देखो और अनुगमन करो
यीशु - सदा बना रहनेवाला मित्र
बपतिस्मा देनेवाला यूहन्ना बार-बार कहता था, “मैं उसे नहीं जानता था” John 1:26, 31, 33। शायद बहुत लोग इसी दशा में हैं और सच्चाई और आनंद से यह नहीं कह सकते कि वे प्रभु यीशु मसीह को जानते हैं। यद्यपि वे उसके विषय में सुनते हैं, उसके विषय में गाते हैं, और उसके विषय में बात करते हैं, फिर भी प्रभु यीशु अभी तक उनके व्यक्तिगत उद्धारकर्ता और मित्र नहीं बने। वह जगत में एक ऐसे मित्र के रूप में आया जो हमेशा के लिए हमारे साथ बना रह सके। सांसारिक मित्र सदैव हमारे साथ नहीं रह सकते। परन्तु हमारे प्रभु ने Matt. 28:28“देख, मैं सर्वदा तुम्हारे साथ हूँ।” ये शब्द उन सब के लिए हैं जो उसकी सदा बनी रहनेवाली उपस्थिति का अनुभव पाना चाहते हैं। अपने मन फिराव से पहले भी मुझे एक बात मालूम थी; कि कोई जीवित और सच्चा मित्र है जो सदा हमारे साथ रह सकता है। सिख धर्म में मुझे प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के समय एक प्रार्थना पढ़नी पड़ती थी। जैसे ही मैं अपने सिर पर पानी डालता, ये शब्द मेरे मुँह से अपने आप निकल आते, “हे परमेश्वर! तू सच्चा है; तू आदि से सच्चा रहा है और सच्चा रहेगा। कोई मनुष्य तुझे नहीं जान सकता, चाहे वह सदियों तक ध्यान करे और सारे संसार का ज्ञान बटोर ले। हे परमेश्वर! मुझमें कोई सद्गुण नहीं है। मैं केवल तेरी कृपा पर निर्भर हूँ। मुझे वह मित्र और सतगुरु (सत्य का गुरु) दिखा जो मेरी सहायता कर सके और मुझे मार्ग दिखा सके।” उस जीवित मित्र से मिलने की लालसा के साथ मैं वर्षों तक इन शब्दों को दोहराता रहा। मैं किसी अकेले स्थान, जंगल या नदी के किनारे जाया करता था, इस आशा में कि वहाँ मुझे लंबी सफेद दाढ़ी वाला कोई वृद्ध पुरुष मिलेगा जो प्रेमपूर्ण स्वर में कहेगा, “आ मेरे बालक। मैं तेरा मित्र बनूँगा।” अपने अंधेपन में मैं प्रतिदिन जो यह प्रार्थना दोहराता था, उसने मुझमें उस जीवित मित्र को देखने की लालसा उत्पन्न की। अंततः मैंने पवित्र बाइबल के विरुद्ध निन्दा करना आरम्भ कर दिया और उसकी एक प्रति को टुकड़े-टुकड़े कर फाड़ डाला। मैंने ऐसा ईसाई धर्म के प्रति अपनी घृणा दिखाने के लिए किया। इसके अतिरिक्त मैं अनेक बुराइयों का दास बन गया। यद्यपि मैंने ऐसा किया, फिर भी परमेश्वर ने स्वयं मुझे ढूँढ़ निकाला। मुझ जैसे पापी को भी उसने अपनाया और मेरे पाप क्षमा किए। बीते तैंतीस वर्षों से वह मेरा वह मित्र रहा है जिससे मैं स्वतंत्रता से बात कर सकता हूँ और जिस पर सहायता के लिए निर्भर रह सकता हूँ। वह मेरी हर आवश्यकता पूरी करता है।
अपने कॉलेज के दिनों में मेरा एक अच्छा मित्र था। हम प्रतिदिन शाम को साथ घूमने जाते और साथ भोजन करते। हम जो कुछ भी करते साथ मिलकर करते, और हम दोनों में से जिसके पास भी पैसे होते उसे बाँट लेते। यदि मैं बाज़ार कुछ खरीदने जाता, तो मैं सदैव एक ही वस्तु के दो टुकड़े खरीदता, एक उसके लिए और एक अपने लिए। जब वह बाज़ार जाता, तो वह भी ऐसा ही करता। कुछ समय बाद हमारा झगड़ा हो गया; और हालाँकि हम एक ही कमरे में रहते थे, फिर भी हमने कई सप्ताह तक एक-दूसरे से बात नहीं की। फिर भी, जो कुछ मैं अपने लिए खरीदता, उसके लिए भी लाकर चुपचाप उसकी मेज़ पर रख देता; और वह भी ऐसा ही करता। कुछ समय तक हम एक-दूसरे से बात नहीं करते थे, फिर भी हमारे हृदयों में वही मित्रता का भाव बना रहा। भीतर से हम अब भी मित्र थे, और सब कुछ बाँटना चाहते थे। तब प्रभु के साथ हमारी मित्रता कितनी अधिक प्रिय होनी चाहिए और उसके साथ सब कुछ बाँटने में हमें कितना अधिक आनंद होना चाहिए।
यीशु ---- परमेश्वर का मेम्ना
प्रभु यीशु ने कहा John 15:15, “जो कुछ मैंने अपने पिता से सुना है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया है।” वे यह नहीं समझ सके कि वह क्या कह रहा था। यह तभी हुआ जब हमारे प्रभु ने फिर से जी उठकर उनके हृदयों में आकर बसे, कि वे इन शब्दों का अर्थ जान सके। वे केवल साधारण मछुआरे थे, फिर भी वे परमेश्वर की बातें सीख सके। आज आप पाते हैं कि उनके परमेश्वर-प्रेरित लेखों के द्वारा बहुतों को स्वर्गीय बुद्धि सिखाई जा रही है, और उनके शब्दों से हम कभी ऊबते नहीं। प्रभु की हमारे प्रति भी वही प्रेमपूर्ण इच्छा है, कि हम भी उससे सारी बुद्धि समझें और पाएँ, और उसे और अधिक जानते जाएँ।
अब हम देखेंगे कि प्रभु ने बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना पर स्वयं को किस प्रकार प्रगट किया। वह पवित्र आत्मा से भरा हुआ पुरुष था, और वह इतनी सामर्थ्य से बोलता था कि जंगल में भी बहुत लोग उसे सुनने जाते थे। इन दिनों वक्ता और प्रचारक लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए बहुत से तरीके अपनाते हैं। परन्तु बपतिस्मा देनेवाला यूहन्ना तो केवल जंगल में रहनेवाला एक मनुष्य था, जंगल में एक शब्द मात्र; फिर भी बहुत लोग उसे सुनने जाते थे। एक दिन हमारे प्रभु स्वयं भीड़ के बीच आए। बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना ने उसे देखा, परन्तु नहीं जानता था कि वह कौन है। उसने कहा, “तुम्हारे बीच एक ऐसा खड़ा है जिसे तुम नहीं जानते” John 1:26, और फिर “मैं उसे नहीं जानता था” John 1:33. जिस दिन पवित्र आत्मा प्रभु यीशु मसीह पर उतरा उसी दिन यूहन्ना ने जाना कि यीशु कौन है। यूहन्ना ने कहा, “मैंने आत्मा को कबूतर के समान आकाश से उतरते और उस पर ठहरते देखा” John 1:33 “मैंने देखा है, और गवाही देता हूँ कि यही परमेश्वर का पुत्र है” John 1:34. हम नहीं जानते कि उस दिन से पहले हमारे प्रभु कितनी बार बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना के पास गए। यूहन्ना जानता था कि यीशु भीड़ में है, परन्तु निश्चय करके नहीं कह सकता था कि वह कौन है। निःसंदेह वह मसीह को देखने की प्रतीक्षा और लालसा कर रहा था, परन्तु परमेश्वर ने उससे स्पष्ट कहा, “जब तू आत्मा को कबूतर के समान उस पर उतरते देखेगा, तभी तू जानेगा कि वह कौन है।” यद्यपि प्रभु भीड़ में था और बपतिस्मा देनेवाला यूहन्ना एक भविष्यद्वक्ता था, फिर भी वह नहीं जानता था कि वह कौन है। उसने कहा, “मैं उसे नहीं जानता था।” अब उसी प्रकार यह संभव है कि आप सभाओं में उपस्थित हों, और यद्यपि प्रभु यीशु मसीह वहाँ उपस्थित हो, जैसे वह तब भीड़ में उपस्थित था, फिर भी आप उसे न जानें।
जिस दिन उसने बपतिस्मा लिया उस दिन क्या हुआ? देखिए Matt. 3:16. बपतिस्मा देनेवाला यूहन्ना प्रभु को पहचान पाता उससे पहले, परमेश्वर के वचन के अनुसार यह आवश्यक था कि प्रभु बपतिस्मा ले, क्योंकि उसका बपतिस्मा उसकी मृत्यु, गाड़े जाने और पुनरुत्थान की ओर संकेत करता था। उसे उन चमत्कारों से नहीं, जो उसने किए, बल्कि उसके बपतिस्मे से और उस पर पवित्र आत्मा के उतरने से पहचाना जाना था।
बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना ने प्रभु को बपतिस्मा देने के बाद भविष्यवाणी की कि उसके साथ आगे क्या होनेवाला है। अगले दिन उसने प्रभु को अपनी ओर आते देखा, और उसे एक नए नाम से पुकारा: “देखो, परमेश्वर का मेम्ना जो जगत का पाप उठा ले जाता है!” उसने यह नहीं कहा, “अपने उद्धारकर्ता को देखो,” या “अपने मसीह को देखो,” यद्यपि उन दिनों वे उत्सुकता से मसीह के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। पहले उसने कहा था, “मैं उसे नहीं जानता था,” यद्यपि वह भीड़ में उपस्थित था। अब वह कह सका, “मैं उसे जानता हूँ।” और उसने उसे “परमेश्वर का मेम्ना” कहकर पुकारा। भविष्यद्वक्ता होने के कारण वह जानता था कि यहूदी प्रतिवर्ष फसह मनाते हुए हज़ारों मेम्नों को यह जाने बिना ही मार डालते थे कि वे क्या कर रहे हैं। परन्तु उस भोर यूहन्ना ने देखना आरम्भ किया कि यीशु स्वयं ही 'परमेश्वर का मेम्ना' है। अब उसने देखा कि अन्य मेम्ने मनुष्यों का पाप दूर नहीं कर सकते, परन्तु यह मेम्ना सारे जगत का पाप दूर करने में समर्थ था।
आप जो कर सकते हैं वह कर सकते हैं; आप बहुत आँसू बहा सकते हैं, बहुत दिन उपवास रख सकते हैं, कितना भी दान-पुण्य कर सकते हैं और कितनी भी सभाओं में उपस्थित हो सकते हैं; परन्तु इनमें से कोई भी बात आपको पापों की क्षमा का निश्चय नहीं देगी। बड़ी आशाओं के साथ बपतिस्मा लेने आई उस भीड़ को देखिए - ये लोग बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना के पास आए थे। उन्होंने सुना था कि वह परमेश्वर का जन है। धनी हों या निर्धन, जब वह बोलता तो सब काँपने लगते थे। वे दोषी ठहराए गए और आँसुओं के साथ अपने पाप मानने लगे। फिर भी यदि आप उनसे पूछते, “अब महोदय, आपने अपने पाप मान लिए हैं और बहुत आँसू बहाए हैं, क्या आप मुझे बता सकते हैं कि आपके पाप क्षमा हुए हैं या नहीं?” तो वे कहते, “नहीं, हमारा विवेक अब भी व्याकुल और दोषी है।” दोषी विवेक होना एक भयानक बात है। आप कुछ समय के लिए अपने विवेक को यह कहकर चुप करा सकते हैं, “यदि मैं यह करूँ तो कोई बात नहीं, मैं इतना डरता हूँ? यह करनेवाला मैं अकेला तो नहीं हूँ।” परन्तु एक दिन अवश्य आएगा जब आपका दोषी विवेक आपको सताएगा। वह दोषी विवेक आपको बेचैन कर देगा और आप पानी से बाहर निकाली गई मछली के समान महसूस करेंगे। मछली पानी में अच्छी तरह तैरती है, परन्तु पानी के बाहर तड़पती और उछलती है। दोषी विवेक रखनेवाले मनुष्य के साथ भी ऐसा ही है। ऐसे लोग सदैव बेचैन रहेंगे। बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना के पास जानेवाले लोगों ने अपने पाप और परमेश्वर का आनेवाला क्रोध देखा। परन्तु यद्यपि उन्होंने अपने पाप मान लिए, बपतिस्मा देनेवाला यूहन्ना उन्हें क्षमा नहीं कर सका। उसने उनसे कहा कि मसीह आएगा और वह क्षमा लाएगा।
अब यहूदियों की मसीह के विषय में एक गलत धारणा थी। वे सोचते थे कि वह राजा दाऊद के समान सब जातियों पर राज्य करेगा। शायद बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना की भी वैसी ही धारणा थी और वे सब वैसे ही मसीह की प्रतीक्षा कर रहे थे। अब परमेश्वर उस पर मसीह को एक नए ढंग से प्रगट कर रहा था। जब बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना ने पवित्र आत्मा को प्रभु यीशु पर उतरते देखा, तब उसने जाना कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है। यह पहला कदम था। तब हम John 1:29और 36 में --- यूहन्ना घोषणा करता है, “देखो, परमेश्वर का मेम्ना!” यह दूसरा कदम था। जब आपको चश्मा चाहिए होता है तो आप किसी नेत्र-विशेषज्ञ के पास जाते हैं। वह आपकी आँखें जाँचता है और पूछता है, “क्या आपको बोर्ड पर अक्षर दिखाई देते हैं?” “नहीं।” फिर वह आपको दूसरे शीशे से जाँचता है। “अब थोड़ा साफ़ दिखाई दे रहा है।” फिर एक और शीशे से जाँचता है और तब आप कहते हैं, “अब बहुत साफ़ दिखाई दे रहा है।” उसी प्रकार बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना का प्रभु यीशु मसीह के विषय में दर्शन धीरे-धीरे स्पष्ट होता गया।
पहले दिन यूहन्ना ने उसे बपतिस्मा देते समय देखा, परन्तु चुप रहा। अगले दिन उसने उसे अपनी ओर आते देखा और घोषणा की, “देखो परमेश्वर का मेम्ना!” तीसरे दिन उसने प्रभु को अपने पास से गुज़रते देखा, और पुकार उठा, “देखो परमेश्वर का मेम्ना!” उसी प्रकार, आत्मिक रूप से आप भी सब कुछ एक ही दिन में नहीं देख पाएँगे; उसे वैसा देखने के लिए जैसा वह है, आपको परमेश्वर के अनेक स्पर्शों की आवश्यकता होगी।
उसे देखो और उसका अनुसरण करो।
इससे पहले यूहन्ना ने अपने आप में पुकारा था, “देखो परमेश्वर का मेम्ना!” अब वह कह रहा था, “अन्द्रियास, तू भी उसे देख।” आप उसके अनुभव में हुई प्रगति को देखेंगे। वह चाहता था कि अन्य लोग भी उसे देखें। यूहन्ना को यीशु को परमेश्वर का मेम्ना कहते सुनकर, चेलों ने यीशु को देखने की इच्छा की। उन्होंने अपने हृदय में विचार किया, “परमेश्वर का मेम्ना! अब हम उसका अनुसरण करें,” और वे यूहन्ना को छोड़कर यीशु के पीछे हो लिए। प्रभु ने फिरकर उन्हें देखा और कहा, “तुम क्या ढूँढ़ते हो?” प्रभु जानता था कि वे उसे अधिक स्पष्टता से देखना चाहते हैं। जब आप उसका अनुसरण करते हैं, तो वह स्वयं फिरकर आपको देखता है। वह आपसे पूछेगा, “बालक, तुझे क्या चाहिए?” शायद आप उससे नौकरी या शारीरिक चंगाई जैसी अनेक बातें माँगें। परन्तु इन चेलों की ऐसी कोई माँग नहीं थी। उन्होंने कहा, “हे गुरु, तू कहाँ रहता है?” अब जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह को देखा है उनमें एक प्रबल लालसा होती है, “मेरा प्रभु कहाँ है? वह कहाँ रहता है?” क्या आपको यह जानने की इच्छा है कि वह कहाँ रहता है?
परन्तु बहुत से मसीही जीवित मसीह को कब्रिस्तान में ढूँढ़ रहे हैं। “तुम जीवित को मुर्दों में क्यों ढूँढ़ते हो?” वे उसे मनुष्यों के बनाए भवनों में देखना चाहते हैं। आप उसे तभी पा सकते हैं जब आप सच्चे मन से उसे खोजें। क्या आप जानते हैं कि आपका गुरु कहाँ रहता है? पहली बात, वह आपके हृदय में रहना चाहता है। वह मनुष्यों के बनाए भवन नहीं ढूँढ़ रहा। कितने ही लोग प्रभु यीशु मसीह के नाम पर तथाकथित “परमेश्वर का भवन” बनाने के लिए पैसे माँगते फिरते हैं। “कृपया हमें कुछ पैसे दीजिए,” वे कहते हैं, “हम परमेश्वर के लिए एक भवन बनाना चाहते हैं।” ऐसे लोग “परमेश्वर के भवन” का अर्थ नहीं जानते। परमेश्वर केवल दो स्थानों में रहता है। वह ऊँचे और पवित्र स्थान में रहता है; और साथ ही विनम्र, टूटे और पश्चातापी हृदय में भी रहता है (Isaiah 57:15).
)। क्या प्रभु यीशु आपके हृदय में रहने आया है? क्या वह आपका जीवित मित्र बना है? उसने आपके पापों को क्षमा करने, आपको शुद्ध करने और आपके हृदय को अपना निवास स्थान बनाने के लिए आपके लिए प्राण दिए। इसी उद्देश्य से वह आज आपको ढूँढ़ रहा है। यदि आप अपने पापों से मन फिराकर उसे ग्रहण करें, तो वह आकर आपके हृदय में निवास करेगा।
अपना हृदय उसे दे दीजिए। फिर अपनी आँखें उस पर टिकाए रखिए। उसका अनुसरण कीजिए और वह अपने आप को आप पर अधिकाधिक प्रगट करेगा।
