यह हिन्दी पाठ समीक्षा के लिए तैयार किया गया है। अंग्रेज़ी मूल प्रमाणिक है।

अध्याय 10

भीतर वास करनेवाला आत्मा — पूर्ण और सदा के लिए तृप्त करनेवाला

पवित्र आत्मा उसमें अपना निवास बनाता है जो आत्मा से जन्मा है। प्रेरित पौलुस कुरिन्थ के विश्वासियों से 1 कुरिन्थियों 3:16 में (संशोधित अनुवाद, R. V.) कहता है, "क्या तुम नहीं जानते कि तुम परमेश्वर का मंदिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है?" यह खंड अलग-अलग विश्वासी की ओर उतना नहीं, जितना विश्वासियों की संपूर्ण देह, अर्थात् कलीसिया की ओर संकेत करता है। देह के रूप में कलीसिया में परमेश्वर का आत्मा वास करता है। परंतु 1 कुरिन्थियों 6:19 में (संशोधित अनुवाद, R. V.) हम पढ़ते हैं, "क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मंदिर है, जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है?" इस खंड में स्पष्ट है कि पौलुस विश्वासियों की देह, अर्थात् समूची कलीसिया की नहीं, बल्कि अलग-अलग विश्वासी की बात कर रहा है। इसी प्रकार प्रभु यीशु ने क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहली रात अपने चेलों से कहा, "और मैं पिता से विनती करूँगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा कि वह सर्वदा तुम्हारे साथ रहे, अर्थात् सत्य का आत्मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है; तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है और तुम में होगा" (यूहन्ना 14:16, 17)। पवित्र आत्मा हर उस व्यक्ति में वास करता है जो नए सिरे से जन्मा है। हम रोमियों 8:9 में पढ़ते हैं, "यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं (इस पद में मसीह का आत्मा, जैसा हम पहले देख चुके हैं, केवल मसीह-समान आत्मा नहीं, बल्कि पवित्र आत्मा का एक नाम है) तो वह उसका जन नहीं।" कोई बहुत अपूर्ण विश्वासी हो सकता है, परंतु यदि वह सचमुच यीशु मसीह में विश्वासी है, यदि वह सचमुच नए सिरे से जन्मा है, तो परमेश्वर का आत्मा उसमें वास करता है। कुरिन्थियों को लिखी पहली पत्री से यह बहुत स्पष्ट है कि कुरिन्थ के विश्वासी बहुत अपूर्ण विश्वासी थे; वे अपूर्णता से भरे थे और उनमें घोर पाप था।

फिर भी पौलुस उन्हें बताता है कि वे पवित्र आत्मा के मंदिर हैं, तब भी जब वह घोर अनैतिकताओं के विषय में उनसे व्यवहार कर रहा है। (देखिए 1 कुरिन्थियों 6:15-19।) पवित्र आत्मा परमेश्वर की हर संतान में वास करता है। फिर भी कुछ में वह चेतना से बहुत पीछे उनकी आत्मा के छिपे हुए पवित्रस्थान में वास करता है। उसे पूरे मनुष्य, आत्मा, प्राण और देह, पर वैसा अधिकार करने की अनुमति नहीं दी जाती जैसा वह चाहता है। इसलिए कुछ लोग उसके निवास के प्रति स्पष्ट रूप से सचेत नहीं होते, फिर भी वह वहाँ है। यह कितना गंभीर, फिर भी कितना महिमामय विचार है कि मुझमें यह आदरणीय व्यक्ति, पवित्र आत्मा, वास करता है। यदि हम परमेश्वर की संतान हैं, तो हमें इतनी प्रार्थना नहीं करनी कि आत्मा आकर हम में वास करे, क्योंकि वह तो पहले से ऐसा कर रहा है; हमें बल्कि उसकी उपस्थिति, उसके कृपामय और महिमामय निवास को पहचानना है, और उस घर का पूरा नियंत्रण उसे देना है जिसमें वह पहले से रहता है, और ऐसे जीने का प्रयत्न करना है कि इस पवित्र, इस ईश्वरीय अतिथि को खेदित न करें। फिर भी हम आगे देखेंगे कि आत्मा की परिपूर्णता या बपतिस्मा के लिए प्रार्थना करना उचित है। यह सोचना कि पवित्र आत्मा हमारे भीतर वास करता है, देह की पवित्रता और पावनता के विषय में कैसा विचार देता है। हमें इन देहों के साथ कितनी विचारशीलता से व्यवहार करना चाहिए और हर उस वस्तु से कितनी संवेदनशीलता से दूर रहना चाहिए जो इन्हें अशुद्ध करेगी। हमें सब बातों में कितनी सावधानी से चलना चाहिए कि जो हमारे भीतर वास करता है उसे खेदित न करें।

यह भीतर वास करनेवाला आत्मा पूर्ण और चिरस्थायी तृप्ति और जीवन का स्रोत है। यीशु यूहन्ना 4:14 में (संशोधित अनुवाद, R. V.) कहता है, "जो कोई उस जल में से पिएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर कभी प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा वह उसमें एक ऐसा सोता बन जाएगा जो अनंत जीवन के लिए (A. V. की तरह 'में' कहना बेहतर) उमड़ता रहेगा।" यीशु सूखार के कुएँ पर सामरी स्त्री से बात कर रहा था। उसने उससे कहा था, "क्या तू हमारे पिता याकूब से बड़ा है, जिसने हमें यह कुआँ दिया, और आप ही उसमें से पिया, और उसके पुत्रों और पशुओं ने भी?" तब यीशु ने उत्तर देकर उससे कहा, "जो कोई इस जल में से पिएगा वह फिर प्यासा होगा।" यह हर सांसारिक सोते के विषय में कितना सच है। हम चाहे कितना ही गहरा पिएँ, हम फिर प्यासे होंगे। तृप्ति का कोई सांसारिक सोता कभी पूरी तरह तृप्त नहीं करता। हम धन के सोते से जितना गहरा पी सकें पिएँ, वह देर तक तृप्त नहीं करेगा। हम फिर प्यासे होंगे। हम यश के सोते से उतना गहरा पिएँ जितना किसी ने कभी पिया हो, तृप्ति बस एक घंटे की है। हम सांसारिक सुख, मानवीय विज्ञान और दर्शन और पार्थिव विद्या के सोते से पिएँ, हम मानवीय प्रेम के सोते से भी पिएँ, कोई देर तक तृप्त नहीं करेगा; हम फिर प्यासे होंगे। परंतु तब यीशु ने आगे कहा, "परंतु जो कोई उस जल में से पिएगा जो मैं उसे दूँगा वह फिर कभी प्यासा न होगा, वरन् जो जल मैं उसे दूँगा वह उसमें एक ऐसा सोता बन जाएगा जो अनंत जीवन के लिए उमड़ता रहेगा।" जो जल यीशु मसीह देता है वह पवित्र आत्मा है। यह यूहन्ना हमें यूहन्ना 7:37-39 में अत्यंत स्पष्ट शब्दों में बताता है, "पर्व के अंतिम दिन, जो मुख्य दिन है, यीशु खड़ा हुआ और पुकारकर कहा, यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पिए।

जो मुझ पर विश्वास करेगा, जैसा पवित्रशास्त्र में कहा है, उसके हृदय में से जीवित जल की नदियाँ बह निकलेंगी। (यह उसने उस आत्मा के विषय में कहा जिसे उस पर विश्वास करनेवाले पाने पर थे।)" पवित्र आत्मा उसे पूर्ण रूप से और सदा के लिए तृप्त करता है जो उसे ग्रहण करता है। वह उसके भीतर अनंत जीवन के लिए उमड़ता हुआ, सदा उमड़ता हुआ सोता बन जाता है। ऐसा कुआँ होना बड़ी बात है जिसे आप अपने साथ ले जा सकें; ऐसा कुआँ होना जो आपके भीतर है; अपनी तृप्ति का स्रोत अपने से बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर के कुएँ में रखना, जो सदा भीतर है और सदा ताज़गी और सामर्थ्य के साथ उमड़ता रहता है; हमारी तृप्ति और आनंद का कुआँ हमारे भीतर होना। तब हम अपने परिवेश पर निर्भर नहीं रहते। यह बहुत मायने नहीं रखता कि हमें स्वास्थ्य है या रोग, समृद्धि है या विपत्ति, हमारे आनंद का स्रोत भीतर है और सदा उमड़ता रहता है। यह तुलनात्मक रूप से बहुत मायने नहीं रखता कि हमारे मित्र हमारे साथ हैं या उनसे अलग हो गए हैं, यहाँ तक कि उससे अलग जिसे मनुष्य मृत्यु कहते हैं, भीतर का यह सोता सदा फूटता रहता है और हमारे प्राण तृप्त होते हैं। कभी-कभी गहनतम शोक के दिनों में भीतर का यह सोता सबसे अधिक सामर्थ्य और पूर्णता से फूटता है। ऐसे समय में सारी सांसारिक तृप्तियाँ विफल हो जाती हैं। जब कोई प्रिय व्यक्ति हमसे ले लिया जाता है, तब धन में, या सांसारिक सुख में, रंगमंच या ओपेरा या नृत्य में, यश या सत्ता या मानवीय विद्या में क्या तृप्ति है? परंतु जिन घड़ियों में वे जिन्हें हम पृथ्वी पर सबसे अधिक प्रेम करते थे हमसे ले लिए जाते हैं, तभी भीतर वास करनेवाले परमेश्वर के आत्मा के आनंद का सोता पूरे प्रवाह के साथ फूट पड़ता है, शोक और आहें भाग जाती हैं और हमारी अपनी आत्माएँ शांति और परमानंद से भर जाती हैं। हमें राख के बदले शोभा, शोक के बदले आनंद का तेल, और उदास आत्मा के बदले स्तुति का वस्त्र मिलता है (यशायाह 61:3)।

यदि वह अनुभव छापने के लिए इतना पवित्र न होता, तो मैं अचानक और अभिभूत कर देनेवाले शोक और दुःख के एक क्षण का वर्णन कर सकता था, जब ऐसा लगता था कि मैं कुचल दिया जाऊँगा, जब मैंने ऐसी पीड़ा में ऊँचे स्वर से पुकारा जो असहनीय प्रतीत होती थी, जब अचानक और तुरंत भीतर का पवित्र आत्मा का यह सोता फूट पड़ा और मैंने ऐसा विश्राम और आनंद जाना जैसा मैंने पहले कम ही जाना था, और मेरा सारा अस्तित्व आनंद के तेल से सराबोर हो गया।

जिसके भीतर परमेश्वर का आत्मा अनंत जीवन के लिए उमड़ते सोते के रूप में वास करता है, वह संसार के सुखों पर निर्भर नहीं रहता। उसे रंगमंच, ओपेरा, नृत्य, ताश और उन अन्य सुखों के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं जिनके बिना उन्हें जीवन जीने योग्य नहीं लगता जिन्होंने पवित्र आत्मा नहीं पाया। वह इन्हें इसलिए नहीं छोड़ता कि उसे ये गलत लगते हैं, उतना नहीं जितना इसलिए कि उसके पास इससे कहीं उत्तम वस्तु है। उसका इनके प्रति सारा स्वाद जाता रहता है।

एक महिला एक बार मिस्टर मूडी के पास आई और बोली, "मिस्टर मूडी, मुझे आप पसंद नहीं।" उन्होंने पूछा, "क्यों नहीं?" उसने कहा, "क्योंकि आप बहुत संकीर्ण हैं।" "संकीर्ण! मुझे नहीं पता था कि मैं संकीर्ण हूँ।" "हाँ, आप बहुत संकीर्ण हैं। आप रंगमंच में विश्वास नहीं करते; आप ताश में विश्वास नहीं करते; आप नृत्य में विश्वास नहीं करते।" "आपको कैसे पता कि मैं रंगमंच में विश्वास नहीं करता?" उन्होंने पूछा। "ओह," उसने कहा, "मुझे पता है कि आप नहीं करते।" मिस्टर मूडी ने उत्तर दिया, "मैं रंगमंच जब चाहूँ तब जाता हूँ।" "क्या!" महिला चिल्लाई, "आप रंगमंच जब चाहें तब जाते हैं?" "हाँ, मैं रंगमंच जब चाहूँ तब जाता हूँ।" "ओह," उसने कहा, "मिस्टर मूडी, आप तो मेरी सोच से कहीं अधिक उदार हैं। यह सुनकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि आप जब चाहें रंगमंच जाते हैं।"

"हाँ, मैं रंगमंच जब चाहूँ तब जाता हूँ। मैं चाहता ही नहीं।" जिसने सचमुच पवित्र आत्मा को पाया है, और जिसमें पवित्र आत्मा वास करता है और बिना बाधा अपना कार्य करता है, वह चाहेगा ही नहीं। तो फिर इतने सारे मसीही होने का दावा करनेवाले इन सांसारिक मनोरंजनों के पीछे क्यों जाते हैं? दो कारणों में से एक के लिए; या तो इसलिए कि उन्होंने पवित्र आत्मा को कभी निश्चित रूप से पाया ही नहीं, या फिर इसलिए कि सोता रुक गया है। सोते का रुक जाना बिलकुल संभव है। हमारे भीतरी नगरों में से एक का सबसे अच्छा कुआँ कई महीनों तक रुका और सूखा रहा क्योंकि जिस छिद्र से पानी बहता था उसमें एक पुराना चिथड़ों का कालीन ठूँस दिया गया था। जब वह चिथड़ा बाहर खींचा गया, तो पानी फिर शुद्ध, ठंडा और स्फूर्तिदायक बहने लगा। आज कलीसिया में बहुत से लोग हैं जिन्होंने कभी पवित्र आत्मा के अतुलनीय आनंद को जाना था, परंतु कोई पाप या सांसारिक अनुरूपता, परमेश्वर के प्रति अवज्ञा का कोई कार्य, कमोबेश जानी-बूझी अवज्ञा आ गई और सोता रुक गया। आइए आज पुराने चिथड़े बाहर खींच लें कि यह अद्भुत सोता फिर फूट पड़े, हर दिन और हर घंटे अनंत जीवन के लिए उमड़ता रहे।

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