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“मेरे जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष तब हुआ जब मैंने व्यापार छोड़ा,” श्री मूडी ने कहा। 1860 में वे शिकागो में ब्यूएल, हिल एण्ड ग्रेंजर के यहाँ काम कर रहे थे, और उस एक लाख डॉलर की ओर, जो उनकी आरम्भिक महत्वाकांक्षा थी, सात हज़ार डॉलर बचा चुके थे। एक ही वर्ष में उन्होंने अपने नियमित वेतन के अतिरिक्त विशेष कमीशनों से पाँच हज़ार डॉलर से अधिक कमाए, और वे देश के धनी लोगों में से एक बनने की सीधी राह पर थे। अब तक उन्होंने अपनी धार्मिक गतिविधियों को केवल संख्या की दृष्टि से देखा था। यदि उनके सण्डे स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या एक हज़ार से कम हो जाती तो वे चिन्तित हो जाते, और यदि वह बारह या पन्द्रह सौ तक पहुँच जाती तो वे फूले न समाते। परन्तु उनमें से किसी का भी उद्धार नहीं हो रहा था, और उन्हें बचाने का कोई प्रयत्न भी नहीं किया जा रहा था। अब उनकी आत्मा में फिर से जागृति हुई, और वे सक्रिय धार्मिक काम के लिए अपनी बुलाहट अनुभव करने लगे। अन्त में, तीन महीने के कठोर संघर्ष के बाद, धन की सारी महत्वाकांक्षाएँ बलिदान कर दी गईं, और उन्होंने अपनी योजनाओं को अपने स्वर्गीय पिता की योजनाओं के आगे समर्पित कर दिया। लगभग इसी समय चंचल लड़कियों की एक कक्षा के शिक्षक, जिनमें से किसी का भी उद्धार नहीं हुआ था, एक रविवार बीमार पड़ गए। उस कक्षा को पढ़ाने का यह काम उन शिक्षक के अनुरोध पर हाथ में लिया गया, जो क्षय रोग की अन्तिम अवस्था में थे और जिन्हें विवश होकर
शिकागो की जलवायु छोड़नी पड़ रही थी। उनके जाने से पहले मूडी और वे शिक्षक कक्षा की एक सदस्या से मिलने गए। मूडी से प्रार्थना करने को कहा गया। उन्होंने कहा, “मैंने अपने जीवन में कभी ऐसा नहीं किया था कि परमेश्वर से प्रार्थना करूँ कि वह किसी युवती का वहीं और उसी समय मन-परिवर्तन कर दे। परन्तु हमने प्रार्थना की, और परमेश्वर ने हमारी प्रार्थना का उत्तर दिया।” इस प्रयत्न और आगे की भेंटों के फलस्वरूप उस कक्षा की हर एक सदस्या का उद्धार हुआ। श्री मूडी के विश्वास सिद्धान्त की दृष्टि से खरे थे, परन्तु उनके आलोचक कभी-कभी उनके दृष्टिकोण पर प्रश्न उठाते थे। बाद के वर्षों में, जब वे लंदन में थे, एक पादरी ने श्री मूडी से अपना विश्वास-वचन छपवाने को कहा। “मेरा विश्वास-वचन छपा हुआ है,” श्री मूडी ने उत्तर दिया। “कहाँ?” सब ओर से प्रश्न हुआ, और बहुत-से लोगों ने अपनी नोटबुकों की ओर हाथ बढ़ाया। “यशायाह के तिरपनवें अध्याय में,” उत्तर मिला। इसके बाद उनके खरेपन पर फिर कभी प्रश्न नहीं उठाया गया। श्री मूडी विधिवत अभिषिक्त पादरी नहीं थे, और उन्होंने सदा अभिषेक लेने से इनकार किया क्योंकि उन्होंने आवश्यक सेमिनरी पाठ्यक्रम पूरा नहीं किया था। परन्तु इससे उनके प्रचार में कोई बाधा नहीं पड़ी। उन्हें परमेश्वर की ओर से सीधी बुलाहट मिली थी; उन्हें अपने मिशन और सन्देश पर विश्वास था। चौबीस वर्ष की आयु में वे पाँच हज़ार डॉलर वार्षिक का वेतन छोड़ चुके थे; उनके पीछे कोई “बोर्ड” नहीं था और न ही किसी सहायता की गारंटी थी। ठीक इसी समय मिस एम्मा सी. रेवेल ने, जिनसे वे दो वर्ष पहले मिले थे और जो अब सत्रह वर्ष की युवती थीं, उनके साथ अपना भाग्य जोड़ने का वचन दिया—एक ऐसा वचन जो दो वर्ष बाद 1862 में उनके विवाह के द्वारा पूरा हुआ। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं को छोड़कर उनके उस काम में कूद पड़ने को, जिसे उनके मित्र “पागलपन भरा उद्यम” कहते थे, लगभग उनके सभी मित्रों ने बुरी दृष्टि से देखा। परन्तु इस युवती को उन पर और उनके भविष्य पर विश्वास था। उनकी शिक्षा उनसे अच्छी थी और वे हर उद्यम में उनकी सबसे योग्य सहायिका बनीं। कोई परीक्षा इतनी कठिन, कोई बोझ इतना
भारी न था कि वे उनमें ऐसी संगिनी न पाएँ जिसकी संगति से उन्हें सबसे गहरी सहानुभूति मिलती थी। उनके विश्वास और आत्म-त्याग पर भरोसा किया जा सकता था। अनेक प्रकार से वे उनके उतावले स्वभाव में सन्तुलन लाती थीं, और वे अक्सर स्वीकार करते थे कि उनकी समझदारी से उन्हें कितनी सहायता मिली। श्री मूडी खुलकर स्वीकार करते थे कि उनसे भूलें होती थीं और कभी-कभी वे निराश भी हो जाते थे। अपनी एक घातक भूल के विषय में उन्होंने कहा, “यह शिकागो में, गरमी के दिनों की बात है। हम सोच रहे थे कि ऐसे मौसम में लोगों की रुचि बनाए रखने के लिए किस विषय पर बोलें। मैंने ‘बाइबल के पात्र’ विषय चुना।” उन्होंने आदम, हनोक और दूसरों के विषय में उपदेशों की एक श्रृंखला दी। पाँचवें रविवार की रात, मसीह के अध्ययन पर, उन्होंने इस पद से प्रचार किया, “फिर यीशु को, जो मसीह कहलाता है, क्या करूँ?” प्रचार के बाद उन्होंने श्रोताओं से—जो उस नगर में उनके द्वारा सम्बोधित सबसे बड़ी सभा थी—कहा: “मैं चाहता हूँ कि आप इस पद को अपने साथ घर ले जाएँ और सप्ताह भर इस पर मन में विचार करें, और अगले विश्रामदिन हम कलवरी और क्रूस पर आएँगे, और निर्णय करेंगे कि नासरत के यीशु का क्या करें।” “कितनी बड़ी भूल!” उन्होंने बाद में कहा; “तब से मैंने कभी किसी सभा को अपने उद्धार के विषय में सोचने के लिए एक सप्ताह देने का साहस नहीं किया। यदि वे नाश हो गए, तो वे न्याय के दिन मेरे विरुद्ध उठ खड़े हो सकते हैं। मुझे श्री सैंकी का गाना याद है, और जब वे उस विनती-भरे पद पर पहुँचे तो उनकी आवाज़ कैसे गूँज उठी थी: “ ‘आज उद्धारकर्ता बुलाता है, शरण के लिए भागो! न्याय का तूफ़ान टूट पड़ रहा है, और मृत्यु निकट है!’ “उस मण्डली को मैंने फिर कभी नहीं देखा। आज भी मुझे आँसू रोकने में बड़ी कठिनाई हो रही है... मैं अपना यह दाहिना हाथ कटवा देना पसन्द करूँगा, पर अब किसी सभा को यह निर्णय करने के लिए एक सप्ताह नहीं दूँगा कि वह
यीशु का क्या करे। मेरी अक्सर आलोचना हुई है; लोगों ने कहा है, ‘मूडी, ऐसा लगता है कि आप लोगों से एकदम निर्णय करवाने का प्रयत्न करते हैं: आप उन्हें विचार करने का समय क्यों नहीं देते?’ “मैंने परमेश्वर से कई बार माँगा है कि वह मुझे क्षमा करे कि उस रात मैंने लोगों से कहा कि इस पर सोचने के लिए एक सप्ताह ले लो, और यदि वह मेरा जीवन बनाए रखे, तो मैं फिर कभी ऐसा नहीं करूँगा।” यह घटना शिकागो की बड़ी आग के दिन, 8 अक्टूबर 1871 को हुई। निराशा के विषय में श्री मूडी एक ऐसा अनुभव बताते हैं जो हम सबके लिए विशेष रूप से सहायक होना चाहिए। एक रविवार उन्होंने प्रचार किया था और कोई परिणाम दिखाई नहीं दिया। सोमवार को वे बहुत उदास थे। वे अपने अध्ययन-कक्ष में बैठे अपनी प्रतीत होनेवाली असफलता पर कुढ़ रहे थे, तभी बाइबल-कक्षा का एक युवा शिक्षक भीतर आया। “कल आपका दिन कैसा रहा?” उसने श्री मूडी से पूछा। “बहुत खराब; मुझे कोई सफलता नहीं मिली, और मैं बहुत उदास हूँ। तुम्हारा कैसा रहा?” “ओह, बहुत बढ़िया। इससे अच्छा दिन मेरा कभी नहीं रहा।” “तुम्हारा विषय क्या था?” “मैंने नूह के जीवन और चरित्र पर पढ़ाया। क्या आपने कभी नूह पर प्रचार किया है? क्या आपने कभी उसके जीवन का अध्ययन किया है?” “नहीं तो,” मूडी ने उत्तर दिया। “यदि आपने पहले कभी उसका अध्ययन नहीं किया, तो अब कर लेना अच्छा होगा,” उसने कहा। “इससे आपका भला होगा। नूह एक अद्भुत चरित्र था।” जब वह युवक चला गया तो श्री मूडी ने अपनी बाइबल निकाली और नूह के विषय में जो कुछ मिल सका सब पढ़ डाला। यहाँ एक ऐसा मनुष्य था जो एक सौ बीस वर्ष तक परिश्रम करता रहा और उसे अपने परिवार के बाहर एक भी
व्यक्ति का मन फिराते देखने को नहीं मिला। फिर भी वह निराश नहीं हुआ। उन्होंने अपनी बाइबल बन्द की; बादल छँट चुका था। वे दोपहर की एक प्रार्थना-सभा के लिए निकल पड़े। सभा में पहुँचे उन्हें थोड़ी ही देर हुई थी कि उनके पीछे बैठा एक व्यक्ति खड़ा हुआ और उसने विनती की कि उसके लिए प्रार्थना की जाए ताकि वह मसीही बन जाए। मूडी ने सोचा, “न जाने नूह यह सुनने के लिए क्या कुछ न दे देता! उसने कभी एक भी प्राणी को परमेश्वर से दया माँगते नहीं सुना, फिर भी वह निराश नहीं हुआ।” श्री मूडी ने कहा, “उस दिन से मैंने अपनी वीणा को मजनू वृक्षों पर कभी नहीं टाँगा। आइए, हम परमेश्वर से माँगें कि वह बादलों और अविश्वास को दूर कर दे; आइए, हम सन्देह के गढ़ से बाहर निकलें; आइए, हम अपने परमेश्वर के नाम में साहस के साथ आगे बढ़ें और परिणाम देखने की आशा रखें।”
