए, और भीड़ की बुरी भावनाओं को रोकने के बजाय उलटे बढ़ावा दिया, और भीड़ शीघ्र ही अभूतपूर्व अत्याचारों में लिप्त होने लगी।
वे सींग फूँके जाने पर इकट्ठे होते, और मेथोडिस्टों के घरों को घेरकर लूट लेते; दरवाज़े और खिड़कियाँ, साज-सामान और बर्तन-भाँड़े तोड़ डालते, और जो कुछ भी उनकी पहुँच में आता उस पर हिंसक हाथ डालते।
व्यक्तियों का भी सम्पत्ति से अधिक सम्मान नहीं किया गया: स्त्रियों और बच्चों को पकड़कर नाली में फेंक दिया गया। भीड़ ने, जो कई महीनों तक नगर में उत्पात मचाती रही, एक पश्चाताप-पत्र तैयार किया जिस पर सब मेथोडिस्टों को हस्ताक्षर करने थे: जिन्होंने मानने से इनकार किया उन्हें पीटा गया और अन्य प्रकार से दुर्व्यवहार किया गया, यहाँ तक कि उनके प्राण संकट में पड़ गए।
96 संघर्ष और सताव।
वेडनेसबरी में भाइयों पर आई इन परीक्षाओं का समाचार सुनकर, वेस्ली ने उन्हें सान्त्वना और प्रोत्साहन देने के लिए तुरन्त वहाँ जाने का निश्चय किया। खतरे का सामना करना सदा उनका सिद्धान्त रहा। पहुँचने के अगले दिन उन्होंने दोपहर को नगर के बीचोंबीच प्रचार किया, और चाहे उनके साहस ने भीड़ को डरा दिया हो, या किसी अन्य कारण से, किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया। परन्तु दोपहर बाद, जब वे अपने कमरे में शान्ति से लिख रहे थे, तो शोर से उन्हें पता चला कि भीड़ ने घर को घेर लिया है।
उन्होंने जिन लोगों के साथ वे ठहरे थे उनसे प्रार्थना में लग जाने का आग्रह किया। क्षण भर के लिए ऐसा लगा मानो लोग तितर-बितर होनेवाले हैं; परन्तु शीघ्र ही नए आगमनों से बल पाकर वे फिर आक्रमण के लिए जुट गए। "सबका एक ही चिल्लाना था, 'पादरी को बाहर निकालो; हमें पादरी चाहिए।' मैंने एक से कहा कि उनके नायक का हाथ पकड़कर उसे घर के भीतर ले आए। हमारे बीच कुछ वाक्यों के आदान-प्रदान के बाद, सिंह मेमना बन गया था,
मैंने उससे कहा कि जाकर अपने साथियों में से एक-दो सबसे क्रोधित लोगों को ले आए। वह दो को भीतर ले आया, जो क्रोध के मारे धरती को निगल जाने को तैयार थे; परन्तु दो मिनट में वे भी उसके समान शान्त हो गए। तब मैंने उनसे कहा कि रास्ता दो, ताकि मैं लोगों के बीच बाहर जा सकूँ। जैसे ही मैं उनके बीच पहुँचा, मैंने एक कुर्सी मँगवाई; और खड़े होकर पूछा, 'तुममें से किसी को मुझसे क्या चाहिए?' कुछ ने कहा, 'हम चाहते हैं कि तुम हमारे साथ न्यायाधीश के पास चलो।' मैंने उत्तर दिया,
'मैं सारे मन से चलूँगा।' तब मैंने कुछ शब्द कहे, जिन्हें परमेश्वर ने कारगर किया; यहाँ तक कि वे पूरी शक्ति से चिल्ला उठे, 'यह भद्रपुरुष एक ईमानदार भद्रपुरुष है, और हम इसकी रक्षा में अपना लहू बहा देंगे।'" फिर भी कुछ लोग इतने अनुकूल न थे, और वेस्ली मूसलाधार वर्षा में दो-तीन सौ की भीड़ के साथ न्यायाधीश के पास गए, जो नगर से लगभग दो मील दूर रहता था।
उस सज्जन ने इस मामले में दखल देने से इनकार कर दिया, यह बहाना बनाकर कि वह बिस्तर में है।
इस बीच यह समाचार वॉलसॉल में फैल गया वॉलसॉल की भीड़। 97 कि वेस्ली को अभी-अभी कड़ी निगरानी में वहाँ लाया गया है: तुरन्त नगर की सारी निकृष्टतम टोलियाँ (और वे बहुत थीं) इकट्ठी हुईं और उनकी खोज में निकल पड़ीं। "डार्लस्टन की भीड़ ने जितना बन पड़ा बचाव किया; पर वे थके हुए थे, और संख्या में भी कम थे: इसलिए थोड़ी ही देर में, अनेक के पटक दिए जाने पर, शेष भाग गए, और मुझे उनके हाथों में छोड़ गए। बोलने का यत्न करना व्यर्थ था; क्योंकि चारों ओर का शोर सागर की गर्जना के समान था। सो वे मुझे घसीटते हुए ले चले जब तक हम नगर में न आ गए; जहाँ एक बड़े मकान का द्वार खुला देखकर मैंने भीतर जाने का यत्न किया; पर एक आदमी ने मुझे बालों से पकड़कर भीड़ के बीचोंबीच खींच लिया। फिर वे बिना रुके मुझे मुख्य गली से होकर नगर के एक छोर से दूसरे छोर तक ले गए। इस पूरे समय मैं उन लोगों से बोलता रहा जो सुन सकते थे, और मुझे न कोई पीड़ा हुई, न थकान। नगर के पश्चिमी छोर पर एक द्वार आधा खुला देखकर मैं उसकी ओर बढ़ा, और भीतर चला जाता; पर दुकान में खड़े एक सज्जन ने मुझे न जाने दिया, यह कहकर कि वे मकान को धरती पर गिरा देंगे। फिर भी,
मैं द्वार पर खड़ा हुआ और पूछा, 'क्या तुम मेरी बात सुनने को तैयार हो?' बहुतों ने चिल्लाकर कहा, 'नहीं, नहीं! इसका भेजा निकाल दो; इसे गिरा दो; इसे अभी मार डालो।' दूसरों ने कहा, 'नहीं, पहले हम इसकी सुनेंगे।' मैंने पूछना आरम्भ किया, 'मैंने कौन-सी बुराई की है? तुम सबमें से मैंने किसके साथ वचन या कर्म में अन्याय किया है?' और मैं पौन घण्टे से अधिक बोलता रहा, जब तक कि अचानक मेरी आवाज़ बैठ न गई: तब बाढ़ें फिर अपनी आवाज़ उठाने लगीं; बहुत-से चिल्ला रहे थे, 'इसे ले चलो! इसे ले चलो!' इस बीच मेरी शक्ति और मेरी आवाज़ लौट आई, और मैं ऊँचे स्वर में प्रार्थना करने लगा।
और अब वह व्यक्ति, जो कुछ ही पहले भीड़ का अगुआ था, मुड़ा और बोला, 'महोदय, मैं आपके लिए अपना जीवन लगा दूँगा: मेरे पीछे आइए, और यहाँ कोई भी प्राणी आपके सिर का एक बाल भी नहीं छुएगा।' 'उसके दो-तीन साथियों ने उसकी बात का समर्थन किया और तुरन्त मेरे निकट आ गए . . . तब लोग, मानो आपसी सहमति से, दाएँ और बाएँ हट गए; जबकि
H 98 संघर्ष और अत्याचार। उन तीन-चार व्यक्तियों ने मुझे अपने बीच में लिया और उन सबके बीच से निकाल ले गए . . . दस बजने से कुछ पहले, परमेश्वर ने मुझे सकुशल वेडनेस्बरी पहुँचा दिया; मैंने केवल अपनी वास्कट का एक छोर और अपने एक हाथ की थोड़ी-सी खाल खोई। मैंने पहले कभी प्रोविडेंस की ऐसी कड़ी नहीं देखी थी।" उनमें से मुख्य ये हैं। सड़क के एक खड़ी और फिसलन भरे हिस्से से उतरते समय उन्हें गिराने के बहुत प्रयास किए गए: यदि वे सफल हो जाते तो सम्भवतः वे कुचलकर मार डाले जाते। परन्तु वे बिलकुल नहीं लड़खड़ाए, और जब तक वे पूरी तरह उनके हाथों से बाहर नहीं हो गए तब तक तनिक भी नहीं फिसले। एक बलवान व्यक्ति ने डंडे से उनके सिर के पिछले भाग पर कई वार करने का निशाना साधा, परन्तु वे सब टल गए; वेस्ली कहते हैं कि वे नहीं जानते कैसे। उनकी छाती पर एक ज़ोरदार वार लगा, और एक और मुँह पर, जिससे लहू बह निकला; परन्तु वे दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि उन्हें इनमें से किसी से भी उतनी पीड़ा नहीं हुई जितनी तिनके से छूने पर होती। और "आरम्भ से अन्त तक, उन्होंने वैसा ही मन का सन्तुलन पाया, मानो वे अपने ही अध्ययन-कक्ष में बैठे हों।"
देखने में तो वेस्ली वेडनेस्बरी और वॉलसॉल में हार गए थे: पर वास्तव में वे ही विजेता थे। इसका प्रमाण यह है कि उनके भाई चार्ल्स ने कुछ समय बाद उस स्थान पर जाकर लोगों के स्वभाव में बड़ा परिवर्तन पाया: अनेक लोगों ने मन फिराया, और उनमें वह व्यक्ति भी था जो भीड़ का अगुआ था, जो एक कुख्यात मुक्केबाज़ था। चार्ल्स ने उससे पूछा कि वह उनके भाई के विषय में क्या सोचता है। "उनके विषय में सोचूँ?" उसने कहा; "यही कि वे परमेश्वर के जन हैं, और जब हम इतने लोग एक मनुष्य को नहीं मार सके तो परमेश्वर उनके पक्ष में था।" वास्तव में परमेश्वर के जन थे
जॉन वेस्ली, जो मनुष्यों की आत्माओं को बचाने के महान कार्य में किसी भी कठिनाई से नहीं डरे।
उत्तर की ओर अपनी यात्रा में वेस्ली ग्रिम्सबी पहुँचे, जहाँ उन्होंने खुले में प्रचार किया, और अगले दिन अपनी सभाओं के लिए कोई स्थान ढूँढ़ा। परन्तु वहाँ के निवासी परिणामों के भय से ऐसे उद्देश्य के लिए अपने घर देने से इनकार करते रहे। अन्त में एक खोई हुई भेड़। 99 स्त्री ने उन्हें अपना घर देने की पेशकश की। वह एक पतित स्त्री थी, जिसने अपने पति को छोड़ दिया था और कुछ समय से भोग-विलास का जीवन बिता रही थी। वेस्ली ने अपने स्वामी के उदाहरण को स्मरण करके, और इस जलती लकड़ी को आग से खींच निकालने की आशा करके, उसका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। उन्होंने उस "पापिनी स्त्री" पर प्रचार किया, जिसने प्रभु के पाँव अपने आँसुओं से धोए और अपने सिर के बालों से पोंछे।
वह भटकी हुई स्त्री "पूरी तरह चूर-चूर हो गई," और बाद में उनके ठहरने के स्थान पर आई, यह पुकारती हुई, "हे महोदय! मुझे उद्धार पाने के लिए क्या करना चाहिए?" वेस्ली ने उत्तर दिया, "अपने प्राण बचाकर भाग निकलो।
तुरन्त अपने पति के पास लौट जाओ।" उसने उत्तर दिया कि उसका पति न्यूकैसल में है, जो सौ मील दूर है। उस महान मिशनरी ने थोड़ी देर सोचा, और फिर उससे कहा, "मैं कल प्रातः न्यूकैसल जा रहा हूँ: तुम मेरे साथ चल सकती हो। विलियम ब्लो तुम्हें अपने पीछे बैठा लेगा।" और उसने वैसा ही किया। वेस्ली के सारे जीवन में इससे अधिक हृदयस्पर्शी दृश्य शायद ही कहीं मिले,— भला चरवाहा खोई हुई भेड़ को वापस बाड़े में ले आ रहा है।
यह दिखाता है कि वे भीड़ को सम्बोधित कर लेने भर से अपना कार्य पूरा नहीं समझते थे: वे प्रचारक भी थे और पास्टर भी।
सन् 1744 वेस्ली और उनके सहकर्मियों के लिए वैसी ही कठोर नई परीक्षाएँ लेकर आया, जैसी हम अभी वर्णन कर चुके हैं।
जनता के प्रदर्शन उस समय की रीति बन चुके थे। ये अब केवल सम्पत्ति के विनाश और लूटपाट तक सीमित नहीं रहे: स्वयं मेथोडिस्टों के प्राण भी सुरक्षित नहीं थे। एक प्रचारक को गम्भीर शारीरिक चोटें पहुँचीं, एक और को नदी में तब तक डुबोया गया जब तक वह लगभग मर न गया।
परमेश्वर के ये सेवक, जनता से अपनी भिड़न्तों में, तब अपने को धन्य समझते थे जब वे साबुत खाल के साथ बच निकलते, और उन्हें इससे अधिक कोई शिकायत न होती कि उनके वस्त्र चीथड़े-चीथड़े हो गए या कीचड़ से सन गए हैं। डार्लस्टन में निर्बल, असहाय स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और उन्हें घोर अपमान सहना पड़ा। स्टैफ़र्डशायर के कुछ नगर महीनों तक
H 2 100 संघर्ष और अत्याचार। भीड़ की दया पर रहे। वॉलसॉल की भीड़ ने मेथोडिस्ट मत के विरुद्ध एक नियमित धर्मयुद्ध का रूप धारण कर लिया: एक झण्डा बनाया गया, जो बाज़ार-चौक में प्रायः फहराया जाता था, और जब भीड़ अपने अभियानों पर निकलती तो उसके आगे-आगे ले जाया जाता था। जिन घरों पर मेथोडिस्टों को आश्रय देने का सन्देह था, उन्हें नष्ट करने के लिए ठहराया गया: कलीसिया के रक्षकों ने जो फ़र्नीचर चाहा वह रख लिया, और बाकी को टुकड़े-टुकड़े कर डाला। लोकप्रिय क्रोध के इन तूफ़ानों से स्त्री-पुरुष भाग निकले, यह न जानते हुए कि शरण के लिए किधर मुड़ें। उनकी दृढ़ता और विश्वासयोग्यता सब प्रशंसा से परे थी। जब उनसे शान्ति की बातचीत इस शर्त पर की गई कि वे प्रचारकों को फिर कभी ग्रहण न करने का वचन दें, तो उन्होंने दृढ़ता से इनकार कर दिया, यह कहते हुए, "हम पहले ही अपना सारा सामान खो चुके हैं; और अब केवल अपने प्राण खोने की बात रह गई है, जिन्हें हम खो भी देंगे, पर अपने विवेक के विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे।"
इन सताए हुए लोगों को कोई सुरक्षा प्राप्त न थी। जनमत उनके विरुद्ध था, और उनके आचरण तथा उद्देश्यों को गलत रूप में प्रस्तुत करता था। "लंदन ईवनिंग पोस्ट" ने एक लेख प्रकाशित किया जो इन शब्दों से आरम्भ होता था:—"स्टैफ़र्डशायर से एक निजी पत्र द्वारा हमें मेथोडिस्ट कहलाने वाले लोगों के विद्रोह की सूचना मिली है।" उसमें कहा गया था कि कलीसिया के पक्ष वालों द्वारा अपमानित किए जाने के बहाने उन्होंने विद्रोह खड़ा कर दिया था, और कई हमले करने के बाद अपने एक विरोधी का घर जला डाला था।
इस प्रकार जनता के सामने कलंकित किए जाने पर, मेथोडिस्टों को न नागरिक अधिकारियों से और न कलीसियाई अधिकारियों से कोई न्याय मिल सका।
डडली में, पादरी के उकसाने पर, भीड़ ने एक प्रचारक पर हिंसक हाथ डाले, और उसे मार ही डालती, यदि एक भले क्वेकर ने उसे अपनी चौड़ी किनारी वाली टोपी और सादा कोट देकर बच निकलने में सहायता न की होती। वॉलसॉल में मजिस्ट्रेटों ने दीवारों पर एक इश्तहार लगा रहने दिया, जिसमें एक निश्चित दिन मेथोडिस्टों के विनाश की घोषणा थी। वेडनेस्बरी में उन अधिकारियों में से एक ने उन्हें नगर से निकालने के लिए पाँच पाउण्ड की पेशकश की
जनमत। 101 ; और एक और ने सोसाइटी के एक सदस्य को भीड़ के हवाले कर दिया, और उस पर हाथ हिलाते हुए चिल्लाया, "वाह, लड़कों! हम कलीसिया के लिए खूब डटकर खड़े होंगे!"
जब मजिस्ट्रेट इस प्रकार वीरता से कलीसिया की रक्षा कर रहे थे, तो उसके सेवक भी पीछे नहीं रहे। 1744 में कॉर्नवाल के अपने अत्यन्त सफल दौरे के समय वेस्ली ने एक उपदेश सुना जिसमें मेथोडिस्टों को पोप-समर्थक और राजगद्दी के दावेदार चार्ल्स
स्टुअर्ट के पक्षधर कहकर निन्दित किया गया था। एक अन्य स्थान पर, पादरी ने मेथोडिस्ट सभाओं में विघ्न डालने के उद्देश्य से ढोल बजाकर भीड़ को इकट्ठा किया, और मधुशाला में अपने सहायकों को भरपूर शराब पिलाने के बाद स्वयं उन्हें आक्रमण के लिए ले चला। बर्स्टाल के पादरी की शान्ति नेल्सन की सक्रियता से भंग हो रही थी; उसने पड़ोस के एक शराबखाने के मालिक के साथ मिलकर उस बेचारे प्रचारक की शिकायत सैनिक अधिकारियों से की, और आवारागर्दी की रोकथाम के अधिनियम के अधीन उसे जबरन सेना में भरती करा देने में सफल हो गया। दो और घुमन्तू प्रचारकों को भी इसी तरह कष्ट उठाना पड़ा, और उनमें से एक सेना में मिले व्यवहार का शिकार होकर मर गया।
इन अत्याचारों के साथ हर प्रकार की निन्दा भी जुड़ गई।
कपट और धोखेबाज़ी के आरोप इतने आम थे कि वेस्ली का मन विचलित न कर सके। उन पर ताने और उपहास की बौछार हुई, परन्तु वे अडिग बने रहे। ऐसे युद्ध में सब हथियार जायज़ थे। न्यूकैसल में उन्होंने दीवारों पर एक इश्तहार देखा जिसमें घोषणा थी कि एडिनबरा के अभिनेताओं की एक मण्डली उसी सन्ध्या "चाल पर चाल; अथवा,
मेथोडिज़्म का पर्दाफ़ाश" (Trick upon trick; or, Methodism displayed) नामक नाटक खेलेगी। घृणा और पूर्वाग्रह इतने फैले हुए थे कि अत्यन्त बेतुकी अफ़वाहों पर भी विश्वास कर लिया जाता था। कुछ कहते थे कि वेस्ली ने फाँसी लगा ली है; दूसरे कहते थे कि उन पर अवैध रूप से जिन बेचने का मुक़दमा चला है; और कुछ ने घोषणा की कि उन्होंने अपना ही नाम हथिया लिया है और असली जॉन वेस्ली को मरे बहुत वर्ष हो गए। एक स्थान पर क्वेकर, एक और स्थान पर 102 संघर्ष और अत्याचार।
एनाबैप्टिस्ट, और इससे भी अधिक व्यापक रूप से यह सन्देह किया जाता था कि वे निकृष्टतम प्रकार के जेसुइट हैं, जो अपने घर में पादरियों को शरण देते हैं और चुपके-चुपके स्थापित कलीसिया को नष्ट करने में लगे हैं। राजगद्दी के दावेदार के आक्रमण से जुड़ी अफ़वाहों से उत्तेजित जनमन ने इनके साथ वेस्ली का नाम जोड़ने में चूक नहीं की। वे स्पेनी सरकार के एजेण्ट थे, जिन्हें पदच्युत राजवंश के पक्ष में भावना भड़काने और बीस हज़ार पुरुषों का एक दल संगठित करने के लिए भेजा गया था, ताकि जब भी स्पेनी सेना तट पर उतरे तो उसकी सहायता की जा सके।
उन्हें फ्रांस में राजगद्दी के दावेदार के साथ देखा गया था, और अन्त में, राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया था।
इन बेतुकी अफ़वाहों का इतना प्रचलन हुआ कि अधिकारी स्वयं घबरा गए: वेस्ली को सरे के न्यायाधीशों के सामने उपस्थित होने का आदेश दिया गया, और उनसे राजा के प्रति निष्ठा की शपथ लेने तथा पोप-मत के विरुद्ध घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। 1744 के आरम्भ में, जब सरकार ने एक घोषणा जारी करके सब कैथोलिकों को लंदन छोड़ने का आदेश दिया, तो वेस्ली नए अपवाद का आधार न देने के लिए नगर में एक सप्ताह और ठहरे रहे। उनके भाई पर भी यॉर्कशायर में मजिस्ट्रेटों के सामने अभियोग लगाया गया, क्योंकि उन्होंने अपनी एक प्रार्थना में सन्देहास्पद अभिव्यक्ति का प्रयोग किया था। उन्होंने परमेश्वर से प्रार्थना की थी कि वह "अपने निर्वासितों को घर बुला ले," और इसे सताए गए राजवंश पर लागू माना गया।
पुनर्जागरण के शत्रुओं द्वारा खड़े किए गए इस विरोध ने इस उत्तम कार्य के योद्धाओं को क्षण भर के लिए भी विचलित नहीं किया। इसने केवल यह दिखाया कि उनके परिश्रम की कितनी तत्काल आवश्यकता थी: इसने उन्हें केवल पहले से भी अधिक उत्साह से अपने कार्य में लग जाने के लिए प्रोत्साहित किया,
प्रथम सम्मेलन।
वेस्ली पिछले पाँच वर्षों से उन सोसाइटियों की नींव डालने में लगे थे जिन्हें उनका नाम धारण करना था, और अपने इतिहास की इस प्रथम अवधि में
मेथोडिज़्म, कहा जा सकता है, अपने संस्थापक में ही साकार था।
उनके निर्देशन में कार्य ने अद्भुत उन्नति की थी, और ऐसा प्रतीत होता था कि अब उत्तरदायित्व उनके सहकर्मियों के साथ बाँटने का समय आ गया है। तदनुसार, 1744 के आरम्भ में उन्होंने स्थापित
कलीसिया के उन पादरियों को, जो उनके कार्य में उनके साथ जुड़े थे, उन प्रमुख सामान्य प्रचारकों के साथ, जो "सुसमाचार में पुत्रों के समान" उनकी सेवा करते थे, लंदन में अपने साथ भेंट करने को आमन्त्रित किया, ताकि परमेश्वर के कार्य को आगे बढ़ाने के सर्वोत्तम उपायों पर विचार किया जा सके। इस प्रथम सम्मेलन का उद्देश्य निमन्त्रण-पत्र में स्पष्ट रूप से बताया गया है: यह, कम से कम जानबूझकर, कोई कलीसिया संगठित करने के लिए नहीं था, वरन् केवल यह परामर्श करने के लिए था कि पुनर्जागरण के कार्य को सर्वोत्तम रीति से कैसे आगे बढ़ाया जाए। वेस्ली अब भी समय और अनुभव द्वारा सिखाए गए अनुसार प्रोविडेंस के निर्देशों का पालन करने के अभ्यस्त थे।
यह प्रथम सम्मेलन छह पादरियों और चार सामान्य प्रचारकों से मिलकर बना था, और 25 जून, 1744 को लंदन के फाउंडरी में एकत्र हुआ। पिछली रात इसके सदस्यों ने गम्भीरता से साथ मिलकर प्रभु-भोज लिया, और प्रातःकाल चार्ल्स वेस्ली ने एकत्रित भाइयों को प्रचार किया।
इस प्रकार वह छोटी सभा आरम्भ से ही गहरी गम्भीरता की भावना से भरी थी, और अपने विचार-विमर्श से जुड़े उत्तरदायित्व की महत्ता को स्पष्ट रूप से अनुभव करती थी। इसके प्रथम प्रस्तावों में से एक यह था:—
"यह चाहा जाता है कि सब बातों पर ऐसे विचार किया जाए मानो 104 प्रथम सम्मेलन। परमेश्वर की तात्कालिक उपस्थिति में हों; कि हम एकाग्र दृष्टि से और उन छोटे बच्चों के समान मिलें जिन्हें सब कुछ सीखना है; कि हर बिन्दु की जाँच नींव से हो; कि हर व्यक्ति अपने मन की बात खुलकर कहे; और कि प्रस्तावित हर प्रश्न पर पूरा वाद-विवाद हो, और उसे 'छान-फटककर भूसी तक' परखा जाए।" तब पहला प्रारम्भिक प्रश्न रखा गया, अर्थात्, "हममें से प्रत्येक शेष सबके सर्वसम्मत निर्णय को किस सीमा तक मानने के लिए सहमत है?" उत्तर दिया गया, "सैद्धान्तिक बातों में, प्रत्येक केवल उसी सीमा तक मान सकता है जहाँ तक उसका निर्णय सन्तुष्ट हो। हर व्यावहारिक बिन्दु में, जहाँ तक हम अपने-अपने विवेक को ठेस पहुँचाए बिना कर सकें।" किसी भी विचार-सभा ने अपने मार्गदर्शन के लिए इससे अधिक विवेकपूर्ण, और साथ ही मसीही आत्मा के इससे अधिक अनुरूप नियम कभी नहीं बनाए।
तब इस सभा का पहला बड़ा उद्देश्य तीन शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तावित किया गया, अर्थात्, "1. क्या सिखाएँ; 2. कैसे सिखाएँ; 3. क्या करें: अर्थात् अपने सिद्धान्त, अनुशासन और आचरण को कैसे नियमित करें।" पूरे दो दिन उन मूलभूत सिद्धान्तों की जाँच में लगाए गए जो पुनर्जागरण का आधार थे, और उसके प्रवर्तकों की शिक्षाओं का सार थे। वेस्ली और उनके मित्रों ने उन व्यावहारिक सत्यों पर सबसे अधिक बल दिया जो मसीही जीवन की नींव हैं, जैसे मन फिराव, विश्वास, धर्मी ठहराया जाना, पवित्रीकरण, और आत्मा की गवाही।
उनका काम कोई पंथ-सूत्र या विश्वास-वक्तव्य तैयार करना नहीं था, वरन् उन महान सिद्धान्तों को स्पष्ट और दृढ़ता से पुनः स्थापित करना था जिन्हें कलीसिया ने विस्मृति में पड़ जाने दिया था। उनका कार्य धर्मशास्त्रियों का नहीं, वरन् गवाहों का था।
प्रचार की सर्वोत्तम सामान्य पद्धति के विषय में, सम्मेलन ने प्रचारकों को यह परामर्श दिया, "1. आमन्त्रित करना। 2. कायल करना। 3. मसीह को प्रस्तुत करना। अन्त में, उन्नति करना; और यह प्रत्येक उपदेश में कुछ मात्रा में करना।"
एक और विषय, जिस पर सम्मेलन को अनिवार्यतः गम्भीर विचार करना पड़ा, वह था सोसाइटियों का स्थापित कलीसिया से सम्बन्ध। सिद्धान्त और अनुशासन। 105
वेस्ली इस विश्वास पर टिके रहे कि सारभूत एकता बनाए रखना अब भी सम्भव है, यद्यपि पादरियों का रुख इस विषय में कुछ आशंकाएँ जगाने लगा था। परन्तु इसी परिस्थिति से मेथोडिज़्म के उत्तरदायित्व बढ़ गए और कई गुना हो गए। और वह उन्हें स्वीकार करने को तैयार था। इस प्रश्न पर, "बिशपों की आज्ञा मानना हमारा कहाँ तक कर्तव्य है?" सम्मेलन ने अपना निर्णय इस प्रकार दिया,
"सब उदासीन (न अच्छी न बुरी) बातों में। और उनकी आज्ञा मानने के इसी आधार पर, हमें नियमों का पालन करना चाहिए, जहाँ तक हम शुद्ध विवेक के साथ कर सकें।" जिस भावना ने यह प्रस्ताव लिखवाया वह विवेकपूर्ण भी थी और उदार भी, और यह वेस्ली के कलीसियाई विचारों में हुई स्पष्ट उन्नति को दर्शाती है।
सोसाइटियों के आन्तरिक अनुशासन पर भी उचित ध्यान दिया गया, जैसा कि निम्नलिखित प्रश्नोत्तरों से प्रकट होता है। प्र. जो लोग आपकी देखरेख में रहना चाहते हैं, वे कैसे विभाजित हैं? उ. संयुक्त
सोसाइटियों, बैंडों, चुनी हुई सोसाइटियों और पश्चात्तापियों में।
ये एक-दूसरे से कैसे भिन्न हैं? उ. संयुक्त सोसाइटियाँ (जो सबसे बड़ी हैं) जागृत हुए लोगों से बनी हैं: इनमें से जिनके विषय में माना जाता है कि उन्हें पापों की क्षमा मिल चुकी है, वे बैंडों में अधिक निकटता से संगठित हैं। बैंडों में से जो परमेश्वर की ज्योति में चलते दिखाई देते हैं, वे चुनी हुई सोसाइटियाँ बनाते हैं: और जो उनमें से इस समय अनुग्रह से गिर गए हैं, वे पश्चात्तापियों के रूप में अलग मिलते हैं।" सदस्यों के इन वर्गों में से प्रत्येक के लिए विशेष नियम सम्मेलन द्वारा अपनाए गए। इनमें सोसाइटी के वे नियम भी हैं जो आज भी लागू हैं।
इनके सम्बन्ध में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि वे किसी विशेष धार्मिक मत को एकता का आधार नहीं बनाते। इन सोसाइटियों में प्रवेश चाहने वालों से पहले केवल एक ही शर्त अपेक्षित है,—"आने वाले क्रोध से भागने और अपने पापों से उद्धार पाने की इच्छा।"
अनुभव ने शीघ्र ही दिखा दिया कि सदस्यों की आत्मिक दशा के अनुसार सोसाइटियों का चौगुना विभाजन अव्यावहारिक है। 106 प्रथम सम्मेलन। परन्तु यह व्यवस्था शीघ्र ही संशोधित हो गई, और जिस उत्तम विचार से वह उपजी थी उसे अधिक सरल रूप में कार्यान्वित किया गया।
यह विचार, जिसे मेथोडिज़्म का मूल सिद्धान्त माना जा सकता है, और जिसके कारण उसकी अपनी विशिष्ट पहचान है, वह संगठित आत्मिक जीवन का है; और इसने क्लास-मीटिंग में अपना साकार रूप पाया। इन छोटी सभाओं ने सहभागिता और परस्पर उन्नति की उस स्वाभाविक इच्छा को पूरा किया, जो जीवित कलीसिया के प्राकृतिक लक्षणों में से एक है, और "कलीसिया के भीतर कलीसियाओं" के उस विचार का व्यावहारिक रूप बनाया, जिसे मोरावियनों ने स्पेनर से उधार लिया था। अपनी आत्माओं का उद्धार खोजने वाले थोड़े-से लोग किसी अनुभवी मसीही की देखरेख में रखे गए, और इस प्रकार एक प्रकार का आत्मिक परिवार बना, जिसमें वे अपने सुख-दुःख, अपनी समृद्धि या विपत्ति की बातें आपस में साझा करते थे; जिसमें बलवान निर्बलों की आवश्यकता पूरी करते और उन्हें सँभालना सीखते थे, और निर्बल बलवानों के उदाहरण से प्रेरित होकर अपनी दुर्बलता पर विजय पाना सीखते थे। हमारे विचार में क्लास-मीटिंग ने, किसी भी अन्य मानवीय संस्था से अधिक, कलीसिया की एकता और सन्तों की सहभागिता के महान विचार को साकार किया है। और इसे अपनी पद्धति की नींव बनाकर वेस्ली ने अपने कार्य की उन्नति और स्थायित्व को सुनिश्चित कर लिया: यह वास्तव में प्रतिभा की सूझ थी, या यों कहें कि यह उन ईश्वरीय संकेतों में से एक थी जिनका लाभ उठाना वे भली-भाँति जानते थे।
केवल क्लास-मीटिंग ने ही मेथोडिज़्म के लिए सम्भव बनाया कि वह सारे इंग्लैंड में उस गति से फैले, जो आज भी इतिहासकार को चकित करती है।
इसने सब जगह धार्मिक जीवन की नई अग्नियाँ जला दीं जो, आवश्यकता पड़ने पर, स्वयं पोषित रह सकती थीं और स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रख सकती थीं, और इस प्रकार मिशनरी कार्यों की एक अनिवार्य सहायक बनीं। और इसने हज़ारों नए मन-फिराने वालों को धार्मिक प्रशिक्षण दिया, जिनका
क्लास-मीटिंग। 107 उदासीनता की, और कभी-कभी पशुवत दशा से आत्मिक जीवन के आनन्द में तत्काल परिवर्तन हो गया।
हम पहले देख चुके हैं कि सामान्य प्रचारकों का प्रचार वेस्ली के लिए कैसे एक व्यावहारिक आवश्यकता बन गया। अब इस नई संस्था की वैधता और उपयोगिता की जाँच करने का समय आ गया था। सम्मेलन ने यह दृढ़ विश्वास घोषित करने में संकोच नहीं किया कि यह नया साधन समय की तात्कालिक आवश्यकताओं को पूरा करता है, और उसने वेस्ली को आवश्यकता की स्थिति में "सामान्य सहायकों" को नियुक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनका कार्य था, "किसी पादरी की अनुपस्थिति में, झुण्ड को चराना और उसका मार्गदर्शन करना।" सम्मेलन ने उनके पालन के लिए नियम भी बनाए, उन्हें दैनिक वृत्तान्त रखने का परामर्श दिया, और अपने तथा दूसरों में औपचारिकता से सावधान रहने की उपदेश-भरी बात जोड़ी। ऐसे कार्यकर्ताओं के लिए एक "सेमिनरी" (प्रशिक्षण-संस्थान) की व्यवस्था का प्रश्न भी उठा; परन्तु योजना स्थगित कर दी गई, क्योंकि उसके प्रभावी कार्यान्वयन का समय अभी नहीं आया था।
यह स्पष्ट है कि न तो वेस्ली और न ही उनके मित्र अब तक सामान्य प्रचारकों के प्रचार का मूल्य और महत्त्व, और भविष्य के मेथोडिज़्म के लिए उसके द्वारा की जाने वाली सेवा को समझ पाए थे। यद्यपि वे पहले ही एक बड़ा समूह थे, (लगभग पचास की संख्या में,) फिर भी वेस्ली उन सहायकों को केवल "असाधारण सन्देशवाहक" ही मानते थे, जिनका कार्य तभी समाप्त हो जाता जब पादरी वर्ग पुनर्जागरण के जागृत करने वाले प्रभाव में आ जाता। उनमें से अधिकांश घुमन्तू सेवकाई के श्रम में लगे रहते हुए भी अपना सांसारिक व्यवसाय करते रहे। वे अत्यन्त सरल और अल्प-शिक्षित पुरुष थे, परन्तु विश्वास और उत्साह से भरे हुए थे, और जो कार्य वेस्ली ने उन्हें सौंपा उसमें उन्होंने पूरी शक्ति से अपने को झोंक दिया। उन्होंने उन्हें कार्यक्षेत्र में बुलाया था, और उन्होंने सहर्ष उनका नेतृत्व स्वीकार किया। उनकी गतिविधियों को नियमित करना, उनके सर्किटों की सीमाएँ निर्धारित करना, और सामान्यतः उनके कार्य की देखरेख करना उन्हीं का काम था। सहायक का तेरहवाँ नियम यह था: "सब बातों में अपनी इच्छा के अनुसार नहीं, परन्तु सुसमाचार में पुत्र के समान कार्य करो। 108 प्रथम सम्मेलन। ऐसे होने के नाते, तुम्हारा कर्तव्य है कि अपना समय उस रीति से बिताओ जो हम निर्देशित करें; एक ओर, घर-घर जाकर झुण्ड से भेंट करने में, विशेषकर बीमारों से; और दूसरी ओर, पढ़ने, मनन और प्रार्थना के उस क्रम में जो हम समय-समय पर सुझाएँ। सबसे बढ़कर, यदि तुम हमारे साथ हमारे प्रभु की दाख की बारी में परिश्रम करते हो, तो आवश्यक है कि तुम कार्य का वह भाग करो जो हम निर्देशित करें, उन समयों और स्थानों में जो हमारी दृष्टि में उसकी महिमा के लिए सबसे उत्तम हों।"
जिस पूर्ण आज्ञाकारिता की अपेक्षा वेस्ली अपने सामान्य सहायकों से करते थे, वह कार्य की माँगों के कारण आवश्यक थी।
वे आत्माओं की देखभाल ऐसे पुरुषों को सौंप रहे थे जो, बहुत विश्वास और उत्साह से सम्पन्न होने पर भी, अधिकांशतः मानसिक संस्कार से वंचित थे। इसलिए परिस्थितियों के बल से उन्हें एक प्रकार का अधिष्ठाता-अधिकार स्वीकार करना पड़ा; और उनके सहायकों ने सहर्ष उसके अधीनता मानी। यह भी कहा जाना चाहिए कि उन्होंने इस अधिकार का प्रयोग प्रचारकों और लोगों, दोनों के बड़े लाभ के लिए किया, उनकी बौद्धिक तथा आत्मिक गतिविधियों को प्रेरित करके, उनके पठन में उनका मार्गदर्शन करके, उनके प्रचार की त्रुटियाँ बताकर,—एक शब्द में, अपनी पूरी शक्ति से उन्हें उस महत्त्वपूर्ण कार्य के योग्य बनाने में परिश्रम करके जिसके लिए प्रोविडेंस ने उन्हें बुलाया था। उनके साथ उनके पत्र-व्यवहार से अधिक रोचक कुछ नहीं हो सकता। उनमें से एक को वे लिखते हैं, "प्रचार में तुम्हारी प्रतिभा बढ़ती नहीं है। यह ठीक वैसी ही है जैसी सात वर्ष पहले थी। यह जीवन्त तो है, पर गहरी नहीं; इसमें विविधता कम है; विचारों का कोई विस्तार नहीं। केवल पठन ही इसकी पूर्ति कर सकता है, मनन और प्रतिदिन की प्रार्थना के साथ। इसे छोड़कर तुम अपने साथ बड़ा अन्याय करते हो। इसके बिना तुम कभी गहरे प्रचारक नहीं बन सकते, जैसे पूर्ण
मसीही भी नहीं। आह, आरम्भ करो! प्रतिदिन का कोई भाग निजी साधनाओं के लिए ठहरा लो। जो रुचि तुममें अब नहीं है, तुम उसे पा सकते हो: जो आरम्भ में उबाऊ लगता है, वह बाद में सुखद हो जाएगा।"
वेस्ली ने प्रचारकों पर अपने अधिकार का प्रयोग केवल उन्हें अध्ययन के लिए उभारने में ही नहीं, वरन् उनके कार्य में उन्हें प्रोत्साहित करने में भी किया। वेस्ली का अधिष्ठाता-पद। 109 वे उनके निर्देशक होने के साथ-साथ उनके व्यक्तिगत मित्र भी थे। एक बार उनमें से एक अपनी बुलाहट के विषय में सन्देहों से अभिभूत हो गया, और उसने उन्हें लिखा कि उसके स्थान पर किसी और को भेज दें, क्योंकि उसे नहीं लगता था कि वह अपने सही स्थान पर है। "मेरे प्रिय भाई," वेस्ली ने उत्तर दिया,
"तुम सचमुच मुझे अपने स्थान से बाहर लगते हो, क्योंकि जो समय तुमने तर्क-वितर्क में बिताया है, उसे तुम्हें प्रार्थना में बिताना चाहिए था।" ऐसा अधिकार, जो ऐसे चरित्र पर आधारित था और उमड़ते स्नेह तथा उदारता से कोमल बना था, तुरन्त और प्रसन्न सहमति पाए बिना नहीं रह सकता था; और सच ही कहा जा सकता है कि किसी नेता के पास इससे अधिक अनुशासित और समर्पित दल कभी नहीं रहा।
पुनर्जागरण से उठे गम्भीर प्रश्नों पर कई दिन बिताने के बाद, प्रथम सम्मेलन के सदस्य अलग हुए और अपने सुसमाचारीय परिश्रम में फिर लग गए। इस छोटी सभा की किसी औपचारिक धर्मसभा से कोई समानता नहीं थी: इसका उद्देश्य कोई कलीसियाई संगठन खड़ा करना नहीं, वरन् कलीसिया को पुनर्जीवित करने और आत्माओं को बचाने के सर्वोत्तम साधन निर्धारित करना था। वेस्ली और उनके मित्र वास्तव में एक महान कार्य की नींव डाल रहे थे, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि उस कार्य को जो विस्तार धारण करना था उसकी उन्होंने कोई कल्पना नहीं की थी।
फिर भी अतीत ने भविष्य के लिए आशाजनक शुभ संकेत दिया। पुनर्जागरण के आरम्भ से बीते पाँच वर्षों में उसकी सफलता सब अपेक्षाओं से बढ़कर रही थी। उसकी दोनों बड़ी शाखाएँ, जो केवल एक सैद्धान्तिक बिन्दु से अलग थीं, उत्साह और सक्रियता में एक-दूसरे से होड़ करती थीं। फिर भी, वह शाखा जिसके प्रतिनिधि वेस्ली थे, अपने श्रेष्ठ संगठन के कारण दूसरी से तेज़ी से आगे निकल रही थी। इस काल के मेथोडिज़्म के पूर्ण आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। घुमन्तू प्रचारक, जैसा हम कह चुके हैं, कम से कम पचास थे; और सोसाइटी के सदस्य हज़ारों में गिने जाते थे। अकेले लंदन में दो हज़ार दो सौ थे।
इंग्लैंड का हर भाग वेस्ली की घुमन्तू सेवकाई की योजना के अन्तर्गत आता था, 110 प्रथम सम्मेलन। उत्तर में न्यूकैसल से लेकर सुदूर दक्षिण-पश्चिम में लैंड्स एंड तक। लंदन, ब्रिस्टल,
सेंट आइव्स और न्यूकैसल इस आन्दोलन के केन्द्र थे: हाल ही में मध्य क्षेत्र में वेडनेस्बरी में एक नया केन्द्र बना था; और कार्य का आरम्भ, जैसा हम देख चुके हैं, हिंसक अत्याचारों से चिह्नित हुआ था। इन विभिन्न केन्द्रों में वेस्ली ने, अपने स्वामी की भाँति, मुख्यतः जनसंख्या के सबसे पतित वर्ग को सम्बोधित किया था, और वे लंदन की जनता तथा किंग्सवुड, स्टैफ़र्डशायर और न्यूकैसल के कोयला-खदान मज़दूरों के मिशनरी बन गए थे। समाज के इन ठुकराए हुओं के बीच उनके परिश्रम को कैसी सफलता मिली, यह हम पहले ही दिखा चुके हैं। यह सबसे मूल्यवान प्रकार की सफलता थी, क्योंकि इसमें केवल आचरण का सुधार ही नहीं, वरन् आत्माओं का मन-परिवर्तन भी निहित था।
विरोध की तो वास्तव में कोई कमी नहीं थी। परन्तु अंग्रेज़ लोगों के रुख ने सुसमाचार की उनकी आवश्यकता को प्रमाणित किया, और मिशनरी के मनोबल को डिगाया नहीं।
इन्हीं भीड़ों में, जो मदिरापान से पशुवत हो गई थीं और क्रोध से भड़की हुई थीं, वे ऐसे संवेदनशील मन पहचान सकते थे, जो अपनी भली प्रवृत्तियों में उतने ही उत्साही हो सकते थे जितने उनमें जो उन्हें भटका रही थीं। फिर भी वे चापलूसी से उस जंगली अत्याचारी को वश में करने का प्रयास नहीं करते थे जो स्वयं सरकार की अवज्ञा करने का आदी था। वेस्ली की आत्मा इतनी ऊँची थी कि वे दरबारी बनकर चाटुकारिता नहीं कर सकते थे, और उनमें इतनी सच्चाई थी कि वे वह कह नहीं सकते थे जो उनका मतलब न हो। बेकाबू भीड़ के बीच भी उन्होंने कभी याचक का स्वर नहीं अपनाया। उनके प्रति लोगों की भावनाओं में आई क्रान्ति केवल उस नैतिक शक्ति के कारण है जो उनके पास थी। यदि तिरस्कृत और निन्दित किए जाने के बाद वे जनसमूह के प्रिय और आदरणीय बन गए, तो इसका कारण यह था कि लोगों ने अनुभव किया कि उनके निर्भीक और अधिकारपूर्ण वचन एक प्रेमी और समर्पित हृदय से निकलते हैं। जनसमूह अपनी रुचियों में चाहे कितना ही छिछला और चंचल हो, वह जानता है कि जिन्होंने उससे प्रेम किया और उसके भले के लिए परिश्रम किया, उनके साथ देर-सबेर न्याय कैसे करे।
1744 में मेथोडिज़्म। 111 वेस्ली को अपने उन विरोधियों की दुर्भावना को क्षमा करना इतना सरल नहीं लगा, जिनके पक्ष में भीड़ का अज्ञान और पूर्वाग्रह तर्क के रूप में नहीं दिया जा सकता था। पादरी वर्ग और मजिस्ट्रेट वर्ग, जैसा हम देख चुके हैं, लोगों के पागलपन को रोकने के बजाय अक्सर उनके इरादों में सहायक और भागीदार बने। उनका आचरण अठारहवीं शताब्दी के सबसे दयनीय दृश्यों में से एक प्रस्तुत करता है,—मजिस्ट्रेट का चोगा और पादरी का सफ़ेद वस्त्र सड़क की हाथापाई के कीचड़ से मैले। "वे लोगों को उकसाते हैं," वेस्ली ने कहा,
"कि वे हमारे साथ ऐसे व्यक्तियों जैसा व्यवहार करें जिनके लिए कोई कानून नहीं है, और जैसे हम पागल कुत्ते हों।"
यह उग्र विरोध, जो हमारे अब तक पहुँचे काल में ही फूट चुका था, और अधिक हिंसा के साथ दुगुना होने को था; परन्तु प्रचारकों ने पहला झटका सह लिया था, और अब वे संघर्ष के अभ्यस्त हो चुके थे।
वह काल जिसे उचित रूप से मेथोडिज़्म के जन्म का काल कहा जा सकता है, प्रथम सम्मेलन पर समाप्त होता है, जिसमें उसके सिद्धान्तों को ऐसी विनम्रता और दृढ़ता के साथ घोषित किया गया। आगे हम कार्य के क्रमिक विकास का अनुसरण करेंगे; और ऐसा करने में वेस्ली के जीवन-सूत्र को फिर उठा लेना ही पर्याप्त होगा, क्योंकि कोई कारीगर अपने कार्य के साथ इतना पूर्णतः एकरूप कभी नहीं हुआ।
कार्य का विकास।
(1744—1770।) अध्याय I.
संघर्ष और सफलताएँ।
अपने सामने खुली उपयोगिता की सम्भावनाओं से प्रोत्साहित होकर, वेस्ली ने अपने सदैव के उत्साह से अपना कार्य फिर आरम्भ किया। अगस्त 1744 में फ़ेलोज़ में से एक के रूप में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के सामने प्रचार करने की उनकी बारी आई। इस प्रकार उन्हें एक अवसर मिला, जिसे उन्होंने अपनाने में चूक नहीं की, कि कलीसिया के उच्चाधिकारियों के सामने सुसमाचारीय सिद्धान्तों का शान्त और प्रकाशमय विवरण रखें, साथ ही उन विशेष कर्तव्यों के पालन के लिए, जो उन पर आते थे, आदरपूर्ण परन्तु दृढ़ शब्दों में आग्रह करें। अपने दैनिक वृत्तान्त में वे कहते हैं, "मैंने प्रचार किया, मेरा अनुमान है, सेंट मैरी में अन्तिम बार। ऐसा ही हो। मैं अब इन लोगों के लहू से निर्दोष हूँ। मैंने अपनी आत्मा को पूरी तरह छुड़ा लिया है,"
यद्यपि वे समाज के उच्च और अधिक शिक्षित वर्ग को सुसमाचार सुनाने के लिए जो थोड़े-से अवसर उन्हें मिले उनका सर्वोत्तम उपयोग करना जानते थे, फिर भी वे यह नहीं भूले कि उनका विशेष मिशन "छोटों" के लिए है। वे अपनी मिशनरी यात्राएँ जारी रखते रहे,
भ्रमणशील सेवकाई की विशेषताएँ। 113 वह सर्दी की कठोरता से भी विचलित नहीं हुआ। उन दिनों सड़कों की दशा शोचनीय रूप से उपेक्षित थी, विशेषकर उत्तरी काउंटियों में। यॉर्क नगर से आगे कोई सार्वजनिक सवारी ज्ञात नहीं थी। वेस्ली को अपनी निरन्तर और लम्बी यात्राएँ घोड़े पर ही करनी पड़ती थीं। बर्फ़ गिरने या नदियों के उफनने से ये बिगड़ी हुई सड़कें सर्दियों में लगभग चलने योग्य नहीं रहती थीं, और एक से अधिक बार उसके प्राण संकट में पड़े। उसे प्रायः घोड़े से उतरकर अपने अनिच्छुक घोड़े को वहाँ से ले जाना पड़ता था जहाँ वह बर्फ़ पर मुश्किल से पैर टिका पाता था। फरवरी
1745 में उसकी दो अत्यन्त कठिन यात्राएँ हुईं। वह अपने रोज़नामचे में उनके विषय में इस प्रकार कहता है:—"इससे पहले मैंने बहुत-सी कठिन यात्राएँ की हैं, परन्तु ऐसी यात्रा कभी नहीं की; हवा, ओले, वर्षा, पाला, बर्फ़, बरसती बौछार और कलेजा चीर देने वाली ठंड के बीच; पर अब वह बीत चुकी है; वे दिन फिर नहीं लौटेंगे, और इसलिए ऐसे हैं मानो कभी थे ही नहीं।"
इन परिश्रमों को वेस्ली ने पूर्ण धैर्य के साथ सहा।
ऐसे कष्टों के लिए उसे अपनी सेवकाई को मिली सफलता में भरपूर प्रतिफल मिल जाता था। इसके अतिरिक्त, वह अपने महान कार्य में इतना लीन था कि उसके साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी छोटी-मोटी असुविधाएँ उसका ध्यान नहीं भटका पाती थीं। यात्राओं के दौरान वह केवल अपने मार्ग के हर प्रमुख पड़ाव पर एकत्र भीड़ को सम्बोधित करने तक ही सीमित नहीं रहता था: वह अपने स्वामी के कार्य के लिए परिश्रम करने के छोटे-से-छोटे अवसर का भी लाभ उठाता था। जब वह
घोड़े पर चल रहा होता, तो जो लोग मिल जाते उनसे बात करता, उनके साथ वार्तालाप में लग जाता, और उनके मन को धार्मिक विषयों की ओर मोड़ने का प्रयत्न करता। जिस सराय में वह रात बिताता, वहाँ भोजन की मेज़ पर या बैठक में भी वह प्रायः अपने जीवन के महान कार्य को आगे बढ़ाने का उपाय निकाल लेता था। उसके मिलनसार स्वभाव और असाधारण वार्तालाप-शक्ति के कारण लोग उसकी संगति की उत्सुकता से खोज करते थे: उसकी पहले से फैली हुई ख्याति और उसके विषय में प्रचलित भिन्न-भिन्न मतों ने जिज्ञासा जगाई; और लोग प्रायः
I 114 संघर्ष और सफलताएँ। दूर-दूर से उसे देखने और उससे बात करने आते थे। निस्सन्देह यह जिज्ञासा सदा सहानुभूति से नहीं उपजती थी; परन्तु केवल आत्म-संयम और सरलता के बल पर द्वेष को निरस्त करना वह जितनी अच्छी तरह जानता था, उतना कोई नहीं जानता था। 1745 के वसन्त में कॉर्नवाल के भ्रमण के दौरान उसने इसका भरपूर प्रमाण दिया।
सेंट जेनिस के उत्तम रेक्टर थॉम्पसन ने, उनके सम्मान में यह कहा जाना चाहिए, उसका खुली बाँहों से स्वागत किया, उसे अपना मंच प्रयोग करने की अनुमति दी, और सदा उसके सर्वोत्तम मित्रों में से एक बना रहा। परन्तु शेष पादरियों और अधिकारियों ने सामान्यतः उसे ठंडा स्वागत दिया। देश मेथोडिस्टों के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ था। प्रचारकों में से एक, मैक्सफ़ील्ड, को अभी-अभी आवारागर्दी-विरोधी कानून के अधीन गिरफ़्तार किया गया था, और उसे सेना में जबरन भर्ती किए जाने का भय था, जैसा कि नेल्सन और कई अन्य लोगों के साथ पहले ही हो चुका था। कष्टदायक प्रचारकों से छुटकारा पाने का यह सरल उपाय उस समय बहुत प्रचलित प्रतीत होता है, और कानून इसका प्रयोग करने वालों को बहुत अधिक छूट देता था। अपने मित्र की ओर से हस्तक्षेप करने का प्रयास करते समय वेस्ली स्वयं भी उसी भाग्य से बाल-बाल बचा। उसके विरुद्ध समन निकाला गया और उसे गिरफ़्तार कर लिया गया; परन्तु ऐसा बंदी उसके शत्रुओं के लिए बड़ी उलझन का कारण बने बिना नहीं रह सकता था, क्योंकि वे अनुभव करते थे कि इतने गरिमामय व्यक्तित्व और सहज व्यवहार वाले पादरी को, जिसके पास निर्वाह का कोई प्रत्यक्ष साधन न हो, आवारा बताकर चलाना कठिन होगा। उसे शीघ्र ही छोड़ दिया गया; परन्तु उसी दिन एक उत्साही मजिस्ट्रेट ने उसके खुले में प्रचार को यह चिल्लाकर रोक दिया, "पकड़ो इसे! पकड़ो! मैं कहता हूँ, प्रचारक को महामहिम की सेवा के लिए पकड़ लो।"
जब कोई इस आदेश का पालन करने को तैयार न दिखा, तो उसने स्वयं प्रचारक को बाँह से पकड़ लिया और उसे अपना बंदी बना लिया, परन्तु सोच-विचार करने पर अपने किए पर लज्जित हुआ और उसे जाने दिया।
अगले दिन फ़ालमाउथ में वेस्ली को किसी डगमगाते मजिस्ट्रेट का नहीं, बल्कि क्रोधित जनसमूह का सामना करना पड़ा। वह एक बीमार महिला से भेंट करने गया था, जब "घर," जैसा वह हमें बताता है,
फ़ालमाउथ की भीड़। 115 "चारों ओर से असंख्य लोगों की भीड़ से घिर गया। किसी नगर पर धावा बोलकर कब्ज़ा किए जाने के समय भी इससे अधिक ऊँचा या उलझा हुआ शोर शायद ही होता। आरम्भ में श्रीमती बी. और उनकी बेटी ने उन्हें शान्त करने का प्रयत्न किया। परन्तु वह परिश्रम व्यर्थ गया। वे उफनते समुद्र को शान्त करने का प्रयास भी कर सकती थीं। शीघ्र ही वे अपनी रक्षा स्वयं करने में लग गईं, और के. ई. तथा मुझे जैसे बन पड़े वैसे निपटने को छोड़ दिया।
भीड़ पूरे गले से गरज उठी, 'कैनोरम को बाहर लाओ! कैनोरम कहाँ है?' (यह एक निरर्थक शब्द है जिसे कॉर्निश लोग सामान्यतः मेथोडिस्ट के स्थान पर प्रयोग करते हैं।) कोई उत्तर न मिलने पर उन्होंने शीघ्र ही बाहरी द्वार ज़बरदस्ती खोल दिया और गलियारा भर दिया। हमारे बीच केवल लकड़ी का एक पर्दा-सा विभाजन था, जिसके अधिक देर टिकने की आशा नहीं थी। मैंने तुरन्त उस पर टँगा एक बड़ा दर्पण उतार लिया, यह सोचकर कि पूरी दीवार एक साथ गिर पड़ेगी।
जब उन्होंने भरपूर कटु श्राप देते हुए अपना काम आरम्भ किया, तो बेचारी किटी बिल्कुल स्तब्ध रह गई और चिल्ला उठी, 'हे श्रीमान, हम क्या करें?' मैंने कहा, 'हमें प्रार्थना करनी चाहिए।'
वास्तव में उस समय, देखने में, हमारे प्राणों का मोल एक घंटे का भी नहीं था। उसने पूछा, 'परन्तु श्रीमान, क्या अच्छा नहीं होगा कि आप स्वयं को छिपा लें? अलमारी में चले जाएँ?'
मैंने उत्तर दिया, 'नहीं। मेरे लिए यही सबसे अच्छा है कि मैं ठीक यहीं खड़ा रहूँ।' बाहर वालों में कुछ निजी जहाज़ों के नाविक थे जो हाल ही में बंदरगाह में आए थे। इनमें से कुछ, शेष लोगों की धीमी चाल से क्रुद्ध होकर, उन्हें धकेलकर हटाने लगे, और सब एक साथ आकर भीतरी द्वार पर कंधे लगाकर चिल्लाए, 'रुको साथियो, रुको!'
सारे कब्ज़े एक साथ टूट गए, और द्वार कमरे के भीतर गिर पड़ा। मैं तुरन्त आगे बढ़कर उनके बीच जा खड़ा हुआ और कहा, 'मैं यहाँ हूँ। तुममें से किसे मुझसे कुछ कहना है? तुममें से किसके साथ मैंने कोई बुराई की है?
तुम्हारे साथ? या तुम्हारे साथ? या तुम्हारे साथ?' मैं बोलता रहा जब तक कि नंगे सिर ही (क्योंकि मैंने जानबूझकर अपनी टोपी छोड़ दी थी ताकि सब मेरा चेहरा देख सकें) गली के बीच में न पहुँच गया, और तब आवाज़ ऊँची करके कहा, 'पड़ोसियो,
116 संघर्ष और सफलताएँ। देशवासियो! क्या तुम मुझे बोलते सुनना चाहते हो?' वे उत्साह से चिल्लाए, 'हाँ, हाँ। यह बोलेगा। अवश्य बोलेगा। कोई इसे नहीं रोकेगा।' परन्तु खड़े होने को कुछ न होने और भूमि का कोई लाभ न होने के कारण केवल थोड़े ही लोग मुझे सुन सके। फिर भी मैं बिना रुके बोलता रहा, और जहाँ तक आवाज़ पहुँची, लोग शान्त रहे; फिर उनके एक-दो सरदारों ने मुड़कर क़सम खाई कि कोई इसे हाथ नहीं लगाएगा। तब एक पादरी, श्री थॉमस, आगे आए और पूछा, 'क्या तुम्हें एक अजनबी के साथ ऐसा व्यवहार करते लज्जा नहीं आती?' शीघ्र ही नगर के दो-तीन सज्जनों और एक नगर-पार्षद ने उनका समर्थन किया; उनके साथ मैं बोलते-बोलते नगर में आगे बढ़ता हुआ श्रीमती मैडर्न के घर तक पहुँचा। सज्जनों ने सुझाव दिया कि मेरा घोड़ा द्वार पर मँगवा लिया जाए, और मुझसे कहा कि तब तक भीतर आकर विश्राम करूँ। परन्तु दूसरी बार सोचने पर उन्होंने मुझे फिर लोगों के बीच जाने देना उचित नहीं समझा; इसलिए उन्होंने मेरे घोड़े को मुझसे पहले पेनरिन भेजने और मुझे वहाँ जलमार्ग से भेजने का निश्चय किया; क्योंकि जिस घर में हम थे उसके पिछले द्वार के पास ही समुद्र बहता था।"
कॉर्नवाल में अपनी यात्रा जारी रखते हुए वेस्ली ने सोसाइटियों की उस भावना को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया जो विरोध से कुछ हतोत्साहित हो गई थी। कुछ लोग बड़ी घबराहट में थे: यहाँ उसे सूचना मिली कि चर्चवार्डन और सिपाही उस पर हिंसक हाथ डालने की तैयारी कर रहे हैं: वहाँ, शराब पिए हुए खनिकों का एक दल "भयानक काम करने आ रहा है।" वह कहता है, "मैंने उनके मन को शान्त करने का बहुत परिश्रम किया: परन्तु भय के कान नहीं होते; इसलिए बहुत-से लोग चले गए। शेष लोगों को मैंने 'अपने शत्रुओं से प्रेम रखो' पर प्रचार किया। परिणाम ने दिखाया कि यह भी झूठी चेतावनी थी, शैतान की एक चाल, ताकि लोग परमेश्वर का वचन सुनने से रुकें।"
टॉलकार्न में उसे भीड़ के एक और आक्रमण का सामना करना पड़ा, जिसने खुले में प्रचार करते समय उस पर धावा बोल दिया। वेस्ली एक ऊँची दीवार पर खड़ा था, और कुछ समय तक अपनी वाणी और हाव-भाव से उन्हें मर्यादा में रखने में सफल रहा। परन्तु
कॉर्नवाल और वेल्स। 17 उसे दीवार से नीचे गिरा दिया गया, और उसे सभा छोड़नी पड़ी, यही उसके लिए बड़े सौभाग्य की बात थी कि वह किसी गम्भीर चोट के बिना बच निकला। स्टिथियन्स में, जब वह प्रचार कर रहा था, अधिकारियों के कारिन्दों ने श्रोताओं में से एक को पकड़कर सेना में जबरन भर्ती कर लिया। ट्रेविंट की सोसाइटी के एक सदस्य को उस स्थान से निकाल दिया गया; परन्तु इस कदम से कार्य का ही भला हुआ, जिसका यह विनम्र मसीही जहाँ कहीं गया वहाँ विश्वासयोग्य रक्षक और समर्थक बन गया। जिस-जिस स्थान पर वह गया, उसे ऐसी सफलता मिली कि उसने कहा, "मुझे स्मरण नहीं कि कॉर्नवाल में इतने कम समय में, ट्रेविंट से लेकर समुद्र-तट तक, बूढ़ों और जवानों, धनी और निर्धन लोगों में इतना बड़ा जागरण कभी हुआ हो।"
अब वेस्ली ने कॉर्नवाल छोड़ दिया और खाड़ी पार करके वेल्स गया, जहाँ उसने स्वयं को बिल्कुल भिन्न दृश्यों के बीच पाया। "हम यहाँ मानो एक नए संसार में थे, शान्ति, सम्मान और प्रचुरता में। इस धूप में मैं कितनी शीघ्र पिघल जाता! परन्तु परमेश्वर की भलाई ने ऐसा होने न दिया।" वास्तव में इस समय इंग्लैंड के सब भागों में से यह रियासत ही ऐसी थी जहाँ उस पुनर्जागरण को सबसे अधिक सहानुभूति और सबसे कम विरोध मिला था।
जब वह इस प्रकार अपने परिश्रम में लगा था, तब उसके सहकर्मी भी कष्टों और संघर्षों के बीच, जिनका वर्णन यहाँ नहीं किया जा सकता, ज़ोरदार ढंग से उसका साथ दे रहे थे। उसका भाई सदा अग्रिम पंक्ति में रहता था, और उससे अधिक उत्साह के साथ संघर्ष में कोई नहीं कूदा। लड़ाई एक साथ अनेक मोर्चों पर चल रही थी, और प्रत्येक सैनिक साहसपूर्वक अपना कर्तव्य निभा रहा था। वेस्ली इस आन्दोलन की आत्मा था, जो अपने साथियों में अपने निर्भीक उत्साह का संचार करता और परमेश्वर के कार्य के प्रति सम्पूर्ण हृदय से समर्पण का उदाहरण उनके सामने रखता था।
यह महान कार्य युग की आवश्यकताओं के इतना अनुरूप था कि वह एक-दूसरे से अति दूर स्थानों में स्वतः फूट पड़ता प्रतीत होता था, और वेस्ली को प्रायः
118 संघर्ष और सफलताएँ। विनम्र और समर्पित सहकर्मियों की सफलता का समाचार आश्चर्य के साथ मिलता था, जिनके अस्तित्व का भी उसे पहले पता नहीं था। उदाहरण के लिए, इसी समय उसे यह आनन्ददायक समाचार मिला कि मेथोडिज़्म उस अंग्रेज़ी सेना में पहुँच गया है जो उस समय महाद्वीप पर थी। स्पेनी उत्तराधिकार का युद्ध अभी आरम्भ ही हुआ था: इंग्लैंड ने मारिया थेरेसा के पक्ष में शस्त्र उठाए थे, जबकि फ़्रांस ने विपरीत पक्ष लिया था। फ़्लैंडर्स परस्पर लड़ती सेनाओं का रणक्षेत्र था। अंग्रेज़ी सैनिकों में कुछ ऐसे थे जिन्होंने इंग्लैंड में मेथोडिस्टों का प्रचार सुना था, और जिनमें उसने फल उत्पन्न किया था।
उनकी भक्ति युद्ध के संकटों के बीच परिपक्व हुई थी, और उनके उत्साह ने उनके अनेक साथियों को जगा दिया था। जॉन इवांस, जॉन हेम, सैम्पसन स्टैनिफ़ोर्थ और मार्क बॉन्ड इस उल्लेखनीय आन्दोलन के अगुवे थे। उन्होंने सुसमाचारीय गतिविधि का एक नियमित क्रम आरम्भ किया जिसने अद्भुत परिणाम प्राप्त किए। अधिकांश रेजिमेंटों में अनेक लोगों का मन-परिवर्तन हुआ: नए विश्वासियों ने परस्पर उन्नति के लिए छोटी-छोटी सोसाइटियाँ बना लीं, और उनकी संख्या शीघ्र ही तीन सौ से अधिक हो गई। उनमें से सबसे बुद्धिमान और भक्त प्रचारक बन गए, और इनकी संख्या सात तक पहुँची। जॉन हेम, जो उन सब में सबसे अधिक ऊर्जावान था, अपने अधिकारियों की अनुमति से शिविर के विभिन्न भागों में दिन में प्रायः पाँच बार प्रचार करता था; अधिकारी उसे बहुत हद तक सैनिक कर्तव्यों से मुक्त रखते थे और सामान्यतः उसके कार्य के पक्ष में थे। ब्रसेल्स में सेनापति ने हेम को प्रतिदिन अंग्रेज़ी गिरजाघर में प्रचार करने की अनुमति दी: मेथोडिस्ट सैनिक
पंक्तिबद्ध होकर सभाओं में जाते थे, और उनके गम्भीर आचरण और आनन्दपूर्ण भजन-गायन से सब की उन्नति होती थी। अन्य सैनिकों ने घेंट में एक आराधना-स्थल का उपयोग किया।
30 अप्रैल, 1745 को फ़ॉन्टेनॉय के भयंकर युद्ध में मेथोडिस्टों ने अपने साथियों को दिखा दिया कि मसीही सैनिक अपने कर्तव्य-स्थल पर प्राण दे सकते हैं। चार प्रचारक और बहुत-से सदस्य सेना में मेथोडिज़्म। युद्ध-भूमि पर पड़े थे। घायलों में से एक ने अपने साथियों से कहा, "मैं यीशु की गोद में विश्राम करने जा रहा हूँ।" "आ,
प्रभु यीशु, शीघ्र आ!" एक और ने अन्तिम साँस के साथ पुकारा। जॉन इवांस की दोनों टाँगें तोप के गोले से कट गईं: उसे मरने के लिए एक तोप के ऊपर लिटा दिया गया; और जब तक वह बोल सका, उसने परमेश्वर की स्तुति करना और अपने आसपास के सब लोगों को समझाना नहीं छोड़ा।
इस प्रकार रणक्षेत्र में पहुँचकर मेथोडिज़्म अपने ईश्वरीय नियत उद्देश्य के प्रति विश्वासयोग्य रहा, जैसा कि वह किंग्सवुड और न्यूकासल के कोयला-खनिकों की देखभाल में पहले ही रह चुका था।
स्पष्ट था कि परमेश्वर इसके अनुयायियों को हर वर्ग के ठुकराए हुए लोगों के लिए अपने दूतों के रूप में काम में ले रहा था।
यद्यपि महाद्वीपीय अभियान में बड़ी संख्या में मेथोडिस्ट सैनिकों ने प्राण गँवाए, फिर भी बहुत-से इंग्लैंड लौट आए और वहाँ वेस्ली की सोसाइटियों से जुड़ गए: उनमें से कुछ उसकी भ्रमणशील सेवकाई की पंक्तियों में सम्मिलित हो गए। उसने स्वयं इस उल्लेखनीय आन्दोलन में गहरी रुचि ली, और इन भक्त सैनिकों में से कई के साथ निरन्तर पत्राचार बनाए रखा। उनके पत्रों से उसे जो आनन्द मिलता था, वह मिशनरी और देशभक्त का दोहरा आनन्द था। वेस्ली की देशभक्ति में कोई सन्देह नहीं हो सकता था, और शीघ्र ही ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं जिन्होंने उसकी परीक्षा ली।
वर्ष 1745 के दौरान, स्कॉटलैंड पर ढोंगी दावेदार चार्ल्स एडवर्ड स्टुअर्ट के आक्रमण से पूरा देश भारी आशंका में पड़ गया। आरम्भ में उसके शस्त्रों को कुछ सफलता मिली: उसने एडिनबरा पर अधिकार कर लिया, और वहाँ से इंग्लैंड के उत्तर को धमकाया। वेस्ली, जो रग-रग से अंग्रेज़ था, पूरी तरह समझता था कि उस दावेदार की सफलता पोप-मत की सफलता होगी, और उसके देश की स्वतंत्रताओं के पतन की अग्रदूत। इसलिए उसने अपने प्रभाव और उदाहरण का पूरा भार राजा के अधिकार और राष्ट्र के हितों के पलड़े में डाल दिया। जब आक्रमण के समाचार आए, तो वह तुरन्त न्यूकासल के लिए चल पड़ा, जिसकी उत्तरी स्थिति उसे 120 संघर्ष और सफलताएँ। सबसे बड़े संकट में डाले हुए थी। वह अपने भाइयों के भाग्य में भी सहभागी होना और उनकी वर्तमान कठिन परिस्थितियों में उन्हें सान्त्वना और प्रोत्साहन देना चाहता था। वहाँ पहुँचकर उसने नगराध्यक्ष को एक उल्लेखनीय पत्र लिखा, जिसमें उसने अपनी देशभक्ति और वैध शासक के प्रति निष्ठा की घोषणा की। कुछ ही समय बाद उसने छावनी के सैनिकों को प्रचार करने की पेशकश की, जिनकी धार्मिक आवश्यकताओं के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। कमान-अधिकारी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, और वेस्ली को अपने प्रयत्नों को अपने सामान्य कार्यक्षेत्र तक सीमित रखना पड़ा; परन्तु इन सीमाओं के भीतर उसने पहले से भी अधिक उत्साह दिखाया, प्रतिदिन खुले में प्रचार करते हुए और आसन्न महान सार्वजनिक विपत्तियों से महत्त्वपूर्ण शिक्षाएँ निकालते हुए। आक्रमण का खतरा प्रतिदिन बढ़ता गया, और इससे लोगों के मन गम्भीर हुए, तथा प्रचारक को अत्यन्त सामर्थी आह्वानों का आधार बनाने के लिए एक विषय मिला। ये परिश्रम बिना परिणाम के नहीं रहे, और उस दावेदार के असफल प्रयास का कम-से-कम इतना प्रभाव अवश्य हुआ कि कुछ आत्माएँ धार्मिक उदासीनता से जाग उठीं।
यद्यपि प्रचार वेस्ली का प्रमुख शस्त्र था, फिर भी वह आरम्भ से ही मुद्रण की शक्ति से अवगत था; और कम ही लोगों ने उसका इतना उपयोग किया है जितना उसने किया। जिस काल का हम अभी वर्णन कर रहे हैं, उसमें उसने क्रमशः अपनी रचना "बुद्धि और धर्म के मनुष्यों से अपील" (Appeal to Men of Reason and Religion) के दोनों भाग प्रकाशित किए, जो मेथोडिस्ट पुनर्जागरण के पक्ष में एक ओजस्वी याचना है, जिसमें अत्यन्त उदात्त भाव असाधारण सशक्त भाषा में व्यक्त हुए हैं। उसने छोटी धार्मिक पुस्तिकाएँ भी लिखीं, जिन्हें उसके प्रचारकों ने ग्रेट ब्रिटेन के सब भागों में हज़ारों की संख्या में बाँटा, और जिन्होंने यथार्थ अर्थ में प्रचार के कार्य का उपयोगी अनुसरण किया। बड़े पैमाने पर पुस्तिकाएँ बाँटने की पहल का सम्मान वेस्ली को ही प्राप्त है, एक ऐसा विचार जिसे आधुनिक समय में प्रभावशाली सोसाइटियों ने आश्चर्यजनक विस्तार तक पहुँचाया है।
कार्य के तीव्र विकास ने वेस्ली पर ऐसे दायित्व डाल दिए जिनकी उसने कभी कल्पना नहीं की थी। उसे झूठे शिक्षक। 121 एक प्रकार का आत्मिक अधिशासन चलाने के लिए बुलाया गया, न केवल अपने प्रचारकों पर, बल्कि उन अनेक सोसाइटियों पर भी जिनका वह संस्थापक था। यह बोझ उसने प्रेरितों जैसी समर्पण-भावना से उठाया। अपने सुसमाचारीय परिश्रम को आगे बढ़ाते हुए वह इनके साथ सोसाइटियों की दशा पर सूक्ष्म ध्यान भी देता रहा, और उनमें कठोर कलीसियाई अनुशासन बनाए रखा। पुनर्जागरण के साथ सर्वत्र चलने वाली धार्मिक उत्तेजना से अनिवार्यतः विविध परिणाम निकले, और इस महान आन्दोलन के पीछे-पीछे कभी-कभी अत्यन्त अतिशयोक्तिपूर्ण विचार भी उठ खड़े हुए। बहुत-सी आत्माएँ, जो सचमुच धार्मिकता की भूखी और प्यासी थीं, ऐसे खतरनाक सिद्धान्तों के कारण भटक गईं जिन्होंने विश्वास के जीवन और संघर्ष के स्थान पर एक अस्वस्थ निष्क्रियता (क्वाइटिज़्म) को रख दिया था। पुनर्जागरण को इन छिछले जलों में डूबने से बचाने के लिए वेस्ली की पूरी दृढ़ता और विवेक की आवश्यकता थी। उसने इन विचारधाराओं की प्रवृत्ति को देखा, और अपनी पूरी शक्ति से उनका विरोध किया। मार्च 1746 में उसने देखा कि ऐसे सिद्धान्तों के परिणामस्वरूप नॉटिंघम की सोसाइटी अत्यन्त असन्तोषजनक अवस्था में गिर गई है, और उसने तुरन्त उसकी पूरी छानबीन करके उसे सुधारने का प्रयत्न किया। वेडनेसबरी और बर्मिंघम में झूठे सिद्धान्तों ने और भी अधिक विनाश किया था। कुछ विधिविरोधी (एंटीनोमियन) शिक्षकों ने मसीही स्वतन्त्रता को ऊँचा उठाने के बहाने अच्छे कामों की अनावश्यकता और मसीही के लिए व्यवस्था की आज्ञाकारिता से पूर्ण मुक्ति का विचार दूर-दूर तक फैला दिया था। कुछ लोगों ने इन खतरनाक सिद्धान्तों को उनकी चरम सीमा तक पहुँचा दिया था। वेस्ली ने सारे विषय पर एक सार्वजनिक चर्चा में सिद्ध किया कि ऐसी धारणाएँ हर प्रकार की स्वच्छन्दता का द्वार खोल देती हैं। इन शोचनीय परिणामों को उजागर करना उन्हें रोकने का सर्वोत्तम उपाय था।
लंदन में वेस्ली को एक धर्मोन्मत्त दल से जूझना पड़ा जो दावा करता था कि उसे भविष्यवाणी और अन्य भाषाओं का वरदान मिला है। इन बेतुके दावों का खण्डन करना कठिन नहीं था। तथाकथित भविष्यद्वक्ताओं में से एक ने बोलने का प्रयास किया
122 संघर्ष और सफलताएँ।
लातीनी में, और प्रयास में लड़खड़ा गया। वेस्ली ने कहा, "उस बेचारे ने हमारे सामने सिद्ध कर दिया कि कम-से-कम उसने अपनी बुलाहट को ग़लत समझ लिया था।"
1746 के वसन्त में वेस्ली ने दक्षिण-पश्चिम का दौरा किया, जहाँ उसके परिश्रम पर फिर बड़ी आशीष हुई। वेल्स ने उसका हार्दिक स्वागत किया, और कॉर्नवाल, जो पिछले वर्ष इतनी परीक्षाओं का स्थल रहा था, मानो भरपाई करने का प्रयत्न कर रहा था। भीड़ ने उसे एक बार भी नहीं सताया, और उसे यह आनन्द मिला कि उसके सताने वालों में से बहुत-से मन फिरा चुके थे। सोसाइटियाँ सर्वत्र अधिक सुदृढ़ होती जा रही थीं, और ऐसे स्पष्ट चिह्न थे कि जो कार्य किया गया था वह टिकाऊ प्रकृति का था।
सर्दी लौटने पर वह फिर उत्तर की ओर चल पड़ा, मौसम की कठोरता की परवाह न करते हुए, जिसका उसे पूरी तीव्रता में सामना करना पड़ा। परन्तु अपने मार्ग में पड़ने वाली सोसाइटियों में जिस आनन्ददायक प्रगति को उसने देखा, उससे इन कष्टों की क्षतिपूर्ति उसे भरपूर हुई। 24 फरवरी, 1747 को वह लिखता है,
"दोपहर को मैंने टेटनी की छोटी सोसाइटी की जाँच की। इंग्लैंड में मैंने ऐसी दूसरी नहीं देखी। क्लास-पत्र में (जो निर्धनों के लिए दिए गए चन्दे का लेखा देता है) मैंने देखा कि कोई सप्ताह में आठ पेंस देता है, प्रायः दस पेंस; कोई तेरह, पन्द्रह या अठारह पेंस; कोई कभी एक, कभी दो शिलिंग। मैंने अगुवे मीका एल्मूर से पूछा,
(जो सचमुच इस्राएली था, और अब अपने परिश्रम से विश्राम कर रहा है,) 'यह कैसे हो रहा है? क्या आप सारे इंग्लैंड की सबसे धनी सोसाइटी हैं?' उसने उत्तर दिया, 'मेरे विचार से नहीं; परन्तु हम सब जो अविवाहित हैं, आपस में सहमत हुए हैं कि अपने आपको और जो कुछ हमारे पास है वह सब परमेश्वर को दे दें: और हम यह आनन्द से करते हैं; इसके द्वारा हम समय-समय पर टेटनी आने वाले सब अजनबियों का सत्कार कर पाते हैं: जिनके पास प्रायः खाने को भोजन नहीं होता, और न कोई मित्र होता है जो उन्हें ठहरने की जगह दे।'" ऐसे अनुयायियों के साथ
मेथोडिज़्म भविष्य का निडर होकर सामना कर सकता था: उसकी नियति व्यावहारिक रूप से तय हो चुकी थी।
उत्तर में कार्य। 7 123 उत्तरी सोसाइटियाँ सामान्यतः समृद्ध अवस्था में थीं। न्यूकासल में, जहाँ सदस्यों के बीच पूर्ण सामंजस्य था, वेस्ली ने पाया कि सामान्य मण्डली के दायरे से बाहर भी बहुत-से लोग प्रचार की सराहना करते थे, और उच्च वर्गों में भी पूर्वाग्रह घट रहा था। उसने नए स्थानों का दौरा किया, जहाँ उसके परिश्रम ने स्थायी कार्य की नींव डाली, और इन नई रुचियों को अपने भ्रमणशील प्रचारकों की देखरेख में सौंप दिया, जिनकी संख्या स्वयं निरन्तर बढ़ रही थी। इनमें से एक, जॉन नेल्सन, जिससे
वेस्ली इस यात्रा के दौरान फिर मिला, अपनी मसीही वीरता और अपनी सेवकाई को मिलने वाली सफलता, दोनों से सदा विशिष्ट बना रहता था। वह अभी-अभी यॉर्क में एक क्रुद्ध भीड़ के हाथों से मानो चमत्कार से बचकर निकला था, जिसने उसे पत्थरों से लगभग मार ही डाला था और उसे अपने ही खून में लथपथ भूमि पर पड़ा छोड़ दिया था। वेस्ली ने अपने वीर सहकर्मी को सान्त्वना दी, और थोड़ी भेंट के बाद अपनी यात्रा फिर आरम्भ की। लीड्स में, जहाँ नेल्सन ने मेथोडिज़्म पहुँचाया था, वेस्ली के प्रचार ने गहरी रुचि जगाई और लोगों की भीड़ खींच ली। कीग्ली में, जहाँ पिछली भेंट में उसने दस सदस्यों की एक सोसाइटी बनाई थी, उसने दो सौ पाए। मैनचेस्टर के विशाल औद्योगिक नगर में उसने खुले में कई हज़ार लोगों को प्रचार किया। सभा के अन्त की ओर कुछ व्यक्तियों ने उसे टोका, और धमकी दी कि यदि वह न रुका तो दमकल निकालकर उस पर पानी की धार छोड़ेंगे।
यह हल्का-सा अनिष्ट ही उसकी उत्तरी यात्रा में वेस्ली को झेलना पड़ा लगभग एकमात्र अनिष्ट था। जनभावना अनेक स्थानों में उसके पक्ष में बहुत बदल गई थी। जो उपद्रव हुए भी, उन्हें शीघ्र दबा दिया गया, और कभी-कभी स्वयं आक्रमणकारियों ने ही दबा दिया। 1747 की ग्रीष्म में दक्षिण-पश्चिम की उसकी यात्रा के दौरान ऐसा ही हुआ। 27 जून को प्लिमथ में वह लिखता है, "संध्या के लगभग छह बजे मैं 124 संघर्ष और सफलताएँ। उस स्थान पर गया जहाँ पिछले वर्ष प्रचार किया था। भजन समाप्त होने से कुछ पहले, एक प्रसिद्ध व्यक्ति, लेफ़्टिनेंट, सैनिकों, ढोल बजाने वालों और भीड़ के अपने दल-बल के साथ आया। जब ढोल थमे, तो एक भद्र नाई बोलने लगा; परन्तु उसकी आवाज़ शीघ्र ही भीड़ के चिल्लाने में डूब गई, जो संख्या बढ़ने के साथ और अधिक उग्र होती गई। लगभग पन्द्रह मिनट प्रतीक्षा करने के बाद, भीड़ की हिंसा को बढ़ता देखकर,
मैं सबसे घनी भीड़ में उतर गया, और भीड़ के सरदार का हाथ पकड़ लिया। उसने तुरन्त कहा, 'श्रीमान, मैं आपको सुरक्षित घर पहुँचाऊँगा: श्रीमान, कोई आपको हाथ नहीं लगाएगा। सज्जनो, हटो; पीछे हटो! जो पहला आदमी इन्हें छुएगा मैं उसे गिरा दूँगा।' हम बड़ी शान्ति से आगे चले; मेरा मार्गदर्शक बीच-बीच में गर्दन ऊँची करता (वह बहुत लम्बा आदमी था) और चारों ओर देखता, कि कहीं कोई अभद्रता तो नहीं कर रहा, जब तक कि हम श्री हाइड के द्वार तक नहीं पहुँच गए। फिर हम बड़े प्रेम से विदा हुए। उसके जाने के बाद मैं लगभग आधे घंटे तक गली में लोगों से बातें करता रहा, जो अब अपना क्रोध भूल चुके थे, और बड़े प्रसन्न मन से चले गए।"
ऐसी घटनाओं को आसानी से बढ़ाया जा सकता है।
वे वेस्ली की वाणी और व्यवहार की लगभग मोहक शक्ति को प्रमाणित करती हैं, जिसके प्रमाण हम पहले ही इतने देख चुके हैं। दक्षिण-पश्चिमी काउंटियों का वर्तमान दौरा वेस्ली के मन को अत्यन्त सुखद लगा। वह कहता है, "एक वर्ष ने कॉर्नवाल का दृश्य कैसे आश्चर्यजनक ढंग से बदल दिया है! अब यह शान्तिपूर्ण, बल्कि सम्मानजनक स्थान है। वे लगभग हर जगह हमसे अच्छी बातें करते हैं। हमने क्या किया है कि संसार हमारे प्रति इतना शिष्ट हो?"
वेस्ली के परिश्रम को मिली सफलता उसे नए उद्यमों का प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित किए बिना नहीं रह सकती थी। वह इन यात्राओं से, जिन्होंने उसे इतना आनन्द दिया था, मुश्किल से लौटा ही था कि उसने एक ऐसे अभियान की तैयारी की जिसमें बहुत कष्ट होने की सम्भावना थी, परन्तु जो उसके विश्वास की दृष्टि को बड़ी सफलता की आशा दिखाता था। उसकी सेवकाई का यह
लोकप्रियता। 125 प्रसंग इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसका अलग से उल्लेख आवश्यक है।
आयरलैंड में मेथोडिज़्म।
आयरलैंड, जो कभी सन्तों का द्वीप कहलाता था और बहुत समय तक शेष यूरोप के लिए मिशनों का अग्रदूत रहा, धार्मिक दृष्टि से अपनी दोनों बहनों, स्कॉटलैंड और इंग्लैंड, से बहुत पहले ही पीछे रह गया है। जहाँ इंग्लैंड ने सोलहवीं शताब्दी के सुधार-आन्दोलन के सिद्धान्तों को उत्सुकता से अपनाया, वहाँ आयरलैंड ने उन्हें ग़लत समझा और उनका विरोध किया। इस धार्मिक हीनता के कारण अपमानजनक सामाजिक और राजनीतिक हानियाँ हुई हैं। महान प्राकृतिक प्रतिभाओं से सम्पन्न एक जाति यहाँ अन्धविश्वास की लोहे की बेड़ियों से अपने विकास में रुक गई है। विपत्तियों की उस लम्बी श्रृंखला का, जिसने इसके इतिहास को अभिलेखित इतिहासों में सबसे अधिक शोकमय बना दिया है, कारण केवल इसी को माना जा सकता है।
कोई राष्ट्र खोए हुए अवसरों को विरले ही पुनः प्राप्त करता है, और आयरलैंड संयुक्त
राज्य की अन्य शाखाओं की बराबरी कर पाने की आशा कठिनाई से ही कर सकता है। यदि वह कभी पुनर्जीवित होगा, तो इस कार्य का साधन केवल सुसमाचार ही होना चाहिए। यह वेस्ली का सम्मान है कि उसने इसकी सम्भावना में विश्वास किया, और इसकी सिद्धि के लिए ज़ोरदार परिश्रम में लग गया। उसके समय से पहले आयरलैंड को मसीह की ओर लाने के जो प्रयास किए गए थे, उनमें केवल राजनीतिक तत्त्व इतना अधिक था कि वे अवमानना के पात्र बन गए। एंग्लिकन पादरी, जिन्हें कैथोलिकों के जबरन वसूले चन्दे से सहारा मिलता था, सामान्यतः एक उत्पीड़क सत्ता के निकम्मे कर्मचारी माने जाते थे; और यदि वे बड़े
126 आयरलैंड में मेथोडिज़्म। उत्साह और भक्ति के पुरुष भी होते, तो भी राज्य से उनका सम्बन्ध उनके प्रभाव को बहुत कम कर देता। वेस्ली ने देखा कि जहाँ पादरी अपने कार्य के लिए इस प्रकार दोहरे रूप से अयोग्य ठहरे हैं, वहाँ उसके सामान्य जन-प्रचारकों के कार्य के लिए स्थान है, और जहाँ एक असफल हुआ वहाँ दूसरा सफल हो सकता है।
वह रविवार, 9 अगस्त, 1747 को डबलिन पहुँचा, और उसी दिन दोपहर बाद उसे सेंट मैरी गिरजाघर के मंच पर खड़े होने के लिए आमंत्रित किया गया। उसने "ऐसी रंगीन-मिज़ाज और विवेकहीन मण्डली" को प्रचार किया जैसी उसने कभी देखी थी। दो दिन बाद वह डबलिन के आर्चबिशप से मिलने गया, जिसने
"बहुत-सी आपत्तियाँ उठाईं।" वेस्ली ने दृढ़ता से उत्तर दिया; परन्तु वह भली-भाँति जानता था कि आयरलैंड में भी, इंग्लैंड की तरह, उसे स्थापित
इस पहली भेंट में उसने आयरलैंड की धार्मिक आवश्यकताओं का सही अनुमान लगाने का प्रयत्न किया। उसने देखा कि "मूल आयरिश लोगों में सौ में से कम-से-कम निन्यानवे अपने पूर्वजों के धर्म में बने हुए हैं। प्रोटेस्टेंट, चाहे डबलिन में हों या अन्यत्र, लगभग सब हाल ही में इंग्लैंड से लाकर बसाए गए हैं। और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है," वह आगे कहता है,
"कि जो पोप-मतावलम्बी जन्मे हैं वे सामान्यतः वैसे ही जीते और मरते हैं, जब प्रोटेस्टेंटों को उनका मन फिराने के लिए दण्ड-विधियों और संसद के अधिनियमों से बेहतर उपाय नहीं मिलते।"
लोगों के विषय में उसके पहले प्रभाव अत्यन्त अनुकूल थे: उसने उन्हें अंग्रेज़ों से कहीं अधिक ग्रहणशील पाया। वह उद्गार करता है, "यह कैसा राष्ट्र है! पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे, सब उपदेश के वचन को न केवल धैर्य से, बल्कि कृतज्ञता से ग्रहण करते हैं।" बाद की घटनाओं ने इस पहले प्रभाव को काफ़ी बदल दिया।
वेस्ली से पहले उसके जन-प्रचारकों में से एक, थॉमस विलियम्स, यहाँ आ चुका था, जिसने कुछ ही महीनों में डबलिन में लगभग तीन सौ सदस्यों की एक सोसाइटी संगठित कर ली। रीति के अनुसार उसने प्रत्येक की आत्मिक दशा की अलग-अलग जाँच की। उसने बड़ी मण्डलियों को भी प्रचार किया, चैपल में, जो पहले लूथरन गिरजाघर था, और वेस्ली बंधुओं का स्वागत। 127 खुले में भी। उसके प्रचार का सर्वत्र अच्छा स्वागत हुआ: वास्तव में उसके स्वागत का उत्साह उसके लिए आश्चर्य की बात थी। आयरलैंड में पखवाड़ा बिताने के बाद उसे एक ऐसी प्रजा को छोड़ना पड़ा जो "वर्णन से परे प्रेमपूर्ण" थी, और ऐसा करते हुए उसने निश्चय किया कि भविष्य में इस उपेक्षित देश की आत्मिक आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान देगा।
उनके प्रस्थान के पंद्रह दिन बाद उनके भाई चार्ल्स ने आयरलैंड का दौरा किया। परन्तु इस थोड़े से समय में ही डबलिन की जनता के मन में अचानक एक उलटफेर हो चुका था। भीड़ का आवेश आँधी की तरह फूट पड़ा था और उसने उस छोटी-सी सोसाइटी पर बड़ी कठोरता से प्रहार किया था। याजकों के उकसाने पर रोमन कैथोलिकों ने प्रार्थनालय को लूट लिया था, और मंच तथा बेंचों से अलाव जलाया गया; बहुत-से मेथोडिस्टों का अपमान भी किया गया और उन्हें इससे भी बुरे व्यवहार की धमकियाँ दी गईं।
अधिकारियों ने हस्तक्षेप करने से इनकार करके इन कार्यों में सहभागिता निभाई: महा-निर्णायक मंडल (ग्रैंड जूरी) ने उनके सामने लाए गए दंगाइयों को छोड़ दिया, और इस प्रकार उन्हें फिर से अपना काम शुरू करने के लिए बढ़ावा दिया, जो उन्होंने करने में चूक नहीं की। चार्ल्स वेस्ली को ऐसी भीड़ के उग्र आक्रमणों का सामना करना पड़ा जिसका क्रोध उन्हें अनसुनी ज्यादतियों तक ले गया। इन मुठभेड़ों में एक से अधिक बार लहू बहा और जीवन की निर्ममता से बलि चढ़ाई गई, और बहुत-से लोगों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार हुआ कि वे अपनी चोटों के कारण मर गए। चार्ल्स वेस्ली की रक्षा करने का प्रयास करते हुए एक सिपाही को पैरों तले कुचलकर मार डाला गया, और उन्मत्त भीड़ ने उसकी लाश को गलियों में घसीटा और फिर एक सार्वजनिक स्थान पर लटका दिया।
हत्यारों पर मुकदमा चलाया गया, परन्तु वेस्ली के शब्दों में "सदा की तरह" वे बरी कर दिए गए। परमेश्वर के जन का विश्वास और साहस इस सारे विरोध के बाद भी बना रहा, और ज्यों ही सताव समाप्त हुआ, कार्य शांतिपूर्वक आगे बढ़ने लगा।
यह अब केवल डबलिन तक सीमित नहीं रहा: इस समय से साहसी प्रचारक देश की लंबाई-चौड़ाई में घूमे, और कठिनाइयों के बावजूद उनके परिश्रम को
128 आयरलैंड में मेथोडिज़्म। भरपूर सफलता का प्रतिफल मिला। चार्ल्स वेस्ली के सुंदर भजन-गायन को इस संगीत-प्रेमी जाति में बहुत पसंद किया गया, और उसने प्रायः बहुत-से श्रोताओं को आकर्षित किया। दो विशेष किस्से यह दिखाएँगे कि मेथोडिस्ट गीतों का आयरलैंड के लोगों के मन पर क्या प्रभाव पड़ा।
वेक्सफ़ोर्ड में रोमन कैथोलिकों से सताई हुई छोटी-सी सोसाइटी एक खलिहान में गुप्त रूप से इकट्ठी होती थी। पड़ोस के एक उत्पाती व्यक्ति ने अपने साथियों से वादा किया कि वह सभा से पहले खलिहान में छिप जाएगा और सभा आरंभ होते ही उनके लिए द्वार खोल देगा। छिपने के लिए उसे एक पुरानी बोरी के सिवा कुछ न मिला।
ज्यों ही गायन शुरू हुआ, उस आयरलैंडवासी पर उसकी शक्ति और सुंदरता का ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह जिस उद्देश्य से आया था उसे भूल गया और अंत तक सुनता रहा। भजन समाप्त होने पर उसने प्रार्थना सुनी, और उसका हृदय, जो पहले ही कोमल हो चुका था, पिघलने लगा। बेचारा मनुष्य अपनी मूर्खता पर पछतावे से भर गया, उसका शरीर काँप उठा, और उसकी वेदना की कराहों ने लोगों का ध्यान उस स्थान की ओर खींचा जहाँ से वे आ रही थीं। उस गँवार और अशिक्षित मंडली का पहला विचार यह था कि कोई शैतानी शक्ति काम कर रही है, परन्तु निकट से जाँच करने पर बोरी में वह अभागा आयरलैंडवासी मिला, जो वेदना से अभिभूत होकर पूरे मन से प्रार्थना कर रहा था। स्पष्टीकरण हुआ: उस बेचारे ने लोगों से अपने लिए प्रार्थना करने को कहा, और उस दिन से उसने सच्चे मन-फिराव का प्रमाण दिया और वेक्सफ़ोर्ड की सोसाइटी का एक स्थिर सदस्य बना रहा।
लगभग उसी समय एक सराय-स्वामी, जो संगीत का बड़ा प्रेमी था, गायन सुनने के लिए एक सभा में आया। यह डरकर कि सभा के अन्य भागों का उस पर कहीं प्रभाव न पड़ जाए, गायन रुकते ही उस बेचारे ने अपनी उँगलियाँ कानों में डाल लीं। उसकी नाक पर एक मक्खी आ बैठी, जिसने उसे अपना हाथ कान से हटाने को विवश कर दिया, और ठीक उसी क्षण प्रचारक ये शब्द कह रहा था, "जिस के सुनने के कान हों वह सुन ले।" उसकी जिज्ञासा जाग उठी: उसने कुछ देर और सुनने का निश्चय किया, और मेथोडिस्ट भजन-गायन। 129 सुसमाचार के सत्यों ने उसके विवेक को ऐसा झकझोरा कि वह मन-फिराव और उद्धार तक पहुँचा।
ये किस्से दिखाते हैं कि कैथोलिक आयरलैंड में मेथोडिज़्म को जिन लोगों से काम पड़ा वे कितने अशिष्ट और अशिक्षित [अस्पष्ट मूल पाठ] "Nneulbimted" [मूल शब्द अस्पष्ट; संदर्भ से आशय "अशिक्षित/असंस्कृत" प्रतीत होता है] थे। यहाँ अज्ञान के साथ अंधविश्वास भी जुड़ गया था, और उसने ऐसी बाधाएँ खड़ी कीं जो सत्य की प्रगति के विरुद्ध सदा बहुत बड़ा काम करती रहेंगी। सौभाग्य से, इन पूर्वाग्रहों के नीचे एक उदार और संवेदनशील स्वभाव छिपा था, जो सुसमाचार के सादगी और सामर्थ्य के साथ प्रचारित होने पर उसे सहज ही ग्रहण कर लेता था।
मार्च 1748 में आयरलैंड की अपनी दूसरी यात्रा पर जॉन वेस्ली का बहुत हार्दिक स्वागत हुआ।
डबलिन पहुँचकर वे तुरंत उस उपासना-स्थल पर गए जहाँ उनके भाई चार्ल्स सोसाइटी की सभा कर रहे थे।
उन्होंने बोलना आरंभ किया, परन्तु कुछ क्षणों तक उनकी आवाज़ इस भावुक जनता के "चिल्लाने और परमेश्वर की स्तुति करने" के शोर में दब गई। आयरलैंड में बिताए तीन महीनों में उन्होंने देश के बड़े भाग की यात्रा की, हर सुबह पाँच बजे प्रचार किया, और सामान्यतः लोगों की सद्भावना का आनंद लिया। जो तूफ़ान सोसाइटी पर टूटा था उसका परिणाम मानो वातावरण को शुद्ध करने के सिवा और कुछ न था।
जहाँ-जहाँ वेस्ली गए, उन्होंने खुले आकाश के नीचे ध्यान से सुनने वाली मंडलियों में प्रचार किया, जिनमें प्रोटेस्टेंटों के साथ कैथोलिक भी थे। एथलोन में उन्होंने एक खिड़की से विशाल भीड़ को संबोधित किया। उनमें अधिकतर कैथोलिक थे, और वचन सुनने की उनकी उत्सुकता ऐसी थी कि उन्होंने अपनी पत्रिका में यह टिप्पणी लिखी: "मैंने शायद ही कभी इससे अधिक सुव्यवस्थित या ध्यान से सुनने वाली मंडली देखी हो। सच तो यह है कि आयरलैंड के लोगों जैसे सभ्य लोग मैंने सामान्यतः न यूरोप में देखे, न अमेरिका में।" दो दिन बाद लोगों का रूप
देखकर वे और भी चकित हुए: "मंडली का बड़ा भाग आँसुओं में था।" वे कहते हैं, "लगभग सारा नगर प्रभावित, सद्भावना और उद्धार की अभिलाषा से भरा प्रतीत हुआ।" परन्तु वे ऐसे प्रदर्शनों से धोखा नहीं खाए।
130 आयरलैंड में मेथोडिज़्म। उन्होंने कहा, "जल इतना फैल गया है कि गहरा नहीं हो सकता।" उसी समय से उन्होंने आयरिश स्वभाव की विशेष कठिनाइयों को पहचान लिया, जो इतना स्पष्टवादी होकर भी इतना चंचल है। वे लोगों की मात्र सद्भावना से, चाहे वह कितनी भी सर्वसम्मत हो, बिल्कुल संतुष्ट नहीं थे, और उन्होंने इस सुंदर बाहरी रूप के नीचे छिपी धार्मिक उदासीनता की जड़ पर प्रहार करने का परिश्रम किया। इस उद्देश्य से उन्होंने अपने प्रचार की शैली बदली और व्यवस्था के भय को उनके मन के सामने लाने का प्रयत्न किया। वे कहते हैं, "मैंने जितनी दृढ़ता से हो सका, प्रभु के भय का प्रचार किया। फिर भी जो हर शब्द को निगल जाने को तैयार रहते हैं, वे उसके किसी भाग को पचाते नहीं दिखते।"
फिर भी, एथलोन में उन्हें बड़ा प्रोत्साहन मिला, और उन्होंने एक फलती-फूलती सोसाइटी की नींव डाली। जब उनके जाने का समय आया, तो इतने स्नेह और आदर से भरे लोगों से विदा लेना उन्हें बहुत कठिन लगा: आँसुओं में डूबी भीड़ उनके साथ चली, और विदाई का दृश्य बहुत हृदयस्पर्शी था। वह महान प्रचारक, जिसका जीवन ऐसे ही दृश्यों से भरा था, स्वयं भी गहराई से द्रवित हुआ। हर स्थान पर उन्होंने वैसी ही कोमलता देखी। फिलिप्सटाउन में उन्हें एक छोटी सोसाइटी मिली, जो अधिकांशतः छावनी के सैनिकों से बनी थी, और जिनका स्वभाव बहुत सराहनीय था। क्लारा में पहली बार जब उन्होंने प्रचार किया, तो उनकी मंडली में मुख्यतः धनी लोग थे, जिनमें से कुछ अपनी गाड़ियों में आए थे।
एक और अवसर पर उन्होंने एक अत्यंत लोकप्रिय राष्ट्रीय खेल से सफलतापूर्वक होड़ ली, अर्थात् एक "प्रसिद्ध मुर्गों की लड़ाई, जिसमें लगभग सारा देश चारों ओर से आ रहा था।...वे कहते हैं, "एक-दो सौ लोग रुके, कुछ देर सुनते रहे, और अपना मनोरंजन भूल गए।" लिमरिक में जिस स्थान पर उन्हें सभा करनी थी वहाँ नाच आरंभ हो चुका था। यद्यपि उन्हें रुक जाने की सलाह दी गई, वे डटे रहे, और एक-एक करके नाचने वाले अपना विचार छोड़कर
कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट। 131 उनकी मंडली में आ मिले। टुलामोर में जब वे खुले आकाश के नीचे विशाल भीड़ को प्रचार कर रहे थे, तब भयंकर ओलावृष्टि आई; और न केवल कोई नहीं गया, बल्कि अधिकांश लोग नंगे सिर बैठे रहे, यद्यपि वेस्ली ने उनसे टोपियाँ पहनने को कहा।
उनके श्रोताओं में प्रायः याजक भी होते थे; और वे सामान्यतः उनके विरुद्ध युद्ध घोषित करते थे। एथलोन का याजक अपने लोगों को उस महान मिशनरी के पीछे चलने से रोकने आया, और उनमें से काफ़ी लोगों ने अच्छी भेड़ों के झुंड की तरह अपने आप को हाँककर बाड़े में ले जाने दिया।
प्रोटेस्टेंट सामान्यतः याजकों के विरुद्ध उनका पक्ष लेते थे, और जब एक दिन एक कार्मेलाइट साधु ने उन्हें यह चिल्लाकर टोका, "तू झूठ बोलता है! तू झूठ बोलता है!" तो अपने धर्म के सम्मान के लिए उत्साही प्रोटेस्टेंटों ने उस साधु को भगा दिया। फिर भी एक से अधिक बार प्रोटेस्टेंट रोमन
कैथोलिकों के साथ मिलकर इस नए कार्य की प्रगति का विरोध करने लगे। दूसरी ओर, एक अवसर पर वेस्ली को एक याजक द्वारा अपना बचाव किए जाने का सम्मान मिला। यह उनकी एक खुले आकाश की सभा में हुआ, जब जनता की विविध भावनाएँ स्वाभाविक रूप से अधिक स्वतंत्रता से प्रकट हो रही थीं। एक प्रोटेस्टेंट ने पुरानी निंदा दोहराई, और चिल्लाया, "हाँ, यह जेसुइट है; यह स्पष्ट है!" वहाँ उपस्थित एक याजक ने ऊँची आवाज़ में उत्तर दिया, "नहीं, यह नहीं है; काश परमेश्वर करता कि यह होता!"
जब वेस्ली ने आयरलैंड छोड़ा, तब उन्होंने कई पूरी तरह संगठित सोसाइटियाँ और प्रचारकों की एक अच्छी-खासी टोली पीछे छोड़ी। उनके भाई ने, जिसने कुछ ही समय बाद इस क्षेत्र का निरीक्षण-कार्य सँभाला, कॉर्क का दौरा किया, जो दक्षिण-पश्चिम का एक महत्वपूर्ण नगर था और आयरिश मेथोडिज़्म का रणक्षेत्र बनने वाला था। आरंभ में उन्हें बड़ी सफलता मिली; उनकी मंडलियाँ दस हज़ार तक पहुँचीं, और उन्होंने दो सौ सदस्यों की एक सोसाइटी बनाई, जिसके धार्मिक चरित्र को उन्होंने अत्यंत सतही बताकर शिकायत की। परन्तु इस कार्य में दृढ़ता की जो भी कमी रही हो, वह सताव की सहायता से प्राप्त होने वाली थी।
क 2 132 आयरलैंड में मेथोडिज़्म।
लोगों ने शीघ्र ही अपना मन बदल लिया, और सच्ची आयरिश चंचलता के साथ मित्रता से क्रोध तक पहुँच गए। चार्ल्स वेस्ली को नगर छोड़े मुश्किल से कुछ ही समय हुआ था कि लोग बटलर नामक एक घुमंतू नौटंकीबाज़ के नेतृत्व में मेथोडिस्टों के विरुद्ध उठ खड़े हुए, जिसके दर्शक प्रचार के कारण घट गए थे। इस मदारी ने मसीहियों के विरुद्ध धर्मयुद्ध का प्रचार किया: वह नगर की गलियों में याजकीय वेश धारण किए दिखाई देता था, उसके हाथ में एक बाइबल और अपवित्र गीतों का एक पुलिंदा होता था: वह हर वर्ग के निठल्ले और विलासी लोगों को इकट्ठा करता और प्रचारकों के विरुद्ध हर प्रकार की बेतुकी निंदाएँ उगलता था। कुछ वाचालता का वरदान पाए होने के कारण यह मसखरा कॉर्क में एक नामी व्यक्ति बन गया, और कुछ समय तक अपने उग्र भाषणों और बेशर्म झूठों के बल पर निम्न वर्ग के लोगों के मन पर पूरी तरह छा गया।
उसके झूठे वर्णनों से बहके हुए लोगों ने अक्षम्य अत्याचार किए। डंडों और तलवारों से लैस लोगों के दल नगर में गश्त लगाते और मेथोडिस्टों के घरों में घुस जाते: जिन पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों पर उस घृणित पंथ के होने का संदेह था, उन पर सड़क में सशस्त्र टोलियाँ टूट पड़ती थीं, और उनमें से बहुतों को गंभीर चोटें आईं। सड़क पर आम पुकार थी, "स्वैडलर के सिर के लिए पाँच पाउंड!" * महापौर इन उपद्रवों को बढ़ावा देता था। सताए हुए लोगों ने उससे सुरक्षा की गुहार लगाई, परन्तु व्यर्थ: उनमें से एक ने, जिसने शिकायत की कि दंगाइयों ने उसके घर को लूट लिया है, उसका उत्तर यह था, "यह तुम्हारा अपना दोष है कि तुमने इन प्रचारकों को आश्रय दिया! यदि तुम उन्हें अपने घर से निकाल दो,
तो मैं वचन देता हूँ कि कोई हानि नहीं होगी, परन्तु यदि तुम उन्हें नहीं निकालोगे, तो जो मिले उसे सहना पड़ेगा।"
भीड़ की उपस्थिति में कहा गया यह असामयिक वचन * "यह नाम पहले श्री सेन्निक को एक पोप-पंथी याजक ने दिया था, जिसने उन्हें एक शिशु का, जो swaddling clothes (लपेटने के कपड़ों) में लपेटा गया था, ज़िक्र करते सुना था; और संभवतः उसे यह पता न था कि यह अभिव्यक्ति बाइबल में है, एक ऐसी पुस्तक जिससे वह बहुत परिचित न था।"
कॉर्क में सताव। 133 आग में तेल डालने के समान था, और केवल निकृष्टतम भावनाओं को भड़का सकता था। बटलर ने इसका लाभ उठाकर अपने मूर्खतापूर्ण भाषण जारी रखे: उसने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि मेथोडिस्टों की हत्या करना वैध और पुण्य का कार्य है।
सामान्य न्यायालयों ने सताए हुओं का पक्ष लेने का साहस नहीं किया। उन्होंने न केवल सताने वालों को बरी किया, बल्कि सताए हुओं पर ही अभियोग भी लगाया। नगर के अभिलेखों में आज भी यह उल्लेखनीय प्रतिवेदन सुरक्षित है, "हम चार्ल्स वेस्ली को कुख्यात, आवारा और महामहिम की शांति का सामान्य भंगकर्ता पाते और प्रस्तुत करते हैं, और हम प्रार्थना करते हैं कि उसे देश-निकाला दिया जाए।" मेथोडिस्टों ने उच्चतर न्यायालय में अपील की और राजा के न्यायाधीशों से पूरा न्याय पाया। जब बटलर इस मुकदमे के पहले गवाह के रूप में उपस्थित हुआ, तो इस प्रश्न पर,
"तुम्हारा व्यवसाय क्या है?" उसने उत्तर दिया, "मैं गाथा-गीत गाता हूँ।"
न्यायाधीश ने क्रोध में हाथ उठाकर कहा, "देखो, छह भद्रपुरुषों पर आवारा होने का अभियोग लगाया गया है, और पहला अभियोक्ता पेशे से आवारा है!"
इस बरी होने के बावजूद भीड़ का राज चलता रहा; और जब 1750 में जॉन वेस्ली कॉर्क आए, तो उन पर भयंकर हिंसा से आक्रमण हुआ। महापौर, जिससे उन्होंने सुरक्षा माँगी, केवल इतने से संतुष्ट रहा कि सभा जितनी देर चली, प्रार्थनालय के सामने नगर के ढोल बजवाता रहा। "शांति बनाए रखने" की इस चतुर विधि का परिणाम यह हुआ कि भीड़ और जमा हो गई। वेस्ली पर टूट पड़ने के बाद, जिन्होंने अपनी सामान्य उपस्थित-बुद्धि दिखाई, उन्होंने प्रार्थनालय पर हमला किया,
"सारी सीटें और बेंचें बाहर निकाल लाए, फर्श, दरवाज़ा, खिड़कियों के चौखटे और जो कुछ भी लकड़ी का काम बचा था उसे उखाड़ फेंका; उसका कुछ भाग वे अपने उपयोग के लिए ले गए, और शेष को उन्होंने खुली सड़क पर जला दिया।"
अगले दिन वेस्ली को कॉर्क की गलियों में अपना पुतला जलाए जाने का "सम्मान" मिला।
इस समय से, दो वर्ष पहले जिन निंदनीय दृश्यों ने 134 आयरलैंड में मेथोडिज़्म। नगर को कलंकित किया था, वे प्रतिदिन दोहराए जाने लगे। कोई दिन ऐसा नहीं जाता था जब लोगों या संपत्ति पर नए आक्रमण न होते हों। "एक
रोजर ओ'फेरल ने सार्वजनिक बाज़ार (एक्सचेंज) में विज्ञापन चिपकाया कि वह किसी भी भीड़ का नेतृत्व करने को तैयार है, ताकि किसी भी ऐसे घर को गिराया जा सके जो स्वैडलर को आश्रय देने का साहस करे।"
महापौर ने एक अनोखी युक्ति अपनाई, जिससे वह अपना कर्तव्य निभाता प्रतीत होता था, परन्तु वास्तव में मेथोडिस्टों को भीड़ की दुर्भावना के हवाले कर देता था। एक दिन जब उससे सहायता की प्रार्थना की गई, तो वह सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ उपद्रव-स्थल पर आया, और भीड़ से बोला, "लड़कों, मैं एक बार, दो बार, तीन बार कहता हूँ कि घर जाओ: अब मैंने अपना काम कर दिया।" फिर वह सैनिकों को साथ लेकर लौट गया, जबकि लोग नगर के प्रथम न्यायाधिकारी से इस प्रकार मिले प्रोत्साहन से अत्यधिक संतुष्ट थे।
पड़ोस के नगर बैंडन में एक शराबी पादरी "निम्न कोटि के लंपट लोगों" की टोली के साथ प्रचार में विघ्न डालने आया। वेस्ली कहते हैं, "मेरे लगभग पंद्रह मिनट बोल चुकने के बाद, एक पादरी ने, जो मेरे पास ही आ खड़ा हुआ था, हाथ में एक बहुत बड़ी छड़ी लिए, पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार दृश्य का आरंभ किया।...परन्तु उसने अधिक शब्द कहे भी न थे कि दो-तीन दृढ़ निश्चयी स्त्रियों ने पूरे ज़ोर से उसे एक घर में खींच लिया; और थोड़ा समझाने-बुझाने के बाद उसे बगीचे के रास्ते से बाहर भेज दिया।"
कॉर्क में इतने समय से जो उत्तेजना छाई थी, वह उन मसीहियों की दृढ़ता के सामने, जिन्हें क्लेश ने केवल सुदृढ़ किया था, धीरे-धीरे घटी और मिट गई। छावनी के बहुत-से सैनिक सभाओं में आते थे: उनमें से बहुतों ने मन फिराया, और सभाओं में उनकी उपस्थिति दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को भय में रखने में सहायक हुई।
सताव से सुदृढ़ हुए मेथोडिज़्म ने कॉर्क में बड़ी सफलता पाई, जहाँ वह आज भी फल-फूल रहा है। बाद की यात्राओं में वेस्ली ने पाया कि लोगों का उनके प्रति भाव बहुत बदल गया है: प्रमुख
सताव का अंत। 135 होटल में महापौर ने स्वयं उनका स्वागत किया। वास्तव में कॉर्क में मेथोडिज़्म ने इतनी तेज़ी से पैर जमाए कि जिस सताव का हमने वर्णन किया उसके केवल पाँच वर्ष बाद वेस्ली इस नगर से ऐसे डरने लगे जैसे वह कैपुआ हो, जहाँ उनके प्रचारकों के निर्बल हो जाने का खतरा था।
इसी प्रकार की प्रगति एक साथ पूरे आयरलैंड में अनेक स्थानों पर हुई। न केवल दक्षिणी काउंटियाँ, बल्कि अल्स्टर के पहाड़ी इलाके भी समर्पित मिशनरियों द्वारा सुसमाचार से परिचित कराए गए, जिनके उत्साह ने कष्ट और संकट को तुच्छ जाना। उन्होंने सर्वोत्तम उद्देश्य के लिए अपनी सर्वोत्तम सेवा दी। आयरलैंड में आरंभिक मेथोडिज़्म का इतिहास वीरता के कार्यों से भरा है, जो दिखाते हैं कि जीवित विश्वास के प्रभाव में आत्मा निःस्वार्थ उत्साह की कितनी ऊँचाई तक उठ सकती है। इस पवित्र उद्यम के पहले अगुवों में से एक अपने मसीही सिद्धांतों के लिए लगभग शहीद ही हो गया: उसका नाम मैकबर्नी था, और उसने कई महीनों तक उन चोटों का कष्ट सहा जो उसे उस भीड़ से मिली थीं जो उसके विश्वासयोग्य प्रचार से क्रुद्ध थी। "परमेश्वर तुम्हें क्षमा करे!
मैं तो करता हूँ," यह उसकी वह प्रार्थना थी जो उसने उन लोगों के लिए की, जब वे उसे अपने पैरों तले रौंद रहे थे।
आयरलैंड के कैथोलिकों में प्रचार करते समय वेस्ली के प्रचारकों में, स्वयं उन्हीं की तरह, इतना विवेक था कि वे रोमन मत की भूलों पर विवाद से बचे रहे और मुख्यतः सुसमाचार के प्रमुख सत्यों तक सीमित रहे। इस प्रकार शिक्षा से उपजे पूर्वाग्रहों से लड़ने के बजाय विवेक की वाणी को जगाने का प्रयत्न करते हुए, वे बहुत-से रोमन कैथोलिकों को मसीह तक पहुँचाने में सफल हुए।
मन फिराने वालों में से एक, थॉमस वॉल्श, अपने ही देश में मेथोडिज़्म का प्रेरित बना। साउदी कहते हैं, "उसके जीवन ने कैथोलिकों को दिखा दिया कि उनके अपने संतों के सिवा और भी संत हैं।" उसकी सेवकाई को जो सफलता मिली, वह जितनी उसके पवित्र जीवन और सौम्य स्वभाव के आकर्षण के कारण थी, उतनी ही उसकी सुसंस्कृत बुद्धि के वरदानों के कारण भी। जहाँ उसकी सफलता बड़ी थी, वहाँ उसके कष्ट, यदि संभव हो तो, उससे भी बड़े थे: याजकों ने उससे बदला लेने की शपथ खाई, 136 तीव्र प्रगति। और परमेश्वर के इस पवित्र जन पर अपने प्रहारों से उन्होंने लोगों की भावनाओं को भड़काया: उसका जीवन प्रायः संकट में रहता था। उसका नाम आयरलैंड में मेथोडिज़्म की स्थापना के साथ अटूट रूप से जुड़ा हुआ है।
अब हम इंग्लैंड में वेस्ली के परिश्रम के वर्णन को फिर आरंभ करेंगे। अब एंग्लिकन पादरियों में से कुछ की ओर से उनके प्रति थोड़ी सहानुभूति प्रकट होने लगी थी, यद्यपि उनका बड़ा समुदाय अब भी, आरंभ की तरह ही, अत्यंत कटुता से उनका विरोध करता रहा। इस अध्याय में समाविष्ट काल में वेस्ली को जॉन हॉजेस, हेनरी पियर्स,
सैमुअल टेलर और जॉन मेरिटन से बहुत मूल्यवान सहायता मिली, ये सब उनके पहले सम्मेलन में उपस्थित थे। सेंट बार्थोलोम्यू के गिरजे के रेक्टर बेटमन ने, अपने सहकर्मी सेवकों को इससे जो अप्रसन्नता हुई उसकी परवाह न करके, उनके लिए अपना मंच खोल दिया; और महानगर के निवासी उस पवित्र मंच से उन सत्यों को सुनकर चकित हुए जो अधिकतर केवल सार्वजनिक स्थानों में ही सुनाए जाते थे। कॉर्नवॉल के सेंट जेनिस के उत्कृष्ट रेक्टर थॉम्पसन भी वेस्ली के सर्वोत्तम मित्रों में से थे, और उस काउंटी में भड़के सतावों के बीच उन्होंने उनकी बड़ी सेवा की। उस धर्मक्षेत्र के सभी पादरी उनके विरुद्ध खड़े हो गए, और उनके बिशप, उग्र लैविंगटन ने, एक अवसर पर धमकी दी कि यदि वह वेस्ली से संगति करता रहा तो उसका पद छीन लेगा। एंग्लिकन पादरीगण। 18% थॉम्पसन ने अपना चोगा उतारकर उस बिशप के चरणों में फेंक दिया, और कहा, "मैं बिना चोगे के भी प्रचार कर सकता हूँ।"
उतने ही समर्पित सहकर्मी शोरहैम के विकर विन्सेंट पेरोने थे, जो वेस्ली के अत्यंत घनिष्ठ मित्रों में से एक थे।
वे किस प्रकार के मनुष्य थे, यह इस बात से जाना जा सकता है कि उन्होंने अपने पुत्रों के लिए कलीसिया के सम्मान और लाभों की खोज करने की अपेक्षा यह पसंद किया कि वे वेस्ली की घुमंतू सेवा के कष्टों और संकटों का सामना करें। वे सुदृढ़ विवेक और महान विश्वास के मनुष्य थे, मेथोडिस्ट प्रचारकों के मेंटर (मार्गदर्शक) थे, जिनके लिए उनका घर और उनका गिरजा सदा खुला रहता था। चार्ल्स वेस्ली उन्हें अपना आर्चबिशप कहते थे।
यॉर्कशायर में हॉवर्थ के पल्ली-पुरोहित विलियम ग्रिमशॉ पुनरुत्थान के कार्य से और भी घनिष्ठ रूप से जुड़े थे। अपने पल्ली का भार बनाए रखते हुए वे वेस्ली के सहायकों में से एक बने, और उनके एक सर्किट का निर्देशन अपने हाथ में ले लिया। वे "सत्य के सहकर्मी" के रूप में अत्यंत मूल्यवान थे, और मेथोडिस्ट प्रचारकों के अभावों के साथ-साथ उनकी सफलता में भी भागी थे। जब वेस्ली
यॉर्कशायर जाते, तो ग्रिमशॉ उनके मार्गदर्शक का काम करते, और अपने मित्र को जिन-जिन कष्टों का सामना करना पड़ता था, उन सबका साहस से सामना करते। विशेषकर अगस्त 1748 में उन्हें जनता के एक अत्यंत दृढ़-संकल्प आक्रमण का भार उठाना पड़ा। यह रफ़ली में हुआ, जो ग्रिमशॉ के पल्ली की सीमा पर था। वेस्ली खुले आकाश के नीचे प्रचार कर रहे थे, जब एक क्रुद्ध भीड़ ने, जिसने उन्हें घेर लिया और उन पर हिंसक हाथ डाले, उन्हें रोक दिया। झगड़े के दौरान उन्हें कई भारी चोटें लगीं और उनके प्राण संकट में पड़ गए। एक मजिस्ट्रेट ने उनसे माँग की कि वे वचन दें कि फिर कभी वहाँ नहीं दिखेंगे। वेस्ली ने साहस से उत्तर दिया, "मैं ऐसा वचन देने की अपेक्षा अपना हाथ कटवाना पसंद करूँगा।" एक उन्मत्त भीड़ की दया पर छोड़ दिए जाने पर उन्हें हर प्रकार का 138 तीव्र प्रगति। अपमान सहना पड़ा: वे कीचड़ और गोबर से लथपथ कर दिए गए, और बार-बार भूमि पर पटके गए। उनके साथ चलने वाले मित्रों के साथ तो और भी बुरा व्यवहार किया गया: उनमें से एक को बालों से घसीटा गया, एक को नदी में फेंक दिया गया। ग्रिमशॉ भी नहीं बख्शे गए, और उन्होंने उस समय सताव का वह बपतिस्मा पाया जो बार-बार दोहराया गया।
कुछ वर्ष बाद, 1757 में, परमेश्वर ने पादरियों की पंक्ति में से उत्कृष्ट फ्लेचर के रूप में वेस्ली को एक नया सहायक दिया, ऐसा मनुष्य जिसका मेथोडिज़्म पर प्रभाव बहुत बड़ा था। जॉन विलियम डी ला फ्लेशेयर* अपने चरित्र की उदात्तता, अपने जीवन की पवित्रता और अपनी प्रतिभा की व्यापकता के कारण अठारहवीं शताब्दी के पुनरुत्थान के सबसे प्रभावशाली अगुवों में से एक थे। वे आंदोलन को केवल अपनी स्वीकृति देकर संतुष्ट नहीं हुए: वे उसके साथ पूरी तरह एकरूप हो गए, और उसके सबसे निर्भीक और उपयोगी योद्धाओं में से एक बने। उनका नाम वेस्ली के नाम के साथ अटूट रूप से जुड़ा है, और उन पुरुषों के उस तारामंडल में, जिन्हें
परमेश्वर ने इंग्लैंड को प्रकाशित करने के लिए खड़ा किया, वह सबसे उज्ज्वल और शुद्धतम तारों में से एक बना हुआ है।
ऐसे योग्य पुरुषों के गठबंधन ने वेस्ली को उस अपमान में बड़ी सांत्वना दी जो पादरियों के बहुसमूह ने उन पर उँडेला था। उन्होंने अब तक यह आशा नहीं छोड़ी थी कि वे उन सब को पुनरुत्थान के झंडे के नीचे इकट्ठा कर लेंगे। इसलिए 1756 में उन्होंने "पादरियों को सम्बोधन" प्रकाशित किया, जो एक वाक्पटु घोषणापत्र था, जिसमें उन्होंने अपने पुरोहित-भाइयों की पंक्तियों को उनकी उदासीनता से जगाने और उनकी सद्भावना जीतने का प्रयत्न किया। यह प्रयास सफल नहीं हुआ, और पादरियों ने अपना शत्रुतापूर्ण रुख बनाए रखा।
यद्यपि पुनरुत्थान को नियमित पादरियों की ओर से कोई सहानुभूति नहीं मिली * फ्लेचर का जन्म वो प्रदेश (कैंटन डी वो) के न्योन में हुआ था, और पेरोने उसी देश के शातो-दे में के थे। यह उल्लेखनीय है कि फ्रेंच स्विट्ज़रलैंड ने अंग्रेज़ी मेथोडिज़्म को उसके दो सबसे समर्पित समर्थक दिए।
कॉर्नवॉल और स्कॉटलैंड। 139 जो उस अद्भुत कार्य को समझ नहीं सके जो उनकी आँखों के सामने चल रहा था, प्रचुर
क्षतिपूर्ति संयुक्त राज्य (यूनाइटेड किंगडम) के सब भागों में पाई जाने वाली सफलता में मिल गई।
वेस्ली की पत्रिकाएँ दिखाती हैं कि वे इस अध्याय में समाविष्ट पूरे काल में किस प्रकार सब दिशाओं में देश का भ्रमण करते रहे। इन निरंतर मिशनरी यात्राओं में उनका पीछा करना असंभव है; इतना पर्याप्त होगा कि हम चलते-चलते कुछ
तथ्य चुन लें और पूरे का एक संक्षिप्त सर्वेक्षण कर लें।
कॉर्नवॉल वेस्ली के विशाल धर्मक्षेत्र के सबसे रोचक भागों में से एक बना रहा, और ऐसा भाग जिसने उनके परिश्रम का बड़ा अंश माँगा। सेंट जस्ट इंग्लैंड के पश्चिमी भाग की सबसे बड़ी सोसाइटी, और "इंग्लैंड में सबसे जीवंत" होने का गर्व कर सकता था। फ़ालमाउथ, कैमलफ़ोर्ड और अन्य अनेक स्थानों में जो लोग सताने वाले थे, वे लगभग सब-के-सब समर्पित अनुयायी बन गए थे, और कुछ सच्चे मन-फिराव वाले भी; इनमें वह मनुष्य भी था जो थॉमस मैक्सफ़ील्ड को क़ैद कराने का कारण बना था। ब्रीज में जिस पादरी ने वेस्ली और उनके लोगों के विरुद्ध निंदापूर्ण अफ़वाहें फैलाई थीं, उसने आत्महत्या कर ली थी, और लोगों ने इस घटना को किसी प्रकार का ईश्वरीय न्याय मानते हुए मेथोडिस्टों के प्रति भिन्न भावनाएँ रखना आरंभ कर दिया था। मेथोडिस्टों में अनेक प्रतिभाशाली और उत्साही प्रचारक भी गिने जाते थे, घुमंतू भी और स्थानीय भी। इनमें से एक ने, जो पेशे से ठठेरा था, अपनी वक्तृत्व-क्षमता से वेस्ली को चकित कर दिया: उसके विषय में उन्होंने कहा कि "वह बिना तैयारी के ऐसे प्रवचन दे सकता है जो कुछ विद्वानों के लिखित प्रवचनों के बराबर हैं।"
स्कॉटलैंड, जहाँ वेस्ली 1751 में पहली बार गए, ने उन्हें थोड़ा ही प्रोत्साहन दिया। व्हिटफ़ील्ड ने उन्हें चेताया था कि उनके आर्मिनियन सिद्धांत स्कॉटलैंड के लोगों को पसंद नहीं आएँगे, जिस पर वेस्ली ने उत्तर दिया कि वे
"आर्मिनियनवाद का नहीं, मसीही धर्म का प्रचार करेंगे।" उनकी मंडलियाँ सर्वत्र बहुत ध्यानपूर्वक सुनने वाली, पर बहुत ठंडी थीं। उनकी 140 तीव्र प्रगति। दूसरी यात्रा में उन्होंने प्रेस्बिटेरियन
कलीसिया के मंचों से विशाल श्रोताओं को प्रचार किया: सर्वत्र उनके साथ बहुत सम्मान से व्यवहार हुआ, यद्यपि इतनी संकोचपूर्ण दूरी के साथ कि वे लगभग किसी अंग्रेज़ या आयरिश भीड़ की हूटिंग और पत्थरबाज़ी को ही पसंद करने की बात कहने लगे। इन यात्राओं के परिणामस्वरूप कुछ छोटी सोसाइटियाँ बनीं, परन्तु ये उन व्यापक और सामर्थी आंदोलनों से चिह्नित नहीं हुईं जो सामान्यतः उनकी सेवकाई के साथ चलते थे। इस सफलता की कमी संभवतः आंशिक रूप से स्कॉटलैंड के लोगों के स्वभाव की विशेषताओं के कारण थी, परन्तु उससे भी अधिक उनकी श्रेष्ठतर आत्मिक ज्ञान-दीप्ति के कारण: वहाँ सत्य में इंग्लैंड की तुलना में कम नवीनता थी, और एक बड़ी धार्मिक क्रांति की आवश्यकता भी कम थी।
स्वयं इंग्लैंड में स्थिति उस स्थिति से बहुत भिन्न थी जिसका हम पुनरुत्थान से पूर्व के काल की विशेषता के रूप में वर्णन कर चुके हैं; और वेस्ली 1750 जैसे आरंभिक वर्ष में भी कह सकते थे कि लंदन से न्यूकैसल तक कार्य पूर्ण समृद्धि में है।
बर्मिंघम में, जहाँ अब तक आनंद की अपेक्षा शोक के अवसर अधिक थे, उन्होंने विशाल मंडलियाँ पाईं, जो प्रार्थनालय की क्षमता से कहीं अधिक थीं और जीवन के वचन की प्यासी थीं। वे कहते हैं, "ओह, यहाँ दृश्य कैसे बदल गया है! पिछली बार जब मैंने बर्मिंघम में प्रचार किया था तो चारों ओर से पत्थर बरसे थे। अब यदि कोई गड़बड़ी की जाए, तो गड़बड़ करने वाला प्रचारक से अधिक संकट में होगा।"
विरोध के उन गढ़ों, वेडन्सबरी और डार्लास्टन में, उन्होंने देखा कि प्राचीन सताने वालों का मुख्य भाग परमेश्वर के चकित करने वाले न्यायदंडों की चपेट में आ चुका था, जबकि जो बचे थे वे "अब," वेस्ली के शब्दों में, "मेमनों की तरह थे।" इनमें से पहले नगर में उन्होंने भारी वर्षा के बीच ध्यान से सुनने वाली मंडली को प्रचार किया, जिनमें से एक भी सभा की समाप्ति तक नहीं हिला। यहाँ शीघ्र ही एक नया और बड़ा प्रार्थनालय बना, और वेडन्सबरी मेथोडिज़्म के सबसे सुदृढ़ केंद्रों में से एक बन गया।
मध्य काउंटियाँ। 141 1752 में उन्होंने वेकफ़ील्ड के गिरजे में प्रचार किया, और अपनी वर्तमान स्थिति की तुलना उस स्थिति से किए बिना न रह सके जो चार वर्ष पहले उसी नगर में उनकी थी, जब उनके सबसे समर्पित अनुयायियों ने भी उन्हें अपने घरों में प्रचार करने देने का साहस नहीं किया था, इस भय से कि भीड़ उन घरों को गिरा देगी।
हल के लोगों के स्वभाव में भी उतना ही उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ था। 1752 में उनकी पहली यात्रा पर भीड़ की बुरी भावनाओं का सामान्य विस्फोट हुआ। जब वे खुले आकाश के नीचे प्रचार कर रहे थे, उनके चारों ओर मिट्टी के ढेले और पत्थर बरसे। जब वे समाप्त कर चुके, तो भीड़ हूटिंग और पत्थरों की बौछारों के साथ उनके पीछे उनके ठहरने के स्थान तक आई। कुछ वर्ष बाद भावना पूरी तरह बदल गई, और लोगों में उनका अत्यंत हार्दिक स्वागत हुआ। यह नगर भी अंग्रेज़ी मेथोडिज़्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
1752 में चेस्टर में वेस्ली ने उस प्रार्थनालय के खंडहरों के पास प्रचार किया जिसे भीड़ ने कुछ समय पहले महापौर की मिलीभगत से नष्ट कर दिया था। जब प्रचारक "उस पंथ" के सिद्धांतों की व्याख्या कर रहे थे "जिसके विरुद्ध हर जगह बातें की जाती हैं," तब कोई विघ्न नहीं हुआ। अगले वर्ष जब वे नगर में फिर आए, तो स्थिति और भी अच्छी हो गई थी: नया महापौर उतना ही दृढ़ था जितना पहला ढीला था, और व्यवस्था पूरी तरह फिर स्थापित हो गई थी। सुसमाचार के प्रचार ने शेष कार्य किया, और जब 1759 में वेस्ली वार्षिक घुड़दौड़ के समय उधर से गुज़रे, तो उन्होंने इस परिस्थिति का लाभ उठाया, और एक बड़ी तथा सुव्यवस्थित मंडली पाई।
चार्लटन में विरोध भिन्न प्रकार का था, परन्तु यहाँ भी उस पर विजय पाई गई। पड़ोस के सभी किसानों ने, मेथोडिज़्म की प्रगति से घबराकर, आपस में यह समझौता किया कि "उस मार्ग" के किसी भी व्यक्ति को काम पर नहीं रखेंगे। इस व्यवस्था को सर्वोत्तम संभव रीति से विफल किया गया। इस योजना के प्रवर्तकों में से एक कुछ ही समय बाद स्वयं सत्य से कायल हो गया, और उसने अपना घर प्रचारकों के लिए खोल दिया। उसने अपने मित्रों और उनके सेवकों को सभाओं में बुलाया। 142 तीव्र प्रगति। "इस प्रकार," वेस्ली कहते हैं,
वेस्ली कहते हैं, "शैतान की सारी युक्ति धरती पर गिर पड़ी; और परमेश्वर का वचन बढ़ता गया और प्रबल हुआ।"
हॉर्नबी में मेथोडिस्टों के साथ भी इसी प्रकार का व्यवहार हुआ। उनके मालिकों ने उन्हें अपनी सेवा से निकाल दिया और घोषणा की कि जब तक वे प्रचार छोड़ने को सहमत न होंगे, उन्हें फिर काम पर नहीं रखा जाएगा। परन्तु वे विश्वासयोग्य बने रहे, और अपने विश्वास को छोड़ने के बजाय सांसारिक लाभ त्यागने को तैयार रहे। जब वेस्ली उनसे मिलने गए, तो उन्होंने उन्हें उसी मनोभाव में पाया। उन्होंने नगर के एक छोर पर कुछ छोटे घर बना लिए थे, जहाँ वे लगभग तीस या चालीस की संख्या में साथ रहते थे और अपना एक छोटा मसीही समुदाय बनाए हुए थे।
मैनचेस्टर के बड़े नगर में, जहाँ अधिकारियों की मिलीभगत के कारण प्रचारकों ने भीड़ की हिंसा से बहुत कष्ट उठाया था, वेस्ली ने पाया कि अब सब कुछ शान्त और संयमित है।
इसी काल में उन्होंने उत्तर के एक और बड़े नगर की पहली यात्रा की। लिवरपूल, जिसमें आज पाँच लाख लोग बसते हैं और जो राज्य के प्रमुख नगरों में से एक है, उस समय अपनी शैशवावस्था में था।
यद्यपि वेस्ली के लिए उन अद्भुत आयामों का पूर्वानुमान करना असम्भव था जिन तक वह नगर पहुँचने वाला था, फिर भी उन्होंने उसके लिए एक महान भविष्य की भविष्यवाणी की, और वहाँ सुसमाचार सुनाने का जो पहला अवसर मिला, उसे हाथ से न जाने दिया।
यह अप्रैल, 1755 की बात है: उन्होंने पाया कि वहाँ पहले ही एक फलती-फूलती सोसाइटी बन चुकी है, और उनके प्रयासों से एक बड़ा चैपल बन गया है। वहाँ के लोग भी सामान्यतः सहनशील और सद्भाव रखने वाले थे: उनका व्यवहार
वेस्ली कहते हैं, "न केवल उन यहूदियों और पोप-पन्थियों के प्रति जो उनके बीच रहते हैं, वरन् मेथोडिस्टों के प्रति भी मित्रतापूर्ण" था।
कीग्ली में, जहाँ प्रचारकों ने भीषण उत्पीड़न सहा था, वेस्ली ने पूरी स्वतन्त्रता से प्रचार किया, और लगभग पूरा नगर सत्य के प्रभाव में आ गया। महान उत्तरी नगर। 143 इस सफलता ने उन्हें वह समय स्मरण करा दिया जब
जॉन नेल्सन को इसी नगर में बन्दी बनाया गया था, और बीच के समय में जो उन्नति हुई थी, उसके लिए उन्होंने परमेश्वर का धन्यवाद किया।
यॉर्क में, जहाँ से मेथोडिज़्म को कभी अपमानपूर्वक निकाल दिया गया था, वेस्ली ने "समूचे राज्य में अनुपात के अनुसार सबसे समृद्ध सोसाइटी" पाई।
शेफ़ील्ड में, जहाँ भी बहुत विरोध हुआ था, उस छोटी सोसाइटी को देखकर उनके मन में प्रशंसा उत्पन्न हुई, जिसने इतने लम्बे समय तक अकेली छोड़ दिए जाने पर भी अपने साधारण अगुवों के नेतृत्व में धर्म में इतनी उन्नति की थी।
दिसम्बर, 1748 में वेस्ली पहली बार लंदन के निकट वैण्ड्ज़वर्थ की एक छोटी सोसाइटी में गए, जो निर्दयी भीड़ के सारे प्रकोप और अन्यायी अधिकारियों की घृणा का शिकार होकर लगभग टूट चुकी थी। नौ वर्ष बाद, गिल्बर्ट नामक पश्चिमी द्वीपसमूह (वेस्ट इंडीज़) के एक बागान-स्वामी ने, जो वहाँ आकर बस गया था, उन्हें अपने घर में ठहराया।
उनके प्रचार से दो हब्शी मनुष्य मसीह की ओर फिरे, जिन्होंने शीघ्र ही बपतिस्मा लिया। ये अफ़्रीकी जाति के वे पहले लोग थे जिन्हें मेथोडिज़्म ने उद्धार देने वाले सुसमाचार के परिचय तक पहुँचाया: वे एक बड़ी फ़सल के पहले फल थे। इन मन-फिरावों ने
वेस्ली के हृदय को आनन्दित किया, और उन्होंने अपनी पत्रिका (जर्नल) में लिखा, "क्या उसका उद्धार देने वाला स्वास्थ्य सब जातियों में प्रकट न किया जाएगा?" ये शब्द लिखते समय उन्हें शायद ही कल्पना थी कि ये भविष्यवाणी सिद्ध होंगे, और यही बागान-स्वामी,
नथानिएल गिल्बर्ट, स्थानीय प्रचारक के रूप में पश्चिमी द्वीपसमूह की अश्वेत आबादी में मेथोडिज़्म को पहुँचाएगा।
अपने जन्म-नगर एपवर्थ में वेस्ली को परमेश्वर के काम को फलते-फूलते देखने का आनन्द मिला। वहाँ भी पूर्वाग्रह मिट गया था। जिस मनुष्य को कुछ वर्ष पहले प्रभु-भोज की मेज़ से लौटा दिया गया था, वह अब उसी कलीसिया की दीवारों के भीतर उसकी सेवा करता था; और जब वह बाहर प्रचार करता, तो लगभग सारी जनसंख्या उसके श्रोताओं में होती। वे कहते हैं, "मैं स्पष्ट देखता हूँ कि हम प्रायः इस स्थान और अन्य स्थानों में परमेश्वर के काम की वृद्धि को केवल सोसाइटी की वृद्धि से नापकर गलत आँकते रहे हैं।
144 तीव्र उन्नति। यहाँ की सोसाइटी बड़ी नहीं है; परन्तु परमेश्वर ने पूरे स्थान पर कार्य किया है। इन गलियों में अब सब्त को तोड़ना और मतवालापन दिखाई नहीं देता; गाली-गलौज और शपथ शायद ही सुनाई देती है। दुष्टता अभी से अपना मुँह छिपा रही है।
कौन जाने, कुछ समय बाद परमेश्वर उसे बिलकुल दूर कर दे?"
वेस्ली को न्यूकासल जाकर सदा आनन्द मिलता था: वहाँ उनकी सोसाइटियाँ सब प्रकार की कठिनाइयों के बीच बढ़ती और बहुगुणित होती गईं: हर बात इस दृढ़ विश्वास को बल देती थी कि उनका परिश्रम व्यर्थ नहीं गया।
हम देख चुके हैं कि अनेक अवसरों पर वह बुरा भाव, जिसका उन्हें आरम्भ में सामना करना पड़ा, उत्तम भावनाओं को स्थान देता गया। भीड़ें कम होने लगीं और उन्हें वश में करना भी कम कठिन रहा: वेस्ली अकसर उन लोगों के प्रभाव से, जिन पर उनके प्रचार का हितकारी असर पड़ा था, ऊपरी हाथ पाने में सफल हो जाते थे। धीरे-धीरे वे प्रतिष्ठित लोग, जो केवल झूठी अफ़वाहों के बहकावे में आकर उपद्रवियों का साथ दे बैठे थे, शिष्टता और शान्त स्वभाव की समझ में लौट आए, और इस प्रकार प्रचारक के लिए एकत्र होने का केन्द्र बने। उपद्रवी अकसर उन्हीं में विरोधी पाते थे जिनके समर्थन पर उन्होंने पूरा भरोसा किया था। कभी-कभी रात के विरोधी, थककर, यदि पूरी तरह पराजित न भी हुए हों, तो अगली सुबह चुपचाप श्रोताओं में आ बैठते थे। भीड़ की अनिश्चयता भी अकसर इस रीति से प्रकट हो जाती थी कि सहज विजय मिल जाती थी।
पास की मदिरा-शाला में जाने के बाद वे ढोल बजाते और झण्डे लहराते हुए निकलते, यह सोचकर कि इस बार वे प्रचारक का ऐसा हाल करेंगे कि वह फिर कभी उस इलाके में पाँव रखना न चाहेगा। वेस्ली आगे बढ़कर उनसे मिलते, भीड़ के नेताओं से हाथ मिलाते, उनसे कुछ दयालु शब्द कहते, और अन्त में उनसे कहते |
भीड़ पर विजय। 145 कि वे उसकी मण्डली में सम्मिलित हो जाएँ; और वे प्रायः ऐसा कर भी लेते थे, क्योंकि इस अनपेक्षित अभिवादन से वे इतने प्रसन्न हो जाते थे।
कभी-कभी वे अपने किसी मित्र को भेजकर ही सन्तोष कर लेते, उनके कारण सभा में विघ्न डालने का सम्मान तक उन्हें न देते। एक बार रीडिंग में ऐसा ही हुआ, और युक्ति पूरी तरह सफल रही। नावों के बहुत-से मल्लाह प्रचार में बाधा डालने इकट्ठे हुए थे। मित्रों में से एक, श्री रिचर्ड्स, उनके पास आए और उनसे बोले, "क्या आप मेरे साथ चलकर एक अच्छा उपदेश सुनेंगे? मैं आपके लिए जगह कर दूँगा, चाहे आप इससे दुगुने ही क्यों न हों।" उन्होंने कहा कि वे सारे मन से चलेंगे। "परन्तु पड़ोसियो," उन्होंने कहा,
"क्या अच्छा न होगा कि इन डण्डों को पीछे ही छोड़ दें?
कदाचित् कुछ स्त्रियाँ इन्हें देखकर डर जाएँ?"
उन्होंने उन सबको फेंक दिया," और चुपचाप प्रचार सुनने आए। उपदेश के अन्त में उनका नायक, जो अपने साथियों से सिर भर ऊँचा था, उठा और मण्डली की ओर देखकर बोला, "इन सज्जन ने जो कहा वह सब अच्छा ही है: मैं यही कहता हूँ; और यहाँ कोई ऐसा मनुष्य नहीं जो इसके विपरीत कहने का साहस करे।"
फिर भी जनसमूह सदा इतनी सरलता से वश में नहीं आता था। बहुत-से स्थानों में उनकी दुर्भावना ज्यों-की-त्यों बनी रही, विशेषकर वहाँ जहाँ राजकीय या धार्मिक अधिकारी उसे बढ़ावा देते थे। उदाहरण के लिए, शेप्टन में ढोल बजाकर इकट्ठी हुई भीड़ ने उस घर को घेर लिया जहाँ वेस्ली ठहरे थे, और सारी खिड़कियाँ तोड़ डालीं। उनके एक सरगना ने भीतर घुस आने में सफलता पाई; परन्तु अपने साथियों से अलग हो जाने पर उसका साहस जाता रहा और उसे समझ न आया कि क्या करे। बाहर से फेंका गया एक पत्थर उसके माथे पर लगा और गहरा घाव कर गया, तब वह अत्यन्त घबरा गया और वेस्ली के जितना हो सके उतना निकट रहकर कहने लगा, "हे महाशय, क्या हम आज रात मर जाएँगे? मैं क्या करूँ? मैं क्या करूँ?" उत्तर मिला, "परमेश्वर से प्रार्थना करो; वह तुम्हें सब संकट से बचाने में समर्थ है।" उस बेचारे ने यह
146 तीव्र उन्नति। सलाह मान ली, और ऐसी प्रार्थना करने लगा जैसी उसने पहले कभी नहीं की थी। जब भीड़ घर में आग लगाने की युक्ति सोचने में व्यस्त थी, वेस्ली पिछले द्वार से निकल भागने में सफल हुए।
बोल्टन में वेस्ली ने ऐसी ही कठिन परिस्थिति से उन अकस्मात् सूझे उपायों में से एक के द्वारा अपने को छुड़ाया, जो उनके जीवन में इतनी बार देखे जाते हैं। वे कहते हैं, "हम मुख्य मार्ग में प्रवेश कर ही पाए थे कि हमने देखा कि रॉचडेल के सिंह बोल्टन के सिंहों की तुलना में मेमने थे। मनुष्य का रूप धारण करने वाले किसी प्राणी में मैंने ऐसा क्रोध और कटुता शायद ही पहले कभी देखी हो।
वे चिल्लाते हुए हमारे पीछे उस घर तक आए जहाँ हम गए थे; और जैसे ही हम भीतर गए, उन्होंने उसके सब रास्तों पर अधिकार कर लिया और सड़क को एक छोर से दूसरे छोर तक भर दिया।... परन्तु वे दूर से ही आक्रमण करने की मंशा नहीं रखते थे: तुरन्त एक ने दौड़कर हमें बताया कि भीड़ घर में घुस आई है।... यह मानकर कि अब समय आ गया है, मैं नीचे उनके सघनतम समूह में उतर गया। उन्होंने नीचे के सब कमरे भर दिए थे। मैंने एक कुर्सी मँगवाई।
हवाएँ थम गईं, और सब कुछ शान्त और स्थिर हो गया। मेरा हृदय प्रेम से भरा था, मेरी आँखें आँसुओं से, और मेरा मुँह तर्कों से। वे चकित हुए, वे लज्जित हुए, वे पिघल गए, उन्होंने मेरा एक-एक शब्द पी लिया। यह कैसा परिवर्तन था! हे, परमेश्वर ने कैसे उस बूढ़े अहीतोपेल की युक्ति को मूर्खता में बदल दिया, और उस स्थान के सब मतवालों, शपथ खाने वालों, सब्त तोड़ने वालों और केवल पापियों को अपने अनुपम छुटकारे की बात सुनने के लिए ले आया!"
जहाँ आवश्यकता पड़ने पर वे सिंह के समान निडर हो सकते थे, वहाँ मेमने की मिठास और कोमलता भी प्रकट कर सकते थे। वे क्षमा भी कर सकते थे और अपमान भी सह सकते थे, ऐसा सामर्थ्य जिसके बिना वे भीड़ पर कभी विजय नहीं पा सकते थे। ड्यूज़बरी में क्रोध से उफनता एक मनुष्य श्रोताओं की पाँतों को चीरता हुआ आया और प्रचारक के पास पहुँचकर पूरे बल से उनके मुख की ओर
बोल्टन की भीड़। 147 थप्पड़ मारा। चोट इतनी तीव्र थी कि उनकी आँखों में आँसू आ गए; परन्तु वेस्ली ने क्षण भर भी हिचकिचाए बिना, मसीह की आज्ञा के अनुसार, दूसरा गाल भी फेर दिया। वह उग्र आक्रमणकारी चकित और घबराकर पीछे हट गया और अपना मुँह छिपाने का यत्न करने लगा। उसी समय से वह मेथोडिस्टों का समर्पित मित्र बन गया, और बाद के एक अवसर पर उसने उनके एक चैपल को नष्ट होने से बचाने के लिए अपने प्राण संकट में डाल दिए।
इस बीच आन्दोलन की सफलता निर्विवाद हो चुकी थी। जागृति (रिवाइवल) अब कुछ विश्वासयोग्य हृदयों में टिका हुआ कोमल अंकुर नहीं रह गई थी: वह पहले से ही एक सशक्त और फलता-फूलता वृक्ष थी, जिसे अत्यन्त विशाल आकार तक पहुँचना था। इस सामान्य समृद्धि के बीच कुछ कम सुखद बातें भी थीं। कुछ सोसाइटियों में सैद्धान्तिक और अन्य त्रुटियाँ तथा और भी गम्भीर बुराइयाँ घुस आई थीं, जिन्हें देश की नैतिक दशा समझाती तो है पर उचित नहीं ठहरा सकती। इनके विरुद्ध वेस्ली ने पूरी शक्ति से संघर्ष किया। समुद्र-तट के साथ-साथ सम्पत्ति के अधिकारों के विषय में ढीली धारणाएँ प्रचलित थीं: तस्करी और जहाज़ों को लूटना इन अशिक्षित लोगों की दृष्टि में पूर्णतः वैध माना जाता था, जिनमें से अनेक इसी से अपनी जीविका चलाते थे। ऐसी प्रथाओं का सुधार करने में समय लगता था। अपने श्रोताओं को इन अपराधों का वास्तविक स्वरूप दिखाकर, और जो इनके आदी थे उन सबको अपनी सोसाइटियों से कठोरता से निकालकर, वेस्ली ने ऐसे दुराचारों को दबाने में पुलिस या चुंगी-विभाग से भी अधिक काम किया। -_
जब कभी वेस्ली सुनते कि किसी सोसाइटी में कोई गड़बड़ी फैल रही है, वे तुरन्त वहाँ पहुँचते। ब्रिस्टल में अनुशासन के प्रयोग और कुछ आन्तरिक कष्टों के कारण सदस्यों की संख्या आधी रह गई थी। इस स्थिति के निवारण के लिए उन्होंने एक विशेष उपवास ठहराया, और उसके फलस्वरूप ऐसी जागृति हुई जिसने दरार को पूरी तरह भर दिया। नॉरविच की सोसाइटी एक प्रचारक के विश्वासघात के कारण बिखर गई थी: अत्यन्त कठिनाई से उन्होंने एक नया समुदाय खड़ा करने में सफलता पाई। L2 148 तीव्र उन्नति।
लंकाशायर में ऐसी ही घटना से एक फूट पड़ी जिसने वेस्ली के मन को गहरी पीड़ा पहुँचाई।
चिन्ता का एक और कारण वह उत्साह था जिससे कुछ झूठे शिक्षक विश्वास की जड़ें खोदने का यत्न कर रहे थे। लाभ से अधिक कौतूहल उत्पन्न करने वाले विवाद और धर्मशास्त्रीय विषयों पर बहसें अनेक स्थानों में उठ खड़ी हुईं और लोगों के मन को जीवित और व्यावहारिक भक्ति से भटकाने लगीं।
वेस्ली ने इस हानि के कारणों के विरुद्ध खुला युद्ध घोषित करने में देर न की: वे भली-भाँति जानते थे कि यदि यह आत्मा एक बार सोसाइटियों में राज करने पाई, तो शीघ्र ही उनका अस्तित्व समाप्त कर देगी। स्टैफ़र्डशायर को इन बुराइयों से सबसे अधिक कष्ट हुआ: उस इलाके में व्यवस्था-विरोधी (एण्टीनोमियन) शिक्षकों ने भारी विनाश मचाया। वेस्ली पुकार उठते हैं, "यदि सन्देहपूर्ण वाद-विवाद न होते तो इन सब स्थानों में कैसा कार्य हुआ होता! यदि पूर्वनिर्धारणवादियों ने उन लोगों को, जो अच्छी दौड़ने लगे थे, कुछ को संसार में, कुछ को बैपटिस्टों में, और कुछ को परमेश्वर की गुप्त योजनाओं के अन्तहीन विवादों में पीछे न धकेला होता! जब हम अपने प्राण हथेली पर लिए फिरते थे, तब इनमें से कोई निकट न आया; लहरें उनके लिए बहुत ऊँची थीं; पर जब सब शान्त हो गया, तब वे चारों ओर से उमड़ आए, और हमारे बच्चों को हमसे छीन ले गए।"
ये अतिवादी कैल्विनवादी प्रकट रूप से व्हाइटफ़ील्ड का अनुसरण करते थे, परन्तु वे उनके सिद्धान्त को अनुचित सीमा तक खींच ले गए, और उससे ऐसे व्यावहारिक निष्कर्ष निकाले जिनकी वे स्वयं क्रोध के साथ निन्दा करते। वेस्ली अपने भूतपूर्व सहकर्मी से पूर्णतः एकमत थे। उनके हृदय इतने गहरे मसीही थे कि विभाजित बने रहना सम्भव न था। उन्होंने एक-दूसरे के मंच बदले और बार-बार एक-दूसरे से भेंट की। लंदन की एक यात्रा के दौरान उन्होंने लिखा, "श्री व्हाइटफ़ील्ड मुझसे मिलने आए। अब वाद-विवाद नहीं रहे: हम एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, और अपने साझे स्वामी के कार्य को बढ़ाने के लिए हाथ-में-हाथ मिलाते हैं।" वेस्ली कैल्विनवादी मेथोडिज़्म के अगुवों से बार-बार मिलते थे: एक बार उन्होंने लेडी हंटिंगडन के घर में उनके सम्मुख प्रचार किया और प्रभु-भोज बाँटा: सहभागियों में
चिन्ता और प्रोत्साहन के स्रोत। 149 व्हाइटफ़ील्ड, मैडन, रोमेन, वेन, ग्रिफ़िथ जोन्स और अन्य लोग थे।
इन परमेश्वर के जनों के, और जो उनके निकट सहयोगी थे उनके, परिश्रम पर विचार करके वेस्ली परमेश्वर द्वारा इस देश में किए गए बड़े-बड़े कार्यों के लिए गहरे कृतज्ञ हुए बिना न रह सके। इन्हीं दिनों उनकी पत्रिका में यह भाव प्रकट हुआ है: "परमेश्वर ने इंग्लैंड में बीते वर्षों में जो आश्चर्यजनक कार्य किया है, उसकी गहरी अनुभूति के कारण मैंने सन्ध्या को इन वचनों पर प्रचार किया, 'उसने किसी और जाति से ऐसा व्यवहार नहीं किया' (भजन संहिता 147:20); हाँ, स्कॉटलैंड या न्यू इंग्लैंड से भी नहीं।
इन दोनों में परमेश्वर ने निश्चय ही अपनी भुजा खोली है; फिर भी वैसे विस्मयकारी ढंग से नहीं जैसा हमारे बीच। यह उन सब को स्पष्ट होगा जो निष्पक्ष होकर विचार करें: 1. उन लोगों की संख्या जिन पर परमेश्वर ने कार्य किया है। 2. उसके कार्य की तीव्रता, जिसमें अनेक लोग कुछ ही दिनों में कायल हुए और सचमुच मन-फिराए।
3. अधिकांश में उसकी गहराई, जो हृदय को और पूरे आचरण को बदल देती है। 4. उसकी स्पष्टता, जिससे वे साहस के साथ कह सकते हैं, 'तूने मुझसे प्रेम किया है; तूने मेरे लिए अपने आप को दे दिया।' 5. उसकी निरन्तरता। परमेश्वर ने स्कॉटलैंड और न्यू इंग्लैंड में अलग-अलग समयों पर कई सप्ताहों या महीनों तक कार्य किया है; परन्तु हमारे बीच
उसने लगभग अठारह वर्ष तक लगातार, बिना किसी दिखाई देने वाले अन्तराल के, कार्य किया है। सबसे बढ़कर यह भी ध्यान देने योग्य है कि स्कॉटलैंड में उस महान कार्य में नियमित पादरियों की एक बड़ी संख्या लगी थी; और न्यू
इंग्लैंड में सौ से अधिक, जो शायद पूरे प्रान्त में सबसे प्रतिष्ठित थे, न केवल भक्ति में, वरन् स्वाभाविक और अर्जित योग्यताओं में भी; जबकि इंग्लैंड में केवल दो-तीन नगण्य पादरी थे, और कुछ नवयुवक, कच्चे, अनपढ़ लोग; और इनका विरोध देश के लगभग सब पादरी और साधारण लोग भी करते थे। जो इसे ध्यान में रखेगा, उसे अवश्य मानना पड़ेगा कि यह परमेश्वर का कार्य है, और उसने किसी और जाति में ऐसा कार्य नहीं किया।"
वेस्ली अब अधेड़ आयु तक पहुँच चुके थे, परन्तु उन्होंने यौवन के उत्साह और सक्रियता में से 150 तीव्र उन्नति। कुछ भी नहीं खोया था। वे वर्ष में कम-से-कम पाँच हज़ार मील यात्रा करते थे, अधिकतर घोड़े पर, मौसम की प्रतिकूलता की तनिक भी परवाह किए बिना। वे दिन में दो-तीन बार प्रचार करते, और वर्ष भर प्रातःकाल पाँच बजे की सभा अटल रूप से चलाते। इंग्लैंड के सब प्रान्तों में घूमते हुए वे हर प्रकार की पुस्तकें पढ़ते: धर्मशास्त्र, इतिहास, साहित्य, विज्ञान, सबमें उनकी रुचि थी, और इस प्रकार संचित सामग्री से वे कभी भी लाभ उठा सकते थे; उनकी साहित्यिक अभिरुचि पहले जितनी ही प्रबल थी, और प्राचीन यूनानी-रोमी लेखक अब भी उनके प्रिय अध्ययन थे। वेस्ली से अधिक विस्तृत पठन बहुत कम लोगों का था: उनकी पत्रिकाओं में भरी पड़ी उनके पठन पर की गई टिप्पणियाँ एक स्वतन्त्र और, सामान्यतः, सुदृढ़ और यथार्थ निर्णय-शक्ति को दर्शाती हैं।
प्रसन्न स्वभाव के धनी होने के कारण वे उन कार्यों का बोझ हल्के मन से उठाते थे जिनकी सूची अविश्वसनीय-सी लगती है। वे हमें विश्वास दिलाते हैं कि दस हज़ार चिन्ताएँ उन्हें उतना ही व्याकुल करती थीं जितना उनके सिर के दस हज़ार बाल। सभी समकालीन गवाह एक स्वर से उनका वर्णन ऐसे व्यक्ति के रूप में करते हैं जिसके मन में मधुर शान्ति थी, जो उसके सम्पर्क में आने वाले सब लोगों तक पहुँचती-सी प्रतीत होती थी।
अलेक्ज़ेंडर नॉक्स, जो वेस्ली के अनुयायी न होते हुए भी बीस वर्ष तक उनके घनिष्ठ मित्र रहे, कहते हैं, "उनके मुख और वार्तालाप से हृदय की सदा बनी रहने वाली प्रसन्नता प्रकट होती थी, जो सचेत सद्गुण और निर्दोषता के सिवा और कुछ नहीं दे सकता था। वे वास्तव में नैतिक सुख के सबसे सिद्ध नमूने थे जो मैंने कभी देखे, और उनके परिचय ने मुझे, पवित्र ग्रन्थ को छोड़कर, जो कुछ मैंने देखा, सुना या पढ़ा उन सबसे बढ़कर यह सिखाया कि मसीही भक्ति की परिपक्वता में पृथ्वी पर कैसा स्वर्ग निहित है।"
उनकी आदतों की सादगी और मितव्ययिता ने उन्हें ऐसे अभावों और कष्टों को सहजता से सहने योग्य बनाया जो साधारण मनुष्यों के लिए असह्य होते। काट-कसर के बल पर,
वेस्ली का चरित्र और आदतें। 151 उन्होंने अपने व्यय को इतनी सीमित मर्यादा में रखा कि वे सोसाइटियों पर कोई बोझ नहीं थे: वस्तुतः यात्राओं के दौरान उन्हें जो विनम्र आतिथ्य मिलता था, उसके सिवा उन्होंने उनसे कुछ स्वीकार न किया। फिर भी उनके प्रकाशन आय का स्रोत थे, जो मेथोडिज़्म की उन्नति से पाठकों का दायरा बढ़ने के साथ धीरे-धीरे बढ़ती गई। परन्तु साधनों की इस वृद्धि ने उन्हें केवल अपनी उदारता बढ़ाने का अवसर दिया। जब उनके पास तीस पाउण्ड वार्षिक थे, तो वे अट्ठाईस में निर्वाह करते और चालीस शिलिंग दान कर देते। अगले वर्ष साठ पाउण्ड पाकर भी वे अट्ठाईस में ही निर्वाह करते रहे, और बत्तीस दान कर दिए। तीसरे वर्ष उन्हें नब्बे पाउण्ड मिले, और उन्होंने बासठ दान किए। चौथे वर्ष उन्हें एक सौ बीस पाउण्ड मिले। फिर भी वे पहले की तरह अट्ठाईस में ही रहे और ग़रीबों को बानवे दे दिए। अनुमान है कि अपने जीवन में उन्होंने तीस हज़ार पाउण्ड दान किए। उनका रहन-सहन इतना सादा था कि जब कर-संग्राहकों ने उनसे पूछताछ की, यह मानकर कि इतने प्रतिष्ठित व्यक्ति के पास चाँदी के बर्तन बहुत होंगे, तो उन्होंने यह उत्तर दिया:—
"मेरे पास लंदन में चाँदी के दो चाय के चम्मच हैं और ब्रिस्टल में दो: अभी मेरे पास बस इतनी ही चाँदी की वस्तुएँ हैं, और जब तक मेरे आसपास इतने ग़रीब रोटी को तरस रहे हैं, मैं और नहीं खरीदूँगा।" वेस्ली बहुत समय से यह सोचते थे कि उनकी सेवकाई का घुमन्तु स्वरूप उनसे विवाह का विचार छोड़ने की माँग करता है। ब्रह्मचर्य उन्हें आकर्षक लगता था, और "एकाकी जीवन पर विचार" नामक पुस्तिका में उन्होंने उन सब को यह मार्ग अपनाने का परामर्श दिया जो "स्वर्ग के राज्य के लिए" अपने को इसके लिए समर्पित कर सकते थे। इस विषय पर उनके विचारों में कुछ परिवर्तन आया, और वे एक जीवन-संगिनी की खोज में प्रवृत्त हुए। उनका ध्यान पहले न्यूकासल में रहने वाली एक विधवा महिला की ओर गया, जिसमें उनके सुख के लिए आवश्यक सभी गुण प्रतीत होते थे। दुर्भाग्य से कई मित्रों ने, जिनमें चार्ल्स वेस्ली और व्हाइटफ़ील्ड का उल्लेख करना होगा, कुछ उतावली में ऐसा हस्तक्षेप किया कि उनकी इच्छा पूरी न हो सकी।
152 तीव्र उन्नति। वेस्ली को गहरा आघात लगा, और कुछ समय तक उन्होंने विवाह का सारा विचार त्याग दिया।
उनके सलाहकार और मित्र पेरोनेट ने 1751 में यह बात फिर उनके सामने रखी, और उनका परिचय श्रीमती
विज़ेल से कराया, जो एक और विधवा महिला थीं और उपयुक्त जीवन-साथी बनने योग्य प्रतीत होती थीं।
वेस्ली अपने मित्र के विचारों में आवश्यकता से अधिक हार्दिकता से सम्मिलित हो गए, और अत्यन्त उतावली से उन्होंने उस महिला से विवाह का प्रस्ताव कर दिया। प्रस्ताव स्वीकार हुआ, और विवाह हो गया। फिर भी इस कदम से उनका अपने कार्यक्षेत्र को सीमित करने का कोई विचार न था। इसलिए विवाह से पूर्व की व्यवस्थाओं में उन्होंने स्पष्ट रूप से पत्नी की सम्पत्ति पर कोई नियन्त्रण लेने से इनकार किया, और यह भी ठहराया कि उन्हें अपनी आदत से एक भी उपदेश कम देने या एक भी मील कम यात्रा करने के लिए बाध्य न किया जाए। वेस्ली ने स्वयं उस महिला से कहा, "यदि मैं सोचूँ कि ऐसा नहीं होगा, तो चाहे मैं तुमसे कितना ही प्रेम करूँ,
मैं तुम्हारा मुँह फिर कभी न देखूँगा।"
दुर्भाग्य से, इस व्यवस्था पर सहमति देते समय श्रीमती वेस्ली ने जितना निभा सकती थीं, उससे अधिक वचन दे दिया, और अनुभव ने उनके पति को दिखा दिया कि उनसे एक अपूरणीय भूल हो गई है। उनके सारे अच्छे गुण वस्तुतः एक बड़े दोष, अर्थात् ईर्ष्या, से निष्प्रभावी हो गए। अपने पति की आत्मा और उद्देश्यों की उच्चता और पवित्रता को समझने में असमर्थ होकर, उन्होंने अपनी कल्पना के बहकावे में आकर अत्यन्त अनर्गल और अपमानजनक सन्देहों को स्थान दिया।
यह देखकर कि वे उन्हें बैठक वाला जीवन अपनाने के लिए प्रेरित नहीं कर सकतीं, जिसे वे अपने विशेष बुलाहट का घोर उल्लंघन समझते, उन्होंने अपने बुरे स्वभाव और बुरे विचारों को खुली छूट दे दी। इस अशोभनीय आवेग के वश में होकर वे कभी-कभी सौ मील की दूरी तय करके यह देखने जातीं कि वे किसी नगर में कब प्रवेश करते हैं और उनके साथ कौन यात्रा कर रहा है। वे उनके पत्र खोल लेतीं, उनके निजी कागज़ात खँगालतीं, और कभी-कभी
वेस्ली का विवाह। 153 उन्हें उनके शत्रुओं के हाथ सौंप देतीं, इस आशा से कि उनके चरित्र पर कोई कलंक लगा सकें।
इस एकोन्माद ने उस अभागी स्त्री को इतना अन्धा कर दिया कि एक से अधिक बार वह अपने पति का घर छोड़कर चली गई, और केवल उनके आग्रहपूर्ण अनुरोध पर लौटी। अन्त में उसने सदा के लिए विदा ले ली, अपने पति के कुछ कागज़ात साथ ले गई और घोषणा की कि वह कभी नहीं लौटेगी। इस बार अलगाव पूर्ण था। वेस्ली ने, जो बीस वर्ष तक प्रतिदिन की शहादत सहते रहे थे, अपनी पत्रिका में यह टिप्पणी लिखी: "23 जनवरी,
1771.—किस कारण से, आज तक मैं नहीं जानता, न्यूकासल को चल पड़ा, यह निश्चय करके कि कभी न लौटूँगा। Non eam reliqui : non dimisi : non revocabo. [मैंने उसे त्यागा नहीं: उसे निकाला नहीं: उसे वापस नहीं बुलाऊँगा।]" * साउदी कहते हैं, "इस प्रकार यह अभागा विवाह संक्षेप में समाप्त हो गया। श्रीमती वेस्ली इस अलगाव के दस वर्ष बाद तक जीवित रहीं, और उनकी समाधि-लिपि उन्हें अनुकरणीय भक्ति वाली स्त्री, कोमल माता और समर्पित मित्र के रूप में वर्णित करती है: परन्तु पत्नी के रूप में उनके गुणों के विषय में वह विवेकपूर्वक कुछ नहीं कहती।" — a "स्टीवन्स कहते हैं, "बीस वर्ष तक वह उन्हें निराधार सन्देहों और असह्य कष्टों से सताती रही, और उनके चरित्र की सच्ची महानता के सबसे सराहनीय प्रमाणों में यह है कि इस लम्बे घरेलू दुःख के दौरान उनका सार्वजनिक जीवन कभी डगमगाया नहीं, उसकी ऊर्जा या सफलता में तिल भर भी कमी न आई।" one igre [अस्पष्ट मूल पाठ]
1753 की शरद ऋतु में, अत्यधिक परिश्रम के परिणामस्वरूप, वेस्ली गम्भीर रूप से बीमार पड़े: उनके चिकित्सकों को क्षय-रोग की आशंका हुई, और उन्होंने परिश्रम को पूर्णतः रोकने और देहात में एकान्तवास का आदेश दिया। यह समाचार सुनकर सोसाइटियाँ घबरा गईं और उनके स्वस्थ होने के लिए सार्वजनिक प्रार्थनाएँ कीं। सब कुछ घातक अन्त की ओर संकेत करता प्रतीत होता था, और वेस्ली ने स्वयं भी उसकी आशा की, जैसा इस समाधि-लेख से प्रमाणित होता है, जिसे "व्यर्थ प्रशंसा-वर्णन से बचने के लिए" उन्होंने स्वयं रचा था। * "T did not desert her: I did not send her away: I will not recall her." [मैंने उसे त्यागा नहीं: उसे निकाला नहीं: उसे वापस नहीं बुलाऊँगा।]
. 154 . तीव्र उन्नति। "यहाँ जॉन वेस्ली की देह पड़ी है, जो जलती आग में से निकाली हुई लुकाठी था: जो अपनी आयु के इक्यावनवें वर्ष में क्षय-रोग से मरा, और अपने ऋण चुकाने के बाद अपने पीछे दस पाउण्ड भी न छोड़ गया; प्रार्थना करता हुआ, हे परमेश्वर, मुझ निकम्मे दास पर दया कर।"
[उन्होंने आदेश दिया कि यदि कोई भी लेख हो तो यही उनकी समाधि पर लगाया जाए।" | इस बीमारी से चारों ओर से सहानुभूति के अनेक सन्देश आए, और इससे प्रकट हुआ कि जो लोग धार्मिक विचारों में उनसे भिन्न थे, वे भी वास्तव में उनके प्रति कैसी भावनाएँ रखते थे। इन सन्देशों में से कोई भी व्हाइटफ़ील्ड के सन्देश से अधिक मूल्यवान न था। वेस्ली के इस पूर्व सहकर्मी का लिखा पत्र दोनों का इतना सम्मान करता है कि उसे रोक रखना उचित नहीं। यह भी प्रमाणित करता है, जो हम पहले ही दिखा चुके हैं, कि परमेश्वर के इन दोनों सेवकों के पारस्परिक सम्बन्ध से कटुता का प्रत्येक चिह्न मिट चुका था, और दोनों उस उच्च लोक में जी रहे थे जहाँ इस संसार की बुराइयाँ नहीं के बराबर हैं, क्योंकि परमेश्वर सब में सब है।
"ब्रिस्टल, 3 दिसम्बर, 1753।
"श्रद्धेय और अति प्रिय महोदय,— "लंदन से चलते समय आपको इतना दुर्बल देखकर मैं व्यथित हुआ था; आपके निकट प्रस्थान के समाचार और सम्भावना ने तो मुझे बिलकुल दबा दिया है। मुझे अपने पर और कलीसिया पर तरस आता है, आप पर नहीं। एक तेजोमय सिंहासन आपकी प्रतीक्षा में है, और शीघ्र ही आप अपने स्वामी के आनन्द में प्रवेश करेंगे। वहाँ वह एक भारी मुकुट लिए खड़ा है, सन्तों और स्वर्गदूतों की प्रशंसा करती भीड़ के बीच उसे आपके सिर पर रखने को तैयार। परन्तु मैं, बेचारा मैं, जो उन्नीस वर्ष से अपने प्रस्थान की प्रतीक्षा में हूँ, यहाँ नीचे धरती पर रेंगने के लिए पीछे छोड़ दिया जाऊँगा!
अच्छा! मेरी सान्त्वना यही है: मुझ जैसे निकम्मे के लिए भी रथ भेजे जाने में अधिक देर न होगी। यदि प्रार्थनाएँ उन्हें रोक सकें, तो आप, श्रद्धेय और प्रिय महोदय, अभी हमें न छोड़ेंगे; परन्तु यदि आज्ञा निकल चुकी है कि अब आप
बीमारी और स्वास्थ्य-लाभ। 155 यीशु में सो जाएँ, तो वह आपकी आत्मा को चूमकर ले जाए, और आपको विजयी प्रेम की बाहों में प्राण त्यागने दे! यदि मैं मरने वालों की भूमि में रहा, तो आशा है कि अगले सप्ताह आपको अपना अन्तिम सम्मान अर्पित करूँगा। यदि नहीं, तो श्रद्धेय और अति प्रिय महोदय, विदा। Ego sequar, etsi non passibus aequis. [मैं पीछे-पीछे आऊँगा, यद्यपि बराबर डगों से नहीं।]* मेरा हृदय बहुत भर आया है, आँसू बहुत तेज़ी से टपक रहे हैं, और आप, मुझे भय है, इतने दुर्बल हैं कि मैं और विस्तार नहीं कर सकता। आपके नीचे मसीह की सनातन भुजाएँ हों! मैं आपको उसकी कभी न घटने वाली दया को सौंपता हूँ, और हूँ, "श्रद्धेय और अति प्रिय महोदय, "हमारे साझे प्रभु के सुसमाचार में आपका अति स्नेही, सहानुभूतिशील और दुःखी छोटा भाई, "जी. व्हाइटफ़ील्ड।"
व्हाइटफ़ील्ड की आशंकाएँ सच न हुईं, और वेस्ली स्वस्थ हो गए। उन्हें अभी लगभग चालीस वर्ष परमेश्वर और कलीसियाओं की सेवा में लगे रहना था। उनका स्वास्थ्य-लाभ धीमा था। इस प्रकार मिले अवकाश का उपयोग उन्होंने कई ग्रन्थ छपने के लिए तैयार करने में किया। उन्होंने "मसीही पारिवारिक पुस्तकालय" का भाग बनने के लिए निर्धारित विभिन्न रचनाओं का संशोधन पूरा किया, जो ऐसी ग्रन्थमाला थी जिसमें उन्होंने अपनी सोसाइटियों के उपयोग के लिए अनेक प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाओं का संक्षेप किया था। लेविशम से वे ब्रिस्टल के निकट हॉट-वेल्स चले गए, और वहीं उन्होंने अपनी "नए नियम पर टिप्पणियाँ" आरम्भ कीं, जो अभिव्यक्ति में संक्षिप्त होते हुए भी मूल्यवान विचारों से भरी है।
वसन्त के लौटने पर वेस्ली ने नई शक्ति के साथ अपना सामान्य कार्य फिर आरम्भ किया।
* "मैं पीछे-पीछे आऊँगा, यद्यपि बराबर डगों से नहीं।"
आन्तरिक और बाह्य समृद्धि: अमेरिका।
जिस दशक में हम अब प्रवेश कर रहे हैं, उसके आरम्भ में वेस्ली लगभग साठ वर्ष के होने को थे: फिर भी उनकी सक्रियता में कोई कमी नहीं आई। यद्यपि वर्षों में वे वृद्धावस्था के निकट पहुँच रहे थे, तथापि अपने कार्य को आगे बढ़ाने के उत्साह में वे पहले जितने ही युवा थे। उस कार्य के दो महत्त्वपूर्ण पक्ष थे, सुसमाचार-प्रचार और संगठन।
उसके बाद वाले पक्ष का, जैसे-जैसे वह उनकी सोसाइटियों में क्रमशः विकसित हुआ, एक रेखाचित्र हम एक अलग अध्याय के लिए रख छोड़ते हैं। इस अध्याय में हम वेस्ली के सुसमाचारीय परिश्रम की धारा का अनुसरण करते रहेंगे। उनकी लम्बी घुमन्तु सेवकाई को जो सफलता मिली थी, वह इतनी स्पष्ट थी कि उस कार्यविधि को छोड़ने का विचार उनके मन में आ ही नहीं सकता था: बैठक वाले जीवन में बस जाना न केवल उनकी अपनी रुचि से मेल न खाता, वरन् उनकी सोसाइटियों के लिए प्राणघातक भी सिद्ध होता। अपने अस्तित्व की उस अवस्था में उन्हें पहले से कहीं अधिक उस जीवनदायी बन्धन की आवश्यकता थी जो उनके सुदृढ़ अधिकार ने उनके बीच स्थापित किया और बनाए रखा। यदि इतने प्रारम्भिक चरण पर वे इससे वंचित कर दी जातीं, तो सम्भवतः सम्प्रदायगत कलह के प्रभाव से वे पूर्णतः बिखर जातीं, और उनका ईश्वरीय उद्देश्य विफल हो जाता।
वेस्ली की शक्तियाँ अब भी निरन्तर यात्राओं में लगी रहीं: उनकी कलीसिया-सीमा तीनों राज्यों में फैली थी, और निरन्तर बढ़ती हुई, वह उनके अपने उस आदर्श को साकार करने के लगभग निकट पहुँच गई थी जो इन अविस्मरणीय शब्दों में व्यक्त हुआ, "संसार मेरा पल्ली-क्षेत्र है।"
1760 में और उसके बाद के कई वर्षों में उन्हें एक अद्भुत पुनरुत्थान (रिवाइवल) देखने का सौभाग्य मिला, जो उनकी सभी सोसाइटियों में फैल गया। वेस्ली ने आरम्भ से ही स्वयं भी इस शिक्षा को ग्रहण किया था और दूसरों को भी इसका प्रचार किया था
मसीही सिद्धता। 157 अर्थात् मसीही सिद्धता की शिक्षा: उनका विश्वास था और वे सिखाते थे कि एक मसीही के लिए इसी जीवन में पाप से पूर्ण छुटकारा पाना सम्भव है। ऑक्सफ़ोर्ड में ही उन्होंने अपने प्रिय लेखकों के बीच यह बहुमूल्य रत्न खोज लिया था, यद्यपि रहस्यवादी कल्पनाओं के घने धुएँ से उसकी चमक धुँधली पड़ गई थी। उन्होंने धीरे-धीरे उसे उसकी मूल शुद्धता में लौटाया और पवित्रशास्त्र के सत्यों की मंजूषा में उसका उचित स्थान दिया।
उनके विचार में, पाप से छुटकारा, नई वाचा की अन्य सब आशीषों के समान, क्रूस के उद्धारक कार्य का फल था, परन्तु उन्हीं के समान इसे भी केवल प्रत्येक मसीही के संघर्षशील विश्वास के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता था।
यह उत्साहवर्धक शिक्षा, यद्यपि वेस्ली आरम्भ से ही इसे मानते थे, ऐसी नहीं थी कि उनके लोग इसे उसकी सम्पूर्ण व्यापकता में तुरन्त ग्रहण कर लेते। आवश्यक था कि उनका प्रचार मुख्यतः विश्वास के मूल सिद्धान्तों पर केन्द्रित रहे, कि पहले बच्चों के लिए दूध और फिर परिपक्व लोगों के लिए ठोस भोजन दिया जाए। परन्तु जब सोसाइटियाँ हमारे पवित्र धर्म की आरम्भिक बातों में भली-भाँति जम गईं, तब आवश्यक था कि उनकी उन्नति की जाए, और वेस्ली का विश्वास था कि यह शिक्षा "वह महान धरोहर है जो परमेश्वर ने मेथोडिस्टों को सौंपी है, और उनका विशेष मिशन यह है कि वे पूरे देश में पवित्रशास्त्र-सम्मत पवित्रता का प्रसार करें।"
सन् 1760 में जो महान पुनरुत्थान प्रकट हुआ, उसने संकेत दिया कि इस मिशन को सच्चे मन से अपनाया जा रहा था। बहुत समय तक सोसाइटियों में एक उल्लेखनीय आत्मिक जागृति देखी जाती रही।
- वेस्ली कहते हैं, "यहीं से पवित्रीकरण का वह महिमामय कार्य आरम्भ हुआ, जो लगभग बीस वर्षों से ठहरा हुआ था।
परन्तु समय-समय पर वह फैलता गया, पहले यॉर्कशायर के विभिन्न भागों में, फिर लंदन में, तब इंग्लैंड के अधिकांश भागों में; उसके बाद डब्लिन, लिमरिक और आयरलैंड के पूरे दक्षिण और पश्चिम में। और जहाँ-जहाँ पवित्रीकरण का कार्य | बढ़ा, वहाँ-वहाँ परमेश्वर का सारा कार्य अपनी सभी शाखाओं में बढ़ा,"
158 आन्तरिक और बाह्य समृद्धि।
इस काल की वेस्ली की डायरियाँ इस उल्लेखनीय कार्य की प्रगति के विवरणों से भरी हैं। जहाँ भी वे जाते हैं, देखते हैं कि परमेश्वर के आत्मा के जीवनदायी श्वास से सोसाइटियाँ सुदृढ़ और बढ़ रही हैं, और जैसे-जैसे उनका आन्तरिक जीवन विकसित होता है, वैसे-वैसे उनकी बाह्य गतिविधि को और अधिक सफलता का प्रतिफल मिलता है। मार्च 1761 में उन्होंने अपने अनेक प्रचारकों को लीड्स में एकत्र किया, ताकि इस महान आन्दोलन को और आगे बढ़ाने के उपायों पर विचार किया जा सके: उन्होंने स्पष्ट देखा कि अपने प्रचार में उन्हें पहले से अधिक यह लक्ष्य रखना चाहिए कि लोगों को पवित्रता की उनकी अभिलाषाओं में प्रोत्साहित और निर्देशित करें।
इन भाइयों से उन्हें ज्ञात हुआ कि पुनरुत्थान पूरे यॉर्कशायर और लिंकनशायर में फैल रहा था। <मैनचेस्टर में भी एक ज्वाला भड़की, जिसके विषय में उन्हें भरोसा था कि "न मनुष्य और न दुष्टात्माएँ कभी उसे बुझा सकेंगी।" "लंदन में बहुत-से लोगों ने," वे कहते हैं, "ऐसा गहरा और सर्वांगीण परिवर्तन अनुभव किया है जिसकी कल्पना उनके हृदयों में कभी नहीं आई थी।" ब्रिस्टल में सोसाइटी उतनी बड़ी थी जितनी कई वर्षों से नहीं रही थी। "परमेश्वर ने प्रसन्न होकर इस वर्ष इंग्लैंड और आयरलैंड के हर भाग पर अपना
आत्मा उण्डेला," वे लिखते हैं, "सम्भवतः ऐसे ढंग से जैसा हमने पहले कभी नहीं देखा था; निश्चय ही बीस वर्षों में नहीं।"
"हमारा पिन्तेकुस्त का दिन," वे 1762 में फिर लिखते हैं, "पूरी तरह आ पहुँचा है।" अकेले लंदन में ही सब पापों से छुटकारे के चार सौ गवाह थे। लिवरपूल में सोसाइटी आश्चर्यजनक रूप से जागृत हुई; और वेस्ली ने उनकी भक्ति में असाधारण परिपक्वता पाई। उन्होंने बारह वर्ष की एक लड़की से पूछा, "अब तुम्हें क्या चाहिए?" उसने अद्भुत उत्साह से कहा, "इस संसार में कुछ नहीं, बस अपने यीशु को और अधिक पाना।"
डब्लिन में जो पुनरुत्थान भड़का, उसे वेस्ली ने सबसे अधिक उल्लेखनीय माना। उसका मुख्य साधन जॉन मैनर्स था, "एक सीधा-सादा मनुष्य, मध्यम बुद्धि का, वाक्पटु नहीं, बल्कि बोलने में कुछ रूखा; जो पहले कभी विशेष रूप से उपयोगी नहीं रहा था, परन्तु मानो केवल इसी एक कार्य के लिए खड़ा किया गया हो
महान पुनरुत्थान, 1760। 159 और जैसे ही वह कार्य पूरा हुआ, उसे क्षय रोग हो गया, वह कुछ समय निर्बल पड़ा रहा, और चल बसा।" अपने एक पत्र में वह वेस्ली को लिखता है, "लोग सब आग में हैं। पिछले रविवार जैसा दिन मैंने कभी नहीं देखा। जब मैं सोसाइटी में प्रार्थना कर रहा था, तब प्रभु की सामर्थ्य हम पर छा गई, और कुछ पुकार उठे, 'हे प्रभु, मैं विश्वास कर सकता हूँ!'"
डब्लिन जाने पर वेस्ली ने पाया कि जो सुना था सत्य उससे बिलकुल भी कम नहीं था। "कुछ बातों में," वे कहते हैं, "इस स्थान पर परमेश्वर का कार्य लंदन के कार्य से भी अधिक उल्लेखनीय था। 1. समय और लोगों की संख्या के अनुपात में यह कहीं अधिक बड़ा है....2. यह कार्य अधिक शुद्ध था। इस पूरे समय में, जब उनके साथ कोमलता और स्नेह से व्यवहार किया गया, उनमें से कोई हठी या असावधान नहीं निकला; कोई ऐसा नहीं जो अपने सिखाने वालों से अधिक बुद्धिमान बने; कोई ऐसा नहीं जो अमर या अचूक होने, या परीक्षा से परे होने का स्वप्न देखे; संक्षेप में, कोई सनकी या उन्मादी व्यक्ति नहीं: सब शान्त और संयमी चित्त के थे।" डब्लिन के कार्य की इस प्रशंसा में लंदन के कार्य की निन्दा निहित है। हम शीघ्र ही देखेंगे कि इसके लिए कारण था।
लिमरिक, एडिनडेरी और आयरलैंड के अन्य स्थानों में भी बहुत-से हृदयों में ऐसा ही कार्य हो रहा था, और वेस्ली की उपस्थिति उन्हें प्रज्वलित करने के लिए चिंगारी के समान थी।
1763 के अन्त में वेस्ली ने लिखा, "यहाँ मैं खड़ा हुआ और पिछली घटनाओं पर दृष्टि डाली। थॉमस वाल्श के इंग्लैंड छोड़ने से पहले परमेश्वर ने वह महान कार्य आरम्भ किया जो तब से बिना किसी उल्लेखनीय रुकावट के चलता आ रहा है।
इस पूरे समय में बहुतों को पाप का कायल किया गया, बहुत-से धर्मी ठहराए गए, और बहुत-से भटके हुए लोग चंगे किए गए। परन्तु इस काल का विशेष कार्य वह रहा है जिसे सन्त पौलुस
'पवित्र लोगों की सिद्धता' कहता है। लंदन, ब्रिस्टल, यॉर्क, और इंग्लैंड तथा आयरलैंड के विभिन्न भागों में बहुत-से लोगों ने ऐसा गहरा और सर्वांगीण परिवर्तन अनुभव किया है जिसकी कल्पना उनके हृदयों में पहले कभी नहीं आई थी। भीतर बसे पाप के गहरे बोध और परमेश्वर से अपने पूर्ण पतन के बोध के बाद, वे विश्वास और 160 आन्तरिक और बाह्य समृद्धि। प्रेम से ऐसे भर गए (और प्रायः एक क्षण में), कि पाप मिट गया, और उस समय से उन्होंने अपने में न अभिमान पाया, न क्रोध, न लालसा, न अविश्वास। वे सदा आनन्दित रह सकते थे, निरन्तर प्रार्थना कर सकते थे, और हर बात में धन्यवाद दे सकते थे। अब चाहे हम इसे पाप का नाश कहें या उसका निलम्बन, यह परमेश्वर का महिमामय कार्य है: ऐसा कार्य जैसा, इसकी गहराई और व्यापकता दोनों को देखते हुए, हमने इन राज्यों में पहले कभी नहीं देखा।"
जैसा हम कह चुके हैं, लंदन में कुछ उन्मादियों द्वारा की गई हानि की शिकायत करने का वेस्ली के पास पूरा कारण था। स्थानीय प्रचारकों में एक सैनिक था, जिसका नाम जॉर्ज बेल था, जिसकी चंचल कल्पना पाप से छुटकारे की शिक्षा पर इतनी मोहित हो गई कि वह उसे खतरनाक भूलों में ले गई। वह अचूक होने का दावा करता था, घोषणा करता था कि वह परीक्षा से मुक्त है, और अपनी श्रेष्ठ आत्मिकता के विचार से पूरी तरह ग्रस्त होकर, कम ऊँचे दावे वाले किसी मसीही के अधिकार के विरुद्ध पूरी तरह विद्रोह कर बैठा। वह मानता था कि उसे चमत्कारों का वरदान प्राप्त है, और तदनुसार उसने एक अन्धे को चंगा करने का प्रयास किया। इस वरदान के प्रयोग के बाद जो असफलता मिली, उससे न तो वह स्वयं और न ही उसके दावों पर विश्वास करने वाले सरल लोग किसी भी प्रकार भ्रममुक्त हुए,
उन्माद फैल गया, और वेस्ली यह देखकर दुखी हुए कि उनके प्रचारकों में सबसे पुराना, थॉमस मैक्सफ़ील्ड, उसके झण्डे तले एकत्र हो रहा था।
इस प्रकार बने दल ने सिखाया कि जो व्यक्ति केवल धर्मी ठहराया गया है वह परमेश्वर से जन्मा नहीं है, परन्तु जब वह एक बार पवित्र हो जाता है, तो उसे फिर जागते और प्रार्थना करते रहने की आवश्यकता नहीं; उसका एकमात्र कर्तव्य विश्वास करना है, और आगे यह कि वह न पाप कर सकता है, न अनुग्रह से गिर सकता है। ये भूलें चिन्ताजनक तीव्रता से फैलीं, और सहनशीलता तथा समझाने-बुझाने का प्रभाव व्यर्थ आज़माने के बाद,
वेस्ली को जॉर्ज बेल को सोसाइटी से निकालने के लिए विवश होना पड़ा। बेल की एक पागलपन भरी भविष्यवाणी, कि संसार 28 फरवरी को समाप्त हो जाएगा,
1763, इतनी फैल गई कि मैक्सफ़ील्ड और बेल। 161 अपनी प्रतिष्ठा और अपनी सोसाइटियों की प्रतिष्ठा के लिए वेस्ली को सार्वजनिक पत्रों के माध्यम से उससे किसी भी प्रकार का सम्बन्ध होने से इनकार करना पड़ा।
जॉर्ज बेल के समर्थक अपने विचारों में इतने आगे बढ़ चुके थे कि भविष्यवाणी के पूरा न होने से वे ज़रा भी विचलित नहीं हुए; जिस महाविपत्ति की वे इतनी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे थे, उसके विलम्ब के लिए उन्होंने अपने ही मन को सन्तुष्ट करने वाले तरह-तरह के कारण खोज लिए। उनके नेता का सोसाइटियों से निकाला जाना उनके हट जाने का संकेत बना; और लगभग एक सौ सत्तर लोगों ने वेस्ली से अपना सम्बन्ध त्याग दिया। जिन्होंने उन्हें रोकने का यत्न किया, उन्हें उन्होंने उत्तर दिया, "अन्धा जॉन हमें सिखाने के योग्य नहीं है; हम श्री मैक्सफ़ील्ड के साथ रहेंगे।" मैक्सफ़ील्ड ने भी, अपने पुराने मित्र के उसे रोक रखने के सब प्रयासों के बावजूद, उनसे पूरी तरह नाता तोड़ लिया, और असन्तुष्टों का मान्य पास्टर बन गया।
यह स्पष्ट था कि यदि अनुशासन का प्रयोग न किया जाता, तो ये नवप्रवर्तक सोसाइटियों को नष्ट कर देते। यदि उन्हें पहल करने देने के बजाय वेस्ली ने आरम्भ से ही अपने अधिकार का प्रयोग किया होता, तो सम्भवतः वे उनकी अति में साझेदारी की प्रतीति से भी बच जाते, और उन लोगों को तर्क देने के खतरे से भी, जो मानते थे कि सम्पूर्ण पवित्रीकरण की शिक्षा से अनिवार्यतः ये खतरनाक परिणाम निकलते हैं। परन्तु उन्हें आशा थी कि कठोरता से अधिक नम्रता काम आएगी।
उनके एक सदस्य ने एक दिन उनसे कहा, "महोदय, मेरे यहाँ कई आदमी काम करते हैं। अब, यदि मेरा कोई सेवक मेरे निर्देश का पालन न करे, तो क्या मेरे लिए उसे तुरन्त निकाल देना उचित नहीं? कृपया यही बात श्री बेल पर लागू कीजिए।" उनका उत्तर उनकी हिचकिचाहट का स्वरूप दिखाता है: "ऐसे सेवक को निकाल देना उचित है; परन्तु यदि वह आपका पुत्र होता तो आप क्या करते?"
जब फूट पड़ी, तो उन्होंने उसे गहराई से अनुभव किया। मैक्सफ़ील्ड ने फ़ाउण्ड्री में अपनी बारी पर प्रचार करने से इनकार कर दिया, तो वेस्ली ने उसका स्थान लिया और इन वचनों पर प्रचार किया, "यदि मैं अपने बच्चों से | 162 आन्तरिक और बाह्य समृद्धि। वंचित हुआ, तो वंचित हुआ।" और वे अपनी डायरी में जोड़ते हैं, "इस प्रकार दरार पड़ गई; परन्तु मैं निर्दोष हूँ, इसे रोकने के लिए मुझसे जो कुछ सम्भव था वह सब मैंने किया।"
ऐसी विचित्रताएँ धार्मिक पुनरुत्थान के साथ असामान्य नहीं हैं। फिर भी इस अवसर पर उन्होंने उस महिमामय कार्य को, जिसकी वे नक़ल थीं, पंगु नहीं किया।
वेस्ली कहते हैं, "हमने खोट खो दिया है; शुद्ध सोना बचा हुआ है: अर्थात् वह विश्वास जो प्रेम के द्वारा काम करता है; और हमारे पास विश्वास करने का अच्छा कारण है कि वह प्रतिदिन बढ़ रहा है।"
इन हलचलों को छोड़कर, कार्य सामान्यतः समृद्ध अवस्था में था, जैसा वेस्ली ने अपनी यात्राओं के दौरान पाया। उन्होंने देखा कि पुनरुत्थान अपने आगे बढ़ते कदमों में किसी भी एक स्थान पर धीमा नहीं पड़ा: पुराने केन्द्रों में कार्य बढ़ ही नहीं रहा था, बल्कि नए केन्द्र निरन्तर खुलते जा रहे थे। जहाँ भी वे गए, उनका हार्दिक स्वागत हुआ, और उनकी यात्राओं ने पहले से बनी सोसाइटियों के उत्साह को उभारा और उन्हें नए उद्यम हाथ में लेने के लिए प्रोत्साहित किया। बहुत-से स्थानों में उनकी प्रातः पाँच बजे की सभाओं में इतनी भारी उपस्थिति होती थी कि कोई स्थान लोगों को समा नहीं सकता था; और उन्हें खुली हवा में प्रचार करना पड़ता था। बर्स्टाल में पहाड़ी की ढलान बीस हज़ार की मण्डली से भर गई। लीड्स में उनके श्रोता उतने ही अधिक थे, और गहरी हलचल उत्पन्न हुई। न्यूकैसल में, यद्यपि नवीनता की रुचि अब नहीं रही थी, उन्होंने सार्वजनिक स्थानों में ऐसी भीड़ को प्रचार किया जो उनकी देखी हुई किसी भी भीड़ से बढ़कर थी; इतनी कि उनकी आवाज़ सब तक नहीं पहुँच सकी।
कॉर्नवाल में सदैव विशाल और गहरे ध्यान से सुनने वाली भीड़ें मिलती थीं, और वहाँ वे शायद अन्य किसी भी स्थान से अधिक सहज थे। ग्वेनैप का प्राकृतिक रंगमंडप इस काउंटी में उनका प्रिय प्रचार-स्थल था। उसमें वे उन जनसमूहों को सहजता से सम्बोधित कर सकते थे जो समतल भूमि पर उन्हें सुन नहीं पाते। वहाँ, किसी शान्त ग्रीष्म की सन्ध्या में, जब डूबता सूर्य अपनी तिरछी किरणें
"ग्वेनैप पिट" और "वेस्ली रॉक।" 168 दृश्य पर डालता, वे अपनी स्पष्ट और गूँजती आवाज़ उठाते, और तब हज़ारों मानव-स्वर उनके स्वर के साथ उत्तर देते, अपने या अपने भाई के किसी भजन को उन मधुर और सरल धुनों में से किसी में गाते, जो इंग्लैंड में इतनी प्रचुर हैं। सेंट आइव्स में एक ऊँची चट्टान उनके मंच का काम देती थी, जबकि श्रोता समुद्र तक दूर फैले समतल हरे मैदान पर पंक्तिबद्ध बैठते थे। वेस्ली ऐसे स्थानों के लाभों के प्रति कदापि उदासीन नहीं थे: वे जानते थे कि लोग कितने सहज प्रभावित होते हैं, और सरल हृदयों के लिए प्रकृति की वाणी कितनी वाक्पटु होती है।
आयरलैंड में प्रचार को अब भी बड़ी सफलता मिलती रही।
कॉर्क में लोग उन परीक्षाओं की स्मृति मिटाने का यत्न करते प्रतीत हुए जो वहाँ उन्हें सहनी पड़ी थीं: पादरी और कुलीन जन उनका प्रचार सुनने उमड़ पड़े। डब्लिन और लिमरिक में मण्डलियाँ पहले से बड़ी थीं। किल्फ़िनान में उन्होंने बाज़ार में प्रचार किया, जहाँ लगभग पूरी आबादी इकट्ठी हुई, और बाद में कुछ श्रोता उन्हें उनके ठहरने के स्थान तक साथ गए, जिन्हें उन्होंने दूसरी बार उपदेश दिया, और जो रात बहुत
बीत जाने तक उन्हें छोड़ने को तैयार न थे। अगली सुबह, पाँच बजे से पहले, भीड़ फिर उसी भावना से इकट्ठी हुई: आँसू बहे, हर ओर सिसकियाँ सुनाई दीं; कुछ पाप के बोध में विलाप कर रहे थे, और कुछ उद्धार का शुभ समाचार सुनकर आनन्दित थे।
वेस्ली स्कॉटलैंड भी जाते रहे, और उनके प्रचार ने इस गम्भीर और स्थिर चित्त जाति में सदा गहरी रुचि जगाई, यद्यपि उसने ग्रेट ब्रिटेन के अन्य भागों जैसे दृश्यमान परिणाम उत्पन्न नहीं किए।
जन-उपद्रव अब अधिकाधिक विरल होते गए, और जब हुए भी, तो वे पहले जैसे गम्भीर स्वभाव के नहीं थे। अब वे उपद्रव के दृश्य नहीं रहे जिनमें मिशनरी का प्राण किसी मतवाली और उच्छृंखल भीड़ की दया पर होता था। m 2 164 आन्तरिक और बाह्य समृद्धि।
विरोध प्रायः निम्न स्तर के भाँडपन तक गिर गया था।
नॉर्विच में प्रार्थनालय के द्वारों पर पत्थरों की बौछार करके सभा में बाधा डालने का प्रयास किया गया; परन्तु मेथोडिस्टों का धैर्य उनके विरोधियों के धैर्य से अधिक टिका, और उन्होंने पीछे हट जाने का निर्णय किया। बैरो में भीड़ ने वेस्ली की हँसी उड़ाई; परन्तु "उनके हृदय बैठ गए," और उन्होंने उन्हें बिना सताए निकल जाने दिया। ब्रैडफ़ोर्ड में एक विचित्र घटना ने आक्रमणकारियों की योजनाओं को विफल कर दिया।
उनके नेता ने, जो अपनी प्रतिष्ठा पर गर्व करता था, अपनी जेबें सड़े अण्डों से भर ली थीं, और प्रचार के अन्त के निकट उसने अपने साथियों को आक्रमण आरम्भ करने के संकेत स्वरूप चिल्लाहट उठाई। परन्तु जब वह अपने प्रक्षेप्यों का प्रयोग करने की तैयारी में था, तब एक युवक आया और उसकी जेबों पर हाथ मारकर सारे अण्डे एक साथ फोड़ दिए। हँसी उसी पर पलट गई, और अभिप्रेत आक्रमण विफल हो गया।
ज्यों-ज्यों वेस्ली वृद्ध होते गए, वाणी और आचरण के उस अधिकार में कोई कमी नहीं आई जिसने भीड़ से उनकी मुठभेड़ों में मिली विजयों में इतना योगदान दिया था। उनके श्वेत होते केश उस अधिकार को बढ़ाते थे जो उन्होंने चरित्र-बल से पाया था। उनकी वाणी और हाव-भाव लोगों पर लगभग जादुई प्रभाव डालते थे: जब वे बोलते थे, तो आज्ञा देने के लिए बोलते थे, और उनकी आज्ञाओं का प्रायः पालन होता था। किल्केनी में एक अवसर पर कैथोलिकों की एक भीड़ उनकी एक मण्डली में उसे तितर-बितर करने के उद्देश्य से घुस आई। उन्होंने केवल स्थिर दृष्टि से उन्हें देखा, और फिर दृढ़ स्वर में कहा, "चुप रहो; या चले जाओ!" और मानो किसी जादूगर की छड़ी से शान्ति लौट आई।
अब अधिकारी भी अपना कर्तव्य बेहतर समझने लगे थे, और उपद्रव के प्रवर्तक नहीं रहे। लगभग हर जगह उनकी दृढ़ता उपद्रव दबाने के लिए पर्याप्त थी। परन्तु स्टॉलब्रिज में मजिस्ट्रेटों को उनका कर्तव्य करने के लिए बाध्य करने में वेस्ली का पूरा प्रभाव लगा। बहुत समय तक लोगों ने
भीड़ पर अधिकार। 165 बड़ी ज्यादतियाँ की थीं, उन घरों के द्वार और खिड़कियाँ तोड़ दीं जहाँ मेथोडिस्ट रहते थे, उनका सामान लूटा और उनके शरीर पर प्रहार किए, यहाँ तक कि वे सड़क पर निकलते तो बुरे से बुरे अपमान के पात्र बनते। उन्होंने मजिस्ट्रेटों से व्यर्थ गुहार लगाई: वे उनकी शिकायतों के प्रति सदा बहरे रहे। न्याय पाने से निराश होकर उन्होंने वेस्ली को लिखा, जिन्होंने उनका मामला किंग्स बेंच की अदालत में प्रस्तुत किया, जहाँ बहुत खर्च और लम्बी देरी के बाद उन्हें विजय मिली।
इससे उनके मित्रों को प्रोत्साहन मिला, और उनके विरोधियों को प्रमाण मिला कि "मेथोडिस्टों के लिए भी कानून है।"
पादरियों ने मजिस्ट्रेटों से अधिक समय तक अपनी असहिष्णुता और द्वेष बनाए रखा। बहुतों ने तब भी अपने मंचों से वेस्ली की निन्दा की, और मेथोडिस्टों को प्रभु-भोज की मेज़ से लौटा दिया, जहाँ लापरवाह और संसारी लोगों को बिना पूछताछ के आने दिया जाता था; और कुछ इससे भी आगे बढ़ गए। 1765 में,
वेस्ली डेवनशायर के एक गाँव में खुले में सभा कर रहे थे, जब उन्होंने पादरी को पड़ोस के कुछ कुलीनों के साथ आते देखा। उन्होंने अपना उपदेश इस प्रकार आरम्भ किया:—"कुछ सत्य ऐसे हो सकते हैं जो केवल कुछ मनुष्यों से सम्बन्ध रखते हैं; परन्तु यह सारी मानव-जाति से सम्बन्ध रखता है।" पादरी ने बीच में चिल्लाकर कहा,
"यह झूठी शिक्षा है; यह पूर्वनियति है;" इस प्रकार सिद्ध करते हुए कि उसने पहला वाक्य ही नहीं समझा था। तुरन्त उसके साथ आए लोग शोर मचाकर बातें और हँसी-ठट्ठा करने लगे, और दल का एक शिकारी अपने कुत्तों को छोड़ बैठा, ताकि उनके भौंकने से प्रचारक की आवाज़ दब जाए। एक और व्यक्ति घोर अपमानजनक शब्दों में उन्हें सम्बोधित करने लगा, और पादरी तथा उसके साथी तालियाँ बजाते रहे, जिन्होंने निःसन्देह कलीसिया के "शत्रुओं" के विरुद्ध सब शस्त्र वैध मान लिए थे। ऐसे आक्रमणकारियों के सामने, जिन्हें यदि उनके सेवक-वस्त्र का आदर न था तो कम से कम उनके श्वेत केशों का आदर करना चाहिए था, वेस्ली पीछे हट गए। वे कहते हैं, "शान्ति से सुने जाने की कोई सम्भावना नहीं थी।"
166 आन्तरिक और बाह्य समृद्धि।
उनकी डायरियाँ, तथ्यों के अपने सरल वर्णन से, अठारहवीं शताब्दी के पतित | पादरीवर्ग के विरुद्ध एक गम्भीर, यद्यपि अनजाना, अभियोग बन गईं। फिर भी वे नैतिक शिक्षा निकालना और अपने पाठकों का लाभ खोजना कभी नहीं भूलते। एनिस्कॉर्थी में, वे लिखते हैं, "भीड़ ने, अपने से ऊँचे लोगों से प्रोत्साहित होकर, जिसे चाहा मारा और अपमानित किया, उनके घर तोड़ डाले, और जो मन में आया वही किया। एक अभागे पादरी ने उन्हें इसमें दृढ़ किया, और मेथोडिस्ट प्रचारकों पर 2 तीमुथियुस 3:6, 7 लागू किया....
उन्हें शैतानों के समान काला चित्रित करने के बाद उसने कहा, 'अभी मेरे पास पूरा करने का समय नहीं है; अगले रविवार को मैं शेष तुम्हें बताऊँगा।' परन्तु अगली सुबह वह एक विचित्र रीति से पीड़ित हुआ। वह एक क्षण भी अकेला नहीं रह सकता था। वह चिल्ला उठा, 'वे भूत-प्रेत; क्या तुम उन्हें नहीं देखते? वहाँ, वहाँ! कमरा उनसे भरा है!' कुछ दिन ऐसा ही रहने के बाद वह चीख उठा, 'देखो वह भूत बिछौने के पैताने पर! ओह वह पत्रा, वह पत्रा जो वह मेरे सामने उठाए हुए है! उसमें मेरे सब पाप लिखे हैं!' इसके कुछ ही समय बाद, आशा का ज़रा-सा भी चिह्न दिखाए बिना, वह अपना हिसाब देने चला गया।"
जहाँ निम्न श्रेणी के पादरियों में वेस्ली के विरुद्ध ऐसा अन्धा और प्रायः अपमानजनक विरोध चलता रहा, वहाँ कलीसिया के उच्च पदाधिकारियों की ओर से उनके साथ सामान्यतः बेहतर व्यवहार किया गया। फिर भी ऐसा सदा नहीं था; और एक से अधिक बार हिंसा और अन्याय का उदाहरण सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों ने रखा। लगभग 1750 में एक्सेटर के बिशप लैविंग्टन ने "मेथोडिस्टों और पोपवादियों के उन्माद की तुलना" शीर्षक एक पुस्तिका में इस आन्दोलन पर आक्रमण किया। इस क्रोध भरे लेख में वह वेस्ली के कार्य को रोमन कैथोलिक मत में छिपी वापसी बताता है, और उन पर जेसुइटों के गुप्त एजेंट होने का आरोप लगाता है।
ये आरोप झूठे तथ्यों पर आधारित थे, जिनका खण्डन और निराकरण वेस्ली ने स्वयं सरलता से कर दिया।
दस वर्ष बाद एक और बिशप, वारबर्टन, वेस्ली के विरुद्ध मैदान में उतरा, जिनके विषय में उसका मत था कि वे "आधुनिक उन्मादियों में एक अग्रणी स्थान रखते हैं।" कलीसिया के उच्च पदाधिकारी। 167 यद्यपि इस विरोधी ने अपने पूर्ववर्ती से अधिक उदारता दिखाई, फिर भी उसने स्वयं को उतना ही अक्षम सिद्ध किया कि वह उस धार्मिक आन्दोलन को समझ सके जो हो रहा था। उसे एक बर्फ़ीले ईश्वरवाद (डीइज़्म) के दृष्टिकोण से देखते हुए, वह शान्ति और जीवन के लिए तरसती आत्माओं की प्रसव-पीड़ा की निन्दा किए बिना नहीं रह सका। वेस्ली का उत्तर अपनी गहराई और अपने रूप दोनों के लिए उल्लेखनीय है: वे जिस कार्य में लगे हैं उसके आधार के रूप में परमेश्वर के आत्मा की सामर्थी कार्यप्रणाली का दावा करते हैं, जिसका प्रभाव उन्हें प्रतिदिन घटित हो रही घटनाओं में खोज लेना सरल लगा।
एक और आक्रमण, जिसने मेथोडिस्ट कार्य को शायद और अधिक हानि पहुँचाई, "मनन" के लेखक हर्वी के "ग्यारह पत्रों" का मरणोपरान्त प्रकाशन था।
ऑक्सफ़ोर्ड में वेस्ली और व्हाइटफ़ील्ड के साथ आरम्भ में जुड़े रहने के कारण उसने बाद वाले के कैल्विनवादी सिद्धान्त अपना लिए थे और उस विषय के विवाद में सक्रिय भाग लिया था। क्षणिक चिढ़ के प्रभाव में उसने वेस्ली के विरुद्ध ग्यारह तीखे पत्र लिखे, जिन्हें उसने पाण्डुलिपि में ही रखा: अपनी मृत्यु-शय्या पर उसने उन्हें लिखने पर खेद प्रकट किया और अनुरोध किया कि उन्हें आग में डाल दिया जाए। उसके निष्पादकों ने, हर्वी की मरणोपरान्त रचना से होने वाले लाभ के सिवा कुछ न सोचते हुए, इस आज्ञा का पालन नहीं किया, बल्कि कडवर्थ नामक एक व्यक्ति को पाण्डुलिपियों को संशोधित कर छपाई के लिए तैयार करने को लगाया। यह व्यक्ति वेस्ली का प्रचण्ड विरोधी था, और पूर्वाग्रह से अन्धा होकर उसने ऐसे वाक्य जोड़ देना उचित समझा जिनमें सबसे अन्यायपूर्ण आरोप थे, और उन्हें जनता के सामने रचना के वास्तविक अंश के रूप में चला दिया। इस प्रकाशन से वेस्ली के कार्य को पर्याप्त हानि पहुँचना अनिवार्य था; और विशेषकर स्कॉटलैंड में उनके शत्रुओं ने उनकी हानि के लिए इसका उपयोग किया।
कलीसिया के पादरियों में मेथोडिस्ट मत के विरुद्ध जो असहिष्णुता का आत्मा भड़क रहा था, उसका परिणाम 1767 में ऑक्सफ़ोर्ड से छह 168 | अमेरिका। विद्यार्थियों का निष्कासन हुआ, "मेथोडिस्ट सिद्धान्त रखने, और निजी घरों में प्रार्थना करने, पवित्रशास्त्र पढ़ने और भजन गाने के कारण।"
फ़्लेचर जैसे पादरी का सहयोग और मित्रता कलीसिया के उच्च पदाधिकारियों के द्वेष और दुर्व्यवहार के बीच वेस्ली के मन को भरपूर सान्त्वना देती थी। फ़्लेचर अब श्रॉपशायर के एक गरीब, पतित पल्ली मेडली में बस गया था, जहाँ उसने सचमुच प्रेरितों जैसी सेवकाई की, जिसने उसके समकालीनों के मन को प्रशंसा से भर दिया। "महोदय, वे एक ज्योति-पुंज थे!" |. वेन ने एक साथी पादरी से कहा।
"ज्योति-पुंज, मैंने कहा?
वे तो एक सूर्य थे! मैं इन पचास वर्षों में सब बड़े पुरुषों को जान चुका हूँ, परन्तु उनके समान किसी को नहीं जाना।" कवि साउदी ने उनके विषय में कहा, "किसी शताब्दी, किसी देश ने इनसे बढ़कर उत्कट भक्ति या अधिक सिद्ध प्रेम वाला मनुष्य नहीं उत्पन्न किया: किसी कलीसिया को इनसे अधिक प्रेरितों जैसी सेवकाई कभी नहीं मिली।" आत्मा और सिद्धान्तों दोनों में वेस्ली के साथ पूर्णतः एक होकर, फ़्लेचर प्रायः उनकी मिशनरी यात्राओं में उनके साथ जाता, और अपने पल्ली में मेथोडिस्ट मत की विशेषता वाले कार्य के विविध तरीके अपनाता। जिस कार्य को वह इतने हृदय से चाहता था, उसकी सेवा में उसकी वाक्पटु जीभ और लगभग प्रेरित लेखनी दोनों समर्पित थीं। हम शीघ्र देखेंगे कि अपने लेखन से वह अपने मित्र के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर कैसे लड़ा।
जिस काल पर हम विचार कर रहे हैं उसका अन्त एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना से चिह्नित हुआ, अर्थात् अमेरिका में मेथोडिस्ट मत का प्रवेश। एक ऐसी कलीसिया की नींव में, जिसके सामने इतना महान भविष्य था, परमेश्वर की प्रोविडेंस (विधान) के कार्य विशेष रूप से दृष्टिगोचर होते हैं। कुछ आयरिश प्रवासी, जिन्होंने मेथोडिस्ट मत के माध्यम से सुसमाचार पाया था, 1760 में न्यूयॉर्क में उतरे: कुछ समय बाद दूसरी टुकड़ी आई। सब धार्मिक सुविधाओं से वंचित होकर वे शीघ्र ही उदासीनता में गिर गए।
परन्तु सौभाग्य से, इन परिवारों में एक स्त्री थी, बारबरा हेक, जिसमें पवित्र अग्नि बारबरा हेक और फ़िलिप एम्बरी। 169 एक ऐसी उत्कटता से जलती थी जिसे संसारिक प्रभाव बुझा नहीं सकते थे।
एक दिन, जब कुछ प्रवासी ताश खेल रहे थे, वह अचानक कमरे में आई, और पवित्र क्रोध से भरकर ताश की गड्डी उठाकर आग में फेंक दी, और साथ ही कुछ गम्भीर चेतावनियाँ भी दीं। फिर उसने फ़िलिप एम्बरी से अपील की, जो अपने जन्म-देश में स्थानीय प्रचारक रह चुका था, और उसे गम्भीरता से समझाया कि वह अपनी स्वाभाविक झिझक पर विजय पाए और अपने घर पर सभाएँ आरम्भ करे। इस साहसिक कदम का तुरन्त प्रभाव हुआ।
एम्बरी ने पहली सभा अपने ही घर में की: उसमें पाँच व्यक्ति थे। उसने एक क्लास भी बनाई। धीरे-धीरे मसीहियों का यह छोटा दल बढ़ा: धार्मिक दृढ़ विश्वास चारों ओर फैल गए, और आराधना का स्थान खोलना आवश्यक हो गया। शीघ्र ही कैप्टन वेब नामक एक अंग्रेज़ स्थानीय प्रचारक, जिसे सैन्य कर्तव्य पर अमेरिका भेजा गया था, ने अपनी उपस्थिति और सहायता से नई संगठित सोसाइटी को प्रोत्साहित किया। वर्दी पहने इस प्रचारक के सामर्थी उपदेशों ने देश में हलचल मचा दी, और एक बड़े पुनरुत्थान का साधन बने। सभा के सभी स्थान छोटे पड़ गए, और 1768 में एक प्रार्थनालय बनाकर परमेश्वर की सेवा के लिए समर्पित किया गया। कदम-दर-कदम मेथोडिस्ट मत पेन्सिलवेनिया, मैसाचुसेट्स, मैरीलैंड और वर्जीनिया के विभिन्न भागों में फैल गया, हर जगह प्रोविडेंस के द्वार खुलने का अनुसरण करता और बल पाता गया।
इस समय तक अमेरिका की विभिन्न मण्डलियों ने अपने देश की मूल सोसाइटी से और घनिष्ठ सम्बन्ध की आवश्यकता अनुभव की।
तदनुसार वेस्ली को एक अत्यावश्यक अपील भेजी गई, और 1769 की कॉन्फ़्रेंस में प्रश्न पूछा गया, "कौन जाने को तैयार है?" रिचर्ड बोर्डमैन और जोसेफ़ पिलमूर ने स्वयं को प्रस्तुत किया। यात्रा के व्यय के लिए प्रचारकों के बीच चन्दा एकत्र किया गया; और इन लोगों ने, जो स्वयं प्रायः जीवन की आवश्यकताओं के अभाव में रहते थे, इस पहले मेथोडिस्ट मिशन की स्थापना के लिए इसके अतिरिक्त पचास पाउण्ड दिए। उनके
170 अमेरिका। न्यूयॉर्क पहुँचने पर दोनों मिशनरियों ने एक संगठित सोसाइटी पाई, जिसमें एक सौ सदस्य थे, और एक प्रार्थनालय जिसमें सात सौ व्यक्ति समा सकते थे, जो लोगों की आवश्यकताओं के लिए पहले ही इतना अपर्याप्त था कि बहुत-सी सभाएँ खुली हवा में होती थीं। नए आए प्रचारकों में से एक कहता है, "अमेरिका में परमेश्वर का वचन सुनने की ऐसी इच्छा दिखाई देती है जैसी मैंने पहले कभी नहीं देखी।"
यह उस कार्य का आरम्भ था जिसे आश्चर्यजनक विस्तार तक पहुँचना था। अनेक दृष्टियों से यह समयोचित आन्दोलन था। व्हाइटफ़ील्ड, जिनकी शक्ति पुरानी दुनिया और नई दुनिया के बीच बँटी रही थी, और जिन्होंने अमेरिका में स्वतंत्र कलीसियाओं को जगाने में बहुत कुछ किया था, उसी वर्ष अमेरिका में चल बसे जिसमें वेस्ली के प्रचारकों ने अपना मिशन आरम्भ किया। उनकी वक्तृत्व-प्रतिभा और सुसमाचारी उत्साह अतुलनीय थे, फिर भी वे संगठन-क्षमता से पूर्णतः रहित थे, और उनके सामर्थी प्रचार के अधीन जो तत्त्व पिघलकर एक हुए थे, उन्हें वे एक ठोस व्यवस्था में नहीं ढाल सके। वेस्ली का दृढ़ और बुद्धिमान प्रशासन इस कमी को दूर करने और उदासीनता तथा संसारमग्नता से जीती गई असंख्य आत्माओं को एक सुसंगठित समुदाय के बन्धनों में एकत्र करने के लिए था।
व्हाइटफ़ील्ड की मृत्यु के समाचार ने उनके महान सहकर्मी के मन को गहरे शोक से भर दिया। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके मित्र के अन्तिम अनुरोधों में से एक यह था कि वे उनके अन्त्येष्टि का उपदेश दें, तो वे गहराई से द्रवित हुए।
उन्होंने यह अनुरोध पूरा किया, और व्हाइटफ़ील्ड के बनाए तम्बू-गृह (टैबरनेकल) में दिवंगत के गुणों की उपयुक्त प्रशंसा की। उनकी आरम्भिक घनिष्ठता बहुत पहले बहाल हो चुकी थी, और उन आशीषों और परीक्षाओं के अनुभव से और गहरी हो गई थी जिनमें दोनों बहुत समय से साझेदार रहे थे।
संगठन और अनुशासन।
इंग्लैंड में मेथोडिस्ट पुनरुत्थान के आरम्भ को अब तीस वर्ष से अधिक बीत चुके थे, और पहली कॉन्फ़्रेंस को पूरे पच्चीस वर्ष, जिसने उसकी एकता स्थापित की और उसकी कलीसियाई व्यवस्था की नींव डाली थी। इस बीच वह व्यवस्था, बिना किसी गम्भीर रुकावट के धीरे-धीरे, उन प्रोविडेंस के संकेतों द्वारा ढाली गई थी जिनका अनुसरण करने में वेस्ली बहुत सावधान थे; और वर्ष-दर-वर्ष कॉन्फ़्रेंस का कार्य यही रहा था कि ऐसे संकेतों को नोट करे, और इस प्रकार अपनी देखरेख की सोसाइटियों को एक नियमित संगठन में गढ़ता जाए।
मेथोडिस्ट मत के ढाँचे में इस प्रकार क्रमशः जो जोड़ किए गए, उनका अब हम संक्षेप में वर्णन करेंगे।
वेस्ली के विचार में, और उनके सहकर्मियों के विचार में भी, जिस पुनरुत्थान को लाने में उनका इतना बड़ा हाथ था, वह कलीसियाई सुधार से अधिक कलीसिया के सिद्धान्तों और व्यवहार की ओर वापसी था।
उनके लिए संगठन के प्रश्न केवल गौण महत्त्व के थे, और उनका मूल्य मुख्यतः इसी कारण था कि वे आत्माओं के उद्धार और मसीही जीवन की उन्नति से जुड़े थे। आरम्भिक सम्मेलनों पर इसी विचार का शासन था। वेस्ली के प्रचारकों, आन्दोलन के पक्षधर पादरियों में से कुछ, व्हाइटफ़ील्ड के कुछ मित्रों और कभी-कभी कुछ सामान्यजनों को मिलाकर बने इन पहले सम्मेलनों में उन सिद्धान्तों को परिभाषित करने का कार्य होता था जो वे सिखाते थे: धर्मी ठहराया जाना, पवित्रीकरण और आत्मा की गवाही रोचक चर्चाओं के विषय थे, जिनके परिणाम बाद में प्रकाशित "कार्यवृत्त" (Minutes) में समाहित हैं। कुछ सिद्धान्तों पर वेस्ली के विचार उनके कुछ समकालीनों से भिन्न थे, और इसलिए
172 संगठन और अनुशासन। उनके हाथों उन्हें जो प्रखर व्याख्या प्राप्त हुई, उसकी आवश्यकता उत्पन्न हुई। यह यहाँ प्रस्तुत स्पष्ट और सुगठित धर्मविज्ञान पर विस्तार करने का स्थान नहीं है; इतना कहना पर्याप्त है कि आरम्भिक मेथोडिस्ट आन्दोलन के अस्तित्व के इस दूसरे चरण में उनके मत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, केवल इतना कि वर्ष बीतने के साथ वे और अधिक स्पष्ट और दृढ़ होते गए।
दूसरी ओर, अपनी सोसाइटियों के संगठन और स्थापित कलीसिया से उनके सम्बन्ध के विषय में उनके विचार घटनाओं के क्रम से बहुत बदल गए।
हम पहले देख चुके हैं कि वेस्ली ने अपना कार्य इस आशा से आरम्भ किया था कि पादरियों और उनके बीच शीघ्र ही सौहार्दपूर्ण समझ बन जाएगी। ऐसे मेल की उनकी इच्छा को हर बात ने बढ़ाया—उनकी पारिवारिक परम्पराओं, उनके मन की बनावट, उनकी स्वाभाविक सहानुभूतियों और स्वयं कार्य में उनकी रुचि ने; और केवल कटु अनुभव ने ही उन्हें उनके उदार भ्रमों से मुक्त किया। वेस्ली के कलीसियाई विचारों में आई इस क्रमिक क्रान्ति का अनुसरण करना रोचक है।
अपने पहले सम्मेलन में, जो अंशतः पादरियों से बना था, वे बिशप-व्यवस्था के अतिशयोक्तिपूर्ण दावों के विरुद्ध मसीही स्वतंत्रता के अधिकारों का निडरता से बचाव करते हैं। 1745 में हुए दूसरे सम्मेलन में, इस प्रश्न पर कि "क्या हमारे शासकों की इच्छा एक व्यवस्था नहीं है?" वे स्पष्ट शब्दों में उत्तर देते हैं,
"नहीं; किसी भी शासक की नहीं, चाहे सांसारिक हो या आत्मिक। इसलिए यदि कोई बिशप चाहे कि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ, तो उसकी इच्छा मेरे लिए कोई व्यवस्था नहीं है....मुझे मनुष्यों की अपेक्षा परमेश्वर की आज्ञा माननी है।"
स्वतंत्र रूप से कार्य करने का यह अधिकार, जिसे इस प्रकार स्पष्टता से घोषित किया गया, वेस्ली कई वर्षों से पहले ही प्रयोग में ला चुके थे: उनके लिए यह कलीसियाई सिद्धान्त बनने से पहले एक व्यावहारिक आवश्यकता थी। फिर भी यह उदारता उन कुछ पूर्वाग्रहों से जुड़ी थी जो उनकी आरम्भिक शिक्षा से उपजे थे: वे अब भी प्रेरितिक उत्तराधिकार के सिद्धान्त में विश्वास करते थे और एंग्लिकन बिशप-व्यवस्था का दृढ़ता से बचाव करते थे। फिर भी उनके
बिशप-व्यवस्था पर विचार। 173 मत इन सब बातों पर अब भी डगमगा रहे थे। ऐसा प्रतीत होता है कि आदिम कलीसिया पर लॉर्ड किंग की रचना ने उनके विचारों की प्रगति में बहुत योगदान दिया। 1746 में वे कहते हैं, "अपनी शिक्षा के तीव्र पूर्वाग्रह के होते हुए भी,"
"मैं यह मानने को तैयार था कि यह एक निष्पक्ष और सही चित्रण है; परन्तु यदि ऐसा है, तो इससे यह निकलेगा कि बिशप और प्रेस्बिटर (सारतः) एक ही श्रेणी के हैं; और मूल रूप से हर मसीही मण्डली एक कलीसिया थी जो अन्य सभी से स्वतंत्र थी।"
यहाँ कुछ संशय के साथ पुष्ट किए गए इन सिद्धान्तों को 1747 के सम्मेलन में बिना किसी हिचकिचाहट के अपना लिया गया। वेस्ली ने तब घोषित किया कि राष्ट्रीय कलीसिया "केवल एक राजनीतिक संस्था" है, और इस प्रश्न के उत्तर में, "इंग्लैंड में बिशप-व्यवस्था का ईश्वरीय अधिकार पहली बार किस युग में प्रतिपादित किया गया?" वे उत्तर देते हैं, "रानी एलिज़ाबेथ के शासन के मध्य के आसपास। उस समय तक इंग्लैंड के सभी बिशप और पादरी उन लोगों की सेवाओं को निरन्तर मान्य करते और उनमें सम्मिलित होते रहे जिनका अभिषेक बिशपीय रीति से नहीं हुआ था।" वे यह भी मानते थे कि कलीसिया समय और परिस्थितियों की माँग के अनुसार अपने संगठन में परिवर्तन कर सकती है, और उसके लिए प्रेरितिक युग की कलीसिया में कोई आदर्श ढूँढ़ना बाध्यकारी नहीं है।
फिर भी वे इन सिद्धान्तों के साथ बिशपीय अधिकार के प्रति उचित सम्मान को जोड़ने का प्रयास करते रहे। ऐसा सामंजस्य बनाए रखने की उनकी इच्छा इतनी प्रबल थी कि उन्होंने कुछ ऐसी रियायतें भी दीं जो उस कार्य की सफलता के लिए, जो परमेश्वर ने उन्हें सौंपा था, बहुत हानिकारक सिद्ध हो सकती थीं। इसलिए इसी वर्ष उन्होंने सामान्यजन-सेवकाई के विकास की कोई सीमा निर्धारित करने का प्रयास किया, ताकि पादरियों को कम अप्रसन्नता हो; और उनकी संवेदनशीलता का ध्यान रखते हुए उन्होंने अपने सहायकों को सुझाव दिया कि वे कोई नई सोसाइटी बनाए बिना प्रचार करें।
परन्तु ये जोखिम-भरी रियायतें उनके विरोधियों को सन्तुष्ट करने से कोसों दूर थीं, और साथ ही कार्य के विघटन का भय भी उत्पन्न कर रही थीं: इसलिए उन्हें शीघ्र ही त्याग दिया गया। इसके अतिरिक्त, पादरी स्वयं अपने अन्धे
174 संगठन और अनुशासन। विरोध से वेस्ली की अन्तिम हिचकिचाहटों को दूर करने और उस अधिकार की सारी प्रतिष्ठा को नष्ट करने पर तुले हुए प्रतीत होते थे जिसका वे आदर करने के अभ्यस्त थे।
अब सोसाइटियाँ स्वयं अपनी शक्ति के प्रति सचेत होने लगीं और इस विषय पर कड़ी आपत्तियाँ उठाईं: 1751 के आरम्भ में ही ऊँचे स्वर में शिकायतें की गईं।
इस प्रकार एक गम्भीर प्रश्न उठ खड़ा हुआ, जिसने उसके अन्तिम समाधान का समय आने तक—और यह समय आने में बहुत देर लगी—भारी कठिनाई उत्पन्न की।
इस बीच, जबकि सोसाइटियों की धार्मिक आवश्यकताएँ सामान्यजन प्रचारकों की सेवाओं से पूरी होती थीं, संस्कारों के लिए उन्हें एंग्लिकन पादरियों के पास जाना पड़ता था। ये पादरी न केवल सामान्यतः मेथोडिस्ट आन्दोलन के विरोधी थे, बल्कि प्रायः भक्तिहीन और संदिग्ध
चरित्र के लोग थे: इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि भक्त लोग उस हाथ से पवित्र प्रतीक ग्रहण करने में झिझकते थे जो भीड़ को उकसाने के लिए उठा था। प्रायः ऐसा होता था कि उन्हें प्रभु-भोज की मेज़ से लौटा दिया जाता था, जबकि कुख्यात पापियों को बिना किसी प्रश्न के ग्रहण कर लिया जाता था। जैसा कि हम देख चुके हैं, दोनों वेस्ली भाइयों ने स्वयं ऐसा व्यवहार सहा था।
अपनी ही अन्तरात्मा और उन कष्टों दोनों से व्यथित होकर, जिनके वे शिकार थे, सोसाइटियों ने शीघ्र ही माँग की कि संस्कार उनके अपने प्रचारकों द्वारा दिए जाएँ; परन्तु बहुत समय तक उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया। 1754 में थॉमस वॉल्श और एडवर्ड तथा चार्ल्स पेरोनेट जैसे कई प्रचारकों ने अपनी भेड़-बकरियों के आग्रह के आगे झुककर प्रभु-भोज देने का दायित्व स्वयं ले लिया। इस घटना की व्यापक चर्चा हुई और सोसाइटियों के बीच काफ़ी विवाद उत्पन्न हुआ। 1755 के सम्मेलन में, जिसमें तिरसठ से कम प्रचारक उपस्थित नहीं थे, कोई निर्णायक कदम उठाना आवश्यक समझा गया। प्रश्न को उसकी पूरी व्यापकता में रखा गया: प्रश्न यह था कि क्या उन्हें स्थापित कलीसिया से अलग हो जाना चाहिए; क्योंकि सबने अनुभव किया कि जो हुआ था, उसका वास्तविक आशय यही
था। सोसाइटियाँ और संस्कार। 175 कई दिनों तक चली निष्पक्ष और गहन चर्चा के बाद सम्मेलन में सहमति हुई कि "यह उचित था या नहीं, किसी भी प्रकार से समीचीन नहीं है।" वॉल्श और उनके मित्र शान्ति के लिए संस्कार देने से विरत रहने को सहमत हुए। वेस्ली ने उनकी भावना की सराहना की, परन्तु स्वीकार किया कि वे "उनके तर्कों का उत्तर नहीं दे सकते थे।" अपने भाई चार्ल्स को, जो इन नवाचारों के विरोधी थे, लिखे एक पत्र में वेस्ली ने लिखा, "यदि, जैसा कि मेरी महिला कहती हैं, सभी बाहरी स्थापनाएँ बाबुल हैं, तो यह स्थापना भी है। मेरे लिए इसे खड़ा रहने दो; न मैंने इसे खड़ा किया, न मैं इसे गिराता हूँ। परन्तु तुम और मैं परमेश्वर का नगर बनाएँ।"
1758 में वेस्ली ने अपनी पुस्तिका "इंग्लैंड की कलीसिया से अलग होने के विरुद्ध कारण" प्रकाशित की, जो अपने संयम और सद्विवेक के लिए उल्लेखनीय है। उसमें वे स्थापित कलीसिया के प्रति अपने लगाव का औचित्य ठहराते हैं, एक ऐसा लगाव जो जितना निःस्वार्थ था उतना ही अकृतज्ञता से चुकाया गया। 1764 में उन्होंने यही पाया, जब अपने पूर्व प्रयासों को नवीकृत करते हुए उन्होंने "पचास या साठ" इंजीली पादरियों को एक परिपत्र भेजा, उन्हें किसी सैद्धान्तिक बिन्दु पर रियायत करने के लिए नहीं, बल्कि केवल व्यावहारिक भक्ति के पुनरुज्जीवन के कार्य में अधिक सक्रिय सहयोग का प्रयत्न करने के लिए आमंत्रित करते हुए। इस घोषणापत्र की मौन उपेक्षा की गई: केवल तीन पादरियों ने इसका उत्तर देने का कष्ट उठाया। फिर भी लगभग बारह उनके अगले सम्मेलन में उनसे मिले; परन्तु उन्होंने ऐसी योजना प्रस्तावित की जिससे स्थापित कलीसिया मेथोडिस्ट आन्दोलन को पूरी तरह निगल लेती, और अपनाने के बहाने उसका प्राण ही कुचल देती।
वेस्ली को यह देखकर दुःख हुआ कि इन चर्चाओं में उनके भाई ने उन लोगों का साथ दिया जो उस संगठन के बलिदान की सलाह दे रहे थे जिसके द्वारा मेथोडिस्ट आन्दोलन ने अपनी सफलता पाई थी। अब वे भली-भाँति समझ गए कि उन्हें नियमित पादरियों से किसी सहायता की आशा को और प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए, और उन्होंने उनका सहयोग माँगे बिना अपने जीवन का कार्य जारी रखने का निश्चय किया।
176 संगठन और अनुशासन।
संस्कारों के प्रशासन का प्रश्न अब भी अनिर्णीत था, परन्तु किसी न किसी प्रकार सोसाइटियों की इच्छाओं की पूर्ति करना आवश्यक था। कुछ पादरियों की प्रत्यक्ष सहायता के अतिरिक्त, वेस्ली ने अपने कुछ सहकर्मियों के लिए बिशपीय अभिषेक भी प्राप्त करवाया था। लंदनडेरी के बिशप ने, जो आयरलैंड में वेस्ली के कार्यों को प्रोत्साहित करते थे, थॉमस मैक्सफ़ील्ड पर हाथ रखे और यह कहा, "श्रीमान, मैं आपको उस पवित्र पुरुष की सहायता के लिए अभिषिक्त करता हूँ, ताकि वह अत्यधिक परिश्रम से अपने प्राण न गँवा बैठे।" मैक्सफ़ील्ड के विमुख हो जाने से, जिसका वर्णन ऊपर किया जा चुका है, वेस्ली ने यह सहायता खो दी।
1763 में यूनानी कलीसिया के एक बिशप, इरास्मस, इंग्लैंड आए और मेथोडिस्ट आन्दोलन में उनकी इतनी रुचि जगी कि उन्होंने वेस्ली के एक प्रचारक का अभिषेक करना स्वीकार कर लिया। इस बात से भारी हलचल मची: यह स्पष्ट हो गया कि यदि वेस्ली अब भी बिशपीय अभिषेक में विश्वास करते थे, तो वे एंग्लिकन कलीसिया के विशिष्टता के दावों को निरर्थक मानते थे।
स्थापित कलीसिया के विषय में वेस्ली के मन की इस प्रत्यक्ष अनिश्चितता की कड़ी आलोचना की गई है: उन पर अपने लोगों को एक सुस्पष्ट कलीसियाई स्थान देने में हिचकिचाहट का आरोप लगाया गया है; दूसरी ओर, उन पर यह आरोप भी लगा है कि उन्होंने एंग्लिकन
कलीसिया के प्रति अत्यधिक श्रद्धा के कारण उन्हें एक झूठी स्थिति में डाल दिया। यह निश्चित है कि जीवन के बहुत उन्नत काल तक वेस्ली उस कलीसिया से सम्बन्ध-विच्छेद का विचार सहन नहीं कर सकते थे जिससे वे इतने बन्धनों से जुड़े थे: वह कलीसिया उन्हें भला-बुरा कह सकती थी और अस्वीकार कर सकती थी, परन्तु वे उसके प्रति गहरा स्नेह बनाए रखते थे; और अपने अन्तिम दिनों में भी वे सहानुभूति और कोमलता के ऐसे भाव प्रकट करते हैं जो हमें चकित करते हैं। परन्तु इसमें हम भावना की उस कोमलता के प्रमाण देखते हैं जो उनके चरित्र पर तेज़ प्रकाश डालती है।
वे उन लोगों में से थे जो पुरानी चीज़ों के प्रति गहरा आदर रखते हैं। एक जीर्ण-शीर्ण कलीसिया के सम्मुख वे उस बालक की उदात्त विनम्रता प्रदर्शित करते हैं जो अपने पिता की महिमा का सम्मान करता है, भले ही वह इतना पतित हो वेस्ली के उद्देश्यों की शुद्धता। 1 कि नाम के योग्य न रहा हो। सम्भव है उन्होंने आरम्भ से ही स्वतंत्रता का झंडा उठाया होता तो अपने और अपने संघ के हितों की बेहतर सेवा की होती: वे
इस प्रकार एक निश्चित स्थिति पा लेते और स्वयं को बहुत संघर्ष से बचा लेते: एक दल के नेता के रूप में उन्होंने और अधिक ख्याति अर्जित की होती; परन्तु सन्देह है कि वे अधिक उपयोगी सिद्ध होते। हम उनमें अधिक स्पष्ट व्यक्तित्व पहचानते; परन्तु हमें ऐसे अनुपम रूप से शुद्ध चरित्र का दर्शन न करना पड़ता।
एंग्लिकन कलीसिया के साथ मेल की आशा न रखते हुए, वेस्ली ने अपनी शक्ति उन बन्धनों को सुदृढ़ करने में लगा दी जो सोसाइटियों को उनके प्रचारकों से, और प्रचारकों को आपस में बाँधते थे। यद्यपि संस्कारों का महान प्रश्न अभी हल नहीं हुआ था, फिर भी अनभिषिक्त सेवकों के अस्तित्व मात्र से उसके समाधान का पूर्वानुमान सरलता से लगाया जा सकता था। स्थापित व्यवस्था के प्रति अत्यधिक आदर के कारण उनके अधिकार कुछ समय के लिए रोके जा सकते थे, परन्तु परिस्थितियों के बल से वे देर-सबेर अवश्य प्राप्त होने वाले थे। जिस काल की हम समीक्षा कर रहे हैं, उसमें इस समूह ने ऐसी सघनता और एकता प्राप्त कर ली कि वह धैर्यपूर्वक भविष्य की प्रतीक्षा कर सकता था।
हम देख चुके हैं कि अपने पहले सम्मेलन में वेस्ली ने घोषित किया था कि वे सामान्यजन प्रचारकों को केवल "आवश्यकता की स्थिति में" लगाते हैं, और बहुत समय तक वे उनकी बुलाहट को मात्र अस्थायी और कालिक मानते रहे। घटनाओं के क्रम ने उन्हें भिन्न निर्णय तक पहुँचाया, और अब उन्होंने अपनी पूरी शक्ति से इस संस्था को स्थायी और सुनिश्चित स्वरूप देने का परिश्रम किया। तीसरे सम्मेलन में यह गम्भीर प्रश्न रखा गया:—"हम उन लोगों की परीक्षा कैसे करें जो मानते हैं कि वे पवित्र आत्मा से प्रेरित हैं और प्रचार करने के लिए परमेश्वर द्वारा बुलाए गए हैं?"
उत्तर है, "पूछताछ करो, 1. क्या वे जानते हैं कि उन्होंने किस पर विश्वास किया है? क्या उनके हृदय में परमेश्वर का प्रेम है? क्या 178 संगठन और अनुशासन।
वे परमेश्वर के सिवा कुछ नहीं चाहते और खोजते? और क्या वे हर प्रकार के आचरण में पवित्र हैं? 2. क्या उनमें इस कार्य के लिए (अनुग्रह के साथ-साथ) वरदान हैं? क्या उनमें (कुछ सहनीय मात्रा में) स्पष्ट, ठोस समझ है? क्या परमेश्वर की बातों में उनका निर्णय सही है? क्या विश्वास द्वारा उद्धार की उनकी धारणा यथार्थ है? और क्या परमेश्वर ने उन्हें
- किसी मात्रा में वाक्शक्ति दी है? क्या वे उचित, सहज और स्पष्ट बोलते हैं? 3. क्या उन्हें सफलता मिली है?..क्या किसी को उनके प्रचार से पापों की क्षमा मिली है?"
ये पूछताछें उन परीक्षाओं की शृंखला में पहली थीं जो वेस्ली ने उन लोगों की योग्यताओं के विषय में स्थापित कीं जो भ्रमणशील सेवकाई की पंक्तियों में प्रवेश करना चाहते थे। इन्हें सम्मेलन में तभी स्वीकार किया जाता था जब वे गहन कसौटी से गुज़र चुके हों, जिसके साथ गम्भीर उपवास और प्रार्थना होती थी। कार्य में प्रवेश के बाद का वर्ष परख का वर्ष माना जाता था, और अगला
सम्मेलन उनके विषय में अन्तिम निर्णय पर पहुँचता था।
अन्तिम प्रवेश बिना किसी समारोह के होता था: उम्मीदवार को उसके भाइयों की प्रार्थनाओं द्वारा कार्य के लिए अलग कर दिया जाता था। फिर भी इस विषय में वेस्ली ने अपने कार्य करने का अधिकार सुरक्षित रखा और घोषणा की कि वे केवल वर्तमान के लिए अधिक औपचारिक अभिषेक-विधि को स्थगित कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "हम जल्दबाज़ी नहीं करेंगे; हम केवल प्रभु की व्यवस्था का अनुसरण करना चाहते हैं, जैसे-जैसे वह धीरे-धीरे मार्ग खोलती है।"
यद्यपि वेस्ली अपने सहकर्मियों के धार्मिक जीवन को प्राथमिक योग्यता मानते थे, फिर भी उन्होंने उनके बौद्धिक विकास की कदापि उपेक्षा नहीं की। आरम्भ से ही उन्होंने उनके लिए अध्ययन और नियमित पठन का पाठ्यक्रम तैयार किया। वे उन्हें परिश्रम के लिए निरन्तर प्रेरित करते रहे, और आग्रह करते रहे कि वे स्वयं की भाँति प्रातः चार बजे उठें, ताकि अपने प्रचार-कार्य के साथ अध्ययन के लिए भी समय निकाल सकें। 1766 में उन्होंने कहा, "सबसे उपयोगी पुस्तकें पढ़ो, और वह भी नियमित और निरन्तर रूप से। सारा प्रातःकाल, या कम से कम चौबीस घंटों में पाँच घंटे, इसी काम में दृढ़ता से लगाओ....परन्तु मुझे
पढ़ने में रुचि नहीं है।' तो उपयोग से उसमें रुचि पैदा करो, या अपने व्यवसाय में लौट जाओ।" नए पास्टरी-कार्य का स्वरूप। 179
अपने प्रचारकों को स्वस्थ रखने और उन्हें एक ही स्थानों में निरन्तर प्रचार करके स्वयं को थका देने से रोकने के लिए वेस्ली ने उनसे अपने सर्किट बार-बार बदलने को कहा। 1767 के सम्मेलन ने इन परिवर्तनों को व्यवस्थित किया और अनिवार्य बना दिया। सहमति हुई, "कि एक ही प्रचारक को सामान्यतः एक वर्ष से अधिक, और कभी भी दो वर्ष से अधिक एक साथ न भेजा जाए।" बाद के समय में यह अवधि तीन वर्ष कर दी गई।
प्रचारक आत्म-त्याग के सच्चे आदर्श थे। यदि उन्होंने भ्रमणशील सेवकाई में प्रवेश करते समय निर्धनता की प्रतिज्ञा नहीं ली, तो उन्होंने स्वेच्छा से आत्म-त्याग का ऐसा मार्ग अपनाया जिसे सन्त फ्रांसिस के अनुयायी भी कभी पार न कर सके। नियमों में से एक था, "किसी से धन न लो। यदि भूख लगने पर वे तुम्हें भोजन दें, या आवश्यकता पड़ने पर वस्त्र दें, तो यह अच्छा है; परन्तु चाँदी या सोना नहीं। यह कहने का कोई बहाना न रहे कि हम सुसमाचार से धनी हो रहे हैं।" सोसाइटी से अपनी दैनिक आवश्यकताएँ पाते हुए, पहले प्रचारकों को केवल इतना धन दिया जाता था कि उनकी यात्रा का व्यय चल सके, और वह व्यय भी पर्याप्त रूप से साधारण था, क्योंकि अधिकांश अपनी यात्राएँ पैदल करते थे।
उनमें से एक, जॉन जेन, इसी प्रकार वेस्ली से मिलने के लिए ब्रिस्टल से होलीहेड तक पैदल गया, और जब वह उन तक पहुँचा तो उसकी जेब में केवल तीन शिलिंग थे; और यह छोटी राशि भी यात्रा के वास्तविक व्यय से अधिक थी, क्योंकि रास्ते में हर कहीं उसे आतिथ्य मिला। उसकी मृत्यु पर उसकी सम्पत्ति उसके अन्तिम संस्कार के व्यय को पूरा करने के लिए बेची गई, और बिक्री की आय उस उद्देश्य के लिए अपर्याप्त निकली, क्योंकि कुल मिलाकर वह चालीस शिलिंग भी नहीं थी। "उसके पास जितना धन था वह एक शिलिंग और चार पेंस था।" इन तथ्यों को बताते हुए वेस्ली जोड़ते हैं, "सुसमाचार के किसी भी अविवाहित प्रचारक के लिए अपने निष्पादकों के लिए छोड़ने को यह पर्याप्त है।"
फिर भी सभी प्रचारक उक्त भाई की तरह जीवन भर अविवाहित रहने को तैयार नहीं थे; और जिन्होंने विवाह किया उन्होंने बड़े अभाव सहे। 180 संगठन और अनुशासन। कई को तो सक्रिय सेवकाई के कार्य से हटना पड़ा, ताकि वे अपने परिवारों के पालन-पोषण के साधन जुटा सकें।
1752 के सम्मेलन ने इस स्थिति का उपाय करना आवश्यक देखा, और सिफ़ारिश की कि सोसाइटियाँ भविष्य में प्रत्येक प्रचारक को वार्षिक बारह पाउंड दिया करें। यह सिफ़ारिश कई मामलों में निष्प्रभावी रही; और तेरह वर्ष बाद, 1765 में,
यॉर्क की सोसाइटी ने सचमुच सम्मेलन में एक प्रतिनिधिमंडल भेजा कि उन्हें अपने प्रचारक को यह "बड़ी" राशि देने की बाध्यता से छूट दी जाए।
इतनी छोटी और कुछ मामलों में उदारता से रहित सोसाइटियों के साथ, उनमें से कई प्रचारक भूख से मरने के संकट में पड़ जाते यदि वे अपने इंजीली परिश्रम के साथ कोई सांसारिक व्यवसाय न करते: उनमें से कई को दिन में अपने हाथों से मेहनत करनी पड़ती थी, और संध्या का समय वे अपनी सेवकाई के कार्य को देते थे। शक्ति का ऐसा विभाजन कोई अपमान नहीं था, क्योंकि उसे सन्त पौलुस के अधिकार का समर्थन प्राप्त है; परन्तु यह उनकी सेवकाई के लिए अनिवार्यतः हानिकारक था, क्योंकि वे उसे अपने समय और शक्ति का केवल सीमित भाग ही दे पाते थे। 1768 के सम्मेलन ने इस तथ्य पर ध्यान दिया और सहमति दी कि भविष्य में भ्रमणशील प्रचारक पूरी तरह अपने पवित्र कार्य के लिए अलग किए जाएँ, और अपने भरण-पोषण के लिए पूरी तरह परमेश्वर और उसकी कलीसिया पर निर्भर रहें।
अगले वर्ष यह निर्णय लिया गया कि प्रचारकों की पत्नियों को सोसाइटियों से सहायता मिले, और इस उद्देश्य से एक प्रकार का अंशदान निर्धारित किया जाए: शीघ्र ही तैंतालीस पत्नियाँ यह सहायता पा रही थीं। प्रचारकों के बच्चों के विषय में भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित किया गया, जिन्हें वेस्ली द्वारा किंग्सवुड में स्थापित विद्यालयों में एक सुव्यवस्थित संस्था मिली, जहाँ उन्हें मसीही शिक्षा दी जाती थी, जिसका व्यय आंशिक रूप से सोसाइटियाँ उठाती थीं। इसकी वृद्धि और स्थिरता। 181 इस प्रकार वेस्ली ने अपने सहकर्मियों को उन सांसारिक चिन्ताओं से मुक्त करने का प्रयास किया जो उनकी कार्यक्षमता के विरुद्ध अवश्य काम करतीं।
परमेश्वर के इन विनम्र सेवकों की उपयोगिता उस काल में, जिसका हम वर्णन कर रहे हैं, बहुत बढ़ गई थी, और मेथोडिस्ट आन्दोलन का आश्चर्यजनक विस्तार उन्हीं की देन था। उनके उल्लेखनीय परिश्रमों का संक्षिप्त चित्रण भी हमारे क्षेत्र में नहीं आता। इतना कहना पर्याप्त है कि नेल्सन, वॉल्श, हॉपर, हेम, स्टैनिफ़ोर्थ, टेलर और राइट जैसे पुरुषों ने पुनरुज्जीवन के कार्य की अमूल्य सेवा की। उन्हें ऐसा अभिषेक प्राप्त हुआ था जो उस औपचारिक अभिषेक की कमी की पूरी भरपाई करता था, जिसे बिशपों ने उनसे रोक रखा था: उनके परिश्रम पर परमेश्वर की स्पष्ट स्वीकृति उनकी सेवकाई की सर्वोत्तम मुहर थी, और संसार की अवहेलना का सर्वोत्तम उत्तर।
यदि वेस्ली ने इस जन-पास्टरी की स्थापना में प्रभु की व्यवस्था का हाथ पहचाना, तो इसकी तीव्र वृद्धि और सफलता ने उस विश्वास को लगातार दृढ़ किया। उन्होंने इस संस्था को दृढ़ और ठोस आधार देने का प्रयास किया। जहाँ उन्होंने उसके बौद्धिक स्तर को ऊँचा उठाने और उसे उसके मिशन की सच्ची भावना से भरने का यत्न किया, वहीं यह भी सोचा कि उसके अस्तित्व को किस प्रकार सबसे अच्छी तरह स्थायी बनाया जाए। यह महान प्रचारक वृद्धावस्था तक पहुँच चुका था और किसी भी समय अपने प्रतिफल के लिए उठा लिया जा सकता था। अपनी मृत्यु तक उन्हें अनिवार्यतः इस पहले से ही शक्तिशाली संगठन का जीवित केन्द्र और प्रभावी बन्धन बने रहना था; परन्तु विवेक की माँग थी कि उस समय की प्रत्याशा में उपाय अपनाए जाएँ जब यह बन्धन टूट जाएगा और केन्द्र हट जाएगा।
इस गम्भीर प्रश्न ने 1769 के सम्मेलन का ध्यान आकृष्ट किया। वेस्ली ने प्रस्ताव किया कि उनकी मृत्यु पर प्रचारक तीन, पाँच या सात प्रचारकों की एक प्रकार की सर्वोच्च परिषद नियुक्त करें, जिनमें से प्रत्येक बारी-बारी से सभापति का कार्य करे, और इस पदवी के अन्तर्गत वे
182 संगठन और अनुशासन। कार्य करे जो उन पर स्वयं आ पड़े थे। इस योजना पर गम्भीर आपत्तियाँ उठ सकती थीं, और बाद में इसमें संशोधन किया गया: अन्ततः जो योजना अपनाई गई उस पर उचित स्थान पर विचार किया जाएगा।
जबकि मेथोडिस्ट आन्दोलन में शिक्षक-समूह इस प्रकार तेज़ी से बढ़ रहा था, सोसाइटियों ने भी अनुपात के अनुसार उन्नति की।
1770 में उनके सदस्यों की संख्या 29,406 थी, जो सारे देश में फैले हुए थे, और जिनके पास पहले से ही बड़ी संख्या में प्रार्थनालय थे।
उनका संगठन क्रमशः पूरा होता गया, और साथ ही उन विशिष्ट लक्षणों को बनाए रखता रहा जिनसे वह आरम्भ से पहचाना जाता था। वर्ग-सभा पूरी सोसाइटी की धुरी बन गई। सन् 1765 से यह प्रथा सामान्य हो गई, जो कई स्थानों में पहले से चली आ रही थी, कि प्रत्येक सदस्य को समय-समय पर एक टिकट दिया जाता था, जो सदस्यता के प्रमाणपत्र का काम करता था। 1746 में, या उससे भी पहले, सारा क्षेत्र सर्किटों में बाँट दिया गया था, जिनमें से प्रत्येक एक या अधिक प्रचारकों के परिश्रम से भरा जाता था; और वर्ष-प्रतिवर्ष, जैसे-जैसे पुनरुज्जीवन फैलता गया और कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ती गई, सर्किटों की संख्या बढ़ती गई और उनका विस्तार घटता गया।
1749 के सम्मेलन ने निर्णय किया कि प्रत्येक सर्किट में त्रैमासिक सभाएँ हों, जिनका कार्य परमेश्वर के कार्य के स्थानीय हितों की देखभाल करना हो। धार्मिक उन्नति के विभिन्न साधन एक-एक करके अपनाए गए। 1749 में जागरण-रात्रियाँ और प्रेम-भोज प्रतिमाह होने लगे: 1755 में वेस्ली ने एक विशेष सेवा आरम्भ की, जिसे वाचा का नवीनीकरण कहा जाता है, जिसका उद्देश्य औपचारिक आत्म-समर्पण के एक कृत्य द्वारा सदस्यों को परमेश्वर की सेवा से बाँधना है। सोसाइटियों में उपवास और प्रार्थना के दिन भी मनाए जाते थे। इस प्रकार हमारे सामने उत्साहवर्धक और उन्नतिदायक विधियों की बड़ी विविधता प्रस्तुत होती है, जो लोगों को परमेश्वर के अनुग्रह में स्थिर करने में सहायक हुए बिना नहीं रह सकती थीं।
अनुग्रह के इन साधनों के साथ, जो सोसाइटियों के जीवन को पोषित करने के लिए बनाए गए थे, जनसमूहों में सुसमाचार प्रचार का कार्य भी निरन्तर चलता रहा; और इसे सोसाइटियों की एकता। 183
वेस्ली सदा अपना और अपने अनुयायियों का महान कार्य मानते थे। इसीलिए वे खुले आकाश के नीचे प्रचार पर बहुत ज़ोर देते हैं, जिसे प्रार्थनालयों की बढ़ती संख्या हतोत्साहित करती थी। वे धार्मिक पुस्तकों के वितरण की सिफ़ारिश करते हैं, उन्हें प्रचार के महत्त्वपूर्ण सहायक मानकर, और अपने सहायकों को युवाओं को शिक्षा देने का निर्देश देते हैं: वे चाहते हैं कि वे सुसमाचार प्रचारक के साथ-साथ पास्टर भी बनें, और उन्हें सलाह देते हैं कि वे सोसाइटियों के सदस्यों से घर-घर जाकर भेंट करें।
संगठनकर्ता की अपनी सशक्त प्रतिभा के बल पर वेस्ली ने अपनी सोसाइटियों को एक समरूप समग्र में गढ़ दिया था। यही अपने आप में कार्य की स्थिरता और स्थायित्व की गारंटी था।
फिर भी बहुत-से प्रश्न अनिर्णीत रह गए; और इन्होंने इस महान मिशनरी के अन्तिम वर्षों के विचारों को घेरे रखा। अपनी आत्मा की ऊर्जा के होते हुए भी, कभी-कभी वे अपने उत्तरदायित्व के बोझ से लगभग दबे हुए महसूस करते थे। 1766 में उन्होंने कहा, "मैंने इस अधिकार का कोई भाग नहीं चाहा; यह मुझ पर अनजाने ही आ पड़ा; परन्तु जब आ गया, तो उस तोड़े को गाड़ने का साहस न करके मैंने अपने सर्वोत्तम विवेक से उसका प्रयोग किया। फिर भी मुझे इससे कभी लगाव नहीं रहा: मैंने सदा इसे अपना बोझ माना, और अब भी मानता हूँ; वह बोझ जो परमेश्वर मुझ पर रखता है, और इसलिए मैं अभी इसे नीचे रखने का साहस नहीं करता।
परन्तु यदि आप मुझे कोई एक, या कोई पाँच पुरुष बता सकें जिन्हें मैं यह बोझ सौंप सकूँ, जो ठीक वही कर सकें और करेंगे जो मैं अब करता हूँ, तो मैं उनका और आपका हृदय से धन्यवाद करूँगा।" वे आगे कहते हैं, "दिन में दो या तीन बार प्रचार करना मेरे लिए बिलकुल बोझ नहीं है; परन्तु सब प्रचारकों और सब लोगों की चिन्ता सचमुच एक बोझ है!" वेस्ली की सेवकाई का मध्य काल समाप्त होता है
1770 के सम्मेलन के साथ। वस्तुतः यह सम्मेलन उस परमेश्वर के जन के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें विदेशी मिशनों के क्षेत्र में मेथोडिस्ट परिश्रम का आरम्भ अंकित हुआ, क्योंकि इसी वर्ष पहली बार
184 संगठन और अनुशासन।
अमेरिका सर्किटों की सूची में आया। इस सम्मेलन ने अन्तिम महान कैल्विनवादी विवाद का संकेत भी दिया।
इसी वर्ष युद्धभूमि में व्हाइटफ़ील्ड गिर पड़े, वेस्ली के महान सहकर्मी, और उस शताब्दी में उनकी बराबरी करने वाले एकमात्र पुरुष। अब केवल वेस्ली ही दृष्टि के घेरे को भरते हैं, एक ऐसे वीर हृदय के साथ जो पहले जितना ही साहसी है, और हरी-भरी वृद्धावस्था के अन्तिम दशक में अपने जीवन का महान कार्य करते हुए।
देखिए जीवन की सन्ध्या।
(1770—1791।) अध्याय I.
वेस्ली की सशक्त वृद्धावस्था।
वेस्ली अब वृद्धावस्था तक पहुँच चुके थे। उन्होंने अपनी सत्तर वर्ष की आयु को बड़ी वीरता से निभाया: जो बहुतों के लिए विश्राम का काल होता है, वह उनके लिए सक्रियता का काल था; और यद्यपि उनके हिम-श्वेत केश स्पष्ट दिखाते थे कि जीवन की शीत ऋतु आ गई है, फिर भी उनकी उष्ण और सौम्य आत्मा अब भी प्रमाण देती थी कि ऐसे मनुष्य के लिए जीवन एक सतत वसन्त है।
शारीरिक बल में अद्भुत रूप से सम्पन्न होने के कारण, उन्होंने उन्नत वृद्धावस्था में ऐसे स्वास्थ्य का आनन्द लिया जो प्रायः उन लोगों को नहीं मिलता जो सांसारिक अस्तित्व की सामान्य सीमाओं को पार कर जाते हैं। इस दशक में उन्हें दो बार बीमारी हुई, परन्तु उनके सामान्य स्वास्थ्य पर उनका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा प्रतीत होता। इनमें से एक आघात घोड़े से गिरने के कारण हुआ; दूसरा आयरलैंड में दोपहर को एक बाग़ में सो जाने से लगी सर्दी के कारण, जो उनकी भ्रमणशील जीवन-भर कभी-कभी की आदत थी। दोनों मामलों में चिकित्सा-कौशल और सावधान सेवा-सुश्रूषा ने ऐसे परिणामों को टाल दिया जो, 186 जीवन की सन्ध्या। उनकी आयु के मनुष्य के लिए, सरलता से घातक सिद्ध हो सकते थे। अपने इकहत्तरवें जन्मदिन पर वे कह सके, "मैं वैसा ही बल पाता हूँ जैसा तीस वर्ष पहले पाता था।" दो वर्ष बाद उन्होंने अपनी पत्रिका में फिर लिखा, "मैं तिहत्तर वर्ष का हूँ, और तेईस वर्ष की आयु से कहीं अधिक प्रचार करने में समर्थ हूँ।" उनकी आवाज़ पहले जितनी ही सशक्त थी: उनकी दृष्टि बेहतर थी: उनकी कार्य करने की शक्ति बहुत बढ़ गई थी। वे कहते हैं, "मुझमें वृद्धावस्था की कोई दुर्बलता नहीं है, और अपनी युवावस्था की कई दुर्बलताएँ मैं खो चुका हूँ।" इस अद्भुत शारीरिक बल का श्रेय वे कई कारणों को देते हैं। वे कहते हैं, "मुख्य कारण है परमेश्वर की प्रसन्नता, जो वह सब करता है जो उसे भाता है। मुख्य साधन ये हैं: 1. लगभग पचास वर्ष से मेरा नियमित रूप से चार बजे उठना। 2. मेरा सामान्यतः प्रातः पाँच बजे प्रचार करना; जो संसार के सबसे स्वास्थ्यप्रद व्यायामों में से एक है। 3. मेरा समुद्र या स्थल पर प्रति वर्ष साढ़े चार हज़ार मील से कम यात्रा कभी न करना।"
ये अनवरत यात्राएँ केवल उस कार्य की उन्नति के लिए ही आवश्यक नहीं थीं जिसमें वे लगे थे: वे उनके अपने अस्तित्व की आवश्यकता बन गई थीं। कभी-कभी हम उन्हें एक स्थान पर बैठे रहने के जीवन के सुखों पर क्षणिक और चिन्तनशील दृष्टि डालते पाते हैं। वे अपनी पत्रिका में कहते हैं, "मैंने एक उपयोगी और सुखद सन्ध्या उन मित्रों के बीच बिताई, जो पृथ्वी के उत्तम जनों में से हैं।
मैं कहने को प्रवृत्त हुआ, 'मेरे लिए यहीं बने रहना अच्छा है।'
परन्तु नहीं! परमेश्वर की वाणी कहती है, 'जा, और सुसमाचार का प्रचार कर।'" अपने छिहत्तरवें वर्ष में वे लिखते हैं, "मैंने यहाँ विश्राम किया।
[न्यूकैसल।] सुन्दर स्थान, और सुन्दर संगति! परन्तु मैं विश्वास करता हूँ कि एक और संसार है; इसलिए मुझे 'उठकर यहाँ से चल देना चाहिए।'" ऐसे खेद वस्तुतः बहुत कम थे। उनकी स्वाभाविक मनोदशा पूर्ण शान्ति की थी, जिसे कुछ भी विचलित नहीं कर सकता था। वे कहते हैं, "मैं अनुभव करता हूँ और दुःखी होता हूँ,
"परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से मैं किसी बात पर व्याकुल नहीं होता।" इस आदरणीय पुरुष की साहसी सक्रियता से अधिक प्रेरणादायक कुछ नहीं, जो जीवन की निराशाओं से अविचलित रहा और युवावस्था के सारे उत्साह के साथ अपने परिश्रम में लगा रहा।
वेस्ली की अक्षुण्ण लोकप्रियता। 187
अपने जीवन के इस अंतिम काल में भी वेस्ली का उतने ही हार्दिक भाव से स्वागत होता रहा जितना पहले होता था। उनकी सफलता कोई क्षणिक ज्वाला नहीं थी: वह तीस वर्ष तक बनी रही थी और निरंतर बढ़ती जा रही थी। उस पके बालों वाले प्रचारक ने अपने आरम्भिक दिनों में जीती हुई सहानुभूति को बनाए रखना जान लिया था। उनके आसपास एक नई पीढ़ी बड़ी हो चुकी थी, और बच्चे उस व्यक्ति का आदर करना सीख गए थे जिसके उत्साह और कष्टों की चर्चा उन्होंने अपने पिताओं से सुनी थी। उनके आने का समाचार ही चारों ओर से एकत्र होने वाले श्रोताओं की विशाल भीड़ सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त था। ग्वेनाप का तथाकथित "गड्ढा" जब भी वे उसमें प्रचार करते, भर जाता था; और उस सत्तर वर्षीय की वाणी अब भी हज़ारों की सभाओं को बाँधे रखती थी। बर्स्टल और लीड्स में, तथा राजधानी में भी, वे उतनी ही विशाल भीड़ को सम्बोधित करते थे जितनी पहले के दिनों में। "मैंने मूरफ़ील्ड्स में," वे 1775 में कहते हैं, "सामान्य से बड़ी मण्डली को प्रचार किया। आश्चर्य है कि लगभग चालीस वर्ष तक वही बात सुनने के बाद भी उनकी जिज्ञासा अब तक शान्त नहीं हुई।" यद्यपि उनकी यात्राएँ प्रायः पहले से निश्चित की जाती थीं, फिर भी अपनी निर्धारित सभाओं के अतिरिक्त वे अवसर मिलने पर बहुत प्रचार करते थे। यात्रा में उन्हें अक्सर रोककर प्रचार करने को कहा जाता था: कभी-कभी वे पाते कि लोगों की भीड़ अपनी ही इच्छा से एकत्र होकर उनकी प्रतीक्षा कर रही है। जब वे समाप्त कर लेते, तब भी श्रोताओं से बच निकलना सदा सरल नहीं होता था: वे जाने से इनकार कर देते और चाहते कि वे उनसे थोड़ी देर और बातचीत करें। वे लिखते हैं, "लोग चाहे जो भी कहें, जब तक लोग सुनने के लिए इतनी उत्सुकता दिखाते हैं, तब तक यह बिलकुल स्पष्ट है कि खुले आकाश के नीचे प्रचार करने का समय बीता नहीं है।"
ऐसे श्रोताओं के साथ यह आश्चर्य की बात नहीं कि वेस्ली स्वयं को अपने घर जैसा अनुभव करते थे। वे अपनी डायरी में कहते हैं, "पोर्ट्समाउथ पहुँचने से पहले मैं कुछ थका हुआ था, परन्तु मण्डली ने शीघ्र ही मुझे मेरी थकान भुला दी। सचमुच, यहाँ के लोग सामान्यतः दक्षिण इंग्लैंड के अधिकांश लोगों से अधिक उदार हैं।
वे परमेश्वर के वचन को 'पूरी तत्परता के साथ' ग्रहण करते हैं।"
188 जीवन की संध्या।
वेस्ली के प्रचार में वे विशेषताएँ सदा बनी रहीं जिन्होंने उसकी सफलता में इतना बड़ा योगदान दिया था: वह श्रोताओं की आत्माओं को भेद देता था, उन्हें उनकी जड़ता से जगा देता था और उनमें अपनी आत्मिक दुर्दशा का गहरा बोध उत्पन्न करता था। यद्यपि अब उसके साथ वे बाहरी लक्षण नहीं होते थे जो आरम्भ में इतने सामान्य थे, फिर भी मन-परिवर्तन का कार्य पहले की ही तरह जोर-शोर से चलता रहा, जैसा कि डायरियों के अभिलेखों से प्रमाणित होता है।
ग्वेनाप में एक व्यक्ति, जिसने विश्वास का इनकार कर दिया था और अपने भाइयों से मुँह मोड़ लिया था, वेस्ली के प्रचार से अपने पाप का कायल हुआ और उस कलीसिया में लौटा लिया गया जिसे उसने अपने पतन से अपमानित किया था। सेंट एग्नेस में एक उपदेश के बाद एक युवती उनके पीछे-पीछे घर में आई और "फूट-फूटकर रोती हुई चिल्ला उठी, 'मुझे मसीह चाहिए; मैं मसीह को पाकर रहूँगी।
मुझे मसीह दो, नहीं तो मैं मर जाऊँगी!'" उस वृद्ध मिशनरी ने उसे उसके उद्धारकर्ता की ओर संकेत किया; और जब वे उसके साथ प्रार्थना कर रहे थे, तब वह "अवर्णनीय आनन्द से भर गई और पुकार उठी, 'हे प्रभु, मुझे मरने दो! मुझे अभी उसके पास जाने दो! मैं यहाँ और अधिक समय तक रहना कैसे
सह सकूँगी?'"
वेस्ली के विश्वास की सामर्थ्य उनकी प्रार्थनाओं में उतनी ही प्रकट होती थी जितनी उनके प्रचार में। एक अवसर पर, जब वे सार्वजनिक रूप से प्रार्थना कर रहे थे, उनका मन अचानक एक पतित हो चुके व्यक्ति की ओर गया, जिसके पतन से बड़ा कलंक फैला था। वे अचानक बोल उठे, "हे प्रभु, क्या शाऊल भी भविष्यद्वक्ताओं में है? क्या जेम्स वाटसन यहाँ है? यदि वह यहाँ है, तो अपनी सामर्थ्य दिखा।" वह बेचारा व्यक्ति वहीं था: वह गिर पड़ा
"पत्थर की तरह, और दया के लिए ऊँचे स्वर में पुकारने लगा।"
मन-परिवर्तन के कार्य के अतिरिक्त, मेथोडिस्ट आन्दोलन के प्रभाव से सब ओर नैतिक और भौतिक परिवर्तन भी हुए थे, जिन्हें देश में अपनी यात्राओं के दौरान वेस्ली देखे बिना नहीं रह सकते थे। श्रमिक वर्ग जीवन के उच्चतर स्तर पर पहुँच गया था: कोयला खदानों के मज़दूर पूरी तरह बदल गए थे। जब वे उत्तर की यात्रा कर रहे थे और हरियाली में बसी झोपड़ियों को तथा हर वस्तु में सुख-सुविधा और प्रसन्नता का रूप देखकर प्रशंसा कर रहे थे, तब नैतिक और भौतिक परिवर्तन। 189 वे यह सोचे बिना न रह सके कि "चार में से तीन, या शायद दस में से नौ, तब बनी हैं जब से देश में मेथोडिस्ट आन्दोलन आया है।"
मेथोडिस्ट आन्दोलन स्वयं भी सब ओर तेज़ी से फैल रहा था।
यद्यपि वेस्ली के लिए चिन्ता के कुछ कारण थे, वे केवल उन समृद्धि के सुन्दर दृश्यों को और उभारते थे जो उनके सामने प्रस्तुत थे। पुनर्जागरण के आरम्भिक दिनों के प्रबल और अप्रतिरोध्य उमड़ाव के पश्चात्, प्रायः सर्वत्र, आन्तरिक उन्नति का कार्य आ गया था, जिसने दिखाया कि उसके सिद्धान्तों ने लोगों के मनों पर कितनी दृढ़ पकड़ बना ली थी। वेस्ली की डायरियाँ हमें दिखाती हैं कि सोसाइटियों की इस ऊर्ध्वगामी गति को बनाए रखने के लिए उन्होंने कितनी कुशलता से परिश्रम किया।
कॉर्नवॉल में उन्हें वही प्रोत्साहन मिला जो पहले के दिनों में मिलता था। वे कहते हैं, "हमारी पुरानी सोसाइटी के बहुत कम लोग अब बचे हैं: उनमें से अधिकांश अब्राहम की गोद में हैं। परन्तु नई पीढ़ी उसी आत्मा की है; गम्भीर, उत्साही, परमेश्वर को समर्पित, और विशेषकर सादगी और मसीही सच्चाई के लिए उल्लेखनीय।" वेल्स ने
वेस्ली के दौरों का स्वागत पहले के दिनों जैसे पूरे उत्साह से किया, और वहाँ की सोसाइटियाँ बहुत उन्नति कर रही थीं। यही बात सामान्यतः पूरे इंग्लैंड के विषय में भी कही जा सकती है। शोरहैम के विषय में, जहाँ उनके पुराने मित्र पेरोने अब भी जीवित थे, वे लिखते हैं, "पिछला पहला कैसे हो गया है! देश में कोई सोसाइटी इतनी तेज़ी से नहीं बढ़ती जितनी यह, चाहे अनुग्रह में हो या संख्या में। इस महिमामय कार्य का मुख्य साधन कुमारी पेरोने हैं, जो एक जलता और चमकता हुआ दीपक हैं।" उस पल्ली में, जहाँ उनके एक और पुराने मित्र ने परिश्रम किया था, वे कहते हैं, "जब से श्री ग्रिम्शॉ और मैं इसी स्थान के निकट एक क्रुद्ध भीड़ द्वारा पकड़े गए और कुछ घण्टे बन्दी बनाए रखे गए, तब से परमेश्वर ने क्या कुछ कर दिखाया है! जिसने उस भीड़ का नेतृत्व किया था, उसके पुत्र अब हमारी बातों को प्रसन्नता से ग्रहण करते हैं।" नॉटिंघम की सोसाइटी ने यह टिप्पणी करवाई: "इस नगर के लोगों में कुछ ऐसा है जिसे मैं बहुत पसन्द किए बिना नहीं रह सकता: यद्यपि हमारी सोसाइटी के अधिकांश लोग निम्न वर्ग के हैं, जो मुख्यतः मोज़े बनाने के काम में लगे हैं, फिर भी उनके स्वभाव में सामान्यतः एक असाधारण कोमलता और मधुरता है, और उनके आचरण में कुछ शिष्टता है, जो ठोस, जीवित धर्म के साथ मिलकर उन्हें अपने पेशे का एक आभूषण बना देती है।" 190 जीवन की संध्या।
उत्तर में वियरडेल में, जहाँ की जनसंख्या मुख्यतः सीसा-खदानों के मज़दूरों की थी, एक उल्लेखनीय जागृति हुई। असंख्य लोगों का मन-परिवर्तन हुआ और सारा क्षेत्र हिल उठा। वेस्ली इस आदर्श
सोसाइटी का वर्णन इन शब्दों में करते हैं:—"दो बातों में यह सोसाइटी सदा विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है: एक यह कि उन्होंने प्रचारकों के लिए सब आवश्यक वस्तुएँ जुटाने में सबसे अधिक उदारता दिखाई है: दूसरी यह कि वे विवाह के विषय में विशेष रूप से सावधान रहे हैं। उन्होंने सामान्यतः आपस में ही विवाह किए हैं; और वह धन के लिए नहीं, परन्तु सद्गुण के लिए। इसलिए... वे अपने बच्चों के पालन-पोषण में एक-दूसरे की सहायता करते हैं; और परमेश्वर ने इसमें उन्हें विशेष रूप से आशीष दी है। क्योंकि उनके अधिकांश परिवारों में दस वर्ष से अधिक आयु के अधिकतर बच्चे परमेश्वर की ओर फिर चुके हैं।"
इस काल में वेस्ली ने कई बार स्कॉटलैंड की यात्रा की, और उनके प्रचार की धनी-निर्धन दोनों ने सराहना की, यद्यपि उसे वह उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली जो ग्रेट ब्रिटेन के अन्य भागों में मिली थी। स्थापित कलीसिया के मंच सर्वत्र उनके लिए खुले थे: पर्थ के निवासियों ने उन्हें अपने नगर की स्वतंत्रता प्रदान की। वेस्ली इस मित्रता पर अपने को बधाई दिए बिना न रह सके: फिर भी उन्होंने शिकायत की कि सुसमाचार के सत्यों को वे ठण्डे और प्रभावहीन ढंग से ग्रहण करते थे। वे उनके लिए एक पहेली थे, और वे उनके लिए।
आयरलैंड कहीं अधिक फलदायी क्षेत्र था; और यहाँ उनकी सफलता पहले जितनी ही बड़ी थी। केवल प्रमुख आबादी वाले केन्द्रों में जाकर सन्तुष्ट न होकर, वे अज्ञानी और उपेक्षित निवासियों को उद्धार का शुभ समाचार सुनाने के लिए पहाड़ी इलाकों के दूरतम कोनों तक पहुँचे। जो दृश्य उन्होंने देखे वे ऐसे थे जो उनके मिशनरी जीवन के आरम्भिक वर्षों की याद दिलाते थे। यहाँ हम
उत्तर। आयरलैंड। 191 उन्हें एक जंगल में, एक पुराने बलूत की छाया में प्रचार करते पाते हैं, जब डूबते सूर्य की किरणें डालियों के बीच खेल रही हैं। वहाँ वे एक सार्वजनिक बगीचे में खड़े होते हैं, जबकि भीड़ चारों ओर हरी घास पर बैठी है।
उधर एक पुराने किले के आँगन में तम्बू खड़ा किया गया है, और उसकी छाया से वे सैनिकों की एक रेजिमेंट को सम्बोधित करते हैं, जो उनके ओजस्वी और लगभग सैनिक-सी वाणी को उत्साह से सुनती है।
आयरलैंड के लोग अपने प्रिय प्रचारक के प्रति सामान्यतः इतने सद्भावी थे कि उन्हें सुनने के लिए वे किसी भी समय अपना काम छोड़ देते थे। एक बाज़ार-दिवस पर कॉर्क में उनका आगमन सबके लिए अपना माल छोड़ देने का संकेत बन गया, और प्रचार समाप्त होने तक वे उसके पास नहीं लौटे। जब वे ब्लैकपूल में प्रचार कर रहे थे, तब वर्षा होने लगी, परन्तु प्रचारक और श्रोता दोनों समान रूप से अडिग रहे, और उपदेश पूरा होने तक कोई नहीं हिला।
एक-दो बार याजकों द्वारा उकसाई गई भीड़ ने थोड़ी हूटिंग और पथराव किया; परन्तु ये आक्रमण शीघ्र रोक दिए गए और व्यवस्था पूरी तरह बहाल हो गई।
वास्तव में आयरलैंड का कार्य पूर्ण उन्नति पर था: सदस्यों की संख्या निरन्तर बढ़ती गई, और अनेक स्थानों पर सोसाइटियों की उदारता से बड़े और सुविधाजनक चैपल बनाए गए। फिर भी, जहाँ वे समृद्धि के इन प्रचुर प्रमाणों पर आनन्दित थे, वहीं वेस्ली उन खतरों के प्रति सजग थे जो इसमें निहित थे। एथलोन के विषय में वे कहते हैं, "अब न धनवानों की ओर से कोई विरोध है, न निर्धनों की ओर से। इसका परिणाम यह है कि कोई उत्साह नहीं है, क्योंकि लोग 'चैन से रहते हैं।' ओ, पृथ्वी की कौन-सी दशा खतरे से मुक्त है! जब सताव उठता है, तो कितने ठोकर खाते हैं! जब नहीं उठता, तो कितने ठण्डे पड़ जाते हैं और अपना 'पहला प्रेम' छोड़ देते हैं! कुछ तूफ़ान में नष्ट होते हैं, परन्तु कहीं अधिक शान्ति में। 'हे प्रभु, बचा, नहीं तो हम नाश हुए!'"
ग्रेट ब्रिटेन में भीड़ पर सर्वत्र विजय पाई जा चुकी थी, और विरोधी अपना मुँह दिखाने का साहस नहीं करते थे, वेस्ली के प्रति लोगों की भावनाएँ इतनी बदल चुकी थीं। यदि कभी
192 जीवन की संध्या। कुछ दुष्ट लोग उपद्रव का विचार करते, तो उन्हें शीघ्र ही पूरा और निष्पक्ष न्याय मिल जाता।
उनके रक्षक कभी-कभी उन्हें आवश्यकता से अधिक सुरक्षा दे देते थे। एक शरारती व्यक्ति, जिसने अपनी चिल्लाहट से प्रचार में बाधा डाली, को गर्मजोशी से स्वागत मिला, और वह कीचड़ से लथपथ होकर घटनास्थल से चला गया।
एक और व्यक्ति, एक शराबी, जिसके उद्दण्ड व्यवहार ने मण्डली को विचलित किया, उसकी पत्नी ने उसे आड़े हाथों लिया; उसने उसे कॉलर से पकड़ा और लाभदायक ताड़ना देने के बाद, लोगों की जय-जयकार के बीच उसे घर ले गई। प्रायः भीड़ न्याय की अधिक दृढ़ भावना प्रदर्शित करती थी, और कानून को अपने हाथ में लेने के बजाय उपद्रवियों को निकट के दण्डाधिकारियों के हवाले करके सन्तुष्ट रहती थी। दण्डाधिकारी स्वयं भी बाद में सम्मानित पुरुषों के समान व्यवहार करने लगे। इस पूरे दशक में केवल एक अपवाद दर्ज है: एक महापौर ने दो सिपाहियों को बाज़ार में वेस्ली के प्रचार को रोकने के लिए भेजा; परन्तु वे अपने काम से लज्जित थे और अपने स्वामी की बात मानने के बजाय अपने विवेक की मानना उन्हें अच्छा लगा।
लोगों के मनों पर वेस्ली का जो प्रभुत्व इस प्रकार स्थापित हुआ, वह उनके व्यक्तिगत चरित्र के कारण था। इसका प्रमाण इस तथ्य से मिलता है कि ठीक इसी समय अन्य प्रचारकों को भीड़ की हिंसा से बहुत कष्ट उठाना पड़ा।
विलियम डार्नी के साथ रूखा व्यवहार किया गया, उन्हें कीचड़ में घसीटा गया, और असहिष्णु पुरोहित-वर्ग द्वारा भड़काई गई भीड़ ने उन्हें पैरों तले रौंदा। जॉन ओलिवर को सुसमाचार प्रचार करने के कारण कारागार में डाल दिया गया। नेल्सन, माथर, टेलर,
रोड्डा, जो वेस्ली के सबसे कुशल सहायकों में गिने जाते थे, ने भी ऐसा ही व्यवहार सहा। परन्तु वेस्ली जानते थे कि जन-साधारण की बुरी भावनाओं को कैसे वश में किया जाए: उनके वचन की सामर्थ्य और उनकी लम्बी सेवा की प्रतिष्ठा ने पूर्वाग्रह को परास्त कर दिया: हिम-श्वेत केशों से मुकुटित उस शान्त मूर्ति की उपस्थिति में वह फटकारा हुआ-सा खड़ा रह जाता था।
यह प्रभाव वे केवल वहीं नहीं चलाते थे जहाँ वे भली-भाँति जाने जाते थे, बल्कि उन स्थानों में भी जहाँ वे पहली बार गए थे।
लोगों का व्यवहार। 193
रेडमायर में उन्हें केवल ठण्डा स्वागत मिला। वे कहते हैं, "जब मैं नगर से होकर गुज़रा, तो लोग चारों ओर घूर-घूरकर देखते खड़े थे, मानो हम कोई विचित्र जीवों का दल हों। मैंने गली में प्रचार किया, और वे शीघ्र ही हर दिशा से, क्या छोटे क्या बड़े, इकट्ठे हो गए। मैंने बड़ों को याद दिलाया कि उन्होंने मुझे तीस वर्ष पहले देखा था, जब मैंने वेन्सली के गिरजे में प्रचार किया था; और एक बार फिर ज़ोर देकर कहा, 'प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा।' जब मैं नगर से होकर वापस लौटा, तो उसका रूप ही नया था। लोग अत्यन्त विनम्र थे: वे चारों ओर झुककर प्रणाम और अभिवादन कर रहे थे। दो घण्टे में ऐसा परिवर्तन मैंने बहुत कम देखा है।"
यद्यपि लोगों के स्वभाव में ऐसा सुधार हुआ था, फिर भी यह स्वीकार करना उचित होगा कि यह उच्च वर्गों द्वारा निम्न वर्गों को सिखाया नहीं गया था: इसके विपरीत, सहिष्णुता और संयम का उदाहरण निम्न वर्ग ने ही प्रस्तुत किया। लम्बे समय तक वे लोग, जो सामाजिक पद और बुद्धि के कारण जन-साधारण में व्यवस्था के प्रति उचित आदर जगाने के योग्य होने चाहिए थे, सारा आत्म-सम्मान भूल गए, और एक साधारण जनों की सभा की उपस्थिति में अत्यन्त अशोभनीय व्यवहार करते रहे, जिस सभा का व्यवस्थित और गरिमामय आचरण उन्हें लज्जित कर सकता था।
वेस्ली अनेक अवसरों पर उन "लोगों की, जिन्हें अंग्रेज़ी शिष्टाचार सज्जन कहता है, परन्तु जो नाविकों या खदान-मज़दूरों से भी बुरा व्यवहार करते हैं," कड़ी शिकायत करते हैं। एक से अधिक बार इन शान्ति भंग करने वालों को उन लोगों से योग्य फटकार मिली, जो शिक्षा में उनसे निम्न होते हुए भी सद्बुद्धि और सामान्य शिष्टता में उनसे आगे थे। एक व्यक्ति ने, जो एक साईस को, जिसने उसे टोका था, अपशब्द कह रहा था, कहा, "क्या तुम समझते हो कि मुझे एक बग्घी के छोकरे से सीखने की ज़रूरत है?" "सचमुच, श्रीमान, मैं समझता हूँ कि आपको है," लड़के ने कहा, और वह "सज्जन" भौंचक्का रह गया।
पादरी-वर्ग वेस्ली के विरुद्ध अपने प्राचीन पूर्वाग्रहों को बहुत हद तक छोड़ चुका था। यदि कोई एक बिशप अब भी मेथोडिस्टों को संस्कार देने से इनकार करके उन पर प्रतिबन्ध लगाता था,
0) 194 वेस्ली की सशक्त वृद्धावस्था। जैसा आइल ऑफ़ मैन में हुआ, तो दूसरे उनकी उपलब्धियों की श्रेष्ठता को पहचानते थे और उनके महान नेता के प्रति सच्चा सम्मान दिखाते थे। जो मंच कभी उनके विरुद्ध दृढ़ता से बन्द थे, वे एक-एक करके खोले गए, और गिरजाघर उन विशाल मण्डलियों के लिए बहुत छोटे सिद्ध हुए जो अपनी छतों के नीचे उस वाणी को सुनने इकट्ठी होती थीं जो चालीस से अधिक वर्षों से गलियों और जंगलों की प्रतिध्वनियों को जगा रही थी।
वेस्ली की यात्राएँ निरीक्षण की अनेक भेंटें थीं, जिनका उद्देश्य उन्हें परमेश्वर के कार्य की वास्तविक स्थिति से अवगत रखना था। इस आत्मिक अधीक्षकता के लिए वे अद्भुत रूप से उपयुक्त थे; और वह इंग्लैंड के बिशपों की अधीक्षकता से कहीं अधिक वास्तविक थी और कहीं अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली थी। उनके पास न केवल उस सेनापति की व्यापक दृष्टि थी जो एक ही दृष्टि में सारा युद्धक्षेत्र देख लेता है, बल्कि सूक्ष्म जाँच की उससे भी दुर्लभ क्षमता थी, जो किसी ब्यौरे की उपेक्षा नहीं होने देती।
सोसाइटियों के अपने निरीक्षण में वे न केवल उनके सामान्य और सामूहिक हितों का ध्यान रखते थे, बल्कि उन हितों का भी जो अधिक विशेष और स्थानीय थे। उन्हें अक्सर विरोधी पक्षों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभानी पड़ती थी, और वे यह इतनी निष्पक्षता, तथा इतनी विवेकशीलता और चतुराई से करते थे कि अपना उद्देश्य पूरा करने में उन्हें बहुत कम ही असफलता मिलती थी।
वास्तव में सोसाइटियाँ अब भी आन्तरिक अनुशासन के प्रश्नों से उत्तेजित थीं, और इस उत्तेजना को खुली फूट बनने से रोकने में वेस्ली की कुशलता की परीक्षा हुई। फिर भी वे इन कठिनाइयों के समाधान के लिए परमेश्वर की व्यवस्था पर निर्भर रहे, और सदा अपनी
सोसाइटियों के मन में मेथोडिस्ट आन्दोलन के मिशन के व्यावहारिक स्वरूप को बैठाने के लिए चिन्तित रहे।
वे 1778 में अपने प्रचारकों से कहते हैं, "ध्यान रखो, तुम्हारा काम इतनी बार प्रचार करना और इस या उस सोसाइटी की देखभाल करना नहीं है, बल्कि जितनी आत्माओं को बचा सको बचाना; जितने पापियों को सम्भव हो मन फिराव तक लाना, और अपनी पूरी सामर्थ्य से उन्हें उस पवित्रता में उन्नत करना—जिसके बिना कोई प्रभु को नहीं देखेगा।"
पादरी के रूप में वेस्ली। 195
प्रचारक के रूप में वेस्ली की श्रेष्ठता को शायद आत्माओं की देखभाल में उनकी कुशलता ने भी पीछे छोड़ दिया। उनकी बड़ी सभाएँ उन्हें लगभग निष्फल प्रतीत होती थीं, सिवाय इसके कि वे उन लोगों के साथ निकट और व्यक्तिगत बातचीत का मार्ग तैयार करती थीं जिन पर आत्मिक प्रभाव पड़ा था। उनके पासबानी के परिश्रम उनके लिए उनके मंच-सम्बन्धी प्रयासों के अनिवार्य पूरक थे।
क्लास-मीटिंग उनकी संगठन-प्रतिभा की उन रचनाओं में से एक थी जिन्होंने कार्य को इतनी स्थिरता और स्थायित्व दिया। वे उसके महत्त्व को पूरी तरह समझते थे, और मेथोडिस्ट तंत्र के इस भाग के व्यवस्थित संचालन को बढ़ावा देने का सर्वत्र प्रयत्न करते थे। जहाँ भी वे जाते, कक्षाओं में जाते और प्रत्येक सदस्य की स्थिति की व्यक्तिगत जाँच करते। अपने असंख्य कार्यभारों के बावजूद वे निरन्तर पासबानी भेंटों में लगे रहते, और नियमित अन्तराल पर अपनी बड़ी
सोसाइटियों—लंदन, ब्रिस्टल और न्यूकैसल—के सभी सदस्यों से उनके अपने घरों में भेंट करते। रोगियों को उनकी सहानुभूति में स्थान प्राप्त था; उनके व्यापक अध्ययन ने उन्हें चिकित्सा-ज्ञान का भण्डार दिया था, जिससे वे उनकी शारीरिक तथा आत्मिक दोनों आवश्यकताओं की सेवा कर सकते थे; और लंदन में उन्होंने एक औषधालय स्थापित किया, जहाँ निर्धनों को दवा निःशुल्क बाँटी जाती थी।
इन पासबानी भेंटों के दौरान वे प्रायः घोर दुर्दशा के प्रत्यक्षदर्शी बने। वे 1777 में कहते हैं, "मैंने बेथनल-ग्रीन की बस्ती में रहने वाले हमारी सोसाइटी के सदस्यों से भेंट करना आरम्भ किया। उनमें से बहुतों को मैंने ऐसी निर्धनता में पाया जिसकी कल्पना बिना देखे बहुत कम लोग
कर सकते हैं। ओ, परमेश्वर का भय मानने वाले सब धनवान निर्धनों से निरन्तर भेंट क्यों नहीं करते! क्या वे अपने खाली समय का कुछ भाग इससे उत्तम रीति से बिता सकते हैं? निश्चय ही नहीं....
अगले दिन सोसाइटी के एक और भाग में भेंट करते हुए मैंने ऐसा ही एक और दृश्य देखा। मैंने ऐसी दुर्दशा कहीं नहीं पाई, यहाँ तक कि न्यूगेट के कारागार में भी नहीं। एक निर्धन पुरुष अभी-अभी अपने रोग-शय्या से घिसटता हुआ अपनी चिथड़ों में लिपटी पत्नी और तीन छोटे बच्चों के पास आया था, जो आधे से अधिक नंगे थे, और 196 वेस्ली की सशक्त वृद्धावस्था। अकाल की साक्षात् मूर्ति थे; तभी किसी ने रोटी का एक टुकड़ा भीतर लाकर दिया, तो वे सब दौड़ पड़े, उस पर झपटे और पल भर में उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। कौन आनन्दित न होगा कि एक और संसार है?"
ऐसी दुर्दशा के प्रति वेस्ली का हृदय सदा सहानुभूति से उमड़ता रहता था। उनके मितव्ययी जीवन और सादे स्वभाव ने उन्हें अपने साधनों का एक बड़ा भाग परोपकार के कार्यों में लगाने में समर्थ किया। एक अवसर पर, जब वे आयरलैंड में थे, उनकी गाड़ी एक दलदल में फँस गई: जब लोग उसे निकालने का प्रयत्न कर रहे थे, एक निर्धन व्यक्ति वहाँ से गुज़रा, और वेस्ली ने उसकी गहरी उदासी देखकर कारण पूछा। उस व्यक्ति ने उन्हें बताया कि उसे घर से निकाले जाने का खतरा है, क्योंकि उसके मकान-मालिक ने बीस शिलिंग के बकाया किराए के लिए उसे निकाल देने की धमकी दी थी। वेस्ली ने उसके हाथ में एक सॉवरेन रख दिया, और वह निर्धन व्यक्ति घुटनों के बल गिर पड़ा और चिल्ला उठा, "अब मेरे पास सिर छिपाने को घर होगा," और अपनी पूरी शक्ति से अपने उपकारी के लिए प्रार्थना करने लगा। वेस्ली कहते हैं, "मैं विश्वास करता हूँ कि
परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना का उत्तर हमें दलदल से निकलने में सहायता देकर दिया।"
वे अब भी कारागारों के उत्साही दर्शक थे, और एक से अधिक बार उन्हें दण्डित अपराधियों को उस उद्धारकर्ता तक ले जाने का सुख मिला जिसने पश्चाताप करने वाले अपराधी को क्षमा किया। 1767 में उनका डॉ. डॉड से, जो एक प्रसिद्ध आंग्लिकन प्रचारक और चतुर लेखक थे, कुछ तीखा विवाद हुआ था; डॉ. डॉड अन्य बहुतों की तरह मेथोडिस्ट आन्दोलन के संस्थापक से भिड़ना चाहते थे। दस वर्ष बीत गए, और वेस्ली अपने इस पुराने विरोधी को लगभग भूल चुके थे, तभी उन्हें एक सन्देश मिला कि वे तुरन्त उनके पास आएँ। पहले के दिनों का वह प्रतिभाशाली प्रचारक जालसाज़ी के आरोप में कारागार में था। उस पर आरोप सिद्ध हुआ था कि उसने अपने एक पूर्व शिष्य लॉर्ड चेस्टरफ़ील्ड की हस्तलिपि की नक़ल करके धन प्राप्त करना चाहा; और उन दिनों के कठोर कानून के अनुसार दण्ड मृत्यु था। पश्चाताप से व्यथित और परमेश्वर से मेल करने की इच्छा से, उस अभागे
डॉ. डॉड की मृत्यु। 197 व्यक्ति ने वेस्ली से सलाह माँगी, और इस प्रकार उस व्यक्ति की भक्ति को सच्चा सम्मान दिया जिस पर उसने कभी इतना उग्र आक्रमण किया था। वेस्ली की उससे जो भेंटें हुईं, उनमें उसने सच्चे पश्चाताप के सब चिह्न प्रकट किए।
उसके मृत्युदण्ड से दो दिन पहले वे उससे फिर मिलने गए, और जब उसकी पत्नी उससे विदा ले रही थी तब वहाँ उपस्थित थे। यह एक हृदयस्पर्शी दृश्य था। वेस्ली ने जो प्रोत्साहन दिए, उनके उत्तर में उसने कहा, "ओ श्रीमान, मुझ जैसे पापी के लिए इस संसार में किसी आनन्द की आशा करना उचित नहीं। मैं अधिक से अधिक शान्ति चाह सकता हूँ; और परमेश्वर की दया से वह मुझे मिली है।" वेस्ली आगे कहते हैं, "शुक्रवार प्रातः जब वह आँगन में उतरा तो सब बन्दी इकट्ठे थे।
वह पूर्णतः शान्त प्रतीत हुआ। परन्तु जब उसने देखा कि उनमें से अधिकांश हाथ उठाकर उसके लिए प्रार्थना कर रहे हैं, उसे आशीर्वाद दे रहे हैं और ऊँचे स्वर में रो रहे हैं, तो वह पिघल गया, वह भी फूट-फूटकर रो पड़ा, और उसने प्रार्थना की कि
परमेश्वर उन सब को आशीष दे। जब वह फाटक से बाहर आया, तो एक असंख्य भीड़ प्रतीक्षा कर रही थी, जिनमें से बहुत-से उसका अपमान करने को तैयार प्रतीत होते थे। परन्तु जिस क्षण उन्होंने उसे देखा उनके हृदय बदल गए, और वे भी उसे आशीर्वाद देने और उसके लिए प्रार्थना करने लगे.... उसके साथी बन्दियों में से एक पूर्ण निराशा में दिखाई दिया। डॉ. डॉड ने अपने को भूलकर उसे सान्त्वना देने का प्रयत्न किया और प्रतिज्ञाओं को दृढ़ता से लागू किया। कुछ समय प्रार्थना में बिताने के बाद उसने टोपी अपनी आँखों पर खींच ली, और गिरकर पल भर में मर गया-सा प्रतीत हुआ। मुझे कोई सन्देह नहीं कि उस क्षण स्वर्गदूत उसे अब्राहम की गोद में ले जाने को तैयार थे।"
यद्यपि आरम्भ में ब्रिस्टल मेथोडिस्ट आन्दोलन का मुख्यालय था, फिर भी शीघ्र ही लंदन ने मानो अधिकार से वह स्थान ले लिया। वहाँ वेस्ली ने अपनी सबसे बड़ी स्थापना रखी, और वहीं से वे अपनी मिशनरी यात्राओं पर निकलते थे। वर्तमान काल के आरम्भ में 1739 में खुला फ़ाउंडरी चैपल अब भी प्रमुख मेथोडिस्ट पवित्रस्थान था, और वह वास्तव में एक महान इतिहास का गर्व कर सकता था। 1778 में उसके स्थान पर एक अधिक विशाल और सुविधाजनक चैपल बना, 198 वेस्ली की सशक्त वृद्धावस्था।
सिटी-रोड में, जिसके निर्माण के लिए धन पूरे कनेक्शन से अपील करके जुटाया गया। सिटी-रोड चैपल, जो अब भी लंदन में मेथोडिस्टों का एक प्रमुख उपासना-स्थल है, तब आंग्लिकन कलीसिया के दायरे के बाहर राजधानी का सबसे सुन्दर धार्मिक भवन था; और वह सदा उन उद्देश्यों के लिए, जिनके लिए वह बना था, एक अद्भुत रूप से उपयुक्त निर्माण रहेगा।
लंदन में अपने छापाखाने से वेस्ली असंख्य प्रकाशन निकालते रहे, जिनसे सम्बन्धित साहित्यिक श्रम ही एक सक्रिय व्यक्ति का पूरा समय लेने के लिए पर्याप्त होता। 1773 में उन्होंने अपनी रचनाओं का तेईस खण्डों में एक संस्करण प्रकाशित किया। 1778 में उन्होंने एक मासिक पत्रिका, "आर्मीनियन मैगज़ीन", का प्रकाशन आरम्भ किया, जिसका सम्पादन उन्होंने जीवन के अन्त तक किया, और जो अब भी "वेस्लियन-मेथोडिस्ट मैगज़ीन" के नाम से चल रही है। उनकी व्यस्त लेखनी की रचनाओं में हम अमेरिकी उपनिवेशों के विद्रोह से उत्पन्न कुछ राजनीतिक पुस्तिकाओं का उल्लेख कर सकते हैं, जिनमें वे इस विषय को पूर्णतः
अंग्रेज़ दृष्टिकोण से देखते हैं। साथ ही, प्रधानमंत्री लॉर्ड नॉर्थ को लिखे एक वाक्पटु पत्र में वे हिंसक उपायों के प्रयोग के विरुद्ध सशक्त तर्क देते हैं और मेल-मिलाप की नीति की वकालत करते हैं।
इस अध्याय को समाप्त करने से पहले हमें उस बड़े विवाद के विषय में कुछ शब्द कहने होंगे जो 1770 में वेस्ली के अनुयायियों और उनके दिवंगत महान सहकर्मी व्हाइटफ़ील्ड के अनुयायियों के बीच कैल्विनवाद के विशिष्ट सिद्धान्तों को लेकर छिड़ा। इस विवाद में वेस्ली केवल अप्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित थे। इसका आरम्भ 1770 के सम्मेलन द्वारा मेथोडिस्ट आन्दोलन के मूल धर्म-सैद्धान्तिक सिद्धान्तों की पुनःपुष्टि से हुआ, जिसमें प्रचारकों को विशेष रूप से व्यवस्था-विरोधी (एण्टिनोमियन) भूलों से सावधान किया गया था। "मिनट्स", जिनमें सम्मेलन के विचार, शायद अत्यधिक संक्षिप्त रूप में, सम्मिलित थे, दुर्भाग्य से उन गम्भीर प्रश्नों को फिर जगा बैठे जिन्हें बहुत वर्षों से सोने दिया गया था। व्हाइटफ़ील्ड के
कैल्विनवादी विवाद। 199 शिष्यों ने उस दस्तावेज़ को अपने ऊपर आक्रमण समझा, और उनके शब्दों का स्वाभाविक अर्थ बिगाड़कर घोषित किया कि वेस्ली पेलेजियनवाद के पक्षधर बन गए हैं। इस कथन का खण्डन उनका सारा बीता हुआ जीवन था; परन्तु शान्ति के लिए उन्होंने "मिनट्स" का अर्थ समझाना स्वीकार किया, और घोषणा की कि वे अपने ऊपर लगाई गई भूलों के उतने ही विरोधी हैं जितने पहले थे। फिर भी ये स्पष्टीकरण धार्मिक
कलह की लहर को रोकने में असमर्थ रहे, और बहुत समय तक इस सम्बन्ध में पुस्तकें और पुस्तिकाएँ बढ़ती गईं। वेस्ली स्वयं अखाड़े में नहीं उतरे, परन्तु उन्हें अपने मित्र फ्लेचर में एक योग्य समर्थक मिला।
यदि इस विवाद का और कोई परिणाम न भी होता, केवल इस समर्पित पुरुष की उल्लेखनीय प्रतिभा के प्रकट हो जाने का ही, तो भी उसने एक योग्य उद्देश्य पूरा किया होता। परन्तु उसने इससे आगे बढ़कर निन्दित आर्मीनियन सिद्धान्त को ठोस नींव पर स्थापित किया, और उसके विरोधियों को सिद्ध कर दिया कि वह केवल उत्साही लोगों का निराधार स्वप्न नहीं है।
इन विषयों पर देश भर में कलह का सामान्यतः थम जाना और कैल्विनवादियों द्वारा चरम विचारों का क्रमशः त्याग बहुत हद तक इसी काल के वाद-विवादात्मक परिश्रम के कारण है।
यद्यपि ये चर्चाएँ अनेक मनों के लिए चिन्ता का कारण थीं, फिर भी उन्होंने मेथोडिस्ट आन्दोलन के विकास में बाधा नहीं डाली।
यह दशक निश्चय ही प्रगति का काल था, और इससे 14,651 सदस्यों और 52 भ्रमणशील प्रचारकों की स्पष्ट वृद्धि हुई। इंग्लैंड और अमेरिका में सदस्यों की कुल संख्या 1780 में बढ़कर 52,334 हो गई; जबकि भ्रमणशील प्रचारकों की संख्या 213 थी, इसके अतिरिक्त कई सौ स्थानीय प्रचारक भी थे। अमेरिका में कार्य ने अद्भुत प्रगति की थी, इतनी कि वेस्ली को अपने कलीसियाई जीवन के सबसे उल्लेखनीय कदमों में से एक उठाना पड़ा।
इन दस वर्षों में प्रचारकों के दल का बहुत विकास और सुदृढ़ीकरण हुआ था। नए भर्ती हुए लोगों में थे फ्रांसिस एस्बरी, अमेरिकी
200 वेस्ली की सशक्त वृद्धावस्था।
मेथोडिस्ट आन्दोलन के जनक और उसके प्रथम बिशपों में से एक; जोसेफ़ बेन्सन, टीकाकार, जो मेथोडिस्ट विचार रखने के कारण ऑक्सफ़ोर्ड से निकाले जाने के बाद कनेक्शन के महान प्रकाशों में से एक बने;—सैमुअल ब्रैडबर्न, मेथोडिस्ट आन्दोलन के डेमॉस्थनीज़, जिनके विषय में डॉ. क्लार्क ने कहा कि उन्होंने उनके समान कभी नहीं सुना;—जेम्स रॉजर्स, उत्साही सुसमाचार-प्रचारक;—जॉन
वाल्टन, एक युवा फ्रांसीसी, जिसने अपने देश में गायक-मण्डली के सदस्य के रूप में मिस्सा मनाने के बाद वेस्ली के चुने हुए साथियों में स्थान पाया और कई पुनर्जागरणों का साधन बना;—हेनरी मूर, वेस्ली के प्रथम जीवनी-लेखक, जो मेथोडिस्टों के बीच पैंसठ वर्ष की सेवकाई में उनके सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक रहे;—और अन्त में
डॉ. कोक, जिन्होंने मेथोडिस्ट आन्दोलन से अपने को जोड़ने के लिए कलीसिया में अपना एक अच्छा पद त्याग दिया और उसके उज्ज्वलतम आभूषणों में से एक तथा उसके महान मिशनरी उद्यम के संस्थापक बने।
ऐसे आगमनों ने वेस्ली के प्रचारकों को उच्चतर स्थिति दी और इस संगठन के भविष्य की गारंटी बनाई। वह भविष्य वास्तव में पहले ही सुरक्षित था: पुनर्जागरण का महान कार्य अब ऐसे पुरुषों को सौंपा जा रहा था जिनकी भक्ति और बुद्धि वेस्ली की मृत्यु के बाद उसकी निरन्तरता सुनिश्चित करती थी।
इस विषय में वे स्वयं पूर्णतः सन्तुष्ट थे, जैसा कि उस आशापूर्ण स्वर से प्रकट होता है जिसमें उन्होंने एक मित्र को इस प्रकार लिखा:— "लूथर की यह टिप्पणी कि 'धार्मिक पुनर्जागरण शायद ही तीस वर्ष से अधिक चलता है,' कई देशों में अनेक बार सत्य सिद्ध हुई है। परन्तु यह सदा सही नहीं रहेगा। इंग्लैंड में धर्म का वर्तमान पुनर्जागरण पहले ही पचास वर्ष चल चुका है। और परमेश्वर का धन्यवाद हो, उसके चलते रहने की सम्भावना कम से कम उतनी ही है जितनी बीस या तीस वर्ष पहले थी। वास्तव में यह कहीं अधिक सम्भावित है; क्योंकि यह न केवल पहले से अधिक फैलता है, बल्कि पहले से अधिक गहरा भी उतरता है; अधिकाधिक लोग गवाही दे पाते हैं कि मसीह का लहू सब पाप से शुद्ध करता है। इसलिए हमारे पास आशा करने का कारण है कि धर्म का यह पुनर्जागरण चलता रहेगा और निरन्तर बढ़ता रहेगा, उस समय तक जब सारा इस्राएल उद्धार पाएगा, और अन्यजातियों की परिपूर्णता आ जाएगी।"
अध्याय II. अन्तिम वर्ष।
1780—1790, वेस्ली ने प्रायः प्रार्थना की थी, "हे प्रभु, मुझे निरर्थक होने के लिए जीवित न रहने दे!" वे कहा करते थे, "अवकाश और मैंने एक-दूसरे से विदा ले ली है। यदि मेरा स्वास्थ्य अनुमति दे, तो मेरा विचार है कि जब तक जीवित रहूँ, व्यस्त रहूँ।" परमेश्वर ने उनके हृदय की इच्छा पूरी की, और उत्तम शारीरिक गठन के कारण वे एक लम्बे जीवन के अन्त तक अपना प्रेरितीय परिश्रम जारी रख सके। इक्यासी वर्ष की आयु में वे लिखते हैं,
"मैं इक्यासी वर्ष की आयु में उतना ही सशक्त हूँ जितना इक्कीस वर्ष में था; बल्कि कहीं अधिक स्वस्थ हूँ, क्योंकि जो सिरदर्द, दाँत-दर्द और अन्य शारीरिक रोग मेरी युवावस्था में मुझे सताते थे, उनसे मैं अनजान हूँ। हम केवल यही कह सकते हैं, 'प्रभु राज्य करता है!'
जब तक हम जीवित हैं, आओ हम उसी के लिए जीएँ।" एक वर्ष बाद उनकी दैनिकी में यह आश्चर्यजनक टिप्पणी मिलती है:—"परमेश्वर की भली व्यवस्था से मैंने अपनी आयु का बयासीवाँ वर्ष पूरा किया। क्या परमेश्वर के लिए कुछ भी कठिन है? अब ग्यारह वर्ष हो गए हैं कि मैंने थकान जैसी कोई बात अनुभव नहीं की: बहुत बार मैं तब तक बोलता हूँ जब तक मेरी आवाज़ बैठ नहीं जाती और मैं और नहीं बोल सकता; प्रायः मैं तब तक चलता हूँ जब तक मेरी शक्ति चुक नहीं जाती और मैं और आगे नहीं चल सकता; फिर भी तब भी मुझे थकान का कोई अनुभव नहीं होता, बल्कि सिर से पाँव तक मैं पूरी तरह सहज रहता हूँ। मैं इसे स्वाभाविक कारणों का फल कहने का साहस नहीं करता: यह परमेश्वर की इच्छा है।"
वेस्ली की जीवन-शैली शारीरिक बल के लिए अत्यन्त अनुकूल थी। वे नियमित रूप से भोर में चार बजे उठते और उतनी ही नियमितता से पाँच बजे प्रचार करते थे; वे जल्दी विश्राम के लिए चले जाते और गहरी नींद सोते थे, और पचास वर्ष से उन्होंने एक रात की भी नींद नहीं खोई थी।
जैसा कि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया, इसका बहुत कुछ श्रेय उनकी आदतों की नियमितता को था 202 अंतिम वर्ष> और उससे भी अधिक उनके आत्मा की शान्ति को, जो उन्हें प्रत्येक बात में परमेश्वर का हाथ देखने योग्य बनाकर बोझिल चिन्ताओं से बचाए रखती थी।
जहाँ उनकी शारीरिक शक्तियाँ बुढ़ापे की उस जर्जरता से मुक्त प्रतीत होती थीं जो सामान्यतः वृद्धावस्था का भाग होती है, वहीं उनकी बुद्धि ने भी अपनी अद्भुत स्पष्टता उसी मात्रा में बनाए रखी।
उनके एक जीवनीकार का कथन है, "उनके साथी उनमें बौद्धिक क्षय का कोई चिह्न नहीं देख पाते थे, और न ही आलोचक उनके लेखों में कोई चिह्न ढूँढ़ सकता है। बचपन की मानसिक दुर्बलता के सामान्य लौट आने के बिना भी, उसकी निर्मल और सरल ताज़गी तथा जीवंतता का कुछ पुनरागमन स्पष्ट दिखाई देता है।
उनके दैनिक जीवन में मानो अधिक धूप चमकने लगी है; वे प्रकृति के सुन्दर प्रभावों और पुस्तकों का उल्लेख अधिक बार करते हैं; वे एरिओस्तो और तास्सो की तुलना और समालोचना करते हैं; कभी-कभी वे नाटक-पाठ और उसकी समीक्षा में भी रुचि लेते हैं; वे ओस्सियन की कविता के प्रश्न पर, जो उस समय साहित्यिक मंडलियों में प्रचलित था, उत्साहपूर्वक चर्चा करते हैं; वे संक्षिप्त किन्तु चित्रात्मक अंशों में अपने खुले में प्रचार के दृश्यों और अपनी यात्राओं के भू-दृश्यों को लिखते हैं, और अभिजात वर्ग के उद्यानों को पहले से अधिक बार देखने जाते हैं तथा पहले से अधिक विस्तार से उनका वर्णन करते हैं। 'सुरुचिपूर्ण' भवन (यह शब्द वे नए मेथोडिस्ट प्रार्थनालयों के लिए प्रायः आनन्द से प्रयोग करते थे), उत्तम संगीत और भव्य प्राचीन खंडहर उनकी प्रशंसा जगाते हैं....वे कोई प्यूरिटन मूर्ति-भंजक नहीं हैं।
उत्तर में वसन्त के फूट पड़ने और गाने वाले पक्षियों के लौट आने से वे तरोताज़ा हो जाते हैं। एक ऐसे स्थान के विषय में, जहाँ सुन्दर बगीचा और आस-पास के चरागाहों के चारों ओर छायादार राह थी, वे लिखते हैं, 'मैं यहाँ कितनी प्रसन्नता से कुछ देर विश्राम करता!' किन्तु 'इस संसार में मेरे लिए विश्राम नहीं है!'* एलेक्ज़ेंडर नॉक्स कहते हैं, "ऐसा सुन्दर वृद्ध पुरुष
मैंने कभी नहीं देखा। उनके मन का आनन्द उनके चेहरे पर चमकता था; उनकी हर दृष्टि दिखाती थी कि वे 'भली-भाँति बिताए हुए जीवन की आनन्दमय स्मृति' का कितना पूर्ण आनन्द ले रहे थे!
वे जहाँ कहीं गए, उन्होंने अपने सुख का एक अंश चारों ओर फैलाया। * स्टीवन्स, मेथोडिज़्म का इतिहास, खण्ड 2, पृ. 197, 198।
वृद्धावस्था में रूप-रंग 203। जहाँ गम्भीर और संजीदा लोग उनकी बुद्धिमत्ता से मोहित होते थे, वहाँ उनके निर्दोष विनोद की चुलबुली बातें युवाओं और लापरवाह लोगों को भी आनन्दित करती थीं: और दोनों उनकी अटूट प्रसन्नता में सच्चे धर्म की उत्कृष्टता देखते थे। उनमें तो वृद्धावस्था भी बिना बादल की सन्ध्या के समान सुहावनी प्रतीत होती थी, और उन्हें देखकर यह तीव्र इच्छा न करना असम्भव था, 'मेरा अन्त भी उसके समान हो!'"
मसीह के इस वृद्ध राजदूत के मुख को आदर और यहाँ तक कि श्रद्धा की भावनाओं के बिना निहारना असम्भव था। यद्यपि वे कद में छोटे थे, उनकी मुखाकृति गहन गम्भीरता को प्रकट करती थी, जो वस्तुतः कठोरता की सीमा तक पहुँचती थी। उनकी चमकीली, भेदक आँखें एक सुघड़ और भावपूर्ण मुख को विशेष दीप्ति से आलोकित करती थीं: उनका बड़ा और ऊँचा माथा बुद्धिमान पुरुष को सूचित करता था, जबकि उनके दृढ़ता से बन्द होंठ ऊर्जा और निर्णय-क्षमता वाले पुरुष का परिचय देते थे। कन्धों तक लहराते हिम-श्वेत लम्बे केशों से सुशोभित सारा मुखमंडल देखने वालों पर अनोखा मनमोहक प्रभाव डालता था। आन्तरिक शान्ति उनके चेहरे को एक मधुर, भावपूर्ण मुस्कान से दीप्त करती थी। जब यह आदरणीय पुरुष राजधानी की सड़कों पर उस तेज़ चाल और गम्भीर मुद्रा से चलता, जो उसने कभी नहीं छोड़ी, और मानो अब भी समय के एक-एक क्षण को मोल लेने में लगा हो, तो राहगीर स्वतः रुक जाते और गहन आदर के साथ अभिवादन करते; और ऐसा करके वे उनके भली-भाँति बिताए हुए जीवन की नैतिक महानता को सम्मान देते थे।
परन्तु विशेष रूप से पुलपिट में ही इस वृद्ध पुरुष ने सबसे गहरा प्रभाव डाला: वहीं उनके चरित्र की महिमा सबसे अधिक प्रभावशाली रूप से प्रकट होती थी। हमारे पास एक भावपूर्ण चित्र आया है, जो फ़ाउंडरी
चैपल की एक बग़ल की बेंच से एक प्रतिभाशाली चित्रकार ने बनाया था, जो कलीसिया का सदस्य था। उसमें प्रचारक को जीवन्त रूप में दिखाया गया है, जो पवित्र मंच पर खड़ा है और ठीक प्रचार करने की मुद्रा में है। सिर आगे की ओर झुका है और मुखमंडल
204 अंतिम वर्ष। लगभग रहस्यमय भक्ति की दीप्ति से प्रकाशित है: प्रमुख भाव अवर्णनीय कोमलता का है, जो स्पष्टतः उत्साहपूर्ण अपीलों में अभिव्यक्त हो रही है, और जो ऐसी वाणी से कही जा रही हैं जो सम्भवतः पहले जितनी मधुर नहीं रही, फिर भी सशक्त और भावविह्वल स्वर निकालने में समर्थ है। वर्षों के बीतने ने उनके मुख पर रेखाएँ खींच दी हैं; पर इससे न तो युवावस्था की अग्नि गई है और न प्रौढ़ता का बल; और मिला-जुला भाव उनके मन के जटिल चरित्र से भली-भाँति मेल खाता है। इसे मूसा और सन्त यूहन्ना का संयोग कहा जा सकता है। वस्तुतः अपने प्रचार में उन्होंने इन दो लगभग विरोधी रूपों को मिलाया था: यहूदी व्यवस्थापक की कठोरता और प्रिय शिष्य की कोमलता।
उनकी वाग्मिता, जिसने आधी शताब्दी से अधिक समय तक अपने श्रोताओं पर इतना असीम प्रभुत्व रखा, सबसे सच्चे प्रकार की मसीही वाग्मिता थी, जो किसी छिछली वक्तृत्व-कला की गँदली धाराओं से नहीं, वरन् अनन्त सत्य के जीवित सोतों से भरती है।
अंग्रेज़ जाति पर वेस्ली के प्रभाव का सही अनुमान लगाने के लिए हमें उनके प्रचार-दौरों में उनके पीछे चलना होगा। इंग्लैंड की सभी काउंटियों ने इस अस्सी वर्षीय पुरुष के मुख से अनन्त जीवन का वचन सुना। वे अब भी दिन में दो और तीन बार प्रचार करते थे, जबकि चार या पाँच घंटे की यात्रा उनके मन को तनिक भी हतोत्साहित नहीं करती थी।
वे जहाँ कहीं गए, गहनतम आदर के चिह्नों से उनका स्वागत हुआ, और उनके वचन अब भी लोगों में उत्साह जगाते थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो वे अपनी सहानुभूति और सम्मान के प्रदर्शन से पिछली परीक्षाओं की स्मृति मिटाने का प्रयत्न कर रहे हों। वेस्ली की सेवकाई के अन्तिम काल के क्रम पर एक शीघ्र दृष्टि डालना पर्याप्त होगा।
ग्रिम्स्बी में उन्होंने गिरजे के आँगन में प्रचार किया, जहाँ सारी आबादी उन्हें सुनने के लिए एकत्र हुई। विटनी में उन्होंने एक भयंकर तूफ़ान से उत्पन्न भय का लाभ उठाया और विशाल भीड़ को मृत्यु और न्याय के महान दृश्यों पर प्रचार किया, जिसके बाद चौंतीस व्यक्ति
निरन्तर यात्राएँ 205। उनके पास आए और सोसाइटी में प्रवेश माँगा। एपवर्थ में उन्होंने पहले से कहीं बड़ी मंडली को प्रचार किया: वे गहरी भावुकता के साथ उस गिरजे के आँगन में गए, जहाँ उन्होंने अपने पिता की समाधि-शिला पर प्रचार किया था, और अपने पुराने साथियों की पंक्तियों में मृत्यु द्वारा बनाई गई रिक्तियों पर विचार करते हुए उन्होंने कहा, "यह बहुत सत्य है कि 'एक पीढ़ी जाती है, और दूसरी पीढ़ी आती है:' पृथ्वी अपने निवासियों को वैसे ही खोती है जैसे वृक्ष अपने पत्ते झाड़ता है।" किंग्सवुड में उन्हें उन कोयला-खदान मज़दूरों के बीच रहकर, जिन्हें उन्हीं के द्वारा सभ्य बनाया गया था, और चालीस वर्ष पहले अपने हाथ से लगाए हुए वृक्षों की दोहरी पंक्ति की छाया में उन्हें प्रचार करके बड़ा आनन्द हुआ; और अतीत की स्मृतियों से उनके वचन को मानो नई शक्ति मिलती प्रतीत हुई। बर्सलेम में उन्होंने घोषणा की थी कि वे अपने प्रिय समय, भोर के पाँच बजे, प्रचार करेंगे; पर लोगों की अधीरता इतनी बड़ी थी कि वे निर्धारित समय से बहुत पहले एकत्र हो गए, और चार बजे के कुछ ही देर बाद वादकों का एक दल संगीत और गायन के साथ उन्हें प्रार्थनालय तक ले जाने आ पहुँचा। बिंग्ली में उनके एक सहायक को मंडली के एक भाग को प्रचार करना पड़ा जबकि वे दूसरे भाग को प्रचार कर रहे थे, क्योंकि उनकी आवाज़ सब तक नहीं पहुँच सकती थी। न्यूआर्क में नगर के अधिकारियों ने अनुरोध किया कि वे उन्हें सम्मानित करते हुए उनके सामने प्रचार करें। प्लिमथ में उन्हें भीड़ के सिरों के ऊपर से उठाकर पुलपिट तक ले जाना पड़ा, "और एक गम्भीर विदाई के बाद," वे कहते हैं, "हमने छह बजे घोड़ागाड़ी ली, और अपने पीछे ऐसी ज्वाला छोड़ी जैसी पहले कभी नहीं जली थी।
परमेश्वर करे कि वह कभी बुझाई न जाए!" बोल्टन में उन्होंने कई पासबानों की सहायता से बारह-तेरह सौ सहभागियों को प्रभु-भोज दिया।
चेस्टर में उन्हें वहाँ अब तक की सबसे बड़ी मंडली मिली। कैसल-कैरी के विषय में उन्होंने कहा, "समय कैसे बदल गया है! हमारे जो पहले प्रचारक यहाँ आए थे, उन्हें उत्साही भीड़ ने घोड़ों के तालाब में फेंक दिया था: अब ऊँच-नीच सब उस वचन को गम्भीरता से सुनते हैं जो समर्थ है
206 अंतिम वर्ष। उनके प्राणों का उद्धार करने में।" ग्लॉस्टर के विषय में भी वे लिखते हैं, 'क्रूस की लज्जा (परमेश्वर की ऐसी ही इच्छा है) समाप्त हो गई है।
ऊँच-नीच, धनी-निर्धन, सब एक साथ उमड़ आते हैं, और मानो वचन को निगल जाते हैं। मैंने चट्टान पर निर्माण करने के विषय में प्रचार किया और पूरी स्पष्टता से बोला। मेरा विश्वास है कि बहुतों का हृदय छिद गया; क्योंकि वह प्रभु की सामर्थ्य का दिन था।"
ऐसे कथन वेस्ली की लेखनी से निरन्तर निकलते रहे, और उनकी दैनिकी का हर पृष्ठ प्रमाणित करता है कि उनके प्रचार ने वृद्धावस्था में वही प्रभाव उत्पन्न किया जो उनकी पूर्ण युवावस्था में किया था। वह अब भी विवेकों को झकझोरता था, और प्रायः, जैसे कोलफ़र्ड में, "ज्वाला भड़क उठी। बहुत-से ज़ोर से चिल्ला उठे, बहुत-से भूमि पर गिर पड़े, बहुत-से अत्यन्त काँपने लगे; पर सब परमेश्वर के प्यासे प्रतीत होते थे, और उसकी सामर्थ्य की उपस्थिति से ओत-प्रोत थे।" पश्चात्ताप करने वालों की सिसकियाँ और उद्धार पाए हुओं के आनन्द-भरे उद्गार अब वेस्ली के प्रचार में एकमात्र बाधाएँ थे, और उनकी खुले आकाश की सभाओं में लोगों के अत्यधिक उत्साह से उत्पन्न होने वाली गड़बड़ी के सिवा कोई अव्यवस्था नहीं होती थी।
कॉर्नवॉल में वेस्ली की यात्रा सचमुच एक अभिनन्दन-यात्रा थी: हर नगर में सारी आबादी उन्हें सुनने निकल पड़ी। ट्रूरो में असाधारण तूफ़ान के बावजूद एक बड़ी मंडली एकत्र हुई, और उनके उपदेश से सब इतने गहरे प्रभावित हुए कि अपने प्राणों का उद्धार कराने के लिए पूरी तरह दृढ़ दिखाई दिए। रेड्रुथ में हर ओर से हज़ारों-हज़ार लोग उमड़ आए, और उन्होंने न केवल सड़कें बल्कि सारी खिड़कियाँ भर दीं, जबकि कुछ लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए घरों की छतों पर चढ़ गए। फ़ालमथ में, जहाँ चालीस वर्ष पहले वे भीड़ के हाथों मृत्यु से बाल-बाल बचे थे, उन्होंने लोगों के विशाल जमघट के बीच नगर में प्रवेश किया। "ऊँच-नीच नगर के एक छोर से दूसरे छोर तक सड़क के दोनों ओर खड़े थे, निरे प्रेम और स्नेह से, मुँह बाए और टकटकी लगाए, मानो राजा की सवारी जा रही हो।" सारे देश में प्रार्थनालय
कॉर्नवॉल और आयरलैंड 207। लोगों को समाने के लिए बहुत छोटे थे, और उन्हें प्रायः सार्वजनिक स्थानों में प्रचार करना पड़ता था, जो पहले भीड़ के साथ उनके संघर्षों के अखाड़े रहे थे।
आयरलैंड में भी ऐसे ही दृश्य हुए, जहाँ हर स्थान पर उनका उत्साहपूर्ण स्वागत हुआ। जब वे कॉर्क के निकट पहुँच रहे थे, तो घुड़सवारों के तीस व्यक्तियों का एक जत्था उन्हें नगर में ले जाने के लिए उनसे मिला।
उनके आगमन से गहरी हलचल मच गई, और उनके प्रचार को बड़ी सफलता मिली। महापौर ने उन्हें अपने घर आमन्त्रित किया और उन्हें नगर के "सिंह" (दर्शनीय स्थल) दिखाए: फ़ादर ओ'लेरी नामक एक कैथोलिक पादरी ने, जिसने कभी समाचार-पत्रों में उनसे युद्ध किया था, उनके साथ भोजन किया और अत्यन्त आदर प्रकट किया। ऑगलन में उन्हें ऐसी मंडली मिली जैसी उन्होंने उस राज्य में कभी नहीं देखी थी: हर ओर आनन्द के आँसू और चीखें सुनाई देती थीं, जो केवल इतनी दबाई जाती थीं कि उनकी आवाज़ न डूबे। एनिस्किलन में भी, जो "पहले सिंहों की माँद" था, पर जहाँ "सिंह मेमने बन गए थे," यही प्रभाव उत्पन्न हुए; और अनेक मनफिराव ने वहाँ उनके परिश्रम को पुरस्कृत किया।
पहाड़ों के बीच भी, उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि लोगों की भीड़-की-भीड़ उनके प्रचार में उमड़ रही है। वे कहते हैं, "कोई सोचेगा कि ये सब लोग कहाँ से आए; वे मानो भूमि से फूट निकले।" आयरलैंड में, इंग्लैंड की तरह, कार्य पूर्ण उन्नति पर था: कुछ वर्षों से वह तीव्र गति से आगे बढ़ रहा था। डबलिन की सोसाइटी अब भी तीनों राज्यों की सबसे उन्नतिशील सोसाइटियों में से एक थी, और 1787 में वेस्ली ने उसके विषय में कहा कि राजधानी की सोसाइटी के सिवा महत्त्व में वह किसी से कम नहीं।
इस भली-भाँति अर्जित लोकप्रियता का वेस्ली ने केवल अपने स्वामी की महिमा बढ़ाने के लिए उपयोग किया। भाग्यशाली होता वह चित्रकार जो उनके पीछे-पीछे चल सकता और उनके असंख्य लोगों के लिए उनके इन अन्तिम वर्षों के मर्मस्पर्शी या भव्य दृश्यों के चित्र सुरक्षित रख पाता,—ग्वेनैप के अर्धवृत्ताकार रंगमंच में ऐसे श्रोताओं के सामने उनका प्रचार, जैसे व्हाइटफ़ील्ड ने सम्भवतः कभी नहीं देखे; रेड्रुथ की सड़क में, 208 अंतिम वर्ष। जहाँ चकित जनसमूह खिड़कियों और छतों पर लटके थे और आसपास की सड़कों में भी ठसाठस भरे थे; न्यूगेट में मृत्युदंड पाए हुए सैंतालीस पुरुषों को उनका सम्बोधन, 'जिनकी बेड़ियों की झनझनाहट बहुत भयानक थी;' किन्तु जिनमें से अधिकांश टूटे हृदय से सिसकते रहे जब वे घोषणा कर रहे थे कि एक मन फिराने वाले पापी के विषय में स्वर्ग में आनन्द होता है; या न्यूकैसल-अंडर-लाइम के निकट की रात्रि का दृश्य, जब उस अथक प्रेरित के रुपहले केश निर्मल चाँदनी में चमक रहे थे, और वे 'कड़कड़ाती ठण्ड में' गाँव के वृक्षों के नीचे ऐसी भीड़ को प्रचार कर रहे थे जो प्रार्थनालय में समा सकने वालों से चार गुनी थी।"*
अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में वेस्ली पहले से कहीं अधिक सोसाइटियों को सुदृढ़ करने और उन्हें अपने बिछोह के अनिवार्य क्षण के लिए तैयार करने में लगे रहे। इन प्रयत्नों से जो संगठन बना, उसका वर्णन किसी अन्य अध्याय में किया जाएगा। किन्तु यह असम्भव था कि ऐसी व्यवस्थाएँ कुछ कठिनाइयों को जन्म दिए बिना की जा सकें, और इनके साथ स्थानीय प्रकृति की अन्य कठिनाइयाँ भी जुड़ गईं, जैसी उस जैसे विशाल संघ में, जिसकी उन्होंने स्थापना की थी, अपेक्षित ही थीं।
बाथ में एक प्रचारक ने खुले रूप से उनके अधिकार के विरुद्ध विद्रोह किया, और अपने साथ नियुक्त किए गए सहकर्मी के अधिकारों को मानने से इनकार कर दिया, और इस प्रकार सोसाइटी में फूट पड़ गई। बर्स्टल और ड्यूज़बरी में उच्छृंखल प्रवृत्ति के लोगों ने, जो सारा अनुशासन उतार फेंकना चाहते थे, ऐसे ही विभाजन उत्पन्न किए। ऐसी दरारों को भरना किसी भी समय कठिन और नाज़ुक कार्य था, पर उस संकट की आशंका में विशेष रूप से, जो अब निकट था: अवज्ञा की भावना, एक बार छूट जाने पर, उस जीवित बन्धन के हट जाने के बाद जो सोसाइटियों को जोड़े हुए था, उन्हें पूर्ण विघटन तक पहुँचा सकती थी। वेस्ली के मन के लिए यह भी कष्टदायक था कि उन्हें ऐसे कार्य में लगना पड़े, ऐसी आयु में * स्टीवन्स, खण्ड 2, पृ. 244, बच्चों के प्रति प्रेम 209। जो विश्राम और शान्ति के लिए पवित्र होनी चाहिए थी।
परन्तु उनका कर्तव्य-बोध इतना प्रबल था कि वे अपनी सुविधा या सुख की चिन्ता करें; और वे भली-भाँति जानते थे कि कुछ सोसाइटियों में फैली बुराइयों के लिए आवश्यक उपचार कैसे लगाए जाएँ, उस दृढ़ता और संयम के मेल के साथ जो सब उत्तम शासन का सार है।
वृद्ध पासबान की उपस्थिति मात्र ही प्रायः कटुतम झगड़े को शान्त करने के लिए पर्याप्त होती थी: उनके स्वभाव की मिलनसारिता सबसे हठी विरोधियों को भी जीत लेती थी: उनके आत्मा की शान्ति संक्रामक थी।
वेस्ली के चरित्र की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक बच्चों के प्रति उनका प्रेम था। प्रारम्भ में ही उन्होंने स्वयं को उनके आत्मिक हितों के लिए समर्पित कर दिया था, जिनकी अब तक प्रायः उपेक्षा की गई थी। उन्होंने अपने प्रचारकों को आग्रह किया कि वे उनकी बड़ी सावधानी से देखभाल करें, और वे सदा पूछते रहते कि उन्होंने अपने कर्तव्य के इस भाग को कैसे निभाया है। इन परिश्रमों के उत्तम परिणाम निकले, और अनेक बच्चे परमेश्वर की ओर फिरे और सोसाइटी से जुड़े। किंग्सवुड में स्थापित विद्यालय में कई बार उल्लेखनीय जागृतियाँ आईं, और वह सचमुच "भविष्यद्वक्ताओं का विद्यालय" बन गया। इस महान प्रचारक के लिए अपने युवा विद्यार्थियों के बीच कुछ दिन ठहरने के समान कोई मनोरंजन इतना आनन्ददायक नहीं था: वे मानो अपना जीवन फिर से जी रहे हों और उनकी संगति में फिर से जवान हो रहे हों।
उन्हें उनकी पढ़ाई की देखरेख करना और उनके प्रयत्नों को प्रोत्साहित करना प्रिय था: उन्होंने उनके उपयोग के लिए प्राचीन क्लासिकी ग्रन्थों के विशेष संस्करण तैयार किए, और युवाओं के उपयुक्त व्याकरण तथा अन्य पुस्तकें संकलित कीं। उनकी उपस्थिति और प्रभाव मानो उनके मनों को मोह लेते थे। ल्यूटन में एक ऐसे विद्यालय में, जहाँ अनुशासन का बहुत अभाव था, उनकी भेंट से अत्यन्त उल्लेखनीय प्रभाव उत्पन्न हुए। वीयरडेल में उन्होंने तीस बच्चों को सोसाइटी का सदस्य बनाया। एक स्थान पर प्रचार के बाद बच्चों का एक दल उनके पास आया, और उन्होंने घुटने टेककर अत्यन्त उत्साह से उनके लिए प्रार्थना की। rid 210 | अंतिम वर्ष।
दूसरे स्थान पर उन्होंने सड़क को बच्चों से भरा पाया, जो उनके साथ परमेश्वर के भवन तक गए, और सभा समाप्त होने पर तब तक नहीं हटे जब तक उन्होंने उन सब से हाथ न मिला लिया। ये घटनाएँ दिखाती हैं कि बच्चे उनके स्नेह को अनुभव करते थे और बदले में उन्हें स्नेह देते थे।
रविवारीय पाठशालाओं की स्थापना को आरम्भ से ही वेस्ली की हार्दिक स्वीकृति मिली। जैसे ही 1783 में रॉबर्ट रेक्स ने इस विषय पर अपनी पुस्तिका प्रकाशित की, वेस्ली ने उसे "आर्मीनियन मैगज़ीन" में पुनः छापा। सन् 1784 की अपनी दैनिकी में वे उनके विषय में लगभग भविष्यसूचक शब्दों में कहते हैं: "मैं देखता हूँ कि मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ ये पाठशालाएँ उग रही हैं: सम्भव है कि परमेश्वर का इसमें उससे गहरा उद्देश्य हो जितना मनुष्य जानते हैं। कौन जाने इन पाठशालाओं में से कुछ मसीहियों की पौधशालाएँ बन जाएँ?" 1787 में उन्होंने एक प्रचारक को लिखा, एक पाठशाला की स्थापना पर उसे बधाई देते हुए, और यह जोड़ते हुए, "ये पाठशालाएँ उन बड़े साधनों में से एक प्रतीत होती हैं जिन्हें परमेश्वर इस राष्ट्र में धर्म को पुनर्जीवित करने के लिए काम में लाएगा।" अपनी मृत्यु से एक वर्ष पहले वे लिखते हैं: "यह उन सर्वोत्तम संस्थाओं में से है जो कई शताब्दियों से यूरोप में देखी गई हैं।"
वेस्ली की पासबानी सेवा केवल अपनी सोसाइटियों के साथ व्यक्तिगत सम्पर्क तक सीमित नहीं थी, वरन् उसमें पत्राचार की विशाल मात्रा भी सम्मिलित थी। चारों ओर से उन्हें परामर्श और सलाह माँगते हुए पत्र भेजे जाते थे; और वे उनका उत्तर देना अपना कर्तव्य मानते थे। उनके बहुत-से पत्र सुरक्षित रखे गए हैं, और वे दिखाते हैं कि उन्होंने अपने कार्य में कितनी ऊर्जा लगाई और उसके छोटे-से-छोटे विवरणों पर कितना ध्यान दिया। जब हम इस पासबानी पत्राचार में उस पत्राचार को भी जोड़ें जो वे अपने अधिकांश प्रचारकों के साथ, कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार, निरन्तर चलाते रहते थे, तो हम उन विशाल उत्तरदायित्वों पर चकित रह जाएँगे जो इस साहसी अस्सी वर्षीय पुरुष पर लदे थे। उनकी अन्तिम यात्राएँ विशेष रूप से मर्मस्पर्शी थीं।
पूर्व-उद्धृत इतिहासकार कहते हैं, "इंग्लैंड में उनकी पुरानी सोसाइटियों के बीच उनकी भेंटें अभूतपूर्व
हॉलैंड की यात्राएँ। 211 सफलता और मर्मस्पर्शी रुचि के साथ होती हैं। आदरणीय पुरुष की आयु लोगों को स्वयं उनसे अधिक उदास करती है। इस दशक के अन्त की ओर, जैसे-जैसे वे अपने मार्गों से गुज़रते हैं, गम्भीर विदाइयाँ होती हैं। हर भेंट पर वे अपेक्षा करते हैं कि उनका मुख फिर नहीं देखेंगे; और हर स्थान पर, अपनी
सोसाइटियों को वह बात देने के बाद, जो वे चाहते थे कि वे उनकी अन्तिम सलाह के रूप में ग्रहण करें—भाइयों की नाईं प्रेम रखो, परमेश्वर से डरो, और राजा का आदर करो— वे सदा उनके साथ ये पंक्तियाँ उठाते और गाते हैं:— 'काश कि बिना किसी विलम्बित कराह के मैं वह स्वागत-वचन पा सकूँ; मेरी देह अपने सौंपे हुए कार्य के साथ पड़ रहे, और मैं एक ही बार काम और जीवन दोनों से रुक जाऊँ!'
... मेथोडिस्ट स्थान-स्थान पर उन्हें सुनने उमड़ते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि यह सौभाग्य शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा। दल उनसे मिलने निकलते हैं और उन्हें नगरों में ले जाते हैं। उनके प्रचारक, जो अब देश के अधिकांश भागों में बहुत हैं, उनकी सभाओं में एकत्र होते हैं, उनकी सेवकाई से और आपसी अभिवादनों से अपने को तरोताज़ा करते हैं: वे उनके लिए ऐसे हैं जैसे 'भविष्यद्वक्ताओं के पुत्रों' के लिए एलिय्याह, वह पुरुष जिसने इस्राएल में आश्चर्यजनक बातें कही और चमत्कार किए, और जिसके अग्निरथ में स्वर्गारोहण का दिन निकट है।"* इस अन्तिम दशक में वेस्ली का प्रचार-कार्य स्वयं ग्रेट ब्रिटेन तक ही सीमित नहीं था। एक आग्रहपूर्ण निमन्त्रण के उत्तर में, उन्होंने हॉलैंड की दो यात्राएँ कीं, जहाँ उनकी ख्याति बहुत पहले से फैली हुई थी और जहाँ बहुत-से मसीही उन्हें देखना चाहते थे। उन्होंने हेग, यूट्रेक्ट, एम्स्टर्डम और रॉटरडम में अंग्रेज़ी में प्रचार किया, बहुत-से पासबानों और प्राध्यापकों से लैटिन में वार्तालाप किया, जिनकी आत्मा उन्हें उत्तम प्रतीत हुई; और देश के सर्वोत्तम परिवारों ने उनका गहन आदर से स्वागत किया, जिनकी ठोस भक्ति उनके मन के लिए बड़े आनन्द का स्रोत थी। वे हॉलैंड और उसके निवासियों की प्रशंसा से भरे हुए लौटे। * स्टीवन्स, खण्ड 2, पृ. 243, 244। p 2 212 ~ अंतिम वर्ष।
डच लोगों की। 'हम सदा डच लोगों को भारी, नीरस, भावशून्य जाति समझते थे; किन्तु सचमुच, जिनसे भी हमने घनिष्ठता से बात की, उनमें से अधिकांश—बल्कि मैं कह सकता हूँ, सब—आयरिश लोगों के समान ही कोमल-हृदय और गहरे स्नेही थे।"
कुछ समय बाद उन्होंने चैनल द्वीपसमूह की भी यात्रा की।
मेथोडिज़्म इन द्वीपों में सीधे इंग्लैंड से नहीं, वरन् न्यूफ़ाउंडलैंड से आया था, जहाँ जर्सी के दो व्यापारी एक मेथोडिस्ट प्रचारक के द्वारा मन फिराकर मसीही बने थे। 1774 में अपने देश लौटने पर उन्होंने अपने पड़ोसियों के उद्धार के लिए परिश्रम किया; और उनके प्रयत्नों को सफलता मिलने पर उन्होंने वेस्ली को लिखकर उनकी सहायता माँगी। उन्होंने 1784 में उनकी सहायता के लिए रॉबर्ट कार ब्रैकनबरी को भेजा, जो धनी पुरुष और प्रतिभाशाली प्रचारक थे और फ़्रेंच बोल सकते थे। कार्य की बढ़ती सफलता ने वेस्ली को प्रेरित किया कि वे 1787 में स्वयं द्वीपों की यात्रा करें। एक खतरनाक यात्रा के बाद वे उतरे, और तुरन्त काम में लग गए, लगातार प्रचार और भेंटें करते रहे। गर्नज़ी में उनका आतिथ्य डी जर्सी परिवार ने किया, जिसका घर, जिसका नाम मों प्लेज़ी था, प्रचारकों का निवास था, और जिसने कुछ ही समय बाद फ़्रेंच कार्य को उसके प्रचारक-अग्रदूतों में से एक दिया। जर्सी में उनका अत्यन्त हार्दिक स्वागत हुआ, सबसे प्रतिष्ठित परिवारों ने उनका आतिथ्य किया, और उन्होंने उत्सुक भीड़ों को सत्य का वचन सुनाया। देहाती पल्लियों में, जहाँ अंग्रेज़ी नहीं समझी जाती थी, वेस्ली ने ब्रैकनबरी की सेवाओं का दुभाषिये के रूप में उपयोग किया।
द्वीपों में कार्य की दशा से वे अत्यन्त सन्तुष्ट हुए। वे बहुत-से ऐसे मसीहियों से मिले जिनकी भक्ति इंग्लैंड के किसी भी मसीही से कम नहीं थी। उन्होंने विशेष रूप से जर्सी की जेन बिसन का उल्लेख किया, जो उन्नीस वर्ष की एक युवती थीं, और जिन्हें उन्होंने असाधारण भक्ति वाली व्यक्ति बताया। वे कहते हैं, "वह पूरी तरह परमेश्वर को समर्पित और उसके साथ निरन्तर संगति रखने वाली प्रतीत होती है। उसकी समझ स्पष्ट और सशक्त है, और मैं उसमें उत्साहान्धता का लेशमात्र भी नहीं देख पाता। मुझे डर है कि वह अधिक दिन जीवित न रहेगी
चैनल द्वीपसमूह। 213
उसमें जो परमेश्वर का अनुग्रह है, उस पर मैं चकित हूँ। मेरे विचार में परमेश्वर के साथ गहरी संगति में वह मदाम गयों से कहीं आगे है; और मुझे सन्देह है कि इंग्लैंड में मुझे उसके समान कोई मिला हो। मेरा समय कितना ही बहुमूल्य हो, यदि मैं जर्सी केवल अनुग्रह के इस आश्चर्य को देखने के लिए आता, तब भी वह आना मेरे लिए सार्थक होता।" उसकी भक्ति से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसके साथ पत्राचार करना चाहा; और उसे लिखे गए तेरह पत्र, जिनमें से अन्तिम उनकी मृत्यु से केवल कुछ महीने पहले का है, उस पितृवत् देखभाल को दिखाते हैं जिससे वे उन लोगों के सर्वोत्तम हितों का पोषण करते थे जो उनकी पासबानी देखरेख में सहभागी थे।
द्वीपों की सोसाइटियाँ स्वतः और बिना बाहरी सहायता के उठ खड़ी हुई थीं: वे भली-भाँति संगठित भी होती जा रही थीं, क्योंकि उनके पास पहले से प्रचारकों का एक दल था जो लोगों को उन्हीं की भाषा में सम्बोधित कर सकता था।
वेस्ली की भेंट के समय, जॉन डी क्वेटविल नामक एक युवक, जो मूलतः जर्सी का था, पहले ही एक वर्ष सेवकाई के कार्य में बिता चुका था, और आधी शताब्दी से अधिक समय तक वह उसी से जुड़ा रहा। ऐसी तीव्र प्रगति को देखकर वेस्ली को पूरा विश्वास हो गया कि सोसाइटियों में अजेय जीवनशक्ति है और उनके लिए एक महान भविष्य सुरक्षित है। उन्होंने स्पष्ट देखा कि पड़ोसी देश के सुसमाचार-प्रचार में वे कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। एक दिन तट के दृश्य-क्षेत्र में खड़े होकर, और इस बात की असम्भवता का उल्लेख करते हुए कि वे कभी उस विशाल देश को जीतने का कार्य हाथ में लें, वृद्ध प्रचारक ने क्षितिज को घेरे हुए धुँधली चट्टानों की ओर संकेत किया और अपना यह विश्वास प्रकट किया कि चैनल
द्वीप फ़्रांस के मनपरिवर्तन के कार्य में भाग लेने के लिए ठहराए गए हैं। तीन वर्ष बाद यह भविष्यवाणी पूरी होने लगी,* और आज तक इन * सन् 1790 में गर्नज़ी के कुछ मेथोडिस्टों ने केन और उसके आसपास के क्षेत्र की यात्रा की। कुछ समय बाद, श्री माबी वहाँ एक नियमित प्रचारक के रूप में बस गए और कई वर्षों तक नॉरमैंडी में बड़ी सफलता के साथ अपना कार्य करते रहे।
परन्तु फ़्रेंच मेथोडिज़्म की नींव स्थायी रूप से तब तक नहीं रखी गई जब तक कि 1815 में यूरोप के महान संघर्ष का अन्त न हुआ। 214 अंतिम वर्ष।
द्वीपों ने वेस्ली की आशाओं को पूरा करने का निष्ठापूर्वक प्रयत्न किया है, और फ़्रांस में सुसमाचार के कार्य के लिए कम-से-कम तीस मज़दूर दिए हैं।
वेस्ली की गतिविधि ऐसी थी कि सारा इंग्लैंड उसके लिए बहुत संकरा क्षेत्र था: वह और भी व्यापक विस्तार चाहती थी। उन्होंने कहा था, 'सारा संसार मेरा पल्ली है;' और अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने अपनी विशाल मसीही महत्त्वाकांक्षा के उद्देश्य को पूरा होते देखना आरम्भ किया: जहाँ वे स्वयं नहीं जा सकते थे, वहाँ वे अपने सहायकों के रूप में गए। वस्तुतः इसी काल में मेथोडिज़्म ने नई
दुनिया में गहरी जड़ें जमाना आरम्भ किया, और अपने को मिशन के उचित अर्थ वाले कार्य के लिए पूर्णतया उपयुक्त सिद्ध करने लगा। इस विषय पर हम अगले अध्याय में लौटेंगे।
यद्यपि इस दशक के आरम्भिक भाग में वेस्ली अब भी अपने को बधाई दे सकते थे कि वे वृद्धावस्था की दुर्बलताओं से लगभग पूरी तरह बच निकले हैं, उसके अन्त की ओर उन्होंने एक परिवर्तन का अनुभव करना आरम्भ किया। जब वे अपना पचासीवाँ वर्ष पूरा कर रहे थे, तभी उन्होंने पहली बार घटती हुई शक्ति के लक्षण देखे: वे पहले की तरह तेज़ नहीं चल पाते थे, उनकी दृष्टि कुछ क्षीण हो गई थी, और नामों तथा हाल की बातों के विषय में उनकी स्मृति में कुछ कमी आ गई थी। पर अब भी उन्हें यात्रा करने या प्रचार करने में थकान जैसी कोई बात अनुभव नहीं होती थी, और न ही उन्हें उपदेश लिखने में किसी क्षीणता का बोध था। छियासीवाँ वर्ष आरम्भ करते समय वे कहते हैं, "अब मैं पाता हूँ कि मैं बूढ़ा हो रहा हूँ;...जिस बात का मुझे डर होना चाहिए वह यह है कि यदि मैं कल की चिन्ता करूँ, तो मेरा शरीर मेरे मन को दबा दे; और या तो मेरी समझ घटने से हठीलापन, या शारीरिक दुर्बलताओं के बढ़ने से चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो: परन्तु
उस वर्ष, "विलियम टोआज़, रिचर्ड रोबार्ट्स और बेंजामिन फ्रैंकलैंड के साथ, नॉरमैंडी गए, और 1818 में चार्ल्स
कुक उनके पीछे गए। वे फ़्रेंच मेथोडिज़्म के प्रमुख संस्थापक बने।"
सहकर्मियों की मृत्यु। 215 हे प्रभु मेरे परमेश्वर, मेरी ओर से तू ही उत्तर देगा!" परमेश्वर ने अपने सेवक को उसकी शक्तियों के उस पूर्ण क्षय से बचाए रखा जिसका उसे भय था। उसने बुद्धि की अपनी अद्भुत स्पष्टता को बनाए रखा, और अन्त तक उस महान धार्मिक आन्दोलन पर अपना सारा ध्यान लगा सका जिसके वे इतने प्रमुख प्रवर्तक रहे थे।
उनके पहले के सहकर्मियों में से बहुत-से बहुत पहले ही जा चुके थे, और अपने जीवन के इन अन्तिम वर्षों में उन्हें थोड़े-से बचे हुओं का भी प्रस्थान देखना पड़ा। उन्होंने मन की पूर्ण शान्ति के साथ उनसे विदा ली, जैसे कोई उन मित्रों से बिछड़ता है जिनसे शीघ्र ही फिर मिलने की आशा हो।
अब हम उन्हें थॉमस मैक्सफ़ील्ड के बिछौने के पास पाते हैं, जो उनके पहले साधारण-जन प्रचारक थे, जिनसे उन्हें अलग होना पड़ा था, परन्तु जिनके लिए उन्होंने गहरा स्नेह बनाए रखा था।
फिर वह शोरहम के पूज्य विकर पेरोनेट के पास जाता है, ताकि पुनर्जागरण के इस वृद्ध कुलपिता से, जो नब्बे वर्ष की आयु पार कर चुके थे, अन्तिम सम्मति और आशीष प्राप्त करे। एक अन्य समय वह डेलामोट के पास जाता है, जो जॉर्जिया में उसका पुराना साथी था और जिसे वह स्वयं की भाँति वर्षों के बोझ से झुका हुआ पाता है, जो जीवन के भारों और परीक्षाओं से निकलकर अपने अन्तिम विश्राम में प्रवेश करने की तैयारी कर रहा था। कुछ समय बाद, सेंट गेनिस के रेक्टर थॉम्पसन ने, जो कॉर्नवॉल में वेस्ली के सहयोगी थे, मृत्यु के निकट आने पर स्वयं को शंकाओं और भय से घिरा पाकर उसे बुलवा भेजा,
उसके साथ प्रभु-भोज में सहभागी हुए, और उस भेंट के दौरान उस शान्त और दृढ़ विश्वास को पुनः पा लिया जो क्षण भर के लिए डगमगा गया था।
वेस्ली को दो और क्षतियाँ सहनी पड़ीं, जिन्होंने उसे सबसे अधिक गहराई से प्रभावित किया। सन् 1785 में समर्पित जॉन फ्लेचर का, जिनका जीवन एक सन्त और प्रेरित का जीवन था, विश्वास की पूर्ण विजय में देहान्त हुआ। उन्हें खोकर वेस्ली ने अपना सबसे अच्छा मित्र और सबसे अच्छा सलाहकार खो दिया। इंग्लैंड में कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक कि उसका अपना भाई भी, उसकी भावनाओं में इतनी गहराई से नहीं उतरा और उसके मिशन को इतनी पूर्णता से नहीं समझा। वह पुनर्जागरण के संत
यूहन्ना थे, जबकि वेस्ली उसके संत पौलुस।
उनमें सब कुछ, हृदय भी और बुद्धि भी, मेथोडिस्ट आन्दोलन के प्रति प्रतिक्रिया करता था; और यह कोई छोटा सम्मान नहीं कि उसे उनकी उच्च बुद्धि और गहरी भक्ति का समर्थन प्राप्त हुआ। वेस्ली बहुत समय से यह विचार करता आया था कि अपनी मृत्यु के बाद इस कार्य की देखरेख उन्हीं को सौंप दे, और उनके निधन से वह गहरे शोक में पड़ गया। वह कहता है, "अस्सी वर्षों के भीतर मैंने अनेक उत्तम पुरुषों को जाना है, जो हृदय और जीवन में पवित्र थे, परन्तु उनके समान किसी को नहीं जाना; इतना सदैव और गहराई से परमेश्वर को समर्पित कोई नहीं। हर दृष्टि से इतना निर्दोष मनुष्य मुझे न यूरोप में मिला, न अमेरिका में, और न मैं इस अनन्तकाल के इस ओर वैसा दूसरा मिलने की आशा करता हूँ।"
तीन वर्ष बाद, अपने भाई चार्ल्स में, वेस्ली ने अपनी सेवकाई का एक और विश्वासयोग्य साथी खो दिया। अपने चरित्र की विशिष्ट निर्भीकता के साथ उसने अपने भाई के आरम्भिक संघर्षों में भाग लिया था; परन्तु शीघ्र ही उसने भ्रमणशील जीवन छोड़ दिया और अपने परिवार के साथ ब्रिस्टल में, और बाद में लंदन में बस गया, जहाँ वह अब भी अपनी सेवकाई करता रहा, चैपलों में प्रचार करता और बीमारों तथा बन्दियों से भेंट करता रहा। प्रथम श्रेणी का कवि, एक विख्यात वक्ता, स्वभाव से उत्साही और जोशीला, उसने स्वयं को उस कार्य में पूरी तरह झोंक दिया जिसे उसका भाई आगे बढ़ा रहा था, और कुछ बातों में वह उसका पूरक और प्रतिरूप था। फिर भी उसमें विधान-निर्माता और संगठनकर्ता के लिए आवश्यक गुणों का अभाव था, और अपनी अतिरंजित कलीसियाई शंकाओं से वह कभी-कभी अपने भाई के कार्य में बाधा डालता था।
फिर भी वह अठारहवीं शताब्दी के पुनर्जागरण में लगे हुए सबसे चुने हुए सेवकों में से एक था।
जब मृत्यु का हाथ इस प्रकार वेस्ली के पहले सहकर्मियों को उठा रहा था, तब परमेश्वर ने उनके स्थान पर दूसरों को खड़ा किया: भ्रमणशील सेवकाई की पंक्तियों में उम्मीदवारों की संख्या निरन्तर बढ़ती गई। इन अन्तिम दस वर्षों के भर्ती हुए लोगों में विविध प्रतिभाओं के पुरुष थे; परन्तु प्रचारकों का दल जॉयस, ब्रैमवेल, रीस, डिकिन्सन, एंटविसल, क्राइटन और एडम क्लार्क जैसे पुरुषों से सुशोभित और सुदृढ़ हुए बिना नहीं रह सकता था।
फ्लेचर और चार्ल्स वेस्ली की मृत्यु। 217
वेस्ली ने जितनी मृत्युएँ देखीं, उन सबने उसकी दुर्बलताओं की साक्षी में अपनी साक्षी जोड़ी और बताया कि उसका अन्त निकट है। यह सम्भावना, भयावह होना तो दूर, उसके लिए आनन्ददायक थी। उसका कार्य पूरा हो चुका था, और भली-भाँति पूरा हुआ था। उसकी भावी सफलता निश्चित थी, जहाँ तक निश्चितता उस विश्वास को दी जा सकती है जो परमेश्वर पर टिका रहता है और विवेक के निर्देशों को तुच्छ नहीं जानता। अन्तिम दृश्यों पर रुकने से पहले हमें उन उपायों पर विचार करना होगा जो कार्य की निरन्तरता और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अपनाए गए।
अमेरिकी मेथोडिस्ट कलीसिया का संगठन।—घोषणा-पत्र।
हम अमेरिका में मेथोडिज़्म का आरम्भिक इतिहास पहले बता चुके हैं। बहुत थोड़े वर्षों के भीतर वह तेज़ी से बढ़ा और विशाल अनुपात तक पहुँचा: क्रान्ति के लम्बे संघर्ष उसकी प्रगति को रोक न सके, और वेस्ली के पहले प्रचारकों के आगमन के पन्द्रह वर्ष बाद ही उसके बीस हज़ार सदस्य और अस्सी से अधिक भ्रमणशील प्रचारक थे; जबकि उसका कार्य दक्षिण में वेस्ट इंडीज़ से लेकर उत्तर में न्यू ब्रन्सविक, नोवा स्कोशिया और न्यूफ़ाउंडलैंड तक फैल गया था। संगठन के अनेक प्रश्न, जो आरम्भ में सामने नहीं आए थे, अब उठने लगे।
नई दुनिया में अपना कार्य आरम्भ करते समय वेस्ली के प्रचारक स्वयं को अंग्रेज़ी कलीसिया के पादरियों के प्रति वैसी ही सापेक्ष स्थिति में मानते थे जैसी उनके स्वदेश के भाइयों की थी, अर्थात् असाधारण सहायकों की; इसलिए वे कलीसियाई कार्यों में, जो उचित अर्थ में कलीसियाई कहलाते हैं, हस्तक्षेप नहीं करते थे, और विशेषकर संस्कार सम्पन्न कराने से इनकार करते थे। यदि इंग्लैंड में इस रुख को बनाए रखना कठिन था, तो अमेरिका में यह शीघ्र ही सर्वथा असम्भव हो गया। 218 अमेरिकी मेथोडिस्ट कलीसिया का संगठन।
एक विशाल भूभाग में बिखरी और निरन्तर बढ़ती जनसंख्या के साथ, और ऐसे पादरी-वर्ग के साथ जो संख्या में थोड़ा और आत्मा में निर्बल था तथा जिसने अपने प्रयास बड़े नगरों तक सीमित रखे थे, इस अधीनस्थ सम्बन्ध में बने रहने का अर्थ उस भव्य कार्य को गम्भीर रूप से पंगु बना देना, और वास्तव में उसका त्याग करना होता, जो परमेश्वर ने मेथोडिज़्म को सौंपा था।
स्वतंत्रता-संग्राम ने इस प्रश्न को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया और उसका समाधान "उदार" पक्ष में करना आवश्यक कर दिया। इस महान क्रान्ति ने कुछ समय के लिए इस कार्य के प्राणों को ही संकट में डाल दिया: अमेरिका में अधिकांश अंग्रेज़ प्रचारकों ने इसे अपना कर्तव्य समझा कि अपने प्रभाव का उपयोग विद्रोह का प्रतिरोध करने में करें और अपने देश की सरकार के प्रति वफ़ादार रहें। इसलिए युद्ध के सारे समय में उनकी स्थिति अत्यन्त कठिन रही: कुछ बन्दी बनाए गए, कुछ छिप गए, और कुछ इंग्लैंड लौट गए। परन्तु जब क्रान्ति की विजय ने संयुक्त राज्य की स्वतंत्रता सुनिश्चित कर दी, तब प्रचारकों ने देखा कि उनके पास नई व्यवस्था के प्रति निष्ठापूर्वक समर्थन देने के सिवा और कोई विकल्प नहीं है। उनके अपने सम्राट ने ही उन्हें यह उदाहरण दिया, नए गणराज्य के राजदूत को दरबार में उसके पहले स्वागत के समय कहे गए अपने उन उल्लेखनीय शब्दों में, "अपने राज्य में आपकी स्वतंत्रता को सबसे अन्त में मैंने स्वीकार किया, और उसका उल्लंघन करने वाला भी सबसे अन्त में मैं ही होऊँगा।" नई सरकार के पक्ष में आकर अमेरिकी मेथोडिज़्म के नेताओं ने अपने सोसाइटियों के विशाल बहुमत का समर्थन भी अपने साथ ले लिया। जिस देश के वे थे, उसी की भाँति
अमेरिकी क्रान्ति के प्रभाव। 219 वे भी अब अस्तित्व के एक सर्वथा नए चरण में प्रवेश करने वाले थे।
नई सरकार ने बुद्धिमानी से राष्ट्रीय धर्म स्थापित करने का उत्तरदायित्व लेने से इनकार कर दिया: और इसलिए अंग्रेज़ी कलीसिया के विशेषाधिकार जाते रहे और उसे अन्य सबके समान स्तर पर रखा गया। उसकी आय, सामान्यतः असहमत कलीसियाओं की आय की भाँति, अपने झुण्डों के स्वैच्छिक दान तक सीमित रह गई। पादरियों के लिए ऐसी स्थिति अत्यन्त अवांछनीय थी; और अपने सामने ऐसी अनिश्चित सम्भावनाओं के कारण उनमें से अधिकांश ने चले जाना ही विवेकपूर्ण समझा: उनका पलायन वास्तव में सामान्य "जान बचाओ" की भगदड़ बन गया। अंग्रेज़ी
कलीसिया का पतन, उसके महान नाम के बावजूद, अर्थपूर्ण घटना थी। वर्जीनिया में क्रान्ति से पहले उसके इक्यानवे पास्टर थे: इनमें से युद्ध के अन्त में केवल अट्ठाईस शेष रह गए, बाकी इंग्लैंड लौट गए थे। देश के अन्य भागों में स्थापित कलीसिया कभी सशक्त नहीं रही थी, और घटनाओं के क्रम ने उसके विघटन का मार्ग प्रशस्त किया था। इसलिए उत्तराधिकारी के लिए मार्ग खुला था, और वह उत्तराधिकारी वही कलीसिया होनी थी जो इस पद के योग्य सिद्ध हो।
संकट अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्षण का था, और उसके लिए वीरतापूर्ण संकल्प की आवश्यकता थी।
वेस्ली ने स्थिति को समझा। यदि अब तक वह चाहता रहा था कि अटलांटिक पार का मेथोडिज़्म एक परजीवी लता की भाँति रहे, जो एक विशाल छाया देने वाले बलूत की संदिग्ध सुरक्षा में बढ़ती है, तो अब परमेश्वर ने स्वयं वन के उस राजा को झुका दिया था, ताकि वह नन्हा पौधा आगे अपना स्वतंत्र जीवन जी सके।
वेस्ली को यह समझने में देर न लगी कि अमेरिकी सोसाइटियों को स्वतंत्र आधार पर स्थापित करना आवश्यक है।
बहुत समय से वे भी माँग करते आ रहे थे कि संस्कार उनके अपने प्रचारकों द्वारा सम्पन्न कराए जाएँ: कई स्थानों में बच्चे बिना बपतिस्मे के बड़े हो रहे थे, और सोसाइटियों के सदस्य प्रभु-भोज में सहभागी हुए बिना ही एकत्र होते थे।
220 अमेरिकी मेथोडिस्ट कलीसिया का संगठन।
यह माँग इतनी तीव्र हो गई और इतने सशक्त तर्कों से समर्थित थी कि यदि लोगों की आवश्यकताएँ और अधिक समय तक अपूर्ण रहतीं, तो फूट का बड़ा खतरा था। दक्षिण के प्रचारकों ने, यह देखकर कि प्रश्न समाधान की ओर नहीं बढ़ रहा, सन् 1779 में एकत्र होकर निश्चय किया कि तीन सबसे वरिष्ठ भाई शेष सब पर हाथ रखें।
तदनुसार ऐसा किया गया, और एक वर्ष तक उन भागों की सोसाइटियों को अपने प्रचारकों के हाथों संस्कार प्राप्त होते रहे। इस साहसिक कदम से अमेरिकी
मेथोडिज़्म बड़ी अव्यवस्था में पड़ जाता और शोचनीय फूट हो जाती, यदि एस्बरी सुलह की नीति द्वारा ऐसा समझौता न करा लेता, जिसने इस उपाय के संचालन को व्यावहारिक रूप से तब तक स्थगित रखा जब तक वेस्ली से परामर्श न कर लिया जाए।
इन संकेतों की गम्भीरता को भूल से भी नहीं समझा जा सकता था।
वेस्ली को दो विकल्पों में से एक चुनना था: या तो कलीसियाई पूर्वाग्रहों का हठी पक्षधर बनकर एक ऐसे कार्य की बलि चढ़ा दे जो स्पष्टतः महान भविष्य के लिए नियत था, या ऐसे पूर्वाग्रहों से पूरी तरह मुक्त हो जाए और इस प्रकार इन नवजात कलीसियाओं के भावी विकास और समृद्धि को सुरक्षित करे। ज्यों ही समस्या ने यह निश्चित रूप धारण किया, उसकी अन्तरात्मा और उसकी बुद्धि दोनों उसके निर्णय पर सहमत हो गईं। जो कदम उठाने थे, उनके विषय में वह अनावश्यक जल्दबाज़ी से बचना चाहता था; और सबसे बढ़कर उसने निश्चय किया कि पहले अंग्रेज़ी धर्माध्यक्ष-मण्डल से अनुरोध करे। इसलिए उसने लंदन के बिशप को दो अलग-अलग पत्र लिखे, जिनमें उसने आग्रहपूर्वक अनुरोध किया कि उसके एक प्रचारक को अभिषेक दिया जाए, ताकि वह संस्कार सम्पन्न कराने के उद्देश्य से सोसाइटियों का दौरा कर सके और इस प्रकार मामले की सबसे अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। वह उस पदाधिकारी से कहता है, "मैं बेचारे अमेरिका के लिए शोक करता हूँ, उस में इधर-उधर बिखरी भेड़ों के लिए, जिनमें से कुछ के कोई चरवाहे ही नहीं हैं, विशेषकर उत्तरी उपनिवेशों में; और शेष की दशा भी बहुत अच्छी नहीं, क्योंकि उनके अपने चरवाहे उन पर तरस नहीं खाते।" धर्माध्यक्ष प्रथा के प्रति झुकाव। 221 बिशप ने यह अनुरोध स्वीकार करने से इनकार कर दिया, तब वेस्ली ने अनुभव किया कि उस ओर से और कोई आशा नहीं रखी जा सकती, और उसने गाँठ को काट डालने का निश्चय किया।
स्थापित कलीसिया से, जिसका वह सदा स्वयं को एक सेवक मानता रहा, उसका गहरा लगाव होने के कारण यह स्वाभाविक था कि वेस्ली की सहानुभूति धर्माध्यक्ष-प्रणाली के पक्ष में हो। फिर भी इस झुकाव ने उसे उन भयंकर कुरीतियों के प्रति अन्धा नहीं किया जो अंग्रेज़ी पदानुक्रम को रोमन कैथोलिक मत से विरासत में मिली थीं। उसके कलीसियाई पूर्वाग्रह एक-एक करके गिरते गए: प्रेरितीय उत्तराधिकार उसे मात्र एक कल्पित कथा दिखाई दिया: जब प्राचीन इतिहास के अध्ययन ने उस पर प्रकट किया कि "बिशप" और "प्राचीन" शब्द मूल रूप से एक ही पद को दर्शाते थे, तब धर्माध्यक्ष-प्रणाली की अपनी प्रतिष्ठा बहुत घट गई। ये क्षणिक आवश्यकताओं से उपजे आकस्मिक प्रभाव नहीं थे: वे उसके सम्पूर्ण धार्मिक विकास के वैध फल थे।
हम देख चुके हैं कि चालीस वर्ष पहले, अर्थात् 1746 में, उसने कैसे घोषित किया कि विषय की पूरी जाँच के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि आदि कलीसिया में
"बिशप और प्रेस्बिटर मूलतः एक ही श्रेणी के थे।" इस दृढ़ मत को वह कुछ वर्ष बाद अपनी नए नियम की टीका में दर्ज करता है, जहाँ वह घोषित करता है कि उसकी राय में प्रथम युगों में बिशप और प्रेस्बिटर, अर्थात् प्राचीन, के नाम बिना भेद के प्रयुक्त होते थे।* 1760 में वह एक मित्र को लिखे पत्र में बताता है कि वह "उनकी उस भूल में भागी नहीं है जो मानते हैं कि केवल धर्माध्यक्षीय श्रेणी ही वैध है।" धर्माध्यक्ष-प्रणाली के ईश्वरीय अधिकार में विश्वास करना तो दूर, 1756 में वह दृढ़तापूर्वक कहता है कि यह प्रणाली कहीं भी "पवित्रशास्त्र में निर्धारित" नहीं है, और सारे विषय का सार इस विश्वास के कथन में देता है कि न मसीह ने और न उसके प्रेरितों ने कलीसियाई शासन का कोई विशेष रूप निर्धारित किया।
* फिलिप्पियों 1:1 पर टिप्पणी।
222 अमेरिकी मेथोडिस्ट कलीसिया का संगठन।
ये उद्धरण, जिन्हें सरलता से बढ़ाया जा सकता है, दिखाते हैं कि वेस्ली ने बहुत पहले ही स्वतंत्र चिन्तन की वह भावना प्रकट की थी जो उन दिनों अत्यन्त दुर्लभ थी; और कि अमेरिका में मेथोडिस्ट
कलीसिया का संगठन, जैसा कि कहा गया है, वृद्धावस्था की किसी भूल का परिणाम नहीं था, बल्कि उसके सम्पूर्ण पूर्ववर्ती विकास का स्वाभाविक फल था। यह पूरी तरह इसके अनुरूप था कि उसने 1785 में लिखा, "मैं दृढ़ता से विश्वास करता हूँ कि मैं इंग्लैंड या यूरोप के किसी भी मनुष्य के समान ही पवित्रशास्त्रीय एपिस्कोपोस हूँ। क्योंकि अटूट उत्तराधिकार को मैं एक कल्पित कथा जानता हूँ, जिसे कोई मनुष्य न कभी सिद्ध कर सका है, न कर सकता है।"
इन बातों में सब पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर और स्पष्ट दृढ़ विश्वासों से सम्पन्न होकर, उसने अपनी सोसाइटियों की मुक्ति को केवल अपनी सेवकाई के मार्गदर्शक सिद्धान्त के पालन में टाला, अर्थात् किसी नए मार्ग में प्रवेश करने से पहले प्रभु की व्यवस्था के खुलते द्वारों की प्रतीक्षा करना।
ऐसा ही एक द्वार अब खुल गया, और उसने आगे बढ़ने के संकेत का पालन किया।
उसके सामने का कार्य अपनी अमेरिकी सोसाइटियों को ऐसी कलीसिया में संगठित करना था जो स्वशासन में समर्थ हो, और वेस्ली ने संचालन का धर्माध्यक्षीय रूप चुनने में संकोच नहीं किया, क्योंकि वह कार्य के विभिन्न भागों की एकता और स्थिरता को बनाए रखने के लिए अन्य किसी भी रूप से अधिक उपयुक्त था, एक ऐसा सिद्धान्त जिसे वह सर्वोच्च महत्त्व का मानता था। इस विषय में अपने कर्तव्य के प्रति पूर्णतः आश्वस्त होकर, और इस पर कम ध्यान देकर कि कितना विरोध उठ सकता है, उसने अपने इरादे कई मित्रों को बताए; और यद्यपि उसका भाई चार्ल्स अपने कलीसियाई पूर्वाग्रहों से इतना दृढ़ता से बँधा था कि इस योजना को अनुकूल दृष्टि से न देख सका, फिर भी वह यह जानकर प्रसन्न हुआ कि फ्लेचर ने इसे हार्दिक अनुमोदन दिया। फरवरी,
1784 में, उसने यह विषय उस व्यक्ति के सामने रखा जिसे वह संयुक्त राज्य में मेथोडिस्ट कलीसिया की स्थापना और संगठन का कार्य सौंपना चाहता था। डॉ. कोक वास्तव में
डॉ. कोक का मिशन। 223 इस नाजुक कार्य को सफल निष्कर्ष तक पहुँचाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति थे, जिनमें एक प्रशासक के साथ-साथ एक मिशनरी के भी सभी गुण एक साथ विद्यमान थे।
वेस्ली ने उन्हें अमेरिकी सोसाइटियों की असाधारण स्थिति और उन खतरों की याद दिलाई जिनका सामना उन्हें करना पड़ेगा यदि उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया: उसने उनके सामने उन्हें कलीसिया के रूप में संगठित करने की अपनी योजनाएँ रखीं, और पूछा कि क्या वे उन्हें कार्यान्वित करने के लिए सहमत होंगे। यदि हाँ, तो सम्पूर्ण कार्य के सामान्य अधीक्षक के रूप में वह स्वयं को उन पर हाथ रखने के लिए बुलाया हुआ अनुभव करता था, और इस प्रकार उन्हें नई
कलीसिया को संगठित करने का अधिकार सौंपता था। उसने अलेक्ज़ान्द्रिया की प्राचीन कलीसिया का उदाहरण स्मरण कराया, जिसमें किसी बिशप की मृत्यु होने पर प्राचीन लोग अपने ही में से एक पर हाथ रखने के लिए एकत्र होते थे, जो इस प्रकार रिक्त पद को प्रिमुस इंटर पारेस, अर्थात् बराबरी वालों में प्रथम के रूप में ग्रहण करने के लिए बुलाया जाता था।
डॉ. कोक को, जिन्हें ऐसे प्रस्ताव की अपेक्षा नहीं थी, विषय पर विचार करने के लिए समय माँगा। दो महीने तक उन्होंने उस पर गम्भीरता से ध्यान दिया, और उसके अन्त में अपना निर्णय वेस्ली को बताया। उन्होंने ऐसे कदम की वैधता को स्वीकार किया, पर उसे थोड़ा और विलम्ब से उठाना विवेकपूर्ण समझा।
उसी वर्ष जुलाई में लीड्स में हुई कॉन्फ़्रेंस इस राय से सहमत नहीं हुई, और वेस्ली द्वारा प्रस्तावित उपायों का उसने गर्मजोशी से अनुमोदन किया। फ्लेचर ने विचार-विमर्श में सक्रिय भाग लिया, और उसकी सलाह का परिणाम पर निर्णायक प्रभाव पड़ा। अपने भाइयों की सामान्य सर्वसम्मति को देखते हुए कोक और अधिक हिचकिचा नहीं सकते थे; और 2 सितम्बर, 1784 को, ब्रिस्टल में,
वेस्ली ने, रेव. जेम्स क्राइटन की सहायता से, उन पर गम्भीरता से हाथ रखे और उन्हें अधीक्षक के पद के लिए अलग किया: ये ठीक वही शब्द हैं जो उस दस्तावेज़ में प्रयुक्त हैं जो वेस्ली ने उन्हें सौंपा। उसने जानबूझकर "बिशप" शब्द से परहेज़ किया, यह दिखाने के लिए कि जो कार्यभार उसने उन्हें सौंपा था उसका अंग्रेज़ी धर्माध्यक्ष-प्रणाली के आडम्बरपूर्ण रूपों से कुछ भी
224 अमेरिकी मेथोडिस्ट कलीसिया का संगठन। सम्बन्ध नहीं था, और हाथ रखने के इस कार्य का सच्चा आदर्श अंग्रेज़ी पदानुक्रम में नहीं बल्कि आदि युग की कलीसिया में खोजा जाना चाहिए।
बाद के समय में अमेरिकी कलीसिया ने वास्तव में यह पवित्रशास्त्रीय उपाधि उन्हें दी जो यथार्थ में उस पद के कर्तव्य निभा रहे थे; और यह मार्ग पूर्णतः उचित था। कोक पर हाथ रखने के बाद, वेस्ली ने अपने दो प्रचारकों, वेज़ी और व्हाटकोट, को प्रेस्बिटरों के रूप में उनके साथ अमेरिका जाने के लिए अभिषिक्त किया।
निस्सन्देह, अंग्रेज़ी दृष्टिकोण से ऐसे अभिषेक मात्र निरर्थक थे। विशेषकर कोक का अभिषेक तीव्र आलोचना का कारण बना: कहा गया कि वेस्ली के पास धर्माध्यक्षीय अधिकार नहीं था, और इसलिए वह उसे प्रदान भी नहीं कर सकता था। कठोर कलीसियाई विधि में इसे क्षण भर के लिए भी नकारा नहीं जा सकता था: और जो कोलाहल उठा वह ऊँचा और प्रबल था। हम, जो अंग्रेज़ी कलीसियाई मत के पूर्वाग्रहों के भागी नहीं हैं, उसके झगड़े में पक्ष नहीं ले सकते। वेस्ली पर हम केवल इतना दोष लगाना चाहेंगे कि उसने कार्य की अनिवार्य आवश्यकताओं के आगे झुकने में इतना विलम्ब किया। कलीसियाई औपचारिकता वेस्ली को दोषी ठहराए: अन्तरात्मा और सामान्य बुद्धि दोनों उसे निर्दोष ठहराती हैं। 3 नवम्बर, 1784 को, कोक अपने दोनों सहयोगियों के साथ अमेरिका पहुँचे, और शीघ्र ही फ्रांसिस एस्बरी को धर्माध्यक्षीय अभिषेक दिया, जिनकी प्रतिभा और गुणों ने उन्हें अनेक वर्षों से अमेरिकी मेथोडिज़्म का वास्तविक नेता बना दिया था। वर्ष के अन्त की ओर बाल्टीमोर में एक कॉन्फ़्रेंस हुई, जिसमें साठ प्रचारक उपस्थित थे, जिन्होंने तब मेथोडिस्ट एपिस्कोपल कलीसिया की नींव डाली। न इन प्रचारकों को और न स्वयं वेस्ली को ज़रा भी सन्देह हो सकता था कि जिस कलीसिया की नींव उन्होंने तब हर प्रकार के विरोध और खण्डन के बीच डाली थी, वह नई
स्वदेश में अभिषेक। 225
दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली कलीसियाओं में से एक बनने वाली थी। उसकी भव्य सफलता ने वेस्ली की कार्य-पद्धति पर किए गए आक्षेपों का पर्याप्त उत्तर दे दिया है।
यदि मेथोडिस्ट धर्माध्यक्ष-प्रणाली तथाकथित प्रेरितीय उत्तराधिकार से उत्पन्न होने का गर्व नहीं कर सकती, तो उसका इतिहास ईश्वरीय अनुमोदन के प्रमाणों से भरा है; और जबकि हमारे दिनों में अंग्रेज़ी कलीसियाई मत को बुद्धिवाद और कर्मकाण्डवाद की संयुक्त बुराइयों से जूझना पड़ रहा है, मेथोडिस्ट एपिस्कोपल
कलीसिया बढ़ती और फलती-फूलती जाती है, और अपनी तीव्र प्रगति से सिद्ध करती है कि वेस्ली द्वारा अपनाई गई कलीसियाई प्रणाली अमेरिकी लोगों की आवश्यकताओं और एक मूलतः मिशनरी कार्य की माँगों को पूरा करने के लिए सबसे उपयुक्त थी।
अमेरिका के लिए जो कुछ उसने किया था, उसके बाद अपने देश की सोसाइटियों के लिए वही पद-प्रदान अस्वीकार करना वेस्ली को कठिन लगा होगा। परन्तु उसने इसे अपना कर्तव्य माना कि अधिक शीघ्रता न करे: परिस्थितियाँ बहुत भिन्न थीं, और उसने अत्यन्त सावधानी से कार्य किया, घटनाओं के क्रम से मार्गदर्शन पाना चाहते हुए।
फिर भी कार्य की आवश्यकताओं और निकट आती मृत्यु की सम्भावना ने उसे इस दिशा में कुछ कदम उठाने का निश्चय कराया: 1786 में उसने स्कॉटलैंड और वेस्ट इंडीज़ के लिए नियुक्त छह या सात प्रचारकों पर हाथ रखे। तीन वर्ष बाद, इंग्लैंड की सोसाइटियों की ऊँचे स्वर में व्यक्त इच्छाओं के सम्मान में, उसने कई और अभिषिक्त किए। इस प्रकार कुल लगभग बीस प्रचारकों को हस्त-स्थापन प्राप्त हुआ, क्योंकि उसका यह सिद्धान्त था कि विद्यमान व्यवस्था से उतने से अधिक न टूटा जाए जितना कड़ाई से आवश्यक हो। फिर भी मेथोडिज़्म अब अपनी पूर्व स्थिति से एक महत्त्वपूर्ण कदम आगे बढ़ चुका था: उसके मार्ग से एक भारी बाधा हट गई थी: मार्ग पहले ही खुल चुका था, और वेस्ली के उत्तराधिकारियों को केवल उस घड़ी की प्रतीक्षा करनी थी जब सोसाइटियाँ उस पूर्ण और सम्पूर्ण स्वतंत्रता तक पहुँचें जो उनका निर्विवाद अधिकार था।
वेस्ली की अध्यक्षता में हुई बाद की कॉन्फ़्रेंसों ने इसी दिशा में और प्रगति की। 1786 में, कलीसिया के समय में सार्वजनिक सभाएँ करने के विरुद्ध नियम
226 घोषणा-पत्र। निम्नलिखित स्थितियों में रद्द कर दिया गया, अर्थात् जहाँ पादरी कुख्यात रूप से दुष्ट या खतरनाक रूप से पाखण्डी थे; जहाँ नगर में आधे लोगों को समाने के लिए पर्याप्त कलीसियाएँ नहीं थीं; और अन्त में, जहाँ दो-तीन मील के भीतर कोई कलीसिया नहीं थी। 1788 में सोसाइटियों की इच्छाओं को और आगे मान लिया गया, इस निर्णय द्वारा कि प्रभु-भोज के दिनों को छोड़कर कलीसिया के समय में भी सभाएँ की जा सकती हैं, और यदि अधिकांश सदस्य चाहें तो रविवार की सुबह चैपलों में प्रार्थना-पुस्तिका का प्रयोग किया जा सकता है।
सन् 1784, जिसने अमेरिकी कलीसिया के संगठन को जन्म दिया, ने उन उपायों को अपनाए जाने का भी साक्ष्य देखा जिनका उद्देश्य संस्थापक की मृत्यु के बाद मेथोडिज़्म का वैधानिक अस्तित्व सुनिश्चित करना था। इस समय तक चैपलों के दस्तावेज़ उन्हें ऐसे प्रचारकों के उपयोग के लिए न्यासियों को सौंपते थे जो वेस्ली द्वारा, या उसकी मृत्यु के बाद कॉन्फ़्रेंस द्वारा, नियुक्त किए जाएँ। कई प्रतिष्ठित वकीलों से इन न्यासों की वैधता के विषय में परामर्श किया गया, और उन्होंने घोषणा की कि वेस्ली की मृत्यु से वे शून्य हो जाएँगे, क्योंकि कानून कॉन्फ़्रेंस के अस्तित्व को मान्यता नहीं देता था, और उसे सम्पत्ति अर्जित करने या रखने का कोई अधिकार नहीं था। यह एक गम्भीर कठिनाई थी, और ऐसी जो सम्पूर्ण
संगठन के भावी अस्तित्व को संकट में डालती थी। इसका उपाय करने के लिए वेस्ली ने चांसरी न्यायालय में एक दस्तावेज़ दर्ज कराया, जिसका शीर्षक "घोषणा-पत्र" था, जिसने कॉन्फ़्रेंस को वैधानिक अस्तित्व दिया और उसे आवश्यक अधिकार प्रदान किए।
इस दस्तावेज़ के अनुसार वैधानिक कॉन्फ़्रेंस में नाम से उल्लिखित एक सौ प्रचारक होने थे, जो वर्ष में एक बार मिलते, मृत्यु से अपनी पंक्तियों में पड़ी रिक्तियों को भरते, और एक अध्यक्ष तथा सचिव नियुक्त करते।
वैधानिक सौ के सदस्यों के चुनाव और उनके मुख्य कार्य के विषय में विभिन्न नियम निर्धारित किए गए। उस कार्य में प्रचारकों को परीक्षा-अवधि पर और "पूर्ण सम्बन्ध" में प्रवेश देना शामिल था, कॉन्फ़्रेंस का वैधीकरण। 227
कॉन्फ़्रेंस में, अयोग्य सदस्यों का निष्कासन, और प्रचारकों की नियुक्ति, जिनका प्रत्येक सर्किट में निवास तीन वर्ष से अधिक नहीं होना था। घोषणा-पत्र ने यह भी व्यवस्था दी कि वैधानिक कॉन्फ़्रेंस को स्वतंत्रता होगी कि वह "पूर्ण सम्बन्ध" में आने वाले किसी भी अन्य प्रचारक को अपने अधिवेशनों में सम्मिलित करे। उसने यह भी घोषित किया कि किन परिस्थितियों में कॉन्फ़्रेंस भंग की जाएगी, अर्थात् यदि कभी उसके सदस्य चालीस से कम हों, या मिलना बन्द कर दे
इस व्यवस्था ने संगठन की एकता और स्थायित्व को सुनिश्चित करने में बहुत योगदान दिया। ऐसे मूलभूत बन्धन के बिना सोसाइटियाँ शीघ्र ही वह विशिष्ट संगठन खो देतीं जो उनकी शक्ति था, जैसे भ्रमणशील सेवकाई, और स्वतंत्र कलीसियाओं का एक बेमेल जमावड़ा बन जातीं। दूसरी ओर, यह खेद की बात है कि संगठन के कुछ ब्योरों के विषय में घोषणा-पत्र ने कॉन्फ़्रेंस की कार्रवाई को सीमित कर दिया, और इस प्रकार ऐसे सुधारों के प्रवेश का मार्ग रोक दिया जिन्हें समय आवश्यक सिद्ध कर सकता था। निस्सन्देह वेस्ली ने ऐसी कमियों को अधिक महत्त्व नहीं दिया: उसने उन निर्विवाद लाभों को देखा जो इस व्यवस्था ने सोसाइटियों की एकजुटता और सुसमाचार प्रचार के कार्य के सम्बन्ध में प्रदान किए, और इस आश्वासन पर अपने को बधाई दी कि उसके जीवन का कार्य उलझी हुई अव्यवस्था या पूर्ण विनाश में समाप्त नहीं होगा।
अपने हृदय के आनन्द में वह इस घोषणा-पत्र का वर्णन "ऐसी नींव के रूप में करता है जो जब तक सूर्य और चन्द्रमा बने रहेंगे तब तक स्थिर रहने की सम्भावना रखती है।"
वेस्ली के अन्तिम परिश्रम।—उसकी मृत्यु।
1790 के पहली जनवरी को वेस्ली ने अपनी पत्रिका में लिखा: "मैं अब वृद्ध मनुष्य हूँ, सिर से पाँव तक जर्जर। मेरी आँखें धुँधली हैं; मेरा दाहिना हाथ बहुत काँपता है; हर सुबह मेरा मुँह गर्म और सूखा रहता है; लगभग हर दिन मुझे धीमा ज्वर रहता है; मेरी गति कमज़ोर और धीमी है।
फिर भी, परमेश्वर का धन्यवाद हो, मैं अपना परिश्रम ढीला नहीं करता: मैं अब भी प्रचार कर सकता और लिख सकता हूँ।" वास्तव में, वृद्धावस्था की बढ़ती दुर्बलताओं के बावजूद उसने अन्त तक अपना सामान्य परिश्रम जारी रखा।
लंदन और उसके आसपास के क्षेत्र को सदा उसका विशेष ध्यान मिलता रहा, और वह अब भी इस महत्त्वपूर्ण कार्यक्षेत्र में पास्टर और मिशनरी के रूप में अपनी सर्वोत्तम शक्ति लगाता रहा।
उसके उपदेश, यद्यपि अब पूर्व दिनों की चौंका देने वाली शक्ति से नहीं दिए जाते थे, फिर भी विशाल श्रोता-समूहों द्वारा सदा सहानुभूति और गहरे आदर के साथ सुने जाते थे। उसकी पत्रिका के कुछ संक्षिप्त अंश इन अन्तिम दृश्यों का सबसे अच्छा चित्रण करेंगे।
3 जनवरी को वह लिखता है: "मेरा अनुमान है कि लगभग दो हज़ार लोग न्यू चैपल में परमेश्वर के साथ अपनी वाचा को नया करने के लिए एकत्र हुए; यह अनुग्रह का एक पवित्रशास्त्रीय साधन है जो अब मेथोडिस्टों को छोड़कर प्रायः सर्वत्र भुला दिया गया है।"
14 फ़रवरी को: "मैंने वेस्ट-स्ट्रीट चैपल में बच्चों को उपदेश दिया। वे हर दिशा से झुण्ड के झुण्ड आए; और सचमुच परमेश्वर उनके बीच में था, और उन शब्दों को लागू कर रहा था, 'हे बालको, आओ, मेरी सुनो, मैं तुम्हें यहोवा का भय मानना सिखाऊँगा।'"
उत्तर की अन्तिम यात्रा। 229
27 तारीख को: "सन्ध्या को स्नोफ़ील्ड्स में मेरे सामने ऐसी मण्डली थी जैसी वहाँ अनेक वर्षों से नहीं देखी गई। इसके बाद मैं अन्तिम बार पश्चात्तापियों से मिला।
उन्होंने कमरे को पूरी तरह भर दिया; और परमेश्वर उनके बीच में था।"
28 तारीख को: "वाचा के नवीनीकरण के बाद से न्यू चैपल में हमारे पास न ऐसी मण्डली हुई, न ऐसी आशीष; लोगों के हृदय पिघलते हुए मोम के समान थे। उनमें से अधिकांश आँसुओं में थे; और मुझे विश्वास है कि जो उपदेश तब उन्हें दिया गया उसे वे शीघ्र नहीं भूलेंगे।
दोपहर बाद मैंने वेस्ट-स्ट्रीट चैपल में इफिसियों 5:1, 2 पर प्रचार किया। चैपल मण्डली को समा नहीं सका। जितने भीतर घुस सके, सभी बहुत प्रभावित दिखाई दिए, और मैं कठिनाई से भीड़ चीरकर निकला और ब्रेंटफ़ोर्ड के लिए घोड़ागाड़ी पकड़ी, जहाँ मैं छह बजे से पहले पहुँच गया।
यहाँ की मण्डली भी उतनी बड़ी थी जितनी मैंने यहाँ कभी देखी, जिससे प्रतीत होता है कि यहाँ भी हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं जाएगा।"
वसन्त में उसने अपनी अन्तिम बड़ी मिशनरी यात्रा आरम्भ की। वर्ष के आरम्भ में लंदन में उसके मित्रों ने सभी सोसाइटियों को एक परिपत्र भेजा था, जिसमें उनसे मिलने के उसके इरादे की घोषणा की गई थी, और जिसमें वह मार्ग तथा वे स्थान बताए गए थे जहाँ वह प्रचार करेगा, स्ट्राउड से लेकर एबरडीन तक: उसका अन्त इन शब्दों में होता है:
"हम आग्रहपूर्वक अनुशंसा करते हैं कि श्री वेस्ली को प्रार्थना में स्मरण किया जाए, विशेषकर अगले त्रैमासिक उपवास पर, कि यदि परमेश्वर की इच्छा हो तो उसकी शक्ति बनी रहे और बढ़ भी जाए।"
इस यात्रा में पूरे तीन महीने लगे, और वेस्ली ने असाधारण थकान को पहले की भाँति साहस से सहा।
ऐसा रोचक वृत्तान्त सरसरी दृष्टि से अधिक का अधिकारी है।
बाथ में उसने एक मण्डली को सम्बोधित किया, जो "मृत्यु की भाँति गम्भीर" थी।
वह आगे कहता है, "सचमुच परमेश्वर का कार्य यहाँ फलता-फूलता प्रतीत होता है, गहरा भी होता और विस्तृत भी।" ब्रिस्टल में उसने 230 वेस्ली के अन्तिम परिश्रम।
"प्रभु के लिए पहले से तैयार एक लोग पाया। प्रचारक सच्ची लगन वाले हैं, जिसका फल मण्डलियों में स्पष्ट दिखाई देता है।" किंग्सवुड के खदान-मज़दूरों के बीच, जो उसे पिता की भाँति आदर देते थे, उसकी भेंटों का सदा आनन्द से स्वागत होता था; और अब, वह कहता है, "मैंने ऐसी मण्डली को प्रचार किया जैसी मैंने वहाँ चालीस वर्षों में किसी सप्ताह के दिन नहीं देखी, सिवाय जागरण-रात्रि के।" स्ट्राउड,
पेंसविक, ग्लॉस्टर, ट्यूक्सबरी और स्टोरपोर्ट में मण्डलियाँ चैपलों के लिए बहुत बड़ी थीं, और असंख्य लोग इसलिए लौट गए कि उन्हें खड़े होने की जगह भी न मिल सकी।
बर्मिंघम में हम उसे उस क्षेत्र में प्रवेश करते देखते हैं जहाँ मेथोडिज़्म ने अपने सबसे बड़े संघर्ष देखे थे और अपनी कुछ सबसे शानदार विजयें प्राप्त की थीं। इस नगर की सोसाइटी से वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसके पहुँचने की सन्ध्या को सब वर्गों के लोगों की एक विशाल मण्डली उसे सुनने के लिए एकत्र हुई। "धनी और निर्धन का व्यवहार ऐसा है जो उनके अंगीकार का सम्मान बढ़ाता है: आरम्भ से अन्त तक इतना शालीन, इतना गम्भीर, इतना भक्तिपूर्ण।"
रविवार को उसने फिर "नए भवन" में प्रचार किया, जिसका वर्णन वह "अद्भुत रूप से भली-भाँति निर्मित" कहकर करता है।
सैकड़ों लोग "भीतर न आ सके"। परन्तु वह कहता है, "मुझे लगता है जो भीतर आए, उन सबने पाया कि परमेश्वर वहाँ था।"
वेडन्सबरी, जो उसके सबसे भयानक उत्पीड़नों में से एक का दृश्य था, अब मेथोडिज़्म के गढ़ों में से एक बन चुका था। "परमेश्वर का कार्य बहुत पुनर्जीवित होता है। व्यापार बहुत घट गया है, और हमारे अधिकतर पुराने मित्र नगर छोड़ गए हैं। इतना ही अधिक निर्धन लोग अनुग्रह में बढ़े हैं और स्वर्ग में धन संचित किया है। परन्तु सन्ध्या को हम बड़ी कठिनाई में थे। मैं सूर्यास्त के बाद खुले में प्रचार नहीं कर सकता था, और भवन लोगों को समाने के निकट भी नहीं था। फिर भी जितने सम्भव हुए, भीतर घुस आए, और उनका परिश्रम व्यर्थ नहीं गया।"
डडली में उन्होंने "नए भवन में, जो इंग्लैंड के सबसे सुघड़ भवनों में से एक है," प्रचार किया। "यह एक लाभदायक समय था, जहाँ उन्होंने मुझे बताया कि दो व्यक्तियों ने परमेश्वर के साथ शान्ति पाई।"
मिडलैंड काउंटियाँ। 934
' मेडले में उन्हें अब अपना उत्तम सहकर्मी फ्लेचर नहीं मिला, जो अब अपने विश्राम में जा चुका था, परन्तु उन्होंने कार्य की दशा में उसका जीवित स्मारक पाया, जो अब भी बढ़ता ही जा रहा था। वर्षा "कलीसिया को पूरी तरह भर जाने से न रोक सकी, और मेरा विश्वास है कि जिनमें आत्मिक विवेक था, उन सब ने जान लिया कि वह परमेश्वर की उपस्थिति से भरी हुई थी।" वे आगे लिखते हैं—दो दिन बाद—"मैंने 'विवाह-वस्त्र' पर अपना उपदेश पूरा किया, जो शायद अन्तिम होगा जो मैं लिखूँगा। |मेरी आँखें अब धुँधली हो गई हैं, मेरा स्वाभाविक बल घट गया है। फिर भी, जब तक मैं कर सकता हूँ, मैं धूल में मिल जाने से पहले परमेश्वर के लिए थोड़ा कुछ करना चाहता हूँ।"
अपने दिवंगत मित्र के पल्ली-क्षेत्र में तीन दिन बिताकर वेस्ली ने अपनी शक्ति से भी बढ़कर उत्साह के साथ उत्तर की ओर अपनी यात्रा फिर आरम्भ की। न्यूकैसल-अंडर-लाइम और बर्सलम में, इस प्रकार अपने ऊपर आ पड़े अतिरिक्त परिश्रम की परवाह किए बिना, उन्होंने खुले आकाश के नीचे प्रचार किया। टन्स्टॉल में उन्होंने "नए प्रार्थनालय में प्रचार किया, जो," वे कहते हैं, "बाथ छोड़ने के बाद से मैंने जितने देखे हैं उनमें सबसे सुरुचिपूर्ण था। मेरा पाठ यह था,
'आओ, हम सिद्धता की ओर बढ़ते जाएँ'; और लोग वचन को मानो निगल जाने को तत्पर दिखाई दिए।" कांग्लटन में प्रमुख पादरी, . नगर के महापौर और सभी प्रमुख जनों के साथ, उनके प्रचार में उपस्थित थे। गुड फ्राइडे के दिन वे मैनचेस्टर पहुँचे, जहाँ उन्होंने अपने उत्तम मित्रों के साथ कई दिन बिताए।
ईस्टर रविवार को उन्होंने बिना थकान के दो बार प्रचार किया और सोलह सौ सहभागियों को प्रभु-भोज दिया। अगले दिन के विषय में वे हमें बताते हैं: "अल्ट्रिंघम में रुकने पर मुझसे अनुरोध किया गया कि मैं नए प्रार्थनालय में लोगों से कुछ शब्द कहूँ; परन्तु मेरे वहाँ पहुँचते ही भवन भर गया, और शीघ्र ही उससे भी अधिक भर गया। इसलिए मैंने | 1 पतरस 1:3 पर प्रचार किया; और बहुतों ने स्तुति की
परमेश्वर की आनन्द-भरे होंठों से। लगभग बारह बजे मैंने नॉर्थविच के प्रार्थनालय में एक बड़ी और अत्यन्त जीवन्त मण्डली के सामने प्रचार किया, और सन्ध्या को चेस्टर में अपने पुराने स्नेही मित्रों से एक बार फिर मिला। मैंने इस प्रार्थनालय को आज रात से अधिक भरा हुआ कभी नहीं देखा; फिर भी वह उसे समा पाने के निकट भी नहीं था
232 वेस्ली के अंतिम परिश्रम। मण्डली को।" लिवरपूल में उनकी उपस्थिति से उतनी ही बड़ी हलचल मची जितनी मैनचेस्टर में। विगन अब और
"दुष्ट विगन" नहीं रहा, जैसा कि वह "बहुत वर्षों तक कहावत के रूप में कहा जाता था:" "निवासियों ने सामान्यतः अधिक कोमल स्वभाव अपना लिया है।" बोल्टन की सोसाइटी, जो इंग्लैंड की सबसे जीवन्त सोसाइटियों में से एक है, "भलाई करने में धीरज के साथ बने रहने के द्वारा, तिरस्कार और घृणा को सामान्य आदर और सद्भावना में बदल चुकी है।"
यहाँ जर्नल की मुद्रित प्रतियों में एक टिप्पणी जोड़ी गई है, जिसमें कहा गया है कि "पांडुलिपि का एक भाग खो जाने से यहाँ एक अन्तराल पड़ गया है।" यह अन्तराल 10 अप्रैल से 24 मई तक फैला है। इस अवधि के उनके परिश्रम का एक रोचक अंश हम सौभाग्य से किसी अन्य स्रोत से दे सकते हैं। बोल्टन से चलकर वे यॉर्कशायर में गए, और यद्यपि वे वास्तव में हैलिफ़ैक्स नहीं गए, तथापि उन्होंने सोमवार की प्रातः ब्रैडशॉ के प्रार्थनालय में प्रचार किया। हैलिफ़ैक्स में एक दिन पहले घोषणा कर दी गई थी, और प्रार्थनालय को भरने से भी अधिक मण्डली दस बजे के समय एकत्र हो गई। परन्तु अपनी बढ़ती दुर्बलताओं के कारण वेस्ली एक बजे तक ही प्रार्थनालय पहुँच सके, और इस बीच मण्डली अत्यन्त धैर्य के साथ प्रार्थनालय में बैठी रही। जब वे पहुँचे, तो दृश्य सचमुच हृदयस्पर्शी था।
जब वह पूज्य सन्त श्री ब्रैडफ़ोर्ड और श्री थॉम्पसन के साथ मंच की सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे, तो मण्डली, यह पूरी तरह समझते हुए कि वे ऐसे व्यक्ति को देख रहे हैं जिसे वे फिर देह में नहीं देखेंगे, फूट-फूटकर रो पड़ी। स्वयं वेस्ली भी भावुक हो उठे; और सब के भाव फिर से उमड़ पड़े जब उन्होंने उसे देखा जो "वचनों में सामर्थी" था, अब अपने प्रवचन की मुख्य बातें कान में कहने के लिए एक मित्र की सहायता चाहता था। उनकी दुर्बलताएँ ऐसी थीं कि मंच पर उन्हें दोनों सेवकों को सहारा देना पड़ रहा था, और एक से अधिक बार उनकी स्मृति पूरी तरह साथ छोड़ गई, ऐसे में प्रवचन जारी रखने के लिए उनकी सहायता आवश्यक हुई।*
उत्तरी काउंटियों का भ्रमण करके वेस्ली पहुँचे * स्मिथ, हिस्ट्री ऑफ़ मेथोडिज़्म, खण्ड 1, पृ. 598।
स्कॉटलैंड। न्यूकैसल-ऑन-टाइन। 233
स्कॉटलैंड में, जहाँ उन्होंने अपने प्रचारकों द्वारा देखे गए सभी प्रमुख नगरों में प्रचार किया। वहाँ उनका प्रायः बहुत अच्छा स्वागत हुआ, और उन्होंने अपनी आत्मा की पूरी बात कह डाली, अपनी शेष शक्ति को उन लोगों को उद्धार का मार्ग विश्वासयोग्यता से बताने में लगाया जिनके लिए धर्म मानो स्वाभाविक-सा था, पर जिनकी भक्ति में, उनके विचार से, गहराई की कमी थी।
ग्लासगो में, अपवाद के रूप में, "मण्डली दयनीय रूप से छोटी थी, जिससे वह बात सच ठहरी जो मैं पहले अक्सर सुन चुका था, कि स्कॉटलैंडवासी प्रभु के वचन से बहुत प्रेम करते हैं—प्रभु के दिन।" यदि मैं फिर आने तक जीवित रहा, तो मैं ध्यान रखूँगा कि ग्लासगो में केवल प्रभु का दिन ही बिताऊँ।" एक से अधिक बार वे अपनी शक्ति की सीमा से आगे निकल गए: उदाहरण के लिए ब्रेचिन में वे "इतने निढाल और अस्वस्थ थे" कि उन्हें "अपना प्रवचन छोटा करना पड़ा।" 'जर्नल प्रमाणित करते हैं कि इस बढ़ी हुई आयु में भी वे स्कॉटलैंड के प्राकृतिक सौन्दर्य और उसके पर्वतों की भव्यता के प्रति सजग थे।
घर लौटते समय उन्होंने न्यूकैसल में, अनाथ-गृह में, जो उनका प्रिय विश्राम-स्थान था, कुछ दिन बिताए।
"इस स्थान और किंग्सवुड भवन में," वे कहते हैं, "यदि मैं अपनी इच्छा के अनुसार करता, तो अपने जीवन के शेष थोड़े-से दिन बिताना चुनता। परन्तु यह नहीं हो सकता: यह मेरा विश्राम नहीं है।" इस नगर में, जो पूर्व काल में ऐसी सक्रियता और ऐसे कष्टों का रंगमंच रहा था, उनका गहन श्रद्धा के साथ स्वागत हुआ: उन्होंने कई बार प्रचार किया, केवल वयस्कों में ही नहीं, बच्चों में भी, और उनके उपदेशों और भेंटों ने लोगों के मनों पर गहरी छाप छोड़ी; जिसका प्रमाण उस वृत्तान्त में देखा जा सकता है जो उनके अपने ही एक प्रचारक द्वारा हमारे लिए सुरक्षित रखा गया है। इस अन्तिम मिशन-यात्रा की स्मृतियाँ इतनी बहुमूल्य हैं कि उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता।
"वे बहुत दुर्बल दिखाई देते हैं," चार्ल्स एटमोर कहते हैं, "और आश्चर्य नहीं, क्योंकि वे लगभग अट्ठासी वर्ष के हैं। उनकी दृष्टि इतनी क्षीण हो गई है कि वे भजन की पंक्तियाँ पढ़कर नहीं सुना सकते; फिर भी उनकी वाणी सशक्त है और उनका उत्साह उल्लेखनीय रूप से जीवन्त है। निश्चय ही यह महान और भला पुरुष वर्तमान युग का एक अद्भुत चमत्कार है....
234 वेस्ली के अंतिम परिश्रम।
"शनिवार, 8 मई: श्री वेस्ली हम छोटे-से दल के साथ नॉर्थ शील्ड्स गए, जहाँ उन्होंने दोपहर को फिलिप्पियों 3:7 से एक उत्तम उपदेश दिया। वह सचमुच प्रभु की उपस्थिति से ताज़गी का समय था।
प्रभु का दिन: श्री डब्ल्यू. थॉम्पसन ने आज प्रातः नौ बजे मंच सँभाला, [और प्रचार किया] इस पाठ से ' अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है।' दोपहर 2 बजे,
श्री वेस्ली बाइकर गए, और खुले आकाश के नीचे कई हज़ार लोगों को मत्ती 7:24 से सम्बोधित किया, और सायं 5 बजे अनाथ-गृह में इफिसियों 2:8 से। भवन में बहुत भीड़ थी, कई सौ लोग भीतर प्रवेश न पा सकने के कारण लौट गए।
"श्री वेस्ली न्यूकैसल में अपनी सेवकाई में अत्यन्त सम्मानित हुए, विशेषकर एक ऐसे व्यक्ति के लिए जो बहुत वर्षों से घोर निराशा की दशा में था। अनाथ-गृह पहुँचते ही श्री वेस्ली ने इस व्यक्ति के विषय में पूछा, और मैं उनके साथ उससे भेंट करने गया। कमरे में प्रवेश करते ही वे उसके पास गए, और परमेश्वर के एक दूत के रूप में बोले, 'भाई रीड, मेरे पास तेरे लिए परमेश्वर की ओर से एक वचन है;
यीशु मसीह तुझे चंगा करता है!' फिर वे प्रार्थना करने के लिए घुटनों के बल बैठ गए, और ऐसा समय मैंने बहुत कम अनुभव किया है।
आशा तुरन्त जाग उठी, और निराशा ने स्थान छोड़ दिया; और यद्यपि वह कई वर्षों से अपने निवास से, यहाँ तक कि अपने दयनीय बिछौने से भी, बाहर नहीं निकला था, वह उसी सन्ध्या श्री वेस्ली का प्रचार सुनने गया, जब परमेश्वर ने अपने सेवक की गवाही की अनुग्रहपूर्वक पुष्टि की और उसे
'अपने मुख के प्रकाश' में लौटा दिया।"* दक्षिण की ओर लौटते हुए वेस्ली ने वियरडेल में एक सन्ध्या बिताई, जहाँ वे टिप्पणी करते हैं, "मण्डली में वही आत्मा अब भी थी जो बहुत वर्षों से रही है।" स्टैनहोप में, और फिर डरहम में, उन्हें खुले आकाश के नीचे प्रचार करना पड़ा। मंकवियरमाउथ में, अन्यत्र की तरह, वे रविवारीय पाठशाला की स्थापना की सराहना और प्रोत्साहन करते हैं,
"' जिसने पहले ही उन सब बच्चों से गलियों को खाली कर दिया है * वेस्लियन-मेथोडिस्ट मैगज़ीन, 1845 के लिए, पृ. 120, 121।
एपवर्थ की अन्तिम यात्रा। 235 जो वहाँ रविवार को प्रातः से सन्ध्या तक खेला करते थे।" व्हिटबी में वे यह टिप्पणी करते हैं: "यह बड़ी ही प्रोविडेंशियल बात थी कि निकटवर्ती पर्वत का एक भाग गिर पड़ा और हमारे पुराने प्रचार-भवन को, और उसके साथ बहुत-से घरों को भी, ध्वस्त कर गया; जिसके कारण हमारे पास ग्रेट ब्रिटेन के सबसे सुन्दर प्रार्थनालयों में से एक है, जो पर्वत की ढलवाँ ओर पर सुन्दर ढंग से बसा है।" तथापि यह नया प्रार्थनालय लोगों को समाने के लिए बहुत छोटा था; और उनका उत्साह इस टिप्पणी से प्रकट होता है: "सारे इंग्लैंड में मैंने व्हिटबी के लोगों से अधिक स्नेही लोग नहीं देखे।"
28 जून को वे हल में हैं, और अपने जर्नल में लिखते हैं: "आज मैं अपने अट्ठासीवें वर्ष में प्रवेश करता हूँ।
छियासी वर्ष से अधिक तक मैंने वृद्धावस्था की कोई दुर्बलता नहीं पाई; मेरी आँखें धुँधली नहीं हुईं, और न मेरा स्वाभाविक बल घटा; परन्तु पिछले अगस्त में मैंने लगभग अचानक ही एक परिवर्तन पाया। मेरी आँखें इतनी धुँधली हो गईं कि कोई चश्मा
सहायता न कर सका। मेरी शक्ति ने भी अब मुझे पूरी तरह छोड़ दिया है, और सम्भवतः इस संसार में नहीं लौटेगी। परन्तु मुझे सिर से पाँव तक कोई पीड़ा नहीं है; केवल ऐसा लगता है कि प्रकृति थक चुकी है; और मानवीय रीति से कहें तो वह और अधिक क्षीण होती जाएगी, जब तक कि
जीवन के थके हुए सोते अन्त में थम न जाएँ 1??
अगले दिन ओवस्टन में उन्होंने "बहुत-से प्रचारकों के साथ एक सुखद दिन बिताया। यह, जो सर्किट की अन्तिम सोसाइटियों में से एक थी, अब अनुग्रह में भी और संख्या में भी पहली हो गई है।" शनिवार, 3 जुलाई को वे अपने जन्मस्थान एपवर्थ पहुँचे, और "सन्ध्या को प्रचार करने के बाद सोसाइटी से भेंट की, और उन्हें स्मरण दिलाया कि कुछ वर्ष पहले वे क्या थे और अब क्या हैं; परमेश्वर के सब मार्गों में अपने पूर्व उत्साह और तत्परता की परछाईं भी मुश्किल से बचाए हुए।" अगले दिन, कलीसिया की आराधना के अन्त में, उन्होंने "बाज़ार-स्थल में उस भयानक प्रश्न को ज़ोर देकर रखना आरम्भ किया, 'यदि हम ऐसे बड़े उद्धार से निश्चिन्त रहें, तो क्योंकर बच सकेंगे?' ऐसी मण्डली के सामने जैसी एपवर्थ में पहले कभी नहीं देखी गई थी।"
236 वेस्ली के अंतिम परिश्रम।
यह अन्तिम यात्रा ब्रिस्टल में समाप्त हुई, जहाँ वे अगस्त 1790 में पहुँचे, ताकि सैंतालीसवें वार्षिक सम्मेलन की अध्यक्षता कर सकें। प्रमुख सोसाइटियों की भेंटों से उनके मन पर जो आनन्दमय प्रभाव पड़े थे, वे प्रचारकों द्वारा चारों ओर से लाए गए आत्मिक उन्नति के समाचारों से नए हो गए। कार्य सर्वत्र पूर्ण समृद्धि में था। उसकी संख्यात्मक शक्ति का विस्तृत विवरण हम अगले अध्याय में देंगे।
वेस्ली के बहुत-से प्रचारक ब्रिस्टल सम्मेलन में उपस्थित हुए, और सब यह दृढ़ विश्वास लेकर लौटे कि वे अब उनका मुख फिर नहीं देखेंगे। उनकी शारीरिक दुर्बलता चरम पर थी: फिर भी वे दिन में दो या तीन बार प्रचार करते रहे। 27 अगस्त को उन्होंने ब्रिस्टल में जागरण-सभा रखी, और अपने उपदेश में उस पुस्तक के प्रभाव का प्रतिकार करने का प्रयास किया जिससे कुछ सदस्यों ने यह सिद्धान्त सीखा था कि इस वर्तमान जीवन के कष्टों का प्रायश्चित्तीय मूल्य है। कुछ दिन बाद, "मेले के पहले दिन," उन्होंने "सुलैमान के इन शब्दों पर ज़ोर से कहा, 'सत्य को मोल लेना, उसे बेचना मत।'" एक अन्य अवसर पर उन्होंने प्रार्थनाओं, उपदेश और प्रभु-भोज सहित तीन घण्टे की आराधना बिना किसी सहायता के चलाई, और फिर भी उसी दिन अपराह्न में खुले आकाश के नीचे प्रचार कर पाए।
7 अक्टूबर, 1790 को विंचेल्सी में उन्होंने एक वृक्ष के नीचे इन शब्दों से प्रचार किया, ' स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है: मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।" वही उनकी अन्तिम खुले आकाश की सभा थी, और तब उन्होंने उस रणभूमि को अलविदा कहा जिसमें उन्होंने इतनी विजयें प्राप्त की थीं। परन्तु यद्यपि उनकी वाणी अब आकाश के चँदोवे तले ऊँची नहीं होनी थी, वे अन्त तक प्रचार करते रहे। राई में उन्होंने "एक प्रेमपूर्ण, भली-भाँति एकजुट लोगों" को प्रचार किया, और "वचन भूमि पर नहीं गिरा;"—कोलचेस्टर में, "एक अद्भुत मण्डली को; धनी और निर्धन, पादरी और सामान्यजन;"—नॉरविच में, जहाँ "ज्वार पलट गया है," और वे "एक सम्मानित पुरुष बन गए हैं;"—यारमाउथ में, जहाँ
अन्तिम सम्मेलन। 237 वे कहते हैं, "भोजन के बाद एक छोटा-सा दल प्रार्थना करने गया, और परमेश्वर की सामर्थ्य हम पर उतरी;"—लिन में, जहाँ वे "सिर से पाँव तक पूरी तरह ठिठुरे हुए" पहुँचे, "जिसकी क्षतिपूर्ति मण्डली की गम्भीरता ने भरपूर कर दी," और जहाँ अगले दिन, "नगर के सब पादरी, सिवाय एक के जो लँगड़ा था, उपस्थित थे।"
लंदन लौटकर उन्होंने एक ही दिन में स्थापित कलीसिया के मंचों से दो बार प्रचार किया। "रविवार, 24 तारीख: मैंने स्पिटलफ़ील्ड्स कलीसिया में एक बड़ी मण्डली को 'परमेश्वर के सारे हथियार' समझाए। अपराह्न में सेंट पॉल, शैडवेल, में और भी अधिक भीड़ थी, जब मैंने उस महत्त्वपूर्ण सत्य पर ज़ोर दिया, 'एक ही बात आवश्यक है;' और मुझे आशा है कि बहुतों ने तभी उत्तम भाग चुन लेने का निश्चय किया।"
"' उनके जर्नल," एक अमेरिकी इतिहासकार कहता है, '" जो मानव-जाति के पास किसी मनुष्य के जीवन का सबसे असाधारण अभिलेख हैं, रविवार, 24 अक्टूबर को समाप्त होते हैं,
1790 में, इस सूचना के साथ कि उन्होंने एक पूरे सब्त को स्थापित कलीसिया के मंचों से प्रचार किया, जिसके वे बीती शताब्दी में एक साथ सबसे बड़े गौरव और सबसे बड़े शिकार थे।"
सन् 1790 के मध्य के लगभग, क्षीण होती दृष्टि ने उन्हें अपनी नकद-बही में अपनी आय और व्यय दर्ज करना बन्द करने को विवश कर दिया। उसका अन्तिम वाक्य अपने भाव और अपने रूप, दोनों में उल्लेखनीय है। "छियासी वर्ष से ऊपर तक मैंने अपना हिसाब ठीक-ठीक रखा है: अब मैं इसे और नहीं रखने का प्रयत्न करूँगा, इस निरन्तर दृढ़ धारणा से सन्तुष्ट होकर कि मैं जो कुछ बचा सकता हूँ बचाता हूँ, और जो कुछ दे सकता हूँ देता हूँ; अर्थात् जो कुछ मेरे पास है, वह सब।" यह मुश्किल से पढ़ा जा सकता है, और वर्षों की संख्या में हुई भूल उनकी क्षमताओं के ह्रास का प्रमाण है।
यद्यपि उनके परिश्रम का अभिलेख समाप्त हो जाता है, परिश्रम स्वयं कुछ महीनों तक चलते रहते हैं। वे लंदन के अपने प्रार्थनालयों में प्रचार करते रहते हैं, प्रायः उपदेश के बाद सोसाइटी से मिलते हैं, उन्हें अपनी विदाई-सम्मति देते हैं कि "भाइयों की नाईं प्रेम रखो, परमेश्वर से डरो, और राजा का आदर करो," और फिर उनके साथ अपना नित्य का विदाई-भजन गाते हैं। वे वर्ष के सामान्य समय पर
238 वेस्ली के अंतिम परिश्रम। आयरलैंड और स्कॉटलैंड की एक और यात्रा करने की तैयारी तक करते हैं; उनकी बग्घी और घोड़े उनसे पहले ब्रिस्टल भेज दिए जाते हैं, और बाथ की डाक-गाड़ी में उनके तथा उनके यात्रा-साथी के लिए स्थान आरक्षित कर लिए जाते हैं; परन्तु उनके मन की ऊर्जा अब उनकी ढलती देह को सँभाल नहीं सकती, और यह योजना त्याग दी जाती है।
1791 की 1 फ़रवरी को वे अमेरिका को अपना अन्तिम पत्र लिखते हैं:
"फ़िलाडेल्फ़िया के श्रद्धेय ईज़ेकिएल कूपर को।
"लंदन के निकट, 1 फ़रवरी, 1791।
"मेरे प्रिय भाई, "जो लोग मुझे कुछ लिखना या कहना चाहते हैं उनके पास खोने को समय नहीं है; क्योंकि समय ने मुझसे हाथ मिला लिया है, और मृत्यु दूर नहीं है। परन्तु बीते समय के लिए मेरे पास धन्यवाद का कारण है: छियासी वर्ष तक मैंने वृद्धावस्था की दुर्बलताओं को बहुत कम अनुभव किया।
डेढ़ वर्ष पहले ही मेरी शक्ति और मेरी दृष्टि क्षीण हुई। और फिर भी मैं थोड़ा-बहुत घसीटकर लिख पाता हूँ, और रेंग पाता हूँ, यद्यपि दौड़ नहीं सकता। सम्भवतः मैं इतना भी न कर पाता यदि तुम में से बहुत-से अपनी प्रार्थनाओं से मेरी सहायता न करते। आधी शताब्दी से अधिक समय से ब्रिटेन और आयरलैंड में जो परमेश्वर का कार्य हुआ है, उसका मैंने एक स्पष्ट विवरण दे दिया है। हम चाहते हैं कि तुम में से कोई हमें वह सम्बद्ध वृत्तान्त दे जो हमारे प्रभु अमेरिका में करते आए हैं, उस समय से जब रिचर्ड बोर्डमैन ने निमन्त्रण स्वीकार किया और तुम्हारी सेवा करने के लिए अपना देश छोड़ा। ध्यान रखना कि यूरोप में अपने भाइयों से अलग होने के किसी भी विचार को कभी स्थान न देना। सब मनुष्यों के सामने यह घोषित करने का कोई अवसर न चूकना कि मेथोडिस्ट सारे संसार में एक ही लोग हैं, और उनका पूरा संकल्प है कि वे ऐसे ही बने रहें—चाहे पर्वत उठें, और महासागर लहराएँ, हमें अलग करने को व्यर्थ ही।
"हमारे साझे प्रभु की देखरेख में मैं तुम्हें सौंपता हूँ, और हूँ "तुम्हारा स्नेही मित्र और भाई।"
"गुरुवार, 17 फ़रवरी, 1791," श्रद्धेय जोसेफ़ अन्तिम उपदेश। 239
बेन्सन कहते हैं, "उन्होंने लैम्बेथ में प्रचार किया; परन्तु लौटने पर वे बहुत अस्वस्थ प्रतीत हुए, और कहा कि उन्हें ठण्ड लग गई है। फिर भी अगले दिन उन्होंने सदा की भाँति पढ़ा और लिखा, और सन्ध्या को चेल्सी में 'राजा का कार्य शीघ्रता चाहता है' इस पाठ से प्रचार किया, यद्यपि कुछ कठिनाई के साथ, क्योंकि उन्हें तेज़ ज्वर था। वास्तव में उन्हें एक-दो बार रुकना पड़ा, और लोगों को बताना पड़ा कि उनकी सर्दी ने उनकी आवाज़ को इस प्रकार प्रभावित किया है कि वे उन आवश्यक विरामों के बिना बोल नहीं सकते। शनिवार को वे अपने सामान्य कामों में डटे रहे, यद्यपि आसपास के लोगों को उनकी शिकायतें स्पष्टतः बढ़ती दिखाई देती थीं। उन्होंने इज़लिंग्टन में भोजन किया, और भोजन के समय एक मित्र से कहा कि वे अय्यूब की पुस्तक में से चार अध्याय पढ़कर सुनाएँ, अर्थात् चौथे से सातवें तक। रविवार को वे रीति के अनुसार सवेरे उठे; परन्तु अपने सामान्य किसी भी
सब्त-दिवस के कार्य के लिए बिलकुल अयोग्य थे। सात बजे उन्हें लेट जाना पड़ा, और वे तीन-चार घण्टे सोए।
जब वे जागे तो बोले, 'पिछले पखवाड़े भर में मुझे ऐसी आरामदेह नींद नहीं आई।' अपराह्न में वे फिर लेट गए, और एक-दो घण्टे सोए। बाद में उन्हें हमारे प्रभु के पहाड़ी उपदेश पर उनके अपने दो प्रवचन पढ़कर सुनाए गए, और सन्ध्या को वे भोजन के लिए नीचे आए।
"सोमवार, 21 तारीख: वे बहुत अच्छे दिखाई दिए, और यद्यपि उनके मित्रों ने उन्हें रोकने का प्रयत्न किया, वे कुछ समय पहले तय किए गए उस कार्यक्रम को निभाने पर अड़े रहे कि ट्विकनहम में भोजन करेंगे।
वहाँ जाते समय वे लेडी मेरी फ़िट्ज़जेराल्ड से मिलने रुके।
वार्तालाप सचमुच लाभदायक था, और अन्तिम भेंट के योग्य ही था। मंगलवार को वे अपना सामान्य कार्य करते रहे, सन्ध्या को सिटी रोड के प्रार्थनालय में प्रचार किया, और कुछ दिनों की अपेक्षा बहुत अच्छे दिखाई दिए।
बुधवार को वे लेदरहेड गए, और एक छोटे समूह को इस पाठ पर प्रचार किया, 'जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज करो; जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो।' यही उनका अन्तिम उपदेश सिद्ध हुआ। यहाँ यीशु मसीह के इस महान सेवक का सार्वजनिक परिश्रम समाप्त हुआ।"
240 वेस्ली के अंतिम परिश्रम।
"उस दिन," (बुधवार 23 को,) उस इतिहासकार का कथन है जिसे हम पहले अनेक बार उद्धृत कर चुके हैं, "उनकी मरणासन्न पकड़ से सत्य की वह तुरही गिर पड़ी, जिसने सनातन
सुसमाचार को सोलह सौ वर्षों में किसी भी अन्य मनुष्य की तुरही से अधिक बार और अधिक प्रभावशाली ढंग से गुंजाया था...व्हिटफ़ील्ड ने अठारह हज़ार उपदेश दिए, अपने चौंतीस वर्ष के सेवकाई-जीवन में प्रति सप्ताह दस से अधिक। वेस्ली ने जॉर्जिया से लौटने के बाद बयालीस हज़ार चार सौ उपदेश दिए, प्रति सप्ताह पन्द्रह से अधिक।"
..."शनिवार, 26 तारीख को उन्होंने अपना अन्तिम पत्र लिखा। वह विल्बरफ़ोर्स को सम्बोधित था, और अफ़्रीकी दास-व्यापार के विरुद्ध उनके संसदीय परिश्रम में दृढ़ बने रहने का एक _ प्रोत्साहन था। अपनी 'दासत्व पर विचार' नामक रचना द्वारा वे क्लार्कसन और शार्प के अधीन उस महान सुधार के आरम्भ में ही उसके प्रति वचनबद्ध हो चुके थे।" यह पत्र इतना रोचक है और इन दोनों महान पुरुषों का इतना सम्मान करता है कि इसे छोड़ा नहीं जा सकता।
"लंदन, 26 फ़रवरी, 1791।
" प्रिय महोदय, " जब तक दैवी सामर्थ्य ने आपको 'अथानासियुस कोन्त्रा मुन्दुम' (संसार के विरुद्ध अथानासियुस) के समान खड़ा न किया हो,* मैं नहीं देखता कि आप उस घृणित दुष्टता का विरोध करने के अपने महिमामय उद्यम को कैसे पार करेंगे, जो धर्म की, इंग्लैंड की और मानव-स्वभाव की लज्जा है। जब तक परमेश्वर ने आपको ठीक इसी कार्य के लिए नहीं उठाया, आप मनुष्यों और दुष्टात्माओं के विरोध से थक कर चूर हो जाएँगे। परन्तु, 'यदि परमेश्वर तुम्हारी ओर है, तो कौन तुम्हारे विरुद्ध हो सकता है?' क्या वे सब मिलकर परमेश्वर से अधिक बलवन्त हैं? अहा, 'भलाई करने में हियाव न छोड़ो!' परमेश्वर के नाम से और उसकी शक्ति के सामर्थ्य से आगे बढ़ते जाओ, जब तक कि अमेरिकी दासत्व भी (जो सूर्य के देखे हुए सबसे नीच दासत्वों में से है) उसके सामने से लुप्त न हो जाए।
" आज प्रातः एक दीन अफ़्रीकी की लिखी एक पुस्तिका पढ़ते हुए, मैं उस परिस्थिति से विशेष रूप से प्रभावित हुआ,—कि काली त्वचा वाला मनुष्य, किसी श्वेत द्वारा अन्याय या अपमान सहने पर, * "संसार के विरुद्ध अथानासियुस।"
अन्तिम पत्र। _ 9AL [241] कोई न्याय नहीं पा सकता; क्योंकि हमारे सब उपनिवेशों में यह नियम है कि श्वेत के विरुद्ध अश्वेत की शपथ कुछ भी नहीं गिनी जाती। यह कैसी दुष्टता है!
"वह जिसने आपको आपकी युवावस्था से मार्ग दिखाया है, आपको इसमें और सब बातों में सामर्थ्य देता रहे, यही प्रार्थना है, " प्रिय महोदय, " आपका स्नेही सेवक, "जॉन वेस्ली।"
वेस्ली के जीवन के अन्तिम दृश्यों का वर्णन श्रद्धेय जोसेफ़ बेन्सन ने इस प्रकार किया है:
"रविवार प्रातः (27 फ़रवरी) वे बहुत अच्छे दिखाई दिए, उठे और एक प्याला चाय ली। अपनी कुर्सी पर बैठे वे बिलकुल प्रसन्न दिखते थे, और अपने भाई चार्ल्स के 'स्क्रिप्चर हिम्स' में 'जब मेरा बल घटे तब मुझे न छोड़' पर लिखे भजन की पद्य-पंक्तियों का अन्तिम भाग दोहराया, अर्थात्:—
'जब तक मैं प्रसन्न होकर इस देह को न रख दूँ, तेरा सेवक, हे प्रभु, साथ रहे; और, हे! मेरे जीवन को दया से मुकुट पहना एक विजयी अन्त के साथ।'
इसके कुछ ही देर बाद, अत्यन्त ज़ोर देकर उन्होंने कहा, 'हमारा मित्र लाज़र सो गया है।' कुछ मित्रों से बातचीत करने का प्रयत्न करते हुए वे शीघ्र थक गए और उन्हें लेट जाना पड़ा। कुछ देर शान्त लेटे रहने के बाद उन्होंने ऊपर देखा और कहा, 'मुझसे बात करो; मैं बोल नहीं सकता।' इस पर उपस्थित लोगों में से एक ने कहा, 'क्या हम आपके साथ प्रार्थना करें, महोदय?' उन्होंने गम्भीरता से उत्तर दिया, 'हाँ।' और जब वे प्रार्थना कर रहे थे, उनकी सारी आत्मा उत्तर के लिए परमेश्वर में लगी हुई प्रतीत होती थी, और उनके हार्दिक आमीन ने दिखाया कि जो कहा जा रहा था उसे वे भली-भाँति समझ रहे थे। लगभग आधे घण्टे बाद उन्होंने कहा, 'और अधिक की आवश्यकता नहीं: जब मैं ब्रिस्टल में था तब मेरे शब्द ये थे,
'J पापियों में प्रधान मैं हूँ, पर यीशु मेरे लिए मरा।' "* * 1783 में ब्रिस्टल सम्मेलन के समय श्री वेस्ली बहुत बीमार पड़ गए थे: न उन्होंने और न उनके मित्रों ने सोचा कि वे स्वस्थ हो सकेंगे। R 242 - वेस्ली के अंतिम शब्द।
"एक ने कहा, 'क्या यही आपके हृदय की वर्तमान भाषा है?
और क्या आप अब वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा तब करते थे?' उन्होंने उत्तर दिया, "हाँ।" जब उसी व्यक्ति ने दोहराया, 'साहस के साथ मैं सनातन सिंहासन के निकट आता हूँ, और मसीह के द्वारा मुकुट को अपना ठहराता हूँ;* और जोड़ा, ''यही बहुत है; हमारे बहुमूल्य इम्मानुएल ने सब कुछ मोल लिया है, सब कुछ वचन दिया है;' तो उन्होंने गम्भीरता से उत्तर दिया, 'वही सब कुछ है! वही सब कुछ है!' इसके बाद ज्वर बहुत तेज़ हो गया, और कभी-कभी उनकी स्मृति को प्रभावित करता था; परन्तु तब भी, यद्यपि उनका मस्तिष्क क्षण-भर के लिए विचलित था, उनका हृदय पूर्णतः अपने स्वामी के कार्य में लगा प्रतीत होता था।
सन्ध्या को वे फिर उठे; और अपनी कुर्सी पर बैठे हुए उन्होंने कहा, 'हर एक के लिए सही नींव पर होना कितना आवश्यक है!
'T पापियों में प्रधान मैं हूँ, पर यीशु मेरे लिए मरा।'
"सोमवार, 28 तारीख: उनकी दुर्बलता बढ़ गई। वे अधिकतर दिन सोते रहे, और बहुत कम बोले; फिर भी उस थोड़े ने प्रकट किया कि उनका सारा हृदय सोसाइटियों की चिन्ता में, परमेश्वर की महिमा में, और उस राज्य से सम्बन्धित बातों की उन्नति में कितना लगा हुआ था जिसकी ओर वे शीघ्रता से बढ़ रहे थे। एक बार उन्होंने धीमे परन्तु स्पष्ट स्वर में कहा,
'यीशु के लहू के बिना परमपवित्र स्थान में जाने का कोई मार्ग नहीं।'
इसके बाद उन्होंने पूछा कि वे कौन-से शब्द थे जिन पर उन्होंने कुछ समय पहले हैम्पस्टेड में प्रचार किया था। अपनी बीमारी का स्वरूप बताए जाने पर, उन्होंने अनुमान लगाया कि पेट में ऐंठन उठेगी, और सम्भवतः अचानक मृत्यु हो जाएगी। अपनी दशा के इन विचारों के अधीन उन्होंने श्री ब्रैडफ़ोर्ड से कहा, 'मैं अपने बीते जीवन पर विचार करता रहा हूँ: मैं पचास-साठ वर्ष तक इधर-उधर भटकता रहा हूँ, अपनी दीन रीति से अपने संगी-प्राणियों का थोड़ा भला करने का प्रयत्न करता हुआ: और अब सम्भव है कि मेरे और मृत्यु के बीच केवल थोड़े-से कदम हैं; और उद्धार के लिए मेरे पास भरोसा करने को क्या है? मुझे अपना किया या सहा हुआ कुछ भी ऐसा नहीं दिखता जो देखने योग्य ठहरे। मेरे पास इसके सिवा और कोई याचना नहीं;
'पापियों में प्रधान मैं हूँ, पर यीशु मेरे लिए मरा।' "
" सब से उत्तम यह है कि परमेश्वर हमारे साथ है!" 243 वे ये थे, 'तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह जानते हो, कि वह धनी होकर भी तुम्हारे लिए कंगाल बन गया, ताकि उसके कंगाल हो जाने से तुम धनी हो जाओ; उन्होंने उत्तर दिया, 'वही नींव है, एकमात्र नींव: कोई दूसरी नहीं।' इस दिन डॉक्टर व्हाइटहेड ने चाहा कि उनसे पूछा जाए कि क्या वे चाहेंगे कि उनकी देखरेख के लिए कोई और चिकित्सक बुलाया जाए; परन्तु उन्होंने इसे पूरी तरह अस्वीकार कर दिया।
यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने बहुत कम पीड़ा सही, अपनी बीमारी के दौरान किसी का शिकायत नहीं की, सिवाय एक बार बाएँ वक्ष की पीड़ा के। यह एक बेचैन रात थी।
"मंगलवार प्रातः: उन्होंने एक भजन के दो पद गाए: फिर शान्त लेटे रहे, मानो शक्ति पुनः पा रहे हों, उन्होंने कलम और स्याही माँगी; परन्तु जब वे लाई गईं तो वे लिख न सके। एक व्यक्ति ने कहा, 'महोदय, मुझे आपके लिए लिखने दीजिए: बताइए आप क्या कहना चाहते हैं।' उन्होंने उत्तर दिया, 'कुछ नहीं, सिवाय इसके कि परमेश्वर हमारे साथ है।' पूर्वाह्न में उन्होंने कहा, 'मैं उठूँगा।'
जब वे उनके वस्त्र तैयार कर रहे थे, तो वे एक ऐसी रीति से फूट पड़े जिसने, उनकी अत्यन्त दुर्बलता को देखते हुए, सब उपस्थितों को चकित कर दिया, गाते हुए, 'जब तक मुझ में साँस है मैं अपने सृजनहार की स्तुति करूँगा; और जब मेरी वाणी मृत्यु में खो जाएगी, तब स्तुति मेरी श्रेष्ठतर शक्तियों को लगाए रखेगी:
मेरे स्तुति के दिन कभी न बीतेंगे, जब तक जीवन, विचार, और अस्तित्व बने रहें, या अमरता बनी रहे,'
'उन्हें कुर्सी पर बैठाने के बाद उन्होंने देखा कि वे मृत्यु की ओर बदल रहे हैं। परन्तु उन्होंने, अपनी मरती देह की परवाह न करते हुए, क्षीण स्वर में कहा, 'हे प्रभु, तू बोल सकने वालों को भी शक्ति देता है और उन्हें भी जो नहीं बोल सकते। बोल,
हे प्रभु, हमारे सब हृदयों से, और उन्हें जानने दे कि तू जीभों को खोलता है।' फिर उन्होंने गाया, 'पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को, जो मधुरता से सब एकमत हैं, —'
यहाँ उनकी वाणी रुक गई। हाँफते हुए साँस लेने के बाद उन्होंने कहा, 'अब हमने सब कर लिया।' फिर उन्हें बिछौने पर लिटा दिया गया R 2 244 वेस्ली के अंतिम शब्द। जिससे वे फिर नहीं उठे। थोड़ा विश्राम करने के बाद उन्होंने अपने पास के लोगों को 'प्रार्थना और स्तुति करने' के लिए बुलाया। वे घुटनों के बल बैठ गए, और कमरा दिव्य उपस्थिति से भरा प्रतीत हुआ। कुछ देर बाद उन्होंने कहा, 'मुझे ऊनी वस्त्र के सिवा और किसी में न गाड़ना, और मेरा शव
- प्रार्थनालय में ले जाया जाए।' फिर, मानो नीचे की हर बात से वे निवृत्त हो चुके हों, उन्होंने फिर विनती की कि वे प्रार्थना और स्तुति करें। घर में उपस्थित कई मित्रों को बुलाया गया, और वे सब फिर प्रार्थना के लिए घुटनों के बल बैठ गए, उस समय उनके आत्मा की उत्कटता हर उपस्थित व्यक्ति को प्रकट थी।
परन्तु प्रार्थना के विशेष अंशों में उनकी सारी आत्मा ऐसी रीति से लगी प्रतीत होती थी जो स्पष्टतः दिखाती थी कि वे उनकी संयुक्त इच्छाओं की पूर्ण सिद्धि के लिए कितनी उत्कटता से तरस रहे थे। और जब प्रचारकों में से एक बहुत भावपूर्ण रीति से यह प्रार्थना कर रहा था कि यदि परमेश्वर उनके पिता को अनन्त विश्राम में ले जाने वाला है, तो वह उस शिक्षा और अनुशासन पर, जिसके प्रसार और संसार में स्थापना का साधन उसने अपने सेवक को इतने समय तक बनाया, अपनी आशीष को बनाए रखने और बढ़ाने की कृपा करे, तब उनके ऊँचे स्वर के साथ ऐसी उत्कटता थी
'आमीन' में, जो हर प्रकार से उनके प्राण के याचनाओं के उत्तर में लगे होने की अभिव्यक्ति थी। घुटनों से उठने पर उन्होंने सबके हाथ थाम लिए, और अत्यन्त शान्ति के साथ उनका अभिवादन किया और कहा, 'विदा, विदा।'
"कुछ देर बाद, एक व्यक्ति के भीतर आने पर उन्होंने बोलने का प्रयत्न किया, पर बोल न सके। यह देखकर कि वे उन्हें नहीं समझ पा रहे, वे थोड़ी देर रुके, और फिर अपनी बची हुई सारी शक्ति के साथ पुकार उठे, 'सब से उत्तम यह है कि परमेश्वर हमारे साथ है;' और शीघ्र ही बाद, अपनी मरती भुजा को विजय के चिह्न के रूप में उठाते हुए, और अकथनीय पवित्र विजयोल्लास के साथ अपनी क्षीण वाणी को ऊँचा करते हुए, उन्होंने हृदय को जिलाने वाले उन शब्दों को फिर दोहराया, 'सब से उत्तम यह है कि परमेश्वर हमारे साथ है।' यह बताए जाने पर कि उनके भाई की विधवा आई है, उन्होंने कहा,
'वह अपने सेवकों को विश्राम देता है।' उसने उसे धन्यवाद दिया, जब उसने उसका हाथ दबाया, और स्नेहपूर्वक उसे चूमने का प्रयास किया। उसकी मृत्यु 245 जब उसके होंठ भिगोए गए, तो उसने कहा, 'हम तेरा धन्यवाद करते हैं,
हे प्रभु, इन सब और तेरी सब दयाओं के लिए: कलीसिया और राजा को आशीष दे, और यीशु मसीह हमारे प्रभु के द्वारा हमें सत्य और शान्ति दे, सदा सर्वदा!' एक और समय उसने कहा, 'वह अपने सेवकों को शान्ति से लेटाता है।'
फिर, कुछ क्षण रुककर, वह पुकार उठा, 'बादल चिकनाई बरसाते हैं!' और शीघ्र ही उसके बाद, 'प्रभु हमारे साथ है; याकूब का परमेश्वर हमारा शरण है।' तब उसने उपस्थित लोगों को प्रार्थना के लिए बुलाया, और यद्यपि वह अत्यन्त थका हुआ था, फिर भी आत्मा में और अधिक उत्साही दिखाई दिया। परन्तु ये प्रयास उसकी दुर्बल देह के लिए बहुत अधिक थे; और अगली रात का अधिकांश भाग, यद्यपि उसने पूर्वोक्त भजन को दोहराने का बार-बार प्रयत्न किया, वह केवल इतना ही कह सका, 'मैं स्तुति करूँगा—मैं स्तुति करूँगा!
"बुधवार की सुबह अन्तिम दृश्य निकट आ गया।
श्री ब्रैडफ़ोर्ड, उसके विश्वासयोग्य मित्र, ने उसके साथ प्रार्थना की, और अन्तिम शब्द जो उसके मुख से सुना गया वह था, 'विदा।'
दस बजने से कुछ मिनट पहले, जब उसके अनेक मित्र उसके बिछौने के चारों ओर घुटने टेके हुए थे, बिना किसी लम्बी कराह के, परमेश्वर के इस जन, हज़ारों के इस प्रिय पास्टर ने अपने प्रभु के आनन्द में प्रवेश किया।"
उसकी मृत्यु 2 मार्च, 1791 को, प्रातः दस बजने से कुछ ही पहले हुई।
श्रीमती हेस्टर ऐन रॉजर्स, जो अन्तिम दृश्य के समय आदि से अन्त तक उपस्थित थीं, लिखती हैं, "उस महान और भले मनुष्य की मृत्यु-घड़ी की गम्भीरता, मेरा विश्वास है, सदा मेरे हृदय पर लिखी रहेगी। ईश्वरीय उपस्थिति का एक बादल सब पर छाया हुआ था; और यद्यपि अब उसे पृथ्वी का निवासी मुश्किल से ही कहा जा सकता था, क्योंकि वह अब मौन था और उसकी आँखें स्थिर थीं, फिर भी विजय और महिमा उसके मुखमण्डल पर लिखी थी, और मानो उसके मरणासन्न होंठों पर काँप रही थी। कोई भाषा उस मुख पर जो दिखाई दे रहा था उसका चित्रण नहीं कर सकती! जितना अधिक हम उसे निहारते थे, उतना ही अधिक हम अवर्णनीय स्वर्ग को देखते थे।"
उसने अपनी वसीयत में निवेदन किया था कि उसका अन्तिम संस्कार बिना किसी समारोह के किया जाए; न शव-वाहन, न बग्घी, न
246 वेस्ली का चरित्र। कुलचिह्न; कोई आडम्बर नहीं, सिवाय उन लोगों के आँसुओं के जो उससे प्रेम करते थे और स्वर्ग तक उसके पीछे चल रहे थे। ये निवेदन उसके निष्पादकों द्वारा कठोरता से माने गए।
उसके दफ़न से एक दिन पहले उसका शव सिटी-रोड के चैपल में रखा गया, जिसे उसके गाउन, चोग़े और बैण्ड पहनाए गए थे।
उसके मुखमण्डल का वर्णन अत्यन्त शान्त बताया गया है, जिस पर "स्वर्गीय मुस्कान थी, एक ऐसी सुन्दरता जिसकी सराहना सबने की जिन्होंने उसे देखा।" असंख्य लोग अन्तिम बार उसके आदरणीय मुख को देखने उमड़ पड़े, और भीड़ से दुर्घटनाओं को रोकने के लिए उसे प्रातः छह बजे से पहले दफ़नाना आवश्यक समझा गया। फिर भी अनेक दर्शक उपस्थित थे; और जब दफ़न-विधि पढ़नेवाला प्रचारक इस अंश पर पहुँचा, "क्योंकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर को यह भला लगा है कि
हमारे भाई की आत्मा को अपने पास ले ले," और उसने "भाई" के स्थान पर "पिता" शब्द रख दिया, तो लोग इतने गहरे प्रभावित हुए कि मौन आँसुओं से वे ऊँचे स्वर में विलाप करने लगे।
वेस्ली के अवशेष एक तहख़ाने में रखे गए, जिसे उसने सिटी-रोड चैपल से सटे क़ब्रिस्तान में तैयार करवाया था।
वहाँ वे धर्मियों के पुनरुत्थान की प्रतीक्षा में विश्राम कर रहे हैं।
वेस्ली का चरित्र एक ऐसी गहन और विस्तृत परीक्षा का अधिकारी है जो हम यहाँ नहीं कर सकते। हमें उसके प्रमुख लक्षणों की संक्षिप्त रूपरेखा से ही सन्तोष करना होगा, उसे एक मनुष्य, एक प्रचारक, एक लेखक और एक प्रशासक के रूप में देखते हुए।
वेस्ली में मनुष्य मसीही से अलग नहीं किया जा सकता।
उसका सारा जीवन केवल उसके विश्वास की दृश्य अभिव्यक्ति है ऊर्जा और निष्कपटता। 247 और उसके मसीही अनुभव की, और बाह्य जीवन आन्तरिक जीवन के पूर्ण सामंजस्य में था। यह तैयारी का वही लम्बा और कष्टदायक मार्ग था जिससे गुज़रने के लिए वह बुलाया गया, और जो समस्त युवावस्था में खिंचता रहा, जिसने उसे वह बनाया जो वह था। ऐसे संघर्षों के बीच जन्मा मसीही जीवन गहन हुए बिना नहीं रह सकता था; ऐसी पाठशाला में गढ़ा गया चरित्र सर्वोच्च कोटि का ऊर्जावान हुए बिना नहीं रह सकता था। वेस्ली वास्तव में एक मसीही के रूप में जितना, एक मनुष्य के रूप में भी उतना ही उत्कृष्ट था। इसका विश्वास करने के लिए बस उसके जीवन के स्रोतों का अध्ययन करना ही पर्याप्त है। बहुत कम लोग इतना सार्वजनिक जीवन जिए हैं।
उसकी पत्रिकाएँ (जर्नल) और उसका पत्राचार उसकी जीवन-शैली के प्रचुर प्रमाण देते हैं, और हमें दिन-प्रतिदिन उसके मार्ग का अनुसरण करने योग्य बनाते हैं। हम उसे अपने प्रति भी और दूसरों के प्रति भी अपने व्यवहार में पूर्णतः स्पष्टवादी पाते हैं। ऐसा कुछ नहीं जो उस दिखावटी मुद्रा-प्रदर्शक की ओर संकेत करे जो जनता के सामने भंगिमाएँ बनाता है। उसकी पारदर्शी निष्कपटता कभी-कभी सरलता तक पहुँच जाती है। वह जनता को अपने विश्वास में लेता है, और ऐसी घटनाएँ बताता है जिन्हें कोई शत्रु उसी के विरुद्ध हथियार बना सकता था। उसमें उस चतुराई का पूर्ण अभाव है जिसके द्वारा कुछ लोग अपने अच्छे गुणों को सर्वोत्तम रूप में प्रदर्शित करना जानते हैं।
यह पूर्ण निष्कपटता सत्य की खोज में उसके उत्साह और निःस्वार्थता में प्रकट हुई। किसी पाठशाला या दल के प्रभाव से बिना झुके, वह तथ्यों से केवल इसलिए प्रश्न करता है कि उनके आधार पर अपना निर्णय बना सके। यदि वह कभी-कभी उन तथ्यों के चयन में, जिनसे वह निर्णय करता है, अत्यधिक अनालोचनात्मक लगता है, यदि वह अद्भुत कथाओं के प्रमाण को बहुत शीघ्र स्वीकार कर लेता है, तो आइए स्मरण करें कि वह ऐसे युग में जिया जब डॉ. जॉनसन जैसा व्यक्ति भूतों में विश्वास करता था, और स्कॉटलैंड जैसा देश डायनों को जलाता था। इसके अतिरिक्त, हम यह न भूलें कि अठारहवीं शताब्दी का महान आन्दोलन असाधारण परिस्थितियों को जन्म दिए बिना नहीं रह सकता था, ऐसी परिस्थितियाँ जिनका तब शान्ति से निर्णय नहीं किया जा सकता था, और जिन्हें अब आसानी से झुठलाया नहीं जा सकता।
248 वेस्ली का चरित्र।
वह ऐसे तथ्यों को अपनी पत्रिकाओं में प्रायः बिना किसी टिप्पणी के दर्ज करता है: और इसमें वह उस भोलेपन का कोई प्रमाण नहीं देता जिसका उस पर आरोप लगाया गया है, बल्कि केवल तथ्यों के प्रति अपना सम्मान दिखाता है, और मानता है कि उसने अभी अदृश्य जगत के सब रहस्य नहीं निकाल लिए हैं। और आगे, वेस्ली को अपने धार्मिक जीवन के आरम्भिक काल में पाई जानेवाली किसी भी त्रुटि के लिए उत्तरदायी ठहराना अन्याय होगा, जब वह रहस्यवादियों के प्रभाव से अभी मुक्त नहीं हुआ था।
यह अन्याय श्री तेन (M. Taine) और श्री दे विट (M. De Witt) ने किया है: वे उसे दो बहुत भिन्न दृष्टिकोणों से देखते हैं, परन्तु इस दोष-आरोपण में एकमत हैं कि उसने कभी-कभी चिट्ठी डालकर परामर्श लिया। परन्तु इसके अतिरिक्त कि प्रेरितों का उदाहरण कुछ असाधारण अवसरों में चिट्ठी के प्रयोग को अधिकृत करता है, मुझे ज्ञात नहीं कि वेस्ली ने अपने धार्मिक जीवन की परिपक्वता तक पहुँचने के बाद एक बार भी इसका सहारा लिया हो। और यही बात तथाकथित धर्मोन्माद के अधिकांश उदाहरणों पर लागू होती है जिनका उस पर आरोप लगाया गया है। उनकी तिथि ही पर्याप्त व्याख्या है।
उस पर एक और आरोप लगाया गया है, जो यदि सिद्ध हो जाए, तो कहीं अधिक गम्भीर बात होगी। साउदी के अनुसार, वेस्ली के प्रमुख उद्देश्यों में से एक महत्वाकांक्षा थी।*
हमें उसका सारा अस्तित्व इस कथन का पूर्ण खण्डन प्रतीत होता है। वह सचमुच एक विरल और विचित्र महत्वाकांक्षा होगी जो किसी मनुष्य को अपनी सबसे प्रिय रुचियों और कामों का त्याग करने, और संसार द्वारा देखी गई सबसे असभ्य और अनियन्त्रणीय भीड़ के लिए खुले में प्रचारक बन जाने को प्रेरित करे!
ऐसी चंचल-चित्त भीड़ से प्रसिद्धि की आशा करना उतना ही निरा पागलपन होता जितना अपना नाम लिखना * साउदी के विचार इस विषय में उसके अन्तिम दिनों में बहुत हद तक बदल गए थे। अपने प्रकाशक को 17 अगस्त, 1835 की तिथि के एक पत्र में वह कहता है: "श्री अलेक्ज़ेण्डर नॉक्स ने मुझे विश्वास दिला दिया है कि मैं यह मानने में भूल पर था कि श्री वेस्ली के प्रेरक आवेगों में महत्वाकांक्षा का बड़ा स्थान था।" साउदी अपनी पुस्तक में इस कथन से अपेक्षित ऐसे परिवर्तन करना चाहता था। दुर्भाग्य से, उसकी मृत्यु ने इस इरादे को पूरा नहीं होने दिया।
उसके उद्देश्यों की पवित्रता। 249 बवण्डर से बहाई गई रेत पर, ताकि उसे भावी पीढ़ी तक पहुँचाया जा सके। यह सच है कि वेस्ली का अपनी सोसाइटियों और उनके प्रचारकों पर विशाल प्रभाव था;
सोसाइटियों और उनके प्रचारकों पर; परन्तु एक ओर, ऐसा अधीक्षण नितान्त आवश्यक था, यदि उसके द्वारा एकत्र किए गए विषम तत्वों को पूरी तरह बिखरने से बचाना था; और दूसरी ओर, यह स्मरण रखना चाहिए कि यद्यपि उसने अपने कार्य का सर्वोच्च नियन्त्रण अपने पास रखा, उसने बहुत शीघ्र उत्तरदायित्व को कॉन्फ़्रेंस के साथ बाँट लिया, और एक से अधिक बार उसने उस बोझ को, जो उसे इतना भारी लगता था, दूसरों पर डालने का प्रयत्न किया।
यह हमें इस अवलोकन की ओर ले जाता है कि वेस्ली की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक प्रभु की व्यवस्था के निर्देशों में वह पूर्ण विश्वास था जो हमें उसके जीवन के क्रम में बार-बार मिला है, और जो महत्वाकांक्षी योजनाओं के सिद्धान्त से मेल नहीं खाता।
इसके अतिरिक्त, किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसने उसकी गहरी भक्ति का निकटता से अध्ययन किया है, वेस्ली पर महत्वाकांक्षी और स्वार्थी लक्ष्यों का आरोप लगाना नैतिक रूप से असम्भव है। यदि उसका सारा बाह्य जीवन ऐसे आरोप के विरुद्ध एक विरोध है, तो उसकी आन्तरिक भक्ति और भी सशक्त साक्षी देती है। वह ईश्वरीय अनुग्रह की सामर्थ में नम्र और फिर भी दृढ़ भरोसा रखता था, और अपनी सफलता की आशाओं को केवल उसी पर आधारित करता था। उसके कार्य और लेख जीवित भक्ति की सुगन्धित महक बिखेरते हैं: यह स्पष्ट है कि उसने उस रहस्यवाद की बेड़ियाँ पूरी तरह उतार फेंकी थीं जो उसने ऑक्सफ़ोर्ड में सीखा था, और जिसमें लिप्त रहना उसके विनाश का कारण बनता। वेस्ली मोरावियनों का गहरा ऋणी था: उनके प्रभाव ने न केवल उसके आत्मिक इतिहास के निर्णायक संकट को उत्पन्न किया, बल्कि उसे परमेश्वर के आत्मा के आन्तरिक कार्यों की वास्तविकता को दृढ़ता से स्थापित करने की ओर भी प्रेरित किया।
इस पुस्तक में वर्णित अनेक तथ्य दिखाते हैं कि वेस्ली प्रार्थना का मनुष्य रहा। इस अभ्यास में वह साहस की सीमा तक सामर्थी था: वह निरन्तर इसका सहारा लेता था, और ऐसी परिस्थितियों में भी, जिनमें दूसरे शायद ही ऐसा करने का साहस करते
250 वेस्ली का चरित्र। वेस्ली अपनी पत्रिकाओं में प्रार्थना के परिणामस्वरूप मिले जिन सांसारिक और आत्मिक छुटकारों को दर्ज करता है, उनका वृत्तान्त एक अत्यन्त रोचक अभिलेख होगा। पापी प्रायः उसके उपदेशों से भी अधिक उसकी प्रार्थनाओं के अधीन पाप के कायल हुए और शान्ति पाई।
वेस्ली की भक्ति न संकीर्ण थी, न असहिष्णु। यदि वाद-विवाद के दौरान कभी-कभी वह संघर्ष के आवेश में बह जाता है, तो वह अपने विचारों की विशालता और अपने सारे जीवन की सार्वभौमिक भावनाओं से ऐसी क्षणिक कमियों की पूरी भरपाई कर देता है।
व्हाइटफ़ील्ड के साथ उसकी मित्रता, जैसा हम देख चुके हैं, उनके बीच उठे सैद्धान्तिक विवादों से अटूट बनी रही। उसका उपदेश, "सार्वभौमिक आत्मा पर" (On a Catholic Spirit), दिखाता है कि वह इवैंजेलिकल अलायंस के अग्रदूतों में गिने जाने योग्य था। उसका हृदय इतना विशाल था कि वह अपनी सहानुभूति को किसी पन्थ या दल की सीमाओं में बाँध नहीं सकता था। जहाँ कहीं उसने मसीही धर्म की सच्ची आत्मा को पहचाना, वहाँ उसने उसका सम्मान किया, चाहे वह त्रुटि और दुर्बलता के मिश्रण से कितनी भी खोटी हो गई हो। उसकी उदारता इतनी महान थी कि उसने अपनी
सोसाइटियों के उपयोग के लिए अनेक ऐसी पुस्तकें सम्पादित कीं जिनके लेखक रोमी सम्प्रदाय के थे। उसने पत्रिका (मैगज़ीन) के पन्नों में और अन्यत्र भी प्रतिष्ठित
कैथोलिक सन्तों के जीवन-वृत्त प्रकाशित किए, जैसे मादाम गयों, मार्क्विस द रेंती, ग्रेगरी लोपेज़ और अन्य। आत्मा की इस सार्वभौमिकता को अनेक सच्चे मसीहियों ने प्रायः ग़लत समझा, परन्तु यह उन बिन्दुओं में से एक थी जिन पर उसने सबसे अधिक बल दिया। अपनी सोसाइटियों में विचार की स्वतन्त्रता पर उसने केवल यही सीमा रखी: दूसरों के मतों के प्रति उचित आदर। इस विषय पर अपने विचार वह इस प्रकार समझाता है: "मुझे किसी मनुष्य पर आपत्ति करने का उतना ही अधिकार नहीं है कि वह मुझसे भिन्न मत रखता है, जितना
मुझे किसी मनुष्य से अलग होने का अधिकार है क्योंकि वह विग पहनता है और मैं नहीं पहनता। परन्तु यदि वह संयोग से अपनी सार्वभौमिक आत्मा। 952 विग उतार दे, और पाउडर मेरी आँखों में झाड़ दे, तो मैं यह अपना कर्तव्य समझूँगा कि जितनी शीघ्र हो सके उससे दूर भाग जाऊँ।"
जहाँ वेस्ली का धार्मिक चरित्र ऐसा था कि सबका सम्मान प्राप्त करे, वहाँ यह भी जोड़ा जा सकता है कि उसकी स्वाभाविक और अर्जित योग्यताओं ने उसे एक अनिर्वचनीय आकर्षण से विभूषित कर दिया था।
जो आन्तरिक शान्ति उसे प्राप्त थी, वह मानो एक ऐसी मिलनसारिता और स्वभाव की शान्ति में चमकती थी जो सब हृदयों को जीत लेती थी।
अपने सब सामाजिक सम्बन्धों में वह इतनी सहजता और शालीनता लेकर आता था, वह स्नेह और आत्मीयता से इतना भरा हुआ था, कि उसकी बातचीत का आकर्षण अप्रतिरोध्य था, और एक संक्षिप्त भेंट ही प्रायः उसके कटु से कटु विरोधियों को मित्र बना देने के लिए पर्याप्त होती थी। अपनी विशाल बौद्धिक संस्कृति, अपनी विरल बुद्धि और अभिव्यक्ति की अतुलनीय प्रवाहशीलता के कारण, धनी और प्रतिभाशाली लोग उसकी संगति चाहते थे, और उसे अपनी मेज़ पर आमन्त्रित करना सम्मान समझते थे: परन्तु वह उन ग़रीब देहातियों के बीच भी उतना ही सहज था जिनके बीच वह बार-बार अतिथि होता था, अपने आप को भूलकर, और उन्हें भी शिक्षा के भेद को भूलने योग्य बनाकर। उसका पत्राचार, जिससे हम केवल संक्षिप्त उद्धरण ही ले पाए हैं, उसे एक सौम्य और मैत्रीपूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है, जो उत्कृष्ट और सहानुभूतिपूर्ण संवेदनशीलता से सम्पन्न था।
फिर भी, वेस्ली का चरित्र, जो निजी जीवन में इतना रोचक है, अपनी सार्वजनिक गतिविधि के विशाल रंगमंच पर ही पूर्णतः प्रकट होता है, जहाँ उसने अपना पूर्ण विकास पाया।
मनुष्य का अध्ययन कर लेने के बाद, अब हमें लोकप्रिय प्रचारक पर विचार करना होगा। सच कहें तो उसकी सामर्थ मुख्यतः उसके प्रचार में निहित थी: इसी के द्वारा उसने जन-समूहों पर प्रभाव डाला, और इसी के द्वारा उसने पृथ्वी की सतह पर वे अविनाशी बीज बिखेरे जिनमें ऐसे भविष्य के अंकुर थे। उसके परिश्रम को मुकुटित करनेवाली लगभग अद्भुत सफलता के सामने एक प्रश्न उठता है जो पहली दृष्टि में अनसुलझी पहेली प्रतीत होता है। वह, ऑक्सफ़ोर्ड का स्नातक, जो जीवन भर प्राचीन लेखकों का समर्पित विद्यार्थी रहा, और जो घोड़े की पीठ पर 252 वेस्ली का चरित्र। होमर और वर्जिल को मूल भाषा में पढ़ता था, वह सड़क का प्रचारक, जन-समूहों का लोकप्रिय वक्ता कैसे बन गया? प्रसिद्धि की प्यास कोई व्याख्या नहीं है, जैसा हम पहले ही देख चुके हैं।
प्राणों के प्रति प्रेम, वह शुद्ध और उदात्त उत्कण्ठा जो परमेश्वर के प्रेम से हृदय में जलाई जाती है, अकेला ही इस अन्यथा अबोधगम्य घटना की व्याख्या करता है। यही अकेला उस अथक धैर्य की भी व्याख्या कर सकता है जिसने ऐसे प्रेरिताई को आधी शताब्दी की सीमाओं से भी आगे बढ़ाया।
पचास वर्षों के संघर्ष वेस्ली में ऐसे महान गुण प्रकट करते हैं जिन पर एक सैन्य सेनापति भी गर्व कर सकता था। सच कहें तो एंग्लो-सैक्सन जाति को, अपने उन व्यावहारिक गुणों के साथ जो उसकी विशिष्ट पहचान हैं, उससे उत्तम प्रतिनिधि कभी नहीं मिला। वह जानता था कि दृढ़ संकल्प और अजेय हठीलेपन को, जिन्होंने अंग्रेज़ी उपनिवेशों को इतनी सफलता दिलाई, अपने धार्मिक सिद्धान्तों की सेवा में कैसे जोतना है। उसने लोगों की दुर्भावना को ऐसी दृढ़ता से जीत लिया जो हर प्रकार के विरोध की परीक्षा में खरी उतरी।
उसके प्रचार को इतनी मौलिकता जिस बात ने दी वह उसकी पूर्ण स्पष्टवादिता थी: वेस्ली के विषय में सच ही कहा जा सकता है कि वह "अधिकारी की नाईं बोलता था।" वह कभी अपने श्रोताओं की चापलूसी नहीं करता; वरन् कभी-कभी, जैसा वह स्वयं हमें बताता है, वह
"कठोर, खुरदरे शब्द बोलता था": वह अपने विचारों को छिपाने की कला नहीं जानता, ताकि उन्हें अधिक स्वीकार्य बना सके। उसकी संक्षिप्त और अर्थपूर्ण भाषा सीधे अपने लक्ष्य पर वार करती है, और ठीक वही कहती है जो उसका अभिप्राय है। उसकी तीक्ष्ण वाणी द्वारा लोगों के मन पर पड़े लगभग जादुई प्रभाव के अनेक उदाहरण दिए गए हैं। सम्भवतः इससे भी अधिक प्रभावशाली रूप से वह यह सामर्थ व्यक्तियों पर चलाता था। जब वह अपने श्रोताओं में से किसी पर दृष्टि जमाता, तो यह बहुत ही कम होता था कि हृदय उसकी दृष्टि के नीचे काँप न उठे। कभी-कभी कोई मनुष्य सिर पर टोपी पहने उसकी सभा में आता, उसे चुप कराने के लिए पूर्णतः दृढ़संकल्प, परन्तु उसका मुख बदल जाता और गाल पीले पड़ जाते जब उसका सामना उस उसके प्रचार की सामर्थ। 253 तीक्ष्ण नेत्र से होता जो मानो उसके अस्तित्व की गहराइयों को बेध देता था।
परन्तु हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि जन-समूहों पर वेस्ली का यह प्रभाव किसी भी अंश में धृष्टता या अहंकार जैसा था। उसका अधिकार विशुद्ध नैतिक प्रकार का था, और मसीही विश्वास तथा उत्साह की धीमी परन्तु अचूक क्रिया से प्राप्त हुआ था।
यह भी जोड़ना चाहिए कि अनेक बातों में वेस्ली एक लोकप्रिय प्रचारक के रूप में अपनी सेवकाई के लिए प्रशंसनीय रूप से योग्य था।
उस उक़ाबी दृष्टि और उस प्रवाहमय तथा लचीली वाणी के अतिरिक्त, उसमें मन के वे गुण थे जिनका लोग सबसे अधिक मूल्य करते हैं, अर्थात् स्पष्टता और सटीकता। उससे बेहतर कोई नहीं जानता था कि उच्चतम सत्यों को निम्नतम मनों के लिए परिचित कैसे बनाया जाए। उससे बेहतर कोई नहीं जानता था कि फुर्तीले उत्तर या सुखद अभिव्यक्ति का उपयोग कैसे किया जाए, ताकि जब एक लम्बा भाषण अपने उद्देश्य में असफल रहता, तब "चतुर कहावत" तलवार की नोक की तरह भीतर उतर जाती थी,
परन्तु आइए हम वेस्ली की वक्तृत्व-क्षमता का एक उचित विचार बनाने का प्रयत्न करें। खुली सड़क में भी और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के पुलपिट में भी, इस महान प्रचारक की शैली सरल है और हर व्यक्ति की समझ के स्तर की है: उसका तर्क तर्कसंगत और सशक्त है; और एक बार उसकी पूर्वधारणाओं को मान लेने पर, आप अपनी इच्छा के विरुद्ध भी बहा लिए जाते हैं और उनसे निकाले गए निष्कर्षों को स्वीकार करने को विवश हो जाते हैं। उसका तर्क पूर्ण धारा में बहता है, परन्तु घुमावदार नहीं है, और अपने उचित तटों को नहीं लाँघता। वह उन व्यर्थ और छिछले अलंकारों से लदा नहीं है जिनके प्रयोग से कुछ लोग अपने विचारों की दरिद्रता को ढँकना चाहते हैं, न ही उन उलझी भटकनों से, जो श्रोता से प्रवचन के मुख्य उद्देश्य को छिपा देती हैं। उसका एकमात्र काम कायल करना है: इसीलिए वह अपने विरोधी के आमने-सामने खड़ा होता है, और उसकी आपत्तियों का उत्तर देने में कभी चूकता नहीं, प्रायः यह दिखाते हुए कि वे सामान्य बुद्धि के कितने विपरीत हैं। उसका लक्ष्य सीधा है: वह घुमावदार बातों से घृणा करता है, और वक्तृत्व-कौशल को कभी तर्क नहीं समझ बैठता।
254 वेस्ली का चरित्र।
यद्यपि वह गहरा तर्कशास्त्री है, वेस्ली थका देनेवाला हठधर्मी होने से कोसों दूर है। जो कोई उसकी तुलना टिलॉट्सन या बैरो से करने का कष्ट उठाए, वह उस विशाल उन्नति को समझ जाएगा जो प्रचार ने उसके प्रभाव से की, और उस महान क्रान्ति को भी जो उसने ऐसे क्षेत्र में की जो सोलहवीं शताब्दी से स्थिर पड़ा था। वह उनकी तरह तर्क के लिए तर्क नहीं करता, और न ही सिलॉजिज़्मों की भव्य पंक्ति से सिद्धान्त या नैतिकता की ऐसी किसी साधारण बात को सिद्ध करने में अपने को खींचता है जिसका विवाद करने का कोई स्वप्न भी नहीं देखता। वह साहसपूर्वक उन विषयों का सामना करता है जिन पर सबसे अधिक विवाद है, और साथ ही, उसकी दृष्टि में, जो मसीही धर्म के लिए सबसे मूलभूत हैं। जिन विषयों का वह वर्णन करता है, वे मसीही पुलपिट में लाए जा सकनेवाले सबसे उच्च और गम्भीर विषयों में से हैं; फिर भी वे इतनी स्पष्टता से कहे जाते हैं, इतनी प्रशंसनीय सहजता से उनके सरलतम रूपों में सुलझाए जाते हैं, इतनी अद्भुत सुबोधता से समझाए और विवेचित किए जाते हैं, कि श्रोता, चाहे कितना ही अशिक्षित हो, मोहित और वशीभूत हो जाता है, और ऐसी सशक्त और जलती हुई वाक्पटुता की सतत गोलाबारी का कठिनाई से सामना कर पाता है। टिलॉट्सन और उसके अनुकरणकर्ताओं की वक्तृत्व-शैली उन भारी तोपों जैसी है, जो किसी ऊँचे दुर्ग की चोटियों पर लगी हुई, शत्रु के निकट आने की प्रतीक्षा करती हैं, और अपनी प्रभावशीलता तभी सिद्ध करती हैं जब वह सन्तुष्ट भाव से उनकी मार की सीमा के भीतर आगे बढ़ता है। इसके विपरीत, वेस्ली उस हल्की तोपख़ाने जैसा है जो मैदानी तोपों से बना है, और शत्रु का उसकी दूरतम मोर्चाबन्दियों तक पीछा करता है। उसके उपदेश प्रायः छोटे होते हैं: उसकी फुर्तीली और सुगठित भाषा सदा सीधी आगे बढ़ती है: उसके जीवन्त विचार मन की आँख के सामने स्पष्ट आते हैं, और प्रायः एक सूक्ति का रूप लेते हैं जो श्रोता की स्मृति पर अंकित हो जाती है।
वेस्ली को यह महान श्रेय प्राप्त है कि उसने उस कठोर धर्मविज्ञान को, जो पहले केवल दीक्षितों को ज्ञात था और जिसे नाम दिया गया था
उसके उपदेशों की शैली। 255 तर्कशास्त्र, लोकप्रिय बनाया, और यदि मैं ऐसा कहने का साहस करूँ तो मानवीय बनाया। उसके मन में लोगों के लिए सच्चा आदर था, जो उन प्रचारकों में सर्वथा नहीं होता जो उनसे ऐसे बात करते हैं मानो वे बच्चे हों, उन्हें ऐसे कारण देते हुए जिनकी उन्हें आवश्यकता नहीं, या केवल एक रुग्ण संवेदनशीलता उत्पन्न करना चाहते हैं जिस पर कोई टिकाऊ भवन खड़ा नहीं किया जा सकता। लोग अनजाने ही वेस्ली के स्तर तक उठ गए, क्योंकि वह जानता था कि उनके स्तर तक कैसे उतरना है।
एक वक्ता के रूप में वेस्ली निश्चय ही व्हाइटफ़ील्ड से कम था।
परन्तु इस तार्किक क्षमता के अतिरिक्त, जिसकी हमने अभी चर्चा की, उसके पास वाणी की वह तीक्ष्णता थी जो उसके मित्र में नहीं थी, इसलिए वह कभी-कभी उन हृदयों तक कायल करने की शक्ति पहुँचाता था जो उसके वाक्पटु मित्र की अपीलों से अछूते रहे थे। जॉन नेल्सन हमें बताता है कि उसने व्हाइटफ़ील्ड के उपदेश अनेक बार सुने थे, और अतुलनीय संगीत की धुनों की तरह उनसे मुग्ध हुआ था: उसने प्रचार की प्रशंसा की और प्रचारक से प्रेम किया, परन्तु इससे अधिक नहीं।
वेस्ली के प्रचार ने बिलकुल भिन्न प्रभाव उत्पन्न किया। आइए हम इस प्रत्यक्षदर्शी की गवाही सुनें। वह कहता है, "जैसे ही वह मंच पर चढ़ा, उसने अपने लम्बे बालों को पीछे सहलाया, और उस स्थान की ओर मुड़ा जहाँ मैं खड़ा था: मुझे लगा कि उसने अपनी आँखें मुझ पर टिका दीं। इस एक दृष्टि ने मुझे अवर्णनीय पीड़ा से भर दिया: उसके मुँह खोलने से पहले ही मेरा हृदय घड़ी के लोलक की तरह धड़कने लगा, और जब वह बोला, तो मुझे लगा कि उसका सारा प्रवचन मुझ पर ही लक्षित है।"
वास्तव में वेस्ली के प्रचार की एक उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि उसके तर्क विवेक और हृदय से की गई अपीलों द्वारा निरन्तर बीच में रोके जाते थे। वह पूरी चर्चा से सत्य की खदान से एक पत्थर को खोज कर निकाल ही पाता कि एक बुद्धिमान मिस्त्री की तरह वह उसे पहले ही आत्मिक भवन में उसकी जगह लगाने लगता है।
जहाँ उसके समकालीन प्राचीन वस्तुओं के संग्रहकर्ताओं के समूह जैसे हैं, जो संग्रहालय बनाने के लिए ज़ंग खाए कवचों का भण्डार जुटाने में कठिन परिश्रम में लगे हैं, वहाँ वेस्ली इन अप्रयुक्त हथियारों पर पहुँचते ही उन्हें
256 वेस्ली का चरित्र। वर्तमान उपयोग के लिए नया रूप दे देता है और शत्रु के विरुद्ध मोड़ देता है। वह कभी नहीं भूलता कि उसका काम उन प्राणों से है जिन्हें उसे आनेवाले प्रकोप से बचाना है। जब वह तर्क करता है, तो किसी चमकदार धर्मवैज्ञानिक या दार्शनिक द्वन्द्व का छिछला तमाशा दिखाने के लिए नहीं: वह उस भवन को, जिसे वह बनाना चाहता है, अटल नींवों पर स्थापित करने के लिए करता है। उसके प्रमाण अधिकतर दार्शनिक से अधिक बाइबल पर आधारित होते हैं, और केवल बुद्धि को नहीं, बल्कि विवेक को सम्बोधित होते हैं।
वेस्ली के उपदेशों के अनुप्रयोग कभी घुमावदार नहीं होते, सदा सीधे और आक्रामक होते हैं। मध्यम पुरुष एकवचन ("तू") के बार-बार और सुखद प्रयोग से, जो, जैसा सर्वविदित है, अंग्रेज़ी में बाइबल और काव्य की भाषा के लिए आरक्षित है, और तब सदा उत्कृष्ट प्रभाव के साथ प्रयुक्त होता है, वह अपनी अपीलों में एक ऐसा ज़ोर डालता है जिसे कोई अनुवाद पुनः प्रस्तुत नहीं कर सकता। यह आदत, बहुत-से बाइबल के वाक्यांशों के प्रयोग की आदत के साथ, जो औपचारिक रूप से उद्धृत नहीं किए जाते परन्तु उसके वाक्यों के ताने-बाने में बुने जाते हैं, उसके उपदेशों को एक पुरातन रंग के साथ-साथ एक प्रमुख ऊर्जा भी देती है, जो प्रायः भविष्यद्वक्ताओं के प्रचार का स्मरण कराती है।
वेस्ली के प्रचार की सफलता हमें उस एंग्लो-सैक्सन जाति के चरित्र का उच्च विचार देती है, जिसके नैतिक नवीकरण के लिए उसने अपना जीवन समर्पित किया। उस राष्ट्र ने अपने नैतिक अस्तित्व की गहराइयों में महान और उदात्त सहज वृत्तियाँ बनाए रखी होंगी, अन्यथा ऐसा ठोस आहार उसे कभी रास न आता, और ऐसे प्रचार की सफलता क्षणिक उत्साह से अधिक कुछ न होती। जो लोग ऐसे उपदेशों की, और वह भी अपने आत्मिक जागरण के ठीक क्षण में, सराहना करने में समर्थ थे, वे अवश्य एक महान जाति रहे होंगे, जिसका भविष्य उनके अपने हाथों में था।
उनकी तुलना उसी युग के किसी दूसरे लोगों से कीजिए, जो वर्साय में चहेते उन सांसारिक मठाधीशों के चारों ओर भीड़ लगाए हैं, और कोई पूछ सकता है कि वेस्ली एक लेखक के रूप में। 257 ऐसे लोगों का जीवन, बल और भविष्य, एक शब्द में, कहाँ है? एक राष्ट्र, शिष्ट और मिलनसार, सेवॉय के विकार (Vicar of Savoy) के सुसमाचार को छोड़ किसी सुसमाचार को नहीं सुनेगा, और बिना जाने एक रक्तरंजित क्रान्ति के कगार पर है: दूसरा, रूखा और अशिष्ट, वेस्ली और उसके सहकर्मियों की शिक्षाओं को ग्रहण करता है, और धीरे-धीरे अस्तित्व की सीढ़ी पर तब तक ऊपर उठता है जब तक वह वास्तविक महानता प्राप्त नहीं कर लेता, और उस कार्य के लिए तैयार है जिसके लिए परमेश्वर ने, अपनी व्यवस्था के क्रम में, उसे बुलाया है।
वेस्ली ने जिस युग में वह जिया, उसे केवल अपनी जीभ से ही नहीं, अपनी कलम से भी प्रभावित किया। अपने किसी भी समकालीन से अधिक, वह लोकप्रिय साहित्य के महत्व को समझता था, और वह उन महान संस्थाओं के अग्रदूतों में से एक था जिन्होंने आज के दिन संसार को धार्मिक प्रकाशनों से भर दिया है। अपने निरन्तर मिशनरी परिश्रमों के बावजूद, उसे लगभग दो सौ ग्रन्थ प्रकाशित करने का समय मिला, जिन्हें उसने स्वयं अनूदित या संक्षिप्त किया था, और जो धर्मविज्ञान, जीवनी, इतिहास, दर्शन, कविता, व्याकरण, चिकित्सा आदि पर थे, और सदा लोकप्रिय दृष्टिकोण से लिखे गए थे। बड़े संस्करण अत्यन्त कम मूल्य पर बेचे गए, और उसके प्रचारकों की सहायता से उनका व्यापक वितरण हुआ, जिनके प्रभाव ने उसकी सोसाइटियों में पढ़ने की रुचि के निर्माण में बहुत योगदान दिया।
अपनी मौलिक रचनाओं में, जिनमें प्रमुख हैं उसके "उपदेश," "पत्रिकाएँ (जर्नल)," "नए नियम पर टिप्पणियाँ,"
"तर्क और धर्म के मनुष्यों से अपीलें," और उसका "आदि पाप पर निबन्ध," वेस्ली एक श्रेष्ठ बुद्धि के सब गुण प्रदर्शित करता है: सक्षम निर्णायकों द्वारा उसकी शैली उत्कृष्ट घोषित की गई है, जो परिष्कृत होने के साथ सशक्त भी है।
प्राचीन शास्त्रीय लेखों के अध्ययन में गहरी रुचि रखनेवाला, और साथ ही प्रमुख आधुनिक भाषाओं से परिचित, उसने अपने व्यापक पठन के क्रम में सूचना और विचार की ऐसी सम्पदा अर्जित की जो उसके लेखों को शिक्षितों के लिए रोचक और अशिक्षितों के लिए शिक्षाप्रद बनाती है।
258 वेस्ली का चरित्र।
यद्यपि हम उसकी रचनाओं में सर्वत्र उसके शास्त्रीय ज्ञान के चिह्न और उसके ऑक्सफ़ोर्ड प्रशिक्षण की अनेक स्मृतियाँ पाते हैं, फिर भी संकीर्णता या पाण्डित्य-प्रदर्शन का कोई संकेत नहीं है।
वह लिखने के लिए नहीं लिखता, बल्कि कायल करने के लिए लिखता है: वह सुन्दर रचना की बहुत कम परवाह करता प्रतीत होता है, मानो सबके द्वारा समझे जाने की इच्छा में पूर्णतः लीन हो। वह न तो अलंकारशास्त्री है, न साहित्यिक कलाकार: वह मसीह का सिपाही है, जो अपने झण्डे को कभी आँखों से ओझल नहीं होने देता।
उसकी शैली, उसके विचार की तरह, ऊर्जावान और सुगठित है: एक दूसरे के अनुकूल है जैसे सुडौल वस्त्र, जो हर गति का अनुसरण करता है और आकार के हर परिवर्तन को सावधान निष्ठा से प्रकट करता है।
तर्क-वितर्क में वेस्ली सबसे अधिक सफल होता है। जब हम उसकी छोटी वाद-विवादात्मक रचनाएँ पढ़ते हैं, या उसके अधिक विस्तृत लेख भी, जैसे नॉरविच के डॉ. टेलर का उसका खण्डन, तो हम एक वाद-विवादकर्ता के रूप में उसकी प्रतिभा की विविधता और ओज से प्रभावित होते हैं। दार्शनिक की अपेक्षा तार्किक मनोवृत्ति का होने से, वह कभी अमूर्त तत्त्व-मीमांसा के क्षेत्रों में खो नहीं जाता: वह अधिक सुरक्षित और सुगम भूमि पर टिका रहता है, और अपने प्रतिद्वन्द्वियों पर वह जो प्रहार करता है वे कम ही निशाना चूकते हैं। चाहे वह सामान्य बुद्धि की अपील से अपने विरोधियों के तर्कों को ध्वस्त करे, या उनके विरुद्ध पवित्रशास्त्र के शस्त्रागार से हथियार निकाले, चाहे वह कठोर तर्क की भाषा बोले या विनोदपूर्ण व्यंग्य का सहारा ले, हम अनुभव करते हैं कि वह अपनी शक्ति के प्रति सचेत है, और सम्भवतः पाठक को अपने पक्ष में जीतने में सफल होगा।
हम एक पद्धति के संस्थापक और संगठनकर्ता के रूप में वेस्ली के गुणों पर विस्तार नहीं करेंगे, यद्यपि इस क्षेत्र में भी वह प्रथम श्रेणी की योग्यता के मनुष्य के रूप में प्रकट होता है। उन सब निष्पक्ष लेखकों ने, जिन्होंने उस विशाल कलीसियाई व्यवस्था का निकटता से अध्ययन किया है जो उसकी प्रतिभा की छाप लिए हुए है, उसके सुनियोजित संगठन की सराहना की है। अंग्रेज़ी सभ्यता के इतिहासकार बकल ने वेस्ली को "धर्मवैज्ञानिक राजनीतिज्ञों में प्रथम" एक लेखक के रूप में गुण। 259 कहा है। विख्यात मैकॉले तो इससे भी आगे जाता है: वह कहता है, "वेस्ली ने संसार द्वारा देखी गई सबसे अद्भुत नैतिक क्रान्तियों में से एक का संचालन किया: उसकी वाक्पटुता और उसका बेधक तर्क उसे एक प्रतिष्ठित साहित्यकार बना देते; और शासन के लिए उसकी प्रतिभा रिशेल्यू से कम न थी।"
समग्र रूप से देखने पर, वेस्ली का चरित्र हमें उल्लेखनीय रूप से सम्पूर्ण प्रतीत होता है। वह ऐसे गुणों को एक करता है जो प्रायः एक-दूसरे के विरोधी लगते हैं, परन्तु जो उसमें एक सामंजस्यपूर्ण समग्र में ढल गए हैं। उसका जीवन, उसके मन की तरह, विविध कामों से भरा है: कोई कहेगा कि इस एक व्यक्तित्व और इस एक अस्तित्व की रचना के लिए अनेक भिन्न व्यक्तित्व और अस्तित्व आपस में मिल गए होंगे। उसकी अनेक चिन्ताएँ और परिश्रम उसे दबाते नहीं; वह बोझ को बिना थकावट के, अति वृद्धावस्था तक उठाता है। क्या कार्यकर्ता का कार्य के प्रति यह अद्भुत अनुकूलन एक विशेष व्यवस्था के कारण नहीं है? और क्या यह स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं करता कि
वेस्ली उन मनुष्यों में से एक था जिन्हें परमेश्वर स्वयं खड़ा करता है और असाधारण योग्यताओं से सम्पन्न करता है ताकि वे एक असाधारण मिशन को पूरा कर सकें?
वेस्ली का कार्य और उसके परिणाम।
वेस्ली के कार्य के दो प्रकार के परिणाम हुए: एक प्रत्यक्ष, जिसने एक विशाल कलीसियाई व्यवस्था को जन्म दिया, और दूसरा अधिक व्यापक, जिसने सम्पूर्ण राष्ट्र को अपने भीतर समेट लिया। अब हमें इस दोहरे प्रभाव का संक्षेप में वर्णन करना शेष है।
मेथोडिज़्म वेस्ली के जीवन का विशेष कार्य था: अपने धर्मशास्त्र और अपने संगठन के द्वारा उसने उन आत्मिक आवश्यकताओं को पूरा किया जो इस पुनर्जागरण से उत्पन्न हुई थीं।
इसका धर्मशास्त्र अपने सभी मूल लक्षणों में वही था जो इंग्लैंड के सुधार-आन्दोलन का था, जैसा कि उनतालीस धर्मसूत्रों (थर्टी-नाइन आर्टिकल्स) में संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है। त्रिएकता, पुत्र और आत्मा की ईश्वरीयता, पुत्र के देहधारण और उसके कार्य की मध्यस्थता-सम्बन्धी प्रकृति जैसे मूलभूत सिद्धान्तों में अन्य सभी सुसमाचारीय कलीसियाओं से पूर्ण सामंजस्य रखते हुए, वेस्ली मनुष्य के पतन और आदि पाप के सिद्धान्तों के विषय में भी उतना ही स्पष्ट था, और जो लोग उस पर अर्ध-पेलेजियनवाद का आरोप लगाते हैं, वे उसके साथ अन्याय करते हैं। इस बात का विश्वास करने के लिए केवल इतना पढ़ना आवश्यक है कि उसने नॉरविच के डॉ. टेलर के विचारों का खण्डन कैसे किया।
दूसरी ओर, वेस्ली ने छुटकारे की सीमित व्याप्ति के कैल्विनवादी सिद्धान्त को पूरी तरह अस्वीकार किया। यह मानते हुए कि पवित्रशास्त्र सिखाता है कि मसीह सबके लिए मरा, उसने सदा यही कहा कि "जो कुछ मनुष्य ने पहले आदम के द्वारा खोया, वह सब दूसरे आदम के द्वारा पुनः प्राप्त कर सकता है, और मनुष्य की कोई भी सन्तान अपने ही दोष के बिना नष्ट नहीं होती।" कठोर
कैल्विनवाद, वेस्ली की दृष्टि में, प्रायः व्यवस्थाविरोधवाद (एंटिनोमियनिज़्म) की शोचनीय खाई की ओर ले जाता है, इसलिए वह उससे कोई समझौता नहीं कर सकता था। उसने उत्तरदायित्व को बनाए रखा
उसका धर्मशास्त्र। 261 मनुष्य का, उसके अपने उद्धार के विषय में, अनुग्रह के सिद्धान्तों को किसी भी अंश में निर्बल किए बिना, और इस प्रकार पुनर्जागरण की अत्यधिक सेवा की। हमारे समय का सुसमाचारीय धर्मशास्त्र उसकी शिक्षाओं का बहुत ऋणी है, और वास्तव में वह निरन्तर उन्हीं के निकट पहुँचता जा रहा है।
उद्धार की प्राप्ति से सम्बन्धित सिद्धान्त वेस्ली के धर्मशास्त्र में प्रथम स्थान रखते हैं। वह कहता है, "हमारे प्रमुख सिद्धान्त, जिनमें अन्य सब समाए हुए हैं, ये हैं: पश्चाताप, विश्वास और पवित्रता। इनमें से पहले को हम धर्म का मार्ग मानते हैं, दूसरे को द्वार, और तीसरे को स्वयं धर्म।" मेथोडिस्ट इन जीवनदायी सिद्धान्तों को विशेष महत्त्व देते हैं, जो उनके धर्मशास्त्र की धुरी बन गए हैं। यह सच है कि उन्होंने इन विषयों पर कोई नए विचार प्रस्तुत नहीं किए, परन्तु उन्होंने इन्हें अधिक सटीक और व्यावहारिक रूप में ढाला, और उन्हें छोटी से छोटी समझ के स्तर तक उतारकर मनुष्यों के विवेक तक पहुँचने का मार्ग खोल दिया।
वेस्ली की दृष्टि में पश्चाताप अपना गहरा महत्त्व और उच्च स्वरूप बनाए रखता है। यह कोई व्यर्थ औपचारिकता नहीं, परन्तु परमेश्वर को अप्रसन्न करने का गहरा शोक है, जो केवल आँसुओं में ही नहीं बल्कि "मन फिराव के योग्य फलों" में प्रकट होता है।
वेस्ली की व्यवस्था में, सन्त पौलुस की व्यवस्था के समान, विश्वास ही उद्धार पाने का एकमात्र साधन है। वह कहता है, "यह केवल मसीह के सुसमाचार की पूर्ण स्वीकृति ही नहीं है, यह मसीह के लहू में पूर्ण विश्राम है, उसके जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान की योग्यता पर भरोसा है; और अपने प्रायश्चित्त
बलिदान और अपने जीवन के रूप में उसके पास आना है, जिसने हमारे लिए अपने आप को दे दिया और जो जीवित है Im aseA [अस्पष्ट मूल पाठ]। उद्धार में सब कुछ—धर्मी ठहराया जाना, नया जन्म, पवित्रीकरण—विश्वास से प्राप्त होता है। धर्मी ठहराया जाना केवल हमारे पापों की क्षमा है: यह पापी के परमेश्वर के साथ सम्बन्ध को पूरी तरह बदल देता है। नए जन्म में पवित्र आत्मा उसके स्वभाव को ही नया कर देता है, उसके हृदय को बदल देता है, और उसे
262 वेस्ली का कार्य और उसके परिणाम। "लेपालकपन की आत्मा" देकर परमेश्वर के परिवार में सम्मिलित करता है। पवित्रीकरण शुद्धिकरण का वह कार्य है जो नए जन्म के क्षण से ही आत्मा में आरम्भ हो जाता है। वह कहता है, "पवित्रीकरण तब आरम्भ होता है जब हम विश्वास करना आरम्भ करते हैं, और जैसे-जैसे हमारा विश्वास बढ़ता है, वैसे-वैसे हमारी पवित्रता भी बढ़ती है।"
वेस्ली को पवित्रशास्त्र के अध्ययन से आरम्भ में ही यह विश्वास हो गया था कि भीतरी शुद्धिकरण और पाप पर विजय का यह कार्य इसी जीवन में पूरी रीति से सम्पन्न हो सकता है, और यही वह सिद्धान्त था जिसका उसने पूर्ण पवित्रीकरण और मसीही सिद्धता के पवित्रशास्त्रीय नामों से प्रचार किया। वह इस महान आशीष का वर्णन इन शब्दों में करता है: "यह है अपने सम्पूर्ण हृदय, मन, प्राण और शक्ति से
परमेश्वर से प्रेम करना; जिसका अर्थ है कि आत्मा में कोई बुरी प्रवृत्ति, प्रेम के विपरीत कोई भी बात, नहीं रहती, और हर विचार, वचन और कर्म शुद्ध प्रेम से शासित होता है।" अतः मसीही सिद्धता, जिसे इसी जीवन में प्राप्त किया जाना है, प्रेम की सिद्धता है:
जो मसीही विश्वास के द्वारा इस सुखद अवस्था को प्राप्त करते हैं, वे इस कारण अज्ञानता और भूल से मुक्त नहीं हो जाते। हमें यह अपेक्षा करने का उतना ही अधिकार नहीं है कि मनुष्य अचूक हो, जितना कि यह कि वह सर्वज्ञ हो। जब तक किसी की आत्मा परमेश्वर के पास नहीं लौट जाती, तब तक कोई भी निर्बलताओं और परीक्षाओं से मुक्त नहीं होगा।"
एक और सिद्धान्त जो वेस्ली के धर्मशास्त्र में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, वह आत्मा की गवाही का है। वह इसकी परिभाषा इस प्रकार देता है: "आत्मा पर एक भीतरी छाप, जिसके द्वारा परमेश्वर का आत्मा मेरी आत्मा को सीधे गवाही देता है कि मैं परमेश्वर की सन्तान हूँ; कि यीशु मसीह ने मुझसे प्रेम किया है और मेरे लिए अपने आप को दे दिया है; और कि मेरे सब पाप मिटा दिए गए हैं, और मैं, हाँ मैं ही, परमेश्वर से मेल कर चुका हूँ।"
आत्मा की यह गवाही वेस्ली की दृष्टि में अन्तिम उद्धार का बिना शर्त आश्वासन नहीं थी। जैसे उसने बिना शर्त पूर्वनियति को अस्वीकार किया, वैसे ही उसने अन्तिम स्थिरता (धीरज) के कैल्विनवादी सिद्धान्त को भी अस्वीकार किया, और ऐसा करने के लिए उसे कठोर तर्क ने विवश किया: मनुष्य के धार्मिक जीवन के आरम्भ में ही उसकी स्वतन्त्रता और उत्तरदायित्व को स्वीकार करके, वह
ऐसे धर्मशास्त्र का स्वरूप और प्रभाव। 263 बाद में उसे इन जोखिम-भरे अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता था। विश्वास से गिर जाने की सम्भावना, जो पवित्रशास्त्र में इतनी स्पष्टता से सिखाई गई है, सबके लिए एक चेतावनी भी थी।
अपने मुख्य लक्षणों में वेस्ली के कार्य की आधारशिला बनने वाला धर्मशास्त्र यही है। स्पष्ट, सरल और व्यावहारिक होने के कारण इसमें सफलता के सभी तत्त्व विद्यमान थे।
वेस्ली की संक्षिप्त और पारदर्शी शैली में समझाए जाने और उसके उत्कृष्ट उपदेशों द्वारा प्रसारित किए जाने पर यह उसके प्रचारकों के अध्ययन का मुख्य विषय और उनकी सेवकाइयों का सार बन गया, और इस प्रकार उसकी सोसाइटियों को ठोस आत्मिक पोषण देने वाला हुआ।
इसकी प्रभावशीलता का सबसे अच्छा प्रमाण उस महान धार्मिक आन्दोलन में मिलता है जिसका वर्णन हमने इस पुस्तक में किया है, और जिसे उन सुसमाचारीय सिद्धान्तों के विश्वासयोग्य प्रचार का परिणाम कहा जा सकता है जिन्हें वेस्ली ने पुनर्जीवित किया था।
मेथोडिज़्म को ऐसा धर्मशास्त्र देकर, जिसने अनुभवजन्य मसीही धर्म के महान सिद्धान्तों की ही पुनः पुष्टि की, वेस्ली ने उस भवन के लिए जो उसने उस पर खड़ा किया, एक विस्तृत और स्थिर नींव डाली। अब हमें स्वयं उस भवन पर, अर्थात् मेथोडिज़्म के संगठन पर, विचार करना है, जिसका इतना सामान्य दृश्य देना पर्याप्त होगा जिससे आधी शताब्दी की वृद्धि के परिणाम स्पष्ट हो जाएँ।
इस संगठन का आधार वह सोसाइटी है, जिसे यथार्थ अर्थ में सोसाइटी कहा जाता है, और जिसमें प्रत्येक स्थान के वे विश्वासी सम्मिलित हैं जो मेथोडिज़्म के सिद्धान्तों को अपनाते हैं। इस सोसाइटी की सदस्यता की एकमात्र शर्त "आनेवाले क्रोध से भागने की इच्छा" थी, जिसमें किसी भी धर्मसिद्धान्त-सूत्र को मानने की आवश्यकता नहीं थी; और उसमें बने रहने के लिए आवश्यक था कि इस इच्छा को मसीही आचरण से प्रकट किया जाए, और क्लास-मीटिंग में उपस्थित होकर मसीही सहभागिता बनाए रखी जाए।
क्लास-मीटिंग, जो मेथोडिज़्म की सच्ची आधारशिला है, "आत्माओं की देखभाल" का एक उत्कृष्ट तरीका है, और साथ ही कलीसिया के भीतर उस भाईचारे की सहभागिता का साकार रूप भी है जिसे प्रेरितों के युग में भली-भाँति समझा जाता था और जिसकी हमारे अपने युग में शोचनीय उपेक्षा की गई है।
264 वेस्ली का कार्य और उसके परिणाम। एक क्लास में सामान्यतः लगभग बारह व्यक्ति होते हैं, जो एक अगुवे के मार्गदर्शन में रखे जाते हैं, जिसे उसके मसीही अनुभव और विवेक के कारण चुना जाता है। उसका कर्तव्य है कि वह अपनी देखरेख में सौंपे गए लोगों की आत्मिक दशा पर दृष्टि रखे, न केवल साप्ताहिक रूप से उनसे मिलकर यह पूछने के द्वारा कि उनकी आत्माएँ कैसी उन्नति कर रही हैं, बल्कि उनके घरों पर जाकर भी। इस प्रकार, जैसा देखा जा सकता है, क्लास-मीटिंग कलीसिया का केन्द्रक है; और अपने सरल संगठन के कारण उसने प्रायः स्वयं ही अन्य विधियों का स्थान भी ले लिया है। पास्टरीय परिश्रम को बाँटकर उसने उसे सरल बना दिया है, और साथ ही अनुशासन के पालन को अधिक गहन भी बना दिया है।
इन साप्ताहिक सभाओं के द्वारा कार्य के संचालन के लिए आवश्यक धन जुटाने का एक सरल उपाय भी उपलब्ध हो गया; और अगुवा, जिसका कार्य सदस्यों की धार्मिक दशा का विवरण प्रचारकों को देना था, उनके धन का हिसाब भी स्थानीय भण्डारियों (स्टीवर्डों) को देता था। इस प्रकार आर्थिक व्यवस्था अत्यन्त सरल थी, फिर भी सामान्यतः प्रभावशाली थी।
एक और प्रथा जो वेस्ली ने अपनाई, वह प्राचीन कलीसियाओं से ली गई थी। सोसाइटी के प्रत्येक सदस्य को समय-समय पर एक टिकट मिलता था, जिस पर उसका अपना नाम और उस प्रचारक का नाम अंकित होता था जिससे उसने उसे पाया। यह त्रैमासिक टिकट सदस्यता का चिह्न था, और कलीसिया की कुछ सभाओं में प्रवेश पाने के लिए इसे दिखाना पड़ता था।
उचित क्लास-मीटिंग के अतिरिक्त, सोसाइटियों की अन्य सभाएँ भी थीं, जैसे बैण्ड-मीटिंग, जिनमें सदस्यों की अधिक घनिष्ठ संगति को प्रोत्साहित किया जाता था, परन्तु जो ऐच्छिक होने के कारण धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो गईं; प्रेम-भोज (लवफ़ीस्ट), जिनमें किसी सोसाइटी की सब क्लासें आदिम कलीसिया की प्रथा के अनुसार रोटी तोड़ने के लिए एक साथ एकत्र होती थीं और अपने
मसीही अनुभव पर खुलकर चर्चा करती थीं; जागरण-रात्रियाँ (वॉच-नाइट), आत्मिक उन्नति के लिए सभाएँ, जो आधी रात तक चलती थीं और जो आरम्भ में प्रतिमास पूर्णिमा के लगभग
संगठन। 265 समय होती थीं, परन्तु अब केवल वर्ष के अन्तिम दिन मनाई जाती हैं, ताकि पुराने वर्ष के अन्त और नए वर्ष के आरम्भ को चिह्नित करने वाला समय प्रार्थना में बिताया जा सके; वाचा का नवीनीकरण, वर्ष के पहले रविवार को होने वाली एक विशेष आराधना, जिसमें सदस्य एक गम्भीर प्रतिज्ञा के द्वारा अपने आप को फिर से परमेश्वर के प्रति समर्पित करते हैं। d
सोसाइटियों में प्रभु-भोज का संचालन अभी तक दुर्लभ था, क्योंकि उनके बीच कार्य करने वाले नियुक्त सेवकों की संख्या थोड़ी थी; परन्तु यह असामान्य स्थिति अधिक समय तक नहीं रही, और सोसाइटियों ने शीघ्र ही वह पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त कर ली जिसके लिए उनके संस्थापक ने उन्हें तैयार किया था।
कुल मिलाकर, यहाँ हमें अनुग्रह के साधनों का एक उल्लेखनीय समूह दिखाई देता है, जो सब सदस्यों के आत्मिक जीवन को विकसित करने और सोसाइटियों की एकता को दृढ़ नींव पर स्थापित करने की ओर सामर्थ्य के साथ अग्रसर हैं। कलीसिया के पदाधिकारियों की त्रैमासिक सभाएँ धीरे-धीरे स्थापित की गईं, जिनमें परमेश्वर के कार्य के आत्मिक और भौतिक हितों पर विचार किया जाता था।
क्लास-अगुवों के अतिरिक्त और भी कई प्रकार के पदाधिकारी थे। ट्रस्टी वे थे जो ट्रस्ट की सम्पत्तियों का प्रबन्ध अपने ऊपर लेते थे। भण्डारी (स्टीवर्ड) सोसाइटियों द्वारा दिया गया विभिन्न प्रकार का धन प्राप्त करते थे और आवश्यकता के अनुसार उसे व्यय करते थे: उनका पद कुछ अंश में अन्य
कलीसियाओं के उपदेशकों (डीकनों) के पद से मिलता-जुलता है। स्थानीय प्रचारक भक्त सामान्य जन थे, जो वाक्पटुता का वरदान रखते हुए अपने सब्त के दिन, और प्रायः सप्ताह की रातें भी, सुसमाचार के कार्य के लिए बिना किसी पारिश्रमिक के देने को तैयार हो जाते थे। इन उपयोगी कार्यकर्ताओं की संख्या बहुत बढ़ गई है, और वे महत्त्वपूर्ण सहायक बन गए हैं, जिनकी सहायता से मेथोडिज़्म सीमित साधनों के होते हुए भी अपने सुसमाचारीय कार्य को एक विशाल क्षेत्र में ऐसी सरलता से फैला पाता है कि अन्य कलीसियाएँ उससे ईर्ष्या कर सकती हैं।
हमने भ्रमणशील सेवकाई के विनम्र आरम्भ का कुछ विस्तार से वर्णन किया है 8 5 266 वेस्ली का कार्य और उसके परिणाम। वह संस्था जिसने अन्य किसी भी संस्था से अधिक मेथोडिज़्म को वर्तमान में उसका स्थान दिलाया है।
इसका उसके संगठन में प्रमुख स्थान है, और यह अपने आप में ही इस आन्दोलन के मौलिक और साथ ही दैवीय प्रबन्ध-सम्बन्धी स्वरूप को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त होगा। ये अनियमित पादरी, जिन्हें वेस्ली ने परमेश्वर की व्यवस्था के निर्देशों का पालन करते हुए अस्तित्व में बुलाया, जनता में से ही उठे थे, और इसलिए जनता की आवश्यकताओं को समझते थे, और बदले में जनता भी उन्हें समझती थी। यह वीर सेना, जिसकी गणना वेस्ली की मृत्यु के समय सैकड़ों में की जाती थी, निरन्तर गतिमान रहती थी: वेस्ली ने भ्रमण को ही उसके अस्तित्व का नियम बना दिया था, और इस प्रकार वह न केवल उसकी प्रचारक-उत्साह को बनाए रखने में, बल्कि उसके कार्यों को कई गुना बढ़ाने और थोड़े-से लोगों के द्वारा बड़े परिणाम प्राप्त करने में समर्थ हुआ। उसने ग्रेट ब्रिटेन को सर्किटों (परिक्रमा-क्षेत्रों) में बाँट दिया था, जिन्हें इसलिए यह नाम दिया गया कि उनके प्रभारी प्रचारकों से अपेक्षा की जाती थी कि वे अपनी सीमा के भीतर के मुख्य स्थानों में बारी-बारी से जाएँ: प्रत्येक सर्किट में उनका निवास भी कभी तीन वर्ष से अधिक नहीं होना था, और प्रत्येक कॉन्फ़्रेंस में उन्हें अपने कार्य-क्षेत्र बदलने के लिए कहा जा सकता था। इतनी सुव्यवस्थित सेवकाई, जिसमें वह उत्कृष्ट आत्मा भी थी जिसे वेस्ली अपने सेवकों में फूँकना जानता था, अपार सामर्थ्य का प्रयोग करने से नहीं चूक सकती थी; और उसकी सफलता हमें आश्चर्य में नहीं डालनी चाहिए।
वेस्ली के जीवनकाल में वह स्वयं इस विस्तृत संगठन की जीवित कड़ी था। उसकी मृत्यु के बाद वार्षिक कॉन्फ़्रेंस को वह पद विरासत में मिला, और वह सर्वोच्च न्यायालय बन गई जिसमें सोसाइटियों के सबसे महत्त्वपूर्ण हितों पर विचार किया जाता था। समय के साथ अन्य परिवर्तन हुए, जो मुख्यतः छोटी-छोटी बातों में थे: उन पर चर्चा करना हमारा काम नहीं है; इतना कहना पर्याप्त है कि ऐसे परिवर्तनों ने वेस्ली के जीवन के कार्य को किसी भी अंश में संकुचित नहीं किया, बल्कि उसे सुदृढ़ करने में ही सहायता दी।
इस संगठन ने एक शताब्दी से अधिक की अपनी स्थिरता से अपनी शक्ति प्रमाणित की है, जिस अवधि में यह निरन्तर विस्तृत होती प्रगति के नियम पर चलता रहा है। इसने उन सब की प्रशंसा पाई है जिन्होंने इस विषय का निकट से अध्ययन किया है। यद्यपि इसकी कुछ विशेषताओं की, जैसे वेस्ली की कलीसियाई स्थिति से उत्पन्न विशेषताओं की, आलोचना से रक्षा नहीं हो सकी, तथापि सब निष्पक्ष न्यायकर्ताओं को यह मानना पड़ता है कि समग्र रूप से यह उन उद्देश्यों के लिए, जिनके लिए इसे बनाया गया था, अद्भुत रीति से उपयुक्त है। उसकी स्थिरता और सामर्थ्य। 267
श्री क्यूशेवाल-क्लारिग्नी कहते हैं, "मेथोडिज़्म की विशेषता, और वह बात जिसने उसे इतना सफल बनाया है, यह है कि वह मसीही को कभी अकेला नहीं छोड़ता, बल्कि निरन्तर उसे आत्मिक सहायता देता रहता है। नियमित सेवकाई के अभाव में भी कलीसिया का सबसे अलग-थलग सदस्य उपदेशक या क्लास-अगुवे से परामर्श, प्रोत्साहन और सान्त्वना पाता है। जहाँ मेथोडिज़्म की बुद्धिमानी से क्रमबद्ध की गई श्रेणी-व्यवस्था उसे सभ्यता की सुदूरतम सीमाओं तक फैलने में समर्थ बनाती है, वहीं उसी व्यवस्था से वह समाज के निम्नतम स्तरों तक भी पहुँच जाता है।" *
वेस्ली की मृत्यु के समय मेथोडिज़्म की संख्यात्मक शक्ति इन आँकड़ों में संक्षेपित है: भ्रमणशील प्रचारक 511, जिनमें से 294 यूरोप के और 217 अमेरिका के थे; सदस्य 120,233, जिनमें से 71,668 यूरोप के और 48,565 अमेरिका के थे।
इन शानदार परिणामों ने वेस्ली को उसके मिशन की पूर्ण सफलता दिखा दी, और जिन दुःखों से वह होकर गुज़रा था, उनकी उसे भरपूर क्षतिपूर्ति कर दी। वह सारी पृथ्वी की राह पर चला गया, दोनों गोलार्द्धों में पाप के मार्गों से जीतकर लाए गए एक लाख बीस हज़ार से अधिक प्राणियों की आशीषों के साथ; जबकि अनन्त तट पर और हज़ारों ने उसे अपने आत्मिक पिता के रूप में स्वागत किया, जो उससे पहले अपने परमेश्वर की गोद में एकत्र हो चुके थे।
ये बड़े संख्यात्मक परिणाम स्वयं केवल उससे भी बड़े परिणामों की, जो आने वाले थे, प्रतिज्ञा मात्र थे। मेथोडिज़्म को * रेव्यू देस देउ-मोंद, 15 अगस्त, 1859।
268 वेस्ली का कार्य और उसके परिणाम। वेस्ली के साथ मर नहीं जाना था। इसके विपरीत, उसने अद्भुत जीवन-शक्ति दिखाई है, और आज पृथ्वी के लगभग हर भाग में विद्यमान है। ग्रेट ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका उन प्रमुख केन्द्रों के रूप में बने हुए हैं जहाँ से उसका प्रभाव फैलता है। विशेषकर बाद वाले देश में उसे असाधारण सफलता मिली है: वहाँ कलीसिया और राज्य का पूर्ण पृथक्करण अपने प्रभाव में अत्यन्त लाभदायक रहा है, और मेथोडिज़्म उस देश की कलीसियाओं में महत्त्व में प्रथम और संख्या में सबसे बड़ा बन गया है। मेथोडिस्ट एपिस्कोपल चर्च नॉर्थ ने, जो अमेरिकी मेथोडिज़्म का सबसे बड़ा भाग है, 1866 में अपना शताब्दी वर्ष मनाया, जब उसके सदस्यों की कुल संख्या दस लाख से अधिक थी, और उसकी उन्नति इतनी तीव्र है कि तब से उसकी वृद्धि एक लाख से ऊपर हो चुकी है।* अंग्रेज़ी और अमेरिकी कलीसियाओं द्वारा संचालित मेथोडिस्ट मिशन अब अपने मिशनरियों की संख्या, अपने कलीसिया-सदस्यों की कुल संख्या और अपनी निधियों की राशि में अन्य सभी
प्रोटेस्टैण्ट मिशनों में सबसे आगे हैं: वे पृथ्वी के सब कोनों तक फैले हुए हैं, और सोसाइटियों के दान से प्रतिवर्ष £300,000 के व्यय पर चलाए जाते हैं।
अनुमान है कि संसार भर में विभिन्न मेथोडिस्ट कलीसियाएँ और मण्डलियाँ, जो वेस्ली द्वारा प्रचारित सिद्धान्तों को अपनाती हैं और उसके कलीसियाई अनुशासन की मुख्य विशेषताओं को बनाए रखती हैं, कुल मिलाकर लगभग अठारह हज़ार भ्रमणशील प्रचारक, लगभग तीस लाख प्रभु-भोज में भाग लेने वाले सदस्य, और लगभग एक करोड़ बीस लाख नियमित श्रोता रखती हैं। ऐसी सफलता की तुलना के लिए हमें प्रेरितों के युग तक पीछे जाना पड़ेगा।
मेथोडिस्ट आन्दोलन के इन प्रत्यक्ष और सकारात्मक परिणामों में अब हमें अन्य परिणाम जोड़ने चाहिए, जो यद्यपि अधिक सामान्य और अप्रत्यक्ष हैं, फिर भी उससे वैसे ही जुड़े हैं जैसे कार्य कारण से।
आज के सब इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि जहाँ पिछली शताब्दी महाद्वीपीय यूरोप के लिए पतन * अथवा, चार वर्षों में (1870 तक), दो लाख।—अनु.
इंग्लैंड का पुनरुद्धार। 269 और विघटन का काल थी, वहीं ग्रेट ब्रिटेन में उसने उन हितकारी संकटों में से एक देखा जो किसी राष्ट्र के जीवन को नया कर देते हैं और असीम प्रगति के एक युग का द्वार खोलते हैं। वास्तव में, जब अन्यत्र सर्वत्र सन्देहवाद की घातक साँस से विश्वास दम तोड़ रहे थे और चरित्र विषैला हो रहा था, तब यह महान जाति अपने एकाकी द्वीप-घर में लड़खड़ाते हुए विश्वास और नैतिकता के भवन को कदम-कदम पर फिर से बना रही थी। इसीलिए जब इस शताब्दी के अन्त में क्रान्ति का नगाड़ा बजा, और प्राचीन संस्थाओं को उन प्राचीन सिद्धान्तों के साथ वही दशा भोगनी पड़ी जिन पर वे आधारित थीं, तब सामान्य विनाश के बीच केवल इंग्लैंड ही सुरक्षित खड़ा रहा।
इंग्लैंड का यह पुनरुद्धार विशेष रूप से मेथोडिज़्म का कार्य था, और निष्पक्ष इतिहास अन्ततः इस तथ्य को स्वीकार करता है। जहाँ अपने समय में दूरदर्शी प्रीस्टली ने देखा कि, "मेथोडिज़्म ने राष्ट्र के उस भाग को, जिसे अपनी प्रतिष्ठा की अत्यधिक चिन्ता करने वाले पादरीवर्ग ने उपेक्षित छोड़ दिया था, न केवल मसीही बनाया बल्कि सभ्य भी बनाया," वहाँ हमारे अपने समय में मैकॉले उन "इंग्लैंड के इतिहास कहलाने वाली पुस्तकों के कुछ लेखकों" को हल्के में लेता है, जो जॉर्ज द्वितीय के शासनकाल का वर्णन करते हुए मेथोडिज़्म के उदय का उल्लेख तक नहीं करते, और कहता है कि सौ वर्षों में "ऐसी नस्ल के लेखक लुप्त हो जाएँगे।" फ्रांस में भी, जिन लेखकों ने उस शताब्दी के इतिहास का अध्ययन किया है, उन्होंने सामान्यतः वेस्ली और उसके कार्य के सर्वोपरि प्रभाव के साथ न्याय किया है; और ये गवाहियाँ, जो ऐसे पूर्णतः निःस्वार्थ स्थान से आती हैं, इतनी मूल्यवान हैं कि उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता।
श्री एडमण्ड शेरर मेथोडिज़्म को "ऐसा आन्दोलन जिसने इंग्लैंड का रूप ही बदल दिया" कहते हैं, और आगे कहते हैं, "हाँ, इंग्लैंड, जैसा हम उसे आज जानते हैं, अपने शुद्ध और गम्भीर साहित्य के साथ, अपनी बाइबिल-प्रेरित भाषा और अपनी राष्ट्रीय भक्ति के साथ, अपने मध्यम वर्गों के साथ जिनकी आदर्श नैतिकता देश को इतना भारी महत्त्व देती है, इंग्लैंड मेथोडिज़्म का ही कार्य है। मेथोडिज़्म ने केवल एक सम्प्रदाय की स्थापना से कहीं अधिक किया है, उसने सभी अन्य सम्प्रदायों में नया जीवन डाला है: उसने राजकीय कलीसिया को अपने प्रभाव से व्याप्त कर दिया है, उसने सुधार-आन्दोलन के सिद्धान्तों को उनका उचित स्थान 270 वेस्ली का कार्य और उसके परिणाम। फिर से दिलाया है, उसने पादरीवर्ग को जगाया है, और उन्हें अपनी ही मिशनरी आत्मा प्रदान की है।"
श्री कार्नेलियस डी विट की गवाही और भी हार्दिक है: "वेस्ली का विश्वास सक्रिय और विस्तारशील था; उसका साहस उपहास और हिंसा दोनों के सामने अडिग था, और उसकी संगठन-प्रतिभा बड़े मठवासी सम्प्रदायों के संस्थापकों के बराबर थी। वेस्ली में एक और गुण था, जो नवप्रवर्तकों में अत्यन्त दुर्लभ है। सुधार की भावना ने उसमें सच्ची रूढ़िवादिता की भावना को नष्ट नहीं किया।
एक धार्मिक सोसाइटी बनाते समय एक धार्मिक सम्प्रदाय की स्थापना करना उसकी योजना का कोई अंग नहीं था। राजकीय कलीसिया का सेवक होने और उसकी त्रुटियों को देखने के कारण उसने अनुभव किया कि पल्ली के पादरियों को जगाने के लिए एक दूसरे प्रकार का पादरीवर्ग उत्पन्न करना आवश्यक है; कि उन लोगों को सुसमाचार सुनाने के लिए, जो कभी कलीसिया में नहीं जाते थे या जो वहाँ केवल ठण्डे उपदेश सुनते थे, उत्साही मिशनरियों की एक सेना संगठित करना आवश्यक है; कि जनसाधारण के हृदय तक पहुँचने के लिए उन्हें खेतों, बाज़ारों और बड़े नगरों की गलियों में खोजना और उनकी अपनी साधारण बोली में उन्हें प्रचार करना आवश्यक है।
"यद्यपि एंग्लिकन कलीसिया से उसका अलगाव उसकी इच्छा से अधिक व्यापक रहा, तथापि जो भलाई उसने उसकी की, वह उससे कहीं अधिक है जिसकी वह कभी आशा या कल्पना कर सकता था।
उसने उसकी सक्रियता को उसकी ईर्ष्या जगाकर उत्तेजित करने से कुछ अधिक किया: उसने उस पर अपने उपदेश, अपने उदाहरण और अपने विश्वास की फैलने वाली उष्णता के द्वारा प्रभाव डाला। उसने उसमें केवल कलीसियाई उत्साह नहीं फूँका, उस प्रकार का स्वार्थपूर्ण उत्साह जो आत्माओं के उद्धार के प्रति उदासीनता के साथ भी रह सकता है: उसने उसके आत्मिक जीवन को पुनर्जीवित किया और उसकी नैतिक कार्यक्षमता को नया किया। यदि आज का इंग्लैंड अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ के इंग्लैंड जैसा नहीं रहा, तो इसका मुख्य श्रेय जॉन वेस्ली को जाता है।"* * अठारहवीं शताब्दी में फ्रांसीसी समाज और अंग्रेज़ी समाज, पृ. 237।
इतिहासकारों की गवाहियाँ। 201
अन्त में आइए हम श्री सेंट-मार्क-जिरार्दिन का मत उद्धृत करें:
"जब फ्रांस अधिकाधिक दार्शनिक भावना में अपने आप को डुबो रहा था, तब इंग्लैंड में मेथोडिज़्म के प्रभाव से धार्मिक भावना जाग रही थी और फैल रही थी। जब मैं वेस्ली और व्हिटफ़ील्ड के जीवन पढ़ता हूँ, तो मैं व्यक्तिगत विश्वास की सामर्थ्य की प्रशंसा करता हूँ। अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में इंग्लैंड में एक पीछे की ओर ले जाने वाली हलचल हुई थी, जो अधर्म को उत्पन्न करने की प्रवृत्ति रखती थी। वहीं वोल्तेयर ने अविश्वास का संक्रमण पकड़ा, और उसे फ्रांस में ले आया। अविश्वास के इस प्रभुत्व ने वेस्ली और व्हिटफ़ील्ड को एक क्षण के लिए भी निरुत्साहित नहीं किया।
उन्होंने ठान लिया कि विचार और वाणी ने जो किया है, उसे विचार और वाणी से ही मिटाएँगे, और ईश्वरहीनता की उच्छृंखलता के सामने विश्वास की स्वतन्त्रता को खड़ा करेंगे। उन्होंने प्रचार किया और लिखा, उनका उपहास किया गया और उन्हें सताया गया, वे डटे रहे जब तक कि उन्होंने जीत न लिया। वेस्ली और उसके शिष्यों ने उन लोगों के हृदयों में भी मसीही आत्मा को पुनर्जीवित किया जो उनका विरोध करते थे।
मेथोडिज़्म के पक्ष में और उसके विरुद्ध लड़ी गई लड़ाइयों से अंग्रेज़ी समाज अधिक सुदृढ़ और अधिक धार्मिक बन गया; और चूँकि वह विश्वास जो ऐसे विरोध के बीच फिर से प्रज्वलित हुआ था, सच्चा ही होना था, इसलिए जब दासता के उन्मूलन का प्रश्न उठा, तब उसी विश्वास ने तीस वर्षों तक कार्य किया जब तक वह पूरा न हो गया।"
ये गवाहियाँ, जो विपरीत दिशाओं से आती हैं, इस बात में सहमत हैं कि इंग्लैंड के नैतिक नवीनीकरण में वेस्ली और मेथोडिज़्म का बड़ा भाग रहा। यह केवल नैतिक क्रान्ति नहीं थी, बल्कि इसने समाज के सब हितों को प्रभावित किया।
श्रमिक वर्गों ने सबसे पहले इसके प्रभाव का अनुभव किया: बड़े नगरों के निचले मुहल्ले, कारखानों और कोयला-खदानों के क्षेत्र, जहाँ दुराचार और दुर्दशा का राज्य था, जैसा हमने देखा है, वेस्ली और उसके सहायकों के लिए कार्य का प्रिय क्षेत्र थे। ये पतित आबादियाँ सुसमाचारीय प्रचार के प्रभाव से धीरे-धीरे बदल गईं। न केवल अनेक मन-परिवर्तन हुए, बल्कि सामान्य स्तर भी तेज़ी से ऊपर उठा: आचार-व्यवहार
272 वेस्ली का कार्य और उसके परिणाम। कोमल और उन्नत हुए, और ज्ञान की प्यास जागी। किंग्सवुड, कॉर्नवॉल, स्टैफ़र्डशायर, नॉर्थम्बरलैंड ने कुछ ही वर्षों में अपनी खदान-मज़दूरों और कोयला-खनिकों की आबादियों के बीच अद्भुत सुधार देखा, जो अभी हाल तक निकृष्टतम अतियों में छोड़ दिए गए थे और अपनी क्रूरता के कारण भयावह माने जाते थे। देश भर में हर जगह प्रार्थनालय उठ खड़े हुए, और उन्हें वे बड़ी संख्या में लोग भरते थे जो पहले शराबखानों में जाया करते थे। सुख-सुविधा और सुव्यवस्था का रूप लिए विनम्र झोंपड़ियों ने धीरे-धीरे उन घिनौनी कुटियों का स्थान ले लिया जिनमें पहले अनेक परिवार गड्डमड्ड होकर ठुँसे रहते थे। सार्वजनिक पाठशालाएँ और पुस्तकालय दिखाई देने लगे, क्योंकि लोगों की बौद्धिक आवश्यकताओं का, जिनके बारे में अब तक सोचा भी नहीं गया था, अनुभव होने लगा।
जैसे-जैसे निम्न वर्ग नैतिकता की सीढ़ी पर ऊपर चढ़ते गए, वे अनिवार्य रूप से उच्च वर्गों पर प्रभाव डालने लगे, और यह आन्दोलन समाज के निम्नतम स्तरों से फैलकर उच्चतम स्तर तक जा पहुँचा। राष्ट्र का नैतिक स्तर इतना ऊँचा उठ गया था कि उसने अनिवार्य रूप से उस भ्रष्ट और बिकाऊ कुलीनवर्ग पर भी अपना दबाव डाला, जो पहली दृष्टि में इतना असुधार्य प्रतीत होता था। मध्यम और निम्न वर्गों के दबाव में, जो नैतिकता और प्रतिष्ठा में तेज़ी से ऊपर उठ रहे थे, उच्च वर्गों के लिए यह नितान्त आवश्यक था कि यदि वे अपना प्रभुत्व बनाए रखना चाहते थे तो अनुपात के अनुसार उन्नति करें। सौभाग्य से ऐसा परिवर्तन वास्तव में हुआ, और इतिहास में कहीं इससे अधिक आमूल परिवर्तन दिखाई नहीं देता।
एंग्लिकन कलीसिया ने, जिसने प्रीस्टली के अनुसार लोगों की आवश्यकताओं की अपेक्षा अपनी प्रतिष्ठा की अधिक चिन्ता की थी, कुलीनवर्ग की अनियमितताओं में लम्बे समय तक सहभागिता निभाई थी, और यहाँ तक कि धार्मिक उदासीनता को प्रोत्साहन भी दिया था।
परन्तु पुनर्जागरण ने उसे भी दर्शन दिया और बदल दिया, जिसने उसकी पंक्तियों में पेरोनेट, फ़्लेचर, ग्रिमशॉ, रोमेन, वेन, बेरिज, न्यूटन जैसे व्यक्तियों को पहुँचाया, और उनके द्वारा एक उल्लेखनीय सुधार सम्पन्न किया।
उपसंहार। Te ऐसा ही परिवर्तन असहमत कलीसियाओं (डिसेंटिंग चर्चों) में भी लाया गया, जो यद्यपि इतनी निराशाजनक रूप से पतित नहीं हुई थीं, फिर भी जनसाधारण पर अपना प्रभाव खो चुकी थीं। वे मेथोडिस्ट आन्दोलन की भावना से इतनी ओत-प्रोत हो गईं कि उन्होंने अपना प्राचीन उत्साह फिर से पा लिया, और पुनर्जागरण के उत्साही मिशनरियों के सम्पर्क से नए जीवन में जाग उठीं।
सुधार के इस महान कार्य में, i अंग्रेज़ जाति ने अपना यौवन फिर पा लिया, और प्रत्येक क्षेत्र को—सामाजिक, राजनीतिक, बौद्धिक और नैतिक—व्याप्त कर लिया। पिछले युग की अशुद्ध रचनाओं का स्थान एक शुद्ध और स्वस्थ साहित्य ने ले लिया। जॉन्सन और गोल्डस्मिथ ने अन्य लेखकों के साथ मिलकर अधिक शुद्ध लोक-साहित्य रचकर निस्सन्देह इस महान क्रान्ति में योगदान दिया।
सचमुच एक महान क्रान्ति, जिसने पिछली शताब्दी की राजनीतिक क्रान्ति के पीछे-पीछे चलकर आधुनिक इंग्लैंड को रचा है, वह राष्ट्र जिसने संसार के सामने सुसमाचार की नींव पर आधारित उदार संस्थाओं की सामर्थ्य और स्थायित्व का उदाहरण रखा है।
आइए हम उन मनुष्यों की प्रशंसा करना सीखें जिन्होंने मानवता को उन हितकारी प्रेरणाओं में से एक दी जो उसे उसके स्वर्ग-निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ाती हैं। प्रशंसा हमें उनके निकट लाती है, और एक अर्थ में हमें उनकी भावना से भर देती है, और हमें उनका जीवन जीने और उनके कार्य में सहभागी होने की ओर ले जाती है। और यह स्मरण करते हुए कि उन्होंने इतने सीमित साधनों से क्या सम्पन्न किया, हम बेहतर समझ पाएँगे कि जिस क्षेत्र में हम रखे गए हैं, उसमें हम क्या कर सकते हैं।
आइए हम सबसे बढ़कर यह स्मरण रखना सीखें कि मनुष्य केवल परमेश्वर का साधन है, और कि उन महान उपक्रमों की महिमा केवल परमेश्वर की है, जिनके केवल मानवीय पक्ष को ही हम, अपनी अज्ञानता और अल्पदृष्टि के साथ, देख सकते हैं। वेस्ली और व्हिटफ़ील्ड, लूथर और कैल्विन की तरह, और सत्य के सब विश्वासयोग्य शिक्षकों की तरह, जानते थे कि वे केवल परमेश्वर के साधन हैं; और उनमें जो बात हमें उनकी बड़ी उपलब्धियों से भी
274 वेस्ली का कार्य और उसके परिणाम। अधिक प्रशंसनीय लगनी चाहिए, वह वह गहरी नम्रता है जिसने उन्हें सारी महिमा परमेश्वर को देना सिखाया। वेस्ली के कार्य का सर्वेक्षण करते समय हमें प्रेरित करने वाली भावना भी यही है, और यह भावना उन शब्दों में भली-भाँति प्रकट हुई है जिनके साथ हमारे पूर्वज अपनी पुस्तकों को समाप्त करना पसन्द करते थे, और जिनके साथ हमारी पुस्तक भी समाप्त होगी:—
"केवल परमेश्वर ही की महिमा हो!"
HEOLOGY LISRARY LAREMONT, CALIF. [अस्पष्ट मूल पाठ]
ROBERT NEEDHAM, PRINTER, PATERNOSTER-ROW. naraie a Pe cool ri. ee as he 49 —_ —_ Stanifaed atl Populae Warhs, PUBLISHED AT THE WESLEYAN CONFERENCE OFFICE, = — = TireOLlO GTC AL. [अस्पष्ट मूल पाठ]
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3 खंड, 8vo। मूल्य £x 11s. 6d.; आधा मोरक्को चमड़ा, कपड़े की जिल्द की बगलें, मूल्य £2।
पोप (डब्ल्यू. बी.) अपने पदावधि के वर्ष में दिए गए उपदेश, सम्बोधन और आदेश। रेव्ह. डब्ल्यू. बी. पोप, डी.डी., वेस्लियन मेथोडिस्ट कॉन्फ़्रेंस के भूतपूर्व अध्यक्ष द्वारा। 8vo। मूल्य 8s. 6d.
पोप (डब्ल्यू. बी.) मसीह का व्यक्तित्व: सैद्धान्तिक, पवित्रशास्त्रीय, ऐतिहासिक, 187x के लिए फ़र्नली व्याख्यान। सिद्धान्त के बाइबिलीय और कलीसियाई विकास पर दो अतिरिक्त निबन्धों और व्याख्यात्मक टिप्पणियों सहित। रेव्ह. डब्ल्यू. बी. पोप, डी.डी., धर्मविज्ञान शिक्षक,
डिड्सबरी कॉलेज द्वारा। 8vo। मूल्य 7s।
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वॉटसन (आर.) उपदेश और उपदेशों की रूपरेखाएँ। रेव्ह. रिचर्ड वॉटसन द्वारा।
तीन खंड, डेमी 8vo। मूल्य 18s।
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वॉटसन (आर.) धर्मशास्त्रीय संस्थान; अथवा मसीही धर्म के प्रमाणों, सिद्धान्तों, नैतिकता और संस्थाओं का एक अवलोकन। रेव्ह. रिचर्ड वॉटसन द्वारा। चार खंड, रॉयल r8mo। मूल्य r4s।
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"वेस्ली (जे.) रेव्ह. जॉन वेस्ली, एम.ए. के तिरेपन उपदेश। क्राउन 8vo। मूल्य 3s. 6d.
ये उपदेश और श्री वेस्ली की नए नियम पर टिप्पणियाँ मेथोडिस्ट संगठन के मानक सिद्धान्त हैं। :
वेस्ली (जे.) विभिन्न अवसरों पर उपदेश। रेव्ह.
; जॉन वेस्ली, एम.ए. द्वारा। सम्पूर्ण संस्करण, जिसमें एक सौ इकतालीस उपदेश तथा रेव्ह. जॉन बेचम, डी.डी. द्वारा लिखित लेखक का जीवन-वृत्तान्त सम्मिलित है।
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वाइज़मैन (एल. एच.) जंगल में मसीह; अथवा हमारे प्रभु की परीक्षा पर व्यावहारिक दृष्टिकोण। रेव्ह. ल्यूक एच. वाइज़मैन, एम.ए. द्वारा। क्राउन 8vo। मूल्य 3s. 6d.
वुड (टी.) सर्वनाश और सार्वभौमिक उद्धार के सिद्धान्त, तर्क, सादृश्य और प्रकाशन के प्रकाश में देखे गए। रेव्ह. थॉमस वुड द्वारा। क्राउन 8vo, मूल्य 2s।
4 पवित्रशास्त्र की व्याख्या करनेवाली टिप्पणियों, शब्दकोशों आदि के प्रकाशन।
दैनिक मनन के सहायक: वर्ष के प्रत्येक दिन के लिए पवित्रशास्त्र के एक अंश पर व्यावहारिक विचार और टिप्पणियाँ।
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पवित्र बाइबिल: आलोचनात्मक, व्याख्यात्मक और व्यावहारिक टिप्पणियों सहित। रेव्ह. जोसेफ़ बेन्सन द्वारा। मानचित्रों और लेखक के चित्र सहित। छह खंड, इम्पीरियल 8vo., कपड़े की जिल्द, लाल किनारे। मूल्य £3 3s।
बाइबिल और धर्मविज्ञान का शब्दकोश: पुराने और नए नियम की व्याख्या करनेवाला। रेव्ह. जॉन फ़ैरर द्वारा। चार मानचित्रों और छियानवे चित्रों सहित। कपड़े की जिल्द, लाल किनारे। क्राउन 8vo। मूल्य 3s. 6d.
कलीसियाई शब्दकोश: मसीही
कलीसिया के इतिहास, प्राचीन वस्तुओं, पाखण्डों, सम्प्रदायों और धार्मिक समुदायों की व्याख्या करनेवाला। रेव्ह. जॉन फ़ैरर द्वारा। क्राउन 8vo। मूल्य ss।
बाइबिल अध्ययन के सहायक, जिनमें विभिन्न पुस्तकों की विश्लेषणात्मक टिप्पणियाँ और सारांश; ऐतिहासिक, कालक्रम-सम्बन्धी और
भौगोलिक तालिकाएँ; पवित्रशास्त्र में पाए जानेवाले पशुओं, पक्षियों, सरीसृपों, पौधों आदि की सूची; तौल, माप और समय की तालिकाएँ; अप्रचलित या अस्पष्ट शब्द; साथ ही बाइबिल की एक नई अनुक्रमणिका, क्रूडन का शब्दकोश-सूची ग्रन्थ, पवित्रशास्त्र के व्यक्तिवाचक नामों का शब्दकोश और मानचित्रों की एक श्रृंखला सम्मिलित है। फ़ूल्सकैप
8vo। कपड़े की जिल्द, लाल किनारे। मूल्य es।
बाइबिल के व्यक्तिवाचक नाम; उनकी वर्तनी, उच्चारण और अर्थ। मुख्य
व्यक्तियों का संक्षिप्त वृत्तान्त और प्रमुख स्थानों का वर्णन सहित। रेव्ह. जॉन फ़ैरर द्वारा। 18mo। मूल्य ts, 6d.
पुराने और नए नियम पर टिप्पणी; जिसमें विस्तृत धर्मशास्त्रीय, ऐतिहासिक और आलोचनात्मक टिप्पणियाँ, सुधार और चिन्तन सम्मिलित हैं। रेव्ह. जोसेफ़ सटक्लिफ़, एम.ए. द्वारा। इम्पीरियल 8vo., कपड़े की जिल्द, संगमरमरी किनारे। मूल्य ras. 6d.
पवित्रशास्त्र के समानान्तर अंशों और सन्दर्भों का संक्षिप्त शब्दकोश; वर्गीकृत पवित्रशास्त्र-पदों की अनुक्रमणिका; जो पवित्रशास्त्र के सिद्धान्तों, मतों, आज्ञाओं और तथ्यों का क्रमबद्ध सारांश है। 8vo। मूल्य eas. 6d.
बाइबिल और धर्मविज्ञान का शब्दकोश: यहूदियों और पड़ोसी जातियों के इतिहास, रीति-रिवाजों और प्रथाओं की व्याख्या करनेवाला।
पवित्र शास्त्र में वर्णित सबसे उल्लेखनीय स्थानों के वृत्तान्त; मसीही धर्म के प्रमुख सिद्धान्तों की व्याख्या; और यहूदी तथा मसीही सम्प्रदायों और पाखण्डों की सूचनाओं सहित। रेव्ह. रिचर्ड
वॉटसन द्वारा। रॉयल 8vo., कपड़े की जिल्द, लाल किनारे। मूल्य ras. 6d.
सन्त मत्ती और सन्त
मरकुस के सुसमाचारों तथा पवित्रशास्त्र के कुछ अन्य पृथक अंशों की व्याख्या। रेव्ह. रिचर्ड वॉटसन द्वारा। डेमी 8vo., मूल्य 6s.; 12mo., मूल्य 3s. 6d,
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रोव द्वारा सम्पादित। थॉमस पर्सिवल बंटिंग की जीवनी-सम्बन्धी भूमिका सहित।
क्राउन 8vo। मूल्य 3s. 6d.
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क्लार्क (ए.) डॉ. एडम क्लार्क का जीवन। रेव्ह.
डॉ. एथरिज द्वारा। चित्र सहित, पोस्ट 8vo। मूल्य 3s. 6d.
सस्ता संस्करण। रॉयल 32mo। मूल्य 1s. 6d.
कोक (टी.) थॉमस कोक का जीवन। रेव्ह. डॉ.
एथरिज द्वारा। चित्र सहित। पोस्ट 8vo। मूल्य 3s. 6d.
सस्ता संस्करण। रॉयल 32mo। मूल्य 1s. 6d.
डिक्सन (जे.) जेम्स डिक्सन, डी.डी., वेस्लियन सेवक का जीवन। उनके पुत्र रिचर्ड वॉटसन डिक्सन, एम.ए., कार्लाइल कैथेड्रल चर्च के माइनर-कैनन द्वारा लिखित। डॉ. डिक्सन के तीन चित्रों और उनके जन्मस्थान के एक रेखाचित्र सहित। क्राउन 8vo। मूल्य 7s. 6d.
डिक्सन (टी.) उत्साही मेथोडिस्ट। ग्रैंथम के स्वर्गीय श्री थॉमस डिक्सन का संस्मरण। उनके भतीजे रेव्ह. जोसेफ़ डिक्सन द्वारा। फ़ूल्सकैप 8vo। चित्र सहित। मूल्य 2s।
एंटविसल (जे.) रेव्ह. जोसेफ़ एंटविसल का संस्मरण > उनकी डायरियों और पत्राचार से विस्तृत अंशों तथा
मेथोडिस्ट इतिहास की समकालीन घटनाओं की यदा-कदा सूचनाओं सहित। उनके पुत्र द्वारा।
चित्र सहित। क्राउन 8vo। मूल्य 3s।
फ़ादर रीव्ज़, मेथोडिस्ट क्लास लीडर। एडवर्ड द्वारा।
कॉपरॉय। 18mo। मूल्य 1s।
फ़्लेचर (जे.) रेव्ह. जॉन फ़्लेचर का जीवन। रेव्ह. जोसेफ़ बेन्सन द्वारा। चित्र सहित। r2mo, मूल्य 3s. 6d.
' सस्ता संस्करण। रॉयल 32mo। मूल्य ts।
फ़्लेचर (श्रीमती) श्रीमती फ़्लेचर का जीवन। रेव्ह.
हेनरी मूर द्वारा। चित्र सहित, क्राउन 8vo। मूल्य 3s. 6d.
सस्ता संस्करण। रॉयल 32mo, मूल्य 1s, जॉर्ज (ई.) एलिज़ाबेथ जॉर्ज के संस्मरण। रेव्ह.
हेनरी जे. पिकॉट, बी.ए. द्वारा। चित्र सहित। क्राउन 8vo। मूल्य 2s. 6d.
ग्रिम्शॉ (डब्ल्यू.), हावर्थ के पादरी। रेव्ह. आर.
स्पेंस हार्डी द्वारा। चित्र सहित। क्राउन 8vo। मूल्य 3s।
हेसल (एलिज़ा) सच्ची नारीत्व; अथवा सुश्री एलिज़ा हेसल के स्मृति-लेख। रेव्ह. जोशुआ प्रीस्टली द्वारा। क्राउन 8yo। चित्र सहित। मूल्य 2s, 6d.; सुनहरे किनारे, 3s।
हंट (जे.) फ़िजी के नरभक्षियों के बीच मिशनरी जॉन हंट का जीवन। रेव्ह. जॉर्ज स्ट्रिंगर रोव द्वारा। फ़ूल्सकैप 8vc..
चित्र और अन्य सचित्र रेखांकनों सहित। मूल्य 2s, 6d.; नरम कपड़े की जिल्द, 1s. 6d.
जैक्सन (टी.) आरम्भिक मेथोडिस्ट प्रचारकों के जीवन-वृत्तान्त। मुख्यतः स्वयं उनके द्वारा लिखित, रेव्ह.
थॉमस जैक्सन द्वारा सम्पादित, एक परिचयात्मक निबन्ध सहित। पुस्तकालय संस्करण, छह खंड। क्राउन 8vo। मूल्य rss।
सस्ता संस्करण, छह खंड। फ़ूल्सकैप 8vo। मूल्य gs।
वेस्लियन कॉन्फ़्रेंस कार्यालय। 7
'जैक्सन (टी.) मेरे अपने जीवन और समय की स्मृतियाँ।
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क्राउन 8vo। मूल्य ss। :
मैकओवन (पी.) परमेश्वर का जन; अथवा रेव्ह. पीटर मैकओवन के संस्मरण में दर्शाया गया विधान और अनुग्रह। रेव्ह. जॉन मैकओवन द्वारा। क्राउन 8vo। मूल्य ss।
मैक्सवेल (लेडी)। डार्सी लेडी मैक्सवेल का जीवन। रेव्ह. विलियम एथर्टन द्वारा। उनकी डायरी और पत्राचार के चुने हुए अंशों सहित। क्राउन 8vo। मूल्य 3s. 6d.
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नेल्सन (जे.) श्री जॉन नेल्सन की डायरी। रॉयल 18mo। मूल्य 1s. 6d. सस्ता संस्करण। रॉयल 32mo। मूल्य rod।
न्यूटन (आर.) रेव्ह. रॉबर्ट न्यूटन, डी.डी. का जीवन।
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सस्ता संस्करण। रॉयल 32mo। मूल्य 1s. 6d.
ऊज़्ली (गिडियन)। गिडियन ऊज़्ली का जीवन। रेव्ह. विलियम आर्थर, एम.ए. द्वारा। सातवाँ हज़ार। क्राउन 8vo., चित्र सहित। मूल्य 3s. 6d. वृक्ष-संगमरमरी बछड़े की खाल की जिल्द, सुनहरे किनारे। मूल्य 1os, 6d.
पॉवेल (वॉल्टर)। पूर्ण व्यवसायी पुरुष। वॉल्टर पॉवेल, लंदन और मेलबर्न के व्यापारी का संस्मरण। रेव्ह. बी.
ग्रेगरी द्वारा। क्राउन 8vo., चित्र सहित। मूल्य 3s. 6d.
प्रीस्टली (एम. ए.) मेरी ऐन प्रीस्टली के स्मृति-लेख, रेव्ह. जोशुआ प्रीस्टली की पत्नी। उनके पति द्वारा, फ़ूल्सकैप 8vo, चित्र सहित। नरम कपड़े की जिल्द, मूल्य 1s. 3d.; कपड़े की जिल्द, सुनहरे अक्षर, मूल्य 1s. 6d.
रिचर्डसन (सी.) किसान प्रचारक: श्री
चार्ल्स रिचर्डसन का संस्मरण, रेव्ह. जे. ई. कोल्सन द्वारा। रॉयल 32mo। मूल्य 1s.; सुनहरे किनारे, 1s. 4d.
रॉजर्स (श्रीमती)। श्रीमती हेस्टर ऐन रॉजर्स का अनुभव और आत्मिक पत्र। 18mo। सुनहरे किनारे। मूल्य 1s. 6d.
सस्ता संस्करण। रॉयल 32mo। मूल्य 1od।
रॉजर्स (श्रीमती)। श्रीमती हेस्टर ऐन रॉजर्स का अनुभव, पत्र और डायरी। रॉयल 18mo। सुनहरे किनारे। मूल्य 3s. 6d.
शॉ (बर्नबास)। दक्षिण अफ़्रीका में उनके जीवन और परिश्रम की कहानी। रेव्ह. विलियम मॉइस्टर द्वारा। क्राउन 8vo, चित्र और सचित्र रेखांकनों सहित। मूल्य 3s. 6d.
शॉ (डब्ल्यू.) रेव्ह. विलियम शॉ, दक्षिण अफ़्रीका में वेस्लियन मिशनों के भूतपूर्व महा-अधीक्षक, के जीवन और परिश्रम के स्मृति-लेख। उनके सबसे पुराने जीवित मित्र द्वारा। क्राउन 8vo।
चित्र सहित। मूल्य 6s. 6d. सस्ता संस्करण, क्राउन 8vo। मूल्य 2s. 6d.
3 के प्रकाशन 'शॉ (श्रीमती) दीर्घायु और शान्ति: सेंट ऑस्टेल की श्रीमती एलिज़ाबेथ शॉ के स्मृति-लेख। रेव्ह. रॉबर्ट सी. बैरैट द्वारा
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शिलिंगटन (टी. ए.) मसीही पूर्णता: पोर्टाडाउन के जे.पी. थॉमस एवरेल शिलिंगटन का स्मृति-रेखाचित्र। रेव्ह. जॉन ड्वायर द्वारा, जो 'कोमल हाथों के लिए मसीही कार्य' आदि के लेखक हैं।
श्रूज़बरी (जे. बी.) जोसेफ़ बी. श्रूज़बरी (ब्रैडफ़ोर्ड, यॉर्कशायर के भूतपूर्व चिकित्सा-छात्र और वेस्लियन स्थानीय प्रचारक) के जीवन, अनुभव और चरित्र में महिमान्वित मसीह। उनके पिता द्वारा लिखित।
रॉयल 32mo। मूल्य 1s.; सुनहरे किनारे, 1s. 4d.
स्मिथ (जे.) रेव्ह. जॉन स्मिथ के जीवन, चरित्र और परिश्रम के संस्मरण। रेव्ह. आर. ट्रेफ़्री, जूनियर द्वारा। रेव्ह. डॉ. डिक्सन के परिचयात्मक निबन्ध सहित। रॉयल18mo। सुनहरे किनारे। मूल्य 3s।
परिचयात्मक निबन्ध के बिना सस्ता संस्करण। मूल्य rs।
स्टोनर (डी.) रेव्ह. डेविड स्टोनर के संस्मरण। रेव्ह.
डॉ. हाना और श्री विलियम डॉसन द्वारा। चित्र सहित। रॉयल 18mo।
सुनहरे किनारे। मूल्य 2s. 6d. सस्ता संस्करण। रॉयल 32mo। मूल्य 1s।
टेलर (एम. सी.) रेव्ह. माइकल सी. टेलर का संस्मरण।
उनके पत्राचार के अंशों सहित। रेव्ह. बी. हेलियर द्वारा। क्राउन 8vo। मूल्य 3s. 6d.
थ्रेलफ़ॉल (डब्ल्यू.) रेव्ह. डब्ल्यू. थ्रेलफ़ॉल के स्मृति-लेख। रेव्ह. सैमुएल ब्रॉडबेंट द्वारा, 18mo। चित्र सहित। मूल्य 1s. 6d.
टोज़ (डब्ल्यू.) रेव्ह. विलियम टोज़ के स्मृति-लेख।
एक मित्र द्वारा संकलित। रेव्ह. विलियम आर्थर, एम.ए. की भूमिका सहित, क्राउन 8vo। मूल्य 3s. 6d.
ट्रेफ़्री (आर.) रेव्ह. आर. ट्रेफ़्री, जूनियर के संस्मरण।
उपदेशों की रूपरेखाओं, निबन्धों और कविता से युक्त चुने हुए अवशेष सहित। उनके पिता, रेव्ह. रिचर्ड ट्रेफ़्री द्वारा। चित्र सहित। tzmo। मूल्य 4s. 6d.
टकर (श्रीमती जे.) श्रीमती जेन टकर का संस्मरण, रेव्ह. चार्ल्स टकर की पत्नी, जो कुछ समय हाबाई और टोंगा में मिशनरी रहे। श्रीमती जी. एफ़. व्हाइट द्वारा, रेव्ह. एच. डब्ल्यू. विलियम्स, डी.डी. द्वारा सम्पादित। क्राउन
टर्नर, जेम्स; अथवा जनसमूह तक कैसे पहुँचें। ई. द्वारा।
मैकहार्डी, क्राउन 8vo। मूल्य 3s।
वेज़ी (टी.) रेव्ह. थॉमस वेज़ी का जीवन। उनकी विधवा द्वारा। क्राउन 8vo। चित्र सहित। मूल्य as. 6d.
वॉडी (एस. डी.) रेव्ह. सैमुएल डी. वॉडी, डी.डी. का जीवन। उनकी सबसे छोटी पुत्री द्वारा, क्राउन 8vo., दो चित्रों सहित, मूल्य ss।
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वॉटसन (आर.) रेव्ह. रिचर्ड वॉटसन के जीवन और लेखन के संस्मरण। रेव्ह. थॉमस जैक्सन द्वारा। चित्र सहित।
, रॉयल 18mo, मूल्य 3s. 6d. 8vo। मूल्य 6s।
वेस्ली (सी.) रेव्ह. चार्ल्स वेस्ली का जीवन।
जिसमें उनकी कविता की समीक्षा; मेथोडिस्ट मत के उदय और प्रगति के रेखाचित्र; तथा समकालीन घटनाओं और व्यक्तियों की सूचनाएँ सम्मिलित हैं। रेव्ह. थॉमस जैक्सन द्वारा। चित्र सहित। क्राउन 8vo। मूल्य 3s. 6d.
वेस्ली (सी.) रेव्ह. चार्ल्स वेस्ली की डायरी।
उनके पत्राचार और कविता के चुने हुए अंशों तथा रेव्ह. थॉमस जैक्सन की भूमिका सहित। दो खंड। रॉयल18mo। मूल्य 7s।
वेस्ली (जे.) रेव्ह. जॉन वेस्ली का जीवन। रेव्ह. रिचर्ड वॉटसन द्वारा। चित्र सहित। क्राउन 8vo। मूल्य 3s. éd.
सस्ता संस्करण। रॉयल 32mo। मूल्य 1s. 4d.
वेस्ली (जे.) उनका जीवन और उनका कार्य। रेव्ह. एम.
लेलिएव्र द्वारा। रेव्ह. ए. जे. फ़्रेंच द्वारा अनूदित। चित्र सहित। क्राउन 8vo। मूल्य 3s।
वेस्ली (जे.) जीवित वेस्ली, जैसा वह अपनी युवावस्था और प्रौढ़ावस्था में था। रेव्ह. जेम्स एच. राइस, डी.डी., वेस्लियन ट्रेनिंग कॉलेज, वेस्टमिंस्टर के प्रधानाचार्य द्वारा, क्राउन 8vo, मूल्य 3s।
वेस्ली (जे.) मेथोडिस्ट मत के पिता: रेव्ह. जॉन वेस्ली, ए.एम. का जीवन। श्रीमती कॉसेट द्वारा। द्वितीय संस्करण, विस्तृत। फ़ूल्सकैप 8vo। पैंतालीस चित्र। मूल्य 1s. 6d.
वेस्ली (जे.) रेव्ह. जॉन वेस्ली की डायरियाँ।
चार खंड। क्राउन 8vo। मूल्य 10s।
वेस्ट (एफ़. ए.) रेव्ह. फ़्रांसिस ए. वेस्ट के स्मृति-लेख।
उनके उपदेशों और व्याख्यानों का एक चयन। उनके एक पुत्र द्वारा जीवनी-सम्बन्धी रेखाचित्र और रेव्ह. बी.
ग्रेगरी की व्यक्तिगत स्मृतियों सहित। क्राउन 8vo। मूल्य 4s।
व्हार्टन (एच.) रेव्ह. हेनरी व्हार्टन के जीवन और वेस्ट इंडीज़, गोल्ड कोस्ट और अशान्ती में मिशनरी परिश्रम की कहानी। रेव्ह. डब्ल्यू. मॉइस्टर द्वारा। क्राउन 8vo। चित्र और ' सचित्र रेखांकनों सहित। मूल्य 3s. 6d.
वुड (जे.) रेव्ह. जोसेफ़ वुड का जीवन। उनकी डायरी के अंशों सहित। रेव्ह. एच. डब्ल्यू. विलियम्स द्वारा। चित्र सहित।
क्राउन 8vo। मूल्य 3s. ?
वेस्ली (रेव्ह. जॉन और चार्ल्स) की काव्य रचनाएँ: एक नया और सम्पूर्ण संस्करण। मूल प्रतियों से पुनर्मुद्रित, लेखकों के अन्तिम संशोधनों सहित; साथ ही चार्ल्स
वेस्ली की पहले अप्रकाशित कविताएँ। रेव्ह.
जॉर्ज ऑस्बोर्न, डी.डी. द्वारा संकलित और व्यवस्थित। तेरह खंड। क्राउन 8vo। आधा मोरक्को चमड़ा, सुनहरे किनारे, मूल्य £3 18s।
10 के प्रकाशन रोमन कैथोलिक मत।
इलियट (सी.) रोमन कैथोलिक मत का चित्रण, रोम की कलीसिया के प्रामाणिक और स्वीकृत मानकों से लिया गया; जिसमें उसके विशिष्ट सिद्धान्तों, नैतिकता और प्रथाओं का वर्णन, विस्तृत विवेचन और खण्डन किया गया है। रेव्ह. चार्ल्स इलियट, डी.डी. द्वारा। परिशिष्ट सहित नया संस्करण; जो पोप पायस नवम के पोपत्व-काल में पोपतन्त्र में हुए कुछ परिवर्तनों की व्याख्या है। विलियम हैरिस रूल,
डी.डी. द्वारा। मूल्य 12s. 6d.; आधी मोरक्को जिल्द, 17s. 6d.
परिशिष्ट अलग से भी बिकता है, मूल्य 2s. 6d.
रूल (डब्ल्यू. एच.) धर्माधिकरण (इन्क्विज़िशन) का इतिहास, बारहवीं शताब्दी में उसकी स्थापना से उन्नीसवीं शताब्दी में उसके अन्त तक। रेव्ह. डब्ल्यू. एच. रूल, डी.डी. द्वारा। चित्रों सहित। दो खंड, 8vo। मूल्य rss।
रूल (डब्ल्यू. एच.) सुधार आन्दोलन के शहीद: सुधार आन्दोलन के उदय से उन्नीसवीं शताब्दी तक के शहादतों, अंगीकारों और कष्टों का इतिहास। रेव्ह. डब्ल्यू. एच. रूल, डी.डी. द्वारा। 8vo। मूल्य 8s।
रॉबिन्सन (ई. जे.) यीशु की माता, पोप-सम्मत मरियम नहीं। रेव्ह. ई. जे. रॉबिन्सन द्वारा। क्राउन 8vo। मूल्य 6s।
सन्त पतरस के रोम आने के विषय में 9 और roth फ़रवरी, 1872 की सन्ध्याओं को रोम में कैथोलिक पादरियों और सुसमाचारवादी सेवकों के बीच हुई चर्चा का प्रामाणिक विवरण। रेव्ह. विलियम आर्थर, एम.ए. द्वारा अनूदित। कागज़ का आवरण, क्राउन 8vo.,
मूल्य 6d.; कपड़े की जिल्द, मूल्य rs।
पियर्स (विलियम)। वेस्लियन मेथोडिस्टों के कलीसियाई सिद्धान्त और शासन-पद्धति। जिसमें 1774 से 1872 तक उनके नियमों और विनियमों का पूर्ण संग्रह सम्मिलित है। रेव्ह. डॉ. जॉन्सन द्वारा संशोधित।
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क्रिस्टोफ़र्स (एस. डब्ल्यू.) मेथोडिस्ट मत के उद्देश्य और सफलता के सम्बन्ध में क्लास मीटिंगें। रेव्ह. एस. डब्ल्यू. क्रिस्टोफ़र्स द्वारा।
रिग (जे. एच.) वेस्लियन मेथोडिस्ट मत की संगठनात्मक व्यवस्था, उसके कलीसियाई और आत्मिक पहलुओं में। जेम्स एच. रिग,
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रिग (जे. एच.) जॉन वेस्ली का कलीसियाई चरित्र, और वेस्लियन मेथोडिस्ट मत का इंग्लैंड की कलीसिया से सम्बन्ध। जेम्स
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मेथोडिस्ट पारिवारिक पुस्तकालय: आत्मिक जीवन को बढ़ावा देने के लिए रचित मानक जीवनी-सम्बन्धी तथा अन्य ग्रन्थ। बीस खंड।
रॉयल 32mo, मूल्य 21s.; अथवा सुन्दर डिब्बे में, 28s, सुनहरे किनारे, 27s, 6d.; अथवा सुन्दर डिब्बे में, 35s।
वेस्लियन कॉन्फ़्रेंस कार्यालय। Ir iltiesteatei Boas for Sefoal utd Haine [अस्पष्ट मूल पाठ], ——+ee—_____ मूल्य पाँच शिलिंग।
मेथोडिस्ट मत का इतिहास, उसके उद्गम से शताब्दी वर्ष तक। एबेल स्टीवन्स, एल.एल.डी. द्वारा। तीन खंड, क्राउन 8vo., चित्रों सहित। प्रत्येक का मूल्य 5s।
कल्पना-रहित रोमांच; अथवा एक वृद्ध मिशनरी के संग्रह से रेखाचित्र। रेव्ह. हेनरी बलेबी द्वारा, जो 'दासत्व की मृत्यु-यातनाएँ' आदि, आदि के लेखक हैं। क्राउन 8vo। आठ पृष्ठ-आकार के चित्र।
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बाइबिल का प्राणिविज्ञान। हार्लैंड कॉलिन्स द्वारा। रेव्ह. डब्ल्यू. एफ़. मोल्टन, डी.डी. की भूमिका सहित। इम्पीरियल i16mo। 126 चित्र।
मिशनरी किस्से, रेखाचित्र, तथ्य और घटनाएँ, जो अन्यजातियों की दशा और संसार के विभिन्न भागों में सुसमाचार के प्रभावों से सम्बन्धित हैं। रेव्ह. विलियम मॉइस्टर द्वारा। क्राउन,
8vo। आठ पृष्ठ-आकार के चित्र। '
उत्तरी ज्योतियाँ; अथवा उन्नीस
आधुनिक स्कॉटिश महापुरुषों के कलम और पेंसिल से बने रेखाचित्र। रेव्ह. जे. मैरैट द्वारा। क्राउन 8vo। चित्र और सचित्र रेखांकन।
मूल्य तीन शिलिंग और छह पेंस।
'पर्वत और बाढ़ की भूमि': स्कॉटलैंड के दृश्य और प्राकृतिक शोभा का चित्रण। रेव्ह. जेबेज़ मैरैट द्वारा। इम्पीरियल 16mo, मानचित्र और छिहत्तर चित्र, विक्लिफ़ से वेस्ली तक: ब्रिटेन में कलीसिया के वीर और शहीद। इम्पीरियल16mo। चौबीस चित्र और चालीस अन्य सचित्र रेखांकन। .
कैपस्टन केबिन के इतिवृत्त; अथवा बच्चों का समय। जे. जैक्सन रे द्वारा। इम्पीरियल r6mo। अट्ठाईस चित्र।
गिडियन ऊज़्ली का जीवन। रेव्ह. विलियम आर्थर, एम.ए. द्वारा। सातवाँ हज़ार। क्राउन 8vo, चित्र सहित।
मिशनरी कहानियाँ, वृत्तान्त, दृश्य और घटनाएँ, जो अन्यजाति देशों में सुसमाचार के प्रसार के सम्बन्ध में परमेश्वर के विधान और अनुग्रह को दर्शाती हैं। रेव्ह. डब्ल्यू. मॉइस्टर द्वारा,
क्राउन 8vo। आठ पृष्ठ-आकार के चित्र। ; रसोईघर में धूप; अथवा दासियों के लिए अध्याय।
रेव्ह. बी. स्मिथ द्वारा, जो 'चढ़ाई' आदि के लेखक हैं। चौथा हज़ार।
क्राउन 8vo। अनेक चित्र।
मार्ग-चिह्न: राजकीय अधिकार से राजा के
राजमार्ग पर स्थापित। एक सौ पवित्रशास्त्रीय नीतिवचन, व्याख्या और उदाहरणों सहित।
क्राउन 8vo। आठ पृष्ठ-आकार की उत्कीर्ण आकृतियाँ।
पुनः जड़े रत्न; अथवा वेस्लियन धर्मप्रश्नोत्तरियाँ, उपमाओं और कथाओं द्वारा समझाई गईं। क्राउन 8vo।
उप-राजत्व; अथवा राजा के लिए धारण किया गया और राजा द्वारा समृद्ध किया गया एक राजकीय क्षेत्र, क्राउन 8vo। बारह पृष्ठ-आकार के चित्र।
12 के प्रकाशन मूल्य तीन शिलिंग।
"भारत की झलकियाँ और मिशन-जीवन। श्रीमती हचियन द्वारा।
क्राउन 8vo, आठ पृष्ठ-आकार के चित्र। (कपड़े की जिल्द, सुनहरे किनारे।
मूल्य दो शिलिंग और छह पेंस, 4A एक प्रतिज्ञा जिसने स्वयं को छुड़ा लिया। सार्सन द्वारा, जो 'अन्धी ऑलिव' आदि के लेखक हैं। क्राउन 8vo। अनेक चित्र, कपड़े की जिल्द, सुनहरे किनारे, "प्रायद्वीपीय युद्ध के एक अनुभवी सैनिक की कहानी: 43वीं
लाइट इन्फ़ैन्ट्री का सार्जेंट, प्रायद्वीपीय युद्ध के दौरान। क्राउन 8vo। अनेक चित्र, 'धार्मिकता के सूर्य की किरणें। रेव्ह.
रिचर्ड न्यूटन, डी.डी. द्वारा। क्राउन 8vo। ग्यारह पृष्ठ-आकार के चित्र। उत्तम कपड़े की जिल्द। सुनहरे किनारे।
उष्णकटिबन्ध में; अथवा वेस्ट इंडीज़ के जीवन के दृश्य और घटनाएँ। रेव्ह. जेबेज़ मैरैट द्वारा। क्राउन 8vo., चित्र आदि सहित।
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'रोम की हमारी यात्रा, मार्ग के टिप्पणियों सहित। रेव्ह.
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मार्क गाय पियर्स की रचनाएँ।
छह खंड, क्राउन 8vo., कपड़े की जिल्द, सुनहरे किनारे। प्रत्येक का मूल्य 2s. 6d.
1.—डैनियल क्वॉर्म और उसके धार्मिक विचार। प्रथम श्रृंखला, उनचासवाँ हज़ार।
2.—डैनियल क्वॉर्म और उसके धार्मिक विचार। द्वितीय श्रृंखला। आठवाँ हज़ार, 3.—बच्चों के लिए उपदेश। तेरहवाँ हज़ार।
4.—मिस्टर हॉर्न और उनके मित्र; अथवा देनेवाले और देना।
5.—छोटी कहानियाँ: और अन्य निबन्ध। तीसरा हज़ार।
6.—'सद्भावना': क्रिसमस की कहानियों का एक संग्रह, चौथा हज़ार, मूल्य दो शिलिंग।
बाइबिल की भूमियों में घर और गृहस्थ जीवन। जे. आर. एस. क्लिफ़ोर्ड द्वारा। | प्रतिष्ठित मसीही परोपकारी। संक्षिप्त जीवनी-सम्बन्धी फ़ूल्सकैप 8vo। अस्सी चित्र। रेखाचित्र, विशेष रूप से युवाओं के लिए रचित। 'छिपे हुए खज़ाने, और उनकी खोज: बाइबिल कक्षाओं में दिए गए व्याख्यान। रेव्ह. जॉर्ज मौण्डर द्वारा। फ़ूल्सकैप रेव्ह. जॉन
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हार्टली द्वारा। फ़ूल्सकैप 8vo, मुखपृष्ठ-चित्र सहित। | मीनार, मन्दिर और गिरजा: लन्दन की मीनार (टॉवर), सेंट पॉल कैथेड्रल और वेस्टमिंस्टर एबे के ऐतिहासिक और जीवनी-सम्बन्धी सम्बन्ध। रेव्ह. जे. डब्ल्यू. थॉमस द्वारा। फ़ूल्सकैप 8vo, महान प्रेरित; अथवा
सन्त पौलुस के जीवन के चित्र। रेव्ह. जेबेज़ मैरैट द्वारा। फ़ूल्सकैप चित्र। 8vo। अट्ठाईस चित्र और मानचित्र।
मार्टिन लूथर, जर्मनी का भविष्यद्वक्ता | युवावस्था के दायित्व। बड़ी संख्या में उपयुक्त तथ्यों और किस्सों द्वारा समझाए गए। रेव्ह. जे. शॉ बैंक्स द्वारा। फ़ूल्सकैप 8vo। तेरह फ़ूल्सकैप
चित्र, 8vo। चित्रों सहित।
वेस्लियन कॉन्फ़्रेंस कार्यालय।
मूल्य दो शिलिंग—जारी।
पीटर पेंजेली; अथवा 'घड़ी की तरह खरा | मेरा अश्वेत शिक्षक, और अन्य कहानियाँ। जे. जैक्सन रेव्ह.
हेनरी बलेबी द्वारा। फ़ूल्सकैप 8vo। पाँच रे द्वारा। क्राउन 8yvo। चालीस चित्र। चित्र।
नारी वीरता और पश्चिमी जगत की कहानियाँ। | चुराए गए बच्चे: एक रेव्ह.
हेनरी बलेबी द्वारा, फ़ूल्सकैप 8vo। चार प्रामाणिक स्रोतों से संकलित वृत्तान्त, रेव्ह. हेनरी बलेबी द्वारा, चित्र।
'दासत्व की मृत्यु-यातनाएँ' के लेखक | समुद्री डाकुओं का पकड़ा जाना: पश्चिमी समुद्रों की अन्य कहानियों सहित।
फ़ूल्सकैप 8vo., सुनहरे किनारे, रेव्ह. हेनरी बलेबी द्वारा। फ़ूल्सकैप चित्रों सहित। 8vo। चार चित्र।
'नन्ही रे' श्रृंखला। रॉयल 16mo, नन्ही रे और उसके मित्र। क्लिफ़्टन परिवार और उनके खेल-घंटे। रूथ इलियट द्वारा। पाँच पृष्ठ-आकार के चित्र। श्रीमती कॉसलेट द्वारा। सात पृष्ठ-आकार के चित्र।
धन-सम्पत्ति का राजमार्ग।
ई. एच. मिलर द्वारा। पन्द्रह चित्र। नेड का आदर्श-वाक्य; अथवा थोड़ा-थोड़ा करके। 'विश्वासयोग्य और सच्चा', 'टोनी स्टार की विरासत' के लेखक द्वारा। नाश्ते का आधा घंटा।
धार्मिक और नैतिक विषयों पर सम्बोधन। छह पृष्ठ-आकार के चित्र।
रेव्ह. एच. आर. बर्टन द्वारा।
पच्चीस चित्र। भालुओं की माँद। ई. एच.
युवाओं के लिए प्राकृतिक इतिहास के संकलित अंश। मिलर द्वारा। छह पृष्ठ-आकार के चित्र। प्रचुर चित्रों सहित। रिवरसाइड फ़ार्म में एक वर्ष।
टूटे उद्देश्य; अथवा आनेवाला ई. एच. मिलर द्वारा। रॉयल 16mo।
सुखद समय। लिली मॉन्टफ़ोर्ट द्वारा। छह पृष्ठ-आकार के चित्र।
पाँच पृष्ठ-आकार के चित्र। लिलीवेल क्लब और उसके चाय के प्याले का इतिहास; कुम्हार की कला के कार्य। एडविन ए. जॉनसन, वर्णनात्मक वृत्तान्त सहित। रेव्ह. जी. आर. डी.डी. द्वारा। रॉयल 16mo। सात पृष्ठ-आकार के
वेजवुड द्वारा। प्रचुर चित्रों सहित। चित्र। i *'नन्हा डोनाल्ड' श्रृंखला।
एक वृद्ध नाविक की कहानी: और इच्छुक कानों के लिए कहानियाँ। साधारण दैनिक जीवन के अन्य रेखाचित्र। लड़कियों के लिए। टी. एस. ई. द्वारा।
पथरीला मार्ग: तीस हज़ार पाउंड की एक कहानी:
साधारण जीवन। और दैनिक जीवन के अन्य रेखाचित्र।
इच्छुक कानों के लिए कहानियाँ। 'नन्हा डोनाल्ड': 'पथरीला मार्ग' का उत्तरभाग। लड़कों के लिए। टी. एस. ई. द्वारा।
फ़ूल्सकैप 8 0, श्रृंखला।
तीन भारतीय वीर: मिशनरी; सैनिक; राजनेता। रेव्ह. जे. शॉ बैंक्स द्वारा। द्वितीय संस्करण। अनेक चित्र।
डेविड लिविंगस्टन, मिशनरी और अन्वेषक। रेव्ह. जे. मैरैट द्वारा। पन्द्रह पृष्ठ-आकार के चित्र।
कोलम्बस; अथवा अमेरिका की खोज। जॉर्ज क्यूबिट द्वारा। सत्रह चित्र।
कोर्टेस; अथवा मेक्सिको की खोज और विजय। जॉर्ज क्यूबिट द्वारा। नौ चित्र। श्रृंखला। i4 के प्रकाशन मूल्य अठारह पेंस। फ़ूल्सकैप 8v0।
पिज़ारो; अथवा पेरू की खोज और विजय। जॉर्ज क्यूबिट द्वारा। नौ चित्र।
ग्रेनाडा; अथवा स्पेन से मूरों का निष्कासन। जॉर्ज क्यूबिट द्वारा। सात चित्र।
जेम्स मॉन्टगोमरी, मसीही कवि और परोपकारी।
रेव्ह. जे. मैरैट द्वारा, ग्यारह चित्र।
मेथोडिस्ट मत के पिता। रेव्ह. जॉन वेस्ली, ए.एम. के जीवन और परिश्रम का रेखाचित्र। युवाओं के लिए। श्रीमती कॉसलेट द्वारा।
द्वितीय संस्करण, विस्तृत। पैंतालीस चित्र।
नए प्रकाश में पुराने सत्य। युवाओं के लिए पवित्रशास्त्र के सत्य के उदाहरण। डब्ल्यू. एच. एस. द्वारा। अनेक चित्र।
'चेकर गली: सफल मसीही कार्य की एक कहानी।
रेव्ह. फ़्रेडरिक डब्ल्यू. ब्रिग्स, एम.ए. द्वारा। ग्यारहवाँ संस्करण।
अंग्रेज़ की बाइबिल: उसे यह कैसे मिली, और वह इसे क्यों सँजोए रखता है। रेव्ह. जेम्स बॉयज़ द्वारा। तेरह चित्रों सहित।
घर: और घर को सुखी बनाने का मार्ग। रेव्ह.
डेविड हे द्वारा। फ़ूल्सकैप 8vo.. मुखपृष्ठ-चित्र सहित।
हेलेन लेस्ली; अथवा सत्य और भ्रम। एडेलीन द्वारा। फ़ूल्सकैप 8vo। मुखपृष्ठ-चित्र सहित।
मूल्य एक शिलिंग और चार पेंस, 'नाविक की पुत्री। पढ़े-लिखों और अनपढ़ों के लिए एक वृत्तान्त। रेव्ह. आल्फ़्रेड बैरेट द्वारा। 18mo। मुखपृष्ठ-चित्र सहित।
रॉयल 16mo, कपड़े की जिल्द, सुनहरे अक्षर।
प्राचीन मिस्र: उसके स्मारक, आराधना और लोग। सुदूर उत्तर की झलकियाँ: आइसलैंड, लैपलैंड और ग्रीनलैंड पर अध्याय। एस. ई. स्कोर्स द्वारा। रेव्ह. एडवर्ड लाइटवुड द्वारा।
छब्बीस चित्र। 'चौबीस [अस्पष्ट मूल पाठ] अंग्रेज़ी इतिहास के रेखाचित्र। रेव्ह. जेम्स येम्स द्वारा। रेलमार्ग के अग्रदूत; अथवा स्टीफ़ेन्सन परिवार की कहानी,
प्रथम श्रृंखला। नॉर्मन पिता और पुत्र। एच. सी. ट्रोन द्वारा।
विजेता से हेनरी चतुर्थ तक। बीस-पन्द्रह चित्र।
तीन चित्र। राजसी शिष्या: लुईस, प्रशिया की रानी। सी. आर. हर्स्ट द्वारा। 'उत्तम जीवनों से शिक्षाएँ' तथा अन्य कहानियाँ, इकतीस चित्र; छह चित्र। टिनी टिम: लंदन जीवन की एक कहानी, सच्ची घटना पर आधारित। मार्जरी का क्रिसमस बक्सा। रूथ एलियट द्वारा। सात चित्र। फ्रांसिस हॉर्नर द्वारा। बाईस चित्र।
प्रेम और कर्तव्य की कहानियाँ। जॉन ट्रेगेनोवेथ; उसकी छाप। लड़कों और लड़कियों के लिए, इकतीस मार्क गाय पियर्स द्वारा।
चित्र, पच्चीस चित्र।
No Gains without Pains: A Tl Dry" 3} or, aflow.: the True Life for the Boys. By H, C. Farmer's Son became a Captain, Knicut, Six Illustrations, Ten Illustrations, THE WESLEYAN CONFERENCE OFFICE. 15 [अस्पष्ट मूल पाठ]
मूल्य एक शिलिंग—जारी।
दानव, और उनसे कैसे लड़ें। डॉ. रिचर्ड न्यूटन द्वारा। पंद्रह चित्र। अनचाहा शिशु, और उसका क्या हुआ; तथा उत्तम जीवनों की अन्य कहानियाँ, आरम्भिक
घास का फूल (मीडो डेज़ी)। समर्पित। एस. एलेन ग्रेगरी द्वारा। नौ चित्र, लिली मॉन्टफ़ोर्ट द्वारा। अनेक चित्र। जेन हडसन, अमेरिकी
रॉबर्ट डॉसन; या, वीर आत्मा। लड़की। चार पूरे पृष्ठ के चित्र।
चार पूरे पृष्ठ के चित्र। टोकरी में शिशु; या, डैफ़ और उसकी ज़िम्मेदारी। चार टार्नसाइड का सुसमाचारक, पूरे पृष्ठ के चित्र।
एम. ए. एच. द्वारा। आठ चित्र। कीटों के प्रकाश और ध्वनियाँ।
रॉब रैट; बजरा-जीवन की एक कहानी। जे. आर. एस. क्लिफ़ोर्ड द्वारा, 'बाइबल के पशु' आदि के लेखक। मार्क गाय पियर्स द्वारा।
अनेक चित्र; प्रचुर चित्रों सहित।
विलियम द मौन (चुप रहने वाला), ऑरेंज का राजकुमार। एक जीवनी-रेखाचित्र। रेवरेंड जे. डब्ल्यू. थॉमस द्वारा। फूलस्कैप 8वो। चित्र सहित।
लहरों पर जीवन; या, कप्तान जॉर्ज लियोनार्ड की स्मृतियाँ। रेवरेंड ए. लैंगली द्वारा, चित्रों सहित। 18मो। मूल्य नौ पेंस।
इम्पीरियल 32मो, कपड़े की जिल्द, सुसज्जित, 1. अद्भुत दीपक; और 10. हाइनरिख स्टिलिंग के जीवन के अंश। अन्य कहानियाँ। रूथ एलियट द्वारा, पाँच पूरे पृष्ठ के
पाँच चित्र। चित्र।
2. डिक की परेशानियाँ; और उसने उनका कैसे सामना किया। रूथ एलियट द्वारा। छह चित्र। 11. छोटे और बुद्धिमान: चींटियाँ, खरगोश-सदृश चट्टानी जीव (कोनीज़), टिड्डियाँ और मकड़ियाँ। रेवरेंड डब्ल्यू. डब्ल्यू.
3. घास के मैदान में बातचीत; और न्यूटन द्वारा। बारह चित्र। अन्य कहानियाँ। लिली मॉन्टफ़ोर्ट द्वारा। छह चित्र। 12. दाख की बारियों को बिगाड़ना, और भविष्य बताना। रेवरेंड डब्ल्यू.
4. जॉन के शिक्षक; और अन्य डब्ल्यू. न्यूटन द्वारा। आठ चित्र।
कहानियाँ। लिली मॉन्टफ़ोर्ट द्वारा। 13. राजसी तोड़ने वाला, खेल के विषय में, और बीज बोना। छह चित्र।
रेवरेंड डब्ल्यू. डब्ल्यू. न्यूटन द्वारा।
नोरा ग्रेसन का स्वप्न; और छह चित्र। अन्य कहानियाँ। लिली मॉन्टफ़ोर्ट द्वारा। 14. पिता-तुल्य मार्गदर्शक, रोडा, सात चित्र। और आत्मा में आग। रेवरेंड
रोज़ा के क्रिसमस निमंत्रण; डब्ल्यू. डब्ल्यू. न्यूटन द्वारा। बारह चित्र। और अन्य कहानियाँ। लिली
मॉन्टफ़ोर्ट द्वारा। छह चित्र। 15. छोटे लोगों के लिए संक्षिप्त उपदेश। रैग्ड जिम का अंतिम गीत; और रेवरेंड टी. चैम्पनेस द्वारा। अन्य गाथागीत। एडवर्ड बेली द्वारा। बीस चित्र।
आठ चित्र। 16. मेरी पाठशाला के रेखाचित्र। स्मृति से चित्र। एक वेस्लियन पादरी की पुत्री द्वारा।
एडलीन द्वारा। नौ चित्र। चार चित्र।
17. मैरी एश्टन; अस्सी वर्ष पहले की एक सच्ची कहानी। 'मारिया' डाक-नौका के जहाज़ के टूटने की कहानी, 'द लैंकेस्टर्स एंड उनके मित्र' की लेखिका श्रीमती हिंक्समैन के संस्मरण सहित; एकमात्र जीवित बचे व्यक्ति द्वारा। सचित्र। चार चित्र।
उपर्युक्त पुस्तकें नरम कपड़े की जिल्द में आठ पेंस में बिकती हैं। 16 वेस्लियन कॉन्फ़्रेंस कार्यालय के प्रकाशन। मूल्य आठ पेंस।
सत्रहों नौ पेंस की पुस्तकें (पृष्ठ 15 देखें) नरम कपड़े की जिल्द में प्रत्येक आठ पेंस में बिकती हैं।
बहुमूल्य बीज, और नन्हे बोने वाले। 18मो। चार चित्र। सुनहरे किनारे।
जेनी: दक्षिण अफ़्रीका का एक फूल। रेवरेंड आर. लैम्प्लो द्वारा। 18मो। चित्र सहित।
फ्रेडी क्लेमिन्सन: एक धन्य जीवन की संक्षिप्त कहानी।
रेवरेंड टी. मैक्कुलॉक द्वारा। 18मो। चित्र आदि सहित।
शीघ्र और सुरक्षित: युवाओं के लिए एक संदेश। रेवरेंड
Stupson Crump [अस्पष्ट मूल पाठ], 18मो। - चित्र।
मसीही धर्म की तुलना रोमन कैथोलिक मत से: एक व्याख्यान।
ज्येष्ठ पुत्र की मृत्यु। सीज़र मालन द्वारा।
एमिली के पाठ; या, एक युवा मसीही के जीवन के अध्याय।
युवाओं के लिए अंश।
यूसुफ़ का इतिहास। एग्नेस बुल्मर द्वारा।
जोनाथन सेविल का जीवन। रेवरेंड एफ. ए. वेस्ट द्वारा।
रविवार-पाठशाला के विद्यार्थी की मार्गदर्शिका। रेवरेंड जे. टी. बार द्वारा।
कपड़े की जिल्द, सुसज्जित, और रंगीन मुखपृष्ठ-चित्र सहित। 1. घूँसे के बदले चुम्बन: शांति और युद्ध की कहानियाँ। 13. छोटी काली मुर्गी। 14. मार्था का भजन।
2. लुई हेनरी; या, बहन की 15. नेटी मैथिसन।
प्रतिज्ञा। 16. भेस में राजकुमार।
3. दानव, और उनसे कैसे लड़ें। 17. मैदानों पर बच्चे।
डॉ. रिचर्ड 18. टोकरी में शिशु।
न्यूटन द्वारा। 19. रिचर्ड हार्वे; या, दृढ़ता से डटे रहना। 4. रॉबर्ट डॉसन; या, वीर
आत्मा। 20. किट्टी किंग: छोटी लड़कियों के लिए पाठ। 5. जेन हडसन, अमेरिकी
लड़की। 21. नेटी का मिशन।
6. यहूदी जुड़वाँ। आंटी 22. नन्हीं मार्जरी।
फ्रेंडली द्वारा। 23. मार्जरी का शहरी घर। 7. पशुओं की पुस्तक। पैंतीस चित्र। 24. सड़क बुहारने वाला। 25. रोज़ी कॉनरॉय के पाठ।
8. पक्षियों की पुस्तक। चालीस चित्र। 26. नेड डोलन की अटारी। 27. नन्हा हेनरी और उसका कहार। 9. आत्मा में अभिमानी। 10. अल्थिया नॉर्टन। 28. नन्हा लकड़हारा और उसका कुत्ता सीज़र।
11. गर्ट्रूड का बाइबल-पाठ। 29. जॉनी: छोटे लड़कों के लिए पाठ। 12. मरुभूमि में गुलाब।
उपर्युक्त पुस्तकें सजावटी कड़े आवरण में प्रत्येक चार पेंस में बिकती हैं।
हैटी और नैन्सी; या, सनातन प्रेम। चित्रों सहित। 18मो। कपड़े की जिल्द, सुनहरे अक्षर, 6पे। (लड़कियों के लिए पुस्तक।) माइकल फ़ैराडे। डब्ल्यू. आर. बर्जेस द्वारा। चित्र सहित, 18मो। कपड़े की जिल्द, सुनहरे अक्षर, 6पे। (लड़कों के लिए पुस्तक।)
वेस्लियन कॉन्फ़्रेंस कार्यालय, 2, कैसल-स्ट्रीट, सिटी-रोड; और 66, पैटरनॉस्टर-रो।
PeeTCTa 111689 {3K SNAS Wi S \- 4/3 THEOLOGY LIBRARY {#7¢ SCHOOL OF THEOLOGY AT CLAREMONT CLAREMONT, CALIFORNIA BY PRINTED IM U.S.A. 23-262-002 lll G&S [अस्पष्ट मूल पाठ]
