यह हिन्दी पाठ समीक्षा के लिए तैयार किया गया है। अंग्रेज़ी मूल प्रमाणिक है।

अध्याय 6

भौतिक ब्रह्मांड में पवित्र आत्मा का कार्य

बहुत-से लोग पवित्र आत्मा के कार्य को केवल मनुष्य तक सीमित मानते हैं। परन्तु परमेश्वर अपने वचन में हम पर प्रकट करता है कि पवित्र आत्मा के कार्य का क्षेत्र इससे कहीं अधिक विस्तृत है। हमें बाइबल में सिखाया गया है कि भौतिक ब्रह्मांड में पवित्र आत्मा का तीन प्रकार का कार्य है।

I. भौतिक ब्रह्मांड और मनुष्य की सृष्टि पवित्र आत्मा के माध्यम से सम्पन्न होती है।

हम भजन संहिता 33:6 में पढ़ते हैं, "यहोवा के वचन से आकाश बने, और उसके सारे गण उसके मुँह की साँस से।" पवित्र आत्मा के नामों के अध्ययन में हम पहले ही देख चुके हैं कि पवित्र आत्मा यहोवा की साँस है; इसलिए यह खंड हमें सिखाता है कि आकाश के सारे गण, सारे तारा-मंडल, पवित्र आत्मा के द्वारा बनाए गए। अय्यूब 33:4 में स्पष्ट रूप से सिखाया गया है कि मनुष्य की सृष्टि पवित्र आत्मा का काम है। हम पढ़ते हैं, "परमेश्वर के आत्मा ने मुझे बनाया है, और सर्वशक्तिमान की साँस ने मुझे जीवन दिया है।" यहाँ देह की रचना और जीवन का दान, दोनों पवित्र आत्मा की क्रियाशीलता के बताए गए हैं। पवित्रशास्त्र के अन्य खंडों में हमें सिखाया गया है कि सृष्टि परमेश्वर के पुत्र में और उसके द्वारा हुई। उदाहरण के लिए, कुलुस्सियों 1:16 में (संशोधित अनुवाद, R. V.) हम पढ़ते हैं, "क्योंकि उसी में सब कुछ सृजा गया, स्वर्ग में और पृथ्वी पर, देखी और अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुताएँ, क्या प्रधानताएँ, क्या अधिकार; सब कुछ उसी के द्वारा और उसी के लिए सृजा गया है।" इसी प्रकार इब्रानियों 1:2 में हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर ने "इन अंतिम दिनों में हम से पुत्र के द्वारा बातें कीं, जिसे उसने सब वस्तुओं का वारिस ठहराया, और उसी के द्वारा उसने संसारों (युगों) को भी रचा।" ऊपर दिए गए खंड (भजन संहिता 33:6) में सृष्टि के संबंध में आत्मा के साथ वचन का भी उल्लेख है। इस जगत को मनुष्य के निवास के रूप में पुनः व्यवस्थित करनेवाली सृष्टि के वृत्तांत में पिता, वचन और पवित्र आत्मा तीनों का उल्लेख है (उत्पत्ति 1:1-3)। इन खंडों की तुलना से यह स्पष्ट है कि सृष्टि के कार्य में पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा तीनों सक्रिय हैं। पिता अपने पुत्र में अपने आत्मा के द्वारा कार्य करता है।

II. बाइबल में भौतिक ब्रह्मांड की मूल सृष्टि ही नहीं, बल्कि जीवित प्राणियों का पालन-पोषण भी पवित्र आत्मा की क्रियाशीलता को सौंपा गया है।

हम भजन संहिता 104:29, 30 में पढ़ते हैं, "तू अपना मुँह फेर लेता है, तब वे घबरा जाते हैं; तू उनकी साँस ले लेता है, तब वे मर जाते हैं और अपनी मिट्टी में लौट जाते हैं। तू अपनी आत्मा भेजता है, तब वे सृजे जाते हैं; और तू पृथ्वी के रूप को नया कर देता है।" इस खंड का स्पष्ट संकेत यह है कि वस्तुएँ पवित्र आत्मा की क्रियाशीलता से अस्तित्व में ही नहीं आतीं, बल्कि पवित्र आत्मा के द्वारा अस्तित्व में बनी भी रहती हैं। न केवल आत्मिक जीवन परमेश्वर के आत्मा से बना रहता है, बल्कि भौतिक सत्ता भी। वस्तुएँ इसलिए अस्तित्व में बनी रहती हैं कि परमेश्वर का आत्मा उनमें उपस्थित है। इसका क्षण भर के लिए भी यह अर्थ नहीं कि ब्रह्मांड ही परमेश्वर है; परंतु इसका अर्थ यह है कि ब्रह्मांड अपनी सत्ता में परमेश्वर की अंतर्व्याप्ति के द्वारा बना रहता है। यही वह महान और गंभीर सत्य है जो अनगिनत रूपों में सर्वेश्वरवाद के भयानक और अधम विकृतिकरणों की नींव में है।

III. परंतु ब्रह्मांड केवल पवित्र आत्मा की क्रियाशीलता से रचा नहीं गया और उसी की क्रियाशीलता से बना नहीं रहता, बल्कि भौतिक ब्रह्मांड की पहले की अव्यवस्थित, अविकसित अवस्थाओं का उच्चतर प्राणी-क्रमों में विकास भी पवित्र आत्मा की क्रियाशीलता से होता है।

हम उत्पत्ति 1:2, 3 में पढ़ते हैं, "पृथ्वी बेडौल और सुनसान थी (या हो गई थी); और गहरे जल के ऊपर अंधियारा था। और परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मँडराता था। तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो; और उजियाला हो गया।" हम इस वृत्तांत को या तो ब्रह्मांड की मूल सृष्टि के संबंध में ले सकते हैं, या, जैसा वचन के गहन अध्येता अधिकाधिक मानने लगे हैं, पद 1 में वर्णित मूल सृष्टि के बाद पाप के कारण पृथ्वी के अराजकता में गिर जाने के पश्चात् उसके पुनर्व्यवस्थापन का वृत्तांत मान सकते हैं। दोनों ही स्थितियों में हमारे सामने पृथ्वी का पवित्र आत्मा की क्रियाशीलता से अराजक और आकारहीन दशा से उसकी वर्तमान अत्यंत विकसित दशा तक विकास रखा गया है। हम उत्पत्ति 2:7 में इस प्रक्रिया को और आगे बढ़ते देखते हैं, "और यहोवा परमेश्वर ने भूमि की मिट्टी से मनुष्य को रचा, और उसके नथुनों में जीवन का श्वास फूँका; और मनुष्य जीवित प्राणी बन गया।" यहाँ फिर परमेश्वर की साँस की क्रियाशीलता से ही एक उच्चतर वस्तु, मानव जीवन, अस्तित्व में आती है। स्वाभाविक है कि बाइबल मनुष्य के उद्धार का इतिहास है, इसलिए वह सत्य के इस पक्ष पर नहीं ठहरती, परंतु प्रतीत होता है कि परमेश्वर के आत्मा का हर नया और उच्चतर दान एक उच्चतर प्राणी-क्रम को उत्पन्न करता है। पहले निर्जीव पदार्थ; फिर गति; फिर प्रकाश; फिर वनस्पति-जीवन; फिर पशु-जीवन; फिर मनुष्य; और, जैसा हम आगे देखेंगे, फिर नया मनुष्य; और फिर यीशु मसीह, सर्वोच्च मनुष्य, मनुष्य के विषय में परमेश्वर के विचार की पूर्णता, मनुष्य का पुत्र। यही परमेश्वर के आत्मा की क्रियाशीलता से निम्न से उच्च की ओर विकास का बाइबल-सम्मत विचार है, जो उस ईश्वरहीन विकासवाद से भिन्न है जो अब समाप्त हो रही पीढ़ी में इतना लोकप्रिय रहा है। फिर भी बाइबल में इसका केवल संकेत मात्र दिया गया है।

पवित्र आत्मा के कार्य के अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष, अर्थात् उद्धार में उसका कार्य, ही वे हैं जिन पर बल दिया गया है और जिन्हें बार-बार दोहराया गया है। सृष्टि की प्रगति की प्रत्येक अवस्था में परमेश्वर का वचन और भी स्पष्ट रूप से सक्रिय है। उत्पत्ति के पहले अध्याय में "परमेश्वर ने कहा" दस बार आता है।

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