अध्याय 7
शैतान और कलीसिया (जारी)
कभी देहात में मैं गाँव के लोहार को काम करते हुए खड़ा देखा करता था, और बहुत समय तक मैं उस छोटे हथौड़े का उपयोग नहीं समझ पाया। बड़े हथौड़े को मैं समझ सकता था, परंतु लोहार बारी-बारी से निहाई और लोहे पर क्यों चोट करता है, यह मुझे उलझन में डालता था। एक दिन मैंने साहस करके स्पष्टीकरण माँगा, और जाना कि छोटा हथौड़ा बड़े की चोट को नियंत्रित करता है। लोहार दहकते धातु को पकड़े रहता है, उसे घुमाता है ताकि चोट बार-बार एक ही स्थान पर न पड़े,
प्रहारों को निर्देशित करता है कि वे ठीक क्षण पर पड़ें; धातु को घुमाते, तपाते और नियंत्रित करते हुए तब तक, जब तक वह वांछित आकार न ले ले। इसी प्रकार परमेश्वर आत्मा को थामे रहता है और चोट को नियंत्रित करता है। कभी-कभी वह शैतान को अपना हथौड़ा चलानेवाला बना लेता है... शैतान चूर-चूर करने के लिए चोट करता है। परमेश्वर चोट को नियंत्रित करता है, और उसकी बैर-भावना को हमारी सिद्धता में बदल देता है, और शैतान संतों को
मसीह के स्वरूप में ढालने के कार्य में पसीना बहाता है। —सैमुअल चैडविक।
कलीसिया को चलाने के दो मार्ग हैं, परमेश्वर का मार्ग और शैतान का मार्ग। कलीसिया को चलाने का परमेश्वर का मार्ग और मनुष्य का मार्ग पूरी तरह दो विपरीत ध्रुवों पर हैं। मनुष्य की बुद्धिमान योजनाएँ, सुखद उपाय और सरल समाधान शैतान की युक्तियाँ हैं। क्रूस को हटा दिया जाता है, संसार भीतर आ जाता है, आत्म-त्याग समाप्त कर दिया जाता है, सब कुछ उज्ज्वल, हर्षित और समृद्ध दिखता है, पर वाचा के संदूक पर शैतान का हाथ है, मनुष्यों की योजनाएँ जीतती हैं, मनुष्यों की इन लुभावनी, प्रिय युक्तियों के नीचे कलीसिया विफल हो जाती है, और दिवालियापन इतना पूर्ण है कि स्वर्ग का न्यायालय उस ढही हुई और कंगाल संस्था के लिए रिसीवर तक नियुक्त नहीं करेगा।
परमेश्वर की सब योजनाओं पर क्रूस की छाप है, और उसकी सब योजनाओं में आत्म की मृत्यु है। परमेश्वर की सब योजनाओं में संसार के लिए क्रूसीकरण है। परंतु मनुष्यों की योजनाएँ क्रूस की ठोकर की उपेक्षा करती हैं या उसे तुच्छ जानती हैं। मनुष्यों की योजनाओं में कोई गहरा, कठोर या आत्म-बलिदानी इनकार नहीं होता। उनका लाभ संसार का होता है। मनुष्यों द्वारा मूल्यवान समझे गए इन विनाशकारी तत्वों में से कितने शैतान कलीसिया में ले आता है, जब तक कि कलीसिया के सब उच्च, संसार से अलग और पवित्र उद्देश्य तथा स्वर्गीय लक्ष्य हटा दिए जाएँ और भुला दिए जाएँ?
इन लुभावनी, मनुष्य-रुचि की, शैतानी युक्तियों में से एक यह है कि कलीसिया के उद्देश्यों को इस प्रकार के कथन और प्रयास से बिगाड़ा जाए कि आज कलीसिया का मुख्य लक्ष्य व्यक्तियों को समाज में से बचाना उतना नहीं जितना समाज को बचाना है, आत्माओं को बचाना उतना नहीं जितना मनुष्यों की देहों को बचाना, मनुष्यों को किसी समुदाय में से बचाना उतना नहीं जितना समुदाय में मनुष्यों और मनुष्यत्व को बचाना। छुटकारे का विषय संसार है, व्यक्ति नहीं। यह लोकप्रिय, भरमानेवाली और घातक भ्रांति मसीह की कलीसिया की नींव को ही पूरी तरह उलट देती है। इसकी भौतिकवादी प्रवृत्ति इतनी प्रबल है कि यदि हम निद्रारहित सतर्कता, अथक ऊर्जा और निर्भीक साहस के साथ चौकस, परिश्रमी और मुखर न रहें, तो यह आत्मिक और अनंत की हर निशानी बहा ले जाएगी। आज हम जो धार्मिक शिक्षा सुनते हैं उसका बड़ा भाग अपने रुख और खुली घोषणा में उसी धुन और भावना में है जो आधी शताब्दी पहले यूनिटेरियन, यहूदी या बुद्धिवादी कथनों की विशेषता थी।
समाज को बचाना एक प्रकार की धार्मिक सनक है जिसके प्रति बहुत-सा साहसिक, प्रशंसित कलीसियाई कार्य समर्पित है। उन्नत विचारकों और खोजकर्ताओं ने इसी विचार को विस्तार दिया है। वे अपनी वास्तविक दशा को समझते प्रतीत नहीं होते, जो पीछे जाने की है, आगे बढ़ने की नहीं। यह पीछे का कदम धर्म को उसी कब्र में दफ़ना देता है जहाँ यहूदी धर्म को इन सब शताब्दियों से दफ़नाया गया है। व्यक्ति की उपेक्षा करके संसार के पुनर्जन्म की बात सोचना सांसारिक रब्बियों के निकम्मे स्वप्नों से भली-भाँति मेल खा सकता है।
“संसार को बचाना” वाक्यांश में आडंबरपूर्ण ध्वनि है; और कलीसिया का व्यक्ति के सांसारिक परिवेश को सुधारने, उसकी स्वच्छता-दशाओं को बेहतर करने, उसकी नाक तक पहुँचनेवाली दुर्गंधों को घटाने, उसके पानी में जीवाणुओं को कम करने, और उसके चलने के लिए लकड़ी या ईंट की जगह ग्रेनाइट बिछाने में लग जाना माँस और लहू को भानेवाली बात है। यह सब सुनने में अच्छा लगता है, भौतिकवादी युग से मेल खाता है, व्यवहार में उपयोगी बनता है, और परिणामों में स्पष्ट और प्रभावशाली होता है। परंतु क्या यह कलीसिया की उदात्त गरिमा और आवश्यक लक्ष्य से मेल खाता है? क्या इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए हमें किसी कलीसिया की आवश्यकता है? साधारण योग्यता के पार्षद, कुशल सड़क आयुक्त और औसत पुलिसकर्मी की सामान्य चौकसी इन परिणामों को सर्वोत्तम रीति से पूरा कर देगी। इन उद्देश्यों के लिए न कलीसिया चाहिए, न बाइबल, न मसीह, न व्यक्तिगत पवित्रता, और यही वह बिंदु है जिसकी ओर इस सारी बखानी गई उन्नति की प्रवृत्ति है। यदि कलीसिया के उद्देश्य उन परिणामों की ओर मोड़ दिए जाएँ जो अन्य माध्यमों से भी उतने ही अच्छे या उनसे बेहतर प्राप्त हो सकते हैं, तो कलीसिया शीघ्र ही एक उपद्रव समझी जाने लगेगी, ऐसी वस्तु जिसे अत्यंत संक्षिप्त प्रक्रिया से हटा दिया जाए।
परमेश्वर की कलीसिया के उद्देश्य इन बचकाने स्वप्नों और निर्बल दर्शनों से ऊपर उदात्त भव्यता में उठते हैं। उसका उद्देश्य व्यक्ति को नया जन्म देना और पवित्र करना है, उसे पवित्र बनाना और शुद्धिकरण तथा प्रशिक्षण के क्रम द्वारा अनंत जीवन के उच्च कार्यों के लिए तैयार करना है। कलीसिया समुद्र में डाले गए जाल के समान है। उद्देश्य समुद्र को बदलना उतना नहीं जितना समुद्र में से मछलियाँ पकड़ना है। समुद्र अपने मूल स्वभाव में बहता रहे, परंतु जाल अपनी मछलियाँ पकड़ लेता है। उन मछुओं से बड़े मूर्ख कभी नहीं मिलेंगे जो अपनी सारी शक्ति किसी रासायनिक प्रक्रिया से समुद्र के मूल तत्वों को बदलने में लगा दें, और व्यर्थ आशा करें कि इससे उन मछलियों का भंडार सुधर जाएगा जिन्हें उन्होंने कभी पकड़ा नहीं और कभी पकड़ न सकेंगे। इस विधि से व्यक्तिगत पवित्रता, जो कलीसिया के कार्य और उद्देश्यों की सबसे बड़ी आवश्यकता है, असंभव हो जाएगी, और स्वर्ग विश्वास, जीवन और आशा से मिटा दिया जाएगा। संसार को बचाना और व्यक्ति की उपेक्षा करना केवल काल्पनिक ही नहीं, हर प्रकार से हानिकारक है। यह नाम में सुंदर और सराहनीय प्रक्रिया है, संसार को बचाने की, पर परिणाम में यह कलीसिया को खो देना है, या, जो उसी के बराबर है, कलीसिया को सांसारिक बना देना और इस प्रकार उसे उसके पवित्र और उदात्त मिशन के अयोग्य कर देना। मसीह ने कहा कि संसार को प्राप्त करना और मनुष्य को बचाना विरोधी उद्देश्य हैं। मसीह पतरस को सिखाता है कि उसकी शैतानी युक्ति कलीसिया के लिए और कलीसिया की ओर से संसार को तो पा लेगी, परंतु आत्मा को खो देगी। हर बात उद्देश्य के लिए फलती-फूलती प्रतीत होती जबकि वास्तव में सब कुछ मृत्यु था। कलीसिया स्पष्ट रूप से, मुख्यतः और पूर्णतः एक आत्मिक संस्था है, अर्थात् ऐसी संस्था जो परमेश्वर के आत्मा द्वारा रची गई, जीवित की गई, अधिकृत की गई और संचालित की जाती है।
उसकी मशीनरी, विधियाँ, रूप, सेवाएँ और अधिकारी तब तक कोई शोभा, कोई प्रासंगिकता और कोई सामर्थ्य नहीं रखते, जब तक वे पवित्र आत्मा के भंडार और माध्यम न हों। उसका वास और उसकी प्रेरणा ही उसके दिव्य अस्तित्व को बनाते और उसके दिव्य उद्देश्य को सुनिश्चित करते हैं। यदि शैतान किसी भी विधि से पवित्र आत्मा को कलीसिया से बाहर कर सके, तो उसने कलीसिया को पृथ्वी पर परमेश्वर की कलीसिया होने से प्रभावी रूप से रोक दिया। वह यह उन माध्यमों या एजेंटों को, जिन्हें पवित्र आत्मा उपयोग करता है, कलीसिया से हटाकर और उनके स्थान पर स्वाभाविक को रखकर पूरा करता है, जो उसकी ऊर्जा के माध्यम कदाचित् ही होते हैं। मसीह ने सार्वभौमिक और अटल नियम तब घोषित किया जब उसने कहा, “जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।” कलीसिया में पवित्र प्रचारक हो सकता है, बहुत प्रार्थनाशील, बड़े अनुग्रह से भरा, आत्मा से परिपूर्ण पुरुष। परंतु यदि शैतान किसी भी विधि से उसे हटा दे और प्रार्थना-रहित, विश्वसनीय लगनेवाला, वाक्पटु और लोकप्रिय पुरुष रख दे, तो कलीसिया को लाभ हुआ प्रतीत हो सकता है, परंतु यह लाभ आत्मिक शक्तियों के स्थान पर स्वाभाविक शक्तियों को रखने से हुआ है, ऐसा लाभ जिसने अनजाने ही कलीसिया में क्रांति कर दी। किसी कलीसिया में पवित्र पुरुषों को अधिकारी बनाइए, जो बहुत सुसंस्कृत नहीं, पर परमेश्वर की गहरी बातों में निपुण हैं, मसीह और उसके उद्देश्य के प्रति भक्ति में सशक्त हैं, धनी नहीं और उच्च सामाजिक पद के नहीं। अब इन अधिकारियों को बदलकर ऐसे पुरुष रखिए जो नैतिकता में हर प्रकार से भले हैं, पर प्रार्थना और भक्ति के लिए समर्पित या प्रसिद्ध नहीं, उच्च सामाजिक पद के और कुशल वित्तदाता पुरुष, और कलीसिया वित्त में स्पष्ट सुधार के सिवा परिवर्तन को मुश्किल से ही पहचान पाती है। परंतु कलीसिया में एक अदृश्य और सामर्थी परिवर्तन हो चुका है, जो मूलभूत है। वह आत्मिक कलीसिया से सांसारिक कलीसिया में बदल गई है। दोपहर से आधी रात का परिवर्तन भी इससे अधिक तीव्र नहीं।
इस बिंदु पर शैतान अपना सबसे घातक और सबसे शापित कार्य कर रहा है, और वह इसलिए और भी घातक और शापित है कि वह अनदेखा, अदृश्य है, कोई धक्का नहीं देता और कोई चेतावनी नहीं जगाता।
शैतान कलीसिया को प्रत्यक्ष, स्पष्ट बुराई से नहीं बिगाड़ता, बल्कि चुपचाप विस्थापन और अनदेखे प्रतिस्थापन से। उच्चतर को हटाया जा रहा है, आत्मिक सामाजिक के लिए स्थान छोड़ता है, और दिव्य को निकाल दिया जाता है क्योंकि उसे गौण बना दिया गया है।
कलीसिया का बिगाड़ और विनाश शैतान तब सिद्ध करता है जब आत्मिक शक्तियाँ हटा दी जाती हैं या स्वाभाविक के अधीन कर दी जाती हैं, और सामाजिक मनोरंजन, न कि आत्मिक उन्नति, लक्ष्य बन जाता है। इस प्रक्रिया में केवल मनोरंजन के उद्देश्य और लक्ष्य ही नहीं हैं, बल्कि इसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से आत्मिक लक्ष्य को नरम और परिवर्तित करना है, और आत्मिक संकीर्णता की कठोर विशिष्टता माने जानेवाले से विस्तार देना है। परंतु अंत में यह उस सबको मिटा देती है जो स्पष्ट रूप से आत्मिक है, और जो किसी भी अर्थ में गहराई से धार्मिक है वह आत्मिक की मृत्यु के बाद बचा नहीं रहेगा। परमेश्वर की कलीसिया के लक्ष्य के रूप में आत्मिक उन्नति पूरी तरह नज़र से ओझल हो जाती है, और मनोरंजन, जो मन को भाए और सुखद हो, आगे आ जाता है। सामाजिक शक्तियाँ आत्मिक शक्तियों को केवल हटाती ही नहीं, बल्कि प्रभावी रूप से उन्हें नष्ट कर देती हैं।
अपनी रसोई और बैठक के साथ, अपने क्लब और लाइसियम के साथ, और देह तथा संसार के प्रति अपनी सेवाओं के साथ एक आधुनिक कलीसिया संकेतपूर्ण भी है और चिंताजनक भी। आदि कलीसिया ने अपने सिद्धांतों की रक्षक और अपने जीवन की अभिव्यक्ति के रूप में जो माध्यम आरंभ और पोषित किए, और आधुनिक एवं प्रगतिशील कलीसिया अपने सहयोगी या विकल्प के रूप में जो प्रस्तुत करती है, उनके बीच जो अंतर दिखता है, वह कितना संकेतपूर्ण है! मूल संस्थाएँ पूरी तरह आत्मिक थीं, उन सभी तत्वों को सुदृढ़ करने और विकसित करने के लिए बनी थीं जो मिलकर परमेश्वर का गहरा और स्पष्ट अनुभव रचते हैं। वे आत्मिक जीवन के प्रशिक्षण-विद्यालय थीं, उसके विकास को मुख्य उद्देश्य मानकर उसकी सेवा करनेवाली। वे कभी नैतिक, सौंदर्यबोधक और मानसिक क्षेत्रों में नहीं ठहरीं। उन्होंने कोई ऐसी रुचि या झुकाव नहीं पोसा जो आत्मिक न हो, और जो आत्मा की ईश्वरीय बातों में उन्नति की सेवा न करता हो।
वे यह मानकर चलती थीं कि जो भी उनके पास आते हैं वे सचमुच आनेवाले क्रोध से भागना चाहते हैं और पूर्ण छुटकारे के लिए सच्चे मन से कराह रहे हैं, और यह कि इन्हें सर्वोत्तम सहायता देने का उनका दायित्व अत्यंत पवित्र और कठोर प्रकार का है। उन्हें कभी यह सूझा ही नहीं कि लाइसियम या सामाजिक मेल-मिलाप ऐसे माध्यम हैं जिनसे परमेश्वर का अनुग्रह बहेगा और जिन पर आत्मिक उपयोगों के लिए कर लगाया जा सकता है। इन सामाजिक और शारीरिक शक्तियों को कई स्थानों पर आत्मिक बातों की सिद्धता माना जाता है। इन माध्यमों को आत्मिक भक्ति के परिपक्व फल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसकी संस्कृति और प्रगति से सुवासित और सिद्ध, और अब से प्रार्थना और गवाही की सभा की दासियों के रूप में नियुक्त। हम इस मेल का अत्यंत गंभीरता से विरोध करते हैं। इनमें साझा क्या है? “यदि दो जन परस्पर सहमत न हों, तो क्या वे इकट्ठे चल सकते हैं?”
लाइसियम या सामाजिक मेल-मिलाप द्वारा भक्ति के कौन-से तत्व सुरक्षित रहते हैं? वे आत्मिक जीवन के कौन-से पहलुओं को बढ़ावा देते हैं? लाइसियम की किस विशेषता से विश्वास सशक्त होता है? उसमें ऐसे कौन-से तत्व मिलते हैं जो स्पष्ट रूप से भक्तिपूर्ण हों या भक्ति के सहायक हों? सामाजिक मेल-मिलाप अधिक प्रार्थनापूर्ण, अधिक पवित्र जीवन कैसे उत्पन्न करता है? आत्मा को परमेश्वर के निकट लाने के लिए उसके पास कौन-से गुप्त स्रोत हैं? वह मसीही सहभागिता के बंधन कहाँ बनाता या सुदृढ़ करता है? क्या वह तुच्छ और सांसारिक नहीं है? क्या वह इंद्रियपरायण और शारीरिक नहीं है? क्या वह शारीरिक, हल्के और सांसारिक लोगों की रुचियों की पूर्ति और उनके अनुकूल नहीं है? लाइसियम और मसीह की गवाही देने के बीच उद्देश्य और आत्मा की क्या एकता है? एक तीव्र रूप से आत्मिक है। दूसरे में आत्मिक उपयोगों की एक मात्रा या बिंदु भी नहीं।
स्वर्गीय सहायकों की सूची में हम स्केटिंग रिंक, शारीरिक व्यायाम और जिमनेजियम भी जोड़ सकते हैं। यदि युवा लाइसियम में सम्मिलित होना, सामाजिक मेल-मिलाप का आनंद लेना या बैंक स्थापित करना चाहें, तो वे ऐसा करें, परंतु इन्हें पवित्र संस्थाएँ और आत्मिक जीवन के पोषक कहकर उन्हें धोखा न दें और भक्ति को न गिराएँ।
हम इसे चाहे जितना छिपाएँ, इस पर चाहे जितना तर्क करें, इसके लिए चाहे जितनी क्षमा-याचना करें, विकास, परिवर्तन और संस्कृति के विषय में व्यर्थ दर्शन-चिंतन करें, सच्चाई यह है कि हमने वह तीव्र प्रकार का व्यक्तिगत अनुभव, अनंत बातों की वह गहरी प्रतीति खो दी है, जो सब महान आत्मिक आंदोलनों की स्पष्ट विशेषताएँ रही हैं। बहुत-से प्रचारक और लोग अपने अनुभव में इतने गिर गए हैं कि उन्हें ये स्पष्ट और प्रबल आत्मिक माध्यम रास नहीं आते; और वे अपनी अनात्मिक रुचियों को संतुष्ट करने के लिए ऐसी योजनाएँ और संस्थाएँ गढ़ रहे हैं जो मसीह और संसार के बीच की हैं; जो, मूलतः गलत न होते हुए भी, आत्मिक सामर्थ्य का एक कण भी नहीं रखतीं, और कभी स्वर्गीय संवाद के माध्यम नहीं बन सकतीं।
कहा जाता है कि हम लोगों को स्पष्ट रूप से आत्मिक अनुग्रह के साधनों में उपस्थित नहीं करा सकते। समस्या क्या है? क्या संस्थाएँ घिस चुकी हैं और नम्र, भक्त आत्मा के लिए अब मूल्यवान नहीं रहीं? इसकी पुष्टि करने का साहस कौन करेगा? लोगों की रुचियाँ निम्न और बिगड़ी हुई हैं। तो क्या हम अपवित्र इच्छाओं के अनुकूल माध्यम बदल दें? नहीं; आइए हम आत्मिक बातों की भूख को ऊँचा उठाएँ, और अपने लोगों की रुचियों को सुधारें और उन्नत करें। क्रांति प्रचारक से आरंभ हो। वह परमेश्वर के साथ तब तक मल्लयुद्ध करे जब तक उसकी अभिषेक-प्रतिज्ञा जीवंत न हो जाए, ताकि सब उसके लक्ष्य का दबाव, उसके उत्साह की तीव्रता, उसके उद्देश्य की एकाग्रता, और उसके जीवन की पवित्रता और उच्चता अनुभव कर सकें, और जब तक लोग उसके हृदय की आग और उद्देश्य को न पकड़ लें, और सब परमेश्वर की सारी परिपूर्णता के लिए हाँफते हुए सिद्ध प्रेम के क्षेत्रों की ओर बढ़ें। इस संयुक्त, सामर्थी, ईश्वरीय प्रेरणा के अधीन सामाजिक मेल-मिलाप और लाइसियम भुला दिए जाएँगे और फीके पड़ जाएँगे, और संतों की सब सभाएँ आकर्षक और आनंददायक होंगी।
कलीसिया अनात्मिक माध्यमों के साथ गठबंधन नहीं कर सकती। ऐसा करके वह अपने विश्वास का तनाव तोड़ देती है और पवित्र आत्मा को त्याग देती है। वह अपवित्र इच्छाओं की आपूर्तिकर्ता नहीं हो सकती। और लोगों का मनोरंजन करने के दरिद्र कार्य में गिर जाना भी उसका क्षेत्र नहीं है। यह उसकी सबसे दुखद भूल है, जब उसकी गंभीर सभाएँ संगीत-समारोह और व्याख्यान के हवाले कर दी जाती हैं, उसकी स्तुति सांसारिक संगीत में बदल दी जाती है, उसकी कक्षाएँ बैठकों में, उसके मेल-मिलाप उसकी प्रार्थना-सभाओं से अधिक लोकप्रिय, परमेश्वर का भवन भोज का भवन बना दिया जाता है, और प्रार्थना के भवन के बजाय सामाजिक आनंद खोजा जाता है। आत्मा की एकता और पवित्र भाईचारा सामाजिक आत्मीयताओं और सांसारिक आकर्षणों के लिए स्थान बनाने को हटा और नष्ट कर दिए जाते हैं। उसका उच्च और राजसी कर्तव्य, जिसके द्वारा वह अपने प्रभु के प्रति निष्कलंक निष्ठा बनाए रखती है, पवित्रता पर बल देना और उसकी उन्नति और सिद्धता के लिए सब साधन देना है। यह किया जाए तो आत्मिक चरित्र और आत्मीयताएँ बाकी सब कुछ व्यवस्थित कर देंगी।
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