अध्याय 3
थियुफिलुस की ओर से औतोलिकुस के नाम।
पहली पुस्तक।
अध्याय I.--औतोलिकुस मूर्तिपूजक और मसीहियों का तिरस्कार करनेवाला।
मन से भ्रष्ट हो चुके अभागे मनुष्यों को धाराप्रवाह वाणी और सुंदर शैली आनंद देती है, और ऐसी प्रशंसा भी जिससे घमंड प्रसन्न होता है; सत्य का प्रेमी अलंकृत भाषणों पर ध्यान नहीं देता, परन्तु भाषण के वास्तविक विषय को परखता है कि वह क्या है और कैसा है। सो हे मेरे मित्र, तुमने अपने काठ और पत्थर के, हथौड़े से गढ़े, ढाले हुए, तराशे और खोदे हुए देवताओं पर घमंड करते हुए, जो न देखते हैं न सुनते हैं, क्योंकि वे मूर्तियाँ और मनुष्यों के हाथों की कारीगरी हैं, मुझ पर खोखले शब्दों से आक्रमण किया है; और इसके अतिरिक्त, तुम मुझे मसीही कहते हो, मानो यह धारण करने के लिए कोई निंदनीय नाम हो; मैं तो स्वीकार करता हूँ कि मैं मसीही हूँ,[1] और परमेश्वर के प्रिय इस नाम को धारण करता हूँ, इस आशा से कि परमेश्वर के काम आ सकूँ।[2] क्योंकि ऐसा नहीं है जैसा तुम समझते हो कि परमेश्वर का नाम धारण करना कठिन है; परन्तु संभव है कि तुम परमेश्वर के विषय में यह धारणा इसलिए रखते हो कि तुम स्वयं अभी तक उसके काम के नहीं हो।
अध्याय II.--परमेश्वर को देखने से पहले आत्मा की आँखों का शुद्ध किया जाना आवश्यक है।
परन्तु यदि तुम कहो, "अपना परमेश्वर मुझे दिखा," तो मैं उत्तर दूँगा, "तू अपने आप को मुझे दिखा,[3] और मैं तुझे अपना परमेश्वर दिखाऊँगा।" सो दिखा कि तेरी आत्मा की आँखें देखने में सक्षम हैं और तेरे हृदय के कान सुनने में समर्थ हैं; क्योंकि जैसे शरीर की आँखों से देखनेवाले पृथ्वी की वस्तुओं और इस जीवन से संबंधित बातों को देखते हैं, और साथ ही भिन्न वस्तुओं में भेद करते हैं, चाहे प्रकाश हो या अंधकार, श्वेत हो या श्याम, कुरूप हो या सुंदर, सुडौल और समानुपाती हो या बेडौल और भद्दा, या विकृत अथवा अंगहीन; और जैसे उसी प्रकार श्रवण-इंद्रिय से भी हम तीखे, गहरे या मधुर स्वरों में भेद करते हैं; वैसे ही आत्मा की आँखों और हृदय के कानों के विषय में भी सत्य है कि उन्हीं के द्वारा हम परमेश्वर को देख सकते हैं। क्योंकि परमेश्वर उन्हें दिखाई देता है जो उसे देखने के योग्य किए गए हैं, जब उनकी आत्मा की आँखें खोल दी जाती हैं: क्योंकि सबके पास आँखें हैं; परन्तु कुछ की आँखों पर परदा पड़ा है[4] और वे सूर्य का प्रकाश नहीं देखते। फिर भी अंधे नहीं देखते, इसलिए यह नहीं निकलता कि सूर्य का प्रकाश नहीं चमकता; परन्तु अंधे अपने आप को और अपनी आँखों को दोष दें। वैसे ही हे मनुष्य, तेरी आत्मा की आँखों पर तेरे पापों और बुरे कामों का परदा पड़ा है। जैसे चमकाया हुआ दर्पण, वैसे ही मनुष्य को अपनी आत्मा शुद्ध रखनी चाहिए। जब दर्पण पर जंग लगा हो, तब मनुष्य का मुख दर्पण में दिखाई देना संभव नहीं; वैसे ही जब मनुष्य में पाप होता है, तब ऐसा मनुष्य परमेश्वर को नहीं देख सकता।
इसलिए तुम अपने आप को मुझे दिखाओ कि तुम व्यभिचारी, या लंपट, या चोर, या डाकू, या उचक्के नहीं हो; कि तुम लड़कों को भ्रष्ट नहीं करते; कि तुम उद्दंड, या निंदक, या क्रोधी, या ईर्ष्यालु, या घमंडी, या अहंकारी नहीं हो; कि तुम झगड़ालू, या लालची, या माता-पिता की आज्ञा न माननेवाले नहीं हो; और कि तुम अपने बच्चों को बेचते नहीं हो; क्योंकि जो ऐसे काम करते हैं उन पर परमेश्वर प्रकट नहीं होता, जब तक वे पहले अपने आप को सब अशुद्धता से शुद्ध न कर लें। सो ये सब बातें तुम्हें अंधकार में डाल देती हैं, जैसे आँखों पर झिल्लीदार स्राव मनुष्य को सूर्य का प्रकाश देखने से रोकता है; वैसे ही हे मनुष्य, अधर्म के काम तुम्हें अंधकार में डाल देते हैं, ऐसे कि तुम परमेश्वर को नहीं देख सकते।
अध्याय III.--परमेश्वर का स्वभाव।
तब तुम मुझसे कहोगे, "तुम जो परमेश्वर को देखते हो, मुझे परमेश्वर का रूप समझाओ।" हे मनुष्य, सुनो। परमेश्वर का रूप अवर्णनीय और अकथनीय है, और शरीर की आँखों से देखा नहीं जा सकता। क्योंकि वह महिमा में अगम्य है, महानता में अथाह है, ऊँचाई में अकल्पनीय है, सामर्थ्य में अतुलनीय है, बुद्धि में
अद्वितीय है, भलाई में अनुपम है, कृपा में अवर्णनीय है। क्योंकि यदि मैं उसे ज्योति कहूँ, तो मैं केवल उसकी अपनी रचना का नाम लेता हूँ; यदि उसे वचन कहूँ, तो केवल उसकी प्रभुता का नाम लेता हूँ; यदि उसे मन कहूँ, तो केवल उसकी बुद्धि की बात करता हूँ; यदि उसे आत्मा कहूँ, तो उसके श्वास की बात करता हूँ; यदि उसे बुद्धि कहूँ, तो उसकी संतान की बात करता हूँ; यदि उसे बल कहूँ, तो उसके अधिकार की बात करता हूँ; यदि उसे सामर्थ्य कहूँ, तो उसकी क्रियाशीलता का उल्लेख करता हूँ; यदि पूर्वदृष्टि (प्रोविडेंस) कहूँ, तो केवल उसकी भलाई का उल्लेख करता हूँ; यदि उसे राज्य कहूँ, तो केवल उसकी महिमा का उल्लेख करता हूँ; यदि उसे प्रभु कहूँ, तो उसके न्यायी होने का उल्लेख करता हूँ; यदि उसे न्यायी कहूँ, तो उसके धर्मी होने की बात करता हूँ; यदि उसे पिता कहूँ, तो सब वस्तुओं के उसी से होने की बात करता हूँ;[1] यदि उसे अग्नि कहूँ, तो केवल उसके क्रोध का उल्लेख करता हूँ। तब तुम मुझसे कहोगे, "क्या परमेश्वर क्रोध करता है?" हाँ; जो दुष्टता करते हैं उन पर वह क्रोधित होता है, परन्तु जो उससे प्रेम करते और उसका भय मानते हैं उनके प्रति वह भला, कृपालु और दयालु है; क्योंकि वह भक्तों का अनुशासन करनेवाला[1] और धर्मियों का पिता है; परन्तु वह अभक्तों का न्यायी और दंड देनेवाला है।
अध्याय IV.--परमेश्वर के गुण।
और वह अनादि है, क्योंकि वह अजन्मा है; और वह अपरिवर्तनीय है, क्योंकि वह अमर है। और वह परमेश्वर [<greek>Qeos</greek>] कहलाता है, क्योंकि उसने सब वस्तुओं को अपने ही द्वारा दी गई सुरक्षा पर स्थापित किया है [<greek>teqeikenai</greek>]; और [<greek>qeein</greek>] के कारण भी, क्योंकि <greek>qeein</greek> का अर्थ है दौड़ना, गति करना, सक्रिय होना, पालन-पोषण करना, पूर्वदृष्टि रखना, शासन करना, और सब वस्तुओं को जीवित करना। परन्तु वह प्रभु है, क्योंकि वह सृष्टि पर शासन करता है; पिता है, क्योंकि वह सब वस्तुओं से पहले है; रचयिता और निर्माता है, क्योंकि वह विश्व का सृजनहार और बनानेवाला है; परमप्रधान है, क्योंकि वह सबके ऊपर है; और सर्वशक्तिमान है, क्योंकि वह स्वयं सबको शासित करता और सबको समेटे हुए है। क्योंकि आकाश की ऊँचाइयाँ, और अथाह गहराइयों की तलहटियाँ, और पृथ्वी की छोर उसके हाथ में हैं, और उसके विश्राम का कोई स्थान नहीं। क्योंकि आकाश उसका काम है, पृथ्वी उसकी सृष्टि है, समुद्र उसके हाथ की कारीगरी है; मनुष्य उसकी रचना और उसका स्वरूप है; सूर्य, चंद्रमा और तारे उसके तत्त्व हैं, जो चिह्नों, ऋतुओं, दिनों और वर्षों के लिए बनाए गए हैं, ताकि वे मनुष्य की सेवा करें और उसके दास बनें; और परमेश्वर ने सब कुछ अभाव से भाव में बनाया,[3] ताकि उसके कामों के द्वारा उसकी महानता जानी और समझी जाए।
अध्याय V.--अदृश्य परमेश्वर अपने कामों के द्वारा जाना जाता है।
क्योंकि जैसे मनुष्य में आत्मा दिखाई नहीं देती, वह मनुष्यों के लिए अदृश्य है, पर शरीर की गति से पहचानी जाती है, वैसे ही परमेश्वर मानवीय आँखों से तो नहीं देखा जा सकता, परन्तु अपनी पूर्वदृष्टि (प्रोविडेंस) और कामों के द्वारा देखा और पहचाना जाता है। क्योंकि जैसे कोई मनुष्य समुद्र पर पाल चढ़ाए, सुसज्जित जहाज़ को बंदरगाह की ओर बढ़ते देखकर निःसंदेह अनुमान लगाएगा कि उसमें कोई कर्णधार है जो उसे चला रहा है; वैसे ही हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर सारे विश्व का शासक [कर्णधार] है, यद्यपि वह शरीर की आँखों को दिखाई नहीं देता, क्योंकि वह अगम्य है। क्योंकि यदि मनुष्य सूर्य को, जो एक बहुत छोटा आकाशीय पिंड है, उसकी अत्यधिक गर्मी और सामर्थ्य के कारण नहीं देख सकता, तो नश्वर मनुष्य परमेश्वर की अकथनीय महिमा का सामना करने में कितना अधिक असमर्थ न होगा? क्योंकि जैसे अनार, अपने ऊपर के छिलके के साथ, भीतर अनेक कोठरियाँ और खंड रखता है जो झिल्लियों से अलग किए गए हैं, और उसमें अनेक बीज भी रहते हैं; वैसे ही सारी सृष्टि परमेश्वर के आत्मा[4] से समाई हुई है, और समाने वाला आत्मा सृष्टि के साथ परमेश्वर के हाथ से समाया हुआ है। इसलिए जैसे अनार का बीज भीतर रहते हुए, स्वयं भीतर होने के कारण, छिलके के बाहर क्या है यह नहीं देख सकता; वैसे ही मनुष्य भी, जो सारी सृष्टि के साथ परमेश्वर के हाथ से घिरा हुआ है, परमेश्वर को नहीं देख सकता। फिर, पृथ्वी के राजा के विषय में भी माना जाता है कि वह है, चाहे वह सब को दिखाई न दे; क्योंकि वह अपने नियमों, आदेशों, अधिकारियों, सेनाओं और मूर्तियों से पहचाना जाता है; और क्या तुम नहीं चाहते कि परमेश्वर अपने कामों और पराक्रम के कार्यों से पहचाना जाए?
अध्याय VI.--परमेश्वर अपने कामों से जाना जाता है।
हे मनुष्य, उसके कामों पर विचार करो--ऋतुओं का समय पर चक्र और तापमान के परिवर्तन; तारों की नियमित चाल; दिनों और रातों, महीनों और वर्षों का सुव्यवस्थित क्रम; बीजों, पौधों और फलों की विविध सुंदरता; और चौपायों, पक्षियों, रेंगनेवाले जंतुओं और नदियों तथा समुद्र की मछलियों की नाना जातियाँ;[5] या इन प्राणियों में डाली गई उस सहज प्रवृत्ति पर विचार करो जिससे वे अपने लाभ के लिए नहीं, पर मनुष्य के उपयोग के लिए संतान उत्पन्न करते और पालते हैं; और उस पूर्वदृष्टि (प्रोविडेंस) पर जिससे परमेश्वर सब प्राणियों के लिए भोजन जुटाता है, या उस अधीनता पर जिसमें उसने ठहराया कि सब कुछ मनुष्यजाति की सेवा करे। मीठे सोतों के प्रवाह और कभी न सूखनेवाली नदियों पर, और ओस, फुहारों और वर्षा की समय पर आपूर्ति पर भी विचार करो; आकाशीय पिंडों की नाना गतियों पर, भोर के तारे पर जो उदय होकर पूर्ण ज्योति के आगमन की घोषणा करता है; और कृत्तिका, मृगशिरा और स्वाति नक्षत्रों पर, और आकाश में परिक्रमा करनेवाले अन्य तारों की कक्षा पर; इन सब को परमेश्वर की बहुविध बुद्धि ने
अपने-अपने नाम दिए हैं। वही अकेला परमेश्वर है जिसने अंधकार में से ज्योति बनाई, और अपने भंडारों में से प्रकाश निकाला, और दक्षिणी वायु की कोठरियाँ,[1] और अथाह सागर के भंडार-घर, और समुद्रों की सीमाएँ, और हिम और ओलों के भंडार रचे; जिसने जल को गहराई के भंडारों में और अंधकार को अपने भंडारों में इकट्ठा किया, और मीठी, मनभावन और सुखद ज्योति को अपने भंडारों में से निकाला; "जो पृथ्वी की छोर से वाष्प उठाता है: वह वर्षा के लिए बिजलियाँ बनाता है;"[2] जो भयभीत करने के लिए अपनी गर्जन भेजता है, और बिजली के द्वारा गर्जन की गड़गड़ाहट की पूर्व सूचना देता है कि कोई प्राण अचानक धक्के से मूर्छित न हो; और जो आकाश से चमकनेवाली बिजली की प्रचंडता को ऐसा नियंत्रित करता है कि वह पृथ्वी को भस्म नहीं करती; क्योंकि यदि बिजली को उसकी पूरी शक्ति दी जाती, तो वह पृथ्वी को जला डालती; और यदि गर्जन को उसकी पूरी शक्ति दी जाती, तो वह उसमें के सब कामों को उलट देती।
अध्याय VII.--जब हम अमरता को पहन लेंगे तब परमेश्वर को देखेंगे।
यही मेरा परमेश्वर है, सबका प्रभु, जिसने अकेले आकाश को तान दिया, और उसके नीचे पृथ्वी का विस्तार स्थापित किया; जो समुद्र की गहरी खाइयों को हिलाता और उसकी लहरों को गरजाता है; जो उसकी शक्ति पर शासन करता और उसकी लहरों का कोलाहल शांत करता है; जिसने जल पर पृथ्वी की नींव डाली और उसके पोषण के लिए आत्मा दी; जिसका श्वास सब को जीवन-प्रकाश देता है, और यदि वह अपना श्वास खींच ले तो सब कुछ पूरी तरह नष्ट हो जाएगा। हे मनुष्य, उसी के द्वारा तू बोलता है; उसी का श्वास तू लेता है, तौभी तू उसे नहीं जानता। और तेरी यह दशा तेरी आत्मा के अंधेपन और तेरे हृदय की कठोरता के कारण है। परन्तु यदि तू चाहे तो चंगा हो सकता है। अपने आप को वैद्य के हाथ सौंप दे, और वह तेरी आत्मा और हृदय की आँखों का मोतियाबिंद दूर करेगा। वह वैद्य कौन है? परमेश्वर, जो अपने वचन और बुद्धि के द्वारा चंगा करता और जिलाता है। परमेश्वर ने अपने ही वचन और बुद्धि से सब कुछ बनाया; क्योंकि "यहोवा के वचन से आकाश बने, और उसके सारे गण उसके मुँह की साँस से।"[3] उसकी बुद्धि सर्वोत्तम है। अपनी बुद्धि से परमेश्वर ने पृथ्वी की नींव डाली; और समझ से आकाश को स्थिर किया; और उसके ज्ञान से गहरे सागर के सोते फूट निकले, और बादलों से ओस टपकी। यदि तू, हे मनुष्य, पवित्रता, भक्ति और धार्मिकता से जीवन बिताते हुए, इन बातों को समझ ले, तो तू परमेश्वर को देख सकता है। परन्तु सबसे पहले विश्वास और परमेश्वर का भय तेरे हृदय में राज्य करे, तब तू इन बातों को समझेगा। जब तू नश्वरता उतारकर अविनाशिता पहन लेगा, तब तू परमेश्वर को योग्य रीति से देखेगा। क्योंकि परमेश्वर तेरे शरीर को तेरी आत्मा के साथ अमर करके जिलाएगा; और तब अमर होकर, यदि अब तू उस पर विश्वास करे, तो तू उस अमर को देखेगा; और तब तू जान लेगा कि तूने उसके विरुद्ध अन्याय की बातें कही थीं।
अध्याय VIII.--सब बातों में विश्वास आवश्यक है।
परन्तु तुम विश्वास नहीं करते कि मरे हुए जिलाए जाते हैं। जब पुनरुत्थान होगा, तब तुम चाहे या न चाहे, विश्वास करोगे; और यदि तुम अभी विश्वास न करो, तो तुम्हारा विश्वास अविश्वास ही गिना जाएगा। और तुम विश्वास क्यों नहीं करते? क्या तुम नहीं जानते कि सब बातों में विश्वास ही मुख्य सिद्धांत है? क्योंकि कौन किसान काट सकता है, जब तक वह पहले अपना बीज भूमि को न सौंपे? या कौन समुद्र पार कर सकता है, जब तक वह पहले अपने आप को नाव और केवट को न सौंपे? और कौन रोगी चंगा हो सकता है, जब तक वह पहले अपने आप को वैद्य की देखभाल में न सौंपे? और कोई मनुष्य कौन सी कला या विद्या सीख सकता है, जब तक वह पहले अपने आप को गुरु के सुपुर्द करके उसके अधीन न हो? तो जब किसान भूमि पर, नाविक नाव पर, और रोगी वैद्य पर भरोसा रखता है, तो क्या तुम परमेश्वर पर भरोसा न रखोगे, जबकि उसके हाथ से तुम्हारे पास इतने प्रमाण हैं? क्योंकि पहले उसने तुम्हें शून्य से रचा, और अस्तित्व में लाया (क्योंकि यदि तुम्हारा पिता न होता, और न माता, तो तुम स्वयं एक समय अस्तित्व में न होते, यह और भी निश्चित है), और एक छोटे और गीले पदार्थ से, अर्थात् अत्यन्त छोटी बूँद से तुम्हें रचा, जिसका स्वयं एक समय कोई अस्तित्व न था; और परमेश्वर ने तुम्हें इस जीवन में प्रवेश कराया। इसके अतिरिक्त, तुम विश्वास करते हो कि मनुष्यों की बनाई हुई मूर्तियाँ देवता हैं, और बड़े-बड़े काम करती हैं; तो क्या तुम यह विश्वास नहीं कर सकते कि जिस परमेश्वर ने तुम्हें बनाया, वह बाद में भी तुम्हें बना सकता है?[4]
अध्याय नौ।--देवताओं के अनैतिक कार्य।
और सचमुच, जिनकी तुम उपासना करने का दावा करते हो, उनके नाम मरे हुए मनुष्यों के नाम हैं। और ये भी कौन थे और कैसे मनुष्य थे? क्या शनि अपनी ही सन्तानों को नष्ट करके खा जानेवाला नरभक्षी नहीं पाया जाता? और यदि तुम उसके पुत्र को बृहस्पति कहते हो, तो उसके कर्म और आचरण भी सुनो--पहले, कैसे ईदा पर्वत पर एक बकरी ने उसे दूध पिलाया, और कथाओं के अनुसार उसे मारकर और उसकी खाल उतारकर उसने उस चमड़े का अपने लिए एक अंगरखा बनाया। और उसके अन्य कर्म,--उसका अगम्यागमन, व्यभिचार और वासना,-- होमर और अन्य कवि अधिक अच्छी रीति से बताएँगे। उसके पुत्रों के विषय में मैं और क्यों कहूँ? कैसे हरकुलेस ने अपने आप को जला डाला; और मतवाले और उग्र बाक्कुस के विषय में; और अपुल्लो के विषय में, जो अखिल्लेस से डरकर भागा, और दाफ्ने के प्रेम में पड़ा, और हुआकिन्थुस की गति से अनजान रहा; और घायल शुक्र के विषय में, और
मंगल के विषय में, जो मनुष्यों का संकट है; और तथाकथित देवताओं से बहनेवाले रक्त के विषय में। और ये तो कथाओं के सौम्य प्रकार हैं; क्योंकि ओसिरिस नामक देवता अंग-अंग करके टुकड़े किया हुआ पाया जाता है, जिसके रहस्य प्रतिवर्ष मनाए जाते हैं, मानो वह नष्ट हो गया हो, और अंग-अंग करके पाया और ढूँढ़ा जा रहा हो। क्योंकि न तो यह जाना जाता है कि वह नष्ट हुआ, और न यह दिखाया जाता है कि वह पाया गया। और मैं अंगहीन किए गए अतिस के विषय में, या वन में भटकते हुए और आखेट करते समय सूअर से घायल हुए अदोनिस के विषय में; या बिजली से मारे गए अस्कुलापियुस के विषय में; या सिनोपे से सिकन्दरिया तक खदेड़े गए भगोड़े सेरापिस के विषय में; या स्कूथी दियाना के विषय में, जो स्वयं भी भगोड़ी, और हत्यारी, और शिकारिन, और एन्दिमियोन की उत्कट प्रेमिका थी, क्यों कहूँ? अब, ये बातें हम प्रकाशित नहीं करते, परन्तु तुम्हारे अपने लेखक और कवि करते हैं।
अध्याय दस।--मूर्तिपूजा की निरर्थकताएँ।
मिस्रियों द्वारा पूजे जानेवाले पशुओं की भीड़ का, अर्थात् रेंगनेवाले जन्तुओं, पशुओं, जंगली जानवरों, पक्षियों और नदी की मछलियों का, और यहाँ तक कि धोने के बर्तनों[1] और लज्जाजनक ध्वनियों[2] का भी मैं और क्यों वर्णन करूँ? परन्तु यदि तुम यूनानियों और अन्य जातियों का उल्लेख करो, तो वे पत्थरों और लकड़ी, और अन्य प्रकार के भौतिक पदार्थों की पूजा करते हैं,--मरे हुए मनुष्यों की मूर्तियों की, जैसा हम अभी कह रहे थे। क्योंकि फिदियास पीसा में एलिसवासियों के लिए ओलिम्पियाई बृहस्पति, और एथेन्स में अक्रोपोलिस की मिनर्वा बनाता हुआ पाया जाता है। और हे मेरे मित्र, मैं तुमसे पूछूँगा कि कितने बृहस्पति हैं। क्योंकि पहले तो ओलिम्पियाई उपनामवाला बृहस्पति है, फिर लातियारिस बृहस्पति, और कासियुस बृहस्पति, और तोनान्स बृहस्पति, और प्रोपातोर बृहस्पति, और पन्निखियुस बृहस्पति, और पोलियूखुस बृहस्पति, और कपितोलीनुस बृहस्पति; और शनि का पुत्र वह बृहस्पति, जो क्रीतियों का राजा है, क्रीत में उसकी कब्र है, परन्तु शेष, सम्भवतः, कब्रों के योग्य नहीं समझे गए। और यदि तुम उन देवताओं कहलानेवालों की माता की बात करो, तो उसके कर्म, या उनके कर्म जिनके द्वारा वह पूजी जाती है, अपने होठों से कहना मुझसे दूर रहे (क्योंकि हमारे लिए ऐसी बातों का नाम लेना भी वर्जित है), और यह भी कि वह और उसके पुत्र राजा को कितने भारी कर और आमदनी देते हैं। क्योंकि ये देवता नहीं, परन्तु मूर्तियाँ हैं, जैसा हम पहले कह चुके हैं, मनुष्यों के हाथ की कारीगरी और अशुद्ध दानवों की। और जो उन्हें बनाते और उन पर भरोसा रखते हैं, वे सब वैसे ही हो जाएँ!
अध्याय ग्यारह।--राजा का आदर किया जाए, परमेश्वर की उपासना की जाए।
इसलिए मैं [तुम्हारे देवताओं की अपेक्षा] राजा का ही आदर करूँगा, उसकी उपासना करके नहीं, परन्तु उसके लिए प्रार्थना करके। परन्तु जीवित और सच्चे परमेश्वर की मैं उपासना करता हूँ, यह जानकर कि राजा उसी के द्वारा बनाया गया है। तब तुम मुझसे कहोगे, "तुम राजा की उपासना क्यों नहीं करते?" इसलिए कि वह उपासना के लिए नहीं बनाया गया, परन्तु वैध आदर के साथ सम्मानित होने के लिए, क्योंकि वह देवता नहीं, परन्तु परमेश्वर का ठहराया हुआ मनुष्य है, उपासना पाने के लिए नहीं, परन्तु न्याय से निर्णय करने के लिए। क्योंकि किसी प्रकार उसका शासन परमेश्वर की ओर से उसे सौंपा गया है: जैसे वह उन्हें, जिन्हें उसने अपने अधीन ठहराया है, राजा कहलाने नहीं देता; क्योंकि "राजा" उसकी उपाधि है, और किसी दूसरे के लिए उसका प्रयोग करना उचित नहीं; वैसे ही परमेश्वर को छोड़ किसी की उपासना किया जाना भी उचित नहीं। इसलिए हे मनुष्य, तू पूरी तरह भूल में है। अतः राजा का आदर कर, उसके अधीन रह, और निष्ठावान मन से उसके लिए प्रार्थना कर; क्योंकि यदि तू ऐसा करे, तो परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है। क्योंकि परमेश्वर की व्यवस्था कहती है, "हे मेरे पुत्र, यहोवा और राजा का भय मान, और उनकी आज्ञा न टाल; क्योंकि वे अचानक अपने शत्रुओं से पलटा लेंगे।"[3]
अध्याय बारह।--मसीही नाम का अर्थ।
और मुझ पर हँसने और मुझे "मसीही" कहने के विषय में, तुम नहीं जानते कि तुम क्या कह रहे हो। पहली बात, जो अभिषिक्त[4] किया गया है वह मधुर और उपयोगी है, और तुच्छ समझे जाने से बहुत दूर। क्योंकि कौन सा जहाज़ उपयोगी और समुद्र के योग्य हो सकता है, जब तक पहले उसमें राल न लगाई जाए [उसका अभिषेक न किया जाए]? या कौन सा गढ़ या घर सुन्दर और उपयोगी है जब उसका अभिषेक न हुआ हो? और कौन मनुष्य, जब वह इस जीवन में या व्यायामशाला में प्रवेश करता है, तेल से अभिषिक्त नहीं किया जाता? और कौन सी रचना में शोभा या सुन्दरता होती है जब तक वह अभिषिक्त और चमकाई न जाए? फिर वायु और आकाश के नीचे की सब वस्तुएँ किसी रीति से ज्योति और आत्मा से अभिषिक्त हैं; और क्या तुम परमेश्वर के तेल से अभिषिक्त होना नहीं चाहते? इसलिए हम मसीही कहलाते हैं, इस कारण कि हम परमेश्वर के तेल से अभिषिक्त हैं।[5]
अध्याय तेरह।--उदाहरणों से पुनरुत्थान का प्रमाण।
फिर, तुम्हारे इस इनकार के विषय में कि मरे हुए जिलाए जाते हैं--क्योंकि तुम कहते हो,[6] "मरे हुओं में से जिलाए गए एक को ही मुझे दिखाओ, कि देखकर मैं विश्वास करूँ,"--पहली बात, यदि तुम काम होते देखकर विश्वास करो तो इसमें कौन सी बड़ी बात है? फिर, तुम विश्वास करते हो कि हरकुलेस, जिसने अपने आप को जलाया, जीवित है; और कि अस्कुलापियुस, जो
बिजली से मारा गया था, जिलाया गया; और क्या परमेश्वर की ओर से तुम्हें बताई गई बातों पर तुम विश्वास नहीं करते? परन्तु मान लो कि मैं तुम्हें एक मरे हुए मनुष्य को जिलाया हुआ और जीवित दिखाऊँ, तो इस पर भी तुम विश्वास न करोगे। परमेश्वर तो तुम्हें बहुत से प्रमाण दिखाता है कि तुम उस पर विश्वास करो। क्योंकि कृपया ऋतुओं, दिनों और रातों के मरने पर विचार करो, कि ये भी कैसे मरते और फिर जी उठते हैं। और क्या? क्या बीजों और फलों का पुनरुत्थान नहीं हो रहा, और वह भी मनुष्यों के उपयोग के लिए? उदाहरण के लिए, गेहूँ का या अन्य अनाजों का बीज जब भूमि में डाला जाता है, तो पहले मरकर सड़ जाता है, फिर उठता है, और बाल बन जाता है। और वृक्षों और फलवाले पेड़ों का स्वभाव,--क्या यह नहीं कि परमेश्वर की ठहराई हुई विधि के अनुसार वे अनदेखे और अदृश्य में से अपने समयों पर अपने फल उत्पन्न करते हैं? इसके अतिरिक्त, कभी-कभी कोई गौरैया या अन्य पक्षियों में से कोई, पीते समय सेब या अंजीर का बीज, या कुछ और निगलकर, किसी चट्टानी टीले या कब्र पर आ गया, और बीज को अपनी बीट में छोड़ गया, और वह बीज, जो एक बार निगला गया था, और इतनी भारी गर्मी से होकर निकला था, अब जड़ पकड़कर एक वृक्ष उग आया है। और ये सब बातें परमेश्वर की बुद्धि करती है, कि इनके द्वारा भी प्रकट हो कि परमेश्वर सब मनुष्यों का सामान्य पुनरुत्थान करा सकता है। और यदि तुम और भी अद्भुत दृश्य देखना चाहो, जो केवल पार्थिव ही नहीं परन्तु आकाशीय पिंडों के भी पुनरुत्थान को प्रमाणित करे, तो चन्द्रमा के पुनरुत्थान पर विचार करो, जो प्रतिमास होता है; कि वह कैसे घटता, मरता और फिर जी उठता है। हे मनुष्य, आगे यह भी सुन कि तेरे अपने भीतर पुनरुत्थान का कार्य चल रहा है, चाहे तू उससे अनजान हो।
क्योंकि सम्भवतः तुम कभी रोगी हुए हो, और तुम्हारा मांस, बल और सुन्दरता घट गई; परन्तु जब तुमने परमेश्वर से फिर दया और चंगाई पाई, तो तुम मांस और रूप में फिर सँभल गए, और अपना बल भी फिर पा लिया। और जैसे तुम नहीं जानते कि तुम्हारा मांस कहाँ चला गया और लोप हो गया, वैसे ही यह भी नहीं जानते कि वह कहाँ से बढ़ा, या कहाँ से फिर आया। परन्तु तुम कहोगे, "रक्त में बदले हुए खाने-पीने से।" ठीक है; परन्तु यह भी परमेश्वर का ही काम है, जो इस प्रकार कार्य करता है, और किसी दूसरे का नहीं।
अध्याय चौदह।--थियुफिलुस मन-परिवर्तन का एक उदाहरण।
इसलिए संदेह न करो, परन्तु विश्वास करो; क्योंकि मैं भी पहले विश्वास नहीं करता था कि यह होगा, परन्तु अब इन बातों पर विचार करके विश्वास करता हूँ। साथ ही, मुझे पवित्र भविष्यवक्ताओं के पवित्र शास्त्र(1) मिले, जिन्होंने परमेश्वर के आत्मा के द्वारा उन बातों की, जो हो चुकी हैं, जैसे वे घटीं वैसे ही, और उन बातों की जो अब हो रही हैं जैसे वे अब हो रही हैं, और भविष्य की बातों की, उसी क्रम में जिसमें वे पूरी होंगी, पहले से भविष्यवाणी की। इसलिए, पहले कही गई रीति से घटनेवाली घटनाओं से मिलनेवाले प्रमाण को मानकर, मैं अविश्वास नहीं करता, परन्तु परमेश्वर का आज्ञाकारी होकर विश्वास करता हूँ; यदि तुम चाहो तो तुम भी उसके अधीन हो जाओ और उस पर विश्वास करो, ऐसा न हो कि यदि अब तुम अविश्वासी बने रहो, तो आगे जब तुम अनन्त दण्डों से पीड़ित किए जाओगे तब तुम्हें विश्वास दिलाया जाए; जिन दण्डों को भविष्यवक्ताओं ने पहले से कहा था, और बाद में जन्मे कवियों और दार्शनिकों ने अपने सिद्धांतों को विश्वास के योग्य बनाने के लिए पवित्र शास्त्रों से चुरा लिया। तौभी इन्होंने भी अपवित्र और अविश्वासियों पर पड़नेवाले दण्डों के विषय में पहले से कहा है, ताकि कोई साक्षी के बिना न छूटे, या यह कहने पाए, "हमने नहीं सुना, और न हम जानते थे।" परन्तु तुम भी, यदि चाहो, तो भविष्यवाणी के शास्त्रों(2) पर श्रद्धापूर्वक ध्यान दो, और वे अनन्त दण्डों से बचने और परमेश्वर के अनन्त पुरस्कार पाने के लिए तुम्हारा मार्ग और स्पष्ट कर देंगे। क्योंकि जिसने बोलने के लिए मुँह दिया, और सुनने के लिए कान बनाया, और देखने के लिए आँख रची, वही सब बातों की जाँच करेगा, और धर्म से न्याय करेगा, और हर एक को उसके योग्य प्रतिफल देगा।
जो भले कामों में धीरज के साथ स्थिर रहकर(3) अमरता की खोज करते हैं, उन्हें वह अनन्त जीवन, आनन्द, शान्ति, विश्राम, और भलाइयों की बहुतायत देगा, जिन्हें न किसी आँख ने देखा, न किसी कान ने सुना, और न वे मनुष्य के हृदय में समाई हैं।(4) परन्तु अविश्वासियों और तुच्छ जाननेवालों पर, जो सत्य को नहीं मानते, परन्तु अधर्म के आज्ञाकारी हैं, जब वे व्यभिचारों और लुचपन, और मलिनता, और लोभ, और निषिद्ध मूर्तिपूजाओं से भर चुके होंगे, तब क्रोध और कोप, संकट और वेदना(5) होगी, और अन्त में अनन्त आग ऐसे मनुष्यों को अपने वश में कर लेगी। क्योंकि तुमने कहा था, "अपना परमेश्वर मुझे दिखाओ," यही मेरा परमेश्वर है, और मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि उससे डरो और उस पर भरोसा रखो।
थियुफिलुस की ऑटोलिकुस को पत्री
पुस्तक दो
अध्याय एक।--इस पुस्तक के लिखने का कारण।
मेरे परम मित्र ऑटोलिकस, जब पहले हमारी कुछ बातचीत हुई थी, और तुमने पूछा था कि मेरा परमेश्वर कौन है, और कुछ देर तक मेरी बातों पर ध्यान दिया था, तब मैंने तुम्हें अपने धर्म के विषय में कुछ बातें समझाई थीं; फिर एक-दूसरे से विदा लेकर हम बड़े आपसी सौहार्द के साथ अपने-अपने घर चले गए, यद्यपि आरंभ में तुमने मुझ पर कुछ कठोरता से दबाव डाला था। तुम जानते हो और तुम्हें याद है कि तुमने हमारे सिद्धांत को मूर्खता समझा था। फिर जैसा तुमने बाद में मुझसे आग्रह किया, मैं भाषण-कला में शिक्षित न होते हुए भी, इस छोटे ग्रंथ के द्वारा उस व्यर्थ परिश्रम और खोखली उपासना को, जिसमें तुम जकड़े हुए हो, और अधिक सटीकता से दिखाना चाहता हूँ; और मैं तुम्हारे अपने कुछ ऐसे इतिहासों के द्वारा, जिन्हें तुम पढ़ते हो और शायद अभी पूरी तरह समझते नहीं, सत्य को तुम्हारे सामने स्पष्ट करना चाहता हूँ।
अध्याय 2.--देवता जब बनाए जाते हैं तब तुच्छ समझे जाते हैं; परन्तु जब खरीदे जाते हैं तब मूल्यवान हो जाते हैं।
और सचमुच मुझे यह बेतुका लगता है कि मूर्तिकार, तराशने वाले, चित्रकार या साँचे में ढालने वाले देवताओं का रूप गढ़ें, चित्रित करें, तराशें, ढालें और तैयार करें, और वे देवता जब तक कारीगरों के हाथ में रहते हैं तब तक किसी मूल्य के नहीं गिने जाते; पर जैसे ही कुछ लोग उन्हें खरीदकर किसी तथाकथित मन्दिर में या किसी घर में स्थापित कर देते हैं, तो न केवल खरीदने वाले उन्हें बलि चढ़ाते हैं, बल्कि जिन्होंने उन्हें बनाया और बेचा वे भी बड़ी श्रद्धा, बलि-सामग्री और अर्घ्य के साथ उनकी पूजा करने आते हैं; और वे उन्हें देवता मानते हैं, यह न देखते हुए कि वे ठीक वैसे ही हैं जैसे अपने ही हाथों से बनाए जाते समय थे, चाहे पत्थर हों, पीतल हों, लकड़ी हों, रंग हों या कोई और सामग्री। और तुम्हारा हाल भी यही है, जब तुम तथाकथित देवताओं के इतिहास और वंशावलियाँ पढ़ते हो। क्योंकि जब तुम उनके जन्म के विषय में पढ़ते हो तो उन्हें मनुष्य समझते हो, पर बाद में उन्हें देवता कहते और पूजते हो, यह न सोचते और न समझते हुए कि जन्म लेते समय वे ठीक वैसे ही प्राणी थे जैसा तुमने पहले पढ़ा।
अध्याय 3.--देवताओं का क्या हुआ?
और पूर्वकाल के देवताओं की, यदि वे सचमुच उत्पन्न हुए थे, तो उनकी उत्पत्ति बहुत प्रचुर थी। पर अब उनकी उत्पत्ति कहाँ दिखाई देती है? क्योंकि यदि प्राचीन काल में उन्होंने संतान उत्पन्न की और स्वयं उत्पन्न हुए, तो स्पष्ट है कि आज तक भी देवता उत्पन्न होते रहने चाहिए; नहीं तो ऐसी जाति नपुंसक मानी जाएगी। क्योंकि या तो वे बूढ़े हो गए हैं और इसलिए अब संतान उत्पन्न नहीं करते, या वे मर मिटे हैं और अब हैं ही नहीं। यदि देवता उत्पन्न हुए थे, तो उन्हें आज तक भी उत्पन्न होना चाहिए, जैसे मनुष्य भी उत्पन्न होते हैं; वरन् देवताओं की संख्या मनुष्यों से कहीं अधिक होनी चाहिए, जैसा सिबिल कहती है:--
"यदि देवता संतान उत्पन्न करते हैं, और प्रत्येक अमर बना रहता है, तो देवताओं की जाति नश्वर मनुष्यों से अधिक होगी, और भीड़ इतनी बड़ी होगी कि मनुष्यों को खड़े होने की जगह न मिलेगी।"
क्योंकि यदि नश्वर और अल्पायु मनुष्यों से उत्पन्न संतानें आज तक दिखाई देती हैं, और मनुष्यों का जन्म लेना बंद नहीं हुआ, यहाँ तक कि नगर और गाँव भरे हैं, और देहात के स्थान भी बसे हुए हैं, तो तुम्हारे कवियों के अनुसार जो देवता मरते नहीं, उन्हें तो और भी अधिक संतान उत्पन्न करनी और स्वयं उत्पन्न होते रहना चाहिए, क्योंकि तुम कहते हो कि देवता जन्म-क्रम से उत्पन्न हुए? और ओलिम्पस नामक पर्वत, जहाँ पहले देवता रहते थे, अब उजाड़ क्यों पड़ा है? या जूपिटर प्राचीन काल में इडा पर क्यों रहता था, और होमर तथा अन्य कवियों के अनुसार वहाँ रहता हुआ जाना जाता था, पर अब दृष्टि से परे क्यों है? और वह पृथ्वी के केवल एक ही भाग में क्यों पाया गया, सर्वत्र क्यों नहीं? क्योंकि या तो उसने अन्य भागों की उपेक्षा की, या वह सर्वत्र उपस्थित रहकर सबकी देखभाल करने में समर्थ न था। क्योंकि यदि वह, उदाहरणार्थ, पूर्वी स्थान में था, तो पश्चिमी में नहीं था; और यदि पश्चिमी भागों में उपस्थित था, तो पूर्वी में नहीं था। परन्तु परमप्रधान, सर्वशक्तिमान और जीवित परमेश्वर का गुण यह है कि वह न केवल सर्वत्र उपस्थित हो, बल्कि सब कुछ देखे और सब कुछ सुने, और किसी स्थान में कदापि सीमित न हो; क्योंकि यदि वह सीमित होता, तो उसे समाने वाला स्थान उससे बड़ा होता; क्योंकि जो समाता है वह उससे बड़ा होता है जो समाया जाता है। परमेश्वर समाया नहीं जाता, वह स्वयं सबका स्थान है। पर जूपिटर ने इडा को क्यों छोड़ दिया? क्या वह मर गया, या वह पर्वत उसे अब अच्छा नहीं लगा? और वह कहाँ गया? क्या स्वर्ग में? नहीं। पर तुम शायद कहोगे, क्रीट में? हाँ, क्योंकि वहाँ भी उसकी कब्र आज तक दिखाई जाती है। फिर तुम कहोगे, पीसा में, जहाँ वह आज तक फ़िडियास के हाथों को यश दे रहा है। तो आओ, अब दार्शनिकों और कवियों के लेखों की ओर चलें।
अध्याय 4.--परमेश्वर के विषय में दार्शनिकों के बेतुके मत।
स्तोइक संप्रदाय के कुछ दार्शनिक कहते हैं कि परमेश्वर है ही नहीं; या यदि है भी, तो वह अपने सिवा किसी की चिंता नहीं करता; और इन मतों को एपिक्यूरस और क्रिसिप्पस की मूर्खता ने विस्तार से प्रस्तुत किया है। और अन्य कहते हैं कि सब वस्तुएँ बिना किसी बाहरी कारण के उत्पन्न होती हैं, और जगत् अनुत्पन्न है, और प्रकृति शाश्वत है;(1) और उन्होंने यह कहने का साहस किया है कि परमेश्वर का कोई विधान या प्रबंध है ही नहीं, बल्कि दावा करते हैं कि परमेश्वर केवल प्रत्येक मनुष्य की अंतरात्मा है। और अन्य फिर यह दावा करते हैं कि जो आत्मा सब वस्तुओं में व्याप्त है वही परमेश्वर है। परन्तु प्लेटो और उसके अनुयायी यह तो मानते हैं कि परमेश्वर अनुत्पन्न है, और सबका पिता और रचयिता है; पर फिर यह दावा करते हैं कि पदार्थ भी परमेश्वर की तरह अनुत्पन्न है, और कहते हैं कि वह परमेश्वर के साथ ही सहकालीन है। परन्तु यदि परमेश्वर अनुत्पन्न है और पदार्थ भी अनुत्पन्न, तो प्लेटोवादियों के अनुसार परमेश्वर अब सबका सृष्टिकर्ता नहीं रहा, और उनके मतों के अनुसार परमेश्वर की एकाधिपत्यता(2) स्थापित नहीं होती। और आगे, जैसे परमेश्वर अनुत्पन्न होने के कारण अपरिवर्तनीय भी है; वैसे ही यदि पदार्थ भी अनुत्पन्न होता, तो वह भी अपरिवर्तनीय और परमेश्वर के समान होता; क्योंकि जो सृजा गया है वह परिवर्तनशील है, पर जो अनुत्पन्न है वह अपरिवर्तनीय है। और यदि परमेश्वर ने जगत् को विद्यमान सामग्री से बनाया, तो इसमें बड़ी बात क्या है?(3) क्योंकि एक मानव कारीगर भी जब किसी से सामग्री पाता है, तो उससे जो चाहे बना लेता है। परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य इसमें प्रकट होती है कि वह जो नहीं हैं उनमें से जो चाहे बनाता है; जैसे जीवन और गति देना परमेश्वर के सिवा किसी और का विशेषाधिकार नहीं। क्योंकि मनुष्य एक मूर्ति तो बना लेता है, पर जो उसने बनाई है उसे बुद्धि, श्वास या संवेदना नहीं दे सकता।
परन्तु परमेश्वर में मनुष्य की सामर्थ्य से बढ़कर यह विशेषता है कि वह ऐसी रचना करता है जिसमें बुद्धि, जीवन और संवेदना है। इसलिए जैसे इन सब बातों में परमेश्वर मनुष्य से अधिक सामर्थी है, वैसे ही इसमें भी: कि जो नहीं हैं उनमें से वह उन्हें रचता है और रच चुका है जो हैं, और जो कुछ वह चाहता है, जैसे चाहता है।
अध्याय 5.--देवताओं के विषय में होमर और हेसियड के मत।
इस प्रकार तुम्हारे दार्शनिकों और लेखकों का मत परस्पर विरोधी है; क्योंकि जहाँ पहले वालों ने उपर्युक्त मत प्रस्तुत किए, वहीं कवि होमर न केवल जगत् की, बल्कि देवताओं की उत्पत्ति को भी बिलकुल दूसरी परिकल्पना पर समझाता पाया जाता है। क्योंकि वह कहीं कहता है:(4)--
"देवताओं का पिता ओशियनस, और वह जिसने देवताओं को जन्म दिया, उनकी माता टेथिस भी, जिनसे सब नदियाँ और हर समुद्र निकला।"
तथापि यह कहकर वह हमें परमेश्वर को नहीं दिखाता। क्योंकि कौन नहीं जानता कि महासागर जल है? और यदि जल है, तो परमेश्वर नहीं। परमेश्वर तो, यदि वह सब वस्तुओं का रचयिता है, जैसा कि वह निश्चय ही है, तो जल और समुद्रों का भी रचयिता है। और हेसियड ने भी न केवल देवताओं की, बल्कि स्वयं जगत् की उत्पत्ति की घोषणा की। और यद्यपि उसने कहा कि जगत् रचा गया, फिर भी उसने हमें यह बताने की कोई इच्छा नहीं दिखाई कि वह किसके द्वारा रचा गया। इसके अतिरिक्त, उसने कहा कि सैटर्न और उसके पुत्र जूपिटर, नेप्च्यून और प्लूटो देवता थे, जबकि हम पाते हैं कि वे जगत् से बाद में उत्पन्न हुए। और वह यह भी बताता है कि सैटर्न पर उसके अपने पुत्र जूपिटर ने युद्ध में कैसे आक्रमण किया; क्योंकि वह कहता है:(5)--
"अपने पिता सैटर्न को उसने बल से पराजित किया, और अमरों के बीच न्याय तथा बुद्धि से राज्य किया, और प्रत्येक को योग्य सम्मान बाँटे।
फिर वह अपनी कविता में जूपिटर की पुत्रियों को लाता है, जिन्हें वह म्यूज़ कहता है, और जिनके याचक के रूप में वह प्रकट होता है, उनसे यह जानना चाहता हुआ कि सब वस्तुएँ कैसे बनीं; क्योंकि वह कहता है:(6)--
"जोव की पुत्रियो, प्रणाम! मेरी सहायता करो, ताकि मैं मधुर और सुसज्जित छंदों में अमर देवताओं के जन्म का गान कर सकूँ; जो तारों भरे आकाश और पृथ्वी से उत्पन्न हुए; जो आरंभ में अँधेरी रात से उत्पन्न होकर खारे सागर द्वारा पाले-पोसे गए। यह भी बताओ कि पृथ्वी को पहले रूप किसने दिया, और नदियों को, और उस असीम सागर को जिसकी लहर थके बिना बैठती है, फिर अपनी चोटी ऊँची उठाती है; और वह चमकता वितान, तारों की जगमगाहट से जड़ा, इस विशाल आकाश में कैसे फैला। वे देवता कहाँ से उत्पन्न हुए जिनके द्वारा सब भलाई दी जाती है? बताओ कि उनके हाथों से कैसे-कैसे उपहार आए, किसी को धन, किसी को संपदा या कीर्ति; और वे अति प्राचीन काल से बहुत कोनों वाले ओलिम्पस के धूप-भरे प्रदेश में कैसे बसे हैं। हे म्यूज़ो, ये बातें कहो, जो सदा ओलिम्पस की छायाओं में रहती हो--क्योंकि तुम बता सकती हो: आरंभ से तुम्हारे चरण वहाँ विचरे हैं; तो हमें बताओ कि सब वस्तुओं में सबसे पहले क्या बना।
परन्तु जो म्यूज़ जगत् से छोटी हैं, वे ये बातें कैसे जान सकती थीं? या वे हेसियड को [जो हो रहा था] कैसे बता सकती थीं, जब उनका पिता अभी जन्मा ही नहीं था?
अध्याय 6.--जगत् की उत्पत्ति पर हेसियड।
और एक प्रकार से वह वास्तव में पदार्थ को [स्वयंभू मानकर] और जगत् की रचना को [बिना रचयिता के] स्वीकार करता है, यह कहते हुए:(1)--
"सब वस्तुओं से पहले कैओस (अराजकता) बना, और उसके बाद चौड़ी छाती वाली पृथ्वी की दृढ़ नींव डाली गई, जहाँ अमर देवता सदा सुरक्षित रहते हैं, जो हिम-शिखर वाले ओलिंपस पर निवास करते हैं। उसके बाद अंधकारमय टार्टरस उत्पन्न हुआ, चौड़े मार्गों वाली पृथ्वी की गहरी खोहों में; और प्रेम, जो देवताओं में भी सबसे सुंदर है, सब कुछ जीतता हुआ आता है, मन और इच्छा को झुकाता है, चिंता से छुड़ाता है, और देवताओं तथा मनुष्यों के हृदयों में बुद्धिमानी की सलाह देता है। कैओस से एरेबस और रात्रि उत्पन्न हुए; रात्रि और एरेबस से आकाश और प्रभात उपजे। पृथ्वी ने अपने ही समान तारों-भरा आकाश बनाया, कि सब वस्तुओं को आश्रय मिले, और धन्य देवता वहाँ विश्राम करें। ऊँचे पर्वत उसकी शक्ति से उठे; वन-अप्सराओं के लिए उसने मनोहर गुफाएँ बनाईं; और अपनी लहरों समेत बाँझ समुद्र को जन्म दिया, प्रेम के बिना; परंतु जब आकाश ने उसका प्रेम चाहा, तब उसने गहरे भँवरों वाले महासागर को उत्पन्न किया।"
और यह कहते हुए उसने अभी तक यह नहीं समझाया कि यह सब किसके द्वारा बनाया गया। क्योंकि यदि आरंभ में कैओस था, और किसी प्रकार का पदार्थ, अनुत्पन्न होकर, पहले से विद्यमान था, तो उसकी दशा को बदलकर उसे भिन्न क्रम और आकार किसने दिया? क्या पदार्थ ने स्वयं अपना रूप बदला और अपने आपको संसार के रूप में सजा लिया (क्योंकि जूपिटर न केवल पदार्थ के बहुत बाद, वरन संसार और बहुत-से मनुष्यों के बहुत बाद उत्पन्न हुआ; और उसका पिता शनि भी वैसे ही), या कोई शासक शक्ति थी जिसने इसे बनाया? मेरा अभिप्राय परमेश्वर से है, जिसने इसे संसार का रूप भी दिया। इसके अतिरिक्त, वह हर प्रकार से व्यर्थ बात करता और अपना ही खंडन करता पाया जाता है। क्योंकि जब वह पृथ्वी, आकाश और समुद्र का उल्लेख करता है, तो हमें समझाता है कि इनसे देवता उत्पन्न हुए; और इन्हीं से फिर [उन देवताओं से] वह कहता है कि कुछ अति भयंकर मनुष्य उत्पन्न हुए,--टाइटनों और साइक्लोपों की जाति, और दैत्यों की भीड़, और मिस्र के देवता,--या यों कहें, व्यर्थ मनुष्य, जैसा कि होरापियस नाम से प्रसिद्ध अपोलोनिदेस "सेमेनौथी" नामक पुस्तक में, और मिस्रियों की उपासना, उनके राजाओं तथा उनके द्वारा किए गए व्यर्थ परिश्रमों के विषय में अपने अन्य इतिहासों में बताता है।(2)
अध्याय VII.--अन्यजातियों की काल्पनिक वंशावलियाँ।
मैं यूनानी कथाओं का वर्णन क्यों करूँ,--अंधकार के राजा प्लूटो का, या समुद्र के नीचे उतरकर मेलानिप्पे को गले लगाने और नरभक्षी पुत्र को जन्म देने वाले नेप्चून का,--या उन अनेक कथाओं का जो आपके लेखकों ने जूपिटर के पुत्रों के विषय में अपने दुखांत नाटकों में बुनी हैं, और जिनकी वंशावली वे इसलिए दर्ज करते हैं कि वे देवता नहीं, मनुष्य उत्पन्न हुए थे? और हास्य कवि अरिस्तोफेनेस ने "पक्षी" नामक नाटक में सृष्टि का विषय उठाकर कहा कि आरंभ में संसार एक अंडे से उत्पन्न हुआ, यह कहते हुए:(3)--
"काले पंखों वाली रात ने आरंभ में एक हवा का अंडा दिया।"
परंतु सातुरस भी, फिलोपेटर से आरंभ करके, जो टॉलमी भी कहलाया, अलेक्जेंड्रिया के कुलों का इतिहास देते हुए, घोषणा करता है कि बाकस उसका पूर्वज था; इसी कारण टॉलमी इस(4) कुल का संस्थापक था। तब सातुरस यों कहता है: कि देजानीरा बाकस और थेस्तियस की पुत्री अल्थिया से उत्पन्न हुई; और उससे तथा जूपिटर के पुत्र हरक्यूलिस से, मेरे अनुमान में, हिल्लस उत्पन्न हुआ; और उससे क्लेओदेमस, और उससे अरिस्तोमकस, और उससे तेमेनस, और उससे सीसस, और उससे मारोन, और उससे थेस्त्रस, और उससे अकौस, और उससे अरिस्तोमिदास, और उससे करनस, और उससे कोएनस, और उससे तिरिम्मास, और उससे पेर्दिक्कस, और उससे फिलिप, और उससे एरोपस, और उससे अल्केतास, और उससे अमिंतास, और उससे बोक्रस, और उससे मेलेआगर, और उससे अर्सिनोए, और उससे तथा लागस से टॉलमी सोतर, और उससे तथा अर्सिनोए से टॉलमी यूएर्गेतेस, और उससे तथा कुरेने के राजा मागा की पुत्री बेरेनिके से टॉलमी फिलोपेटर। इस प्रकार अलेक्जेंड्रिया के राजाओं का बाकस से संबंध है। और इसलिए डायोनीसियन गोत्र में अलग-अलग कुल हैं: अल्थिया से अल्थियन कुल, जो डायोनीसस की पत्नी और थेस्तियस की पुत्री थी; देजानीरा का कुल भी, जो डायोनीसस और अल्थिया की पुत्री तथा हरक्यूलिस की पत्नी थी;--इसी से कुलों के नाम भी पड़े: मिनोस की पुत्री और डायोनीसस की पत्नी अरियाद्ने से अरियाद्ने का कुल, जो एक आज्ञाकारी पुत्री थी और जिसने दूसरे रूप में डायोनीसस से संसर्ग किया; अल्थिया के पिता थेस्तियस से थेस्तियन; डायोनीसस के पुत्र थोआस से थोआंतियन; डायोनीसस के पुत्र स्टाफिलस से स्टाफिलियन; डायोनीसस के पुत्र यूनोस से यूएनियन; अरियाद्ने और डायोनीसस के पुत्र मारोन से मारोनियन;--क्योंकि ये सब डायोनीसस के पुत्र हैं।
और वास्तव में, और भी अनेक नाम इसी प्रकार उत्पन्न हुए और आज तक विद्यमान हैं; जैसे हरक्यूलिस से हेराक्लिदाए, अपोलो से अपोलोनिदाए, पोसाइडन से पोसाइदोनीय, और ज़ीउस से दीई और दियोगेनाए।
अध्याय VIII.--प्रोविडेंस (ईश्वरीय व्यवस्था) के विषय में मत।
और मैं ऐसे नामों और वंशावलियों की विशाल श्रृंखला का आगे वर्णन क्यों करूँ? इसलिए सभी लेखक और कवि, और जो दार्शनिक कहलाते हैं, पूरी तरह धोखे में हैं; और वे भी जो उन पर ध्यान देते हैं। क्योंकि उन्होंने अपने देवताओं के विषय में बहुतायत से कल्पित कथाएँ और मूर्खतापूर्ण कहानियाँ रचीं, और उन्हें देवता नहीं, वरन मनुष्य दिखाया, और ऐसे मनुष्य जिनमें से कुछ पियक्कड़, और कुछ व्यभिचारी और हत्यारे थे। परंतु संसार की उत्पत्ति के विषय में भी उन्होंने परस्पर विरोधी और बेतुके मत प्रकट किए। पहले, जैसा हमने पहले समझाया, उनमें से कुछ ने कहा कि संसार अनुत्पन्न है। और जिन्होंने कहा कि यह अनुत्पन्न और स्वयंभू है, उन्होंने उनका खंडन किया जिन्होंने प्रस्तावित किया कि यह सृजा गया। क्योंकि वे अनुमान और मानवीय कल्पना से बोले, सत्य को न जानते हुए। और अन्य लोगों ने फिर कहा कि प्रोविडेंस है, और पहले लेखकों के कथनों को ढा दिया। अरातस सचमुच कहता है:(1)--"जूपिटर से मेरा गीत आरंभ हो; उसका नाम कभी अनकहा न रहे: सब कुछ तुझसे परिपूर्ण है; मनुष्यों के मार्ग और निवास; आकाश और समुद्र: हमारा अस्तित्व तुझ पर टिका है; तुझमें हम चलते-फिरते हैं; सब तेरी संतान और जूपिटर के बीज हैं। दयालु होकर वह मनुष्यों को भलाई की चेतावनी देता है, परिश्रम के लिए उकसाता है और भोजन की आशा जगाता है। वह बताता है कि पशु कहाँ सबसे अच्छा चर सकते हैं, और गहरी जुती मिट्टी कहाँ पीला अन्न उपजाएगी। किसान को कब रोपना या बोना चाहिए, यह बताना उसी का काम है, यह जानना केवल उसी का है।"
तो हम किस पर विश्वास करें: यहाँ उद्धृत अरातस पर, या सोफोक्लीज़ पर, जब वह कहता है:(2)--"भविष्य की कोई दूरदर्शिता नहीं है; जैसे बने वैसे संयोग से जीना ही सबसे अच्छा है"?
और होमर फिर इससे सहमत नहीं है, क्योंकि वह कहता है(3) कि सद्गुण--"जूपिटर के ठहराए अनुसार मनुष्यों में बढ़ता या घटता है।"
और सिमोनिदेस कहता है:--"परमेश्वर के सिवा किसी मनुष्य या राज्य में सद्गुण नहीं; परामर्श परमेश्वर में निवास करता है; और अभागे मनुष्य के पास अपने अभागेपन के सिवा अपने में कुछ नहीं।"
वैसे ही यूरिपिडीज़:--"परमेश्वर से अलग मनुष्यों के पास कुछ भी अपना नहीं।"
और मेनान्डर:--"केवल परमेश्वर को छोड़ कोई हमारे लिए प्रबंध नहीं करता।"
और यूरिपिडीज़ फिर:--"क्योंकि जब परमेश्वर बचाना चाहता है, तब वह सब वस्तुओं को झुकाकर अपना उद्देश्य पूरा करने के साधन बना लेता है।"
और थेस्तियस:--"यदि परमेश्वर तुम्हें बचाना चाहे, तो तुम सुरक्षित हो, चाहे बीच समुद्र में चटाई पर तैर रहे हो।"(4)
और इस प्रकार के असंख्य कथन कहकर उन्होंने अपना ही खंडन किया। कम से कम सोफोक्लीज़, जिसने दूसरी जगह प्रोविडेंस का इनकार किया, कहता है:--"कोई नश्वर मनुष्य परमेश्वर के प्रहार से बच नहीं सकता।"
इसके अतिरिक्त, उन्होंने बहुत-से देवताओं को भी प्रस्तुत किया, फिर भी एकता की बात की; और जिन्होंने प्रोविडेंस की पुष्टि की उनके विरुद्ध उन्होंने यह दावा किया कि कोई प्रोविडेंस नहीं है। इसलिए यूरिपिडीज़ कहता है:--"हम बहुत परिश्रम करते हैं और अपनी शक्ति व्यर्थ खर्च करते हैं; हमारा मार्गदर्शक खोखली आशा है, दूरदर्शिता नहीं।"
और बिना चाहे ही वे स्वीकार करते हैं कि वे सत्य को नहीं जानते; परंतु दुष्टात्माओं से प्रेरित होकर और उनसे फूलकर, उन्होंने जो कुछ कहा उनके कहने पर कहा। क्योंकि कवि,--अर्थात होमर और हेसिओड, जैसा वे कहते हैं, म्यूज़ों से प्रेरित होकर,--भ्रामक कल्पना से,(5) शुद्ध आत्मा से नहीं बल्कि भटकी हुई आत्मा से बोले। और यह आज तक इस बात से स्पष्ट प्रकट होता है कि अधिकारग्रस्त लोगों को कभी-कभी जीवित और सच्चे परमेश्वर के नाम से झाड़ा जाता है; और भ्रम की ये आत्माएँ स्वयं मानती हैं कि वे दुष्टात्माएँ हैं जिन्होंने पहले इन लेखकों को भी प्रेरित किया था। परंतु कभी-कभी उनमें से कुछ आत्मा में जाग उठे, और अपने तथा सब मनुष्यों के लिए साक्षी होने के लिए, परमेश्वर की एकाधिपत्य, और न्याय तथा ऐसी ही बातों के विषय में भविष्यद्वक्ताओं के अनुरूप बातें कहीं।
अध्याय IX.--भविष्यद्वक्ता पवित्र आत्मा से प्रेरित।
परन्तु परमेश्वर के जन अपने भीतर पवित्र आत्मा(6) को रखकर भविष्यद्वक्ता बन गए; परमेश्वर से प्रेरित और बुद्धिमान किए जाकर वे परमेश्वर-शिक्षित, पवित्र और धर्मी हुए। इसलिए वे इस पुरस्कार को पाने के योग्य भी ठहरे कि वे परमेश्वर के यंत्र बनें, और उसकी ओर से आने वाली बुद्धि को अपने भीतर धारण करें, जिस बुद्धि के द्वारा उन्होंने संसार की सृष्टि के विषय में और अन्य सब बातों के विषय में कहा। क्योंकि उन्होंने महामारियों, अकालों और युद्धों की भी भविष्यवाणी की। और ऐसे भविष्यद्वक्ता एक-दो नहीं, वरन् इब्रानियों में भिन्न-भिन्न समयों और ऋतुओं में बहुत से हुए; और यूनानियों में भी सिबिल थी; और उन सब ने एक-दूसरे से संगत और मेल खाने वाली बातें कहीं, चाहे वह उनसे पहले की घटनाएँ हों, या उनके अपने समय की, या वे बातें जो आज हमारे दिनों में पूरी हो रही हैं: इसलिए हमें भविष्य की बातों के विषय में भी विश्वास है कि वे घटित होंगी, जैसे पहली बातें पूरी हो चुकी हैं।
अध्याय X.--परमेश्वर ने वचन के द्वारा संसार की सृष्टि की।
और सबसे पहले, उन्होंने एकमत होकर हमें सिखाया कि परमेश्वर ने सब वस्तुएँ शून्य में से बनाईं; क्योंकि कुछ भी परमेश्वर के साथ सहअस्तित्व में नहीं था: परन्तु वह स्वयं अपना ही स्थान होकर, किसी बात की घटी न रखते हुए, और युगों से पहले विद्यमान रहकर, मनुष्य को बनाने की इच्छा रखता था जिसके द्वारा वह जाना जाए; इसलिए उसने उसके लिए संसार तैयार किया। क्योंकि जो सृजा गया है वह अभावग्रस्त भी है; परन्तु जो अनुत्पन्न है उसे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं। इसलिए परमेश्वर ने अपना ही वचन अपने भीतर, अपने अंतस् में(1) रखते हुए, सब वस्तुओं से पहले अपनी बुद्धि के साथ उसे प्रकट करके(2) उत्पन्न किया। उसने इस वचन को अपनी सृजी हुई वस्तुओं में सहायक के रूप में रखा, और उसी के द्वारा सब कुछ बनाया। वह "शासक सिद्धांत" [<greek>arkh</greek>] कहलाता है, क्योंकि वह अपने रचे हुए सब पदार्थों पर शासन करता है और उनका प्रभु है। इसलिए वह परमेश्वर का आत्मा, शासक सिद्धांत, बुद्धि और परमप्रधान की सामर्थ्य होकर भविष्यद्वक्ताओं पर उतरा, और उनके द्वारा संसार की सृष्टि और अन्य सब बातों के विषय में कहा। क्योंकि जब संसार अस्तित्व में आया तब भविष्यद्वक्ता नहीं थे, परन्तु परमेश्वर की बुद्धि जो उसमें थी, और उसका पवित्र वचन जो सदा उसके साथ उपस्थित था। इसलिए वह भविष्यद्वक्ता सुलैमान के द्वारा यों कहता है: "जब उसने आकाश को स्थापित किया तब मैं वहाँ थी, और जब उसने पृथ्वी की नींव ठहराई तब मैं उसके साथ पली हुई के समान उसके पास थी।"(3) और मूसा ने, जो सुलैमान से बहुत वर्ष पहले जीवित था, या यों कहें कि उसके द्वारा, एक यंत्र के समान, परमेश्वर के वचन ने कहा, "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।" पहले उसने "आदि"(4) और "सृष्टि"(5) का नाम लिया, फिर इस प्रकार परमेश्वर का परिचय दिया; क्योंकि परमेश्वर का नाम हल्के ढंग से और तुच्छ अवसर पर लेना उचित नहीं। क्योंकि दिव्य बुद्धि ने पहले से जान लिया था कि कुछ लोग खिलवाड़ करेंगे और ऐसे बहुत से देवताओं के नाम लेंगे जो अस्तित्व में ही नहीं हैं।
इसलिए, कि जीवित परमेश्वर अपने कामों से जाना जाए, और [यह जाना जाए कि] परमेश्वर ने अपने वचन से आकाश और पृथ्वी और उनमें जो कुछ है उसकी सृष्टि की, उसने कहा, "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।" फिर उनकी सृष्टि का वर्णन करके, वह हमें समझाता है: "और पृथ्वी बेडौल और सुनसान थी, और गहरे जल के ऊपर अंधियारा था; और परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता था।" पवित्र शास्त्र आरंभ में ही यह इसलिए सिखाता है कि दिखाए कि वह पदार्थ, जिससे परमेश्वर ने संसार को बनाया और रचा, किसी न किसी रूप में सृजा गया था, परमेश्वर से उत्पन्न हुआ था।(6)
अध्याय XI.--छः दिनों के कार्य का वर्णन।
अब, सृष्टि का आरंभ प्रकाश है; क्योंकि प्रकाश सृजी हुई वस्तुओं को प्रकट करता है। इसलिए कहा गया है: "और परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो,(7) और उजियाला हो गया; और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है," स्पष्टतः मनुष्य के लिए अच्छा बनाया गया। "और परमेश्वर ने उजियाले को अंधियारे से अलग किया; और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अंधियारे को रात कहा। और साँझ हुई और भोर हुआ, यह पहला दिन था। और परमेश्वर ने कहा, जल के बीच एक अन्तर हो, और वह जल को जल से अलग करे: और ऐसा ही हो गया। और परमेश्वर ने अन्तर को बनाया, और अन्तर के नीचे के जल को अन्तर के ऊपर के जल से अलग किया। और परमेश्वर ने अन्तर को आकाश कहा: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। और साँझ हुई और भोर हुआ, यह दूसरा दिन था। और परमेश्वर ने कहा, आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो, और सूखी भूमि दिखाई दे: और ऐसा ही हो गया। और जल अपने-अपने स्थानों में इकट्ठा हो गया, और सूखी भूमि दिखाई दी। और परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, और जल के इकट्ठा होने को समुद्र कहा: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। और परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी से घास, और बीज वाले छोटे छोटे पौधे, और फलदाई वृक्ष, जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार और उसकी समानता में हों, उगें: और ऐसा ही हो गया। और पृथ्वी ने घास, और एक एक की जाति के अनुसार बीज वाले छोटे पौधे, और फलदाई वृक्ष जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार थे, पृथ्वी पर उगाए: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। और साँझ हुई और भोर हुआ, यह तीसरा दिन था।
और परमेश्वर ने कहा, दिन को रात से अलग करने के लिए, और पृथ्वी पर प्रकाश देने के लिए आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और ऋतुओं, और दिनों, और वर्षों के लिए हों; और वे आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ होकर पृथ्वी पर प्रकाश दें: और ऐसा ही हो गया। और परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियाँ बनाईं; दिन पर प्रभुता करने के लिए बड़ी ज्योति, और रात पर प्रभुता करने के लिए छोटी ज्योति: तारे भी बनाए। और परमेश्वर ने उन्हें आकाश के अन्तर में इसलिए रखा कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें, और दिन और रात पर प्रभुता करें, और उजियाले को अंधियारे से अलग करें: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। और साँझ हुई और भोर हुआ, यह चौथा दिन था। और परमेश्वर ने कहा, जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें: और ऐसा ही हो गया। आकाश
के अन्तर में ऐसा ही हो गया। और परमेश्वर ने बड़े बड़े जलचर जन्तुओं की, और सब जाति के चलने वाले जीवित प्राणियों की, जिनसे जल बहुत ही भर गया था, और सब जाति के पंख वाले पक्षियों की सृष्टि की: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। और परमेश्वर ने उन्हें आशीष दी, कि फूलो-फलो, और समुद्र का जल भर दो, और पक्षी पृथ्वी पर बढ़ें। और साँझ हुई और भोर हुआ, यह पाँचवाँ दिन था। और परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी से एक एक जाति के अनुसार जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगने वाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु उत्पन्न हों: और ऐसा ही हो गया। और परमेश्वर ने पृथ्वी के वनपशुओं को जाति जाति के अनुसार, और घरेलू पशुओं को जाति जाति के अनुसार, और पृथ्वी पर सब रेंगने वाले जन्तुओं को बनाया। और परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार और अपनी समानता में बनाएँ; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी, और पृथ्वी पर रेंगने वाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखें। और परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की: परमेश्वर के स्वरूप में उसने उसे सृजा; नर और नारी करके उसने उन्हें सृजा। और परमेश्वर ने उन्हें आशीष दी, और उनसे कहा, फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो, और समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और सब घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी, और पृथ्वी पर रेंगने वाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो। और परमेश्वर ने कहा, देखो, मैंने सारी पृथ्वी के ऊपर जितने बीज वाले छोटे पौधे हैं और जितने वृक्षों में बीज वाले फल होते हैं, वे सब तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिए, और पृथ्वी के सब पशुओं, और आकाश के सब पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगने वाले सब जन्तुओं के लिए हैं, जिनमें जीवन का श्वास है; सब हरे हरे पौधे भोजन के लिए दिए हैं: और ऐसा ही हो गया। और परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, और देखो, वह बहुत ही अच्छा था।
और साँझ हुई और भोर हुआ, यह छठवाँ दिन था। और आकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनना समाप्त हो गया। और परमेश्वर ने छठवें दिन अपने किए हुए कामों को पूरा किया, और सातवें दिन अपने सब कामों से जो उसने किए थे विश्राम किया। और परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और उसे पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने अपने सब कामों से जिन्हें परमेश्वर ने सृजा था और बनाया था विश्राम लिया।"
अध्याय XII.--छः दिनों के कार्य की महिमा।
इन छः दिनों के कार्य के सब अंगों का योग्य विवरण और वर्णन कोई मनुष्य नहीं दे सकता, चाहे उसके दस हज़ार जीभें और दस हज़ार मुँह हों; वरन् चाहे वह इस जीवन में प्रवासी होकर दस हज़ार वर्ष जीए, तो भी वह इन बातों के योग्य कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि ऊपर वर्णित छः दिनों के कार्य में परमेश्वर की बुद्धि की अत्यधिक महानता और समृद्धि है। निश्चय ही बहुत से लेखकों ने [उस वृत्तांत की] नकल की है, और इन बातों की व्याख्या देने का प्रयास किया है; फिर भी, यद्यपि उन्होंने वहाँ से संसार की सृष्टि और मनुष्य के स्वभाव के विषय में कुछ संकेत लिए, उन्होंने सत्य की एक छोटी-सी चिंगारी भी नहीं निकाली। और दार्शनिकों, लेखकों और कवियों के कथन अपनी भाषा की सुंदरता के कारण विश्वसनीय प्रतीत होते हैं; परन्तु उनका वाद-विवाद मूर्खतापूर्ण और व्यर्थ सिद्ध होता है, क्योंकि उनकी निरर्थक तुच्छताओं की बहुतायत बहुत है; और उनमें सत्य का एक भटका हुआ टुकड़ा भी नहीं मिलता। क्योंकि यदि उनके द्वारा कोई सत्य कहा हुआ प्रतीत भी हो, तो उसमें भूल की मिलावट होती है। और जैसे कोई घातक औषधि, जब शहद या दाखमधु या किसी और वस्तु में मिलाई जाती है, तो पूरे [मिश्रण] को हानिकारक और निष्फल बना देती है; वैसे ही उनके विषय में वाक्पटुता व्यर्थ परिश्रम ठहरती है; वरन् उन लोगों के लिए हानिकारक है जो उस पर विश्वास करते हैं। इसके अतिरिक्त, [उन्होंने] सातवें दिन के विषय में [कहा], जिसे सब मनुष्य मानते हैं; परन्तु अधिकांश लोग नहीं जानते कि इब्रानियों में जो "सब्त" कहलाता है, उसका यूनानी में अनुवाद "सातवाँ" (<greek>ebdomas</greek>) होता है, यह नाम हर जाति ने अपनाया है, यद्यपि वे इस नामकरण का कारण नहीं जानते।
और जो कवि हेसियड कहता है कि अंधकार (कैओस) से एरेबस उत्पन्न हुआ, और पृथ्वी तथा प्रेम भी, जो उसके [हेसियड के] देवताओं और मनुष्यों पर प्रभुता करता है, उसका यह कथन व्यर्थ और नीरस, तथा सत्य से बिलकुल पराया सिद्ध होता है। क्योंकि यह उचित नहीं कि परमेश्वर सुख से पराजित हो; क्योंकि संयमी मनुष्य भी हर नीच सुख और दुष्ट अभिलाषा से दूर रहते हैं।
अध्याय XIII.--संसार की सृष्टि पर टिप्पणियाँ।
इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के विषय में उसकी [हेसियड की] मानवीय, तुच्छ और अत्यंत दुर्बल धारणा इसमें प्रकट होती है कि वह सब वस्तुओं की सृष्टि का वर्णन यहाँ नीचे की पार्थिव वस्तुओं से आरंभ करता है। क्योंकि मनुष्य नीचे होने के कारण पृथ्वी से निर्माण आरंभ करता है, और जब तक पहले नींव न डाल ले, तब तक क्रम से छत नहीं बना सकता। परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य इसमें दिखाई देती है कि वह सबसे पहले, अपनी इच्छा के अनुसार, बनने वाली वस्तुओं को शून्य में से रचता है। "क्योंकि जो मनुष्यों से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।"(1) इसलिए भविष्यद्वक्ता ने भी बताया कि आकाश की सृष्टि सबसे पहले, मानो एक प्रकार की छत के रूप में हुई, यह कहते हुए: "आदि में परमेश्वर ने आकाश की सृष्टि की"-- अर्थात् "आदि" सिद्धांत के द्वारा आकाश बना, जैसा हम पहले दिखा चुके हैं। और "पृथ्वी" से उसका अर्थ भूमि और नींव है, जैसे "गहरे जल" से उसका अर्थ जल की बहुतायत है; और वह "अंधियारा" इसलिए कहता है कि परमेश्वर का बनाया हुआ आकाश ढक्कन के समान जल और पृथ्वी को घेरे हुए था। और उस आत्मा से जो जल के ऊपर मण्डलाता था,
उसका अर्थ वह है जो परमेश्वर ने सृष्टि को जीवन देने के लिए दिया, जैसे उसने मनुष्य को जीवन दिया,(1) सूक्ष्म को सूक्ष्म से मिलाकर। क्योंकि आत्मा सूक्ष्म है, और जल सूक्ष्म है, ताकि आत्मा जल का पोषण करे, और जल आत्मा के साथ सर्वत्र प्रवेश करके सृष्टि का पोषण करे। क्योंकि आत्मा, जो एक था और प्रकाश का स्थान लिए हुए था,(2) जल और आकाश के बीच था, ताकि परमेश्वर के "उजियाला हो" कहने से पहले अंधकार उस आकाश से, जो परमेश्वर के अधिक निकट था, किसी भी प्रकार संपर्क न करे। इसलिए आकाश, गुंबद के आकार के आवरण के समान, मिट्टी के ढेले जैसे पदार्थ को घेरे हुए था। और इसी प्रकार यशायाह नामक एक अन्य भविष्यद्वक्ता ने इन शब्दों में कहा: "परमेश्वर ही है जिसने आकाश को मेहराब के समान बनाया, और उसे निवास के लिए तम्बू की नाईं तान दिया।"(3) तब परमेश्वर की आज्ञा, अर्थात् उसका वचन, बंद कोठरी में दीपक के समान चमकता हुआ, आकाश के नीचे सब कुछ प्रकाशित करने लगा, जब उसने संसार से अलग प्रकाश बनाया।(4) और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अंधियारे को रात कहा। क्योंकि मनुष्य न तो उजियाले को दिन कह सकता, न अंधियारे को रात, और न ही अन्य वस्तुओं के नाम रख सकता, यदि उसने नामावली उस परमेश्वर से न पाई होती जिसने वे वस्तुएँ बनाईं। इसलिए संसार के इतिहास और उत्पत्ति के आरंभ में ही पवित्र शास्त्र ने इस अन्तर [जिसे हम देखते हैं] के विषय में नहीं, परन्तु एक अन्य आकाश के विषय में कहा, जो हमारे लिए अदृश्य है, जिसके बाद इस आकाश को जिसे हम देखते हैं "अन्तर" कहा गया, और जिसमें आधा जल उठा लिया गया ताकि वह मनुष्यों के लिए वर्षा, फुहारों और ओस का काम दे। और आधा जल पृथ्वी पर नदियों, सोतों और समुद्रों के लिए छोड़ दिया गया।
फिर जब जल सारी पृथ्वी को, विशेषकर उसके गड्ढों को ढके हुए था, तब परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा जल को एक जगह इकट्ठा करवाया, और सूखी भूमि दिखाई देने लगी, जो पहले अदृश्य थी। इस प्रकार पृथ्वी दिखाई देने लगी, फिर भी बेडौल थी। इसलिए परमेश्वर ने उसे सब प्रकार की वनस्पतियों, बीजों और पौधों से रचा और सजाया।(5)
अध्याय XIV.--संसार की तुलना समुद्र से।
और फिर उनकी विविधता, भिन्न-भिन्न सुंदरता और बहुतायत पर विचार करो, और देखो कि उनके द्वारा पुनरुत्थान कैसे प्रदर्शित होता है, जो आगे होने वाले सब मनुष्यों के पुनरुत्थान का एक नमूना है। क्योंकि जो इस पर विचार करे, वह कौन है जो इस पर आश्चर्य न करेगा कि अंजीर के बीज से अंजीर का वृक्ष उत्पन्न होता है, या अन्य अत्यंत छोटे बीजों से बहुत विशाल वृक्ष उगते हैं? और हम कहते हैं कि संसार समुद्र के समान है। क्योंकि जैसे समुद्र को, यदि उसे पोषित करने के लिए नदियों और सोतों का प्रवाह और आपूर्ति न मिलती, तो उसके खारेपन के कारण वह बहुत पहले सूख गया होता; वैसे ही संसार भी, यदि उसमें परमेश्वर की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता मिठास, करुणा और धार्मिकता, और परमेश्वर की पवित्र आज्ञाओं की शिक्षा को बहाते और उमड़ाते न होते, तो उसमें जो दुष्टता और पाप बहुतायत से है, उसके कारण वह बहुत पहले ही नष्ट हो चुका होता। और जैसे समुद्र में टापू हैं, जिनमें से कुछ बसने योग्य, जल-संपन्न और उपजाऊ हैं, और उनमें बंदरगाह और घाट हैं जहाँ तूफ़ान से झकझोरे हुए लोग शरण पा सकते हैं,--वैसे ही परमेश्वर ने पापों से हाँके गए और तूफ़ान में डगमगाते संसार को सभाएँ(6) दी हैं--हमारा अर्थ पवित्र कलीसियाएँ(7) है--जिनमें सत्य की शिक्षाएँ बनी रहती हैं, जैसे उत्तम लंगर-स्थल वाले टापुओं के बंदरगाहों में; और इनमें वे लोग दौड़ आते हैं जो उद्धार पाना चाहते हैं, जो सत्य के प्रेमी हैं और परमेश्वर के क्रोध और न्याय से बचना चाहते हैं। और फिर जैसे अन्य टापू हैं, चट्टानी, जलहीन, बंजर, जंगली पशुओं से भरे, रहने के अयोग्य, और केवल नाविकों और तूफ़ान के सताए हुओं को हानि पहुँचाने के काम आने वाले, जिन पर जहाज़ टूट जाते हैं, और जो उनके बीच हाँके जाते हैं वे नष्ट हो जाते हैं,--वैसे ही भूल की शिक्षाएँ हैं--मेरा अर्थ विधर्म(7) से है--जो उनके पास जाने वालों को नष्ट कर देती हैं।
क्योंकि वे सत्य के वचन से मार्गदर्शित नहीं होते; परन्तु जैसे समुद्री डाकू, जब अपने जहाज़ भर लेते हैं,(8) तो उन्हें पूर्वोक्त स्थानों की ओर हाँक ले जाते हैं, ताकि उन्हें लूट सकें: वैसे ही उन लोगों के साथ भी होता है जो सत्य से भटकते हैं, कि वे सब अपनी भूल से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।
अध्याय XV.--चौथे दिन के विषय में।
चौथे दिन ज्योतियाँ बनाई गईं; क्योंकि पूर्वज्ञान रखनेवाले परमेश्वर ने व्यर्थ दार्शनिकों की मूर्खताओं को जान लिया कि वे यह कहने वाले हैं कि पृथ्वी पर उगनेवाली वस्तुएँ आकाशीय पिंडों से उत्पन्न होती हैं, ताकि परमेश्वर को बाहर रखा जा सके। इसलिए, कि सत्य प्रकट हो जाए, पौधे और बीज आकाशीय पिंडों से पहले उत्पन्न किए गए, क्योंकि जो बाद का है वह उसे उत्पन्न नहीं कर सकता जो पहले का है। और इनमें एक बड़े भेद का नमूना और प्रतीक है। क्योंकि सूर्य परमेश्वर का प्रतीक है, और चंद्रमा मनुष्य का। और जैसे सूर्य शक्ति और तेज में चंद्रमा से बहुत बढ़कर है, वैसे ही परमेश्वर मनुष्य से बढ़कर है। और जैसे सूर्य सदा पूर्ण रहता है, कभी घटता नहीं, वैसे ही परमेश्वर सदा सिद्ध रहता है, सब सामर्थ्य, समझ, बुद्धि, अमरता और सब भलाई से परिपूर्ण होकर। परंतु चंद्रमा प्रतिमास घटता है और एक प्रकार से मरता है, मनुष्य का प्रतीक होकर; फिर वह नया जन्म लेता और बढ़ता है, भावी पुनरुत्थान के नमूने के रूप में। इसी प्रकार वे
तीन दिन जो ज्योतियों से पहले थे,(1) त्रिएकता(2) के, अर्थात परमेश्वर, उसके वचन और उसकी बुद्धि के प्रतीक हैं।(3) और चौथा मनुष्य का प्रतीक है, जिसे प्रकाश की आवश्यकता है, कि इस प्रकार परमेश्वर, वचन, बुद्धि, मनुष्य हों। इसी कारण चौथे दिन ज्योतियाँ बनाई गईं। तारों की व्यवस्था में भी धर्मियों और भक्तों की, और उनकी जो परमेश्वर की व्यवस्था और आज्ञाओं को मानते हैं, रचना और क्रम का प्रतीक है। क्योंकि चमकीले और उज्ज्वल तारे भविष्यद्वक्ताओं की अनुकृति हैं, और इसलिए वे स्थिर रहते हैं, न घटते हैं, न एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते हैं। और जो चमक में दूसरा स्थान रखते हैं, वे धर्मियों के लोगों के प्रतीक हैं। और जो अपनी स्थिति बदलते और एक स्थान से दूसरे स्थान को भागते हैं, जो ग्रह कहलाते हैं,(4) वे भी उन मनुष्यों के प्रतीक हैं जो परमेश्वर से भटक गए हैं, उसकी व्यवस्था और आज्ञाओं को त्यागकर।
अध्याय XVI.--पाँचवें दिन के विषय में।
पाँचवें दिन जल से निकलनेवाले जीव-जंतु उत्पन्न किए गए, जिनके द्वारा इन बातों में परमेश्वर की नाना प्रकार की बुद्धि भी प्रकट होती है; क्योंकि उनकी भीड़ और अत्यंत भिन्न-भिन्न जातियों को कौन गिन सकता है? इसके अतिरिक्त, जल से उत्पन्न हुई वस्तुओं को परमेश्वर ने आशीष दी, कि यह भी इस बात का चिह्न हो कि मनुष्य जल और नये जन्म के स्नान के द्वारा मन फिराव और पापों की क्षमा पाने को ठहराए गए हैं,--उन सब के लिए जो सत्य के पास आते हैं, और नया जन्म लेते हैं, और परमेश्वर से आशीष पाते हैं। परंतु समुद्र के दानव और शिकारी पक्षी लोभी और अपराधी मनुष्यों की उपमा हैं। क्योंकि जैसे मछलियाँ और पक्षी एक ही प्रकृति के हैं,--उनमें से कुछ तो अपनी स्वाभाविक दशा में रहते हैं, और अपने से दुर्बलों की हानि नहीं करते, परंतु परमेश्वर की व्यवस्था मानते और पृथ्वी के बीज खाते हैं; और उनमें से दूसरे परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन करते हैं, और मांस खाते हैं, और अपने से दुर्बलों को हानि पहुँचाते हैं: वैसे ही धर्मी भी, परमेश्वर की व्यवस्था मानते हुए, किसी को नहीं काटते और न हानि पहुँचाते, परंतु पवित्रता और धार्मिकता से जीते हैं। पर लुटेरे, हत्यारे और अधर्मी लोग समुद्र के दानवों, जंगली पशुओं और शिकारी पक्षियों के समान हैं; क्योंकि वे वास्तव में अपने से दुर्बलों को निगल जाते हैं। तब मछलियों और रेंगनेवाले जंतुओं की जाति, यद्यपि परमेश्वर की आशीष में सहभागी थी, उसे कोई बहुत विशिष्ट गुण प्राप्त नहीं हुआ।
अध्याय XVII.--छठे दिन के विषय में।
और छठे दिन परमेश्वर ने चौपायों, जंगली पशुओं और भूमि पर रेंगनेवाले जंतुओं को बनाकर उन पर कोई आशीष नहीं दी, अपनी आशीष मनुष्य के लिए रख छोड़ी, जिसे वह छठे दिन बनानेवाला था। चौपाए और जंगली पशु भी कुछ ऐसे मनुष्यों के प्रतीक के रूप में बनाए गए, जो न परमेश्वर को जानते हैं न उसकी उपासना करते हैं, परंतु पृथ्वी की बातों पर मन लगाते हैं, और मन नहीं फिराते। क्योंकि जो अपने अधर्म से फिरते और धार्मिकता से जीते हैं, वे आत्मा में पक्षियों के समान ऊपर उड़ते हैं, और ऊपर की बातों पर मन लगाते हैं, और परमेश्वर की इच्छा को भाते हैं। परंतु जो परमेश्वर को नहीं जानते न उसकी उपासना करते हैं, वे उन पक्षियों के समान हैं जिनके पंख हैं पर जो उड़ नहीं सकते, न परमेश्वर की ऊँची बातों तक चढ़ सकते हैं। वैसे ही ऐसे लोग यद्यपि मनुष्य कहलाते हैं, तथापि पापों से दबे हुए, नीची और सांसारिक बातों पर मन लगाते हैं। और पशु जंगली पशु [<greek>qhria</greek>] कहलाते हैं, इसलिए कि उनका शिकार [<greek>qhreuesqai</greek>] किया जाता है, इसलिए नहीं कि वे आरंभ से बुरे या विषैले बनाए गए थे--क्योंकि परमेश्वर ने कुछ भी बुरा नहीं बनाया,(5) परंतु सब कुछ अच्छा, वरन बहुत अच्छा--परंतु उस पाप ने जिसमें मनुष्य सम्मिलित था उन पर बुराई ला दी। क्योंकि जब मनुष्य ने अपराध किया, तब उन्होंने भी उसके साथ अपराध किया। क्योंकि जैसे यदि घर का स्वामी स्वयं ठीक करे, तो घर के सेवक भी अवश्य ही भला व्यवहार करते हैं; परंतु यदि स्वामी पाप करे, तो सेवक भी उसके साथ पाप करते हैं; वैसे ही ऐसा हुआ कि मनुष्य के पाप के मामले में, वह स्वामी होने के कारण, जो कुछ उसके अधीन था उसने उसके साथ पाप किया। इसलिए जब मनुष्य फिर अपनी स्वाभाविक दशा में लौट आएगा, और फिर बुराई नहीं करेगा, तब वे भी अपनी मूल कोमलता में पुनःस्थापित किए जाएँगे।
अध्याय XVIII.--मनुष्य की सृष्टि।
परंतु मनुष्य की सृष्टि के विषय में, उसकी अपनी सृष्टि मनुष्य द्वारा समझाई नहीं जा सकती, यद्यपि पवित्र शास्त्र उसका संक्षिप्त वर्णन देता है। क्योंकि जब परमेश्वर ने कहा, "हम मनुष्य को अपने स्वरूप में अपनी समानता के अनुसार बनाएँ," तब वह पहले मनुष्य की प्रतिष्ठा को सूचित करता है। क्योंकि परमेश्वर ने सब कुछ अपने वचन से बनाकर, उन सबको केवल गौण कार्य गिना, और मनुष्य की सृष्टि को ही अपने हाथों के योग्य एकमात्र कार्य गिना। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर ऐसा पाया जाता है मानो सहायता चाहता हो, जब वह कहता है, "हम मनुष्य को अपने स्वरूप में अपनी समानता के अनुसार बनाएँ।" परंतु उसने अपने वचन और बुद्धि के सिवा और किसी से नहीं कहा, "हम बनाएँ।" और जब उसने उसे बनाया और आशीष दी, कि वह बढ़े और पृथ्वी को भर दे, तो उसने सब कुछ उसके अधिकार और सेवा में कर दिया; और आरंभ से ही ठहराया कि वह पृथ्वी के फलों, बीजों, जड़ी-बूटियों और बलूत के फलों से भोजन पाए, और उसी समय यह भी ठहराया कि
पशु मनुष्य के समान स्वभाव के हों, कि वे भी पृथ्वी के सब बीज खा सकें।
अध्याय XIX.--मनुष्य को स्वर्गोद्यान (पैराडाइज़) में रखा गया।
परमेश्वर ने इस प्रकार छठे दिन आकाश, पृथ्वी, समुद्र और उनमें जो कुछ है उसे पूरा करके, सातवें दिन अपने किए हुए सब कार्यों से विश्राम किया। तब पवित्र शास्त्र इन शब्दों में सारांश देता है: "यह आकाश और पृथ्वी की उत्पत्ति का वृत्तांत है, जब वे सृजे गए, उस दिन जब यहोवा परमेश्वर ने पृथ्वी और आकाश को बनाया, और मैदान का हर एक हरा पौधा उसके उगने से पहले, और मैदान की हर एक जड़ी-बूटी उसके उगने से पहले। क्योंकि परमेश्वर ने पृथ्वी पर जल नहीं बरसाया था, और भूमि को जोतने के लिए मनुष्य भी न था।"(1) इससे वह हमें सूचित करता है कि उस समय सारी पृथ्वी एक दिव्य सोते से सींची जाती थी, और उसे जोतने के लिए मनुष्य की आवश्यकता न थी; परंतु पृथ्वी परमेश्वर की आज्ञा से सब कुछ अपने आप उपजाती थी, ताकि मनुष्य उसे जोतने से थके नहीं। परंतु ताकि मनुष्य की सृष्टि स्पष्ट हो जाए, और मनुष्यों के बीच कोई अनसुलझी समस्या न दिखाई दे, क्योंकि परमेश्वर ने कहा था, "हम मनुष्य को बनाएँ;" और उसकी सृष्टि का वर्णन अभी स्पष्ट नहीं हुआ था, शास्त्र हमें सिखाता है, कहते हुए: "और पृथ्वी से एक सोता फूटा, और सारी भूमि के ऊपर को सींचा; और परमेश्वर ने भूमि की मिट्टी से मनुष्य को रचा, और उसके मुँह में जीवन का श्वास फूँका, और मनुष्य जीवित प्राणी बन गया।"(2) इसी से अधिकांश लोगों द्वारा प्राण को अमर कहा जाता है।(3) और मनुष्य की रचना के बाद, परमेश्वर ने उसके लिए पूर्व के स्थानों में एक प्रदेश चुना, जो प्रकाश में उत्कृष्ट, अति उज्ज्वल वायुमंडल से चमकता हुआ, [और] उत्तम पौधों से [भरपूर] था; और उसमें उसने मनुष्य को रखा।
अध्याय XX.--स्वर्गोद्यान का शास्त्रीय वर्णन।
शास्त्र पवित्र इतिहास के शब्दों को इस प्रकार बताता है: "और परमेश्वर ने पूर्व की ओर अदन में एक वाटिका लगाई; और वहाँ उसने उस मनुष्य को रखा जिसे उसने रचा था। और परमेश्वर ने भूमि से हर एक वृक्ष उगाया जो देखने में मनोहर और खाने में अच्छा था; वाटिका के बीच में जीवन का वृक्ष भी, और भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष भी। और उस वाटिका को सींचने के लिए अदन से एक नदी निकली; वहाँ से वह चार धाराओं में बँट गई। पहली का नाम पीशोन है: यह वही है जो हवीला के सारे देश को घेरे हुए है, जहाँ सोना है; और उस देश का सोना उत्तम है, और वहाँ मोती और सुलेमानी पत्थर भी हैं। और दूसरी नदी का नाम गीहोन है: यह वही है जो कूश के सारे देश को घेरे हुए है। और तीसरी नदी दजला है: यह वही है जो सीरिया की ओर बहती है। और चौथी नदी फरात है। और यहोवा परमेश्वर ने उस मनुष्य को जिसे उसने बनाया था लिया, और उसे वाटिका में रखा, कि उसे जोते और उसकी रखवाली करे। और परमेश्वर ने आदम को आज्ञा दी, कि वाटिका के हर एक वृक्ष का फल तू स्वतंत्रता से खा सकता है; पर भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल तुम न खाना; क्योंकि जिस दिन तुम उसे खाओगे उसी दिन अवश्य मर जाओगे। और यहोवा परमेश्वर ने कहा, मनुष्य का अकेला रहना अच्छा नहीं; हम उसके लिए एक उपयुक्त सहायक बनाएँ। और परमेश्वर ने भूमि से मैदान के सब पशुओं और आकाश के सब पक्षियों को रचा, और उन्हें आदम के पास लाया। और आदम ने हर एक जीवित प्राणी का जो नाम रखा, वही उसका नाम हुआ। और आदम ने सब घरेलू पशुओं, आकाश के पक्षियों और मैदान के सब पशुओं के नाम रखे। परंतु आदम के लिए कोई उपयुक्त सहायक न मिला। और परमेश्वर ने आदम पर गहरी बेसुधी डाली, और वह सो गया; और उसने उसकी पसलियों में से एक ली, और उसकी जगह मांस भर दिया।
और उस पसली को, जिसे यहोवा परमेश्वर ने मनुष्य में से लिया था, उसने एक स्त्री बनाया, और उसे आदम के पास लाया। और आदम ने कहा, यह अब मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे मांस में का मांस है; यह नारी कहलाएगी, क्योंकि यह नर में से निकाली गई है। इसलिए मनुष्य अपने पिता और माता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे। और वे दोनों, आदम और उसकी पत्नी, नंगे थे, और लज्जित न थे।
अध्याय XXI.--मनुष्य के पतन के विषय में।
"और सर्प मैदान के सब पशुओं से, जिन्हें यहोवा परमेश्वर ने बनाया था, अधिक चतुर था। और सर्प ने स्त्री से कहा, क्या सच है कि परमेश्वर ने कहा, तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना? स्त्री ने सर्प से कहा, हम वाटिका के वृक्षों का फल खाते हैं, पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है, न तो तुम उसे खाना, और न उसे छूना, नहीं तो मर जाओगे। तब सर्प ने स्त्री से कहा, तुम निश्चय न मरोगे। क्योंकि परमेश्वर जानता है कि जिस दिन तुम उसे खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले-बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वरों के तुल्य हो जाओगे। और स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिए चाहने योग्य है; तब उसने उसका कुछ फल लेकर खाया, और अपने पति को भी, जो उसके साथ था, दिया: और उन्होंने खाया। तब उन दोनों की आँखें खुल गईं, और उन्हें मालूम हुआ कि वे नंगे हैं; और उन्होंने अंजीर के पत्ते सीकर अपने लिए लंगोट बना लिए। और उन्होंने यहोवा परमेश्वर का शब्द सुना, जो टहलता हुआ
बाग़ में दिन के ठंडे समय में, और आदम और उसकी पत्नी ने अपने को वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर की उपस्थिति से छिपा लिया। और यहोवा परमेश्वर ने आदम को पुकारकर कहा, तू कहाँ है? उसने उससे कहा, मैंने वाटिका में तेरा शब्द सुना, और मैं डर गया, क्योंकि मैं नंगा था, और मैंने अपने को छिपाया। उसने उससे कहा, तुझे किसने बताया कि तू नंगा है? क्या तूने उस वृक्ष का फल खाया है जिसके विषय में मैंने तुझे आज्ञा दी थी कि तू न खाना? आदम ने कहा, जिस स्त्री को तूने मेरे साथ रहने को दिया, उसने मुझे उस वृक्ष का फल दिया, और मैंने खाया। परमेश्वर ने स्त्री से कहा, यह तूने क्या किया है? स्त्री ने कहा, सर्प ने मुझे बहकाया, और मैंने खाया। तब यहोवा परमेश्वर ने सर्प से कहा, तूने यह किया है इसलिए तू पृथ्वी के सब पशुओं में शापित है; तू छाती और पेट के बल चलेगा, और जीवन भर मिट्टी खाएगा: और मैं तेरे और स्त्री के बीच, और तेरे वंश और उसके वंश के बीच बैर उत्पन्न करूँगा; वह तेरे सिर को कुचलेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।(1) और स्त्री से उसने कहा, मैं तेरे दुःख और तेरी प्रसव-पीड़ा को बहुत बढ़ाऊँगा: तू पीड़ा के साथ बच्चे जनेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा। और आदम से उसने कहा, क्योंकि तूने अपनी पत्नी की बात सुनी, और उस वृक्ष का फल खाया जिसके विषय में मैंने तुझे आज्ञा दी थी, कि तू उसे न खाना; भूमि तेरे कामों के कारण(2) शापित है: तू उसकी उपज दुःख के साथ जीवन भर खाएगा; वह तेरे लिए काँटे और ऊँटकटारे उगाएगी; और तू मैदान की उपज खाएगा।
तू अपने माथे के पसीने की रोटी खाएगा, जब तक तू भूमि में न लौट जाए; क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है: तू मिट्टी है और मिट्टी में ही फिर मिल जाएगा।"(3) मनुष्य और स्वर्गोद्यान के इतिहास के विषय में पवित्र शास्त्र का वर्णन यही है।
अध्याय XXII.--परमेश्वर के टहलने की बात क्यों कही गई।
तब तुम मुझसे कहोगे: "तुमने कहा था कि परमेश्वर किसी स्थान में समाया नहीं जा सकता, तो अब कैसे कहते हो कि वह स्वर्गोद्यान में टहला?" सुनो मैं क्या कहता हूँ। सब का परमेश्वर और पिता तो समाया नहीं जा सकता, और किसी स्थान में नहीं पाया जाता, क्योंकि उसके विश्राम का कोई स्थान नहीं; परंतु उसका वचन, जिसके द्वारा उसने सब कुछ बनाया, जो उसकी सामर्थ्य और उसकी बुद्धि है, सब के पिता और प्रभु का स्वरूप(4) धारण करके, परमेश्वर के स्वरूप में उस वाटिका में गया, और आदम से बातचीत की। क्योंकि पवित्र लेख स्वयं हमें सिखाता है कि आदम ने कहा कि उसने शब्द सुना था। परंतु यह शब्द परमेश्वर के वचन के सिवा और क्या है, जो उसका पुत्र भी है? ऐसा नहीं जैसा कवि और कथा-लेखक देवताओं के पुत्रों के विषय में कहते हैं कि वे [स्त्रियों के] संसर्ग से उत्पन्न हुए, परंतु जैसा सत्य बताता है, कि वचन जो सदा विद्यमान है, परमेश्वर के हृदय में निवास करता है। क्योंकि किसी वस्तु के होने से पहले उसने उसे अपना सलाहकार रखा, जो उसका अपना मन और विचार था। परंतु जब परमेश्वर ने जो ठहराया था वह सब बनाना चाहा, तब उसने इस वचन को उत्पन्न किया, जो प्रकट किया गया,(5) सारी सृष्टि का पहलौठा, इसलिए नहीं कि वह स्वयं वचन [विवेक] से रिक्त हो गया, परंतु विवेक को उत्पन्न करके, और सदा अपने विवेक से बातचीत करते हुए। और इसलिए पवित्र लेख हमें सिखाते हैं, और सब आत्मा-वाहक [प्रेरित] मनुष्य भी, जिनमें से एक, यूहन्ना, कहता है, "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था,"(6) यह दिखाते हुए कि आरंभ में परमेश्वर अकेला था, और वचन उसमें था। फिर वह कहता है, "वचन परमेश्वर था; सब कुछ उसी के द्वारा अस्तित्व में आया; और उसके बिना एक भी वस्तु अस्तित्व में न आई।" तब वचन, जो परमेश्वर है, और परमेश्वर से स्वाभाविक रूप से(7) उत्पन्न हुआ है, जब कभी सब का पिता चाहता है, उसे किसी भी स्थान को भेजता है; और वह आकर, उसके द्वारा भेजा हुआ होकर, सुना भी जाता है और देखा भी जाता है, और एक स्थान में पाया जाता है।
अध्याय XXIII.--उत्पत्ति के वृत्तांत की सत्यता।
इसलिए परमेश्वर ने मनुष्य को छठे दिन बनाया, और इस सृष्टि को सातवें दिन के बाद प्रकट किया, जब उसने पैराडाइज़ (स्वर्ग-वाटिका) भी बनाई, कि वह एक उत्तम और स्पष्ट रूप से श्रेष्ठ स्थान में रहे। और यह सत्य है, इसे स्वयं तथ्य ही प्रमाणित करता है। क्योंकि कोई कैसे न देख सके कि स्त्रियाँ प्रसव के समय जो पीड़ाएँ सहती हैं, और उसके बाद अपने श्रम को भूल जाने का जो सुख पाती हैं, वे इसलिए भेजी गई हैं कि परमेश्वर का वचन पूरा हो, और मनुष्यों की जाति बढ़े और फैले?(8) और क्या हम सर्प का दंड भी नहीं देखते,--वह अपने पेट के बल कितनी घृणित रीति से रेंगता और मिट्टी खाता है,--कि हमारे पास यह भी पहले कही गई बातों का प्रमाण हो?
अध्याय XXIV.--पैराडाइज़ का सौंदर्य।
तब परमेश्वर ने पृथ्वी से हर वह वृक्ष उगाया जो देखने में सुंदर और खाने में अच्छा है। क्योंकि आरंभ में केवल वही वस्तुएँ थीं जो तीसरे दिन उत्पन्न हुईं,--पौधे, बीज और घास-पात; परंतु जो वस्तुएँ पैराडाइज़ में थीं, वे
अधिक श्रेष्ठ सुंदरता और शोभा से बनाई गई थीं, क्योंकि उसमें के पौधों के विषय में कहा गया है कि वे परमेश्वर द्वारा लगाए गए थे। शेष पौधों के विषय में तो संसार में उन जैसे पौधे थे; परंतु वे दो वृक्ष,--जीवन का वृक्ष और ज्ञान का वृक्ष,--पृथ्वी के शेष भाग में नहीं थे, केवल पैराडाइज़ में थे। और पैराडाइज़ पृथ्वी ही है, और पृथ्वी पर लगाया गया है, यह पवित्र शास्त्र बताता है, यह कहते हुए:(1) "और यहोवा परमेश्वर ने पूर्व की ओर अदन में पैराडाइज़ लगाया, और वहाँ मनुष्य को रखा; और यहोवा परमेश्वर ने भूमि से हर वह वृक्ष उगाया जो देखने में मनोहर और खाने में अच्छा है।" इसलिए "भूमि से" और "पूर्व की ओर" इन कथनों से पवित्र लेख हमें स्पष्ट सिखाता है कि पैराडाइज़ इसी आकाश के नीचे है, जिसके नीचे पूर्व और पृथ्वी हैं। और इब्रानी शब्द अदन का अर्थ "आनंद" है। और यह संकेत किया गया कि पैराडाइज़ को सींचने के लिए अदन से एक नदी निकली, और उसके बाद चार शाखाओं में बँट जाती है; जिनमें पीशोन और गीहोन नामक दो पूर्वी भागों को सींचती हैं, विशेषकर गीहोन, जो इथियोपिया के पूरे देश को घेरती है, और जो, वे कहते हैं, मिस्र में नील नाम से फिर प्रकट होती है। और अन्य दो नदियाँ हमें स्पष्ट पहचानी जाती हैं--जिन्हें टाइग्रिस और यूफ्रेटीज़ कहते हैं--क्योंकि ये हमारे ही प्रदेशों की सीमा पर हैं। और जैसा कहा गया, परमेश्वर ने मनुष्य को पैराडाइज़ में रखकर, उसे जोतने और रखवाली करने के लिए, सब वृक्षों से खाने की आज्ञा दी,--स्पष्टतः जीवन के वृक्ष से भी; परंतु केवल ज्ञान के वृक्ष से उसने चखने की मनाही की। और परमेश्वर ने उसे उस पृथ्वी से, जिससे वह उत्पन्न किया गया था, पैराडाइज़ में स्थानांतरित किया, और उसे उन्नति के साधन दिए, कि वह परिपक्व और सिद्ध होकर, यहाँ तक कि ईश्वर घोषित होकर, इस प्रकार अमरता को धारण किए हुए स्वर्ग में चढ़ जाए।
क्योंकि मनुष्य एक मध्य स्वभाव का बनाया गया था, न पूरी तरह नश्वर, न पूरी तरह अमर, परंतु दोनों के योग्य; वैसे ही स्थान, पैराडाइज़, सौंदर्य की दृष्टि से पृथ्वी और स्वर्ग के बीच का बनाया गया। और "उसे जोतने"(2) के कथन से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने के सिवा और किसी प्रकार का श्रम अभिप्रेत नहीं है, ऐसा न हो कि अवज्ञा करके वह अपना ही नाश कर ले, जैसा कि वास्तव में उसने पाप के द्वारा अपना नाश कर लिया।
अध्याय XXV.--ज्ञान के वृक्ष से खाने की मनाही में परमेश्वर न्यायी ठहरा।
ज्ञान का वृक्ष स्वयं अच्छा था, और उसका फल भी अच्छा था। क्योंकि, जैसा कुछ लोग समझते हैं, मृत्यु वृक्ष में नहीं, अवज्ञा में थी। क्योंकि फल में ज्ञान के सिवा और कुछ नहीं था; परंतु ज्ञान तब अच्छा है जब कोई उसका विवेक से उपयोग करे।(3) परंतु आदम, अभी आयु में शिशु होने के कारण, तब तक ज्ञान को योग्य रीति से ग्रहण करने में असमर्थ था। क्योंकि अब भी, जब बच्चा जन्मता है तो तुरंत रोटी नहीं खा सकता, पर पहले दूध से पोषित होता है, और फिर वर्षों की वृद्धि के साथ ठोस आहार तक पहुँचता है। आदम के साथ भी ऐसा ही होता; क्योंकि कुछ लोगों के अनुमान के अनुसार, ईर्ष्या करने वाले के रूप में परमेश्वर ने उसे ज्ञान न खाने की आज्ञा नहीं दी। परंतु वह उसकी परीक्षा भी लेना चाहता था कि वह उसकी आज्ञा के प्रति विनम्र है या नहीं। और साथ ही वह चाहता था कि मनुष्य, शिशु होते हुए,(4) कुछ और समय तक सरल और निष्कपट बना रहे। क्योंकि यह न केवल परमेश्वर के साथ, वरन मनुष्यों के साथ भी पवित्र है कि सरलता और निष्कपटता में माता-पिता के अधीन रहा जाए। और यदि बच्चों का माता-पिता के अधीन होना उचित है, तो सब वस्तुओं के परमेश्वर और पिता के अधीन होना कितना अधिक? इसके अतिरिक्त, यह अशोभनीय है कि शैशव में बच्चे अपनी आयु से अधिक बुद्धिमान हों; क्योंकि जैसे कद में कोई क्रमबद्ध प्रगति से बढ़ता है, वैसे ही बुद्धि में भी।
परंतु जैसे जब कोई व्यवस्था किसी वस्तु से दूर रहने की आज्ञा दे, और कोई उसका पालन न करे, तो स्पष्ट है कि दंड का कारण व्यवस्था नहीं, वरन अवज्ञा और उल्लंघन है;--क्योंकि पिता कभी-कभी अपने ही बच्चे को कुछ बातों से दूर रहने का आदेश देता है, और जब वह पिता की आज्ञा नहीं मानता, तो अवज्ञा के कारण कोड़े खाता और दंड पाता है; और इस स्थिति में वे कार्य स्वयं कोड़ों का [कारण] नहीं हैं, वरन अवज्ञा अवज्ञाकारी के लिए दंड लाती है;--वैसे ही पहले मनुष्य के लिए अवज्ञा ने पैराडाइज़ से उसका निष्कासन करवाया। इसलिए ऐसा नहीं कि ज्ञान के वृक्ष में कोई बुराई थी; वरन अपनी अवज्ञा से मनुष्य ने, मानो किसी सोते से, श्रम, पीड़ा, शोक खींचे, और अंत में मृत्यु का शिकार हुआ।
अध्याय XXVI.--मनुष्य को पैराडाइज़ से निकालने में परमेश्वर की भलाई।
और परमेश्वर ने मनुष्य पर इसमें बड़ी कृपा दिखाई कि उसने उसे सदा पाप में बने रहने नहीं दिया; वरन मानो एक प्रकार के निर्वासन द्वारा, उसे पैराडाइज़ से निकाल दिया, कि निर्धारित समय के भीतर दंड के द्वारा पाप का प्रायश्चित करके और अनुशासित होकर वह बाद में पुनः स्थापित किया जाए। इसलिए जब मनुष्य इस संसार में रचा गया, तो उत्पत्ति में रहस्यपूर्ण रीति से लिखा गया है मानो वह दो बार पैराडाइज़ में रखा गया हो; ताकि एक तब पूरा हुआ जब वह वहाँ रखा गया, और दूसरा पुनरुत्थान और न्याय के बाद पूरा होगा। क्योंकि जैसे कोई पात्र, गढ़े जाने पर उसमें कुछ दोष हो, तो उसे फिर ढाला या फिर बनाया जाता है कि वह नया और पूरा हो जाए; वैसे ही मृत्यु द्वारा मनुष्य के साथ होता है। क्योंकि किसी न किसी रीति से
वह तोड़ा जाता है, कि पुनरुत्थान में पूर्ण होकर उठे; मेरा अर्थ है निष्कलंक, धर्मी और अमर। और जहाँ तक परमेश्वर के पुकारने और यह कहने की बात है, "हे आदम, तू कहाँ है?" परमेश्वर ने यह इसलिए नहीं किया कि वह इससे अनजान था; वरन दीर्घसहनशील होकर उसने उसे पश्चाताप और अंगीकार का अवसर दिया।
अध्याय XXVII.--मनुष्य का स्वभाव।
परंतु कोई हमसे कहेगा, क्या मनुष्य स्वभाव से नश्वर बनाया गया था? निश्चय ही नहीं। तो क्या वह अमर था? हम यह भी नहीं कहते। परंतु कोई कहेगा, तो क्या वह कुछ भी नहीं था? यह भी निशाने पर नहीं बैठता। वह स्वभाव से न नश्वर था न अमर। क्योंकि यदि उसने उसे आरंभ से अमर बनाया होता, तो उसे ईश्वर बना दिया होता। फिर, यदि उसने उसे नश्वर बनाया होता, तो उसकी मृत्यु का कारण परमेश्वर प्रतीत होता। इसलिए उसने उसे न अमर बनाया न नश्वर, वरन, जैसा हमने ऊपर कहा, दोनों के योग्य; ताकि यदि वह परमेश्वर की आज्ञा मानते हुए अमरता की बातों की ओर झुके, तो उससे प्रतिफल के रूप में अमरता पाए और ईश्वर बन जाए; परंतु यदि, दूसरी ओर, वह परमेश्वर की अवज्ञा करते हुए मृत्यु की बातों की ओर मुड़े, तो वह स्वयं अपनी मृत्यु का कारण हो। क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को स्वतंत्र और अपने ऊपर अधिकार वाला बनाया।(1) इसलिए जो कुछ मनुष्य ने लापरवाही और अवज्ञा से अपने ऊपर खींचा, वही परमेश्वर अब अपने मनुष्य-प्रेम और दया से उसे दान के रूप में देता है, जब मनुष्य उसकी आज्ञा मानते हैं।(2) क्योंकि जैसे मनुष्य ने अवज्ञा करके अपने ऊपर मृत्यु खींची; वैसे ही परमेश्वर की इच्छा का पालन करके, जो चाहता है वह अपने लिए अनंत जीवन प्राप्त कर सकता है। क्योंकि परमेश्वर ने हमें व्यवस्था और पवित्र आज्ञाएँ दी हैं; और जो कोई इन्हें मानता है वह बचाया जा सकता है, और पुनरुत्थान पाकर अविनाशिता का उत्तराधिकारी हो सकता है।
अध्याय XXVIII.--हव्वा आदम की पसली से क्यों रची गई।
और आदम पैराडाइज़ से निकाले जाने पर, इस दशा में अपनी पत्नी हव्वा को जान गया, जिसे परमेश्वर ने उसकी पसली से उसके लिए पत्नी के रूप में रचा था। और यह उसने इसलिए नहीं किया कि वह पत्नी को अलग से बनाने में असमर्थ था, वरन परमेश्वर ने पहले से जान लिया था कि मनुष्य अनेक देवताओं को पुकारेगा। और इस पूर्वज्ञान के साथ, और यह जानते हुए कि सर्प के द्वारा भ्रम अनेक ऐसे देवताओं को प्रवेश कराएगा जिनका कोई अस्तित्व नहीं,--क्योंकि एक ही परमेश्वर होते हुए भी, तब भी भ्रम यह कहकर देवताओं की भीड़ फैलाने का यत्न कर रहा था, "तुम देवताओं के समान हो जाओगे;"--ऐसा न हो कि यह समझा जाए कि एक परमेश्वर ने पुरुष को और दूसरे ने स्त्री को बनाया, इसलिए उसने दोनों को बनाया; और परमेश्वर ने स्त्री को पुरुष के साथ बनाया, न केवल इसलिए कि इस प्रकार परमेश्वर के एकमात्र शासन का रहस्य प्रकट हो, वरन इसलिए भी कि उनका पारस्परिक स्नेह अधिक हो। इसलिए आदम ने हव्वा से कहा, "यह अब मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे मांस में का मांस है।" और इसके अतिरिक्त उसने भविष्यवाणी करते हुए कहा, "इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा; और वे दोनों एक तन होंगे;"(3) जो स्वयं हम में भी पूरा होता है। क्योंकि जो विधिपूर्वक विवाह करता है, वह कौन है जो माता और पिता को, अपने सारे पारिवारिक संबंध को, और अपने पूरे घराने को तुच्छ नहीं जानता, अपनी पत्नी से मिलकर और उसके साथ एक होकर, स्नेह से उसे ही वरीयता देता? यहाँ तक कि अक्सर अपनी पत्नियों के लिए कुछ लोग मृत्यु तक सह लेते हैं। इस हव्वा को, आरंभ में सर्प द्वारा धोखा दिए जाने और पाप की जननी बनने के कारण, उस दुष्ट दुष्टात्मा ने, जो शैतान भी कहलाता है, जिसने तब सर्प के द्वारा उससे बात की, और जो आज तक अपने वश में पड़े लोगों में कार्य करता है, "हव्वा" कहकर पुकारा।(4) और वह "दुष्टात्मा" और "अजगर" इसलिए कहलाता है कि उसने परमेश्वर से [<greek>apodedrakenai</greek>] विद्रोह किया।
क्योंकि आरंभ में वह एक स्वर्गदूत था। और उसके इतिहास के विषय में बहुत कुछ कहने को है; इसलिए मैं अभी उसका वर्णन छोड़ता हूँ, क्योंकि मैंने उसका वृत्तांत दूसरी जगह भी दिया है।
अध्याय XXIX.--कैन का अपराध।
तब जब आदम अपनी पत्नी हव्वा को जान गया, तो वह गर्भवती हुई और एक पुत्र जना, जिसका नाम कैन था; और उसने कहा, "मैंने यहोवा की सहायता से एक मनुष्य पाया है।" और फिर उसने दूसरा पुत्र जना, जिसका नाम हाबिल था, "जो भेड़-बकरियों का चरवाहा बना, परंतु कैन भूमि जोतने वाला।"(5) उनका इतिहास बहुत पूर्ण वर्णन पाता है, वरन विस्तृत व्याख्या भी:(6) इसलिए "संसार की उत्पत्ति" नामक पुस्तक स्वयं उन लोगों को, जो उनकी कथा जानने के इच्छुक हैं, अधिक यथार्थ रूप से बता सकती है। जब शैतान ने आदम और उसकी पत्नी को न केवल अब भी जीवित, वरन संतान उत्पन्न करते देखा--उन्हें मार डालने में सफल न होने के कारण द्वेष से भरकर,--जब उसने देखा कि हाबिल परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला है, तो उसने कैन नामक उसके भाई के हृदय पर काम किया, और उससे अपने भाई हाबिल को मरवा डाला। और इस प्रकार इस संसार में मृत्यु का आरंभ हुआ, कि आज तक मनुष्य की हर जाति में अपना मार्ग बना ले। परंतु परमेश्वर ने, दयालु होकर, और कैन को भी, आदम की तरह, पश्चाताप और अंगीकार का अवसर देना चाहकर, कहा, "तेरा भाई हाबिल कहाँ है?" परंतु कैन ने परमेश्वर को ढिठाई से उत्तर दिया,
यह कहते हुए, "मैं नहीं जानता; क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?" परमेश्वर ने इस प्रकार उस पर क्रोधित होकर कहा, "तूने क्या किया है? तेरे भाई के लहू की आवाज़ भूमि से मुझे पुकार रही है, जिसने तेरे हाथ से तेरे भाई का लहू पीने के लिए अपना मुँह खोला। तू पृथ्वी पर कराहता और काँपता रहेगा।" उस समय से पृथ्वी भय के कारण अब मनुष्य का लहू ग्रहण नहीं करती,(1) नहीं, किसी पशु का लहू भी नहीं; जिससे प्रकट होता है कि [मृत्यु का] कारण वह नहीं, वरन अपराध करने वाला मनुष्य है।
अध्याय XXX.--कैन का परिवार और उनके आविष्कार।
कैन के भी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम हनोक था; और उसने एक नगर बसाया, जिसका नाम उसने अपने पुत्र के नाम पर हनोक रखा। उसी समय से नगरों के निर्माण का आरंभ हुआ, और यह जलप्रलय से पहले की बात है; जैसा कि होमर झूठ कहता है:(2)--"मनुष्यों ने अभी तक कोई नगर नहीं बसाया था।"
और हनोक के एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम गैदाद था; उससे मेएल नामक पुत्र उत्पन्न हुआ; और मेएल से मतूशेला, और मतूशेला से लेमेक। और लेमेक ने अपने लिए दो पत्नियाँ लीं, जिनके नाम आदा और ज़िल्ला थे। उस समय बहुविवाह और संगीत का आरंभ हुआ। क्योंकि लेमेक के तीन पुत्र थे: याबाल, यूबाल, तूबल। याबाल पशुपालक बना और तंबुओं में रहा; परंतु यूबाल वह है जिसने सारंगी और वीणा को प्रचलित किया; और तूबल लोहार बना, पीतल और लोहे का गढ़ने वाला। यहाँ तक कैन का वंश दर्ज है; और शेष के विषय में, उसके वंश की संतान उसके अपने भाई के हत्यारे होने के कारण विस्मृति में डूब गई। और हाबिल के स्थान पर परमेश्वर ने हव्वा को एक पुत्र गर्भ में धारण करने और जन्म देने का वरदान दिया, जो शेत कहलाया, जिससे शेष मानव जाति आज तक चली आती है। और जो लोग सब पीढ़ियों के विषय में जानकारी चाहते हैं, उनके लिए पवित्र शास्त्रों के द्वारा स्पष्टीकरण देना सरल है। क्योंकि, जैसा हम पहले उल्लेख कर चुके हैं, यह विषय, अर्थात मनुष्य की वंशावली का क्रम, हमने एक अन्य प्रवचन में, इतिहास की पहली पुस्तक में, आंशिक रूप से निपटाया है।(3) और ये सब बातें हमें पवित्र आत्मा सिखाता है, जो मूसा और अन्य भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बोलता है, ताकि हम भक्तों के लेख सब लेखकों और कवियों से अधिक प्राचीन, वरन अधिक सच्चे भी प्रमाणित हों। परंतु संगीत के विषय में भी कुछ ने कल्पित किया है कि अपोलो उसका आविष्कारक था, और अन्य कहते हैं कि ओर्फियस ने पक्षियों के मधुर स्वरों से संगीत-कला खोजी। उनकी कहानी खोखली और व्यर्थ प्रमाणित होती है, क्योंकि ये आविष्कारक जलप्रलय के बहुत वर्ष बाद जीवित थे। और नूह के विषय में, जिसे कुछ लोग देउकालियोन कहते हैं, हमने पहले उल्लिखित पुस्तक में समझाया है, और यदि आप चाहें तो उसे पढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं।
अध्याय XXXI.--जलप्रलय के बाद का इतिहास।
जलप्रलय के बाद फिर नगरों और राजाओं का आरंभ हुआ, इस प्रकार:--पहला नगर बाबुल था, और एरेख, और अक्कद, और कलने, शिनार देश में। और उनका राजा नेब्रोत [निम्रोद] कहलाया। इनसे अश्शूर निकला, जिससे अश्शूरी भी अपना नाम पाते हैं। और निम्रोद ने नीनवे और रहोबोत, और कालह, और नीनवे तथा कालह के बीच रेसेन नगर बसाए; और नीनवे एक बहुत बड़ा नगर बन गया। और नूह के पुत्र शेम के एक और पुत्र मिस्राईम ने लूदीम, और अनामीम, और लहाबीम, और नप्तूहीम, और पत्रूसीम, और कसलूहीम को जन्म दिया, जिनसे पलिश्ती निकले। परंतु नूह के तीनों पुत्रों, और उनकी मृत्यु तथा वंशावली का, हमने उपर्युक्त पुस्तक में संक्षिप्त लेखा दे दिया है। परंतु अब हम नगरों और राजाओं के विषय में शेष तथ्यों का, और उन बातों का उल्लेख करेंगे जो तब घटीं जब एक ही बोली और एक ही भाषा थी। भाषाओं के विभाजन से पहले ये पूर्वोक्त नगर विद्यमान थे। परंतु जब मनुष्य बिखरने को थे, तो उन्होंने परमेश्वर की प्रेरणा से नहीं, वरन अपने ही निर्णय से परामर्श किया कि एक नगर और एक मीनार बनाएँ जिसकी चोटी आकाश तक पहुँचे, ताकि वे अपने लिए एक प्रतापी नाम बना सकें। इसलिए, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध एक भव्य कार्य का प्रयास करने का साहस किया था, परमेश्वर ने उनका नगर नष्ट कर दिया और उनकी मीनार गिरा दी। उसी समय से उसने मनुष्यों की भाषाओं को गड़बड़ा दिया, और प्रत्येक को भिन्न बोली दी। और सिबिल ने भी इसी प्रकार कहा, जब उसने घोषणा की कि संसार पर क्रोध आएगा। वह कहती है:--
"जब महान परमेश्वर की वे धमकियाँ पूरी होंगी, जिनसे उसने पहले मनुष्यों को धमकाया था, जब अश्शूर देश में उन्होंने मीनार बनाई, और सब एक ही बोली के थे, और चाहते थे कि तारों-भरे आकाश तक चढ़ जाएँ, तब अमर ने एक प्रचंड आँधी उठाई और उन पर कठोर विवशता डाली; क्योंकि जब आँधी ने उस विशाल मीनार को गिरा दिया, तब मनुष्यों में भीषण कलह और घृणा उठी। एक बोली बदलकर अनेक बोलियाँ हो गई, और पृथ्वी नाना जातियों और राजाओं से भर गई।"
और इसी प्रकार आगे। तो ये बातें कसदियों के देश में घटीं। और कनान देश में हारान नाम का एक नगर था। और उन दिनों में फिरौन, जो मिस्रियों द्वारा नेकाओत भी कहलाता था, मिस्र का पहला राजा था, और इस प्रकार राजा क्रम से आए।(4) और शिनार देश में, जो कस-
दी कहलाते हैं, पहला राजा अरिओक था, और उसके बाद एल्लासर, और उसके बाद एलाम का राजा कदोर्लाओमेर, और उसके बाद तिदाल, जो अश्शूरी कहलाने वाली जातियों का राजा था। और नूह के पुत्र हाम के प्रदेश में पाँच और नगर थे; पहला सदोम, फिर अमोरा, अदमा, सबोयीम, और बाला, जो सोअर भी कहलाता था। और उनके राजाओं के नाम ये हैं: सदोम का राजा बेरा; अमोरा का राजा बिर्शा; अदमा का राजा शिनाब; सबोयीम का राजा शेमेबेर; सोअर का राजा बेला, जो केफालाक भी कहलाता है।(1) ये अश्शूरियों के राजा कदोर्लाओमेर की बारह वर्ष तक सेवा करते रहे, और तेरहवें वर्ष में उन्होंने कदोर्लाओमेर के विरुद्ध विद्रोह किया; और इस प्रकार उस समय ऐसा हुआ कि चार अश्शूरी राजाओं ने पाँच राजाओं से युद्ध किया। पृथ्वी पर युद्ध करने का यह पहला आरंभ था; और उन्होंने कर्नैम के दैत्यों को, और उनके साथ उनके नगर में जो बलवान जातियाँ थीं उन्हें, और सेईर नामक पहाड़ों के होरियों को, पारान के मैदान तक जो जंगल के पास है, नष्ट कर दिया। और उस समय सालेम नगर में मलिकिसिदक नाम का एक धर्मी राजा था, जो अब यरूशलेम है। यह परमप्रधान परमेश्वर के सब याजकों में पहला याजक था;(2) और उसी से उपर्युक्त हीरोसोलिमा नगर यरूशलेम कहलाया।(3) और उसके समय से सारी पृथ्वी पर याजक पाए गए। और उसके बाद गरार में अबीमेलेक ने राज्य किया; और उसके बाद एक और अबीमेलेक ने। फिर हित्ती उपनाम वाले एप्रोन ने राज्य किया। पूर्वकाल में जो राजा थे उनके नाम ये हैं। और अश्शूरियों के शेष राजे, अनेक वर्षों के अंतराल में, अलिखित और मौन छोड़ दिए गए हैं, क्योंकि सब लेखक हमारे हाल के दिनों की घटनाओं का वर्णन करते हैं।
अश्शूर के ये राजा हुए: तिग्लत-पिलेसर, और उसके बाद शल्मनेसेर, फिर सन्हेरीब; और इथियोपियाई अद्रम्मेलेक, जिसने मिस्र पर भी राज्य किया, उसका त्रिशासक था;--यद्यपि ये बातें हमारी पुस्तकों की तुलना में बिलकुल हाल की हैं।
अध्याय XXXII.--मानव जाति कैसे बिखर गई।
इसलिए, इसी से विद्या और प्राचीनता के प्रेमी इस इतिहास को समझें, और देखें कि जो बातें हमारे द्वारा पवित्र भविष्यद्वक्ताओं से अलग बताई जाती हैं वे हाल की हैं।(4) क्योंकि यद्यपि आरंभ में अरब और कसदियों के देश में थोड़े ही मनुष्य थे, फिर भी अपनी भाषाओं के विभाजित हो जाने के बाद वे धीरे-धीरे बढ़ने और सारी पृथ्वी पर फैलने लगे; और उनमें से कुछ वहाँ बसने के लिए पूर्व की ओर गए, और कुछ बड़े महाद्वीप के भागों की ओर, और कुछ उत्तर की ओर, यहाँ तक कि आर्कटिक प्रदेशों में ब्रिटेन तक फैल गए। और अन्य लोग कनान देश में गए, जो यहूदिया कहलाता है, और फीनीके में, और इथियोपिया के प्रदेश में, और मिस्र में, और लीबिया में, और उस देश में जो तप्त कहलाता है, और पश्चिम की ओर फैले हुए भागों में; और शेष समुद्र के किनारे के स्थानों में, और पंफूलिया, और एशिया, और यूनान, और मकिदुनिया में, और इसके अतिरिक्त इटली में, और गॉल नामक सारे देश में, और स्पेन तथा जर्मनी में गए; ताकि अब सारा संसार इस प्रकार निवासियों से भरा है। इसलिए जब संसार पर मनुष्यों का अधिकार पहले तीन भागों में था,--पूर्व में, दक्षिण में, और पश्चिम में: उसके बाद, जब मनुष्य बहुत अधिक हो गए, तब पृथ्वी के शेष भाग बसाए गए। और लेखक, इन बातों को न जानते हुए, यह दावा करने को उतावले हैं कि संसार गोले के आकार का है, और इसकी तुलना घन से करते हैं। परंतु जब वे संसार की सृष्टि और उसकी आबादी के विषय में जानते ही नहीं, तो इन बातों के विषय में जो सत्य है वह कैसे कह सकते हैं? जैसा हम पहले कह चुके हैं, मनुष्य धीरे-धीरे संख्या में बढ़ते और पृथ्वी पर बहुगुणित होते गए, तब समुद्र के द्वीप और शेष देश भी बसाए गए।
अध्याय XXXIII.--लौकिक इतिहास इन बातों का कोई वृत्तांत नहीं देता।
तो जो ज्ञानी, कवि और इतिहासकार कहलाते हैं, उनमें से कौन हमें इन बातों के विषय में सच्चाई से बता सकता है, जबकि वे स्वयं बहुत बाद में उत्पन्न हुए, और बहुत-से देवताओं को प्रस्तुत करते हैं जो नगरों के इतने वर्ष बाद उत्पन्न हुए, और राजाओं, जातियों और युद्धों से भी अधिक आधुनिक हैं? क्योंकि उन्हें जलप्रलय से पहले घटी घटनाओं तक की, संसार की सृष्टि और मनुष्य की रचना की, और घटनाओं के पूरे क्रम की चर्चा करनी चाहिए थी। मिस्र या कसदी भविष्यद्वक्ताओं और अन्य लेखकों को ये बातें ठीक-ठीक बताने में समर्थ होना चाहिए था, यदि वे कम से कम दिव्य और शुद्ध आत्मा से बोलते थे, और जो कुछ उन्होंने कहा उस सब में सत्य बोलते थे; और उन्हें केवल बीती या वर्तमान बातें ही नहीं, वरन वे बातें भी घोषित करनी चाहिए थीं जो संसार पर आने वाली थीं। इसलिए यह प्रमाणित होता है कि अन्य सब भूल में रहे हैं; और केवल हम मसीहियों ने ही सत्य पाया है, क्योंकि हमें पवित्र आत्मा ने सिखाया है, जिसने पवित्र भविष्यद्वक्ताओं में बोलकर सब बातें पहले से बता दीं।
अध्याय XXXIV.--भविष्यद्वक्ताओं ने जीवन की पवित्रता की आज्ञा दी।
और आगे, काश कि आप कृपालु भाव से दिव्य बातों की जाँच करें--मेरा अभिप्राय उन बातों से है जो भविष्यद्वक्ताओं द्वारा कही गई हैं--ताकि हमारे कथनों की दूसरों के कथनों से तुलना करके आप सत्य को खोज सकें। हमने(2) उनके अपने इतिहासों से, जो उन्होंने संकलित किए, दिखा दिया है कि जो देवता कहलाते हैं उनके नाम उन मनुष्यों के नाम पाए जाते हैं जो उनके बीच रहते थे, जैसा हमने ऊपर दिखाया है। और आज तक उनकी मूर्तियाँ, "मनुष्यों के हाथ की कारीगरी" की प्रतिमाएँ, प्रतिदिन गढ़ी जाती हैं। और मूर्खों की भीड़ इनकी सेवा करती है, जबकि वे सब वस्तुओं के रचयिता और बनाने वाले और प्राण की सारी साँस के पोषक को ठुकराते हैं, अपने पिता-दादों से मिली निर्बुद्धि परंपरा के छल के कारण व्यर्थ शिक्षाओं पर विश्वास करते हैं। परंतु परमेश्वर ने, जो सब का पिता और सृजनहार है, कम से कम मानव जाति को नहीं त्यागा, वरन व्यवस्था दी, और पवित्र भविष्यद्वक्ताओं को भेजा कि वे मनुष्य जाति को घोषणा करें और सिखाएँ, ताकि हम में से प्रत्येक जागे और समझे कि एक ही परमेश्वर है। और उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि हम अवैध मूर्तिपूजा, और व्यभिचार, और हत्या, और बदचलनी, चोरी, लोभ, झूठी शपथ, क्रोध, और हर प्रकार के असंयम और अशुद्धता से बचें; और जो कुछ मनुष्य नहीं चाहेगा कि उसके साथ किया जाए, वह दूसरे के साथ न करे; और इस प्रकार जो धार्मिकता से कार्य करता है वह अनंत दंडों से बचेगा, और परमेश्वर की ओर से अनंत जीवन के योग्य समझा जाएगा।
अध्याय XXXV.--भविष्यवाणी की पुस्तकों से उपदेश।
इसलिए दिव्य व्यवस्था न केवल मूर्तियों की उपासना को, वरन आकाशीय पिंडों, सूर्य, चंद्रमा, या अन्य तारों की उपासना को भी वर्जित करती है; वरन न आकाश, न पृथ्वी, न समुद्र, न सोते, न नदियाँ पूजी जानी चाहिए, परंतु हमें हृदय की पवित्रता और उद्देश्य की सच्चाई के साथ केवल जीवित और सच्चे परमेश्वर की सेवा करनी चाहिए, जो संसार का रचयिता भी है। इसलिए पवित्र व्यवस्था कहती है: "तू व्यभिचार न करना; तू चोरी न करना; तू झूठी गवाही न देना; तू अपने पड़ोसी की पत्नी का लालच न करना।" भविष्यद्वक्ता भी ऐसा ही कहते हैं। सुलैमान तो हमें सिखाता है कि हमें आँख की एक झपक से भी पाप नहीं करना चाहिए,(3) यह कहते हुए: "तेरी आँखें सीधी देखें, और तेरी पलकें तेरे आगे सीधी दृष्टि करें।"(4) और मूसा ने, जो स्वयं भी भविष्यद्वक्ता था, परमेश्वर के एकमात्र शासन के विषय में कहा: "तुम्हारा परमेश्वर वही है जो आकाश को स्थिर करता है, और पृथ्वी को रचता है, जिसके हाथों ने आकाश की सारी सेना को उत्पन्न किया; और उसने इन्हें तुम्हारे सामने इसलिए नहीं रखा कि तुम इनके पीछे चलो।"(5) और यशायाह भी स्वयं कहता है: "यहोवा परमेश्वर, जिसने आकाश को स्थापित किया, और पृथ्वी और उसमें की सब वस्तुओं की नींव डाली, और उस पर के लोगों को साँस, और उसमें चलने वालों को आत्मा देता है, यों कहता है। यही तुम्हारा परमेश्वर यहोवा है।"(6) और फिर उसके द्वारा वह कहता है: "मैंने पृथ्वी को, और उस पर मनुष्य को बनाया।
मैंने अपने हाथ से आकाश को स्थापित किया।"(7) और दूसरे अध्याय में, "यह तुम्हारा परमेश्वर है, जिसने पृथ्वी के छोर सृजे; वह न भूखा होता है, न थकता है, और उसकी समझ की खोज नहीं हो सकती।"(8) वैसे ही यिर्मयाह कहता है: "जिसने अपनी शक्ति से पृथ्वी को बनाया, और अपनी बुद्धि से जगत को स्थिर किया, और अपनी समझ से आकाश को तान दिया, और आकाश में जल का समूह रखा, और पृथ्वी के छोरों से बादलों को उठाया; उसने वर्षा के साथ बिजलियाँ बनाईं, और अपने भंडारों से पवन निकाले।"(9) कोई भी देख सकता है कि सब भविष्यद्वक्ताओं ने कितनी संगति और सामंजस्य से बात की, एक ही आत्मा के द्वारा परमेश्वर की एकता, संसार की सृष्टि और मनुष्य की रचना के विषय में वाणी देकर। इसके अतिरिक्त, वे घोर पीड़ा में थे, मनुष्यों की भक्तिहीन जाति के लिए विलाप करते थे, और जो बुद्धिमान दिखाई देते थे उन्हें उनकी भूल और हृदय की कठोरता के लिए डाँटते थे। यिर्मयाह ने सचमुच कहा: "हर मनुष्य उसके ज्ञान से पशु-समान भटक गया है; हर सुनार अपनी खुदी हुई मूर्तियों से लज्जित होता है; चाँदी का कारीगर व्यर्थ ढली हुई मूर्तियाँ बनाता है; उनमें साँस नहीं है: उनके दंड के दिन वे नष्ट हो जाएँगी।"(10) दाऊद भी यही कहता है: "वे भ्रष्ट हो गए हैं, उन्होंने घृणित काम किए हैं; कोई भलाई करने वाला नहीं, एक भी नहीं; सब बहक गए हैं, सब मिलकर निकम्मे हो गए हैं।"(11) वैसे ही हबक्कूक: "खुदी हुई मूर्ति से क्या लाभ कि उसके गढ़ने वाले ने उसे झूठी मूर्ति गढ़ा? हाय उस पर जो पत्थर से कहता है, जाग; और काठ से, उठ।"(12) अन्य भविष्यद्वक्ताओं ने भी सत्य के विषय में इसी प्रकार कहा। और मैं भविष्यद्वक्ताओं की भीड़ का वर्णन क्यों करूँ, जो अनेक हैं, और जिन्होंने दस हज़ार बातें संगति और सामंजस्य से कहीं?
क्योंकि जो चाहें, वे उनके कहे को पढ़कर सत्य को ठीक-ठीक समझ सकते हैं, और फिर मत और निष्फल परिश्रम के बहाव में नहीं बहेंगे। तो ये, जिनका हमने पहले उल्लेख किया, इब्रानियों में भविष्यद्वक्ता थे,--अनपढ़, और चरवाहे, और अशिक्षित।
अध्याय XXXVI.--सिबिल की भविष्यवाणियाँ।
और सिबिल ने, जो यूनानियों और अन्य जातियों में एक भविष्यवक्तिन थी, अपनी भविष्यवाणी के आरंभ में मनुष्य जाति को धिक्कारते हुए कहा:--
"तुम अब भी इतनी जल्दी कैसे घमंड में उठ जाते हो, और जीवन के अंत के विषय में इतने बेसोच कैसे हो, हे नश्वर मनुष्यो, जो शरीर के हो और कुछ भी नहीं हो? क्या तुम परमप्रधान परमेश्वर से नहीं काँपते, न डरते? तुम्हारा निरीक्षक, जानने वाला, सबका देखने वाला, जो उन्हें सदा सँभाले रखता है जिन्हें उसके हाथ ने पहले बनाया, अपनी मधुर आत्मा को अपनी सब कृतियों में डालता है, और उसे नश्वर मनुष्यों को मार्गदर्शक के रूप में देता है। केवल एक ही अनुत्पन्न परमेश्वर है, जो अकेला राज्य करता है, सर्वशक्तिमान, अत्यंत महान, जिससे कुछ भी छिपा नहीं। वह सब कुछ देखता है, पर स्वयं किसी नश्वर आँख से नहीं दिखता। क्या नश्वर मनुष्य अमर परमेश्वर को देख सकता है, या मांसल आँखें, जो दोपहर की किरणों से बचती हैं, उसे देख सकती हैं जो आकाशों के पार रहता है? तो उस स्वयंभू परमेश्वर की उपासना करो, जगत के अजन्मा शासक की, जो अनादि काल से अकेला था, और अनंत काल तक बना रहेगा। बुरी सम्मतियों का फल तुम काटोगे, क्योंकि तुमने सच्चे परमेश्वर का आदर नहीं किया, न उसे पवित्र हेकाटोंब अर्पित किए। जो अधोलोक में रहते हैं उन्हें तुम भेंट देते हो, और दुष्टात्माओं को बलि चढ़ाते हो। उन्माद और अहंकार में तुम चलते हो; और सही मार्ग को छोड़कर, दूर भटकते हो, और गड्ढों और काँटों में अपने आप को खो देते हो। हे मूर्ख मनुष्यो, तुम इस प्रकार क्यों भटकते हो? काली, अँधेरी रात में अपना व्यर्थ भटकना बंद करो; जब देखो, तुम्हारे लिए धन्य ज्योति चमक रही है, तो अंधकार और सदा के घोर तम के पीछे क्यों चलते हो? देखो, वह निर्मल है--उसमें कोई दाग नहीं। इसलिए अंधकार से फिरो, और दिन को देखो; बुद्धिमान बनो, और अपने हृदय में बुद्धि का धन संचित करो। एक ही परमेश्वर है जो हवाएँ और वर्षा, भूकंप, बिजलियाँ, महामारियाँ, अकाल, हिमआँधियाँ और बर्फ़, और हमारी दुखी जाति पर आने वाले सब कष्ट भेजता है। और केवल यही नहीं, वरन अन्य सब वस्तुएँ भी वही देता है, स्वर्ग और पृथ्वी में सर्वशक्तिमान होकर राज्य करता हुआ, और अनंतकाल से स्वयंभू रहता हुआ।"
और उन [देवताओं] के विषय में जो जन्मे हुए कहे जाते हैं, उसने कहा:-- "यदि जो कुछ जन्मता है वह मरता भी अवश्य है, तो परमेश्वर किसी नश्वर मनुष्य से उत्पन्न नहीं हो सकता। परंतु केवल एक है, सर्वोच्च, जिसने आकाशों को उनकी सारी तारों की सेना सहित, सूर्य और चंद्रमा को बनाया; और उसी प्रकार फलवंत पृथ्वी को, समुद्र की सारी लहरों के साथ, और पहाड़ों, सोतों और सदा बहने वाली नदियों को; उसी ने समुद्री जीवों की असंख्य भीड़ भी बनाई, और पृथ्वी और समुद्र दोनों के सब रेंगने वाले जीवों को वही जीवित रखता है; और पक्षियों का सारा सुरीला गायक-दल उसी ने बनाया, जो पंखों से वायु को चीरते हैं, और तीखी बाँसुरी के समान भोर में अपना कोमल, स्पष्ट स्वर का गीत गाते हैं। पहाड़ों की गहरी घाटियों में उसने हिंसक पशुओं की जाति रखी; और मनुष्यों के अधीन सब पशु कर दिए, मनुष्य को परमेश्वर की रची हुई प्रतिमा और सब पर शासक बनाकर, और बहुत-सी अगम्य बातों को उसके अधिकार में रखकर। क्योंकि नश्वरों में कौन इन सब बातों को जान सकता है? केवल वही जानता है जिसने आरंभ में इन्हें बनाया, वह सृष्टिकर्ता, अविनाशी, जो ऊपर की वायु में सदा निवास करता है; जो भले लोगों को अत्यंत समृद्ध प्रतिफल देता है, और बुरे तथा अधर्मी मनुष्यों के विरुद्ध बदला, क्रोध और रक्तरंजित युद्ध, महामारी और अनेक आँसू भरे शोक भड़काता है। हे व्यर्थ ही ऊँचे उठाए गए मनुष्य--बता, तूने अपने आप को इस प्रकार पूरी तरह क्यों नष्ट कर लिया? क्या पशुओं को देवता मानकर पूजते तुम्हें लज्जा नहीं आती? और यह विश्वास करना कि देवता तुम्हारे पशु चुरा लेंगे, या उन्हें तुम्हारे बर्तनों की आवश्यकता है--क्या यह उन्माद का सबसे निष्फल और मूर्खतापूर्ण विचार नहीं? सुनहरे आकाशों में रहने के बदले, तुम अपने देवताओं को कीड़ों और घिनौने तथा अशुद्ध जीवों के झुंडों का आहार बनते देखते हो। हे मूर्खो! तुम साँपों, कुत्तों और बिल्लियों की, पक्षियों की, और पृथ्वी तथा समुद्र के रेंगने वाले जीवों की, हाथों से बनी प्रतिमाओं की, पत्थर की मूर्तियों की, और मार्ग के किनारे रखे कूड़े के ढेरों की पूजा करते हो।
"इन सबको, और इनके अतिरिक्त और भी बहुत-सी व्यर्थ वस्तुओं को तुम पूजते हो, उन वस्तुओं की उपासना करते हो जिनका नाम लेना भी लज्जाजनक है: ये वे देवता हैं जो व्यर्थ मनुष्यों को भटकाते हैं, जिनके मुँह से घातक विष की धाराएँ बहती हैं। परंतु उस के आगे जिसमें अकेले जीवन है, जीवन, और अविनाशी, अनंत ज्योति; जो मनुष्य के जीवन के प्याले में ऐसा रस उँडेलता है जो उसके स्वाद में मधु से भी अधिक मीठा है,-- उसी के आगे सिर झुकाओ, केवल उसी के आगे, और अनंत शांति के मार्गों पर चलो। उसे छोड़कर तुम सब मुड़ गए हो, और अपनी उन्मत्त मूर्खता में न्याय का वह प्याला, बिना मिलावट का, शुद्ध, वश में करने वाला, प्रबल, पी गए हो; और तुम फिर कभी होश में न आओगे, तुम फिर स्वस्थ मन तक न पहुँचोगे, और अपने परमेश्वर और राजा को न जानोगे, जो सब पर दृष्टि रखता है: इसलिए तुम पर जलती हुई आग आएगी, और तुम प्रतिदिन ज्वालाओं में जलते रहोगे, अपने निकम्मे देवताओं से सदा के लिए लज्जित होकर। परंतु जो अनंत परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे अनंत जीवन के अधिकारी होंगे, आनंद के खिलते हुए लोकों में बसते हुए, और तारों-भरे स्वर्ग से आए मीठे भोजन का भोज करते हुए।"
ये बातें सच्ची, उपयोगी, न्यायसंगत और सब मनुष्यों के लिए लाभदायक हैं, यह स्पष्ट है। कवियों ने भी दुष्टों के दंड के विषय में कहा है।
अध्याय XXXVII.--कवियों की गवाहियाँ।
और यह कि कुकर्मियों को उनके कर्मों के अनुसार अवश्य दंड मिलना चाहिए, इसे कुछ कवियों ने पहले ही मानो भविष्यवाणी के रूप में कह दिया है, अपने विरुद्ध और दुष्टों के विरुद्ध गवाह के रूप में, यह घोषित करते हुए कि वे दंडित होंगे। एस्किलस ने कहा:--"जिसने किया है उसे भुगतना भी होगा।" और पिंडार ने स्वयं कहा:-- "उचित है कि करने के पीछे पीड़ा आए।" वैसे ही यूरिपिडीज़ ने:--"कर्म ने तुम्हें प्रसन्न किया--अब पीड़ा सहो; पकड़े गए शत्रु को पीड़ा होनी ही चाहिए।" और फिर:--"शत्रु की पीड़ा वीर की महिमा है।" और इसी प्रकार आर्किलोकस ने:-- "एक बात मैं जानता हूँ, उसे सदा सत्य मानता हूँ, कि बुराई करने वाला बुराई ही भुगतेगा।"
और यह कि परमेश्वर सब देखता है, और कोई बात उसकी दृष्टि से नहीं बचती, परंतु दीर्घसहनशील होकर वह उस समय तक रुका रहता है जब वह न्याय करेगा--इसके विषय में भी डायोनिसियस ने कहा:--"न्याय की आँख, जो सब देखती है, फिर भी न देखती-सी लगती है।"
और यह कि परमेश्वर का न्याय होने वाला है, और बुराइयाँ दुष्टों पर अचानक आ पड़ेंगी,--इसे भी एस्किलस ने घोषित किया, कहते हुए:--
"भाग्य का आगमन द्रुतगामी है, और कोई न्याय का उल्लंघन नहीं कर सकता, पर देर-सबेर उसके कठोर हाथ को अनुभव करता है। "वह अनसुना, अनदेखा भी तुम्हारे साथ है; तुम रात का परदा बीच में खींच लेते हो, पर नींद भी कोई आड़ नहीं देती। "तुम सोओ या जागो, वह तुम्हारे साथ है; और यदि तुम बाहर अपनी राह लो, तो उसकी शांत, कठोर चौकसी तुम तोड़ नहीं सकते। "वह तुम्हारा पीछा करेगा, या तुम्हारा मार्ग काटेगा; और रात में भी ऐसा कोई गुण नहीं जो तुम्हें प्रतिशोधी के क्रोध से छिपा सके। "बुराई को दिखाने के लिए अंधकार भाग जाता है; तब यदि पाप आनंद या सुख प्रस्तुत करे, तो रुको, और सोचो कि कोई देख रहा है!" और क्या हम सिमोनाइडीज़ को भी उद्धृत न करें?-- "मनुष्यों पर कोई बुराई बिना पूर्व-सूचना के नहीं आती; पर परमेश्वर अचानक हाथ से सब कुछ बदल देता है।"
यूरिपिडीज़ फिर:--
"दुष्ट और अहंकारी मनुष्य की समृद्धि रेत पर टिकी है: उसका वंश नहीं टिकता; और समय मनुष्यों की दुष्टता को प्रकट कर देता है।"
फिर एक बार यूरिपिडीज़:--"देवता न्याय के बिना नहीं है, वह तब देखता है जब शपथें अधर्म से ली जाती हैं, और जब वे अनिच्छुक मनुष्यों से बलपूर्वक निकलवाई जाती हैं।"
और सोफोक्लीज़:--
"यदि तुम बुराई करते हो, तो बुराई तुम्हें सहनी भी होगी।"
कि परमेश्वर झूठी शपथ के विषय में और हर अन्य दुष्टता के विषय में भी पूछताछ करेगा, यह उन्होंने स्वयं लगभग पहले ही कह दिया है। और संसार के भस्म होने के विषय में उन्होंने, चाहे इच्छा से चाहे अनिच्छा से, भविष्यद्वक्ताओं के अनुरूप ही कहा है, यद्यपि वे बहुत अधिक हाल के थे, और इन बातों को उन्होंने व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं से चुराया। कवि भविष्यद्वक्ताओं की गवाही की पुष्टि करते हैं।
अध्याय XXXVIII.--यूनानी कवियों और दार्शनिकों की शिक्षाएँ इब्रानी भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षाओं की पुष्टि करती हैं।
परंतु इससे क्या अंतर पड़ता है कि वे उनसे पहले हुए या बाद में? निश्चय ही उन्होंने किसी भी स्थिति में ऐसी बातें कहीं जो भविष्यद्वक्ताओं की पुष्टि करती हैं। संसार के भस्म होने के विषय में मलाकी भविष्यद्वक्ता ने पहले ही कहा: "प्रभु का दिन जलते हुए भट्ठे के समान आता है, और सब दुष्टों को भस्म कर देगा।"(1) और यशायाह ने: "क्योंकि परमेश्वर का क्रोध प्रचंड ओलावृष्टि के समान, और उमड़ती पहाड़ी धारा के समान है।"(2) इस प्रकार सिबिल ने और अन्य भविष्यद्वक्ताओं ने, वरन कवियों और दार्शनिकों ने भी, धार्मिकता, न्याय और दंड के विषय में स्पष्ट शिक्षा दी है; और प्रोविडेंस के विषय में भी, कि परमेश्वर हमारी चिंता करता है, न केवल हममें से जीवितों की, परंतु उनकी भी जो मर चुके हैं: यद्यपि उन्होंने यह अनिच्छा से कहा, क्योंकि वे सत्य द्वारा कायल किए गए थे। और भविष्यद्वक्ताओं में सुलैमान ने मृतकों के विषय में कहा, "तेरे शरीर के लिए चंगाई होगी, और तेरी हड्डियों की देखभाल की जाएगी।"(3) और दाऊद भी यही कहता है, "जो हड्डियाँ तूने तोड़ी हैं वे आनंद करेंगी।"(4) और इन वचनों के अनुरूप तिमोक्लीज़ का यह कथन था:--"प्रेममय परमेश्वर द्वारा मृतकों पर दया की जाती है।"
और बहुत से देवताओं की चर्चा करने वाले लेखक अंत में परमेश्वर की एकता के सिद्धांत तक पहुँचे, और जिन्होंने संयोग को माना उन्होंने प्रोविडेंस की भी बात की; और दंडहीनता के पक्षधरों ने स्वीकार किया कि न्याय होगा, और जिन्होंने इनकार किया कि मृत्यु के बाद संवेदना होती है उन्होंने माना कि होती है। इसलिए होमर ने, यद्यपि यह कहा था,--"क्षणिक स्वप्न-सी आत्मा चली गई,"(5) दूसरी जगह कहता है:-- "देहहीन आत्मा अधोलोक को गई;"(5) और फिर:--"कि मैं शीघ्र अधोलोक के फाटकों से निकल जाऊँ, मुझे गाड़ दो।"(7)
और जहाँ तक उन अन्य लोगों का संबंध है जिन्हें आपने पढ़ा है, मेरा विचार है कि आप भली-भाँति जानते हैं कि उन्होंने अपने आप को कैसे व्यक्त किया। परंतु ये सब बातें हर वह व्यक्ति समझेगा जो परमेश्वर की बुद्धि को खोजता है, और विश्वास, धार्मिकता और भले कार्यों के करने के द्वारा उसे प्रसन्न करता है। क्योंकि उन भविष्यद्वक्ताओं में से एक ने, जिनका हम पहले उल्लेख कर चुके हैं, जिसका नाम होशे है, कहा, "बुद्धिमान कौन है, कि वह इन बातों को समझे? समझदार कौन है, कि वह इन्हें जाने? क्योंकि यहोवा के मार्ग सीधे हैं, और धर्मी उन पर चलेंगे: परंतु अपराधी उनमें गिरेंगे।"(8) इसलिए जो सीखना चाहता है, उसे बहुत सीखना चाहिए।(9) अतः [मुझसे] अधिक बार मिलने का प्रयत्न कीजिए, ताकि जीवित वाणी सुनकर आप सत्य को ठीक-ठीक जान सकें।
थियुफिलुस की ओर से औतोलिकुस के नाम।
पुस्तक तीन।
अध्याय I.--औतोलिकुस अभी भी आश्वस्त नहीं हुआ।
थियुफिलुस की ओर से औतोलिकुस को नमस्कार: यह देखते हुए कि लेखक व्यर्थ घमंड के लिए बहुत सी पुस्तकें रचना पसंद करते हैं,--कोई देवताओं, युद्धों और कालक्रम के विषय में, और कोई निरर्थक किंवदंतियों के विषय में, तथा ऐसे ही अन्य व्यर्थ परिश्रम के विषय में, जिनमें तुम भी अब तक अपने को लगाते आए हो, और उस परिश्रम को सहने में हिचकिचाते नहीं; परन्तु तुम मुझसे बातचीत करने पर भी अब तक यही मानते हो कि सत्य का वचन एक निकम्मी कहानी है, और यह समझते हो कि हमारे लेख नए और आधुनिक हैं;--इस कारण मैं भी परमेश्वर की सहायता से तुम्हारे सामने अपनी पुस्तकों की प्राचीनता को संक्षेप में प्रस्तुत करने का परिश्रम करने से पीछे नहीं हटूँगा, और थोड़े शब्दों में तुम्हें उसका स्मरण दिलाऊँगा, ताकि तुम उसे पढ़ने का परिश्रम करने से न कतराओ, वरन् अन्य लेखकों की मूर्खता को पहचान सको।
अध्याय II.--लौकिक लेखकों के पास सत्य को जानने का कोई साधन नहीं था।
क्योंकि उचित था कि जिन्होंने लिखा, वे स्वयं उन बातों के प्रत्यक्षदर्शी होते जिनके विषय में उन्होंने दावे किए, या उन्हें देखने वालों से ठीक-ठीक जान लेते; क्योंकि जो लोग अनिश्चित बातों के विषय में लिखते हैं वे हवा को पीटते हैं। क्योंकि होमर को त्रोय का युद्ध रचकर और बहुतों को धोखा देकर क्या लाभ हुआ; या हेसियोद को उनकी देववंशावली की सूची रचने से, जिन्हें वह देवता कहता है; या ओर्फियस को तीन सौ पैंसठ देवताओं को रचने से, जिन्हें उसने अपने जीवन के अंत में अस्वीकार कर दिया, और अपने उपदेशों में यह दृढ़ता से कहा कि एक ही परमेश्वर है? अरातुस को, या उन्हें जो उसी के समान मत रखते थे, संसार-मंडल के गोल-शास्त्र से मनुष्यों में यश के सिवा क्या लाभ मिला? और वह भी उन्होंने अपनी योग्यता के अनुसार नहीं पाया। और उन्होंने कौन सा सत्य कहा? या यूरीपिदीस और सोफोक्लीस को, या अन्य दुखांत नाटककारों को, उनके दुखांत नाटकों से क्या भला हुआ? या मेनांदर और अरिस्तोफेनीस को, और अन्य हास्य नाटककारों को उनके हास्य नाटकों से? या हेरोदोतस और थूकीदीदीस को उनके इतिहासों से? या पाइथागोरस को मंदिरों(1) और हर्क्युलीस के स्तंभों से, या डायोजीनीस को निंदकवादी दर्शन से? एपिक्यूरस को यह मानने से क्या लाभ हुआ कि कोई ईश्वरीय विधान नहीं है; या एम्पेदोक्लीस को नास्तिकता सिखाने से; या सुकरात को कुत्ते, हंस, चिनार के वृक्ष, बिजली से मारे गए अस्क्लेपियस, और उन दुष्टात्माओं की शपथ खाने से, जिन्हें वह पुकारता था? और उसने स्वेच्छा से मृत्यु क्यों स्वीकार की? उसे मृत्यु के बाद कौन सा प्रतिफल, या किस प्रकार का, पाने की आशा थी? प्लेटो की संस्कृति-पद्धति से उसे क्या लाभ हुआ? या शेष दार्शनिकों को अपने सिद्धांतों से क्या लाभ मिला, जिन सबकी गिनती हम नहीं करते, क्योंकि वे बहुत हैं? परन्तु हम ये बातें इसलिए कहते हैं कि उनके निरर्थक और अधर्मी मतों को प्रकट करें।
अध्याय III.--उनके विरोधाभास।
क्योंकि इन सब ने व्यर्थ और खोखली ख्याति पर मोहित होकर न स्वयं सत्य को जाना, और न दूसरों को सत्य की ओर चलाया: क्योंकि जो बातें उन्होंने स्वयं कहीं वे ही उन्हें असंगत बोलने का दोषी ठहराती हैं; और उनमें से अधिकांश ने अपने ही सिद्धांतों को ढहा दिया। क्योंकि उन्होंने न केवल एक-दूसरे का खंडन किया, बल्कि कुछ ने तो अपनी ही शिक्षाओं को मूर्खतापूर्ण बना दिया; इसलिए उनकी ख्याति लज्जा और मूर्खता में परिणत हुई, क्योंकि समझदार लोग उन्हें दोषी ठहराते हैं। क्योंकि या तो उन्होंने देवताओं के विषय में दावे किए, और बाद में सिखाया कि कोई देवता नहीं है; या यदि उन्होंने संसार की सृष्टि के विषय में भी कहा, तो अंत में कहा कि सब कुछ अपने आप उत्पन्न हुआ। हाँ, ईश्वरीय विधान की बात करते हुए भी, उन्होंने फिर सिखाया कि संसार ईश्वरीय विधान से शासित नहीं है। परन्तु क्या? जब उन्होंने सम्माननीय आचरण के विषय में भी लिखने का प्रयास किया, तो क्या उन्होंने लंपटता, जारकर्म और व्यभिचार करना नहीं सिखाया; और क्या उन्होंने घृणित और अकथनीय दुष्टता नहीं चलाई? और वे घोषणा करते हैं कि उनके देवता अकथनीय
व्यभिचार के कार्य करने में और भयानक भोजों में अग्रणी थे। क्योंकि कौन शनि को अपनी ही संतानों को निगलते हुए, और ज्यूपिटर को अपने पुत्र मेटिस को निगलकर देवताओं के लिए भयंकर भोज तैयार करते हुए नहीं गाता, जिस भोज में, वे कहते हैं, लंगड़े लोहार वल्कन ने परोसने का काम किया; और कैसे ज्यूपिटर ने न केवल अपनी ही बहन जूनो से विवाह किया, बल्कि अशुद्ध मुँह से घृणित दुष्टता भी की? और उसके शेष कर्म, जितने कवि गाते हैं, उनसे तुम परिचित होगे, ऐसा संभव है। नेपच्यून और अपोलो, या बैकस और हर्क्युलीस, वक्षःप्रिय मिनर्वा और निर्लज्ज वीनस के कर्मों का और वर्णन मैं क्यों करूँ, क्योंकि दूसरी जगह(1) हमने इनका अधिक सटीक वर्णन दिया है?
अध्याय IV.--मसीहियों पर लगाए गए झूठे आरोपों से औतोलिकुस कैसे भटकाया गया था।
इन्हें खंडन करने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं थी, सिवाय इसके कि मैं तुम्हें अब भी सत्य के वचन के विषय में संदेह में देखता हूँ। क्योंकि तुम स्वयं विवेकी होकर भी मूर्खों को प्रसन्नता से सहन करते हो। अन्यथा तुम निर्बुद्धि मनुष्यों के कहने से खोखली बातों के आगे झुकने और उस प्रचलित अफ़वाह पर विश्वास करने के लिए प्रेरित न होते, जिसके द्वारा अधर्मी होंठ हम पर, जो परमेश्वर के उपासक हैं और मसीही कहलाते हैं, झूठा आरोप लगाते हैं, यह कहते हुए कि हम सब की पत्नियाँ साझा हैं और उनका सब के द्वारा अंधाधुंध उपयोग किया जाता है; कि हम अपनी ही बहनों के साथ भी अगम्यागमन करते हैं, और, जो सबसे अधिक अधर्म और बर्बरता की बात है, कि हम मनुष्य का मांस खाते हैं।(2) इसके अतिरिक्त वे कहते हैं कि हमारा सिद्धांत हाल ही में प्रकाश में आया है, और जिसे हम सत्य मानकर ग्रहण करते हैं उसके प्रमाण में, या हमारी शिक्षा के प्रमाण में, हमारे पास कहने को कुछ नहीं है, बल्कि हमारा सिद्धांत मूर्खता है। इसलिए मुझे मुख्यतः यह आश्चर्य होता है कि तुम, जो अन्य बातों में परिश्रमी और सब कुछ की जाँच-पड़ताल करने वाले हो, हमारी बात लापरवाही से सुनते हो। क्योंकि यदि तुम्हारे लिए संभव होता, तो तुम पुस्तकालयों में रात बिताने से न कतराते
अध्याय V.--दार्शनिक नरभक्षण की शिक्षा देते हैं।
तो जब तुमने बहुत पढ़ा है, तो ज़ेनो, डायोजीनीस और क्लिएंथीस की उन शिक्षाओं के विषय में तुम्हारी क्या राय है, जो उनकी पुस्तकों में हैं और जिनमें मनुष्य का मांस खाना सिखाया गया है: कि पिताओं को पकाकर उनकी ही संतानें खाएँ; और यदि कोई इस कुख्यात भोजन का कोई भाग अस्वीकार या अलग करे, तो जो नहीं खाएगा वह स्वयं निगल लिया जाए? इनसे भी अधिक अधर्मी एक कथन मिलता है,--अर्थात् डायोजीनीस का, जो बच्चों को सिखाता है कि अपने माता-पिता को बलि चढ़ाने के लिए लाएँ और उन्हें खा जाएँ। और क्या इतिहासकार हेरोदोतस यह वर्णन नहीं करता कि कम्बीसेस(3) ने हार्पागस के बच्चों का वध करने के बाद उन्हें भी पकाया और उनके पिता के सामने भोजन के रूप में परोस दिया? और इससे आगे वह वर्णन करता है कि भारतीयों में माता-पिता को उनकी अपनी ही संतानें खाती हैं। अरे! उन लोगों की अधर्मी शिक्षा, जिन्होंने ऐसी बातें लिखीं, वरन् सिखाईं! अरे! उनकी दुष्टता और अधर्म! अरे! उनकी धारणा, जिन्होंने इस प्रकार सूक्ष्मता से दर्शनशास्त्र किया और दर्शनशास्त्र का दावा करते हैं! क्योंकि जिन्होंने ये सिद्धांत सिखाए उन्होंने संसार को अधर्म से भर दिया।
अध्याय VI.--दार्शनिकों के अन्य मत।
और अधर्मपूर्ण आचरण के विषय में, जो लोग दर्शनशास्त्र की मंडली में अंधे होकर भटक आए हैं, उन्होंने लगभग सबने एक ही स्वर में कहा है। निश्चय ही प्लेटो ने, जिसका नाम पहले लेना चाहिए क्योंकि वह उनमें सबसे सम्माननीय दार्शनिक प्रतीत होता है, अपनी पहली पुस्तक में,(4) जिसका शीर्षक रिपब्लिक है, मानो स्पष्ट रूप से विधान बनाया है कि सबकी पत्नियाँ साझा हों, जिसमें उसने ज्यूपिटर के पुत्रों और क्रेतावासियों के विधि-निर्माता की मिसाल का सहारा लिया, ताकि इस बहाने सर्वोत्तम व्यक्तियों से प्रचुर संतान उत्पन्न हो, और परिश्रम से थके हुए लोगों को ऐसे संसर्ग से सांत्वना मिले।(6) और एपिक्यूरस ने भी नास्तिकता सिखाने के साथ-साथ माताओं और बहनों के साथ अगम्यागमन भी सिखाया है, और यह उन विधियों का उल्लंघन करते हुए जो इसे वर्जित करती हैं; क्योंकि सोलन ने इस विषय में स्पष्ट विधान बनाया था, ताकि विवाहित पिता से संतान वैध रूप से उत्पन्न हो, ताकि वे व्यभिचार से न जन्में, जिससे कोई उसे पिता के रूप में सम्मान न दे जो उसका पिता नहीं है, या जो वास्तव में उसका पिता है उसका यह न जानते हुए अनादर न करे कि वह उसका पिता है। और रोमियों और यूनानियों के अन्य विधान भी इन बातों को वर्जित करते हैं। तब एपिक्यूरस और स्तोइक लोग अगम्यागमन और पुरुषगमन क्यों सिखाते हैं, जिन सिद्धांतों से उन्होंने पुस्तकालय भर दिए हैं, जिससे बचपन से(7) ही यह अधर्मपूर्ण संसर्ग सीखा जाता है? और मैं उन पर और समय क्यों व्यतीत करूँ, जबकि जिन्हें वे देवता कहते हैं उनके विषय में भी वे ऐसी ही बातें बताते हैं?
अध्याय VII.--देवताओं के विषय में भिन्न-भिन्न सिद्धांत।
क्योंकि इन्हें देवता कहने के बाद, उन्होंने फिर इन्हें तुच्छ बना दिया। क्योंकि कुछ ने कहा कि वे परमाणुओं से बने हैं; और दूसरों ने फिर कहा कि वे परमाणुओं में परिणत हो जाते हैं; और वे कहते हैं कि देवताओं में मनुष्यों से अधिक सामर्थ्य नहीं है। प्लेटो भी, यद्यपि वह इन्हें देवता कहता है, चाहता है कि वे पदार्थ से बने हों। और पाइथागोरस ने, देवताओं के विषय में इतना परिश्रम और उथल-पुथल करने और [जानकारी के लिए] इधर-उधर घूमने के बाद, अंत में यह निर्धारित किया कि सब कुछ स्वाभाविक रूप से और अपने आप उत्पन्न होता है, और देवताओं को मनुष्यों की कोई चिंता नहीं। और अकादमी के दार्शनिक क्लितोमाखस ने कितने नास्तिक मत प्रस्तुत किए, [यह मुझे गिनाने की आवश्यकता नहीं।] और क्या क्रितियास और अब्देरा के प्रोतागोरस ने यह नहीं कहा, "क्योंकि देवता हैं या नहीं, इसके विषय में मैं कुछ पुष्टि नहीं कर सकता, और न यह समझा सकता हूँ कि उनका स्वभाव कैसा है; क्योंकि बहुत सी बातें मुझे रोकती हैं"? और सबसे नास्तिक यूहेमेरस के मतों की चर्चा करना अनावश्यक है, क्योंकि देवताओं के विषय में बहुत से दुःसाहसी कथन करने के बाद, अंत में वह उनके अस्तित्व को पूरी तरह नकार देता है, और चाहता है कि सब कुछ स्व-नियंत्रित क्रिया से शासित हो।(1) और प्लेटो, जिसने परमेश्वर की एकता और मनुष्य की आत्मा के विषय में इतना कुछ कहा, यह दृढ़तापूर्वक कहते हुए कि आत्मा अमर है, क्या वह स्वयं बाद में अपने ही विरुद्ध यह मानता हुआ नहीं पाया जाता कि कुछ आत्माएँ अन्य मनुष्यों में चली जाती हैं, और अन्य बुद्धिहीन पशुओं में प्रस्थान करती हैं? उसका सिद्धांत भयानक और विचित्र क्यों न लगे--कम से कम उन्हें जिनमें कुछ विवेक है--कि जो कभी मनुष्य था वह बाद में भेड़िया, या कुत्ता, या गधा, या कोई अन्य बुद्धिहीन पशु होगा? पाइथागोरस भी ईश्वरीय विधान को ढहाने के अलावा ऐसी ही बकवास करता हुआ पाया जाता है। तो फिर हम उनमें से किसका विश्वास करें?
फिलेमोन, हास्य कवि, जो कहता है,--"जो देवताओं की स्तुति और सेवा करते हैं, उनके लिए अच्छी आशा है;"
या वे जिनका हमने उल्लेख किया--यूहेमेरस, एपिक्यूरस, पाइथागोरस, और अन्य जो कहते हैं कि देवताओं की उपासना नहीं करनी चाहिए, और जो ईश्वरीय विधान को समाप्त करते हैं? परमेश्वर और ईश्वरीय विधान के विषय में अरिस्तोन ने कहा:--
"हियाव बाँधो: परमेश्वर अब भी रक्षा करेगा और जो ऐसे योग्य हैं उन सब की बड़ी सहायता करेगा। यदि विश्वासयोग्य मनुष्यों के लिए कोई पदोन्नति प्रतीक्षा नहीं करती, तो बताओ तब भलाई क्या लाभ देती है। माना--फिर भी मैं प्रायः देखता हूँ कि धर्मी लोग सब सम्मान से वंचित होकर बुरी दशा में रहते हैं; जबकि जिनका लक्ष्य अपनी ही उन्नति है, वे इस वर्तमान जीवन में प्रायः वह सब पा लेते हैं जो वे चाहते हैं। परन्तु हमें आगे देखना चाहिए, और अंत की प्रतीक्षा करनी चाहिए, उस परिणति की जिसकी ओर सब कुछ बढ़ रहा है। यह ऐसा नहीं है, जैसा व्यर्थ और दुष्ट मनुष्यों ने कहा है, कि हम किसी बेलगाम नियति द्वारा चलाए जा रहे हैं: संसार पर अंधा संयोग शासन नहीं करता, न सब कुछ बिना नियंत्रण के आगे फेंका जा रहा है। दुष्ट इस विश्वास से अपने को अंधा कर लेता है; परन्तु निश्चय जानो कि सब प्रतिफलों में प्रधान प्रतिफल उन्हीं के लिए सुरक्षित है जो पवित्र जीवन जीते हैं; और ईश्वरीय विधान दुष्ट मनुष्यों को केवल वही उचित प्रतिफल देगा जो उनका भाग है, और प्रत्येक बुरे कर्म के लिए उचित दंड।"
और कोई देख सकता है कि परमेश्वर और पूर्वदृष्टि (प्रोविडेंस) के विषय में जो बातें दूसरों ने, वरन लगभग अधिकांश ने कही हैं, वे आपस में कितनी असंगत हैं। क्योंकि कुछ ने तो परमेश्वर और पूर्वदृष्टि को पूरी तरह रद्द कर दिया है; और दूसरों ने फिर परमेश्वर को माना है और घोषणा की है कि सब कुछ पूर्वदृष्टि से शासित होता है। इसलिए समझदार श्रोता और पाठक को उनकी अभिव्यक्तियों पर बारीकी से ध्यान देना चाहिए; जैसा कि सिमिलुस ने भी कहा: "कवियों की यह रीति है कि अत्यंत दुष्टों और श्रेष्ठों को एक ही सामान्य नाम से पुकारते हैं; इसलिए हमें विवेक करना चाहिए।" फिलेमोन भी कहता है: "जो मूर्ख मनुष्य बैठकर केवल सुनता है, वह एक कष्टदायक विशेषता है; क्योंकि वह स्वयं को दोष नहीं देता, वह इतना निर्बुद्धि है।" इसलिए हमें ध्यान देना चाहिए, और जो कहा जाता है उस पर विचार करना चाहिए, और दार्शनिकों और कवियों ने जो कहा है उसकी आलोचनात्मक जाँच करनी चाहिए।
अध्याय VIII.--विधर्मी लेखकों द्वारा देवताओं पर थोपी गई दुष्टता।
क्योंकि देवताओं के होने से इनकार करते हुए वे फिर उनके अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, और उन्होंने कहा कि उन्होंने घोर दुष्ट काम किए। और पहले, कवि जोव (जूपिटर) के दुष्ट कर्मों को मधुर स्वर में गाते हैं। और क्रिसिप्पस, जिसने बहुत बकवास की, क्या यह प्रकाशित करता नहीं पाया जाता कि जूनो ने जूपिटर के साथ अत्यंत घृणित संबंध रखा? क्योंकि मैं देवताओं की तथाकथित माता की अशुद्धताओं का, या मानव-रक्त के प्यासे लातियारिस जूपिटर का, या बधिया किए गए अत्तिस का, या ट्रेजेडियन उपनाम वाले जूपिटर का, और कैसे उसने, जैसा वे कहते हैं, अपने आपको अशुद्ध किया और अब रोमियों में देवता के रूप में पूजा जाता है, क्यों वर्णन करूँ? मैं अंतिनूस के मंदिरों के विषय में, और उन दूसरों के विषय में जिन्हें आप देवता कहते हैं, चुप हूँ। क्योंकि समझदार लोगों से कहे जाने पर वे हँसी उत्पन्न करते हैं। जिन्होंने परमेश्वर के न होने के, या अंधाधुंध संभोग और पशुवत् रखैलपन के विषय में ऐसा दर्शन गढ़ा, वे स्वयं अपनी ही शिक्षाओं से दोषी ठहरते हैं। इसके अतिरिक्त, हम उनके रचे लेखों से पाते हैं कि नरमांस-भक्षण उनके बीच स्वीकार किया गया था; और वे लिखते हैं कि जिन्हें वे देवता मानकर सम्मान देते हैं उन्होंने ही ये काम सबसे पहले किए।
अध्याय IX.--परमेश्वर और उसकी व्यवस्था के विषय में मसीही शिक्षा।
अब हम भी मानते हैं कि परमेश्वर है, परंतु वह एक ही है, इस सृष्टि का रचयिता, और बनानेवाला, और गढ़नेवाला; और हम जानते हैं कि सब कुछ उसकी पूर्वदृष्टि (प्रोविडेंस) से व्यवस्थित है, पर केवल उसी से। और हमने एक पवित्र व्यवस्था सीखी है; और हमारा व्यवस्थादाता वही है जो सचमुच परमेश्वर है, जो हमें धार्मिकता से कार्य करना, भक्तिमान होना, और
भलाई करना सिखाता है। और भक्ति(1) के विषय में वह कहता है, "मेरे सिवा तेरा कोई और देवता न हो। तू अपने लिए कोई खुदी हुई मूर्ति न बनाना, न किसी की प्रतिमा जो ऊपर आकाश में, या नीचे पृथ्वी पर, या पृथ्वी के नीचे जल में है: तू उन्हें दंडवत् न करना, न उनकी सेवा करना: क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ।"(2) और भलाई करने के विषय में उसने कहा: "अपने पिता और अपनी माता का आदर करना; ताकि तेरा भला हो, और उस देश में जो मैं यहोवा तेरा परमेश्वर तुझे देता हूँ तेरे दिन लंबे हों।" फिर धार्मिकता के विषय में: "तू व्यभिचार न करना। तू हत्या न करना। तू चोरी न करना। तू अपने पड़ोसी के विरुद्ध झूठी गवाही न देना। तू अपने पड़ोसी की पत्नी का लालच न करना, तू अपने पड़ोसी के घर का, न उसकी भूमि का, न उसके दास का, न उसकी दासी का, न उसके बैल का, न उसके बोझ ढोनेवाले पशु का, न उसके किसी भी पशु का, न किसी ऐसी वस्तु का जो तेरे पड़ोसी की है, लालच न करना। तू दीन के मुकदमे में उसका न्याय न बिगाड़ना।(3) हर अन्यायपूर्ण बात से अपने को दूर रख। निर्दोष और धर्मी को तू न मारना; तू दुष्ट को धर्मी न ठहराना; और तू घूस न लेना, क्योंकि घूस देखनेवालों की आँखें अंधी कर देती है और धर्मी की बातें उलट देती है।" इस दिव्य व्यवस्था का, तब, मूसा, जो परमेश्वर का सेवक भी था, सारे संसार के लिए, और मुख्यतः इब्रानियों के लिए, जो यहूदी भी कहलाते थे, सेवक बनाया गया, जिन्हें प्राचीन दिनों में एक मिस्री राजा ने दास बना लिया था, और जो भक्त और पवित्र पुरुषों--अब्राहम, इसहाक और याकूब--की धर्मी संतान थे।
परमेश्वर ने उन्हें स्मरण करके, मूसा के हाथ से अद्भुत और विचित्र चमत्कार करके, उन्हें छुड़ाया, और उस स्थान से होकर जो जंगल कहलाता है उन्हें मिस्र से बाहर निकाल लाया; और उन्हें फिर कनान देश में बसाया, जो बाद में यहूदिया कहलाया, और उन्हें व्यवस्था दी, और ये बातें सिखाईं। इस महान और अद्भुत व्यवस्था के, जो सब धार्मिकता की ओर ले जाती है, दस मुख्य अंश वही हैं जो हम पहले दोहरा चुके हैं।
अध्याय X.--परदेशियों के प्रति मानवता के विषय में।
इसलिए, क्योंकि वे मिस्र देश में परदेशी थे, जन्म से कसदियों के देश के इब्रानी होकर,--क्योंकि उस समय अकाल पड़ने के कारण उन्हें वहाँ भोजन मोल लेने के लिए मिस्र को प्रवास करना पड़ा, जहाँ वे कुछ समय तक रहे भी; और ये बातें उन पर परमेश्वर की भविष्यवाणी के अनुसार घटीं,--तो मिस्र में 430 वर्ष रहने के बाद, जब मूसा उन्हें जंगल में ले जाने को था, परमेश्वर ने उन्हें व्यवस्था के द्वारा सिखाया, यह कहकर: "तुम परदेशी को न सताना; क्योंकि तुम परदेशी के मन को जानते हो: क्योंकि तुम आप मिस्र देश में परदेशी थे।"(4)
अध्याय XI.--पश्चाताप के विषय में।
और जब लोगों ने उस व्यवस्था का उल्लंघन किया जो परमेश्वर की ओर से उन्हें दी गई थी, तो परमेश्वर ने, जो भला और दयालु है, उन्हें नष्ट करना न चाहते हुए, उन्हें व्यवस्था देने के अतिरिक्त, बाद में उनके भाइयों में से भविष्यद्वक्ताओं को भी उनके पास भेजा, कि वे उन्हें व्यवस्था की बातें सिखाएँ और स्मरण कराएँ, और उन्हें पश्चाताप की ओर फेरें, ताकि वे फिर पाप न करें। परंतु यदि वे अपने दुष्ट कामों में लगे रहें, तो उसने उन्हें पहले से चेताया कि वे पृथ्वी के सब राज्यों के अधीन कर दिए जाएँगे; और यह कि यह उन पर हो चुका है, प्रकट है। तो पश्चाताप के विषय में यशायाह भविष्यद्वक्ता, सामान्यतः तो सब से, पर विशेष रूप से लोगों से, कहता है: "जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज करो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो: दुष्ट अपनी चाल, और अधर्मी अपने विचार छोड़ दे: और वह यहोवा अपने परमेश्वर की ओर फिरे, और वह उस पर दया करेगा, क्योंकि वह बहुतायत से क्षमा करेगा।"(5) और एक और भविष्यद्वक्ता, यहेजकेल, कहता है: "यदि दुष्ट अपने किए हुए सब पापों से फिरे, और मेरी सब विधियों को माने, और जो मेरी दृष्टि में ठीक है वही करे, तो वह निश्चय जीवित रहेगा, मरेगा नहीं। उसके किए हुए सब अपराधों में से किसी का स्मरण उसके विरुद्ध न किया जाएगा; परंतु अपनी धार्मिकता के कारण जो उसने की है वह जीवित रहेगा: क्योंकि मैं पापी की मृत्यु नहीं चाहता, प्रभु कहता है, परंतु यह कि वह अपनी दुष्ट चाल से फिरे और जीवित रहे।"(6) फिर यशायाह: "तुम जो गहरी और दुष्ट युक्ति करते हो, फिरो, कि तुम बचाए जाओ।"(7) और एक और भविष्यद्वक्ता, यिर्मयाह: "जैसे अंगूर तोड़नेवाला अपनी टोकरी के पास लौटता है, वैसे ही अपने परमेश्वर यहोवा की ओर फिरो, और तुम दया पाओगे।"(8) इसलिए पवित्र शास्त्रों में पश्चाताप के विषय में कथन बहुत हैं, वरन असंख्य हैं, क्योंकि परमेश्वर सदा चाहता है कि मनुष्य जाति अपने सब पापों से फिरे।
अध्याय XII.--धार्मिकता के विषय में।
इसके अतिरिक्त, उस धार्मिकता के विषय में जिसकी व्यवस्था ने आज्ञा दी, भविष्यद्वक्ताओं में और सुसमाचारों में भी पुष्टि करनेवाले कथन पाए जाते हैं, क्योंकि उन सब ने परमेश्वर की एक ही आत्मा से प्रेरित होकर बात की। यशायाह ने इस प्रकार कहा: "अपने कामों की बुराई अपने प्राणों से दूर करो; भलाई करना सीखो, न्याय की खोज करो, पीड़ितों को छुड़ाओ, अनाथों का न्याय चुकाओ, विधवा का मुकदमा लड़ो।"(9) और फिर उसी भविष्यद्वक्ता ने कहा: "दुष्टता का हर बंधन खोल दो, हर अत्याचारी अनुबंध तोड़ दो, पीड़ितों को स्वतंत्र जाने दो, और हर अधर्मी बंधन फाड़ डालो। अपनी रोटी भूखे को बाँटो, और बेघर गरीबों को अपने घर ले आओ। जब तू किसी नंगे को देखे, तो उसे ढाँप दे, और अपने ही मांस से अपने को न छिपा। तब तेरी ज्योति
भोर के समान फूट निकलेगी, और तेरा स्वास्थ्य शीघ्र उगेगा, और तेरी धार्मिकता तेरे आगे आगे चलेगी।"(1) इसी प्रकार यिर्मयाह भी कहता है: "मार्गों में खड़े होकर देखो, और पूछो कि तुम्हारे परमेश्वर यहोवा का भला मार्ग कौन सा है, और उस पर चलो तो तुम अपने प्राणों के लिए विश्राम पाओगे। सच्चा न्याय करो, क्योंकि इसी में तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की इच्छा है।"(2) होशे भी ऐसा ही कहता है: "न्याय का पालन करो, और अपने परमेश्वर के निकट आओ, जिसने आकाश को स्थापित किया और पृथ्वी को रचा।"(3) और एक और, योएल, ने इनसे सहमत होकर कहा: "लोगों को इकट्ठा करो, सभा को पवित्र करो, पुरनियों को एकत्र करो, गोद के बच्चों को इकट्ठा करो; दूल्हा अपनी कोठरी से, और दुल्हन अपने कमरे से निकले, और अपने परमेश्वर यहोवा से आग्रहपूर्वक प्रार्थना करो कि वह तुम पर दया करे और तुम्हारे पापों को मिटा दे।"(4) इसी प्रकार एक और, जकर्याह: "सर्वशक्तिमान यहोवा यों कहता है, सच्चा न्याय चुकाओ, और हर एक अपने भाई पर करुणा और दया दिखाओ; और विधवा, अनाथ, या परदेशी पर अत्याचार न करो; और तुम में से कोई अपने भाई के विरुद्ध अपने मन में बुराई की कल्पना न करे, सर्वशक्तिमान यहोवा कहता है।"(5)
अध्याय XIII.--पवित्रता के विषय में।
और पवित्रता के विषय में, पवित्र वचन हमें सिखाता है कि न केवल कर्म में पाप न करें, वरन विचार में भी नहीं, मन में भी किसी बुराई की कल्पना न करें, और न किसी दूसरे की पत्नी को आँखों से लालसा करके देखें। इसलिए सुलैमान ने, जो राजा और भविष्यद्वक्ता था, कहा: "तेरी आँखें सीधी देखें, और तेरी पलकें तेरे सामने सीधी दृष्टि करें: अपने पाँवों के लिए सीधे मार्ग बना।"(6) और सुसमाचार की वाणी पवित्रता के विषय में और भी बल देकर सिखाती है, यह कहती हुई: "जो कोई ऐसी स्त्री को जो उसकी अपनी पत्नी नहीं है, लालसा से देखता है, वह अपने मन में उसके साथ व्यभिचार कर चुका।"(7) "और जो विवाह करता है," [सुसमाचार] कहता है, "पति से त्यागी हुई स्त्री से, वह व्यभिचार करता है; और जो कोई व्यभिचार के कारण को छोड़ अपनी पत्नी को त्यागता है, वह उससे व्यभिचार कराता है।"(8) क्योंकि सुलैमान कहता है: "क्या कोई अपनी छाती में आग रखे और उसके कपड़े न जलें? या कोई दहकते अंगारों पर चले और उसके पाँव न झुलसें? वैसे ही जो पराई स्त्री के पास जाता है वह निर्दोष न ठहरेगा।"(9)
अध्याय XIV.--अपने शत्रुओं से प्रेम करने के विषय में।
और यह कि हमें न केवल अपने ही वंश के लोगों के प्रति, जैसा कुछ मानते हैं, वरन सब के प्रति दयालु होना चाहिए, यशायाह भविष्यद्वक्ता ने कहा: "जो तुमसे बैर रखते और तुम्हें निकाल देते हैं उनसे कहो, तुम हमारे भाई हो, ताकि यहोवा का नाम महिमा पाए, और उनके आनंद में प्रकट हो।"(10) और सुसमाचार कहता है: "अपने शत्रुओं से प्रेम करो, और जो तुम्हारा अपमान करते हैं उनके लिए प्रार्थना करो। क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिए क्या प्रतिफल है? यह तो डाकू और चुंगी लेनेवाले भी करते हैं।"(11) और जो भलाई करते हैं उन्हें वह घमंड न करना सिखाता है, ऐसा न हो कि वे मनुष्यों को प्रसन्न करनेवाले बन जाएँ। क्योंकि वह कहता है: "तेरा बायाँ हाथ न जाने कि तेरा दाहिना हाथ क्या करता है।"(12) इसके अतिरिक्त, अधिकारियों और शासकों के अधीन रहने और उनके लिए प्रार्थना करने के विषय में दिव्य वचन हमें निर्देश देता है, ताकि "हम शांत और चैन का जीवन बिताएँ।"(13) और वह हमें सिखाता है कि सब को सब कुछ चुकाएँ,(14) "जिसका आदर करना चाहिए उसका आदर, जिससे डरना चाहिए उससे भय, जिसे कर देना चाहिए उसे कर; किसी का कुछ ऋणी न रहो, परंतु सब से प्रेम रखो।"
अध्याय XV.--मसीहियों की निर्दोषता का बचाव।
इसलिए विचार करो कि क्या ऐसी बातें सिखानेवाले लोग उदासीन होकर जी सकते हैं, और अवैध संभोग में मिल-जुल सकते हैं, या, सबसे बढ़कर अभक्ति में, नरमांस खा सकते हैं, विशेषकर जब हमें ग्लैडिएटरों के प्रदर्शन देखने तक की मनाही है, ऐसा न हो कि हम हत्याओं के भागी और सहायक बनें। परंतु हम अन्य तमाशे(15) भी नहीं देख सकते, ऐसा न हो कि वहाँ गाए जानेवाले कथनों में भाग लेकर हमारी आँखें और कान अशुद्ध हों। क्योंकि यदि कोई नरमांस-भक्षण की बात करे, तो इन तमाशों में थुएस्तेस और तेरेयुस के बच्चे खाए जाते हैं; और व्यभिचार के विषय में, मनुष्यों और देवताओं दोनों के मामले में, जिन्हें वे सम्मान और पुरस्कारों के लिए सुंदर भाषा में गाते हैं, वह उनके नाटकों का विषय बनाया जाता है। परंतु मसीहियों से ऐसे कामों की कल्पना भी दूर रहे; क्योंकि उनके बीच संयम बसता है, आत्म-नियंत्रण का अभ्यास होता है, एकपत्नीत्व निभाया जाता है, पवित्रता की रक्षा होती है, अधर्म का नाश होता है, पाप जड़ से उखाड़ा जाता है, धार्मिकता का पालन होता है, व्यवस्था चलाई जाती है, उपासना की जाती है, परमेश्वर को माना जाता है: सत्य शासन करता है, अनुग्रह रक्षा करता है, शांति उनकी आड़ बनती है; पवित्र वचन मार्गदर्शन करता है, बुद्धि सिखाती है, जीवन निर्देशित करता है, परमेश्वर राज्य करता है। इसलिए, यद्यपि हमें अपने जीवन-व्यवहार और सारी सृष्टि के रचयिता परमेश्वर की विधियों के विषय में बहुत कुछ कहना है, फिर भी हम मानते हैं कि फिलहाल हमने आपको इतना स्मरण करा दिया है कि आप इन बातों का अध्ययन करने को प्रेरित हों, विशेषकर इसलिए कि अब आप [हमारे लेखों को] स्वयं पढ़ सकते हैं, ताकि जैसे आप जानकारी प्राप्त करने के शौकीन रहे हैं, वैसे ही इस दिशा में भी अध्ययनशील बने रहें।
अध्याय XVI.--दार्शनिकों के अनिश्चित अनुमान।
परंतु अब मैं, परमेश्वर की सहायता से, ऐतिहासिक कालों का आपको अधिक सटीक प्रमाण देना चाहता हूँ, ताकि आप देखें कि हमारा सिद्धांत न आधुनिक है और न कल्पित, वरन् उन सब कवियों और लेखकों से अधिक प्राचीन और सत्य है जिन्होंने अनिश्चितता में लिखा है। क्योंकि कुछ ने यह मानते हुए कि जगत अनुत्पन्न है, अनंत की ओर प्रस्थान किया;(1) और अन्य ने यह कहते हुए कि वह रचा गया था, कहा कि तब तक 1,53,075 वर्ष बीत चुके थे। यह मिस्री अपोलोनियस का कथन है। और प्लेटो, जो यूनानियों में सबसे बुद्धिमान माना जाता है, वह कैसी निरर्थक बातों में जा पड़ा? क्योंकि "द रिपब्लिक"(2) नामक अपनी पुस्तक में हम उसे स्पष्ट कहते हुए पाते हैं: "क्योंकि यदि सब कुछ सब समय अपनी वर्तमान व्यवस्था में ही बना रहता, तो कोई नई बात कभी कैसे खोजी जाती? क्योंकि दस हज़ार गुना दस हज़ार वर्ष बिना किसी अभिलेख के बीत गए, और जब से कुछ बातें डेडेलस द्वारा, कुछ ओर्फियस द्वारा, और कुछ पलामेदेस द्वारा खोजी गईं, तब से एक हज़ार या उसके दुगुने वर्ष बीत चुके हैं।" और जब वह कहता है कि ये बातें घटित हुईं, तो उसका आशय यह है कि जलप्रलय से डेडेलस तक दस हज़ार गुना दस हज़ार वर्ष बीते। और संसार के नगरों, बस्तियों और जातियों के विषय में बहुत कुछ कहने के बाद, वह स्वीकार करता है कि उसने ये बातें अनुमान से कही हैं। क्योंकि वह कहता है, "यदि तब, हे मित्र, कोई देवता हमसे प्रतिज्ञा करे कि यदि हम विधान-निर्माण का सर्वेक्षण करने का प्रयत्न करें, तो अब कही गई बातें,"(3) आदि; जिससे प्रकट होता है कि वह अटकल से बोल रहा था; और यदि अटकल से, तो जो वह कहता है वह सच नहीं है।
अध्याय XVII.--मसीहियों की सटीक जानकारी।
इसलिए उसके लिए यही उचित था कि वह इस विधान-निर्माण के विषय में परमेश्वर का शिष्य बनता, जैसा कि उसने स्वयं स्वीकार किया कि व्यवस्था के द्वारा परमेश्वर के सिखाने के सिवा किसी और रीति से वह सटीक जानकारी नहीं पा सकता था। और क्या कवि होमर, हेसियड और ओर्फियस ने यह दावा नहीं किया कि वे स्वयं ईश्वरीय विधान द्वारा शिक्षित हुए थे? इसके अतिरिक्त, कहा जाता है कि आपके लेखकों में भविष्यद्वक्ता और भविष्यवक्ता थे, और जो उनसे सूचित हुए उन्होंने सटीक लिखा। तब हम जो परमेश्वर के पवित्र आत्मा से आविष्ट(4) पवित्र भविष्यद्वक्ताओं द्वारा सिखाए गए हैं, सत्य को कितना अधिक जानेंगे! इसी कारण सब भविष्यद्वक्ताओं ने एक-दूसरे के साथ सामंजस्य और सहमति से बातें कहीं, और जो कुछ सारे संसार में होने वाला था उसकी पहले से घोषणा की। क्योंकि पूर्वकथित और पहले ही पूरी हो चुकी घटनाओं की पूर्ति ही जानकारी के प्रेमियों को, वरन् सत्य के प्रेमियों को, यह प्रमाणित कर दे कि जो बातें उन्होंने जलप्रलय से पहले के युगों और कालों के विषय में कहीं, वे सचमुच सत्य हैं:(5) अर्थात् जगत की सृष्टि से अब तक वर्ष कैसे बीतते चले आए, ताकि आपके लेखकों का हास्यास्पद झूठ प्रकट हो जाए और दिखा दे कि उनके कथन सत्य नहीं हैं।
अध्याय XVIII.--जलप्रलय के विषय में यूनानियों की भूलें।
क्योंकि प्लेटो ने, जैसा हमने ऊपर कहा, यह प्रदर्शित करने के बाद कि जलप्रलय हुआ था, कहा कि वह सारी पृथ्वी पर नहीं फैला, वरन् केवल मैदानों पर, और जो सबसे ऊँची पहाड़ियों पर भाग गए उन्होंने अपने आपको बचा लिया। परंतु अन्य कहते हैं कि देउकालियोन और पिर्रा थे, और वे एक संदूक में सुरक्षित रखे गए; और देउकालियोन ने संदूक से बाहर आने के बाद अपने पीछे पत्थर फेंके, और उन पत्थरों से मनुष्य उत्पन्न हुए; इसी कारण, वे कहते हैं, मनुष्यों को समूह में "लोग"(6) कहा जाता है। अन्य फिर कहते हैं कि दूसरी बाढ़ में क्लिमेनस था। अब तक जो कहा गया है उससे स्पष्ट है कि जिन्होंने ऐसी बातें लिखीं और इतने निरर्थक ढंग से तत्त्वज्ञान की बातें कीं, वे अभागे, अत्यंत अपवित्र और निर्बुद्धि लोग हैं। परंतु मूसा ने, जो हमारा भविष्यद्वक्ता और परमेश्वर का सेवक है, जगत की उत्पत्ति का वृत्तांत देते हुए बताया कि जलप्रलय पृथ्वी पर किस प्रकार आया, और इसके अतिरिक्त यह भी बताया कि जलप्रलय का विवरण कैसे घटित हुआ, और उसने न पिर्रा, न देउकालियोन, न क्लिमेनस की कोई कथा कही; और न यह कि केवल मैदान डूबे, और केवल वे ही बचे जो पहाड़ों पर भाग निकले।
अध्याय XIX.--जलप्रलय का सटीक वृत्तांत।
और न वह दूसरी बाढ़ की बात करता है: इसके विपरीत, उसने कहा कि संसार पर जल की बाढ़ फिर कभी नहीं आएगी; जैसे कि अब तक नहीं आई, और न कभी आएगी। और वह कहता है कि परमेश्वर के निर्देश से तैयार किए गए जहाज़ में आठ मनुष्य सुरक्षित रखे गए, जो देउकालियोन द्वारा नहीं, वरन् नूह द्वारा तैयार किया गया था; यह इब्रानी शब्द अंग्रेज़ी में(7) "विश्राम" का अर्थ रखता है; जैसा हमने अन्यत्र दिखाया है कि जब नूह ने उस समय जीवित मनुष्यों को घोषणा की कि बाढ़ आने वाली है, तो उसने उन्हें भविष्यवाणी करते हुए कहा, "इधर आओ, परमेश्वर तुम्हें पश्चाताप के लिए बुला रहा है।" इसी कारण वह उचित रूप से देउकालियोन(8) कहलाया। और इस नूह के तीन पुत्र थे (जैसा हमने दूसरी पुस्तक में बताया), जिनके नाम
शेम, हाम और याफेत थे; और इनकी तीन पत्नियाँ थीं, प्रत्येक की एक; हर पुरुष और उसकी पत्नी। इस मनुष्य को कुछ ने "नपुंसक" (यूनूकस) उपनाम दिया है। इसलिए जहाज़ में जो आठों प्राणी पाए गए, वे सब बचाए गए। और मूसा ने बताया कि जलप्रलय चालीस दिन और चालीस रात रहा, आकाश से धाराएँ बरसती रहीं, और गहरे सोतों के फूट पड़ने से जल हर ऊँची पहाड़ी से 15 हाथ ऊपर चढ़ गया। और इस प्रकार तब के सब मनुष्यों की जाति नष्ट हो गई, और केवल वे ही बचे जो जहाज़ में सुरक्षित थे; और ये, हम पहले कह चुके हैं, आठ थे। और जहाज़ के अवशेष आज तक अरब के पहाड़ों में देखे जाते हैं। यही, संक्षेप में, जलप्रलय का इतिहास है।
अध्याय XX.--मूसा की प्राचीनता।
और मूसा, जैसा हम पहले कह चुके हैं, यहूदियों का अगुवा बनकर, मिस्र देश से राजा फिरौन द्वारा निकाल दिया गया, जिसका नाम अमासिस था, और जिसने, वे कहते हैं, लोगों के निष्कासन के बाद 25 वर्ष 4 महीने राज्य किया, जैसा मनेथो मानता है। और उसके बाद केब्रोन, 13 वर्ष। और उसके बाद अमेनोफिस, 20 वर्ष 7 महीने। और उसके बाद उसकी बहन अमेस्सा, 21 वर्ष 1 महीना। और उसके बाद मेफ्रेस, 12 वर्ष 9 महीने। और उसके बाद मेथ्रामुथोसिस, 20 वर्ष 10 महीने। और उसके बाद तिथमोसेस, 9 वर्ष 8 महीने। और उसके बाद दम्फेनोफिस, 30 वर्ष 10 महीने। और उसके बाद ओरस, 35 वर्ष 5 महीने। और उसके बाद उसकी बेटी, 10 वर्ष 3 महीने। उसके बाद मेर्केरेस, 12 वर्ष 3 महीने। और उसके बाद उसका पुत्र अर्माइस, 30 वर्ष 1 महीना। उसके बाद मियाम्मस का पुत्र मेस्सेस, 6 वर्ष 2 महीने। उसके बाद रामेसेस, 1 वर्ष 4 महीने। उसके बाद अमेनोफिस, 19 वर्ष 6 महीने। उसके बाद उसके पुत्र थोएस्सस और रामेसेस, 10 वर्ष, जिनके पास, कहा जाता है, विशाल घुड़सवार सेना और नौसेना थी। इब्रानी लोग तो, अपने अलग इतिहास के अनुसार, उस समय मिस्र देश में प्रवास करके आए, और जैसा पहले कहा गया, राजा तेथमोसिस द्वारा दास बना लिए गए, और उसके लिए उन्होंने पीथो, रामेसेस, और ओन, अर्थात् हेलियोपोलिस, नामक दृढ़ नगर बनाए; इसलिए इब्रानी लोग, जो हमारे पूर्वज भी हैं, और जिनसे हमें वे पवित्र पुस्तकें मिली हैं जो, जैसा पहले कहा गया, सब लेखकों से पुरानी हैं, प्रमाणित होते हैं कि वे उन नगरों से अधिक प्राचीन हैं जो उस समय मिस्रियों में प्रसिद्ध थे। और देश का नाम मिस्र राजा सेथोस के नाम पर पड़ा। क्योंकि सेथोस शब्द का उच्चारण, वे कहते हैं, "मिस्र" होता है।[1] और सेथोस का एक भाई था, जिसका नाम अर्माइस था। वह दनाउस कहलाता है, वही जो मिस्र से आर्गोस गया, जिसे अन्य लेखक अति प्राचीन काल का बताते हैं।
अध्याय XXI.--मनेथो की अशुद्धता।
और मनेथो, जिसने मिस्रियों के बीच बहुत-सी निरर्थक बातें फैलाईं, और यहाँ तक कि मूसा तथा उसके साथ के इब्रानियों पर कोढ़ के कारण मिस्र से निकाले जाने का अधर्मपूर्ण आरोप लगाया, कोई सटीक कालक्रमीय कथन नहीं दे सका। क्योंकि जब उसने कहा कि वे चरवाहे और मिस्रियों के शत्रु थे, तो उसने सत्य ही कहा, क्योंकि उसे ऐसा करने पर विवश होना पड़ा। क्योंकि मिस्र में रहने वाले हमारे पूर्वज सचमुच चरवाहे थे, कोढ़ी नहीं। क्योंकि जब वे उस देश में आए जो यरूशलेम कहलाता है, जहाँ वे बाद में भी रहे, तो सर्वविदित है कि उनके याजक परमेश्वर की नियुक्ति के अनुसार मंदिर में बने रहे, और वहाँ हर रोग को चंगा करते थे, यहाँ तक कि वे कोढ़ियों और हर प्रकार की अस्वस्थता को चंगा करते थे। वह मंदिर यहूदिया के राजा सुलैमान ने बनवाया। और मनेथो के अपने ही कथन से उसकी कालक्रमीय भूल प्रकट है। (जैसा उस राजा के विषय में भी है जिसने उन्हें निकाला, जिसका नाम फिरौन था। क्योंकि अब वह उन पर शासन नहीं करता था। क्योंकि इब्रानियों का पीछा करते हुए, वह और उसकी सेना लाल समुद्र में डूब गए। और वह यह कहने में और भी भूल करता है कि चरवाहों ने मिस्रियों के विरुद्ध युद्ध किया।) क्योंकि वे मिस्र से निकले और तब से उस देश में बसे जो अब यहूदिया कहलाता है, दनाउस के आर्गोस आने से 313[2] वर्ष पहले। और यह प्रकट है कि अधिकतर लोग उसे यूनानियों में सबसे प्राचीन मानते हैं। इसलिए मनेथो ने अनिच्छा से अपने ही लेखों द्वारा सत्य की दो बातें हमें बता दीं: पहली, यह मानना कि वे चरवाहे थे; दूसरी, यह कहना कि वे मिस्र देश से निकल गए। इसलिए इन्हीं लेखों से मूसा और उसके अनुयायी ट्रॉय के युद्ध से 900 या यहाँ तक कि 1,000 वर्ष पहले के प्रमाणित होते हैं।[3]
अध्याय XXII.--मंदिर की प्राचीनता।
फिर यहूदिया में मंदिर के निर्माण के विषय में, जिसे राजा सुलैमान ने यहूदियों के मिस्र से निर्गमन के 566 वर्ष बाद बनवाया, सोर के लोगों के बीच एक अभिलेख है कि मंदिर कैसे बनाया गया; और उनके अभिलेखागार में लेख सुरक्षित रखे गए हैं, जिनमें प्रमाणित होता है कि मंदिर सोरवासियों द्वारा कार्थेज की स्थापना से 143[4] वर्ष 8 महीने पहले विद्यमान था (और यह अभिलेख हीराम[5] ने बनाया (यह सोरवासियों के राजा का नाम है), जो अबीमलस का पुत्र था, हीराम और सुलैमान के बीच चले आ रहे वंशानुगत मैत्री-संबंध के कारण, और साथ ही सुलैमान की असाधारण बुद्धि के कारण। क्योंकि वे कठिन समस्याओं की चर्चा में निरंतर एक-दूसरे के साथ लगे रहते थे। और इसका प्रमाण उनके पत्राचार में है, जो आज तक सुरक्षित है