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जैसे-जैसे मूडी बड़े होते गए, उनके मन में परिवर्तन की महत्वाकांक्षा जागी। उनकी सीमाएँ बहुत संकरी थीं। वे शिक्षा का मूल्य समझने लगे, और स्कूल में पढ़ने के अवसरों का पूरा लाभ उठाने का प्रयत्न करने लगे। 1854 के वसन्त में एक दिन, जब वे जंगल में लट्ठे काट और ढो रहे थे, उन्होंने अपने भाई एडविन से कहा, “मैं इससे थक गया हूँ! मैं अब और यहाँ नहीं रहूँगा। मैं शहर जा रहा हूँ।” उन्होंने बॉस्टन में अपने मामाओं के यहाँ, जो जूतों का व्यापार करते थे, काम पाने का प्रयत्न किया, परन्तु असफल रहे। फिर वे क्लिंटन, मैसाचुसेट्स गए, जहाँ उनका एक और भाई नौकरी करता था। वहाँ उन्हें उस नगर में प्रकाशित होनेवाले पहले अख़बार के लिए लपेटनों पर पते लिखने का काम मिल गया। परन्तु असन्तुष्ट होकर वे बॉस्टन लौट आए, जहाँ काम ढूँढ़ते हुए उन्होंने घर की याद और कठिनाइयों से भरा समय बिताया। अन्त में उनके मामाओं ने उन्हें अपनी दुकान में इस वचन पर रख लिया कि वे उन्हीं के चुने हुए स्थान पर रहेंगे-खाएँगे, माउंट वर्नन चर्च और उसके सण्डे स्कूल में जाएँगे, और न शराब पिएँगे न जुआ खेलेंगे। उन्होंने यह स्वीकार कर लिया और दुकान के लड़के बन गए। ड्वाइट की महत्वाकांक्षा थी कि वे एक लाख डॉलर कमाएँ और एक सफल व्यापारी बनें। शीघ्र ही, व्यापार के सिद्धान्तों पर लगन से चलने के द्वारा, वे एक विक्रेता के रूप में आगे आ गए, परन्तु इस स्थिति तक पहुँचने से पहले वे बहुत-सी कठिन परिस्थितियों से गुज़रे। वे घर से पाँच डॉलर लेकर निकले थे; शीघ्र ही वे कंगाल हो गए। उन कठिन दिनों
के विषय में उन्होंने कहा: “ऐसा लगता था मानो संसार में सबके लिए जगह थी, पर मेरे लिए नहीं। लगभग दो दिन तक मुझे यह अनुभूति रही कि कोई मुझे नहीं चाहता। वह अनुभूति मुझे फिर कभी नहीं हुई, और मैं फिर कभी उसे नहीं चाहता। वह एक भयानक अनुभूति है। मुझे लगता है कि जब परमेश्वर का पुत्र यहाँ पृथ्वी पर था तब उसकी भी यही अनुभूति रही होगी। लोग उसे नहीं चाहते थे। वह मनुष्यों को बचाने आया था, और वे बचाए जाना नहीं चाहते थे। वह मनुष्यों को ऊपर उठाने आया था, और वे ऊपर उठाए जाना नहीं चाहते थे। इस संसार में उसके लिए कोई जगह नहीं थी, और अब भी उसके लिए कोई जगह नहीं है।” वे दिन में कई बार डाक की खोज में डाकघर जाते थे, यद्यपि वे जानते थे कि नॉर्थफ़ील्ड से दिन में केवल एक ही डाक आती है। अन्त में उन्हें एक पत्र मिला; वह उनकी सबसे छोटी बहन का था। उन्होंने उसे हल्के मन से खोला, यह सोचते हुए कि उसमें घर से कोई शुभ समाचार होगा, परन्तु पूरे पत्र का सार यह था कि उसने सुना है कि बॉस्टन में जेबकतरे हैं, और वह उन्हें उनसे सावधान रहने की चेतावनी दे रही थी। एक कंगाल, बेरोज़गार लड़के को ऐसा लगा कि उसे सबसे पहले कुछ पैसा पाने की सोचनी चाहिए, और तब वह जेबकतरों से चौकस रहने की सोच सकता है। अपने मामाओं के प्रति उनका आरम्भिक रवैया स्वाभिमान का था, और वे इस प्रतीक्षा में थे कि मामा स्वयं उन्हें नौकरी की पेशकश करें। परन्तु अन्त में एक ऐसे संसार में, जिसे उनकी कोई परवाह न थी, बेसहारा भटकने की भयानक अनुभूति के आगे उनका अभिमान टूट गया। इसी समय उनके एक मामा ने उन्हें बिना माँगे यह सलाह दी कि उनकी हठ उनके मार्ग में बड़ी बाधा है और कभी-कभी साहस के समान नम्रता भी आवश्यक होती है। फिर उन्होंने सुझाव दिया कि यदि वे अपने से अधिक बुद्धिमान और बड़े लोगों के अधीन चलने को थोड़ा अधिक तैयार हों, तो दूसरे मामा निःसन्देह उन्हें काम देने को तैयार होंगे। पहले तो ड्वाइट हिचकिचाए, परन्तु अन्त में झुक गए और अपने मामा से उनकी दुकान में जगह माँगी। उनके मामा ने उन्हें काम दिया और साथ में यह अच्छी सलाह भी दी:
“ड्वाइट, मुझे डर है कि यदि तुम यहाँ आओगे तो तुम स्वयं दुकान चलाना चाहोगे। देखो, मेरे यहाँ के लोग अपना काम वैसे ही करना चाहते हैं जैसे मैं चाहता हूँ। यदि तुम यहाँ आकर अपनी भरसक कोशिश करना और ठीक से काम करना चाहते हो, और यदि जब भी तुम्हें कोई बात मालूम न हो तो पूछने को तैयार रहोगे, और यदि तुम गिरजाघर और सण्डे स्कूल जाने का वचन दो, और यदि तुम ऐसी किसी जगह नहीं जाओगे जिसके विषय में तुम नहीं चाहोगे कि तुम्हारी माँ को पता चले, तो हम देखेंगे कि हमारा निभाव कैसे होता है। सोचने के लिए तुम्हारे पास सोमवार तक का समय है।” “मुझे सोमवार तक का समय नहीं चाहिए,” तुरन्त उत्तर मिला। “मैं अभी वचन देता हूँ।” शीघ्र ही स्पष्ट हो गया कि अपनी स्वाभाविक सूझ-बूझ और तेज़ी के कारण वे सबसे अच्छे विक्रेताओं में से एक थे; वे विक्रेताओं के साधारण तरीकों से सन्तुष्ट नहीं थे, बल्कि दरवाज़े के सामने खड़े होकर अपने माल की पुकार लगाते थे और सड़क पर निकलकर उदासीन राहगीरों को मनाते थे कि उन्हें कुछ खरीदना चाहिए। लोगों के अपने पास आने की प्रतीक्षा करने के बजाय अपना माल लोगों तक ले जाने की उनकी बिक्री की यह प्रवृत्ति बाद में सेवकाई में बड़े काम आई, जब वे उन सड़कों और गलियों में गए जहाँ पाप में पड़े मनुष्य इकट्ठे होते हैं, और उन्हें यीशु के पास ले आए। यही उन प्रमुख कारणों में से एक था जिन्होंने डी. एल. मूडी को वैसा सामर्थी प्रचारक बनाया जैसे वे थे। अपने मामा के साथ किए गए अनुबन्ध के अनुसार मूडी माउंट वर्नन कॉन्ग्रिगेशनल चर्च में नियमित रूप से जाने लगे। उनका नाम सण्डे स्कूल के सदस्य के रूप में भी लिखा गया और उन्हें युवकों की एक बाइबल-कक्षा में रखा गया जिसे श्री एडवर्ड किम्बल पढ़ाते थे। आरम्भ से ही उन्होंने बाइबल-अध्ययन में गहरी रुचि ली। अपने आरम्भिक प्रशिक्षण के फलस्वरूप मूडी धार्मिक तो थे, परन्तु उनका कभी नया जन्म नहीं हुआ था। उनके सण्डे स्कूल शिक्षक धीरे-धीरे इस युवा विद्यार्थी को परमेश्वर की उद्धार की योजना के अधिक पूर्ण ज्ञान की ओर ले गए। श्री किम्बल ने युवा मूडी से एक व्यक्तिगत
भेंट के लिए सावधानी और प्रार्थना के साथ योजना बनाई, जो अन्त में उस दुकान में हुई जहाँ मूडी काम करते थे। इसके विषय में श्री किम्बल ने कहा: “मैंने सोचा कि शायद मेरे आने से लड़का लज्जित हो, और जब मैं चला जाऊँ तो दूसरे कर्मचारी पूछें कि मैं कौन था, और उसे अच्छा लड़का बनाने के मेरे प्रयत्नों को लेकर उसे ताने मारें। इसी सोच-विचार में मैं दुकान से आगे निकल गया, और जब मुझे यह पता चला, तो मैंने निश्चय किया कि एकदम धावा बोल दूँ और बात को तुरन्त निपटा दूँ। मैंने मूडी को इमारत के पिछले भाग में जूते लपेटते हुए पाया। मैं सीधे उसके पास गया, और उसके कन्धे पर हाथ रखकर मसीह के लिए ऐसी विनती की जो बाद में मुझे बहुत ही कमज़ोर लगी। मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने कौन-से शब्द कहे, और न ही श्री मूडी बता सके। मैंने बस उसे बताया कि मसीह उससे कितना प्रेम करता है और बदले में मसीह उससे कैसा प्रेम चाहता है। बस इतना ही था। ऐसा लगता था कि वह युवक उस ज्योति के लिए बिलकुल तैयार था जो तब उस पर चमकी, और वहीं, बॉस्टन की उस दुकान के पिछले भाग में, उसने अपने आप को और अपने जीवन को मसीह को सौंप दिया।” श्री किम्बल को तनिक भी पता न था कि अपने व्यक्तिगत प्रयत्नों और सण्डे स्कूल की कक्षा में अपने काम के द्वारा उन्होंने आग में से एक लुकटी निकाली थी और एक ऐसे लड़के की आत्मा के उद्धार का साधन बने थे जो आगे चलकर संसार में बिजली-सी दौड़ा देनेवाला था। जिस क्षण मूडी ने मसीह को ग्रहण किया, उसी क्षण से उनका सारा जीवन बदल गया। बाद में उन्होंने कहा, “अपने मन-परिवर्तन से पहले मैं क्रूस की ओर काम करता था, परन्तु तब से मैं क्रूस से काम करता हूँ; तब मैं उद्धार पाने के लिए काम करता था, अब मैं इसलिए काम करता हूँ क्योंकि मेरा उद्धार हो चुका है।” सत्रह वर्ष बाद श्री किम्बल को अपने ही घराने में आशीष मिली, जब श्री मूडी के प्रयत्नों से श्री किम्बल के पुत्र का उद्धार हुआ। एक सभा के बाद युवा किम्बल ने श्री मूडी को अपना परिचय उनके पुराने बाइबल-कक्षा शिक्षक के पुत्र के रूप में दिया। “क्या! क्या तुम बॉस्टन के श्री एडवर्ड किम्बल के पुत्र हो? तुम्हारा नाम क्या है?” “हेनरी।”
“तुमसे मिलकर मुझे खुशी हुई। हेनरी, क्या तुम मसीही हो?” “नहीं, महोदय, मुझे नहीं लगता कि मैं हूँ।” “तुम्हारी आयु कितनी है?” “मैं सत्रह वर्ष का हूँ।” फिर और बातचीत हुई, और श्री मूडी ने उस युवक से पूछा कि क्या वह मसीही बनना नहीं चाहता, जिस पर उसने उत्तर दिया, “जी हाँ, महोदय, मुझे लगता है कि मैं चाहता हूँ।” कुछ ही मिनटों में उस युवक का पूरी तरह मन-परिवर्तन हो गया।
