यह हिन्दी पाठ समीक्षा के लिए तैयार किया गया है। अंग्रेज़ी मूल प्रमाणिक है।

The Epistle of Polycarp to the Philippians

फिलिप्पियों के नाम पुलिकर्पस की पत्री(1)

पुलिकर्पस और उसके साथ के प्राचीन(2), फिलिप्पी में परदेशी होकर रहनेवाली परमेश्वर की कलीसिया के नाम: सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर से, और हमारे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह की ओर से, दया और शान्ति तुम पर बहुतायत से हों।

अध्याय I.-- फिलिप्पियों की स्तुति।

मैंने हमारे प्रभु यीशु मसीह में तुम्हारे साथ बहुत आनन्द किया है, क्योंकि तुमने सच्चे प्रेम का आदर्श(3) माना है, [जैसा परमेश्वर ने दिखाया], और अपने योग्य रीति से उन लोगों के साथ चले हो जो साँकलों में बँधे थे। वे साँकलें पवित्र लोगों के योग्य आभूषण हैं, और सचमुच परमेश्वर और हमारे प्रभु के सच्चे चुने हुओं के मुकुट हैं। और क्योंकि तुम्हारे विश्वास की दृढ़ जड़, जो बहुत पहले के दिनों(4) में कही गई थी, अब तक बनी है, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के लिये फल लाती है। उसने हमारे पापों के लिये मृत्यु तक दुःख उठाया, [पर] "जिसे परमेश्वर ने मरे हुओं में से जिलाया, कब्र के बन्धन खोलकर।"(5) "उसमें तुम अब उसे नहीं देखते, तौभी विश्वास करते हो, और विश्वास करके अनिर्वचनीय और महिमा से भरे आनन्द से आनन्द करते हो।"(6) उस आनन्द में बहुत लोग प्रवेश करना चाहते हैं, यह जानकर कि "अनुग्रह से तुम उद्धार पाए हो, कर्मों से नहीं,"(7) पर परमेश्वर की इच्छा से यीशु मसीह के द्वारा।

अध्याय II.-- सद्गुण के लिये उपदेश।

"इसलिये, अपनी कमर बाँधकर,"(8) "भय में प्रभु की सेवा करो"(9) और सत्य में, जैसे वे जो भीड़ की व्यर्थ, खोखली बात और भ्रम को छोड़ चुके हैं, और "उस पर विश्वास किए हैं जिसने हमारे प्रभु यीशु मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, और उसे महिमा दी,"(10) और उसकी दाहिनी ओर सिंहासन दिया। आकाश की और पृथ्वी की सब वस्तुएँ उसके आधीन हैं। हर आत्मा उसकी सेवा करती है। वह जीवतों और मरे हुओं का न्यायी होकर आता है।(12) जो उस पर विश्वास नहीं करते उन से परमेश्वर उसका लहू माँगेगा।(13) पर जिसने उसे मरे हुओं में से जिलाया वह हमें भी जिलाएगा,(14) यदि हम उसकी इच्छा करें, और उसकी आज्ञाओं में चलें, और जिस से उसने प्रेम किया उस से प्रेम करें, और अपने आप को सब अधर्म से, लोभ से, रुपये के प्रेम से, बुरी बात से, झूठी गवाही से बचाएँ। "बुराई के बदले बुराई, और निन्दा के बदले निन्दा न करना,"(15) न चोट के बदले चोट, न शाप के बदले शाप, पर यह स्मरण रखना कि प्रभु ने अपनी शिक्षा में क्या कहा। "न्याय न करो, कि तुम पर न्याय न किया जाए।(16) क्षमा करो, तो तुम्हें भी क्षमा होगा।(17) दयालु बनो, कि तुम दया पाओ।(18) जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये फिर नापा जाएगा।(19) और फिर, "धन्य हैं कंगाल, और वे जो धर्म के लिये सताए जाते हैं, क्योंकि परमेश्वर का राज्य उन्हीं का है।"(20)

अध्याय III.-- व्यक्तिगत अयोग्यता के वचन।

हे भाइयो, मैं ये बातें धर्म के विषय में तुम्हें लिखता हूँ, इसलिये नहीं कि मैं अपने ऊपर कुछ लेता हूँ, पर इसलिये कि तुमने मुझे ऐसा करने को बुलाया है। क्योंकि न मैं, न मुझ जैसा और कोई, उस धन्य और महिमा पाए हुए पौलुस की बुद्धि तक पहुँच सकता है। जब वह तुम्हारे बीच था, तब जो उस समय जीवित थे उनके सामने उसने सत्य का वचन ठीक और स्थिरता से सिखाया। और जब वह तुम से दूर था, तब उसने तुम्हें एक पत्र लिखा,(22) जिसे यदि तुम ध्यान से पढ़ोगे, तो पाओगे कि वह उस विश्वास में तुम्हें बनाने का साधन है जो तुम्हें दिया गया है। उस विश्वास के पीछे आशा चलती है, और परमेश्वर के प्रति, और मसीह के प्रति, और हमारे पड़ोसी के प्रति प्रेम उसके आगे चलता है। वह "हम सब की माता है।"(23) क्योंकि यदि कोई भीतर से

इन अनुग्रहों से भरा हो, तो उसने धर्म की आज्ञा पूरी की है, क्योंकि जिसमें प्रेम है वह सब पाप से दूर है।

अध्याय IV.-- नाना उपदेश।

"पर रुपये का प्रेम सब बुराइयों की जड़ है।"(1) इसलिये यह जानकर कि "जैसे हम संसार में कुछ नहीं लाए, वैसे कुछ ले जा नहीं सकते,"(2) हम धर्म के हथियार से अपने आप को सज्जित करें।(3) और पहिले हम अपने आप को यह सिखाएँ कि प्रभु की आज्ञाओं में चलें। तब अपनी पत्नियों को [सिखाओ] कि उन्हें दिए हुए विश्वास में, और प्रेम और पवित्रता में [चलें], और सब सत्य में अपने अपने पति से कोमलता से प्रेम करें, और सब संयम में सब [औरों] से समान प्रेम करें। और अपने बालकों को परमेश्वर की पहचान और भय में पालें। विधवाओं को सिखाओ कि वे प्रभु के विश्वास के विषय में समझदार रहें, सब के लिये निरन्तर प्रार्थना करती रहें,(4) और सब बदनामी, बुरी बात, झूठी गवाही, रुपये के प्रेम, और हर प्रकार की बुराई से दूर रहें। यह जानकर कि वे परमेश्वर की वेदियाँ हैं, कि वह सब बातें स्पष्ट देखता है, और उस से कुछ छिपा नहीं, न युक्तियाँ, न विचार, न हृदय की गुप्त बातों में से कोई एक।

अध्याय V.-- सेवकों, जवानों, और कुँवारियों के कर्तव्य।

इसलिये यह जानकर कि "परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता,"(6) हमें उसकी आज्ञा और महिमा के योग्य चलना चाहिये। उसी प्रकार सेवक उसकी धर्मिता के सामने निर्दोष हों, क्योंकि वे परमेश्वर और मसीह के सेवक हैं,(7) मनुष्यों के नहीं। वे बदनाम करनेवाले, दुजीभ,(8) या रुपये के प्रेमी न हों, पर सब बातों में संयमी, दयालु, परिश्रमी हों, और प्रभु के सत्य के अनुसार चलें, जो सब का सेवक(9) था। यदि हम इस वर्तमान संसार में उसे प्रसन्न करें, तो आनेवाले संसार को भी पाएँगे, जैसे उसने हम से प्रतिज्ञा की है कि वह हमें मरे हुओं में से फिर जिलाएगा, और यदि हम उसके योग्य जीवन बिताएँ,(10) तो "हम उसके साथ राज्य भी करेंगे,"(11) केवल यह कि हम विश्वास करें। उसी प्रकार जवान भी सब बातों में निर्दोष रहें, और पवित्रता बनाए रखने की विशेष चौकसी करें, और हर प्रकार की बुराई से अपने आप को लगाम की नाई रोके रखें। क्योंकि यह भला है कि वे उन अभिलाषाओं से(12) काट दिए जाएँ जो संसार में हैं, क्योंकि "हर अभिलाषा आत्मा के विरुद्ध लड़ती है।"(13) और "न व्यभिचारी, न स्त्रैण, न पुरुषगामी परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे,"(14) और न वे जो बेमेल और अशोभनीय काम करते हैं। इसलिये इन सब बातों से अलग रहना आवश्यक है, और प्राचीन लोगों और सेवकों के आधीन रहना, जैसे परमेश्वर और मसीह के आधीन। कुँवारियाँ भी निर्दोष और शुद्ध विवेक में चलें।

अध्याय VI.-- प्राचीन लोगों और औरों के कर्तव्य।

और प्राचीन लोग सब पर करुणा और दया करें, भटकनेवालों को लौटाएँ, सब रोगियों के पास जाएँ, और विधवा, अनाथ, या कंगाल को न छोड़ें, पर सदा "जो परमेश्वर और मनुष्यों की दृष्टि में उचित है उसके लिये प्रबन्ध करें।"(15) सब क्रोध, पक्षपात, और अन्याय के न्याय से अलग रहें। सब लोभ से दूर रहें, किसी के विरुद्ध [बुरी खबर] को शीघ्र न मानें, न्याय में कठोर न हों, यह जानकर कि हम सब पाप के ऋण के नीचे हैं। यदि हम प्रभु से अपने लिये क्षमा माँगते हैं, तो हमें भी आप क्षमा करना चाहिये।(16) क्योंकि हम अपने प्रभु और परमेश्वर की आँखों के सामने हैं, और "हम सब को मसीह के न्याय आसन के सामने आना होगा, और हर एक को अपने विषय में लेखा देना होगा।"(17) तो हम भय में और सब आदर के साथ उसकी सेवा करें, जैसे उसने आप हमें आज्ञा दी है, और जैसे प्रेरितों ने, जिन्होंने हमें सुसमाचार सुनाया, और भविष्यद्वक्ताओं ने, जिन्होंने प्रभु के आने का पहिले से प्रचार किया, [उसी प्रकार हमें सिखाया है]। हम भलाई के पीछे लगाने में उत्साही हों, और अपने आप को ठोकर के कारणों से, झूठे भाइयों से, और उन से बचाएँ जो कपट से प्रभु का नाम धारण करते हैं, और व्यर्थ मनुष्यों को भ्रम में खींच ले जाते हैं।

अध्याय VII.-- डोकेताई से बचो, और उपवास तथा प्रार्थना में स्थिर रहो।

"क्योंकि जो कोई यह न माने कि यीशु मसीह शरीर में आया है, वह मसीह का विरोधी है।"(18) और जो कोई क्रूस की गवाही न माने,(19) वह शैतान का है। और जो कोई प्रभु के वचनों को अपनी अभिलाषाओं के अनुसार बिगाड़े, और कहे कि न पुनरुत्थान है न न्याय, वह शैतान का पहलौठा है।(20) इसलिये बहुतों की व्यर्थता और उनकी झूठी शिक्षाओं को छोड़कर, उस वचन की ओर लौटें जो आरम्भ से(21) हमें सौंपा गया है। "प्रार्थना में जागते हुए,"(22) और उपवास में स्थिर रहते हुए, अपनी विनती में सर्वदर्शी परमेश्वर से बिनती करें "कि हमें परीक्षा-

में न ला,"(1) जैसा प्रभु ने कहा है: "आत्मा तो सचमुच तैयार है, पर शरीर दुर्बल है।"(2)

अध्याय VIII.-- आशा और धीरज में स्थिर रहो।

तो हम अपनी आशा में, और अपनी धर्मिता के बयाने में, जो यीशु मसीह है, निरन्तर स्थिर रहें। "उसने हमारे पापों को अपने शरीर में काठ पर उठा लिया,"(3) "उसने कोई पाप नहीं किया, और उसके मुँह में छल न पाया गया,"(4) पर हमारे लिये सब कुछ सहा, कि हम उस में जीवित रहें।(5) तो हम उसके धीरज के अनुकरण करनेवाले बनें। और यदि हम उसके नाम के लिये दुःख उठाएँ,(6) तो उसकी महिमा करें।(7) क्योंकि उसने अपने में यह आदर्श हमारे लिये रखा है, और हमने विश्वास किया है कि बात ऐसी ही है।

अध्याय IX.-- धीरज का उपदेश।

इसलिये मैं तुम सब को समझाता हूँ कि धर्म के वचन की आज्ञा मानो, और सब धीरज का अभ्यास करो, जैसा तुमने अपनी आँखों के सामने [रखा हुआ] देखा है, केवल धन्य इग्नातियुस, और जोसिमुस, और रूफुस के विषय में ही नहीं, पर अपने बीच औरों में भी, और पौलुस में भी, और शेष प्रेरितों में भी। [यह करो] इस निश्चय के साथ कि इन सब ने व्यर्थ नहीं दौड़ा है,(9) पर विश्वास और धर्म में, और कि वे अब प्रभु के सामने अपने योग्य स्थान में हैं, जिसके साथ उन्होंने दुःख भी उठाया। क्योंकि उन्होंने इस वर्तमान संसार से प्रेम नहीं किया, पर उस से जिसने हमारे लिये मृत्यु सही, और हमारे निमित्त परमेश्वर ने जिसे मरे हुओं में से फिर जिलाया।

अध्याय X.-- सद्गुण के अभ्यास के लिये उपदेश।(10)

इसलिये इन बातों में स्थिर रहो, और प्रभु के आदर्श पर चलो, विश्वास में दृढ़ और अटल रहते हुए, भाईचारे से प्रेम करते हुए,(11) और एक दूसरे से जुड़े रहते हुए, सत्य में आपस में जोड़े हुए, एक दूसरे के साथ व्यवहार में प्रभु की नम्रता दिखाते हुए, और किसी को तुच्छ न जानते हुए। जब तुम भलाई कर सको, तो उसे टालो मत, क्योंकि "दान मृत्यु से छुड़ाता है।" तुम सब एक दूसरे के आधीन रहो, "अन्यजातियों के बीच तुम्हारा चालचलन निर्दोष हो,"(14) कि तुम अपने भले कामों के लिये स्तुति भी पाओ, और तुम्हारे द्वारा प्रभु की निन्दा न हो। पर हाय उस पर जिस के द्वारा प्रभु के नाम की निन्दा होती है!(15) इसलिये सब को संयम सिखाओ, और उसे अपने चालचलन में भी प्रगट करो।

अध्याय XI.-- वालेन्स के कारण शोक का वचन।

मैं वालेन्स के लिये बहुत शोकित हूँ, जो तुम्हारे बीच कभी प्राचीन था, क्योंकि वह उस स्थान को बहुत कम समझता है जो उसे [कलीसिया में] दिया गया था। इसलिये मैं तुम्हें समझाता हूँ कि लोभ से अलग रहो,(16) और पवित्र और सच्चे बनो। "हर प्रकार की बुराई से अलग रहो।"(17) यदि कोई मनुष्य ऐसी बातों में अपने आप पर शासन न कर सके, तो वह औरों को उनकी आज्ञा कैसे देगा? यदि कोई मनुष्य अपने आप को लोभ से न बचाए,(16) तो वह मूर्तिपूजा से अशुद्ध होगा, और अन्यजाति के समान दोषी ठहराया जाएगा। पर हम में से कौन प्रभु के न्याय से अनजान है? "क्या हम नहीं जानते कि पवित्र लोग संसार का न्याय करेंगे?"(18) जैसा पौलुस सिखाता है। पर मैंने तुम्हारे बीच ऐसी कोई बात न देखी है न सुनी है, जिनके बीच धन्य पौलुस ने परिश्रम किया, और जो उसकी पत्री के आरम्भ में सराहे गए हैं।(19) क्योंकि वह उन सब कलीसियाओं में तुम्हारा घमण्ड करता है जो उस समय अकेली प्रभु को जानती थीं। पर हम [स्मुरना के लोग] उसे अभी तक नहीं जानते थे। इसलिये हे भाइयो, मैं उसके (वालेन्स) और उसकी पत्नी के लिये गहरे शोक में हूँ। प्रभु उन्हें सच्चा मन फिराव दे! और तुम इस बात में संयम रखो, और "ऐसों को शत्रु न गिनो,"(20) पर उन्हें दुःख उठाते और भटके हुए अंगों की नाई वापस बुलाओ, कि तुम अपनी सारी देह को बचाओ। क्योंकि ऐसा करने से तुम अपने आप को उन्नत करोगे।(21)

अध्याय XII.-- नाना अनुग्रहों के लिये उपदेश।

क्योंकि मुझे भरोसा है कि तुम पवित्र शास्त्रों में भली भाँति निपुण हो, और तुम से कुछ छिपा नहीं। पर मुझे यह अधिकार अभी तक नहीं मिला है।(23) इन शास्त्रों में कहा गया है, "क्रोधी तो हो, पर पाप न करो,"(23) और "सूर्य अस्त होने न पाए तुम्हारे क्रोध पर।"(24) धन्य है वह जो इस बात को स्मरण रखता है।(25) मुझे विश्वास है कि तुम्हारे विषय में ऐसा ही है। पर हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर और पिता, और यीशु मसीह आप, जो परमेश्वर का पुत्र और हमारा सनातन महायाजक है, तुम्हें विश्वास और सत्य में, और सब नम्रता, कोमलता, धीरज, दीर्घसहिष्णुता, सहन, और पवित्रता में बनाए। और वह तुम्हें अपने पवित्र लोगों के बीच एक भाग और अंश दे, और हमें भी तुम्हारे साथ, और आकाश के नीचे जितने हमारे प्रभु

यीशु मसीह पर, और उसके पिता पर विश्वास करेंगे, जिस पिता ने "उसे मरे हुओं में से जिलाया।"(1) सब पवित्र लोगों के लिये प्रार्थना करो। राजाओं के लिये भी प्रार्थना करो,(2) और अधिकारियों, और राजकुमारों के लिये, और उनके लिये जो तुम्हें सताते और बैर रखते हैं,(3) और क्रूस के शत्रुओं के लिये, कि तुम्हारा फल सब पर प्रगट हो, और तुम उस में सिद्ध हो।

अध्याय XIII.-- पत्रियों के भेजने के विषय में।

तुमने और इग्नातियुस ने(4) मुझे लिखा कि यदि कोई [यहाँ से] सीरिया को जाए, तो वह तुम्हारा पत्र(5) अपने साथ ले जाए। उस विनती को मैं पूरा करूँगा, यदि मुझे योग्य अवसर मिले, चाहे मैं स्वयं जाऊँ, चाहे मेरे बदले कोई और जाए, कि तुम्हारी इच्छा पूरी हो। इग्नातियुस की पत्रियाँ जो उसने हमें लिखीं,(6) और [उसकी पत्रियों] में से जितनी और हमारे पास हैं, हमने तुम्हें भेज दी हैं, जैसे तुमने माँगा था। वे इस पत्री के साथ जोड़ी गई हैं, और उन से तुम बहुत लाभ पा सकते हो। क्योंकि वे विश्वास और धीरज की, और उन सब बातों की बात करती हैं जो हमारे प्रभु में उन्नति के लिये हैं। जो और निश्चित समाचार(7) तुमने इग्नातियुस के विषय में, और जो उसके साथ थे(8) उनके विषय में, पाया हो, कृपा करके हमें बताओ।(9)

अध्याय XIV.-- समाप्ति।

ये बातें मैंने क्रेस्केन्स के द्वारा तुम्हें लिखी हैं, जिस की इस समय(10) तक मैंने तुम्हें सिफारिश की है, और अब भी करता हूँ। क्योंकि उसने हमारे बीच निर्दोष रीति से काम किया है, और मुझे विश्वास है कि तुम्हारे बीच भी। और जब उसकी बहिन तुम्हारे पास आए, तो तुम उसका आदर करोगे। प्रभु यीशु मसीह में तुम सुरक्षित रहो। तुम सब पर अनुग्रह हो।(11) आमीन।

पुलिकर्पस की शहादत के विषय की पत्री पर प्रारम्भिक टिप्पणी

आन्तरिक प्रमाण उस विश्वास को बहुत दूर तक स्थिर करता है जो यूसेबियुस शहीदी वृत्तान्तों के इस नमूने को देता है। यदि हम इग्नातियुस के वृत्तान्त को सच्चा मानें, तो यह निश्चय ही सब से पहला नहीं। "सात कलीसियाओं" में से एक की ओर से उन्हीं सात में से दूसरी को लिखे परिपत्र की नाई, और "पवित्र और कैथोलिक कलीसिया" की एकता में औरों के साथ उनके मेल की गवाही की नाई, यह बहुत रोचक गवाह है। केवल विश्वास की एक धारा के लिये नहीं, पर उसी के मूल अर्थ और ग्रहण के लिये भी। इससे अधिक, यह उस बल की गवाही है जो मसीह का है, और जो मनुष्य की दुर्बलता में सिद्ध हुआ है। इस प्रकार यह हमें हर आवश्यकता के समय में अपने दिन के बराबर अनुग्रह का भरोसा देता है। जब मैं इसमें यह उदाहरण देखता हूँ कि शहीदों की एक महान सेना ने, स्त्रियों और बालकों समेत, उन दिनों "यीशु की गवाही के लिये" क्या दुःख उठाया, कि हमारे इन डींग मारनेवाले युगों को सुसमाचार का ज्ञान सौंपे, तो मैं मानता हूँ कि जो मैं पढ़ता हूँ उससे मैं उन्नत होता हूँ, मुख्यतः क्योंकि मैं दीन और लज्जित होता हूँ, जब तुलना करता हूँ कि मसीही पहले कैसा हुआ करता था, और हमारे समय में मसीही, अपनी उत्तम दशा में भी, कैसा है।

यह कि इस पत्री में प्रक्षेप हुआ है, इसमें सन्देह करना कठिन है, जब हम इसकी तुलना यूसेबियुस में दिए अलंकाररहित नमूने से करते हैं। आग से आई "सुगन्ध" के विषय में, अनेक प्रकार की लकड़ी जलते समय वैसी ही सुगन्ध छोड़ती है। और पूर्वी रंग की गर्मी को छोड़कर, कथा में अविश्वसनीय कुछ नहीं दिखता, यदि "कबूतर" (chap. xvi.) को छोड़ दें। वह तौभी सम्भवतः बिगड़ा हुआ पाठ है,(1) जैसा हमारे अनुवादकों ने सुझाया। शहीद की बाईं पसली में फलक घोंपा गया। और इसने हृदय को खोलकर बाढ़ का उण्डेला किया, केवल टपकन नहीं। पर यूनानी को इस प्रकार सुधारना युक्तियुक्त अनुमान है, तौभी यूसेबियुस ने जिस प्रति को उद्धृत किया उसमें ऐसी कोई बात नहीं दिखती। दूसरी ओर, सचमुच सार्वभौमिक और शास्त्रीय गवाही को देखो। "हम शहीदों से प्रेम करते हैं, पर परमेश्वर के पुत्र की हम आराधना करते हैं। हमारे लिये किसी और की आराधना करना असम्भव है।"

बिशप जैकबसन इस शहीदी वृत्तान्त को पचास से अधिक पृष्ठ देता है, लातीनी रूपान्तर और प्रचुर टिप्पणियों के साथ। विद्यार्थी को मैं इन्हीं की ओर भेजना चाहता हूँ, जो इस आकर्षक इतिहास को आलोचनात्मक विद्वत्ता के सारे प्रकाश में, और अक्सर सराहनीय टिप्पणी के प्रकाश में, देखना चाहे।

निम्नलिखित मूल प्रारम्भिक सूचना यह है:--

निम्नलिखित पत्री स्मुरना की कलीसिया की ओर से फिलोमेलियुम की कलीसिया को लिखी हुई बताई जाती है, और उस कलीसिया के द्वारा सारे मसीही जगत को, कि पुलिकर्पस की शहादत के साथ जुड़ी परिस्थितियों का संक्षिप्त विवरण दे। यह सब शहीदी वृत्तान्तों में सब से पहली है, और सामान्यतः सब से रोचक और प्रामाणिक मानी गई है। तौभी कुछ लोग इसे कई अंशों में प्रक्षिप्त मानते हैं, और कुछ इसे उस तिथि से बहुत बाद की मानते हैं जो साधारणतः

दूसरी शताब्दी का मध्य है, जिस पर इसे साधारणतः लगाया गया है। हम नहीं कह सकते कि इसे क्रम से उतारनेवाले लेखकों (chap. xxii.) का इस पर कितना ऋण है। इसका बड़ा भाग यूसेबियुस ने अपने कलीसियाई इतिहास में (iv. 15) उतार लिया है। और यह शिक्षाप्रद है कि जैसा पाठ अब है उसमें लिखे कुछ सब से चौंकानेवाले आश्चर्यकर्म उस कथा में स्थान नहीं पाते जो कलीसिया के उस आरम्भिक इतिहासकार ने दी है। इस शहीदी वृत्तान्त में आई कई बातों के विषय में बहुत विवाद उठ खड़ा हुआ है। पर इन झगड़ों में हम नहीं पड़ते। हमारा उद्देश्य केवल यह है कि मसीही प्राचीनता के इस बहुत रोचक स्मारक का जितना सम्भव हो उतना विश्वासयोग्य अनुवाद पाठक के सामने रखें।