डी. एल. मूडी — आत्माओं को जीतनेवाला · अध्याय 8

शिकागो की आग में सब कुछ भस्म

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सन् 1871 डी. एल. मूडी के जीवन में एक निर्णायक समय था। उन्होंने स्वयं में परमेश्वर के साथ अधिक सामर्थ्य की अपनी निजी आवश्यकता को अनुभव किया। यह भावना तब और भी तीव्र हो गई जब दो भक्त स्त्रियाँ उनकी सभाओं में आईं और उन्होंने उनसे कहा कि वे उनके लिए प्रार्थना कर रही हैं। उन्होंने उनसे कहा, “आप लोगों के लिए प्रार्थना क्यों नहीं करतीं?” उन्होंने उत्तर दिया, “क्योंकि आपको आत्मा की सामर्थ्य की आवश्यकता है।” उन्होंने उन्हें अपने पास बुलाया कि वे उनके साथ और उनके लिए प्रार्थना करें, ताकि उन्हें यह आत्मिक सामर्थ्य प्राप्त हो। यह भूख बढ़ती गई। उन्होंने कहा, “मुझे सचमुच ऐसा लगा कि यदि मुझे सेवा के लिए यह सामर्थ्य न मिल सके तो मैं जीना नहीं चाहता।” जब वे इसी मानसिक और आत्मिक दशा में थे, तभी शिकागो राख का ढेर बन गया। वह भयंकर आग 8 अक्तूबर 1871 को आरम्भ हुई और उसने फ़ारवेल हॉल और इलिनॉय स्ट्रीट चर्च, दोनों का अस्तित्व मिटा दिया। वे फ़ारवेल हॉल में बाइबल के पात्रों पर उपदेशों की एक शृंखला दे रहे थे। उस रात कचहरी का घंटा आग की चेतावनी बजा रहा था, परन्तु मूडी ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। लोग आग का घंटा अक्सर सुनने के आदी थे, और उसके बजने से वे अधिक विचलित नहीं होते थे। उन्होंने अपना उपदेश पूरा किया। सभा से घर लौटते समय मि. मूडी ने लपटों की चकाचौंध देखी, और वे समझ गए कि इसका अर्थ शिकागो का विनाश है। लगभग एक बजे फ़ारवेल हॉल जल गया; शीघ्र ही उनकी कलीसिया का भवन भी ढह गया।

सब कुछ तितर-बितर हो गया। कुछ समय तक यह समझा गया कि आग पर काबू पा लिया गया है, परन्तु शीघ्र ही चेतावनी दी गई कि आग नदी पार कर चुकी है और तेज़ी से आगे बढ़ रही है। अब इतनी देर हो चुकी थी कि हाथों में उठाकर ले जाई जा सकनेवाली वस्तुओं से अधिक कुछ बचाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। एक पड़ोसी मि. मूडी के दोनों बच्चों को अपनी पहले से ही भरी हुई गाड़ी में लेकर उत्तर की ओर भाग निकला। चाँदी की कुछ वस्तुएँ और मित्रता की कुछ बहुमूल्य निशानियाँ जल्दी-जल्दी एक बच्चा-गाड़ी में रख दी गईं। परन्तु एक वस्तु ऐसी थी जिसे बचाने पर श्रीमती मूडी का मन लगा हुआ था—चित्रकार हीली द्वारा बनाया गया मि. मूडी का एक चित्र। यह चित्र श्रीमती मूडी को उसी समय भेंट किया गया था जब उन्हें पूरी तरह सुसज्जित उनका घर निःशुल्क पट्टे पर दिया गया था। घर की सब वस्तुओं में से श्रीमती मूडी इस चित्र को सबसे अधिक मूल्यवान समझती थीं। एक अजनबी ने उसे दीवार से उतारने में सहायता की। मि. मूडी को पुकारकर उनकी पत्नी ने आग्रह किया कि वे उसे उनके लिए बचा लें। परन्तु उन्होंने इन्कार कर दिया। कैनवस को जल्दी से सोने के फ़्रेम में से ठोककर निकाला गया और श्रीमती मूडी स्वयं उसे लेकर चलीं। इस प्रयास की कीमत के रूप में उन्हें एक काली पड़ी आँख और छिला हुआ चेहरा चुकाना पड़ा, क्योंकि सड़क पर पहुँचते ही उस चित्र को उठानेवाली और बड़े वेग से चलती हुई भयंकर आँधी के बीच उस अनमोल वस्तु पर अधिकार के लिए लगातार संघर्ष होता रहा। प्रेम जीत गया, परन्तु निरन्तर लड़ाई के बाद ही। जब वे सुरक्षित हो गए तो मि. मूडी ने कहा, “कितनी हास्यास्पद बात होती यदि मैं अपना ही चित्र उठाकर ले जाता! मान लो, सड़क पर मुझे ऐसे मित्र मिलते जो हमारी ही जैसी दुर्दशा में होते, और वे कहते, ‘नमस्ते, मूडी, हमें खुशी है कि तुम बच निकले; यह क्या है जिसे तुमने बचाया है और इतने प्रेम से कलेजे से लगाए हुए हो?’ तब क्या यह उत्तर देना अच्छा लगता, ‘ओह, मेरे पास मेरा अपना चित्र है?’ ” जैसे ही उनकी पत्नी और परिवार मित्रों के पास सुरक्षित हो गए, मि. मूडी राहत-कार्य में जुट गए। वे बेघर लोगों के लिए, और एक नए कलीसिया-भवन के लिए भी धन इकट्ठा करने पूर्व की ओर गए। फ़िलाडेल्फ़िया के जॉर्ज एच. स्टुअर्ट और जॉन वानामेकर ने, तथा अन्य मित्रों ने,

तीन हज़ार डॉलर इकट्ठे किए, और पुरानी कलीसिया के स्थान से कुछ ही दूरी पर एक भूखंड पर 75 गुणा 100 फ़ुट का एक अस्थायी भवन तुरन्त खड़ा किया गया। 24 दिसम्बर 1871 को, आग लगने के ठीक दो महीने और पन्द्रह दिन बाद, नॉर्थ साइड टैबरनेकल के नाम से जाना जानेवाला यह भवन समर्पित किया गया। परन्तु पूर्व की उस यात्रा से मि. मूडी के जीवन में इससे भी बड़ी आशीषें आईं। अधिक आत्मिक सामर्थ्य की भूख अब भी उन पर छाई हुई थी। आग ने उस लालसा को मिटाया नहीं था। मि. मूडी ने कहा, “माँगने के काम में मेरा मन नहीं लगता था। मैं अपील नहीं कर पाता था। मैं हर समय परमेश्वर से पुकारता रहता था कि वह मुझे अपने आत्मा से भर दे। फिर, एक दिन, न्यूयॉर्क नगर में—ओह, कैसा दिन था वह! मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता, मैं उसकी चर्चा बहुत कम करता हूँ, वह एक ऐसा अनुभव है जो इतना पवित्र है कि उसका नाम लेना भी कठिन है। पौलुस को एक ऐसा अनुभव हुआ था जिसकी चर्चा उसने चौदह वर्ष तक कभी नहीं की। मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि परमेश्वर ने अपने आप को मुझ पर प्रकट किया, और मुझे उसके प्रेम का ऐसा अनुभव हुआ कि मुझे उससे विनती करनी पड़ी कि वह अपना हाथ रोक ले। मैं फिर से प्रचार करने लगा। उपदेश भिन्न नहीं थे; मैंने कोई नए सत्य प्रस्तुत नहीं किए, फिर भी सैकड़ों लोगों ने मन फिराया। यदि आप मुझे सारा संसार भी दे दें, तो भी मैं उस धन्य अनुभव से पहले की दशा में फिर से लौटाया जाना स्वीकार नहीं करूँगा—वह सब तराज़ू पर की धूलि के समान होगा।” शिकागो लौटने पर नए टैबरनेकल में उनका मिशन-कार्य सफलतापूर्वक चलता रहा। जागृति की आग फिर से सुलगाई गई और बहुत समय तक तेज़ी से धधकती रही। एक वर्ष के भीतर एक स्थायी भवन बनाने के लिए कदम उठाए गए। चारों ओर से दान आने लगे, और सण्डे स्कूल के हज़ारों बच्चों ने ईंटें खरीदने के लिए पाँच-पाँच सेंट दिए। अन्ततः एक स्थायी कलीसिया-भवन को पूरा करने के साधन जुटा लिए गए, जो शिकागो एवेन्यू चर्च, या मूडी चर्च के नाम से जाना जाने लगा। आग के पाँच वर्ष बाद, विदेश से लौटने पर, मि. मूडी ने अपनी पुरानी कलीसिया, शिकागो एवेन्यू चर्च को, जिससे वे

इतना गहरा प्रेम करते थे, एक पत्र लिखा, जिसके कुछ अंश उनके हृदय और मन के भीतर चल रहे विचारों की कुछ झलक दिखाते हैं। उन्होंने लिखा: “किसी भी कलीसिया के लिए आशीष पाने का एकमात्र मार्ग यह है कि वह सब मतभेद, सब आलोचना, सब ठंडापन और दलबन्दी की भावना को अलग रख दे, और एक मन होकर प्रभु के पास आए; और जब कलीसिया 1 कुरिन्थियों के तेरहवें अध्याय की सामर्थ्य में जीवन बिताएगी तो मुझे निश्चय है कि परमेश्वर के झुंड में प्रतिदिन बहुत से लोग जोड़े जाएँगे। मैं चाहूँगा कि गुरुवार को कलीसिया मिलकर घुटनों के बल उस अध्याय को पढ़े और, ऐसा करते हुए, परमेश्वर से प्रार्थना करे कि वह उसे सामर्थ्य के साथ लागू करे। इन दिनों परमेश्वर से मेरी सच्ची प्रार्थना यह रही है कि वह मुझे और अधिक लोगों को बचाने में सहायता दे, और मैं आपको बता नहीं सकता कि उसने कितने अद्भुत रीति से मेरी प्रार्थना का उत्तर दिया है। ऐसा लगता है मानो आप सब मुझे पहले से कहीं अधिक निकट और प्रिय हैं। मेरा हृदय आपकी ओर खिंचता है, और मैं लालायित हूँ कि आप सबको लगातार परमेश्वर के पास आते हुए देखूँ, ताकि प्रेम की नई आपूर्ति पाएँ।”

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