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अध्याय 2

स्वतंत्र आनन्द

प्रभु का आनन्द · बख्त सिंह

स्वतंत्र आनन्द

स्वतंत्र आनन्द

“परमेश्वर का राज्य खाने-पीने की बात नहीं, परन्तु धार्मिकता, शान्ति और पवित्र आत्मा में आनन्द है” (रोमियों 14:17)।

सांसारिक आनन्द अधिकार में रखने से उत्पन्न होता है। मनुष्य सोचते हैं कि यदि उन्हें वह सब मिल जाए जो वे चाहते हैं, तो वे सुखी हो जाएँगे। इसलिये वे उसे पाने के लिये निकल पड़ते हैं और अपना पूरा जीवन इसी में बिता देते हैं, और अन्त में निराश हो जाते हैं।

तुम इस संसार की सारी सम्पत्ति अपने हाथ में रखो, तो भी तुम दरिद्र और असन्तुष्ट ही रह सकते हो। इतना ही नहीं, यदि तुम कुछ समय के लिये सुखी भी हो जाओ, तो वह टिकेगा नहीं। तुम्हारी सम्पत्ति समय के साथ तुम्हारे हाथ से खिसक जाती है; जल्दी या देर से जीवन की आशाएँ और योजनाएँ टूट जाती हैं। तुम्हारा स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। इस संसार में जिस-जिस वस्तु में तुमने आनन्द ढूँढ़ा, वह अन्त में तुम्हें निराश ही करेगी।

आज की मिठास कल कड़वी हो जाएगी; आज का मित्र कल शत्रु बन जाएगा; आज की बुद्धि कल मूर्खता सिद्ध होगी। जो कुछ तुम सोचते हो कि तुम्हें आनन्द देगा, वह अन्त में व्यर्थ ही निकलेगा। प्रभु यीशु मसीह, वह जीवित, प्रेममय उद्धारकर्ता, जो पापियों के लिये मरा, ही एकमात्र है जो तुम्हें आनन्द दे सकता है। परन्तु जो आनन्द वह तुम्हें देता है वह सांसारिक आनन्द नहीं है। वह उसका अपना स्वर्गीय आनन्द है।

स्वतंत्र आनन्द 16

“परमेश्वर का राज्य ... धार्मिकता, शान्ति और पवित्र आत्मा में आनन्द है।” जो पवित्र आत्मा हम में बसने आता है, वह हम में परमेश्वर के वरदान रूपी धार्मिकता को भरपूर मात्रा में उत्पन्न करता है, और वही धार्मिकता हमारी शान्ति और आनन्द का स्रोत है। मनुष्य की अपनी धार्मिकता न शान्ति लाती है न आनन्द, क्योंकि वह अपने ही प्रयत्न पर आधारित है। मनुष्य परमेश्वर और मनुष्यों के सामने धर्मी बनने के लिये संघर्ष करते हैं, परन्तु इतने संघर्ष के बाद भी वे परमेश्वर की दृष्टि में प्रतिदिन मैले चिथड़ों के समान ही रहते हैं। जिसे मनुष्य धार्मिकता कहता है, उसे परमेश्वर मैला चिथड़ा कहता है (यशायाह 64:6)। “वे परमेश्वर की धार्मिकता से अनजान होकर अपनी ही धार्मिकता स्थापित करने का यत्न करते हुए परमेश्वर की धार्मिकता के अधीन नहीं हुए” (रोमियों 10:3)। चाहे यहूदी धार्मिकता हो, या हिन्दू धार्मिकता, या बौद्ध धार्मिकता, या नाममात्र के ईसाई की धार्मिकता — सब एक समान हैं; परमेश्वर उन्हें मैले चिथड़े ही कहता है।

और तुम्हारे द्वारा किए गए धोखों का क्या? तुम्हारे पास अनेक उत्कृष्ट प्रमाण-पत्र हो सकते हैं। तुम्हारे प्रधानाध्यापक या प्राचार्य ने लिखा हो कि “अमुक व्यक्ति बहुत ऊँचे नैतिक चरित्र का है”। परन्तु तुम भली-भाँति जानते हो कि यह प्रायः केवल झूठ ही है। शिक्षक और विद्यार्थी सब यह जानते हैं। तुम्हारी समिति के सदस्य, पड़ोसी, मित्र, सम्बन्धी सब कह सकते हैं कि तुम कितने अच्छे हो, और तुम किसी भी नियोक्ता, किसी भी देश के पादरी या प्रचारक से बढ़िया प्रमाण-पत्र इकट्ठे कर सकते हो। परन्तु सर्वज्ञ, पवित्र परमेश्वर तुम्हारे विषय में क्या सोचता है? तुम्हारे प्रमाण-पत्र उसके सामने कैसे दिखेंगे? क्या तुम्हारा अपना विवेक प्रतिदिन तुम से नहीं कहता कि तुम दोषी हो, दोषी हो, दोषी हो? अच्छी...

3 प्रभु का आनन्द

दूसरों की प्रशंसा मत सुनो। अपने ही विवेक की जाँच करो, तब तुम्हें वे बातें दिखाई देंगी जो तुमने गुप्त में की थीं, शायद वर्षों पहले किसी कोने में। जब तुम सोने जाते हो, या इधर-उधर टहलते हो, तो तुम्हारे मन में कैसे विचार आते हैं? तुम नहीं चाहते कि दूसरे देखें कि तुम वास्तव में कैसे हो। इसलिये अपने ही विवेक की जाँच करो और जो वह तुम से कहता है उस पर विश्वास करो, और अपनी धार्मिकता स्थापित करने के प्रयत्न में अब और समय व्यर्थ मत गँवाओ।

परमेश्वर अपने प्रेम के मुफ्त उपहार के रूप में अपनी धार्मिकता तुम्हें देने के लिये तैयार है। क्या तुम्हारा पिता, माता, भाई, बहन, पति या पत्नी तुम्हें ऐसा प्रेम दे सकते हैं? वे प्रयत्न भी करें तो नहीं दे सकते, क्योंकि उनमें ऐसा प्रेम देने की सामर्थ्य ही नहीं है। परन्तु अनन्त परमेश्वर तुम्हें ऐसा ही प्रेम प्रदान करता है। वह चाहता है कि तुम उसे प्रेम करो और अनन्तकाल तक उसे बढ़ाते जाओ। यही उसका उपहार है!

और पवित्र आत्मा द्वारा दिया गया एक और आनन्द भी है। वह आनन्द न तो कोई मनुष्य तुम्हें दे सकता है, न तुम अपने प्रयत्न से उसे प्राप्त कर सकते हो। परन्तु यदि तुम परमेश्वर के पवित्र आत्मा को अपने भीतर प्रवेश करने और कार्य करने दो, तो तुम परमेश्वर की अपनी धार्मिकता से धर्मी बन जाओगे, और परिणामस्वरूप प्रभु में आनन्दित होने लगोगे। तुम्हारे हृदय में आत्मा की इस निश्चितता के कारण कि तुम परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी हो, तुम परमेश्वर के आनन्द से उछल पड़ोगे, और दिन-प्रतिदिन अपने आप को उसमें और अधिक समृद्ध, शुद्ध और बलवन्त पाओगे।

इस विषय पर मुझे कुछ और समय ठहरने दो। मैं परमेश्वर के वचन से तुम्हें दिखाना चाहता हूँ कि उसने हर किसी के लिये इस आनन्द का अनुभव करना कैसे सम्भव बनाया है।

स्वतंत्र आनन्द 18

“मरूभूमि और सूखी भूमि आनन्दित होगी; निर्जल देश मगन होकर केसर के फूल की नाईं फूले-फलेगा। वह अत्यन्त प्रफुल्लित होकर आनन्द और गीतों के साथ मगन होगा; उसे लबानोन की महिमा और कर्मेल और शारोन का वैभव दिया जाएगा; वे यहोवा की महिमा, हमारे परमेश्वर के वैभव को देखेंगे” (यशायाह 35:1, 2)।

प्रभु अपने आनन्द का सार कितनी सरलता और सुन्दरता से बताता है! जब एक मनुष्य की अवज्ञा के द्वारा पाप संसार में आया, तो वह अपने साथ शाप लाया, और उस शाप के कारण काँटे, ऊँटकटारे, बंजरपन और निराशा हर जगह फैल गए। ये मनुष्य की वर्तमान दशा और जीवन के चित्र हैं। मनुष्य अपनी उन्नति और संस्कृति के द्वारा जो कुछ भी करना चाहे, वह अन्त में केवल काँटों, ऊँटकटारों और रेगिस्तान की रेत में ही समाप्त होता है।

इस संसार में अनेक राज्य और साम्राज्य रहे हैं, परन्तु सब असफलता, पराजय और लज्जा में समाप्त हुए। अपनी कब्रों में गड़े हुए वे प्रसिद्ध राजा और दार्शनिक अब कहाँ हैं? मनुष्य का हर कार्य अन्ततः व्यर्थ हो जाना है। पत्थर से बनी सुन्दर इमारतें भी अन्त में मलबे के ढेर बन जाती हैं। चतुराई से बनाए गए यन्त्र और मशीनें किसी न किसी दिन टूट जाती हैं। मानवीय सम्बन्ध कलह और घृणा में समाप्त होते हैं। बच्चे माता-पिता के विरुद्ध विद्रोह करते हैं। हर घर में झगड़े और मतभेद हैं। क्या तुम मुझे कोई ऐसा घर बता सकते हो जहाँ भाई-बहनों के बीच, या सास और बहू के बीच झगड़ा और ईर्ष्या न हो? क्या तुम्हें कोई ऐसा व्यापार मालूम है जिसमें भ्रष्टाचार या अनैतिकता न हो? ऊँचे पदों पर बैठे लोग भी घूस लेते और देते हैं। प्रभु का आनन्द हर परिवार और हर समाज में विद्यमान इस पाप के शाप के कारण

समाज।

परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप में बनाया। उसने पहले मनुष्य को हर तरह से सिद्ध, अद्भुत शरीर दिया। फिर पाप आया, और अब हर चेहरे पर कोई भी पाप के चिह्न देख सकता है। कुछ चेहरे कुछ समय के लिये बहुत सुन्दर और मीठे लग सकते हैं, परन्तु भीतर, यदि ध्यान से देखो, तो तुम्हें अभिमान, लोभ, घमण्ड और वासना के पाप के चिह्न दिखाई देंगे। इस प्रकार परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य का जीवन काँटों और ऊँटकटारों से भरे एक बंजर मरुस्थल के सिवा कुछ नहीं है, और

बंजरपन के सिवा कुछ नहीं। हे मनुष्य, अपने और अपने कार्यों पर घमण्ड करने से पहले, अपने आप को वैसे ही देख जैसे परमेश्वर तुम्हें देखता है — कि तुम्हारा जीवन एक ऐसे बंजर मरुस्थल के सिवा कुछ नहीं जिसे किसी भी उपाय से बदला या सुन्दर नहीं बनाया जा सकता। परन्तु परमेश्वर का वचन कहता है: “मरुस्थल केसर के फूल की नाईं फूलेगा। वह अत्यन्त फलेगा-फूलेगा, और आनन्द तथा गीतों से भरपूर होगा।”

“और यहोवा के छुड़ाए हुए लोग लौटेंगे, और जयजयकार करते हुए सिय्योन में आएँगे; और सर्वदा का आनन्द उनके सिर पर होगा; वे आनन्द और मगनता को प्राप्त होंगे, और शोक और आहें भाग जाएँगी” (यशायाह 35:10)।

जब तुम पहली बार इस नए

जन्म के अनुभव में आते हो, तो तुम अवश्य कहोगे: “काश मैं इतने वर्ष पहले ही नए सिरे से जन्मा होता!” एक मसीही के रूप में अपने नए जीवन के आरम्भ में मैंने भी यही कहा था। मैंने सोचा: “यह मेरे साथ पहले क्यों नहीं हुआ, तब मुझे अपने जीवन के इतने वर्ष बिगाड़ने की आवश्यकता न पड़ती।” लज्जा और अन्धकार में बिताए वर्षों के लिये मैं कई बार आह भर चुका हूँ। क्या तुमने कभी ऐसा सोचा है? तुम चाहे कितने भी बूढ़े या जवान हो, निःसन्देह यह विचार तुम्हारे मन में कभी न कभी आया होगा। यह... स्वतंत्र आनन्द 5 ...अपना जीवन बिगाड़ने और इतने वर्ष व्यर्थ गँवाने की आवश्यकता न पड़ती। लज्जा और अन्धकार में बिताए वर्षों के लिये मैं कई बार आह भर चुका हूँ। क्या तुमने कभी ऐसा सोचा है? तुम चाहे कितने भी बूढ़े या जवान हो, निःसन्देह यह विचार तुम्हारे मन में कभी न कभी आया होगा। यह शुभ समाचार है: जब हम परमेश्वर के अनुग्रह को उसकी भरपूरी में ग्रहण करते हैं, तो अतीत के हर पाप की पूरी भरपाई हो सकती है। “मैं तुम्हें उन वर्षों को लौटा दूँगा जिन्हें टिड्डियों ने खा लिया” (Joel 2.25यदि तुम किसान हो, तो तुम भली-भाँति जानते हो कि टिड्डी, कीड़ा, कतरनेवाला कीड़ा और खानेवाला कीड़ा फ़सल को कैसे नष्ट कर सकते हैं। खेत आज हरा-भरा और सुन्दर दिख सकता है, परन्तु कल टिड्डियाँ आकर सारे पत्ते खा जाती हैं। फिर कीड़ा, कतरनेवाला कीड़ा और खानेवाला कीड़ा पीछा करते हैं। ऐसे खेत के लिये कैसी आशा हो सकती है?

क्या यही तुम्हारे जीवन का चित्र है? व्यापार या मूर्खता के कारण तुम्हारे कुछ सबसे अच्छे वर्ष टिड्डियों ने खा लिये। तुम्हारे व्यापक पठन, तुम्हारी सरकारी ज़िम्मेदारियों, तुम्हारी बुरी आदतों के कारण तुम्हारे सबसे अच्छे वर्ष और संकल्प कीड़े ने खा लिये। तुम्हारे अन्य द्वेष या मनोव्यथा के कारण तुम्हारे जीवन के और भी वर्ष खानेवाले कीड़े ने खा लिये। तुम्हारा हृदय कठोर होते-होते कठोर हो गया, और मृत्युशय्या पर तुम्हें कोई आशा नहीं दिखती, और तुम्हारी पत्नी, पति, बच्चे या पड़ोसी तुम्हारे बिस्तर के चारों ओर इकट्ठे होकर आँसू बहाते हुए, तुम उन्हें ऐसे देखते हो मानो पहले कभी न देखा हो, और हृदय की पीड़ा में अपने बच्चों से कहते हो: “मेरी जवानी के दस वर्ष शराब और तुम्हारे पड़ोसी ने खा लिये।” “मेरे प्रौढ़ जीवन के दस वर्ष... ने खा लिये।” तब तुम... प्रभु का आनन्द तुम अपनी उस मूर्खता को समझोगे जिसमें तुमने कभी उन्नति नहीं की। तब तुम अपनी उस आलस्यता को समझोगे, जिसके कारण तुम्हारे वर्ष व्यर्थ गए। तब तुम अपने उस हठ को समझोगे, जिससे तुमने सत्य को अस्वीकार किया। परन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होगी, है न?

तुम्हारा जीवन चाहे कितना भी नष्ट और उजाड़ बना दिया गया हो, परमेश्वर के अनुग्रह का चमत्कार कितना महान है, यह देखो। क्योंकि हमारा प्रभु कहता है: “मैं फिर से भर दूँगा, मैं नया बनाऊँगा, जो खाया गया उसे मैं लौटा दूँगा।” ऐसे धन्यवाद के लिये कितना अद्भुत आनन्द है! जो कुछ नष्ट, बिगाड़ा और उजाड़ा गया, वह सब फिर से ठीक किया जा सकता है और वापस पाया जा सकता है। इस्राएल के लिये भी यही सच था। वे पाप के कारण उजड़ गए और बन्धुआई में गए। तौभी परमेश्वर उन्हें वापस लाया और उनका सांसारिक राज्य उन्हें फिर से दे दिया। प्रभु यीशु मसीह में वह हमें उससे कहीं अधिक देता है! यही हमारा आनन्द है। हम इसलिये अधिकाधिक आनन्दित होते हैं क्योंकि हमने जो कुछ खोया है, वह परमेश्वर के अनुग्रह से लौटाया जाएगा। जब कोई सांसारिक वस्तु खो जाती है और फिर मिल जाती है, तो हमारा आनन्द कितना बड़ा होता है! जब परमेश्वर हमें वे सारे वर्ष लौटाएगा जिन्हें टिड्डियों ने खा लिया है, तो हमारा आनन्द कितना और भी बड़ा होगा!

आओ हम कल्पना करें कि हमने कितने वर्ष व्यर्थ गँवाए हैं। उदाहरण के लिये, एक सम्मेलन को लें। औसतन उन सभाओं में 2,000 लोग उपस्थित होते हैं। इनमें से हर एक के व्यर्थ गँवाए गए वर्षों को गिना जाए, तो कुल मिलाकर हज़ारों वर्षों के बराबर बहुमूल्य जीवन व्यर्थ गँवाया गया प्रतीत होगा।

आओ एक और सामान्य उदाहरण लें। अपने जीवनकाल में तुमने जो कुछ खोया है, चाहे वह छाता हो या फाउण्टेन पेन, या किसी और रूप में, उन सबको याद करने का प्रयत्न करो... स्वतंत्र आनन्द 17

कितने पेन, घड़ियाँ, छाते, चप्पलें, कितनी चाबियाँ, दर्पण, नकली दाँत, कितने कपड़े धोबी के हाथों फट गए या घिस गए; कितना पैसा लापरवाही या चोरी से खो गया, और भी न जाने कितनी चीज़ें। यदि आज शाम बैठकर तुम इन सबको गिनो, तो तुम्हें आश्चर्य होगा कि तुम्हारा नुकसान कितना बड़ा हो गया है। यह भी सोचो कि तुम क्या बनना चाहते थे। यदि एक स्कूली विद्यार्थी के रूप में, अपनी कल्पना और सपनों में, तुम्हें बताया गया होता कि भविष्य में तुम सारी उपाधियाँ प्राप्त करोगे, तो क्या इससे तुम्हें बड़ा आनन्द न मिलता?

परन्तु यहाँ हमारे पास इससे भी कहीं अधिक अद्भुत एक बात है, और

बीते हुए समय और हार की भरपाई की जा सकती है; इतना ही नहीं, जो कुछ तुमने खोया है उससे कहीं अधिक तुम्हें लौटाया जाएगा। अब लज्जा और अपमान सहने की आवश्यकता नहीं है। “सभी ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।” हम सब इस मामले में ऋणी हैं। हमारी मूर्खता, दुर्बलता और अज्ञान के कारण जो कुछ हमने खोया है, यदि हम तैयार हों, तो प्रभु उसे हमें लौटा देगा। क्योंकि वह पूरी तरह चंगा करता है। जो आनन्द वह तुम्हें भरपूरी में देता है, उसे प्रेम और कृतज्ञता से ग्रहण करो। सन्देह में मत रहो। वह सब को देता है, सब को चाहता है। अपने प्रभु को अपना सारा प्रेम पूरी तरह और सर्वथा लेने दो। तब तुम्हारे हृदय में आनन्द, मगनता और गीत होंगे, और प्रभु का आनन्द ही तुम्हारा बल होगा। इसे ग्रहण करने में प्रभु तुम्हारी सहायता करे।

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