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जब श्री मूडी से उनकी वंश-परम्परा के विषय में पूछा गया तो उन्होंने उत्तर दिया: “वंश-परम्परा की चिन्ता मत कीजिए! मैंने एक बार एक ऐसे मनुष्य के विषय में सुना था जिसे अपने परिवार की जड़ें ‘मेफ़्लावर’ तक खोज निकालने की बड़ी लालसा थी, और खोजते-खोजते वह एक घोड़ा-चोर से जा टकराया। किसी मनुष्य की वंश-परम्परा की चिन्ता मत कीजिए!” अपने जन्म के विषय में उन्होंने कहा: “शरीर से मेरा जन्म 1837 में हुआ। आत्मा से मेरा जन्म 1856 में हुआ।” श्री मूडी का जन्म 5 फ़रवरी 1837 को नॉर्थफ़ील्ड, मैसाचुसेट्स में हुआ; 1856 में बॉस्टन, मैसाचुसेट्स में उनका मन-परिवर्तन हुआ; और 22 दिसम्बर 1899 को नॉर्थफ़ील्ड, मैसाचुसेट्स में उनकी मृत्यु हुई। वे नौ बच्चों के परिवार में छठी सन्तान थे, और परिश्रमी, विवेकशील प्यूरिटन वंश से आए थे। हमारे बहुत-से मसीही वीरों के समान श्री मूडी का जन्म और पालन-पोषण भी गरीबी में हुआ। उनके पिता इकतालीस वर्ष की आयु में चल बसे, और विधवा को जीविका के लगभग किसी भी साधन के बिना छोड़ गए, और घर-बार भी गिरवी में फँसा हुआ था। लेनदारों के हाथ जो कुछ लग सका, वे सब ले गए, यहाँ तक कि छप्पर में रखी आग सुलगाने की लकड़ियाँ तक, और विधवा को उसके सात बच्चों के साथ बड़ी तंगी में छोड़ दिया। जलाने की लकड़ी समाप्त हो गई; गरम रहने के लिए बच्चे स्कूल के समय तक बिस्तर में ही पड़े रहते थे। तब श्रीमती मूडी का एक भाई लकड़ी का ऐसा बोझ लेकर उनकी सहायता को आया जो ड्वाइट को अपने जीवन में देखे गए किसी भी बोझ से बड़ा लगा। मामा ने लकड़ी चीरी, और शीघ्र ही उनके यहाँ अच्छी आग जलने लगी। पिता की मृत्यु के बाद जुड़वाँ बच्चों के जन्म से उस
माँ का भारी बोझ और भी बढ़ गया, और उन्हें सलाह दी गई कि वे घर तोड़ दें और बच्चों को पालन-पोषण के लिए अलग-अलग परिवारों में भेज दें। परन्तु इस माँ का सीधा-सादा विश्वास-सूत्र था, “परमेश्वर पर भरोसा रखो।” जीवन के आरम्भ में ही बच्चों ने उस परमेश्वर से प्रेम करना और उससे प्रार्थना करना सीख लिया जो अनाथों और विधवा का बल है। एक बड़े परिवार की सारी देखभाल अकेले उन्हीं पर होने के कारण घर में धार्मिक सिद्धान्तों की शिक्षा तो कम ही दी जाती थी, परन्तु बच्चों को हृदय के सच्चे धर्म की शिक्षा दी गई थी, “पहले परमेश्वर की और उसकी धार्मिकता की खोज करो।” सत्रह वर्ष की आयु में, बॉस्टन में युवकों की एक बाइबल-कक्षा के सदस्य के रूप में, जब ड्वाइट से पवित्रशास्त्र का एक साधारण-सा हवाला ढूँढ़ने को कहा गया, तो वे घबरा गए और लज्जित हुए; फिर भी उन पर हँसनेवाले साथियों में से शायद ही कोई उनसे अधिक दृढ़ता से “शुद्ध भक्ति” में स्थिर था। अठारह वर्ष की आयु तक उनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ था, परन्तु सुसमाचार का निमन्त्रण एक कोमल विवेक और खुले हृदय को दिया गया था, और ड्वाइट परमेश्वर का आदर करने और उसका उद्धार ग्रहण करने के लिए तैयार थे। श्रीमती मूडी कोमल हृदय की थीं। उन्होंने बच्चों को सिखाया कि अपनी थोड़ी-सी पूँजी में से भी देना एक सौभाग्य है। भूखों को कभी खाली हाथ नहीं लौटाया जाता था, और एक बार जब संध्या के भोजन की सामग्री बहुत ही थोड़ी थी, तब बच्चों से मत लिया गया कि क्या वे अपना भोजन एक गरीब भिखारी के साथ बाँटें जिसने सहायता माँगी थी। उन्होंने उसकी सहायता करने के पक्ष में मत दिया और कहा कि उनकी अपनी रोटी के टुकड़े और पतले काट दिए जाएँ। पड़ोसियों के विषय में दोष निकालना या शिकायत करना बिलकुल सहन नहीं किया जाता था; इस प्रकार बच्चों ने उदारता के साथ-साथ स्वावलम्बन भी सीखा। उपेक्षा चाहे कितनी भी अक्षम्य क्यों न हो, परिवार के किसी भी सदस्य के मुँह से शिकायत का एक शब्द भी नहीं सुना जाता था। गिरजाघर जाना अनिवार्य था। लड़के नंगे पाँव जाते थे, अपने जूते और मोज़े हाथों में लिए रहते थे, और जब गिरजाघर दिखाई देने लगता तब उन्हें पहन लेते थे। वे दोपहर का भोजन साथ ले जाते थे और दिन भर गिरजाघर में रहते थे, दो लम्बे उपदेश सुनते थे और बीच में सण्डे स्कूल में उपस्थित होते थे। उस गरीबी के बावजूद जो
सप्ताह भर बच्चों को माँ से अलग रखती थी, वे सब रविवार को घर आ जाते थे, और इस प्रकार माँ ने सात में से एक दिन घर का जीवन और धार्मिक प्रशिक्षण बनाए रखा। बाद के वर्षों में श्री मूडी इन दिनों को कृतज्ञता के साथ याद करते थे, यद्यपि उन्हें विवश होकर गिरजाघर जाना और ऐसे उपदेश सुनने पड़ते थे जिन्हें वे समझ नहीं पाते थे, क्योंकि इसी से उनमें परमेश्वर के भवन में जाने की आदत पक्की हो गई। उन दिनों के विषय में श्री मूडी ने कहा: “मुझे याद है कि विश्रामदिन को गिरजाघर भेजने के लिए मैं अपनी माँ को दोष देता था। एक बार तो प्रचारक को किसी को गैलरी में भेजकर मुझे जगवाना पड़ा। मुझे यह बड़ा कठिन लगता था कि सारे सप्ताह खेत में काम करो, और फिर गिरजाघर जाकर ऐसा उपदेश सुनने को बाध्य हो जिसे मैं समझता भी नहीं था। मैंने सोचा था कि जब मैं घर से दूर चला जाऊँगा तो फिर कभी गिरजाघर नहीं जाऊँगा; परन्तु मुझे जाने की ऐसी आदत पड़ चुकी थी कि मैं दूर रह ही न सका। एक-दो विश्रामदिनों के बाद मैं फिर परमेश्वर के भवन में जा पहुँचा। वहीं मैंने पहली बार मसीह को पाया, और तब से मैंने अक्सर कहा है: ‘माँ, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि जब मैं परमेश्वर के भवन में जाना नहीं चाहता था, तब भी आपने मुझे वहाँ जाने पर विवश किया।’ ” घर के पुस्तकालय में तीन पुस्तकें थीं—एक बड़ी पारिवारिक बाइबल, एक प्रश्नोत्तरी, और एक भक्ति-पुस्तक। प्रतिदिन सवेरे इस अन्तिम पुस्तक में से एक अंश पढ़ा जाता था, और परिवार के दिन के काम में लगने से पहले प्रार्थना भी की जाती थी। श्री मूडी उन आरम्भिक दिनों की चर्चा कभी भी उस साहसी माँ का अत्यन्त कोमलता से स्मरण किए बिना नहीं कर पाते थे, जिनके आत्म-त्याग और समर्पण ने उन्हें सौंपे गए घर की पवित्र भाव से रक्षा की थी। जब नब्बे वर्ष की आयु में उनकी जीवन-यात्रा समाप्त हुई और उन्होंने “विश्राम के बन्दरगाह” में प्रवेश किया, तब उनके बच्चे, उनके बच्चों के बच्चे, और सारा समाज उठकर उन्हें धन्य कहने लगा। सात हट्टे-कट्टे लड़कों और दो लड़कियों के घराने को, जिनमें सबसे बड़ा बारह वर्ष का था, सँभालने के लिए साधारण से कहीं अधिक व्यवहार-कुशलता और विवेक की आवश्यकता थी, परन्तु यह निष्ठावान माँ इतनी समझदार थीं कि उन्होंने घर को अपने परिवार के लिए पृथ्वी पर सबसे प्रिय स्थान बना दिया और अपने
बच्चों को ऐसा प्रशिक्षण दिया कि वे समाज के लिए आशीष बन गए। “लगभग पचास वर्षों से मैं नॉर्थफ़ील्ड लौटकर आता रहा हूँ,” श्री मूडी ने, परिवार का घेरा बिखर जाने के बहुत समय बाद, कहा, “और यहाँ लौटकर मुझे सदा आनन्द हुआ है। जब मैं घर से पचास मील के भीतर पहुँचता हूँ तो बेचैन हो उठता हूँ और रेल के डिब्बे में इधर-उधर टहलने लगता हूँ। ऐसा लगता है मानो गाड़ी नॉर्थफ़ील्ड कभी पहुँचेगी ही नहीं। जब मैं अँधेरा होने के बाद लौटता हूँ तो सदा यह देखता हूँ कि माँ की खिड़की में दीया जल रहा है या नहीं।” इस प्रकार उनकी नसों में बहनेवाले उत्तम लहू ने, सावधानीपूर्ण अनुशासन ने, आरम्भिक और निरन्तर धार्मिक प्रशिक्षण ने, एक भक्त माँ के प्रभाव ने, और उन कठिनाइयों और अभावों ने जिन्हें उन्होंने बिना शिकायत सहा, डी. एल. मूडी की नींव डाली, जो निःसन्देह सब युगों के सबसे महान “अपुरोहित” प्रचारक थे। कम से कम अनुमान के अनुसार भी अपनी सेवकाई के दौरान उन्होंने इंग्लैंड, अमेरिका, स्कॉटलैंड, आयरलैंड और पवित्र भूमि में पाँच करोड़ से अधिक लोगों को सुसमाचार सुनाया। कहा गया है कि उनके जीवन और वचन ने सेवकाई की महिमा बढ़ाई।
