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9. संतों को सलाह . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . 23
विषय-सूची. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . 1 भूमिका. . . . . . . . . . . . . . . . 2 1. प्रार्थना उद्धार के लिए आवश्यक है. . . . . . . . 4 2. प्रार्थना की आदत: सच्चे मसीही की पहचान. . . . . . . . . . . . . . 7 3. प्रार्थना: सबसे उपेक्षित कर्तव्य. . . . . . . . . . . 10 4. प्रार्थना से बड़ा प्रोत्साहन मिलता है. . . . . . . . . 13 5. प्रार्थना में लगन, पवित्रता का रहस्य. . . . . . . . . . . . . . . . . . . 16 6. प्रार्थना और पीछे हटना. . . . . . . . . . . . . . . . . . 18 7. प्रार्थना और सन्तोष. . . . . . . . . . . . . . . . . 21 8. अपरिवर्तित लोगों को सलाह. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . 23 9. संतों को सलाह
जे. सी. राइल
भूमिका
"मनुष्यों को सदा प्रार्थना करनी चाहिए।" लूका 18:1
मेरे पास आपके लिए एक प्रश्न है। यह तीन शब्दों में समाया है: क्या आप प्रार्थना करते हैं? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर आपके सिवा कोई नहीं दे सकता। आप सार्वजनिक आराधना में जाते हैं या नहीं, यह आपका सेवक जानता है। आपके घर में पारिवारिक प्रार्थना होती है या नहीं, यह आपके सम्बन्धी जानते हैं। परन्तु आप एकान्त में प्रार्थना करते हैं या नहीं, यह आपके और परमेश्वर के बीच की बात है।
मैं आपसे पूरे हृदय से विनती करता हूँ कि जो विषय मैं आपके सामने रख रहा हूँ उस पर ध्यान दें। यह न कहें कि मेरा प्रश्न बहुत चुभने वाला है। यदि आपका हृदय परमेश्वर की दृष्टि में सीधा है, तो उसमें डरने की कोई बात नहीं। मेरे प्रश्न को यह उत्तर देकर टाल न दें कि आप अपनी प्रार्थनाएँ कह लेते हैं। प्रार्थनाएँ कह लेना एक बात है और प्रार्थना करना दूसरी। मुझसे यह भी न कहें कि मेरा प्रश्न अनावश्यक है। कुछ मिनट मेरी बात सुनिए, मैं आपको इसे पूछने के उचित कारण दिखाऊँगा।
व्यावहारिक धर्म में प्रार्थना सबसे महत्त्वपूर्ण विषय है। अन्य सब विषय उसके बाद आते हैं। बाइबल पढ़ना, उपदेश सुनना, सार्वजनिक आराधना में जाना, प्रभु-भोज में सम्मिलित होना—ये सब बहुत महत्त्वपूर्ण बातें हैं। परन्तु इनमें से कोई भी एकान्त प्रार्थना जितनी महत्त्वपूर्ण नहीं।
इस पुस्तिका में मैं सात स्पष्ट कारण प्रस्तुत करना चाहता हूँ कि मैं प्रार्थना के विषय में इतने दृढ़ शब्द क्यों कहता हूँ। जिस विचारशील मनुष्य के हाथ में यह पुस्तिका पहुँचे, उसका ध्यान मैं इन कारणों की ओर दिलाता हूँ। मैं विश्वासपूर्वक कहने का साहस करता हूँ कि ये गम्भीर विचार के योग्य हैं।
प्रार्थना के लिए एक पुकार
1 प्रार्थना
उद्धार के लिए आवश्यक है
I. मैं पूछता हूँ कि क्या आप प्रार्थना करते हैं, क्योंकि प्रार्थना किसी मनुष्य के उद्धार के लिए नितान्त आवश्यक है।
मैं कहता हूँ, नितान्त आवश्यक, और सोच-समझकर कहता हूँ। मैं अभी शिशुओं या मन्दबुद्धि लोगों की बात नहीं कर रहा। मैं अन्यजातियों की दशा का निर्णय नहीं कर रहा। मैं जानता हूँ कि जहाँ थोड़ा दिया गया है, वहाँ थोड़ा ही माँगा जाएगा। मैं विशेष रूप से उनकी बात कर रहा हूँ जो हमारे जैसे देश में अपने आप को मसीही कहते हैं। और ऐसे लोगों के विषय में मैं कहता हूँ कि जो स्त्री या पुरुष प्रार्थना नहीं करता, वह उद्धार पाने की आशा नहीं रख सकता। मैं अनुग्रह से उद्धार के सिद्धान्त को किसी से कम दृढ़ता से नहीं मानता। मैं बड़े से बड़े पापी को भी सेंत-मेंत और पूर्ण क्षमा सहर्ष देना चाहूँगा। मैं उसकी मृत्यु-शय्या के पास खड़े होकर यह कहने में संकोच न करता, "प्रभु यीशु मसीह पर अब भी विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा।" (प्रेरितों के काम 16:31।) परन्तु यह कि कोई मनुष्य उद्धार को माँगे बिना पा ले, यह मुझे बाइबल में नहीं दिखता। यह कि जो मनुष्य भीतर से अपना हृदय भी उठाकर यह न कहे, "प्रभु यीशु, मुझे यह दे," वह अपने पापों की क्षमा पाएगा—यह मुझे कहीं नहीं मिलता। मुझे यह मिलता है कि कोई अपनी प्रार्थनाओं के कारण उद्धार नहीं पाएगा, परन्तु यह नहीं मिलता कि प्रार्थना के बिना कोई उद्धार पाएगा।
उद्धार के लिए यह नितान्त आवश्यक नहीं कि मनुष्य बाइबल पढ़े। किसी के पास विद्या न हो, या वह अन्धा हो, फिर भी उसके हृदय में मसीह हो सकता है। यह भी नितान्त आवश्यक नहीं कि मनुष्य सुसमाचार का सार्वजनिक प्रचार सुने। वह ऐसी जगह रहता हो जहाँ सुसमाचार का प्रचार नहीं होता, या वह बिस्तर पर पड़ा हो, या बहरा हो। परन्तु प्रार्थना के विषय में यही बात नहीं कही जा सकती। उद्धार के लिए नितान्त आवश्यक है कि मनुष्य प्रार्थना करे।
स्वास्थ्य या विद्या के लिए कोई राजमार्ग नहीं है। प्रधानमंत्री और राजा, निर्धन और किसान, सब को अपने शरीर और अपने मन की आवश्यकताओं की ओर स्वयं ध्यान देना पड़ता है। कोई मनुष्य किसी दूसरे के बदले न खा सकता है, न पी सकता है, न सो सकता है। कोई मनुष्य
जे. सी. राइल किसी दूसरे से अपने लिए वर्णमाला नहीं सीखवा सकता। ये सब ऐसे काम हैं जो हर किसी को अपने लिए स्वयं करने होते हैं, नहीं तो वे होंगे ही नहीं।
जैसा मन और शरीर के विषय में है, वैसा ही आत्मा के विषय में है। आत्मा के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए कुछ बातें नितान्त आवश्यक हैं। हर एक को ये बातें अपने लिए स्वयं करनी हैं। हर एक को अपने लिए मन फिराना है। हर एक को अपने लिए मसीह के पास आना है। और हर एक को अपने लिए परमेश्वर से बात करनी और प्रार्थना करनी है। यह आपको स्वयं करना है, क्योंकि कोई दूसरा इसे आपके लिए नहीं कर सकता।
प्रार्थना न करना परमेश्वर के बिना, मसीह के बिना, अनुग्रह के बिना, आशा के बिना और स्वर्ग के बिना होना है। यह नरक के मार्ग पर होना है। तो क्या आप आश्चर्य कर सकते हैं कि मैं यह प्रश्न पूछता हूँ: क्या आप प्रार्थना करते हैं?
प्रार्थना के लिए एक पुकार
2 प्रार्थना की आदत:
सच्चे मसीही की पहचान
II. मैं फिर पूछता हूँ कि क्या आप प्रार्थना करते हैं, क्योंकि प्रार्थना की आदत सच्चे मसीही की सबसे निश्चित पहचानों में से एक है।
पृथ्वी पर परमेश्वर की सब सन्तान इस बात में एक समान हैं। जिस क्षण से उनके धर्म में कुछ भी जीवन और वास्तविकता आती है, वे प्रार्थना करते हैं। जैसे संसार में जन्म लेने पर शिशु के जीवन का पहला चिन्ह साँस लेना है, वैसे ही नया जन्म पाने पर स्त्री-पुरुषों का पहला कार्य प्रार्थना करना है।
यह परमेश्वर के सब चुने हुए लोगों की एक सामान्य पहचान है: "वे रात-दिन उसकी दुहाई देते रहते हैं।" (लूका 18:7।) पवित्र आत्मा जो उन्हें नई सृष्टि बनाता है, उनमें लेपालकपन की भावना उत्पन्न करता है, और उनसे यह पुकार कराता है, "हे अब्बा, हे पिता।" (रोमियों 8:15।) प्रभु यीशु जब उन्हें जिलाता है, तो उन्हें वाणी और जीभ देता है, और उनसे कहता है, "अब और गूँगे न रहो।" परमेश्वर की कोई सन्तान गूँगी नहीं होती। प्रार्थना करना उनके नए स्वभाव का उतना ही अंग है जितना रोना बच्चे के स्वभाव का। वे अपनी दया और अनुग्रह की आवश्यकता देखते हैं। वे अपनी रिक्तता और निर्बलता को अनुभव करते हैं। वे जैसा करते हैं उससे भिन्न कुछ कर ही नहीं सकते। उन्हें प्रार्थना करनी ही है।
मैंने बाइबल में परमेश्वर के सन्तों के जीवन को ध्यान से देखा है। उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक, जिनका इतिहास हमें कुछ विस्तार से बताया गया है, उनमें मुझे एक भी ऐसा नहीं मिलता जो प्रार्थना करनेवाला मनुष्य न रहा हो। मैं देखता हूँ कि भक्तों की यह विशेषता बताई गई है कि वे "पिता को पुकारते हैं," और "प्रभु यीशु मसीह का नाम लेकर प्रार्थना करते हैं।" और दुष्टों की यह विशेषता लिखी गई है कि "वे यहोवा को नहीं पुकारते।" (1 पतरस 1:17; 1 कुरिन्थियों 1:2; भजन संहिता 14:4।)
बाइबल के दिनों से लेकर अब तक पृथ्वी पर रहे अनेक प्रतिष्ठित मसीहियों की जीवनियाँ मैंने पढ़ी हैं। मैं देखता हूँ कि उनमें से कुछ धनी थे और कुछ निर्धन; कुछ विद्वान थे और कुछ अनपढ़; उनमें से कुछ एपिस्कोपल थे, और कुछ
जे. सी. राइल
अन्य नामों के मसीही थे। कुछ केल्विनवादी थे और कुछ आर्मिनियसवादी। कुछ को धार्मिक विधि-पुस्तिका का प्रयोग प्रिय था, और कुछ उसे नहीं अपनाते थे। परन्तु एक बात मैं देखता हूँ जो उन सब में समान थी: वे सब प्रार्थना करनेवाले मनुष्य थे। मैं अपने ही समय की मिशनरी संस्थाओं के प्रतिवेदन पढ़ता हूँ। मैं आनन्द के साथ देखता हूँ कि संसार के अनेक भागों में खोए हुए स्त्री-पुरुष सुसमाचार ग्रहण कर रहे हैं। अफ्रीका में, न्यूज़ीलैंड में, भारत में, चीन में मन-परिवर्तन हो रहे हैं। जो लोग मन फिराते हैं वे स्वभाव से हर बात में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। परन्तु सब मिशन-केन्द्रों पर मैं एक विलक्षण बात देखता हूँ: मन फिराए हुए लोग सदा प्रार्थना करते हैं।
मैं इनकार नहीं करता कि कोई मनुष्य बिना हृदय और बिना सच्चाई के भी प्रार्थना कर सकता है। मैं क्षण भर के लिए भी यह दावा नहीं करता कि किसी के प्रार्थना कर लेने मात्र से उसकी आत्मा के विषय में सब कुछ सिद्ध हो जाता है। जैसे धर्म के हर दूसरे अंग में, वैसे ही इसमें भी धोखा और कपट हो सकता है।
परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि प्रार्थना न करना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मनुष्य अभी सच्चा मसीही नहीं है। वह सचमुच अपने पापों को अनुभव नहीं कर सकता। वह परमेश्वर से प्रेम नहीं कर सकता। वह अपने आपको मसीह का ऋणी नहीं समझ सकता। वह पवित्रता की लालसा नहीं कर सकता। वह स्वर्ग की अभिलाषा नहीं कर सकता। उसे अभी नया जन्म लेना है। उसे अभी नई सृष्टि बनना है। वह चुनाव, अनुग्रह, विश्वास, आशा और ज्ञान की बड़ी निश्चिन्तता से डींग मार सकता है, और अज्ञानी लोगों को धोखा दे सकता है। परन्तु निश्चय जानो, यदि वह प्रार्थना नहीं करता तो वह सब व्यर्थ की बातें हैं।
और मैं आगे यह भी कहता हूँ कि पवित्र आत्मा के सच्चे कार्य के सब प्रमाणों में से हार्दिक निजी प्रार्थना की आदत सबसे अधिक सन्तोषजनक प्रमाणों में से एक है। मनुष्य बुरे उद्देश्यों से भी प्रचार कर सकता है। मनुष्य पुस्तकें लिख सकता है, सुन्दर भाषण दे सकता है, भले कर्मों में परिश्रमी दिख सकता है, और फिर भी यहूदा इस्करियोती ही हो सकता है। परन्तु मनुष्य यदि सच्चे मन से न हो तो कम ही अपनी कोठरी में जाकर गुप्त में परमेश्वर के सामने अपनी आत्मा उण्डेलता है। प्रभु ने स्वयं प्रार्थना पर सच्चे मन-परिवर्तन के सर्वोत्तम प्रमाण की मुहर लगाई है। जब उसने हनन्याह को दमिश्क में शाऊल के पास भेजा, तब उसके हृदय-परिवर्तन का इसके सिवा कोई और प्रमाण नहीं दिया, "देख, वह प्रार्थना कर रहा है।" (प्रेरितों के काम 9:11।)
मैं जानता हूँ कि मनुष्य के प्रार्थना करने तक पहुँचने से पहले उसके मन में बहुत कुछ चलता रहता है। उसमें अनेक कायलताएँ, अभिलाषाएँ, इच्छाएँ, भावनाएँ, इरादे, संकल्प, आशाएँ और भय हो सकते हैं। परन्तु
प्रार्थना का आह्वान ये सब बातें बहुत अनिश्चित प्रमाण हैं। ये भक्तिहीन लोगों में भी पाई जाती हैं, और प्रायः व्यर्थ ठहरती हैं। बहुत से मामलों में ये भोर के बादल और उड़ जानेवाली ओस से अधिक स्थायी नहीं होतीं। टूटे और पिसे हुए मन से निकली सच्ची हार्दिक प्रार्थना इन सब बातों को मिलाकर भी उनसे अधिक मूल्यवान है। मैं जानता हूँ कि पवित्र आत्मा, जो पापियों को उनके बुरे मार्गों से बुलाता है, बहुत से मामलों में उन्हें बहुत धीरे-धीरे मसीह की पहचान तक पहुँचाता है। परन्तु मनुष्य की आँख केवल उसी के आधार पर न्याय कर सकती है जो वह देखती है। जब तक कोई विश्वास न करे, मैं उसे धर्मी ठहराया गया नहीं कह सकता। जब तक कोई प्रार्थना न करे, मैं यह कहने का साहस नहीं करता कि वह विश्वास करता है। मैं गूँगे विश्वास को समझ नहीं सकता। विश्वास का पहला कार्य परमेश्वर से बातें करना होगा। विश्वास आत्मा के लिए वही है जो जीवन शरीर के लिए है। प्रार्थना विश्वास के लिए वही है जो साँस शरीर के लिए है। कोई मनुष्य साँस लिए बिना कैसे जीवित रह सकता है, यह मेरी समझ से परे है; और कोई मनुष्य प्रार्थना किए बिना कैसे विश्वास कर सकता है, यह भी मेरी समझ से परे है।
यदि तुम सुसमाचार के सेवकों को प्रार्थना के महत्त्व पर बहुत ज़ोर देते सुनो तो कभी आश्चर्य न करना। यही वह बात है जिस तक वे तुम्हें पहुँचाना चाहते हैं। वे जानना चाहते हैं कि तुम प्रार्थना करते हो। हो सकता है सिद्धान्त के विषय में तुम्हारे विचार सही हों। प्रोटेस्टेंट मत के प्रति तुम्हारा प्रेम उष्ण और निस्सन्देह हो। फिर भी यह केवल सिर का ज्ञान और दलबन्दी की भावना ही हो सकती है। वे जानना चाहते हैं कि क्या तुम सचमुच अनुग्रह के सिंहासन से परिचित हो, और क्या तुम परमेश्वर के विषय में बातें करने के साथ-साथ परमेश्वर से बातें भी कर सकते हो।
क्या तुम जानना चाहते हो कि तुम सच्चे मसीही हो या नहीं? तो निश्चय जानो कि मेरा प्रश्न सबसे पहले महत्त्व का है—क्या तुम प्रार्थना करते हो?
जे. सी. राइल
3 प्रार्थना: सबसे
उपेक्षित कर्तव्य
3. मैं पूछता हूँ कि क्या तुम प्रार्थना करते हो, क्योंकि धर्म में निजी प्रार्थना के समान किसी कर्तव्य की इतनी उपेक्षा नहीं की जाती।
हम ऐसे दिनों में रहते हैं जब धर्म का अत्यधिक दिखावा है। सार्वजनिक आराधना के स्थान पहले से कहीं अधिक हैं। उनमें जानेवाले लोग भी पहले से कहीं अधिक हैं। फिर भी इस सारे सार्वजनिक धर्म के होते हुए, मेरा विश्वास है कि निजी प्रार्थना की बहुत बड़ी उपेक्षा है। यह परमेश्वर और हमारी आत्माओं के बीच के उन निजी व्यवहारों में से है जिन्हें कोई आँख नहीं देखती, और इसलिए लोग इसे छोड़ देने और अनकिया रहने देने के प्रलोभन में पड़ जाते हैं।
मेरा विश्वास है कि हज़ारों लोग प्रार्थना का एक शब्द भी नहीं बोलते। वे खाते हैं। वे पीते हैं। वे सोते हैं। वे उठते हैं। वे अपने काम पर जाते हैं। वे अपने घरों को लौटते हैं। वे परमेश्वर की हवा में साँस लेते हैं। वे परमेश्वर का सूर्य देखते हैं। वे परमेश्वर की पृथ्वी पर चलते-फिरते हैं। वे परमेश्वर की दया का आनन्द लेते हैं। उनके शरीर मरनेवाले हैं। उनके सामने न्याय और अनन्तकाल है। परन्तु वे परमेश्वर से कभी बात नहीं करते। वे नाश होनेवाले पशुओं के समान जीते हैं। वे बिना आत्मा के प्राणियों जैसा व्यवहार करते हैं। जिसके हाथ में उनका जीवन और साँस और सब कुछ है, और जिसके मुँह से उन्हें एक दिन अपना अनन्त दण्ड सुनना है, उससे कहने को उनके पास एक शब्द भी नहीं है। यह कितना भयानक लगता है; परन्तु यदि मनुष्यों के भेद केवल जाने जाते, तो यह कितना सामान्य ठहरता।
मेरा विश्वास है कि हज़ारों-लाखों ऐसे लोग हैं जिनकी प्रार्थनाएँ केवल दिखावा हैं—शब्दों का एक समूह जो बिना उनके अर्थ पर कुछ भी विचार किए रटकर दोहरा दिया जाता है। कुछ लोग बचपन में घर पर सीखे हुए थोड़े-से वाक्य जल्दी-जल्दी बोल देते हैं। कुछ लोग विश्वास-वचन दोहराकर सन्तुष्ट हो जाते हैं, यह भूलकर कि उसमें कोई प्रार्थना है ही नहीं। कुछ लोग प्रभु की प्रार्थना भी जोड़ लेते हैं, पर इस ज़रा-सी इच्छा के बिना कि उसकी गम्भीर विनतियाँ पूरी की जाएँ।
प्रार्थना का आह्वान
बहुत से लोग, यहाँ तक कि वे भी जो अच्छे प्रार्थना-पाठ काम में लाते हैं, बिस्तर में लेट जाने के बाद, या सुबह नहाते या कपड़े पहनते हुए अपनी प्रार्थनाएँ बुदबुदा लेते हैं। लोग जो चाहें सोचें, पर वे निश्चय जान लें कि परमेश्वर की दृष्टि में यह प्रार्थना करना नहीं है। बिना मन के बोले गए शब्द हमारी आत्मा के लिए उतने ही निरर्थक हैं जितना जंगली लोगों का अपनी मूर्तियों के आगे ढोल पीटना। जहाँ मन नहीं है, वहाँ होंठों और जीभ का काम तो हो सकता है, परन्तु ऐसा कुछ नहीं जिसे परमेश्वर सुने; वहाँ प्रार्थना नहीं है। मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं कि शाऊल ने दमिश्क के मार्ग में प्रभु के उससे मिलने से पहले बहुत-सी लम्बी प्रार्थनाएँ की होंगी। परन्तु जब तक उसका मन टूट न गया, तब तक प्रभु ने यह नहीं कहा, "वह प्रार्थना कर रहा है।"
क्या यह सुनकर आपको आश्चर्य होता है? मेरी सुनिए, मैं आपको दिखाऊँगा कि मैं जो कह रहा हूँ वह बिना कारण नहीं कह रहा। क्या आप सोचते हैं कि मेरे दावे बढ़ा-चढ़ाकर कहे गए और अनुचित हैं? मेरी ओर ध्यान दीजिए, और मैं शीघ्र ही आपको दिखा दूँगा कि मैं आपसे केवल सत्य ही कह रहा हूँ।
क्या आप भूल गए हैं कि प्रार्थना करना किसी के लिए भी स्वाभाविक नहीं है? "शारीरिक मन परमेश्वर से बैर रखता है।" (रोमियों 8:7।) मनुष्य के मन की चाह यही है कि वह परमेश्वर से दूर भाग जाए और उससे कोई सरोकार न रखे। उसके प्रति उसकी भावना प्रेम की नहीं, भय की है। तो फिर कोई मनुष्य प्रार्थना क्यों करे जब उसे पाप का कोई सच्चा बोध नहीं, आत्मिक आवश्यकताओं की कोई सच्ची अनुभूति नहीं, अनदेखी बातों पर कोई पूरा विश्वास नहीं, और पवित्रता तथा स्वर्ग की कोई अभिलाषा नहीं? इन सब बातों के विषय में अधिकांश लोग न कुछ जानते हैं, न कुछ अनुभव करते हैं। भीड़-की-भीड़ चौड़े मार्ग पर चल रही है। मैं इसे भूल नहीं सकता। इसलिए मैं साहसपूर्वक कहता हूँ कि मेरा विश्वास है कि थोड़े ही लोग प्रार्थना करते हैं।
क्या आप भूल गए हैं कि प्रार्थना करना चलन में नहीं है? यह उन बातों में से है जिन्हें स्वीकार करने में बहुत लोग लज्जित होंगे। सैकड़ों ऐसे हैं जो दीवार की दरार पर धावा बोल देंगे, या मृत्यु के मुँह में जाने वाली टुकड़ी का नेतृत्व कर लेंगे, पर यह सबके सामने मान नहीं सकते कि वे नियमित प्रार्थना करते हैं। हज़ारों ऐसे हैं जो यदि किसी अपरिचित के साथ एक ही कमरे में सोने को विवश हों, तो बिना प्रार्थना किए बिस्तर पर लेट जाएँगे। अच्छे कपड़े पहनना, नाट्यशालाओं में जाना, चतुर और मिलनसार समझा जाना—यह सब चलन में है, पर प्रार्थना करना नहीं। मैं इसे भूल नहीं सकता। जिस आदत को स्वीकार करने में इतने लोग लज्जित जान पड़ते हैं, उसे मैं साधारण नहीं मान सकता। इसलिए मेरा विश्वास है कि थोड़े ही लोग प्रार्थना करते हैं।
जे. सी. राइल
क्या आप उन जीवनों को भूल गए हैं जो बहुत लोग जीते हैं? क्या हम सचमुच विश्वास कर सकते हैं कि लोग रात-दिन पाप के विरुद्ध प्रार्थना कर रहे हैं, जबकि हम उन्हें उसी में डूबते देखते हैं? क्या हम मान सकते हैं कि वे संसार के विरुद्ध प्रार्थना करते हैं, जब वे उसकी खोजों में पूरी तरह लीन और व्यस्त हैं? क्या हम सोच सकते हैं कि वे सचमुच परमेश्वर से उसकी सेवा के लिए अनुग्रह माँगते हैं, जब वे उसकी सेवा करने में ज़रा भी रुचि नहीं दिखाते? अरे नहीं, यह दिन के उजाले की तरह स्पष्ट है कि अधिकांश लोग या तो परमेश्वर से कुछ माँगते ही नहीं, या जब माँगते हैं तो जो कहते हैं उसका अर्थ नहीं रखते, जो एक ही बात है। प्रार्थना और पाप कभी एक ही मन में एक साथ नहीं रह सकते। या तो प्रार्थना पाप को भस्म कर देगी, या पाप प्रार्थना का गला घोंट देगा। मैं इसे भूल नहीं सकता। मैं लोगों के जीवन को देखता हूँ। मेरा विश्वास है कि थोड़े ही लोग प्रार्थना करते हैं।
क्या आप उन मृत्युओं को भूल गए हैं जिनसे बहुत लोग मरते हैं? कितने ही लोग, जब मृत्यु के निकट पहुँचते हैं, परमेश्वर से बिलकुल अपरिचित जान पड़ते हैं। वे न केवल उसके सुसमाचार से दुःखद रूप से अनजान होते हैं, बल्कि उससे बात करने की सामर्थ्य में भी दुःखद रूप से कमी रखते हैं। उसके निकट आने के उनके प्रयासों में एक भयानक अटपटापन और झिझक होती है। वे मानो कोई बिलकुल नई बात आरम्भ कर रहे हों। ऐसा लगता है कि उन्हें परमेश्वर से परिचय कराने वाले की आवश्यकता है, मानो उन्होंने उससे पहले कभी बात ही न की हो। मुझे याद है कि मैंने एक स्त्री के विषय में सुना था जो अपनी अन्तिम बीमारी में किसी सेवक को अपने पास बुलाने के लिए चिन्तित थी। उसने चाहा कि वह उसके लिए प्रार्थना करे। उसने उससे पूछा कि वह किस बात के लिए प्रार्थना करे। वह न जानती थी, न बता सकी। वह एक भी ऐसी बात का नाम न ले सकी जिसे वह चाहती कि सेवक उसकी आत्मा के लिए परमेश्वर से माँगे। उसे केवल एक सेवक की प्रार्थनाओं का रूप-भर चाहिए जान पड़ता था। मैं इसे भली-भाँति समझ सकता हूँ। मृत्यु-शय्याएँ भेदों को खोल देने वाली बड़ी प्रकट करने वाली होती हैं। मैंने बीमार और मरते हुए लोगों में जो देखा है, उसे मैं भूल नहीं सकता। यह भी मुझे इस विश्वास की ओर ले जाता है कि थोड़े ही लोग प्रार्थना करते हैं।
मैं आपका मन नहीं देख सकता। आत्मिक बातों में आपका निजी इतिहास मैं नहीं जानता। परन्तु जो कुछ मैं बाइबल में और संसार में देखता हूँ, उससे मैं निश्चित हूँ कि आपके सामने रखे गए इस प्रश्न से अधिक आवश्यक प्रश्न मैं आपसे नहीं पूछ सकता—क्या आप प्रार्थना करते हैं?
प्रार्थना का आह्वान
4 प्रार्थना से बड़ा प्रोत्साहन मिलता है
प्रोत्साहन
4. मैं पूछता हूँ कि क्या आप प्रार्थना करते हैं, क्योंकि प्रार्थना धर्म का ऐसा कार्य है जिसके लिए बड़ा प्रोत्साहन है।
परमेश्वर की ओर से प्रार्थना को सरल बनाने के लिए सब कुछ किया जा चुका है, यदि लोग केवल प्रयास करें। उसकी ओर से सब बातें तैयार हैं। हर आपत्ति का पहले ही उत्तर दे दिया गया है। हर कठिनाई का प्रबन्ध कर दिया गया है। टेढ़े स्थान सीधे और ऊबड़-खाबड़ स्थान चौरस कर दिए गए हैं। प्रार्थना न करने वाले के लिए कोई बहाना नहीं बचा।
एक ऐसा मार्ग है जिससे कोई भी मनुष्य, चाहे वह कितना ही पापी और अयोग्य क्यों न हो, पिता परमेश्वर के निकट आ सकता है। यीशु मसीह ने क्रूस पर हमारे लिए जो बलिदान दिया, उसके द्वारा उसने वह मार्ग खोल दिया है। परमेश्वर की पवित्रता और न्याय को पापियों को डराने और रोक रखने की आवश्यकता नहीं। वे केवल यीशु के नाम से परमेश्वर को पुकारें, केवल यीशु के प्रायश्चित्त करने वाले लहू का आश्रय लें, और वे परमेश्वर को अनुग्रह के सिंहासन पर सुनने को इच्छुक और तत्पर पाएँगे। यीशु का नाम हमारी प्रार्थनाओं के लिए कभी विफल न होने वाला पारपत्र है। उस नाम से मनुष्य साहस के साथ परमेश्वर के निकट आ सकता है और भरोसे के साथ माँग सकता है। परमेश्वर ने उसकी सुनने का वचन दिया है। इस पर विचार कीजिए। क्या यह प्रोत्साहन नहीं है?
एक अधिवक्ता और मध्यस्थ सदा तैयार खड़ा है, जो उन सबकी प्रार्थनाएँ प्रस्तुत करता है जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं। वह अधिवक्ता यीशु मसीह है। वह हमारी प्रार्थनाओं को अपनी सर्वशक्तिमान मध्यस्थता की धूप में मिला देता है। इस प्रकार मिलकर वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने सुखदायक सुगन्ध बनकर चढ़ती हैं। अपने आप में वे कितनी ही तुच्छ क्यों न हों, हमारे महायाजक और ज्येष्ठ भाई के हाथ में वे सामर्थी और प्रभावशाली हैं। जिस बैंक-नोट के नीचे हस्ताक्षर न हो, वह केवल कागज़ का एक निकम्मा टुकड़ा है। कलम की एक रेखा ही उसे उसका सारा मूल्य दे देती है। आदम की सन्तान की प्रार्थना अपने आप में दुर्बल वस्तु है, परन्तु जब प्रभु यीशु के हाथ से उस पर हस्ताक्षर हो जाते हैं, तब वह बहुत कुछ कर सकती है।
जे. सी. राइल
रोम नगर में एक अधिकारी था जिसे यह ठहराया गया था कि उसके द्वार सदा खुले रहें, ताकि जो भी रोमी नागरिक सहायता माँगने आए, उसे वह ग्रहण कर सके। ठीक वैसे ही प्रभु यीशु का कान उन सब की पुकार के लिए सदा खुला रहता है जिन्हें दया और अनुग्रह की आवश्यकता है। उनकी सहायता करना उसका कार्य है। उनकी प्रार्थना उसका आनन्द है। इस पर विचार कीजिए। क्या यह प्रोत्साहन नहीं है?
पवित्र आत्मा प्रार्थना में हमारी निर्बलताओं में सहायता करने को सदा तैयार है। हमारे प्रयत्नों में कि हम परमेश्वर से बातें करें, हमारी सहायता करना उसके विशेष कार्य का एक अंश है। हमें इस भय से निराश और व्याकुल होने की आवश्यकता नहीं कि हमें क्या कहना है यह हम नहीं जानते। यदि हम उसकी सहायता चाहें तो आत्मा हमें शब्द देगा। प्रभु के लोगों की प्रार्थनाएँ प्रभु के आत्मा की प्रेरणा हैं, उस पवित्र आत्मा का कार्य हैं जो उनमें अनुग्रह और विनती की आत्मा होकर वास करता है। निश्चय ही प्रभु के लोग यह आशा रख सकते हैं कि उनकी सुनी जाएगी। यह केवल प्रार्थना करनेवाले ही नहीं, वरन् पवित्र आत्मा भी है जो उनमें होकर विनती करता है। इस पर विचार कीजिए। क्या यह प्रोत्साहन नहीं है?
प्रार्थना करनेवालों के लिए बहुमूल्य और बड़ी-बड़ी प्रतिज्ञाएँ हैं। जब प्रभु यीशु ने ऐसे वचन कहे तो उसका क्या अर्थ था: "माँगो तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो तो तुम पाओगे; खटखटाओ तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा: क्योंकि जो कोई माँगता है, उसे मिलता है; और जो ढूँढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा।" (मत्ती 7:7, 8)। "और जो कुछ तुम प्रार्थना में विश्वास के साथ माँगोगे, वह सब तुम को मिलेगा।" (मत्ती 21:22)। "जो कुछ तुम मेरे नाम से माँगोगे, वही मैं करूँगा, कि पिता पुत्र में महिमा पाए। यदि तुम मुझ से मेरे नाम से कुछ माँगोगे, तो मैं उसे करूँगा।" (यूहन्ना 14:13, 14)। जब प्रभु ने आधी रात को आए मित्र और हठ करनेवाली विधवा के दृष्टान्त कहे, तो उसका क्या अर्थ था? (लूका 11:5; 18:1)। इन वचनों पर मनन कीजिए। यदि यह प्रार्थना करने का प्रोत्साहन नहीं, तो शब्दों का कोई अर्थ ही नहीं।
पवित्रशास्त्र में प्रार्थना की सामर्थ्य के अद्भुत उदाहरण हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कोई वस्तु प्रार्थना के लिए बहुत बड़ी, बहुत कठिन या बहुत दुष्कर नहीं है। उसने वे वस्तुएँ प्राप्त की हैं जो असम्भव और पहुँच से बाहर लगती थीं। उसने आग, वायु, पृथ्वी और जल पर विजय पाई है। प्रार्थना ने लाल समुद्र को खोल दिया। प्रार्थना ने चट्टान से जल और स्वर्ग से रोटी उतारी। प्रार्थना ने सूर्य को ठहरा दिया। प्रार्थना ने एलिय्याह के बलिदान पर आकाश से आग गिराई। प्रार्थना ने
प्रार्थना का आह्वान
अहीतोपेल की युक्ति को मूर्खता में बदल दिया। प्रार्थना ने सन्हेरीब की सेना को उलट दिया। स्कॉटलैंड की रानी मरियम ने ठीक ही कहा था, "मुझे दस हज़ार पुरुषों की सेना से अधिक जॉन नॉक्स की प्रार्थनाओं का भय है।" प्रार्थना ने बीमारों को चंगा किया है। प्रार्थना ने मरे हुओं को जिलाया है। प्रार्थना ने आत्माओं का मन फिराव कराया है। एक वृद्ध मसीही ने ऑगस्टीन की माता से कहा था, "जो बहुत प्रार्थनाओं की सन्तान है, वह कभी नष्ट नहीं होगा।" प्रार्थना, परिश्रम और विश्वास सब कुछ कर सकते हैं। जिस मनुष्य में लेपालकपन की आत्मा है, उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं लगता। जब मूसा इस्राएलियों के लिए मध्यस्थता करने को था, तब परमेश्वर ने उससे यह अद्भुत वचन कहा, "मुझे छोड़ दे।" (निर्गमन 32:10)। जब तक अब्राहम सदोम के लिए दया माँगता रहा, तब तक प्रभु देता गया। जब तक अब्राहम ने प्रार्थना करना न छोड़ा, उसने देना न छोड़ा। (उत्पत्ति 18:17-33)। इस पर विचार कीजिए। क्या यह प्रोत्साहन नहीं है?
प्रार्थना के विषय में जो बातें मैंने अभी आपको बताई हैं, उनके अतिरिक्त मनुष्यों को धर्म में कोई कदम उठाने के लिए और क्या चाहिए? दया के सिंहासन तक का मार्ग सरल बनाने और पापी के मार्ग से ठोकर के सब कारण हटाने के लिए और क्या किया जा सकता था? निश्चय ही यदि नरक के दुष्टात्माओं के सामने ऐसा द्वार खोला जाता, तो वे आनन्द से उछल पड़ते और सारा गड्ढा आनन्द की ध्वनि से गूँज उठता।
परन्तु जो मनुष्य ऐसे महिमामय प्रोत्साहनों की उपेक्षा करता है, वह अन्त में अपना मुँह कहाँ छिपाएगा? उस मनुष्य के पक्ष में क्या कहा जा सकता है जो इन सब के होते हुए भी बिना प्रार्थना किए मर जाता है? निश्चय ही मैं चिन्तित हो सकता हूँ कि आप वह मनुष्य न हों। निश्चय ही मैं यह पूछ सकता हूँ—क्या आप प्रार्थना करते हैं?
जे. सी. राइल
5 प्रार्थना में लगन,
पवित्रता का रहस्य
V. मैं पूछता हूँ कि क्या आप प्रार्थना करते हैं, क्योंकि प्रार्थना में लगन ही उत्कृष्ट पवित्रता का रहस्य है।
निर्विवाद है कि सच्चे मसीहियों में बड़ा अन्तर होता है। परमेश्वर की सेना में अगली पंक्ति के और पिछली पंक्ति के लोगों के बीच बहुत बड़ा अन्तर है।
वे सब एक ही अच्छी लड़ाई लड़ रहे हैं, परन्तु कुछ दूसरों से कितनी अधिक वीरता से लड़ते हैं। वे सब प्रभु का ही कार्य कर रहे हैं, परन्तु कुछ दूसरों से कितना अधिक करते हैं। वे सब प्रभु में ज्योति हैं, परन्तु कुछ दूसरों से कितनी अधिक चमक से प्रकाशित होते हैं। वे सब एक ही दौड़ दौड़ रहे हैं, परन्तु कुछ दूसरों से कितना अधिक तेज़ आगे बढ़ते हैं। वे सब एक ही प्रभु और उद्धारकर्ता से प्रेम करते हैं, परन्तु कुछ दूसरों से कितना अधिक उससे प्रेम करते हैं। मैं किसी भी सच्चे मसीही से पूछता हूँ कि क्या ऐसा नहीं है? क्या ये बातें ऐसी नहीं हैं?
प्रभु के कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने मन फिराव के समय से कभी आगे बढ़ते हुए नहीं दिखाई देते। वे नया जन्म पा चुके हैं, परन्तु जीवन भर शिशु ही बने रहते हैं। आप उनसे वही पुराना अनुभव सुनते हैं। आप उनमें आत्मिक भूख का वही अभाव, अपने छोटे-से घेरे से परे किसी बात में वही अरुचि देखते हैं, जो आपने दस वर्ष पहले देखी थी। वे सचमुच यात्री हैं, परन्तु प्राचीन गिबोनियों जैसे यात्री; उनकी रोटी सदा सूखी और फफूँद लगी, उनके जूते सदा पुराने, और उनके वस्त्र सदा फटे-पुराने रहते हैं। (यहोशू 9:3-15)। मैं यह शोक और दुःख के साथ कहता हूँ; परन्तु मैं किसी भी सच्चे मसीही से पूछता हूँ: क्या यह सच नहीं है?
प्रभु के लोगों में कुछ और भी हैं जो सदा आगे बढ़ते हुए दिखाई देते हैं। वे वर्षा के बाद घास की नाईं बढ़ते हैं; वे मिस्र में इस्राएल की नाईं बढ़ते जाते हैं; वे गिदोन की नाईं आगे बढ़ते हैं, जो यद्यपि कभी-कभी थक जाता था, तौभी सदा पीछा करता रहा। (न्यायियों 8:4।) वे निरन्तर अनुग्रह पर अनुग्रह, विश्वास पर विश्वास, और
प्रार्थना का आह्वान सामर्थ्य पर सामर्थ्य जोड़ते चले जाते हैं। जब भी आप उनसे मिलते हैं, उनके हृदय और भी विशाल, और उनका आत्मिक कद और भी ऊँचा और सुदृढ़ प्रतीत होता है। हर वर्ष वे अपने धर्म में अधिक देखते, अधिक जानते, अधिक विश्वास करते और अधिक अनुभव करते हुए दिखाई देते हैं। उनके पास अपने विश्वास की सच्चाई प्रमाणित करने के लिये भले कर्म ही नहीं, वरन् उनके लिये उत्साह भी है। वे केवल भला ही नहीं करते, वरन् भला करने में थकते भी नहीं। वे बड़े-बड़े कामों का प्रयत्न करते हैं और बड़े-बड़े काम करते भी हैं। जब असफल होते हैं तो फिर प्रयत्न करते हैं, और जब गिरते हैं तो शीघ्र उठ खड़े होते हैं। और इस सारे समय में वे अपने आप को दीन, निकम्मे दास समझते हैं और मानते हैं कि हम कुछ भी नहीं करते। ये वे लोग हैं जो धर्म को सब की दृष्टि में मनोहर और सुन्दर बना देते हैं। वे अपरिवर्तित लोगों से भी प्रशंसा खींच लेते हैं और संसार के स्वार्थी लोगों से भी उत्तम सम्मति पा लेते हैं। उन्हें देखकर, उनके संग रहकर और उनकी बातें सुनकर भला होता है। जब आप उनसे मिलते हैं तो विश्वास कर सकते हैं कि मूसा की नाईं वे अभी-अभी परमेश्वर की उपस्थिति से निकलकर आए हैं। (निर्गमन 34:29-35।) जब आप उनसे विदा होते हैं तो उनकी संगति से ऐसी गर्माहट अनुभव करते हैं मानो आपकी आत्मा किसी आग के निकट रही हो। मैं जानता हूँ कि ऐसे लोग दुर्लभ हैं। मैं केवल इतना पूछता हूँ: क्या ऐसे बहुत-से नहीं हैं?
अब जो अन्तर मैंने अभी बताया है, उसका कारण आप कैसे समझाएँगे? क्या कारण है कि कुछ विश्वासी दूसरों से इतने अधिक तेजस्वी और पवित्र होते हैं? मेरा विश्वास है कि उन्नीस में से बीस बार यह अन्तर निजी प्रार्थना की भिन्न-भिन्न आदतों से उत्पन्न होता है। मेरा विश्वास है कि जो लोग विशेष रूप से पवित्र नहीं हैं वे कम प्रार्थना करते हैं, और जो विशेष रूप से पवित्र हैं वे बहुत प्रार्थना करते हैं।
मैं कह सकता हूँ कि यह मत कुछ पाठकों को चौंका देगा। मुझे थोड़ा भी सन्देह नहीं कि बहुत-से लोग विशेष पवित्रता को एक प्रकार का विशेष वरदान समझते हैं, जिसकी इच्छा केवल गिने-चुने लोगों को ही करनी चाहिए। वे उसे दूर से पुस्तकों में सराहते हैं। जब अपने निकट कोई उदाहरण देखते हैं तो उसे सुन्दर मानते हैं। परन्तु यह कि वह थोड़े-से लोगों के अतिरिक्त किसी की पहुँच में है, ऐसा विचार उनके मन में कभी आता ही नहीं। संक्षेप में, वे उसे कुछ कृपापात्र विश्वासियों को दिया गया एकाधिकार समझते हैं, सबको नहीं।
अब मेरा विश्वास है कि यह एक अत्यन्त खतरनाक भूल है। मेरा विश्वास है कि प्राकृतिक महानता की नाईं आत्मिक महानता भी बहुत हद तक उन साधनों के विश्वासयोग्य उपयोग पर निर्भर है जो हर एक की
जे. सी. रायल पहुँच में हैं। निःसन्देह मैं यह नहीं कहता कि हमें बुद्धि के वरदानों के चमत्कारिक दान की आशा करने का अधिकार है; परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि जब कोई मनुष्य एक बार परमेश्वर की ओर फिर जाता है, तो पवित्रता में उसकी उन्नति बहुत कुछ उसके द्वारा परमेश्वर के ठहराए हुए साधनों के परिश्रम से उपयोग के अनुसार होगी। और मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि जिस मुख्य साधन से अधिकांश विश्वासी मसीह की कलीसिया में महान बने हैं, वह परिश्रमपूर्वक निजी प्रार्थना की आदत है।
परमेश्वर के सबसे तेजस्वी और उत्तम सेवकों के जीवन को देखिए, चाहे वे बाइबल में हों या न हों। देखिए कि मूसा, दाऊद, दानिय्येल और पौलुस के विषय में क्या लिखा है। देखिए कि धर्म-सुधारक लूथर और ब्रैडफोर्ड के विषय में क्या लिखा गया है। देखिए कि व्हाइटफील्ड, सिसिल, वेन, बिकरस्टेथ और मैक्चेन की निजी भक्ति के विषय में क्या बताया गया है। सन्तों और शहीदों की उस सारी उत्तम संगति में से मुझे एक भी ऐसा बताइए जिसमें यह चिह्न सबसे प्रमुख न रहा हो—वे प्रार्थना के मनुष्य थे। निश्चय जानिए, प्रार्थना सामर्थ्य है।
प्रार्थना से पवित्र आत्मा की नई और निरन्तर वर्षा प्राप्त होती है। वही अकेला मनुष्य के हृदय में अनुग्रह का कार्य आरम्भ करता है। वही अकेला उसे आगे बढ़ा सकता है और सफल कर सकता है। परन्तु भला आत्मा चाहता है कि उससे विनती की जाए। और जो सबसे अधिक माँगेंगे उन्हें उसका प्रभाव सबसे अधिक मिलेगा।
प्रार्थना शैतान और सहज उलझाने वाले पापों के विरुद्ध सबसे निश्चित उपाय है। जिस पाप के विरुद्ध सच्चे मन से प्रार्थना की जाती है, वह कभी स्थिर नहीं रह सकता। यदि हम प्रभु से विनती करें कि वह उसे निकाल दे, तो शैतान हम पर बहुत समय तक अधिकार नहीं रख सकेगा। परन्तु यदि हमारे स्वर्गीय वैद्य को हमें प्रतिदिन आराम देना है, तो हमें अपनी सारी दशा उसके सामने खोलकर रखनी होगी।
क्या आप अनुग्रह में बढ़ना और समर्पित मसीही बनना चाहते हैं? यदि आप यह चाहते हैं, तो निश्चय जानिए कि इससे अधिक महत्वपूर्ण कोई प्रश्न नहीं हो सकता—क्या आप प्रार्थना करते हैं?
प्रार्थना का आह्वान
6 प्रार्थना और पीछे हटना
6. मैं पूछता हूँ कि क्या आप प्रार्थना करते हैं, क्योंकि प्रार्थना की उपेक्षा पीछे हटने के सबसे बड़े कारणों में से एक है।
अच्छा अंगीकार करने के बाद धर्म में पीछे हट जाने जैसी बात होती है। लोग गलातियों की नाईं कुछ समय तक अच्छी दौड़ दौड़ सकते हैं, और फिर झूठे उपदेशकों के पीछे मुड़ जाते हैं। लोग जब तक उनकी भावनाएँ गर्म रहती हैं ऊँचे स्वर में अंगीकार कर सकते हैं, जैसा पतरस ने किया, और फिर परीक्षा की घड़ी में अपने प्रभु का इन्कार कर देते हैं। लोग इफिसियों की नाईं अपना पहला प्रेम खो सकते हैं। लोग भलाई करने की अपनी धुन में ठण्डे पड़ सकते हैं, जैसे पौलुस का साथी यूहन्ना मरकुस। लोग कुछ समय तक किसी प्रेरित के पीछे चल सकते हैं, और देमास की नाईं फिर संसार की ओर लौट जाते हैं। ये सब बातें लोग कर सकते हैं।
पीछे हटनेवाला होना एक दयनीय बात है। जितनी भी दुखद बातें किसी मनुष्य पर आ सकती हैं, उन सब में मैं समझता हूँ यह सबसे बुरी है। किनारे पर फँसा जहाज, टूटे पंखों वाला उकाब, झाड़-झंखाड़ से भरा बगीचा, बिना तारों की वीणा, खण्डहर बनी कलीसिया—ये सब दुखद दृश्य हैं, परन्तु पीछे हटनेवाला इनसे भी अधिक दुखद दृश्य है। घायल विवेक—अपने आप से ऊबा हुआ मन—आत्म-धिक्कार से भरी स्मृति—प्रभु के तीरों से बिंधा हुआ हृदय—भीतरी दोषारोपण से टूटी हुई आत्मा—यह सब नरक का स्वाद है। यह पृथ्वी पर ही नरक है। सचमुच बुद्धिमान की वह बात गम्भीर और भारी है, "जो बुद्धि का फिरने वाला है वह अपनी चाल चलन का फल भोगता है।" (नीतिवचन 14:14।)
अब अधिकतर पीछे हटने की दशा क्या है? मेरा विश्वास है कि सामान्य नियम के रूप में, उसके मुख्य कारणों में से एक निजी प्रार्थना की उपेक्षा है। निःसन्देह पतनों का गुप्त इतिहास अन्तिम दिन तक ज्ञात नहीं होगा। मैं मसीह के एक सेवक और हृदय के विद्यार्थी के रूप में केवल अपनी सम्मति दे सकता हूँ। वह सम्मति, मैं स्पष्ट रूप से दोहराता हूँ, यह है कि पीछे हटना सामान्यतः निजी प्रार्थना की उपेक्षा से ही आरम्भ होता है।
बाइबल बिना प्रार्थना के पढ़ी जाती है; उपदेश बिना प्रार्थना के सुने जाते हैं; विवाह बिना प्रार्थना के किए जाते हैं; यात्राएँ बिना प्रार्थना के आरम्भ की जाती हैं;
जे. सी. राइल बिना प्रार्थना के निवास-स्थान चुने जाते हैं; मित्रताएँ बिना प्रार्थना के बनाई जाती हैं; और दैनिक प्रार्थना का कार्य भी जल्दबाज़ी में निपटा दिया जाता है, या बिना हृदय के पूरा किया जाता है: ये ही वे सीढ़ियाँ हैं जिनसे उतरते-उतरते अनेक मसीही आत्मिक लक़वे की दशा में जा पहुँचते हैं, या उस बिन्दु पर पहुँच जाते हैं जहाँ परमेश्वर उन्हें भयानक पतन में गिरने देता है।
यही वह प्रक्रिया है जो ढीले-ढाले लूत, अस्थिर शिमशोन, पत्नियों को पूजने वाले सुलैमान, असंगत आसा, लचीले यहोशापात और अति-चिन्ता करने वाली मार्था बनाती है, जिनमें से इतने सारे मसीह की कलीसिया में पाए जाते हैं। प्रायः ऐसे मामलों का सीधा-सादा इतिहास यह होता है: वे निजी प्रार्थना के विषय में लापरवाह हो गए।
आप निश्चित जानें कि लोग सबके सामने गिरने से बहुत पहले अकेले में गिर जाते हैं। संसार की दृष्टि में खुल्लमखुल्ला पीछे हटने से बहुत पहले वे अपने घुटनों पर पीछे हट चुके होते हैं। पतरस की नाईं वे पहले प्रभु की जागते और प्रार्थना करते रहने की चेतावनी की उपेक्षा करते हैं, और फिर पतरस ही की नाईं उनका बल जाता रहता है, और परीक्षा की घड़ी में वे अपने प्रभु का इन्कार कर देते हैं। (मत्ती 26:40-75।)
संसार उनके पतन पर ध्यान देता है और ऊँचे स्वर में उपहास करता है। परन्तु संसार असली कारण के विषय में कुछ नहीं जानता। विधर्मियों ने मृत्यु से भी बुरे दण्ड की धमकी देकर एक सुप्रसिद्ध मसीही से मूर्ति के आगे धूप चढ़वा लिया। उसकी कायरता और धर्म-त्याग को देखकर उन्होंने बड़ा उत्सव मनाया। परन्तु विधर्मी उस बात को नहीं जानते थे जो इतिहास हमें बताता है, कि उसी दिन सवेरे वह अपनी प्रार्थनाएँ पूरी किए बिना ही हड़बड़ी में अपने शयनकक्ष से निकल आया था।
यदि आप सचमुच मसीही हैं, तो मुझे भरोसा है कि आप कभी पीछे हटने वाले नहीं होंगे। परन्तु यदि आप पीछे हटने वाला मसीही नहीं होना चाहते, तो मेरा यह प्रश्न स्मरण रखें: क्या आप प्रार्थना करते हैं?
प्रार्थना का आह्वान
7 प्रार्थना और सन्तोष
7. अन्त में मैं पूछता हूँ कि क्या आप इसलिए प्रार्थना करते हैं कि प्रार्थना सुख और सन्तोष के सर्वोत्तम साधनों में से एक है।
हम ऐसे संसार में रहते हैं जहाँ दुःख की बहुतायत है। जब से पाप आया है तब से सदा यही दशा रही है। पाप हो और दुःख न हो, यह सम्भव नहीं। और जब तक पाप को संसार से निकाल नहीं दिया जाता, तब तक किसी का यह समझना व्यर्थ है कि वह दुःख से बच सकता है।
निस्सन्देह कुछ लोगों को दूसरों की अपेक्षा दुःख का बड़ा प्याला पीना पड़ता है। परन्तु ऐसे लोग कम ही मिलेंगे जो लम्बे समय तक किसी न किसी प्रकार के दुःख या चिन्ता के बिना जीएँ। हमारे शरीर, हमारी सम्पत्ति, हमारे परिवार, हमारी सन्तान, हमारे सम्बन्धी, हमारे सेवक, हमारे मित्र, हमारे पड़ोसी, हमारे सांसारिक व्यवसाय—इनमें से हर एक चिन्ता का सोता है। बीमारी, मृत्यु, हानि, निराशा, बिछोह, अलगाव, कृतघ्नता, निन्दा—ये सब आम बातें हैं। हम इनके बिना जीवन नहीं बिता सकते। किसी न किसी दिन ये हमें खोज निकालती हैं। हमारा स्नेह जितना बड़ा होता है, हमारे क्लेश उतने ही गहरे होते हैं, और हम जितना अधिक प्रेम करते हैं उतना ही अधिक हमें रोना पड़ता है।
और ऐसे संसार में प्रसन्नचित्त रहने का सर्वोत्तम साधन क्या है? हम इस आँसुओं की घाटी में कम से कम पीड़ा के साथ कैसे पार हों? मैं इससे उत्तम साधन नहीं जानता कि हर बात को प्रार्थना में परमेश्वर के पास ले जाने की आदत डाली जाए।
बाइबल पुराने और नए, दोनों नियमों में यही सीधी सलाह देती है। भजनकार क्या कहता है? "संकट के दिन मुझे पुकार; मैं तुझे छुड़ाऊँगा, और तू मेरी महिमा करने पाएगा।" (भजन संहिता 50:15।) "अपना बोझ यहोवा पर डाल दे वह तुझे सम्भालेगा; वह धर्मी को कभी टलने न देगा।" (भजन संहिता 55:22।) प्रेरित पौलुस क्या कहता है? "किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को
जे. सी. राइल
मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।" (फिलिप्पियों 4:6, 7।) प्रेरित याकूब क्या कहता है: "क्या तुम में कोई दुःखी है? तो वह प्रार्थना करे।" (याकूब 5:13।)
पवित्रशास्त्र में जिन सब सन्तों का इतिहास लिखा गया है, उन सबका यही अभ्यास था। जब याकूब अपने भाई एसाव से डरा तब उसने यही किया। जब जंगल में लोग मूसा को पथराव करने को तैयार थे तब उसने यही किया। जब ऐ के लोगों के सामने इस्राएल हार गया तब यहोशू ने यही किया। जब दाऊद कीला में संकट में था तब उसने यही किया। जब हिजकिय्याह को सन्हेरीब की चिट्ठी मिली तब उसने यही किया। जब पतरस बन्दीगृह में डाला गया तब कलीसिया ने यही किया। जब पौलुस फिलिप्पी के कारागार में डाला गया तब उसने यही किया।
ऐसे संसार में सचमुच सुखी रहने का एकमात्र उपाय यह है कि हम अपनी सारी चिन्ता सदा परमेश्वर पर डालते रहें। विश्वासियों को प्रायः उदास इसी बात से होना पड़ता है कि वे अपने बोझ स्वयं उठाने का प्रयत्न करते हैं। यदि वे अपने कष्ट परमेश्वर को बताएँ, तो वह उन्हें उन्हें ऐसी सरलता से उठाने की सामर्थ्य देगा जैसे शिमशोन ने गाज़ा के फाटकों को उठाया था। (न्यायियों 16:3।) यदि वे उन्हें अपने ही पास रखने का निश्चय करें, तो एक दिन पाएँगे कि टिड्डी भी उनके लिए बोझ है।
एक मित्र सदा हमारी सहायता के लिए तैयार है, यदि हम उसके सामने अपना दुःख खोलकर रखें—एक ऐसा मित्र जिसने पृथ्वी पर रहते हुए गरीबों, रोगियों और दुःखियों पर तरस खाया—एक ऐसा मित्र जो मनुष्य के हृदय को जानता है, क्योंकि वह तैंतीस वर्ष तक हमारे बीच मनुष्य होकर रहा—एक ऐसा मित्र जो रोने वालों के साथ रो सकता है, क्योंकि वह दुःखी पुरुष और रोग से परिचित था—एक ऐसा मित्र जो हमारी सहायता करने में समर्थ है, क्योंकि ऐसी कोई सांसारिक पीड़ा नहीं जिसे वह चंगा न कर सके। वह मित्र यीशु मसीह है। सुखी होने का मार्ग यही है कि हम सदा अपना हृदय उसके सामने खोलते रहें। काश, हम सब उस दीन मसीही दास के समान होते जो धमकाए और दण्ड दिए जाने पर केवल यही उत्तर देता था, "मुझे प्रभु को बताना है।"
यीशु उन्हें सुखी कर सकता है जो उस पर भरोसा रखते और उसे पुकारते हैं, उनकी बाहरी दशा चाहे जो हो। वह उन्हें कारागार में हृदय की शान्ति, दरिद्रता के बीच सन्तोष, शोक के बीच सान्त्वना और कब्र के किनारे आनन्द दे सकता है। उसमें अपने सब विश्वासी अंगों के लिए अपार परिपूर्णता है—ऐसी परिपूर्णता जो हर उस व्यक्ति पर उंडेले जाने को तैयार है जो प्रार्थना में माँगे। काश, लोग
प्रार्थना का आह्वान यह समझ लेते कि सुख बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि हृदय की दशा पर निर्भर करता है।
प्रार्थना हमारे क्रूसों को, चाहे वे कितने ही भारी हों, हल्का कर सकती है। यह उसे हमारे पास ला सकती है जो उन्हें उठाने में हमारी सहायता करेगा। जब हमारा मार्ग घिरा हुआ दिखाई दे, तब प्रार्थना हमारे लिये द्वार खोल सकती है। यह उसे नीचे ला सकती है जो कहेगा, "मार्ग यही है, इसी पर चलो।" (यशायाह 30:21।) जब हमारी सारी सांसारिक आशाएँ अन्धकारमय दिखाई दें, तब प्रार्थना आशा की एक किरण भीतर आने दे सकती है। यह उसे नीचे ला सकती है जो कहेगा, "मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी त्यागूँगा।" (इब्रानियों 13:5) जब हमारे सबसे प्रिय लोग उठा लिये जाएँ और संसार सूना लगे, तब प्रार्थना हमारे लिये राहत पा सकती है। यह उसे नीचे ला सकती है जो हमारे हृदय के खालीपन को अपने आप से भर सकता है, और भीतर की लहरों से कह सकता है, "शान्त रह, थम जा।" (मरकुस 4:39।) काश लोग जंगल में हाजिरा के समान न होते, जो अपने ही पास जीवन-जल के सोते को देख न सकी। (उत्पत्ति 21:14-19।)
मैं चाहता हूँ कि तुम सुखी हो। मैं जानता हूँ कि मैं तुमसे इससे अधिक उपयोगी प्रश्न नहीं पूछ सकता: क्या तुम प्रार्थना करते हो?
और अब इस पुस्तिका को समाप्त करने का समय आ गया है। मुझे भरोसा है कि मैंने तुम्हारे सामने ऐसी बातें रखी हैं जिन पर गम्भीरता से विचार किया जाएगा। मैं हृदय से परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि यह विचार तुम्हारी आत्मा के लिये आशीष ठहरे।
जे. सी. राइल
8 अपरिवर्तित लोगों के लिये सलाह
जो प्रार्थना नहीं करते, उनसे मुझे एक विदाई का वचन कहने दो। मैं यह मानने का साहस नहीं कर सकता कि इन पृष्ठों को पढ़नेवाले सब लोग प्रार्थना करनेवाले हैं। यदि तुम प्रार्थनाहीन व्यक्ति हो, तो मुझे आज परमेश्वर की ओर से तुमसे बात करने दो।
प्रार्थनाहीन पाठक, मैं तुम्हें केवल चेतावनी दे सकता हूँ, परन्तु मैं तुम्हें अति गम्भीरता से चेतावनी देता हूँ। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ कि तुम भयंकर खतरे की स्थिति में हो। यदि तुम अपनी वर्तमान दशा में मर गए, तो तुम खोई हुई आत्मा हो। तुम केवल अनन्त दुःख भोगने के लिये फिर जी उठोगे। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ कि तुम सब नाममात्र के मसीहियों के पास कोई बहाना नहीं है। प्रार्थना के बिना जीने का एक भी उचित कारण तुम नहीं दिखा सकते।
यह कहना व्यर्थ है कि तुम नहीं जानते कि प्रार्थना कैसे करें। प्रार्थना सारे धर्म में सबसे सरल कार्य है। यह केवल परमेश्वर से बात करना है। इसे आरम्भ करने के लिये न विद्या चाहिए, न बुद्धि, न पुस्तक का ज्ञान। इसके लिये केवल हृदय और इच्छा चाहिए। सबसे दुर्बल शिशु भी भूख लगने पर रो सकता है। सबसे कंगाल भिखारी भी भिक्षा के लिये हाथ फैलाता है, और सुन्दर शब्द ढूँढ़ने की प्रतीक्षा नहीं करता। सबसे अनपढ़ व्यक्ति को भी परमेश्वर से कहने के लिये कुछ न कुछ मिल जाएगा, यदि उसका मन हो।
यह कहना व्यर्थ है कि तुम्हारे पास प्रार्थना के लिये कोई सुविधाजनक स्थान नहीं है। यदि कोई चाहे तो उसे पर्याप्त एकान्त स्थान मिल सकता है। हमारे प्रभु ने पहाड़ पर प्रार्थना की; पतरस ने छत पर; इसहाक ने खेत में; नतनएल ने अंजीर के पेड़ के नीचे; योना ने मछली के पेट में। कोई भी स्थान कोठरी, प्रार्थनालय और बेतेल बन सकता है, और हमारे लिये परमेश्वर की उपस्थिति का स्थान हो सकता है।
यह कहना व्यर्थ है कि तुम्हारे पास समय नहीं है। समय बहुत है, यदि लोग उसका उपयोग करें। समय थोड़ा हो सकता है, परन्तु प्रार्थना के लिये समय सदा पर्याप्त होता है। दानिय्येल के हाथ में एक राज्य के कार्य थे, फिर भी वह दिन में तीन बार प्रार्थना करता था। (दानिय्येल 2:48; 6:10।) दाऊद एक सामर्थी जाति का शासक था, फिर भी वह कहता है, "साँझ को, भोर को, और दोपहर को मैं
प्रार्थना की प्रार्थना करूँगा।" (भजन संहिता 55:17।) जब सचमुच समय की आवश्यकता हो, तो समय सदा मिल सकता है।
यह कहना व्यर्थ है कि जब तक तुम्हें विश्वास और नया हृदय न मिले तब तक तुम प्रार्थना नहीं कर सकते, और तुम्हें चुपचाप बैठकर उनकी प्रतीक्षा करनी चाहिए। यह पाप पर पाप जोड़ना है। अपरिवर्तित होकर नरक की ओर जाना ही बुरा है। यह कहना और भी बुरा है, "मैं यह जानता हूँ, परन्तु दया की दुहाई न दूँगा।" यह ऐसा तर्क है जिसका पवित्रशास्त्र में कोई आधार नहीं। यशायाह कहता है, "जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो।" (यशायाह 55:6।) होशे कहता है, "वचन सोचकर यहोवा की ओर फिरो।" (होशे 14:2।) पतरस शमौन जादूगर से कहता है, "मन फिरा और प्रभु से प्रार्थना कर।" (प्रेरितों के काम 8:22।) यदि तुम्हें विश्वास और नया हृदय चाहिए, तो जाकर प्रभु से उनके लिये पुकारो। प्रार्थना करने का प्रयत्न ही प्रायः किसी मरी हुई आत्मा के जी उठने का कारण बना है।
हे प्रार्थनाहीन पाठक, तुम कौन हो और क्या हो कि परमेश्वर से कुछ नहीं माँगते? क्या तुमने मृत्यु और नरक से वाचा बाँधी है? क्या तुम कीड़े और आग से मेल रखते हो? क्या तुम्हारे कोई पाप नहीं जो क्षमा किये जाएँ? क्या तुम्हें अनन्त पीड़ा का कोई भय नहीं? क्या तुम्हें स्वर्ग की कोई अभिलाषा नहीं? काश तुम अपनी वर्तमान मूर्खता से जाग उठते। काश तुम अपने अन्त पर विचार करते। काश तुम उठकर परमेश्वर को पुकारते। हाय, वह दिन आनेवाला है जब बहुत लोग ऊँचे स्वर से प्रार्थना करेंगे, "हे प्रभु, हे प्रभु, हमारे लिये द्वार खोल दे," परन्तु बहुत देर हो चुकी होगी; जब बहुत लोग चट्टानों से कहेंगे कि हम पर गिर पड़ो और पहाड़ियों से कि हमें ढाँप लो, जिन्होंने कभी परमेश्वर को न पुकारा। (मत्ती 25:11; प्रकाशितवाक्य 6:16।) पूरे स्नेह से मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ, सावधान रहो कि तुम्हारी आत्मा का यही अन्त न हो। उद्धार तुम्हारे बहुत निकट है। माँगने के अभाव में स्वर्ग को मत खोओ।
जे. सी. राइल
9 सन्तों के लिये परामर्श
मुझे उनसे बात करने दो जिनमें उद्धार की सच्ची अभिलाषा है, परन्तु नहीं जानते कि कौन-सा कदम उठाएँ या कहाँ से आरम्भ करें। मैं आशा किये बिना नहीं रह सकता कि कुछ पाठक इसी मनःस्थिति में होंगे, और यदि ऐसा एक भी हो तो मुझे उसे स्नेहपूर्ण परामर्श देना ही चाहिए।
हर यात्रा में पहला कदम होना अवश्य है। बैठे रहने से आगे बढ़ने की ओर परिवर्तन होना चाहिए। इस्राएल की मिस्र से कनान तक की यात्रा लम्बी और थका देनेवाली थी। यरदन पार करने से पहले चालीस वर्ष बीत गए। फिर भी जब वे रामसेस से सुक्कोत की ओर चले, तब किसी ने तो पहले कदम बढ़ाया था। मनुष्य पाप और संसार से निकलने का पहला कदम सचमुच कब उठाता है? उसी दिन जब वह पहली बार हृदय से प्रार्थना करता है।
हर भवन में पहला पत्थर रखा जाना और पहली चोट की जानी अवश्य है। जहाज़ बनने में एक सौ बीस वर्ष लगे। फिर भी एक दिन ऐसा था जब नूह ने उसे बनाने के लिये पहला पेड़ काटने को अपनी कुल्हाड़ी लगाई। सुलैमान का मन्दिर एक भव्य भवन था। परन्तु एक दिन ऐसा था जब मोरिय्याह पर्वत में पहला विशाल पत्थर गहरा रखा गया। आत्मा का भवन मनुष्य के हृदय में सचमुच कब दिखाई देने लगता है? जहाँ तक हम समझ सकते हैं, तब जब वह पहली बार प्रार्थना में परमेश्वर के सामने अपना हृदय उँडेलता है।
यदि तुम उद्धार चाहते हो और जानना चाहते हो कि क्या करें, तो मेरी सलाह है कि आज ही, जो पहला एकान्त स्थान मिले उसमें, प्रभु यीशु मसीह के पास जाओ, और प्रार्थना में पूरे मन और गम्भीरता से उससे विनती करो कि वह तुम्हारी आत्मा का उद्धार करे।
उससे कहिए कि आपने सुना है कि वह पापियों को ग्रहण करता है, और उसने कहा है, "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" (यूहन्ना 6:37।) उससे कहिए कि आप एक दीन और अधम पापी हैं, और उसी के अपने निमंत्रण पर विश्वास करके उसके पास आए हैं। उससे कहिए कि आप अपने आपको पूरी तरह से उसके हाथों में सौंपते हैं; कि आप अपने आप में अधम, असहाय और निराश अनुभव करते हैं; और कि जब तक वह न
प्रार्थना की पुकार आपका उद्धार न करे, तब तक आपके उद्धार की कोई आशा नहीं। उससे विनती कीजिए कि वह आपको पाप के दोष, उसकी सामर्थ्य और उसके परिणामों से छुड़ाए। उससे विनती कीजिए कि वह आपको क्षमा करे और अपने ही लहू में आपको धो डाले। उससे विनती कीजिए कि वह आपको नया हृदय दे और पवित्र आत्मा को आपकी आत्मा में बसाए। उससे विनती कीजिए कि वह आज से सदा के लिए उसका चेला और सेवक बनने के लिए आपको अनुग्रह, विश्वास, इच्छा और सामर्थ्य दे। हे पाठक, यदि आप सचमुच अपनी आत्मा के विषय में गंभीर हैं, तो आज ही जाइए और ये बातें प्रभु यीशु मसीह से कहिए।
उससे अपने ही ढंग से और अपने ही शब्दों में कहिए। जब आप बीमार हों और कोई वैद्य आपको देखने आए, तो आप उसे बता सकते हैं कि आपको कहाँ पीड़ा होती है। यदि आपकी आत्मा सचमुच अपने रोग को अनुभव करती है, तो आपको मसीह से कहने के लिए अवश्य कुछ न कुछ मिल जाएगा।
इस कारण कि आप पापी हैं, उसके आपको बचाने की इच्छा पर सन्देह न कीजिए। पापियों को बचाना ही मसीह का काम है। वह स्वयं कहता है, "मैं धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूँ।" (लूका 5:32।)
इस कारण कि आप अपने को अयोग्य समझते हैं, रुके न रहिए। किसी बात की प्रतीक्षा न कीजिए। किसी की प्रतीक्षा न कीजिए। प्रतीक्षा करते रहना शैतान की ओर से आता है। जैसे हैं वैसे ही मसीह के पास जाइए। आप जितने बुरे हैं, उतनी ही अधिक आवश्यकता है कि आप उसके पास जाएँ। दूर रहकर आप अपने आपको कभी नहीं सुधार पाएँगे।
इस कारण मत डरिए कि आपकी प्रार्थना तुतलाती है, आपके शब्द दुर्बल हैं और आपकी भाषा कंगाल है। यीशु आपको समझ सकता है। जैसे माता अपने शिशु की पहली तोतली बोली को समझ लेती है, वैसे ही धन्य उद्धारकर्ता पापियों को समझता है। वह आह को पढ़ सकता है और कराह में भी अर्थ देख सकता है।
इस कारण निराश न होइए कि आपको तुरन्त उत्तर नहीं मिलता। जब आप बोल रहे होते हैं, तब यीशु सुन रहा होता है। यदि वह उत्तर देने में देर करता है, तो केवल बुद्धिमानी के कारणों से, और यह परखने के लिए कि आप गंभीर हैं या नहीं। उत्तर अवश्य आएगा। चाहे विलम्ब हो, उसकी बाट जोहते रहिए। वह अवश्य आएगा। हे पाठक, यदि आपमें उद्धार पाने की कुछ भी इच्छा है, तो वह सलाह स्मरण रखिए जो मैंने आज आपको दी है। उस पर सच्चाई और सच्चे मन से चलिए, और आपका उद्धार होगा।
अन्त में मैं उनसे कहना चाहता हूँ जो प्रार्थना करते हैं। मुझे आशा है कि इस पत्रिका को पढ़नेवालों में से कुछ भली-भाँति जानते हैं कि प्रार्थना क्या है, और उनमें लेपालकपन का आत्मा है। ऐसे सब लोगों को मैं भाईचारे की कुछ सलाह और प्रोत्साहन के शब्द देता हूँ। तम्बू में चढ़ाया जानेवाला धूप
जे. सी. राइल एक विशेष रीति से बनाने की आज्ञा दी गई थी। हर प्रकार का धूप नहीं चल सकता था। आइए, हम यह स्मरण रखें, और अपनी प्रार्थनाओं की विषय-वस्तु और रीति के विषय में सावधान रहें।
प्रार्थना करनेवाले भाइयो, यदि मैं मसीही के हृदय के विषय में कुछ भी जानता हूँ, तो आप अपनी ही प्रार्थनाओं से प्रायः उकता जाते हैं। प्रेरित के इन शब्दों को, "जब मैं भलाई करना चाहता हूँ, तो बुराई मेरे पास आती है," आप कभी-कभी घुटनों के बल उतनी गहराई से समझते हैं जितना और कहीं नहीं। (रोमियों 7:21।) आप दाऊद के इन शब्दों को समझ सकते हैं, "मैं दुचित्ते मनुष्यों से बैर रखता हूँ।" (भजन संहिता 119:113।) आप उस दीन मन फिराए हुए हॉटेंटॉट के साथ सहानुभूति रख सकते हैं जिसे प्रार्थना करते हुए सुना गया, "हे प्रभु, मुझे मेरे सब शत्रुओं से छुड़ा, और सबसे बढ़कर उस बुरे मनुष्य से—अर्थात् मुझ से।" परमेश्वर की सन्तानों में थोड़े ही ऐसे हैं जो प्रार्थना के समय को प्रायः संघर्ष का समय न पाते हों। जब शैतान हमें घुटनों के बल देखता है, तो उसका क्रोध हम पर विशेष रूप से भड़कता है। फिर भी मेरा विश्वास है कि जिन प्रार्थनाओं में हमें कोई कष्ट नहीं होता, उन्हें बड़े सन्देह की दृष्टि से देखना चाहिए। मेरा विश्वास है कि हम अपनी प्रार्थनाओं की भलाई के बहुत ही कंगाल न्यायी हैं, और जो प्रार्थना हमें सबसे कम भाती है, वही प्रायः परमेश्वर को सबसे अधिक भाती है। इसलिए मसीही संग्राम के एक साथी के रूप में मुझे अनुमति दीजिए कि मैं प्रोत्साहन के कुछ शब्द कहूँ। एक बात तो कम से कम हम सब अनुभव करते हैं: हमें प्रार्थना करनी ही है। हम इसे छोड़ नहीं सकते। हमें आगे बढ़ते जाना है।
इसलिए मैं आपके ध्यान में प्रार्थना में श्रद्धा और दीनता का महत्त्व रखता हूँ। हम कभी न भूलें कि हम क्या हैं, और परमेश्वर से बात करना कितनी गम्भीर बात है। हम सावधान रहें कि लापरवाही और हल्केपन के साथ उसकी उपस्थिति में न दौड़ पड़ें। हम अपने आप से कहें: "मैं पवित्र भूमि पर हूँ। यह तो स्वर्ग का द्वार ही है। यदि मैं जो कहता हूँ उसे मन से नहीं कहता, तो मैं परमेश्वर से खिलवाड़ कर रहा हूँ। यदि मैं अपने मन में अधर्म को देखता रहूँ, तो प्रभु मेरी न सुनेगा।" (निर्गमन 3:5; उत्पत्ति 28:17; भजन संहिता 66:18।) हम सुलैमान के इन शब्दों को स्मरण रखें, "बातें करने में उतावली न करना, और न अपने मन से कोई बात उतावली से परमेश्वर के सामने निकालना, क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में हैं और तू पृथ्वी पर है।" (सभोपदेशक 5:2।) जब अब्राहम परमेश्वर से बोला, तो उसने कहा, "मैं मिट्टी और राख हूँ।" जब अय्यूब परमेश्वर से बोला, तो उसने कहा, "मैं तो तुच्छ हूँ।" हम भी वैसा ही करें। (उत्पत्ति 18:27; अय्यूब 40:4।)
मैं आपके सामने आत्मिक रीति से प्रार्थना करने का महत्त्व रखता हूँ। इससे मेरा तात्पर्य यह है कि हम सदा यत्न करें कि सीधा
प्रार्थना का आह्वान — हमारी प्रार्थनाओं में आत्मा की सहायता लें, और सब बातों से बढ़कर औपचारिकता से सावधान रहें। कोई भी वस्तु इतनी आत्मिक नहीं कि वह केवल रीति न बन जाए, और निजी प्रार्थना के विषय में यह विशेष रूप से सच है। हम अनजाने ही सबसे उपयुक्त शब्दों का प्रयोग करने और पवित्रशास्त्र के अनुकूल सबसे उत्तम विनतियाँ करने की आदत में पड़ सकते हैं, फिर भी यह सब बिना हृदय की अनुभूति के रटे-रटाए ढंग से करते हैं, और प्रतिदिन उसी घिसे-पिटे मार्ग पर चलते रहते हैं। मैं इस बात को सावधानी और कोमलता से छूना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ कि कुछ बातें ऐसी हैं जो हमें प्रतिदिन चाहिए, और इन्हें एक ही शब्दों में माँगना अनिवार्य रूप से औपचारिक नहीं है। संसार, शैतान और हमारे मन प्रतिदिन वैसे ही रहते हैं। इसलिए हमें आवश्यक रूप से प्रतिदिन पुरानी भूमि पर चलना ही पड़ता है। परन्तु मैं यह कहता हूँ कि इस विषय में हमें बहुत सावधान रहना चाहिए। यदि हमारी प्रार्थनाओं का ढाँचा और रूपरेखा आदत के कारण लगभग रीति ही बन गई हो, तो हम यत्न करें कि हमारी प्रार्थनाओं का पहनावा और उनकी भराई यथासम्भव आत्मा की ओर से हो। जहाँ तक अपनी निजी भक्ति में किसी पुस्तक से प्रार्थना करने की बात है, यह ऐसी आदत है जिसकी मैं प्रशंसा नहीं कर सकता। यदि हम अपने वैद्यों को अपने शरीर की दशा बिना किसी पुस्तक के बता सकते हैं, तो हमें परमेश्वर को अपनी आत्मा की दशा भी बता सकना चाहिए। जब कोई टूटे हुए अंग से स्वस्थ हो रहा हो तो उसके बैसाखियाँ लेने में मुझे कोई आपत्ति नहीं। बैसाखी का प्रयोग करना बिलकुल न चलने से अच्छा है। परन्तु यदि मैं उसे जीवन भर बैसाखियों पर देखूँ, तो मैं इसे बधाई की बात न समझूँगा। मैं तो उसे इतना बलवन्त देखना चाहूँगा कि वह अपनी बैसाखियाँ फेंक दे।
मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि प्रार्थना को जीवन का नियमित कार्य बना लेना कितना महत्त्वपूर्ण है। मैं दिन में प्रार्थना के लिए निश्चित समयों के मूल्य के विषय में भी कुछ कह सकता हूँ। परमेश्वर व्यवस्था का परमेश्वर है। यहूदी मन्दिर में सुबह और सन्ध्या के बलिदान के जो समय ठहराए गए थे, वे बिना अर्थ के नहीं ठहराए गए थे। अव्यवस्था पाप के सबसे प्रत्यक्ष फलों में से एक है। फिर भी मैं किसी को बन्धन में नहीं डालना चाहता। मैं केवल इतना कहता हूँ कि आपकी आत्मा के स्वास्थ्य के लिए यह अत्यावश्यक है कि प्रार्थना करना आपके जीवन के प्रत्येक चौबीस घण्टे के कार्य का एक अंग हो। जैसे आप खाने, सोने और कामकाज के लिए समय निर्धारित करते हैं, वैसे ही प्रार्थना के लिए भी समय निर्धारित करें। अपने घण्टे और समय आप ही चुनें। कम से कम इतना तो करें कि सुबह संसार से बात करने से पहले परमेश्वर से बात करें, और रात को संसार के काम से निपटने के बाद परमेश्वर से बात करें। परन्तु अपने मन में यह बात पक्की कर लें कि प्रार्थना करना प्रत्येक दिन के बड़े कामों में से एक है। इसे किसी कोने में न धकेलें। इसे अपने कर्तव्य के बचे-खुचे टुकड़ों और छीलनों पर न छोड़ें। आप और जिस किसी काम को भी अपना मुख्य कार्य बनाएँ, प्रार्थना को अपना मुख्य कार्य बनाएँ।
जे. सी. राइल — आप और जिस किसी काम को भी अपना मुख्य कार्य बनाएँ, प्रार्थना को अपना मुख्य कार्य बनाएँ।
मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि प्रार्थना में अन्त तक स्थिर रहना कितना महत्त्वपूर्ण है। एक बार यह आदत आरम्भ कर लेने के बाद उसे कभी न छोड़ें। आपका मन कभी-कभी कहेगा, "तुमने पारिवारिक प्रार्थना तो कर ली है; यदि निजी प्रार्थना न की जाए तो कौन-सी बड़ी हानि हो जाएगी?" आपका शरीर कभी-कभी कहेगा, "तुम अस्वस्थ हो, या नींद में हो, या थके हो; तुम्हें प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं।" आपका मन कभी-कभी कहेगा, "आज तुम्हें आवश्यक काम निपटाने हैं; अपनी प्रार्थना छोटी कर दो।" ऐसे सब सुझावों को सीधे शैतान की ओर से आया हुआ समझें। ये सब यही कहने के बराबर हैं कि "अपनी आत्मा की उपेक्षा करो।" मैं यह नहीं कहता कि प्रार्थनाएँ सदा एक ही लम्बाई की हों; परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि कोई बहाना आपसे प्रार्थना न छुड़वाए। पौलुस ने कहा, "प्रार्थना में लगे रहो" और "निरन्तर प्रार्थना करो।" (कुलुस्सियों 4:2; 1 थिस्सलुनीकियों 5:17।) उसका अर्थ यह नहीं था कि लोग सदा घुटनों पर ही रहें, परन्तु उसका अर्थ यह अवश्य था कि हमारी प्रार्थनाएँ नित्य होमबलि के समान हों, जो प्रत्येक दिन स्थिरता से बनी रहे; कि वे बीज बोने और कटनी के समय, और ग्रीष्म और शीत ऋतु के समान हों, जो नियत समयों पर निरन्तर लौटती रहती हैं; कि वे वेदी की आग के समान हों, जो सदा बलिदानों को भस्म नहीं करती, पर कभी पूरी तरह बुझती भी नहीं। यह कभी न भूलें कि आप दिन भर छोटी-छोटी संक्षिप्त प्रार्थनाओं की अटूट कड़ी से सुबह और सन्ध्या की भक्ति को जोड़ सकते हैं। संगति में, या कामकाज में, या सड़कों पर भी, आप परमेश्वर के पास चुपचाप छोटे-छोटे पंखधारी सन्देशवाहक भेज सकते हैं, जैसे नहेम्याह ने अर्तक्षत्र के सामने ही किया था। (नहेम्याह 2:4।) और कभी यह न सोचें कि जो समय परमेश्वर को दिया गया वह व्यर्थ गया। विश्रामदिन मानने से किसी जाति के सात वर्षों में से एक वर्ष के कार्य-दिवस खो जाते हैं, फिर भी वह जाति इससे निर्धन नहीं हो जाती। प्रार्थना में अन्त तक स्थिर रहने से मसीही अन्त में कभी हानि में नहीं रहता।
मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि प्रार्थना में गम्भीरता कितनी महत्त्वपूर्ण है। ऐसा नहीं कि अपनी गम्भीरता प्रमाणित करने के लिए किसी को चिल्लाना, चीखना या बहुत ऊँचे स्वर में बोलना चाहिए। परन्तु यह वांछनीय है कि हम सच्चे मन से, उत्साह और गर्मजोशी से माँगें, मानो हमें अपने किए हुए कार्य में वास्तव में रुचि हो। यह "धर्मी जन की प्रार्थना" का "प्रभाव" है जो "बहुत कुछ कर सकती है।" (याकूब 5:16।) पवित्रशास्त्र में प्रार्थना के विषय में जो वाक्यांश आए हैं, उनसे हमें यही शिक्षा मिलती है। उसे "पुकारना, खटखटाना,
प्रार्थना का आह्वान — मल्लयुद्ध करना, परिश्रम करना, यत्न करना" कहा गया है। पवित्रशास्त्र के उदाहरणों से भी हमें यही शिक्षा मिलती है। याकूब इसका एक उदाहरण है। उसने पनीएल में स्वर्गदूत से कहा, "जब तक तू मुझे आशीष न दे तब तक मैं तुझे जाने न दूँगा।" (उत्पत्ति 32:26।) दानिय्येल एक और उदाहरण है। सुनिए उसने परमेश्वर से कैसे विनती की: "हे प्रभु, सुन ले; हे प्रभु, क्षमा कर; हे प्रभु, ध्यान दे और ऐसा ही कर, विलम्ब न कर; हे मेरे परमेश्वर, अपने ही निमित्त।" (दानिय्येल 9:19।) हमारे प्रभु यीशु मसीह भी एक उदाहरण हैं। उनके विषय में लिखा है, "उसने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊँचे शब्द से पुकार-पुकारकर, और आँसू बहा-बहाकर प्रार्थनाएँ और विनती की।" (इब्रानियों 5:7।) हाय, यह हमारी बहुत-सी विनतियों से कितना भिन्न है! उनकी तुलना में वे कितनी फीकी और गुनगुनी लगती हैं। परमेश्वर हममें से बहुतों से सचमुच कह सकता है, "तुम जो माँगते हो वह वास्तव में चाहते ही नहीं।" आइए हम इस दोष को सुधारने का यत्न करें। आइए हम अनुग्रह के द्वार को ऊँचे स्वर से खटखटाएँ, जैसे "पिलग्रिम्स प्रोग्रेस" में दया ने खटखटाया था, मानो यदि हमारी न सुनी गई तो हम नाश हो जाएँगे। आइए हम अपने मन में यह बात पक्की कर लें कि ठण्डी प्रार्थनाएँ बिना आग का बलिदान हैं। आइए हम महान वक्ता डेमोस्थनीज़ की कथा को स्मरण करें, जब कोई उसके पास अपना मुकद्दमा लड़वाने के लिए आया। उसने उसकी बात बिना ध्यान दिए सुनी, क्योंकि वह अपनी कहानी बिना गम्भीरता के सुना रहा था। उस मनुष्य ने यह देखा, और व्याकुल होकर चिल्ला उठा कि यह सब सच है। "अब," डेमोस्थनीज़ ने कहा, "मैं तुम्हारा विश्वास करता हूँ।"
मैं आपको विश्वास के साथ प्रार्थना करने का महत्व सुझाता हूँ। हमें यह विश्वास करने का यत्न करना चाहिए कि हमारी प्रार्थनाएँ सुनी जाती हैं, और यदि हम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार माँगें तो हमें उत्तर मिलेगा। हमारे प्रभु यीशु मसीह की यही स्पष्ट आज्ञा है: "जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो तो विश्वास कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।" (मरकुस 11:24।) प्रार्थना के लिये विश्वास वैसा ही है जैसा तीर के लिये पंख: इसके बिना प्रार्थना निशाने पर नहीं लगती। हमें अपनी प्रार्थनाओं में प्रतिज्ञाओं को सामने रखकर विनती करने की आदत डालनी चाहिए।
हमें अपने साथ कुछ प्रतिज्ञाएँ लेकर कहना चाहिए, "हे प्रभु, यह तेरा अपना वचन है जो तूने दे रखा है। जैसा तूने कहा है वैसा ही हमारे लिये कर।" याकूब, मूसा और दाऊद की यही आदत थी। भजन संहिता 119 ऐसी बातों से भरा है जो "तेरे वचन के अनुसार" माँगी गई हैं। सबसे बढ़कर, हमें अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर की आशा रखने की आदत डालनी चाहिए। हमें उस व्यापारी के समान करना चाहिए जो अपने जहाज़ समुद्र में भेजता है। जब तक हमें कोई प्रतिफल न दिखाई दे, हमें सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए। हाय, ऐसे थोड़े ही विषय हैं जिनमें मसीही इतने पीछे रह जाते हैं जितना इसमें। यरूशलेम की कलीसिया ने बन्दीगृह में पड़े पतरस के लिये निरन्तर प्रार्थना की; पर जब प्रार्थना का उत्तर मिला, तो उन्हें उस पर मुश्किल से विश्वास हुआ।
(प्रेरितों के काम 12:15।) रॉबर्ट ट्रेल का यह कथन गम्भीर है, "प्रार्थना में ओछेपन का इससे निश्चित चिह्न कोई नहीं कि लोग इसकी परवाह न करें कि प्रार्थना में उन्हें क्या मिलता है।" मैं आपको प्रार्थना में साहस का महत्व सुझाता हूँ। कुछ लोगों की प्रार्थनाओं में एक अनुचित घनिष्ठता होती है जिसकी मैं प्रशंसा नहीं कर सकता। परन्तु पवित्र साहस भी कोई वस्तु है, जो अत्यन्त वांछनीय है। मेरा तात्पर्य मूसा जैसे साहस से है, जब वह परमेश्वर से विनती करता है कि इस्राएल को नाश न करे। वह कहता है, "मिस्री लोग यह क्यों कहने पाएँ कि वह बुरे अभिप्राय से, अर्थात् उन्हें पहाड़ों में घात करके धरती पर से मिटा डालने की मनसा से उनको निकाल ले गया? तू अपने भड़के हुए क्रोध से शान्त हो।" (निर्गमन 32:12।) मेरा तात्पर्य यहोशू जैसे साहस से भी है, जब इस्राएली ऐ के लोगों के सामने हार गए: वह कहता है, "तू अपने बड़े नाम के लिये क्या करेगा?" (यहोशू 7:9।) लूथर इसी साहस के लिये प्रसिद्ध था। उसे प्रार्थना करते सुनने वाले एक व्यक्ति ने कहा, "उसके शब्दों में कैसा आत्मा, कैसा भरोसा था। वह ऐसे आदर के साथ विनती करता था जैसे कोई परमेश्वर से भीख माँग रहा हो, और फिर भी ऐसी आशा और निश्चयता के साथ, मानो वह किसी प्रेमी पिता या मित्र से बात कर रहा हो।" यही वह साहस है जिससे सत्रहवीं शताब्दी का स्कॉटलैंड का महान धर्मशास्त्री ब्रूस पहचाना जाता था। कहा जाता है कि उसकी प्रार्थनाएँ "स्वर्ग की ओर छोड़े गए तीरों के समान" थीं। इसमें भी मुझे भय है कि हम बहुत पीछे रह जाते हैं। हम विश्वासी के विशेषाधिकारों को पर्याप्त रूप से नहीं समझते। हम उतनी बार यह कहकर विनती नहीं करते जितनी बार कर सकते थे, "हे प्रभु, क्या हम तेरे अपने लोग नहीं हैं? क्या यह तेरी महिमा के लिये नहीं कि हम पवित्र किए जाएँ? क्या यह तेरे आदर के लिये नहीं कि तेरे सुसमाचार की बढ़ती हो?"
मैं आपको प्रार्थना में परिपूर्णता का महत्व सुझाता हूँ। मैं यह नहीं भूलता कि हमारा प्रभु हमें फरीसियों के उदाहरण से सावधान करता है, जो दिखावे के लिये लम्बी प्रार्थनाएँ करते थे; और आज्ञा देता है कि प्रार्थना करते समय व्यर्थ दोहराव न करें। परन्तु दूसरी ओर मैं यह भी नहीं भूल सकता कि उसने सारी रात परमेश्वर से प्रार्थना करते बिताकर लम्बी और विस्तृत आराधना को अपनी स्वीकृति दी है। किसी भी दशा में, आज के दिनों में हमारे बहुत अधिक प्रार्थना करने की भूल करने की सम्भावना नहीं है। क्या यह भय करना अधिक उचित नहीं कि इस पीढ़ी के बहुत से विश्वासी बहुत कम प्रार्थना करते हैं? क्या बहुत से मसीही जितना समय प्रार्थना को देते हैं, वह कुल मिलाकर बहुत थोड़ा नहीं है? मुझे डर है कि इन प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर नहीं दिया जा सकता। मुझे डर है कि बहुतों की निजी
प्रार्थना-जीवन दुखद रूप से अल्प और सीमित हैं; बस इतना कि यह प्रमाणित हो कि वे जीवित हैं, इससे अधिक नहीं। लगता है कि उन्हें परमेश्वर से बहुत कम चाहिए। उन्हें मानो बहुत कम अंगीकार करना है, बहुत कम माँगना है, और बहुत कम के लिये उसका धन्यवाद करना है। हाय, यह सर्वथा गलत है। विश्वासियों को यह शिकायत करते सुनना अत्यन्त सामान्य है कि वे आगे नहीं बढ़ते। वे हमसे कहते हैं कि वे अनुग्रह में उतना नहीं बढ़ते जितना वे चाहते हैं। क्या यह सन्देह करना अधिक उचित नहीं कि बहुतों के पास उतना अनुग्रह है जितना उन्होंने माँगा? क्या बहुतों का सच्चा हाल यह नहीं कि उनके पास थोड़ा है, क्योंकि वे थोड़ा माँगते हैं? उनकी दुर्बलता का कारण उनकी अपनी बौनी, कटी-छँटी, सिकुड़ी, हड़बड़ी वाली, संकुचित और तुच्छ प्रार्थनाओं में मिलता है। उनके पास इसलिये नहीं है कि वे माँगते नहीं। ओह, हम मसीह में तंग नहीं हैं, परन्तु अपने आप में तंग हैं। प्रभु कहता है, "तू अपना मुँह पसार, मैं उसे भर दूँगा।" (भजन संहिता 81:10।) परन्तु हम इस्राएल के उस राजा के समान हैं जिसने भूमि पर तीन बार मारा और रुक गया, जबकि उसे पाँच या छः बार मारना चाहिए था। (2 राजाओं 13:14-19।)
मैं आपको प्रार्थना में विशिष्टता का महत्व सुझाता हूँ। हमें सामान्य विनतियों से सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए। हमें अनुग्रह के सिंहासन के सामने अपनी आवश्यकताओं को स्पष्ट बताना चाहिए। केवल यह मान लेना पर्याप्त नहीं कि हम पापी हैं; हमें उन पापों के नाम लेने चाहिए जिनके विषय में हमारा विवेक हमें बताता है कि हम सबसे अधिक दोषी हैं। केवल पवित्रता माँगना पर्याप्त नहीं; हमें उन गुणों के नाम लेने चाहिए जिनमें हम सबसे अधिक कमी अनुभव करते हैं। केवल प्रभु से यह कहना पर्याप्त नहीं कि हम संकट में हैं; हमें अपना संकट और उसकी सब विशेषताएँ बतानी चाहिए। याकूब ने यही किया जब उसे अपने भाई एसाव का भय था। वह परमेश्वर को ठीक-ठीक बताता है कि वह किस बात से डरता है। (उत्पत्ति 32:11।) एलीएजेर ने यही किया, जब उसने अपने स्वामी के पुत्र के लिये पत्नी ढूँढ़ी। वह परमेश्वर के सामने ठीक वही रखता है जिसकी उसे आवश्यकता है। (उत्पत्ति 24:12।) पौलुस ने भी यही किया जब उसके शरीर में एक काँटा चुभाया गया। उसने प्रभु से विनती की। (2 कुरिन्थियों 12:8।) यही सच्चा विश्वास और भरोसा है। हमें विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर के सामने नाम लेने के लिये कोई बात इतनी छोटी नहीं। उस रोगी के विषय में हम क्या सोचेंगे जो अपने चिकित्सक से कहे कि वह बीमार है, पर ब्योरे में कभी न जाए? उस पत्नी के विषय में हम क्या सोचेंगे जो अपने पति से कहे कि वह दुःखी है, पर कारण न बताए? उस बच्चे के विषय में हम क्या सोचेंगे जो अपने पिता से कहे कि वह संकट में है, पर इससे अधिक कुछ न कहे? मसीह आत्मा का सच्चा दूल्हा है, हृदय का सच्चा चिकित्सक है, और
जे. सी. राइल — अपने सब लोगों का सच्चा पिता। आइए हम यह दिखाएँ कि हम इसका अनुभव करते हैं, और उसके साथ अपनी बातचीत में कुछ न छिपाएँ। हम उससे कोई भेद न छिपाएँ। हम अपने मन की सारी बातें उसे बता दें।
मैं तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में मध्यस्थता की प्रार्थना के महत्त्व की सिफ़ारिश करता हूँ। हम सब स्वभाव से स्वार्थी हैं, और हमारा स्वार्थ हमारे मन फिराने के बाद भी हमसे चिपका रहता है। हममें यह प्रवृत्ति रहती है कि हम केवल अपनी आत्मा, अपने आत्मिक संघर्षों और अपनी धार्मिक उन्नति के विषय में सोचें, और दूसरों को भूल जाएँ। इस प्रवृत्ति के विरुद्ध हम सबको चौकसी करने और संघर्ष करने की आवश्यकता है, और अपनी प्रार्थनाओं में तो विशेष रूप से। हमें सार्वजनिक भावना रखने का अभ्यास करना चाहिए। हमें अनुग्रह के सिंहासन के सामने अपने नाम के अतिरिक्त दूसरों के नाम भी लेने के लिए अपने आप को उभारना चाहिए। हमें सारे संसार को अपने हृदय में रखने का यत्न करना चाहिए: अन्यजातियों को, यहूदियों को, रोमन कैथोलिकों को, सच्चे विश्वासियों की देह को, प्रोटेस्टेंट होने का दावा करनेवाली कलीसियाओं को, जिस देश में हम रहते हैं उसे, जिस मण्डली के हम सदस्य हैं उसे, जिस घराने में हम ठहरे हैं उसे, और जिन मित्रों और सम्बन्धियों से हम जुड़े हैं उन्हें। इनमें से प्रत्येक के लिए और सबके लिए हमें बिनती करनी चाहिए। यही सबसे ऊँचा प्रेम है। जो मुझसे अपनी प्रार्थनाओं में प्रेम करते हैं, वे मुझसे सबसे अधिक प्रेम करते हैं। यह हमारी आत्मा के स्वास्थ्य के लिए है। यह हमारी सहानुभूति को बढ़ाता है और हमारे हृदय को विशाल करता है। यह कलीसिया की भलाई के लिए है। सुसमाचार को फैलाने के सारे साधनों के पहिये प्रार्थना से ही घूमते हैं। जो पहाड़ पर मूसा के समान मध्यस्थता की प्रार्थना करते हैं, वे प्रभु के काम के लिए उतना ही करते हैं जितना वे जो यहोशू के समान घमासान युद्ध में लड़ते हैं। यही मसीह के समान होना है। वह अपने लोगों के नाम अपने महायाजक के रूप में पिता के सामने धारण किए हुए है। आह, यीशु के समान होने का कैसा सौभाग्य है! यही सेवकों का सच्चा सहायक होना है। यदि मुझे कोई मण्डली चुननी हो, तो मुझे वह मण्डली दीजिए जो प्रार्थना करती है।
मैं तुम्हें प्रार्थना में धन्यवाद के महत्त्व की सिफ़ारिश करता हूँ। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि परमेश्वर से माँगना एक बात है और परमेश्वर की स्तुति करना दूसरी बात। परन्तु बाइबल में मुझे प्रार्थना और स्तुति के बीच ऐसा गहरा सम्बन्ध दिखाई देता है कि मैं उसे सच्ची प्रार्थना कहने का साहस नहीं कर सकता जिसमें धन्यवाद का कोई भाग न हो। यह व्यर्थ नहीं है कि पौलुस कहता है, "हर एक बात में प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।" (फिलिप्पियों 4:6)। "प्रार्थना में लगे रहो, और धन्यवाद के साथ उसमें जागृत रहो।" (कुलुस्सियों 4:2)। यह दया ही है कि हम नरक में नहीं हैं। यह दया ही है कि हमें स्वर्ग की आशा है। यह दया ही
प्रार्थना की पुकार है कि हम आत्मिक ज्योति के देश में रहते हैं। यह दया ही है कि हमें आत्मा ने बुलाया है, और हमें अपनी ही चाल का फल भोगने के लिए नहीं छोड़ा गया। यह दया ही है कि हम अब भी जीवित हैं और हमें सक्रिय रूप से या निष्क्रिय रूप से परमेश्वर की महिमा करने के अवसर मिलते हैं। निश्चय ही परमेश्वर से बातें करते समय ये विचार हमारे मन में उमड़ने चाहिए। निश्चय ही हमें उस मुफ़्त अनुग्रह के लिए, जिससे हम जीवित हैं, और उस करुणामय प्रेम के लिए, जो सदा बना रहता है, परमेश्वर को धन्य कहे बिना प्रार्थना में अपने होंठ नहीं खोलने चाहिए। कभी कोई प्रसिद्ध सन्त ऐसा नहीं हुआ जो धन्यवाद से भरा हुआ न हो। पौलुस शायद ही कोई पत्री धन्यवाद से आरम्भ किए बिना लिखता है। पिछली शताब्दी में व्हाइटफ़ील्ड और हमारे अपने समय में बिकरस्टेथ जैसे लोग धन्यवाद से भरपूर थे। हे पाठक, यदि हम अपने समय में चमकती हुई ज्योति बनना चाहते हैं, तो हमें स्तुति की आत्मा को पोसना होगा। हमारी प्रार्थनाएँ धन्यवाद-भरी प्रार्थनाएँ हों। मैं तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं पर चौकसी रखने के महत्त्व की सिफ़ारिश करता हूँ। प्रार्थना ही धर्म का वह स्थान है जहाँ तुम्हें सबसे अधिक सावधान रहना चाहिए। यहीं से सच्चा धर्म आरम्भ होता है; यहीं वह फलता-फूलता है, और यहीं वह क्षीण भी होता है। मुझे बताओ कि किसी की प्रार्थनाएँ कैसी हैं, तो मैं शीघ्र बता दूँगा कि उसकी आत्मा की दशा कैसी है। प्रार्थना आत्मिक नाड़ी है। इसी से आत्मिक स्वास्थ्य परखा जा सकता है। प्रार्थना आत्मिक मौसम-सूचक यन्त्र है। इसी से हम जान सकते हैं कि हमारे हृदयों में मौसम साफ़ है या बिगड़ा हुआ। आह, हम अपनी निजी आराधना पर निरन्तर दृष्टि रखें। हमारे व्यावहारिक मसीही जीवन का सार यहीं है। उपदेश, पुस्तकें, पर्चे, समिति-बैठकें और भले लोगों की संगति, ये सब अपनी जगह अच्छे हैं, परन्तु ये निजी प्रार्थना की उपेक्षा की पूर्ति कभी नहीं कर सकते। उन स्थानों, उस समाज और उन साथियों को भली-भाँति पहचान लो जो परमेश्वर के साथ सहभागिता के लिए तुम्हारे हृदय को अस्थिर कर देते हैं और तुम्हारी प्रार्थनाओं को बोझिल बना देते हैं। वहाँ सावधान रहो। ध्यान से देखो कि कौन-से मित्र और कौन-सा काम तुम्हारी आत्मा को सबसे अधिक आत्मिक दशा में और परमेश्वर से बातें करने के लिए सबसे अधिक तैयार छोड़ते हैं। उन्हीं से लगे रहो और उन्हें दृढ़ता से पकड़े रहो। यदि तुम अपनी प्रार्थनाओं की देखभाल करोगे, तो तुम्हारी आत्मा में कुछ भी बहुत बिगड़ नहीं सकेगा।
मैं ये बातें तुम्हारे निजी विचार के लिए प्रस्तुत करता हूँ। मैं यह पूरी दीनता से करता हूँ। मैं ऐसे किसी को नहीं जानता जिसे इन बातों की मुझसे अधिक स्मरण दिलाने की आवश्यकता हो। परन्तु मैं इन्हें परमेश्वर का अपना सत्य मानता हूँ, और मैं चाहता हूँ कि मैं और वे सब जिनसे मैं प्रेम करता हूँ, इन्हें और अधिक अनुभव करें।
जे. सी. राइल
मैं चाहता हूँ कि जिस समय में हम जी रहे हैं वह प्रार्थना का समय हो। मैं चाहता हूँ कि हमारे दिनों के मसीही प्रार्थना करनेवाले मसीही हों। मैं चाहता हूँ कि कलीसिया प्रार्थना करनेवाली कलीसिया हो। इस पर्चे को भेजते समय मेरे हृदय की अभिलाषा और प्रार्थना यह है कि प्रार्थनाशीलता की आत्मा को बढ़ावा मिले। मैं चाहता हूँ कि जिन्होंने अब तक कभी प्रार्थना नहीं की, वे उठकर परमेश्वर को पुकारें, और जो प्रार्थना करते हैं, वे यह देखें कि वे अनुचित रीति से प्रार्थना तो नहीं कर रहे।
