यह हिन्दी पाठ समीक्षा के लिए तैयार किया गया है। अंग्रेज़ी मूल प्रमाणिक है।

अध्याय 11

नया जन्म

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नया जन्म

“यीशु ने उसको उत्तर दिया, मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता। . . . यीशु ने उत्तर दिया, मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।” — यूहन्ना 3:3, 5।

इस अध्याय में हमारा विषय पुनर्जन्म, अर्थात् नया जन्म है। मैंने लगभग एक वर्ष पहले इस विषय पर बोला था, परन्तु इस अध्याय में मैं इसे पूर्णतः भिन्न रीति से प्रस्तुत करूँगा, और इसके अतिरिक्त मसीही विश्वास के मूल सिद्धांतों पर कोई भी प्रवचन-माला नए जन्म पर प्रवचन के बिना पूर्ण नहीं होगी। इस अध्याय में हमें जो कहना है वह चार शीर्षकों के अंतर्गत आएगा: I. नया जन्म क्या है? II. नए जन्म के परिणाम, III. नए जन्म की आवश्यकता, IV. कोई कैसे नया जन्म पाता है।

I. नया जन्म क्या है?

पहला प्रश्न जो हमारे सामने आता है वह है, नया जन्म क्या है? बहुत लोग नए जन्म या पुनर्जन्म की बात इस निश्चित धारणा के बिना करते हैं कि नया जन्म वास्तव में क्या है, और इसलिए वे स्वयं कभी निश्चित नहीं होते कि उन्होंने नया जन्म पाया है या नहीं।

परमेश्वर के वचन में जितनी स्पष्ट और सरल परिभाषा नए जन्म की हमें मिल सकती है, वह 2 पतरस 1:4 में दी गई है, “जिनके द्वारा उसने हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएँ दी हैं, ताकि इनके द्वारा तुम उस सड़ाहट से छूटकर जो संसार में बुरी अभिलाषाओं से होती है, ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी हो जाओ।” पतरस के इन शब्दों से स्पष्ट है कि नया जन्म नया जन्म पानेवाले को एक नए स्वभाव का, परमेश्वर के अपने स्वभाव का प्रदान किया जाना है। नया जन्म पाकर हम वास्तव में ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी बन जाते हैं। हम सब इस संसार में भ्रष्ट बौद्धिक और नैतिक स्वभाव के साथ जन्मे हैं। स्वाभाविक मनुष्य, अर्थात् अपुनर्जीवित मनुष्य, बौद्धिक रूप से अंधा है, परमेश्वर के सत्य के प्रति अंधा है; “आत्मा की बातों” को वह न देख सकता है न ग्रहण कर सकता है। “वे उसकी दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है” (1 कुरिन्थियों 2:14)। उसकी भावनाएँ भ्रष्ट हैं; वह उनसे प्रेम करता है जिनसे उसे घृणा करनी चाहिए और उनसे घृणा करता है जिनसे उसे प्रेम करना चाहिए। अपुनर्जीवित मनुष्य की भावनाओं, रुचियों और अभिलाषाओं का निश्चित वर्णन गलातियों 5:19, 20, 21 में मिलता है। वह अपनी इच्छा में भी टेढ़ा है, जैसा पौलुस रोमियों 8:7 में कहता है, “शारीरिक मन तो परमेश्वर से बैर रखता है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है और न हो सकता है।” बौद्धिक आत्मिक अंधेपन और नैतिक भ्रष्टता की यह दशा प्रत्येक अपुनर्जीवित मनुष्य की स्थिति है। वह बाहर से चाहे कितना ही सुसंस्कृत, परिष्कृत या नैतिक हो, उसका आंतरिक जीवन मूल रूप से गलत है। नए जन्म में परमेश्वर नया जन्म पानेवाले को अपना ही ज्ञानमय और पवित्र स्वभाव प्रदान करता है, ऐसा स्वभाव जो वैसा सोचता है जैसा परमेश्वर सोचता है (“वह अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिये नया बनता जाता है” — कुलुस्सियों 3:10); वह वैसा अनुभव करता है जैसा परमेश्वर अनुभव करता है, उससे प्रेम करता है जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, उससे घृणा करता है जिससे परमेश्वर घृणा करता है, वैसी इच्छा करता है जैसी परमेश्वर करता है (1 यूहन्ना 3:14; 4:7, 8)।

इसलिए यह स्पष्ट है कि पुनर्जन्म विचार, भावना और कर्म के गहनतम स्रोतों में होनेवाला एक गहरा और सर्वांगीण परिवर्तन है। यह परिवर्तन इतना सर्वांगीण है कि पौलुस 2 कुरिन्थियों 5:17 में कहता है, “यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि (अधिक ठीक रूप में, सृष्टि) है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं।” प्रेरित यूहन्ना की प्रेरित भाषा में कहें तो पुनर्जन्म “मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश करना” है। यूहन्ना 1 यूहन्ना 3:14 में कहता है, “हम जानते हैं कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं।” जब तक हम इस प्रकार नया जन्म नहीं पाते, हम नैतिक और आत्मिक मृत्यु की दशा में रहते हैं। जब हम नया जन्म पाते हैं तब हम, जो “अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे,” “जिलाए जाते” हैं (इफिसियों 2:1)। पुनर्जन्म और मात्र मन-फिराव में गहरा अंतर है। मन-फिराव एक बाहरी बात है, मुड़ना। कोई मनुष्य गलत दिशा में, परमेश्वर से मुँह फेरे हुए खड़ा है; वह मुड़ता है और परमेश्वर की ओर मुख करता है। यह मन-फिराव है। परन्तु पुनर्जन्म केवल बाहरी परिवर्तन नहीं है, वरन् मनुष्य के अस्तित्व की गहनतम गहराइयों में होनेवाला सर्वांगीण परिवर्तन है, जो सच्चे मन-फिराव या सच्चे बाहरी परिवर्तन की ओर ले जाता है। बहुत से प्रत्यक्षतः सर्वांगीण दिखनेवाले मन-फिराव अस्थायी होते हैं क्योंकि वे पर्याप्त गहरे नहीं गए, परन्तु पुनर्जन्म स्थायी है। जब परमेश्वर किसी मनुष्य को अपना स्वभाव प्रदान करता है, तो वह स्वभाव उस मनुष्य में बना रहता है। जब वह नया जन्म पा लेता है तो वह अजन्मा नहीं हो सकता, अथवा जैसा यूहन्ना 1 यूहन्ना 3:9 में कहता है, “जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता, क्योंकि उसका (परमेश्वर का) बीज उसमें बना रहता है।” कोई मनुष्य हज़ार बार मन फिरा सकता है, पर पुनर्जन्म केवल एक बार पा सकता है।

II. नए जन्म के परिणाम

अब हम दूसरे प्रश्न पर आते हैं, जो पहले से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है, और यह हमें और भी स्पष्ट रूप से समझने में सहायता करेगा कि नया जन्म क्या है। जब कोई नया जन्म पाता है तब कौन-से परिणाम होते हैं? वे अनेक हैं।

1. इन परिणामों में से पहला 1 कुरिन्थियों 6:19 में मिलता है, जहाँ हम पढ़ते हैं: “क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है, जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है?” ये शब्द विश्वासियों से, पुनर्जीवित मनुष्यों से कहे गए थे, और ये हमें स्पष्ट बताते हैं कि जब कोई नया जन्म पाता है तब पवित्र आत्मा उस मनुष्य में स्थायी निवास करने आता है और नया जन्म पाया हुआ वह मनुष्य इस प्रकार पवित्र आत्मा का मन्दिर बन जाता है। यह सच है कि हमें पवित्र आत्मा के इस निवास का सदा बोध न हो, फिर भी वह हम में वास करता है।

2. नए जन्म का दूसरा परिणाम रोमियों 8:2-4 में मिलता है, जहाँ हम पढ़ते हैं: “क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया। क्योंकि जो काम व्यवस्था शरीर के कारण दुर्बल होकर न कर सकी, उसे परमेश्वर ने किया, अर्थात् अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में और पाप के बलिदान के लिये भेजकर, शरीर में पाप पर दंड की आज्ञा दी, ताकि व्यवस्था की विधि हम में जो शरीर के अनुसार नहीं वरन् आत्मा के अनुसार चलते हैं, पूरी की जाए।” रोमियों के सातवें अध्याय में हमें उस मनुष्य का चित्र मिलता है जो परमेश्वर की व्यवस्था से जाग उठा है, जिसे वह भीतरी मनुष्यत्व के अनुसार सराहता है, जिसे वह देखता है कि वह “पवित्र, धर्मी और भली है,” जिसे वह अपनी ही सामर्थ्य से मानने का प्रयत्न करता है, परन्तु पूर्णतः विफल रहता है, जब तक कि अंत में वह स्वयं से हार नहीं मान लेता और अपने भीतर की पाप और मृत्यु की व्यवस्था के कारण अपने बाहर की परमेश्वर की व्यवस्था को कभी मान सकने की निराशा से भर नहीं जाता, वह पाप और मृत्यु की व्यवस्था जो कहती है, “जो भलाई तू करना चाहता है वह नहीं कर सकता, और जिस बुराई से तू घृणा करता है और जिसे करना नहीं चाहता, उसे तुझे करते ही रहना होगा।” जब मनुष्य इस प्रकार अपनी पूर्ण असहायता का बोध पाकर परमेश्वर की ओर मुड़ता है और यीशु मसीह को ग्रहण करता है, तो पवित्र आत्मा, जिसे यीशु मसीह उसे देता है और जो उसमें वास करता है, उसे पाप और मृत्यु की इस व्यवस्था से स्वतंत्र कर देता है, ताकि भीतर वास करनेवाले आत्मा की सामर्थ्य से वह परमेश्वर की व्यवस्था का पालन कर सके, और जिन बुरी बातों को वह करना नहीं चाहता उन पर जय पा सके, और जो बातें वह करना चाहता है उन्हें कर सके।

जहाँ परमेश्वर की व्यवस्था से मात्र जागे हुए मनुष्य में “पाप और मृत्यु की व्यवस्था” को निरंतर विजय मिलती है, वहाँ पुनर्जीवित मनुष्य में “मसीह यीशु में जीवन की आत्मा की व्यवस्था” को निरंतर विजय मिलती है। निःसंदेह आज यहाँ आप में से बहुत से लोग अब भी परमेश्वर की व्यवस्था को मानने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और ऐसा करने के अपने प्रयत्न में पूर्णतः विफल हो रहे हैं। आपको आवश्यकता है नया जन्म पाने की, और इस प्रकार पवित्र आत्मा के आप में वास करने की, और फिर आत्मा के अनुसार चलने की, और इस भीतर वास करनेवाले आत्मा की सामर्थ्य से प्रतिदिन और प्रतिघड़ी पाप और मृत्यु की उस व्यवस्था पर जय पाने की जो आपके अंगों में परमेश्वर की व्यवस्था के विरुद्ध लड़ती है।

3. नए जन्म का तीसरा परिणाम रोमियों 12:2 में मिलता है, जहाँ हम पढ़ते हैं, “और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नए हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए।” इससे प्रकट होता है कि नए जन्म का तीसरा परिणाम हमारे मनों के भीतरी नवीकरण द्वारा हमारे जीवनों का बाहरी रूपांतरण है, जिससे हम अब इस संसार के सदृश नहीं बनते। निःसंदेह पुनर्जीवित मनुष्य उस बात को जिसका बीज उसके भीतर है, तुरंत सिद्ध रूप से प्रकट नहीं करता। वह नया जीवन वैसे ही आरंभ करता है जैसे हम अपना स्वाभाविक जीवन आरंभ करते हैं, एक शिशु के रूप में, और उसे बढ़ना होगा। जैसा पतरस 1 पतरस 2:2 में कहता है, हमें “नए जन्मे बच्चों के समान वचन के निर्मल दूध की लालसा करनी चाहिए, ताकि उसके द्वारा हम बढ़ते जाएँ।” इस नए जीवन को आहार दिया जाना और उसका विकास किया जाना चाहिए। जिसने अभी नया जन्म पाया है, और जो इसलिए मसीह में एक शिशु है, उससे यह अपेक्षा करना कि वह चरित्र में उतना ही सिद्ध हो जितना वह जो वर्षों पहले जन्मा और परिपक्वता तक बढ़ चुका है, अतर्कसंगत है और परमेश्वर के वचन से असमर्थित है। परन्तु जिस क्षण हम नया जन्म पाते हैं, हम बीज रूप में वह सारी नैतिक सिद्धता पा लेते हैं जो हमारी होगी जब यह बीज हम में पूर्ण रूप से विकसित होकर अपनी सिद्ध अभिव्यक्ति को पहुँचेगा।

4. नए जन्म का चौथा परिणाम हमें 1 यूहन्ना 5:1 में मिलता है, “जो कोई विश्वास करता है कि यीशु ही मसीह है, वह परमेश्वर से जन्मा है।” नया जन्म पाने का चौथा परिणाम यह है कि पुनर्जीवित मनुष्य विश्वास करता है कि यीशु ही मसीह है। निःसंदेह नए जन्म से आनेवाला यह विश्वास सच्चा विश्वास है। जिस विश्वास की कलीसियाा यूहन्ना यहाँ करता है वह केवल एक मत के रूप में विश्वास नहीं है, वरन् वह सच्चा विश्वास कि यीशु परमेश्वर का अभिषिक्त है, जो हमें यीशु को अपने जीवन में राजा के रूप में सिंहासन पर बिठाने की ओर ले जाता है। यदि आप यीशु को अपने हृदय और जीवन में राजा नहीं बना रहे हैं तो आप ने नया जन्म नहीं पाया है। परन्तु यदि आप यीशु को अपने हृदय और जीवन में राजा और अपने विचारों और आचरण का पूर्ण शासक बना रहे हैं, तो आप ने नया जन्म पाया है, क्योंकि “जो कोई विश्वास करता है कि यीशु ही मसीह है, वह परमेश्वर से जन्मा है।”

5. नया जन्म पाने का पाँचवाँ परिणाम हमें इसी अध्याय में तीन पद आगे, 1 यूहन्ना 5:4 में मिलता है: “क्योंकि जो कुछ परमेश्वर से जन्मा है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है।” परमेश्वर से जन्म लेने का पाँचवाँ परिणाम यह है कि इस प्रकार नया जन्म पाया हुआ जन संसार पर जय पाता है। संसार परमेश्वर के विरोध में है, “सारा संसार उस दुष्ट के वश में पड़ा है” (1 यूहन्ना 5:19)। वह दुष्ट के अधिकार में है, उसकी महत्त्वाकांक्षाओं और विचारों से शासित है। संसार अपने व्यापारिक जीवन, सामाजिक जीवन, पारिवारिक जीवन, और बौद्धिक तथा शैक्षिक जीवन के सभी पक्षों में परमेश्वर के विरोध में है, और हम में से प्रत्येक पर निरंतर ऐसा प्रभाव डालता रहता है कि हमें परमेश्वर की अवज्ञा में खींच ले (देखिए 1 यूहन्ना 5:3); परन्तु नए जन्म से आनेवाले विश्वास की सामर्थ्य से परमेश्वर से जन्मा हुआ जन संसार पर जय पाता है। वह संसार के विचारों, उद्देश्यों, योजनाओं और महत्त्वाकांक्षाओं पर जय पाता है। वह अपने व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन, व्यापारिक जीवन, राजनीतिक जीवन और बौद्धिक जीवन में प्रतिदिन संसार पर जय पाता है।

6. परमेश्वर से जन्म लेने का छठा परिणाम 1 यूहन्ना 3:9, R. V. में मिलता है, “जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; क्योंकि उसका (अर्थात् परमेश्वर का) बीज उसमें बना रहता है; और वह पाप कर नहीं सकता (अधिक ठीक रूप में, पाप करता नहीं रह सकता), क्योंकि वह परमेश्वर से जन्मा है।” तो परमेश्वर से जन्म लेने का छठा परिणाम यह है कि जो परमेश्वर से जन्मा है उसमें परमेश्वर का बीज बना रहता है; और इसलिए जो परमेश्वर से जन्मा है वह पाप को अभ्यास नहीं बनाता। कोई पूछेगा कि इसका ठीक-ठीक अर्थ क्या है? इसका वही अर्थ है जो यह कहता है, यदि हम प्रयुक्त शब्दों के ठीक बल को ध्यान से देखें और प्रयुक्त क्रियाओं के काल पर उचित बल दें। सबसे पहले हम “पाप” के रूप में अनूदित शब्द के ठीक बल को देखें। पाप का क्या अर्थ है? यूहन्ना ने स्वयं इसे उसी पद में और उस संदर्भ में जिसमें हमारा पद आता है, सावधानी से परिभाषित कर दिया है। 1 यूहन्ना 3:9 से जो पहली बात स्पष्ट होती है वह यह है कि पाप किया हुआ कुछ है, केवल छोड़ा हुआ कुछ नहीं, और केवल पापमय विचार और अभिलाषाएँ नहीं। किया हुआ वह कुछ किस प्रकार का है, यह पाँच पद पीछे चौथे पद में परिभाषित किया गया है। “जो कोई पाप करता है वह व्यवस्था-विरोध भी करता है; और पाप व्यवस्था-विरोध ही है।” यहाँ पाप, यूहन्ना की अपनी परिभाषा के अनुसार (और हमें किसी और की परिभाषा को उस पद में लाने का अधिकार नहीं जिसका हम अध्ययन कर रहे हैं), “व्यवस्था-विरोध” है, अर्थात् ऐसे कार्य जो परमेश्वर के वचन में प्रकट उसकी इच्छा की जानबूझकर की गई अवहेलना को प्रकट करते हैं। इसलिए हम देखते हैं कि पाप, जैसा यहाँ प्रयुक्त हुआ है, का अर्थ है परमेश्वर की व्यवस्था का जानबूझकर किया गया उल्लंघन। पुनर्जीवित मनुष्य वह नहीं करेगा जिसे वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध जानता है। वह ऐसा कुछ कर सकता है जो परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध है, पर जिसे वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध नहीं जानता।

इसलिए वह “व्यवस्था-विरोध” नहीं है। संभव है उसे जान लेना चाहिए था कि वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध है और जब वह यह देखने पाएगा कि वह है, तो वह परमेश्वर के सामने अपना दोष मान लेगा। इसके अतिरिक्त, हमें इस पद में प्रयुक्त क्रिया के काल पर ध्यान देना चाहिए। यह वर्तमान काल है जो प्रगतिशील या निरंतर क्रिया को दर्शाता है। इस खंड का शाब्दिक अनुवाद यह होगा, “हर एक जो परमेश्वर से जन्मा है, पाप करता नहीं रहता, क्योंकि उसका (परमेश्वर का) बीज उसमें बना रहता है; और वह पाप करता नहीं रह सकता, क्योंकि वह परमेश्वर से जन्मा है।” यहाँ यह नहीं सिखाया गया कि परमेश्वर से जन्मा हुआ जन एक भी कार्य में कभी पाप नहीं करता, परन्तु यह सिखाया गया है कि वह पाप करता नहीं रहता, पाप को अभ्यास नहीं बनाता। वह किसे अभ्यास बनाता है, यह 1 यूहन्ना 2:29 में प्रकट होता है, “यदि तुम जानते हो कि वह धर्मी है, तो यह भी जानते हो कि जो कोई धार्मिकता का काम करता है वह भी उससे जन्मा है।” इसलिए नया जन्म पाने का परिणाम यह है कि नया जन्म पाया हुआ जन उस काम को जिसे वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध जानता है, जान-बूझकर दिन-प्रतिदिन करता नहीं रहता, परन्तु वह “धार्मिकता का काम करने” को, अर्थात् परमेश्वर के वचन में प्रकट उसकी इच्छा के अनुरूप काम करने को अभ्यास बनाता है। पुनर्जन्म में प्रदान किया गया नया स्वभाव पाप के निरंतर अभ्यास को असंभव और धार्मिकता के अभ्यास को अनिवार्य बना देता है।

7. नए जन्म का सातवाँ परिणाम 1 यूहन्ना 3:14, R. V. में मिलता है, “हम जानते हैं कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं, क्योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं। जो प्रेम नहीं रखता वह मृत्यु में बना रहता है।” नया जन्म पाने का सातवाँ परिणाम यह है कि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं। हमें ध्यान से देखना चाहिए कि संदर्भ में “प्रेम” का क्या विचार प्रकट किया गया है। यह मात्र भावुकता के रूप में प्रेम नहीं है। यह उस उच्चतर और गहरे अर्थ में प्रेम है जिसमें दूसरों के कल्याण की इच्छा और उसमें आनंद है, वह प्रेम जो हमें उनके लिए त्याग करने की ओर ले जाता है जिनसे हम प्रेम करते हैं, अथवा जैसा हम इसी अध्याय में आगे पद 16-18 में पढ़ते हैं, “हम ने प्रेम इसी से जाना कि उसने हमारे लिये अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिये प्राण देना चाहिए। पर जिस किसी के पास संसार की संपत्ति हो और वह अपने भाई को घटी में देखकर उस पर तरस न खाना चाहे, तो उसमें परमेश्वर का प्रेम क्योंकर बना रह सकता है? हे बालको, हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी प्रेम करें।” इससे यह बहुत स्पष्ट हो जाता है कि पवित्र आत्मा यहाँ प्रेम से जो अर्थ लेता है वह दूसरों के प्रति मात्र स्नेह या लगाव नहीं है, उनकी संगति में मात्र आनंद नहीं है; इसका अर्थ है उनके कल्याण में वह गहरी और सच्ची रुचि जो हमें, जब वे आवश्यकता में हों, अपनी जेब में हाथ डालकर उनकी आवश्यकता पूरी करने की ओर ले जाती है; वह हमें उनके हितों के लिए अपने हितों का त्याग करने की ओर ले जाती है, यहाँ तक कि उनके लिए अपने प्राण देने तक। इस प्रेम के पात्र “भाई” हैं, अर्थात् वे सब जो परमेश्वर से जन्मे हैं, जैसा हम 1 यूहन्ना 5:1 में पढ़ते हैं, “जो कोई विश्वास करता है कि यीशु ही मसीह है, वह परमेश्वर से जन्मा है; और जो कोई उत्पन्न करनेवाले से प्रेम करता है, वह उससे भी प्रेम करता है जो उससे उत्पन्न हुआ है।” जो कोई मनुष्य नया जन्म पाता है, वह परमेश्वर से जन्मे हुए हर दूसरे मनुष्य से प्रेम करेगा।

परमेश्वर से जन्मा हुआ वह दूसरा जन अमरीकी हो सकता है या जर्मन, या अंग्रेज़, या हब्शी, या चीनी, या भारतीय। वह शिक्षित हो सकता है या अशिक्षित; परन्तु वह परमेश्वर की संतान और भाई है, और यदि आप परमेश्वर से जन्मे हैं तो वह आपके प्रेम का पात्र होगा। यह इस बात की गहरी कसौटी है कि कोई परमेश्वर से जन्मा है या नहीं।

8. परमेश्वर से जन्म लेने का अंतिम परिणाम, जिस पर हम आज प्रातः विचार करेंगे, 2 कुरिन्थियों 5:17, R. V. में मिलता है, “इसलिये यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं, देखो, वे सब नई हो गईं।” नया जन्म पाने का नौवाँ परिणाम, जिसमें अन्य सब परिणाम जिन पर हम विचार करते रहे हैं सम्मिलित हैं, यह है कि पुनर्जीवित मनुष्य में पुरानी बातें बीत गई हैं, वे नई हो गई हैं। पुराने विचारों, पुराने स्नेहों, पुराने उद्देश्यों, पुराने चुनावों के स्थान पर नए विचार, नए स्नेह, नए उद्देश्य, नए चुनाव हैं।

III. नए जन्म की आवश्यकता

कुछ ही क्षणों के लिए आइए नए जन्म की आवश्यकता को देखें। यह हमारे पाठों में से एक में और उसके बाद के पदों में, 1 यूहन्ना 3:5, 6 में प्रस्तुत की गई है: “मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। जो शरीर से जन्मा है वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है वह आत्मा है।” हम यहाँ देखते हैं कि नया जन्म एक सार्वभौमिक आवश्यकता है, और हम देखते हैं कि वह आवश्यकता क्यों है। “जब तक कोई मनुष्य न जन्मे” आदि शब्दों का अधिक शाब्दिक अनुवाद यह होगा, “यदि कोई जल और आत्मा से न जन्मे, तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।” और वह परमेश्वर के राज्य में क्यों प्रवेश नहीं कर सकता, यह अगला पद कहता है, और वह यह है कि स्वाभाविक जन्म से मनुष्य जो कुछ पाता है वह केवल “शरीर” है और परमेश्वर का राज्य आत्मिक है, और इसलिए उसमें प्रवेश करने के लिए मनुष्य को आत्मा से जन्म लेना होगा। हमारे पूर्वज कितने ही परिष्कृत और बुद्धिमान रहे हों, हमारे माता-पिता कितने ही भक्त रहे हों, हम उनसे पवित्र आत्मा नहीं पाते। हम जो पाते हैं वह केवल “शरीर” है। वह परिष्कृत शरीर हो सकता है, नैतिक शरीर, सीधा और बहुत आकर्षक शरीर, परन्तु है तो शरीर ही; और “जो शारीरिक दशा में हैं वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते,” और न “परमेश्वर के राज्य के अधिकारी हो सकते हैं।” शरीर सुधार के अयोग्य है। जैसे “कूश देश का वासी अपनी चमड़ी का, या चीता अपने धब्बों का रंग नहीं बदल सकता,” वैसे ही अपुनर्जीवित मनुष्य परमेश्वर को भानेवाले जीवन तक नहीं पहुँच सकता। (देखिए यिर्मयाह 13:23।) उसे नया जन्म पाना ही होगा। यह आवश्यकता पूर्ण और अनिवार्य भी है, इतनी पूर्ण और अनिवार्य कि यीशु ने नीकुदेमुस से, यद्यपि वह अत्यंत आदर्श नैतिकता का मनुष्य था, उच्च नैतिक और आत्मिक शिक्षा पाया हुआ मनुष्य, इस्राएल का गुरु, इस्राएल के धार्मिक जीवन का अगुवा, कहा, “तुम्हें नया जन्म लेना अवश्य है” (यूहन्ना 3:7)। नए जन्म का स्थान और कोई वस्तु नहीं ले सकती।

मनुष्य शिक्षा, नैतिकता, धर्म, रूढ़िवादिता, बपतिस्मा, बाहरी सुधार, “नव-विचार,” “थियोसॉफ़ी” या परमेश्वर के ज्ञान, और ऐसी ही अन्य बातों को नए जन्म के स्थान पर रखने का प्रयत्न कर रहे हैं; परन्तु इनमें से कोई भी, या सब मिलकर भी, पर्याप्त नहीं हैं; आपको नया जन्म पाना ही होगा। इस नियम का बिलकुल कोई अपवाद नहीं है। जैसा यीशु यूहन्ना 3:3 में कहता है, “मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई ऊपर से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।”

IV. कोई कैसे नया जन्म पा सकता है?

इसलिए यह प्रश्न आप में से प्रत्येक के सामने खड़ा है, क्या आप ने नया जन्म पाया है? इससे अधिक महत्त्वपूर्ण कोई प्रश्न नहीं जिसका आप सामना कर सकें। इन पृष्ठों में इसका सामना कीजिए और इससे बचिए नहीं। और यह हमें तुरंत व्यावहारिक प्रश्न तक ले आता है, मनुष्य कैसे नया जन्म पाते हैं, अथवा यहाँ आज जो कोई नया जन्म नहीं पाए हुए है, उसे आज प्रातः यहीं नया जन्म पाने के लिए क्या करना चाहिए? इस प्रश्न का भी स्पष्ट उत्तर परमेश्वर के वचन में दिया गया है; और मैं आपको वह उत्तर बहुत थोड़े मिनटों में दे सकता हूँ और ऐसे दे सकता हूँ कि यहाँ कोई भी उसे समझ सके। उत्तर के तीन भाग हैं।

1. उत्तर का पहला भाग आपको तीतुस 3:4 में मिलेगा, “उसने हमारा उद्धार किया, और यह धार्मिक कामों के कारण नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार, नए जन्म के स्नान और पवित्र आत्मा के नए करने के द्वारा हुआ।” ये शब्द हमें बहुत स्पष्ट बताते हैं कि पुनर्जन्म देनेवाला परमेश्वर है और वह यह अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से करता है। यही विचार हमारे पाठ यूहन्ना 3:5, 6 में मिलता है: “यीशु ने उत्तर दिया, मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। जो शरीर से जन्मा है वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है वह आत्मा है।” पुनर्जन्म परमेश्वर का कार्य है; जो उसने अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से, नया जन्म पानेवाले के मन, भावनाओं और इच्छा में, आपके और मेरे हृदय में कार्य करके किया है।

2. कोई इस तथ्य से यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि पुनर्जन्म परमेश्वर का कार्य है, जिसे वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में करता है, कि हमें केवल तब तक प्रतीक्षा करनी है जब तक परमेश्वर कार्य करना उचित न समझे; परन्तु वचन के अन्य खंडों से हम स्पष्ट देखते हैं कि यह सत्य नहीं है। पुनर्जन्म कैसे होता है, इस विषय में दूसरी बात हमें याकूब 1:18 में सिखाई गई है, “उसने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया, ताकि हम उसकी सृष्टि की हुई वस्तुओं में से एक प्रकार के पहले फल हों।” यहाँ हमें सिखाया गया है कि सत्य का वचन, परमेश्वर का वचन, वह साधन है जिसे परमेश्वर पुनर्जन्म में काम में लाता है। यही विचार 1 पतरस 1:23 में मिलता है, “क्योंकि तुम ने नाशमान नहीं, परन्तु अविनाशी बीज से, परमेश्वर के जीवते और सदा ठहरनेवाले वचन के द्वारा नया जन्म पाया है।” और पौलुस 1 कुरिन्थियों 4:15 में इसी महान विचार को स्वर देता है, जहाँ वह कहता है: “क्योंकि यदि मसीह में तुम्हारे सिखानेवाले दस हज़ार भी हों, तौभी तुम्हारे पिता बहुत से नहीं, इसलिये कि मसीह यीशु में सुसमाचार के द्वारा मैं तुम्हारा पिता बना।” इन खंडों से स्पष्ट है कि नया जन्म परमेश्वर के द्वारा उसके वचन के माध्यम से होता है। इसे अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से करनेवाला परमेश्वर है, परन्तु पवित्र आत्मा वचन के द्वारा कार्य करता है, और इस प्रकार परमेश्वर “सत्य के वचन” या “परमेश्वर के वचन” के द्वारा, अर्थात् उस वचन के द्वारा जो “सुसमाचार” में प्रचार किया जाता है, मनुष्यों को नए सिरे से उत्पन्न करता है। इसलिए यदि आप या मैं नया जन्म पाना चाहते हैं, तो हमें बाइबल का अध्ययन करके और परमेश्वर से यह माँगकर कि पवित्र आत्मा उस वचन को, जिसका हम अध्ययन कर रहे हैं, हमारे अपने हृदयों में जीवित बना दे, परमेश्वर के वचन के संपर्क में आना चाहिए।

हमें विशेष रूप से परमेश्वर के वचन के उस भाग के संपर्क में आना चाहिए जो यूहन्ना के सुसमाचार में मिलता है, क्योंकि यूहन्ना हमें यूहन्ना 20:31 में बताता है कि “ये (अर्थात् यूहन्ना के सुसमाचार की ये बातें) इसलिये लिखे गए हैं कि तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है, और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ।” यदि हम दूसरों को नया जन्म पाते देखना चाहते हैं तो हमें वचन का प्रचार करके, या उसे सिखाकर, या व्यक्तिगत सेवकाई में, परमेश्वर के वचन को उनके मनों और हृदयों तक पहुँचाना चाहिए; और जब हम उसे उनके हृदयों में बोएँ तब हमें पवित्र आत्मा की ओर देखना चाहिए कि वह उस वचन को मनुष्यों के हृदयों में जीवित करे, और इस प्रकार नए जन्म का परिणाम होगा।

3. हम नया जन्म कैसे पाते हैं, इस विषय में तीसरा, अंतिम और निर्णायक सत्य गलातियों 3:26 और यूहन्ना 1:12, 13 में मिलता है। गलातियों 3:26 में हम पढ़ते हैं, “क्योंकि तुम सब उस विश्वास के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, परमेश्वर की संतान हो।” यह हमें स्पष्ट बताता है कि हम मसीह यीशु पर अपना विश्वास रखने के द्वारा नया जन्म पाते हैं। यह यूहन्ना 1:12, 13 में और भी स्पष्ट रूप से कहा गया है: “परन्तु जितनों ने उसे (अर्थात् प्रभु यीशु को) ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की संतान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं; वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।” यहाँ हमें बताया गया है कि हमारे परमेश्वर की संतान बनने में निर्णायक बात यह है कि हम यीशु मसीह पर विश्वास करें, अर्थात् उसे ग्रहण करें। जो कोई यीशु मसीह को अपना निजी उद्धारकर्ता ग्रहण करता है और इस पर परमेश्वर से भरोसा रखता है कि वह उसे क्षमा करेगा क्योंकि यीशु मसीह उसके स्थान पर मरा, और उसे अपना प्रभु और राजा ग्रहण करता है, और अपने विचारों को उसके पूर्ण नियंत्रण में अपने प्रभु के रूप में और अपने जीवन को उसके पूर्ण नियंत्रण में अपने राजा के रूप में सौंप देता है और यीशु मसीह को संसार के सामने प्रभु अंगीकार करता है, ऐसा जन तुरंत परमेश्वर की संतान बन जाता है, तुरंत नया जन्म पाता है, तुरंत ईश्वरीय स्वभाव का सहभागी बनाया जाता है। यही विचार स्वयं यीशु ने यूहन्ना 3:14, 15 में स्पष्ट किया है, जहाँ हमारे प्रभु यीशु के ये वचन लिखे हैं, “और जिस रीति से मूसा ने जंगल में साँप को ऊँचे पर चढ़ाया, उसी रीति से अवश्य है कि मनुष्य का पुत्र भी ऊँचे पर चढ़ाया जाए; ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए।” यह संकेत पुराने नियम में इस्राएलियों की उस कथा की ओर है जब उन्हें अग्निमय साँपों ने डसा था।

जैसे वह मरता हुआ इस्राएली, जिसकी नसों में अग्निमय साँप का विष दौड़ रहा था, डंडे पर लगे पीतल के साँप को, जो उस साँप की समानता में बना था जिसने उसे डसा था, केवल देखने से बचाया गया, और देखते ही उसकी नसों में नया जीवन दौड़ने लगा, वैसे ही हम मरते हुए मनुष्य, जिनकी नसों में पाप का विष दौड़ रहा है, क्रूस पर ऊँचे चढ़ाए गए यीशु मसीह को, जो “पापमय शरीर की समानता में बनाया गया,” देखने से बचाए जाते हैं, और जिस क्षण हम देखते हैं उसी क्षण हमारी नसों में नया जीवन दौड़ने लगता है। अपने पुनर्जन्म के संबंध में हमें केवल इतना करना है कि मसीह को वैसा ही ग्रहण करें जैसा वह हमें वचन में प्रस्तुत किया गया है, जिसके द्वारा हम नया जन्म पाते हैं। इसलिए, “यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है। पुरानी बातें बीत गई हैं, देखो, सब कुछ नया हो गया है।”

नए जन्म में परमेश्वर का वचन बीज है; मानव हृदय भूमि है; वचन का प्रचारक बोनेवाला है, और परमेश्वर के वचन के बीज को मानव हृदय की भूमि में डालता है; परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा हृदय को खोलता है कि वह बीज को ग्रहण करे (प्रेरितों के काम 16:14); सुननेवाला विश्वास करता है; ग्रहणशील हृदय में आत्मा बीज को जीवन में जिलाता है; हृदय विश्वास के द्वारा बीज के चारों ओर बंद हो जाता है; नया स्वभाव, ईश्वरीय स्वभाव, ईश्वरीय वचन से उग आता है; विश्वासी “नया जन्म पाता है,” “नए सिरे से सृजा जाता है,” “जिलाया जाता है,” “मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचता है।”

निष्कर्ष।

क्या आप ने नया जन्म पाया है? मैं यह प्रश्न यहाँ उपस्थित हर पुरुष और स्त्री से पूछता हूँ। मैं आप से यह नहीं पूछता कि आप कलीसिया के सदस्य हैं या नहीं। मैं यह नहीं पूछता कि आप ने बपतिस्मा लिया है या नहीं। मैं यह नहीं पूछता कि क्या आप नियमित रूप से प्रभु-भोज में जाते हैं। मैं यह नहीं पूछता कि क्या आप ने नया पन्ना पलटा है। मैं यह नहीं पूछता कि क्या आप मिलनसार, सुसंस्कृत, बुद्धिमान, नैतिक, सामाजिक रूप से मनमोहक सज्जन या महिला हैं। मैं आप से पूछता हूँ, क्या आप ने नया जन्म पाया है? यदि नहीं, तो आप परमेश्वर के राज्य से बाहर हैं और यदि आप नया जन्म नहीं पाते तो अनन्त नरक की ओर जा रहे हैं। परन्तु यदि आप ने अब तक नया जन्म नहीं पाया है तो आप आज ही नया जन्म पा सकते हैं, आप इस भवन से जाने से पहले नया जन्म पा सकते हैं, आप अभी इसी समय नया जन्म पा सकते हैं; क्योंकि परमेश्वर का वचन कहता है, “जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की संतान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं; वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।” और वह फिर रोमियों 10:9, 10 में कहता है, “यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे, और अपने मन से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा; क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है।” ये पद दिन के समान स्पष्ट कर देते हैं कि परमेश्वर की संतान बनने के लिए आपको यहीं और अभी क्या करना है। यह आप पर निर्भर है कि आप इसे करेंगे या नहीं।

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