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मि. मूडी का धार्मिक कार्य अमेरिका से बाहर भी फैला। वे दूसरे वक्ताओं और कार्यकर्ताओं की कद्र करते थे। उन्होंने अंग्रेज़ों की कार्य-पद्धतियों के विषय में बहुत कुछ सुना था, और उन्हें चार्ल्स एच. स्पर्जन और जॉर्ज मुलर से मिलने की भी बड़ी लालसा थी। श्रीमती मूडी के स्वास्थ्य को लाभ पहुँचाने तथा इन दो महान अगुवों से परिचय करने और उनकी पद्धतियाँ सीखने के दोहरे उद्देश्य से वे 1867 में इंग्लैंड गए। कुछ उन थोड़े-से लोगों को छोड़कर जो अमेरिका हो आए थे, इंग्लैंड में उन्हें कोई नहीं जानता था। इंग्लैंड पहुँचने पर वे लंदन सण्डे स्कूल यूनियन के सचिव एफ़. जे. हार्टली के साथ एक्सेटर हॉल में एक वार्षिकोत्सव सभा में गए, जहाँ उन्हें बोलने के लिए आमन्त्रित किया गया। ऐसे अवसर पर यह प्रथा थी कि वक्ता को बोलने का अधिकार देने के लिए उसे किसी प्रस्ताव के साथ, उसके प्रस्तावक या समर्थक के रूप में, जोड़ा जाए। इसलिए मि. मूडी को यह काम सौंपा गया कि वे उस शाम के सभापति के प्रति धन्यवाद का प्रस्ताव रखें, जो उस अवसर पर सुप्रसिद्ध अर्ल ऑफ़ शैफ़्ट्सबरी थे। उचित समय पर उपसभापति ने घोषणा की कि वे अपने “अमेरिकी चचेरे भाई, शिकागो के रेवरेंड मि. मूडी” का स्वागत करते हुए प्रसन्न हैं, “जो अब उन माननीय अर्ल के प्रति धन्यवाद का प्रस्ताव रखेंगे जिन्होंने इस अवसर पर सभापतित्व किया है।”
मि. मूडी इस साहसिक घोषणा के साथ श्रोताओं के सामने अचानक प्रकट हुए: “‘सभापति’ महोदय ने दो भूलें की हैं। पहली तो यह कि मैं ‘रेवरेंड’ मि. मूडी बिल्कुल नहीं हूँ। मैं तो केवल साधारण ड्वाइट एल. मूडी हूँ, एक सब्त-स्कूल कार्यकर्ता। और फिर, मैं आपका ‘अमेरिकी चचेरा भाई’ नहीं हूँ! परमेश्वर के अनुग्रह से मैं आपका भाई हूँ, जो आपके साथ मिलकर अपने पिता के उस कार्य में रुचि रखता है जो वह अपनी सन्तानों के लिए करता है। और अब, ‘माननीय अर्ल’ को आज शाम हमारे सभापति होने के लिए धन्यवाद देने के इस प्रस्ताव के विषय में। मुझे समझ नहीं आता कि हम उन्हें क्यों धन्यवाद दें, जबकि उन्हें भी हमें उतना ही धन्यवाद देना चाहिए। जब एक बार लोगों ने इलिनॉय में एक सभा की अध्यक्षता करने के लिए हमारे मि. लिंकन को धन्यवाद देना चाहा, तो उन्होंने उसे रोक दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपना कर्तव्य निभाने का प्रयास किया है, और उन लोगों ने अपना कर्तव्य निभाने का प्रयास किया है। उनके विचार में सब ओर से हिसाब बराबर था।” इस आरम्भ ने मि. मूडी के श्रोताओं की साँसें सचमुच थाम दीं। ऐसी बातों को किसी भी मापदंड से नहीं आँका जा सकता था। उसका नयापन मनोहर था, और उस समय से मि. मूडी ने अपने अंग्रेज़ श्रोताओं का मन जीत लिया। वे मि. मुलर और ब्रिस्टल में उनके कार्य को देखने गए, जहाँ मुलर के अनाथालयों में 1,150 बच्चे थे, जिनका पालन-पोषण धन की किसी गारंटी के बिना और किसी से माँगे बिना होता था। मि. मूडी ने मुलर के विषय में कहा, “वे परमेश्वर को पुकारते हैं, और परमेश्वर उनके पास पैसा भेज देता है। यह देखना अद्भुत है कि परमेश्वर प्रार्थना करनेवाले मनुष्य के द्वारा क्या कुछ कर सकता है।” वे मि. स्पर्जन से भी मिले, और उनके यहाँ थोड़े समय के लिए गए। वे वाई.एम.सी.ए. की शाखाओं में गए और उन्हें सम्बोधित किया, और उनकी सहायता करने के साथ-साथ उन्होंने बहुत सी जानकारी भी प्राप्त की, जिसका अमेरिका लौटने पर उन्होंने अच्छा उपयोग किया। अंग्रेज़ लोग मि. और श्रीमती मूडी की कितनी कद्र करते थे, यह उस विदाई-भोज से प्रकट होता है जो अमेरिका लौटते समय उन्हें दिया गया। एक वक्ता ने कहा: “परदेश के तट पर आनेवाले बहुत कम लोगों ने इतने थोड़े समय में इतने अधिक हृदयों में ऐसा प्रिय स्थान बनाया है, या एक अनजाने नाम के साथ और बिना किसी सिफ़ारिशी पत्र के
मसीही भाइयों की एक बड़ी भीड़ के स्नेह में इतनी गहराई तक अपनी जगह बनाई है, जितना मि. मूडी ने किया। इससे पहले बहुत कम लोगों ने उनका नाम सुना था, परन्तु उनसे बात करके या उन्हें यीशु के विषय में बोलते सुनकर, उन्होंने उन्हें अपना भरपूर प्रेम देने के लिए किसी और प्रमाणपत्र की माँग नहीं की।” बाद के वर्षों में मि. मूडी ने इस यात्रा और अपने प्रयासों की चर्चा करते हुए कहा कि वे कुछ हद तक “ज्ञान रहित जोश” का प्रदर्शन थे; परन्तु, जैसा वे यह भी जोड़ते थे, “ऐसी दशा में पड़े मनुष्य के लिए उस मनुष्य से कहीं अधिक आशा है जिसके पास ज्ञान तो था पर जोश नहीं।” इंग्लैंड की इस पहली यात्रा के दौरान मूडी आयरलैंड के डबलिन भी गए, जहाँ वे “बाल-प्रचारक” हेनरी मूरहाउस से मिले। मूरहाउस बाद में अमेरिका आए और उन्होंने शिकागो में मि. मूडी की कलीसिया में प्रचार किया। मि. मूडी 1872 में थोड़े समय के लिए फिर से इंग्लैंड और आयरलैंड गए। 1873 में वे अधिक लम्बे समय के लिए विदेश गए, और इंग्लैंड के अनेक भागों में उन्होंने व्यापक कार्य किया तथा स्कॉटलैंड और आयरलैंड भी गए। वे अपने निजी खर्च पर मि. सैंकी को अपने साथ ले गए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने कार्य का विस्तार किया; मि. मूडी ने इंग्लैंड, आयरलैंड और स्कॉटलैंड के अनेक नगरों और कस्बों में प्रचार किया और मि. सैंकी ने गाया। बहुत पूर्वाग्रह था, मुख्यतः इस कारण कि उनका किसी भी रूप में राजकीय चर्च (एस्टैब्लिश्ड चर्च) से कोई सम्बन्ध नहीं था। मि. मूडी वास्तव में किसी सम्प्रदाय से बँधे हुए नहीं थे। परन्तु उस पूर्वाग्रह के बावजूद उन्होंने शीघ्र ही दसियों हज़ार हृदयों में अपना स्थान बना लिया, और उनके संयुक्त परिश्रम के द्वारा बहुतों ने मन फिराया। उनके एक सहानुभूतिपूर्ण आलोचक ने उस समय के उनके प्रचार के विषय में इस प्रकार लिखा:
एग्ज़िबिशन हॉल, डबलिन, आयरलैंड
“मि. मूडी प्रचार करते हैं, परन्तु ‘प्रचार’ शब्द का परम्परागत प्रयोग मि. मूडी की बातचीत का कोई अनुमान नहीं करा पाता। वे एक व्यवसायी व्यक्ति हैं और वे काम की बात करते हैं; उनका बोला हुआ हर शब्द किसी निश्चित काम की ओर ले जाने के लिए होता है; यदि वह ऐसा नहीं करता, तो वे उसे व्यर्थ गया समझते हैं। अधिकांश लोग विश्वास करते हैं कि कब्र के पार भी एक जीवन है और उद्धार पाने का कोई मार्ग है और सदा के लिए नाश होने का भी कोई मार्ग है; और आख़िरकार यह काफ़ी महत्वपूर्ण काम की बात है। मि. मूडी तुरन्त इस विषय के मर्म तक पहुँच जाते हैं और उसे व्यवसायिक ढंग से रखते हैं। वे कहते हैं कि उनके पास स्वयं उद्धार है, वास्तव में परमेश्वर के पुत्र के द्वारा वे सदा के लिए उद्धार पा चुके हैं, और यह कि हर वह प्राणी जो इसे चाहता है, उसे भी यह मिल सकता है, अभी इसी समय, और वह इसे जान सकता है, और इसे लेकर घर जा सकता है, और जितना चाहे उतना आनन्दित रह सकता है।” इंग्लैंड की इसी यात्रा के दौरान मूडी और सैंकी ने पहली बार अपने गीतों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना आरम्भ किया। ये पुस्तकें उनकी सब सभाओं में प्रयोग की जाती थीं, और इनकी लाखों प्रतियाँ बिकीं। गीत-पुस्तकों को प्रकाशित करने में मि. मूडी की नीयत को लेकर कुछ अन्यायपूर्ण आलोचना उठी; कुछ लोगों का कहना था कि वे यह काम उस मुनाफ़े के लिए कर रहे हैं जो इससे उन्हें और मि. सैंकी को मिलता है। इस पर उन्होंने प्रकाशकों को निर्देश दिया कि पुस्तकों की सारी रॉयल्टी और मुनाफ़ा ग्रेट ब्रिटेन के प्रमुख व्यवसायियों की एक समिति को सौंप दिया जाए, जो उस धन का जैसा उचित समझे वैसा प्रबन्ध करे। इस प्रकार अंग्रेज़ी और अमेरिकी समितियों के द्वारा दस लाख डॉलर से अधिक बाँटे जा चुके हैं, और अनेक धार्मिक और शैक्षिक संस्थाओं को उससे लाभ पहुँचा है। मि. मूडी ने निजी रूप से कुछ भी नहीं लिया। यह मि. मूडी की उदारता और निःस्वार्थता का एक अद्भुत प्रमाण था। मि. मूडी आलोचना के प्रति बहुत संवेदनशील थे, और चाहे वह अन्यायपूर्ण और निराधार ही क्यों न हो, वे प्रायः कोई न कोई उपाय निकाल लेते थे जिससे वह आलोचना बूमरैंग बनकर उनके आलोचकों के ही सिर पर आ गिरती थी और उनकी नीयत की शुद्धता को प्रमाणित कर देती थी।
