अध्याय 1 / 1

कभी नाश न होंगे!

यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

कभी नाश न होंगे!

कभी नाश न होंगे!

जे. सी. राइल द्वारा

विषय-सूची

भूमिका

I. अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का क्या अर्थ है?

II. पवित्रशास्त्र के वे आधार जिन पर यह सिद्धान्त टिका है।

III. बहुत से लोग इस सिद्धान्त को क्यों अस्वीकार करते हैं।

IV. यह सिद्धान्त व्यावहारिक रूप से इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है।

पाद-टिप्पणियाँ

भूमिका

"वे कभी नाश न होंगी।"—यूहन्ना 10:28

सर्वप्रथम ड्रमंड्स ट्रैक्ट डिपो, स्टर्लिंग, स्कॉटलैंड द्वारा प्रकाशित

धर्म में दो बातें ऐसी हैं जिन पर बाइबल की शिक्षा अत्यन्त स्पष्ट और सुनिश्चित है। इनमें से एक है अधर्मियों का भयानक संकट; दूसरी है धर्मियों की पूर्ण सुरक्षा। एक है उन लोगों का आनन्द जिनका मन फिराव हुआ है; दूसरी है उन लोगों का दुःख जिनका मन नहीं फिरा। एक है स्वर्ग के मार्ग पर होने का आशीष; दूसरी है नरक के मार्ग पर होने की दुर्दशा।

मैं इसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानता हूँ कि मसीही कहलाने वालों के मनों पर ये दोनों बातें निरन्तर अंकित की जाएँ। मेरा विश्वास है कि परमेश्वर की सन्तानों के अपार विशेषाधिकार और संसार की सन्तानों का घातक संकट, मसीह की कलीसिया के सामने सदा सबसे स्पष्ट रंगों में प्रस्तुत किए जाने चाहिए। मेरा विश्वास है कि मसीह में रहने वाले मनुष्य और मसीह में न रहने वाले मनुष्य के बीच का अन्तर कभी भी अत्यधिक दृढ़ता और पूर्णता से नहीं बताया जा सकता। इस विषय में संकोच करना मनुष्यों की आत्माओं की निश्चित हानि है। जहाँ ऐसा संकोच किया जाता है, वहाँ लापरवाह लोग नहीं जागेंगे, विश्वासी स्थिर नहीं होंगे, और परमेश्वर के कार्य को हानि पहुँचेगी।

पाठक, सम्भव है आप यह न जानते हों कि बाइबल में सच्चे मसीहियों के विशेष लाभ के लिए सांत्वना देने वाले सत्यों का कितना बड़ा भण्डार है। वचन में एक आत्मिक कोषागार है जिसमें बहुतेरे कभी प्रवेश नहीं करते, और कुछ की आँखों ने उसे देखा तक नहीं। वहाँ आप मन फिराव, विश्वास और मन-परिवर्तन के पुराने प्रथम सिद्धान्तों के अतिरिक्त अनेक स्वर्णिम सत्य पाएँगे। वहाँ आप महिमामय क्रम में देखेंगे: मसीह में पवित्र जनों का अनन्त चुनाव,—वह विशेष प्रेम जिससे परमेश्वर ने उनसे जगत की उत्पत्ति से पहले प्रेम किया,—स्वर्ग में अपने जी उठे हुए सिर के साथ उनका रहस्यमय एकत्व, और उसके फलस्वरूप उनके प्रति उसकी सहानुभूति,—उनके महायाजक यीशु की निरन्तर मध्यस्थता की प्रार्थना में उनका भाग,—पिता और पुत्र के साथ प्रतिदिन सहभागिता करने की उनकी स्वतन्त्रता,—आशा की उनकी पूर्ण निश्चयता,—अन्त तक उनका स्थिर रहना। ये उन बहुमूल्य वस्तुओं में से कुछ हैं जो पवित्रशास्त्र में परमेश्वर से प्रेम रखने वालों के लिए रखी गई हैं: ये ऐसे सत्य हैं जिन्हें कुछ लोग अज्ञानता के कारण उपेक्षित करते हैं। कैलिफ़ोर्निया के स्पेनियों के समान वे नहीं जानते कि उनके पैरों के नीचे कैसी समृद्ध खानें हैं। ये ऐसे सत्य हैं जिन्हें कुछ लोग झूठी नम्रता के कारण उपेक्षित करते हैं। वे उन्हें दूर से भय और काँपते हुए देखते हैं, पर उन्हें छूने का साहस नहीं करते। परन्तु ये ऐसे सत्य हैं जो परमेश्वर ने हमारी शिक्षा के लिए दिए हैं, और जिनका अध्ययन करने के लिए आप और मैं बाध्य हैं। इनकी उपेक्षा करके अपनी हानि किए बिना रहना असम्भव है।

विश्वासी के विशेषाधिकारों की सूची में से एक विशेष सत्य की ओर मैं आज आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ। वह सत्य अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त है,—यह सिद्धान्त कि सच्चे मसीही कभी नाश न होंगे और न त्यागे जाएँगे। यह ऐसा सत्य है जिसका स्वाभाविक मन ने हर युग में कटु विरोध किया है। यह ऐसा सत्य है जो अनेक कारणों से वर्तमान समय में विशेष ध्यान के योग्य है। सबसे बढ़कर, यह ऐसा सत्य है जिससे परमेश्वर की सब सन्तानों का सुख अत्यन्त घनिष्ठता से जुड़ा है।

अन्त तक स्थिर रहने के विषयों पर विचार करते हुए मैं चार काम करने का प्रस्ताव रखता हूँ।

I. मैं समझाऊँगा कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का क्या अर्थ है।

II. मैं पवित्रशास्त्र के वे आधार दिखाऊँगा जिन पर यह सिद्धान्त टिका है।

III. मैं कुछ कारण बताऊँगा कि बहुत से लोग इस सिद्धान्त को क्यों अस्वीकार करते हैं।

IV. मैं कुछ कारण बताऊँगा कि यह सिद्धान्त व्यावहारिक रूप से इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है।

मैं इस विषय के पास संकोच के साथ आता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि यह ऐसा विषय है जिस पर पवित्र जन एक-सा नहीं देखते। परन्तु परमेश्वर मेरा साक्षी है कि इस पुस्तिका को लिखने में मेरी इच्छा पवित्रशास्त्रीय सत्य के अतिरिक्त किसी और बात को बढ़ावा देने की नहीं है। अन्त तक स्थिर रहने के पक्ष में तर्क देते हुए मैं शुद्ध विवेक से कह सकता हूँ कि मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि मैं मसीह के सुसमाचार के एक महत्त्वपूर्ण भाग का पक्ष ले रहा हूँ। परमेश्वर पवित्र आत्मा लेखक और पाठक दोनों को सब सत्य में ले चले! वह धन्य दिन शीघ्र आए जब सब लोग प्रभु को पूरी रीति से जानें, और मतभेद और फूट सदा के लिए मिट जाएँ!

I. अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त

का क्या अर्थ है?

इस बात को स्पष्ट करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यही इस विषय की नींव है। यह सम्पूर्ण तर्क की दहलीज़ पर स्थित है। धर्मविज्ञान के विवादित विषयों की सभी चर्चाओं में शब्दों की परिभाषा में अत्यधिक सटीक होना भी कम है। अन्त तक स्थिर रहने के विरुद्ध जो आधी निन्दा दुर्भाग्य से उँडेली गई है, वह प्रश्नगत सिद्धान्त को पूरी तरह गलत समझने से उत्पन्न हुई है। इसके विरोधियों ने अपने ही रचे हुए भूतों से युद्ध किया है, और अपनी शक्ति हवा को पीटने में गँवा दी है।

जब मैं अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त की बात करता हूँ, तो मेरा आशय यह है। मैं कहता हूँ कि बाइबल सिखाती है कि सच्चे मसीही अपने जीवन के अन्त तक अपने धर्म में स्थिर रहेंगे। वे कभी नाश न होंगे। वे कभी खोए न जाएँगे। वे कभी त्यागे न जाएँगे। एक बार मसीह में होने पर वे सदा मसीह में रहेंगे। एक बार लेपालकपन और अनुग्रह से परमेश्वर की सन्तान बन जाने पर वे कभी उसकी सन्तान होना नहीं छोड़ेंगे और शैतान की सन्तान नहीं बनेंगे। एक बार आत्मा के अनुग्रह से सम्पन्न हो जाने पर वह अनुग्रह उनसे कभी छीना न जाएगा। एक बार क्षमा और पापमुक्ति पा लेने पर वे अपनी क्षमा से कभी वंचित न किए जाएँगे। एक बार जीवित विश्वास से मसीह से जुड़ जाने पर उनका यह मेल कभी टूटेगा नहीं। एक बार परमेश्वर द्वारा जीवन की ओर ले जाने वाले सकरे मार्ग में बुलाए जाने पर उन्हें कभी नरक में गिरने न दिया जाएगा। एक शब्द में, पृथ्वी पर जो भी पुरुष, स्त्री या बालक उद्धार करने वाला अनुग्रह पाता है, वह देर-सवेर अनन्त महिमा पाएगा। जो भी आत्मा एक बार धर्मी ठहराई गई और मसीह के लहू में धोई गई, वह न्याय के दिन मसीह के दाहिने हाथ पर सुरक्षित पाई जाएगी।

पाठक, इस प्रकार के कथन बहुत ही कठोर लगते हैं। यह मैं भली-भाँति जानता हूँ। परन्तु मैं इस विषय को यहीं नहीं छोड़ूँगा; मुझे इस पर थोड़ी देर और ठहरना होगा। मैं जिस सिद्धान्त का समर्थन कर रहा हूँ, उसे उस भ्रामक चित्रण के बादल से मुक्त करना चाहता हूँ जिससे बहुत से लोग उसे धुँधला कर देते हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम उसे उसके अपने सही रूप में देखो — उस रूप में नहीं जैसा अज्ञानता और पक्षपात के हाथ उसे चित्रित करते हैं, परन्तु उस रूप में जैसा वह सत्य के पवित्रशास्त्र में प्रस्तुत किया गया है।

अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त से अधर्मियों और संसारी लोगों का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह उस विशाल भीड़ से सम्बन्ध नहीं रखता जिनके पास न ज्ञान है, न विचार, न विश्वास, न भय, और मसीही जीवन के नाम के सिवा और कुछ भी नहीं। उनके विषय में यह सत्य नहीं कि वे "कभी नाश न होंगे।" इसके विपरीत, यदि वे मन न फिराएँ तो उनका अन्त दयनीय होगा।

अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त से कपटियों और झूठे अंगीकार करनेवालों का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह उन अभागे लोगों से सम्बन्ध नहीं रखता जिनका धर्म केवल बातों, शब्दों और भक्ति के बाहरी रूप में है, जबकि उनके हृदय आत्मा के अनुग्रह से खाली हैं। उनके विषय में यह सत्य नहीं कि वे "कभी नाश न होंगे।" इसके विपरीत, यदि वे मन न फिराएँ तो सदा के लिए खो जाएँगे।[1]

अन्त तक स्थिर रहना वास्तविक, सच्चे, आत्मिक मसीहियों का विशेष अधिकार है। यह मसीह की उन भेड़ों का है जो उसका शब्द सुनती और उसके पीछे चलती हैं। यह उनका है जो प्रभु यीशु के नाम से और परमेश्वर की आत्मा से धोए गए, धर्मी ठहराए गए और पवित्र किए गए हैं। यह उनका है जो मन फिराते हैं, मसीह पर विश्वास करते हैं और पवित्र जीवन जीते हैं। यह उनका है जो नए सिरे से जन्मे हैं, जिनका मन परिवर्तित हुआ है, और जिन्हें पवित्र आत्मा ने नई सृष्टि बनाया है। यह उनका है जिनका हृदय टूटा और पिसा हुआ है, जो आत्मा की बातों पर मन लगाते हैं और आत्मा का फल लाते हैं। यह परमेश्वर के उन चुने हुए लोगों का है जो दिन-रात उसकी दुहाई देते हैं। यह उनका है जो प्रभु यीशु को अनुभव से जानते हैं, और जिनमें विश्वास, आशा और प्रेम है। यह उनका है जो दाखलता की फलवन्त डालियाँ हैं — बुद्धिमान कुँवारियाँ, जगत की ज्योति, पृथ्वी का नमक, राज्य के वारिस, मेम्ने के अनुयायी। बाइबल इन्हीं को सन्त कहती है। और यह केवल सन्तों के ही विषय में लिखा है कि वे "कभी नाश न होंगे।"[2]

क्या कोई यह समझता है कि जो मैं कह रहा हूँ वह केवल प्रतिष्ठित सन्तों पर ही लागू होता है? क्या कोई सोचता है कि प्रेरितों, भविष्यद्वक्ताओं और शहीदों जैसे लोग तो शायद अन्त तक स्थिर रहें, परन्तु साधारण विश्वासियों के विषय में यह नहीं कहा जा सकता? वह जान ले कि वह पूरी तरह भूल में है। वह जान ले कि अन्त तक स्थिर रहने का यह अधिकार परमेश्वर के सारे परिवार का है — छोटे का भी और बड़े का भी, निर्बल का भी और बलवान का भी, अनुग्रह में बालकों का भी और कलीसिया के पुराने स्तम्भों का भी। सबसे छोटा विश्वास भी उतना ही निश्चित रूप से अटल रहेगा जितना सबसे बड़ा। अनुग्रह की सबसे छोटी चिंगारी भी उतनी ही अबुझ सिद्ध होगी जितनी सबसे अधिक जलती और चमकती ज्योति। हो सकता है तुम्हारा विश्वास बहुत दुर्बल हो, तुम्हारा अनुग्रह बहुत कमज़ोर हो, हमारा बल बहुत थोड़ा हो, और तुम्हें लगे कि आत्मिक बातों में तुम केवल एक बच्चे हो। फिर भी मत डरो, और न घबराओ। प्रतिज्ञा इस पर निर्भर नहीं कि मनुष्य में अनुग्रह कितना है, परन्तु इस पर कि वह सच्चा और असली है। एक पैसा भी राज्य का उतना ही सच्चा चलता सिक्का है जितनी सोने की गिन्नी, चाहे उसका मूल्य उतना न हो। जहाँ कहीं पाप से सच्चा मन फिराव है, मसीह पर सच्चा भरोसा है और पवित्रता का सच्चा अनुसरण है, वहाँ एक ऐसा काम है जो कभी नष्ट न होगा। वह तब भी खड़ा रहेगा जब पृथ्वी और उसके सब कामों को जला दिया जाएगा।

पाठक, अन्त तक स्थिर रहने के विषय में अभी कुछ बातें कहनी बाकी हैं, जिन पर मैं तुमसे विशेष ध्यान देने का अनुरोध करता हूँ। इनके बिना इस सिद्धान्त का वर्णन अधूरा और अपूर्ण रहेगा। इनका उल्लेख इस विषय को घेरे हुए कुछ कठिनाइयों को दूर कर सकता है, और मसीही अनुभव के कुछ ऐसे पक्षों पर प्रकाश डाल सकता है जिन्हें परमेश्वर के बच्चे समझना कठिन पाते हैं।

तो स्मरण रखो कि जब मैं तुमसे कहता हूँ कि विश्वासी अन्त तक स्थिर रहेंगे, तो मैं क्षण भर के लिए भी यह नहीं कहता कि वे कभी पाप में नहीं गिरेंगे। वे बुरी तरह, घिनौने ढंग से और लज्जाजनक रूप में गिर सकते हैं — सच्चे धर्म की बदनामी के लिए और अपने ही गहरे और कड़वे शोक की हानि के लिए। नूह एक बार मतवालेपन में गिरा। अब्राहम ने दो बार झूठ कहा कि सारा केवल उसकी बहन है। याकूब ने अपने पिता इसहाक को धोखा दिया। मूसा ने अपने होंठों से बिना सोचे बात कह दी। दाऊद ने भयानक व्यभिचार किया। सुलैमान ने अपना पहला प्रेम खो दिया और अपनी अनेक पत्नियों के द्वारा भटका दिया गया। हिजकिय्याह परमेश्वर को भूल गया और अपने धन पर घमण्ड किया। पतरस ने शपथ खाकर तीन बार अपने प्रभु का इन्कार किया। बारी में सब प्रेरितों ने मसीह को छोड़ दिया। ये सब उदाहरण प्रमाण हैं। ये सब दुःखद प्रमाण हैं कि मसीही गिर सकते हैं। परन्तु विश्वासी कभी पूरी तरह, अन्तिम रूप से और सम्पूर्णतः नहीं गिरेंगे। वे अपने गिरने से सदा मन फिराव के द्वारा फिर उठेंगे और परमेश्वर के साथ अपनी चाल फिर आरम्भ करेंगे। यद्यपि वे बहुत दीन किए और गिराए जाएँ, तो भी वे अनुग्रह को पूरी तरह कभी नहीं खोते। उसका सुख वे खो सकते हैं, परन्तु उसका अस्तित्व नहीं। ग्रहण लगे चन्द्रमा की नाईं, उनकी ज्योति कुछ समय के लिए अन्धकार में बदल जाती है; परन्तु वे त्यागे और फेंके नहीं जाते। जाड़े के वृक्षों की नाईं, कुछ समय तक उन पर न पत्ते दिखाई देते हैं न फल; परन्तु जीवन उनकी जड़ों में अब भी बना रहता है। परन्तु वे कभी नाश नहीं होते।

एक और बात स्मरण रखिए: जब मैं कहता हूँ कि विश्वासी अन्त तक स्थिर रहेंगे, तो मेरा यह अर्थ नहीं कि उन्हें अपनी सुरक्षा के विषय में कभी कोई सन्देह या भय न होगा। ऐसा तो बिलकुल नहीं है; परमेश्वर के सबसे पवित्र जन भी कभी-कभी अपनी आत्मिक दशा की चिन्ताओं से अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं। वे अपने हृदयों में इतनी निर्बलता देखते हैं, और अपने आचरण को अपनी अभिलाषाओं से इतना कम पाते हैं, कि उनके सामने यह प्रलोभन प्रबल हो जाता है कि वे अपने अनुग्रह की सच्चाई पर सन्देह करें, और यह कल्पना करें कि वे केवल कपटी हैं और स्वर्ग तक कभी न पहुँचेंगे। सुरक्षित होना एक बात है; और यह निश्चय रखना कि हम सुरक्षित हैं, बिलकुल दूसरी बात है। ऐसे अनेक सच्चे विश्वासी हैं जो जीवन भर आशा की पूर्ण निश्चयता का आनन्द कभी नहीं पाते। उनका विश्वास इतना निर्बल और उनके पाप का बोध इतना प्रबल होता है कि वे मसीह में अपने भाग के विषय में कभी निश्चिन्त नहीं हो पाते। बहुत बार वे दाऊद के साथ कह सकते थे, "मैं एक न एक दिन नाश हो जाऊँगा" (1 शमूएल 27:1); और अय्यूब के साथ, "मेरी आशा कहाँ रही?" (अय्यूब 17:15)। विश्वास करने में जो आनन्द और शान्ति कुछ लोग अनुभव करते हैं, और आत्मा की जो गवाही कुछ लोग पाते हैं, उन्हें वे विश्वासी कभी प्राप्त करते नहीं दिखाई देते, जिनके विश्वास से इनकार करना असम्भव है। परमेश्वर के अनुग्रह से बुलाए हुए होने पर भी, जैसा कि वे प्रत्यक्ष हैं, वे उस बुलाहट की पूरी सान्त्वना का स्वाद कभी नहीं चखते। फिर भी वे पूर्ण रीति से सुरक्षित हैं, चाहे वे स्वयं इसे मानने से इनकार करें।

"अधिक सुखी, परन्तु अधिक सुरक्षित नहीं,

स्वर्ग में महिमा पाई हुई आत्माएँ।"

उद्धार के लिए आशा की पूर्ण निश्चयता आवश्यक नहीं है। उसका न होना इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि मनुष्य अन्त तक स्थिर न रहेगा। धर्मविज्ञान के उस महान गुरु, जॉन बनयन, को भली-भाँति मालूम था कि वह क्या लिख रहा है, जब उसने हमें बताया कि निराशा (Despondency) और बहुत-डरपोक (Much-afraid) भी अन्ततः स्वर्गीय नगर में सुरक्षित पहुँच गए, ठीक वैसे ही जैसे सत्य-के-लिए-वीर (Mr. Valiant-for-the-truth) पहुँचा। परमेश्वर के सबसे सन्देहशील सन्तान के विषय में भी यह उतना ही सत्य है जितना सबसे सबल के विषय में, कि वह "कभी नाश न होगा।" हो सकता है वह इसे कभी अनुभव न करे। परन्तु क्या यह सत्य नहीं है?[3]

अन्तिम बात यह स्मरण रखिए कि विश्वासियों के अन्त तक स्थिर रहने की निश्चितता उन्हें जागते रहने, प्रार्थना करने और साधनों का उपयोग करने की आवश्यकता से मुक्त नहीं करती, और न व्यावहारिक उपदेशों के द्वारा उन्हें प्रोत्साहित करना अनावश्यक बनाती है। ऐसा तो बिलकुल नहीं है; परमेश्वर उन्हें विश्वास में बनाए रखने में समर्थ ठहराता ही साधनों के उपयोग के द्वारा है। वह उन्हें मनुष्य की डोरियों से खींचता है। वह चेतावनियों और सशर्त प्रतिज्ञाओं को उस व्यवस्था का अंग बनाकर काम में लाता है जिसके द्वारा वह उनकी अन्तिम सुरक्षा निश्चित करता है। यही तथ्य कि वे परमेश्वर के ठहराए हुए सहायकों और विधियों को तुच्छ जानते, इस बात का स्पष्ट प्रमाण होता कि उनमें अनुग्रह है ही नहीं और वे विनाश के मार्ग पर हैं। पौलुस को जहाज़ के टूटने से पहले परमेश्वर की ओर से विशेष प्रकाशन मिला था कि वह और जहाज़ के सब लोग सुरक्षित किनारे पहुँचेंगे। फिर भी यह उल्लेखनीय बात है कि उसने सिपाहियों से कहा, "यदि ये मल्लाह जहाज़ पर न रहें, तो तुम नहीं बच सकते।" (प्रेरितों के काम 27:31)। वह जानता था कि परिणाम निश्चित है, परन्तु यह भी मानता था कि वह परिणाम कुछ निश्चित साधनों के उपयोग से ही प्राप्त होना है। पवित्रशास्त्र में विश्वासियों के लिए जो चेतावनियाँ, सशर्त प्रतिज्ञाएँ और समझावनियाँ भरी पड़ी हैं, वे सब उस ईश्वरीय कार्य-विधि का अंग हैं जिसके द्वारा उनका अन्त तक स्थिर रहना पूरा होता है। एक पुराना लेखक कहता है, "वे यह नहीं दर्शातीं कि पवित्र लोग गिर सकते हैं; वे तो उन्हें गिरने से बचाए रखने के रक्षक साधन हैं।" जो मनुष्य सोचता है कि वह ऐसी चेतावनियों के बिना भी निर्वाह कर सकता है और उन्हें व्यवस्था-सम्बन्धी कहकर तुच्छ जानता है, उस पर यह सन्देह करना उचित है कि वह धोखेबाज़ है, जिसका हृदय अभी तक नया नहीं हुआ। जिसे सचमुच आत्मा ने सिखाया है, वह प्रायः अपनी निर्बलता का नम्र बोध रखेगा, और जो कुछ भी उसके विवेक को जगा सके और उसे सावधान रख सके उसके लिए धन्यवादी होगा। जो अन्त तक स्थिर रहते हैं वे किसी साधन पर निर्भर नहीं हैं, फिर भी वे साधनों से स्वतन्त्र भी नहीं हैं। उनका अन्तिम उद्धार व्यावहारिक उपदेशों के पालन पर टिका नहीं है, परन्तु ऐसे उपदेशों पर ध्यान देने से ही वे सदा अन्त तक बने रहेंगे। यह प्रतिज्ञा उन्हीं की है जो परिश्रमी, जागरूक, प्रार्थनाशील और नम्र हैं: "वे कभी नाश न होंगे।"

पाठक, अब मैंने आपको बता दिया है कि जब मैं अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त की बात करता हूँ तो मेरा क्या तात्पर्य होता है। यही, और केवल यही, वह सिद्धान्त है जिसका बचाव करने को मैं इस पुस्तिका में तैयार हूँ। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि जो कुछ मैंने कहा है उसे भली-भाँति तौलें, और मेरे कथन को हर ओर से परखें। मेरा विश्वास है कि वह जाँच में खरा उतरेगा।

यह कहने से काम नहीं चलेगा कि अन्त तक स्थिर रहने का यह सिद्धान्त लापरवाह और अधर्मी जीवन को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति रखता है। ऐसा आरोप सर्वथा असत्य है। इसे उचित रीति से सामने रखा ही नहीं जा सकता। जो जानबूझकर पाप में जीता है, चाहे उसका अंगीकार कितना ही ऊँचा क्यों न हो, उसकी ओर से मुझे एक शब्द भी नहीं कहना है। वह अपने आप को धोखा दे रहा है। उसके हाथ में झूठ है। उसमें परमेश्वर के चुने हुए लोगों का कोई चिह्न नहीं है। जिस स्थिर रहने की मैं पैरवी करता हूँ वह पापियों का नहीं, पवित्र लोगों का है। वह शारीरिक और अधर्मी मार्गों में बने रहना नहीं, बल्कि विश्वास और अनुग्रह के मार्ग में बने रहना है। मुझे ऐसा मनुष्य दिखाइए जो जानबूझकर अपवित्र जीवन जीता है, फिर भी घमण्ड करता है कि वह मन फिरा चुका है और कभी नाश न होगा, और मैं साफ़ कहता हूँ कि मुझे उसमें कोई आशा की बात नहीं दिखती। वह सब भेद जानता हो और स्वर्गदूतों की बोली बोलता हो, परन्तु जब तक उसका जीवन नहीं बदलता, मुझे तो वह नरक के राजमार्ग पर चलता दिखाई देता है।[4]

हमें यह कहकर टालना ठीक नहीं कि अन्त तक स्थिर रहने का यह सिद्धान्त केवल कैल्विनवाद की एक बात है। किसी सत्य को बुरा नाम देकर उसके विरुद्ध पूर्वाग्रह खड़ा कर देने से सरल कुछ भी नहीं। जो सिद्धान्त मनुष्यों को पसन्द नहीं आते, उनके साथ वे वैसा ही करते हैं जैसा नीरो ने आरम्भिक मसीहियों को सताते समय किया था। वे उन्हें एक घिनौना वस्त्र पहनाते हैं, फिर उन्हें तिरस्कार के लिये सबके सामने खड़ा करते हैं और उनकी निन्दा करते हैं। सन्तों के अन्त तक स्थिर रहने के साथ भी प्रायः ऐसा ही व्यवहार किया जाता है। लोग कैल्विनवाद पर कोई व्यंग्य कसकर, या ओलिवर क्रॉमवेल की मृत्यु-शय्या की किसी अप्रामाणिक बुढ़ियों वाली कहानी सुनाकर इसे टाल देते हैं और समझते हैं कि प्रश्न का निपटारा हो गया।[5] क्या यह अधिक शोभा न देता कि वे यह पूछते कि कैल्विन के जन्म से 1400 वर्ष पहले ही बाइबल में अन्त तक स्थिर रहने की शिक्षा दी गई थी या नहीं? निर्णय का प्रश्न यह नहीं कि सिद्धान्त कैल्विनवादी है या नहीं, बल्कि यह कि वह पवित्रशास्त्र के अनुसार है या नहीं। बिशप हॉर्सली के शब्द व्यापक रूप से जाने जाने के योग्य हैं। वे कहते हैं, "अपने बाण कैल्विनवाद पर चलाने से पहले विशेष सावधानी रखो कि तुम जान लो कि कैल्विनवाद क्या है और क्या नहीं है; कि सिद्धान्तों के उस समूह में, जिसकी कैल्विनवाद के नाम पर निन्दा करना हाल ही में चलन बन गया है, तुम निश्चय के साथ यह भेद कर सको कि उसका कौन-सा भाग केवल कैल्विनवाद है और कौन-सा भाग हमारे साझे मसीही धर्म और सुधारी हुई कलीसियाओं के सामान्य विश्वास का है; ऐसा न हो कि जब तुम केवल कैल्विनवाद पर टूट पड़ना चाहो, तब असावधानी में किसी ऐसी वस्तु पर आक्रमण कर बैठो जो उससे कहीं अधिक पवित्र और उच्च उत्पत्ति की है।"

अन्त में, परन्तु कम महत्त्व की बात नहीं, हमें यह कहकर टालना भी ठीक नहीं कि अन्त तक स्थिर रहना इंग्लैंड की कलीसिया का सिद्धान्त नहीं है। लोग इसके विरुद्ध चाहे जो कहें, यह ऐसा दावा है जिसे सिद्ध करना उनके लिये कठिन होगा। इंग्लैंड की कलीसिया के सत्रहवें अनुच्छेद में अन्त तक स्थिर रहने की शिक्षा स्पष्ट, सीधे और निःसन्देह रूप से दी गई है। यह कैंटरबरी के पहले आर्चबिशपों, अर्थात् पार्कर, ग्रिंडल, व्हिटगिफ्ट, बैनक्रॉफ्ट और एबट का सिद्धान्त था। यह विवेकी हूकर द्वारा प्रचारित सिद्धान्त था, जैसा कोई भी उसके उपदेश पढ़कर देख सकता है।[6] यह वह सिद्धान्त था जिसे इंग्लैंड की कलीसिया के सब प्रमुख धर्मविज्ञानी चार्ल्स प्रथम के शासन-काल तक मानते रहे। उस समय तक इस सिद्धान्त का इनकार मुश्किल से सहन किया जाता था। एक से अधिक सेवकों को, जिन्होंने इस पर प्रश्न उठाया, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सामने सार्वजनिक रूप से अपने कथन से मुकरना पड़ा। संक्षेप में, आर्चबिशप लॉड के सत्ता में आने के समय तक इंग्लैंड की कलीसिया में अन्त तक स्थिर रहना सुसमाचार का एक स्वीकृत सत्य माना जाता था। पोप-पन्थी खमीर के साथ, जिसे लॉड अपने साथ लाया, यह दुःखद सिद्धान्त भी आया कि सच्चे विश्वासी गिर सकते हैं और नाश हो सकते हैं। यह इतिहास की एक सीधी-सी बात है। सन्तों का अन्त तक स्थिर रहना इंग्लैंड की कलीसिया का पुराना सिद्धान्त है। उसका इनकार नया है।[7]

पाठक, मैं अनुभव करता हूँ कि अब विषय की इस शाखा को छोड़कर आगे बढ़ने का समय आ गया है। अन्त तक स्थिर रहने का इससे अधिक स्पष्ट और सुनिश्चित कथन मुझे नहीं चाहिए जो मेरी अपनी कलीसिया के सत्रहवें अनुच्छेद में मिलता है, जिसका मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ। परमेश्वर के चुने हुओं के विषय में अनुच्छेद कहता है—"जिन्हें परमेश्वर की ओर से ऐसा उत्तम वरदान मिला है, वे परमेश्वर के उद्देश्य के अनुसार उसके आत्मा के द्वारा, जो ठीक समय पर कार्य करता है, बुलाए जाते हैं; वे अनुग्रह से उसके बुलावे का पालन करते हैं; वे सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं; वे लेपालकपन के द्वारा परमेश्वर के पुत्र बनाए जाते हैं; वे उसके एकलौते पुत्र यीशु मसीह के स्वरूप के समान बनाए जाते हैं; वे भक्ति से भले कर्मों में चलते हैं, और अन्त में परमेश्वर की दया से अनन्त आनन्द को प्राप्त करते हैं।" मैं ठीक यही विचार रखता हूँ। यही वह सिद्धान्त है जिसे मैंने बहुत पहले स्वीकार किया था। यही वह सत्य है जिसकी रक्षा करना मैं एक सेवक के रूप में अपना कर्तव्य मानता हूँ। यही वह सत्य है जिसे अब मैं चाहता हूँ कि आप ग्रहण करें और मानें।[8]

II. वे पवित्रशास्त्रीय आधार जिन पर

यह सिद्धान्त स्थापित है।

मुझे शायद ही कहने की आवश्यकता हो कि बाइबल ही वह एकमात्र कसौटी है जिससे हर धार्मिक सिद्धान्त की सच्चाई परखी जा सकती है। इंग्लैंड की कलीसिया के छठे अनुच्छेद के शब्द सोने के अक्षरों में लिखे जाने के योग्य हैं: "जो कुछ पवित्र शास्त्र में पढ़ा नहीं जाता, और न उससे प्रमाणित किया जा सकता है, उसे किसी मनुष्य से विश्वास के अनुच्छेद के रूप में मानने की माँग नहीं की जानी चाहिए।" इसी नियम पर मैं स्थिर रहने को सन्तुष्ट हूँ। मैं किसी से यह नहीं कहता कि वह सन्तों के अन्तिम रूप से स्थिर रहने को माने, जब तक कि यह सिद्धान्त परमेश्वर के वचन से प्रमाणित न किया जा सके। मेरे विचार में पवित्रशास्त्र की एक सीधी आयत उन सब तर्कसंगत निष्कर्षों से भारी है जहाँ तक मानवीय बुद्धि पहुँच सकती है।

पाठक, पवित्रशास्त्र के जिन पदों पर यह पुस्तिका आधारित है उन्हें प्रस्तुत करते समय मैं जान-बूझकर पुराने नियम से उद्धरण देने से बचता हूँ। मैं ऐसा इसलिये करता हूँ कि कोई यह न कहे कि पुराने नियम की प्रतिज्ञाएँ केवल यहूदी जाति के लिये एक राष्ट्र के रूप में हैं, और वे व्यक्तिगत विश्वासियों से सम्बन्धित विवादित प्रश्न में काम की नहीं हैं। मैं इस तर्क को ठीक नहीं मानता, परन्तु किसी को इसका प्रयोग करने का अवसर नहीं दूँगा। मुझे नए नियम में प्रमाण भरपूर मिलते हैं, और मैं स्वयं को उन्हीं तक सीमित रखूँगा।

मैं वे पद, जो मुझे अन्तिम स्थिरता को प्रमाणित करते दिखाई देते हैं, बिना किसी टिप्पणी या व्याख्या के लिख दूँगा। मैं केवल इतना निवेदन करता हूँ कि उन्हें पढ़ते समय आप ध्यान दें कि जिस नींव पर यह सिद्धान्त टिका है वह कितनी गहरी और चौड़ी है। ध्यान दें कि सन्त अपनी किसी शक्ति या भलाई के कारण अन्त तक नहीं टिकेंगे और कभी गिरेंगे नहीं, ऐसा नहीं है। वे स्वयं में निर्बल और दुर्बल हैं, और दूसरों के समान गिर सकते हैं। उनकी सुरक्षा परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर आधारित है, जो कभी टूटी नहीं; परमेश्वर के चुनाव पर, जो व्यर्थ नहीं हो सकता; महान मध्यस्थ मसीह यीशु की सामर्थ्य पर, जो सर्वशक्तिमान है; और पवित्र आत्मा के भीतरी कार्य पर, जिसे कोई उलट नहीं सकता। मैं आपसे कहता हूँ कि इन पदों को ध्यान से पढ़ें और देखें कि क्या ऐसा ही नहीं है।

"और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ; और वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा।

मेरा पिता, जिसने उन्हें मुझे दिया है, सब से बड़ा है; और कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन नहीं सकता।" (यूहन्ना 10:28, 29)

"कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार?

"जैसा लिखा है, कि तेरे लिये हम दिन भर घात किए जाते हैं; और उन भेड़ों के समान समझे जाते हैं जो घात होने पर हैं।

"परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया, जयवन्त से भी बढ़कर हैं।

"क्योंकि मुझे निश्चय है, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य,

"न सामर्थ्य, न ऊंचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्टि हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।" (रोमियों 8:35-39।)

"वे निकले तो हम में से ही, पर हम में के थे नहीं; क्योंकि यदि हम में के होते, तो हमारे साथ रहते; पर निकल इसलिये गए कि यह प्रगट हो कि वे सब हम में के नहीं हैं।" (1 यूहन्ना 2:19।)

"मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है; और उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।" (यूहन्ना 5:24।)

"जीवन की रोटी जो स्वर्ग से उतरी, मैं हूं; यदि कोई इस रोटी में से खाए, तो सर्वदा जीवित रहेगा।" (यूहन्ना 6:51।)

"इसलिये कि मैं जीवित हूं, तुम भी जीवित रहोगे।" (यूहन्ना 14:19।)

"जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा।" (यूहन्ना 11:26।)

"क्योंकि उस ने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है।" (इब्रानियों 10:14।)

"जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा।" (1 यूहन्ना 2:17।)

"तुम पर पाप की प्रभुता न होगी।" (रोमियों 6:14।)

"तुम्हारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं।" (रोमियों 6:14।)

"वह कुचले हुए सरकण्डे को न तोड़ेगा, और धुआं देती हुई बत्ती को न बुझाएगा।" (मत्ती 12:20।)

"वह तुम्हें अन्त तक दृढ़ भी करेगा, कि तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह के दिन में निर्दोष ठहरो।" (1 कुरिन्थियों 1:8।)

"जिन की रक्षा परमेश्वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो अन्तिम समय में प्रगट होने वाला है, की जाती है।" (1 पतरस 1:5।)

"यीशु मसीह के लिये सुरक्षित रखे गए, और बुलाए हुए।" (यहूदा 1।)

"प्रभु मुझे हर एक बुरे काम से छुड़ाएगा, और अपने स्वर्गीय राज्य में उद्धार करके पहुंचाएगा।" (2 तीमुथियुस 4:18।)

"मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक निर्दोष रखे जाएं।

"तुम्हारा बुलाने वाला विश्वासयोग्य है, और वह ऐसा ही करेगा।" (1 थिस्सलुनीकियों 5:23,24।)

"प्रभु विश्वासयोग्य है; वह तुम्हें स्थिर करेगा, और उस दुष्ट से सुरक्षित रखेगा।" (2 थिस्सलुनीकियों 3:3।)

"परमेश्वर विश्वासयोग्य है: वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परखे जाने न देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा, कि तुम सह सको।" (1 कुरिन्थियों 10:13।)

"इसलिये जब परमेश्वर ने प्रतिज्ञा के वारिसों पर और भी साफ रीति से प्रगट करना चाहा कि उसकी मनसा बदल नहीं सकती तो शपथ को बीच में डाला।

"ताकि दो बे-बदल बातों के द्वारा, जिन के विषय में परमेश्वर का झूठा ठहरना अनहोना है, हमारा दृढ़ता से सांत्वना पाना हो, जो शरण लेने को भाग कर उस आशा को जो सामने रखी हुई है प्राप्त कर लें।" (इब्रानियों 6:17,18।)

"हे छोटे झुण्ड, मत डर; क्योंकि तुम्हारे पिता को यह भाया है कि तुम्हें राज्य दे।" (लूका 12:32।)

"और मेरे भेजने वाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उस ने मुझे दिया है, उस में से मैं कुछ न खोऊं, परन्तु उसे अन्तिम दिन फिर जिला उठाऊं।" (यूहन्ना 6:39।)

"तौभी परमेश्वर की पक्की नेव बनी रहती है, और उस पर यह छाप लगी है, कि प्रभु अपनों को पहचानता है।" (2 तीमुथियुस 2:19।)

"जिन्हें उस ने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया है; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है।" (रोमियों 8:30।)

"क्योंकि परमेश्वर ने हमें क्रोध के लिये नहीं, परन्तु इसलिये ठहराया कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उद्धार प्राप्त करें।" (1 थिस्सलुनीकियों 5:9।)

"परमेश्वर ने आरम्भ ही से तुम्हें चुन लिया कि आत्मा के द्वारा पवित्रीकरण और सत्य पर विश्वास करने से उद्धार पाओ।" (2 थिस्सलुनीकियों 2:13।)

"दया के बरतन, जिन्हें उस ने पहले से महिमा के लिये तैयार किया।" (रोमियों 9:23।)

"क्योंकि परमेश्वर अपने वरदानों और बुलाहट से कभी पीछे नहीं हटता।" (रोमियों 11:29।)

"यदि हो सके तो वे चुने हुए लोगों को भी भरमा दें।" (मत्ती 24:24।)

"जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, वह उन्हें पूरी रीति से उद्धार दे सकता है, क्योंकि वह उन के लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है।" (इब्रानियों 7:25।)

"जो तुम्हें ठोकर खाने से बचा सकता है, और अपनी महिमा की उपस्थिति में प्रबल आनन्द के साथ निर्दोष करके खड़ा कर सकता है।" (यहूदा 24।)

"मैं उसे जानता हूं जिस पर मैं ने विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है कि वह मेरी थाती की उस दिन तक रखवाली कर सकता है।" (2 तीमुथियुस 1:12।)

"मैं ने तेरे लिये बिनती की, कि तेरा विश्वास जाता न रहे।" (लूका 22:32।)

"हे पवित्र पिता, अपने उस नाम से जो तू ने मुझे दिया है, उन की रक्षा कर।" (यूहन्ना 17:11।)

"मैं यह बिनती नहीं करता, कि तू उन्हें जगत से उठा ले, परन्तु यह कि तू उन्हें उस दुष्ट से बचाए रख।" (यूहन्ना 17:15।)

"हे पिता, मैं चाहता हूँ कि जिन्हें तू ने मुझे दिया है, जहाँ मैं हूँ वहाँ वे भी मेरे साथ हों।" (यूहन्ना 17:24)

"क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा परमेश्वर के साथ मेल हो गया फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम क्यों न उद्धार पाएँगे।" (रोमियों 5:10)

"अर्थात् सत्य का आत्मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है; तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।" (यूहन्ना 14:17)

"और मुझे इस बात का भरोसा है कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा।" (फिलिप्पियों 1:6)

"और तुम्हारा वह अभिषेक, जो उसकी ओर से किया गया, तुम में बना रहता है, और तुम्हें इस का प्रयोजन नहीं कि कोई तुम्हें सिखाए; बल्कि जैसे उसका वही अभिषेक तुम्हें सब बातें सिखाता है, और सच्चा है, और झूठा नहीं, और जैसा उसने तुम्हें सिखाया है, वैसे ही तुम उस में बने रहोगे।" (1 यूहन्ना 2:27)

"और परमेश्वर के पवित्र आत्मा को शोकित मत करो, जिससे तुम पर छुटकारे के दिन के लिये छाप दी गई है।" (इफिसियों 4:30)

"जिस पर तुम ने भी जब सत्य का वचन सुना, जो तुम्हारे उद्धार का सुसमाचार है, और जिस पर विश्वास किया, तो प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप तुम पर लगी। वह उस मोल लिए हुए अधिकार के छुटकारे के लिये हमारी मीरास का बयाना है।" (इफिसियों 1:13, 14)

"क्योंकि तुम ने नाशवान नहीं पर अविनाशी बीज से, परमेश्वर के जीवते और सदा ठहरनेवाले वचन के द्वारा नया जन्म पाया है।" (1 पतरस 1:23)

"क्योंकि उसने आप ही कहा है, 'मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा।'" (इब्रानियों 13:5)

पाठक, मैं पवित्रशास्त्र के ये चौवालीस वचन आपके सामने रखता हूँ, और इन पर आपका गम्भीर ध्यान चाहता हूँ। मैं फिर कहता हूँ कि मैं इन पर कोई टिप्पणी नहीं करूँगा। मैं इन्हें उन सब की निष्कपट सामान्य बुद्धि पर छोड़ देना ही उचित समझता हूँ जो बाइबल पढ़ते हैं। इन वचनों में से कुछ निस्सन्देह अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को दूसरों से अधिक स्पष्टता से प्रकट करते हैं। उनमें से कुछ की व्याख्या के विषय में मनुष्यों के विचार बहुत भिन्न हो सकते हैं। परन्तु इन चौवालीस में से कई ऐसे हैं जो मेरे मन को इतने स्पष्ट प्रतीत होते हैं कि यदि मैं अपने विचारों के अनुरूप शब्द स्वयं गढ़ने बैठूँ, तो निराश हो जाऊँगा कि कोई भी शब्द मेरा अर्थ इतनी निस्सन्देहता से प्रकट नहीं कर पाएगा।

मैं यह कहने से बहुत दूर हूँ कि ये वचन ही वह सारा पवित्रशास्त्रीय प्रमाण हैं जो प्रस्तुत किया जा सकता है। मुझे विश्वास है कि इस पुस्तिका में जिस सिद्धान्त का समर्थन किया गया है, उसकी पुष्टि अन्य बड़े सामर्थी और शक्तिशाली तर्कों से भी की जा सकती है।

मैं परमेश्वर के उस स्वभाव के गुणों की ओर संकेत कर सकता हूँ जो बाइबल में प्रकट किए गए हैं, और दिखा सकता हूँ कि उसकी बुद्धि, अपरिवर्तनीयता, सामर्थ्य, प्रेम और महिमा, ये सब सन्तों के अन्त तक स्थिर रहने से कैसे जुड़े हैं। यदि चुने हुए लोग अन्त में नाश हो सकते हैं, तो अनन्तकाल में उनके विषय में परमेश्वर की जो योजना है, और समय में उनके लिये उसने जो कुछ किया है, उसका क्या होगा?[9]

मैं उन सब पदों की ओर संकेत कर सकता हूँ जो प्रभु यीशु मसीह निभाता है, और दिखा सकता हूँ कि यदि उसके विश्वास करनेवाले लोगों में से कोई अन्त में खो सकता है, तो उन पदों को निभाने पर कितना कलंक लगता है।

यदि उसकी रहस्यमय देह का कोई अंग उससे छीना जा सके, तो वह कैसा सिर ठहरेगा? यदि उसके झुण्ड की एक भी भेड़ जंगल में पीछे छूट जाए, तो वह कैसा चरवाहा ठहरेगा? यदि उसके हाथ का कोई रोगी अन्त में असाध्य रह जाए, तो वह कैसा वैद्य ठहरेगा? जब वह अपने रत्नों को इकट्ठा करे और उसके हृदय पर एक बार लिखा हुआ कोई नाम कम पाया जाए, तो वह कैसा महायाजक ठहरेगा? यदि वह और कोई आत्मा, जो विश्वास के द्वारा एक बार उससे जुड़ चुकी है, कभी अलग किए जा सकें, तो वह कैसा दूल्हा ठहरेगा?[10]

अन्त में, मैं इस बड़े तथ्य की ओर संकेत कर सकता हूँ कि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में एक भी उदाहरण नहीं है कि परमेश्वर के चुने हुओं में से कोई कभी अन्त में विश्वास के जहाज़ को डुबोकर नरक में गया हो। हम झूठे भविष्यद्वक्ताओं और कपटियों के विषय में पढ़ते हैं। हम निष्फल डालियों, पथरीली भूमि और काँटों वाली भूमि के सुननेवालों, बिना तेल के बर्तनों वाली कुँवारियों, और अपने तोड़ों को गाड़ देनेवाले दासों के विषय में पढ़ते हैं। हम बिलाम, लूत की पत्नी, शाऊल, यहूदा इस्करियोती, हनन्याह और सफीरा, और देमास के विषय में पढ़ते हैं। हम उनके खोखले चरित्र देखते हैं। हमें उनका अन्त बताया गया है। उनमें जड़ नहीं थी। वे हृदय से सड़े हुए थे। वे कुछ समय तक टिके रहे। अन्त में वे अपने ही स्थान को गए। परन्तु सारी बाइबल में एक भी उदाहरण नहीं है कि कोई ऐसा मनुष्य गिर गया हो जिसने अनुग्रह के निस्सन्देह प्रमाण दिखाए थे। अब्राहम, मूसा, दाऊद, पतरस और पौलुस जैसे मनुष्य सदा अपने मार्ग पर चलते रहते हैं। वे फिसल सकते हैं। वे कुछ समय के लिये गिर सकते हैं। परन्तु वे परमेश्वर से पूरी रीति से कभी दूर नहीं होते। वे कभी नाश नहीं होते। निश्चय ही यदि परमेश्वर के सन्त त्यागे जा सकते हैं, तो यह एक विचित्र और उल्लेखनीय बात है कि बाइबल ने हमें इसका एक भी स्पष्ट उदाहरण नहीं दिया।

परन्तु यदि मैं उस क्षेत्र में उतरूँ जिसकी ओर मैंने अभी संकेत किया है, तो समय और स्थान मेरे लिये कम पड़ जाएँगे। मैं यही उचित समझता हूँ कि अपना मामला उन्हीं वचनों पर टिकाए रखूँ जो मैं पहले दे चुका हूँ। जिस मन को ये वचन कायल नहीं करते, उसे अन्य तर्क प्रभावित करें, इसकी सम्भावना कम है। मुझे तो ये सब मिलाकर प्रमाण का इतना विशाल समूह प्रतीत होते हैं कि मैं एक मसीही मनुष्य होकर उसे सच मानने से इनकार करने का साहस नहीं कर सकता। मैं साहस नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे लगता है कि इस रीति से तो मैं सुसमाचार के किसी भी सिद्धान्त की सच्चाई पर विवाद कर सकता हूँ। मुझे लगता है कि यदि मैं उद्धृत किए हुए कुछ ऐसे स्पष्ट वचनों की व्याख्या को टाल सकूँ, तो मैं मसीही धर्म के लगभग सभी प्रमुख सत्यों की व्याख्या को टाल सकता हूँ।

पाठक, मैं भली-भाँति जानता हूँ कि पवित्रशास्त्र में कुछ वचन और अंश ऐसे हैं जो पहली दृष्टि में उस सिद्धान्त के विपरीत शिक्षा देते प्रतीत होते हैं जिसका मैं इस पुस्तिका में समर्थन करता हूँ। मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग इन वचनों को बड़ा महत्त्व देते हैं, और मानते हैं कि ये प्रमाणित करते हैं कि परमेश्वर के सन्त नाश हो सकते हैं और गिर सकते हैं। मैं यह भी कह सकता हूँ कि मैंने इन वचनों की ध्यान से जाँच की है, परन्तु अन्त तक स्थिर रहने के विषय में अपना मत बदलने का कोई कारण उनमें नहीं पाया।[11] उनकी संख्या थोड़ी है। उनका अर्थ निस्सन्देह मेरे उद्धृत किए हुए चौवालीस में से बहुतों की अपेक्षा अधिक विवादास्पद है। वे सब ऐसी रीति से समझाए जा सकते हैं कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का खण्डन न हो। मैं पवित्रशास्त्र की व्याख्या में इसे एक अचूक नियम मानता हूँ कि जब दो वचन एक-दूसरे के विरोधी प्रतीत हों, तो जो कम स्पष्ट है उसे अधिक स्पष्ट के आगे, और जो दुर्बल है उसे सबल के आगे झुकना चाहिए। जो सिद्धान्त पवित्रशास्त्र के अधिकतम वचनों का मेल बिठाता है, उसी के सही होने की सम्भावना सबसे अधिक है। जो सिद्धान्त अधिकतम वचनों को एक-दूसरे से झगड़ाता है, उसी के गलत होने की सम्भावना सबसे अधिक है।

यदि अब तक जो कुछ मैंने कहा है उससे आप आश्वस्त नहीं हुए, तो मैं आपसे कहता हूँ कि अन्त तक स्थिर रहने के पक्ष में जो वचन मैंने उद्धृत किए हैं, और जो वचन सामान्यतः इसके विरोध में उद्धृत किए जाते हैं, उन्हें दो अलग-अलग सूचियों में लिख लें। उन्हें एक-दूसरे के साथ तौलकर देखें। उनका निष्पक्ष और ईमानदार न्याय के साथ विचार करें। किस सूची में सबसे अधिक स्पष्ट और असंदिग्ध कथन हैं? किस सूची में ऐसे वाक्य सबसे अधिक हैं जिनकी व्याख्या करके उन्हें टाला नहीं जा सकता? कौन-सी सूची सबसे सुदृढ़ है? कौन-सी सबसे निर्बल है? कौन-सी सबसे लचीली है? कौन-सी सबसे अटल है? यदि इस संसार में किसी निष्पक्ष और समझदार जूरी द्वारा इस प्रश्न का ठीक-ठीक विचार कराना सम्भव होता, तो मुझे तनिक भी सन्देह नहीं कि निर्णय किस ओर जाता। मेरा अपना दृढ़ विश्वास और धारणा है कि सन्तों का अन्त तक स्थिर रहना पवित्रशास्त्र की भूमि पर इतनी गहराई से स्थापित है कि जब तक बाइबल न्यायी है, तब तक इसे उखाड़ा नहीं जा सकता।

III. बहुत-से लोग इस सिद्धान्त को क्यों अस्वीकार करते हैं

सिद्धान्त

इस बात से इनकार करना असम्भव है कि मसीही होने का दावा करनेवाले असंख्य लोग इसमें व्यक्त विचारों से पूरी तरह असहमत हैं। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत-से लोग इन्हें घृणा की दृष्टि से देखते हैं, इन्हें खतरनाक, उन्मादी और कट्टरपंथी मानते हैं, और लोगों को इनके विरुद्ध चेताने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। मैं यह भी जानता हूँ कि जो लोग यह मानते हैं कि परमेश्वर के सन्त गिर सकते और नाश हो सकते हैं, उनमें अनेक पवित्र, आत्म-त्यागी और आत्मिक मन के लोग पाए जाते हैं — ऐसे लोग जिनके चरणों में मैं स्वर्ग में बैठना चाहूँगा, यद्यपि पृथ्वी पर मैं उनकी सारी शिक्षा का समर्थन नहीं कर सकता।

ऐसी स्थिति में यह जानना गहरी रुचि का विषय बन जाता है कि, यदि हम खोज सकें, तो अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को इतनी बार क्यों ठुकराया जाता है। जिस सिद्धान्त के पक्ष में पवित्रशास्त्र के इतने प्रमाण दिए जा सकते हैं, उसका इतना डटकर विरोध कैसे होता है? जिस सिद्धान्त पर इंग्लैंड की सुधारवादी कलीसिया के पहले सौ वर्षों में प्रश्न उठाना भी कठिनता से स्वीकार्य था, उसे अब इतनी बार क्यों अस्वीकार कर दिया जाता है? पिछली दो शताब्दियों में ऐसे कौन-से नए विचार उठ खड़े हुए हैं जिनके कारण मसीह के इस पुराने भले सेवक को विदा कर देना आवश्यक हो गया? मुझे विश्वास है कि आज के दिनों में ऐसी पूछताछ बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस प्रश्न में उससे कहीं अधिक है जितना पहली दृष्टि में दिखाई देता है। मुझे सन्तोष है कि सम्पूर्ण विषय पर थोड़ा प्रकाश डालने का प्रयास करके मैं समय नष्ट नहीं कर रहा हूँ।

मैं मार्ग साफ़ करने के लिए यह मान लेता हूँ कि बहुत-से भले लोग अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को केवल इसलिए अस्वीकार करते हैं कि वह उनके लिए बहुत कठोर है। इस समय सच्चे मन के मसीहियों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो कभी कोई कठोर बात सहन करने योग्य प्रतीत नहीं होती। उनकी धार्मिक प्रकृति इतनी दुर्बल और उनकी आत्मिक पाचन-शक्ति इतनी कमज़ोर जान पड़ती है कि उन्हें सदा "दूध पिलाना" पड़ता है, ठोस भोजन नहीं। उनसे अनुग्रह के विषय में ज़ोर देकर बात करें, तो वे आपको व्यवस्था-विरोधी ठहरा देते हैं! पवित्रता के विषय में ज़ोर देकर बात करें, तो आप व्यवस्थावादी समझे जाते हैं! चुनाव के विषय में ज़ोर देकर बोलें, तो आप संकीर्ण मन के कैल्विनवादी माने जाते हैं! उत्तरदायित्व और स्वतंत्र इच्छा के विषय में ज़ोर देकर कहें, तो आप निम्न कोटि के आर्मीनियाई गिने जाते हैं! संक्षेप में, वे किसी भी प्रकार की, किसी भी दिशा की कठोर बात सहन नहीं कर सकते। स्वाभाविक है कि वे अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को ग्रहण नहीं कर सकते।

मैं इन लोगों को उनके हाल पर छोड़ता हूँ। मुझे उन पर खेद है। इस समय मसीह की कलीसियाओं में दुःख की बात है कि ऐसे लोग बहुत अधिक हैं। मैं केवल यही कामना कर सकता हूँ कि उन्हें बेहतर आत्मिक स्वास्थ्य, कम संकीर्ण विचार, और आत्मिक ज्ञान में तीव्र बढ़ोतरी मिले। इस पुस्तिका के इस भाग में मेरी कल्पना में जो लोग हैं वे दूसरी श्रेणी के हैं, और अब मैं उन्हीं को सम्बोधित करता हूँ।

(1) मेरा विश्वास है कि बहुत-से लोग अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को इसलिए नहीं मानते कि उन्हें मसीही धर्म की सम्पूर्ण व्यवस्था का सामान्य अज्ञान है। सुसमाचार को रचनेवाले विविध सिद्धान्तों के स्वरूप, स्थान और अनुपात का उन्हें कोई स्पष्ट विचार नहीं है। उसके अलग-अलग सत्यों की उनके मन में कोई निश्चित जगह नहीं है। उसकी सामान्य रूपरेखा उनकी समझ में अंकित नहीं है। उनकी एक धुँधली-सी धारणा है कि मसीह की कलीसिया का सदस्य होना और मसीही विश्वास के सब अनुच्छेदों पर विश्वास करना उचित बात है। उनके मन में एक अस्थिर, धुंधला-सा विचार है कि मसीह ने उनके लिए कुछ काम किए हैं, और उन्हें भी उसके लिए कुछ काम करने चाहिए, और यदि वे उन्हें कर लें तो अन्त में सब ठीक हो जाएगा। परन्तु इससे आगे वे वास्तव में कुछ नहीं जानते। रोमियों, गलातियों और इब्रानियों की पत्रियों में दिए गए महान क्रमबद्ध विवरणों से वे बिलकुल अनजान हैं। धर्मी ठहराए जाने का स्पष्ट वर्णन माँगना तो ऐसा है जैसे उनसे वृत्त का वर्ग बनाने या संस्कृत में पत्र लिखने को कहा जाए। यह ऐसा विषय है जिसे उन्होंने उँगलियों के पोरों से भी नहीं छुआ। यह एक गम्भीर रोग है, और इंग्लैंड में बहुत सामान्य है। खेद की बात है कि यह उन हज़ारों का रोग है जो उत्तम कलीसियाई जन के रूप में स्वीकार कर लिए जाते हैं। ऐसे लोगों से अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को मानने की आशा करना व्यर्थ है। जब मनुष्य यही नहीं जानता कि धर्मी ठहराया जाना क्या है, तो वह स्वाभाविक ही यह नहीं समझ सकता कि अन्त तक स्थिर रहना क्या है।

(2) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोगों के अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को न मानने का एक और कारण यह है कि उन्हें ऐसी हर धार्मिक व्यवस्था से अरुचि है जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद करती है। ऐसे लोग कम नहीं हैं जो किसी भी ऐसी मसीही शिक्षा को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं जो मण्डली को अलग-अलग वर्गों में बाँटती है और एक वर्ग के लोगों को परमेश्वर के सामने दूसरे वर्ग से अधिक अच्छी और अनुकूल दशा में बताती है। ऐसे लोग चिल्ला उठते हैं, "इस प्रकार की सारी शिक्षा निर्दयी है; हमें हर किसी के विषय में अच्छी आशा रखनी चाहिए और मानना चाहिए कि हर कोई स्वर्ग जाएगा।" वे यह कहना सरासर अनुचित समझते हैं कि एक मनुष्य में विश्वास है और दूसरे में नहीं, एक परमेश्वर की सन्तान है और दूसरा संसार की सन्तान, एक सन्त है और दूसरा पापी। वे कहते हैं, "इस विषय में कुछ भी सोचने का हमें क्या अधिकार है? हम निश्चित रूप से जान ही नहीं सकते। जिन्हें हम भला कहते हैं, बहुत सम्भव है कि वे औरों से अच्छे न हों — कपटी, ढोंगी और इसी प्रकार के हों। जिनके विषय में हम बुरा सोचते हैं, बहुत सम्भव है कि वे भी बाकी मनुष्यों के समान स्वर्ग के मार्ग पर हों और भीतर से उनका मन अच्छा हो।" जहाँ तक किसी के स्वर्ग के विषय में निश्चित होने या अपने उद्धार के विषय में आश्वस्त होने का प्रश्न है, उसे वे बिलकुल घृणित मानते हैं। "कोई मनुष्य निश्चित नहीं हो सकता। हमें सबके विषय में अच्छी आशा रखनी चाहिए।" आज के समय में इस प्रकार के लोग बहुत ही अधिक हैं। स्वाभाविक है कि अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त उनके लिए बिलकुल असहनीय है। जब कोई मनुष्य यह मानने से इनकार कर देता है कि कोई चुना हुआ है, या उस पर अनुग्रह है, या वह अपने पड़ोसियों से बढ़कर परमेश्वर की किसी विशेष कृपा का चिह्न पाता है, तो यह स्वाभाविक ही है कि वह इससे भी इनकार करेगा कि किसी को अन्त तक स्थिर रहने का अनुग्रह मिल सकता है।

(3) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोगों के अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को न मानने का एक और सामान्य कारण उद्धार देनेवाले विश्वास के स्वरूप की गलत समझ है। वे विश्वास को एक भावना या प्रभाव से बढ़कर कुछ नहीं मानते। ज्यों ही वे किसी मनुष्य को सुसमाचार के प्रचार से कुछ प्रभावित होते और मसीह की चर्चा सुनकर कुछ आनन्द प्रकट करते देखते हैं, वे तुरन्त उसे विश्वासी ठहरा देते हैं। कुछ समय बाद उस मनुष्य के प्रभाव मिट जाते हैं और मसीह तथा उद्धार में उसकी रुचि बिलकुल समाप्त हो जाती है। जो विश्वास उसमें दिखाई देता था, वह कहाँ गया? वह चला गया। उसके मित्र, जिन्होंने उसे विश्वासी घोषित किया था, इसका क्या कारण बताएँ? वे इसका कारण केवल यही बता सकते हैं कि "मनुष्य विश्वास से गिर सकता है" और "अन्त तक स्थिर रहने जैसी कोई बात नहीं है।" संक्षेप में, यही उनके धर्म का एक स्थापित सिद्धान्त बन जाता है। अब यह एक हानिकारक भ्रम है, और मुझे डर है कि बहुत से स्थानों में यह अत्यन्त सामान्य है। स्पष्ट है कि इसका मूल धार्मिक भावनाओं के सच्चे स्वरूप की अज्ञानता में खोजा जा सकता है। लोग भूल जाते हैं कि मनुष्य के मन में बहुत सी धार्मिक भावनाएँ हो सकती हैं जिनका अनुग्रह से कोई सम्बन्ध नहीं। पथरीली भूमि पर गिरे बीज के सुननेवालों ने वचन को आनन्द के साथ ग्रहण किया, परन्तु उनमें जड़ नहीं थी। सब जागृतियों का इतिहास प्रमाणित करता है कि पवित्र आत्मा के किसी सच्चे कार्य के बिना भी प्रायः बहुत से प्रतीत होनेवाले धार्मिक प्रभाव हो सकते हैं। उद्धार देनेवाला विश्वास किसी थोड़ी सी अचानक उठी भावना से कहीं अधिक गहरा और सामर्थी है। यह केवल भावनाओं का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विवेक, इच्छा, समझ और भीतरी मनुष्य का कार्य है। यह स्पष्ट ज्ञान का परिणाम है। यह उस विवेक से उत्पन्न होता है जो केवल छुआ नहीं गया, बल्कि पूरी तरह हिल उठा है। यह स्वयं को मसीह पर सोच-समझकर, स्वेच्छा से और दीनता के साथ निर्भर रहने में प्रकट करता है। ऐसा विश्वास परमेश्वर का दान है और कभी उलटा नहीं जाता। विश्वास को केवल भावना की बात बना दीजिए, तो अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को बनाए रखना निश्चय ही असम्भव हो जाता है।

(4) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोगों के अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को न मानने का एक और कारण, जो अन्तिम बताए गए कारण से निकटता से जुड़ा है, मन फिराव के स्वरूप की गलत समझ है। कम नहीं हैं वे जो किसी मनुष्य के चरित्र में हुए किसी भी सुधार को तुरन्त मन फिराव घोषित कर देते हैं। वे भूल जाते हैं कि वसन्त में किसी वृक्ष पर बहुत से फूल हो सकते हैं और फिर भी पतझड़ में कोई फल नहीं होता, और यह कि पुराने द्वार पर रंग की नई परत चढ़ा देने से वह नया नहीं हो जाता। कुछ लोग यदि किसी को उपदेश के प्रभाव से रोते देखते हैं, तो तुरन्त उसे मन फिराव का मामला ठहरा देते हैं। दूसरे लोग, यदि कोई पड़ोसी अचानक शराब पीना या कसम खाना छोड़ दे और प्रभु-भोज में सहभागी होने लगे और बड़ा धर्म-प्रदर्शक बन जाए, तो झट इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि उसने मन फिराया है। अनेक उदाहरणों में स्वाभाविक परिणाम निराशा होता है। उनका माना हुआ मन फिराव का मामला प्रायः केवल बाहरी सुधार का मामला निकलता है, जिसमें हृदय कभी बदला ही नहीं था। उनका तथाकथित परिवर्तित पड़ोसी कभी-कभी अपनी पुरानी आदतों में लौट जाता है, जैसे धुली हुई सुअरनी फिर कीचड़ में लोटने लगती है। परन्तु तब दुर्भाग्य से स्वाभाविक हृदय का घमण्ड, जो कभी अपने को गलत मानना पसन्द नहीं करता, लोगों को उस मामले के विषय में गलत निष्कर्ष निकालने की ओर ले जाता है। यह बताने के बदले कि उस मनुष्य ने कभी मन फिराया ही नहीं था, वे कहते हैं कि "उसने मन फिराया तो था, परन्तु बाद में अपना अनुग्रह खो बैठा और गिर गया।" इसका सच्चा उपाय मन फिराव की सही समझ है। यह वैसी सस्ती, सरल और साधारण बात नहीं है जैसी बहुतों को लगती है। यह हृदय पर एक सामर्थी कार्य है जिसे उसके सिवा कोई नहीं कर सकता जिसने जगत को बनाया, और ऐसा कार्य जो टिकेगा और आग की परीक्षा में खरा उतरेगा। परन्तु एक बार मन फिराव के विषय में निम्न और ऊपरी दृष्टिकोण अपना लीजिए, तो आप पाएँगे कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को बनाए रखना असम्भव है।

(5) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोगों के अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को न मानने का एक और अत्यन्त सामान्य कारण बपतिस्मा के प्रभाव के विषय में उनका गलत दृष्टिकोण है। वे अपने धर्मविज्ञान के एक मूल सिद्धान्त के रूप में यह मान बैठे हैं कि जितने बपतिस्मा पाते हैं वे सब बपतिस्मा में नया जन्म पाते हैं, और सब पवित्र आत्मा का अनुग्रह पाते हैं। बाइबल में एक भी स्पष्ट पद के बिना जो उनके मतों का समर्थन करे, और 17वें अनुच्छेद के होते हुए भी, जिस पर उनमें से बहुतों ने कलीसिया के सदस्य होने के नाते हस्ताक्षर किए हैं, वे फिर भी हमसे कहते हैं कि सब बपतिस्मा पाए हुए लोग अनिवार्य रूप से नया जन्म पाए हुए हैं। निश्चय ही बपतिस्मा का ऐसा दृष्टिकोण इस सिद्धान्त का पूरी तरह नाश कर देता है कि सच्चा अनुग्रह कभी उखाड़ा नहीं जा सकता। यह दिन के उजाले की तरह स्पष्ट है कि बपतिस्मा पाए हुए असंख्य लोग जीवन भर अनुग्रह की एक चिंगारी भी नहीं दिखाते, और इस बात का ज़रा-सा भी प्रमाण नहीं देते कि वे परमेश्वर से जन्मे हैं। वे लापरवाह और संसारी जीवन जीते हैं, और लापरवाह और संसारी ही मरते हैं, और देखने में दुर्दशा में नाश हो जाते हैं। जिस दृष्टिकोण की मैं यहाँ चर्चा कर रहा हूँ, उसके अनुसार “वे सब अनुग्रह से गिर गए हैं! उन सब ने उसे पाया था! वे सब परमेश्वर की सन्तान बनाए गए थे! परन्तु उन सब ने अपना अनुग्रह खो दिया! वे सब शैतान की सन्तान बन गए हैं!” मैं ऐसे सिद्धान्त पर एक भी टिप्पणी करने का साहस नहीं करूँगा। जो कर सकें, वे इसे बाइबल से मिलाने का प्रयत्न करें। मैं केवल इतना कहता हूँ कि यदि बपतिस्मा से नया जन्म होना सच है, तो अन्त तक स्थिर रहने की बात ही समाप्त हो जाती है।

(6) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोगों के अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को न मानने का एक और कारण कलीसिया के स्वभाव के विषय में उनका गलत दृष्टिकोण है। वे उस दृश्य कलीसिया में, जिसमें “बुरे और भले” दोनों हैं, और उस अदृश्य कलीसिया में, जो केवल परमेश्वर के चुने हुए लोगों और सच्चे विश्वासियों से बनी है, कोई भेद नहीं करते। जो विशेषाधिकार, आशीषें और प्रतिज्ञाएँ दूसरी की हैं, उन्हें वे पहली पर लागू कर देते हैं। वे दृश्य कलीसिया को, उसके अधर्मी सदस्यों की भीड़ और बपतिस्मा पाए हुए अविश्वासियों समेत, “मसीह की रहस्यमय देह, दुल्हिन, मेम्ने की पत्नी, पवित्र सार्वभौमिक कलीसिया” और इसी प्रकार के नाम देते हैं। वे उस बात को देखना नहीं चाहते जो हूकर ने बहुत पहले दिखाई थी, और जिसे उनके प्रशंसकों को याद रखना अच्छा होगा, कि ये सब महिमामय उपाधियाँ वास्तव में किसी दृश्य कलीसिया की नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रहस्यमय मण्डली की हैं। इस सारी उलझन का परिणाम निश्चित और स्पष्ट है। इस मनुष्य-रचित व्यवस्था पर उन्हें यह मानना पड़ता है कि मसीह की देह के हज़ारों अंगों में न जीवन है, न अनुग्रह, और न अपने सिर के प्रति कोई सहानुभूति, और वे अन्त में सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं, और नरक में मसीह के खोए हुए अंग बन जाते हैं! निश्चय ही इस हिसाब से वे अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को थामे नहीं रख सकते। जैसे ही कोई इस पवित्रशास्त्र-विरुद्ध धारणा को अपना लेता है कि दृश्य कलीसिया के सब सदस्य अपनी कलीसिया-सदस्यता के कारण मसीह के अंग हैं, तो इस पुस्तिका के सिद्धान्त को एक ओर रखना ही पड़ेगा। आह, हूकर की यह कितनी बुद्धि-भरी टिप्पणी है! “परमेश्वर की रहस्यमय और दृश्य कलीसिया के बीच के अन्तर को परिश्रम से न देखने के कारण जो भूलें की गई हैं, वे न थोड़ी हैं और न हल्की।”

पाठक, मैंने अभी जो बातें कही हैं, उन्हें मैं आपके सच्चे और प्रार्थनापूर्ण ध्यान के लिए प्रस्तुत करता हूँ। उनकी बड़ी महत्ता के गहरे विश्वास से मैंने उन्हें थका देने वाला लगने का जोखिम उठाकर भी विस्तार से कहा है। मुझे निश्चय है कि इस पुस्तिका का कोई भाग विचार के योग्य है, तो यही है।

मैं आपसे विनती करता हूँ कि ध्यान दें कि मसीहियों के लिए विश्वास में दृढ़ होना, और सुसमाचार की सारी व्यवस्था के स्पष्ट पवित्रशास्त्रीय ज्ञान से सुसज्जित होना कितना महत्त्वपूर्ण है। मुझे उस बढ़ती हुई प्रवृत्ति का भय है कि सब सैद्धान्तिक प्रश्नों को केवल मत की बातें माना जाए, और सब गम्भीर मन वाले लोगों को सही समझा जाए, चाहे वे कोई भी सिद्धान्त मानते हों। मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि इस प्रवृत्ति के आगे झुक जाने का निश्चित परिणाम एक अस्पष्ट, निम्न और धुँधला धर्मविज्ञान होगा, ऐसा धर्मविज्ञान जिसमें कोई निश्चित आशा, कोई निश्चित प्रेरणा और कोई निश्चित सांत्वना नहीं होगी, ऐसा धर्मविज्ञान जो ठीक तब सबसे अधिक विफल होगा जब उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी, अर्थात् विपत्ति के दिन में, बीमारी की घड़ी में, और मृत्यु-शय्या पर।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि ऐसी चेतावनियाँ देना एक कृतघ्नता भरा काम है। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि जो ऐसा करते हैं, उन्हें कट्टर, संकीर्ण-मन और अनुदार कहे जाने की आशा रखनी चाहिए। परन्तु अन्त तक स्थिर रहने के विषय में फैली हुई अनेक भूलों की समीक्षा करते हुए मैं पहले से कहीं अधिक देखता हूँ कि सब से यह आग्रह करने की कितनी बड़ी आवश्यकता है कि वे सिद्धान्त के विषय में सावधान रहें। आह, यह जानना सीखिए कि जब आप मसीही सिद्धान्तों पर विश्वास करने की बात करते हैं, तो उसका अर्थ क्या है! अपनी आशा का कारण बताने में समर्थ हों। यह कह सकें कि धर्म में आप क्या सत्य और क्या असत्य मानते हैं। और यह कभी, कभी न भूलें कि विश्वास में दृढ़ता की एकमात्र नींव बाइबल का पूरा, पद-पद का ज्ञान है।

अन्त में मैं आपसे विनती करता हूँ कि देखें कि धर्म में एक भूल कैसे दूसरी भूल की ओर ले जाती है। झूठे सिद्धान्तों में गहरा सम्बन्ध होता है। उनमें से किसी एक को अकेले अपनाना लगभग असम्भव है। जैसे ही मनुष्य कलीसिया और संस्कारों के विषय में भटक जाता है, कोई नहीं कह सकता कि वह कितनी दूर जाएगा और अन्त में कहाँ पहुँचेगा। यह स्रोत पर ही की गई एक भूल है और उसके सारे धर्म-मार्ग को प्रभावित करती है। बपतिस्मा के विषय में भूल मेरे कहने का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। वह मनुष्य के सारे धर्मविज्ञान पर एक रंग चढ़ा देती है; वह अनजाने ही धर्मी ठहराए जाने, पवित्रीकरण, चुनाव और अन्त तक स्थिर रहने के विषय में उसके विचारों को प्रभावित करती है; वह विश्वास के सब प्रमुख अनुच्छेदों के विषय में उसके मन को उलझन के जाल में भर देती है। वह एक ऐसे सिद्धान्त से आरम्भ करता है जिसके लिए पवित्रशास्त्र का एक भी स्पष्ट पद नहीं दिया जा सकता, और फिर यह सिद्धान्त बाइबल के दर्जनों स्पष्ट खण्डों को रौंद डालता है! वे तो उसके प्रिय सिद्धान्त में बाधा डालते हैं, इसलिए उनका वह अर्थ नहीं हो सकता जो सामान्य बुद्धि हमें बताती है! आह, पाठक, थोड़े से झूठे सिद्धान्त के विषय में भी उतने ही चौकन्ने रहिए जितना थोड़े से पाप के विषय में रहते हैं! पौलुस के वचन स्मरण रखिए: “थोड़ा सा खमीर पूरे गूँधे हुए आटे को खमीर कर डालता है।”

4. यह सिद्धान्त बड़े व्यावहारिक महत्त्व का क्यों है

महत्त्व।

जब मैं अन्त तक स्थिर रहने के महत्व की बात करता हूँ, तो मेरा तनिक भी यह आशय नहीं कि उद्धार पाने के लिए इसे ग्रहण करना आवश्यक है। मैं सहर्ष मानता हूँ कि हज़ारों-लाखों लोग स्वर्ग पहुँचे हैं, जो जीवन भर यह मानते रहे कि सन्त गिर भी सकते हैं। परन्तु इस सबसे यह प्रमाणित नहीं होता कि इस पुस्तिका में जिस सिद्धान्त का समर्थन किया गया है वह कोई उदासीन विषय है। जो इसे नहीं मानता और फिर भी उद्धार पाता है, वह निःसन्देह भला करता है; परन्तु मुझे विश्वास है कि जो इसे मानता है और उद्धार पाता है, वह कहीं अधिक भला करता है। मैं इसे परमेश्वर की सन्तानों के प्रमुख विशेषाधिकारों में से एक मानता हूँ, और मेरा विचार है कि सुसमाचार में निहित किसी भी विशेषाधिकार को आँखों से ओझल करने से आत्मा की हानि हुए बिना नहीं रहती।

(1) अन्त तक स्थिर रहना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त है, क्योंकि यह सुसमाचार के सम्पूर्ण कथन पर गहरा रंग चढ़ा देता है।

सुसमाचार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह आनन्द का समाचार है। वह विद्रोही संसार के लिए शान्ति का सन्देश है। वह किसी दूर देश से आया शुभ समाचार है, जो जितना अप्रत्याशित है उतना ही हमारी योग्यता से परे। यह आनन्द का समाचार है कि हमारे लिए आशा है, जो स्वभाव से खोए हुए, नष्ट और दिवालिया हैं—क्षमा की आशा, परमेश्वर से मेल-मिलाप की आशा, महिमा की आशा। यह आनन्द का समाचार है कि इस आशा की नींव सामर्थी, गहरी और चौड़ी है—वह एक उद्धारकर्ता की प्रायश्चित्तकारी मृत्यु और अनुग्रहपूर्ण मध्यस्थता पर बनी है। यह आनन्द का समाचार है कि यह उद्धारकर्ता एक सचमुच जीवित व्यक्ति है, परमेश्वर का पुत्र यीशु; जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आनेवालों को पूरी रीति से उद्धार देने में समर्थ है, और जितना समर्थ है उतना ही दयालु, करुणामय और उद्धार देने को तत्पर भी। यह आनन्द का समाचार है कि इस उद्धारकर्ता के द्वारा क्षमा और शान्ति पाने का मार्ग अत्यन्त सरल है। वह कोई ऐसी वस्तु नहीं जो स्वर्ग में इतनी ऊँची हो कि हम पहुँच न सकें, या पाताल में इतनी गहरी हो कि हम थाह न पा सकें। बस विश्वास करना है, भरोसा रखना है, और अपने आपको पूरी रीति से यीशु पर छोड़ देना है, और उद्धार हमारा अपना हो जाता है। यह आनन्द का समाचार है कि जो विश्वास करते हैं वे तुरन्त धर्मी ठहराए जाते हैं और उनके सब अपराध क्षमा हो जाते हैं; उनके पाप, चाहे कितने ही हों, धो डाले जाते हैं; उनकी आत्माएँ, चाहे कितनी ही अयोग्य हों, परमेश्वर के सामने धर्मी गिनी जाती हैं।

वे यीशु पर विश्वास करते हैं, इसलिए उनका उद्धार हुआ है। यही शुभ समाचार है। यही आनन्द का समाचार है। यही वह सत्य है जो सुसमाचार की सबसे बड़ी विशेषता है। धन्य है वह जो इसे जानता और इस पर विश्वास करता है!

परन्तु, हे पाठक, क्षण भर सोचो कि यदि मैं आगे यह कहता कि ये सब दया-दान पाने के बाद भी तुम आगे चलकर इन्हें पूरी तरह खो सकते हो, तो सुसमाचार के स्वर में कितना भारी अन्तर आ जाता। यदि मैं तुमसे कहूँ कि तुम इन सब विशेषाधिकारों को गँवा देने के प्रतिदिन खतरे में हो, और मसीह के लहू से मुहरबन्द तुम्हारी क्षमा फिर वापस ली जा सकती है, तो तुम्हारे मन की क्या दशा होगी? यदि मैं कहूँ कि तुम्हारी सुरक्षा अभी अनिश्चित बात है, और तुम अब भी नाश हो सकते हो और स्वर्ग कभी पहुँच ही न पाओ, तो तुम क्या सोचोगे? ओह, यह कैसी गिरावट प्रतीत होगी! ओह, महिमामय सुसमाचार का कितना अनुग्रह और सौन्दर्य लुप्त होकर मुरझा जाएगा! फिर भी अन्त तक स्थिर रहने का इनकार हमें अक्षरशः और ठीक इसी निष्कर्ष पर पहुँचाता है।

एक बार यह मान लो कि परमेश्वर के सन्त नाश हो सकते हैं, तो मुझे ऐसा लगता है कि तुम सुसमाचार के मुकुट से उसका सबसे दीप्तिमान रत्न नोच लेते हो। हम किसी खड़ी चट्टान की कोर पर लटके हैं। मरने तक हम भयानक अनिश्चितता में रखे जाते हैं। यह कहना कि यदि हम केवल स्थिर बने रहें तो हमें प्रोत्साहन देने के लिए अनुग्रह की बहुत-सी प्रतिज्ञाएँ हैं, केवल उपहास है। यह तो रोगी से कहने जैसा है कि यदि वह केवल स्वस्थ हो जाए तो बलवन्त हो जाएगा। बेचारे रोगी को कोई भरोसा नहीं कि वह स्वस्थ हो जाएगा, और बेचारा निर्बल विश्वासी अपने भीतर ऐसा कुछ नहीं पाता जो स्थिर रहने की सामर्थ्य जैसा हो। आज वह कनान में हो सकता है, और कल फिर मिस्र में, दासत्व में। इस सप्ताह वह सकरे मार्ग पर हो सकता है; परन्तु जहाँ तक उसे ज्ञात है, अगले सप्ताह वह फिर चौड़े मार्ग पर लौट गया हो। इस महीने वह धर्मी ठहराया गया, क्षमा पाया हुआ और छुड़ाया हुआ मनुष्य हो सकता है; परन्तु अगले महीने उसकी क्षमा सब वापस ली जा सकती है, और वह स्वयं दण्ड की दशा में हो। इस वर्ष उसमें विश्वास हो और वह परमेश्वर की सन्तान हो; अगले वर्ष वह शैतान की सन्तान हो, और मसीह में उसका कोई भाग या अंश न रहे। इसमें शुभ समाचार कहाँ है? आनन्द के समाचार का क्या हुआ? सचमुच मुझे ऐसा सिद्धान्त सुसमाचार के आनन्द को जड़ से काट डालनेवाला लगता है। फिर भी यदि हम सन्तों के अन्त तक स्थिर रहने को अस्वीकार करें तो यही सिद्धान्त हमें मानना पड़ेगा।[12]

मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मैं उसके वचन में इससे भिन्न प्रकार का सुसमाचार देख पाता हूँ। मेरी आँखों में बाइबल यही सिखाती है कि जो एक बार मसीह में विश्वास का जीवन आरम्भ करता है, वह निःसन्देह विश्वास से गिरने से बचाया जाएगा और महिमामय अन्त तक पहुँचेगा। परमेश्वर के अनुग्रह से एक बार जिलाया जाने पर वह सदा जीवित रहेगा। पाप की कब्र से एक बार उठाया जाकर और नया मनुष्य बनाया जाकर वह कभी उस कब्र में लौटकर फिर अपराधों और पापों में मरा हुआ पुराना मनुष्य न बनेगा। वह परमेश्वर की सामर्थ्य से सुरक्षित रखा जाएगा। वह उसके द्वारा जिसने उससे प्रेम किया जयवन्त से भी बढ़कर होगा। अनादि परमेश्वर उसका शरण-स्थान है; और उसके नीचे सनातन भुजाएँ हैं। जिस प्रेम में उसका भाग है वह अनन्त है। जिस धार्मिकता का वह वस्त्र पहने है वह अनन्त है। जो छुटकारा वह भोग रहा है वह अनन्त है। उसका बोध और सान्त्वना वह अपनी ही लापरवाही से खो सकता है। परन्तु वस्तु स्वयं, एक बार विश्वास कर लेने के बाद, सदा के लिए उसी की है।

पाठक, उन दो रीतियों को देखिए जिनसे थके और बोझ से दबे हुए पापी से बात की जा सकती है, और अपने आप ही निर्णय कीजिए कि कौन-सी परमेश्वर के अनुग्रह के सुसमाचार से अधिक मेल खाती है। एक ओर वह सिद्धान्त है जो कहता है, "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा। एक बार विश्वास करने के बाद तू कभी नाश न होगा। तेरा विश्वास कभी पूरी तरह जाने न दिया जाएगा। छुटकारे के दिन तक तुझ पर पवित्र आत्मा की छाप रहेगी।" दूसरी ओर वह सिद्धान्त है जो कहता है, "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा। परन्तु विश्वास करने के बाद सावधान रहना। तेरा विश्वास जाता रह सकता है। तू गिर सकता है। तू आत्मा को अपने से दूर भगा सकता है। अन्त में तू सदा के लिए नाश भी हो सकता है।" इन दोनों सिद्धान्तों में से किसमें अधिक शुभ समाचार है? कौन-सा अधिक आनन्द के समाचार जैसा है? क्या पापी से किसी भी रीति से बात की जाए, सब बराबर है? क्या यह कोई महत्त्व नहीं रखता कि हम उससे कहें कि विश्वास करने पर वह उद्धार पाता है, जब तक कि वह गिर न जाए, या यह कहें कि विश्वास करने पर वह सदा के लिए उद्धार पाता है? मैं ऐसा नहीं सोच सकता। मैं इन दोनों सिद्धान्तों के बीच के अन्तर को सचमुच बहुत बड़ा मानता हूँ। यह जनवरी और जून का अन्तर है। यह भोर के धुँधलके और दोपहर के उजाले का अन्तर है।

मैं अपनी ओर से कहता हूँ। दूसरों के अनुभव का उत्तर मैं नहीं दे सकता। मुझे ठोस शान्ति मिले, इसके लिए जितना मुझे अपनी वर्तमान दशा के विषय में जानना आवश्यक है, उतना ही अपने भविष्य की आशाओं के विषय में भी। आज अपने क्षमा-दान को देखना सुखद है; परन्तु मैं कल के बारे में सोचे बिना नहीं रह सकता। मुझे बताइए कि जो मुझे मसीह के पास ले आता है और मुझे उसमें मन फिराव और विश्वास देता है, वह मुझे कभी न छोड़ेगा और न त्यागेगा, तो मुझे ठोस सान्त्वना मिलती है। मेरे पाँव चट्टान पर हैं। मेरी आत्मा सुरक्षित हाथों में है। मैं सुरक्षित घर पहुँचूँगा। इसके विपरीत, मुझसे कहिए कि मसीह के पास लाए जाने के बाद मुझे मेरी ही चौकसी पर छोड़ दिया गया है, और आत्मा मुझे छोड़ दे या नहीं, यह मेरे जागते रहने, प्रार्थना करने और सावधानी बरतने पर निर्भर है, तो मेरा हृदय भीतर ही भीतर पिघल जाता है। मैं रेत की दलदल पर खड़ा हूँ। मैं टूटे हुए नरकट का सहारा ले रहा हूँ। मैं कभी स्वर्ग नहीं पहुँचूँगा। मुझे प्रतिज्ञाओं की बात बताना व्यर्थ है; वे तो तभी मेरी हैं जब मैं उनके योग्य चलूँ। मुझसे मसीह की दया की चर्चा करना व्यर्थ है; मैं आलस्य और हठ से उसमें अपना सारा भाग खो सकता हूँ। पाठक, अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का अभाव मुझे सारे सुसमाचार को ही दूसरा रंग दे देता प्रतीत होता है। यदि मैं इसे बड़े महत्त्व का मानता हूँ, तो इसमें आपको आश्चर्य न होना चाहिए।

(2) परन्तु अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त इस कारण से भी महत्त्वपूर्ण है कि धर्म के विषय में जो लोग दो विचारों के बीच डगमगाते हैं, उन पर इसका विशेष प्रभाव पड़ने की सम्भावना है।

मसीह की कलीसिया में इस प्रकार के बहुत से लोग हैं। हर उस सभा में, जिसमें

मसीह का सुसमाचार सुनाया जाता है, सैकड़ों ऐसे लोग मिलते हैं जो भली-भाँति जानते हैं कि क्या उचित है, फिर भी अपने ज्ञान के अनुसार चलने का साहस नहीं रखते। उनके विवेक जाग उठे हैं। उनके मन अपेक्षाकृत प्रकाशित हैं। उनकी भावनाएँ अपनी आत्माओं के मूल्य के बोध से कुछ-कुछ जाग उठी हैं। वे वह मार्ग देखते हैं जिस पर उन्हें चलना चाहिए। वे आशा करते हैं कि किसी दिन उस पर चल सकेंगे। परन्तु अभी तो वे बैठे प्रतीक्षा करते हैं। वे क्रूस उठाकर मसीह का अंगीकार नहीं करना चाहते।

और उन्हें किस बात ने रोक रखा है? बहुत बड़ी संख्या में तो वे आरम्भ करने से इसलिए डरते हैं कि कहीं आगे चलकर असफल होकर गिर न जाएँ। यदि वे मसीह की सेवा करें तो उनके सामने अनगिनत कठिनाइयाँ हैं। वे बिलकुल ठीक कहते हैं। यह नकारना व्यर्थ है कि कठिनाइयाँ हैं, और बहुत हैं और बड़ी भी। जिस विशाल समुद्र में हम उन्हें उतारना चाहते हैं, उसके किनारे पर वे काँपते खड़े हैं, और जब वे उमड़ती-घुमड़ती लहरों को देखते हैं तो उनके हृदय बैठ जाते हैं। वे उस समुद्र के जल पर अनेक छोटी नावें देखते हैं जो इधर-उधर डोल रही हैं, पार पहुँचने के लिए कठिन संघर्ष कर रही हैं, और ऐसी लगती हैं मानो क्रुद्ध लहरों में डूब जाएँगी और कभी बन्दरगाह तक सुरक्षित न पहुँचेंगी। वे सोचते हैं, "कोई लाभ नहीं; कोई लाभ नहीं। हम निश्चय ही गिर पड़ेंगे। हम अभी मसीह की सेवा नहीं कर सकते। यह काम होने का नहीं।"

अब, इन डगमगाती आत्माओं को साहस देने के लिए सबसे अधिक सम्भावित बात क्या है? इस यात्रा के लिए उनका मन बढ़ाने के लिए सबसे अधिक सम्भावित बात क्या है? उनके हृदयों को प्रफुल्लित करने, उनके मनों में बल भरने और उन्हें निडर होकर नाव छोड़ने के बिन्दु तक लाने के लिए सबसे अधिक सम्भावित बात क्या है? मैं बिना झिझक उत्तर देता हूँ: अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त।

मैं उनसे यह कहना चाहता हूँ कि मसीह की सेवा की कठिनाइयाँ चाहे कितनी ही बड़ी हों, अनुग्रह और सामर्थ्य का भण्डार तैयार है जो उन्हें विजय के साथ सब कुछ पार करा देगा। मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि ये दीन, प्रार्थना करनेवाले, टूटे मनवाले यात्री, जिन्हें वे देखते हैं और जिनके डूब जाने की वे बाट जोहते हैं, ऐसे सुरक्षित हैं मानो पहले ही बन्दरगाह में पहुँच चुके हों। हर एक के साथ जहाज़ पर एक खेवैया है, जो उन्हें हर आँधी से सुरक्षित पार ले जाएगा। हर एक सनातन परमेश्वर से एक ऐसे बन्धन में जुड़ा है जो कभी टूट नहीं सकता, और वे सब अन्त में अपने प्रभु के दाहिने हाथ सुरक्षित दिखाई देंगे। हाँ, मैं उनसे यह भी कहना चाहता हूँ कि यदि वे केवल आरम्भ करें तो उनका भी अन्त महिमामय होगा। मैं चाहता हूँ कि वे जानें कि यदि वे अपने आपको मसीह को सौंप दें, तो वे कभी निकाल न दिए जाएँगे। शैतान उन्हें छीन न सकेगा। वे डूबने और लज्जित होने के लिए कभी छोड़ न दिए जाएँगे। परीक्षाएँ उन पर आ सकती हैं, पर कोई ऐसी नहीं जिसे सहने की सामर्थ्य आत्मा उन्हें न देगा। प्रलोभन उन पर आ सकते हैं, पर कोई ऐसा नहीं जिसका सामना करने के योग्य आत्मा उन्हें न बनाएगा। वे केवल आरम्भ करें, और वे विजयी होंगे। परन्तु मुख्य बात आरम्भ करना ही है।

पाठक, मेरा दृढ़ विश्वास है कि बहुत से डगमगाते मसीही स्पष्ट अंगीकार करने से इसलिए पीछे हटते हैं कि उन्हें वह प्रोत्साहन नहीं मिलता जो अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त देने के लिए ठहराया गया है।

(3) अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि सच्चे विश्वासियों के मनों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ने की सम्भावना है।

सच्चे विश्वासियों की संख्या सदा बहुत थोड़ी रही है। वे एक छोटा झुण्ड हैं। परन्तु उस झुण्ड में से भी थोड़े ही ऐसे हैं जिन्हें विश्वास में दृढ़ कहा जा सके, थोड़े ही हैं जो विश्वास करने में अटूट आनन्द और शान्ति को बहुत जानते हैं, और थोड़े ही हैं जो अपने सन्देहों, चिन्ताओं और भयों से बार-बार निराश नहीं हो जाते।

इस बात का इनकार करना व्यर्थ है कि स्वर्ग का मार्ग सकरा है। विश्वासियों के विश्वास को परखने वाली बहुत सी बातें हैं। उन पर ऐसी परीक्षाएँ आती हैं जिन्हें संसार समझ नहीं सकता। उनके भीतर एक ऐसा हृदय है जो निर्बल, छली और अविश्वसनीय है—जब वे उत्सुकता से गर्मजोशी चाहते हैं तब वह ठण्डा पड़ जाता है,—जब वे आगे बढ़ना चाहते हैं तब वह पीछे हट जाता है,—जागने की अपेक्षा सो जाने को अधिक तैयार रहता है।

उनके बाहर एक ऐसा संसार है जो मसीह के सत्य और मसीह के लोगों से प्रेम नहीं रखता,—ऐसा संसार जो निन्दा, उपहास और सताव से भरा है,—ऐसा संसार जिसमें उनके अपने सबसे प्रिय सम्बन्धी भी प्रायः सम्मिलित हो जाते हैं। उनके निकट सदा एक व्यस्त शैतान रहता है, एक ऐसा शत्रु जो 6,000 वर्ष से मनुष्यों के हृदयों को पढ़ता आया है, और ठीक-ठीक जानता है कि अपनी परीक्षाओं को कैसे और कब उनके अनुकूल बनाए,—ऐसा शत्रु जो उनके मार्ग में फन्दे बिछाने से कभी नहीं रुकता,—जो न कभी ऊँघता है और न कभी सोता है। उन्हें भी औरों की तरह जीवन की चिन्ताओं को निभाना पड़ता है,—बाल-बच्चों की चिन्ता,—व्यापार की चिन्ता,—सेवकों की चिन्ता,—धन की चिन्ता,—सांसारिक योजनाओं और प्रबन्धों की चिन्ता,—एक दीन, निर्बल देह की चिन्ता, जो प्रतिदिन उनकी आत्मा पर आ पड़ती है। फिर यदि विश्वासी कभी-कभी निराश हो जाएँ तो इसमें आश्चर्य ही क्या? बल्कि आश्चर्य तो इस बात पर होना चाहिए कि कोई भी विश्वासी उद्धार पाता है। सचमुच मैं प्रायः सोचता हूँ कि प्रत्येक उद्धार पाए हुए जन का उद्धार इस्राएल के लाल समुद्र पार करने से भी बड़ा चमत्कार है।[13]

परन्तु विश्वासी के भय और चिन्ताओं की सबसे उत्तम औषधि क्या है? जब वह आने वाले अनजाने भविष्य की ओर देखता और बीते हुए थका देने वाले समय को स्मरण करता है, तब उसे सबसे अधिक ढाढ़स किस बात से मिलेगा? मैं बिना किसी हिचकिचाहट के उत्तर देता हूँ: परमेश्वर के चुने हुए लोगों के अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त। वह यह जान ले कि परमेश्वर ने जो भला काम उसमें आरम्भ किया है, उसे वह कभी नष्ट नहीं होने देगा। वह यह जान ले कि मसीह की छोटी भेड़-बकरियों के झुण्ड के सब पदचिह्न एक ही दिशा में हैं। वे भटके हैं। वे सताए गए हैं। वे परखे गए हैं। परन्तु उनमें से एक भी खोया नहीं गया। वह यह जान ले कि यीशु जिनसे प्रेम करता है, उनसे अन्त तक प्रेम करता है। वह यह जान ले कि प्रभु अपने झुण्ड के सबसे निर्बल मेम्ने को जंगल में नाश होने न देगा, और अपनी बारी के सबसे कोमल फूल को मुरझाकर मरने न देगा। वह यह जान ले कि सिंहों की मांद में दानिय्येल, आग के भट्ठे में तीनों जवान, जहाज़ की टूटन में पौलुस, जहाज़ में नूह—इनमें से कोई भी मसीह में विश्वास करने वाले से अधिक सुरक्षित और अधिक देखभाल पाया हुआ न था। वह यह जान ले कि वह पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य से घिरा हुआ, दीवार से सुरक्षित, रक्षित और पहरे में है, और नाश नहीं हो सकता। वह यह जान ले कि वर्तमान या आने वाली बातों में,—मनुष्यों या शैतानों में,—भीतर की चिन्ताओं या बाहर के क्लेशों में इतनी सामर्थ्य नहीं कि परमेश्वर की किसी एक भी सन्तान को उस प्रेम से अलग कर सके जो मसीह यीशु में है।

यह दृढ़ सांत्वना है। ये वे बातें हैं जो परमेश्वर ने अपने लोगों को स्थिर और दृढ़ करने के लिये सुसमाचार में रख छोड़ी हैं। मसीह की कलीसिया में यदि इन बातों को जितना अभी किया जाता है उससे अधिक सामने रखा जाए तो उसके लोगों के लिये कितना भला होता। मैं सचमुच विश्वास करता हूँ कि सन्तों की निर्बलता का एक कारण उन सत्यों से उनकी अनभिज्ञता है जिन्हें परमेश्वर ने इसलिये प्रकट किया कि वे बलवन्त हो सकें।

पाठक, अन्त तक स्थिर रहने के महत्त्व का विषय मैं यहीं छोड़ता हूँ। मुझे भरोसा है कि मैंने इतना कह दिया है कि आप देख सकें कि इस पुस्तिका में मैंने आपका ध्यान इस ओर बिना उचित कारण नहीं दिलाया। मैं दृढ़ता से अनुभव करता हूँ कि मनुष्य के हृदय की कठोरता ऐसी है कि धार्मिक शिक्षा में कोई ऐसी बात छोड़ी नहीं जानी चाहिए जिससे उसका भला होने की सम्भावना हो। मैं सत्य के एक भी दाने को छोड़ने का साहस नहीं करता, चाहे वह कितना ही कड़ा और उसका दुरुपयोग होने की सम्भावना वाला क्यों न प्रतीत हो। मुझे कोई भी बात तुच्छ नहीं लगती जो सुसमाचार की शोभा बढ़ाती हो, या डगमगाने वालों को प्रोत्साहन देती हो, या परमेश्वर के लोगों को दृढ़ करती और उनकी उन्नति करती हो। मैं यह सिखाना चाहता हूँ कि सुसमाचार केवल वर्तमान क्षमा और शान्ति ही नहीं, वरन् अनन्त सुरक्षा और अन्त तक निश्चित बने रहने का भी प्रस्ताव करता है। मेरा विश्वास है कि यही आत्मा की इच्छा है। और जो कुछ आत्मा प्रकट करता है, उसकी मैं घोषणा करना चाहता हूँ।

और अब, पाठक, मैंने अपनी सामर्थ्य भर अन्त तक स्थिर रहने का सारा विषय आपके सामने रख दिया है। जैसा मैं यीशु में सत्य को मानता हूँ, उसे मैंने यथासम्भव स्पष्टता से आपको बताया है। यदि मेरी किसी बात से आपको ठेस पहुँची हो तो मुझे खेद है। मैं किसी को दुःख देना नहीं चाहता, और परमेश्वर की सन्तानों को तो बिलकुल नहीं। यदि मैं आपको समझाने में असफल रहा हूँ तो मुझे खेद है, परन्तु मुझे सन्तोष है कि दोष उस सिद्धान्त में नहीं जिसका मैं समर्थन करता हूँ, वरन् उसे प्रस्तुत करने के मेरे ढंग में है। अब इस पुस्तिका को कुछ व्यावहारिक बातों के साथ समाप्त करना शेष है।

(1) एक बात तो यह कि मैं आपसे विनती करता हूँ कि भली-भाँति विचार कीजिए कि क्या मसीह यीशु के उद्धार में आपका कोई भाग है भी या नहीं।

अन्त तक स्थिर रहने के विषय में आप जो भी मानें, उसका कोई महत्त्व नहीं, यदि अन्ततः आपको मसीह में विश्वास ही नहीं है। इससे बहुत अन्तर नहीं पड़ता कि आप इस सिद्धान्त को मानते हैं या नहीं, जब तक आपमें उद्धार देने वाला विश्वास नहीं है, आपके पाप क्षमा नहीं हुए हैं, और आपका हृदय पवित्र आत्मा के द्वारा नया नहीं बनाया गया है। सबसे स्पष्ट बौद्धिक ज्ञान किसी मनुष्य को नहीं बचाएगा। यदि मनुष्य नए सिरे से जन्मा नहीं है, तो सबसे शुद्ध और रूढ़िवादी विचार भी उसे सबसे अनजान अन्यजाति के पास ही नाश होने से नहीं रोकेंगे। आह, खोजिए और देखिए कि आपकी अपनी आत्मा की दशा क्या है!

आप सदा जीवित नहीं रह सकते। आपको एक दिन मरना ही है। आप मृत्यु के बाद के न्याय से बच नहीं सकते। आपको मसीह के न्याय-आसन के सामने खड़ा होना ही है। प्रधान स्वर्गदूत की पुकार की अवज्ञा नहीं की जा सकती। उस अन्तिम महासभा में उपस्थित होना ही होगा। आपकी अपनी आत्मा की दशा की एक दिन पूरी जाँच होगी। एक दिन यह प्रकट हो जाएगा कि परमेश्वर की दृष्टि में आप क्या हैं। आपकी आत्मिक दशा अन्त में सारे संसार के सामने प्रकाश में लाई जाएगी। आह, अभी पता कर लीजिए कि वह क्या है! जब तक आपके पास समय है, जब तक आपका स्वास्थ्य है, अपनी आत्मा की दशा का पता लगा लीजिए।

यदि आपका मन नहीं फिरा है, तो आपका खतरा उससे कहीं अधिक बड़ा है जितना मैं बता सकता हूँ। जितनी पूर्ण सुरक्षा विश्वासी की है, उतना ही घातक संकट अविश्वासी का है। अविश्वासी और उस कीड़े के बीच जो कभी नहीं मरता, और उस आग के बीच जो कभी नहीं बुझती, केवल एक ही कदम का अन्तर है। वह सचमुच अथाह कुण्ड के किनारे पर लटका हुआ है। सन्त के लिये अचानक मृत्यु अचानक महिमा है; परन्तु मन न फिराए हुए पापी के लिये अचानक मृत्यु अचानक नरक है। ओह, खोजकर देखिये कि आपकी आत्मा की दशा क्या है!

स्मरण रखिये कि आप यह जान सकते हैं कि सुसमाचार के निमन्त्रणों में आपका भाग है या नहीं। यह ऐसी बात है जो जानी जा सकती है। यह कहना कि कोई मनुष्य इसे नहीं बता सकता, व्यर्थ की बात है। मैं कभी विश्वास नहीं करूँगा कि हाथ में बाइबल लिये हुए कोई सच्चा मनुष्य परिश्रम से आत्म-परीक्षा करने पर भी अपनी आत्मिक दशा को पहचानने में असफल रहेगा। ओह, सच्चे मनुष्य बनिये! पवित्रशास्त्र में ढूँढ़िये। अपने भीतर झाँकिये। जब तक अपनी आत्मा की दशा का पता न लगा लें, तब तक चैन न लीजिये। आत्मा की दशा को अनिश्चित छोड़कर जीते जाना बुद्धिमान का नहीं, मूर्ख का काम है।

(2) इसके बाद, यदि आप सुसमाचार के विशेषाधिकारों के विषय में कुछ नहीं जानते, तो मैं आपसे आज ही विनती करता हूँ कि मन फिराइये और मसीह की ओर फिरिये, उसका शब्द सुनिये और उसके पीछे चलिये।

मुझे कोई कारण नहीं दिखता, न मनुष्य की ओर से न परमेश्वर की ओर से, कि यदि आप सचमुच इच्छुक हैं तो आज इस निमन्त्रण को स्वीकार करके उद्धार न पाएँ। आपके पापों की संख्या आपके लिये बाधा नहीं होनी चाहिये। हर प्रकार का पाप क्षमा हो सकता है। यीशु का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।—आपके हृदय की कठोरता बाधा नहीं होनी चाहिये। परमेश्वर आपको नया हृदय देगा, और आपके भीतर नई आत्मा डालेगा।—परमेश्वर की आज्ञाएँ बाधा नहीं होनी चाहिये। वह पापियों की मृत्यु नहीं चाहता। वह नहीं चाहता कि कोई नाश हो, वरन् यह कि सब मन फिराव तक पहुँचें।—मसीह की इच्छा में कोई कमी बाधा नहीं है:—वह बहुत समय से मनुष्यों के पुत्रों को पुकार रहा है, "जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंतमेंत ले।" "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" ओह पाठक, आप उद्धार क्यों न पाएँ?

यदि आपको कभी परमेश्वर की सन्तान होना है, तो एक दिन ऐसा आना ही चाहिये जब आप अपनी आत्मा के हितों से खिलवाड़ करना छोड़ दें। एक घड़ी ऐसी आनी चाहिये जब आप अन्ततः सच्ची गम्भीरता से घुटने टेकें और परमेश्वर के सामने सच्ची प्रार्थना में अपना हृदय उँडेल दें। एक समय ऐसा आना चाहिये जब आपके पापों का बोझ अन्ततः असह्य लगे, और आप अनुभव करें कि मसीह में विश्राम पाना ही होगा, नहीं तो नाश होना होगा। यह सब होना ही चाहिये यदि आपको कभी परमेश्वर की सन्तान बनना और उद्धार पाना है। और आज ही क्यों नहीं? आज की इसी रात क्यों नहीं? बिना देर किये मसीह को ढूँढ़कर जीवन क्यों न पाएँ? ओह पाठक, यदि हो सके तो मुझे उत्तर दीजिये!

(3) इसके बाद, मैं हर उस पाठक से विनती करता हूँ जो अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त मानता है, कि वह इस बहुमूल्य सिद्धान्त का ऐसा उपयोग करे कि इसका दुरुपयोग न हो।

सब मनुष्यों में परमेश्वर की दयाओं का दुरुपयोग करने की भयानक तत्परता है। परमेश्वर की सन्तान भी इस दुखद संक्रमण से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। उत्तम से उत्तम सन्तों के पास भी एक व्यस्त शैतान है जो उन्हें समझाना चाहता है कि वे अपने विशेषाधिकारों को लापरवाही से जीने का बहाना बना लें, और अपनी आत्मा के भोजन को विष में बदल दें। जब मैं कलीसिया के चारों ओर देखता हूँ और यह सोचता हूँ कि बहुत से ऊँचे दावे करनेवाले कैसे अन्त को पहुँचते हैं, तो मुझे लगता है कि सावधानी की आवश्यकता है। "जो समझता है, मैं स्थिर हूँ, वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।"

क्या हम जानना चाहते हैं कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का दुरुपयोग क्या है? इसका दुरुपयोग तब होता है जब विश्वासी अपनी सुरक्षा को आचरण की असंगतियों का बहाना बना लेते हैं। इसका दुरुपयोग तब होता है जब वे अन्तिम विनाश से अपनी सुरक्षा को पवित्रीकरण के निम्न स्तर और परमेश्वर के साथ दूर की चाल का बहाना बना लेते हैं। इन दोनों दुरुपयोगों से मैं विश्वासियों से विनती करता हूँ कि सावधान रहें।

क्या हम जानना चाहते हैं कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का सही उपयोग क्या है? आइये हम अपने हृदयों की प्रतिदिन की क्रियाओं पर सजग दृष्टि रखें। आइये हम आत्मिक आलस्य की छोटी से छोटी प्रवृत्ति को आरम्भ में ही मार डालें। आइये हम अपने मन में अपने जीवन के प्रमुख सिद्धान्त के रूप में यह बैठा लें कि परमेश्वर की दयाएँ तभी भली रीति से काम में लाई जाती हैं जब वे हमारे हृदयों पर पवित्र करनेवाला प्रभाव डालें। आइये हम अपने भीतरी मनुष्यत्व में यह जड़ पकड़वा दें कि मसीह के प्रेम का सच्चा मूल्य तभी आँका जाता है जब वह हमें अधिक आत्मिक-मनस्कता की ओर उकसाता है। आइये हम अपने मन के सामने यह रखें कि हम जितना अधिक सुरक्षित अनुभव करें, उतना ही अधिक हमें पवित्र होना चाहिये। हम जितना अधिक यह समझें कि परमेश्वर ने हमारे लिये बहुत कुछ किया है, उतना ही अधिक हमें परमेश्वर के लिये करना चाहिये। हमारा ऋण जितना बड़ा, हमारी कृतज्ञता भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिये। हम अनुग्रह की सम्पत्ति को जितना अधिक देखें, भले कर्मों में उतने ही अधिक धनी हों।

ओह, प्रेरित पौलुस जैसा हृदय पाने के लिये! उसके समान मसीह में अपनी पूर्ण सुरक्षा को समझना, और उसके समान परमेश्वर की महिमा के लिये ऐसा परिश्रम करना मानो हम कभी बहुत नहीं कर सकते,—यही लक्ष्य है,—यही वह स्तर है जिसे हमें पाना चाहिये।

पाठक, आइये हम अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का ऐसा उपयोग करें कि हमारी भलाई की कभी निन्दा न हो। आइये हम अपने जीवन से इस सिद्धान्त को ऐसा सँवारें कि वह दूसरों के लिये सुन्दर बने, और मनुष्य यह कहने को विवश हों, "यह मानना अच्छी और पवित्र बात है कि सन्त कभी नाश न होंगे।"

(4) अन्त में, मैं उन सब विश्वासियों से विनती करता हूँ जो अब तक गिर जाने से डरते रहे हैं, कि वे अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को दृढ़ता से पकड़ लें, और मसीह में अपनी सुरक्षा को पहचानें।

मैं चाहता हूँ कि तुम मसीह में अपने भाग की लम्बाई और चौड़ाई को जानो। मैं चाहता हूँ कि तुम उस सम्पूर्ण भण्डार को समझो जिसके अधिकारी तुम यीशु पर विश्वास करने से ठहरते हो। तुमने जान लिया है कि तुम एक बड़े पापी हो। इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करो। तुम क्षमा और परमेश्वर के साथ मेल पाने के लिए मसीह के पास भाग आए हो। इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करो। तुमने समय और अनन्तकाल के लिए अपने आप को यीशु को सौंप दिया है: मसीह के लहू, मसीह की धार्मिकता, मसीह की मध्यस्थता और मसीह की प्रतिदिन की सदा बनाए रखने वाली मध्यस्थता की प्रार्थना को छोड़ तुम्हारी कोई और आशा नहीं। इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करो। तुम्हारे हृदय की अभिलाषा और प्रार्थना है कि तुम हर प्रकार के चाल-चलन में पवित्र बनो। इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करो। परन्तु आह, इस महिमामय सत्य को दृढ़ता से थाम लो — कि यीशु पर विश्वास करने से तुम कभी नाश न होगे, कभी निकाले न जाओगे, कभी गिर न पड़ोगे! यह जितना प्रेरितों के लिए लिखा है उतना ही तुम्हारे लिए भी लिखा है, "मेरी भेड़ें कभी नाश न होंगी।" हाँ! पाठक, यीशु ने यह कहा है, और यीशु ने चाहा कि इस पर विश्वास किया जाए। यीशु ने यह कहा है, जिसने अपनी प्रतिज्ञाओं को कभी नहीं तोड़ा। यीशु ने यह कहा है, जो झूठ नहीं बोल सकता। यीशु ने यह कहा है, जिसे स्वर्ग और पृथ्वी में अपना वचन पूरा करने का अधिकार है। यीशु ने यह छोटे से छोटे और दीन से दीन विश्वासी के लिए कहा है: "मेरी भेड़ें कभी नाश न होंगी।"

क्या तुम जीवन में पूर्ण शान्ति चाहते हो? तो अन्त तक स्थिर रहने के इस सिद्धान्त को थाम लो। तुम्हारे क्लेश बहुत और बड़े हो सकते हैं। तुम्हारा क्रूस बहुत भारी हो सकता है। परन्तु तुम्हारी आत्मा का सारा कार्य एक सनातन वाचा के अनुसार चलाया जाता है, जो सब बातों में सुव्यवस्थित और निश्चित है। सब बातें मिलकर तुम्हारी भलाई ही के लिए काम कर रही हैं। तुम्हारे दुःख केवल तुम्हारी आत्मा को महिमा के लिए शुद्ध कर रहे हैं; तुम्हारे बिछोह केवल तुम्हें ऊपर के उस मन्दिर के लिए, जो हाथों से नहीं बना, एक तराशे हुए पत्थर के समान गढ़ रहे हैं। आँधियाँ चाहे किसी भी दिशा से चलें, वे तुम्हें केवल स्वर्ग के और निकट ले जाती हैं; तुम चाहे जैसे भी मौसम से होकर गुज़रो, वह तुम्हें केवल परमेश्वर के खत्ते के लिए पका रहा है। तुम्हारी सबसे उत्तम वस्तुएँ पूरी तरह सुरक्षित हैं। चाहे जो हो, तुम "कभी नाश न होगे।"

क्या तुम रोग में दृढ़ सान्त्वना चाहते हो? तो अन्त तक स्थिर रहने के इस सिद्धान्त को थाम लो। जब तुम इस पार्थिव तम्बू की खूँटियों को एक-एक करके ढीला होता अनुभव करो, तब सोचो, "कोई भी वस्तु मसीह के साथ मेरे मेल को तोड़ नहीं सकती।" तुम्हारा शरीर निकम्मा हो सकता है; तुम्हारे अंग अपना काम करने से इनकार कर सकते हैं; तुम अपने आप को किसी पुराने निकम्मे लट्ठे के समान अनुभव कर सकते हो — दूसरों के लिए थकावट और अपने लिए बोझ। परन्तु तुम्हारी आत्मा सुरक्षित है। यीशु तुम्हारी आत्मा की चिन्ता करते कभी थकता नहीं। तुम "कभी नाश न होगे।"

क्या तुम मृत्यु में आशा की पूर्ण निश्चयता चाहते हो? तो अन्त तक स्थिर रहने के इस सिद्धान्त को थाम लो। चिकित्सक अपना परिश्रम छोड़ चुके हों; मित्र तुम्हारी आवश्यकताएँ पूरी करने में असमर्थ हों; आँखों की ज्योति जा चुकी हो; सुनने की शक्ति जा चुकी हो; स्मरण-शक्ति लगभग जाती रही हो: परन्तु परमेश्वर की करुणा तुम से नहीं हटेगी। एक बार मसीह में होने पर तुम कभी त्यागे न जाओगे। यीशु तुम्हारे पास खड़ा रहेगा। मृत्यु तुम्हें मसीह में परमेश्वर के सनातन प्रेम से अलग न कर सकेगी। तुम "कभी नाश न होगे।"[14]

पाठक, जीवन और मृत्यु में यही तुम्हारा भाग हो! और यही मेरा भी हो!

पाद-टिप्पणियाँ

[1] "हम यह नहीं मानते कि जिन सब को अत्यन्त विवेकी सेवक या मसीही सच्चे मसीही समझे, वे सब 'विश्वास के द्वारा परमेश्वर की सामर्थ्य से उद्धार के लिए सुरक्षित रखे जाएँगे।' हृदय को केवल परमेश्वर ही जाँच सकता है, और वह उस विश्वास को मृत और क्षणिक देख सकता है जिसे हम प्रेम के निर्णय में जीवित और स्थायी समझते हैं।" — टॉमलिन को स्कॉट का उत्तर, पृष्ठ 675।

[2] "पवित्रशास्त्र के सत्य के नितान्त विपरीत है यह कल्पना करना कि जो इस प्रकार नया किए गए हैं, वे फिर से अजन्मे हो सकते हैं।" — आर्चबिशप लेइटन, 1680।

[3] "हर विश्वासी यह नहीं जानता कि वह विश्वासी है, और इसलिए वह विश्वासियों के सब विशेषाधिकारों को नहीं जान सकता।" — ट्रेल, 1690।

"कोई भी पाप में छूट लेने के लिए अपने आप को प्रोत्साहित न करे, और साधनों के उपयोग के बिना परमेश्वर द्वारा अपने सुरक्षित रखे जाने का दुस्साहस न करे। कदापि नहीं! जिस चुनाव की योजना पर यह विजय आधारित है, उसने हमें अन्त तक के लिए चुना है। जो ऐसा निष्कर्ष निकालता है, उसके विषय में मुझे सन्देह है कि वह कभी मसीही था भी। मैं निश्चिन्त होकर कह सकता हूँ कि जिस किसी में दृढ़ ठहराई हुई, संकल्पित और जानबूझकर की गई शिथिलता है, वह अब तक अनुग्रह की वाचा में नहीं आया।" — चार्नॉक, निर्बल अनुग्रह पर। 1684।

[5] मैं तुम्हारा ध्यान उस प्रचलित कथा की ओर दिलाता हूँ कि क्रॉमवेल ने अपनी मृत्यु-शय्या पर डॉ. थॉमस गुडविन से पूछा कि क्या कोई विश्वासी अनुग्रह से गिर सकता है। गुडविन ने उत्तर दिया कि वह नहीं गिर सकता। कहा जाता है कि क्रॉमवेल ने कहा कि "यदि ऐसा है तो मैं सुरक्षित हूँ, क्योंकि मुझे निश्चय है कि मैं अनुग्रह की दशा में रहा हूँ।"

इस कथा की सच्चाई अत्यन्त सन्देहास्पद है। यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि क्रॉमवेल के विश्वासी सेवक ने, जिसने अपने स्वामी की अन्तिम बीमारी में उसके सब उल्लेखनीय कथनों और कार्यों का संग्रह प्रकाशित किया, इस वार्तालाप का उल्लेख नहीं किया। अधिक सम्भावना यही है कि यह उन झूठे और द्वेषपूर्ण गढ़न्तों में से एक है जिनके द्वारा महान प्रोटेक्टर के शत्रुओं ने उसकी मृत्यु के बाद उसकी स्मृति को कलंकित करने का इतना प्रयत्न किया।

[6] "जैसे मसीह मरे हुओं में से जी उठकर फिर नहीं मरता, और मृत्यु का उस पर कोई अधिकार नहीं रहा; वैसे ही धर्मी ठहराया गया मनुष्य, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में परमेश्वर से जुड़ गया है, उस समय से आवश्यक रूप से सदा जीवित रहता है, जैसे मसीह, जिससे उसे जीवन मिला है, सदा जीवित रहता है।" (रोमियों 6:10; यूहन्ना 14:19।) "जब तक वह हम में बना रहता है जो प्राण देता, जिलाता और जीवन देता है, तब तक हम जीवित हैं; और हम जानते हैं कि हमारे विश्वास का कारण हम में सदा बना रहता है। यदि जीवन का सोता मसीह उड़ जाए, और उन निवासों को छोड़ दे जहाँ वह एक बार रहा, तो उसकी इस प्रतिज्ञा का क्या होगा, 'मैं जगत के अन्त तक तुम्हारे साथ हूँ'? यदि परमेश्वर का वह बीज, जिसमें मसीह समाया है, पहले गर्भ में पड़े और फिर निकाल दिया जाए, तो पतरस उसे अविनाशी क्यों कहता है? (1 पतरस 1:23।) यूहन्ना यह क्यों कहता है कि वह बना रहता है? (1 यूहन्ना 3:9।)" — हूकर, धर्मी ठहराए जाने पर प्रवचन। 1590।

[7] बहुत कम विषय ऐसे हैं जिनके विषय में अंग्रेज़ लोग उतने अनजान हैं जितने इंग्लैंड की कलीसिया के वास्तविक सिद्धान्तों के विषय में। बहुत से लोग अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों के और प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के बाद लगभग एक शताब्दी तक के सभी प्रमुख अंग्रेज़ धर्मशास्त्रियों के धर्मवैज्ञानिक मतों के विषय में कुछ नहीं जानते। वे उन मतों को पुराना कहते हैं जो वास्तव में नए हैं, और उन मतों को नया कहते हैं जो वास्तव में पुराने हैं।

इस अज्ञानता के कारणों की खोज करना समय की बर्बादी होगी। यह तो निश्चित है कि यह अज्ञानता विद्यमान है। बहुत कम लोग जानते प्रतीत होते हैं कि जिन सिद्धान्तों को अब सामान्यतः सुसमाचारीय कहा जाता है, वे महारानी एलिज़ाबेथ और जेम्स प्रथम के पूरे शासनकाल में अंग्रेज़ कलीसियाई जनों की सर्वमान्य धर्मविद्या थे। वे नवीन आविष्कार के नये-नवेले विचार नहीं हैं, जैसा कि बहुत से लोग अज्ञानतावश मान लेते हैं। वे तो केवल वे पुराने मार्ग हैं जिन पर धर्म-सुधारक और उनके तुरन्त बाद के उत्तराधिकारी चले थे। ट्रैक्टेरियनवाद, उच्च कलीसियावाद और व्यापक कलीसियावाद नई प्रणालियाँ हैं। सुसमाचारीय शिक्षा न कम है न अधिक, वह वही पुरानी पाठशाला है।

इस कथन का प्रमाण एलिज़ाबेथ और जेम्स प्रथम के शासनकाल के कलीसियाई इतिहास में तथा उस काल के धर्मशास्त्रियों के लेखों में मिलता है। मुझसे यह कभी न हो कि मैं उस समय के धर्मशास्त्रियों की सब बातों और कार्यों का बचाव करूँ। विद्यार्थी को उनके लेखों में असहिष्णुता, संकीर्णता और कट्टरता के प्रचुर चिह्न मिलेंगे, जिनका समर्थन करने वाला मैं अन्तिम व्यक्ति होऊँगा। परन्तु मेरे लिए यह दोपहर के समान स्पष्ट है कि उस समय के कलीसियाई जनों की विशाल बहुसंख्या ऐसे सिद्धान्त मानती थी जिन्हें अब केल्विनवादी और सुसमाचारीय कहा जाता है; और किसी भी बात पर प्रमाण मुझे इतना स्पष्ट नहीं लगता जितना अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त पर।

(1) क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है कि महारानी एलिज़ाबेथ के शासनकाल में, सन् 1595 में, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने कायस कॉलेज के श्री बैरेट को विवश किया कि वे सेंट मेरी के गिरजे में अन्तिम रूप से अन्त तक स्थिर रहने और चुनाव के सिद्धान्तों का इनकार करने के लिए सार्वजनिक रूप से अपना कथन वापस लें और क्षमा माँगें? —विलियम प्रिन की पुस्तक 'इंग्लैंड की कलीसिया की पुरानी शिक्षा और नया अर्मीनियनवाद', पृष्ठ 56।

(2) क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के उपकुलपति और प्रमुखों ने उपर्युक्त बैरेट के विरुद्ध जो अनुच्छेद तैयार किए, वे इन शब्दों के साथ समाप्त होते हैं? "यह सिद्धान्त कोई गौण बातों या उदासीन विषयों का नहीं, परन्तु हमारे उद्धार की ठोस नींव और प्रधान सान्त्वना तथा लंगर-भूमि का है; और हमारी जानकारी में महारानी के शासन के आरम्भ से लेकर इस विश्वविद्यालय में व्याख्यानों, वाद-विवादों और उपदेशों में, तथा अन्य स्थानों पर उपदेशों में, निरन्तर और सामान्यतः माना, सिखाया और उसका बचाव किया जाता रहा है, और अब भी यही माना जाता है; और हम इसे इंग्लैंड की कलीसिया के सिद्धान्त के अनुरूप मानते हैं।" —एडवर्ड्स, 'वेरितास रेदक्स', पृष्ठ 534

(3) क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है कि उसी महारानी एलिज़ाबेथ के शासनकाल में, उसी वर्ष 1595 में, लैम्बेथ अनुच्छेद तैयार किए गए और आर्चबिशप व्हिटगिफ्ट तथा बिशप बैनक्रॉफ्ट (जो बाद में कैंटरबरी के आर्चबिशप हुए) ने उन्हें स्वीकृत किया; और उनमें यह प्रस्ताव है: "सच्चा जीवित और धर्मी ठहरानेवाला विश्वास, और परमेश्वर का आत्मा जो धर्मी ठहराता है, चुने हुए लोगों में न बुझता है, न छूटता है, न लुप्त होता है, न अन्तिम रूप से और न पूर्णतः।" ये अनुच्छेद हमारे विश्वास-वचन में जोड़े नहीं गए; फिर भी फुलर के शब्द पूर्णतः सत्य हैं: "इन विद्वान धर्मशास्त्रियों की गवाही इस बात का अचूक प्रमाण है कि उस युग में इंग्लैंड के सामान्य और मान्य सिद्धान्त क्या थे।" —फुलर का कलीसियाई इतिहास, टेग का संस्करण, तीसरा खण्ड, पृष्ठ 150।

(4) क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है कि सन् 1604 में, जेम्स प्रथम के शासनकाल में, अन्त तक स्थिर रहने के इस सिद्धान्त पर हैम्पटन कोर्ट सम्मेलन में विचार किया गया? प्युरिटन दल चाहता था कि लैम्बेथ अनुच्छेद उनतालीस अनुच्छेदों में जोड़े जाएँ। उनकी माँग स्वीकार नहीं की गई: परन्तु किस आधार पर? इसलिए नहीं कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त पर आपत्ति थी, परन्तु इसलिए कि राजा जेम्स ने यह उचित समझा कि "अनुच्छेदों की पुस्तक को सब धर्मशास्त्रीय निष्कर्षों से न ठूँसा जाए।" जबकि ओवरॉल ने भी, जो सेंट पॉल के डीन थे और जिनकी इस विषय में सही शिक्षा पर सबसे अधिक सन्देह किया जाता था, ये उल्लेखनीय शब्द कहे: "जो लोग परमेश्वर के चुनाव के उद्देश्य के अनुसार धर्मी ठहराए गए हैं, वे यद्यपि घोर पाप में और उसके द्वारा दण्ड की वर्तमान दशा में गिर सकते हैं, तथापि धर्मी ठहराए जाने की दशा से न पूर्णतः गिरते हैं न अन्तिम रूप से, परन्तु समय पर परमेश्वर के आत्मा द्वारा जीवित विश्वास और मन फिराव में नए किए जाते हैं।" —फुलर का कलीसियाई इतिहास, तीसरा खण्ड, पृष्ठ 181।

(5) क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है कि धर्म-सुधार के बाद प्रकाशित उनतालीस अनुच्छेदों की पहली व्याख्या में, सत्रहवें अनुच्छेद वाले भाग में, अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का पूर्ण और स्पष्ट प्रतिपादन है? मेरा संकेत थॉमस रॉजर्स की पुस्तक की ओर है, जो आर्चबिशप बैनक्रॉफ्ट के पुरोहित थे और जिन्हें यह पुस्तक सन् 1607 में समर्पित की गई थी। —रॉजर्स की उनतालीस अनुच्छेदों पर पुस्तक, पार्कर सोसायटी संस्करण।

(6) क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है कि सन् 1612 में राजा जेम्स प्रथम ने अर्मीनियन धर्मशास्त्री वोर्स्टियस के विरुद्ध स्वयं लिखी हुई एक घोषणा प्रकाशित की, जिसमें वे इस सिद्धान्त को कि पवित्र लोग गिर सकते हैं, "एक दुष्ट सिद्धान्त, एक निन्दापूर्ण झूठी शिक्षा, जो इंग्लैंड की कलीसिया के सिद्धान्त के सीधे विपरीत है" कहते हैं? प्रिन, इंग्लैंड की कलीसिया की शिक्षा आदि, पृष्ठ 206।

(7) क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है कि उसी राजा जेम्स प्रथम ने उसी वर्ष 1612 में हॉलैंड के राज्यों को एक पत्र लिखा, क्योंकि बर्टियस नामक एक डच धर्मशास्त्री ने पवित्र लोगों के विश्वास-त्याग पर एक पुस्तक लिखकर कैंटरबरी के आर्चबिशप को भेजी थी? इस पत्र में राजा बर्टियस को "एक महामारी-सा फैलानेवाला विधर्मी" कहते हैं और उसके सिद्धान्त को "एक घृणित झूठी शिक्षा" कहते हैं, और एक स्थान पर कहते हैं, "उसे इतना घोर झूठ बोलने में भी लज्जा नहीं आती कि वह कहे कि उस पुस्तक में दी गई झूठी शिक्षाएँ इंग्लैंड की कलीसिया के धर्म और मान्यता के अनुरूप हैं।" —प्रिन, इंग्लैंड की कलीसिया की अर्मीनियनवाद से विपरीतता, पृष्ठ 206।

(8) क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है कि उसी राजा जेम्स प्रथम ने सन् 1616 में सिम्पसन नामक एक पादरी पर कठोर अप्रसन्नता प्रकट की,

जो कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो थे, क्योंकि उन्होंने रॉयस्टन में राजा के सामने यह प्रचार किया था कि सच्चे विश्वासी पूर्णतः गिर सकते हैं? — फुलर का कैम्ब्रिज का इतिहास, पृष्ठ 160।

(9) क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है कि सन् 1619 में डॉर्ट की सभा में अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को दृढ़ता से स्थापित किया गया था? उस सभा में उपस्थित होकर उसकी कार्यवाही में भाग लेने के लिए अंग्रेज़ी कलीसिया के अनेक विद्वान धर्मशास्त्री विधिवत् भेजे गए थे, और उनमें अन्य लोगों के साथ अध्यक्ष डेवनैंट और अध्यक्ष कार्लटन भी थे। और क्या यह सर्वविदित नहीं कि कलीसिया-व्यवस्था के विषयों में वे सभा के निष्कर्षों से चाहे जितना भी असहमत रहे हों, फिर भी उन्होंने "सिद्धान्त की सब बातों को स्वीकार किया"?—फुलर की चर्च हिस्ट्री, खण्ड 3, पृष्ठ 279।

(10) अन्त में, पर कम महत्त्व की बात नहीं—क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं कि एलिज़ाबेथ और जेम्स प्रथम के शासनकाल में सभी प्रमुख आर्चबिशप और अध्यक्ष सिद्धान्त के विषयों में पूरी तरह कैल्विनवादी थे? और क्या यह सर्वविदित नहीं कि सन्तों का अन्त तक स्थिर रहना उस पद्धति के प्रमुख सिद्धान्तों में से एक है जिसे कैल्विनवादी कहा जाता है? हेलिन को स्वयं यह स्वीकार करना पड़ा है। वह कहता है, "उन दिनों किसी मनुष्य के लिए कैल्विन-विरोधी समझे जाने की अपेक्षा अन्यजाति या चुंगी लेनेवाला समझा जाना अधिक सुरक्षित था।"—हेलिन की लाइफ़ ऑफ़ लॉड, पृष्ठ 52।

मैं ये दस तथ्य पाठक के सामने रखता हूँ और उनसे उसका गम्भीर ध्यान चाहता हूँ। मैं नहीं समझ पाता कि इनसे निकलनेवाले निष्कर्ष से कोई कैसे बच सकता है। मुझे तो इतिहास में यह एक स्थापित बात दिखाई देती है कि सन्तों के अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त इंग्लैंड की कलीसिया का पुराना सिद्धान्त है, और इस सिद्धान्त का इनकार नया है।

जो प्रमाण मैंने प्रस्तुत किए हैं, उन्हें पुष्ट करने के लिए मैं सरलता से लम्बे उद्धरण जोड़ सकता था। मैं "बिशप्स बाइबल" के हाशिये की टिप्पणियों की ओर संकेत कर सकता था, जो आर्चबिशप पार्कर की विशेष देखरेख और अनुमोदन में छपी थी। मैं आर्चबिशप क्रैनमर, ग्रिंडल, सैंडिस, ऐबट, अशर के लेखों से, और अध्यक्ष रिडले, लैटिमर, ज्यूएल, पिल्किंगटन, बैबिंगटन, हॉल, डेवनैंट, कार्लटन, प्रिडो और रेनॉल्ड्स के लेखों से अंश पर अंश उद्धृत कर सकता था। संक्षेप में, कठिनाई तो यह है कि एलिज़ाबेथ और जेम्स प्रथम के शासनकाल में ऐसे धर्मशास्त्रीय लेखक खोजे जाएँ जिन्होंने अन्त तक स्थिर रहने का विरोध करने की कभी सोची भी हो। विलियम प्रिन की सूची में कम से कम 130 लेखकों के नाम हैं जो मानते थे कि सन्त कभी नष्ट नहीं हो सकते, और वह उनकी रचनाओं के संदर्भ भी देता है। परन्तु जब उसने लिखा (1629), तब उसे केवल चार ही लेखक मिल सके जिन्होंने सन्तों के अन्त तक स्थिर रहने का इनकार किया और उनके पतित हो जाने की सम्भावना सिखाई। जिन लेखकों के नाम उसने दिए हैं, उनसे मैं बहुत से उद्धरण दे सकता था। परन्तु मैं पाठक को बचा रहा हूँ। उसने शायद पर्याप्त सुन लिया है।

मैंने यह टिप्पणी जितनी सोची थी उससे लम्बी कर दी है, परन्तु इसमें दिए गए तथ्यों का महत्त्व ही मेरी क्षमा-याचना है। आज के समय में यह पूरा विषय अत्यन्त गम्भीर महत्त्व का है।

इंग्लैंड की कलीसिया के सुसमाचारवादी सदस्यों को उनके विरोधी लगातार ताना मारते रहते हैं कि वे नए विचार रखते हैं। उनसे कहा जाता है कि उनकी मान्यताएँ "कलीसिया की मान्यताएँ" नहीं हैं, और उन्हें बिना देर किए इंग्लैंड की कलीसिया छोड़कर असहमत सम्प्रदायी बन जाना चाहिए। मैं इन पृष्ठों के सब पाठकों से विनती करता हूँ कि ऐसे तानों और संकेतों से कभी विचलित न हों। मैं उनसे कहता हूँ कि ऐसा कहनेवाले केवल अपनी ही संगति के मूल सिद्धान्तों के विषय में अपनी पूरी अज्ञानता प्रकट कर रहे हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि अपने विचारों पर लज्जित न हों, क्योंकि उनके पास कोई कारण नहीं है। मैं उनसे कहता हूँ कि इंग्लैंड की कलीसिया के सुसमाचारवादी सदस्य ही धर्म-सुधारकों और उनके तत्काल बाद के उत्तराधिकारियों के विचारों के सच्चे प्रतिनिधि हैं, और जो उनका विरोध करते हैं वे नहीं जानते कि क्या कह रहे हैं।

यदि मैं इस संकट की घड़ी में अपने सुसमाचारवादी भाइयों को सलाह देने की स्थिति में होता, तो मैं उन्हें गम्भीरता से यही परामर्श देता कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को दृढ़ता से थामे रहें और उसे कभी न छोड़ें। ऐसा कोई सिद्धान्त नहीं जो बपतिस्मा द्वारा नया जन्म होने की आधुनिक धारणा को इतनी पूर्णता से उलट देता हो। इसी कारण ऐसा कोई सिद्धान्त नहीं जो ट्रैक्टेरियनों को इतना अप्रिय हो और जिसे गिराने के लिए वे इतना परिश्रम करते हों। यह उनके मार्ग की बाधा है। यह उनके पाँव में काँटा है। यह ऐसा तर्क है जिसका वे उत्तर नहीं दे सकते। इंग्लैंड की कलीसिया का सत्रहवाँ अनुच्छेद हमारी स्थिति की कुंजियों में से एक है। जो अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त छोड़ देता है, वह निश्चय जान ले कि उसने अतीत को अपने शत्रु के हाथ बेच दिया है। एक बार यह मान लिया जाए कि उद्धार देनेवाला अनुग्रह पूरी तरह खोया जा सकता है, तो विवाद के दिन तुम अपनी भूमि पर कभी टिक न सकोगे।

अन्त में, पर कम महत्त्व की बात नहीं—मैं उन सब सेवकों को, जो सुसमाचारवादी मान्यताएँ रखने के कारण सताए जाते हैं, यह सलाह दूँगा कि वे इंग्लैंड की कलीसिया की पुरानी धर्मशिक्षा के पूर्ण ज्ञान से अपने को सुसज्जित करें, और इस विचार से सान्त्वना पाएँ कि सत्य उनके पक्ष में है। कम से कम वे उन उनतालीस अनुच्छेदों की व्याख्या उन्हीं के आशय के अनुसार कर रहे हैं जिन्होंने उन्हें रचा था। उनके विरोधी या तो अनुच्छेदों की उपेक्षा करते हैं, या उन्हें कोई नया अर्थ पहनाते हैं।

भक्त जनों को इसलिए सताना कि वे लॉड के विचारों की अपेक्षा धर्म-सुधारकों के विचारों को पसंद करते हैं, कहाँ तक उचित और न्यायसंगत है, यह मैं दूसरों के निर्णय पर छोड़ता हूँ। परन्तु जो सताए जाते हैं, वे इस विचार से सान्त्वना पा सकते हैं कि यदि वे भूल भी करते हैं, तो अच्छी संगति में भूल करते हैं। और यदि कभी उन्हें अन्त तक स्थिर रहने को मानने और बपतिस्मा तथा नए जन्म के अटूट सम्बन्ध को नकारने के कारण अपनी प्रतिष्ठा और पद की हानि उठानी पड़े, तो वे निडर होकर संसार से कह सकते हैं कि वे इसलिए दुःख उठाते हैं कि वे लैटिमर, हूपर, ज्यूएल, व्हिटगिफ़्ट, कार्लटन, डेवनैंट, अशर, लेटन, हूकर और हॉल से सहमत हैं। जो इन भले मनुष्यों की संगति में दुःख उठाता है, उसके पास लज्जित होने का कोई कारण नहीं।

[8] मैं हर उस मनुष्य से, जिसकी आँखें उसके सिर में ठीक बैठी हैं, विनती करूँगा कि वह सत्रहवें अनुच्छेद के शब्दों को, उनकी क्रमबद्धता और सुदृढ़ता को पढ़े और विचार करे; और फिर स्वयं निर्णय करे कि इस अनुच्छेद में अन्त तक स्थिर रहने की बात भली-भाँति और स्पष्ट रूप से कही और पुष्ट नहीं की गई है।"—जॉर्ज कार्लटन, चिचेस्टर के अध्यक्ष, 1692। ऐन एग्ज़ामिनेशन, पृ. 63।

[9]"यदि तू इन लोगों को एक मनुष्य के समान मार डाले, तो जिन जातियों ने तेरी कीर्ति सुनी है वे कहेंगी, कि यहोवा उन लोगों को उस देश में, जिसके देने की उसने उनसे शपथ खाई थी, पहुंचा न सका, इस कारण उसने उनको जंगल में घात कर डाला।"— गिनती 14:15, 16. "तू अपने बड़े नाम के लिये क्या करेगा?"— यहोशू 7:9. "यदि चुने हुए लोगों में से कोई नाश हो जाए, तो परमेश्वर मनुष्य की हठीली अवज्ञा से हार गया; परन्तु उनमें से कोई भी नाश नहीं होता, क्योंकि परमेश्वर, जो सर्वशक्तिमान है, किसी भी रीति से हराया नहीं जा सकता।"—ऑगस्टीन। De Corruptione et Gratia, अध्याय 7

[10] "वे मसीह के आदर का कितना अच्छा ध्यान रखते हैं जो कहते हैं कि उसकी भेड़ें अन्त में विश्वास त्यागने के गड्ढे में पड़कर मर सकती हैं?

"मसीह और उसके अंग मिलकर एक मसीह बनते हैं। अब, क्या यह सम्भव है कि मसीह का कोई अंश अन्त में नरक में जलता हुआ पाया जाए? क्या मसीह एक अपंग मसीह हो सकता है? क्या यह अंग गिर सकता है और वह अंग भी? वह अपने आत्मिक अंगों को छोड़े और अपनी महिमा को न छोड़े, यह कैसे हो सकता है?"— गर्नल। 1665।

[11] जिन पदों पर अन्त तक स्थिर रहने के विरोधी मुख्य रूप से भरोसा करते हैं, उन पर संक्षिप्त ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है।

यहेजकेल 3:20 और यहेजकेल 18:24. इन दोनों स्थानों में मुझे इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिखता कि यहाँ जिस "धर्मी" की चर्चा है, वह उस मनुष्य से अधिक कुछ है जिसका बाहरी आचरण धार्मिक है। ऐसा कुछ नहीं दिखाया गया कि वह विश्वास से धर्मी ठहराया गया और परमेश्वर के सामने धर्मी गिना गया है।

1 कुरिन्थियों 9:27. मुझे इसमें पाप में गिरने के उस भक्तिपूर्ण भय के सिवा कुछ नहीं दिखता, जो विश्वासी का एक चिह्न है और उसे अपरिवर्तित लोगों से अलग करता है, और साथ ही उन उपायों की सीधी घोषणा है जिनसे पौलुस ने स्वयं को निकम्मा ठहरने से बचाए रखा। यह 1 यूहन्ना 5:18 के समान है: "जो परमेश्वर से उत्पन्न हुआ, वह अपनी रक्षा करता है।"

यूहन्ना 15:2. इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि सच्चे विश्वासी मसीह से अलग कर दिए जाएंगे। जो डाली "फल नहीं लाती" वह विश्वासी नहीं है। 12वाँ अनुच्छेद कहता है, "जीवित विश्वास भले कर्मों से उतने ही स्पष्ट रूप से जाना जा सकता है जैसे वृक्ष फल से पहचाना जाता है।"

1 थिस्सलुनीकियों 5:19. यदि यहाँ "आत्मा" का अर्थ हमारे भीतर की आत्मा है, तो इसका अर्थ इफिसियों 4:30 के "आत्मा को शोकित करने" से अधिक कुछ नहीं। परन्तु बहुत से लोग मानते हैं कि यह दूसरों में आत्मा के वरदानों की बात है, और इसे पद 20 के साथ जोड़कर समझना चाहिए।

गलातियों 5:4. सारी पत्री का आशय यही दिखाता है कि यह "गिरना" आत्मा के भीतरी अनुग्रह से नहीं, बल्कि अनुग्रह के सिद्धान्त से है। यही बात 2 कुरिन्थियों 6:1 पर भी लागू होती है।

इब्रानियों 6:4-6. यहाँ जिस व्यक्ति का "भटक जाना" बताया गया है, उसमें ऐसा कोई लक्षण नहीं जो अपरिवर्तित मनुष्यों में न पाया जा सके; और यह नहीं कहा गया कि उसमें उद्धार देनेवाला विश्वास और प्रेम है, या वह चुना हुआ है।

यूहन्ना 8:31; कुलुस्सियों 1:23. इन दोनों पदों में, और ऐसे ही अनेक अन्य पदों में, जो उद्धृत किए जा सकते हैं, "यदि" की शर्त का अर्थ यह नहीं कि जिनका वर्णन है उनके उद्धार के विषय में अनिश्चितता है। इसका केवल यह अर्थ है कि सच्चे अनुग्रह का प्रमाण "स्थिर बने रहना" है। झूठा अनुग्रह नाश हो जाता है। सच्चा अनुग्रह बना रहता है। चार्नॉक कहता है, "पवित्रशास्त्र में यह बात बार-बार मिलती है कि प्रतिज्ञाओं में वे शर्तें रखी जाती हैं जिनके विषय में अन्य स्थानों पर प्रतिज्ञा है कि वे हम में उत्पन्न की जाएंगी।"—चार्नॉक, सच्चे अनुग्रह पर। 1684।

मैं सहर्ष मानता हूँ कि अन्त तक स्थिर रहने के विरोधी जो पद प्रायः प्रस्तुत करते हैं, वे सब यही नहीं हैं; परन्तु मेरा विश्वास है कि मुख्य पद ये ही हैं। उनके पक्ष की दुर्बलता यह है: उनके पास यह प्रमाणित करने के लिए कोई पद नहीं कि पवित्र लोग भटक सकते हैं, जिसकी तुलना "मेरी भेड़ें कभी नाश न होंगी" जैसे वचन से की जा सके; और हमारे प्रभु की इस महान उक्ति का वे कोई ऐसा विवरण नहीं दे पाते जो सन्तोषजनक या तर्कसंगत भी हो। प्रसिद्ध अर्मीनियाई जॉन गुडविन इस पद की यह व्याख्या देता है: "मसीह की अपनी भेड़ों को दी गई अनन्त सुरक्षा की प्रतिज्ञा इस वर्तमान संसार की उनकी दशा से नहीं, बल्कि आनेवाले संसार की दशा से सम्बन्ध रखती है!" जब मनुष्य इस प्रकार तर्क करता है, तो वह अवश्य ही बड़ी कठिनाई में पड़ा होगा।

[12] "वे मसीहियों की शान्ति को निर्बल करते हैं जो विश्वासियों को मसीह के साथ ऐसे चलाते हैं जैसे नट रस्सी पर नाचते हैं, हर क्षण यह भय लिए हुए कि गर्दन टूट जाएगी।"—मैन्टन, यहूदा पर। 1658

[13] "जितने क्षण एक पवित्र जन सुरक्षित रखा जाता है, उतने ही चमत्कार किए जाते हैं।"—जेनकिन, यहूदा पर। 1680।

[14] स्कॉटलैण्ड के प्रसिद्ध ईश्वरविज्ञानी ब्रूस का मृत्युशय्या का दृश्य मेरे विषय के इस भाग का एक प्रभावशाली उदाहरण है। वृद्ध फ्लेमिंग इसका वर्णन इन शब्दों में करता है: "उसकी दृष्टि जाती रही, तब उसने अपनी बाइबल मँगवाई; परन्तु यह जानकर कि उसकी दृष्टि जा चुकी है, उसने कहा, 'रोमियों का आठवाँ अध्याय मेरे लिए खोलो और मेरी उँगली इन शब्दों पर रख दो,—मुझे निश्चय है कि न मृत्यु, न जीवन, आदि, हमें परमेश्वर के उस प्रेम से, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में है, अलग कर सकेंगे। अब,' उसने कहा, 'क्या मेरी उँगली उन पर है?' जब उन्होंने बताया कि है, तो उसने कहा, 'अब परमेश्वर तुम्हारे साथ रहे, मेरे बच्चो: मैंने तुम्हारे साथ नाश्ता किया है, और आज रात अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ भोजन करूँगा,' और यह कहकर प्राण त्याग दिए।"—फ्लेमिंग, भविष्यद्वाणी की पूर्ति, 1680।

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