अध्याय 6
शित हुआ, जिस ने मृत्यु का नाश किया, और जीवन और अमरता क
उपदेश III।
2 तीमुथियुस, अध्याय 1, पद 9 और 10।
9. जिस ने हमारा उद्धार किया, और पवित्र बुलाहट से हमें बुलाया; हमारे कामों के अनुसार नहीं, पर अपने ही उद्देश्य और उस अनुग्रह के अनुसार जो सनातन से मसीह यीशु में हम पर हुआ;
10. पर अब हमारे उद्धारकर्ता मसीह यीशु के प्रगट होने से प्रकाशित हुआ, जिस ने मृत्यु का नाश किया, और जीवन और अमरता को सुसमाचार के द्वारा प्रकाशित कर दिया।
आज प्रातःकाल हमने सन्त पौलुस के पाठ के अनुसार दिखाया कि यदि हम यह जानना चाहें कि हमारे उद्धार में हमारे परमेश्वर की दया कितनी मुफ़्त है, तो हमें उसकी सनातन युक्ति तक पहुँचना होगा, जिसके द्वारा उसने जगत की उत्पत्ति से पहले हमें चुन लिया। क्योंकि वहाँ हम देखते हैं कि उसने न हमारे व्यक्तित्व को देखा, न हमारी योग्यता को, और न उन किन्हीं गुणों को जो हम किसी प्रकार ला सकते थे। हमारे जन्म से पहले ही हम उसकी पुस्तक में लिख लिये गए थे; वह हमें अपनी सन्तान के रूप में गोद ले चुका था। इसलिए आओ, हम सब कुछ उसकी दया के हाथ सौंप दें, यह जानते हुए कि हम अपने विषय में घमण्ड नहीं कर सकते, जब तक कि हम उस महिमा को उससे छीन न लें जो उसी की है।
मनुष्यों ने परमेश्वर के अनुग्रह को धुँधला करने के लिए तरह-तरह की कुतर्क-रचनाएँ गढ़ने का प्रयत्न किया है। क्योंकि उन्होंने कहा है कि यद्यपि परमेश्वर ने जगत की उत्पत्ति से पहले मनुष्यों को चुना, तथापि यह इस आधार पर हुआ कि उसने पहले से देख लिया था कि एक मनुष्य दूसरे से भिन्न होगा। पवित्रशास्त्र स्पष्ट दिखाता है कि परमेश्वर ने मनुष्यों को चुनते समय यह प्रतीक्षा नहीं की कि वे योग्य हैं या नहीं; परन्तु कुतर्कियों ने सोचा कि वे यह कहकर परमेश्वर के अनुग्रह को धुँधला कर सकते हैं कि यद्यपि उसने बीते हुए गुणों का विचार नहीं किया, तो भी उसकी दृष्टि आगे होनेवाले गुणों पर थी। क्योंकि वे कहते हैं कि यद्यपि याकूब और उसके भाई एसाव ने न भला किया था न बुरा, और परमेश्वर ने एक को चुना और दूसरे को ठुकराया, तो भी उसने पहले से देख लिया था (क्य
ंकि सब बातें उसके सम्मुख वर्तमान हैं) कि एसाव दुष्ट मनुष्य होगा, और याकूब वैसा होगा जैसा उसने आगे चलकर अपने आप को दिखाया।
परन्तु ये मूर्खतापूर्ण अटकलें हैं; क्योंकि वे स्पष्ट ही सन्त पौलुस को झूठा ठहराते हैं, जो कहता है कि परमेश्वर ने हमें चुनते समय हमारे कामों को कोई प्रतिफल नहीं दिया, क्योंकि उसने यह जगत की उत्पत्ति से पहले किया। परन्तु यदि सन्त पौलुस का अधिकार मिटा भी दिया जाए, तो भी यह बात न केवल पवित्रशास्त्र में, वरन् बुद्धि में भी अत्यन्त स्पष्ट और खुली है; यहाँ तक कि जो इस प्रकार बच निकलना चाहते हैं, वे अपने आपको सब समझ से रहित मनुष्य प्रमाणित करते हैं। क्योंकि यदि हम अपने आप को तह तक खोजें, तो हम में कौन-सी भलाई मिलेगी? क्या सारी मानवजाति शापित नहीं है? हम अपनी माता के गर्भ से पाप को छोड़ और क्या लेकर आते हैं?
इसलिए हम एक-दूसरे से रत्ती भर भी भिन्न नहीं हैं; परन्तु परमेश्वर को यही भाया कि जिन्हें वह चाहे उन्हें अपना कर ले। और इसी कारण सन्त पौलुस दूसरे स्थान पर ये शब्द कहता है, कि मनुष्यों के पास घमण्ड करने का कोई कारण नहीं, क्योंकि कोई अपने आप को अपने साथियों से उत्तम नहीं पाता, सिवाय इसके कि परमेश्वर उसे अलग करता है। अतः यदि हम मानते हैं कि परमेश्वर ने जगत की उत्पत्ति से पहले हमें चुन लिया, तो अवश्य ही यह परिणाम निकलता है कि परमेश्वर ने हमें अपना अनुग्रह पाने के योग्य बनाया; कि उसने हमें वह भलाई दी जो पहले हम में नहीं थी; कि उसने हमें केवल स्वर्ग के राज्य के उत्तराधिकारी होने के लिए ही नहीं चुना, वरन् वह हमें धर्मी भी ठहराता है और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारा संचालन भी करता है। मसीही को इस शिक्षा में ऐसा दृढ़ निश्चय होना चाहिए कि वह सब सन्देह से परे हो।
आज के दिन ऐसे कुछ लोग हैं जो चाहेंगे कि परमेश्वर का सत्य नष्ट हो जाए। ऐसे लोग पागल पशुओं की नाईं पवित्र आत्मा से लड़ते हैं और पवित्रशास्त्र को मिटाने का यत्न करते हैं। इन लोगों की अपेक्षा पोप-मतवादियों में अधिक सज्जनता है; क्योंकि पोप-मतवादियों की शिक्षा उन नीच और दुष्ट मनुष्यों की शिक्षा से, जो परमेश्वर के पवित्र चुनाव को गिरा देते हैं,—उन कुत्तों से जो उस पर भौंकते हैं और उन सूअरों से जो उसे जड़ से उखाड़ते हैं,—कहीं अधिक उत्तम, अधिक पवित्र और पवित्रशास्त्र के अधिक अनुकूल है।
तथापि जो शिक्षा यहाँ हमें दी गई है उसे हम दृढ़ता से थामे रहें: जब परमेश्वर ने जगत के अपने क्रम में आने से पहले हमें चुन लिया, तो हमें अपने उद्
ार का कारण उसकी मुफ़्त भलाई ही को ठहराना चाहिए; हमें मानना चाहिए कि उसने हमें अपनी सन्तान हमारी किन्हीं योग्यताओं के कारण नहीं बनाया; क्योंकि हमारे पास ऐसा कुछ न था जिससे हम उसकी कृपादृष्टि पा सकते। इसलिए हमें अपने उद्धार का कारण और स्रोत केवल उसी में रखना और उसी पर अपने आप को स्थिर करना चाहिए; नहीं तो हम जो कुछ और जैसे भी बनाएँ, वह व्यर्थ हो जाएगा।
यहाँ हमें ध्यान देना चाहिए कि सन्त पौलुस ने किन बातों को एक साथ जोड़ा है; अर्थात् यीशु मसीह के अनुग्रह को पिता परमेश्वर की सनातन युक्ति के साथ; और फिर वह हमें हमारी बुलाहट तक ले आता है, ताकि हम परमेश्वर की भलाई और उसकी उस इच्छा के विषय में निश्चित हो जाएँ, जो हम से छिपी रहती, यदि हमें उसकी साक्षी न मिलती। सन्त पौलुस पहले यह कहता है कि वह अनुग्रह, जो परमेश्वर के उद्देश्य पर टिका है और उसी में समाया हुआ है, हमारे प्रभु यीशु मसीह में दिया गया है। मानो वह कहता है कि हम तो इस योग्य थे कि त्यागे जाएँ और परमेश्वर के प्राणघातक शत्रु जानकर घृणित ठहरें; इसलिए आवश्यक था कि हम मानो यीशु मसीह में कलम लगाए जाएँ, ताकि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान के रूप में पहचाने और स्वीकार करे। नहीं तो परमेश्वर हमें केवल घृणा की दृष्टि से ही देख सकता था; क्योंकि हम में दुर्दशा के सिवाय कुछ नहीं; हम पाप से भरे हैं और मानो हर प्रकार के अधर्म से ठूँसे हुए हैं।
परमेश्वर, जो स्वयं धार्मिकता है, जब तक हमारे पापमय स्वभाव पर विचार करता है, तब तक हमारे साथ उसका मेल नहीं हो सकता। इसलिए जब उसे जगत की उत्पत्ति से पहले हमें गोद लेना था, तो आवश्यक था कि यीशु मसीह हमारे और उसके बीच खड़ा हो; कि हम उसी के व्यक्तित्व में चुने जाएँ, क्योंकि वही प्रिय पुत्र है: जब परमेश्वर हमें उससे जोड़ता है, तो वह हमें ऐसा बना देता है जैसा उसे भाता है। यदि हम परमेश्वर के चुनाव में सन्देह न करना चाहें, तो आओ, हम सीधे यीशु मसीह के पास आना सीखें: क्योंकि वही सच्चा दर्पण है, जिसमें हमें अपना गोद लिया जाना देखना चाहिए।
यदि यीशु मसीह को हम से अलग कर दिया जाए, तो परमेश्वर पापियों का न्यायी है; इस प्रकार हम उसके हाथ से किसी भलाई या कृपा की आशा नहीं कर सकते, वरन् दण्ड की ही बाट जोहेंगे: क्योंकि यीशु मसीह के बिना उसकी महिमा हमारे लिए सदा भयानक और डरावनी रहेगी। यदि हम उसकी सनातन युक्ति की कलीसियाा सुनें, तो हम भयभीत हुए बिना नहीं रह सकते, मानो वह हमें दुःख में डुबो देने के लिए पहले ही शस्त्र बाँधे खड़ा हो।
परन्तु जब हम जानते हैं कि सारा अनुग्रह यीशु मसीह में निहित है, तब हम निश्चित हो सकते हैं कि परमेश्वर ने हम से प्रेम किया, यद्यपि हम अयोग्य थे।
दूसरे, हमें ध्यान देना चाहिए कि सन्त पौलुस केवल परमेश्वर के चुनाव की बात नहीं करता, क्योंकि उससे हम सन्देह से परे नहीं हो जाते; वरन् हम उलझन और व्याकुलता में ही पड़े रहते: परन्तु वह जोड़ता है, बुलाहट ; जिसके द्वारा परमेश्वर ने अपनी वह युक्ति प्रकट की, जो पहले हम से अज्ञात थी और जिस तक हम पहुँच नहीं सकते थे। तो हम कैसे जानें कि परमेश्वर ने हमें चुना है, ताकि हम उस में आनन्द करें और उस भलाई पर गर्व करें जो उसने हम पर की है? जो लोग परमेश्वर के चुनाव के विरुद्ध बोलते हैं, वे सुसमाचार को अकेला छोड़ देते हैं; वे वह सब छोड़ देते हैं जो परमेश्वर हमारे सामने रखता है कि हमें अपने पास ले आए; वे सब साधन छोड़ देते हैं जो उसने हमारे लिए ठहराए हैं और जिन्हें वह हमारे काम के योग्य और उचित जानता है। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए; वरन् सन्त पौलुस के नियम के अनुसार हमें बुलाहट को परमेश्वर के सनातन चुनाव के साथ जोड़ना चाहिए।
कहा गया है कि हम बुलाए गए हैं; और इस प्रकार हमें यह दूसरा शब्द मिलता है, बुलाहट। अतः परमेश्वर हमें बुलाता है: और कैसे? निश्चय ही तब, जब उसे भाता है कि हमारे चुनाव के विषय में हमें निश्चय दिलाए; जिसे हम और किसी उपाय से पा नहीं सकते थे। क्योंकि परमेश्वर की युक्ति में कौन प्रवेश कर सकता है? जैसा भविष्यद्वक्ता यशायाह कहता है, और प्रेरित पौलुस भी। परन्तु जब परमेश्वर को भाता है कि वह अपने आप को हम से घनिष्ठता से बाँटे, तब हम वह पाते हैं जो सब मनुष्यों के ज्ञान से परे है: क्योंकि हमारे पास एक भली और विश्वासयोग्य साक्षी है, अर्थात् पवित्र आत्मा; जो हमें संसार से ऊपर उठाता है और परमेश्वर के अद्भुत भेदों तक पहुँचा देता है।
हमें परमेश्वर के चुनाव के विषय में उतावली से नहीं बोलना चाहिए, और यह नहीं कहना चाहिए कि हम पूर्वनियत हैं; परन्तु यदि हम अपने उद्धार के विषय में पूर्ण निश्चय चाहते हैं, तो हमें उसकी बात हल्के ढंग से नहीं करनी चाहिए, कि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान बनाया है या नहीं। तो फिर क्या करें? आओ, देखें कि सुसमाचार में क्या प्रस्तुत किया गया है। वहाँ परमेश्वर हमें दिखाता है कि वह हमारा पिता है; और वह हमें जीवन के उत्तराधिकार तक पहुँचाएगा, क्योंकि उसने हमारे हृदयों में पवित्र आत्मा की मुहर लगाकर हमें चिह्नित किया है, जो हमारे उद्धार की निःसन्देह साक्षी है, यदि हम उसे विश्वास से ग्रहण करें।
सुसमाचार बहुतों को सुनाया जाता है, जो फिर भी ठुकराए हुए हैं; हाँ, और परमेश्वर प्रकट करता और दिखाता है कि उसने उन्हें शाप दिया है: कि उसके राज्य में उनका न कोई भाग है न अंश, क्योंकि वे सुसमाचार का विरोध करते हैं और जो अनुग्रह उन्हें दिया जाता है उसे दूर फेंक देते हैं। परन्तु जब हम परमेश्वर की शिक्षा को आज्ञाकारिता और विश्वास के साथ ग्रहण करते हैं, और उसकी प्रतिज्ञाओं पर टिकते हैं, और उसके इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं कि वह हमें अपनी सन्तान बना ले, तो यही, मैं कहता हूँ, हमारे चुनाव का निश्चय है। परन्तु हमें यहाँ यह भी ध्यान देना चाहिए कि जब हमें अपने उद्धार का ज्ञान होता है, जब परमेश्वर हमें बुलाता और अपने सुसमाचार के विश्वास में हमें ज्योति देता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उस सनातन पूर्वनियति को, जो पहले से चली आ रही थी, व्यर्थ कर दिया जाए।
आजकल बहुत से लोग कहेंगे कि जिन्हें परमेश्वर ने चुना है वे विश्वासियों के सिवाय और कौन हैं? मैं मानता हूँ; परन्तु वे इससे बुरा निष्कर्ष निकालते हैं, और कहते हैं कि विश्वास ही हमारे उद्धार का कारण है, हाँ, पहला कारण। यदि वे इसे बीच का कारण कहें, तो यह सचमुच सत्य होगा; क्योंकि पवित्रशास्त्र कहता है, इफिसियों 2:8 । “अनुग्रह ही से विश्वास के द्वारा तुम्हारा उद्धार हुआ है।” परन्तु हमें और ऊपर जाना चाहिए; क्योंकि यदि वे विश्वास को मनुष्यों की स्वतन्त्र इच्छा का फल बताते हैं, तो वे परमेश्वर की दुष्टता से निन्दा करते और अपवित्र कर्म करते हैं। हमें उसी पर आना चाहिए जो पवित्रशास्त्र दिखाता है; अर्थात् जब परमेश्वर हमें विश्वास देता है, तो हमें जानना चाहिए कि हम सुसमाचार ग्रहण करने के योग्य तभी हैं जब उसने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें गढ़ा हो।
हमारे लिए केवल मनुष्य की वाणी सुनना पर्याप्त नहीं, जब तक परमेश्वर भीतर काम न करे और पवित्र आत्मा के द्वारा गुप्त रीति से हम से बातें न करे; और इसी से विश्वास उत्पन्न होता है। परन्तु इसका कारण क्या है? विश्वास एक को क्यों दिया जाता है और दूसरे को क्यों नहीं? सन्त लूका हमें दिखाता है, जब वह कहता है, प्रेरितों के काम 13:48 । “जितने अनन्त जीवन के लिये ठहराए गए थे, उन्होंने विश्वास किया।” सुननेवाले बहुत थे, फिर भी उनमें से थोड़े ही ने उद्धार की प्रतिज्ञा ग्रहण की। और वे थोड़े कौन थे? वे जो उद्धार के लिए ठहराए गए थे। फिर, सन्त पौलुस इफिसियों की पत्री में इस विषय पर इतने विस्तार से बोलता है कि अनिवार्य है कि परमेश्वर की पूर्वनियति के विरोधी मूढ़ और अज्ञानी ह
ं, और शैतान ने उनकी आँखें निकाल ली हैं; और वे सब बुद्धि से रहित हो गए हैं, यदि वे ऐसी स्पष्ट और प्रत्यक्ष बात को नहीं देख सकते।
सन्त पौलुस कहता है कि परमेश्वर ने हमें बुलाया और हमें अपने उन भण्डारों और असीम धन का सहभागी बनाया, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें दिए गए: जैसा उसने जगत की उत्पत्ति से पहले हमें चुना था। जब हम कहते हैं कि हम उद्धार के लिए बुलाए गए हैं क्योंकि परमेश्वर ने हमें विश्वास दिया है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि इससे ऊँचा कोई कारण नहीं; और जो कोई परमेश्वर के सनातन चुनाव तक नहीं पहुँचता, वह उसमें से कुछ घटाता और उसकी महिमा को कम करता है। यह बात पवित्रशास्त्र के लगभग हर भाग में मिलती है।
इस विषय का संक्षिप्त निष्कर्ष निकालने के लिए, आओ देखें कि हमें अपने आप को किस रीति से सँभालना चाहिए। जब हम अपने उद्धार के विषय में पूछताछ करें, तो यह कहना आरम्भ न करें कि क्या हम चुने गए हैं? नहीं, हम कभी इतने ऊँचे नहीं चढ़ सकते; परमेश्वर की युक्ति तक पहुँचने से पहले हम हज़ार बार घबरा जाएँगे और हमारी आँखें चौंधिया जाएँगी। तो फिर हम क्या करें? आओ, सुनें कि सुसमाचार में क्या कहा गया है: जब परमेश्वर ने ऐसी कृपा की कि हम से प्रस्तावित प्रतिज्ञा ग्रहण करवाई, तो क्या हम नहीं जानते कि यह वैसा ही है मानो उसने अपना सारा हृदय हमारे सामने खोल दिया हो, और हमारे चुनाव को हमारे विवेक में दर्ज कर दिया हो!
हमें निश्चय होना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान बना लिया है, और स्वर्ग का राज्य हमारा है; क्योंकि हम यीशु मसीह में बुलाए गए हैं। हम यह कैसे जानें? उस शिक्षा पर, जो परमेश्वर ने हमारे सामने रखी है, हम अपने आप को कैसे टिकाएँ? हमें परमेश्वर के अनुग्रह की बड़ाई करनी और जानना चाहिए कि हम उसकी कृपादृष्टि पाने के लिए अपनी ओर से कुछ नहीं ला सकते; हमें अपनी ही दृष्टि में कुछ नहीं बन जाना चाहिए, ताकि हम कोई प्रशंसा अपने ऊपर न लें; वरन् यह जानें कि परमेश्वर ने जगत की उत्पत्ति से पहले हमें चुनकर सुसमाचार के लिए बुलाया है। परमेश्वर का यह चुनाव मानो एक मुहरबन्द पत्र है; क्योंकि वह अपने आप में और अपने स्वभाव में स्थित है: परन्तु हम उसे पढ़ सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर उसकी साक्षी देता है, जब वह सुसमाचार और विश्वास के द्वारा हमें अपने पास बुलाता है।
क्योंकि जैसे मूल या पहली प्रति पढ़े जानेवाले पत्र या लेख में से कुछ नहीं घटाती, वैसे ही हमें अपने उद्धार के विषय में सन्देह से परे होना चाहिए। जब परमेश्वर सुसमाचार के द्वारा हमें निश्चय दिलाता है कि वह हमें अपनी सन्तान मानता है, तो यह साक्षी अपने साथ शान्ति लाती है; जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से हस्ताक्षरित और पवित्र आत्मा से मुहरबन्द है। जब हमारे पास यह साक्षी है, तो क्या हमारे मन को सन्तुष्ट करने के लिए यह पर्याप्त नहीं? इसलिए परमेश्वर का चुनाव इसके विरुद्ध होना तो दूर, उस साक्षी को और दृढ़ करता है जो हमें सुसमाचार में मिली है। हमें इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर ने जगत के बनने से पहले हमारे नाम अपने चुने हुए बच्चों में दर्ज कर रखे थे: परन्तु उसका ज्ञान उसने अपने ही पास रखा।
जब हम अपने चुनाव की कलीसियाा करें, तब हमें सदा अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आना चाहिए; क्योंकि उसके बिना (जैसा हम पहले दिखा चुके हैं) हम परमेश्वर के निकट नहीं आ सकते। जब हम उसकी आज्ञा की बात करते हैं, तो मृत्यु के योग्य मनुष्यों की नाईं हमारा चकित होना उचित ही है। परन्तु यदि यीशु मसीह हमारा अगुवा हो, तो हम आनन्द के साथ उस पर भरोसा रख सकते हैं; यह जानते हुए कि उस में इतनी योग्यता है कि वह अपने सब अंगों को पिता परमेश्वर का प्रिय बना दे; हमारे लिए इतना ही पर्याप्त है कि हम उसकी देह में कलम लगाए गए और उसके साथ एक किए गए हैं। इसी प्रकार हमें इस शिक्षा पर मनन करना चाहिए, यदि हम उससे ठीक रीति से लाभ उठाना चाहें: जैसा सन्त पौलुस इसे प्रस्तुत करता है; जब वह कहता है कि उद्धार का यह अनुग्रह हमें जगत की उत्पत्ति से पहले दिया गया। यदि हम जानना चाहें कि हमारा उद्धार कैसे हुआ, किस कारण से हुआ, और हमारा उद्धार कहाँ से आता है, तो हमें प्रकृति के क्रम से भी परे जाना होगा।
परमेश्वर ने न तो हमें सन्देह में छोड़ना चाहा, न अपनी युक्ति को छिपाना, कि हम जानें ही नहीं कि हमारा उद्धार कैसे निश्चित किया गया; वरन् उसने अपने सुसमाचार के द्वारा हमें अपने पास बुलाया है, और अपनी भलाई तथा पितृवत् प्रेम की साक्षी हमारे हृदयों में मुहरबन्द कर दी है। अतः ऐसा निश्चय पाकर आओ, हम परमेश्वर की महिमा करें कि उसने अपनी मुफ़्त दया से हमें बुलाया। आओ, हम अपने प्रभु यीशु मसीह पर टिकें, यह जानते हुए कि उसने हमें धोखा नहीं दिया, जब उसने यह प्रचार करवाया कि उसने अपने आप को हमारे लिए दे दिया; और पवित्र आत्मा के द्वारा इसकी साक्षी दी। क्योंकि विश्वास इस बात का निःसन्देह चिह्न है कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान
ानता है; और उसी के द्वारा हम सनातन चुनाव तक पहुँचाए जाते हैं, जैसा उसने पहले से हमें चुना था।
वह यह नहीं कहता कि परमेश्वर ने हमें इसलिए चुना कि हमने सुसमाचार सुना, वरन् इसके विपरीत वह हमें दिए गए विश्वास को सबसे ऊँचे कारण का फल ठहराता है; अर्थात् इसलिए कि परमेश्वर ने पहले से ठहराया था कि वह हमें बचाएगा; क्योंकि हम आदम में खोए हुए और त्यागे हुए थे। कुछ मूर्ख हैं, जो सीधे-सादे लोगों की और अपने जैसे लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिए कहते हैं कि उद्धार का अनुग्रह हमें इसलिए दिया गया कि परमेश्वर ने ठहराया कि उसका पुत्र मानवजाति को छुड़ाए, और इसलिए यह सब के लिए साझा है।
परन्तु सन्त पौलुस ने दूसरी रीति से बात की; और मनुष्य ऐसे बचकाने तर्कों से सुसमाचार की शिक्षा को बिगाड़ नहीं सकते: क्योंकि स्पष्ट कहा गया है कि परमेश्वर ने हमारा उद्धार किया। क्या यह बिना किसी अपवाद के सब पर लागू होता है? नहीं; वह केवल विश्वासियों की बात करता है। फिर, क्या सन्त पौलुस सारे संसार को सम्मिलित करता है? कुछ लोग प्रचार के द्वारा बुलाए गए, तो भी उन्होंने अपने आप को उस उद्धार के अयोग्य बना लिया जो उन्हें दिया गया था: इसलिए वे ठुकराए गए। परमेश्वर ने औरों को उनके अविश्वास में छोड़ दिया, जिन्होंने कभी सुसमाचार का प्रचार नहीं सुना।
इसलिए सन्त पौलुस स्पष्ट और सटीक रूप से उन्हीं से बात करता है जिन्हें परमेश्वर ने चुना और अपने लिए अलग रखा था। परमेश्वर की भलाई कभी अपने सच्चे प्रकाश में न देखी जाएगी, और न उसकी योग्य महिमा की जाएगी, जब तक हम यह न जानें कि उसने नहीं चाहा कि हम मानवजाति के सामान्य विनाश में पड़े रहें; जिसमें उसने उन्हें छोड़ दिया जो हमारे जैसे थे: जिनसे हम भिन्न नहीं हैं; क्योंकि हम उनसे अच्छे नहीं: परन्तु परमेश्वर को यही भाया। इसलिए सब के मुँह बन्द हो जाने चाहिए; मनुष्य परमेश्वर की स्तुति करने के सिवाय अपने ऊपर कुछ भी लेने का साहस न करें, और अपने सारे उद्धार के लिए अपने आप को उसका ऋणी मानें।
अब हम सन्त पौलुस के इस स्थान पर प्रयुक्त अन्य शब्दों के विषय में कुछ टिप्पणियाँ करेंगे। यह सच है कि परमेश्वर का चुनाव हमारे लिए कभी लाभदायक नहीं हो सकता था, और न हम तक पहुँच सकता था, यदि हम उसे सुसमाचार के द्वारा न जानते; इसी कारण परमेश्वर को भाया कि जो बात उसने सब युगों से पहले गुप्त रखी थी उसे प्रकट करे। परन्तु अपना अर्थ और स्पष्ट करने के लिए वह जोड़ता है कि यह अन
ग्रह हम पर अब प्रकट हुआ है। और कैसे? “हमारे उद्धारकर्ता यीशु मसीह के प्रगट होने से।” जब वह कहता है कि यह अनुग्रह यीशु मसीह के प्रगट होने से हम पर प्रकट हुआ, तो वह दिखाता है कि यदि हम परमेश्वर के पुत्र के अनुग्रह पर सन्तुष्ट होकर विश्राम न कर सकें, तो हम बड़े कृतघ्न ठहरेंगे। इससे अधिक हम और क्या देख सकते हैं? यदि हम बादलों के पार चढ़कर परमेश्वर के भेदों की खोज कर सकते, तो उसका परिणाम क्या होता? क्या यही नहीं कि हम निश्चित कर लें कि हम उसकी सन्तान और उत्तराधिकारी हैं?
अब हम इन बातों को जानते हैं, क्योंकि वे यीशु मसीह में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की गई हैं। क्योंकि कहा गया है कि जो कोई उस पर विश्वास करते हैं, वे परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार पाएँगे। इसलिए यदि हम अपने चुनाव का निश्चय चाहते हैं, तो हमें इन बातों से रत्ती भर भी नहीं हटना चाहिए। सन्त पौलुस पहले ही हमें दिखा चुका है कि परमेश्वर ने हम से कभी प्रेम नहीं किया, और न हमें चुना, केवल अपने प्रिय पुत्र के व्यक्तित्व में। जब यीशु मसीह प्रगट हुआ, तो उसने हम पर जीवन प्रकट किया; नहीं तो हम कभी उसके भागी न होते। उसने हमें परमेश्वर की सनातन युक्ति से परिचित करा दिया है। परन्तु मनुष्यों के लिए यह अहंकार है कि वे उससे अधिक जानने का प्रयत्न करें जितना परमेश्वर चाहता है कि वे जानें।
यदि हम परमेश्वर की आज्ञाकारिता में संयम और श्रद्धा से चलें, और जो कुछ वह पवित्रशास्त्र में कहता है उसे सुनें और ग्रहण करें, तो हमारे सामने मार्ग सीधा किया जाएगा। सन्त पौलुस कहता है कि जब परमेश्वर का पुत्र संसार में प्रगट हुआ, तो उसने हमारी आँखें खोल दीं, ताकि हम जानें कि जगत के बनने से पहले वह हम पर अनुग्रहकारी था। हम उसकी सन्तान के रूप में ग्रहण किए गए और धर्मी गिने गए; इसलिए हमें इसमें सन्देह करने की आवश्यकता नहीं कि स्वर्ग का राज्य हमारे लिए तैयार है। ऐसा नहीं कि वह हमें हमारी योग्यताओं से मिला है, परन्तु इसलिए कि वह यीशु मसीह का है, जो हमें अपने साथ सहभागी बनाता है।
जब सन्त पौलुस यीशु मसीह के प्रगट होने की बात करता है, तो कहता है, “उसने जीवन और अमरता को सुसमाचार के द्वारा प्रकाशित कर दिया।” केवल इतना ही नहीं कहा गया कि यीशु मसीह हमारा उद्धारकर्ता है, परन्तु यह कि वह मध्यस्थ होने के लिए भेजा गया है; कि अपनी मृत्यु के बलिदान के द्वारा हमारा मेल कराए: वह हमारे पास निष्कलंक मेमने के रूप में भेजा गया है; कि हमें शुद्ध करे और हमारे सब अपराधों का प्रायश्चित्त
करे: वह हमारा जमानती है, कि हमें मृत्यु के दण्ड से छुड़ाए: वह हमारी धार्मिकता है; वह हमारा सहायक है, जो परमेश्वर के सामने मध्यस्थता करता है कि वह हमारी प्रार्थनाएँ सुने।
यदि हम ठीक रीति से जानना चाहते हैं कि वह कैसे प्रगट हुआ, तो हमें ये सब गुण यीशु मसीह के मानने चाहिए। हमें उस सार को देखना चाहिए जो सुसमाचार में निहित है। हमें जानना चाहिए कि यीशु मसीह हमारे उद्धारकर्ता के रूप में प्रगट हुआ, और हमारे उद्धार के लिए उसने दुःख उठाया; और उसी के द्वारा हमारा मेल पिता परमेश्वर से हुआ; कि हम अपने सब दागों से शुद्ध किए गए और अनन्त मृत्यु से छुड़ाए गए हैं। यदि हम न जानें कि वह हमारा सहायक है, कि जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं तो वह हमारी सुनता है, ताकि हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर मिले, तो हमारा क्या होगा? हमें उस परमेश्वर का नाम लेकर पुकारने का, जो हमारे उद्धार का स्रोत है, क्या भरोसा रहेगा? परन्तु सन्त पौलुस कहता है कि यीशु मसीह ने मानवजाति के छुटकारे के लिए जो कुछ आवश्यक था वह सब पूरा कर दिया है।
यदि सुसमाचार को हटा दिया जाए, तो इससे हमें क्या लाभ होता कि परमेश्वर के पुत्र ने मृत्यु सही और हमारे धर्मी ठहरने के लिए तीसरे दिन जी उठा? यह सब हमारे लिए निष्फल होता। अतः सुसमाचार हमें उन लाभों का अधिकारी बनाता है जो यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल लिए हैं। और इसलिए, यद्यपि वह देह में हम से दूर है और यहाँ पृथ्वी पर हमारे बीच नहीं रहता, तो भी ऐसा नहीं कि उसने अपने आप को हटा लिया हो, मानो हम उसे पा ही न सकें; क्योंकि चमकता हुआ सूर्य संसार को उतना प्रकाश नहीं देता, जितना यीशु मसीह उन पर अपने आप को खुले रूप से दिखाता है जिनके पास विश्वास की आँखें हैं कि जब सुसमाचार का प्रचार होता है तब उसे देखें। इसलिए सन्त पौलुस कहता है कि यीशु मसीह ने जीवन को प्रकाश में प्रकट किया , हाँ, अनन्त जीवन को।
वह कहता है कि परमेश्वर के पुत्र ने मृत्यु का नाश कर दिया। और उसने उसका नाश कैसे किया? यदि उसने परमेश्वर के क्रोध को शान्त करने के लिए एक सनातन बलिदान न चढ़ाया होता, यदि वह अथाह गड्ढे तक न उतरा होता कि हमें वहाँ से खींच निकाले, यदि उसने हमारा शाप अपने ऊपर न लिया होता, यदि उसने वह बोझ
दूर न किया होता जिसके तले हम कुचले जा रहे थे, तो हम कहाँ होते? क्या मृत्यु का नाश होता? नहीं, पाप हम में राज्य करता, और मृत्यु भी। और सचमुच, हर कोई अपने आप को जाँचे, तो हम पाएँगे कि हम शैतान के दास हैं, जो मृत्यु का सरदार है। इसलिए हम इस दुःखद दासत्व में बन्द हैं, जब तक कि परमेश्वर शैतान, पाप और मृत्यु को नष्ट न करे। और यह हो चुका है; पर कैसे? उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू के द्वारा हमारे पापों को दूर कर दिया है।
इसलिए यद्यपि हम दीन पापी हैं और परमेश्वर के न्याय के संकट में हैं, तो भी पाप हमें हानि नहीं पहुँचा सकता; वह डंक, जो विषैला है, ऐसा कुन्द हो गया है कि हमें घायल नहीं कर सकता, क्योंकि यीशु मसीह ने उस पर विजय पाई है। उसने अपना लहू बहाना व्यर्थ नहीं सहा; वरन् वह एक ऐसा धोना था जिससे हम पवित्र आत्मा के द्वारा धोए गए; जैसा सन्त पतरस दिखाता है। और इस प्रकार हम स्पष्ट देखते हैं कि जब सन्त पौलुस सुसमाचार की बात करता है, जिसमें यीशु मसीह प्रगट हुआ, और प्रतिदिन हम पर प्रगट होता है, तो वह उसकी मृत्यु और दुःखभोग को, और मानवजाति के उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली बातों को नहीं भूलता।
हम निश्चय रख सकते हैं कि अपने प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में हमें वह सब कुछ मिला है जो हम चाह सकते हैं; हमें परमेश्वर की भलाई और उस प्रेम पर, जो वह हम से रखता है, पूर्ण और सिद्ध भरोसा है। परन्तु हम देखते हैं कि हमारे पाप हमें परमेश्वर से अलग करते हैं और हमारे अंगों में युद्ध मचाते हैं; फिर भी हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिए प्रायश्चित्त है। और यह क्यों? क्योंकि उसने हमारे पापों को धो डालने के लिए अपना लहू बहाया; उसने ऐसा बलिदान चढ़ाया जिसके द्वारा परमेश्वर हम से मेल रखनेवाला हो गया; संक्षेप में, उसने शाप को दूर कर दिया, ताकि हम परमेश्वर से आशीष पाएँ। और इसके अतिरिक्त उसने मृत्यु को जीत लिया और उस पर जयवन्त हुआ; ताकि वह हमें उसके अत्याचार से छुड़ाए, जो नहीं तो हमें पूरी तरह दबा देता।
इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातें हमारे प्रभु यीशु मसीह में पूरी हो चुकी हैं। और इन सब लाभों के पूर्ण अधिकारी होने के लिए हमें जानना चाहिए कि वह अपने सुसमाचार के द्वारा प्रतिदिन हम पर प्रगट होता है।
यद्यपि वह अपनी स्वर्गीय महिमा में निवास करता है, तो भी यदि हम अपने विश्वास की आँखें खोलें, तो हम उसे देखेंगे। हमें सीखना चाहिए कि जिसे पवित्र आत्मा ने जोड़ा है उसे अलग न करें। आओ, देखें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने के पश्चात् परमेश्वर ने संसार पर जो अनुग्रह किया उसे बढ़ाकर बताने के लिए सन्त पौलुस का तुलना से क्या अभिप्राय था; मानो वह कहता है कि प्राचीन पिताओं को यह लाभ नहीं मिला था कि यीशु मसीह उन पर वैसे प्रगट हो जैसे वह हम पर प्रगट हुआ।
यह सच है कि उनका विश्वास वही था; और स्वर्ग का उत्तराधिकार उनका भी है, जैसा हमारा; परमेश्वर ने अपना अनुग्रह उन पर भी प्रकट किया जैसा हम पर: परन्तु उसी मात्रा में नहीं: क्योंकि उन्होंने यीशु मसीह को व्यवस्था के प्रतीकों के नीचे दूर से देखा, जैसा सन्त पौलुस कुरिन्थियों से कहता है। मन्दिर का परदा अब तक तना हुआ था, ताकि यहूदी पवित्रस्थान के निकट न आ सकें: अर्थात् भौतिक पवित्रस्थान के। परन्तु अब, मन्दिर का परदा हटा दिए जाने पर, हम अपने परमेश्वर की महिमा के निकट आते हैं: हम बड़ी घनिष्ठता से उसके पास आते हैं जिसमें सारी सिद्धता और महिमा वास करती है। संक्षेप में, हमारे पास देह है, जब कि उनके पास केवल छाया थी। कुलुस्सियों 2:17 ।
प्राचीन पिताओं ने अपने आप को पूरी तरह यीशु मसीह के क्लेश सहने के लिए सौंप दिया था; जैसा इब्रानियों के 11वें अध्याय में कहा गया है: क्योंकि यह नहीं कहा गया कि मूसा ने अब्राहम की नामधराई उठाई, वरन् यीशु मसीह की। इस प्रकार प्राचीन पिताओं ने, यद्यपि वे व्यवस्था के अधीन जीवित रहे, बलिदानों में अपने आप को परमेश्वर को अर्पित किया, कि मसीह के क्लेश बड़े धीरज से सहें। और अब यीशु मसीह मृतकों में से जी उठकर जीवन को प्रकाश में ले आया है। यदि हम इतने नाज़ुक हैं कि सुसमाचार के क्लेश सह नहीं सकते, तो क्या हम इस योग्य नहीं कि परमेश्वर की पुस्तक में से मिटा दिए जाएँ और त्याग दिए जाएँ? इसलिए हमें विश्वास में स्थिर रहना और यीशु मसीह के नाम के लिए जो कुछ परमेश्वर चाहे वह सहने को तैयार रहना चाहिए; क्योंकि जीवन हमारे सामने रखा गया है, और हमें उसका ज्ञान प्राचीन पिताओं की अपेक्षा अधिक निकट से है।
हम जानते हैं कि प्राचीन पिताओं को अत्याचारियों और सत्य के शत्रुओं ने कैसे सताया, और उन्होंने कैसी स्थिरता से दुःख सहा। कलीसिया की दशा आज के दिनों में उस समय से अधिक कठिन नहीं है। क्योंकि अब यीशु मसीह ने सुसमाचार के द्वारा जीवन
र अमरता को प्रकाश में प्रकट कर दिया है। जब-जब परमेश्वर के अनुग्रह का प्रचार हमारे सामने होता है, तब-तब यह वैसा ही है मानो स्वर्ग का राज्य हमारे लिए खोल दिया गया हो; मानो परमेश्वर ने अपना हाथ बढ़ाकर हमें निश्चय दिलाया हो कि जीवन निकट है; और कि वह हमें अपने स्वर्गीय उत्तराधिकार का सहभागी बनाएगा। परन्तु जब हम उस जीवन की ओर देखते हैं, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिए मोल लिया गया, तो हमें उस सब को, जो हमारा इस संसार में है, छोड़ देने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, ताकि हम ऊपर के उस भण्डार तक पहुँचें, जो स्वर्ग में है।
इसलिए आओ, हम जानबूझकर अन्धे न बनें; क्योंकि यीशु मसीह प्रतिदिन हमारे सामने उस जीवन और अमरता को रखता है जिसकी यहाँ कलीसियाा है। जब सन्त पौलुस जीवन की बात करता है और अमरता जोड़ता है, तो यह वैसा ही है मानो वह कहता है कि हम विश्वास के द्वारा अभी से स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर रहे हैं। यद्यपि हम यहाँ नीचे परदेशी के समान हैं, तो भी जिस जीवन और अनुग्रह के हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा भागी बनाए गए हैं, वह उचित समय पर अपना फल लाएगा; अर्थात् जब वह पिता परमेश्वर की ओर से भेजा जाएगा, कि हमें उन बातों का प्रभाव दिखाए जिनका प्रतिदिन प्रचार होता है, और जो उसके व्यक्तित्व में पूरी हुईं, जब वह मनुष्य-देह धारण किए हुए था।
प्रचारित, जो उसके व्यक्तित्व में पूरी हुईं, जब वह मनुष्य-देह धारण किए हुए था।
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