Irenaeus Against Heresies
इरेनायुस विधर्मों के विरुद्ध
पहली पुस्तक
प्रस्तावना.
1. इसलिये(1) कि कुछ मनुष्य सत्य को एक ओर रख चुके हैं, और झूठे वचन तथा व्यर्थ वंशावलियाँ भीतर लाते हैं, जो, जैसा प्रेरित कहता है,(2) "विश्वास में जो ईश्वरीय उन्नति है उसे नहीं, वरन् प्रश्न उत्पन्न करती हैं", और अपनी चतुराई से रची हुई संभावनाओं के द्वारा अनुभवहीनों के मनों को खींचकर उन्हें बन्दी बनाते हैं, [हे प्रिय मित्र, उनकी युक्तियों को उघाड़ने और उनका सामना करने के लिये मैंने यह ग्रन्थ रचने को अपने को विवश जाना है.] ये मनुष्य परमेश्वर के वाक्यों को बिगाड़ते हैं, और प्रकाशन के भले वचन के बुरे व्याख्याता ठहरते हैं. वे [उत्तम] ज्ञान के बहाने बहुतों को, जिसने विश्व को स्थापित किया और सजाया, उससे खींचकर बहुतों के विश्वास को भी गिरा देते हैं; मानो उन्हें उस परमेश्वर से, जिसने आकाश और पृथ्वी और उनमें की सब वस्तुओं को रचा, कुछ अधिक उत्तम और ऊँचा प्रगट करने को मिला हो. दिखावटी और सम्भाव्य वचनों से वे भोले मन के लोगों को अपनी पद्धति की जाँच करने को चतुराई से लुभाते हैं; परन्तु डेमियुर्ज के विषय में अपनी निन्दापूर्ण और अभक्ति की रायों में उन्हें दीक्षित करते हुए, वे उन्हें बेढंगे ढंग से नाश करते हैं;(3) और ये भोले जन ऐसे विषय में भी झूठ को सत्य से अलग नहीं कर सकते.
2. भूल, सचमुच, अपने नग्न कुरूप रूप में कभी नहीं रखी जाती, ऐसा न हो कि इस प्रकार खुली हुई वह तुरन्त पकड़ ली जाए. परन्तु वह चतुराई से एक आकर्षक वस्त्र में सजाई जाती है, ताकि अपने बाहरी रूप से अनुभवहीनों को (यह बात हास्यास्पद सी लगे तो भी) सत्य से भी अधिक सत्य दिखाई दे. मुझ से बहुत श्रेष्ठ एक जन(4) ने इस बात के विषय में भली भाँति कहा है, "काँच में एक चतुर नकल, कुछ लोगों के द्वारा अत्यन्त आदरणीय उस बहुमूल्य रत्न पन्ने पर, जब तक वह किसी ऐसे की आँख के सामने न आए जो नकली को परख और उघाड़ सके, एक प्रकार से तिरस्कार डालती है. या, फिर, जब पीतल चाँदी में मिला दिया गया हो, तो अनुभवहीन व्यक्ति उसकी उपस्थिति को सहज में कैसे पकड़ सकता है?" इसलिये, कहीं मेरी उपेक्षा से कुछ लोग ऐसे न उठा लिये जाएँ, जैसे भेड़ें भेड़ियों के द्वारा उठा ली जाती हैं, जब वे इन मनुष्यों के सच्चे स्वभाव को नहीं पहचानते,-क्योंकि वे बाहर से भेड़ की खाल से ढके हैं (जिनके विषय में प्रभु ने हमें सावधान रहने की आज्ञा दी है(5)), और क्योंकि उनकी भाषा हमारी सी है, जब कि उनकी भावनाएँ बहुत भिन्न हैं,--मैंने अपना कर्तव्य समझा (वैलेंटिनुस के शिष्यों की टीकाओं में से, जैसा वे उन्हें कहते हैं, कुछ पढ़ने के बाद, और उनमें से कुछ के साथ व्यक्तिगत संगति के द्वारा उनकी शिक्षाओं से परिचित होने के बाद) हे मेरे मित्र, तुझे ये भयंकर और गहरे भेद खोलना, जो हर बुद्धि की पहुँच में नहीं आते, क्योंकि सब ने अपने मस्तिष्कों को पर्याप्त रूप से शुद्ध नहीं किया है(6). मैं यह इसलिये करता हूँ, कि तू इन बातों का परिचय पाकर, जिन जिन से तेरा सम्बन्ध है उन सब को फिर उन्हें समझाए, और उन्हें मसीह के विरुद्ध ऐसे पागलपन और निन्दा के गहरे गड्ढे से बचने के लिये उभारे.
अतः, अपनी शक्ति भर, संक्षेप और स्पष्टता के साथ, जो अब हैं उनकी रायों को रखना मैं चाहता हूँ
विधर्म का प्रचार करनेवालों की. मैं विशेष करके टॉलेमायुस के शिष्यों की ओर संकेत करता हूँ, जिनकी पाठशाला वैलेंटिनुस की पाठशाला से एक कली के रूप में वर्णित की जा सकती है. मैं अपनी मध्यम शक्ति के अनुसार, उनकी बातें कितनी असंगत और सत्य से असंगत हैं यह दिखाकर, उन्हें गिराने के साधन देने का भी यत्न करूँगा. नहीं कि मैं रचना में या वाक्पटुता में अभ्यस्त हूँ; परन्तु मेरी स्नेह की भावना मुझे प्रेरित करती है कि जो शिक्षाएँ अब तक गुप्त रखी गई थीं, परन्तु अन्त में परमेश्वर की भलाई से प्रकाश में लाई गई हैं, उन्हें तुझे और तेरे सब साथियों को बताऊँ. "क्योंकि कुछ छिपा नहीं जो प्रगट न होगा, और न कुछ गुप्त जो जाना न जाएगा."(1)
3. तू मुझ से, जो केल्टे लोगों के बीच रहता हूँ,(2) और अधिकतर एक असभ्य बोली के प्रयोग का अभ्यस्त हूँ, वक्तृत्व का कोई प्रदर्शन नहीं चाहेगा, जिसे मैंने कभी नहीं सीखा, या रचना की कोई उत्कृष्टता नहीं, जिसका मैंने कभी अभ्यास नहीं किया, या शैली का कोई सौन्दर्य और समझाने की शक्ति नहीं, जिसका मैं कोई दावा नहीं करता. परन्तु तू कृपा की आत्मा से उसे ग्रहण करेगा जिसे मैं ऐसी ही आत्मा से तुझे सरलता से, सत्यता से, और अपने घरेलू ढंग से लिखता हूँ; और तू स्वयं (मुझ से अधिक समर्थ होने के कारण) उन विचारों को फैलाएगा जिनके, मानो, केवल बीज रूप सिद्धान्त मैं तुझे भेजता हूँ; और अपनी समझ की व्यापकता में, जिन बातों को मैं संक्षेप में छूता हूँ उन्हें उनकी पूरी सीमा तक विकसित करेगा, ताकि जिन्हें मैंने निर्बलता में कहा है उन्हें तू अपने साथियों के सामने सामर्थ्य के साथ रखे. अन्त में, जैसे मैंने (इन व्यक्तियों की शिक्षाओं के विषय में सूचना की तेरी दीर्घकालीन इच्छा को पूरा करने के लिये) कोई कष्ट नहीं छोड़ा, केवल ये शिक्षाएँ तुझे बताने के लिये ही नहीं, वरन् उनकी झूठाई दिखाने के साधन देने के लिये भी; वैसे ही तू, प्रभु के द्वारा तुझे दिए गए अनुग्रह के अनुसार, दूसरों के लिये एक उत्साही और कार्यक्षम सेवक ठहरेगा, ताकि मनुष्य अब इन विधर्मियों की उस सम्भाव्य पद्धति से, जिसका वर्णन मैं अब करने लगता हूँ, खिंचे न जाएँ.(3)
अध्याय एक.--वैलेंटिनुस के शिष्यों के असंगत विचार, अपने कल्पित एओनों के मूल, नाम, क्रम, और दाम्पत्य उत्पत्तियों के विषय में, और उन पवित्रशास्त्र के अंशों के साथ जिन्हें वे अपनी रायों के अनुकूल बनाते हैं.
1. अतः वे कहते हैं कि ऊपर की अदृश्य और अकथनीय ऊँचाइयों में एक निश्चित पूर्ण, पूर्वविद्यमान एओन है,(4) जिसे वे प्रोआर्खे, प्रोपेटर, और बाइथस कहते हैं, और अदृश्य तथा अग्राह्य बताते हैं. नित्य और अजन्मा होकर, वह युगों के असंख्य चक्रों भर गहरी शान्ति और निश्चलता में रहा. उसके साथ एन्नोइया थी, जिसे वे खारिस और सीगे भी कहते हैं.(5) अन्त में इस बाइथस ने अपने से सब वस्तुओं का आदि बाहर भेजना निश्चय किया, और इस उत्पत्ति को (जिसे वह बाहर लाना ठान चुका था) अपनी समकालीन सीगे में रखा, जैसे बीज गर्भ में रखा जाता है. तब उसने, यह बीज पाकर और गर्भवती होकर, नूस को जन्म दिया, जो उसको उत्पन्न करनेवाले के समान और बराबर था, और अकेला अपने पिता की महानता को ग्रहण करने में समर्थ था. इस नूस को वे मोनोजेनेस भी, और पिता, और सब वस्तुओं का आदि कहते हैं. उसके साथ अलेथेया भी उत्पन्न हुई; और इन चारों ने प्रथम और प्रथमजात पाइथागोरीय टेट्राड बनाई, जिसे वे सब वस्तुओं की जड़ भी कहते हैं. क्योंकि पहले बाइथस और सीगे हैं, फिर नूस और अलेथेया. और मोनोजेनेस ने, यह समझकर कि वह किस उद्देश्य से उत्पन्न हुआ था, स्वयं भी लोगोस और जोए को बाहर भेजा, अपने पीछे आनेवालों सब का पिता होकर, और सम्पूर्ण प्लेरोमा का आदि और गठन होकर. लोगोस और जू के संयोग से आन्थ्रोपोस और एक्लेसिया बाहर लाए गए; और इस प्रकार प्रथमजात ऑग्डोअड बनी, सब वस्तुओं की जड़ और द्रव्य, जो उनके बीच चार नामों से पुकारी जाती है, अर्थात्, बाइथस, और नूस, और लोगोस, और आन्थ्रोपोस.
क्योंकि इनमें से प्रत्येक पुरुष-स्त्री रूप है, इस प्रकार: प्रोपेटर अपनी एन्नोइया के साथ एक संयोग द्वारा एक हुआ; फिर मोनोजेनेस, अर्थात् नूस, अलेथेया के साथ; लोगोस जोए के साथ, और आन्थ्रोपोस एक्लेसिया के साथ.
2. ये एओन पिता की महिमा के लिये उत्पन्न होकर, और अपने ही प्रयत्नों से इस उद्देश्य को पूरा करना चाहकर, संयोग के द्वारा उत्सर्ग बाहर भेजे. लोगोस और जोए ने, आन्थ्रोपोस और एक्लेसिया को उत्पन्न करने के बाद, और दस एओन बाहर भेजे, जिनके नाम ये हैं: बाइथियस और मिक्सिस, अगेराटोस और हेनोसिस, ऑटोफ्यूएस और हेदोने, अकीनेटोस और सिंक्रासिस, मोनोजेनेस और मकारिया.(6) ये हैं
वे दस एओन जिन्हें वे लोगोस और जोए के द्वारा उत्पन्न हुआ बताते हैं. फिर वे जोड़ते हैं कि आन्थ्रोपोस ने स्वयं, एक्लेसिया के साथ, बारह एओन उत्पन्न किए, जिन्हें वे ये नाम देते हैं: पराक्लेटुस और पिस्टिस, पात्रिकोस और एल्पिस, मेत्रिकोस और अगापे, ऐनोस और सिनेसिस, एक्लेसियास्तिकुस और मकारिओटेस, थेलेटोस और सोफिया.
3. इन मनुष्यों की भ्रान्त पद्धति में तीस एओन ऐसे हैं; और वे, यों कहें, मौन में लपेटे हुए, और किसी को नहीं जाने हुए [इन दावा करनेवाले शिक्षकों को छोड़] बताए जाते हैं. और वे घोषित करते हैं कि उनका यह अदृश्य और आत्मिक प्लेरोमा तीन भागों का है, एक ऑग्डोअड, एक डेकाड, और एक ड्यूओडेकाड में बँटा हुआ. और इसी कारण वे दृढ़ करते हैं कि "उद्धारकर्ता" ने--क्योंकि वे उसे "प्रभु" कहना नहीं चाहते--तीस वर्ष के काल में(1) सार्वजनिक रूप से कोई काम नहीं किया, इस प्रकार इन एओनों का भेद रखते हुए. वे यह भी कहते हैं कि ये तीस एओन दाखबारी में भेजे गए मजदूरों के दृष्टान्त में(2) अत्यन्त स्पष्ट रूप से सूचित हैं. क्योंकि कुछ पहले घण्टे के निकट भेजे जाते हैं, और कुछ तीसरे घण्टे के निकट, और कुछ छठे घण्टे के निकट, और कुछ नौवें घण्टे के निकट, और कुछ ग्यारहवें घण्टे के निकट. अब, यदि यहाँ कही हुई घण्टों की संख्याओं को हम जोड़ें, तो योग तीस होगा: क्योंकि एक, तीन, छह, नौ, और ग्यारह, जब साथ जोड़े जाते हैं, तीस बनाते हैं. और घण्टों के द्वारा, वे मानते हैं कि एओन दिखाए गए; और वे कहते हैं कि ये बड़े, और अद्भुत, और अब तक अकथनीय भेद हैं जिन्हें विकसित करना उनका विशेष काम है; और इस प्रकार वे आगे बढ़ते हैं जब पवित्रशास्त्र में निहित बातों की भीड़ में(3) उन्हें कुछ ऐसा मिलता है जिसे वे अपनी निराधार कल्पनाओं के अनुकूल अपना और बैठा सकते हैं.
अध्याय दो.--प्रोपेटर केवल मोनो-जेनेस को ज्ञात था. महत्वाकांक्षा, विक्षोभ, और संकट जिसमें सोफिया पड़ी; उसकी आकारहीन सन्तान: वह होरोस के द्वारा पुनःस्थापित होती है. एओनों की पूर्णता के निमित्त मसीह की और पवित्र आत्मा की उत्पत्ति. यीशु की उत्पत्ति का ढंग.
1. वे हमें बताना जारी रखते हैं कि उनकी योजना का प्रोपेटर केवल मोनोजेनेस को ज्ञात था, जो उससे उत्पन्न हुआ; दूसरे शब्दों में, केवल नूस को, जब कि और सब के लिये वह अदृश्य और अग्राह्य था. और, उनके अनुसार, केवल नूस पिता का ध्यान करने में आनन्द लेता था, और उसकी नाप से बाहर महानता पर विचार करने में उछलता था; और वह यह भी ध्यान करता था कि पिता की महानता को शेष एओनों को कैसे बताए, उन्हें यह प्रगट करते हुए कि वह कितना विशाल और शक्तिमान था, और कैसे वह आदि रहित था,--ग्रहण से परे, और देखे जाने के लिये सर्वथा असमर्थ. परन्तु, पिता की इच्छा के अनुसार, सीगे ने उसे रोका, क्योंकि उसका उद्देश्य था उन सब को पूर्वोक्त प्रोपेटर के परिचय तक ले जाना, और उनके भीतर उसकी प्रकृति की जाँच की इच्छा उत्पन्न करना. इसी प्रकार, शेष एओन भी, एक प्रकार की शान्त रीति से, अपने अस्तित्व के कर्ता को देखने की इच्छा रखते थे, और उस प्रथम कारण का ध्यान करने की, जिसका कोई आदि नहीं था.
2. परन्तु शेष से आगे वह एओन दौड़ पड़ा जो उन में बहुत अन्तिम था, और आन्थ्रोपोस तथा एक्लेसिया से उत्पन्न ड्यूओडेकाड का सबसे छोटा, अर्थात् सोफिया, और अपने साथी थेलेटोस के आलिंगन से अलग भाव को सहती रही. यह भाव, सचमुच, पहले उन में उठा जो नूस और अलेथेया से जुड़े थे, परन्तु छूत की नाईं इस क्षीण एओन तक चला गया, जिसने प्रेम के बहाने काम किया, परन्तु वास्तव में साहस के अतिरेक से प्रभावित थी, क्योंकि उसने नूस की नाईं पूर्ण पिता के साथ संगति नहीं भोगी थी. यह भाव, वे कहते हैं, पिता की प्रकृति को खोजने की इच्छा में था; क्योंकि वह, उनके अनुसार, उसकी महानता को ग्रहण करना चाहती थी. जब वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकी, क्योंकि उसने असम्भव को निशाना बनाया, और इस प्रकार मन की अत्यन्त वेदना में फँस गई, और पिता की विशाल गहराई के कारण भी तथा उसकी अगम्य प्रकृति के कारण भी, और उसके प्रति अपने प्रेम के कारण भी, वह सदा अपने को आगे तानती रही, तो भय था कि अन्त में वह उसकी मधुरता में लीन हो जाती, और उसके निरपेक्ष सार में घुल जाती, यदि उस शक्ति से न मिलती जो सब को थामे है, और उन्हें अकथनीय महानता के बाहर सुरक्षित रखती है. इस शक्ति को वे होरोस कहते हैं; जिसके द्वारा, वे कहते हैं, वह रोकी गई और सम्भाली गई; और तब, कठिनाई से अपने पास लौटाई जाकर, वह मान गई कि पिता अग्राह्य है, और इस प्रकार अपना पहला उद्देश्य, उस भाव के साथ जो उसकी विस्मय की भारी छाप से उसके भीतर उठा था, छोड़ दिया.
3. परन्तु उनमें से और लोग सोफिया के भाव और पुनःस्थापन को इस प्रकार कल्पित रूप में वर्णन करते हैं: वे कहते हैं कि उसने, एक असम्भव और अव्यावहारिक प्रयत्न में लगकर, एक आकारहीन द्रव्य को जन्म दिया, जैसा उसकी स्त्री प्रकृति उसे उत्पन्न करने में समर्थ करती थी.(4) जब उसने उसे देखा, तो उसकी पहली भावना शोक की थी, उसकी उत्पत्ति की अपूर्णता के कारण, और फिर भय की, कहीं यह उसके अपने अस्तित्व का अन्त न कर दे(5). फिर उसने, मानो, सब कोम-
मांड अपने ऊपर, और इस सब के कारण को खोजने का यत्न करते हुए, और जो हुआ उसे किस प्रकार छिपाए, अत्यन्त उलझन में थी. इन भावों से बहुत सताई जाकर, उसने अन्त में अपना मन बदला, और पिता के पास नए सिरे से लौटने का यत्न किया. परन्तु, जब उसने कुछ हद तक प्रयत्न किया, तो बल उसे छोड़ गया, और वह पिता की विनती करनेवाली हो गई. अन्य एओनों ने, विशेष करके नूस ने, उसके साथ अपनी विनतियाँ रखीं. और इसी से वे घोषित करते हैं कि भौतिक द्रव्य(1) का आरम्भ अज्ञान और शोक से, तथा भय और घबराहट से हुआ.
4. पिता इसके बाद, अपनी ही प्रतिमा में, मोनोजेनेस के द्वारा, ऊपर कथित होरोस को उत्पन्न करता है, संयोग के बिना,(2) पुरुष-स्त्री रूप में. क्योंकि वे कहते हैं कि कभी पिता सीगे के साथ संयोग में काम करता है, परन्तु अन्य समय वह अपने को नर और नारी दोनों से स्वतन्त्र दिखाता है. इस होरोस को वे स्तौरोस और लिट्रोतेस, और कार्पिस्तेस, और होरोथेतेस, और मेटागोगेस कहते हैं.(3) और इस होरोस के द्वारा वे घोषित करते हैं कि सोफिया शुद्ध की गई और स्थिर की गई, और वह अपने उचित संयोग को भी लौटा दी गई. क्योंकि उसका एन्थ्यूमेसिस (या जन्मजात विचार) उससे ले लिया गया, उस पर आए भाव के साथ, वह स्वयं निश्चय ही प्लेरोमा के भीतर रही; परन्तु उसका एन्थ्यूमेसिस, अपने भाव के साथ, होरोस के द्वारा उससे अलग किया गया, बाड़ लगाकर हटाया गया(4), और उस घेरे से निकाल दिया गया. यह एन्थ्यूमेसिस, निस्सन्देह, एक आत्मिक द्रव्य था, एक एओन की कुछ स्वाभाविक झुकावों को रखे हुए, परन्तु उसी समय आकारहीन और रूपरहित, क्योंकि उसे कुछ नहीं मिला था.(5) और इसी कारण वे कहते हैं कि वह एक दुर्बल और स्त्री उत्पत्ति थी.(6)
5. यह द्रव्य एओनों के प्लेरोमा के बाहर रखे जाने के बाद, और उसकी माता अपने उचित संयोग को लौटाए जाने के बाद, वे हमें बताते हैं कि मोनोजेनेस ने, पिता की विवेकपूर्ण पूर्वदृष्टि के अनुसार काम करते हुए, एक और दाम्पत्य जोड़े को मूल दिया, अर्थात् मसीह और पवित्र आत्मा को (ऐसा न हो कि कोई एओन सोफिया के सदृश विपत्ति में पड़े), प्लेरोमा को दृढ़ और बलवान करने के उद्देश्य से, और जिन्होंने उसी समय एओनों की संख्या पूरी की. मसीह ने तब उन्हें उनके संयोग की प्रकृति के विषय में सिखाया, और उन्हें सिखाया कि जिनके पास अजन्मा का ग्रहण है वे अपने लिये पर्याप्त हैं.(7) उसने उनके बीच वह भी सुनाया जो पिता के ज्ञान से सम्बन्ध रखता था,--अर्थात्, कि वह समझा या ग्रहण नहीं किया जा सकता, और न देखा या सुना जा सकता है, केवल उतने तक जितना वह केवल मोनोजेनेस के द्वारा जाना जाता है. और शेष एओनों के नित्य अस्तित्व का कारण पिता की प्रकृति के उस भाग में है जो अग्राह्य है; परन्तु उनके मूल और गठन का कारण उसमें स्थित था जो उसके विषय में ग्रहण किया जा सकता है, अर्थात्, पुत्र में.(8) अतः मसीह ने, जो अभी उत्पन्न हुआ था, उनके बीच ये बातें कीं.
6. परन्तु पवित्र आत्मा(9) ने उन्हें सिखाया कि सब के आपस में समान किए जाने पर धन्यवाद दें, और उन्हें सच्चे विश्राम की दशा में ले गई. इस प्रकार, वे हमें बताते हैं कि एओन रूप और भावना में एक दूसरे के समान ठहराए गए, ताकि सब नूस, और लोगोस, और आन्थ्रोपोस, और क्रिस्तुस के समान हो गए. स्त्री एओन भी सब अलेथेया, और जोए, और स्पिरितुस, और एक्लेसिया के समान हो गईं. तब सब कुछ इस प्रकार स्थिर होकर, और पूर्ण विश्राम की दशा में लाया जाकर, वे फिर हमें बताते हैं कि इन प्राणियों ने बड़े आनन्द से प्रोपेटर की स्तुति गाई, जो स्वयं उस उमड़ती महिमा में सम्मिलित हुआ. फिर, उस बड़े लाभ के लिये कृतज्ञता से जो उन्हें दिया गया था, एओनों के सारे प्लेरोमा ने, एक ही उद्देश्य और इच्छा से, और मसीह तथा पवित्र आत्मा की सहमति से, उनके पिता ने भी उनकी चाल पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाते हुए, जो कुछ प्रत्येक के पास अपने में सबसे बड़े सौन्दर्य और मूल्य का था उसे इकट्ठा किया; और इन सब अंशदानों को ऐसा एक किया कि पूरा कुशलता से घुल जाए, उन्होंने बाइथस के सम्मान और महिमा के लिये, अत्यन्त पूर्ण सौन्दर्य का एक प्राणी, प्लेरोमा का वही तारा, और पूर्ण फल [उसका], अर्थात् यीशु को उत्पन्न किया. उसे वे उद्धारकर्ता के नाम से भी, और मसीह, और पितृनाम से, लोगोस, और सब कुछ कहते हैं, क्योंकि वह सब के अंशदानों से रचा गया था. और तब हमें बताया जाता है कि, सम्मान के लिये, उसके समान स्वभाव के दूत उसी समय उत्पन्न किए गए, कि उसके अंगरक्षक का काम करें.
अध्याय तीन.--इन विधर्मियों के द्वारा अपनी रायों को सहारा देने के लिये प्रयुक्त पवित्रशास्त्र के पाठ.
1. अतः, प्लेरोमा के भीतर जो हुआ उसका जो वृत्तान्त वे देते हैं वह ऐसा है; उन विपत्तियों का ऐसा है जो उस भाव से बहीं जिसने उस नामित एओन को पकड़ा, जो पिता की जिज्ञासु खोज के द्वारा सार्वत्रिक द्रव्य में लीन होकर नष्ट होने के थोड़ा भीतर थी; होरोस, और स्तौरोस, और लिट्रोतेस, और कार्पिस्तेस, और होरोथेतेस, और मेटागोगेस के द्वारा उसकी वेदना की दशा से उस स्थिर करने का ऐसा है(1) [उस एओन का].(2) बाद के एओनों की उत्पत्ति का वृत्तान्त भी ऐसा है, अर्थात् पहले मसीह का और पवित्र आत्मा का, जो दोनों पिता के द्वारा पश्चात्ताप(3) [सोफिया के] के बाद उत्पन्न किए गए, और दूसरे(4) मसीह का (जिसे वे उद्धारकर्ता भी कहते हैं), जो अपने अस्तित्व के लिये [एओनों के] संयुक्त अंशदानों का ऋणी था. वे हमें बताते हैं, तथापि, कि यह ज्ञान खुले रूप में नहीं बताया गया, क्योंकि सब उसे ग्रहण करने के योग्य नहीं, परन्तु उद्धारकर्ता के द्वारा दृष्टान्तों के माध्यम से उन्हें रहस्यमय रूप में प्रगट किया गया जो उसे समझने के योग्य हैं. यह इस प्रकार किया गया है. तीस एओन (जैसा हम पहले कह चुके हैं) उन तीस वर्षों से सूचित होते हैं जिन में वे कहते हैं कि उद्धारकर्ता ने कोई सार्वजनिक काम नहीं किया, और दाखबारी के मजदूरों के दृष्टान्त से. पौलुस भी, वे दृढ़ करते हैं, बहुत स्पष्ट और बार बार इन एओनों के नाम लेता है, और यहाँ तक जाता है कि उनका क्रम भी रखता है, जब वह कहता है, "एओन के एओनों की सब पीढ़ियों के लिये."(5) वरन्, हम स्वयं, जब धन्यवाद देते समय ये वचन कहते हैं, "एओनों के एओनों के लिये" (युगानुयुग), इन एओनों को रखते हैं. और, अन्त में, जहाँ कहीं एओन या एओन शब्द आते हैं, वे तुरन्त उन्हें इन प्राणियों की ओर लगाते हैं.
2. एओनों की ड्यूओडेकाड की उत्पत्ति, फिर, इस तथ्य से सूचित होती है कि प्रभु बारह(7) वर्ष की आयु का था जब उसने व्यवस्था के शिक्षकों से वाद किया, और प्रेरितों के चुने जाने से, क्योंकि इनमें बारह थे.(8) अन्य अठारह एओन इस प्रकार प्रगट किए जाते हैं: कि प्रभु ने, [उनके अनुसार,] मरे हुओं में से अपने पुनरुत्थान के बाद अठारह महीने(9) अपने शिष्यों के साथ बातचीत की. वे यह भी दृढ़ करते हैं कि ये अठारह एओन उसके नाम के पहले दो अक्षरों से स्पष्ट रूप से सूचित हैं [I<greek>hsous</greek>], अर्थात् आयोटा(10) और एटा. और, इसी प्रकार, वे कहते हैं कि दस एओन आयोटा अक्षर से दिखाए गए हैं, जो उसके नाम को आरम्भ करता है; और, उसी कारण, वे हमें बताते हैं कि उद्धारकर्ता ने कहा, "एक आयोटा, या एक बिन्दु, किसी भी रीति से टलेगा नहीं जब तक सब पूरा न हो जाए."(11)
3. वे आगे कहते हैं कि बारहवें एओन के विषय में जो भाव हुआ वह यहूदा के धर्मत्याग से संकेत किया गया है, जो बारहवाँ प्रेरित था, और इस तथ्य से भी कि मसीह ने बारहवें महीने में दुख उठाया. क्योंकि उनकी राय है कि उसने अपने बपतिस्मा के बाद केवल एक वर्ष तक प्रचार जारी रखा. वही बात उस स्त्री के विषय से भी अत्यन्त स्पष्ट रूप से सूचित होती है जो रक्तस्राव से दुखी थी. क्योंकि बारह वर्ष तक इस प्रकार पीड़ित रहने के बाद, वह उद्धारकर्ता के आगमन से चंगी हुई, जब उसने उसके वस्त्र के छोर को छुआ; और इसी कारण उद्धारकर्ता ने कहा, "मुझे किसने छुआ?"(12)--अपने शिष्यों को वह भेद सिखाते हुए जो एओनों के बीच हुआ था, और उस एओन की चंगाई जो दुख में फँसा था. क्योंकि जो बारह वर्ष पीड़ित रही वह उस शक्ति को दर्शाती थी जिसका सार, जैसा वे वर्णन करते हैं, अपने को आगे तान रहा था, और असीमता में बह रहा था; और यदि उसने पुत्र के वस्त्र को न छुआ होता,(13) अर्थात् प्रथम टेट्राड की अलेथेया को, जो कथित छोर से सूचित है, तो वह सामान्य सार में घुल गई होती(14) [जिसमें वह सहभागी थी]. वह रुक गई, तथापि, और आगे दुख सहना बन्द कर दिया. क्योंकि वह शक्ति जो पुत्र से निकली (और इस शक्ति को वे होरोस कहते हैं) ने उसे चंगा किया, और भाव को उससे अलग किया.
4. वे और भी दृढ़ करते हैं कि उद्धारकर्ता(15) सब एओनों से निकला हुआ, और अपने में सब कुछ, इस अंश से दिखाया जाता है: "हर नर जो गर्भ को खोलता है."(16) क्योंकि उसने, सब कुछ होकर, दुख उठानेवाले एओन के एन्थ्यूमेसिस के गर्भ को खोला(17), जब
वह प्लेरोमा से निकाल दिया गया था. इसे वे दूसरी ऑग्डोअड भी कहते हैं, जिसके विषय में हम अभी बोलेंगे. और वे कहते हैं कि स्पष्ट रूप से इसी कारण पौलुस ने कहा, "और वह स्वयं सब कुछ है;"(1) और फिर, "सब कुछ उसके लिये है, और उसी से सब कुछ है;"(2) और आगे, "उसमें ईश्वरत्व की सारी पूर्णता वास करती है;"(3) और फिर भी, "सब कुछ परमेश्वर के द्वारा मसीह में इकट्ठा किया जाता है."(4) इस प्रकार वे इन और पवित्रशास्त्र में मिलनेवाले ऐसे ही अंशों की व्याख्या करते हैं.
5. वे आगे दिखाते हैं कि उनका वह होरोस, जिसे वे अनेक नामों से पुकारते हैं, दो सामर्थ्य रखता है,--एक सम्भालने की, और दूसरी अलग करने की; और जितना वह सम्भालता और थामे रहता है, वह स्तौरोस है, और जितना वह बाँटता और अलग करता है, वह होरोस है. फिर वे उद्धारकर्ता को इस दोहरी सामर्थ्य का संकेत करते हुए दिखाते हैं: पहले, थामने की शक्ति, जब उसने कहा, "जो कोई अपना क्रूस (स्तौरोस) नहीं उठाता, और मेरे पीछे नहीं आता, मेरा चेला नहीं हो सकता;"(5) और फिर, "क्रूस उठाकर मेरे पीछे आ;"(6) परन्तु अलग करने की शक्ति जब उसने कहा, "मैं मेल भेजने नहीं, वरन् एक वचन भेजने आया."(7) वे यह भी कहते हैं कि यूहन्ना ने वही बात संकेत की जब उसने कहा, "सूप उसके हाथ में है, और वह खलिहान को अच्छी तरह साफ करेगा, और गेहूँ को अपने खत्ते में इकट्ठा करेगा; परन्तु भूसी को वह न बुझनेवाली आग से जलाएगा."(8) इस घोषणा से उसने होरोस की सामर्थ्य को रखा. क्योंकि उस सूप को वे क्रूस (स्तौरोस) बताते हैं, जो, निस्सन्देह, सब भौतिक(9) वस्तुओं को भस्म करता है, जैसे आग भूसी को करती है, परन्तु बचाए हुओं सब को शुद्ध करता है, जैसे सूप गेहूँ को करता है. और वे दृढ़ करते हैं कि प्रेरित पौलुस ने स्वयं इस क्रूस का उल्लेख इन वचनों में किया: "क्रूस का उपदेश नाश होनेवालों के लिये मूर्खता है, परन्तु हम जो बचाए गए हैं उनके लिये वह परमेश्वर की सामर्थ्य है."(10) और फिर: "परमेश्वर ऐसा न करे कि मैं किसी वस्तु में(11) घमण्ड करूँ, मसीह के क्रूस को छोड़कर, जिसके द्वारा संसार मेरे लिये क्रूस पर चढ़ाया गया है, और मैं संसार के लिये."
6. अतः, अपने प्लेरोमा का, और विश्व की रचना का(12), जो वृत्तान्त वे सब देते हैं वह ऐसा है, प्रकाशन के भले वचनों को अपनी दुष्ट कल्पनाओं के अनुकूल बनाने का यत्न करते हुए. और केवल सुसमाचार लेखकों तथा प्रेरितों की रचनाओं से ही नहीं वे टेढ़ी व्याख्याओं और छलपूर्ण व्याख्याओं के द्वारा अपनी रायों के प्रमाण निकालने का यत्न करते हैं: व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के साथ भी वे इसी प्रकार व्यवहार करते हैं, जिनमें बहुत से दृष्टान्त और रूपक हैं जो बार बार विविध अर्थों में खींचे जा सकते हैं, जिस प्रकार की व्याख्या के अधीन वे रखे जाएँ उसके अनुसार. और उनमें से और लोग(13), बड़ी चतुराई से, पवित्रशास्त्र के ऐसे भागों को अपनी कल्पनाओं के अनुकूल बनाकर, सत्य से बन्दी बनाकर ले जाते हैं उन्हें जो एक परमेश्वर, सर्वशक्तिमान पिता, और एक प्रभु यीशु मसीह, परमेश्वर के पुत्र, में स्थिर विश्वास नहीं रखे रहते.
अध्याय चार.--अकामथ की रचना का विधर्मियों द्वारा दिया गया वृत्तान्त; उसके विक्षोभों से दृश्य जगत् का मूल.
1. प्लेरोमा के बाहर हुई बताई गई बातें ये हैं: ऊपर रहनेवाली उस सोफिया का एन्थ्यूमेसिस, जिसे वे अकामथ भी कहते हैं,(14) प्लेरोमा से हटाया जाकर, अपने भाव के साथ, अन्धकार और शून्य के उन स्थानों में [जहाँ वह निकाल दी गई थी] उग्र रूप से उत्तेजित हो गया, ऐसा वे सहज ही कहते हैं. क्योंकि वह ज्योति(15) और प्लेरोमा से बाहर की गई थी, और रूप या आकृति रहित थी, अकाल जन्म की नाईं, क्योंकि उसे कुछ नहीं मिला था(16) [एक पुरुष माता-पिता से]. परन्तु ऊपर रहनेवाले मसीह ने उस पर दया की; और स्तौरोस के द्वारा और उसके परे अपने को बढ़ाकर,(17) उसने उसे एक आकृति दी, परन्तु केवल द्रव्य के विषय में, और ऐसी नहीं कि बुद्धि पहुँचाए.(18) यह कर चुकने पर, उसने अपना प्रभाव खींच लिया, और लौट गया, अकामथ को अपने पर छोड़कर, ताकि वह, प्लेरोमा से कटी हुई अपनी पीड़ा को समझकर, अच्छी वस्तुओं की इच्छा से प्रभावित हो, और इस बीच मसीह तथा पवित्र आत्मा के द्वारा उसमें छोड़ी गई अमरता की एक प्रकार की सुगन्ध रखे. इसलिये वह दो नामों से भी पुकारी जाती है--अपने पिता के पीछे सोफिया (क्योंकि सोफिया उसका पिता कही जाती है), और उस आत्मा से पवित्र आत्मा जो मसीह के साथ है. तब रूप पाकर, बुद्धि के साथ, और उस लोगोस के द्वारा तुरन्त छोड़ दी जाकर जो उसके साथ अदृश्य रूप से उपस्थित था--अर्थात्, मसीह के द्वारा--उसने उस ज्योति को खोजने को अपने को ताना जिसने उसे छोड़ दिया था, परन्तु नहीं कर सकी
अपना उद्देश्य पूरा करना, क्योंकि होरोस ने उसे रोका. और जब होरोस ने इस प्रकार उसकी आगे की प्रगति को रोका, तो उसने पुकारा, इआओ,(1) जहाँ से, वे कहते हैं, यह नाम इआओ अपना मूल पाता है. और जब वह उस भाव के कारण होरोस के पार नहीं जा सकी जिसमें वह फँसी थी, और क्योंकि वह अकेली बाहर छोड़ दी गई थी, तब उसने अपने को उस अनेक रूप और विविध भाव-दशा के हर प्रकार के लिये सौंप दिया जिसके अधीन वह थी; और इस प्रकार उसने एक ओर शोक सहा क्योंकि अपनी इच्छा की वस्तु नहीं पाई, और दूसरी ओर भय, कहीं जीवन ही उसे छोड़ न दे, जैसा ज्योति पहले ही कर चुकी थी, और साथ ही, वह अत्यन्त उलझन में थी. ये सब भावनाएँ अज्ञान से जुड़ी थीं. और उसका यह अज्ञान उसकी माता, प्रथम सोफिया, एक एओन, के अज्ञान जैसा नहीं था, जो भाव के द्वारा क्षीणता से था, वरन् एक [जन्मजात] विरोध [प्रकृति का ज्ञान के प्रति] से था.(2) और, एक और प्रकार का भाव उस पर (अकामथ) पड़ा, अर्थात्, उस की ओर लौटने की इच्छा जिसने उसे जीवन दिया.
2. इस संग्रह को [भावों के] वे घोषित करते हैं कि वह उस पदार्थ का द्रव्य था जिससे यह जगत् रचा गया. क्योंकि [उसे जीवन देनेवाले की ओर] लौटने [की उसकी इच्छा] से, इस जगत् की हर आत्मा, और स्वयं डेमियुर्ज(3) की भी, ने अपना मूल पाया. और सब वस्तुओं ने अपना आरम्भ उसके भय और शोक के ऋणी हुए. क्योंकि उसके आँसुओं से द्रव स्वभाव की सब वस्तु बनी; उसके मुस्कान से सब जो प्रकाशमान है; और उसके शोक तथा उलझन से जगत् के सब शारीरिक तत्व. क्योंकि एक समय, जैसा वे दृढ़ करते हैं, वह रोती और विलाप करती, अन्धकार और शून्य के बीच अकेली छोड़े जाने के कारण; और दूसरे समय, उस ज्योति पर विचार करके जिसने उसे छोड़ दिया था, वह आनन्द से भर जाती, और हँसती; फिर, वह भय से मारी जाती; या, अन्य समय, घबराहट और उलझन में डूब जाती.
3. अब इस सब से क्या निकलता है? इससे कोई हलकी त्रासदी नहीं निकलती, जैसा उनमें हर मनुष्य की कल्पना आडम्बर से समझाती है, एक एक प्रकार से, और दूसरा दूसरे प्रकार से, किस प्रकार के भाव से और किस तत्व से उसका मूल निकला. उनके पास अच्छा कारण है, जैसा मुझे लगता है, कि ये बातें सब को सार्वजनिक रूप में सिखाने की ओर वे झुकें नहीं, वरन् केवल उन्हें जो ऐसे गहरे भेदों के परिचय के लिये ऊँचा मूल्य चुका सकें. क्योंकि ये शिक्षाएँ उनसे बिलकुल मिलती नहीं जिनके विषय में हमारे प्रभु ने कहा, "तुम ने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो."(4) वे, इसके विपरीत, गूढ़, और भयंकर, और गहरे भेद हैं, जो झूठ से प्रेम करनेवालों के द्वारा केवल बड़े श्रम से पाए जाते हैं. क्योंकि कौन अपना सब कुछ खर्च न करेगा, यदि केवल बदले में वह सीख सके, कि भाव में फँसे एओन के एन्थ्यूमेसिस के आँसुओं से समुद्र, और सोते, और नदियाँ, और हर द्रव द्रव्य ने अपना मूल पाया; कि उसके मुस्कान से ज्योति फूट पड़ी; और कि उसकी उलझन और घबराहट से जगत् के शारीरिक तत्वों की रचना हुई?
4. मैं स्वयं उनकी पद्धति के विकास की ओर कुछ संकेत जोड़ने को कुछ झुका हुआ हूँ. क्योंकि जब मैं देखता हूँ कि जल कुछ ताजे हैं, जैसे सोते, नदियाँ, वर्षा, इत्यादि, और कुछ खारे; जैसे समुद्र के, तो मैं अपने से विचार करता हूँ कि ऐसे सब जल उसके आँसुओं से नहीं निकल सकते, क्योंकि ये केवल खारे गुण के हैं. अतः स्पष्ट है, कि खारे जल ही वे हैं जो उसके आँसुओं से निकले हैं. परन्तु सम्भव है कि वह, अपनी तीव्र वेदना और उलझन में, पसीने से ढकी थी. और इसलिये, उनकी धारणा को आगे बढ़ाकर, हम सोच सकते हैं कि सोते और नदियाँ, और जगत् का सब ताजा जल, इसी स्रोत के कारण हैं. क्योंकि कठिन है, जब हम जानते हैं कि सब आँसू एक ही गुण के हैं, यह मानना कि उनसे खारे और ताजे दोनों जल निकले. अधिक सम्भाव्य कल्पना यह है, कि कुछ उसके आँसुओं से हैं, और कुछ उसके पसीने से. और क्योंकि जगत् में कुछ जल ऐसे भी हैं जो अपनी प्रकृति में गर्म और तीखे हैं, तुझे उनका मूल, कैसे और कहाँ से, अनुमान के लिये छोड़ दिया जाना चाहिए. उनकी परिकल्पना के कुछ फल ऐसे हैं.
5. वे आगे कहते हैं कि, जब माता अकामथ हर प्रकार के भाव से गुजर चुकी, और कठिनाई से उनसे बच निकली, तो उसने उस ज्योति से विनती करने को अपने को फेरा जिसने उसे छोड़ दिया था, अर्थात् मसीह से. वह, तथापि, प्लेरोमा को लौट चुका था, और सम्भवतः फिर उससे उतरना नहीं चाहता था, इसलिये उसने उसके पास पराक्लेट को, अर्थात् उद्धारकर्ता को, बाहर भेजा.(5) इस प्राणी को पिता ने सब शक्ति दी, जिसने सब कुछ उसके अधिकार के नीचे रखा, एओनों(6) ने भी वैसा ही किया, ताकि "उसके द्वारा सब वस्तुएँ, दृश्य और अदृश्य, सृजी गईं, सिंहासन, देवत्व, प्रभुताएँ."(7) तब वह अपने समकालीन दूतों के साथ उसके पास भेजा गया. और उन्होंने कहा कि अकामथ, श्रद्धा से भरी, पहले लज्जा से अपने को ढाँक ली, परन्तु धीरे धीरे, जब उसने उसे उसके सब वरदानों के साथ देखा, और उसके रूप से बल पा लिया, तो उससे मिलने आगे दौड़ी. तब उसने उसे बुद्धि के विषय में रूप दिया, और उसके भावों को चंगाई दी, उन्हें उससे अलग करते हुए, परन्तु नहीं
ऐसे कि उन्हें विचार से बिलकुल निकाल दे. क्योंकि सम्भव नहीं था कि वे पहले मामले की नाईं(1) मिटा दिए जाएँ, क्योंकि वे पहले ही जड़ पकड़ चुके थे और बल पा चुके थे [ताकि अविनाशी अस्तित्व रखें]. वह जो कुछ कर सकता था वह उन्हें अलग करना और एक ओर रखना था, और फिर उन्हें मिलाना और गाढ़ा करना, ताकि उन्हें अशरीरी भाव से अव्यवस्थित पदार्थ में बदल दे.(2) तब इस प्रक्रिया से उसने उन्हें घनीभूत और शारीरिक रचनाएँ बनने की योग्यता और प्रकृति दी, ताकि दो द्रव्य बनें,--एक दुष्ट, भावों का फल, और दूसरा सचमुच दुख के अधीन, परन्तु उसके परिवर्तन से उत्पन्न. और इसी कारण (अर्थात्, आदर्श पदार्थ के इस स्वरूपीकरण के कारण) वे कहते हैं कि उद्धारकर्ता ने वास्तव में(3) जगत् की सृष्टि की. परन्तु जब अकामथ अपने भाव से मुक्त हुई, तो उसने उसके साथ के दूतों के चकाचौंध दर्शन को आनन्द से देखा; और अपनी समाधि में, उनसे गर्भ धारण करके, वे हमें बताते हैं कि उसने नए प्राणी जने, कुछ अपनी ही प्रतिमा के अनुसार, और कुछ उद्धारकर्ता के साथियों की प्रतिमा के अनुसार एक आत्मिक सन्तान.
अध्याय पाँच.--डेमियुर्ज की रचना; उसका वर्णन. वह प्लेरोमा के बाहर प्रत्येक वस्तु का सृष्टिकर्ता है.
1. ये तीन प्रकार के अस्तित्व, अतः, उनके अनुसार, अब रचे जा चुके थे,--एक भाव से, जो पदार्थ था; दूसरा परिवर्तन से, जो प्राणीय था; और तीसरा, जिसे उसने (अकामथ) स्वयं जना, जो आत्मिक था,--उसने फिर इन्हें रूप देने के काम की ओर मुख किया. परन्तु आत्मिक अस्तित्व के विषय में इसमें वह सफल नहीं हो सकी, क्योंकि वह उसके समान स्वभाव का था. इसलिये उसने उस प्राणीय द्रव्य को रूप देने की ओर अपने को लगाया जो उसके अपने परिवर्तन से निकला था, और उद्धारकर्ता की शिक्षाओं को प्रकाश में लाने की.(4) और वे कहते हैं कि उसने पहले प्राणीय द्रव्य से उसे रचा जो सब वस्तुओं का पिता और राजा है, दोनों उन वस्तुओं का जो उसके समान स्वभाव की हैं, अर्थात् प्राणीय द्रव्य, जिन्हें वे दाहिने हाथ की भी कहते हैं, और उन वस्तुओं का जो भाव से, और पदार्थ से निकलीं, जिन्हें वे बाएँ हाथ की कहते हैं. क्योंकि वे दृढ़ करते हैं कि उसने अपने पीछे अस्तित्व में आई सब वस्तुओं को रचा, अपनी माता के द्वारा गुप्त रूप से इसके लिये प्रेरित होकर. इस परिस्थिति से वे उसे मेट्रोपेटर,(5) अपेटर, डेमियुर्ज, और पिता कहते हैं, यह कहते हुए कि वह दाहिने हाथ के द्रव्यों का पिता है, अर्थात् प्राणीय का, परन्तु बाईं ओर के द्रव्यों का डेमियुर्ज, अर्थात् भौतिक का, और वही सब का राजा भी है. क्योंकि वे कहते हैं कि इस एन्थ्यूमेसिस ने, एओनों के सम्मान के लिये सब कुछ बनाने की इच्छा से, उनकी प्रतिमाएँ रचीं, या बल्कि उद्धारकर्ता(6) ने उसके साधन के द्वारा ऐसा किया. और वह, अदृश्य पिता की प्रतिमा में(7), डेमियुर्ज से अपने को छिपाए रही. परन्तु वह एकलौते पुत्र की प्रतिमा में था, और उसके द्वारा रचे गए दूत और प्रधान दूत शेष एओनों की प्रतिमा में थे.
2. अतः वे दृढ़ करते हैं कि वह प्लेरोमा के बाहर की हर वस्तु का पिता और परमेश्वर ठहराया गया, सब प्राणीय और भौतिक द्रव्यों का सृष्टिकर्ता होकर. क्योंकि वही था जिसने अब तक गड्डमड्ड इन दो प्रकार के अस्तित्वों को अलग किया, और अशरीरी द्रव्यों से शारीरिक बनाया, स्वर्गीय और पार्थिव वस्तुओं को गढ़ा, और भौतिक तथा प्राणीय वस्तुओं का, दाहिनी और बाईं ओर की वस्तुओं का, हलकी और भारी वस्तुओं का, और ऊपर झुकनेवाली तथा नीचे झुकनेवाली वस्तुओं का रचयिता (डेमियुर्ज) बना. उसने सात आकाश भी रचे, जिनके ऊपर वे कहते हैं कि वह, डेमियुर्ज, है. और इसी कारण वे उसे हेब्डोमस कहते हैं, और उसकी माता अकामथ को ऑग्डोअड्स, प्रथमजात और प्राथमिक ऑग्डोअड की संख्या को प्लेरोमा के रूप में रखते हुए. वे और दृढ़ करते हैं कि ये सात आकाश बुद्धिमान हैं, और उन्हें दूत कहते हैं, और स्वयं डेमियुर्ज को परमेश्वर की समानता धारण करनेवाला एक दूत बताते हैं; और उसी ढब से, वे घोषित करते हैं कि परादैस, जो तीसरे आकाश के ऊपर स्थित है, शक्ति रखनेवाला चौथा दूत है, जिससे आदम ने उसके साथ बातचीत करते हुए कुछ गुण पाए.
3. वे आगे कहते हैं कि डेमियुर्ज ने कल्पना की कि उसने ये सब वस्तुएँ अपने आप रचीं, जब कि वास्तव में उसने उन्हें अकामथ की उत्पादक शक्ति के संयोग से बनाया. उसने आकाश रचे, फिर भी आकाशों से अनजान था; उसने मनुष्य गढ़ा, फिर भी मनुष्य को नहीं जाना; उसने पृथ्वी को प्रकाश में लाया, फिर भी पृथ्वी से परिचय नहीं था; और, इसी प्रकार. वे घोषित करते हैं कि वह अपने बनाए सब के रूपों से अनजान था, और अपनी ही माता के अस्तित्व को भी नहीं जानता था, परन्तु कल्पना करता था कि वह स्वयं सब कुछ है. वे आगे दृढ़ करते हैं
कि उसकी माता ने उसके मन में यह राय उत्पन्न की, क्योंकि वह उसे ऐसे स्वभाव से युक्त बाहर लाना चाहती थी कि वह अपने ही सार का सिर और स्रोत हो, और हर प्रकार के काम पर [जो बाद में किया गया] पूर्ण शासक हो. इस माता को वे ऑग्डोअड, सोफिया, टेरा, यरूशलेम, पवित्र आत्मा, और, पुरुष संकेत के साथ, प्रभु भी कहते हैं.(1) उसका निवास स्थान एक मध्य स्थान है, डेमियुर्ज के ऊपर सचमुच, परन्तु प्लेरोमा के नीचे और बाहर, अन्त तक भी.(2)
4. अतः, जब वे सब भौतिक द्रव्य को तीन भावों से रचा हुआ दिखाते हैं, अर्थात्, भय, शोक, और उलझन, तो जो वृत्तान्त वे देते हैं वह यह है: प्राणीय द्रव्य भय से और परिवर्तन से उत्पन्न हुए; डेमियुर्ज को भी वे अपने मूल के लिये परिवर्तन का ऋणी बताते हैं; परन्तु अन्य सब प्राणीय द्रव्यों के अस्तित्व को वे भय के कारण बताते हैं, जैसे अविवेकी पशुओं की आत्माएँ, और वन पशुओं की, और मनुष्यों की. और इसी कारण, वह (डेमियुर्ज), किसी आत्मिक सार को पहचानने में असमर्थ होकर, अपने को अकेला परमेश्वर समझ बैठा, और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा घोषित किया, "मैं परमेश्वर हूँ, और मेरे सिवा कोई और नहीं."(3) वे आगे सिखाते हैं कि दुष्टता की आत्माओं ने अपना मूल शोक से पाया. इसी से शैतान, जिसे वे कॉस्मोक्रेटर (जगत् का शासक) भी कहते हैं, और दुष्टात्माएँ, और दूत, और हर दुष्ट आत्मिक प्राणी जो है, ने अपने अस्तित्व का स्रोत पाया. वे डेमियुर्ज को अपनी उस माता (अकामथ) का पुत्र दिखाते हैं, और कॉस्मोक्रेटर को डेमियुर्ज की सृष्टि. कॉस्मोक्रेटर को अपने ऊपर की बात का ज्ञान है, क्योंकि वह दुष्टता की आत्मा है; परन्तु डेमियुर्ज ऐसी बातों से अनजान है, क्योंकि वह केवल प्राणीय है. उनकी माता उस स्थान में रहती है जो आकाशों के ऊपर है, अर्थात् मध्य निवास में; डेमियुर्ज स्वर्गीय स्थान में, अर्थात् हेब्डोमद में; परन्तु कॉस्मोक्रेटर इस हमारे जगत् में. जगत् के शारीरिक तत्व, फिर, जैसा हम पहले कह चुके हैं, घबराहट और उलझन से निकले, एक अधिक नीच स्रोत से.
इस प्रकार पृथ्वी उसकी मूर्च्छा की दशा से उठी; जल उसके भय से उत्पन्न हलचल से; वायु उसके शोक के घनीभूत होने से; और अग्नि, मृत्यु और क्षय उत्पन्न करती हुई, इन सब तत्वों में अन्तर्निहित थी, जैसा वे सिखाते हैं कि अज्ञान भी इन तीन भावों में छिपा पड़ा था.
5. जगत् को इस प्रकार रचकर, उसने (डेमियुर्ज) मनुष्य का मिट्टी का [भाग] भी रचा, उसे इस सूखी पृथ्वी से नहीं लिया, वरन् एक अदृश्य द्रव्य से जो पिघलनेवाले और द्रव पदार्थ से बना था, और फिर बाद में, जैसा वे प्रक्रिया को बताते हैं, उसमें उसकी प्रकृति का प्राणीय भाग फूँका. यही बाद वाला था जो उसकी प्रतिमा और समानता के अनुसार रचा गया. भौतिक भाग, सचमुच, प्रतिमा तक बहुत निकट था. परमेश्वर के, परन्तु उसके साथ एक ही द्रव्य का नहीं. प्राणीय, दूसरी ओर, समानता के विषय में ऐसा था; और इसलिये उसका द्रव्य जीवन की आत्मा कहलाया, क्योंकि वह एक आत्मिक बहाव से उठा. इस सब के बाद, वह, वे कहते हैं, चारों ओर खाल के आवरण से लपेटा गया; और इससे वे बाहरी संवेदी मांस का अर्थ करते हैं.
6. परन्तु वे आगे दृढ़ करते हैं कि डेमियुर्ज स्वयं अपनी माता अकामथ की उस सन्तान से अनजान था, जिसे उसने उन दूतों के ध्यान के फलस्वरूप जना जो उद्धारकर्ता की सेवा में थे, और जो, उसके समान, आत्मिक स्वभाव की थी. उसने इस अज्ञान का लाभ उठाकर उसे (अपनी उत्पत्ति) उसकी जानकारी के बिना उसमें रख दिया, ताकि, उसके साधन से उस प्राणीय आत्मा में मिलाई जाकर जो उससे निकलती है, और इस भौतिक देह में गर्भ की नाईं ढोई जाकर, जब वह धीरे धीरे बल में बढ़े, समय के साथ पूर्ण विवेक को ग्रहण करने के योग्य हो जाए.(4) इस प्रकार, उनके अनुसार, हुआ, कि डेमियुर्ज की ओर किसी ज्ञान के बिना, उसके फूँक से रचा गया मनुष्य उसी समय, एक अकथनीय प्रबन्ध के द्वारा, सोफिया से पाए गए उसी समय के फूँक से एक आत्मिक मनुष्य बना दिया गया. क्योंकि, जैसे वह अपनी माता से अनजान था, वैसे ही उसने उसकी सन्तान को भी नहीं पहचाना. इस [सन्तान] को वे एक्लेसिया भी घोषित करते हैं, ऊपर की एक्लेसिया का एक चिह्न. अतः, जिस प्रकार के मनुष्य की वे कल्पना करते हैं वह यह है: उसकी प्राणीय आत्मा डेमियुर्ज से है, उसका शरीर पृथ्वी से, उसका मांसल भाग पदार्थ से, और उसका आत्मिक मनुष्य माता अकामथ से.
अध्याय छह.--इन विधर्मियों द्वारा कल्पित तीन प्रकार का मनुष्य: उनके लिये अच्छे काम अनावश्यक, यद्यपि दूसरों के लिये आवश्यक: उनकी छोड़ी हुई नैतिकता.
1. इस प्रकार तीन प्रकार के द्रव्य होने पर, वे सब भौतिक के विषय में (जिसे वे "बाएँ हाथ पर" भी बताते हैं) घोषित करते हैं कि उसका नाश अवश्य होना चाहिए, क्योंकि वह अक्षय के किसी फूँक को ग्रहण करने में असमर्थ है. हर प्राणीय अस्तित्व के विषय में (जिसे वे "दाहिने हाथ पर" भी कहते हैं), वे मानते हैं कि, क्योंकि वह आत्मिक और भौतिक के बीच का है, वह उस ओर को चला जाता है
जिसे झुकाव खींचता है. आत्मिक द्रव्य को, फिर, वे इस उद्देश्य से बाहर भेजा हुआ बताते हैं, कि यहाँ प्राणीय के साथ एक होकर, वह आकार धारण करे, दोनों तत्व एक ही समय एक ही अनुशासन के अधीन हों. और इसे वे "नमक"(1) और "जगत् की ज्योति" घोषित करते हैं. क्योंकि प्राणीय द्रव्य को बाहरी इन्द्रियों के द्वारा प्रशिक्षण की आवश्यकता थी; और इसी कारण वे दृढ़ करते हैं कि जगत् रचा गया, और यह भी कि उद्धारकर्ता प्राणीय द्रव्य के पास आया (जो स्वतन्त्र इच्छा रखता था), ताकि उसके लिये उद्धार सुरक्षित करे. क्योंकि वे दृढ़ करते हैं कि उसने उन लोगों के प्रथम फल पाए जिन्हें उसे बचाना था [इस प्रकार], अकामथ से वह जो आत्मिक था, और डेमियुर्ज के द्वारा वह प्राणीय मसीह से विभूषित किया गया, परन्तु एक [विशेष] प्रबन्ध से एक ऐसे शरीर से घेरा गया(2) जो प्राणीय स्वभाव से युक्त था, फिर भी अकथनीय कौशल से रचा गया, ताकि वह दृश्य और स्पर्श्य हो, और दुख सहने में समर्थ हो. उसी समय, वे नकारते हैं कि उसने कुछ भी भौतिक [अपनी प्रकृति में] लिया, क्योंकि पदार्थ सचमुच उद्धार के अयोग्य है. वे आगे मानते हैं कि सब वस्तुओं की समाप्ति तब होगी जब सब आत्मिक ग्नोसिस (ज्ञान) के द्वारा रचा और सिद्ध किया जा चुका होगा; और इससे वे उन आत्मिक मनुष्यों का अर्थ करते हैं जो परमेश्वर के पूर्ण ज्ञान तक पहुँचे हैं, और अकामथ के द्वारा इन भेदों में दीक्षित किए गए हैं. और वे अपने को ये व्यक्ति दिखाते हैं.
2. प्राणीय मनुष्य, फिर, प्राणीय बातों में सिखाए जाते हैं; ऐसे मनुष्य, अर्थात्, जो अपने कामों से, और केवल विश्वास से, स्थिर किए गए हैं, जब कि उनके पास पूर्ण ज्ञान नहीं. कलीसिया के हम, वे कहते हैं, ये व्यक्ति हैं.(3) इसलिये वे यह भी कहते हैं कि अच्छे काम हमारे लिये आवश्यक हैं, क्योंकि नहीं तो हमारा उद्धार पाना असम्भव है. परन्तु अपने विषय में, वे मानते हैं कि वे पूरी तरह और निस्सन्देह बचाए जाएँगे, चाल के द्वारा नहीं, वरन् क्योंकि वे स्वभाव से आत्मिक हैं.(4) क्योंकि, जैसे असम्भव है कि भौतिक द्रव्य उद्धार में सहभागी हो (क्योंकि, सचमुच, वे कहते हैं कि वह उसे ग्रहण करने में असमर्थ है), वैसे ही फिर असम्भव है कि आत्मिक द्रव्य (जिससे वे अपना अर्थ करते हैं) कभी क्षय के अधिकार के नीचे आए, वे जिस प्रकार के कामों में भी मग्न हों. क्योंकि जैसे सोना, गन्दगी में डुबोया जाने पर, उस कारण अपना सौन्दर्य नहीं खोता, वरन् अपने निज गुण रखता है, गन्दगी को सोने की हानि करने की शक्ति नहीं, वैसे वे दृढ़ करते हैं कि वे किसी भी मात्रा में हानि नहीं सह सकते, या अपना आत्मिक द्रव्य नहीं खो सकते, वे जिन भौतिक कामों में भी फँसें.
3. इसलिये यह भी होता है, कि उनमें "अत्यन्त पूर्ण" लोग निर्भय होकर उन सब प्रकार के निषिद्ध कामों में लग जाते हैं जिनके विषय में पवित्रशास्त्र हमें निश्चय दिलाते हैं कि "ऐसे काम करनेवाले परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे."(5) उदाहरण के लिये, वे मूर्तियों को बलि चढ़ाए गए मांस खाने में कोई संकोच नहीं करते, यह कल्पना करके कि इस रीति से वे कोई अशुद्धता नहीं पा सकते. फिर, हर अन्यजाति पर्व में जो मूर्तियों के सम्मान में मनाया जाता है, ये मनुष्य सबसे पहले इकट्ठे होते हैं; और वे इतनी सीमा तक जाते हैं, कि उनमें से कुछ उस रक्तमय दृश्य से भी दूर नहीं रहते जो परमेश्वर और मनुष्यों दोनों के लिये घृणित है, जिसमें तलवारबाज या वन पशुओं से लड़ते हैं, या अकेले एक दूसरे का सामना करते हैं. उनमें से और लोग अत्यन्त लालच से मांस की लालसाओं के लिये अपने को सौंप देते हैं, यह कहते हुए कि शारीरिक बातें शारीरिक स्वभाव को दी जानी चाहिए, और आत्मिक बातें आत्मिकों के लिये जुटाई जाती हैं. उनमें से कुछ, और भी, उन स्त्रियों को अशुद्ध करने के अभ्यस्त हैं जिन्हें उन्होंने ऊपर की शिक्षा सिखाई है, जैसा उन स्त्रियों ने बार बार स्वीकार किया है जो उनमें से कुछ के द्वारा बहकाई गई थीं, जब वे परमेश्वर की कलीसिया में लौटीं, और अपनी शेष भूलों के साथ इसे माना. उनमें से और लोग भी, खुले रूप में और बिना लज्जा के, कुछ स्त्रियों से तीव्र आसक्ति रखकर, उन्हें उनके पतियों से बहका ले जाते हैं, और उनके साथ अपने विवाह बाँधते हैं. उनमें से और लोग, फिर, जो पहले. उनके साथ बहिनों की नाईं पूरी मर्यादा में रहने का बहाना करते हैं, समय के साथ अपने सच्चे रंग में प्रगट हुए हैं, जब बहिन अपने [बहाने के] भाई से गर्भवती पाई गई.
4. और और भी बहुत सी घृणित बातें और अभक्तियाँ करते हुए, वे हमें नीचा दिखाते हैं (जो परमेश्वर के भय से विचार या वचन में भी पाप करने से बचते हैं) बिलकुल तुच्छ और अज्ञानी व्यक्ति बताकर, और अपने को बहुत ऊँचा करते हैं, और पूर्ण होने का, और चुना हुआ बीज होने का दावा करते हैं. क्योंकि वे घोषित करते हैं कि हम केवल उपयोग के लिये अनुग्रह पाते हैं, इसलिये वह फिर हम से ले लिया जाएगा; परन्तु वे स्वयं अनुग्रह को अपनी विशेष निज सम्पत्ति के रूप में रखते हैं, जो एक अकथनीय और वर्णनातीत संयोग के द्वारा ऊपर से उतरा है; और इसी कारण उन्हें और दिया जाएगा.(6) अतः वे कहते हैं कि हर रीति से उनके लिये संयोग के भेद का अभ्यास करना सदा आवश्यक है. और ताकि वे विचारहीनों को इसे मानने के लिये मना लें, वे इन्हीं वचनों के प्रयोग के अभ्यस्त हैं, "जो कोई इस जगत् में होकर किसी स्त्री से ऐसा प्रेम नहीं करता कि"
उसका अधिकार पाना, सत्य का नहीं है, और न सत्य तक पहुँचेगा. पर जो कोई इस संसार का होकर(1) स्त्री के साथ समागम करता है, वह सत्य तक न पहुँचेगा, क्योंकि उसने कामवासना की शक्ति के अधीन ऐसा किया है." इस कारण वे हम से कहते हैं कि जिन्हें वे प्राणमय मनुष्य कहते हैं, और संसार के बताते हैं, हमारे लिये संयम और अच्छे काम करना आवश्यक है, कि इस उपाय से हम अन्त में मध्य निवास तक पहुँचें, पर जिन्हें "आत्मिक और सिद्ध" कहा जाता है उनके लिये ऐसी चाल चलन बिलकुल आवश्यक नहीं. क्योंकि किसी प्रकार की चाल चलन प्लेरोमा में नहीं ले जाती, पर वहाँ से दुर्बल, अपक्व दशा में भेजा गया बीज, और यहाँ सिद्धता तक लाया जाता है.
अध्याय सात.--माता अकामोट, जब उसका सब बीज सिद्ध हो जाएगा, आत्मिक उन मनुष्यों के साथ प्लेरोमा में प्रवेश करेगी; डेमियुर्ज, प्राणमय मनुष्यों के साथ, मध्य निवास में प्रवेश करेगा; पर सब भौतिक मनुष्य क्षय में चले जाएँगे. कुँवारी मरियम के द्वारा मसीह के सत्य देहधारण के विरुद्ध उनकी निन्दापूर्ण धारणाएँ. भविष्यद्वाणियों के विषय उनकी दृष्टि. डेमियुर्ज का मूर्ख अज्ञान.
1. जब सब बीज सिद्धता तक आ जाएगा, तब वे कहते हैं कि उनकी माता अकामोट मध्य स्थान से निकलकर प्लेरोमा के भीतर प्रवेश करेगी, और सब एयोन से उत्पन्न उद्धारकर्ता को अपना पति पाएगी, कि इस प्रकार उद्धारकर्ता और सोफिया, अर्थात् अकामोट, के बीच एक संयोग बने. ये, तब, दूल्हा और दुल्हन हैं, और विवाह मण्डप प्लेरोमा का पूरा विस्तार है. आत्मिक बीज, फिर, अपने प्राणमय प्राणों को उतारकर,(2) और बुद्धिमान आत्माएँ बनकर, अबाध्य और अदृश्य रीति से प्लेरोमा के भीतर प्रवेश करेंगे, और उद्धारकर्ता की सेवा में खड़े स्वर्गदूतों को दुल्हनों के रूप में दिए जाएँगे. डेमियुर्ज स्वयं अपनी माता सोफिया के स्थान में प्रवेश करेगा;(3) अर्थात् मध्य निवास. इस मध्य स्थान में भी धर्मियों के प्राण विश्राम करेंगे; पर प्राणमय स्वभाव की कोई वस्तु प्लेरोमा में प्रवेश न पाएगी. जब ये बातें वर्णित रूप में हो चुकी होंगी, तब संसार में छिपी वह आग भड़ककर बाहर आएगी और bum करेगी; और सब पदार्थ को नाश करती हुई, उसके साथ बुझ भी जाएगी, और फिर अस्तित्व न रखेगी. वे दृढ़ करते हैं कि उद्धारकर्ता के आगमन से पहले डेमियुर्ज इन बातों में से कोई नहीं जानता था.
2. कुछ और भी हैं जो मानते हैं कि उसने मसीह को भी अपने निज पुत्र के रूप में उत्पन्न किया, पर प्राणमय स्वभाव का, और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उसका उल्लेख किया गया(4). यह मसीह मरियम में से(5) ऐसे निकला जैसे पानी एक नली में से बहता है; और उसके बपतिस्मा के it the time में कबूतर के रूप में उस पर उतरा, वह उद्धारकर्ता जो प्लेरोमा का था, और उसके सब inhabit ants के मिले हुए प्रयत्नों से रचा गया था. उसमें वह आत्मिक बीज भी था जो अकामोट से निकला था. इसलिये वे मानते हैं कि हमारे प्रभु ने, 1ले जन्मे और प्राथमिक टेट्राड के चिह्न को बनाए रखते हुए, इन चार तत्वों से मिलकर बना,--आत्मिक तत्व से, जितना वह अकामोट से था; प्राणमय तत्व से, विशेष प्रबन्ध के द्वारा डेमियुर्ज से होने के कारण, क्योंकि वह [देह रूप में] अकथनीय कौशल से रचा गया; और उद्धारकर्ता से, उस कबूतर के विषय में जो उस पर उतरा. वह सब दुःख से स्वतन्त्र भी बना रहा, क्योंकि जो एक साथ अगम्य और अदृश्य था उसके दुःख सहना सम्भव न था. इस कारण, मसीह की आत्मा, जो उसके भीतर रखी गई थी, जब वह पिलातुस के सामने लाया गया तब हटा ली गई. वे आगे मानते हैं कि माता से [अकामोट] उसे मिला बीज भी दुःख के अधीन न था; क्योंकि वह भी दुःखरहित था, आत्मिक होने से, और डेमियुर्ज को भी अदृश्य. तब, उनके अनुसार, यह निकलता है कि प्राणमय मसीह, और जो विशेष प्रबन्ध से रहस्यमय रीति से रचा गया था, दुःख सह गया, कि माता उसके द्वारा ऊपर के मसीह का एक चिह्न दिखाए, अर्थात् उसका जो स्टौरोस के द्वारा अपने आप को फैलाया,(6) और तत्व के विषय में अकामोट को रूप दिया.
क्योंकि वे घोषित करते हैं कि ये सब व्यवहार ऊपर हुए कामों के प्रतिरूप थे.
3. वे और भी मानते हैं कि जो प्राण अकामोट का बीज रखते हैं वे शेष से श्रेष्ठ हैं, और डेमियुर्ज के द्वारा औरों से अधिक प्रिय हैं, यद्यपि वह उसका सच्चा कारण नहीं जानता, पर कल्पना करता है कि वे उसके प्रति उसकी कृपा से वैसे हैं जैसे वे हैं. इसलिये वे कहते हैं कि उसने उन्हें भविष्यद्वक्ताओं, याजकों, और राजाओं में बाँटा; और वे घोषित करते हैं कि इस बीज के द्वारा भविष्यद्वक्ताओं से बहुत बातें कही गईं,(7) क्योंकि यह अत्यन्त ऊँचे स्वभाव से सम्पन्न था. वह
माता ने भी, वे कहते हैं, ऊपर की बातों के विषय बहुत कुछ कहा, और वह भी उसके द्वारा और उन प्राणों के द्वारा जो उसके द्वारा रचे गए. फिर, वे भविष्यद्वाणियों को [भिन्न वर्गों में] बाँटते हैं, यह मानते हुए कि एक भाग माता ने कहा, 2रा उसके बीज ने, और 3रा डेमियुर्ज ने. इसी रीति वे मानते हैं कि यीशु ने कुछ बातें उद्धारकर्ता के प्रभाव से कहीं, और बातें माता के प्रभाव से, और और बातें डेमियुर्ज के प्रभाव से, जैसा हम अपने ग्रन्थ में आगे दिखाएँगे.
4. डेमियुर्ज, जो अपने से ऊँची बातों को नहीं जानता था, [भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा] की गई घोषणाओं से सचमुच उत्तेजित हुआ, पर उसने उन्हें तुच्छ जाना, उन्हें कभी एक कारण पर और कभी दूसरे कारण पर डालते हुए; या तो भविष्यद्वाणी की आत्मा पर (जिसमें स्वयं स्वोत्तेजना की शक्ति है), या [केवल बिना सहायता के] मनुष्य पर, या कि यह नीचे के [और नीच श्रेणी के मनुष्यों] की केवल एक चतुराई थी.(1) प्रभु के प्रकट होने तक वह इस प्रकार अज्ञानी रहा. पर वे बताते हैं कि जब उद्धारकर्ता आया, डेमियुर्ज ने उससे सब बातें सीखीं, और आनन्द से सब के साथ, अपनी शक्ति से अपने आप को उससे जोड़ लिया. वे मानते हैं कि वह सुसमाचार में कहा गया सूबेदार है, जिसने उद्धारकर्ता से ये वचन कहे: "क्योंकि मेरे भी अधिकार में सिपाही और सेवक हैं; और जो कुछ मैं आज्ञा देता हूँ वे करते हैं."(2) वे आगे मानते हैं कि वह संसार के कामों का प्रबन्ध तब तक करता रहेगा जब तक यह उचित और आवश्यक हो, और विशेष करके कि वह कलीसिया की देखरेख करे; और साथ ही उसके लिये तैयार किए हुए प्रतिफल के ज्ञान से वह प्रभावित है, अर्थात् कि वह अपनी माता के निवास तक पहुँचे.
5. वे, तब, तीन प्रकार के मनुष्यों की कल्पना करते हैं, आत्मिक, भौतिक, और प्राणमय, जो कैन, हाबिल, और शेत के द्वारा दर्शाए गए हैं. ये तीन स्वभाव अब एक व्यक्ति में नहीं पाए जाते,(3) पर [मनुष्यों के] विविध प्रकार बनाते हैं. भौतिक, सहज ही, क्षय में चला जाता है. प्राणमय, यदि उत्तम भाग को चुने, मध्य स्थान में विश्राम पाता है; पर यदि निकृष्ट को, तो वह भी विनाश में चला जाएगा. पर वे दृढ़ करते हैं कि अकामोट के बोए हुए आत्मिक सिद्धान्त, यहाँ उस समय से अब तक धर्ममय प्राणों में अनुशासित और पोषित होते हुए (क्योंकि उसके द्वारा दिए जाने पर वे अभी केवल दुर्बल थे), अन्त में सिद्धता तक पहुँचकर, उद्धारकर्ता के स्वर्गदूतों को दुल्हनों के रूप में दिए जाएँगे, और उनके प्राणमय प्राण अवश्य मध्य स्थान में डेमियुर्ज के साथ सदा विश्राम करेंगे. प्राणमय प्राणों को फिर उपविभाजित करके वे कहते हैं कि कुछ स्वभाव से अच्छे हैं, और कुछ स्वभाव से बुरे. अच्छे वे हैं जो [आत्मिक] बीज को ग्रहण करने के योग्य होते हैं; स्वभाव से बुरे वे हैं जो उस बीज को कभी ग्रहण नहीं कर सकते.
अध्याय आठ.--वैलेंटिनियन अपने निज धर्मपरायण विचारों को सहारा देने के लिये शास्त्र को कैसे बिगाड़ते हैं.
1. ऐसा, तब, उनका मत है, जिसकी न भविष्यद्वक्ताओं ने घोषणा की, न प्रभु ने शिक्षा दी, न प्रेरितों ने सौंपा, पर जिसका वे घमण्ड करते हैं कि और सब से बढ़कर उन्हें सिद्ध ज्ञान है. वे शास्त्र से अन्य स्रोतों से अपने विचार बटोरते हैं;(4) और, एक साधारण कहावत को काम में लाएँ तो, वे बालू की रस्सियाँ बुनने का यत्न करते हैं, प्रभु के दृष्टान्तों को, भविष्यद्वक्ताओं की उक्तियों को, और प्रेरितों के वचनों को, सम्भावना की एक आभा के साथ अपनी निज बातों के अनुकूल बनाने का प्रयत्न करते हुए, कि उनकी योजना बिलकुल बिना सहारे की न लगे. पर ऐसा करते हुए वे शास्त्र की क्रमबद्धता और सम्बन्ध की उपेक्षा करते हैं, और जितना उन में है, सत्य को खण्ड खण्ड करके नाश करते हैं. अंशों को हटाकर, उन्हें नया रूप देकर, और एक बात से दूसरी बात बनाकर, प्रभु के वचनों को अपनी धारणाओं के अनुकूल करने की दुष्ट कला से वे बहुतों को बहकाने में सफल होते हैं. उनकी चाल ऐसी है मानो कोई, जब किसी निपुण कलाकार ने बहुमूल्य रत्नों से राजा की एक सुन्दर प्रतिमा बनाई हो, तब उस मनुष्य की इस समानता को टुकड़े टुकड़े कर ले, रत्नों को फिर से जमाए, और उन्हें कुत्ते या लोमड़ी के रूप में ऐसा जोड़ दे, वह भी घटिया रीति से; और तब यह ठहराए और घोषित करे कि यही वह सुन्दर प्रतिमा है जिसे निपुण कलाकार ने बनाई थी, उन रत्नों की ओर संकेत करते हुए जो राजा की प्रतिमा बनाने के लिये 1ले कलाकार के द्वारा उत्तम रीति से जोड़े गए थे, पर बाद वाले के द्वारा बुरे परिणाम से कुत्ते के आकार में हटा दिए गए, और इस प्रकार रत्नों को दिखाकर, जो अज्ञानी राजा का रूप क्या है यह नहीं जानते थे उन्हें धोखा दे, और उन्हें समझाए कि लोमड़ी की वह दीन समानता वास्तव में राजा की सुन्दर प्रतिमा थी.
इसी रीति ये लोग बूढ़ी स्त्रियों की कथाएँ जोड़ते हैं, और तब, उचित सम्बन्ध से बलपूर्वक खींचकर, जहाँ कहीं मिलें वचन, उक्तियाँ, और दृष्टान्त, परमेश्वर के वचनों को अपनी निराधार कल्पनाओं के अनुकूल करने का यत्न करते हैं. प्लेरोमा के भीतरी भाग के विषय वे इस मार्ग में कहाँ तक बढ़ते हैं, यह हम पहले ही कह चुके हैं.
2. फिर, उनके प्लेरोमा के बाहर की उन बातों के विषय, शास्त्र में से अपनी धारणाओं के अनुकूल करने के उनके प्रयत्न के कुछ नमूने ये हैं. वे दृढ़ करते हैं कि
प्रभु जगत के अन्तिम समयों में दुःख सहने आया, इस उद्देश्य से, कि वह एयोन में अन्तिम को हुई पीड़ा को सूचित करे, और अपने अन्त के द्वारा उन एयोन में उठी उस हलचल के थमने की घोषणा करे. वे आगे मानते हैं कि बारह वर्ष की वह बालिका, आराधनालय के प्रधान की बेटी,(1) जिसके पास प्रभु आया और उसे मरे हुओं में से जिलाया, अकामोट का एक चिह्न थी, जिसे उनके मसीह ने, अपने आप को फैलाकर, रूप दिया, और जिसे उसने उस प्रकाश के बोध की ओर फिर ले चला जिसने उसे छोड़ दिया था. और जब वह प्लेरोमा के बाहर एक प्रकार के गर्भपात के समान पड़ी थी तब उद्धारकर्ता उसे दिखाई दिया, यह वे दृढ़ करते हैं कि पौलुस ने कुरिन्थियों के नाम अपनी पत्री में [इन वचनों में] घोषित किया, "और सब के अन्त में, वह मुझे भी दिखाई दिया, मानो असमय जन्मे हुए को."(2) फिर, अपने साथियों के साथ उद्धारकर्ता का अकामोट के पास आना उसी पत्री में उसी के द्वारा इसी रीति घोषित है, जब वह कहता है, "स्वर्गदूतों के कारण स्त्री को अपने सिर पर घूँघट होना चाहिए."(3) अब, जब उद्धारकर्ता उसके पास आया तब अकामोट ने लज्जा से अपने ऊपर घूँघट डाला, यह मूसा ने तब प्रगट किया जब उसने अपने मुख पर घूँघट रखा. तब, वे यह भी कहते हैं कि उसके सहे हुए विकार प्रभु ने क्रूस पर सूचित किए. इस प्रकार, जब उसने कहा, "मेरे परमेश्वर, मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?"(4) उसने केवल दिखाया कि सोफिया प्रकाश से त्यागी गई थी, और होरोस के द्वारा आगे कोई बढ़ना बन्द की गई थी. उसका सन्ताप, फिर, तब सूचित हुआ जब उसने कहा, "मेरा प्राण मृत्यु तक अत्यन्त उदास है;"(5) उसका भय इन वचनों से, "पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए;"(6) और उसका घबराहट भी, जब उसने कहा, "और मैं क्या कहूँगा, मैं नहीं जानता."(7)
3. और वे सिखाते हैं कि उसने तीन प्रकार के मनुष्यों को इस प्रकार दिखाया: भौतिक को, जब उसने उस से कहा जिसने उससे पूछा, "क्या मैं तेरे पीछे आऊँ?"(8) "मनुष्य के पुत्र के पास सिर धरने की जगह नहीं;"--प्राणमय को, जब उसने उस से कहा जिसने कहा, "मैं तेरे पीछे आऊँगा, पर मुझे पहले 1 अपने घर के लोगों को विदा करने दे," "कोई मनुष्य, हल पर हाथ रखकर, और पीछे देखता हुआ, स्वर्ग के राज्य के योग्य नहीं"(9) (इस मनुष्य को वे मध्य वर्ग का बताते हैं, जैसा वे उस दूसरे को भी करते हैं, जिसने बहुत बड़ी मात्रा में धर्म करने का दावा किया, तौभी उसके पीछे चलने से इन्कार किया, और धन [के प्रेम] से ऐसा जीत लिया गया कि कभी सिद्धता तक न पहुँचा)--इसे वे प्राणमय वर्ग में रखना चाहते हैं;--आत्मिक को, फिर, जब उसने कहा, "मरे हुओं को अपने मरे हुए गाड़ने दे, पर तू जा और परमेश्वर के राज्य का प्रचार कर,"(10) और जब उसने चुँगी लेनेवाले जक्कई से कहा, "फुर्ती कर, और उतर आ, क्योंकि आज मुझे तेरे घर रहना है"(11)--इनके विषय उन्होंने घोषित किया कि वे आत्मिक वर्ग के थे. खमीर का वह दृष्टान्त भी, जिसे स्त्री ने तीन माप आटे में छिपाया बताया गया है, वे घोषित करते हैं कि तीन वर्गों को प्रगट करता है. क्योंकि, उनकी शिक्षा के अनुसार, स्त्री सोफिया को दर्शाती थी; आटे के तीन माप, तीन प्रकार के मनुष्यों को--आत्मिक, प्राणमय, और भौतिक; और खमीर स्वयं उद्धारकर्ता को सूचित करता था.
पौलुस ने भी भौतिक, प्राणमय, और आत्मिक को बहुत स्पष्ट रखा, एक स्थान पर कहकर, "जैसा मिट्टी का है, वैसे ही मिट्टी के लोग भी हैं;"(12) और दूसरे स्थान पर, "पर प्राणमय मनुष्य आत्मा की बातें नहीं ग्रहण करता;"(13) और फिर: "जो आत्मिक है वह सब बातों को परखता है."(14) यह, "प्राणमय मनुष्य आत्मा की बातें नहीं ग्रहण करता," वे दृढ़ करते हैं कि डेमियुर्ज के विषय कहा गया, जो प्राणमय होने से न अपनी आत्मिक माता को जानता था, न उसके बीज को, न प्लेरोमा के एयोन को. जिन्हें वह बचाने वाला था उनमें से 1 फल उद्धारकर्ता ने पाए, यह पौलुस ने तब घोषित किया जब उसने कहा, "यदि 1 फल पवित्र है, तो गूँथा आटा भी पवित्र है,"(15) यह सिखाते हुए कि "1 फल" आत्मिक को सूचित करता है, पर "गूँथा आटा" हम को, अर्थात् प्राणमय कलीसिया को, जिसका गूँथा आटा वे कहते हैं कि उसने लिया, और अपने साथ मिलाया, क्योंकि वह "खमीर" है.
4. और, अकामोट प्लेरोमा के पार भटकी, और मसीह से रूप पाया, और उद्धारकर्ता के द्वारा खोजी गई, यह उन्होंने घोषित किया कि उसने तब सूचित किया जब उसने कहा कि वह उस भेड़ के पीछे आया था जो भटक गई थी.(16) क्योंकि भटकती भेड़ का अर्थ वे अपनी माता बताते हैं, जिसके द्वारा वे कलीसिया को बोया हुआ दर्शाते हैं. भटकना स्वयं प्लेरोमा के बाहर विविध विकार की दशा में उसके ठहरने को सूचित करता है, जिससे वे मानते हैं कि पदार्थ की उत्पत्ति हुई. वह स्त्री, फिर, जो घर बुहारती है और सिक्का पाती है, वे घोषित करते हैं कि ऊपर की सोफिया को सूचित करती है, जिसने अपनी एन्थुमेसिस खोकर, पीछे उसे फिर पाया, सब बातों पर
उद्धारकर्ता के आगमन से शुद्ध होने पर. इसलिये यह तत्व भी, उनके अनुसार, प्लेरोमा में फिर स्थापित किया गया. वे यह भी कहते हैं कि शिमोन, "जिसने मसीह को अपनी बाँहों में लिया, और परमेश्वर का धन्यवाद किया, और कहा, प्रभु, अब अपने वचन के अनुसार अपने दास को शान्ति से जाने दे,"(1) डेमियुर्ज का एक चिह्न था, जिसने उद्धारकर्ता के आने पर अपने स्थान के परिवर्तन को जाना, और बैथस का धन्यवाद किया. वे यह भी दृढ़ करते हैं कि अन्ना के द्वारा, जो सुसमाचार में(2) एक भविष्यद्वक्तिन कही गई है, और जो अपने पति के साथ सात वर्ष रहने के बाद, जब तक उसने उद्धारकर्ता को न देखा तब तक अपने शेष जीवन का सब समय वैधव्य में बिताया, और उसे पहचाना, और सब से उसके विषय बोली, अकामोट सबसे स्पष्ट सूचित हुई, जिसने थोड़ी देर उद्धारकर्ता को उसके साथियों के साथ देखा, और शेष सब समय मध्य स्थान में रहकर, उसके लिये तब तक प्रतीक्षा की जब तक वह फिर आए, और उसे उसके उचित पति को लौटाए. उसका नाम भी उद्धारकर्ता ने सूचित किया, जब उसने कहा, "तौभी बुद्धि अपने बच्चों से धर्मी ठहरती है."(3) यह भी पौलुस ने इन वचनों में किया, "पर सिद्धों में हम बुद्धि की बातें कहते हैं."(4) वे यह भी घोषित करते हैं कि पौलुस ने प्लेरोमा के भीतर के संयोगों का उल्लेख किया है, उन्हें एक के द्वारा दिखाते हुए; क्योंकि, इस जीवन के दाम्पत्य संयोग के विषय लिखते हुए, उसने अपने आप को इस प्रकार व्यक्त किया: "यह एक बड़ा भेद है, पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय कहता हूँ."(5)
5. आगे, वे सिखाते हैं कि प्रभु के चेले यूहन्ना ने 1ले ओग्डोअड को सूचित किया, इन वचनों में अपने आप को व्यक्त करते हुए: प्रभु का चेला यूहन्ना, सब बातों की उत्पत्ति को रखना चाहता हुआ, कि समझाए पिता ने समग्र को कैसे उत्पन्न किया, एक नियम रखता है,--अर्थात् वह जो परमेश्वर से 1ला जन्माया गया, जिस सत्ता को उसने एकजात पुत्र और परमेश्वर दोनों कहा है, जिसमें पिता ने, बीज की रीति से, सब कुछ उत्पन्न किया. उसके द्वारा वचन उत्पन्न हुआ, और उसमें एयोन का समग्र तत्व, जिसे वचन ने स्वयं पीछे रूप दिया. इसलिये, क्योंकि वह बातों की 1ली उत्पत्ति का विवरण करता है, वह अपनी शिक्षा में आरम्भ से ठीक चलता है, अर्थात् परमेश्वर से और वचन से. और वह अपने आप को इस प्रकार व्यक्त करता है: "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था; वही आदि में परमेश्वर के साथ था."(6) सबसे 1ले इन तीन को अलग करके--परमेश्वर, आदि, और वचन--वह उन्हें फिर जोड़ता है, कि उनमें से प्रत्येक की उत्पत्ति को प्रदर्शित करे, अर्थात् पुत्र की और वचन की, और साथ ही एक दूसरे के साथ और पिता के साथ उनके मेल को दिखाए. क्योंकि "आदि" पिता में है, और पिता का है, जबकि "वचन" आदि में है, और आदि का है. तब, बहुत उचित ही, उसने कहा, "आदि में वचन था," क्योंकि वह पुत्र में था; "और वचन परमेश्वर के साथ था," क्योंकि वह आदि था; "और वचन परमेश्वर था," निश्चय ही, क्योंकि जो परमेश्वर से जन्मा है वह परमेश्वर है. "वही आदि में परमेश्वर के साथ था"--यह वाक्य उत्पत्ति के क्रम को खोलता है. "सब कुछ उसके द्वारा बनाया गया, और उसके बिना कुछ नहीं बना;"(7) क्योंकि उसके बाद अस्तित्व में आए सब एयोन के लिये वचन रूप और आदि का कर्ता था.
पर "जो उसमें बनाया गया," यूहन्ना कहता है, "जीवन है."(8) यहाँ फिर उसने संयोग सूचित किया; क्योंकि सब कुछ, उसने कहा, उसके द्वारा बनाया गया, पर उसमें जीवन था. यह, तब, जो उसमें है, उन बातों से अधिक निकट उससे जुड़ा है जो केवल उसके द्वारा बनाई गईं, क्योंकि यह उसके साथ है, और उसके द्वारा विकसित होता है. फिर, जब वह जोड़ता है, "और जीवन मनुष्यों की ज्योति था," इस प्रकार अन्थ्रोपोस का उल्लेख करते हुए, उसने उस एक उक्ति से एक्क्लीसिया को भी सूचित किया, कि केवल एक नाम का उपयोग करके, उनके संयोग के कारण एक दूसरे के साथ उनकी संगति को वह खोल दे. क्योंकि अन्थ्रोपोस और एक्क्लीसिया लोगोस और जोए से उत्पन्न होते हैं. और, उसने जीवन (जोए) को मनुष्यों की ज्योति कहा, क्योंकि वे उसके द्वारा प्रकाशित होते हैं, अर्थात् रचे जाते और प्रगट किए जाते हैं. यह भी पौलुस इन वचनों में घोषित करता है: "क्योंकि जो कुछ प्रगट करता है वह ज्योति है."(9) इसलिये, क्योंकि जोए ने अन्थ्रोपोस और एक्क्लीसिया दोनों को प्रगट किया और जना, वह उनकी ज्योति कही जाती है. इस प्रकार, तब, यूहन्ना ने इन वचनों से और बातों को और 2रे टेट्राड को खोला, लोगोस और जोए, अन्थ्रोपोस और एक्क्लीसिया. और आगे भी, उसने 1ले टेट्राड को भी सूचित किया. क्योंकि, उद्धारकर्ता के विषय भाषण करते हुए और घोषित करते हुए कि प्लेरोमा के परे सब कुछ उससे रूप पाया, वह कहता है कि वह समग्र प्लेरोमा का फल है. क्योंकि वह उसे "ज्योति जो अन्धकार में चमकती है, और जो उसके द्वारा नहीं समझी गई"(10) कहता है, क्योंकि, जब उसने उन सब बातों को रूप दिया जिनकी उत्पत्ति विकार से हुई थी, वह उसके द्वारा जाना नहीं गया.(11) वह उसे पुत्र, और अलेथेया, और जोए, और "देह बना वचन कहता है, जिसकी महिमा," वह कहता है, "हम ने देखी; और उसकी महिमा एकजात के समान थी (पिता के द्वारा उसे दी गई), अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण."(12) (पर यूहन्ना वास्तव में करता है
कहता है यह है: "और वचन देहधारी हुआ, और हमारे बीच रहा; और हम ने उसकी महिमा देखी, जैसी पिता के एकजात की महिमा, अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण."(1)) इस प्रकार, तब, वह [उनके अनुसार] 1ले टेट्राड को स्पष्ट रखता है, जब वह पिता, और खारिस, और मोनोजेनेस, और अलेथेया के विषय बोलता है. इस मार्ग से भी, यूहन्ना 1ले ओग्डोअड का, और जो सब एयोन की माता है उसका, वर्णन करता है. क्योंकि वह पिता, और खारिस, और मोनोजेनेस, और अलेथेया, और लोगोस, और जोए, और अन्थ्रोपोस, और एक्क्लीसिया का उल्लेख करता है. टोलेमयस के विचार ऐसे हैं.(2)
अध्याय नौ.--इन विधर्मियों की अभक्त व्याख्याओं का खण्डन.
1. तुम देखते हो, मेरे मित्र, वह विधि जिसे ये मनुष्य अपने आप को धोखा देने के लिये काम में लाते हैं, शास्त्र का दुरुपयोग करते हुए अपनी पद्धति को उन से सहारा देने का यत्न करते हुए. इस कारण मैंने उनकी अभिव्यक्ति की विधियाँ आगे रखीं, कि इस प्रकार तू उनकी प्रक्रिया की कपटता को, और उनकी भूल की दुष्टता को समझ सके. क्योंकि, 1ले स्थान में, यदि ऊपर के उस ओग्डोअड को रखना यूहन्ना का उद्देश्य होता, तो वह निश्चय उसकी उत्पत्ति के क्रम को बनाए रखता, और निःसन्देह प्राथमिक टेट्राड को 1ले रखता, उनके अनुसार सबसे आदरणीय होने से, और तब 2रे को जोड़ता, कि नामों के क्रम से ओग्डोअड का क्रम प्रदर्शित हो, इतने लम्बे अन्तराल के बाद नहीं, मानो क्षण भर भूल गया हो और फिर बात को स्मरण लाया हो, उसने सब के अन्त में प्राथमिक टेट्राड का उल्लेख किया. अगले स्थान में, यदि वह उनके संयोगों को सूचित करना चाहता, तो वह निश्चय एक्क्लीसिया का नाम न छोड़ता; अन्य संयोगों के विषय, वह पुरुष [एयोन] के उल्लेख से सन्तुष्ट होता (क्योंकि अन्य [एक्क्लीसिया के समान] समझे जा सकते थे), कि सर्वत्र एकरूपता बनी रहे; या यदि वह शेष के संयोगों को गिनता, तो अन्थ्रोपोस की पत्नी की भी घोषणा करता, और शकुन से उसका नाम निकालने के लिये हमें न छोड़ता.
2. इस व्याख्या की कपटता, तब, प्रगट है. क्योंकि जब यूहन्ना, एक परमेश्वर, सर्वशक्तिमान, और एक यीशु मसीह, एकजात, जिसके द्वारा सब कुछ बनाया गया, की घोषणा करता है, कि यह परमेश्वर का पुत्र है, यह एकजात है, यह सब का रचयिता है, यह सच्ची ज्योति है जो हर मनुष्य को प्रकाशित करती है, यह जगत का सृजनहार है, यह वह है जो अपने लोगों के पास आया, यह वह है जो देह बना और हमारे बीच रहा,--ये मनुष्य, एक सम्भाव्य प्रकार की व्याख्या से, इन कथनों को बिगाड़कर, मानते हैं कि उत्पत्ति के अनुसार एक और मोनोजेनेस था, जिसे वे आर्के भी कहते हैं. वे यह भी मानते हैं कि एक और उद्धारकर्ता था, और मोनोजेनेस का पुत्र एक और लोगोस, और प्लेरोमा की पुनःस्थापना के लिये उत्पन्न एक और मसीह. इस प्रकार, उद्धृत हर एक उक्ति को सत्य से मरोड़कर, और नामों का बुरा लाभ लेकर, उन्होंने उन्हें अपनी पद्धति में हटा दिया है; इसलिये, उनके अनुसार, इन सब शब्दों में यूहन्ना प्रभु यीशु मसीह का उल्लेख नहीं करता. क्योंकि यदि उसने पिता, और खारिस, और मोनोजेनेस, और अलेथेया, और लोगोस, और जोए, और अन्थ्रोपोस, और एक्क्लीसिया का नाम लिया है, तो उनकी कल्पना के अनुसार, इस प्रकार बोलकर, उसने प्राथमिक ओग्डोअड का उल्लेख किया है, जिसमें अभी यीशु नहीं था, और यूहन्ना का शिक्षक मसीह नहीं था. पर प्रेरित ने उनके संयोगों के विषय नहीं कहा, पर हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय, जिसे वह परमेश्वर के वचन के रूप में भी मानता है, यह उसने स्वयं प्रगट किया है.
क्योंकि, अपने द्वारा पहले कही गई वचन के विषय बातों का सार करते हुए, वह आगे घोषित करता है, "और वचन देहधारी हुआ, और हमारे बीच रहा." पर, उनकी कल्पना के अनुसार, वचन देह बना ही नहीं, क्योंकि वह प्लेरोमा के बाहर कभी नहीं गया, पर वह उद्धारकर्ता [देह बना] जो विशेष प्रबन्ध से रचा गया [सब एयोन में से], और वचन से बाद के समय का था.
3. तब सीखो, हे मूर्ख मनुष्यों, कि यीशु जिसने हमारे लिये दुःख सहा, और जो हमारे बीच रहा, स्वयं परमेश्वर का वचन है. क्योंकि यदि एयोन में से कोई और हमारे उद्धार के लिये देह बनता, तो सम्भव था कि प्रेरित किसी और के विषय बोलता. पर यदि पिता का वचन जो उतरा वही है जो ऊपर भी गया, अर्थात् एकमात्र परमेश्वर का एकजात पुत्र, जो पिता की सुइच्छा के अनुसार मनुष्यों के लिये देह बना, तो प्रेरित निश्चय किसी और के विषय नहीं बोलता, न किसी ओग्डोअड के विषय, पर हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय. क्योंकि, उनके अनुसार, वचन पहले देह बना नहीं. क्योंकि वे मानते हैं कि उद्धारकर्ता ने एक प्राणमय शरीर लिया, जो अकथनीय विधान के द्वारा विशेष प्रबन्ध के अनुसार रचा गया, कि दृश्य और स्पर्शयोग्य हो. पर देह वह है जो आदम के लिये परमेश्वर ने धूल से प्राचीन काल में रची, और यही है जिसके विषय यूहन्ना ने घोषित किया कि परमेश्वर का वचन यही बना. इस प्रकार उनका प्राथमिक और 1ला जन्मा ओग्डोअड व्यर्थ किया जाता है. क्योंकि, लोगोस, और मोनोजेनेस, और जोए, और फोस, और सोरेर, और क्रिस्टुस, और परमेश्वर का पुत्र, और जो हमारे लिये देहधारी हुआ, एक ही और वही सिद्ध हुए हैं, इसलिये उन्होंने जो ओग्डोअड बनाया है वह तुरन्त टुकड़े टुकड़े हो जाता है. और जब यह नाश किया जाता है,
उनकी सारी पद्धति नाश में डूब जाती है,--एक पद्धति जिसे वे झूठ से अस्तित्व में स्वप्न देखते हैं, और इस प्रकार शास्त्र को हानि पहुँचाते हैं, अपनी निज कल्पना को बनाते हुए.
4. फिर, इधर उधर बिखरी [शास्त्र में] उक्तियों और नामों का एक समूह बटोरकर, वे उन्हें, जैसा हम पहले कह चुके हैं, स्वाभाविक अर्थ से अस्वाभाविक अर्थ की ओर मरोड़ते हैं. ऐसा करते हुए वे उन लोगों के समान चलते हैं जो अपनी पसन्द की किसी भी कल्पना को आगे रखते हैं, और तब होमर की कविताओं में से उन्हें सहारा देने का(1) यत्न करते हैं, कि अज्ञानी कल्पना करें कि होमर ने वास्तव में उस कल्पना से सम्बन्धित पद्य रचे, जो वास्तव में नया ही बनाया गया है; और बहुत से लोग पद्यों के नियम से बने क्रम से इतनी दूर तक ले जाए जाते हैं कि सन्देह करें कि होमर ने उन्हें रचा हो या नहीं. इस प्रकार(2) का निम्नलिखित अंश है, जहाँ कोई, हेर्क्युलीस को यूरिस्थेयुस के द्वारा अधोलोक के कुत्ते के पास भेजा गया बताते हुए, इन होमर के पद्यों के द्वारा ऐसा करता है,--इन्हें दृष्टान्त के रूप में उद्धृत करने में कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि उसी प्रकार का प्रयत्न दोनों में दिखाई देता है:--
"इस प्रकार कहकर, अपने घर से गहरी कराह के साथ भेजा."-- ओड., एक्स. 76. "वीर हेर्क्युलीस बड़े कामों से परिचित."--ओड., एक्सएक्सआई. 26. यूरिस्थेयुस, स्थेनेलस का पुत्र, पेर्सेयुस से उत्पन्न."--इल., एक्सआईएक्स. 123. "कि वह उदास प्लूटो के कुत्ते को एरेबुस से लाए."--इल., वीआईआईआई. 368. "और वह पर्वत पर पले सिंह के समान बल के भरोसे आगे बढ़ा."--ओड., वीआई. 130. "नगर के बीच वेग से, जबकि उसके सब मित्र पीछे चले."--इल., एक्सएक्सआईवी. 327. "कुमारियाँ भी, और जवान भी, और बहुत सहनेवाले बूढ़े भी."--ओड., एक्सआई. 38. "मृत्यु की ओर आगे जाते हुए के समान उसके लिये कटुता से विलाप करते हुए."--इल., एक्सएक्सआईवी. 328. "पर मर्क्यूरी और नीली आँखों वाली मिनर्वा ने उसे ले चला."--ओड., एक्सआई. 626. "क्योंकि वह अपने भाई के मन को जानती थी, वह शोक से कैसे श्रम कर रहा था."--इल., आईआई. 409.
अब, सरल मन वाला कौन मनुष्य, मैं पूछता हूँ, ऐसे पद्यों से यह सोचने को न ले जाया जाएगा कि होमर ने उन्हें सूचित विषय के विषय वास्तव में ऐसा रचा? पर जो होमर की रचनाओं से परिचित है वह पद्यों को तो पहचानेगा, पर उस विषय को नहीं जिस पर वे लगाए गए हैं, यह जानकर कि उनमें से कुछ यूलिसिस के विषय कहे गए, कुछ हेर्क्युलीस के विषय, कुछ और प्रियाम के विषय, और कुछ फिर मेनेलाउस और अगमेम्नोन के विषय. पर यदि वह उन्हें लेता है और प्रत्येक को उसके उचित स्थान पर लौटाता है, तो वह प्रश्नगत वर्णन को तुरन्त नाश कर देता है. इसी रीति वह भी जो बपतिस्मा के द्वारा पाए हुए सत्य के नियम को अपने हृदय में अपरिवर्तनीय(3) रखता है, शास्त्र से लिए नामों, उक्तियों, और दृष्टान्तों को निश्चय पहचानेगा, पर इन मनुष्यों के उनके निन्दापूर्ण उपयोग को किसी रीति न मानेगा. क्योंकि, रत्नों को वह मानेगा, राजा की समानता के बदले लोमड़ी को वह निश्चय न लेगा. पर जब उसने उद्धृत हर एक उक्ति को उसके उचित स्थान पर लौटा दिया है, और उसे सत्य की देह के साथ बैठा दिया है, तब वह इन विधर्मियों की कल्पना को खोल देगा, और निराधार सिद्ध करेगा.
5. पर क्योंकि इस प्रदर्शन को समाप्ति की चोट(4) सिद्ध हो सके वह कमी है, कि कोई, उनकी हँसी को अन्त तक ले जाकर, तब तुरन्त एक युक्ति जोड़ सके जो उसे गिरा दे, हम ने अच्छा ठहराया कि सबसे 1ले यह दिखाएँ, इस कथा के पिता किन बातों में आपस में भिन्न हैं, मानो वे भ्रान्ति की भिन्न आत्माओं से प्रेरित हों. क्योंकि यही तथ्य एक पूर्व प्रमाण बनाता है कि कलीसिया के द्वारा प्रचारित सत्य अचल है,(5) और इन मनुष्यों के सिद्धान्त केवल झूठ का जाल हैं.
अध्याय दस.--सारे जगत में कलीसिया के विश्वास की एकता.
1. कलीसिया, यद्यपि हमारे उस सारे जगत में, पृथ्वी के छोरों तक भी, बिखरी हुई है, प्रेरितों और उनके चेलों से यह विश्वास पाया है: [वह विश्वास करती है] एक परमेश्वर में, सर्वशक्तिमान पिता, स्वर्ग, और पृथ्वी, और समुद्र, और जो कुछ उन में है उसका बनानेवाला; और एक मसीह यीशु में, परमेश्वर का पुत्र, जो हमारे उद्धार के लिये देहधारी हुआ; और पवित्र आत्मा में, जिसने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा परमेश्वर के प्रबन्धों(6) की घोषणा की, और आगमनों की, और कुँवारी से जन्म की, और दुःख की, और मरे हुओं में से जी उठने की, और प्रिय मसीह यीशु, हमारे प्रभु, के शरीर में स्वर्ग पर चढ़ने की, और पिता की महिमा में स्वर्ग से उसकी [भावी] प्रकटता की "सब कुछ एक में इकट्ठा करने के लिये,"(7) और समस्त मानव जाति की सब देह को नया जिलाने के लिये, कि मसीह यीशु, हमारे प्रभु, और परमेश्वर, और उद्धारकर्ता, और राजा के लिये, अदृश्य पिता की इच्छा के अनुसार, "हर एक घुटना झुके, स्वर्ग की वस्तुओं का,, और पृथ्वी की वस्तुओं का, और पृथ्वी के नीचे की वस्तुओं का, और हर एक जीभ अंगीकार करे"(8) उसके प्रति, और वह सब के प्रति न्याय का न्याय करे; कि वह "आत्मिक दुष्टताओं को,"(9) भेजे और
उन स्वर्गदूतों को जिन्होंने उल्लंघन किया और धर्मत्यागी हुए, मनुष्यों में अभक्त, और अधर्मी, और दुष्ट, और अपवित्र के साथ, अनन्त आग में; पर अपने अनुग्रह के प्रयोग में, धर्मी, और पवित्र, और जिन्होंने उसकी आज्ञाएँ मानी हैं, और उसके प्रेम में स्थिर रहे हैं, उन पर अमरता दे सकता है, कुछ आरम्भ से [अपने मसीही मार्ग के], और कुछ [तिथि के] अपने पश्चात्ताप से, और उन्हें अनन्त महिमा से घेर सकता है.
2. जैसा मैं पहले देख चुका हूँ, कलीसिया, इस प्रचार और इस विश्वास को पाकर, यद्यपि सारे जगत में बिखरी है, तौभी, मानो केवल एक घर में रहती हो, उसे यत्न से बनाए रखती है. वह इन [शिक्षा के] बातों को भी मानती है, मानो उसका केवल एक प्राण हो, और एक ही हृदय, और वह उन्हें प्रचार करती है, और उन्हें सिखाती है, और उन्हें सौंपती है, पूर्ण मेल से, मानो उसके पास केवल एक मुख हो. क्योंकि, जगत की भाषाएँ भिन्न हैं, तौभी परम्परा का अर्थ एक ही और वही है. क्योंकि जर्मनी में लगाई गई कलीसियाएँ कुछ भिन्न नहीं मानतीं और न सौंपतीं, न स्पेन की, न गाल की, न पूर्व की, न मिस्र की, न लीबिया की, न वे जो जगत के मध्य क्षेत्रों में(1) स्थापित की गई हैं. पर जैसे सूर्य, परमेश्वर की वह सृष्टि, सारे जगत में एक ही और वही है, वैसे ही सत्य का प्रचार सर्वत्र चमकता है, और सत्य के ज्ञान तक आना चाहने वाले सब मनुष्यों को प्रकाशित करता है. कलीसियाओं के शासकों में से कोई, वाक्पटुता के विषय वह कितना ही ऊँचा वरदान पाया हो, इन से भिन्न शिक्षाएँ न सिखाएगा (क्योंकि गुरु से बड़ा कोई नहीं); और दूसरी ओर, अभिव्यक्ति की शक्ति में कमी वाला परम्परा को हानि न पहुँचाएगा. क्योंकि विश्वास सदा एक ही और वही होने से, जो उसके विषय बहुत लम्बाई से भाषण कर सकता है, उसमें कुछ नहीं जोड़ता, और जो थोड़ा ही कह सकता है उसे घटाता नहीं.
3. यह नहीं निकलता कि क्योंकि मनुष्य अधिक और कम मात्रा की बुद्धि से सम्पन्न हैं, इसलिये वे [विश्वास के] विषय को ही बदलें, और इस ब्रह्माण्ड के रचनेवाले, बनानेवाले, और पालनेवाले के सिवा किसी और परमेश्वर की कल्पना करें, (मानो वह उनके लिये पर्याप्त(2) न हो), या किसी और मसीह की, या किसी और एकजात की.
पर उक्त तथ्य केवल यह सूचित करता है, कि कोई [दूसरे से अधिक ठीक] उन बातों का अर्थ निकाल सकता है जो दृष्टान्तों में कही गई हैं, और उन्हें विश्वास की सामान्य योजना के अनुकूल कर सकता है; और मनुष्य के उद्धार से जुड़ी परमेश्वर की क्रिया और प्रबन्ध को [विशेष स्पष्टता से] समझा सकता है; और दिखा सकता है कि परमेश्वर ने उन स्वर्गदूतों के धर्मत्याग के विषय दीर्घसहन दिखाया जिन्होंने उल्लंघन किया, और मनुष्यों की अनाज्ञाकारिता के विषय भी; और रख सकता है कि एक ही और वही परमेश्वर ने कुछ बातें कालिक और कुछ अनन्त, कुछ स्वर्गीय और अन्य पार्थिव क्यों बनाईं; और समझ सकता है कि किस कारण परमेश्वर, अदृश्य होते हुए भी, भविष्यद्वक्ताओं को एक रूप के अधीन नहीं, पर भिन्न व्यक्तियों को भिन्न रूप में अपने आप को प्रगट हुआ; और दिखा सकता है कि मानवजाति को एक से अधिक वाचाएँ क्यों दी गईं; और सिखा सकता है कि इन वाचाओं में से प्रत्येक का विशेष स्वभाव क्या था; और खोज सकता है कि किस कारण "परमेश्वर(3) ने हर मनुष्य(4) को अविश्वास में बन्द किया, कि वह सब पर दया करे;" और कृतज्ञता से(5) वर्णन कर सकता है कि किस कारण परमेश्वर का वचन देह बना और दुःख सहा; और बता सकता है कि परमेश्वर के पुत्र का आगमन इन अन्तिम समयों में, अर्थात् अन्त में, आरम्भ में [जगत के] नहीं, क्यों हुआ; और खोल सकता है कि अन्त [स्वयं] के विषय और आने वाली बातों के विषय शास्त्र में क्या है; और मौन न रह सकता है कि परमेश्वर ने अन्यजातियों को, जिनके उद्धार की निराशा थी, सह-वारिस, और उसी देह के, और पवित्र लोगों के सहभागी कैसे बनाया; और भाषण कर सकता है कि "यह मरणशील देह अमरता को पहिन लेगी, और यह नाशवान अविनाश को पहिन लेगा;"(6) कैसे; और प्रचार कर सकता है कि [परमेश्वर] किस अर्थ में कहता है, "'वह एक लोग है जो लोग न था; और वह प्रिय है जो प्रिय न थी;"(7) और किस अर्थ में वह कहता है कि "उस निर्जन की सन्तान उस से अधिक हैं जिसके पति था."(8) क्योंकि इन बातों के विषय, और ऐसी ही अन्य बातों के विषय, प्रेरित पुकारता है: "ओह! परमेश्वर की बुद्धि और ज्ञान दोनों के धन की गहराई; उसके न्याय कितने अगम्य हैं, और उसके मार्ग कैसे अज्ञेय हैं!"(9) पर [कहा गया श्रेष्ठ कौशल] इसमें नहीं पाया जाता, कि कोई, सृजनहार और रचनेवाले [जगत के] से परे, एक भटके एयोन की एन्थुमेसिस की, उनकी माता और उसकी माता की, कल्पना करे, और इस प्रकार निन्दा की ऐसी ऊँचाई तक बढ़े; और न यह इसमें है, कि वह फिर झूठ से कल्पना करे, इस [कल्पित सत्ता] के ऊपर, एक प्लेरोमा जिसे कभी तीस रखने वाला माना गया, और कभी एयोन की अनगिनत जाति, जैसा ये शिक्षक मानते हैं जो सचमुच की ईश्वरीय ज्ञान से रहित हैं; जबकि कैथोलिक कलीसिया pos-
sesses सारे जगत में एक ही और वही विश्वास रखती है, जैसा हम पहले कह चुके हैं.
अध्याय ग्यारह.--वैलेंटिनुस की धारणाएँ, उसके चेलों की और औरों की.
1. अब हम उन विधर्मियों की अस्थिर धारणाओं को देखें (क्योंकि उन में दो या तीन हैं), वे उन्हीं बातों के विवरण में कैसे सहमत नहीं होते, पर बातों में और नामों में, परस्पर विरोध की धारणाएँ रखते हैं. उन में 1ला,(1) वैलेंटिनुस, जिसने "ग्नोस्टिक" कहे गए विधर्म के सिद्धान्तों को अपनी निज पाठशाला के विशेष स्वभाव के अनुकूल किया, इस प्रकार सिखाया: उसने माना कि एक ड्याड (द्विगुण सत्ता) है, जो किसी नाम से अकथ्य है, जिसका एक भाग अर्रेतुस (अकथ्य) कहा जाए, और दूसरा सिगे (मौन). पर इस ड्याड से एक 2रा उत्पन्न हुआ, जिसका एक भाग वह पाटेर कहता है, और दूसरा अलेथेया. इस टेट्राड से, फिर, लोगोस और जोए, अन्थ्रोपोस और एक्क्लीसिया उठे. ये प्राथमिक ओग्डोअड को बनाते हैं. आगे वह कहता है कि लोगोस और जोए से दस शक्तियाँ उत्पन्न हुईं, जैसा हम पहले कह चुके हैं. पर अन्थ्रोपोस और एक्क्लीसिया से बारह निकले, जिन में से एक शेष से अलग होकर, और अपनी मूल दशा से गिरकर, ब्रह्माण्ड के शेष को(2) उत्पन्न किया. उसने होरोस नाम की दो सत्ताओं की भी कल्पना की, जिन में से एक का स्थान बैथस और प्लेरोमा के शेष के बीच है, और रचे गए एयोन को अरचित पिता से विभाजित करता है, जबकि दूसरा उनकी माता को प्लेरोमा से अलग करता है. मसीह भी प्लेरोमा के भीतर के एयोन से उत्पन्न नहीं हुआ, पर उस माता के द्वारा जन्माया गया जो उस से निकाल दी गई थी, उत्तम बातों की स्मृति के कारण, पर एक प्रकार की छाया के बिना नहीं. वह, सचमुच, पुरुष होने से, छाया को अपने से काटकर, प्लेरोमा को लौटा; पर उसकी माता छाया के साथ छोड़ी गई, और अपने आत्मिक तत्व से वंचित होकर, एक और पुत्र को जनी, अर्थात् डेमियुर्ज, जिसे वह उन सब बातों का सर्वोच्च शासक भी कहता है जो उसके अधीन हैं.
वह यह भी दृढ़ करता है कि डेमियुर्ज के साथ एक बाएँ हाथ की शक्ति उत्पन्न हुई, इस विशेष बात में वह उन से सहमत है जो झूठ से ग्नोस्टिक कहे जाते हैं, जिन के विषय to हम को अभी बोलना है. कभी, फिर, वह मानता है कि यीशु उससे उत्पन्न हुआ जो उनकी माता से अलग किया गया और शेष से जोड़ा गया, अर्थात् थेलेतुस से, कभी प्लेरोमा में लौटनेवाले से उत्पन्न के रूप में, अर्थात् मसीह से; और और समयों में अन्थ्रोपोस और एक्क्लीसिया से निकला हुआ. और वह घोषित करता है कि पवित्र आत्मा अलेथेया(5) के द्वारा एयोन के निरीक्षण और फलवन्त करने के लिये उत्पन्न हुआ, उन में अदृश्य रूप से प्रवेश करके, और इस मार्ग से एयोन ने सत्य के पौधे जने.
2. सेकुन्दुस फिर दृढ़ करता है कि प्राथमिक ओग्डोअड एक दाहिने हाथ और एक बाएँ हाथ के टेट्राड से बना है, और सिखाता है कि इन में से एक ज्योति कहलाता है, और दूसरा अन्धकार. पर वह मानता है कि जो शक्ति शेष से अलग हुई और गिर पड़ी, वह तीस एयोन से सीधे नहीं निकली, पर उनके फलों से.
3. एक और है,(4) जो उन में प्रसिद्ध शिक्षक है, और जो कुछ और ऊँचे तक पहुँचने को संघर्ष करता है, और एक प्रकार के ऊँचे ज्ञान तक पहुँचने को, प्राथमिक टेट्राड को इस प्रकार समझाया है: [वह कहता है] सब से पहले एक प्रोआर्के था, जो सब विचार, वचन, और नामकरण से ऊपर है, जिसे मैं मोनोटेस (एकत्व) कहता हूँ. इस मोनोटेस के साथ एक शक्ति है, जिसे मैं फिर हेनोटेस (एकरूपता) कहता हूँ. यह हेनोटेस और मोनोटेस, एक होकर, उत्पन्न हुए, पर [अपने से अलग, एक निकास के रूप में] उत्पन्न करने की रीति नहीं, सब का आरम्भ, एक बुद्धिमान, अजन्मी, और अदृश्य सत्ता, जिस आरम्भ को भाषा "मोनाड" कहती है. इस मोनाड के साथ उसी सार की एक शक्ति सह-अस्तित्व रखती है, जिसे मैं फिर हेन (एक) कहता हूँ. ये शक्तियाँ तब--मोनोटेस, और हेनोटेस, और मोनास, और हेन--एयोन के शेष समूह को उत्पन्न हुईं.
4. इयू, इयू! फेयु, फेयु!--क्योंकि नाम गढ़ने के ऐसे साहस की ऊँचाई पर हम ये दुःखान्त के विस्मयबोधक अच्छी रीति कह सकते हैं, जैसा उसने बिना लज्जा दिखाया, अपनी झूठ की पद्धति के लिये एक नामकरण रचते हुए. क्योंकि जब वह घोषित करता है: सब से पहले एक प्रोआर्के है, सब विचार से ऊपर, जिसे मैं मोनोटेन कहता हूँ; और फिर, इस मोनोटेस के साथ एक शक्ति सह-अस्तित्व रखती है जिसे मैं भी हेनोरेस कहता हूँ,--यह सबसे प्रगट है कि वह मानता है कि कही गई बातें उसकी निज कल्पना हैं, और उसने स्वयं अपनी बातों की योजना को नाम दिए हैं, जो पहले किसी और के द्वारा सुझाए नहीं गए थे. यह भी प्रगट है कि वही है जिसके पास ये नाम गढ़ने का पर्याप्त साहस था; इसलिये, यदि वह जगत में प्रकट न होता, तो सत्य अभी भी नाम से रहित होता. पर, उस दशा में, उसी विषय को लेते हुए, निम्नलिखित रीति नाम लगाने से किसी और को कुछ नहीं रोकता: वहाँ(5) एक प्रोआर्के है, राजसी, सब विचार से ऊपर, एक शक्ति जो हर अन्य तत्व से पहले है, और हर दिशा में अन्तरिक्ष में फैली हुई. पर उसके साथ एक शक्ति है जिसे मैं एक लौकी कहता हूँ; और साथ
इस लौकी के साथ एक शक्ति है जिसे मैं फिर अत्यन्त-शून्यता कहता हूँ. यह लौकी और शून्यता, क्योंकि वे एक हैं, एक फल उत्पन्न हुईं (तौभी केवल उत्पन्न नहीं हुईं, कि अपने से अलग हों), सर्वत्र दृश्य, खाने योग्य, और स्वादिष्ट, जिस फल को फल-भाषा एक खीरा कहती है. इस खीरे के साथ उसी सार की एक शक्ति है, जिसे मैं फिर एक खरबूजा कहता हूँ. ये शक्तियाँ, लौकी, अत्यन्त-शून्यता, खीरा, और खरबूजा, वैलेंटिनुस के शेष उन्मत्त खरबूजों की भीड़ को जनीं.(1) क्योंकि यदि ब्रह्माण्ड के विषय प्रयुक्त वह भाषा प्राथमिक टेट्राड पर बदलना उचित है, और यदि कोई अपनी इच्छा से नाम नियुक्त कर सकता है, तो इन नामों को अपनाने से हमें कौन रोकेगा, [औरों से] बहुत अधिक विश्वसनीय होने से, और सामान्य प्रयोग में होने से, और सब के द्वारा समझे जाने से?
5. और औरों ने, तौभी, अपने प्राथमिक और 1ले जन्मे ओग्डोअड को निम्नलिखित नामों से पुकारा है: 1ला, प्रोआर्के; तब अनेन्नोएटोस; 3सरे रूप में, अर्रेतोस; और 4थे रूप में, अओराटोस. तब, 1ले से, प्रोआर्के से, 1ले और 5वें स्थान में, आर्के उत्पन्न हुआ; अनेन्नोएटोस से, 2रे और 6ठे स्थान में, अकाटालेप्तोस; अर्रेतोस से, 3रे और 7वें स्थान में, अनोनोमास्टोस; और अओराटोस से, 4थे और 8वें स्थान में, अगेन्नेटोस. यह 1ले ओग्डोअड का प्लेरोमा है. वे मानते हैं कि ये शक्तियाँ बैथस और सिगे से पहले थीं, कि सिद्धों से अधिक सिद्ध, और स्वयं ग्नोस्टिकों से अधिक जाननेवाली दिखाई दें To. इन व्यक्तियों को कोई न्याय से इस प्रकार पुकार सकता है: "हे तुच्छ सोफिस्टो!" क्योंकि, बैथस के विषय भी, उन में बहुत और विरोध की धारणाएँ हैं. क्योंकि some/declare उसे संगिनी रहित, और न पुरुष न स्त्री, और वास्तव में कुछ भी नहीं; जबकि और दृढ़ करते हैं कि वह पुरुष-स्त्री है, उसे उभयलिंगी का स्वभाव देते हुए; और, फिर, सिगे को उसे पत्नी के रूप में देते हैं, कि इस प्रकार 1ला संयोग बने.
अध्याय बारह.--टोलेमी के अनुयायियों और कोलोर्बासुस के अनुयायियों की शिक्षाएँ.
1. पर टोलेमी के अनुयायी कहते हैं(2) कि उसके [बैथोस] दो संगिनियाँ हैं, जिन्हें वे डियाथेसेस (भाव) भी कहते हैं, अर्थात्, एन्नोए और थेलेसिस. क्योंकि, जैसा वे दृढ़ करते हैं, उसने कुछ उत्पन्न करने का विचार पहले 1 रचा, और तब उस प्रभाव के लिये चाहा. इसलिये, फिर, ये दो भाव, या शक्तियाँ, एन्नोया और थेलेसिस, मानो अपने बीच समागम करके, मोनोजेनेस और अलेथेया की उत्पत्ति संयोग के अनुसार हुई. ये दोनों पिता के दो भावों के चिह्न और प्रतिमा बनकर निकले,--अदृश्यों के दृश्य प्रतिनिधि,--नौस (अर्थात्, मोनोजेनेस) थेलेसिस का, और अलेथेया एन्नोया का, और इसलिये थेलेसिस से निकली प्रतिमा पुरुष थी,(3) जबकि एन्नोया से निकली स्त्री थी. इस प्रकार थेलेसिस (इच्छा) एन्नोया (विचार) की एक क्षमता के समान हो गई. क्योंकि एन्नोया निरन्तर सन्तान की लालसा करती थी; पर जिसकी वह इच्छा करती थी उसे वह अपने आप नहीं जन सकती थी. पर जब थेलेसिस की शक्ति (इच्छा की क्षमता) उस पर आई, तब उसने उसे जना जिस पर वह बैठी थी.
2. ये कल्पित सत्ताएँ(4) (होमर के जोव के समान, जो अकिल्लेस का सम्मान करने और यूनानियों की संख्या को नाश करने की युक्तियाँ रचते हुए चिन्ता से नींद रहित रात बिताता दिखाया गया है(5)) तुम्हें, मेरे प्रिय मित्र, ब्रह्माण्ड के परमेश्वर से अधिक ज्ञानवाली न लगेंगी. वह, सोचते ही, जो उसने चाहा है उसे करता भी है; और चाहते ही, जो उसने चाहा है उसे सोचता भी है; जब वह चाहता है तब सोचता है, और जब वह सोचता है तब चाहता है, क्योंकि वह समग्र विचार है, [समग्र इच्छा, समग्र मन, समग्र ज्योति,](6) समग्र आँख, समग्र कान, सब अच्छी बातों का एक ही सम्पूर्ण सोता.
3. पर उन में से जो अभी कही गई व्यक्तियों से अधिक निपुण गिने जाते हैं, कहते हैं कि 1ला ओग्डोअड क्रम से उत्पन्न नहीं हुआ, कि एक एयोन दूसरे के द्वारा भेजा जाए, पर सब(7) एयोन प्रोपेटर और उसकी एन्नोया के द्वारा एक साथ अस्तित्व में लाए गए. वह (कोलोर्बासुस) इसे इतने भरोसे से दृढ़ करता है मानो वह उनके जन्म पर सहायक रहा हो. इसलिये, वह और उसके अनुयायी मानते हैं कि अन्थ्रोपोस और एक्क्लीसिया उत्पन्न नहीं हुए,(8) जैसा और मानते हैं, लोगोस और जोए से; पर, इसके विपरीत, लोगोस और जोए अन्थ्रोपोस और एक्क्लीसिया से. पर वे इसे दूसरे रूप में व्यक्त करते हैं, इस प्रकार: जब प्रोपेटर ने कुछ उत्पन्न करने का विचार रचा, उसने पिता का नाम पाया. पर क्योंकि जो उसने उत्पन्न किया वह सत्य था, उसका नाम अलेथेया रखा गया. फिर, जब वह अपने आप को प्रगट करना चाहता था, यह अन्थ्रोपोस कहा गया. अन्त में, जब उसने उन्हें उत्पन्न किया जिनके विषय उसने पहले सोचा था, इन का नाम एक्क्लीसिया रखा गया. अन्थ्रोपोस ने, बोलकर, लोगोस को रचा: यह 1ला जन्मा पुत्र है. पर जोए लोगोस के पीछे आई; और इस प्रकार 1ला ओग्डोअड पूरा हुआ.
4. उद्धारकर्ता के विषय अपने बीच भी उनका बहुत झगड़ा है. क्योंकि कुछ
वे स्थिर करते हैं कि वह सब में से रचा गया; इस कारण वह यूदोकेतोस कहलाया, क्योंकि सारी प्लेरोमा उसके द्वारा पिता की महिमा करने में प्रसन्न हुई। पर दूसरे यह कहते हैं कि वह केवल उन दस एयोन से उत्पन्न हुआ जो लोगोस और जोए से निकले, और इस कारण वह लोगोस और जोए कहलाया, इस प्रकार पूर्वजों के नामों को सुरक्षित रखते हुए।(1) फिर दूसरे यह दृढ़ करते हैं कि उसका होना उन बारह एयोन से हुआ जो अन्थ्रोपोस और एक्क्लेसिया की सन्तान थे; और इस कारण वह अपने को मनुष्य का पुत्र मानता है, क्योंकि वह अन्थ्रोपोस का वंशज है। और भी दूसरे यह कहते हैं कि वह मसीह और पवित्र आत्मा से उत्पन्न हुआ, जो प्लेरोमा की सुरक्षा के लिए आगे लाए गए; और इस कारण वह मसीह कहलाया, इस प्रकार उस पिता की उपाधि को सुरक्षित रखते हुए जिसके द्वारा वह उत्पन्न हुआ। और उनके बीच अभी और हैं जो यह घोषित करते हैं कि समस्त का प्रोपटोर, प्रोआर्खे, और प्रोअनेन्नोएतोस अन्थ्रोपोस कहलाता है; और यही वह बड़ा और गूढ़ भेद है, अर्थात् वह सामर्थ्य जो और सब से ऊपर है और सब को अपनी गोद में समेटे है, अन्थ्रोपोस कही जाती है; इस कारण उद्धारकर्ता अपने को "मनुष्य का पुत्र" कहता है।
अध्याय तेरह.--मार्कुस की छलपूर्ण कलाएँ और दुष्ट आचरण।
आई. पर(2) इन विधिविरोधी उपदेशकों में एक और है, नाम मार्कुस, जो अपने गुरु से आगे बढ़ने का घमण्ड करता है। वह जादुई छल में पूर्ण निपुण है, और इस उपाय से बहुत से पुरुषों को, और थोड़ी नहीं अनेक स्त्रियों को, अपनी ओर खींचकर, उसने उन्हें अपने साथ जुड़ने को प्रेरित किया है, मानो वह सबसे बड़े ज्ञान और सिद्धता वाला हो, और ऊपर के अदृश्य तथा अकथनीय क्षेत्रों से सर्वोच्च सामर्थ्य पाया हो। इस प्रकार ऐसा दिखता है कि वह सचमुच मसीहविरोधी का अग्रदूत हो। क्योंकि अनाक्सिलाउस(3) की विदूषकता को तथाकथित मागियों की चतुराई से जोड़कर, वह अपने निर्बुद्धि और फटे मस्तिष्क के अनुयायियों की दृष्टि में इन उपायों से आश्चर्यकर्म करता हुआ माना जाता है।
2. दाखरस से मिली हुई कटोरी को प्रतिष्ठित करने का नाटक करते हुए(4), और आह्वान के वचन को बहुत लम्बा खींचते हुए, वह उन्हें बैंगनी और लाल रंग देने की युक्ति करता है, ताकि सब से श्रेष्ठों में से एक खारिस,(5) उसके आह्वान के द्वारा उस कटोरी में अपना रक्त टपकाती हुई समझी जाए, और इस प्रकार उपस्थित लोग उस कटोरी का स्वाद लेने में आनन्दित हों, जिससे ऐसा करने पर इस जादूगर द्वारा दिखाई गई खारिस उनमें भी बहे। फिर, मिली हुई कटोरी स्त्रियों को देकर, वह उन्हें अपनी उपस्थिति में इन्हें प्रतिष्ठित करने को कहता है। जब यह हो चुका, तब वह स्वयं एक और कटोरी निकालता है, जो उस मोहित स्त्री ने प्रतिष्ठित की है उससे बहुत बड़ी,) और स्त्री द्वारा प्रतिष्ठित छोटी कटोरी से अपनी आगे लाई हुई कटोरी में उंडेलते हुए, उसी समय ये शब्द बोलता है: "वह Chaffs जो सब से पहले है, और जो सब ज्ञान और वचन से परे है, तेरे भीतरी मनुष्य को भरे, और अच्छी मिट्टी में जैसे, तेरे भीतर सरसों का दाना बोकर तेरे में अपने ज्ञान को बढ़ाए।" ऐसे और कुछ शब्द दोहराकर, और इस प्रकार उस दीन स्त्री को [उन्माद तक] उकसाकर, जब बड़ी कटोरी छोटी से भरी हुई, यहाँ तक कि उसमें से पाई हुई वस्तु से उफनती हुई दिखती है, तब वह आश्चर्यकर्ता दिखाई देता है। और ऐसे कई काम पूरे करके उसने बहुतों को पूरी तरह धोखा दिया है, और उन्हें अपने पीछे खींच लिया है।
3. यह सम्भव सा दिखता है कि इस मनुष्य के पास अपनी परिचित आत्मा के रूप में एक दुष्टात्मा है, जिसके द्वारा वह भविष्यद्वाणी कर सकता हुआ दिखता है,(6) और जितनों को वह अपनी खारिस के भागी होने के योग्य गिनता है उन्हें भी स्वयं भविष्यद्वाणी करने की सामर्थ्य देता है। वह विशेष करके स्त्रियों पर, और ऐसी स्त्रियों पर जो अच्छे कुल की, सुन्दर वस्त्र वाली, और बड़े धन वाली हैं, अपने को लगाता है, जिन्हें वह बार बार अपने पीछे खींचने के लिए ऐसी मोहक बातों से बुलाता है: "मैं तुझे अपनी खारिस की भागी बनाने को उत्सुक हूँ, क्योंकि सब के पिता तेरे दूत को अपने मुख के सामने निरन्तर देखते हैं। अब तेरे दूत का स्थान हमारे बीच है:(7) हमें एक होना उचित है। मुझ से और मेरे द्वारा पहले [Chaffs का वरदान] ग्रहण कर। अपने को उस दुल्हन के समान सजा जो अपने दूल्हे की बाट जोहती है, ताकि तू वही हो जो मैं हूँ, और मैं वही होऊँ जो तू है। अपनी विवाह-कोठरी में ज्योति के अंकुर को स्थापित कर। मुझ से एक पति को ग्रहण कर, और उसकी ग्रहण करने वाली हो, जब कि तू उसके द्वारा ग्रहण की जाती है। देख, खारिस तुझ पर उतरी है; अपना मुँह खोल और भविष्यद्वाणी कर।" जब स्त्री उत्तर देती है, "मैंने कभी किसी समय भविष्यद्वाणी नहीं की, और मैं नहीं जानती भविष्यद्वाणी कैसे करूँ;" तब दूसरी बार कुछ आह्वानों में लगकर, अपनी मोहित पीड़िता को चकित करने के लिए, वह उससे कहता है, "अपना मुँह खोल, जो कुछ तुझे सूझे वह बोल, और तू भविष्यद्वाणी करेगी।" तब वह, इन बातों से व्यर्थ फूलकर और ऊँची होकर, और इस आशा से प्राण में बहुत उत्तेजित होकर कि भविष्यद्वाणी करने वाली वही है, उसका हृदय [भाव से] जोर से धड़कता हुआ, आवश्यक साहस की मात्रा तक पहुँचता है, और जैसा होता है. उसे सूझने वाली कुछ व्यर्थ बात को वह निकम्मी और निर्लज्ज रीति से बोलती है, ऐसी जो ex-
pected एक खाली आत्मा से तपे हुए जन से अपेक्षित हो सकती है। (इसके विषय में मुझ से श्रेष्ठ एक व्यक्ति ने देखा है कि प्राण खाली वायु से तपने पर साहसी भी है और निर्लज्ज भी।) तब से वह अपने को एक भविष्यद्वक्तिन गिनती है, और मार्कुस का धन्यवाद करती है कि उसने उसे अपनी Chaffs में से दिया। तब वह उसे प्रतिफल देने का यत्न करती है, केवल अपनी सम्पत्ति के दान से नहीं (इस रीति से उसने बहुत बड़ा धन इकट्ठा किया है), वरन् अपना शरीर भी उसे सौंपकर, हर प्रकार से उसके साथ एक होने की इच्छा से, कि वह उसके साथ पूरी तरह एक हो जाए।
4. परन्तु पहले ही से कुछ अति विश्वासी स्त्रियाँ, जिनमें परमेश्वर का भय है, और जो धोखा नहीं खाईं (तौभी उसने शेष के समान उन्हें भविष्यद्वाणी करने को कहकर बहकाने की पूरी चेष्टा की), उससे घृणा और शाप करके, ऐसे नीच आनन्दमंगलियों की संगति से हट गई हैं। उन्होंने यह इसलिए किया कि वे भली भाँति जानती हैं कि भविष्यद्वाणी का वरदान जादूगर मार्कुस मनुष्यों को नहीं देता, पर केवल वे जिनके पास ऊपर से परमेश्वर अपना अनुग्रह भेजता है, भविष्यद्वाणी करने की ईश्वरदत्त सामर्थ्य रखती हैं; और तब वे वहीं और तब बोलती हैं जहाँ और जब परमेश्वर चाहता है, न कि जब मार्कुस उन्हें ऐसा करने की आज्ञा देता है। क्योंकि आज्ञा देने वाला आज्ञा पाए हुए से बड़ा और ऊँचे अधिकार वाला है, इस कारण कि पहले कहा हुआ शासन करता है, और पीछे कहा हुआ अधीन दशा में है। अतः यदि मार्कुस, या कोई और, आज्ञा देता है,--जैसे ये अपने भोजों में निरन्तर चिट्ठियाँ डालने का खेल खेलने के अभ्यस्त हैं, और [चिट्ठी के अनुसार] एक दूसरे को भविष्यद्वाणी करने की आज्ञा देते हैं, अपनी ही अभिलाषाओं के अनुरूप जो है उसे वचन के रूप में देते हुए,--तो यह निकलेगा कि आज्ञा देने वाला भविष्यद्वाणी की आत्मा से बड़ा और ऊँचे अधिकार वाला है, यद्यपि वह केवल मनुष्य है, जो असम्भव है। पर जो आत्माएँ इन मनुष्यों से आज्ञा पाती हैं, और जब वे चाहते हैं तब बोलती हैं, वे पृथ्वी की और निर्बल, साहसी और निर्लज्ज हैं, शैतान से भेजी हुईं, उन लोगों के बहकाने और नाश के लिए जो उस भली भाँति जमी हुई विश्वास को दृढ़ नहीं पकड़े रहते जिसे उन्होंने आरम्भ में कलीसिया के द्वारा पाया।
5. और यह कि यह मार्कुस इन स्त्रियों में से कुछ के, नहीं तो सब के, शरीर का अपमान करने के लिए मन्त्रपेय और प्रेमऔषधि मिलाता है, परमेश्वर की कलीसिया को लौट आए हुए लोगों ने--जो बात बार बार होती है- -माना है, यह भी अंगीकार करते हुए कि वे उसके द्वारा अशुद्ध किए गए, और उसके प्रति जलती हुई लालसा से भरे थे। इसका एक शोकपूर्ण उदाहरण हमारे सेवकों में से एक एशियावासी के विषय में हुआ, जिसने उसे (मार्कुस को) अपने घर में ग्रहण किया था। उसकी पत्नी, असाधारण सुन्दरता की स्त्री, मन और शरीर दोनों में इस जादूगर का शिकार हुई, और बहुत काल तक उसके साथ घूमती रही। अन्त में, जब भाइयों ने कुछ कम कठिनाई से नहीं उसे लौटाया, तब उसने अपना सारा समय सार्वजनिक अंगीकार(1) के अभ्यास में बिताया, इस जादूगर से मिली हुई अशुद्धता पर रोती और विलाप करती हुई।
6. उसके कुछ शिष्य भी, उन्हीं आचरणों के आदी होकर(2), बहुत सी मूर्ख स्त्रियों को धोखा दे चुके और उन्हें अशुद्ध कर चुके हैं। वे अपने को "सिद्ध" प्रचार करते हैं, ताकि उनके ज्ञान की असीमता के विषय में कोई उन से तुलना न कर सके, चाहे तू पौलुस या पतरस, या और किसी प्रेरित का नाम ले। वे कहते हैं कि वे स्वयं और सब से अधिक जानते हैं, और उस सामर्थ्य के ज्ञान की महानता को, जो अकथनीय है, केवल उन्होंने ही पिया है। वे यह भी स्थिर करते हैं कि वे सब सामर्थ्य से ऊपर की ऊँचाई तक पहुँच गए हैं, और इसलिए हर बात में अपनी इच्छा के अनुसार करने को स्वतंत्र हैं, किसी बात में डरने वाला कोई नहीं। क्योंकि वे दृढ़ करते हैं कि "छुटकारे"(3) के कारण ऐसा हो गया है कि वे न न्यायाधीश से पकड़े जा सकते हैं, न देखे भी जा सकते हैं। पर यदि वह उन्हें पकड़ भी ले, तो वे उसकी उपस्थिति में "छुटकारे" के साथ खड़े होकर ये शब्द दोहरा सकते हैं: "हे तू, जो परमेश्वर के पास बैठा है,(4) और रहस्यमय, अनन्त सिगे, तेरे द्वारा स्वर्गदूत (पराक्रम), जो पिता के मुख को निरन्तर देखते हैं, तुझे अपना मार्गदर्शक और प्रवेशक ठहराकर, ऊपर से अपने रूप(5) पाते हैं, जिन्हें उसने अपने साहस की महानता में प्रोपटोर की भलाई के कारण मन से प्रेरित करके, उनके प्रतिरूप के रूप में हमें उत्पन्न किया, तब उसका मन ऊपर की बातों पर, स्वप्न के समान, लगा था,--देख, न्यायाधीश निकट है, और पुकारने वाला मुझे अपनी प्रतिरक्षा करने की आज्ञा देता है। पर तू, दोनों के विषय को जानने वाला होकर, हम दोनों का कारण न्यायाधीश के सामने रख, क्योंकि वह वास्तव में एक ही कारण है।"(6) अब, माता इन शब्दों को सुनते ही, उन पर होमेरिक(7) प्लूटो का शिरस्त्राण रखती है, ताकि वे न्यायाधीश से अदृश्य होकर बच निकलें।
और तब वह तुरन्त उन्हें उठा लेती है, विवाहकक्ष में ले जाती है, और उन्हें उनके जोड़ों को सौंप देती है।
7. ऐसी बातों और कामों से, हमारी अपनी रोन की भूमि में, उन्होंने बहुत स्त्रियों को मोह लिया है, जिनके विवेक तपाए हुए लोहे से दागे गए से हैं।(1) उनमें से कुछ सचमुच अपने पापों का सार्वजनिक अंगीकार करती हैं; पर उनमें से दूसरी यह करने में लज्जित होती हैं, और एक मौन रीति से, परमेश्वर के जीवन को [पहुँचने की] निराशा करके, उनमें से कुछ पूरी तरह धर्मत्याग कर चुकी हैं; जब कि दूसरी दोनों मार्गों के बीच हिचकिचाती हैं, और उस बात को पाती हैं जो कहावत में है, "न बाहर न भीतर;" ज्ञान की सन्तानों के बीज से फल के रूप में इसे रखे हुए।
अध्याय चौदह.--मार्कुस और दूसरों की नाना कल्पनाएँ। अक्षरों और अक्षरसमूहों के विषय के सिद्धान्त।
1. तब यह मार्कुस(2), यह घोषित करते हुए कि केवल वही कोलोर्बासुस की सिगे का गर्भ और ग्रहणस्थान था, क्योंकि वह एकलौता था, दोषयुक्त यूथ्यूमेसिस में से उसे सौंपी हुई वस्तु को कुछ ऐसी रीति से जन्म तक लाया है। वह घोषित करता है कि अनन्त रूप से ऊँची टेट्राड अदृश्य और अवर्णनीय स्थानों से एक स्त्री के रूप में उस पर उतरी (क्योंकि पुरुष रूप में आने पर संसार उसे सहन न कर सकता), और केवल उसे अपनी प्रकृति और सब वस्तुओं का मूल समझाया, जिसे उसने पहले न देवताओं में से किसी को और न मनुष्यों में से किसी को प्रकट किया था। यह इन शब्दों में हुआ: जब पहले अनादि, अकल्पनीय पिता, जो भौतिक पदार्थ से रहित है,(3) और न पुरुष है न स्त्री, उसको जो उसके लिए अकथनीय है उत्पन्न करना, और जो अदृश्य है उसे रूप देना चाहा, तब उसने अपना मुँह खोला, और अपने समान वचन को बाहर भेजा, जो पास खड़ा होकर उसे दिखाया कि वह स्वयं क्या है, क्योंकि वह उस अदृश्य के रूप में प्रकट हुआ था। और उसके नाम का उच्चारण इस प्रकार हुआ:--उसने उसका पहला शब्द बोला, जो आरम्भ(4) [शेष सब का] था, और वह उचार चार अक्षरों का था। उसने दूसरा जोड़ा, और यह भी चार अक्षरों का था। फिर उसने तीसरा उचारा, और इसने फिर दस अक्षरों को समेटा। अन्त में उसने चौथा उचारा, जो बारह अक्षरों से बना था। इस प्रकार पूरे नाम का उच्चारण हुआ, जो तीस अक्षरों और चार भिन्न उचारों का था। इन तत्वों में से प्रत्येक के अपने विशेष अक्षर, और लक्षण, और उच्चारण, और रूप, और प्रतिमाएँ हैं, और उनमें से एक भी उस [उचार] की आकृति को नहीं जानता जिसका वह तत्व है।
कोई भी अपने को नहीं जानता(5), न वह अपने पड़ोसी के उच्चारण को जानता है, पर प्रत्येक यह कल्पना करता है कि अपने ही उचार से वह वास्तव में पूरे को नाम ले रहा है। क्योंकि उनमें से प्रत्येक पूरे का एक भाग होते हुए भी अपनी ही ध्वनि को पूरा नाम समझता है, और तब तक ध्वनित होना नहीं छोड़ता जब तक अपने ही उचार से तत्वों में से प्रत्येक के अन्तिम अक्षर तक नहीं पहुँच जाता। यह शिक्षक घोषित करता है कि सब वस्तुओं की पुनर्स्थापना तब होगी, जब ये सब एक अक्षर में मिलकर एक ही ध्वनि बोलेंगे। वह कल्पना करता है कि इस उचार का चिह्न आमेन में मिलता है, जिसे हम एक स्वर से बोलते हैं।(6) विविध ध्वनियाँ (वह जोड़ता है) वे हैं जो उस एयोन को रूप देती हैं जो भौतिक पदार्थ से रहित और अजन्मा है, और ये फिर वे रूप हैं जिन्हें प्रभु ने स्वर्गदूत कहा है, जो निरन्तर पिता के मुख को देखते हैं।(7)
2. तत्वों के उन नामों को जो कहे जा सकते हैं और सामान्य हैं, उसने एयोन, और शब्द, और जड़, और बीज, और पूर्णताएँ, और फल कहा है। वह कहता है कि इनमें से प्रत्येक, और जो प्रत्येक का अपना है वह सब, एक्क्लेसिया नाम में समाया हुआ समझा जाए। इन तत्वों में से, उचारे गए अन्तिम के अन्तिम अक्षर ने अपनी वाणी बोली, और बाहर गई यह ध्वनि(8) [अन्य] तत्वों की प्रतिमा के अनुसार अपने तत्व उत्पन्न करती है, जिससे वह दृढ़ करता है कि यहाँ नीचे की वस्तुएँ अपने स्थान के क्रम में रची गईं, और जो उन से पहले थीं वे अस्तित्व में बुलाई गईं। वह यह भी स्थिर करता है कि वह अक्षर स्वयं, जिसकी ध्वनि नीचे उस ध्वनि के पीछे गई, पूरे की पूर्ति के लिए उस अक्षरसमूह ने फिर ऊपर ग्रहण कर लिया जिससे वह था, पर ध्वनि नीचे रह गई मानो बाहर फेंकी गई हो। पर वह तत्व स्वयं जिससे विशेष उच्चारण वाला अक्षर नीचे वाले तक उतरा, वह कहता है तीस अक्षरों का है, और इन अक्षरों में से प्रत्येक फिर अपने में और अक्षर रखता है, जिनके द्वारा अक्षर का नाम व्यक्त होता है। और इस प्रकार फिर दूसरे दूसरे अक्षरों से नाम पाते हैं, और और भी दूसरे औरों से, यहाँ तक कि अक्षरों की भीड़ अनन्तता में फूल जाती है। मैं जो कहता हूँ उसे तू इस उदाहरण से और स्पष्ट समझ सकता है:--डेल्टा शब्द con-
tains पाँच अक्षर, अर्थात्, डी, ई, एल, टी, ए: ये अक्षर फिर और अक्षरों से लिखे जाते हैं,(1) और और भी दूसरे औरों से। अतः यदि डेल्टा शब्द की सारी रचना [जब इस प्रकार विश्लेषित हो] अनन्तता में चल जाती है, अक्षर निरन्तर और अक्षर उत्पन्न करते हुए, और निरन्तर क्रम में एक दूसरे के पीछे चलते हुए, तो उस [एक] शब्द से अक्षरों का [सारा] समुद्र कितना raster है! यदि एक अक्षर भी इस प्रकार अनन्त है, तो पूरे नाम में अक्षरों की असीमता पर विचार कर; जिसमें से मार्कुस की सिगे ने हमें सिखाया है कि प्रोपटोर रचा गया है। इस कारण पिता, अपनी प्रकृति की अग्राहीयता को जानकर, उन तत्वों को जिन्हें वह एयोन भी कहता है, प्रत्येक के अपने उचार को बोलने की [सामर्थ्य] नियुक्त किया, क्योंकि उनमें से कोई अपने आप पूरे को बोलने में समर्थ नहीं था।
3. और टेट्राड ने ये बातें उसे और पूरी रीति से समझाते हुए कहा:--मैं अलेथेया (सत्य) को स्वयं तुझे दिखाना चाहती हूँ; क्योंकि मैं उसे ऊपर के निवासों से नीचे लाई हूँ, ताकि तू उसे बिना आवरण देखे, और उसकी सुन्दरता को समझे--ताकि तू उसे बोलती भी सुने, और उसकी बुद्धि की प्रशंसा करे। देख, तब, उसका सिर ऊपर, अल्फा और ओमेगा; उसकी गर्दन, बीटा और साई; उसके कन्धे हाथों समेत, गामा और खाई; उसकी छाती, डेल्टा और फाई; उसका मध्यपट, एप्सिलॉन और उप्सिलॉन; उसकी पीठ, जीटा और टाउ; उसका उदर, एटा और सिग्मा; उसकी जाँघें, थीटा और रो; उसके घुटने, आयोटा और पाई; उसकी टाँगें, कप्पा और ओमिक्रॉन; उसके टखने, लाम्ब्डा और क्साई; उसके पाँव, म्यू और न्यू। इस जादूगर के अनुसार सत्य का शरीर ऐसा है, तत्व की आकृति ऐसी, अक्षर का लक्षण ऐसा। और वह इस तत्व को अन्थ्रोपोस (मनुष्य) कहता है, और कहता है कि वही सब वचन का सोता है, और सब ध्वनि का आरम्भ, और जो अकथनीय है उस सब की अभिव्यक्ति, और मौन सिगे का मुँह। यही सचमुच सत्य का शरीर है। पर तू, अपने मन के विचारों को ऊपर उठाकर, सत्य के मुँह से स्वयंजनित वचन को सुन, जो पिता की उदारता का बाँटने वाला भी है।
4. जब उसने (टेट्राड ने) ये बातें कहीं, तब अलेथेया ने उसकी ओर देखा, अपना मुँह खोला, और एक शब्द बोला। वह शब्द एक नाम था, और नाम वही था जिसे हम जानते और बोलते हैं, अर्थात् यीशु मसीह। जब उसने यह नाम बोला, तब वह तुरन्त मौन में लौट गई। और जब मार्कुस इस आशा में बाट जोहता रहा कि वह और कुछ कहेगी, तब टेट्राड फिर आगे आकर बोली, "जो शब्द तूने अलेथेया के मुँह से सुना है उसे तू तुच्छ गिना है। जिसे तू जानता है और रखता हुआ दिखता है, वह प्राचीन नाम नहीं। क्योंकि तू केवल उसकी ध्वनि रखता है, जब कि तू उसकी सामर्थ्य से अनजान है। क्योंकि यीशु (I<greek>hsous</greek>) अंकगणित की रीति से(2) सांकेतिक नाम है, छह अक्षरों का, और बुलाए हुओं में से जितने हैं उन सब से जाना जाता है। पर जो प्लेरोमा के एयोन के बीच है वह अनेक भागों का है, और दूसरे रूप और आकार का है, और उन [स्वर्गदूतों] से जाना जाता है जो उसके साथ बन्धुता में जुड़े हैं, और जिनकी आकृतियाँ (पराक्रम) सदा उसके साथ वर्तमान हैं।
5. अतः जान कि जो चौबीस अक्षर तुम्हारे पास हैं वे उन तीन सामर्थ्यों के सांकेतिक निर्गम हैं जो ऊपर के तत्वों की सारी संख्या को रखती हैं। क्योंकि तुम्हें इस प्रकार गिनना है--कि नौ मूक(3) अक्षर पाटेर और अलेथेया की [प्रतिमाएँ] हैं, क्योंकि वे वाणी से रहित हैं, अर्थात् ऐसे स्वभाव के जिन्हें बोला या उच्चारित नहीं किया जा सकता। पर अर्धस्वर(4) लोगोस और जोए को दर्शाते हैं, क्योंकि वे व्यंजनों और स्वरों के बीच में हैं, दोनों के स्वभाव में भागी होते हुए(5)। स्वर फिर अन्थ्रोपोस और एक्क्लेसिया के प्रतिनिधि हैं, क्योंकि अन्थ्रोपोस से निकली वाणी ने उन सब को होना दिया; क्योंकि वाणी की ध्वनि ने उन्हें रूप दिया। इस प्रकार, तब, लोगोस और जोए आठ [इन अक्षरों में से] रखते हैं; अन्थ्रोपोस और एक्क्लेसिया सात; और पाटेर और अलेथेया नौ। पर क्योंकि प्रत्येक को दिया गया अंक असमान था, वह जो पिता में था नीचे आया, विशेष करके उसके द्वारा भेजा गया जिससे वह अलग किया गया था, जो हुआ था उसकी सुधार के लिए, ताकि समानता से युक्त प्लेरोमाओं की एकता सब में से बहने वाली उस एक सामर्थ्य को विकसित करे। इस प्रकार वह विभाग जिसमें केवल सात अक्षर थे, आठ की सामर्थ्य पा गया,(6) और तीन दल अंक के विषय में समान कर दिए गए, सब ओग्डोअड बनते हुए; ये तीन, जब इकट्ठे लाए जाएँ, चौबीस की संख्या बनाते हैं। तीन तत्व भी (जो वह घोषित करता है तीन सामर्थ्यों के साथ हैं,(7) और इस प्रकार उस छह को बनाते हैं जिनसे चौबीस अक्षर बहे हैं), अकथनीय टेट्राड के वचन से चौगुने होकर, उनके साथ वही संख्या उत्पन्न करते हैं; और इन तत्वों को वह उसके विषय में स्थिर करता है जिसका नाम नहीं लिया जा सकता। ये फिर तीन सामर्थ्यों द्वारा उसके समानता से युक्त किए गए जो अदृश्य है।
और वह कहता है कि जिन अक्षरों को हम द्वित्व(8) कहते हैं वे प्रतिमाएँ हैं
इन तत्वों की प्रतिमाएँ; और यदि ये चौबीस अक्षरों में जोड़ दी जाएँ, तो सादृश्य के बल से वे तीस की संख्या बनाती हैं।
6. वह कहता है कि इस व्यवस्था और सादृश्य का फल एक प्रतिमा की समानता में प्रकट हुआ है, अर्थात् वह, जो छह दिन के बाद, और तीन के साथ पहाड़ पर चढ़ा(1), और तब छह में से एक हुआ (छठा),(2) जिस स्वरूप में वह उतरा और हेब्दोमाद में समाया, क्योंकि वह प्रसिद्ध ओग्डोअड था,(3) और तत्वों की सारी संख्या को अपने में रखता था, जिसे कबूतर का उतरना (जो अल्फा और ओमेगा है) स्पष्ट प्रकट किया, जब वह बपतिस्मा पाने आया; क्योंकि कबूतर की संख्या आठ सौ एक है।(4) और इसी कारण मूसा ने घोषित किया कि मनुष्य छठे दिन रचा गया; और तब फिर, व्यवस्था के अनुसार, छठे दिन, जो तैयारी है, अन्तिम मनुष्य प्रकट हुआ, पहले के पुनर्जनन के लिए। इस व्यवस्था का आरम्भ और अन्त दोनों उस छठे घण्टे में रचे गए, जिसमें वह काठ पर ठोंका गया। क्योंकि वह सिद्ध प्राणी नूस, यह जानकर कि छह की संख्या में रचना और पुनर्जनन दोनों की सामर्थ्य है, ज्योति की सन्तानों को उस पुनर्जनन को घोषित किया जो उस संख्या के विषय में एपिसेमोन के रूप में प्रकट हुए उसके द्वारा पूरा किया गया। इसी से वह यह भी घोषित करता है कि द्वित्व अक्षर(5) एपिसेमोन संख्या को रखते हैं; क्योंकि यह एपिसेमोन, जब चौबीस तत्वों से जोड़ा गया, तीस अक्षरों के नाम को पूरा किया।
7. मार्कुस की सिगे घोषित करती है उसके अनुसार, उसने सात अक्षरों की सामर्थ्य को(6) अपना साधन बनाया, ताकि [अखामोथ की] स्वतंत्र इच्छा का फल प्रकट हो। "इस वर्तमान एपिसेमोन पर विचार कर," वह कहती है--"उसे जो [मूल] एपिसेमोन के बाद रचा गया, मानो दो भागों में बाँटा या काटा गया हो, और बाहर रह गया हो; जिसने अपनी सामर्थ्य और बुद्धि से, अपने द्वारा उत्पन्न की हुई वस्तु के द्वारा, हेब्दोमाद की सामर्थ्य की समानता पर सात सामर्थ्यों से(7) बने इस जगत को जीवन दिया, और उसे ऐसा रचा कि वह दृश्य प्रत्येक वस्तु का प्राण है। और वह इस काम को स्वयं ऐसे काम में लाता है मानो वह उसकी अपनी स्वतंत्र इच्छा से रचा गया हो; पर शेष, जो [पूरी रीति से] अनुकरण न हो सकने वाली वस्तु की प्रतिमाएँ हैं, माता की एन्थ्यूमेसिस के अधीन हैं। और पहला स्वर्ग सचमुच अल्फा बोलता है, इसके बाद वाला एप्सिलॉन, तीसरा एटा, चौथा, जो सात के बीच में भी है, आयोटा की ध्वनि बोलता है, पाँचवाँ ओमिक्रॉन, छठा उप्सिलॉन, सातवाँ, जो बीच से भी चौथा है, सुन्दर ओमेगा बोलता है,"--जैसा मार्कुस की सिगे, बहुत निरर्थक बातें करती हुई, पर सत्य का एक शब्द भी न बोलती हुई, निश्चय से कहती है। "और ये सामर्थ्य," वह जोड़ती है, "सब एक साथ एक दूसरे की गोद में बँधी हुई, उसकी महिमा को ध्वनित करती हैं जिसके द्वारा वे उत्पन्न हुईं; और उस ध्वनि की महिमा प्रोपटोर की ओर ऊपर पहुँचाई जाती है।" वह और भी निश्चय करती है कि "स्तुति के इस उचार की ध्वनि, पृथ्वी तक बहाई जाकर, पृथ्वी पर की वस्तुओं का रचयिता और जनक बन गई है।"
8. वह इसके प्रमाण में उन शिशुओं का दृष्टान्त देता है जो अभी जन्मे हैं, जिनकी पुकार, गर्भ से निकलते ही, इन तत्वों में से प्रत्येक की ध्वनि के अनुसार होती है। अतः, वह कहता है, जैसे सात सामर्थ्य वचन की महिमा करती हैं, वैसे ही शिशुओं का विलाप करता प्राण भी करता है।(8) इसी कारण दाऊद ने भी कहा: "बालकों और दूधपिउओं के मुँह से तूने स्तुति को सिद्ध किया है;"(9) और फिर: "आकाश परमेश्वर की महिमा का वर्णन करते हैं।"(10) इसी से यह भी होता है कि जब प्राण कठिनाइयों और क्लेशों में फँसा हो, तो अपनी राहत के लिए वह "ओ" (<greek>W</greek>) पुकारता है, प्रश्न के अक्षर के सम्मान में,(11) ताकि ऊपर का उसका जातिगत प्राण [उसके क्लेश को] पहचाने, और उसके पास राहत नीचे भेजे।
9. इस प्रकार ही, पूरे नाम के विषय में,(12) जो तीस अक्षरों का है, और बूथुस, जो इस [नाम] के अक्षरों से अपनी वृद्धि पाता है, और अलेथेया का शरीर, जो बारह अंगों से बना है, जिनमें से प्रत्येक दो अक्षरों का है, और वह वाणी जिसे उसने बिना कुछ बोले उचारी, और उस नाम के विश्लेषण के विषय में जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, और जगत और मनुष्य के प्राण के विषय में, जैसे वे उस व्यवस्था को रखते हैं जो [ऊपर की वस्तुओं की] प्रतिमा के अनुसार है, उसने अपनी निरर्थक रायें बोली हैं। यह रह गया है कि मैं बताऊँ टेट्राड ने नामों से उसे संख्या में समान एक सामर्थ्य कैसे दिखाई; ताकि, मेरे मित्र, जो कुछ मैंने उसके द्वारा बोला हुआ पाया है उसमें से कुछ भी तेरे लिए अज्ञात न रहे; और इस प्रकार तेरा अनुरोध, जो मुझ से बार बार रखा गया, पूरा हो।
अध्याय पन्द्रह.--सिगे मार्कुस को चौबीस तत्वों और यीशु की उत्पत्ति बताती है। इन असंगतियों का उद्घाटन।
1. तब सर्वज्ञ सिगे ने चौबीस तत्वों की उत्पत्ति उसे इस प्रकार घोषित की:--मोनोटेस के साथ हेनोटेस साथ थी, जिससे दो उत्पत्तियाँ निकलीं, जैसा हम ऊपर कह चुके हैं, मोनास और हेन, जो अन्य दो में जोड़ी जाकर चार बनाती हैं, क्योंकि दूना दो चार है। और फिर, दो और चार जब जोड़े जाएँ, छह की संख्या दिखाते हैं। और आगे, ये छह चौगुने होकर चौबीस रूपों को जन्म देते हैं। और पहली टेट्राड के नाम, जो परम पवित्र और शब्दों में व्यक्त न हो सकने वाले समझे जाते हैं, केवल पुत्र से जाने जाते हैं, पिता भी जानता है कि वे क्या हैं। अन्य नाम जो आदर, और विश्वास, और श्रद्धा से बोले जाएँ, उसके अनुसार अर्रेतोस और सिगे, पाटेर और अलेथेया हैं। अब इस टेट्राड की सारी संख्या चौबीस अक्षरों तक पहुँचती है; क्योंकि अर्रेतोस नाम अपने में सात अक्षर रखता है, Seige(1) पाँच, पाटेर पाँच, और अलेथेया सात। यदि ये सब जोड़े जाएँ--दूना पाँच, और दूना सात-- वे चौबीस की संख्या पूरी करते हैं। उसी प्रकार दूसरी टेट्राड भी, लोगोस और जोए, अन्थ्रोपोस और एक्क्लेसिया, तत्वों की वही संख्या प्रकट करती है। और उद्धारकर्ता का वह नाम जो बोला जा सकता है, अर्थात् यीशु 'I<greek>hsous</greek>, छह अक्षरों का है, पर उसका अकथनीय नाम for-and-twenty अक्षर रखता है। मसीह पुत्र(2) (<greek>uios</greek> X<greek>reistos</greek>) नाम बारह अक्षर रखता है, पर जो मसीह में उच्चारण न हो सके वह तीस अक्षर रखता है। और इसी कारण वह घोषित करता है कि fie अल्फा और ओमेगा है, ताकि वह कबूतर को सूचित करे, क्योंकि उस पक्षी के पास यह संख्या [उसके नाम में] है।
2. पर यीशु का, वह दृढ़ करता है, यह अकथनीय मूल है। सब वस्तुओं की माता से, अर्थात् पहली टेट्राड से; दूसरी टेट्राड एक पुत्री की रीति से बाहर आई; और इस प्रकार एक ओग्डोअड बनी, जिससे फिर एक देकाड चली: इस प्रकार एक देकाड और एक ओग्डोअड उत्पन्न हुई। तब देकाड, ओग्डोअड से जुड़कर, और उसे दस बार गुणा करके, अस्सी की संख्या को जन्म देती है; और फिर, अस्सी को दस बार गुणा करके, आठ सौ की संख्या उत्पन्न करती है। इस प्रकार, तब, ओग्डोअड से [गुणा होकर] देकाड में जाने वाले अक्षरों की सारी संख्या आठ सौ अट्ठासी है।(3) यही यीशु का नाम है; क्योंकि यह नाम, यदि तू अक्षरों का संख्यात्मक मान जोड़े, आठ सौ अट्ठासी तक पहुँचता है। इस प्रकार, तब, अतिस्वर्गीय यीशु के मूल के विषय में उनकी राय का स्पष्ट कथन तेरे पास है। इसी से यूनानियों की वर्णमाला आठ मोनाड, आठ देकाड, और आठ हेकाटाड(4) रखती है, जो आठ सौ अट्ठासी की संख्या दिखाती हैं, अर्थात् यीशु, जो सब संख्याओं से रचा गया है; और इस कारण वह अल्फा और ओमेगा कहलाता है, सब से अपने मूल को सूचित करते हुए। और फिर, वे बात को इस प्रकार रखते हैं: यदि पहली टेट्राड संख्या की वृद्धि के अनुसार जोड़ी जाए, तो दस की संख्या दिखाई देती है। क्योंकि एक, और दो, और तीन, और चार जब जोड़े जाएँ, दस बनाते हैं; और यही, जैसा वे चाहेंगे, यीशु है। और ख्रीस्तुस, वह कहता है, आठ अक्षरों का शब्द होकर, पहली ओग्डोअड को सूचित करता है, और यह दस से गुणा होने पर यीशु को (888) जन्म देता है। और मसीह पुत्र, वह कहता है, भी बोला जाता है, अर्थात् दुओदेकाड। क्योंकि पुत्र नाम, (<greek>uios</greek>) चार अक्षर रखता है, और मसीह (ख्रीस्तुस) आठ, जो मिलकर दुओदेकाड की महानता को दिखाते हैं।
पर, वह आरोप लगाता है, इस नाम का एपिसेमोन प्रकट होने से पहले, अर्थात् यीशु पुत्र, मनुष्यजाति बड़े अज्ञान और भ्रम में फँसी थी। पर जब छह अक्षरों का यह नाम प्रकट हुआ (इसे धारण करने वाला व्यक्ति अपने को मांस में लपेटा, ताकि वह मनुष्य की इन्द्रियों की पकड़ के नीचे आए, और अपने में ये छह और चौबीस अक्षर रखता था), तब उसे जानकर वे अपने अज्ञान से रुक गए, और मृत्यु से जीवन में पार हुए, यह नाम सत्य के पिता की ओर उनका मार्गदर्शक होकर।(5) क्योंकि सब के पिता ने अज्ञान को समाप्त करने, और मृत्यु को नष्ट करने का निश्चय किया था। पर अज्ञान का यह मिटना उसी का ज्ञान था। इसलिए वह मनुष्य (अन्थ्रोपोस) उसकी इच्छा के अनुसार चुना गया, ऊपर की [संगत] सामर्थ्य की प्रतिमा के अनुसार रचा जाकर।
3. एयोन के विषय में, वे टेट्राड से चले, और उस टेट्राड में अन्थ्रोपोस और एक्क्लेसिया, लोगोस और जोए थे। तब जिन सामर्थ्यों ने इन से निर्गम किया, वह घोषित करता है, उन्होंने उस यीशु को उत्पन्न किया जो पृथ्वी पर प्रकट हुआ। स्वर्गदूत गब्रिएल ने लोगोस का स्थान लिया, पवित्र आत्मा ने जोए का, सर्वोच्च की सामर्थ्य ने अन्थ्रोपोस का, जब कि कुँवारी ने एक्क्लेसिया का स्थान दिखाया। और इस प्रकार, एक विशेष प्रबन्ध से, उसके द्वारा, मरियम के द्वारा, वह मनुष्य उत्पन्न हुआ, जिसे गर्भ से जाते हुए सब के पिता ने वचन के द्वारा अपने विषय का ज्ञान [पाने के लिए] चुना। और उसके [बपतिस्मा के] जल पर आने पर, एक कबूतर के रूप में उस पर उतरा,
वह सत्ता जो पहले ऊपर चढ़ी थी, और बारहवीं संख्या को पूरा किया था, जिसमें अपने साथ एक काल में उत्पन्न हुए लोगों का बीज था, और जो उसके साथ उतरी और चढ़ी। और वह स्थिर करता है कि जो सामर्थ्य उतरी वह पिता का बीज थी, जिसमें पिता और पुत्र दोनों थे, तथा सिगे की वह सामर्थ्य भी जो उनके द्वारा जानी जाती है, पर भाषा में व्यक्त नहीं हो सकती, और सब एयोन भी। और यही वह आत्मा थी जो यीशु के मुँह से बोली, और जिसने अंगीकार किया कि वह मनुष्य का पुत्र है तथा पिता को प्रकट किया, और जो यीशु में उतरकर उसके साथ एक कर दी गई। और वह कहता है कि विशेष प्रबन्ध से रचा गया उद्धारकर्ता ने सचमुच मृत्यु को नष्ट किया, पर मसीह ने पिता को जानाया।(1) इसलिए वह स्थिर करता है कि यीशु उस मनुष्य का नाम है जो विशेष प्रबन्ध से रचा गया, और कि वह उस [स्वर्गीय] अन्थ्रोपोस की समानता और रूप के अनुसार रचा गया, जो उस पर उतरने वाला था। जब उसने उस एयोन को पा लिया, तब उसने अन्थ्रोपोस को स्वयं, Loges को स्वयं, और पाटेर, और Arrhetus, और सिगे, और अलेथेया, और एक्क्लेसिया, और जोए को रखा।
4. ऐसा प्रलाप, अब हम भली भाँति कह सकते हैं, इयु, इयु, फेयु, फेयु, और हर प्रकार की शोकपूर्ण चीत्कार या दुख की उक्ति से आगे निकल जाता है।(2) क्योंकि ऐसे साहसी झूठों के दीन रचयिता से कौन घृणा न करेगा, जब वह देखता है कि सत्य को मार्कुस ने केवल एक प्रतिमा बना डाला है, और वर्णमाला के अक्षरों से वह सब ओर छेदा गया है? यूनानी मानते हैं कि उन्होंने पहले सोलह अक्षर कादमुस से पाए, और वह आरम्भ की तुलना में हाल ही में, [जिसकी विशाल प्राचीनता सूचित है] सामान्य कहावत में: "कल और उससे पहले;"(3) और बाद में, समय के क्रम में, उन्होंने स्वयं एक काल में महाप्राण, और दूसरे काल में द्वित्व अक्षर आविष्कार किए, जब कि सबसे अन्त में, वे कहते हैं, पलमेडेस ने पूर्व के अक्षरों में दीर्घ अक्षर जोड़े। तो क्या ऐसा था कि जब तक ये बातें यूनानियों में न हुईं, सत्य का अस्तित्व नहीं था? क्योंकि, तेरे अनुसार, मार्कुस, सत्य का शरीर कादमुस और उन से जो उसके पहले थे उन से पीछे का है--शेष अक्षर जोड़ने वालों से भी पीछे का--तुझ से भी पीछे का! क्योंकि केवल तूने जिसे तू सत्य कहता है उसे एक [बाहरी, दृश्य] प्रतिमा बना दिया है।
5. पर तेरी निरर्थक सिगे को कौन सहेगा, जो नाम न लिए जा सकने वाले को नाम देती है, अकथनीय के स्वभाव को समझाती है, जो खोजा नहीं जा सकता उसे खोजती है, और जिसके विषय में तू स्थिर करता है कि वह शरीर और रूप से रहित है उसके विषय में घोषित करती है कि उसने अपना मुँह खोला और वचन को बाहर भेजा, मानो वह अंगयुक्त प्राणियों में गिना गया हो; और कि उसका वचन, अपने रचयिता के समान होते हुए, और अदृश्य की प्रतिमा को धारण करते हुए, तौभी तीस तत्वों और चार अक्षरसमूहों का था? तब, तेरे सिद्धान्त के अनुसार, यह निकलेगा कि सब का पिता, वचन की समानता के अनुसार, तीस तत्वों और चार अक्षरसमूहों का है! या फिर, रूपों और संख्याओं के साथ तेरी हस्तचातुर्य को कौन सहेगा,--एक समय तीस, दूसरे समय चौबीस, और फिर दूसरे समय केवल छह,--जब तू [इनमें] परमेश्वर के वचन को, सब वस्तुओं के संस्थापक, रचयिता, और बनाने वाले को बन्द करता है; और तब फिर, उसे चार अक्षरसमूहों और तीस तत्वों में टुकड़े टुकड़े काटता है; और आकाश की नींव डालने वाले सब के प्रभु को आठ सौ अट्ठासी की संख्या तक नीचे लाता है, ताकि वह वर्णमाला के समान हो; और पिता को, जो समाया नहीं जा सकता, पर सब को समेटे है, एक टेट्राड, और एक ओग्डोअड, और एक देकाड, और एक दुओदेकाड में बाँटता है; और ऐसी गुणन से पिता की अकथनीय और अकल्पनीय प्रकृति को रखता है, जैसा तू स्वयं उसे घोषित करता है? और दुष्ट आविष्कार के लिए अपने को एक डेडालुस, और सर्वोच्च सामर्थ्य का दुष्ट शिल्पी दिखाकर, तू जिसे तू अशरीरी और अपदार्थ कहता है उसके लिए अक्षरों की भीड़ से, एक से दूसरा उत्पन्न होकर, एक प्रकृति और पदार्थ निर्माण करता है।
और जिस सामर्थ्य को तू अविभाज्य दृढ़ करता है, उसे तौभी तू व्यंजनों, और स्वरों, और अर्धस्वरों में बाँटता है; और जो अक्षर मूक हैं उन्हें सब वस्तुओं के पिता और उसकी Enncea (कल्पना) पर झूठ से थोपकर, तूने जितने तुझ पर भरोसा रखते हैं उन सब को निन्दा के सर्वोच्च बिन्दु तक और घोर अधर्म तक हाँक दिया है।(4)
6. अतः अच्छे कारण से, और बहुत उचित रीति से, तेरे उतावले यत्न के विषय में, उन दिव्य प्राचीनों और सत्य के प्रचारक ने तेरे विरुद्ध इस प्रकार पद्य में फूट पड़ा है:--
"मार्कुस, तू मूर्तियों का रचयिता, अपशकुनों का निरीक्षक, नक्षत्रों से परामर्श करने में Skill'd, और जादू की काली कलाओं में गहरा, सदैव ऐसी युक्तियों से भ्रम की शिक्षाओं को पक्का करता हुआ, तेरे द्वारा छल में फँसाए हुए लोगों को चिह्न देता हुआ, उस सामर्थ्य के आश्चर्य जो परमेश्वर से सर्वथा कटी हुई और धर्मत्यागी है, जिन्हें शैतान, तेरा सच्चा पिता, अब भी पूरा करने की शक्ति तुझे देता है, अजाजेल के द्वारा, उस गिरा हुए पर फिर भी पराक्रमी स्वर्गदूत के,-- इस प्रकार तुझे अपने ही अधर्म कर्मों का अग्रदूत बनाता हुआ।"
पवित्र प्राचीन के शब्द ऐसे हैं। और मैं उनके रहस्यपूर्ण तंत्र के शेष को, जो बड़ी लम्बाई तक चलता है, संक्षेप में कहने का यत्न करूँगा, और प्रकाश में लाने का कि क्या
बहुत काल से छिपा रहा है। क्योंकि इस रीति से ऐसी बातें सब के द्वारा उद्घाटन के लिए सहज ग्राह्य हो जाएँगी।
अध्याय सोलह.--मार्कोसियों की असंगत व्याख्याएँ।
1. अपने ही एयोन की उत्पत्ति को, और [सुसमाचार में कही गई(1)] भेड़ के भटकने और फिर मिलने को एक में मिलाकर, ये व्यक्ति बातों को और रहस्यमय शैली में रखना चाहते हैं, सब कुछ संख्याओं पर डालते हुए, यह स्थिर करते हुए कि विश्व एक मोनाड और एक दयड से रचा गया है। तब, एकता से चार तक गिनकर, वे इस प्रकार देकाड को उत्पन्न करते हैं। क्योंकि जब एक, दो, तीन, और चार जोड़े जाएँ, वे दस एयोन की संख्या को जन्म देते हैं। और फिर, दयड अपने से [दो दो करके] छह तक बढ़ती हुई--दो, और चार, और छह--दुओदेकाड को बाहर लाती है। फिर, यदि हम उसी रीति से दस तक गिनें, तो तीस की संख्या दिखाई देती है, m जिनमें आठ, और दस, और बारह मिलते हैं। इसलिए वे दुओदेकाड को--क्योंकि उसमें एपिसेमोन है,(2) और क्योंकि एपिसेमोन [यूँ कहें] उसकी बाट जोहता है--दुख कहते हैं। और इसी कारण, क्योंकि बारहवीं संख्या के सम्बन्ध में एक भूल हुई,(3) भेड़ उछलकर भागी और भटक गई; क्योंकि वे कहते हैं कि दुओदेकाड से एक पतन हुआ। उसी रीति से वे वचन की नाईं घोषित करते हैं कि एक सामर्थ्य दुओदेकाड से भी निकलकर नष्ट हो गई है; और यह उस स्त्री से दिखाई गई जिसने द्राख्मा खोया,(4) और दीया जलाकर उसे फिर पाया। इस प्रकार, अतः, जो संख्याएँ रह गईं, अर्थात् नौ, धन के टुकड़ों के विषय में, और ग्यारह भेड़ के विषय में,(5) जब एक साथ गुणा की जाएँ, निन्यानवे की संख्या को जन्म देती हैं, क्योंकि नौ गुणा ग्यारह निन्यानवे हैं। इसी से वे यह भी स्थिर करते हैं कि "आमेन" शब्द इस संख्या को रखता है।
2. पर मैं तुझे थकाने के लिए उनकी और व्याख्याएँ नहीं गिनाऊँगा, ताकि तू परिणामों को सब जगह देखे। वे उदाहरण के लिए स्थिर करते हैं कि एटा अक्षर (<greek>h</greek>) एपिसेमोन के साथ (<s234) एक ओग्डोअड बनाता है, क्योंकि वह पहले अक्षर से आठवाँ स्थान रखता है। तब फिर, एपिसेमोन के बिना, अक्षरों की संख्या गिनकर, और उन्हें एटा तक जोड़कर, वे Priacontad को बाहर लाते हैं। क्योंकि यदि कोई अल्फा से आरम्भ करे और एटा पर समाप्त हो, Episeman को छोड़कर, और क्रम से अक्षरों के मान को जोड़े, तो वह उनकी संख्या को कुल तीस तक पहुँची पाएगा। क्योंकि एप्सिलॉन तक (<greek>e</greek>) पन्द्रह बनते हैं; तब उस संख्या में सात जोड़ने पर बाईस का योग पहुँचता है। फिर, एटा इनमें जोड़ा जाकर, क्योंकि उसका मान आठ है, अति अद्भुत त्रयाकोन्ताड पूरा होता है। और इसी से वे प्रचार करते हैं कि ओग्डोअड तीस एयोन की माता है। अतः, क्योंकि तीस की संख्या तीन सामर्थ्यों से [ओग्डोअड, देकाड, और दुओदेकाड] बनी है, तीन से गुणा होने पर वह नब्बे उत्पन्न करती है, क्योंकि तीन गुणा तीस नब्बे हैं। वैसे ही यह त्रय, अपने से गुणा होने पर, नौ को जन्म देता है। इस प्रकार ओग्डोअड इन उपायों से निन्यानवे उत्पन्न करती है।
और क्योंकि बारहवाँ एयोन, अपने पतन से, ऊपर की ऊँचाइयों में ग्यारह छोड़ गया, वे स्थिर करते हैं कि इसलिए अक्षरों का स्थान उनकी गणना की विधि का सच्चा समन्वय है(6) (क्योंकि लाम्ब्डा अक्षरों में क्रम से ग्यारहवाँ है, और तीस की संख्या को दर्शाता है), और ऊपर के कामों की व्यवस्था का एक चित्र भी बनाता है, क्योंकि अल्फा से, एपिसेमोन को छोड़कर, लाम्ब्डा तक अक्षरों की संख्या, अक्षरों के क्रमिक मान के अनुसार जोड़ी जाकर, और Zambda को स्वयं मिलाकर, निन्यानवे का योग बनाती है; पर यह लाम्ब्डा, क्रम में ग्यारहवाँ होकर, अपने समान एक को खोजने को उतरा, ताकि बारह अक्षरों की संख्या पूरी हो, और जब उसे ऐसा एक मिल गया, संख्या पूरी हुई, यह अक्षर की आकृति से ही प्रकट है; क्योंकि लाम्ब्डा, मानो, अपने समान एक की खोज में लगा होकर, और ऐसा एक पाकर, और उसे अपने से चिपकाकर, इस प्रकार बारहवें स्थान को भर गया, म्यू अक्षर (एम) दो लाम्ब्डा से बना होने के कारण (<s222<greek>L</greek>)। इसी से वे भी, अपने "ज्ञान" के द्वारा, निन्यानवे के स्थान को, अर्थात् पतन को, टालते हैं--बायें हाथ का एक रूप,(7)--पर एक और को सुरक्षित करने का यत्न करते हैं, जो निन्यानवे में जोड़ा जाकर उनकी गणना को दाहिने हाथ पर बदलने का प्रभाव रखता है।
3. मेरे प्रिय मित्र, मैं भली भाँति जानता हूँ कि जब तू यह सब पढ़ चुकेगा, तब तू उनकी इस फूली हुई ज्ञानमूर्खता पर हृदय से हँसेगा! पर वे मनुष्य सचमुच शोक के योग्य हैं, जो ऐसी जाति का धर्म प्रचार करते हैं, और जो सचमुच अकथनीय सामर्थ्य की महानता को, और अपने में इतने चकित करने वाले परमेश्वर के प्रबन्धों को, अल्फा और बीटा के द्वारा, और संख्याओं की सहायता से, इतनी ठण्डी और टेढ़ी रीति से चीर डालते हैं। पर जितने कलीसिया से अलग होकर ऐसी बुढ़ियों की कथाओं पर ध्यान देते हैं, वे सचमुच अपने आप को दण्ड ठहराए हुए हैं; और इन मनुष्यों के विषय में पौलुस हमें आज्ञा देता है, "पहली और दूसरी चेतावनी के बाद, उन्हें छोड़ दो।"(8)
और प्रभु के शिष्य यूहन्ना ने उनकी निन्दा को और तीव्र किया है, जब वह चाहता है कि हम उन्हें "कुशल हो" का नमस्कार भी न कहें; क्योंकि, वह कहता है, "जो उन्हें कुशल हो कहता है वह उनके बुरे कामों का भागी है;"(1) और यह कारण से, "क्योंकि अधर्मी के लिए कुशल नहीं है,"(2) प्रभु कहता है। सचमुच अधर्मी, सब अधर्म से आगे, ये मनुष्य हैं, जो यह कहते हैं कि आकाश और पृथ्वी का बनाने वाला, एकमात्र सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जिसके सिवा कोई परमेश्वर नहीं, एक दोष के द्वारा उत्पन्न हुआ, जो दोष स्वयं दूसरे दोष से निकला, ताकि उनके अनुसार वह तीसरे दोष की उत्पत्ति था।(3) ऐसी राय से हमें घृणा और शाप करना चाहिए, और जो इसे पकड़े हैं उन से हमें सब जगह दूर भागना चाहिए; और जिस अनुपात में वे अपनी कल्पित शिक्षाओं को तीव्रता से स्थिर करते और उन में आनन्दित होते हैं, उतना ही अधिक हमें विश्वास करना चाहिए कि वे ओग्डोअड की दुष्ट आत्माओं के प्रभाव में हैं,--ठीक वैसे जैसे जो उन्माद के दौरे में पड़ते हैं, जितना अधिक वे हँसते हैं, और अपने को अच्छा समझते हैं, और सब काम ऐसे करते हैं मानो वे [शरीर और मन दोनों के] अच्छे स्वास्थ्य में हों, हाँ, कुछ बातें सचमुच ऐसे लोगों से बेहतर जो वास्तव में ऐसे हैं, उतना ही वे और गम्भीर रूप से रोगी दिखाए जाते हैं। उसी रीति से ये मनुष्य, जितना वे बुद्धि में औरों से बढ़े हुए दिखते हैं, और धनुष को अधिक कसकर खींचने से अपनी शक्ति को व्यर्थ करते हैं,(4) उतने बड़े मूर्ख अपने को दिखाते हैं।
क्योंकि जब मूर्खता की अशुद्ध आत्मा बाहर चली जाती है, और बाद में वह उन्हें परमेश्वर की बाट जोहते नहीं, वरन् केवल सांसारिक प्रश्नों में लगे पाता है, तब, "अपने से अधिक दुष्ट सात और आत्माओं को लेकर,"(5) और इन मनुष्यों के मनों को इस धारणा से फुलाकर कि वे परमेश्वर से परे कुछ सोच सकते हैं, और छल के ग्रहण के लिए उन्हें योग्य रीति से तैयार करके, वह उनके भीतर दुष्टता की मूर्ख आत्माओं की ओग्डोअड को रोपता है।
अध्याय सत्रह.--मार्कोसियों का सिद्धान्त, कि सृजी हुई वस्तुएँ अदृश्य वस्तुओं की प्रतिमा के अनुसार बनाई गईं।
1. मैं तुझे उनका सिद्धान्त भी समझाना चाहता हूँ कि सृष्टि स्वयं माता के द्वारा डेमियुर्ग से (मानो उसके ज्ञान के बिना) कैसे रची गई, अदृश्य वस्तुओं की प्रतिमा के अनुसार। तब वे स्थिर करते हैं कि सबसे पहले चार तत्व, अग्नि, जल, पृथ्वी, और वायु, ऊपर की प्राथमिक टेट्राड की प्रतिमा के अनुसार उत्पन्न हुए, और तब, यदि हम उनकी क्रियाएँ जोड़ें, अर्थात् गर्मी, ठण्ड, सूखापन, और आर्द्रता, तो ओग्डोअड की ठीक समानता उपस्थित होती है। फिर वे इस रीति से दस सामर्थ्यों को गिनते हैं:--सात गोलाकार पिण्ड हैं, जिन्हें वे स्वर्ग भी कहते हैं; तब वह गोलाकार पिण्ड जो इन्हें रखता है, जिसे वे आठवाँ स्वर्ग भी नाम देते हैं; और इन के अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा। ये, संख्या में दस होकर, उस अदृश्य देकाड के रूप घोषित किए जाते हैं जो लोगोस और जोए से चली। दुओदेकाड के विषय में, वह राशिचक्र कहलाने वाले से सूचित होती है; क्योंकि वे दृढ़ करते हैं कि बारह राशियाँ दुओदेकाड को, अन्थ्रोपोस और एक्क्लेसिया की पुत्री को, अत्यन्त स्पष्ट छाया दिखाती हैं। और क्योंकि सर्वोच्च स्वर्ग, [सातवें स्वर्ग के] गोले को ही ठोकता हुआ, पूरी व्यवस्था के अति तीव्र अयन से एक रोक के रूप में जोड़ा गया है, और अपनी गुरुता से उस व्यवस्था को सन्तुलित करता है, ताकि वह तीस वर्षों में राशि से राशि तक चक्र पूरा करे,--वे कहते हैं कि यह होरुस की प्रतिमा है, उनकी तीस नामों वाली माता को घेरती हुई।(6) और तब फिर, क्योंकि चन्द्रमा तीस दिनों में स्वर्ग के अपने नियत स्थान से यात्रा करती है, वे धारण करते हैं कि इन दिनों से वह तीस एयोन की संख्या को व्यक्त करती है।
सूर्य भी, जो बारह महीनों में अपनी कक्षा से दौड़ता है, और तब वृत्त के उसी बिन्दु पर लौटता है, इन बारह महीनों से दुओदेकाड को प्रकट करता है; और दिन, बारह घण्टों से मापे जाते हुए, अदृश्य दुओदेकाड का एक रूप हैं। और वे घोषित करते हैं कि घण्टा, जो दिन का बारहवाँ भाग है, तीस भागों से बना है(7), त्रयाकोन्ताड की प्रतिमा को रखने के लिए। राशिचक्र की परिधि स्वयं तीन सौ साठ अंश रखती है (क्योंकि उसकी राशियों में से प्रत्येक तीस रखती है); और इस प्रकार वे दृढ़ करते हैं कि इस वृत्त के द्वारा बारह और तीस के बीच के उस सम्बन्ध की एक प्रतिमा सुरक्षित है। और आगे, यह निश्चय करते हुए कि पृथ्वी बारह मण्डलों में बँटी है, और प्रत्येक मण्डल में वह स्वर्ग से सामर्थ्य पाती है, [उसके ऊपर सूर्य की लम्ब स्थिति] के अनुसार, उस सामर्थ्य के अनुसार उत्पत्तियाँ बाहर लाती हुई जो उस पर अपना प्रभाव नीचे भेजती है, वे स्थिर करते हैं कि यह दुओदेकाड और उसकी सन्तान का अत्यन्त स्पष्ट रूप है।
2. इन बातों के अतिरिक्त, वे घोषित करते हैं कि डेमियुर्ग, ऊपर की ओग्डोअड की अनन्तता, और नित्यता, और असीमता, और समय के सब माप से स्वतन्त्रता का अनुकरण करना चाहता था, पर, वह दोष का फल होने के कारण, उसकी स्थिरता और नित्यता को व्यक्त न कर सकने से, उसकी नित्यता को कालों, और ऋतुओं, और वर्षों की विशाल संख्याओं में फैलाने के उपाय का सहारा लिया, यह कल्पना करते हुए कि ऐसे कालों की भीड़ से वह उसकी immen-
sity का अनुकरण कर सकेगा। वे और घोषित करते हैं कि सत्य उसके हाथ से निकल गया, और वह उस का अनुसरण किया जो झूठ था, और इसी कारण, जब काल पूरे होंगे, उसका काम shah नष्ट होगा।
अध्याय अठारह.--मूसा से अंश, जिन्हें विधिविरोधी अपनी कल्पना के आधार के लिए बिगाड़ते हैं।
1. और जब वे सृष्टि के विषय में ऐसी बातें दृढ़ करते हैं, तब उनमें से हर एक अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिन प्रतिदिन कुछ नया उत्पन्न करता है; क्योंकि जो उनके बीच कुछ प्रबल कल्पनाएँ विकसित नहीं करता, वह "सिद्ध" नहीं गिना जाता। इस प्रकार आवश्यक है, 1ले, कि वे भविष्यद्वाणी के लेखों में से किन बातों को [अपने उपयोग के लिए] रूपान्तरित करते हैं, यह दिखाया जाए, और फिर उनका खण्डन किया जाए। मूसा ने, तब, वे घोषित करते हैं, सृष्टि के विवरण को आरम्भ करने की अपनी रीति से, आरम्भ में ही सब वस्तुओं की माता को दिखाया, जब वह कहता है, "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की;"(1) क्योंकि, जैसा वे मानते हैं, इन चारों के नाम लेकर,--परमेश्वर, आदि, आकाश, और पृथ्वी,--उसने उनकी टेट्राड को प्रगट किया। उसके अदृश्य और छिपे स्वभाव को भी दिखाते हुए, उसने कहा, "पृथ्वी अदृश्य और बेडौल थी।"(2) वे यह भी चाहते हैं कि उसने 2री टेट्राड के विषय में, जो 1ली की सन्तान है, इस प्रकार कहा--एक अथाह गहराई और अन्धकार का नाम लेकर, जिनमें जल भी था, और आत्मा जल के ऊपर चल रही थी। फिर, डेकैड का उल्लेख करने को बढ़कर, वह ज्योति, दिन, रात, आकाशमण्डल, सन्ध्या, भोर, सूखी भूमि, समुद्र, पौधे, और 10वें स्थान में वृक्षों का नाम लेता है। इस प्रकार, इन दस नामों के द्वारा, उसने दस आइयोन दिखाए। डुओडेकैड की सामर्थ्य, फिर, उसके द्वारा इस प्रकार छाया रूप में दिखाई गई:--वह सूर्य, चन्द्रमा, तारे, ऋतुएँ, वर्ष, तिमिंगल, मछलियाँ, रेंगनेवाले जन्तु, पक्षी, चौपाए, वनपशु, और इन सब के बाद, 12वें स्थान में, मनुष्य का नाम लेता है। इस प्रकार वे सिखाते हैं कि ट्रायकोंटैड मूसा के द्वारा आत्मा से कही गई। और भी, मनुष्य भी, ऊपर की सामर्थ्य के स्वरूप के अनुसार रचा जाकर, अपने में वह सामर्थ्य रखता था जो एक ही स्रोत से बहती है।
यह सामर्थ्य मस्तिष्क के क्षेत्र में बैठी थी, जहाँ से चार शक्तियाँ, ऊपर की टेट्राड के स्वरूप के अनुसार, निकलती हैं, और ये कहलाती हैं: 1ली, दृष्टि, 2रा, श्रवण, 3री, गन्ध, और 4था,(3) स्वाद। और वे कहते हैं कि ओग्डोअड मनुष्य के द्वारा इस प्रकार दिखाई जाती है: कि उसके दो कान हैं, उतनी ही संख्या में आँखें, दो नथुने भी, और दोहरा स्वाद, अर्थात् कड़वे और मीठे का। और भी, वे सिखाते हैं कि सम्पूर्ण मनुष्य ट्रायकोंटैड के पूरे स्वरूप को इस प्रकार धारण करता है: अपने हाथों में, अपनी अँगुलियों के द्वारा, वह डेकैड को धारण करता है; और अपने सारे शरीर में डुओडेकैड को, क्योंकि उसका शरीर बारह अंगों में विभक्त है; वे उसे इस प्रकार बाँटते हैं, जैसे सत्य का शरीर उनके द्वारा विभक्त किया जाता है--जिस बात के विषय में हम पहले ही कह चुके हैं।(4) परन्तु ओग्डोअड, अकथनीय और अदृश्य होने के कारण, आँतों में छिपी हुई समझी जाती है।
2. फिर, वे दृढ़ करते हैं कि सूर्य, महान ज्योति देनेवाला, टेट्राड की संख्या के संकेत से 4थे दिन रचा गया। वैसे ही, उनके अनुसार, मूसा के बनाए तम्बू के आँगन(5), मलमल, नीले, बैंगनी, और लाल रंग के बने होकर, उसी स्वरूप की ओर संकेत करते थे। और भी, वे मानते हैं कि याजक का लम्बा वस्त्र उसके पाँवों पर failing होता हुआ, चार पंक्तियों के बहुमूल्य पत्थरों से(6) सजा होने के कारण, टेट्राड को दिखाता है; और यदि पवित्रशास्त्र में और कोई बातें हों जिन्हें किसी प्रकार चार की संख्या में घसीटा जा सके, तो वे घोषित करते हैं कि उनकी सत्ता टेट्राड के उद्देश्य से थी। ओग्डोअड, फिर, इस प्रकार दिखाई गई:--वे दृढ़ करते हैं कि मनुष्य 8वें दिन रचा गया, क्योंकि कभी वे चाहते हैं कि वह 6वें दिन बनाया गया, और कभी 8वें पर, यदि संयोग से उनका अर्थ यह न हो कि उसका मिट्टी का भाग 6वें दिन रचा गया, पर उसका मांस का भाग 8वें पर, क्योंकि ये दो बातें उनके द्वारा अलग की जाती हैं। उनमें से कुछ यह भी मानते हैं कि एक मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप और समानता के अनुसार रचा गया, पुरुष-स्त्री रूप, और यह आत्मिक मनुष्य था; और कि दूसरा मनुष्य पृथ्वी से रचा गया।
3. और भी, वे घोषित करते हैं कि जलप्रलय में जहाज के विषय में की गई व्यवस्था, जिसके द्वारा आठ व्यक्ति बचाए गए,(7) उद्धार लानेवाली ओग्डोअड को अति स्पष्ट रूप से दिखाती है। दाऊद भी वही दिखाता है, अपने भाइयों के बीच आयु की दृष्टि से 8वाँ स्थान रखते हुए।(8) और भी, वह खतना जो 8वें दिन हुआ,(9) ऊपर की ओग्डोअड के खतने को दर्शाता था। एक शब्द में, पवित्रशास्त्र में वे जो कुछ आठ की संख्या से जोड़ा जा सकने योग्य पाते हैं, उसे वे ओग्डोअड के भेद को पूरा करनेवाला घोषित करते हैं। फिर, डेकैड के विषय में, वे मानते हैं कि वह उन दस जातियों से दिखाई जाती है जिन्हें परमेश्वर ने अब्राहम को निज भाग के लिए प्रतिज्ञा की।(10) दस वर्ष के बाद जब सारा ने अपनी दासी हागार को उसे दिया,(11) ताकि उसके द्वारा उसका पुत्र हो, तब उसकी की हुई व्यवस्था भी वही बात दिखाती थी। और भी, अब्राहम का वह सेवक जो रिबका के पास भेजा गया, और कुएँ पर उसे सोने के दस कंगन भेंट किए, और उसकी
भाई जिन्होंने उसे दस दिन रोके;, यारोबाम भी, जिसने दस sceptresa (गोत्र) पाए, और तम्बू के दस आँगन(3), और दस हाथ(4) [ऊँचे] खम्भे, और याकूब के दस पुत्र जो 1ले मिस्र में भेजे गए com,(5) मोल लेने को, और वे दस प्रेरित जिन्हें प्रभु अपने पुनरुत्थान के बाद दिखाई दिया,--थोमा(6) अनुपस्थित रहते हुए,--उनके अनुसार, अदृश्य डेकैड को दर्शाते थे।
4. डुओडेकैड के विषय में, जिसके सम्बन्ध में न्यूनता के विकार का भेद हुआ, जिस विकार से वे मानते हैं कि सब दृश्य वस्तुएँ रची गईं, वे दृढ़ करते हैं कि वह हर जगह [पवित्रशास्त्र में] स्पष्ट और प्रगट रूप से पाया जाता है। क्योंकि वे घोषित करते हैं कि याकूब के बारह पुत्र,(7) जिनसे बारह गोत्र भी निकले,- -महायाजक का सीनाबन्द, जो बारह बहुमूल्य पत्थर और बारह छोटी घंटियाँ धारण करता था,(8)--वे बारह पत्थर जो मूसा ने पर्वत के पाद पर रखे,(9)--वही संख्या जो यहोशू ने नदी में रखी,(10) और फिर, दूसरी ओर, वाचा के सन्दूक के ढोनेवाले,(11)--वे पत्थर जो एलिय्याह ने तब खड़े किए जब बछिया होमबलि के रूप में चढ़ाई गई;(12) प्रेरितों की संख्या भी; और, अन्त में, हर घटना जो अपने में बारह की संख्या समेटती है,--उनकी डुओडेकैड को प्रगट करती थी। और तब इन सब का मेल, जो ट्रायकोंटैड कहलाता है, वे नूह के जहाज से बलपूर्वक दिखाने का यत्न करते हैं, जिसकी ऊँचाई तीस हाथ थी;(13) शमूएल के विषय से, जिसने शाऊल को तीस अतिथियों में मुख्य स्थान दिया;(14) दाऊद से, जब उसने तीस दिन खेत में अपने को छिपाया;(15) उन लोगों से जो उसके साथ गुफा में गए; इस तथ्य से भी कि पवित्र तम्बू की लम्बाई (ऊँचाई) तीस हाथ थी;(16) और यदि उन्हें और कोई ऐसी संख्याएँ मिलें, तो भी वे इन्हें अपनी ट्रायकोंटैड पर लगाते हैं।
अध्याय 19.--पवित्रशास्त्र के वे अंश जिनसे वे सिद्ध करने का यत्न करते हैं कि सर्वोच्च पिता मसीह के आने से पहले अज्ञात था।
1. मैं इन विवरणों में यह भी जोड़ना आवश्यक समझता हूँ, जो पवित्रशास्त्र के अंशों को बिगाड़कर वे अपने प्रोपेटर के विषय में हमें समझाने का यत्न करते हैं, जो मसीह के आने से पहले सब के लिए अज्ञात था। इसमें उनका उद्देश्य यह दिखाना है कि हमारे प्रभु ने इस जगत के बनानेवाले से भिन्न एक और पिता का प्रचार किया, जिसे, जैसा हम पहले कह चुके हैं, वे अभक्ति से एक न्यूनता का फल घोषित करते हैं। उदाहरण के लिए, जब भविष्यद्वक्ता यशायाह कहता है, "परन्तु इस्राएल ने मुझे नहीं जाना, और मेरी प्रजा ने मुझे नहीं समझा,"(17)
वे उसके शब्दों को अदृश्य बाइथस की अज्ञानता के अर्थ में बिगाड़ते हैं। और होशे के द्वारा कही हुई बात, "उनमें सत्य नहीं, और न परमेश्वर का ज्ञान,"(18) उसी संकेत को देने का वे यत्न करते हैं। और, "कोई नहीं जो समझे, या जो परमेश्वर को खोजे: वे सब मार्ग से भटक गए, वे सब मिलकर निकम्मे हो गए,"(19) इसे वे बाइथस की अज्ञानता के विषय में कहा गया मानते हैं। मूसा के द्वारा कही हुई बात भी, "कोई मनुष्य परमेश्वर को देखकर जीवित न रहेगा,"(20) जैसा वे हमें समझाना चाहते हैं, वही संकेत रखती है।
2. क्योंकि वे झूठ से मानते हैं कि सृष्टिकर्ता भविष्यद्वक्ताओं को दिखाई दिया। पर यह वचन, "कोई मनुष्य परमेश्वर को देखकर जीवित न रहेगा," वे उसकी उस महानता के विषय में कहा गया मानेंगे जो सब से अनदेखी और अज्ञात है; और निश्चय ये शब्द, "कोई मनुष्य परमेश्वर को न देखेगा," अदृश्य पिता, जगत के बनानेवाले के विषय में कहे गए हैं, यह हम सब पर प्रकट है; पर वे उस बाइथस के विषय में नहीं हैं जिसे वे अस्तित्व में मन्त्र से बुलाते हैं, वरन सृष्टिकर्ता के विषय में (और वही अदृश्य परमेश्वर है), यह आगे चलकर दिखाया जाएगा। वे मानते हैं कि दानिय्येल ने भी वही बात प्रगट की जब उसने स्वर्गदूतों से दृष्टान्तों की व्याख्या माँगी, क्योंकि वह स्वयं उनसे अनजान था। पर स्वर्गदूत, उससे बाइथस के बड़े भेद को छिपाकर, उससे कहा, "दानिय्येल, अपना मार्ग शीघ्र जा, क्योंकि ये बातें बन्द हैं जब तक समझनेवाले उन्हें समझें, और श्वेत लोग श्वेत किए जाएँ."(21) और भी, वे अपने को श्वेत और अच्छी समझ के मनुष्य होने का घमण्ड करते हैं।
अध्याय 20.--मार्कोसियों के अप्रमाणित और कूटरचित लेख, उन सुसमाचारों के अंशों के साथ जिन्हें वे बिगाड़ते हैं।
1. ऊपर की [मिथ्या व्याख्याओं] के अतिरिक्त, वे असंख्य अप्रमाणित और कूटरचित लेख लाते हैं, जिन्हें उन्होंने स्वयं गढ़ा है, मूर्ख मनुष्यों के मनों को, और सत्य के लेखों से अनजान लोगों को घबरा देने के लिए। अन्य बातों के बीच, वे वह झूठी और दुष्ट कथा(22) आगे रखते हैं जो
बताती है कि हमारे प्रभु, जब वह अक्षर सीखते हुए बालक थे, गुरु के उनसे, जैसा रीति है, "अल्फा बोल," कहने पर, [जैसा उन्हें कहा गया] उत्तर दिया, "अल्फा।" पर जब, फिर, गुरु ने उन्हें "बीटा" कहने की आज्ञा दी, तो प्रभु ने उत्तर दिया, "तू 1ले मुझे बता अल्फा क्या है, तब मैं तुझे बताऊँगा बीटा क्या है।" इसे वे इस अर्थ में खोलते हैं कि वही अकेला अज्ञात को जानता था, जिसे उसने अल्फा के रूप के अधीन प्रगट किया।
2. सुसमाचारों में आनेवाले कुछ अंश भी उनसे उसी प्रकार का रंग पाते हैं, जैसा वह उत्तर जो उसने अपनी माता को बारह वर्ष की आयु में दिया: "क्या तुम नहीं जानते थे कि मुझे अपने पिता के काम में लगे रहना अवश्य है?"(1) इस प्रकार, वे कहते हैं, उसने उन्हें उस पिता का समाचार दिया जिसे वे नहीं जानते थे। इसी कारण, उसने चेलों को बारह गोत्रों के पास भेजा, कि वे उन्हें अज्ञात परमेश्वर का प्रचार करें। और जिस व्यक्ति ने उससे कहा, "हे अच्छे गुरु,"(2) उसने उस परमेश्वर को माना जो सच में अच्छा है, यह कहते हुए, "तू मुझे अच्छा क्यों कहता है: एक ही अच्छा है, स्वर्गों में पिता;"(3) और वे दृढ़ करते हैं कि इस वचन में आइयोन स्वर्गों का नाम पाते हैं। और भी, जिन्होंने उससे कहा, "तू यह किस अधिकार से करता है?"(4) उन्हें उत्तर न देकर, वरन अपनी ओर से एक प्रश्न से, उसने उन्हें पूरी घबराहट में डाल दिया; इस प्रकार उत्तर न देने से, उनकी व्याख्या के अनुसार, उसने पिता के अकथनीय स्वभाव को दिखाया। और भी, जब उसने कहा, "मैंने बार बार इन वचनों में से एक को सुनना चाहा, और मेरे पास कोई न था जो उसे बोल सके,"(5) वे मानते हैं, कि इस "एक" शब्द से उसने उस एक सच्चे परमेश्वर को प्रगट किया जिसे वे नहीं जानते थे। फिर, जब वह यरूशलेम के निकट आया, तो उस पर रोया और कहा, "यदि तू भी, इस अपने दिन में, जानता कि तेरी शान्ति की बातें कौन सी हैं, पर वे तुझ से छिपी हैं,"(6) इस "छिपी" शब्द से उसने बाइथस के गूढ़ स्वभाव को दिखाया। और फिर, जब उसने कहा, "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ, और मैं तुम्हें विश्राम दूँगा, और मुझ से सीखो,"(7) उसने सत्य के पिता का समाचार दिया। क्योंकि जिसे वे नहीं जानते थे, ये मनुष्य कहते हैं कि उसे सिखाने की उसने प्रतिज्ञा की।
3. पर वे निम्नलिखित वचन को सर्वोच्च साक्षी के रूप में,(8) और, मानो, अपनी पद्धति के मुकुट के रूप में लाते हैं:--"हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ, क्योंकि तू ने ये बातें ज्ञानियों और समझदारों से छिपा रखीं, और बालकों पर प्रगट कीं। हाँ, मेरे पिता; क्योंकि तेरी दृष्टि में ऐसा ही अच्छा लगा। सब वस्तुएँ मेरे पिता के द्वारा मुझे सौंपी गई हैं; पुत्र को छोड़ पिता को कोई नहीं जानता, और पिता को छोड़ पुत्र को कोई नहीं जानता, और वह जिसे पुत्र उसे प्रगट करना चाहे।"(9) इन शब्दों में वे दृढ़ करते हैं कि उसने स्पष्ट दिखाया कि सत्य का पिता, जिसे उन्होंने अस्तित्व में मन्त्र से बुलाया, उसके आगमन से पहले किसी को ज्ञात न था। और वे इस वचन को ऐसे अर्थ में लगाना चाहते हैं मानो यह सिखाता हो कि [जगत का] बनानेवाला और रचनेवाला सदा सब को ज्ञात था, जबकि प्रभु ने ये शब्द उस पिता के विषय में कहे जो सब के लिए अज्ञात है, जिसका वे अब प्रचार करते हैं।
अध्याय 21.--इन विधर्मियों के विमोचन विषयक विचार।
1. ऐसा होता है कि विमोचन(10) के विषय में उनकी परम्परा अदृश्य और अगम्य है, क्योंकि वह उन बातों की माता है जो अगम्य और अदृश्य हैं; और इस कारण, वह चंचल होने से, उसके स्वभाव को सरल रूप से और एक ही बार बताना असम्भव है, क्योंकि उनमें से हर एक उसे वैसे ही सौंपता है जैसे उसकी अपनी रुचि प्रेरित करती है। इस प्रकार "विमोचन" की योजनाएँ उतनी ही हैं जितने इन मर्ममय मतों के शिक्षक। और जब हम उनका खण्डन करने आएँगे, तो हम योग्य स्थान पर दिखाएँगे, कि इस वर्ग के मनुष्य शैतान से उकसाए गए हैं, उस बपतिस्मा के इन्कार के लिए जो परमेश्वर की ओर नया जन्म है, और इस प्रकार सम्पूर्ण [मसीही] विश्वास के त्याग के लिए।
2. वे मानते हैं कि जो सिद्ध ज्ञान तक पहुँचे हैं, उन्हें अवश्य उस सामर्थ्य में नया जन्म पाना है जो सब के ऊपर है। क्योंकि अन्यथा प्लेरोमा के भीतर प्रवेश पाना असम्भव है, क्योंकि यही [नया जन्म] उन्हें बाइथस की गहराइयों में नीचे ले जाता है। क्योंकि दृश्य यीशु द्वारा ठहराया बपतिस्मा पापों की क्षमा के लिए था, पर वह विमोचन जो उस मसीह ने लाया जो उस पर उतरा, सिद्धता के लिए था; और वे आरोप करते हैं कि पहला प्राणिक है, पर दूसरा आत्मिक। और यूहन्ना का बपतिस्मा मन-फिराव के उद्देश्य से प्रचारित हुआ, पर यीशु(11) का विमोचन सिद्धता के निमित्त लाया गया। और इसी की ओर वह संकेत करता है जब वह कहता है, "मुझे एक और बपतिस्मा से बपतिस्मा लेना है, और मैं उसकी ओर उत्सुकता से शीघ्रता करता हूँ।"(12) और भी, वे दृढ़ करते हैं कि प्रभु ने यह विमोचन जब्दी के पुत्रों पर जोड़ा, जब उनकी माता ने माँगा कि वे उसके राज्य में बैठें, एक उसकी दाहिनी ओर, और दूसरा उसकी बाईं ओर, यह कहते हुए, "क्या तुम उस बपतिस्मा से बपतिस्मा ले सकते हो जिससे मैं बपतिस्मा लूँगा?"(13) पौलुस ने भी, वे घोषित करते हैं, स्पष्ट शब्दों में बार बार उस विमोचन को रखा है जो मसीह में है
यीशु; और यही वह था जो उनके द्वारा इतने विविध और असंगत रूपों में सौंपा जाता है।
3. क्योंकि उनमें से कुछ विवाह की शय्या तैयार करते हैं, और दीक्षित किए जा रहे लोगों के साथ एक प्रकार की मर्म-विधि करते हैं (कुछ वाक्य बोलते हुए), और दृढ़ करते हैं कि यह एक आत्मिक विवाह है जो उनके द्वारा ऊपर के संयोगों की समानता पर मनाया जाता है। दूसरे, फिर, उन्हें उस स्थान पर ले जाते हैं जहाँ जल है, और इन शब्दों को बोलकर उन्हें बपतिस्मा देते हैं, "जगत के अज्ञात पिता के नाम में--सत्य में, जो सब वस्तुओं की माता है- -उसमें जो यीशु पर उतरा--एकता में, और विमोचन में, और शक्तियों के साथ सहभागिता में।" और भी दूसरे, दीक्षित किए जा रहे लोगों को और अधिक पूरी तरह घबराने के लिए, कुछ इब्री शब्द इस प्रकार दोहराते हैं: "बसेमा, खामोस्से, बाओएनाओरा, मिस्टाडिया, रुआदा, कौस्टा, बाबाफोर, कलाख्थेई."(1) इन पदों की व्याख्या इस प्रकार चलती है: "मैं उसको पुकारता हूँ जो पिता की हर सामर्थ्य के ऊपर है, जो ज्योति, और अच्छी आत्मा, और जीवन कहलाता है, क्योंकि तू ने देह में राज्य किया।" दूसरे, फिर, विमोचन को इस प्रकार रखते हैं: वह नाम जो हर देवता, और प्रभुता, और सत्य से छिपा है, जिसे नासरत के यीशु ने मसीह की ज्योति के जीवनों(2) में पहना--उस मसीह का, जो पवित्र आत्मा से जीवित है, स्वर्गदूतीय विमोचन के लिए।
पुनर्स्थापन का नाम इस प्रकार खड़ा है: मेस्सिया, उफारेग, नामेम्पसोएमान, खल्दोएउर, मोसोमेदोएआ, अक्फ्रानोए, प्सौआ, यीशु नजरारिया।(3) इन शब्दों की व्याख्या इस प्रकार है: "मैं मसीह की आत्मा को नहीं बाँटता, न हृदय को और न उस अतिस्वर्गीय सामर्थ्य को जो दयालु है; हे सत्य के उद्धारकर्ता, मैं तेरे नाम का आनन्द लूँ!" दीक्षा देनेवालों के शब्द ऐसे हैं; पर जो दीक्षित होता है, उत्तर देता है, "मैं स्थिर किया गया हूँ, और मैं छुड़ाया गया हूँ; मैं अपना प्राण को इस युग (जगत) से, और उससे जुड़ी सब वस्तुओं से इआओ के नाम में छुड़ाता हूँ, जिसने अपना प्राण को जीवित मसीह में विमोचन में छुड़ाया।" तब खड़े लोग ये शब्द जोड़ते हैं, "शान्ति हो उन सब पर जिन पर यह नाम टिकता है।" इसके बाद वे दीक्षित व्यक्ति का बलसान से अभिषेक करते हैं; क्योंकि वे दृढ़ करते हैं कि यह लेप उस मीठी सुगन्ध का रूप है जो सब वस्तुओं के ऊपर है।
4. पर उनमें से कुछ दृढ़ करते हैं कि लोगों को जल के पास लाना व्यर्थ है, पर तेल और जल को मिलाकर, वे यह मिश्रण दीक्षित होनेवालों के सिरों पर रखते हैं, ऐसी कुछ उक्तियों के प्रयोग के साथ जिनका हम पहले उल्लेख कर चुके हैं। और इसे वे विमोचन मानते हैं। वे भी बलसान से अभिषेक करने के अभ्यस्त हैं। दूसरे, तथापि, इन सब रीतियों को अस्वीकार करते हैं, और मानते हैं कि अकथनीय और अदृश्य सामर्थ्य का भेद दृश्य और नाशवान सृष्टियों से नहीं किया जाना चाहिए, और न उन [प्राणियों] का जो अकल्पनीय, और अशरीरी, और इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं, [किया जाना चाहिए] ऐसे लोगों से जो इन्द्रियों के विषय हैं, और देह रखते हैं। ये मानते हैं कि अकथनीय महानता का ज्ञान स्वयं सिद्ध विमोचन है। क्योंकि न्यूनता और विकार दोनों अज्ञान से बहे, इस प्रकार रची हुई वस्तु का सारा सार ज्ञान से नष्ट होता है; और इसलिए ज्ञान भीतरी मनुष्य का विमोचन है। यह, तथापि, दैहिक स्वभाव का नहीं, क्योंकि देह नाशवान है; और न यह प्राणिक है, क्योंकि प्राणिक प्राण एक न्यूनता का फल है, और, मानो, आत्मा का निवास है। इसलिए विमोचन आत्मिक स्वभाव का होना चाहिए; क्योंकि वे दृढ़ करते हैं कि भीतरी और आत्मिक मनुष्य ज्ञान के द्वारा छुड़ाया जाता है, और कि वे, सब वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करके, तब से और किसी वस्तु के मोहताज नहीं रहते। यह, तब, सच्चा विमोचन है।
5. और भी दूसरे हैं जो मृत्यु के क्षण तक भी व्यक्तियों को छुड़ाते रहते हैं, उनके सिरों पर तेल और जल, या पहले कथित लेप जल के साथ, रखकर, उसी समय ऊपर कथित पुकार का प्रयोग करते हुए, कि जिन व्यक्तियों की बात है वे प्रधानताओं और शक्तियों से पकड़े या देखे जाने के अयोग्य हो जाएँ, और उनका भीतरी मनुष्य अदृश्य रीति से ऊपर चढ़े, मानो उनकी देह इस जगत में सृजी वस्तुओं के बीच छोड़ दी गई हो, जबकि उनका प्राण डेमियर्ज की ओर आगे भेज दिया जाए। और वे उन्हें शिक्षा देते हैं, प्रधानताओं और शक्तियों तक पहुँचने पर, इन शब्दों का प्रयोग करें: "मैं पिता से एक पुत्र हूँ--वह पिता जिसकी पहले से सत्ता थी, और पहले से सत्तावान में एक पुत्र। मैं सब वस्तुओं को देखने आया हूँ, वे भी जो मेरी हैं और दूसरों की, यद्यपि, ठीक कहें तो, वे दूसरों की नहीं, पर अकामोथ की हैं, जो स्वभाव से स्त्री है, और उसने ये वस्तुएँ अपने लिए बनाईं। क्योंकि मैं अपनी सत्ता उससे पाता हूँ जो पहले से सत्तावान है, और मैं फिर अपने स्थान पर आता हूँ जहाँ से मैं निकला।" और वे दृढ़ करते हैं कि, ये बातें कहकर, वह शक्तियों से बच निकलता है। तब वह डेमियर्ज के साथियों के पास बढ़ता है, और उन्हें इस प्रकार सम्बोधित करता है:--"मैं उस स्त्री से अधिक बहुमूल्य पात्र हूँ जिसने तुम्हें रचा। यदि तुम्हारी माता अपने अवतरण से अनजान है, तो मैं अपने को जानता हूँ, और जानता हूँ मैं कहाँ से हूँ, और मैं अविनाशी सोफिया को पुकारता हूँ, जो पिता में है, और तुम्हारी माता की माता है, जिसका कोई पिता नहीं, और न कोई पुरुष साथी; पर एक स्त्री से उठी एक स्त्री ने तुम्हें रचा, अपनी माता से अनजान रहकर, और यह कल्पना करते हुए कि वही अकेली थी; पर मैं उसकी माता को पुकारता हूँ।" और वे घोषित करते हैं, कि जब डेमियर्ज के साथी ये शब्द सुनते हैं, तो वे बहुत घबरा जाते हैं, और अपनी उत्पत्ति और अपनी माता की जाति को धिक्कारते हैं।
पर वह अपने स्थान में जाता है, लिए हुए
अपनी जंजीर [उतार] फेंककर, अर्थात्, अपना प्राणिक स्वभाव। ये, तब, वे विवरण हैं जो "विमोचन"(1) के विषय में हम तक पहुँचे हैं। पर चूँकि वे आपस में शिक्षा और परम्परा दोनों में इतना अधिक भिन्न हैं, और चूँकि उनमें से जो सबसे आधुनिक माने जाते हैं वे प्रतिदिन कोई नया मत गढ़ने, और वह बाहर लाने का यत्न करते हैं जिसके विषय में पहले कभी किसी ने न सोचा, इसलिए उनके सब मतों का वर्णन करना कठिन बात है।
अध्याय 22.--विधर्मियों का सत्य से भटकना।
1. सत्य का वह नियम(2) जिसे हम थामे हैं, यह है, कि एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, जिसने अपने वचन से सब वस्तुएँ बनाईं, और जो अस्तित्व में न था उससे, जो अस्तित्व में है उन सब को गढ़ा और रचा। पवित्रशास्त्र इस भाव से यों कहता है "प्रभु के वचन से आकाश स्थिर किए गए, और उनकी सारी शक्ति, उसकी मुख की आत्मा से."(3) और फिर, "सब वस्तुएँ उसके द्वारा बनी, और उसके बिना कुछ न बना."(4) कोई अपवाद या घटती कही नहीं गई; पर पिता ने उसके द्वारा सब वस्तुएँ बनाईं, दृश्य हों या अदृश्य, इन्द्रिय की वस्तुएँ हों या बुद्धि की, काल की, उन्हें दिए किसी स्वभाव के कारण, या अनन्त; और इन अनन्त(5) वस्तुओं को उसने स्वर्गदूतों से, या अपनी एन्नोइया से अलग किसी शक्ति से नहीं बनाया। क्योंकि परमेश्वर को इन सब में से किसी की आवश्यकता नहीं, वरन वही है, जो अपने वचन और आत्मा से, सब वस्तुएँ बनाता, और व्यवस्थित करता, और शासन करता है, और सब वस्तुओं को अस्तित्व में आज्ञा देता है,--जिसने जगत को रचा (क्योंकि जगत सब का है),--जिसने मनुष्य को गढ़ा,--वह [जो](6) अब्राहम का परमेश्वर, और इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर है, जिसके ऊपर कोई दूसरा परमेश्वर नहीं, न आदि सिद्धान्त, न सामर्थ्य, न प्लेरोमा,--वही हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता है, जैसा हम सिद्ध करेंगे। इसलिए, इस नियम को थामे हुए, हम सहज दिखाएँगे, उनके मतों की बड़ी विविधता और भीड़ के होते हुए भी, कि ये मनुष्य सत्य से भटके हैं; क्योंकि विधर्मी सम्प्रदायों में से लगभग सब मानते हैं कि एक परमेश्वर है; पर तब, अपनी नाशकारी शिक्षाओं से, वे [इस सत्य को भ्रम में] बदल देते हैं, जैसा अन्यजाति मूर्तिपूजा के द्वारा करते हैं,--इस प्रकार अपने को बनानेवाले के प्रति कृतघ्न सिद्ध करते हैं।
और भी, वे परमेश्वर की कारीगरी को तुच्छ जानते हैं, अपने उद्धार के विरुद्ध बोलते हुए, अपने सबसे कटु दोषी बनते हुए, और झूठे साक्षी होते हुए [अपने ही विरुद्ध]। फिर भी, वे कितने ही अनिच्छुक हों, ये मनुष्य एक दिन शरीर में फिर जी उठेंगे, उसे मानने के लिए जो उन्हें मरे हुओं में से जिलाता है; पर अपने अविश्वास के कारण वे धर्मियों में गिने न जाएँगे।
2. इसलिए, क्योंकि सब विधर्मियों को पकड़ना और दोषी ठहराना एक जटिल और बहु रूप कार्य है, और क्योंकि हमारा उद्देश्य उन सब को उनके विशेष स्वभाव के अनुसार उत्तर देना है, हमने 1ले, उनके स्रोत और जड़ का विवरण देना आवश्यक समझा, ताकि, उनके अति उन्नत बाइथस का ज्ञान पाकर, तू उस वृक्ष के स्वभाव को समझ सके जिसने ऐसे फल उत्पन्न किए हैं।
अध्याय 23.--सीमोन मागुस और मेनान्दर की शिक्षाएँ और रीतियाँ।
1. शोमरोनी सीमोन वह जादूगर था जिसके विषय में लूका, प्रेरितों का चेला और अनुयायी, कहता है, "पर एक मनुष्य था, जिसका नाम सीमोन, जो पहले उस नगर में जादू के काम करता था, और शोमरोन की प्रजा को भटकाता था, यह प्रचार करते हुए कि वह स्वयं कोई महान है, जिसकी ओर सब ने ध्यान दिया, छोटे से लेकर बड़े तक, यह कहते हुए, यही परमेश्वर की वह सामर्थ्य है जो महान कहलाती है। और वे उसकी ओर झुके रहे, क्योंकि बहुत समय से उसने अपने टोनों से उन्हें उन्मत्त किया था."(7) यह सीमोन, तब--जिसने विश्वास का ढोंग किया, यह सोचकर कि प्रेरित स्वयं अपने चंगाइयाँ जादू की कला से करते थे, परमेश्वर की सामर्थ्य से नहीं; और उनके द्वारा प्रचार किए हुए के द्वारा, अर्थात् मसीह यीशु के द्वारा, परमेश्वर पर विश्वास करनेवालों को हाथ रखने से पवित्र आत्मा से भरने के विषय में--यह भी जादू के किसी बड़े ज्ञान से हुआ, ऐसा सन्देह करके, और प्रेरितों को धन देकर, सोचा कि वह भी यह सामर्थ्य पा सकता है कि जिसे चाहे उस पर पवित्र आत्मा दे,--पतरस ने इन शब्दों से उसे सम्बोधित किया: "तेरा धन तेरे साथ नाश हो, क्योंकि तू ने सोचा कि परमेश्वर का दान धन से मोल लिया जा सकता है: इस बात में तेरा न भाग है न अंश, क्योंकि परमेश्वर की दृष्टि में तेरा हृदय fight नहीं; क्योंकि मैं देखता हूँ कि तू कड़वाहट के पित्त में, और अधर्म के बन्धन में है."(8) तब वह, परमेश्वर पर रत्ती भर भी और विश्वास न रखकर, प्रेरितों के विरुद्ध झगड़ने को उत्सुक हुआ, ताकि वह स्वयं एक अद्भुत प्राणी जान पड़े, और सारी जादू कला के अध्ययन में और भी बड़े उत्साह से लगा, ताकि वह मनुष्यों की भीड़ को और अच्छी तरह घबराए और दबाए।
क्लौदियुस कैसर के राज्य में उसकी चाल ऐसी थी, जिसके द्वारा भी कहा जाता है कि वह एक मूर्ति से सम्मानित हुआ, उसके कारण
जादुई सामर्थ्य।(1) यह मनुष्य, तब, बहुतों से मानो वह एक परमेश्वर हो ऐसे महिमावान किया गया; और उसने सिखाया कि वही था जो यहूदियों के बीच पुत्र के रूप में प्रकट हुआ, पर शोमरोन में पिता के रूप में उतरा, जबकि वह अन्य जातियों के पास पवित्र आत्मा के रूप में आया। उसने अपने को, एक शब्द में, सब शक्तियों में सबसे ऊँचा, अर्थात् वह सत्ता जो सब के ऊपर पिता है, ऐसा दिखाया, और जिस किसी पदवी से लोग उसे सम्बोधित करना चाहें, उससे पुकारे जाने दिया।
2. अब शोमरोन का यह सीमोन, जिससे हर प्रकार के विधर्म अपनी उत्पत्ति पाते हैं, निम्नलिखित सामग्री से अपना सम्प्रदाय बनाया:--फोनीके के नगर सोर में दासत्व से हेलेना नाम की एक स्त्री को छुड़ाकर, वह उसे अपने साथ लिए फिरने का अभ्यस्त था, यह घोषित करते हुए कि यह स्त्री उसके मन की 1ली धारणा थी, सब की माता, जिसके द्वारा, आदि में, उसने अपने मन में स्वर्गदूतों और प्रधान स्वर्गदूतों को रचने का [विचार] गर्भ में लिया। क्योंकि यह एन्नोइया उससे कूदकर, और अपने पिता की इच्छा को समझकर, नीचे के क्षेत्रों [आकाश के] में उतरी, और स्वर्गदूतों और शक्तियों को जन्म दिया, जिनके द्वारा भी उसने घोषित किया कि यह वचन रचा गया। पर जब उसने उन्हें उत्पन्न किया, तो वे ईर्ष्या के कारण उसे रोके रहे, क्योंकि वे किसी दूसरे प्राणी की सन्तान माने जाना नहीं चाहते थे। उसके अपने विषय में, उन्हें उसका कुछ भी ज्ञान न था; पर उसकी एन्नोइया उन शक्तियों और स्वर्गदूतों से रोकी गई जो उसके द्वारा उत्पन्न हुए थे। उसने उनसे हर प्रकार का अपमान सहा, यहाँ तक कि वह अपने पिता की ओर ऊपर लौट न सकी, वरन एक मानव देह में भी बन्द कर दी गई, और युगों तक एक स्त्री देह से दूसरी में, पात्र से पात्र की नाईं, क्रम से गुजरती रही। उदाहरण के लिए, वह उस हेलेन में थी जिसके कारण ट्रोजन युद्ध आरम्भ हुआ; जिसके निमित्त स्तेसिखोरुस(2) भी अन्धा मारा गया, क्योंकि उसने अपनी कविताओं में उसे शाप दिया था, पर पीछे, पछताकर पालिनोड कहलानेवाले लेख लिखे, जिनमें उसने उसकी स्तुति गाई, और वह दृष्टि पा गया। इस प्रकार वह, देह से देह में जाती हुई, और उनमें से हर एक में अपमान सहती हुई, अन्त में एक साधारण वेश्या बनी; और खोई हुई भेड़ से वही अभिप्रेत थी।(3)
3. इस उद्देश्य से, तब, वह आया था कि उसे 1ले जीते, और उसे दासत्व से छुड़ाए, जबकि वह अपने को उन पर प्रगट करके मनुष्यों को उद्धार देता। क्योंकि स्वर्गदूत जगत पर बुरा राज्य करते थे, क्योंकि उनमें से हर एक प्रधान सामर्थ्य अपने लिए चाहता था, वह बातों को सुधारने आया था, और उतरा था, शक्तियों और प्रधानताओं और स्वर्गदूतों के रूप में बदलकर और उनके समान बनकर, ताकि वह मनुष्यों के बीच मनुष्य जान पड़े, यद्यपि वह मनुष्य न था; और इस प्रकार यह समझा गया कि उसने यहूदिया में दुःख उठाया, जबकि उसने दुःख न उठाया था। और भी, भविष्यद्वक्ताओं ने उन स्वर्गदूतों की प्रेरणा से भविष्यवाणी की जिन्होंने जगत को रचा; इस कारण जो उस पर और हेलेना पर भरोसा रखते हैं वे अब उनकी ओर ध्यान नहीं देते, पर, स्वतन्त्र होकर, जैसे चाहें वैसे जीते हैं; क्योंकि मनुष्य उसके अनुग्रह के द्वारा बचाए जाते हैं, अपने धर्म के कामों के कारण नहीं। क्योंकि ऐसे काम वस्तुओं के स्वभाव में धर्म नहीं, पर केवल संयोग से, जैसा उन स्वर्गदूतों ने उचित समझा जिन्होंने जगत बनाया, ऐसी आज्ञाओं के द्वारा मनुष्यों को दासत्व में लाने की खोज में। इस कारण, उसने प्रतिज्ञा की कि जगत मिटाया जाएगा, और जो उसके हैं वे जगत के बनानेवालों के राज्य से छुड़ाए जाएँगे।
4. इस प्रकार, तब, इस सम्प्रदाय के मर्म-याजक लम्पट जीवन भी बिताते हैं और जादू की कलाएँ भी करते हैं, हर एक अपनी सामर्थ्य की सीमा तक। वे भूत-निकाल और मन्त्र काम में लाते हैं। प्रेम-औषधियाँ भी, और ताबीज, तथा वे प्राणी जो "पारेड्री" (साथ रहनेवाले) और "ओनिरोपोम्पी" (स्वप्न भेजनेवाले) कहलाते हैं, और और जो भी विचित्र कलाएँ अपनाई जा सकें, उत्सुकता से उनकी सेवा में झोंक दी जाती हैं। उनके पास सीमोन की एक मूर्ति भी है जो बृहस्पति की समानता पर गढ़ी गई है, और हेलेना की दूसरी मिनर्वा के रूप में; और इनकी वे पूजा करते हैं। अन्त में, उनका नाम सीमोन से निकला है, इन अति अभक्त शिक्षाओं के रचयिता से, और वे सीमोनी कहलाते हैं; और उन्हीं से "ज्ञान, जो झूठ से ऐसा कहलाता है,"(4) ने अपना आरम्भ पाया, जैसा उनके अपने कथनों से भी जाना जा सकता है।
5. इस मनुष्य का उत्तराधिकारी मेनान्दर था, वह भी जन्म से शोमरोनी, और वह भी जादू के अभ्यास में सिद्ध निपुण था। वह दृढ़ करता है कि प्रधान सामर्थ्य सब के लिए अज्ञात बनी रहती है, पर वह स्वयं वह व्यक्ति है जो अदृश्य प्राणियों की उपस्थिति से मनुष्यों की मुक्ति के लिए एक उद्धारकर्ता होकर भेजा गया है। जगत स्वर्गदूतों से बना, जिन्हें, सीमोन की नाईं, वह एन्नोइया से उत्पन्न हुआ मानता है। वह भी, जैसा वह दृढ़ करता है, उस जादू के द्वारा जिसे वह सिखाता है, इस भाव का ज्ञान देता है, कि कोई उन स्वर्गदूतों पर भी जय पा सकता है जिन्होंने जगत बनाया; क्योंकि उसके चेले उसमें बपतिस्मा पाकर पुनरुत्थान प्राप्त करते हैं, और फिर मर नहीं सकते, पर अमर यौवन के अधिकार में बने रहते हैं।
अध्याय 24. -- सातुर्निनुस और बसिलिदेस की शिक्षाएँ।
1. इन मनुष्यों के बीच उठकर, सातुर्निनुस (जो उस अन्ताकिया का था जो दफ्ने के निकट है) और बसिलिदेस ने कुछ अनुकूल अवसर पकड़े, और भिन्न पद्धतियों का
शिक्षा--एक सीरिया में, दूसरा सिकन्दरिया में। सातुर्निनुस ने, मेनान्दर की नाईं, एक पिता को रखा जो सब के लिए अज्ञात है, जिसने स्वर्गदूत, प्रधान स्वर्गदूत, शक्तियाँ, और अधिकारी बनाए। जगत, फिर, और उसमें की सब वस्तुएँ, सात स्वर्गदूतों के एक दल से बनी। मनुष्य भी स्वर्गदूतों की कारीगरी था, सर्वोच्च सामर्थ्य की उपस्थिति से नीचे फूटती एक चमकती प्रतिमा; और जब वे, वह कहता है, इसे थामे न रख सके, क्योंकि यह तुरन्त फिर ऊपर को उछली, तो उन्होंने एक दूसरे को उभारा, यह कहते हुए, "आओ हम मनुष्य को अपने स्वरूप और समानता के अनुसार बनाएँ."(1) वह तदनुसार रचा गया, फिर भी सीधा खड़ा न हो सका, स्वर्गदूतों की उस सामर्थ्य को उसे पहुँचाने की असमर्थता से, पर कीड़े की नाईं [भूमि पर] छटपटाया। तब ऊपर की सामर्थ्य ने उस पर दया की, क्योंकि वह उसकी समानता पर बना था, और जीवन की एक चिनगारी भेजी, जिसने मनुष्य को सीधी स्थिति दी, उसके जोड़ों को जकड़ा, और उसे जिलाया। इसलिए वह घोषित करता है, कि यह जीवन की चिनगारी, मनुष्य की मृत्यु के बाद, उन्हीं वस्तुओं की ओर लौटती है जो उसके समान स्वभाव की हैं, और देह का शेष अपने मूल तत्त्वों में गल जाता है।
2. उसने यह भी सत्य ठहराया, कि उद्धारकर्ता जन्म रहित, देह रहित, और आकृति रहित था, पर कल्पना से एक दृश्य मनुष्य था; और उसने माना कि यहूदियों का परमेश्वर स्वर्गदूतों में से एक था; और, इस कारण, क्योंकि सब शक्तियाँ उसके पिता को मिटाना चाहती थीं, मसीह यहूदियों के परमेश्वर को नाश करने आया, पर उनको बचाने जो उस पर विश्वास करते हैं; अर्थात्, जो उसके जीवन की चिनगारी रखते हैं। यह विधर्मी 1ला था जो यह दृढ़ करे कि स्वर्गदूतों से दो प्रकार के मनुष्य रचे गए,--एक दुष्ट, और दूसरा अच्छा। और क्योंकि दुष्टात्माएँ सबसे दुष्टों की सहायता करती हैं, उद्धारकर्ता दुष्ट मनुष्यों और दुष्टात्माओं के नाश के लिए आया, पर अच्छों के उद्धार के लिए। वे यह भी घोषित करते हैं, कि विवाह और जन्म शैतान से हैं।(2) उसके मत के बहुत से लोग भी पशु-भोजन से दूर रहते हैं, और इस प्रकार के reigned संयम से भीड़ को खींचते हैं। वे यह भी मानते हैं, कि कुछ भविष्यवाणियाँ उन स्वर्गदूतों से कही गईं जिन्होंने जगत बनाया, और कुछ शैतान से; जिसे सातुर्निनुस स्वयं एक स्वर्गदूत दिखाता है, जगत के रचनेवालों का शत्रु, पर विशेषकर यहूदियों के परमेश्वर का।
3. बसिलिदेस फिर, कि वह कुछ और उदात्त और विश्वसनीय खोज पाया जान पड़े, अपनी शिक्षाओं को अपार विस्तार देता है। वह रखता है कि नूस अजन्मा पिता से 1ला जन्मा, कि उससे, फिर, लोगोस जन्मा, लोगोस से फ्रोनेसिस, फ्रोनेसिस से सोफिया और डाइनामिस, और डाइनामिस और सोफिया से शक्तियाँ, और प्रधानताएँ, और स्वर्गदूत, जिन्हें वह 1ले भी कहता है; और कि उन्हीं से 1ला स्वर्ग बना। तब अन्य शक्तियाँ, इनसे निकलकर रची जाकर, 1ले के समान एक और स्वर्ग crated; और उसी रीति से, जब अन्य, फिर, उनसे निकलकर रचे गए, ठीक उनके ऊपरवालों के अनुरूप, तो इन्होंने भी एक और 3रा स्वर्ग रचा; और तब इस 3रे से, नीचे के क्रम में, वंशजों की 4थी पंक्ति हुई; और इसी प्रकार आगे, उसी ढंग से, वे घोषित करते हैं कि और अधिक प्रधानताएँ और स्वर्गदूत रचे गए, और तीन सौ पैंसठ स्वर्ग।(3) इसलिए वर्ष में दिनों की वही संख्या है, स्वर्गों की संख्या के अनुरूप।
4. वे स्वर्गदूत जो सबसे नीचे के स्वर्ग पर हैं, अर्थात् जो हमें दिखाई देता है, उन्होंने जगत में की सब वस्तुओं को रचा, और पृथ्वी का और उन जातियों का जो उस पर हैं आपस में बँटवारा किया। उनका प्रधान वह है जो यहूदियों का परमेश्वर समझा जाता है; और क्योंकि वह अन्य जातियों को अपनी प्रजा के, अर्थात् यहूदियों के, अधीन करना चाहता था, तो अन्य सब राजकुमारों ने उसका विरोध किया और उसके सामने खड़े हुए। इसलिए अन्य सब जातियाँ उसकी जाति से बैर रखती थीं। पर जन्म रहित और नाम रहित पिता, यह देखकर कि वे नाश हो जाएँगे, अपने 1ले जन्मे नूस को (वही मसीह कहलाता है) भेजा, कि उस पर विश्वास करनेवालों को जगत के बनानेवालों की सामर्थ्य से छुटकारा दे। वह, तब, पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में, इन शक्तियों की जातियों को दिखाई दिया, और आश्चर्यकार्य किए। इसलिए उसने स्वयं मृत्यु न सही, पर कुरेने का एक मनुष्य सीमोन, विवश किया जाकर, उसके बदले क्रूस उठाए; यहाँ तक कि यह पिछला उसके द्वारा रूप बदलकर, कि वह यीशु समझा जाए, अज्ञान और भ्रम से क्रूस पर चढ़ाया गया, जबकि यीशु ने स्वयं सीमोन का रूप लिया, और पास खड़ा होकर उन पर हँसा। क्योंकि वह अशरीरी सामर्थ्य था, और अजन्मे पिता का नूस (मन), उसने अपनी इच्छा से अपना रूप बदला, और इस प्रकार उसे भेजनेवाले के पास चढ़ गया, उनकी हँसी उड़ाता हुआ, क्योंकि वह पकड़ा न जा सकता था, और सब के लिए अदृश्य था। तब, जो ये बातें जानते हैं वे उन प्रधानताओं से छूट गए हैं जिन्होंने जगत रचा; यहाँ तक कि हमें उसे मानना कर्तव्य नहीं जो क्रूस पर चढ़ाया गया, पर उसे जो मनुष्य के रूप में आया, और क्रूस पर चढ़ाया गया समझा गया, और यीशु कहलाया, और पिता से भेजा गया, कि इस प्रबन्ध से वह जगत के बनानेवालों के कामों को नाश करे।
इसलिए, यदि कोई, वह घोषित करता है, क्रूस पर चढ़ाए हुए को मानता है, तो वह मनुष्य अभी भी दास है, और उन लोगों की सामर्थ्य के अधीन है जिन्होंने हमारी देहें रचीं; पर जो उसका इन्कार करता है वह इन प्राणियों से छूट गया है, और अजन्मे पिता के प्रबन्ध से परिचित है।
5. उद्धार केवल प्राण का है, क्योंकि देह स्वभाव से नाश के अधीन है। वह यह भी घोषित करता है, कि भविष्यवाणियाँ उन शक्तियों से निकलीं जो जगत की बनानेवाली थीं, पर व्यवस्था विशेष रूप से उनके प्रधान ने दी, जिसने प्रजा को मिस्र देश से बाहर निकाला। वह मूर्तियों को बलि चढ़ाए मांस [के विषय के प्रश्न] को कोई महत्व नहीं देता, उन्हें निष्फल समझता है, और बिना किसी हिचकिचाहट के उनका उपयोग करता है; अन्य वस्तुओं के उपयोग को, और हर प्रकार की लालसा के आचरण को, वह पूर्ण उदासीनता की बात मानता है। ये मनुष्य, और भी, जादू करते हैं; और मूर्तियाँ, मन्त्र, पुकार, और हर अन्य प्रकार की विचित्र कला काम में लाते हैं। कुछ नाम भी गढ़कर मानो वे स्वर्गदूतों के हों, वे इनमें से कुछ को 1ले स्वर्ग के, और अन्य को 2रे स्वर्ग के घोषित करते हैं; और तब वे कल्पित तीन सौ पैंसठ स्वर्गों के नाम, सिद्धान्त, स्वर्गदूत, और शक्तियाँ रखने का यत्न करते हैं। वे यह भी दृढ़ करते हैं कि वह बर्बर नाम जिसमें उद्धारकर्ता चढ़ा और उतरा, कौलकाउ है।(1)
6. तब, जिसने [ये बातें] सीख लीं, और सब स्वर्गदूतों और उनके कारणों को जान लिया, वह स्वर्गदूतों और सब शक्तियों के लिए अदृश्य और अगम्य कर दिया जाता है, जैसा कौलकाउ भी था। और जैसे पुत्र सब के लिए अज्ञात था, वैसे ही वे भी किसी से जाने न जाएँ; पर जब वे सब को जानते हैं, और सब में से होकर जाते हैं, वे स्वयं सब के लिए अदृश्य और अज्ञात रहते हैं; क्योंकि, "तू," वे कहते हैं, "सब को जान, पर कोई तुझे न जाने।" इस कारण, ऐसे विश्वास के लोग [अपने मतों को] वापस लेने को भी तैयार हैं, हाँ, बल्कि, केवल एक नाम के कारण उनका दुःख उठाना असम्भव है, क्योंकि वे सब के समान हैं। भीड़, तथापि, इन बातों को नहीं समझ सकती, पर हजार में से केवल एक, या दस हजार में से दो। वे घोषित करते हैं कि वे अब यहूदी नहीं, और अभी मसीही नहीं; और कि उनके भेदों को खुले रूप में कहना बिलकुल उचित नहीं, पर मौन रखकर उन्हें गुप्त रखना ठीक है।
7. वे तीन सौ पैंसठ स्वर्गों की स्थानीय स्थिति वैसे ही निकालते हैं जैसे गणितज्ञ करते हैं। क्योंकि, इन पिछलों के प्रमेयों को मानकर, उन्होंने उन्हें अपनी शिक्षा के रूप में लगा दिया है। वे मानते हैं कि उनका प्रधान अब्राक्सास है;(2) और, इस कारण, वह शब्द अपने में तीन सौ पैंसठ तक पहुँचती संख्याएँ रखता है।
अध्याय 25.--कार्पोक्रातेस की शिक्षाएँ।
1. कार्पोक्रातेस, फिर, और उसके अनुयायी मानते हैं कि जगत और उसमें की वस्तुएँ अजन्मा पिता से बहुत हीन स्वर्गदूतों से सृजी गईं। वे यह भी मानते हैं कि यीशु यूसुफ का पुत्र था, और अन्य मनुष्यों के ठीक समान था, केवल इस बात को छोड़कर कि वह उनसे इस प्रकार भिन्न था, कि उसका प्राण स्थिर और शुद्ध था, इसलिए उसने उन बातों को सिद्ध रूप से स्मरण किया जिन्हें उसने अजन्मे परमेश्वर के क्षेत्र के भीतर देखा था(3)। इस कारण, पिता से एक सामर्थ्य उस पर उतरी, कि उसके द्वारा वह जगत के रचनेवालों से बच निकले; और वे कहते हैं कि वह, उन सब में से होकर, और सब बातों में स्वतन्त्र रहकर, फिर उसके पास, और शक्तियों के पास,(4) चढ़ गई, जो उसी रीति से अपने समान वस्तुओं को अपना लेती थीं। वे और भी घोषित करते हैं, कि यीशु का प्राण, यद्यपि यहूदियों की रीतियों में शिक्षित था, इन्हें तुच्छ जानता था, और इस कारण उसे शक्तियाँ दी गईं, जिनके द्वारा उसने उन विकारों को नाश किया जो मनुष्यों में दण्ड के रूप में [उनके पापों के लिए] बसे थे।
2. इसलिए, जो प्राण मसीह के समान है वह उन शासकों को तुच्छ जान सकता है जो जगत के रचनेवाले थे, और, उसी रीति से, वही फल सिद्ध करने की सामर्थ्य पाता है। इस विचार ने उन्हें घमण्ड की ऐसी ऊँचाई पर उठाया है, कि उनमें से कुछ अपने को यीशु के समान घोषित करते हैं; जबकि दूसरे, और भी बलवान, मानते हैं कि वे उसके चेलों से श्रेष्ठ हैं, जैसे पतरस और पौलुस, और शेष प्रेरित, जिन्हें वे किसी बात में यीशु से हीन नहीं समझते। क्योंकि उनके प्राण, उसी क्षेत्र से उतरकर जहाँ से उसका उतरा, और इसलिए जगत के रचनेवालों को उसी रीति से तुच्छ जानकर, उसी सामर्थ्य के योग्य गिने जाते हैं, और फिर उसी स्थान को चले जाते हैं। पर यदि कोई इस जगत की वस्तुओं को उससे अधिक तुच्छ जाने, तो वह अपने को उससे श्रेष्ठ सिद्ध करता है।
3. वे जादू की कलाएँ और मन्त्र भी करते हैं; प्रेम-द्रव्य भी, और प्रेम-पान; और साथ रहनेवाली आत्माओं, स्वप्न भेजनेवाली दुष्टात्माओं, और अन्य घृणित बातों का सहारा लेते हैं, यह घोषित करते हुए कि उनके पास सामर्थ्य है कि वे अभी भी इस जगत के राजकुमारों और रचनेवालों पर राज्य करें; और केवल उन पर नहीं, वरन उसमें की सब वस्तुओं पर भी। ये मनुष्य, अन्यजातियों की नाईं, कलीसिया पर अपमान लाने के लिए शैतान से(5) भेजे गए हैं, ताकि, किसी न किसी रीति से, मनुष्य उनकी कही बातों को सुनकर, और यह कल्पना करके कि हम सब वैसे ही हैं जैसे वे, सत्य के प्रचार से अपने कान फेर लें; या, फिर, उनके किए कामों को देखकर, बुरा कहें
हम सब की, जिनका वास्तव में उनसे कोई सहभाग नहीं, न शिक्षा में, न नैतिकता में, न हमारे प्रतिदिन के आचरण में। पर वे स्वच्छन्द जीवन बिताते हैं,(1) और, अपनी अभक्त शिक्षाओं को छिपाने के लिए, वे [मसीह के] नाम का दुरुपयोग करते हैं, अपनी दुष्टता को छिपाने के साधन के रूप में; यहाँ तक कि "उनका दण्ड न्यायसंगत है,"(2) जब वे परमेश्वर से अपने कामों के योग्य बदला पाते हैं।
4. उनका उन्माद इतना निरंकुश है, कि वे घोषित करते हैं कि अधार्मिक और अभक्त सब बातें उनके अधिकार में हैं, और उन्हें करने की उन्हें स्वतन्त्रता है; क्योंकि वे मानते हैं कि वस्तुएँ केवल मनुष्य की राय के बल पर बुरी या अच्छी हैं।(3) इसलिए वे आवश्यक समझते हैं, कि देह से देह में संक्रमण के द्वारा, प्राण हर प्रकार के जीवन का और हर प्रकार के काम का अनुभव करें (यदि सचमुच, एक ही अवतार से, कोई अन्य की आवश्यकता को रोक सके, एक ही बार, और समान पूर्णता से, वे सब बातें करके जिनके विषय में हम न बोलने का और न सुनने का साहस करते हैं, बल्कि, जिन्हें हमें अपने विचारों में भी कल्पना नहीं करनी, और न विश्वसनीय समझना, यदि ऐसी कोई बात हमारे सहनागरिक उन लोगों के बीच उठाई जाए), ताकि, जैसा उनके लेख व्यक्त करते हैं, उनके प्राण, हर प्रकार के जीवन की परीक्षा करके, अपने प्रस्थान पर, किसी बात में कमी न रहें। इस पर जोर देना आवश्यक है,(4) कहीं ऐसा न हो कि उनके छुटकारे के लिए अभी कोई एक बात कमी रह जाने के कारण, वे फिर देह धारण करने को विवश हों। वे दृढ़ करते हैं कि इस कारण यीशु ने यह दृष्टान्त कहा:--"जब तक तू अपने विरोधी के साथ मार्ग में है, पूरा यत्न कर, कि तू उससे छूट जाए, कहीं वह तुझे न्यायी को सौंप न दे, और न्यायी तुझे अधिकारी को सौंप न दे, और वह तुझे बन्दीगृह में न डाले। मैं तुझ से सच कहता हूँ, जब तक तू अन्तिम पाई न चुकाए, वहाँ से बाहर न निकलेगा."(5) वे यह भी घोषित करते हैं कि "विरोधी" उन स्वर्गदूतों में से एक है जो जगत में हैं, जिसे वे शैतान कहते हैं, यह मानते हुए कि वह इस उद्देश्य से रचा गया, कि वह उन प्राणों को जगत से जो नष्ट हो चुकी हैं सर्वोच्च शासक के पास ले जाए।
वे उसे जगत के बनानेवालों में प्रधान भी बताते हैं, और मानते हैं कि वह ऐसी प्राणों को [जिनका उल्लेख हुआ है] दूसरे स्वर्गदूत को सौंपता है, जो उसकी सेवा करता है, कि वह उन्हें अन्य देहों में बन्द करे; क्योंकि वे घोषित करते हैं कि देह "बन्दीगृह" है। फिर, वे इन उक्तियों का, "जब तक तू अन्तिम पाई न चुकाए, वहाँ से बाहर न निकलेगा," यह अर्थ करते हैं कि कोई उन स्वर्गदूतों की सामर्थ्य से नहीं बच सकता जिन्होंने जगत बनाया, पर उसे देह से देह में जाना होगा, जब तक इस जगत में किए जा सकने वाले हर प्रकार के काम का अनुभव न हो, और जब उसके लिए और कुछ कमी न रहे, तब उसका छुड़ाया हुआ प्राण उन स्वर्गदूतों से ऊपर के उस परमेश्वर की ओर उड़ जाए, जो जगत के बनानेवाले हैं। इस रीति से भी सब प्राण बचाए जाते हैं, चाहे उनके अपने, जो हर देर से बचकर, एक अवतार में हर प्रकार के कामों में भाग लेते हैं, या वे, फिर, जो देह से देह में जाकर छूटते हैं, जब वे उस हर जीवन-रूप में आवश्यक बात को पूरा करते हैं जिसमें वे भेजे जाते हैं, यहाँ तक कि अन्त में वे फिर [देह में बन्द न रहें।
5. और इस प्रकार, यदि उनके बीच अधर्मी, अवैध, और निषिद्ध काम किए जाते हैं, तो उन्हें ऐसा मानने का आधार मुझे अब नहीं मिलता।(6) और उनके लेखों में हम इस प्रकार पढ़ते हैं, वह व्याख्या जो वे देते हैं [अपने विचारों की], यह घोषित करते हुए कि यीशु ने अपने चेलों और प्रेरितों से एकान्त में भेद में बात की, और कि उन्होंने अनुमति माँगी और पाई कि इस प्रकार सिखाई गई बातें और लोगों को सौंपें जो योग्य और विश्वास करनेवाले हों। हम, सचमुच, विश्वास और प्रेम के द्वारा बचाए जाते हैं; पर अन्य सब बातें, अपने स्वभाव में उदासीन रहते हुए, मनुष्यों की राय से गिनी जाती हैं--कुछ अच्छी और कुछ बुरी, स्वभाव से सचमुच बुरा कुछ नहीं।
6. उनमें से दूसरे बाहरी चिह्न काम में लाते हैं, अपने चेलों के दाहिने कान की लौ के भीतर दाग लगाते हुए। इन्हीं में से मार्सेल्लीना भी उठी, जो [अनीकेतुस के अध्यक्ष काल में] रोम आई, और, इन शिक्षाओं को थामे, उसने भीड़ को भटकाया। वे अपने को ज्ञोस्टिक कहते हैं। उनके पास मूर्तियाँ भी हैं, उनमें से कुछ चित्रित, और अन्य भिन्न प्रकार की सामग्री से बनी; और वे मानते हैं कि मसीह की एक समानता पिलातुस ने उस समय बनाई जब यीशु उनके बीच रहता था।(7) वे इन मूर्तियों पर मुकुट रखते हैं, और उन्हें जगत के दार्शनिकों की मूर्तियों के साथ खड़ा करते हैं, अर्थात्, पाइथागोरस, और प्लेटो, और अरस्तू, और शेष की मूर्तियों के साथ। इन मूर्तियों का आदर करने की और रीतियाँ भी उनके पास हैं, अन्यजातियों की उसी रीति के अनुसार।
अध्याय 26.--केरिन्थुस, इबियोनी, और निकोलाईयों की शिक्षाएँ।
1. केरिन्थुस, फिर, एक मनुष्य जो मिस्रियों की बुद्धि में शिक्षित(8) था, उसने सिखाया कि जगत प्रधान परमेश्वर से नहीं बना, पर एक ऐसी सामर्थ्य से जो उससे बहुत अलग थी, और उस प्रधानता से दूर जो su-
preme विश्व के ऊपर, और सब के ऊपर वाले से अनजान। उसने यीशु को कुँवारी से जन्मा नहीं, परन्तु यूसुफ और मरियम का पुत्र, मानव जन्म के साधारण क्रम के अनुसार, दर्शाया, यद्यपि वह अन्य मनुष्यों से अधिक धर्मी, समझदार और ज्ञानी था। इसके अतिरिक्त, उसके बपतिस्मा के बाद, मसीह सर्वोच्च शासक से कबूतर के रूप में उस पर उतरा, और तब उसने अज्ञात पिता का प्रचार किया, और चमत्कार किए। परन्तु अन्त में मसीह यीशु से चला गया, और तब यीशु ने दुःख सहा और फिर जी उठा, जबकि मसीह दुःख न सहने वाले के रूप में रहा, क्योंकि वह एक आत्मिक प्राणी था।
2. एबियोनी कहलाए जाने वाले मानते हैं कि जगत परमेश्वर के द्वारा बनाया गया; परन्तु प्रभु के विषय में उनके विचार केरिन्थुस और कर्पोक्रातेस के विचारों के समान हैं। वे केवल मत्ती के अनुसार सुसमाचार का उपयोग करते हैं, और प्रेरित पौलुस को ठुकराते हैं, यह मानकर कि वह व्यवस्था से धर्मत्यागी था। भविष्यद्वाणी के लेखों के विषय में, वे उन्हें कुछ विलक्षण रीति से समझाने का प्रयत्न करते हैं: वे खतना करते हैं, व्यवस्था द्वारा आज्ञा दी गई उन रीतियों के पालन में स्थिर रहते हैं, और अपनी जीवन-शैली में इतने यहूदी हैं, कि वे यरूशलेम की भी आराधना करते हैं, मानो वह परमेश्वर का घर हो।
3. नीकोलाइती उस नीकोलास के अनुयायी हैं, जो प्रेरितों के द्वारा सेवकाई के लिये पहले ठहराए गए सात में से एक था।(1) वे अनियन्त्रित आसक्ति का जीवन जीते हैं। इन मनुष्यों का स्वभाव यूहन्ना के प्रकाशितवाक्य में बहुत स्पष्ट रीति से दिखाया गया है, [जब वे दर्शाए जाते हैं] व्यभिचार करना और मूर्तियों को बलि की हुई वस्तुएँ खाना उदासीन बात है, यह सिखाते हुए। इसलिये वचन ने भी उनके विषय में इस प्रकार कहा है: "परन्तु तेरे पास यह है, कि तू नीकोलाइतियों के कामों से बैर रखता है, जिन से मैं भी बैर रखता हूँ।"(2)
अध्याय सत्ताईस.--सेर्दो और मार्कियन की शिक्षाएँ।
1. सेर्दो वह था जिसने अपनी पद्धति शमौन के अनुयायियों से ली, और रोम में हिगिनुस के समय रहने आया, जिसने प्रेरितों से नीचे की ओर धर्माध्यक्षों के उत्तराधिकार में नौवाँ स्थान धारण किया। उसने सिखाया कि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा प्रचारित परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता नहीं था। क्योंकि पहला जाना हुआ था, परन्तु दूसरा अज्ञात; और एक धर्मी भी था, परन्तु दूसरा कृपालु।
2. पुन्तुस के मार्कियन ने उसका स्थान लिया, और उसकी शिक्षा को बढ़ाया। ऐसा करते हुए, उसने उसके विरुद्ध सब से साहसी निन्दा आगे बढ़ाई, जो व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा परमेश्वर के रूप में प्रचारित है, यह घोषित करते हुए कि वह बुराइयों का कर्ता है, युद्ध में आनन्द लेता है, उद्देश्य में दुर्बल है, और स्वयं अपने विपरीत भी है। परन्तु यीशु, उस पिता से निकला हुआ जो जगत को बनाने वाले परमेश्वर के ऊपर है, और तिबेरियुस कैसर के प्रोक्यूरेटर, राज्यपाल पुन्तियुस पीलातुस के समय में यहूदिया में आकर, यहूदिया में रहने वालों पर मनुष्य के रूप में प्रगट हुआ, भविष्यद्वक्ताओं और व्यवस्था को, और उस परमेश्वर के सब कामों को जो जगत को बनाया, मिटाते हुए, जिसे वह कॉस्मोक्राटोर भी कहता है। इसके अतिरिक्त, वह लूका के अनुसार सुसमाचार को काटता है, प्रभु की उत्पत्ति के विषय में जो कुछ लिखा है उसे हटाते हुए, और प्रभु की शिक्षा का बहुत सा भाग अलग करते हुए, जिसमें प्रभु ने अत्यन्त प्रिय रीति से यह स्वीकार किया हुआ लिखा है कि इस विश्व का बनाने वाला उसका पिता है। उसी प्रकार उसने अपने शिष्यों को मना लिया कि वह स्वयं उन प्रेरितों से अधिक विश्वास के योग्य है, जिन्होंने सुसमाचार हमें सौंपा है, उन्हें सुसमाचार नहीं, परन्तु केवल उसका एक खण्ड देते हुए। उसी रीति से उसने पौलुस की पत्रियों को भी टुकड़े-टुकड़े किया, उस परमेश्वर के विषय में प्रेरित के द्वारा कही गई सब बातों को हटाते हुए, जो जगत को बनाया, इस भाव से कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता है, और भविष्यद्वाणी के लेखों से उन अंशों को भी जिन्हें प्रेरित उद्धृत करता है, यह सिखाने के लिये कि उन्होंने प्रभु के आने की पहले से घोषणा की।
3. उद्धार केवल उन प्राणों को प्राप्त होगा, जिन्होंने उसकी शिक्षा सीखी थी; जबकि देह, पृथ्वी से ली गई होने के कारण, उद्धार में भाग लेने में असमर्थ है। स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध अपनी निन्दा के अतिरिक्त, उसने यह भी आगे बढ़ाया, सचमुच शैतान के मुख से बोलते हुए, और सत्य के सीधे विरोध में सब बातें कहते हुए,--कि कैन, और उसके समान लोग, और सदोमी, और मिस्री, और उनके समान अन्य, और अन्त में वे सब जातियाँ जो सब प्रकार की घृणा में चलीं, प्रभु के द्वारा बचाई गईं, जब वह हेडस में उतरा, और जब वे उसकी ओर दौड़े, और कि उन्होंने उसे अपने राज्य में स्वागत किया। परन्तु मार्कियन में जो सर्प(3) था, उसने घोषित किया कि हाबिल, और हनोक, और नूह, और कुलपिता अब्राहम से निकले(4) वे अन्य धर्मी पुरुष, सब भविष्यद्वक्ताओं समेत, और जो परमेश्वर को प्रसन्न थे, उद्धार में सम्मिलित नहीं हुए। क्योंकि ये मनुष्य, वह कहता है, जानते थे कि उनका परमेश्वर निरन्तर उन्हें परख रहा था, इसलिये अब उन्होंने सन्देह किया कि वह उन्हें परख रहा है, और यीशु की ओर नहीं दौड़े, और न उसकी घोषणा पर विश्वास किया: और इस कारण उसने घोषित किया कि उनके प्राण हेडस में रह गए।
4. परन्तु यह मनुष्य एकमात्र है जिसने खुलकर पवित्र लेखों को काटने का साहस किया, और सब से अधिक निर्लज्जता से परमेश्वर के विरुद्ध आक्षेप किया, इसलिये मैं विशेष रूप से उसका खण्डन करना चाहता हूँ, convict-
ing उसे उसकी अपनी रचनाओं से; और, परमेश्वर की सहायता से, मैं उसे प्रभु और प्रेरितों के उन(1) प्रवचनों से गिराऊँगा, जो उसके यहाँ अधिकार रखते हैं, और जिनका वह उपयोग करता है। परन्तु इस समय, मैं केवल उसका उल्लेख करने को ले आया गया हूँ, कि तू जाने कि जो किसी भी रीति से सत्य को बिगाड़ते हैं, और कलीसिया के प्रचार को हानि पहुँचाते हैं, वे सब सामरिया के शमौन मागुस के चेले और उत्तराधिकारी हैं। यद्यपि वे अपने गुरु का नाम नहीं मानते, औरों को और भी अधिक बहकाने के लिये, तौभी वे उसकी शिक्षाएँ सिखाते हैं। वे मसीह यीशु का नाम एक प्रकार के चारे के रूप में सचमुच रखते हैं, परन्तु नाना रीतियों से वे शमौन की अभक्तियाँ प्रवेश कराते हैं; और इस प्रकार वे बहुतों को नाश करते हैं, एक अच्छे नाम के उपयोग से अपनी शिक्षाएँ दुष्टता से फैलाते हुए, और उसकी मिठास और सुन्दरता के द्वारा, सुनने वालों तक सर्प का कड़वा और घातक विष पहुँचाते हुए, धर्मत्याग के बड़े कर्ता?
अध्याय अट्ठाईस.--तातियन, एन्क्राती, और अन्यों की शिक्षाएँ।
1. जिन मतान्तरियों का हमने वर्णन किया है, उन से अनेक मतान्तरों की अनेक शाखाएँ पहले ही बन चुकी हैं। यह इस तथ्य से उत्पन्न होता है कि उन में से बहुत से--सचमुच, हम कह सकते हैं सब--स्वयं शिक्षक बनना चाहते हैं, और जिस विशेष मतान्तर में वे फँसे हैं उस से टूट जाना चाहते हैं। एक बिलकुल भिन्न मत-पद्धति से शिक्षाओं का एक समूह बनाकर, और फिर औरों से और, वे कुछ नया सिखाने पर अड़ते हैं, और जिस किसी प्रकार के मत को वे अस्तित्व में बुलाने में समर्थ हुए हों, उसके आविष्कारक अपने आप को घोषित करते हैं। एक उदाहरण देने के लिये: सातुर्नीनुस और मार्कियन से निकलकर, एन्क्राती (आत्मसंयमी) कहलाए जाने वाले लोगों ने विवाह के विरुद्ध प्रचार किया, इस प्रकार परमेश्वर की मूल सृष्टि को अलग करते हुए, और परोक्ष रूप से उसे दोष देते हुए जिसने मानव जाति की वृद्धि के लिये नर और नारी को बनाया। उन में गिने गए कुछ लोगों ने पशु-भोजन से परहेज भी प्रवेश कराया, इस प्रकार अपने आप को परमेश्वर के प्रति कृतघ्न सिद्ध करते हुए, जिसने सब कुछ रचा। वे उसकी मुक्ति को भी नहीं मानते जो पहले सृजा गया था। परन्तु हाल ही में यह मत उन में निकाला गया है। तातियन नाम के एक मनुष्य ने पहले इस निन्दा को प्रवेश कराया। वह यूस्टीन का श्रोता था, और जब तक वह उसके साथ रहा उसने ऐसे विचार नहीं कहे; परन्तु उसकी शहादत के बाद वह कलीसिया से अलग हो गया, और शिक्षक होने के विचार से उत्तेजित और फूला हुआ, मानो वह औरों से श्रेष्ठ हो, उसने अपनी एक विचित्र प्रकार की शिक्षा रची। उसने कुछ अदृश्य ऐयोनों की एक पद्धति निकाली, वैलेन्टिनुस के अनुयायियों के समान; और मार्कियन और सातुर्नीनुस के समान, उसने घोषित किया कि विवाह भ्रष्टता और व्यभिचार के सिवा और कुछ नहीं।(3) परन्तु आदम के उद्धार का उसका इन्कार पूरी तरह उसी का अपना मत था।
2. औरों ने, फिर, बासिलिदेस और कर्पोक्रातेस का अनुसरण करके, मिश्रित सम्भोग और अनेक पत्नियाँ प्रवेश कराई हैं, और मूर्तियों को बलि किए गए मांस खाने के विषय में उदासीन हैं, यह मानकर कि परमेश्वर ऐसी बातों की बहुत अधिक चिन्ता नहीं करता। परन्तु आगे क्यों चलें? क्योंकि उन सब का उल्लेख करना असम्भव प्रयत्न है, जो किसी न किसी रीति से सत्य से गिर गए हैं।
अध्याय उनतीस.--अन्य नाना ग्नोस्तिक सम्प्रदायों की शिक्षाएँ, और विशेषकर बार्बेलोतियों या बोरोबोरियनों की।
1. परन्तु इन के अतिरिक्त, इन मतान्तरियों में जो शमौनी हैं, जिन का उल्लेख हम पहले कर चुके हैं, ग्नोस्तिकों की एक भीड़ उग पड़ी है, और भूमि से उगने वाले कुकुरमुत्तों के समान प्रगट हुई है। अब मैं उन के मुख्य मतों का वर्णन करने आगे बढ़ता हूँ। तब उन में से कुछ एक ऐसे ऐयोन को रखते हैं जो कभी बूढ़ा नहीं होता, और एक कुँवारी आत्मा में अस्तित्व रखता है: उसे वे बार्बेलोस कहते हैं।(4) वे घोषित करते हैं कि कहीं न कहीं एक ऐसा पिता है जिसका नाम नहीं लिया जा सकता, और कि वह इस बार्बेलोस पर अपने आप को प्रगट करना चाहता था। तब यह एन्नोइया आगे बढ़ी, उसके मुख के सामने खड़ी हुई, और उस से प्रोग्नोसिस (पूर्वज्ञान) माँगा। परन्तु जब प्रोग्नोसिस, [जैसा माँगा गया था,] निकल आया, इन दोनों ने अफ्थार्सिया (अक्षयता) माँगी, जो भी निकल आई, और उसके बाद जोए आइओनियोस (अनन्त जीवन)। बार्बेलोस, इन में गर्व करते हुए, और उन की महानता का ध्यान करते हुए, और गर्भधारण s [इस प्रकार बनी] में, इस महानता में आनन्दित होकर, उसके समान ज्योति को उत्पन्न किया। वे घोषित करते हैं कि यह ज्योति का भी और सब वस्तुओं की उत्पत्ति का भी आरम्भ था; और कि पिता, इस ज्योति को देखकर, उसे अपनी दयालुता से अभिषिक्त किया, कि वह सिद्ध की जाए। इसके अतिरिक्त, वे मानते हैं कि यह मसीह था, जिसने, उन के अनुसार, फिर माँगा कि नूस उसे सहायक के रूप में दिया जाए; और नूस तदनुसार निकल आया। इन के अतिरिक्त, पिता ने लोगोस को भेजा। एन्नोइया और लोगोस के, और अफ्थार्सिया और मसीह के संयोग इस प्रकार बनेंगे; जबकि जोए आइओनियोस थेलेमा से मिला, और नूस प्रोग्नोसिस से। तब इन्होंने बड़ी ज्योति और बार्बेलोस की महिमा की।
2. वे यह भी दृढ़ करते हैं कि ऑटोजेनिस बाद में एन्नोइया और लोगोस से भेजा गया, होने के लिये
बड़ी ज्योति का एक प्रतिरूप, और कि वह बहुत आदर पाया, सब वस्तुएँ उसके अधीन की गईं। उसके साथ अलेथेइया भेजी गई, और ऑटोजेनिस और अलेथेइया के बीच एक संयोग बना। परन्तु वे घोषित करते हैं कि ज्योति से, जो मसीह है, और अफ्थार्सिया से, ऑटोजेनिस को घेरने के लिये चार ज्योतियाँ भेजी गईं; और फिर थेलेमा और जोए आइओनियोस से चार और उत्सर्ग हुए, इन चार ज्योतियों की सेवा के लिये; और इन्हें वे कारिस (अनुग्रह), थेलेसिस (इच्छा), सिनेसिस (समझ), और फ्रोनेसिस (बुद्धि) नाम देते हैं इन में से, Chaffs बड़ी और पहली ज्योति से जुड़ी है: उसे वे Sorer (उद्धारकर्ता) के रूप में दर्शाते हैं, और आर्मोगेनिस कहते हैं।(1) थेलेसिस, फिर, दूसरी ज्योति से मिली है, जिसे वे रगूएल भी नाम देते हैं; सिनेसिस तीसरी से, जिसे वे दाऊद कहते हैं; और फ्रोनेसिस चौथी से, जिसे वे एलेलेथ नाम देते हैं।
3. ये सब, तब, इस प्रकार स्थिर हो जाने पर, Auto-genes इसके अतिरिक्त एक सिद्ध और सच्चा मनुष्य उत्पन्न करता है, जिसे वे अडामास भी कहते हैं, क्योंकि न तो वह स्वयं कभी जीता गया है, और न वे जिन से वह निकला; वह भी, पहली ज्योति के साथ, आर्मोगेनिस से अलग किया गया। इसके अतिरिक्त, सिद्ध ज्ञान ऑटोजेनिस के द्वारा मनुष्य के साथ भेजा गया, और उससे मिला; इसलिये उसने सब के ऊपर वाले का ज्ञान प्राप्त किया। अजेय शक्ति भी कुँवारी आत्मा के द्वारा उसे दी गई; और तब सब वस्तुएँ उस में विश्राम किया, बड़े ऐयोन की स्तुति गाने के लिये। इसलिये वे घोषित करते हैं कि माता, पिता, और पुत्र प्रगट हुए; और आन्थ्रोपोस और ग्नोसिस से वह वृक्ष उत्पन्न हुआ जिसे वे स्वयं ग्नोसिस भी कहते हैं।
4. इसके बाद वे मानते हैं, कि मोनोजेनेस की बगल में खड़े पहले दूत से, पवित्र आत्मा भेजा गया है, जिसे वे सोफिया और प्रूनिकुस भी कहते हैं।(2) तब उसने, यह समझकर कि और सब के जोड़े थे, जबकि वह स्वयं एक से रहित था, एक ऐसे प्राणी को खोजा जिससे वह मिल सके; और एक न पाकर, उसने अपने आप को अत्यन्त तक जोर दिया और फैलाया और निचले क्षेत्रों में नीचे देखा, वहाँ एक जोड़ा पाने की आशा में; और अभी भी एक से न मिलकर, वह बड़े अधैर्य की दशा में [अपने स्थान से] कूद पड़ा, [जो उस पर आ गया था] क्योंकि उसने अपने पिता की सद्भावना के बिना अपना प्रयत्न किया था। बाद में, सरलता और दयालुता के प्रभाव में, उसने एक कार्य उत्पन्न किया, जिस में अज्ञान और दुस्साहस पाए जाने थे। उसके इस कार्य को वे प्रोटार्खोन्तेस घोषित करते हैं, इस [निचली] सृष्टि का रचने वाला। परन्तु वे बताते हैं कि एक बलवन्त शक्ति उसे उसकी माता से ले गई, और कि वह उस से दूर निचले क्षेत्रों में बस गया, और स्वर्ग के आकाशमण्डल को बनाया, जिस में वे दृढ़ करते हैं कि वह रहता है। और अपने अज्ञान में उसने वे शक्तियाँ बनाईं जो स्वयं से छोटी हैं--दूत, और आकाशमण्डल, और सब पृथ्वी की वस्तुएँ। वे दृढ़ करते हैं कि वह, औथाडिया (दुस्साहस) से मिलकर, काकिया (दुष्टता), जेलोस (स्पर्धा), फ्थोनोस (डाह), एरिन्निस (क्रोध), और एपिथूमिया (वासना) को उत्पन्न किया। जब ये उत्पन्न हुए, माता सोफिया बहुत शोकित हुई, भाग गई, ऊपरी क्षेत्रों में चली गई, और ओग्डोआद की अन्तिम हो गई, उसे नीचे की ओर गिनते हुए। उसके इस प्रकार चले जाने पर, उसने कल्पना की कि वह अस्तित्व में एकमात्र प्राणी है; और इस कारण घोषित किया, "मैं जलन रखने वाला परमेश्वर हूँ, और मेरे सिवा कोई नहीं।"(3) ऐसे झूठ ये लोग गढ़ते हैं।
अध्याय तीस.--ओफीतियों और सेतियों की शिक्षाएँ।
1. और लोग, फिर, अद्भुत रूप से घोषित करते हैं कि बाइथुस की शक्ति में एक प्राथमिक ज्योति अस्तित्व रखती है, धन्य, अक्षय, और अनन्त: यही सब का पिता है, और पहला मनुष्य कहलाता है। वे यह भी मानते हैं कि उसकी एन्नोइया, उस से निकलकर, एक पुत्र को उत्पन्न किया, और कि यह मनुष्य का पुत्र है--दूसरा मनुष्य। इन के नीचे, फिर, पवित्र आत्मा है, और इस श्रेष्ठ आत्मा के नीचे तत्व एक दूसरे से अलग किए गए, अर्थात्, जल, अन्धकार, अथाह, अव्यवस्था, जिन के ऊपर वे घोषित करते हैं कि आत्मा मँडराती थी, उसे पहली स्त्री कहते हुए। बाद में, वे मानते हैं, पहला मनुष्य, अपने पुत्र के साथ, आत्मा की सुन्दरता पर आनन्दित होकर--अर्थात्, स्त्री की--और उस पर ज्योति उण्डेलकर, उस के द्वारा एक अक्षय ज्योति को उत्पन्न किया, तीसरा नर, जिसे वे मसीह कहते हैं,--पहले और दूसरे मनुष्य का पुत्र, और पवित्र आत्मा, पहली स्त्री, का।
2. पिता और पुत्र दोनों ने इस प्रकार उस स्त्री के साथ सम्भोग किया (जिसे वे जीवितों की माता भी कहते हैं)। परन्तु,(4) जब वह ज्योतियों की महानता को न सह सकी और न अपने भीतर ग्रहण कर सकी, वे घोषित करते हैं कि वह भरकर उफन गई, और बाईं ओर उबल पड़ी; और कि इस प्रकार उनका एकमात्र पुत्र मसीह, दाहिनी ओर का होने के कारण, और सदा ऊँचे की ओर झुकता हुआ, तुरन्त अपनी माता के साथ एक अक्षय ऐयोन बनाने के लिये ऊपर उठा लिया गया। यही सच्ची और पवित्र कलीसिया है, जो सब के पिता की, पहले मनुष्य की, पुत्र की, दूसरे मनुष्य की, उनके पुत्र मसीह की, और उल्लिखित स्त्री की उपाधि, एकत्र होना, और एकता बन गई है।
3. परन्तु वे सिखाते हैं, कि उबाल द्वारा स्त्री से निकली शक्ति, ज्योति से छिड़की हुई, अपने जनकों के स्थान से नीचे गिरी, तौभी रखती हुई
अपनी ही इच्छा से ज्योति के उस छिड़काव को; और उसे वे सिनिस्ट्रा, प्रूनिकुस, और सोफिया कहते हैं, तथा पुरुषस्त्री भी। यह प्राणी, अपनी सरलता में, जलों में उतरा जब वे अभी निश्चल दशा में थे, और उन्हें भी गति दी, उन पर उच्छृङ्खलता से उनके सब से नीचे गहिरे स्थानों तक भी काम करते हुए, और उन से एक देह धारण की। क्योंकि वे दृढ़ करते हैं कि सब वस्तुएँ ज्योति के उस छिड़काव की ओर दौड़ीं और उससे लिपट गईं, और उसे चारों ओर आरम्भ करती हैं। यदि उस में वह न होता, तो वह शायद पदार्थ में पूरी तरह सोख लिया जाता, और उस से डूब जाता। इसलिये पदार्थ से बनी एक देह से बँधा हुआ, और उस से बहुत बोझिल होकर, इस शक्ति ने अपने चलाए हुए मार्ग पर पछतावा किया, और जलों से निकलकर अपनी माता तक चढ़ने का प्रयत्न किया: परन्तु यह वह न कर सकी, अपने ऊपर और चारों ओर पड़ी देह के भार के कारण। परन्तु बहुत बेचैन होकर, उसने कम से कम ऊपर से आई उस ज्योति को छिपाने का प्रयत्न किया, डरते हुए कि कहीं वह भी निम्न तत्वों से घायल न हो जाए, जैसा स्वयं उसके साथ हुआ था। और जब उसने अपने पास के उस ज्योति-छिड़काव से शक्ति पाई, वह फिर पीछे उछली, और ऊपर उठाई गई; और ऊँचे पर होकर, उसने अपने आप को फैलाया, [स्थान का एक भाग] ढका, और अपनी देह से इस दृश्य स्वर्ग को बनाया; तौभी अपने बनाए स्वर्ग के नीचे रही, क्योंकि अभी भी जलमय देह का रूप रखती थी। परन्तु जब उसे ऊपर की ज्योति की इच्छा हुई, और सब वस्तुओं के द्वारा शक्ति मिली, उसने इस देह को रख दिया, और उस से मुक्त हुई। इस देह को, जिसे वे उस शक्ति के उतार फेंकने की कहते हैं, वे स्त्री से एक स्त्री कहते हैं।
4. वे और भी घोषित करते हैं, कि उसके पुत्र के पास भी अपनी माता के छोड़े अक्षयता के एक श्वास था, और कि उसके द्वारा वह काम करता है; और बलवान होकर, वह स्वयं भी, जैसा वे दृढ़ करते हैं, जलों से बिना माता के एक पुत्र को भेजा; क्योंकि वे उसे माता को जानने भी नहीं देते। उसके पुत्र ने, फिर, अपने पिता के उदाहरण पर, एक और पुत्र भेजा। इस तीसरे ने भी एक चौथा उत्पन्न किया; चौथे ने भी एक पुत्र उत्पन्न किया: वे मानते हैं कि फिर पाँचवें के द्वारा एक पुत्र उत्पन्न हुआ; और छठे ने भी एक सातवाँ उत्पन्न किया। इस प्रकार हेब्दोमाद, उन के अनुसार, पूरा हुआ, माता आठवाँ स्थान रखती हुई; और जैसे उन की पीढ़ियों के विषय में, वैसे ही गरिमा और शक्तियों के विषय में भी, वे बारी-बारी एक दूसरे से आगे रहते हैं।
5. उन्होंने अपनी झूठ की पद्धति में [अलग-अलग व्यक्तियों] को भी नाम दिए हैं, जैसे ये: जो माता का पहला वंशज था वह इयल्दाबाओथ कहलाता है;(1) जो, फिर, उस से उतरा, इयाओ नाम पाता है; जो इस से है, वह सबाओथ कहलाता है; चौथा अडोनेयुस नाम पाता है; पाँचवाँ, एलोयुस; छठा, ओरेयुस; और सातवाँ और सब का अन्तिम, अस्टान्फायुस। इसके अतिरिक्त, वे इन स्वर्गों, अधिपतियों, शक्तियों, दूतों, और सृष्टिकर्ताओं को, अपनी पीढ़ी के अनुसार स्वर्ग में अपनी उचित क्रम में बैठे हुए, और स्वर्गीय और पार्थिव वस्तुओं पर अदृश्य रूप से राज्य करते हुए दर्शाते हैं। उन में पहला, अर्थात् इयल्दाबाओथ, अपनी माता को तुच्छ जानता है, क्योंकि उसने किसी की अनुमति के बिना पुत्र और पौत्र उत्पन्न किए, हाँ, दूत, प्रधान दूत, शक्तियाँ, अधिपति, और प्रभुताएँ भी। ये बातें हो जाने के बाद, उसके पुत्र सर्वोच्च अधिकार के विषय में उससे लड़ने और झगड़ने को मुड़े,--ऐसा आचरण जिसने इयल्दाबाओथ को बहुत शोकित किया, और उसे निराशा में ढकेल दिया। इन परिस्थितियों में, उसने पदार्थ के नीचे की तलछट पर अपनी आँखें डालीं, और उस पर अपनी इच्छा ठहराई, जिसके विषय में वे घोषित करते हैं कि उसका पुत्र अपनी उत्पत्ति का ऋणी है। यह पुत्र स्वयं नूस है, सर्प के रूप में मरोड़ा हुआ;(2) और यहीं से आत्मा, प्राण, और सब सांसारिक वस्तुएँ निकलीं: इसी से सब विस्मृति, दुष्टता, स्पर्धा, डाह, और मृत्यु भी उत्पन्न हुईं। वे घोषित करते हैं कि पिता ने उनके इस सर्प-समान और मरोड़े नूस को और भी बड़ी टेढ़ाई दी(3), जब वह उनके पिता के साथ स्वर्ग और परमदेश में था।
6. इस कारण, इयल्दाबाओथ, आत्मा में ऊँचा होकर, अपने नीचे की उन सब वस्तुओं पर घमण्ड किया, और पुकारा, "मैं पिता हूँ, और परमेश्वर, और मेरे ऊपर कोई नहीं।" परन्तु उसकी माता, उसे इस प्रकार बोलते सुनकर, उसके विरुद्ध चिल्लाई, "झूठ मत बोल, इयल्दाबाओथ: क्योंकि सब का पिता, पहला आन्थ्रोपोस (मनुष्य), तेरे ऊपर है; और आन्थ्रोपोस का पुत्र आन्थ्रोपोस भी ऐसा ही है।" तब, जब सब इस नई आवाज से, और अनपेक्षित घोषणा से घबरा गए, और जब वे पूछ रहे थे कि शब्द कहाँ से निकला, उन्हें दूर ले जाने और अपनी ओर खींचने के लिये, वे दृढ़ करते हैं कि इयल्दाबाओथ ने पुकारा, "आओ, हम मनुष्य को अपनी छवि के अनुसार बनाएँ।"(4) छह शक्तियों ने, यह सुनकर, और उनकी माता उन्हें मनुष्य का एक विचार देती हुई (कि उसके द्वारा वह उन्हें उनकी मूल शक्ति से खाली कर सके), मिलकर चौड़ाई और लम्बाई दोनों में विशाल आकार का एक मनुष्य बनाया। परन्तु वह केवल भूमि पर छटपटा सकता था, इसलिये वे उसे अपने पिता के पास ले गए; सोफिया इस बात में इस प्रकार परिश्रम करती हुई, कि वह उस (इयल्दाबाओथ) को उस ज्योति से खाली कर सके जिससे वह छिड़का गया था, ताकि वह, अभी भी शक्तिमान होते हुए, ऊपर की शक्तियों के विरुद्ध अपने आप को न उठा सके। वे घोषित करते हैं, तब, कि फूँकने के द्वारा
मनुष्य में जीवन की आत्मा, वह चुपके से अपनी शक्ति से खाली कर दिया गया; कि इसलिये मनुष्य नूस (बुद्धि) और एन्थ्यूमेसिस (विचार) का स्वामी बन गया; और वे दृढ़ करते हैं कि ये वे सामर्थ्य हैं जो उद्धार में भाग लेती हैं। उसने [वे और दृढ़ करते हैं] तुरन्त पहले आन्थ्रोपोस (मनुष्य) को धन्यवाद दिया, उन को छोड़कर जिन्होंने उसे रचा था।
7. परन्तु इयल्दाबाओथ, इस पर डाह करके, स्त्री के द्वारा मनुष्य को फिर खाली करने की युक्ति बनाने से प्रसन्न हुआ, और अपनी ही एन्थ्यूमेसिस से एक स्त्री उत्पन्न की, जिसे उस प्रूनिकुस [ऊपर उल्लिखित] ने पकड़कर, अनजाने में शक्ति से खाली कर दिया। परन्तु और लोग आकर उसकी सुन्दरता की प्रशंसा करके, उसे हव्वा नाम दिया, और उससे प्रेम में पड़कर, उस से पुत्र उत्पन्न किए, जिन्हें वे दूत भी घोषित करते हैं। परन्तु उनकी माता (सोफिया) ने चतुराई से एक युक्ति रची, कि सर्प के द्वारा हव्वा और आदम को बहकाए, इयल्दाबाओथ की आज्ञा का उल्लंघन करने के लिये। हव्वा ने इसे ऐसे सुना मानो यह परमेश्वर के पुत्र से निकला हो, और सहज विश्वास दे दिया। उसने आदम को भी उस वृक्ष से खाने के लिये मना लिया जिसके विषय में परमेश्वर ने कहा था कि वे उस से न खाएँ। तब वे घोषित करते हैं, कि इस प्रकार खाने पर, उन्होंने उस शक्ति का ज्ञान पाया जो सब के ऊपर है, और अपने सृजनहारों से चले गए।(1) जब प्रूनिकुस ने देखा कि शक्तियाँ अपनी ही सृष्टि से इस प्रकार विफल हुईं, वह बहुत आनन्दित हुई, और फिर चिल्लाई, कि चूँकि पिता अक्षय था, वह (इयल्दाबाओथ) जिसने पहले अपने आप को पिता कहा था झूठा था; और कि, जबकि आन्थ्रोपोस और पहली स्त्री (आत्मा) पहले से थे, इस ने (हव्वा) व्यभिचार करके पाप किया।
8. परन्तु इयल्दाबाओथ, उस विस्मृति के द्वारा जिस में वह फँसा था, और इन बातों की कुछ भी चिन्ता न करके, आदम और हव्वा को परमदेश से निकाल दिया, क्योंकि उन्होंने उसकी आज्ञा का उल्लंघन किया था। क्योंकि हव्वा से पुत्र उत्पन्न करने की उसकी इच्छा थी, परन्तु वह अपनी इच्छा पूरी न कर सका, क्योंकि उसकी माता ने हर बात में उसका विरोध किया, और चुपके से आदम और हव्वा को उस ज्योति से खाली कर दिया जिससे वे छिड़के गए थे, ताकि वह आत्मा जो सर्वोच्च शक्ति से निकली थी न शाप में और न निन्दा में [उल्लंघन के कारण हुई] भाग ले। वे यह भी सिखाते हैं, कि इस प्रकार ईश्वरीय पदार्थ से खाली किए जाकर, वे उसके द्वारा शापित हुए, और स्वर्ग से इस जगत में गिरा दिए गए।(2) परन्तु सर्प भी, जो पिता के विरुद्ध काम कर रहा था, उसके द्वारा इस निचले जगत में गिरा दिया गया; परन्तु उसने यहाँ के दूतों को अपनी शक्ति के अधीन कर लिया, और छह पुत्र उत्पन्न किए, वह स्वयं सातवाँ व्यक्ति बनकर, उस हेब्दोमाद के उदाहरण पर जो पिता को घेरती है। वे और घोषित करते हैं कि ये सात सांसारिक दुष्टात्माएँ हैं, जो सदा मानव जाति का विरोध और प्रतिरोध करती हैं, क्योंकि उन्हीं के कारण उनका पिता इस निचले जगत में गिरा दिया गया था।
9. आदम और हव्वा के पहले ज्योतिर्मय, स्वच्छ, और मानो आत्मिक देहें थीं, जैसी वे अपनी सृष्टि पर थे; परन्तु जब वे इस जगत में आए, ये अधिक धुँधली, स्थूल, और सुस्त देहों में बदल गईं। उनका प्राण भी दुर्बल और मुरझाया हुआ था, क्योंकि उन्हें अपने सृष्टिकर्ता से केवल एक सांसारिक श्वास मिला था। यह तब तक चला, जब तक प्रूनिकुस, उन पर करुणा से उद्वेलित होकर, उन्हें ज्योति के छिड़काव की मीठी सुगन्ध फिर न दे दी, जिसके द्वारा वे अपने आप को स्मरण करने लगे, और जान गए कि वे नग्न हैं, तथा कि देह एक भौतिक पदार्थ है, और इस प्रकार पहचाना कि वे मृत्यु को अपने साथ लिए फिरते हैं। तब वे धीरजवान हुए, यह जानकर कि केवल कुछ समय के लिये वे देह में लिपटे रहेंगे। सोफिया के मार्गदर्शन से उन्होंने भोजन भी पाया; और जब वे तृप्त हुए, उन्होंने एक दूसरे का शारीरिक ज्ञान किया, और कैन को जन्म दिया, जिसे सर्प ने, जो अपने पुत्रों समेत नीचे गिरा दिया गया था, तुरन्त पकड़ लिया और नाश किया, उसे सांसारिक विस्मृति से भरकर, और मूर्खता और दुस्साहस में धकेलकर, ताकि, अपने भाई हाबिल को मारकर, वह डाह और मृत्यु को प्रकाश में लाने वाला पहला हुआ। इन के बाद, वे दृढ़ करते हैं, कि प्रूनिकुस की पूर्वकल्पना से, सेत उत्पन्न हुआ, और फिर नोरेया,(3) जिन से वे शेष सारी मानवजाति के उतरी हुई होने का चित्र देते हैं। वे निम्न हेब्दोमाद के द्वारा सब प्रकार की दुष्टता की ओर, और श्रेष्ठ पवित्र हेब्दोमाद के द्वारा धर्मत्याग, मूर्तिपूजा, और हर वस्तु के प्रति सामान्य तुच्छता की ओर धकेले गए,(4) क्योंकि माता सदा चुपके से उन के विरुद्ध थी, और जो विशेष रूप से उसका अपना था उसे सावधानी से सुरक्षित रखती थी, अर्थात्, ज्योति का छिड़काव।
वे और मानते हैं, कि पवित्र हेब्दोमाद वे सात तारे हैं जिन्हें वे ग्रह कहते हैं; और वे दृढ़ करते हैं कि गिराए गए सर्प के दो नाम हैं, मीकाएल और सामाएल।
10. इयल्दाबाओथ, फिर, मनुष्यों पर क्रोधित होकर, क्योंकि उन्होंने उसकी पिता और परमेश्वर के रूप में आराधना या आदर नहीं किया, उन पर एक जलप्रलय भेजा, कि वह एक ही बार उन सब को नाश कर सके। परन्तु सोफिया ने इस बात में भी उसका विरोध किया, और नूह और उसका घराना उस ज्योति के छिड़काव के द्वारा जहाज में बचाया गया जो उस से निकली थी, और उसके द्वारा जगत फिर मानवजाति से भर गया। इयल्दाबाओथ ने स्वयं इन में से अब्राहम नाम के एक मनुष्य को चुना, और उसके साथ एक वाचा बाँधी, इस भाव से कि, यदि उसका वंश उसकी सेवा करता रहे, तो वह उन्हें पृथ्वी निज भाग के लिये देगा। बाद में, मूसा के द्वारा, वह
मिस्र से अब्राहम के वंशजों को बाहर लाया, और उन्हें व्यवस्था दी, और उन्हें यहूदी बनाया। उस लोगों में से उसने सात दिन चुने,(1) जिन्हें वे पवित्र हेब्दोमाद भी कहते हैं। इन में से प्रत्येक परमेश्वर की महिमा और घोषणा के लिये अपना अपना दूत पाता है; ताकि, जब शेष लोग इन स्तुतियों को सुनें, वे भी देवताओं के रूप में घोषित किए गए लोगों की सेवा करें भविष्यद्वक्ताओं को प्रयत्न करें।
11. इसके अतिरिक्त, वे भविष्यद्वक्ताओं को इस रीति बाँटते हैं: मूसा, और नून का पुत्र यहोशू, और आमोस, और हबक्कूक, इयल्दाबाओथ के थे; शमूएल, और नातान, और योना, और मीका, इयाओ के; एलिय्याह, योएल, और जकर्याह सबाओथ के; यशायाह, यहेजकेल, यिर्मयाह, और दानिय्येल, अडोहाई के; तोबियास और हाग्गै एलोई के; मीकायाह और नहूम ओरेयुस के; एज्रास और सफन्याह अस्टान्फायुस के। तब इन में से प्रत्येक अपने पिता और परमेश्वर की महिमा करता है, और वे मानते हैं कि सोफिया ने स्वयं भी उनके द्वारा पहले आन्थ्रोपोस (मनुष्य),(2) और ऊपर के उस मसीह के विषय में बहुत बातें कहीं, इस प्रकार मनुष्यों को अक्षय ज्योति, पहले आन्थ्रोपोस, और मसीह के उतरने की चेतावनी और स्मृति दिलाते हुए। [अन्य] शक्तियाँ इन बातों से भयभीत होकर, और उन बातों की नवीनता पर अचम्भित होकर जो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा घोषित हुईं, प्रूनिकुस ने इयल्दाबाओथ के द्वारा (जो नहीं जानता था कि वह क्या कर रहा है) यह कराया, कि दो मनुष्यों के उत्सर्ग हुए, एक बाँझ एलीशिबा से, और दूसरा कुँवारी मरियम से।
12. और चूँकि उसे स्वयं न स्वर्ग में और न पृथ्वी पर विश्राम था, उसने अपनी माता को अपने संकट में सहायता के लिये पुकारा। इस पर, उसकी माता, पहली स्त्री, अपनी बेटी के मन फिराव पर उसके प्रति करुणा से उद्वेलित हुई, और पहले मनुष्य से विनती की कि मसीह उसकी सहायता के लिये भेजा जाए, जो भेजा जाकर, अपनी बहन के पास, और ज्योति के छिड़काव के पास उतरा। जब उसने उसे पहचाना (अर्थात्, नीचे की सोफिया), उसका भाई उसके पास उतरा, और यूहन्ना के द्वारा अपने आगमन की घोषणा की, और मन फिराव का बपतिस्मा तैयार किया, और यीशु को पहले से ग्रहण किया, ताकि मसीह के उतरने पर वह एक शुद्ध पात्र पाए, और कि उस इयल्दाबाओथ के पुत्र के द्वारा स्त्री मसीह के द्वारा घोषित हो। वे और घोषित करते हैं कि वह सात स्वर्गों से उतरा, उनके पुत्रों की समानता धारण करके, और धीरे-धीरे उन्हें उनकी शक्ति से खाली करते हुए। क्योंकि वे मानते हैं कि ज्योति का सारा छिड़काव उसकी ओर दौड़ पड़ा, और कि मसीह, इस जगत में उतरते हुए, पहले अपनी बहन सोफिया को [उस से] पहनाया, और कि तब दोनों उस पारस्परिक ताजगी में उछले जो उन्होंने एक दूसरे की संगति में अनुभव की: इस दृश्य को वे दूल्हे और दुल्हन से सम्बन्धित बताते हैं। परन्तु यीशु, चूँकि वह परमेश्वर के कार्य के द्वारा कुँवारी से उत्पन्न हुआ था, अन्य सब मनुष्यों से अधिक ज्ञानी, पवित्र, और धर्मी था: सोफिया से मिला मसीह उस में उतरा, और इस प्रकार यीशु मसीह उत्पन्न हुआ।
13. वे दृढ़ करते हैं कि उसके बहुत से चेले उस में मसीह के उतरने को नहीं जानते थे; परन्तु, जब मसीह यीशु पर उतरा, तब उसने चमत्कार करना, और चंगा करना, और अज्ञात पिता की घोषणा करना आरम्भ किया, और खुलकर अपने आप को पहले मनुष्य का पुत्र माना। शक्तियाँ और यीशु का पिता इन कार्यों पर क्रोधित हुए, और उसे नाश करने का परिश्रम किया; और जब वह इस उद्देश्य से ले जाया जा रहा था, वे कहते हैं कि मसीह स्वयं, सोफिया के साथ, उस से एक अक्षय ऐयोन की दशा में चला गया, जबकि यीशु क्रूस पर चढ़ाया गया। परन्तु मसीह अपने यीशु को भूला नहीं, बल्कि ऊपर से उस में एक शक्ति उतारी, जिसने उसे देह में फिर जिलाया, जिसे वे पशु-सम्बन्धी और आत्मिक दोनों कहते हैं; क्योंकि उसने सांसारिक भागों को फिर जगत में भेज दिया। जब उसके चेलों ने देखा कि वह जी उठा है, उन्होंने उसे नहीं पहचाना--नहीं, स्वयं यीशु को भी नहीं, जिसके द्वारा वह मरे हुओं में से फिर जी उठा। और वे दृढ़ करते हैं कि उसके चेलों में यह बहुत बड़ी भूल प्रबल रही, कि उन्होंने कल्पना की कि वह एक सांसारिक देह में जी उठा है, यह न जानते हुए कि "मांस(3) और लोहू परमेश्वर के राज्य तक नहीं पहुँचते।"
14. उन्होंने मसीह के उतरने और चढ़ने को इस तथ्य से स्थापित करने का यत्न किया, कि न उसके बपतिस्मा से पहले, और न मरे हुओं में से उसके पुनरुत्थान के बाद, उसके चेले कहते हैं कि उसने कोई सामर्थ्य के काम किए, यह न जानते हुए कि यीशु मसीह से मिला था, और अक्षय ऐयोन हेब्दोमाद से; और वे उसकी सांसारिक देह को पशुओं के समान स्वभाव की घोषित करते हैं। परन्तु अपने पुनरुत्थान के बाद वह [पृथ्वी पर] अठारह महीने ठहरा; और ऊपर से ज्ञान उस में उतरकर, उसने जो स्पष्ट था सिखाया। उसने अपने कुछ चेलों को, जिन्हें वह इतने बड़े भेद समझने के योग्य जानता था, इन बातों में शिक्षा दी, और तब स्वर्ग में उठा लिया गया, मसीह अपने पिता इयल्दाबाओथ के दाहिने हाथ बैठते हुए, कि वह उन के प्राणों को,(4) जिन्होंने उन्हें जाना है, अपना सांसारिक मांस छोड़ चुकने के बाद, अपने पास ले ले, इस प्रकार अपने पिता के ज्ञान या बोध के बिना अपने आप को धनी बनाते हुए; ताकि, जिस अनुपात में यीशु पवित्र प्राणों से अपने आप को धनी बनाता है, उतने ही अनुपात में उसका पिता हानि सहता है और घटता है, इन प्राणों के द्वारा अपनी ही शक्ति से खाली किया जा रहा। क्योंकि अब वह पवित्र प्राणों को नहीं रखेगा उन्हें फिर नीचे भेजने के लिये में
जगत में, केवल वे ही छोड़कर जो उसके पदार्थ के हैं, अर्थात्, वे जिन में उसने फूँका है। परन्तु [सब वस्तुओं का] अन्त होगा, जब ज्योति की आत्मा का सारा छिड़काव इकट्ठा किया जाएगा, और एक अक्षय ऐयोन बनाने के लिये ले जाया जाएगा।
15. ऐसे मत इन व्यक्तियों में प्रचलित हैं, जिन के द्वारा, लेर्नियन हाइड्रा के समान, वैलेन्टिनुस के विद्यालय से एक बहुशीर्ष पशु उत्पन्न हुआ है। क्योंकि उन में से कुछ दृढ़ करते हैं कि सोफिया स्वयं सर्प बन गई; इस कारण वह आदम के सृष्टिकर्ता की शत्रु हुई, और मनुष्यों में ज्ञान बोया, जिस कारण सर्प और सब से अधिक ज्ञानी कहलाया। इसके अतिरिक्त, हमारी आँतों की स्थिति से, जिन के द्वारा भोजन ले जाया जाता है, और इस तथ्य से कि वे ऐसा आकार रखती हैं, सर्प के रूप में हमारी भीतरी रचना(1) हमारी छिपी जननी को प्रगट करती है।
अध्याय इकतीस.--काइनीयों की शिक्षाएँ।
1. और लोग फिर घोषित करते हैं कि कैन ने अपना अस्तित्व ऊपर की शक्ति से पाया, और मानते हैं कि एसाव, कोरह, सदोमी, और ऐसे सब व्यक्ति, अपने से सम्बन्धी हैं। इस कारण, वे जोड़ते हैं, वे सृष्टिकर्ता के द्वारा आक्रमण किए गए, तौभी उन में से किसी ने हानि नहीं सही। क्योंकि सोफिया की आदत थी कि जो उसका था उसे उन से अपने पास ले जाए। वे घोषित करते हैं कि विश्वासघाती यहूदा इन बातों से पूरी तरह परिचित था, और कि वही अकेला, सत्य को ऐसे जानकर जैसा और कोई नहीं जानता था, विश्वासघात के भेद को पूरा किया; उसके द्वारा सब वस्तुएँ, पार्थिव और स्वर्गीय दोनों, इस प्रकार गड़बड़ी में डाल दी गईं। वे इस प्रकार का एक कल्पित इतिहास निकालते हैं, जिसे वे यहूदा का सुसमाचार कहते हैं।
2. मैंने उनकी रचनाओं का एक संग्रह भी किया है, जिन में वे हिस्तेरा के कामों के उन्मूलन का समर्थन करते हैं।(2) इसके अतिरिक्त, वे इस हिस्तेरा को स्वर्ग और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता कहते हैं। वे, कर्पोक्रातेस के समान, यह भी मानते हैं कि मनुष्य तब तक नहीं बचाए जा सकते जब तक वे सब प्रकार के अनुभव से न गुजर जाएँ। एक दूत, वे मानते हैं, उनके पापमय और घृणित कामों में से हर एक में उन के साथ रहता है, और उन्हें दुस्साहस पर बढ़ने और अशुद्धता उठाने के लिये उकसाता है। कार्य का स्वभाव(3) जो भी हो, वे घोषित करते हैं कि वे उसे दूत के नाम में करते हैं, यह कहते हुए, "हे दूत, मैं तेरे काम का उपयोग करता हूँ; हे शक्ति, मैं तेरा कार्य पूरा करता हूँ !" और वे मानते हैं कि यही "सिद्ध ज्ञान" है, ऐसे कामों में झपटने से न झिझकते हुए जिन का नाम लेना भी उचित नहीं।
3. स्पष्ट रूप से सिद्ध करना आवश्यक था, कि, जैसा उनके ही मत और नियम उन्हें दिखाते हैं, वैलेन्टिनुस के विद्यालय वाले ऐसी माताओं, पिताओं, और पूर्वजों से अपनी उत्पत्ति पाते हैं, और उनकी शिक्षाओं को आगे लाना भी, इस आशा से कि कदाचित् उन में से कुछ, मन फिराव करते हुए और एकमात्र सृष्टिकर्ता की ओर, विश्व के रचने वाले परमेश्वर की ओर लौटकर, उद्धार पा सकें, और कि और लोग आगे उनकी दुष्ट, यद्यपि विश्वसनीय, मनाहटों से डूबकर बह न जाएँ, यह कल्पना करते हुए कि वे उन से किसी बड़े और अधिक ऊँचे भेदों का ज्ञान पाएँगे। परन्तु वे, इन मनुष्यों के दुष्ट सिद्धान्तों को हम से अच्छे फल के साथ सीखकर, उनकी शिक्षाओं को तुच्छ दृष्टि से देखें, और उसी समय उन पर दया करें, जो अभी इन दयनीय और निराधार कथाओं से चिपके हुए, ऐसे गर्व की चोटी पर पहुँच गए हैं कि ऐसे ज्ञान के कारण, या, जैसा इसे बल्कि कहा जाना चाहिए, अज्ञान के कारण, अपने आप को और सब से श्रेष्ठ गिनते हैं। वे अब पूरी तरह उघाड़े जा चुके हैं; और केवल उनके भावों को दिखाना, उन पर विजय पाना है।
4. इसलिये मैंने इस दयनीय छोटी लोमड़ी के अत्यन्त बुरी दशा वाले शव को आगे लाकर, स्पष्ट प्रगट करने का परिश्रम किया है।(4) क्योंकि जब वह सब पर प्रगट हो चुकी हो, तब उनकी शिक्षा-पद्धति को उलटने के लिये अब बहुत शब्दों की आवश्यकता न रहेगी। यह ऐसा है, जब, एक पशु पर जो वन में अपने आप को छिपाता है, और उस से बाहर झपटकर बहुतों को नाश करने की आदत रखता है, जो वन को चारों ओर पीटता है और उसे पूरी तरह खोजता है, ताकि पशु को छिपने के स्थान से बाहर आने को विवश करे, उसे पकड़ने का यत्न नहीं करता, यह देखकर कि वह सचमुच एक क्रूर पशु है; परन्तु जो उपस्थित हैं वे तब उसके आक्रमणों को देख सकते हैं और उन से बच सकते हैं, और चारों ओर से उस पर बाण डाल सकते हैं, और उसे घायल कर सकते हैं, और अन्त में उस विनाशकारी क्रूर पशु को मार सकते हैं। वैसे, हमारे विषय में, चूँकि हम उनके छिपे भेदों को, जिन्हें वे अपने बीच मौन में रखते हैं, ज्योति में लाए हैं, अब उनकी मत-पद्धति को नाश करने में बहुत शब्दों का उपयोग आवश्यक न होगा। क्योंकि अब तेरे अधिकार में है, और तेरे सब सहचरों के अधिकार में, कही गई बात से परिचित होना, उनकी दुष्ट और अपाक शिक्षाओं को उलटना, और सत्य के अनुकूल शिक्षाएँ रखना। तब चूँकि विषय ऐसा है, मैं, प्रतिज्ञा के अनुसार, और जैसा मेरा सामर्थ्य सेवा करे, उन्हें उलटने का परिश्रम करूँगा, अगली पुस्तक में उन सब का खण्डन करके। उनका वृत्तान्त देना भी थकाने वाला काम है, जैसा तू देखता है।(5) परन्तु मैं उन्हें उलटने के साधन दूँगा, उनके सब मतों का उस क्रम में सामना करके जिस में उनका वर्णन हुआ है, कि मैं न केवल क्रूर पशु को दृष्टि में उघाड़ूँ, बल्कि हर ओर से उस पर घाव भी लगाऊँ।
इरेनायुस विधर्मों के विरुद्ध
पुस्तक दो
प्रस्तावना.
1. पहली पुस्तक में, जो इस से तुरन्त पहले है, "झूठे नाम से कहलाया ज्ञान,"(1) को उघाड़ते हुए, मैंने तुझे, मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र, दिखाया, कि वैलेन्टिनुस के विद्यालय वालों के द्वारा अनेक और विपरीत रीतियों से रची गई सारी पद्धति झूठ और निराधार थी। मैंने उनके पूर्वजों के सिद्धान्त भी रखे, यह सिद्ध करते हुए कि वे न केवल आपस में भिन्न थे, बल्कि बहुत पहले स्वयं सत्य से भटक चुके थे। मैंने जादूगर मार्कुस की शिक्षा और आचरण को भी, पूरी लगन से, समझाया, क्योंकि वह भी इन व्यक्तियों में है; और उन अंशों को मैंने सावधानी से ध्यान दिया(2) जिन्हें वे पवित्र लेखों से बिगाड़ते हैं, उन्हें अपनी कल्पनाओं के अनुकूल करने की दृष्टि से। इसके अतिरिक्त, मैंने सूक्ष्म रूप से वह रीति बताई जिस से, संख्याओं के द्वारा, और वर्णमाला के चौबीस अक्षरों के द्वारा, वे साहस से [जिसे वे मानते हैं] सत्य को स्थापित करने का यत्न करते हैं। मैंने यह भी बताया कि वे कैसे सोचते और सिखाते हैं कि सृष्टि व्यापक रूप से उनकी अदृश्य प्लेरोमा की छवि पर बनाई गई, और डेमियुर्ग के विषय में वे क्या मानते हैं, उसी समय उनके पूर्वज, सामरिया के शमौन मागुस, की शिक्षा, और उन सब की जिन्होंने उसका स्थान लिया, घोषित करते हुए। मैंने उन ग्नोस्तिकों की भीड़ का भी उल्लेख किया जो उस से निकले हैं, और उनके बीच भेद के बिन्दुओं पर ध्यान दिया(2), उनकी अलग-अलग शिक्षाओं पर, और उनके उत्तराधिकार के क्रम पर, जबकि मैंने वे सब मतान्तर रखे जो उन के द्वारा आरम्भ किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, मैंने दिखाया, कि ये सब मतान्तरी, शमौन से उठकर, इस जीवन में अभक्त और धर्मविरोधी शिक्षाएँ ले आए हैं; और मैंने उनके "छुटकारे" के स्वभाव को, और "सिद्ध" बनाए गए लोगों को दीक्षित करने की उनकी विधि को, उनके आह्वानों और उनके भेदों समेत, समझाया।
मैंने यह भी सिद्ध किया कि एक ही परमेश्वर है, सृष्टिकर्ता, और कि वह किसी दोष का फल नहीं, और न उसके ऊपर कुछ है, और न उसके बाद।
2. वर्तमान पुस्तक में, मैं उन बिन्दुओं को स्थापित करूँगा जो मेरी योजना से मेल खाते हैं, जहाँ तक समय अनुमति दे, और अलग-अलग शीर्षकों के अधीन लम्बे विवेचन के द्वारा उनकी सारी पद्धति को उलटूँगा; इस कारण, चूँकि यह उनके मतों का उघाड़ना और उलटना है, मैंने इस रचना की रचना को ऐसा शीर्षक दिया है। क्योंकि, उनके संयोगों के स्पष्ट प्रकटन और उलटने के द्वारा, इन छिपे गठबन्धनों का,(3) और स्वयं बाइथुस का, अन्त करना उचित है, और इस प्रकार यह प्रमाण पाना कि वह पहले किसी समय अस्तित्व में नहीं था, और न अब कोई अस्तित्व रखता है।
अध्याय एक.--केवल एक ही परमेश्वर है: इसके अन्यथा होने की असम्भावना।
1. तब उचित है, कि मैं पहले और सब से महत्वपूर्ण शीर्षक से आरम्भ करूँ, अर्थात्, परमेश्वर सृष्टिकर्ता, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी, और उन में की सब वस्तुएँ बनाईं (जिसे ये मनुष्य निन्दा से एक दोष का फल कहते हैं), और यह प्रमाणित करूँ कि न उसके ऊपर कुछ है और न उसके बाद; और न कि, किसी के प्रभाव से, परन्तु अपनी ही स्वतंत्र इच्छा से, उसने सब कुछ रचा, क्योंकि वह एकमात्र परमेश्वर है, एकमात्र प्रभु, एकमात्र सृष्टिकर्ता, एकमात्र पिता, अकेला सब वस्तुओं को धारण करने वाला, और स्वयं सब वस्तुओं को अस्तित्व में आज्ञा देने वाला।
2. क्योंकि उसके ऊपर और कोई पूर्णता, या सिद्धान्त, या शक्ति, या परमेश्वर, कैसे हो सकता है, जब आवश्यक है कि परमेश्वर, इन सब का प्लेरोमा (पूर्णता), अपनी असीमता में सब वस्तुओं को धारण करे, और किसी के द्वारा धारण न किया जाए? परन्तु यदि उसके पार कुछ है, तो वह तब सब का प्लेरोमा नहीं, और न वह सब को धारण करता है। क्योंकि जिसे वे उसके पार घोषित करते हैं वह प्लेरोमा को, या, [अन्य शब्दों में,] उस परमेश्वर को जो सब वस्तुओं के ऊपर है, कमी रहेगा। परन्तु जो कमी है, और किसी भी रीति से छोटा पड़ता है, वह नहीं है
सब वस्तुओं का प्लेरोमा। ऐसी दशा में, उसके पार वालों के विषय में उसके आरम्भ, मध्य, और अन्त दोनों होंगे। और यदि नीचे की वस्तुओं के विषय में उसका अन्त है, तो ऊपर की वस्तुओं के विषय में उसका आरम्भ भी है। उसी रीति, यह नितान्त आवश्यक है कि वह अन्य सब बिन्दुओं पर वही बात अनुभव करे, और अपने बाहर की उन सत्ताओं के द्वारा भीतर रोका जाए, सीमाबद्ध किया जाए, और घेरा जाए। क्योंकि जो प्राणी नीचे की ओर अन्त है, वह अवश्य उसे घेरता और घेरे में लेता है जो उस में अपना अन्त पाता है। और इस प्रकार, उन के अनुसार, सब का पिता (अर्थात्, जिसे वे प्रोओन और प्रोआर्खे कहते हैं), उनकी प्लेरोमा समेत, और मार्कियन का अच्छा परमेश्वर, किसी और में स्थापित और बन्द किया जाता है, और बाहर से एक और बलवन्त सत्ता के द्वारा घेरा जाता है, जिसे अवश्य बड़ा होना चाहिए, क्योंकि धारण करने वाला धारण किए हुए से बड़ा है। परन्तु तब जो बड़ा है वह अधिक बलवान भी है, और बड़े अनुपात में प्रभु; और जो बड़ा, और अधिक बलवान, और बड़े अनुपात में प्रभु है--वह परमेश्वर होना चाहिए।
3. अब, चूँकि, उन के अनुसार, और भी कुछ अस्तित्व रखता है जिसे वे प्लेरोमा के बाहर घोषित करते हैं, जिस में वे और मानते हैं कि वह ऊँची शक्ति उतरी जो भटक गई, हर रीति से आवश्यक है कि प्लेरोमा या तो पार की वस्तु को धारण करे, तौभी धारण किया जाए (नहीं तो, वह प्लेरोमा के पार न होगा; क्योंकि यदि प्लेरोमा के पार कुछ है, तो इस प्लेरोमा के भीतर एक प्लेरोमा होगा जिसे वे प्लेरोमा के बाहर घोषित करते हैं, और प्लेरोमा पार वाली वस्तु के द्वारा धारण किया जाएगा: और प्लेरोमा के साथ पहला परमेश्वर भी समझा जाता है); या, फिर, वे एक दूसरे से अनन्त दूरी से अलग होने चाहिए--प्लेरोमा [मेरा अर्थ है], और जो उसके पार है। परन्तु यदि वे यह मानें, तब एक तीसरी प्रकार की सत्ता होगी, जो असीमता के द्वारा प्लेरोमा को और उसके पार की वस्तु को अलग करती है। यह तीसरी प्रकार की सत्ता इसलिये दोनों और को सीमाबद्ध करेगी और धारण करेगी, और प्लेरोमा से भी और उसके पार की वस्तु से भी बड़ी होगी, क्योंकि वह दोनों को अपनी गोद में धारण करती है। इस रीति, धारण की हुई वस्तुओं और धारण करने वाली वस्तुओं के विषय में बात सदा चल सकती है। क्योंकि यदि इस तीसरी सत्ता का आरम्भ ऊपर है, और उसका अन्त नीचे, तो यह नितान्त आवश्यक है कि वह पाश्र्वों पर भी सीमाबद्ध हो, अन्य कुछ बिन्दुओं पर आरम्भ या रुकते हुए, [जहाँ नई सत्ताएँ आरम्भ होती हैं।] ये, फिर, और ऊपर और नीचे की अन्य, अन्य कुछ बिन्दुओं पर अपने आरम्भ रखेंगी, और इस प्रकार अनन्त तक; ताकि उनके विचार कभी एक ही परमेश्वर में विश्राम न करें, परन्तु, जो अस्तित्व रखता है उस से अधिक खोजने के फलस्वरूप, उस की ओर भटक जाएँ जिसका कोई अस्तित्व नहीं, और सच्चे परमेश्वर से चले जाएँ।
4. ये टिप्पणियाँ, उसी रीति, मार्कियन के अनुयायियों के विरुद्ध लागू होती हैं। क्योंकि उसके दो परमेश्वर भी एक विशाल अन्तराल के द्वारा धारण और घेरे जाएँगे जो उन्हें एक दूसरे से अलग करता है। परन्तु तब हर ओर एक दूसरे से विशाल दूरी से अलग देवताओं की भीड़ को मानना आवश्यक है, एक दूसरे से आरम्भ होकर, और एक दूसरे में अन्त होते हुए। इस प्रकार, उसी तर्क-प्रक्रिया से जिस पर वे यह सिखाने के लिये निर्भर हैं कि स्वर्ग और पृथ्वी के सृष्टिकर्ता के ऊपर कोई प्लेरोमा या परमेश्वर है, जो कोई उसे काम में लाना चाहे वह मान सकता है कि प्लेरोमा के ऊपर एक और प्लेरोमा है, उसके ऊपर फिर एक और, और बाइथुस के ऊपर देवत्व का एक और समुद्र, जबकि उसी रीति वही उत्तराधिकार पाश्र्वों के विषय में ठहरते हैं; और इस प्रकार, उनकी शिक्षा असीमता में बहती हुई, अन्य प्लेरोमा, और अन्य बाइथी की कल्पना करने की आवश्यकता सदा रहेगी, किसी समय भी रुकने के लिये नहीं, बल्कि पहले से उल्लिखितों के अतिरिक्त औरों को सदा खोजते रहने के लिये। इसके अतिरिक्त, यह अनिश्चित होगा कि जिन्हें हम कल्पना करते हैं वे नीचे हैं, या, वास्तव में, स्वयं वे वस्तुएँ हैं जो ऊपर हैं; और, उसी रीति, उन वस्तुओं के विषय में सन्देह] होगा जिन्हें वे ऊपर कही जाती बताते हैं, कि वे सचमुच ऊपर हैं या नीचे; और इस प्रकार हमारे मतों का कोई स्थिर निष्कर्ष या निश्चय न होगा, बल्कि सीमाहीन जगतों के पीछे, और गिने न जा सकने वाले देवताओं के पीछे भटकना अवश्य होगा।
5. तब ये बातें ऐसी होने पर, प्रत्येक देवता अपनी सम्पत्तियों से सन्तुष्ट रहेगा, और औरों के मामलों के विषय में किसी जिज्ञासा से न हिलेगा; नहीं तो वह अन्यायी, और लुटेरा होगा, और जो परमेश्वर है वह होना छोड़ देगा। प्रत्येक सृष्टि भी, अपने बनाने वाले की महिमा करेगी, और उस से सन्तुष्ट रहेगी, किसी और को न जानते हुए; नहीं तो वह और सब के द्वारा सब से न्यायपूर्वक धर्मत्यागी मानी जाएगी, और भरपूर योग्य दण्ड पाएगी। क्योंकि या तो ऐसा होना चाहिए, कि एक सत्ता है जो सब वस्तुओं को धारण करती है, और अपने क्षेत्र में उन सब वस्तुओं को, जो रची गई हैं, अपनी ही इच्छा के अनुसार, रची; या, फिर, कि अनेक असीम सृष्टिकर्ता और परमेश्वर हैं, जो एक दूसरे से आरम्भ होते हैं, और हर ओर एक दूसरे में अन्त होते हैं; और तब यह अनुमति देना आवश्यक होगा कि शेष सब बाहर से किसी बड़े के द्वारा धारण किए जाते हैं, और कि उन में से प्रत्येक अपने क्षेत्र में बन्द है, और उस में रहता है। इसलिये उन सब में से कोई परमेश्वर नहीं है। क्योंकि उन में से प्रत्येक को [बहुत] कमी रहेगी, शेष सब की तुलना में केवल एक बहुत छोटा भाग रखते हुए [जैसा वह रखेगा]। सर्वशक्तिमान का नाम इस प्रकार अन्त को लाया जाएगा, और ऐसा मत अवश्य अभक्ति पर गिरेगा।
अध्याय दो--जगत स्वर्गदूतों के द्वारा, या किसी और सत्ता के द्वारा, नहीं रचा गया, सर्वोच्च परमेश्वर की इच्छा के विपरीत, परन्तु पिता के द्वारा वचन के द्वारा बनाया गया।(1)
1. इसके अतिरिक्त, जो कहते हैं कि जगत दूतों द्वारा, या उसके किसी और रचयिता द्वारा, सर्वोच्च पिता की इच्छा के विरुद्ध रचा गया, वे सब से पहले इसी बात में भूल करते हैं, कि वे मानते हैं कि दूतों ने ऐसी और इतनी बड़ी सृष्टि परमप्रधान परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध रची। इसका अर्थ यह होता कि दूत परमेश्वर से अधिक सामर्थी थे; या ऐसा न हो, तो वह या तो असावधान था, या निकृष्ट, या अपनी ही सम्पत्ति में जो बातें हुईं उन पर ध्यान नहीं दिया, चाहे वे बुरी निकलीं या अच्छी, ताकि एक को वह दूर भगाए और रोके, और दूसरे की प्रशंसा करे और उस पर आनन्दित हो। परन्तु यदि कोई ऐसी चाल किसी योग्य मनुष्य पर भी नहीं डाले, तो परमेश्वर पर कितना कम
2. आगे वे हमें बताएँ कि ये वस्तुएँ उन सीमाओं के भीतर रची गई हैं जो उसके द्वारा घिरी हैं, और उसके अपने क्षेत्र में, या औरों के क्षेत्रों में, और उसके परे पड़ी हुई? परन्तु यदि वे कहें [कि ये बातें की गईं] उसके परे, तो पहले कही हुई सब असंगतियाँ उनके सामने आएँगी, और सर्वोच्च परमेश्वर उसके परे वाली वस्तु से घेर लिया जाएगा, जिसमें यह भी आवश्यक होगा कि वह अपना अन्त पाए। दूसरी ओर, यदि [ये बातें की गईं] उसके अपने क्षेत्र के भीतर, तो यह कहना बहुत व्यर्थ होगा कि जगत उसके अपने क्षेत्र में उसकी इच्छा के विरुद्ध उन दूतों द्वारा इस प्रकार रचा गया जो आप उसकी शक्ति के अधीन हैं, या किसी और सत्ता द्वारा, मानो या तो वह आप अपनी सम्पत्ति में होनेवाली सब बातों को नहीं देखता था, या(2) दूतों द्वारा की जानेवाली बातों से अनजान था।
3. तौभी, यदि [जिन बातों का उल्लेख है वे की गईं] उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं, परन्तु उसकी सम्मति और ज्ञान के साथ, जैसा कुछ [इन मनुष्यों में से] सोचते हैं, तो दूत, या जगत का रचयिता [वह जो कोई भी रहा हो], उस रचना के कारण फिर नहीं रहेंगे, परन्तु परमेश्वर की इच्छा। क्योंकि यदि वह जगत का रचयिता है, तो उसने दूतों को भी बनाया, या कम से कम उनकी सृष्टि का कारण था; और जगत को बनानेवाला वह गिना जाएगा जिसने उसकी रचना के कारणों को तैयार किया। यद्यपि वे मानते हैं कि दूत नीचे की ओर एक लम्बी परम्परा से बनाए गए, या कि जगत का रचयिता सर्वोच्च पिता से [निकला], जैसा बसिलिदेस कहता है; तौभी जो उन वस्तुओं का कारण है जो बनाई गई हैं वह फिर भी उस तक खोजा जाएगा जो ऐसी परम्परा का कर्ता था। [बात वैसी ही है] जैसी युद्ध में सफलता के विषय में, जो उस राजा पर डाली जाती है जिसने उन वस्तुओं को तैयार किया जो विजय का कारण हैं; और, उसी प्रकार, किसी राज्य की, या किसी काम की सृष्टि उस पर डाली जाती है जिसने उन परिणामों की सिद्धि के लिये सामग्री तैयार की जो पीछे लाए गए। इसलिये, हम यह नहीं कहते कि लकड़ी को कुल्हाड़ी ने काटा, या आरे ने उसे बाँटा; परन्तु कोई बहुत उचित रीति से कहेगा कि उस मनुष्य ने उसे काटा और बाँटा जिसने इस उद्देश्य से कुल्हाड़ी और आरे को रचा, और [जिसने यह भी रचा] बहुत पहले की तारीख को वे सब औजार जिन से कुल्हाड़ी और आरा आप रचे गए। इसलिये न्याय के साथ, इसी प्रकार के तर्क के अनुसार, सब का पिता इस जगत का रचयिता घोषित किया जाएगा, न दूत, न जगत का और कोई [तथाकथित] रचयिता, उस से भिन्न जो उसका कर्ता था, और पहले(3) इस प्रकार की सृष्टि की तैयारी का कारण रहा था।
4. यह बोलने का ढंग शायद उन को सम्भाव्य या समझानेवाला लगे जो परमेश्वर को नहीं जानते, और जो उसे दरिद्र मनुष्यों के समान करते हैं, और उन के समान जो तुरन्त और बिना सहायता कुछ भी नहीं रच सकते, परन्तु जो वे चाहते हैं उसे उत्पन्न करने को बहुत साधन चाहते हैं। परन्तु यह उन को बिलकुल सम्भाव्य नहीं लगेगा जो जानते हैं कि परमेश्वर को किसी वस्तु की घटी नहीं, और कि उसने अपने वचन से सब वस्तुएँ रचीं और बनाईं, और न उसने दूतों को उन वस्तुओं के उत्पन्न करने में अपनी सहायता के लिये चाहा जो बनाई गई हैं, न अपने से बहुत निकृष्ट और पिता से अनजान किसी शक्ति को, न किसी न्यूनता या अज्ञान को, ताकि जो उसे जाने वह मनुष्य बने.(4) परन्तु वह आप अपने में, एक ऐसी रीति से जिसे हम न वर्णन कर सकते हैं न कल्पना, सब वस्तुओं को पहले से ठहराते हुए, उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार रचा, सब वस्तुओं को सामंजस्य देकर, और उन्हें उनका अपना स्थान, और उनकी सृष्टि का आरम्भ नियुक्त करके। इस रीति से उसने आत्मिक वस्तुओं को एक आत्मिक और अदृश्य स्वभाव दिया, अतिस्वर्गीय वस्तुओं को एक स्वर्गीय, दूतों को एक दूत-सम्बन्धी, पशुओं को एक पशु-सम्बन्धी, तैरनेवाले प्राणियों को जल के योग्य स्वभाव, और भूमि पर रहनेवालों को भूमि के योग्य--संक्षेप में, सब पर, उन्हें दिए गए जीवन के स्वरूप के योग्य एक स्वभाव--जब वह अपने कभी न थकनेवाले वचन से बनाई गई सब वस्तुओं को रच रहा था।
5. क्योंकि परमेश्वर की श्रेष्ठता की यह विशेषता है, कि जो वस्तुएँ अस्तित्व में बुलाई जाती हैं उनकी सृष्टि के लिये और साधनों की घटी न रखना। उसका अपना वचन सब वस्तुओं की रचना के लिये योग्य भी है और पर्याप्त भी, जैसा प्रभु का चेला यूहन्ना,
उसके विषय में घोषणा करता है: "सब वस्तुएँ उसके द्वारा बनीं, और उसके बिना कुछ नहीं बना।"(1) अब, "सब वस्तुओं" में हमारा जगत सम्मिलित होना चाहिए। इसलिये वह भी उसके वचन से बना, जैसा पवित्रशास्त्र उत्पत्ति की पुस्तक में हमें बताता है कि उसने हमारे जगत से जुड़ी सब वस्तुएँ अपने वचन से बनाईं। दाऊद भी वही सत्य प्रकट करता है [जब वह कहता है] "क्योंकि उसने कहा, और वे बन गईं; उसने आज्ञा दी, और वे सृजी गईं।"(2) तो जगत की सृष्टि के विषय में हम किस की प्रतीति करें--इन मिथ्या शिक्षकों की, जिन का उल्लेख हुआ है, जो इस विषय पर इतनी मूर्खता और असंगति से बकते हैं, या प्रभु के चेलों की, और मूसा की, जो परमेश्वर का विश्वासयोग्य दास भी था और भविष्यद्वक्ता भी? उसने पहले जगत की रचना इन शब्दों में वर्णित की: "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की,"(3) और क्रम से और सब वस्तुएँ; परन्तु न देवताओं का न दूतों का [उस काम में कोई भाग था]।
अब, यह कि यह परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता है, पौलुस प्रेरित ने भी घोषित किया है, [कहते हुए,] "एक ही परमेश्वर है, पिता, जो सब के ऊपर है, और सब वस्तुओं के द्वारा, और हम सब में।"(4) मैं ने सचमुच पहले ही सिद्ध कर दिया है कि केवल एक ही परमेश्वर है; परन्तु मैं इसे आगे प्रेरितों से ही, और प्रभु के प्रवचनों से दिखाऊँगा। क्योंकि कैसा चालचलन होता, यदि हम भविष्यद्वक्ताओं की, प्रभु की, और प्रेरितों की उक्तियों को छोड़ दें, ताकि इन व्यक्तियों की ओर ध्यान दें, जो समझ की एक भी बात नहीं बोलते?
अध्याय तीन.--वैलेन्तीनियों का बूथोस और प्लेरोमा, तथा मार-कियोन का परमेश्वर, असंगत दिखाए गए; जगत वास्तव में उसी सत्ता द्वारा सृजा गया जिसने उसकी कल्पना की थी, और वह न्यूनता या अज्ञान का फल नहीं था।
1. इसलिये, बूथोस, जिसकी वे उसके प्लेरोमा के साथ कल्पना करते हैं, और मार्कियोन का परमेश्वर, असंगत हैं। यदि सचमुच, जैसा वे कहते हैं, उसके नीचे और उसके परे कुछ है, जिसे वे शून्य और छाया कहते हैं, तो यह शून्य उनके प्लेरोमा से बड़ा सिद्ध होता है। परन्तु यह कथन करना भी असंगत है, कि जब वह सब वस्तुओं को अपने भीतर रखता है, सृष्टि किसी और के द्वारा रची गई। क्योंकि यह नितान्त आवश्यक है कि वे एक निश्चय शून्य और अस्तव्यस्त प्रकार के अस्तित्व को मानें (आत्मिक प्लेरोमा के नीचे) जिसमें यह विश्व रचा गया, और कि प्रोपाटोर ने इस अस्तव्यस्तता को जानबूझकर वैसी ही छोड़ दिया, या तो(5) पहले से जानते हुए कि उसमें कौन सी बातें होनेवाली थीं, या उन से अनजान होकर। यदि वह सचमुच अनजान था, तो परमेश्वर सब वस्तुओं का पूर्वज्ञानी नहीं होगा। परन्तु वे [उस दशा में] भी यह कारण नहीं बता सकेंगे कि किस कारण उसने इस स्थान को इतने लम्बे समय तक शून्य छोड़ दिया। यदि, फिर, वह पूर्वज्ञानी है, और उस सृष्टि पर मन से ध्यान किया जो उस स्थान में अस्तित्व पानेवाली थी, तो उसने आप ही उसे रचा जिसने उसे पहले से [आदर्श रूप में] अपने में रचा था।
2. इसलिये वे यह कहना छोड़ दें कि जगत किसी और के द्वारा बनाया गया; क्योंकि ज्योंही परमेश्वर ने अपने मन में एक धारणा रची, वह भी हो गया जिसकी उसने इस प्रकार मन से धारणा की थी। क्योंकि यह सम्भव नहीं था कि एक सत्ता मन से धारणा रचे, और दूसरी वास्तव में उन वस्तुओं को उत्पन्न करे जिनकी धारणा उसके मन में की गई थी। परन्तु इन मिथ्या शिक्षकों के अनुसार परमेश्वर ने मन से या तो एक अनन्त जगत की धारणा की या एक कालिक की, और ये दोनों कल्पनाएँ सत्य नहीं हो सकतीं। तौभी यदि उसने इसकी धारणा मन से अनन्त, आत्मिक,(6) और दृश्य के रूप में की होती, तो वह भी ऐसा ही रचा गया होता। परन्तु यदि वह वैसा ही रचा गया जैसा वह सचमुच है, तो उसे वैसा उसने बनाया जिसने उसकी धारणा मन से वैसी ही की थी; या उसने चाहा कि वह पिता की आदर्शता(7) में, उसके मन की धारणा के अनुसार, वैसा अस्तित्व में रहे जैसा वह अब है, मिश्रित, परिवर्तनशील, और क्षणभंगुर। तो, क्योंकि वह ठीक वैसा ही है जैसा पिता ने अपने साथ मन्त्रणा में [आदर्श रूप में] रचा था, वह पिता के योग्य होना चाहिए। परन्तु यह कहना कि जो सब के पिता द्वारा मन से धारणा किया गया और पहले से रचा गया, ठीक जैसा वह वास्तव में रचा गया है, न्यूनता का फल है, और अज्ञान की उत्पत्ति है, बड़ी निन्दा का दोषी होना है। क्योंकि, उनके अनुसार, सब का पिता इस प्रकार [समझा जाएगा] अपने वक्ष में, अपनी ही मानसिक धारणा के अनुसार, न्यूनता के निकास और अज्ञान के फल उत्पन्न करता हुआ, क्योंकि जिन वस्तुओं की उसने अपने मन में धारणा की थी वे वास्तव में उत्पन्न हो गई हैं।
अध्याय चार.--मिथ्या शिक्षकों के कल्पित शून्य और न्यूनता की असंगति दर्शाई जाती है।
1. तो, परमेश्वर की ओर से ऐसी व्यवस्था का कारण पूछा जाना है; परन्तु जगत की रचना किसी और पर नहीं डाली जानी। और सब वस्तुओं के विषय में यह कहा जाना है कि वे परमेश्वर द्वारा पहले से ऐसे तैयार की गई थीं, कि वे वैसी बनें जैसी वे बनी हैं
बनीं; परन्तु छाया और शून्यता को अस्तित्व में नहीं जगाया जाना। परन्तु, मैं पूछूँ, यह शून्यता [जिसकी वे बात करते हैं] कहाँ से आई? यदि वह सचमुच उसके द्वारा उत्पन्न की गई जो, उनके अनुसार, तेल वस्तुओं का पिता और कर्ता है, तो वह शेष एओनों के समान सम्मान में भी है और उन से सम्बद्ध भी, कदाचित् उन से और भी प्राचीन। इसके अतिरिक्त, यदि वह उसी स्रोत से निकली [जैसे वे निकले], तो वह स्वभाव में उसके समान होनी चाहिए जिसने उसे उत्पन्न किया, तथा उन के समान भी जिन के साथ वह उत्पन्न की गई। इसलिये नितान्त आवश्यकता होगी, दोनों कि जिस बूथोस की वे बात करते हैं, सिगे के साथ, स्वभाव में एक शून्य के समान हो, अर्थात् कि वह सचमुच एक शून्य है; और कि शेष एओन, क्योंकि वे शून्यता के भाई हैं, द्रव्य से रहित(1) भी हों। दूसरी ओर, यदि वह इस प्रकार उत्पन्न नहीं हुई, तो वह अपने से फूटी और अपने द्वारा जनी गई होनी चाहिए, और उस दशा में वह आयु में उस बूथोस के समान होगी जो, उनके अनुसार, तेल का पिता है; और इस प्रकार शून्यता उसी स्वभाव की और उसी सम्मान की होगी उसके साथ जो, उनके अनुसार, सार्वत्रिक पिता है। क्योंकि वह अवश्य या तो किसी के द्वारा उत्पन्न हुई हो, या अपने द्वारा जनी गई हो, और अपने से फूटी हो। परन्तु यदि, सचमुच, शून्यता उत्पन्न की गई, तो उसका उत्पादक वैलेन्तीनुस भी एक शून्य है, वैसे ही उसके अनुयायी भी।
यदि, फिर, वह उत्पन्न नहीं की गई, परन्तु अपने द्वारा जनी गई, तो जो सचमुच एक शून्य है वह उस पिता के समान है, और उसका भाई है, और उसी सम्मान का है, जिस पिता की वैलेन्तीनुस ने घोषणा की है; और वह अधिक प्राचीन है, और अपने अस्तित्व को बहुत पहले के काल से गिनती है, और सम्मान में टोलेमी आप के, और हेराक्लेओन के, और वही मत रखनेवाले शेष सब(2) के बचे हुए एओनों से अधिक ऊँची है।
2. परन्तु यदि, इन बातों के विषय में निराशा को धकेले जाकर, वे मान लें कि सब का पिता सब वस्तुओं को रखता है, और Heroma के बाहर कुछ भी नहीं है (क्योंकि यह नितान्त आवश्यक है कि, [यदि उसके बाहर कुछ हो,] वह अपने से बड़ी किसी वस्तु से घिरा और सीमित हो), और कि वे बाहर की और भीतर की बात ज्ञान और अज्ञान के विषय में कहते हैं, स्थान की दूरी के विषय में नहीं; परन्तु यह कि, प्लेरोमा में, या उन वस्तुओं में जो पिता के द्वारा घिरी हैं, वह सारी सृष्टि जिसे हम रची हुई जानते हैं, डेमियुर्ज द्वारा या दूतों द्वारा बनाई जाकर, अवर्णनीय महानता से घिरी है, जैसे केन्द्र वृत्त में है, या जैसे एक धब्बा वस्त्र में है,--तो, 1ले स्थान पर, वह बूथोस कैसा प्राणी होना चाहिए, जो अपने ही वक्ष में एक दाग को स्थान देता है, और अपने क्षेत्र में किसी और को अपनी ही इच्छा के विरुद्ध रचने या उत्पन्न करने देता है? ऐसा चालचलन सचमुच सारे प्लेरोमा पर [दोष] अधोगति लाएगा, क्योंकि वह 1 से ही उस न्यूनता को, और उन निकासों को जिन का मूल उसी से था,(3) काट सकता था, और अज्ञान में, या भाव में, या न्यूनता में सृष्टि की रचना को अनुमति देने को राजी न होता। क्योंकि जो पीछे एक न्यूनता को सुधार सकता है, और मानो एक दाग को धो डालता है,(4) वह बहुत पहले की तारीख को ऐसा ध्यान रख सकता था कि ऐसा कोई दाग 1 ही बार भी उसकी सम्पत्ति में न पाया जाए। या यदि 1 ही बार उसने बननेवाली वस्तुओं को [वैसी रहने दिया जैसी वे हैं], क्योंकि वे सचमुच और प्रकार से नहीं रची जा सकती थीं, तो यह निकलता है कि उन्हें सदा उसी दशा में बने रहना चाहिए।
क्योंकि यह कैसे सम्भव है, कि जो वस्तुएँ 1 ही बार सुधार नहीं पा सकतीं, वे पीछे उसे पाएँ? या मनुष्य कैसे कह सकते हैं कि वे सिद्धता के लिये बुलाए गए हैं, जब वे ही प्राणी जिन से मनुष्यों को अपना मूल मिलता है--या तो डेमियुर्ज आप, या दूत --न्यूनता में हैं ऐसा घोषित किया जाता है? और यदि, जैसा माना जाता है, [सर्वोच्च सत्ता,] इसलिये कि वह कृपालु है, अन्त में मनुष्यों पर दया की, और उन्हें सिद्धता दी, तो उसे 1 ही बार मनुष्य के रचयिताओं पर दया करनी चाहिए थी, और उन्हें सिद्धता देनी चाहिए थी। इस रीति से, मनुष्य भी सचमुच उसकी करुणा में भागी होते, बनते हुए. उन से सिद्ध जो सिद्ध थे। क्योंकि यदि उसने इन प्राणियों के काम पर दया की, तो बहुत पहले उन पर ही दया करनी चाहिए थी, और उन्हें ऐसी भयानक अन्धाई में पड़ने नहीं देना चाहिए था।
3. छाया और शून्यता के विषय में उनकी बात भी, जिसमें वे मानते हैं कि जिस सृष्टि से हमारा सम्बन्ध है वह रची गई, शून्य हो जाएगी, यदि जिन बातों का उल्लेख है वे उस क्षेत्र में सृजी गईं जो पिता के द्वारा घिरा है। क्योंकि यदि वे मानते हैं कि उनके पिता का प्रकाश ऐसा है कि वह उसके भीतर की सब वस्तुओं को भरता है, और उन सब को प्रकाशित करता है, तो उस क्षेत्र में जो प्लेरोमा से और पिता के प्रकाश से घिरा है कोई शून्य या छाया कैसे रह सकता है? क्योंकि, उस दशा में, उन्हें प्रोपाटोर के भीतर, या प्लेरोमा के भीतर, कोई स्थान दिखाना होगा जो प्रकाशित नहीं, और न किसी के अधिकार में है, जिसमें या तो दूतों ने या डेमियुर्ज ने जो चाहा वह रचा। और वह स्थान थोड़ी मात्रा का नहीं होगा जिसमें ऐसी और इतनी बड़ी सृष्टि रह
सकती है ऐसी कल्पना की जाए। इसलिये नितान्त आवश्यकता होगी कि, प्लेरोमा के भीतर, या जिस पिता की वे बात करते हैं उसके भीतर, वे किसी स्थान की कल्पना करें(1), शून्य, रूपहीन, और अन्धकार से भरा, जिसमें जो वस्तुएँ रची गईं वे रची गईं। परन्तु ऐसी कल्पना से उनके पिता के प्रकाश पर निन्दा आएगी, मानो वह उन वस्तुओं को प्रकाशित और भर नहीं सकता जो उसके भीतर हैं। इस प्रकार, तब, जब वे मानते हैं कि ये वस्तुएँ न्यूनता का फल और भ्रम का काम थीं, वे प्लेरोमा के भीतर और पिता के वक्ष में न्यूनता और भ्रम को प्रवेश कराते हैं।
अध्याय पाँच.--यह जगत उस क्षेत्र के भीतर किसी और सत्ता द्वारा नहीं रचा गया जो पिता के द्वारा घिरा है।
1. इसलिये, जो टिप्पणियाँ मैं ने थोड़ी देर पहले(2) कीं वे उन को उत्तर में उपयुक्त हैं जो कहते हैं कि यह जगत प्लेरोमा के बाहर, या एक "अच्छे परमेश्वर के नीचे; "रचा गया, और ऐसे व्यक्ति, जिस पिता की वे बात करते हैं उसके साथ, प्लेरोमा के बाहर वाली वस्तु से बिलकुल काट दिए जाएँगे, जिसमें, उसी समय, यह आवश्यक है कि वे अन्त में विश्राम करें.(3) फिर, जो मानते हैं कि यह जगत उस क्षेत्र के भीतर कुछ और सत्ताओं द्वारा रचा गया जो पिता के द्वारा घिरा है, उन को उत्तर में, जो बातें अब(4) ध्यान में आई हैं वे सब [उनकी] असंगतियों और असम्बद्धताओं को [दिखाती हुई] सामने आएँगी; और वे विवश होंगे या तो पिता के भीतर की सब वस्तुओं को उज्ज्वल, पूर्ण, और शक्तिमान मानने को, या पिता के प्रकाश पर यह दोष लगाने को कि वह सब वस्तुओं को प्रकाशित नहीं कर सकता; या, उनके प्लेरोमा का एक अंश [ऐसा वर्णित है], तो उसके पूरे को शून्य, अस्तव्यस्त, और अन्धकार से भरा मानना होगा। और वे और सब सृजी वस्तुओं पर दोष लगाते हैं मानो ये केवल कालिक हैं, या [अधिक से अधिक], यदि अनन्त,(5) तौभी भौतिक। परन्तु(6) इन्हें (एओनों को) ऐसे दोषों की पहुँच से परे समझा जाना चाहिए, क्योंकि वे प्लेरोमा के भीतर हैं, नहीं तो प्रश्न के दोष सारे प्लेरोमा पर समान रूप से पड़ेंगे; और इस प्रकार जिस मसीह की वे बात करते हैं वह अज्ञान का कर्ता पाया जाता है। क्योंकि, उनकी बातों के अनुसार, जब उसने द्रव्य तक उस माता को एक रूप दिया जिसकी वे कल्पना करते हैं, उसने उसे प्लेरोमा के बाहर डाल दिया; अर्थात्, उसने उसे ज्ञान से काट दिया। इसलिये, जिसने उसे ज्ञान से अलग किया, उसने सचमुच उस में अज्ञान उत्पन्न किया।
तो फिर वही व्यक्ति शेष एओनों को, जो [उत्पत्ति में] उससे पहले थे, ज्ञान का दान कैसे दे सकता था, और तौभी अपनी माता के लिये अज्ञान का कर्ता होता? क्योंकि उसने उसे ज्ञान की सीमा के परे रखा, जब उसने उसे प्लेरोमा के बाहर डाल दिया।
2. इसके अतिरिक्त, यदि वे प्लेरोमा के भीतर और बाहर होने को क्रम से ज्ञान और अज्ञान का अर्थ समझाएँ, जैसा उन में से कुछ करते हैं (क्योंकि जिसके पास ज्ञान है वह जाननेवाली वस्तु के भीतर है), तो उन्हें अवश्य मानना होगा कि उद्धारकर्ता आप (जिसे वे सब वस्तुएँ नाम देते हैं) अज्ञान की दशा में था। क्योंकि वे मानते हैं कि, प्लेरोमा के बाहर आने पर, उसने उनकी माता [अकामथ] को रूप दिया। तो, यदि वे कहते हैं कि [प्लेरोमा के] बाहर जो कुछ है वह सब वस्तुओं से अनजान है, और यदि उद्धारकर्ता उनकी माता को रूप देने को बाहर गया, तो वह सब वस्तुओं के ज्ञान की सीमा के परे स्थित था; अर्थात्, वह अज्ञान में था। तो वह उसे ज्ञान कैसे पहुँचा सकता था, जब वह आप ज्ञान की सीमा के परे था? क्योंकि वे हम को भी प्लेरोमा के बाहर घोषित करते हैं, इसलिये कि हम उस ज्ञान के बाहर हैं जो उनके पास है। और फिर: यदि उद्धारकर्ता सचमुच खोई हुई भेड़ को ढूँढ़ने को प्लेरोमा के परे गया, परन्तु प्लेरोमा ज्ञान [के बराबर विस्तार] है, तो उसने अपने को ज्ञान की सीमा के परे रखा, अर्थात् अज्ञान में। क्योंकि यह आवश्यक है या तो वे मानें कि प्लेरोमा के बाहर जो है वह स्थान के अर्थ में ऐसा है, जिस दशा में पहले की गई सब टिप्पणियाँ उन पर उठ खड़ी होंगी; या यदि वे भीतर की बात ज्ञान के विषय में कहें, और बाहर की बात अज्ञान के विषय में, तो उनका उद्धारकर्ता, और उससे बहुत पहले मसीह, अज्ञान में रचे गए होंगे, इसलिये कि वे प्लेरोमा के परे, अर्थात् ज्ञान की सीमा के परे, अपनी माता को रूप देने को गए।
3. ये तर्क, उसी प्रकार, उन सब के विषय में लगाए जा सकते हैं जो किसी भी रीति से मानते हैं कि जगत या तो दूतों द्वारा या सच्चे परमेश्वर से भिन्न किसी और के द्वारा रचा गया। क्योंकि जो दोष वे डेमियुर्ज पर लगाते हैं, और उन वस्तुओं पर जो भौतिक और कालिक बनाई गईं, वे सचमुच पिता पर लौट पड़ेंगे; यदि सचमुच(7) वे ही वस्तुएँ
प्लेरोमा के वक्ष में रची गई थीं, पिता की अनुमति और सद्भावना के अनुसार, क्रम से वास्तव में गलना आरम्भ किया। तो [तत्काल] सृष्टिकर्ता इस काम का [वास्तविक] कर्ता नहीं है, उसने सोचा था कि उसने उसे बहुत अच्छा रचा, परन्तु वह है जो न्यूनता की उत्पत्तियों को, और भ्रम के कामों को अपनी ही सम्पत्ति में स्थान देता और स्वीकृत करता है, और कि कालिक वस्तुएँ अनन्त के साथ, क्षयशील अक्षय के साथ, और जो भ्रम में भागी हैं वे जो सत्य की हैं उनके साथ मिलाई जाएँ। तौभी, यदि ये वस्तुएँ सब के पिता की अनुमति या स्वीकृति के बिना रची गईं, तो वह सत्ता अधिक सामर्थी, अधिक बलवाली, और अधिक राजसी होनी चाहिए, जिसने ये वस्तुएँ एक क्षेत्र में बनाईं जो उचित रीति से उसी (पिता) का है, और उसकी अनुमति के बिना ऐसा किया। यदि फिर, जैसा कुछ कहते हैं, उनके पिता ने इन वस्तुओं को स्वीकृति दिए बिना अनुमति दी, तो उसने किसी आवश्यकता के कारण अनुमति दी, [ऐसी चाल को] रोक सकने के कारण, या न रोक सकने के कारण। परन्तु यदि सचमुच वह [इसे रोक] नहीं सकता था, तो वह निर्बल और शक्तिहीन है; और यदि वह कर सकता था, तो वह बहकानेवाला, कपटी, और आवश्यकता का दास है, इसलिये कि वह [ऐसे मार्ग को] सम्मति नहीं देता, तौभी सम्मति देता हो इस प्रकार अनुमति देता है। 1 ही बार भ्रम को उठने देता है, और बढ़ते जाने देता है, वह पीछे के समयों में उसे नाश करने का यत्न करता है, जब [मूल] न्यूनता के कारण बहुत से पहले ही दुःख से नाश हो चुके हैं।
4. तौभी, जो सब के ऊपर परमेश्वर है उसके विषय में कहना शोभा नहीं देता, क्योंकि वह स्वतन्त्र और स्वाधीन है, कि वह आवश्यकता का दास था, या कि कोई बात उसकी अनुमति से होती है, तौभी उसकी इच्छा के विरुद्ध; नहीं तो वे आवश्यकता को परमेश्वर से बड़ी और अधिक राजसी बनाएँगे, क्योंकि जिसमें सब से अधिक शक्ति है वह सब [औरों] से श्रेष्ठ(1) है। और उसे आरम्भ ही में [कल्पित] आवश्यकता के कारणों को काट देना चाहिए था, और अपने को उस आवश्यकता के आगे झुकने को बन्द नहीं होने देना चाहिए था, उसके योग्य वस्तु के अतिरिक्त कुछ भी अनुमति देकर। क्योंकि इस प्रकार की आवश्यकता के सिद्धान्त को आरम्भ में काट देना बहुत अच्छा, अधिक सुसंगत, और अधिक परमेश्वर के योग्य होता, पीछे, मानो पश्चात्ताप से चला हुआ, आवश्यकता के परिणामों को जड़ से मिटाने का यत्न करने से, जब वे ऐसी वृद्धि को पहुँच चुके हों। और यदि सब का पिता आवश्यकता का दास हो, और भाग्य के आगे झुकना पड़े, और वह अनिच्छा से उन बातों को सहता है जो होती हैं, परन्तु उसी समय आवश्यकता और भाग्य के विरोध में कुछ करने को शक्तिहीन है (होमर के जूपिटर के समान, जो आवश्यकता के विषय में कहता है, "मैं ने तुझे इच्छा से दिया है, तौभी अनिच्छुक मन से"), तो, इस तर्क के अनुसार, जिस बूथोस की वे बात करते हैं वह आवश्यकता और भाग्य का दास पाया जाएगा।
अध्याय छह. --दूत और जगत का सृष्टिकर्ता सर्वोच्च परमेश्वर से अनजान नहीं हो सकते थे।
1. फिर, दूत, या जगत का सृष्टिकर्ता, सर्वोच्च परमेश्वर से अनजान कैसे हो सकते थे, जब वे उसकी सम्पत्ति थे, और उसकी सृष्टि थे, और उसके द्वारा घिरे थे? वह अपनी श्रेष्ठता के कारण उन को अदृश्य हो सकता था सचमुच, परन्तु अपने प्रबन्ध के कारण वह उन को किसी रीति से अज्ञात नहीं हो सकता था। क्योंकि यद्यपि यह सच है, जैसा वे घोषित करते हैं, कि वे [स्वभाव की] निकृष्टता द्वारा उससे बहुत दूर अलग थे, तौभी, क्योंकि उसका आधिपत्य उन सब पर फैला था, उन्हें अपने शासक को जानना शोभा देता था, और इसमें विशेष रूप से जानना, कि जिसने उन्हें रचा वह सब का प्रभु है। क्योंकि उसका अदृश्य सार सामर्थी है, वह सब को उसकी सब से सामर्थी, हाँ, सर्वशक्तिमान महानता की गहरी मानसिक अन्तर्दृष्टि और ग्रहण देता है। इसलिये, यद्यपि "पिता को पुत्र को छोड़ कोई नहीं जानता, न पुत्र को पिता को छोड़, और जिन्हें पुत्र उसे प्रकट करेगा,"(2) तौभी सब [प्राणी] कम से कम इस एक तथ्य को जानते हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि में रोपा हुआ विवेक उन्हें चलाता है, और उन्हें [सत्य] प्रकट करता है कि एक ही परमेश्वर है, सब का प्रभु।
2. इसी कारण सब वस्तुएँ [सामान्य सम्मति से] उसके अधिकार के नीचे रखी गई हैं जो परमप्रधान, और सर्वशक्तिमान कहलाता है। उसे पुकारने से, हमारे प्रभु के आने से पहले भी, मनुष्य सब से दुष्ट आत्माओं से, और सब प्रकार के राक्षसों से, और हर प्रकार की धर्मत्यागी शक्ति से बचाए गए। यह ऐसा था, मानो पृथ्वी की आत्माओं या राक्षसों ने उसे देखा हो ऐसा नहीं, परन्तु क्योंकि वे उस के अस्तित्व को जानते थे जो सब के ऊपर परमेश्वर है, जिसके पुकारने पर वे काँप उठे, जैसे उसके शासन के नीचे शक्ति से सम्पन्न हर प्राणी, और प्रत्येक आधिपत्य, और शक्ति, और हर सत्ता काँपती है। समानान्तर रूप से, क्या जो रोमियों के साम्राज्य के नीचे रहते हैं, यद्यपि उन्होंने सम्राट को कभी नहीं देखा, परन्तु भूमि और समुद्र दोनों से उससे बहुत दूर अलग हैं, उसके शासन का अनुभव करते हुए, भली भाँति नहीं जानते कि राज्य में मुख्य शक्ति किस के पास है? तो फिर कैसे हो सकता था, कि जो दूत हम से [स्वभाव में] श्रेष्ठ थे, या वह भी जिसे वे जगत का सृष्टिकर्ता कहते हैं, सर्वशक्तिमान को न जानता, जब गूँगे पशु भी उसके नाम के पुकारने पर काँपते और झुकते हैं? और जैसे, यद्यपि उन्होंने उसे नहीं देखा, तौभी सब वस्तुएँ हमारे प्रभु के नाम के अधीन हैं,(3) वैसे ही उन्हें भी उसके अधीन होना चाहिए जिसने अपने वचन से सब वस्तुओं को बनाया और स्थिर किया, क्योंकि जगत को रचनेवाला उसी से भिन्न कोई नहीं था। और इसी कारण यहूदी अब भी राक्षसों को भगाते हैं के द्वारा
इसी शपथ के, इसलिये कि सब प्राणी उसे पुकारने से डरते हैं जिसने उन्हें रचा।
3. तो, यदि वे यह कहने से हिचकते हैं कि दूत गूँगे पशुओं से अधिक अविवेकी हैं, तो वे पाएँगे कि इन्हें, यद्यपि उन्होंने सब के ऊपर परमेश्वर को नहीं देखा था, उसकी शक्ति और प्रभुता को जानना शोभा देता था। क्योंकि सचमुच हास्यास्पद लगेगा, यदि वे मानें कि वे आप ही, जो पृथ्वी पर रहते हैं, सब के ऊपर परमेश्वर को जानते हैं जिसे उन्होंने कभी नहीं देखा, परन्तु उसे, जिसने उनकी राय के अनुसार उन्हें और सारे जगत को रचा, यद्यपि वह ऊँचाइयों में और स्वर्गों के ऊपर रहता है, उन बातों को जानने नहीं देते जिन से वे आप, यद्यपि वे नीचे रहते हैं, परिचित हैं। [यह दशा है], जब तक वे कदाचित् यह न मानें कि बूथोस पृथ्वी के नीचे तारतारुस में रहता है, और इस कारण वे उन दूतों से पहले उसके ज्ञान तक पहुँचे हैं जिन का निवास ऊपर है। इस प्रकार वे पागलपन की ऐसी खाई में दौड़ पड़ते हैं कि जगत के सृष्टिकर्ता को समझ से रहित कहें। वे सचमुच दया के योग्य हैं, क्योंकि ऐसी पूरी मूर्खता से वे कहते हैं कि वह (जगत का सृष्टिकर्ता) न अपनी माता को जानता था, न उसके बीज को, न एओनों के प्लेरोमा को, न प्रोपाटोर को, न यह कि जो वस्तुएँ उसने बनाईं वे क्या थीं; परन्तु ये उन वस्तुओं की प्रतिमाएँ हैं जो प्लेरोमा के भीतर हैं, उद्धारकर्ता ने गुप्त रूप से परिश्रम किया कि वे ऐसे रची जाएँ ['अचेत डेमियुर्ज द्वारा], उन वस्तुओं के सम्मान में जो ऊपर हैं।
अध्याय सात.--सृजी वस्तुएँ उन एओनों की प्रतिमाएँ नहीं हैं जो प्लेरोमा के भीतर हैं।
1. जब डेमियुर्ज इस प्रकार सब वस्तुओं से अनजान था, वे हमें बताते हैं कि उद्धारकर्ता ने अपनी माता के द्वारा [जिसे उसने अस्तित्व में बुलाया] सृष्टि द्वारा प्लेरोमा पर सम्मान दिया, इसलिये कि उसने ऊपर की वस्तुओं की समानताएँ और प्रतिमाएँ उत्पन्न कीं। परन्तु मैं पहले ही दिखा चुका हूँ कि प्लेरोमा के परे कुछ भी होना असम्भव था (जिस बाहरी क्षेत्र में वे हमें बताते हैं कि प्लेरोमा के भीतर की वस्तुओं की प्रतिमाएँ बनाई गईं), या कि यह जगत सर्वोच्च परमेश्वर से भिन्न किसी और के द्वारा रचा गया। परन्तु यदि हर ओर उन्हें उलट देना, और उन्हें झूठ के बेचनेवाले सिद्ध करना, सुखद बात है; तो हम उनके विरोध में कहें, कि यदि ये वस्तुएँ ऊपर की वस्तुओं के सम्मान के लिये, उनकी समानता के अनुसार, उद्धारकर्ता द्वारा बनाई गईं, तो उन्हें सदा बने रहना शोभा देता था, ताकि जो वस्तुएँ सम्मानित हुई हैं वे निरन्तर सम्मान में बनी रहें। परन्तु यदि वे सचमुच मिट जाती हैं, तो सम्मान की इस बहुत संक्षिप्त अवधि का क्या उपयोग, सम्मान,- -एक सम्मान जो एक समय अस्तित्व में नहीं था, और जो फिर शून्य हो जाएगा? उस दशा में मैं सिद्ध करूँगा कि उद्धारकर्ता ऊपर की वस्तुओं का सम्मान करनेवाले से बढ़कर व्यर्थ महिमा का अभिलाषी है,(1) क्योंकि कालिक वस्तुएँ ऐसी वस्तुओं पर कौन सा सम्मान दे सकती हैं जो अनन्त हैं और सदा बनी रहती हैं? या जो मिट जाती हैं वे उन पर जो रहती हैं? या जो क्षयशील हैं वे उन पर जो अक्षय हैं?--क्योंकि, मर्त्य मनुष्यों में भी, उस सम्मान का कोई मूल्य नहीं जो शीघ्र मिट जाता है, परन्तु उस का जो जितना सम्भव हो उतने समय तक बना रहे।
परन्तु जो वस्तुएँ बनते ही अन्त को आ जाती हैं, उनके विषय में न्याय से कहा जा सकता है कि वे उन के तिरस्कार के लिये रची गईं जो उन से सम्मानित समझे जाते हैं; और जो अनन्त है उसके साथ अपमान का व्यवहार होता है जब उसकी प्रतिमा बिगड़ती और गल जाती है। परन्तु यदि उनकी माता न रोई होती, न हँसी होती, और न निराशा में फँसी होती? तब उद्धारकर्ता के पास परिपूर्णता का सम्मान करने का कोई साधन नहीं होता, क्योंकि उसकी अन्तिम गड़बड़ी की दशा(2) का अपना द्रव्य नहीं था जिससे वह प्रोपाटोर का सम्मान कर सके।
2. हाय उस व्यर्थ महिमा के सम्मान पर जो तुरन्त मिट जाता है, और फिर दिखाई नहीं देता! कोई(3) एओन होगा, जिसके विषय में ऐसा सम्मान अस्तित्व में रहा ही नहीं ऐसा समझा जाएगा, और तब ऊपर की वस्तुएँ सम्मान रहित होंगी; या प्लेरोमा के सम्मान के लिये रोती और निराशा में एक और माता को फिर उत्पन्न करना आवश्यक होगा। कैसी असमान, और उसी समय निन्दात्मक प्रतिमा! क्या तुम मुझ से कहते हो कि एकलौते की एक प्रतिमा जगत के रचयिता द्वारा(4) उत्पन्न की गई, जिसे(5) फिर तुम सब के पिता का नूस (मन) माना जाना चाहते हो, और [तौभी मानते हो] कि यह प्रतिमा अपने से अनजान थी, सृष्टि से अनजान,--माता से भी अनजान,--जो कुछ अस्तित्व में है उससे अनजान, और उन वस्तुओं से अनजान जो उसके द्वारा बनाई गईं; और क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती, जब अपने ही विरोध में तुम एकलौते पर भी अज्ञान डालते हो? क्योंकि यदि ये वस्तुएँ [नीचे] ऊपर की वस्तुओं की समानता के अनुसार उद्धारकर्ता द्वारा बनाई गईं, और जो (डेमियुर्ज) ऐसी समानता के अनुसार बनाया गया वह इतने बड़े अज्ञान में था, तो अवश्य निकलता है कि उसके चारों ओर, और उसके अनुसार, जिसकी समानता पर जो इस प्रकार अनजान है वह रचा गया, प्रश्न के प्रकार का अज्ञान आत्मिक रूप से अस्तित्व में है।
क्योंकि यह सम्भव नहीं, क्योंकि दोनों आत्मिक रूप से उत्पन्न हुए, और न गढ़े गए न जोड़े गए, कि कुछ में समानता बनी रहे, और औरों में प्रतिमा की समानता बिगड़ जाए, वह प्रतिमा जो यहाँ उत्पन्न की गई ताकि वह ऊपर की उस उत्पत्ति की प्रतिमा के अनुसार हो। परन्तु यदि वह समान नहीं, तो दोष तब उद्धारकर्ता पर लगेगा, जिसने असमान प्रतिमा उत्पन्न की,--अर्थात्, एक असमर्थ कारीगर होना। क्योंकि यह उनकी शक्ति से बाहर है कि वे कहें कि उद्धारकर्ता के पास उत्पत्ति की क्षमता नहीं थी, क्योंकि वे उसे सब वस्तुएँ नाम देते हैं। तो, यदि प्रतिमा असमान है, तो वह निकम्मा कारीगर है, और दोष, उनकी कल्पना के अनुसार, उद्धारकर्ता पर है। दूसरी ओर, यदि वह समान है, तो वही अज्ञान उनके प्रोपाटोर के नूस (मन) में पाया जाएगा, अर्थात् एकलौते में। उस दशा में पिता का नूस अपने से अनजान था; पिता से भी अनजान; और उन वस्तुओं से भी अनजान जो उसके द्वारा रची गईं। परन्तु यदि उसके पास ज्ञान है, तो अवश्य यह भी निकलता है कि जो उद्धारकर्ता द्वारा उसकी समानता पर रचा गया वह समान वस्तुओं को जाने; और इस प्रकार, उनके अपने सिद्धान्तों के अनुसार, उनकी विकट निन्दा उलट जाती है।
3. इससे अलग, तौभी, जो वस्तुएँ सृष्टि की हैं, अनेक प्रकार की, नाना रूप, और अगणित जैसी वे हैं, वे उन तीस एओनों की प्रतिमाएँ कैसे हो सकती हैं जो प्लेरोमा के भीतर हैं, जिन के नाम, जैसे इन मनुष्यों ने उन्हें ठहराया, मैं ने इस से पहले की पुस्तक में रख दिए हैं? वे सृष्टि की [विशाल] विविधता को अपने प्लेरोमा की [तुलना में] लघुता के अनुकूल नहीं ला सकेंगे, वे इसके किसी एक भाग के विषय में भी यह नहीं कर सकते, चाहे [वह] स्वर्गीय या पार्थिव प्राणियों का हो, या जल में रहनेवालों का। क्योंकि वे आप गवाही देते हैं कि उनका प्लेरोमा तीस एओनों से बना है; परन्तु कोई भी दिखाने को तैयार होगा कि, जिन [सृजे प्राणियों] का उल्लेख हुआ है उन के एक ही विभाग में, वे गिनते हैं कि तीस नहीं, परन्तु अनेक हजार जातियाँ हैं। तो वे वस्तुएँ, जो ऐसी बहु रूप सृष्टि बनाती हैं, जो स्वभाव में एक दूसरे के विरुद्ध हैं, और आपस में नहीं मिलतीं, और एक दूसरी को नाश करती हैं, प्लेरोमा के तीस एओनों की प्रतिमाएँ और समानताएँ कैसे हो सकती हैं, यदि सचमुच, जैसा वे घोषित करते हैं, ये एक ही स्वभाव की होकर, समान और मिलते गुणों की हैं, और [अपने बीच] भेद नहीं दिखातीं? क्योंकि यह आवश्यक था, यदि ये वस्तुएँ उन एओनों की प्रतिमाएँ हैं,--क्योंकि वे घोषित करते हैं कि कुछ मनुष्य स्वभाव से दुष्ट हैं, और कुछ, दूसरी ओर, स्वभाव से अच्छे,--कि वे अपने एओनों में भी ऐसे भेद दिखाएँ, और मानें कि उन में से कुछ स्वभाव से अच्छे उत्पन्न हुए, और कुछ स्वभाव से बुरे, ताकि उन वस्तुओं की समानता की कल्पना एओनों के साथ मेल खाए।
इसके अतिरिक्त, क्योंकि जगत में कुछ प्राणी कोमल हैं, और दूसरे क्रूर, कुछ अहानिकर हैं, और दूसरे हानिकर हैं और शेष को नाश करते हैं; कुछ का निवास पृथ्वी पर है, औरों का जल में, औरों का वायु में, और औरों का स्वर्ग में; उसी प्रकार, वे एओनों के ऐसे गुण दिखाने को बाध्य हैं, यदि सचमुच एक दूसरे की प्रतिमाएँ हैं। और इसके अतिरिक्त; "वह अनन्त आग जिसे पिता ने शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार किया है,"(2)-- उन्हें दिखाना चाहिए कि ऊपर के उन एओनों में से किस की यह प्रतिमा है; क्योंकि वह भी सृष्टि का अंश गिनी जाती है।
4. तौभी, यदि वे कहते हैं कि ये वस्तुएँ उस एओन की एन्थिमसिस की प्रतिमाएँ हैं जो भाव में गिर पड़ा, तो, 1 से ही, वे अपनी माता के विरुद्ध अभक्ति से चलेंगे, उसे बुराई और क्षयशील प्रतिमाओं का पहला कारण घोषित करके। और फिर, फिर, जो वस्तुएँ अनेक रूप, असमान, और स्वभाव में विपरीत हैं, वे एक ही सत्ता की प्रतिमाएँ कैसे हो सकती हैं? और यदि वे कहते हैं कि प्लेरोमा के दूत अनेक हैं, और जो वस्तुएँ बहुत हैं वे इन की प्रतिमाएँ हैं--इस रीति से भी जो वृत्तान्त वे देते हैं सन्तोषजनक नहीं होगा। क्योंकि, 1ले स्थान पर, वे तब प्लेरोमा के दूतों में भेद दिखाने को बाध्य हैं, जो परस्पर विपरीत हैं, जैसे नीचे की प्रतिमाएँ अपने में विपरीत स्वभाव की हैं। और फिर, फिर, क्योंकि सृष्टिकर्ता को घेरनेवाले अनेक, हाँ, अगणित दूत हैं, जैसा सब भविष्यद्वक्ता मानते हैं,--[उदाहरण के लिये कहते हुए,] "दस हजार गुणा दस हजार उसके पास खड़े थे, और अनेक हजारों हजार उसकी सेवा करते थे,"(2)--तो, उनके अनुसार(3), प्लेरोमा के दूतों की प्रतिमाएँ सृष्टिकर्ता के दूत होंगी, और सारी सृष्टि प्लेरोमा की प्रतिमा में रहती है, परन्तु ऐसा कि तीस एओन अब सृष्टि की बहु रूप विविधता के साथ मेल नहीं खाते।
5. और आगे, यदि ये वस्तुएँ [नीचे] उन [ऊपर] की समानता के अनुसार बनाई गईं, तो फिर वे किस समानता के अनुसार तब बनाई जाएँगी? क्योंकि यदि जगत के सृष्टिकर्ता ने ये वस्तुएँ अपनी ही(4) धारणा से सीधे नहीं रचीं, परन्तु, असमर्थ वास्तुकार के समान, या अपना 1ला पाठ पाते बालक के समान, औरों द्वारा दी गई आद्यरूपों से उनकी नकल की, तो उनके बूथोस ने उस सृष्टि के रूप कहाँ से पाए जिसे उसने 1 ही बार उत्पन्न किया? स्पष्ट निकलता है
कि उसे किसी और से नमूना मिला होगा जो उसके ऊपर है, और उस एक को, फिर, किसी और से। [इन कल्पनाओं के कारण] कम नहीं, प्रतिमाओं की बात, देवताओं के विषय में जैसी, अनन्त तक फैलेगी, यदि हम तुरन्त अपने मन को एक ही कारीगर पर, और एक ही परमेश्वर पर न टिकाएँ, जिसने आप उन वस्तुओं को रचा जो सृजी गई हैं। या क्या सचमुच ऐसा है, कि केवल मनुष्यों के विषय में, कोई मान लेगा कि उन्होंने आप जीवन के प्रयोजनों के लिये उपयोगी वस्तु निकाल ली, परन्तु उस परमेश्वर को नहीं देगा जिसने जगत रचा, कि उसने आप उन वस्तुओं के रूप रचे जो बनाई गई हैं, और उसे उसकी व्यवस्थित व्यवस्था दी?
6. परन्तु, फिर, ये वस्तुएँ [नीचे] उन [ऊपर] की प्रतिमाएँ कैसे हो सकती हैं, क्योंकि वे सचमुच उन के विपरीत हैं, और किसी बात में उन के साथ सहानुभूति नहीं रख सकतीं? क्योंकि जो वस्तुएँ एक दूसरे के विपरीत हैं वे उन को नाश कर सकती हैं जिन के वे विपरीत हैं, परन्तु किसी रीति से उनकी प्रतिमाएँ नहीं हो सकतीं--जैसे, उदाहरण के लिये, जल और अग्नि; या, फिर, प्रकाश और अन्धकार, और ऐसी और वस्तुएँ, कभी एक दूसरे की प्रतिमाएँ नहीं हो सकतीं। उसी प्रकार, न क्षयशील और पार्थिव, और मिश्रित स्वभाव की, और क्षणिक वस्तुएँ उन की प्रतिमाएँ हो सकती हैं, जो इन मनुष्यों के अनुसार आत्मिक हैं; जब तक ये वस्तुएँ आप मिश्रित, स्थान में सीमित, और निश्चय आकार की मान न ली जाएँ, और इस प्रकार फिर आत्मिक न रहें, और व्याप्त न रहें, और विशाल विस्तार में फैलती न रहें, और अग्राह्य न रहें। क्योंकि उनमें अवश्य निश्चय आकृति होनी चाहिए, और कुछ सीमाओं में बन्द होनी चाहिए, ताकि वे सच्ची प्रतिमाएँ हों; और तब यह ठहर जाता है कि वे आत्मिक नहीं हैं। तौभी, यदि ये मनुष्य मानते हैं कि वे आत्मिक हैं, और व्याप्त हैं, और अग्राह्य हैं, तो जो वस्तुएँ आकृतिवाली हैं, और कुछ सीमाओं में बन्द हैं, वे ऐसी वस्तुओं की प्रतिमाएँ कैसे हो सकती हैं जो आकृति से रहित और अग्राह्य हैं?
7. यदि, फिर, वे कहते हैं कि न तो विन्यास के अनुसार न रचना के अनुसार, परन्तु संख्या और उत्पत्ति के क्रम के अनुसार, वे वस्तुएँ [ऊपर] [इन नीचे की] प्रतिमाएँ हैं, तो, 1ले स्थान पर, इन वस्तुओं [नीचे] को ऊपर के उन एओनों की प्रतिमाएँ और समानताएँ नहीं कहा जाना चाहिए। क्योंकि जिन वस्तुओं के पास [ऊपर] की वस्तुओं का न ढंग है न आकार, वे उनकी प्रतिमाएँ कैसे हो सकती हैं? और, अगले स्थान पर, वे ऊपर के एओनों की संख्याओं और उत्पत्तियों दोनों को ऐसा ढालेंगे कि उन्हें सृष्टि [नीचे] से सम्बन्ध रखनेवाले thoseth at के समान और मिलता हुआ बनाएँ। परन्तु अब, क्योंकि वे केवल तीस एओनों का उल्लेख करते हैं, और घोषित करते हैं कि सृष्टि [नीचे] के भीतर समाई वस्तुओं की विशाल भीड़ केवल तीस वस्तुओं की प्रतिमाएँ हैं, हम उन्हें बिलकुल बुद्धि से रहित ठहराकर उचित रीति से दण्ड दे सकते हैं।
अध्याय आठ.--सृजी वस्तुएँ प्लेरोमा की छाया नहीं हैं। 1. यदि, फिर, वे घोषित करते हैं कि ये वस्तुएँ [नीचे] उन [ऊपर] की छाया हैं, जैसा उन में से कुछ मानने को इतने साहसी हैं, ताकि इस बात में वे प्रतिमाएँ हैं, तो उनके लिये यह आवश्यक होगा कि वे मानें कि ऊपर की वस्तुएँ शरीर रखती हैं। क्योंकि जो शरीर ऊपर हैं वे छाया डालते हैं, परन्तु आत्मिक द्रव्य नहीं डालते, क्योंकि वे किसी मात्रा में औरों को अन्धकारमय नहीं कर सकते। तौभी, यदि हम उन्हें यह बात भी दें (यद्यपि वह, सचमुच, एक असम्भावना है), कि उन सारों की एक छाया है जो आत्मिक और ज्योतिर्मय हैं, जिस में वे घोषित करते हैं कि उनकी माता उतरी; तौभी, क्योंकि [ऊपर की] वे वस्तुएँ अनन्त हैं, और जो छाया वे डालती हैं वह सदा बनी रहती है, [यह निकलता है कि] ये वस्तुएँ [नीचे] भी क्षणिक नहीं हैं, परन्तु उन के साथ बनी रहती हैं जो उन पर अपनी छाया डालती हैं। दूसरी ओर, यदि ये वस्तुएँ [नीचे] क्षणिक हैं, तो आवश्यक परिणाम है कि वे [ऊपर] भी, जिन की ये छाया हैं, मिट जाएँ; जबकि; यदि वे बने रहें, तो उनकी छाया भी बनी रहे।
2. तौभी, यदि वे मानते हैं कि कही गई छाया [ऊपर की वस्तुओं] की छाया से उत्पन्न होकर अस्तित्व में नहीं है, परन्तु केवल इस बात में, कि [नीचे की वस्तुएँ] उन [ऊपर] से बहुत दूर अलग हैं, तो वे अपने पिता के प्रकाश पर निर्बलता और अपर्याप्तता का दोष लगाएँगे, मानो वह इन वस्तुओं तक नहीं फैल सकता, परन्तु जो खाली है उसे भरने में चूक जाता है, और छाया को दूर करने में, और वह तब जब कोई कोई बाधा नहीं दे रहा। क्योंकि, उनके अनुसार, उनके पिता का प्रकाश अन्धकार में बदल जाएगा और अस्पष्टता में गाड़ दिया जाएगा, और उन स्थानों में अन्त को आएगा जो खालीपन से चिह्नित हैं, क्योंकि वह सब वस्तुओं को बेध और भर नहीं सकता। तो वे फिर यह घोषित न करें कि उनका बूथोस सब वस्तुओं की परिपूर्णता है, यदि सचमुच उसने न भरा है न प्रकाशित किया है जो शून्य और छाया है; या, दूसरी ओर, वे शून्य और छाया की बात करना छोड़ दें, यदि उनके पिता का प्रकाश सचमुच सब वस्तुओं को भरता है।
3. 1ले पिता के परे, तो--अर्थात्, जो सब के ऊपर परमेश्वर है--न कोई प्लेरोमा हो सकता है जिस में वे घोषित करते हैं कि उस एओन की एन्थिमसिस उतरी जिसने भाव सहा (ताकि प्लेरोमा आप, या 1ला परमेश्वर, परे वाली वस्तु से सीमित और घिरा न हो, और सचमुच उसके द्वारा घिरा न हो); न शून्य या छाया का कोई अस्तित्व हो सकता है, क्योंकि पिता पहले से अस्तित्व में है, ताकि उसका प्रकाश चूक न जाए, और शून्य में अन्त न पाए। इसके अतिरिक्त, यह अविवेक और अभक्ति है, एक स्थान की कल्पना करना जिसमें, उनके अनुसार, जो प्रोपाटोर, और प्रोआर्खे, और सब का पिता, और इस
प्लेरोमा का, रुक जाता है और अन्त रखता है। फिर, पहले कही गई कारणों(1) के लिये, यह कहना अनुमत नहीं कि किसी और सत्ता ने पिता के वक्ष में इतनी विशाल सृष्टि रची, उसकी सम्मति के साथ या बिना। क्योंकि यह समान रूप से अभक्ति और मूढ़ता है कि इतनी बड़ी सृष्टि दूतों द्वारा, या सच्चे परमेश्वर से अनजान किसी विशेष उत्पत्ति द्वारा, उस क्षेत्र में रची गई(2) जो उसका अपना है। न यह सम्भव है कि पार्थिव और भौतिक वस्तुएँ उनके प्लेरोमा के भीतर रची गई हों, क्योंकि वह पूर्णतया आत्मिक है। और आगे, यह भी सम्भव नहीं कि जो वस्तुएँ बहु रूप सृष्टि की हैं, और परस्पर विपरीत गुणों से रची गई हैं [वे रची गई हों] ऊपर की वस्तुओं की प्रतिमा के अनुसार, क्योंकि ये (अर्थात् एओन) थोड़े, मिलती रचना के, और सजातीय कहे जाते हैं। केनोमा की छाया के विषय में उनकी बात भी--अर्थात्, एक शून्य की--सब बातों में झूठी निकली है। तो उनकी गढ़न्त, [जिस किसी रीति से देखी जाए,] निराधार सिद्ध हुई है,(3) और उनकी शिक्षाएँ अस्थिर। खाली भी हैं जो उनकी सुनते हैं, और सचमुच विनाश की खाई में उतर रहे हैं।
अध्याय नौ.--जगत का केवल एक ही सृष्टिकर्ता है, परमेश्वर पिता: यही कलीसिया का स्थिर विश्वास है।
1. यह कि परमेश्वर जगत का सृष्टिकर्ता है, उन्हीं व्यक्तियों द्वारा भी माना जाता है जो अनेक रीतियों से उसके विरुद्ध बोलते हैं, और तौभी उसे मानते हैं, उसे सृष्टिकर्ता, और एक दूत कहकर, यह कहना छोड़ कि सब पवित्रशास्त्र [उसी फल की ओर] पुकारते हैं, और प्रभु हमें स्वर्ग में इस पिता(4) के विषय में सिखाता है, और किसी और के विषय में नहीं, जैसा मैं इस काम के आगे के भाग में दिखाऊँगा। तौभी अभी के लिये, जो प्रमाण उन से निकलता है जो हमारी शिक्षाओं के विपरीत शिक्षाएँ कहते हैं, वह आप ही पर्याप्त है,--सचमुच सब मनुष्य इस सत्य को मानते हुए: प्राचीन लोग अपनी ओर से पहिले रचे मनुष्य की परम्परा से इस धारणा को विशेष ध्यान से सुरक्षित रखते हुए, एक ही परमेश्वर, आकाश और पृथ्वी के रचयिता, की स्तुति करते हुए; और लोग, फिर, उनके बाद, परमेश्वर के भविष्यद्वक्ताओं द्वारा इस तथ्य की याद दिलाए जाकर, और अन्यजातियों ने सृष्टि से ही इसे सीखा। क्योंकि सृष्टि भी उसे प्रकट करती है जिसने उसे रचा, और बनाया हुआ काम ही उसे सुझाता है जिसने उसे बनाया, और जगत उसे दिखाता है जिसने उसे व्यवस्थित किया। विश्वव्यापी कलीसिया ने, इसके अतिरिक्त, सारे जगत के द्वारा, प्रेरितों से यह परम्परा पाई है।
2. यह परमेश्वर, तब, जैसा मैं ने कहा है, मान लिया जाकर, और अपनी सत्ता के तथ्य पर सब से साक्षी पाकर, जिस पिता को वे अस्तित्व में रच डालते हैं वह निस्सन्देह अस्थिर है, और [उसकी सत्ता के] साक्षी नहीं रखता। सीमोन मागुस 1ला था जिसने कहा कि वह आप ही सब पर परमेश्वर है, और जगत उसके दूतों द्वारा रचा गया। तब जो उसके पीछे आए, जैसा मैं ने 1ली पुस्तक में दिखाया है,(5) अपने अपने विचारों से, सृष्टिकर्ता के विरुद्ध अपनी अभक्ति और अधर्म की शिक्षाओं द्वारा [उसकी शिक्षा को] और भी बिगाड़ गए। अब जिनका उल्लेख है ये [मिथ्या शिक्षक],(6) बताए हुए लोगों के चेले होकर, जो उन से सहमत होते हैं उन्हें अन्यजातियों से भी बुरा कर देते हैं। क्योंकि पहले वाले "सृष्टिकर्ता की नहीं, सृष्टि की सेवा करते हैं,"(7) और "जो देवता नहीं हैं उन की,"(8) यद्यपि वे इस ब्रह्माण्ड के रचयिता परमेश्वर को देवत्व में 1ला स्थान देते हैं। परन्तु पीछे वाले मानते हैं कि वह, [अर्थात् इस जगत का सृष्टिकर्ता,] न्यूनता का फल है, और उसका वर्णन करते हैं कि वह पशु-स्वभाव का है, और उस सामर्थ को नहीं जानता जो उस से ऊपर है, जबकि वह भी पुकारता है, "मैं परमेश्वर हूँ, और मेरे सिवा दूसरा कोई परमेश्वर नहीं।"(9) यह दृढ़ करते हुए कि वह झूठ बोलता है, वे आप ही झूठे हैं, उस पर हर प्रकार की दुष्टता डालते हैं; और जो इस सत्ता से ऊपर नहीं है उसे सचमुच अस्तित्व वाला मानकर, वे अपने ही विचारों से उस परमेश्वर के विरुद्ध निन्दा में दोषी ठहरते हैं जो सचमुच है, और जो नहीं है ऐसे ईश्वर को अस्तित्व में रचकर अपनी ही निन्दा करते हैं। और इस प्रकार जो अपने को "सिद्ध" कहते हैं, और सब बातों के ज्ञान से युक्त कहते हैं, वे अन्यजातियों से बुरे, और अपने ही सृष्टिकर्ता के विरुद्ध भी अधिक निन्दापूर्ण विचार रखनेवाले पाए जाते हैं।
अध्याय दस.--मिथ्या शिक्षकों द्वारा पवित्रशास्त्र की टेढ़ी व्याख्याएँ: परमेश्वर ने सब वस्तुओं को शून्य से रचा, पहले से विद्यमान पदार्थ से नहीं।
1. इसलिये यह अत्यन्त अविवेक है कि हम उस पर ध्यान न दें जो सचमुच परमेश्वर है, और जो सब से साक्षी पाता है, और यह पूछें कि क्या उसके ऊपर वह [दूसरी सत्ता] है जिसका सचमुच कोई अस्तित्व नहीं, और जिस की घोषणा किसी ने कभी नहीं की। क्योंकि उसके विषय में कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा गया, इसका साक्ष्य वे आप ही देते हैं; क्योंकि जब वे, दयनीय सफलता से, उस सत्ता पर, जिस की उन्होंने कल्पना की है, उन दृष्टान्तों को [पवित्रशास्त्र के] ले जाते हैं जो, जिस रूप में भी कहे गए हों, [इस उद्देश्य से] खोजे जाते हैं, तो प्रकट है कि वे अब दूसरे [ईश्वर] को उत्पन्न करते हैं, जो था
पहले कभी नहीं खोजा गया था। क्योंकि इस तथ्य से कि वे पवित्रशास्त्र के सन्दिग्ध अंशों को (सन्दिग्ध, परन्तु मानो दूसरे ईश्वर की ओर संकेत करते हुए नहीं, [सच्चे] परमेश्वर की व्यवस्थाओं के विषय में) इस प्रकार समझाने का यत्न करते हैं, उन्होंने दूसरे ईश्वर को गढ़ा है, जैसा मैं ने पहले कहा, बालू की रस्सियाँ बुनते हुए, और कम महत्वपूर्ण प्रश्न पर अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न को जोड़ते हुए। क्योंकि कोई प्रश्न ऐसे दूसरे प्रश्न से हल नहीं हो सकता जो आप ही हल की बाट जोहता है; और बुद्धिमानों की दृष्टि में, एक सन्देह दूसरे सन्देह से, या पहेलियाँ किसी बड़ी पहेली से, नहीं समझाई जा सकतीं, परन्तु ऐसे स्वभाव की बातें उन से अपना हल पाती हैं जो प्रकट, संगत और स्पष्ट हैं।
2. परन्तु ये [मिथ्या शिक्षक], पवित्रशास्त्र के अंशों और दृष्टान्तों को समझाने का यत्न करते हुए, एक और अधिक महत्वपूर्ण, और सचमुच अभक्तिपूर्ण प्रश्न इस प्रकार आगे रखते हैं, "क्या सचमुच उस परमेश्वर के ऊपर दूसरा ईश्वर है जो जगत का सृष्टिकर्ता था?" वे उन प्रश्नों को हल करने के मार्ग पर नहीं हैं [जिन्हें वे रखते हैं]; क्योंकि वे ऐसा करने का उपाय कैसे पा सकते थे? परन्तु वे कम महत्व के प्रश्न पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न जोड़ देते हैं, और इस प्रकार [अपनी कल्पनाओं में] एक ऐसी कठिनाई घुसा देते हैं जिसका हल नहीं। क्योंकि इसलिये कि वे(1) "ज्ञान" को ही जानें (फिर भी यह तथ्य न सीखते हुए कि प्रभु, तीस वर्ष की आयु में, सत्य के बपतिस्मा के पास आया), वे उस परमेश्वर का अभक्ति से तिरस्कार करते हैं जो सृष्टिकर्ता था, और जिसने मनुष्यों के उद्धार के लिये उसे भेजा। और इसलिये कि वे हमें यह बताने के योग्य गिने जाएँ कि पदार्थ का सार कहाँ से है, जबकि वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर ने अपनी प्रसन्नता के अनुसार, अपनी ही इच्छा और सामर्थ के प्रयोग में, जो पहले नहीं था उस से सब वस्तुओं को रचा (ताकि जो अब हैं उनका अस्तित्व हो), उन्होंने [एक multitute की] व्यर्थ बातें इकट्ठी की हैं। वे इस प्रकार सचमुच अपना अविश्वास प्रकट करते हैं; जो सचमुच है उस पर वे विश्वास नहीं करते, और जो वस्तुतः अस्तित्व नहीं रखता उस [विश्वास] में वे गिर गए हैं।
3. क्योंकि, जब वे हमें बताते हैं कि सब भीगा सार अकामथ के आँसुओं से निकला, सब उज्ज्वल सार उसके मुस्कान से, सब ठोस सार उसके विषाद से, सब चलायमान सार उसके भय से, और इस प्रकार उन्हें उत्कृष्ट ज्ञान है जिसके कारण वे औरों से श्रेष्ठ हैं,--तो ये बातें तिरस्कार के योग्य और सचमुच हास्यास्पद कैसे न मानी जाएँ? वे नहीं मानते कि परमेश्वर ने (सामर्थी होकर, और सब साधनों में धनी होकर) पदार्थ को ही रचा, क्योंकि वे नहीं जानते कि एक आत्मिक और दैवी सार कितना कर सकता है। परन्तु वे मानते हैं कि उनकी माता, जिसे वे स्त्री से स्त्री कहते हैं, अपनी उपर्युक्त भाव-वेदनाओं से सृष्टि का इतना विशाल भौतिक सार उत्पन्न किया। वे यह भी पूछते हैं कि सृष्टि का सार सृष्टिकर्ता को कहाँ से दिया गया; परन्तु वे नहीं पूछते कि उनकी माता को (जिसे वे भटके हुए एओन की एन्थिमसिस और प्रेरणा कहते हैं) इतनी बड़ी मात्रा आँसू, या पसीना, या विषाद, या वह जिससे पदार्थ का शेष उत्पन्न हुआ, [कहाँ से दिया गया]।
4. क्योंकि, रची हुई वस्तुओं के सार को उस की सामर्थ और इच्छा पर डालना जो सब का परमेश्वर है, विश्वास और ग्रहण दोनों के योग्य है। यह [बुद्धि के] अनुकूल भी है, और ऐसे विश्वास के विषय में भली भाँति कहा जा सकता है, "जो बातें मनुष्यों से असंभव हैं वे परमेश्वर से संभव हैं।"(2) मनुष्य, सचमुच, शून्य से कुछ नहीं बना सकते, केवल पहले से विद्यमान पदार्थ से, तौभी परमेश्वर इस बात में मनुष्यों से अत्यन्त श्रेष्ठ है, कि जिस का पहले अस्तित्व नहीं था उस सृष्टि का सार उसने आप अस्तित्व में बुलाया। परन्तु यह कहना कि पदार्थ भटकते हुए एक एओन की एन्थिमसिस से उत्पन्न हुआ, और [जिस का उल्लेख है] वह एओन अपनी एन्थिमसिस से दूर अलग था, और फिर, उसकी भाव-वेदना और अनुभूति, उस से अलग, पदार्थ बन गई--अविश्वसनीय, मूढ़, असंभव और अस्थिर है।
अध्याय ग्यारह.--मिथ्या शिक्षक, सत्य पर अविश्वास करने से, भ्रम की खाई में गिर पड़े: उनकी पद्धतियों की जाँच के कारण।
1. वे नहीं मानते कि वह, जो सब पर परमेश्वर है, सब का रचयिता होकर, एक बुद्धिमान शिल्पी के समान, और अति सामर्थी अधिपति के समान, अपने ही क्षेत्र में, जैसा उसे भाया, अपने वचन के द्वारा, जो विविध और नाना [सृष्टि के काम हैं] उन्हें रचा, क्योंकि वह सब का रचयिता है। परन्तु वे मानते हैं कि दूतों ने, या परमेश्वर से अलग किसी सामर्थ ने, जो उसे नहीं जानती थी, इस ब्रह्माण्ड को रचा। इस मार्ग से, इसलिये, सत्य पर विश्वास न देकर, झूठ में लोटते हुए, उन्होंने सच्चे जीवन की रोटी खो दी है, और शून्यता में(3) और छाया की खाई में गिर पड़े हैं। वे ईसप के कुत्ते के समान हैं, जिसने रोटी गिरा दी, और अपनी छाया को पकड़ने का यत्न किया, और इस प्रकार [सच्चा] भोजन खो दिया। प्रभु के वचनों से ही सिद्ध करना सहज है कि वह जगत के एक पिता और सृष्टिकर्ता को, और मनुष्य के रचयिता को, मानता है, जिस की घोषणा व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं ने की, और वह दूसरे को नहीं जानता, और कि यह एक ही सचमुच सब पर परमेश्वर है; और कि वह सिखाता है कि पिता से सम्बन्ध रखनेवाला पुत्रत्व, जो अनन्त जीवन है, उसके द्वारा होता है, और वह इसे सब धर्मियों पर [जैसा वह करता है] प्रदान करता है।
2. परन्तु क्योंकि ये मनुष्य हम पर आक्रमण करने में आनन्दित होते हैं, और अपने सच्चे कुतर्कियों के स्वभाव में, उन बातों से हम पर टूट पड़ते हैं जो वास्तव में हमारे विरुद्ध कुछ भी नहीं लगतीं, और हमारे विरोध में बहुत से दृष्टान्त और [कुतर्क] प्रश्न लाते हैं, मैं ने भला समझा, दूसरी ओर, 1ले स्थान पर, उनकी अपनी शिक्षाओं के विषय में ये पूछताछ उन पर रखना, उनकी असंभावना दिखाना, और उनके साहस का अन्त करना। यह हो चुकने के बाद, प्रभु के प्रवचन आगे लाने का [मेरा आशय है], ताकि वे केवल हम पर आक्रमण के साधनों से रहित न किए जाएँ, परन्तु, क्योंकि वे रखे गए उन प्रश्नों का बुद्धि से उत्तर न दे सकेंगे, वे देखें कि उनकी युक्ति की योजना नष्ट हो गई है; ताकि, या तो सत्य की ओर लौटकर, और अपने को दीन करके, और अपनी नाना कल्पनाओं से रुककर, वे उन. निन्दाओं के लिये परमेश्वर को मनाएँ जो उन्होंने उसके विरुद्ध कही हैं, और उद्धार पाएँ; या, यदि वे उस व्यर्थ महिमा की पद्धति में अब भी डटे रहें जिसने उनके मन को पकड़ लिया है, तो वे कम से कम यह आवश्यक पाएँ कि हमारे विरुद्ध अपनी युक्ति का प्रकार बदलें।
अध्याय बारह.--मिथ्या शिक्षकों की त्रियाकोंटाड न्यूनता और अधिकता दोनों से भूलती है: सोफिया अपने सहचर से अलग कभी कुछ उत्पन्न नहीं कर सकती थी; लोगोस और सिगे समकालीन नहीं हो सकते थे।
1. हम(1) 1ले स्थान पर, उनकी त्रियाकोंटाड के विषय में, कह सकते हैं कि वह सारी दोनों ओर आश्चर्यजनक रीति से नाश होती है, अर्थात् न्यूनता और अधिकता दोनों के विषय में। वे कहते हैं कि उसे सूचित करने के लिये प्रभु तीस वर्ष की आयु में बपतिस्मा लेने आया। परन्तु यह कथन वास्तव में उनकी सारी युक्ति के स्पष्ट उलटने के बराबर है। न्यूनता के विषय में, यह इस प्रकार होता है: 1ले स्थान पर, क्योंकि वे प्रोपाटोर को अन्य एओनों में गिनते हैं। सब के पिता को अन्य उत्पत्तियों के साथ नहीं गिना जाना चाहिए; जो उत्पन्न नहीं हुआ उसे उस के साथ जो उत्पन्न हुआ; जो जन्मा नहीं उसे उस के साथ जो जन्मा; जिसे कोई नहीं समझता उसे उस के साथ जो उस से समझा जाता है, और जो इस कारण [आप] अगम्य है; और जो बिना आकृति है उसे उस के साथ जिस की निश्चित आकृति है। क्योंकि वह शेष से श्रेष्ठ है, इसलिये उसे उन के साथ नहीं गिना जाना चाहिए, और ऐसा कि जो भाव-वेदना से रहित है और भ्रम में नहीं है वह एक ऐसे एओन के साथ गिना जाए जो भाव के अधीन है, और वास्तव में भ्रम में है। क्योंकि जो पुस्तक इस के ठीक पहले है उस में मैं ने दिखाया है कि बूथोस से आरम्भ करके वे सोफिया तक त्रिकोंटाड गिनते हैं, जिस का वे वर्णन भटके हुए एओन के रूप में करते हैं; और मैं ने वहीं उनके [एओनों] के नाम भी रखे हैं; परन्तु यदि वह न गिना जाए, तो उनकी अपनी दिखावट पर, एओनों की तीस उत्पत्तियाँ अब नहीं रहतीं, वरन ये तब केवल उनतीस हो जाती हैं।
2. इसके बाद, 1ली उत्पत्ति एन्नोया के विषय में, जिसे वे सिगे भी कहते हैं, जिस से फिर वे नूस और अलेथिया को भेजा हुआ बताते हैं, वे दोनों बातों में भूल करते हैं। क्योंकि यह असंभव है कि किसी की विचार (एन्नोया), या उसका मौन (सिगे), उस से अलग समझा जाए; और कि, उस से परे भेजा जाकर, उसका अपना विशेष रूप हो। परन्तु यदि वे दृढ़ करें कि (एन्नोया) उस से परे नहीं भेजी गई, वरन प्रोपाटोर के साथ एक बनी रही, तो फिर वे उसे अन्य एओनों के साथ क्यों गिनते हैं--उन के साथ जो [पिता के साथ] एक नहीं थे, और इस कारण उसकी महानता से अनजान हैं? यदि, तौभी, वह इस प्रकार संयुक्त थी (इसे भी विचार में ले लें), तो नितान्त आवश्यकता है कि इस संयुक्त और अविभाज्य संयोग से, जो केवल एक सत्ता बनाता है, वहाँ(2) एक अविभक्त और संयुक्त उत्पत्ति निकले, ताकि वह उसके असमान न हो जिसने उसे भेजा। परन्तु यदि ऐसा हो, तो जैसे बूथोस और सिगे, वैसे ही नूस और अलेथिया भी एक ही सत्ता बनाएँगे, सदा परस्पर चिपके हुए। और क्योंकि एक बिना दूसरे के सोचा नहीं जा सकता, जैसे जल [नमी के विचार] बिना [नहीं सोचा जा सकता], या अग्नि [ताप के विचार] बिना, या पत्थर [कठोरता के विचार] बिना (क्योंकि ये बातें परस्पर बँधी हैं, और एक दूसरे से अलग नहीं हो सकता, वरन सदा उसके साथ रहता है), वैसे ही उचित है कि बूथोस उसी प्रकार एन्नोया के साथ संयुक्त हो, और नूस अलेथिया के साथ। लोगोस और जोए फिर, इस प्रकार संयुक्तों के द्वारा भेजे गए होने से, आप संयुक्त हों, और केवल एक सत्ता बनाएँ।
परन्तु, ऐसी युक्ति की प्रक्रिया के अनुसार, होमो और एक्लेसिया भी, और सचमुच उत्पन्न एओनों के शेष सब युग्म, संयुक्त हों, और सदा एक दूसरे के साथ रहें। क्योंकि उनकी दृष्टि में आवश्यकता है कि एक स्त्री एओन एक पुरुष एओन के पास साथ साथ रहे, क्योंकि वह, यों कहें, उसकी प्रीति [का निकास] है।
3. ये बातें ऐसी होने पर, और ऐसे विचार उन के द्वारा घोषित होने पर, वे फिर, बिना लज्जा, सिखाने का साहस करते हैं कि दुओडेकाड का कनिष्ठ एओन, जिसे वे सोफिया भी कहते हैं, अपने सहचर के साथ संयोग के बिना, जिसे वे थेलेटस कहते हैं, भाव-वेदना सही, और अलग, उस से किसी सहायता के बिना, एक उत्पत्ति को जन्म दिया जिसे वे "स्त्री से एक स्त्री" नाम देते हैं। वे इस प्रकार ऐसे पूरे उन्माद में दौड़ते हैं कि एक ही बात के विषय में दो अत्यन्त स्पष्ट विपरीत विचार बनाते हैं। क्योंकि यदि
बूथोस सदा सिगे के साथ एक है, नूस अलेथिया के साथ, लोगोस जोए के साथ, और शेष के विषय में भी ऐसा ही, तो सोफिया, अपने सहचर के साथ संयोग के बिना, कैसे भाव सह सकती थी या कुछ उत्पन्न कर सकती थी? और यदि, फिर, उसने सचमुच उस से अलग भाव सहा, तो अनिवार्य है कि अन्य युग्म भी अपने बीच वियोग और अलगाव मानें,--एक बात जिसे मैं पहले ही असंभव दिखा चुका हूँ। इसलिये यह भी असंभव है कि सोफिया ने थेलेटस से अलग भाव सहा; और इस प्रकार, फिर, उनकी सारी युक्ति की पद्धति उलट जाती है। क्योंकि उन्होंने अभी(1) फिर शेष [भौतिक सार] सारे को, एक दुःखान्त रचना के समान, उस भाव से निकाला है जिसे वे दृढ़ करते हैं कि उसने अपने सहचर के साथ संयोग के बिना सहा।
4. यदि, तौभी, अपनी व्यर्थ कल्पनाओं को नाश से बचाने के लिये, वे निर्लज्जता से मानें कि शेष युग्म भी इस अन्तिम युग्म के कारण एक दूसरे से विभक्त और अलग हुए, तो [मैं उत्तर देता हूँ कि], 1ले स्थान पर, वे एक असंभव बात पर टिकते हैं। क्योंकि वे प्रोपाटोर को उसकी एन्नोया से, या नूस को अलेथिया से, या लोगोस को जोए से, और शेष के साथ भी ऐसा ही, कैसे अलग कर सकते हैं? और वे आप कैसे मान सकते हैं कि वे फिर एकता की ओर मुड़ते हैं, और वास्तव में सब एक हैं, यदि ये युग्म ही, जो प्लेरोमा के भीतर हैं, एकता नहीं रखते, वरन एक दूसरे से अलग हैं; और इस सीमा तक, कि वे एक दूसरे के साथ संयोग के बिना भाव सहते हैं और जन्म का काम करते हैं, जैसे मुर्गियाँ मुर्गों के संसर्ग के बिना करती हैं?
5. तब, फिर, उनकी 1ली और 1ले जन्मी ओगदोअड इस प्रकार उलट जाएगी: उन्हें मानना होगा कि बूथोस और सिगे, नूस और अलेथिया, लोगोस और जोए, आन्थ्रोपोस और एक्लेसिया, अलग अलग उसी प्लेरोमा में रहते हैं। परन्तु यह असंभव है कि सिगे (मौन) लोगोस (वाक्) की उपस्थिति में रहे, या फिर, कि लोगोस सिगे की उपस्थिति में अपने को प्रकट करे। क्योंकि ये एक दूसरे को परस्पर नष्ट करते हैं, जैसे प्रकाश और अन्धकार किसी प्रकार एक ही स्थान में नहीं रह सकते: क्योंकि यदि प्रकाश प्रबल हो, तो अन्धकार नहीं हो सकता; और यदि अन्धकार हो, तो प्रकाश नहीं हो सकता, क्योंकि जहाँ प्रकाश दिखाई देता है, अन्धकार भगा दिया जाता है। इसी प्रकार, जहाँ सिगे है, वहाँ लोगोस नहीं हो सकता; और जहाँ लोगोस है, वहाँ निश्चय सिगे नहीं हो सकती। परन्तु यदि वे कहें कि लोगोस केवल भीतर(2) (अव्यक्त) है, तो सिगे भी भीतर होगी, और भीतर के लोगोस से कम नष्ट नहीं होगी। परन्तु कि वह सचमुच केवल मन में नहीं सोचा जाता, उनकी (एओनों) की उत्पत्ति का क्रम ही दिखाता है।
6. तब वे घोषित न करें कि 1ली और प्रधान ओगदोअड लोगोस और सिगे से बनी है, वरन वे [आवश्यकता के रूप में] या तो सिगे को या लोगोस को निकाल दें; और तब उनकी 1ली और प्रधान ओगदोअड समाप्त हो जाती है। क्योंकि यदि वे [एओनों के] युग्मों का वर्णन संयुक्त रूप में करें, तो उनकी सारी युक्ति टुकड़ों में विफल हो जाती है। क्योंकि, यदि वे संयुक्त होते, तो सोफिया अपने सहचर के साथ संयोग के बिना एक न्यूनता कैसे उत्पन्न कर सकती थी? दूसरी ओर, यदि वे मानें कि, उत्पत्ति में जैसा है, एओनों में से प्रत्येक का अपना विशेष सार है, तो सिगे और लोगोस एक ही स्थान में कैसे प्रकट हो सकते हैं? इतने तक, तब, न्यूनता के विषय में।
7. परन्तु फिर, उनकी त्रियाकोंटाड अधिकता के विषय में निम्नलिखित विचारों से उलट जाती है। वे होरोस को (जिसे वे नाना नामों से पुकारते हैं जिन का मैं ने पिछली पुस्तक में उल्लेख किया है) मोनोजेनेस के द्वारा अन्य एओनों के समान उत्पन्न दिखाते हैं। उन में से कुछ मानते हैं कि यह होरोस मोनोजेनेस के द्वारा उत्पन्न हुआ, जबकि अन्य दृढ़ करते हैं कि वह प्रोपाटोर ने आप अपनी ही प्रतिमा में भेजा। वे आगे दृढ़ करते हैं कि मोनोजेनेस के द्वारा एक उत्पत्ति रची गई--मसीह और पवित्र आत्मा; और वे इन्हें प्लेरोमा की संख्या में नहीं गिनते, न उद्धारकर्ता को, जिसे वे तोटुम(3) (सब वस्तुएँ) भी घोषित करते हैं। अब, एक अन्धे को भी प्रकट है कि केवल तीस उत्पत्तियाँ, जैसा वे मानते हैं, नहीं भेजी गईं, वरन इन तीस के साथ चार और। क्योंकि वे प्रोपाटोर को आप प्लेरोमा में गिनते हैं, और उन्हें भी जो क्रम से एक दूसरे के द्वारा उत्पन्न हुए। तो क्यों है कि वे [अन्य सत्ताएँ] इन के साथ उसी प्लेरोमा में विद्यमान नहीं गिनी जातीं, जब वे उसी रीति से उत्पन्न हुई थीं? वे कौन सा न्यायसंगत कारण दे सकते हैं कि अन्य एओनों के साथ न मसीह को गिनें, जिस का वे वर्णन करते हैं कि पिता की इच्छा के अनुसार मोनोजेनेस के द्वारा उत्पन्न हुआ, न पवित्र आत्मा को, न होरोस को, जिसे वे सोतेर(4) (उद्धारकर्ता) भी कहते हैं, और न उद्धारकर्ता को आप, जो उनकी माता को सहायता और रूप देने आया? क्या यह ऐसा है मानो ये पीछे वाले पहले वालों से दुर्बल हों, और इसलिये एओनों के नाम के, या उन में गिने जाने के, अयोग्य हों, या मानो वे श्रेष्ठ और अधिक उत्तम हों? परन्तु वे दुर्बल कैसे हो सकते थे, जब वे औरों की स्थापना और सुधार के लिये उत्पन्न किए गए थे?
और तब, फिर, वे 1ली और प्रधान टेट्राड से श्रेष्ठ नहीं हो सकते, जिस के द्वारा वे भी उत्पन्न हुए; क्योंकि वह भी उस संख्या में गिनी गई है जो ऊपर मनुष्यों-
tioned. ये पीछे की सत्ताएँ, तब, प्लेरोमा of the or that में भी गिनी जानी चाहिए थीं, इस नाम को धारण करनेवाले उन एओनों के सम्मान से वंचित होनी चाहिए थीं (टेट्राड)।
8. इसलिये, क्योंकि उनकी त्रियाकोंटाड इस प्रकार शून्य कर दी गई है, जैसा मैं ने दिखाया है, न्यूनता और अधिकता दोनों के विषय में (क्योंकि ऐसी संख्या से व्यवहार में, अधिकता या न्यूनता [किसी भी सीमा तक] संख्या को अस्थिर कर देगी, और इतने बड़े अन्तर कितने अधिक?), यह निकलता है कि जो वे अपनी ओगदोअड और दुओडेकाड के विषय में मानते हैं वह एक मात्र कथा है जो खड़ी नहीं रह सकती। उनकी सारी पद्धति, इसके अतिरिक्त, भूमि पर गिरती है, जब उनकी नींव ही नाश होकर बूथोस में,(1) अर्थात् जिस का अस्तित्व नहीं है उस में, घुल जाती है। तब वे अब से कुछ और कारण रखें कि प्रभु तीस वर्ष की आयु में बपतिस्मा लेने क्यों आया, और प्रेरितों की दुओडेकाड [को किसी और रीति से समझाएँ]; और रक्तस्राव से पीड़ित उस स्त्री के [विषय में कही गई बात को]; और अन्य सब बातों को जिन के विषय में वे इतने उन्माद से व्यर्थ परिश्रम करते हैं।
अध्याय तेरह.--मिथ्या शिक्षकों द्वारा मानी गई उत्पत्ति का 1ला क्रम सर्वथा असम्भव है।
1. मैं अब यह दिखाने को आगे बढ़ता हूँ, इस प्रकार, कि उत्पत्ति का 1ला क्रम, जैसा उन्होंने कल्पना की है, अस्वीकार की जानी चाहिए। क्योंकि वे मानते हैं कि नूस और अलेथिया बूथोस और उसकी एन्नोया से उत्पन्न हुए, जो एक विरोध सिद्ध होता है। क्योंकि नूस वह है जो आप मुख्य है, और सर्वोच्च, और, यों कहें, सब समझ का सिद्धान्त और स्रोत। एन्नोया, फिर, जो उस से उठती है, किसी विषय के विषय में किसी प्रकार का भाव है। इसलिये नहीं हो सकता कि नूस बूथोस और एन्नोया के द्वारा उत्पन्न हुआ; उनके लिये यह सत्य के अधिक निकट होगा कि वे मानें कि एन्नोया प्रोपाटोर और इस नूस की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई। क्योंकि एन्नोया नूस की पुत्री नहीं है, जैसा वे दृढ़ करते हैं, वरन नूस एन्नोया का पिता बनता है। क्योंकि नूस प्रोपाटोर के द्वारा कैसे उत्पन्न हो सकता था, जब वह उस छिपी और अदृश्य प्रीति का मुख्य और 1ला स्थान धारण करता है जो उसके भीतर है? इस प्रीति से इन्द्रिय उत्पन्न होती है, और एन्नोया, और एन्थिमसिस, और अन्य बातें जो नूस आप के केवल पर्याय हैं। जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, वे किसी विशेष विषय के विषय में उसी सामर्थ के कुछ निश्चित विचार-अभ्यास मात्र हैं। हम [अलग अलग] शब्दों को उनके(2) अर्थ की लम्बाई और चौड़ाई के अनुसार समझते हैं, [अर्थ के] किसी [मूल] परिवर्तन के अनुसार नहीं; और [विचार के नाना अभ्यास] [उसी ज्ञान के क्षेत्र] से सीमित हैं, और [उसी] शब्द से साथ साथ व्यक्त होते हैं, [वही] अर्थ भीतर रहता है, और रचता है, और प्रशासित करता है, और पहले कही गई बातों पर अपनी ही सामर्थ से और जैसा उसे भाता है स्वतन्त्रता से राज्य करता है।
2. क्योंकि किसी बात के विषय में उस [सामर्थ] का 1ला अभ्यास एन्नोया कहलाता है; परन्तु जब वह बना रहता है, और बल बटोरता है, और सारे जीव को अधिकार में ले लेता है, तो वह एन्थिमसिस कहलाता है। यह एन्थिमसिस, फिर, जब वह एक ही बात पर दीर्घ काल अपने को अभ्यास में लाती है, और, यों कहें, सिद्ध हो चुकी होती है, तो संवेदना नाम पाती है। और यह संवेदना, जब बहुत विकसित होती है, मन्त्रणा बनती है। फिर, इस मन्त्रणा की वृद्धि और बहुत विकसित अभ्यास विचार की जाँच (निर्णय) बनता है; और यह मन में रहकर सबसे उचित रीति से लोगोस (तर्क) कहलाता है, जिस से बोला हुआ लोगोस (वचन) निकलता है।(3) परन्तु जिन [विचार-अभ्यासों] का उल्लेख हुआ है वे सब [मूल रूप से] एक ही हैं, नूस से अपना मूल पाते हुए, और अपनी वृद्धि के अनुसार [भिन्न] नाम पाते हुए। जैसे मानव शरीर, जो एक समय युवा है, फिर जीवन की प्रधान अवस्था में, और फिर वृद्ध, अपनी वृद्धि और निरन्तरता के अनुसार [भिन्न] नाम पा चुका है, सार के किसी परिवर्तन के अनुसार नहीं, या शरीर की किसी [वास्तविक] हानि के कारण नहीं, वैसा ही उन [मानसिक अभ्यासों] के साथ है। क्योंकि, जब कोई किसी बात का [मन से] ध्यान करता है, तो वह उस पर सोचता भी है; और जब वह उस पर सोचता है, तो उसके विषय में ज्ञान भी रखता है; और जब वह उसे जानता है, तो उस पर विचार भी करता है; और जब वह उस पर विचार करता है, तो उसे मन से सँभालता भी है; और जब वह उसे मन से सँभालता है, तो उसके विषय में बोलता भी है। परन्तु, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, इन [मानसिक प्रक्रियाओं] सब पर नूस राज्य करता है, जबकि वह आप अदृश्य है, और उन प्रक्रियाओं के द्वारा, जो कही गई हैं, मानो [उस से] किरणों के द्वारा, अपने से वाणी बोलता है, परन्तु वह आप किसी और के द्वारा नहीं भेजा जाता।
3. ये बातें मनुष्यों में उचित रीति से ठीक कही जा सकती हैं, क्योंकि वे स्वभाव से संयुक्त हैं, और शरीर और जीव से बने हैं। परन्तु जो दृढ़ करते हैं कि एन्नोया परमेश्वर से भेजी गई, और नूस एन्नोया से, और फिर, क्रम से, लोगोस इन से, वे, 1ले स्थान पर, दोषी ठहराए जाने हैं कि उन्होंने इन उत्पत्तियों का अनुचित उपयोग किया; और, अगले स्थान पर, कि वे मनुष्यों के भावों, भाव-वेदनाओं, और मानसिक झुकावों का वर्णन करते हैं, जबकि वे [इस प्रकार सिद्ध करते them-
selves] परमेश्वर से अनजान। अपनी बोलने की रीति से, वे उन बातों को सब के पिता पर डालते हैं जो मनुष्यों पर लागू होती हैं, जिसे वे यह भी घोषित करते हैं कि वह सब से अज्ञात है; और वे इन्कार करते हैं कि उसने आप जगत बनाया, ताकि उस पर सामर्थ की कमी(1) डालने से बचें; जबकि, उसी समय, वे उसे मानव भाव और भाव-वेदनाएँ देते हैं। परन्तु यदि वे पवित्रशास्त्र को जानते, और सत्य से सिखाए गए होते, तो वे निस्सन्देह जानते कि परमेश्वर मनुष्यों के समान नहीं है; और कि उसके विचार मनुष्यों के विचारों के समान नहीं हैं।(2) क्योंकि सब का पिता उन भावों और भाव-वेदनाओं से बहुत दूर है जो मनुष्यों में काम करती हैं। वह एक सरल, असंयुक्त सत्ता है, विविध अंगों से रहित,(3) और सर्वथा अपने समान, और अपने बराबर, क्योंकि वह पूरी तरह समझ है, और पूरी तरह आत्मा, और पूरी तरह विचार, और पूरी तरह बुद्धि, और पूरी तरह तर्क, और पूरी तरह श्रवण, और पूरी तरह दर्शन, और पूरी तरह प्रकाश, और जो कुछ अच्छा है उस सब का पूरा स्रोत--जैसा भक्त और धर्मनिष्ठ परमेश्वर के विषय में कहने के अभ्यस्त हैं।
4. वह, तौभी, [सब] इन गुणों से ऊपर है, और इसलिये वर्णनातीत है। क्योंकि वह भली भाँति और उचित रीति से एक ऐसी समझ कहला सकता है जो सब बातों को ग्रहण करती है, परन्तु वह [इस कारण] मनुष्यों की समझ के समान नहीं है; और वह सबसे उचित रीति से प्रकाश कहला सकता है, परन्तु वह उस प्रकाश के समान कुछ भी नहीं है जिस से हम परिचित हैं। और इसी प्रकार, अन्य सब बातों में, सब का पिता किसी भी मात्रा में मानव दुर्बलता के समान नहीं है। वह इन शब्दों में उस प्रेम के अनुसार कहा जाता है [जो हम उस पर रखते हैं]; परन्तु महानता की दृष्टि से, उसके विषय में हमारे विचार इन अभिव्यक्तियों से आगे बढ़ जाते हैं। यदि तब, मनुष्यों के विषय में भी, समझ आप निकास से नहीं उठती, और न वह बुद्धि जो अन्य वस्तुओं को उत्पन्न करती है जीवित मनुष्य से अलग होती है, जबकि उसकी गतियाँ और भाव प्रकट होते हैं, तो बहुत अधिक परमेश्वर का मन, जो सब समझ है, किसी भी रीति से कभी अपने से अलग नहीं होगा; और न कुछ(4) [उसके विषय में] ऐसे उत्पन्न हो सकता है मानो किसी भिन्न सत्ता के द्वारा।
5. क्योंकि यदि उसने बुद्धि उत्पन्न की, तो जिसने इस प्रकार बुद्धि उत्पन्न की वह, उनके विचारों के अनुसार, एक संयुक्त और शारीरिक सत्ता समझा जाना चाहिए; ताकि परमेश्वर, जिसने [जिस बुद्धि का उल्लेख है उसे] भेजा, उस से अलग हो, और जो बुद्धि भेजी गई [उस से] अलग हो। परन्तु यदि वे दृढ़ करें कि बुद्धि बुद्धि से भेजी गई, तो वे परमेश्वर की बुद्धि को चीर देते हैं, और उसे भागों में बाँट देते हैं। वह कहाँ गई? वह कहाँ से भेजी गई? क्योंकि जो किसी स्थान से भेजा जाता है, वह अनिवार्य रूप से किसी और में चला जाता है। परन्तु परमेश्वर की बुद्धि से अधिक प्राचीन कौन सा अस्तित्व था, जिस में वे मानते हैं कि वह भेजी गई? और वह क्षेत्र कितना विशाल रहा होगा जो परमेश्वर की बुद्धि को ग्रहण और धारण कर सकता था! यदि, तौभी, वे दृढ़ करें [कि यह निकास हुआ] ठीक जैसे एक किरण सूर्य से निकलती है, तो, जैसे नीचे की वायु जो किरण को ग्रहण करती है उस से पहले अस्तित्व में रही होगी, वैसे [ऐसी युक्ति से] वे सूचित करेंगे कि कुछ अस्तित्व में था, जिस में परमेश्वर की बुद्धि भेजी गई, जो उसे धारण कर सकता था, और उस से अधिक प्राचीन था। इस के पीछे, हमें मानना होगा कि, जैसे हम सूर्य को देखते हैं, जो सब वस्तुओं से छोटा है, अपने से बड़ी दूरी तक किरणें भेजता है, वैसे ही हम कहते हैं कि प्रोपाटोर ने अपने से परे, और अपने से बड़ी दूरी पर, एक किरण भेजी। परन्तु परमेश्वर से परे, या उस से दूरी पर, क्या सोचा जा सकता है, जिस में उसने यह किरण भेजी?
6. यदि, फिर, वे दृढ़ करें कि वह [बुद्धि] पिता से परे नहीं भेजी गई, वरन पिता के भीतर ही, तो, 1ले स्थान पर, यह कहना व्यर्थ हो जाता है कि वह भेजी ही गई। क्योंकि यदि वह पिता के भीतर बनी रही तो वह कैसे भेजी जा सकती थी? क्योंकि निकास उस वस्तु का प्रकटीकरण है जो निकाली जाती है, उसे निकालनेवाले से परे। अगले स्थान पर, यह [बुद्धि] भेजी जाकर, वह लोगोस भी जो उस से निकलता है अभी पिता के भीतर रहेगा, जैसे लोगोस से निकलनेवाले भावी निकास भी रहेंगे। तब, ये ऐसी दशा में पिता से अनजान नहीं हो सकते, क्योंकि वे उसके भीतर हैं; और, सब पिता से समान रूप से घिरे होने पर, उनके निकास के अवरोह क्रम के अनुसार कोई [दूसरे से] कम उसे नहीं जान सकता। और उन सब को समान माप में भाव-रहित भी बने रहना होगा, क्योंकि वे अपने पिता की गोद में हैं, और उन में से कोई कभी अधोगति या क्षय की दशा में नहीं डूब सकता। क्योंकि पिता के पास अधोगति नहीं है, जब तक संयोग से एक बड़े वृत्त में एक छोटा न समाया हो, और इस में फिर एक छोटा; या जब तक वे पिता के विषय में यह न दृढ़ करें कि, एक गोले या वर्ग की रीति पर, वह अपने भीतर चारों ओर एक गोले की समानता को, या शेष एओनों की उत्पत्ति को वर्ग के रूप में, रखता है, इन में से प्रत्येक महानता में अपने ऊपर वाले से घिरा हुआ, और छोटेपन में अपने पीछे वाले को फिर घेरता हुआ; और कि इस कारण, सब में सबसे छोटा और अन्तिम, जिसका स्थान केन्द्र में है, और इस प्रकार पिता से दूर अलग, प्रोपाटोर से सचमुच अनजान था। परन्तु यदि वे ऐसी कोई कल्पना मानें, तो उन्हें अपने बूथोस को बन्द करना होगा साथ.
एक निश्चित रूप और स्थान में, जबकि वह औरों को घेरता भी है, और उन से घिरा भी है; क्योंकि उन्हें अनिवार्य रूप से मानना होगा कि उसके बाहर कुछ है जो उसे घेरता है। और कम नहीं, जो धारण करते हैं और जो धारण किए जाते हैं उनके विषय की बात अनन्त में बहती जाएगी; और [एओन] सब अत्यन्त स्पष्ट रीति से [एक दूसरे से] घिरे शरीर दिखाई देंगे।
7. आगे, उन्हें यह भी मानना होगा कि या तो वह मात्र शून्यता है, या सारा ब्रह्माण्ड उसके भीतर है; और उस दशा में सब समान मात्रा में पिता के सहभागी होंगे। जैसे, यदि कोई जल में वृत्त, या गोल या वर्गाकार आकृतियाँ, बनाए, तो ये सब समान रूप से जल के सहभागी होंगे; जैसे, फिर, जो वायु में रचे जाते हैं वे अनिवार्य रूप से वायु के सहभागी होंगे, और जो प्रकाश में [रचे जाते हैं] प्रकाश के; वैसे ही जो उसके भीतर हैं वे सब भी समान रूप से पिता के सहभागी होंगे, उन में अज्ञान का कोई स्थान न होगा। तब, [सब वस्तुओं को] भरनेवाले पिता की यह सहभागिता कहाँ है? यदि, सचमुच, उसने [सब वस्तुओं को] भर दिया है, तो उन में अज्ञान नहीं होगा। इस आधार पर, तब, [मानी हुई] अधोगति का उनका काम शून्य हो जाता है, और जगत के शेष की रचना के साथ पदार्थ की उत्पत्ति भी; जिन बातों को वे मानते हैं कि उनका सार भाव और अज्ञान से निकला। यदि, दूसरी ओर, वे मानें कि वह शून्यता है, तो वे सबसे बड़ी निन्दा में गिरते हैं; वे उसके आत्मिक स्वभाव का इन्कार करते हैं। क्योंकि वह आत्मिक सत्ता कैसे हो सकता है, जो उन वस्तुओं को भी नहीं भर सकता जो उसके भीतर हैं?
8. अब, बुद्धि के निकास के विषय में जो बातें कही गई हैं वे उसी प्रकार बसिलिदेस के मत के लोगों के विरोध में लागू होती हैं, और शेष ग्नोस्टिकों के विरोध में भी, जिन से इन्होंने भी (वैलेन्तीनियों ने) निकासों के विषय के विचार अपनाए, और 1ली पुस्तक में खण्डन किए गए। परन्तु मैं ने अब स्पष्ट दिखाया है कि नूस की 1ली उत्पत्ति, अर्थात् जिस बुद्धि की वे बात करते हैं उसकी, एक अस्थिर और असंभव विचार है। और देखें कि [एओनों के] शेष के विषय में बात कैसी है। क्योंकि वे मानते हैं कि लोगोस और जोए उसके द्वारा (अर्थात्, नूस) इस प्लेरोमा के रचयिताओं के रूप में भेजे गए; जबकि वे लोगोस के एक निकास की कल्पना करते हैं, अर्थात् मानव भावों की समानता पर वचन की, और जल्दी से परमेश्वर के विषय में अनुमान बनाते हैं, मानो उन्होंने अपनी इस दृढ़ता में कुछ अद्भुत पाया हो कि लोगोस नूस के द्वारा I उत्पन्न किया गया। सचमुच सब को स्पष्ट बोध है कि यह मनुष्यों के विषय में तर्क से दृढ़ किया जा सकता है।(1) परन्तु उस में जो सब पर परमेश्वर है, क्योंकि वह सब नूस है, और सब लोगोस, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, और अपने में किसी और से अधिक प्राचीन या परवर्ती कुछ नहीं रखता, और किसी और से विरुद्ध कुछ नहीं, वरन सर्वथा समान, और सदृश, और सजातीय बना रहता है, उस क्रम में ऐसी उत्पत्ति की कल्पना का अब आधार नहीं रहा जिस का उल्लेख हुआ है।
जैसे वह नहीं भूलता जो घोषित करता है कि परमेश्वर सब दर्शन है, और सब श्रवण (क्योंकि जिस रीति से वह देखता है, उसी में वह सुनता भी है; और जिस रीति से वह सुनता है, उसी में वह देखता भी है), वैसे ही जो दृढ़ करता है कि वह सब बुद्धि है, और सब वचन, और कि जिस किसी दृष्टि से वह बुद्धि है, उसी में वह वचन भी है, और कि यह नूस उसका लोगोस है, वह अभी सब के पिता के विषय में केवल एक अपर्याप्त धारणा ही रखेगा, परन्तु उन से कहीं अधिक उचित [उसके विषय में विचार] रखेगा जो मनुष्यों के बोले हुए वचन की उत्पत्ति को परमेश्वर के अनन्त वचन पर ले जाते हैं, [उसे] उत्पत्ति का आरम्भ और क्रम देते हुए, जैसा वे अपने ही वचन को देते हैं। और किस दृष्टि से परमेश्वर का वचन--हाँ, वरन परमेश्वर आप, क्योंकि वह वचन है--मनुष्यों के वचन से भिन्न होगा, यदि वह उत्पत्ति के उसी क्रम और प्रक्रिया का अनुसरण करे?
9. वे जोए के विषय में भी भ्रम में गिरे हैं, यह मानकर कि वह 6ठे स्थान में उत्पन्न हुई, जबकि उचित था कि वह [शेष] सब से पहले रहे, क्योंकि परमेश्वर जीवन है, और अविनाशिता, और सत्य। और ये तथा ऐसी बातें अवरोह के क्रमिक माप के अनुसार उत्पन्न नहीं की गई हैं, वरन वे उन सिद्धताओं के नाम हैं जो परमेश्वर में सदा हैं, जहाँ तक मनुष्यों के लिये परमेश्वर को सुनना और उसके विषय में बोलना संभव और उचित है। क्योंकि परमेश्वर के नाम के साथ ये शब्द मेल खाएँगे: बुद्धि, वचन, जीवन, अविनाशिता, सत्य, विवेक, भलाई, और ऐसी बातें। और न कोई मान सकता है कि बुद्धि जीवन से अधिक प्राचीन है, क्योंकि बुद्धि आप जीवन है; न कि जीवन बुद्धि से परवर्ती है, ताकि वह जो सब की बुद्धि है, अर्थात् परमेश्वर, एक समय जीवन से रहित रहा हो। परन्तु यदि वे दृढ़ करें कि जीवन सचमुच [पहले] पिता में था, परन्तु 6ठे स्थान में इसलिये उत्पन्न किया गया कि वचन जीवित रहे, तो निश्चय उचित था कि वह बहुत पहले, [ऐसी युक्ति के अनुसार,] 4थे स्थान में भेजा गया होता, ताकि नूस को जीवन मिले; और आगे भी, उस से भी पहले, [वह होता] बूथोस के साथ, ताकि उनका बूथोस जीवित रहे। क्योंकि सिगे को, सचमुच, अपने प्रोपाटोर के साथ गिनना, और उसे उसका सहचर ठहराना, जबकि वे जोए को संख्या में नहीं जोड़ते,--क्या यह अन्य सब उन्माद से बढ़ जाना नहीं है?
10. फिर, इन से निकलनेवाली 2री उत्पत्ति के विषय में [जिन एओनों का उल्लेख हुआ है],--अर्थात्, होमो और एक्लेसिया की,--उनके ही पिता, झूठ से ग्नोस्टिक कहलाए हुए, आपस में संघर्ष करते हैं, प्रत्येक अपने विचारों को सिद्ध करने की खोज में, और इस प्रकार अपने को दुष्ट चोर सिद्ध करते हैं।
वे मानते हैं कि उत्पत्ति [के सिद्धान्त] के अधिक अनुकूल है--वास्तव में, सत्य के समान होने के कारण--कि वचन मनुष्य के द्वारा उत्पन्न हुआ, और मनुष्य वचन के द्वारा नहीं; और कि मनुष्य वचन से पहले था, और कि यह सचमुच वह है जो सब पर परमेश्वर है। और इस प्रकार है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, कि एक प्रकार की संभाव्यता के साथ सब मानव भावों को, और मानसिक अभ्यासों को, और इरादों की रचना को, और वचनों के उच्चारण को, ढेर लगाकर, उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध किसी संभाव्यता के बिना झूठ बोला है। क्योंकि जब वे उन बातों को, जो मनुष्यों पर घटती हैं, और जो कुछ वे अपने को अनुभव करते हुए पहचानते हैं, दैवी तर्क पर डालते हैं, तो वे परमेश्वर से अनजान लोगों को पर्याप्त अनुकूल कथन करते दिखाई देते हैं। और इन मानव भाव-वेदनाओं से, अपनी बुद्धि को खींचकर, जब वे परमेश्वर के वचन के मूल और उत्पत्ति का 5वें स्थान में वर्णन करते हैं, तो वे दृढ़ करते हैं कि इस प्रकार वे अद्भुत, अकथनीय और उत्कृष्ट भेद सिखाते हैं, जो अपने सिवा किसी को ज्ञात नहीं। [वे दृढ़ करते हैं,] इन्हीं के विषय में प्रभु ने कहा, "ढूँढो, तो पाओगे,"(1) अर्थात्, कि वे पूछें कि नूस और अलेथिया बूथोस और सेज से कैसे निकले; क्या लोगोस और जोए फिर इन से अपना मूल पाते हैं और फिर, क्या आन्थ्रोपोस और एक्लेसिया लोगोस और जोए से निकलते हैं।
अध्याय चौदह.-- वैलेन्तीनुस और उसके अनुयायियों ने अपनी पद्धति के सिद्धान्त अन्यजातियों से लिए; केवल नाम बदले गए हैं।
1. सत्य के बहुत अधिक समान, और अधिक प्रिय, वह वृत्तान्त है जो आन्तिफानेस,(2) प्राचीन हास्य कवियों में से एक, सब वस्तुओं के मूल के विषय में अपनी थियोगोनी में देता है। क्योंकि वह केओस को रात्रि और मौन से उत्पन्न हुआ कहता है; बताता है कि तब प्रेम(3) केओस और रात्रि से फूटा; इस से फिर, प्रकाश; और कि इस से, उसकी दृष्टि में, देवताओं की 1ली पीढ़ी का शेष सब निकला। इन के बाद वह आगे देवताओं की 2री पीढ़ी को, और जगत की सृष्टि को, प्रवेश कराता है; तब वह देवताओं के 2रे क्रम के द्वारा मानवजाति की रचना का वर्णन करता है। इन मनुष्यों ने (मिथ्या शिक्षकों ने), इस कथा को अपनी मानकर, एक प्रकार की स्वाभाविक प्रक्रिया से मानो, अपने विचारों को उसके चारों ओर रखा है, केवल निर्दिष्ट वस्तुओं के नाम बदलकर, और सब वस्तुओं की उत्पत्ति का वही आरम्भ, और उनकी उत्पत्ति, रखते हुए। रात्रि और मौन के स्थान पर वे बूथोस और सिगे को रखते हैं; केओस के बदले, वे नूस को रखते हैं; और प्रेम के लिये (जिस के द्वारा, हास्य कवि कहता है, अन्य सब वस्तुएँ क्रम में रखी गईं) उन्होंने वचन को आगे लाया है; जबकि प्रधान और महान् देवताओं के लिये उन्होंने एओनों को रचा है; और 2रे देवताओं के स्थान पर, वे हमें उस सृष्टि की बात कहते हैं जो उनकी माता के द्वारा प्लेरोमा के बाहर है, और उसे 2री ओगदोअड कहते हैं। वे हमें, निर्दिष्ट लेखक के समान, घोषित करते हैं कि इस (ओगदोअड) से जगत की सृष्टि और मनुष्य की रचना आई, यह मानते हुए कि ये अकथनीय और अज्ञात भेद केवल उन्हें ज्ञात हैं। जो बातें हास्य अभिनेताओं के द्वारा रंगमंचों में सबसे स्पष्ट स्वरों से सब कहीं खेली जाती हैं उन्हें वे अपनी पद्धति पर ले जाते हैं, निस्सन्देह उन्हीं युक्तियों के द्वारा उन्हें सिखाते हुए, और केवल नाम बदलते हुए।
2. और वे केवल इस बात में दोषी नहीं ठहरते कि हास्य कवियों में मिलनेवाली बातों को मानो अपनी [मूल विचार] आगे लाते हैं, वरन वे उन सब बातों को भी इकट्ठा करते हैं जो उन सब ने कही हैं जो परमेश्वर से अनजान थे, और जो दार्शनिक कहलाते हैं; और, यों कहें, दयनीय चिथड़ों के ढेर से एक रंगबिरंगा वस्त्र सी कर, उन्होंने अपनी सूक्ष्म अभिव्यक्ति की रीति से, अपने लिये एक ऐसा आवरण तैयार कर लिया है जो वास्तव में उनका अपना नहीं। वे, यह सच है, एक नई प्रकार की शिक्षा प्रवेश कराते हैं, क्योंकि एक नई प्रकार की कला से वह [पुरानी के बदले] रख दी गई है। तौभी वह वास्तव में पुरानी और निष्फल दोनों है, क्योंकि ये विचार ही अज्ञान और अधर्म की गन्ध वाले प्राचीन सिद्धान्तों से सी दिए गए हैं। उदाहरण के लिये, मिलेतुस के थेल्स(4) ने दृढ़ किया कि जल सब वस्तुओं का जनक और आरम्भिक सिद्धान्त था। अब यह वही बात है चाहे हम जल कहें या बूथोस। कवि होमर,(5) फिर, यह विचार रखता था कि ओकेअनस, माता तेथ्युस के साथ, देवताओं का मूल था: इस विचार को इन मनुष्यों ने बूथोस और सिगे पर ले लिया है। अनक्सिमन्दर ने ठहराया कि अनन्तता सब वस्तुओं का 1ला सिद्धान्त है, अपने में उन सब की उत्पत्ति को बीज रूप में रखे हुए, और इस से वह घोषित करता है कि विशाल जगत [जो हैं] रचे गए: इसे भी उन्होंने नया वेश दिया है, और बूथोस और अपने एओनों पर डाला है। अनक्सागोरस, फिर, जिस का उपनाम "नास्तिक" भी पड़ा है, ने अपना विचार दिया कि पशु आकाश से पृथ्वी पर गिरते बीजों से रचे गए। इस विचार को भी इन मनुष्यों ने अपनी माता के "बीज" पर ले लिया है, जिसे वे मानते हैं कि वे आप हैं; इस प्रकार एक ही बार, बुद्धिमानों के न्याय में, मानते हुए कि वे आप अधर्मी अनक्सागोरस की सन्तान हैं।
3. फिर, डेमोक्रितुस और एपिकूरस से छाया और शून्यता के [विचारों को] अपनाकर, वे
इन्हें अपने विचारों पर बैठा चुके हैं, उन [शिक्षकों] के पीछे चलते हुए जिन्होंने पहले ही शून्य और परमाणुओं के विषय में बहुत बात की थी, जिन में से एक को उन्होंने वह कहा जो है, और दूसरे को वह जो नहीं है। इसी प्रकार, ये मनुष्य प्लेरोमा के भीतर की वस्तुओं को वास्तविक अस्तित्व कहते हैं, जैसे उन दार्शनिकों ने परमाणुओं को; जबकि वे मानते हैं कि जो प्लेरोमा के बाहर हैं उनका सच्चा अस्तित्व नहीं, जैसे उन्होंने शून्य के विषय में किया। उन्होंने इस प्रकार इस जगत में अपने को (क्योंकि वे यहाँ प्लेरोमा के बाहर हैं) एक ऐसे स्थान में निर्वासित कर लिया है जिस का अस्तित्व नहीं। फिर, जब वे मानते हैं कि [नीचे] ये वस्तुएँ [ऊपर] सच्चे अस्तित्व वालों की प्रतिमाएँ हैं, तो वे फिर डेमोक्रितुस और प्लेटो की शिक्षा को अत्यन्त प्रकट रीति से दोहराते हैं। क्योंकि डेमोक्रितुस 1ला था जिसने माना कि अनेक और विविध आकृतियाँ, यों कहें, [ऊपर की वस्तुओं के] रूपों से अंकित हुईं, और सार्वत्रिक आकाश से इस जगत में उतरीं। परन्तु प्लेटो, अपनी ओर से, पदार्थ, आदर्श,(1) और परमेश्वर की बात करता है। ये मनुष्य, उन भेदों का अनुसरण करते हुए, जिसे वह विचार और आदर्श कहता है, उसे ऊपर की वस्तुओं की प्रतिमाएँ कह चुके हैं; जबकि, केवल नाम के परिवर्तन से, वे अपने को इस प्रकार की काल्पनिक कथा के आविष्कर्ता और रचयिता होने का गर्व करते हैं।
4. यह विचार भी, कि वे मानते हैं कि सृष्टिकर्ता ने पहले से विद्यमान पदार्थ से जगत रचा, अनक्सागोरस, एम्पेदोक्लेस, और प्लेटो ने उन से पहले व्यक्त किया; सचमुच, जैसा हम सीखते हैं कि वे भी अपनी माता की प्रेरणा के अधीन करते हैं। तब फिर, इस विचार के विषय में कि हर वस्तु अनिवार्य रूप से उन वस्तुओं की ओर चली जाती है जिन से वे मानते हैं कि वह रची भी गई थी, और कि परमेश्वर इस अनिवार्यता का दास है, ताकि वह मर्त्य को अमरता न दे सके, या क्षयवान पर अविनाशिता न दे सके, वरन हर एक अपने स्वभाव के समान सार में चला जाता है, दोनों वे जो मण्डप (<greek>stoa</greek>) से स्तोइक कहलाते हैं, और सचमुच सब जो परमेश्वर से अनजान हैं, कवि और इतिहासकार एक समान, वही दृढ़ता करते हैं।(2) वे [मिथ्या शिक्षक] जो वही [पद्धति का] अविश्वास रखते हैं उन्होंने, सन्देह नहीं, आत्मिक सत्ताओं को अपना उचित क्षेत्र दिया है,--अर्थात्, जो प्लेरोमा के भीतर है, परन्तु पशु सत्ताओं को बीच का स्थान, जबकि शारीरिक सत्ताओं को वे वह देते हैं जो भौतिक है। और वे दृढ़ करते हैं कि परमेश्वर आप और कुछ नहीं कर सकता, वरन [भिन्न प्रकार के सार] में से हर एक उन वस्तुओं की ओर चला जाता है जो उसी स्वभाव की हैं। [अपने साथ]।
5. इसके अतिरिक्त, इस बात के विषय में कि वे कहते हैं कि उद्धारकर्ता सब एओनों से रचा गया, उन में से हर एक ने, यों कहें, उस में अपना विशेष फूल रख दिया, वे हेसिओद की पन्दोरा में न मिलनेवाली कोई नई बात नहीं लाते। क्योंकि जो वह उसके विषय में कहता है, ये मनुष्य उद्धारकर्ता के विषय में संकेत करते हैं, उसे पन्दोरोस (सर्वदत्त) के रूप में हमारे सामने लाते हुए, मानो एओनों में से प्रत्येक ने उसे वह दिया हो जो उसने सबसे बड़ी सिद्धता में रखा था। फिर, मांसों [के खाने] और अन्य कर्मों की उदासीनता के विषय में उनका विचार, और यह कि वे सोचते हैं कि अपने स्वभाव की श्रेष्ठता से वे किसी भी मात्रा में अशुद्धता नहीं पकड़ सकते, चाहे वे कुछ भी खाएँ या करें, उन्होंने सिनिकों से लिया है, क्योंकि वे वास्तव में उसी समाज के हैं जिस के ये [दार्शनिक] हैं। वे विश्वास [के विषयों के उपचार] पर भी उस बाल की खाल निकालनेवाली और सूक्ष्म प्रश्न-रीति को ले जाने का यत्न करते हैं जो, वास्तव में, अरस्तू की नकल है।
6. फिर, इस इच्छा के विषय में जो वे इस सारे ब्रह्माण्ड को संख्याओं पर डालने की दिखाते हैं, उन्होंने उसे पाइथागोरसियों से सीखा है। क्योंकि ये 1ले थे जिन्होंने संख्याओं को सब वस्तुओं का आरम्भिक सिद्धान्त रखा, और [वर्णन किया] कि उनका वह आरम्भिक सिद्धान्त समान और असमान दोनों है, जिन [दो गुणों] से उन्होंने कल्पना की कि इन्द्रियगोचर(3) और अभौतिक दोनों का मूल निकला। और [उन्होंने माना] कि 1ले सिद्धान्तों(4) का एक समूह [वस्तुओं के] पदार्थ को जन्म देता है, और दूसरा उनके रूप को। वे दृढ़ करते हैं कि इन 1ले सिद्धान्तों से सब वस्तुएँ बनाई गई हैं, जैसे एक मूर्ति अपनी धातु और अपने विशेष रूप की होती है। अब, मिथ्या शिक्षकों ने इसे उन वस्तुओं पर लगाया है जो प्लेरोमा के बाहर हैं। [पाइथागोरसी] मानते थे कि बुद्धि का(5) सिद्धान्त उस ऊर्जा के अनुपात में है जिस से मन, ग्राह्य वस्तु का ग्रहणकर्ता होकर, अपनी पूछताछ चलाता है, जब तक, थककर, वह अन्त में अविभाज्य और एक में घुल नहीं जाता। वे आगे दृढ़ करते हैं कि हेन--अर्थात्, एक--सब वस्तुओं का 1ला सिद्धान्त है, और जो कुछ रचा गया है उस सब का सार। इस से फिर द्याद, टेट्राड, पेन्टाड, और औरों की बहुविध उत्पत्ति निकली। इन बातों को मिथ्या शिक्षक, शब्दशः, अपने प्लेरोमा और बूथोस के सन्दर्भ के साथ, दोहराते हैं।
उसी स्रोत से भी, वे उन युग्मों को प्रचलन में लाने का यत्न करते हैं जो एकता से निकलते हैं। मार्कस ऐसे विचारों का गर्व करता है मानो वे उसके अपने हों, और मानो वह औरों से अधिक नया कुछ खोजता देखा गया हो, जबकि वह केवल पाइथागोरस की टेट्राड को सब वस्तुओं का मूल सिद्धान्त और माता के रूप में रखता है।
7. परन्तु इन मनुष्यों के विरोध में मैं केवल इतना कहूँगा--क्या उन सब ने, जिन का उल्लेख हुआ है, जिन के साथ तुम अभिव्यक्ति में मेल खाते सिद्ध हुए हो, सत्य को जाना, या नहीं जाना? यदि उन्होंने उसे जाना, तो इस जगत में उद्धारकर्ता का अवतरण व्यर्थ था। क्योंकि [उस दशा में] वह क्यों उतरा? क्या इसलिये कि वह उस सत्य को लाए जो [पहले से] जाननेवालों के ज्ञान में ज्ञात था? दूसरी ओर, यदि इन मनुष्यों ने उसे नहीं जाना, तो कैसे है कि, जब तुम अपने को उन्हीं शब्दों में व्यक्त करते हो जैसे वे करते हैं जो सत्य को नहीं जानते थे, तुम गर्व करते हो कि केवल तुम ही वह ज्ञान रखते हो जो सब से ऊपर है, यद्यपि जो परमेश्वर से अनजान हैं वे [भी] उसे रखते हैं? इस प्रकार, तब, भाषा के पूरे विकार(1) से, वे सत्य के अज्ञान को ज्ञान कहते हैं: और पौलुस भली भाँति कहता है [उनके विषय में, कि [वे उपयोग करते हैं] "झूठे ज्ञान के वचनों की नवीनताएँ।"(2) क्योंकि उनका वह ज्ञान सचमुच झूठा पाया जाता है। यदि, तौभी, इन बातों के विषय में निर्लज्ज मार्ग लेकर, वे घोषित करें कि मनुष्य सचमुच सत्य को नहीं जानते थे, परन्तु उनकी माता,(3) पिता का बीज, ऐसे मनुष्यों के द्वारा, जैसे भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा भी, सत्य के भेदों की घोषणा करती थी, जबकि डेमियुर्ज [चल रही बात से] अनजान था, तो मैं उत्तर देता हूँ, 1ले स्थान पर, कि जो बातें पहले कही गई थीं वे ऐसी प्रकृति की नहीं थीं कि किसी को बोधगम्य न हों; क्योंकि मनुष्य आप जानते थे कि वे क्या कह रहे हैं, जैसे उनके चेले भी जानते थे, और जो फिर इन के पीछे आए वे भी।
और, अगले स्थान पर, यदि माता या उसका बीज उन बातों को जानता और प्रचार करता जो सत्य की थीं (और पिता(4) सत्य है), तो उनके सिद्धान्त पर उद्धारकर्ता ने झूठ बोला जब उसने कहा, "पुत्र को छोड़ पिता को कोई नहीं जानता,"(5) यदि सचमुच वे यह न मानें कि उनका बीज या माता कोई-नहीं है।
8. इतनी दूर तक, तब, [अपने एओनों पर आरोपित करने] मानवीय भावों के द्वारा, और इस तथ्य के द्वारा कि वे अपनी भाषा में उन बहुतों से बहुत कुछ मेल खाते हैं जो परमेश्वर से अनजान हैं, वे कुछ संख्या को [सत्य से] युक्तियुक्त रीति से खींचते देखे गए हैं। वे उन [उक्तियों] के प्रयोग से उन्हें आगे ले जाते हैं जिन से वे परिचित रहे हैं, उस प्रकार के प्रवचन की ओर जो सब बातों का विवेचन करता है, परमेश्वर के वचन की, और ज़ोए की, और नूस की उत्पत्ति को सामने रखते हुए, और जगत में, मानो, देवत्व के [क्रमिक] उद्गमों को लाते हुए। फिर, जो मत वे रखते हैं, युक्ति के बिना और दिखावे के बिना, वे आरम्भ से अन्त तक केवल झूठ हैं। जैसे वे जो, किसी भी प्रकार के पशुओं को लुभाने और पकड़ने के लिये, उनका अभ्यस्त भोजन उनके आगे रखते हैं, परिचित आहार के द्वारा उन्हें धीरे धीरे खींचते हुए, जब तक वे उसे पकड़ न लें, परन्तु, जब वे उन्हें बन्दी बना लेते हैं, तो उन्हें सबसे कड़वी दासता के अधीन करते हैं, और जहाँ उन्हें भाए वहाँ बल से घसीटते हैं; वैसे ही ये मनुष्य भी धीरे धीरे और कोमलता से [औरों को] मनाते हुए, अपनी युक्तियुक्त बातों के द्वारा, उस उल्लेखित उत्सर्ग को स्वीकार करने के लिये, तब असंगत बातों को आगे लाते हैं, और शेष उत्सर्गों के ऐसे रूप जो अपेक्षित हो सकते थे ऐसे नहीं हैं।
उदाहरण के लिये, वे घोषित करते हैं, कि लोगोस और ज़ोए के द्वारा [दस](6) एओन भेजे गए, जबकि एन्थ्रोपोस और एक्लेसिया से बारह निकले, यद्यपि उनके पास न प्रमाण है, न साक्ष्य, न सम्भावना, न ऐसी प्रकृति की कोई भी बात [इन दावों को सहारा देने के लिये]; और समान मूर्खता और धृष्टता से वे चाहते हैं कि यह माना जाए कि एओन होकर लोगोस और ज़ोए से बूथोस और मिक्सिस, अगेराटोस और हेनोसिस, ऑटोफ्यूएस और हेडोने, अकिनेटोस और सिन्क्रासिस, मोनोजेनेस और मकारिया भेजे गए। और भी, [जैसा वे दृढ़ करते हैं,] एओन होकर एन्थ्रोपोस और एक्लेसिया से, इसी रीति से, पराक्लेटास और पिस्टिस, पाट्रिकोस और एल्पिस, मेट्रिकोस और अगापे, ऐनोस और सिनेसिस, एक्लेसियास्टिकस और मकारियोतेस, थेलेटोस और सोफिया भेजे गए।
9. इस सोफिया के विकार और भ्रम, और पिता के [स्वभाव की] जाँच के द्वारा वह नाश होने के संकट में कैसे पड़ी, जैसा वे बताते हैं, और प्लेरोमा के बाहर क्या हुआ, और किस प्रकार की न्यूनता से वे सिखाते हैं कि जगत का कर्ता उत्पन्न हुआ, मैं ने पिछली पुस्तक में रखा है, उसमें, पूरी लगन से, इन मिथ्या शिक्षकों के मतों का वर्णन करते हुए। [मैं ने उनके मतों का भी विस्तार किया है] मसीह के विषय में, जिसे वे इन सब के पीछे उत्पन्न हुआ बताते हैं, और सोतेर के विषय में भी, जिसने, [उनके अनुसार,] अपना अस्तित्व उन एओनों से पाया जो प्लेरोमा के भीतर बनाए गए थे।(7) परन्तु मैं ने अभी उनके नामों का उल्लेख करना आवश्यक समझा है, ताकि इन से उनके झूठ की असंगति प्रकट हो, और उस नाम-पद्धति का उलझा हुआ स्वभाव भी जिसे उन्होंने गढ़ा है। क्योंकि
वे स्वयं इस प्रकार के नामों की भीड़ से अपने एओनों की [मर्यादा] घटाते हैं। वे अन्यजातियों के लिये युक्तियुक्त और विश्वासयोग्य नाम देते हैं, [समान होने के रूप में] उन से जो उनके बारह देवता कहलाते हैं,(1) और इन्हीं को वे अपने बारह एओनों की प्रतिमाएँ बनाना चाहते हैं। परन्तु [ऐसी कही गई] प्रतिमाएँ [अपने ही] नाम उत्पन्न कर सकती हैं जो बहुत अधिक शोभनीय हैं, और अपनी व्युत्पत्ति के द्वारा देवत्व को सूचित करने में अधिक सामर्थी हैं [उनके कल्पित मूलरूपों के नामों से]।
अध्याय पन्द्रह.--इन उत्पत्तियों का कोई विवरण नहीं दिया जा सकता।
1. परन्तु हम [एओनों की] उत्पत्ति के विषय में पहले कही गई बात पर लौटें। और, 1वें स्थान पर, वे हमें एओनों की उत्पत्ति का कारण बताएँ, कि वह ऐसी क्यों है कि वे सृष्टि से सम्बन्ध रखनेवाली उन वस्तुओं में से किसी के सम्पर्क में नहीं आतीं। क्योंकि वे मानते हैं कि वे वस्तुएँ [ऊपर] सृष्टि के कारण बनाई गईं ऐसा नहीं, सृष्टि उनके कारण बनी; और कि पहली दूसरी की प्रतिमाएँ हैं ऐसा नहीं, दूसरी पहली की प्रतिमाएँ हैं। इसलिये, जैसे वे प्रतिमाओं का कारण देते हैं, यह कहकर कि महीने में तीस दिन हैं तीस एओनों के कारण, और दिन में बारह घण्टे, और वर्ष में बारह महीने, प्लेरोमा के भीतर के बारह एओनों के कारण, उसी प्रकार की और ऐसी व्यर्थ बातों के साथ, अब वे हमें एओनों की उस उत्पत्ति का कारण भी बताएँ, वह ऐसी प्रकृति की क्यों थी, किस कारण से 1ली और 1ली-जनित ओगदोअद भेजी गई, एक पेन्ताद होकर नहीं, एक त्रय होकर नहीं, एक सेप्टेनाद होकर नहीं, भिन्न संख्या से परिभाषित उन में से कोई होकर नहीं? और भी, यह कैसे हुआ, कि लोगोस और ज़ोए से दस एओन भेजे गए, अधिक भी नहीं और कम भी नहीं; जबकि फिर एन्थ्रोपोस और एक्लेसिया से बारह निकले, यद्यपि ये अधिक या कम संख्या के हो सकते थे?
2. और तब, फिर, समस्त प्लेरोमा के विषय में, क्या कारण है कि वह इन तीन में बाँटा जाए--एक ओगदोअद, एक देकाद, और एक डुओदेकाद--और इन से भिन्न किसी और संख्या में न हो? और भी, विभाग के विषय में ही, वह तीन भागों में क्यों किया गया है, और चार में नहीं, या पाँच में, या छह में, या उन में से किसी और संख्या में जिन का सृष्टि से सम्बन्ध रखनेवाली ऐसी संख्याओं से(2) कोई सम्बन्ध नहीं? क्योंकि वे उन [ऊपर के एओनों] को इन [नीचे की सृजी वस्तुओं] से अधिक प्राचीन बताते हैं, और उन्हें अपना सिद्धान्त [अस्तित्व का] अपने में रखना उचित है, जो सृष्टि से पहले विद्यमान था, और सृष्टि के नमूने के अनुसार वाला नहीं, उस बात पर सब ठीक एकमत होते हुए।(3)
3. सृष्टि का जो विवरण हम देते हैं वह [जगत में प्रचलित वस्तुओं की] उस नियमित व्यवस्था के साथ मेल खाता है, क्योंकि हमारी यह योजना उन(4) वस्तुओं के अनुकूल है जो [वास्तव में] बनाई गई हैं; परन्तु यह आवश्यक है कि वे, वस्तुओं से ही सम्बन्ध रखनेवाला कोई कारण नियत करने में असमर्थ होकर, उन सत्ताओं के विषय में जो [सृष्टि से] पहले विद्यमान थीं, और अपने द्वारा सिद्ध की गई थीं, सबसे बड़े उलझन में पड़ें। क्योंकि, जिन बातों पर वे हमें सृष्टि से अनजान जानकर पूछते हैं, वे स्वयं, जब प्लेरोमा के विषय में पलटकर पूछे जाते हैं, या तो केवल मानवीय भावों का उल्लेख करते हैं, या उस प्रकार की बात का सहारा लेते हैं जो केवल सृष्टि में दिखाई देनेवाले उस सामञ्जस्य पर टिकती है, अनुचित रीति से हमें गौण वस्तुओं के विषय में उत्तर देते हुए, और उन वस्तुओं के विषय में उत्तर नहीं देते जो, जैसा वे मानते हैं, प्राथमिक हैं। क्योंकि हम उन्हें उस सामञ्जस्य के विषय में नहीं पूछते जो सृष्टि का है, और न मानवीय भावों के विषय में; परन्तु क्योंकि उन्हें अपने अष्टरूप, दशरूप, और द्वादशरूप प्लेरोमा के विषय में (जिसकी प्रतिमा वे सृष्टि को घोषित करते हैं) मानना होगा, कि उनके पिता ने उसे उस आकृति का व्यर्थ और बिना विचार बनाया, और यदि उसने बिना कारण कुछ बनाया तो उसे विकृति आरोपित करनी होगी।
या, फिर, यदि वे घोषित करें कि प्लेरोमा पिता की पूर्वदृष्टि के अनुसार इस प्रकार उत्पन्न हुआ, सृष्टि के निमित्त, मानो उसने इस प्रकार उसके सार को ही सममिति से व्यवस्थित किया, तो यह निकलता है कि प्लेरोमा को अब अपने निमित्त रचा हुआ नहीं माना जा सकता, उस [सृष्टि] के निमित्त जो उसकी प्रतिमा होनेवाली थी और उसकी समानता रखती थी (जैसे मिट्टी का नमूना अपने निमित्त नहीं गढ़ा जाता, बननेवाली पीतल, या सोना, या चाँदी की मूर्ति के निमित्त), तब सृष्टि को प्लेरोमा से बड़ा सम्मान होगा, यदि उसके निमित्त वे वस्तुएँ [ऊपर] उत्पन्न हुईं।
अध्याय सोलह.--जगत का सृष्टिकर्ता या तो अपने से ही बननेवाली वस्तुओं की प्रतिमाएँ उत्पन्न किया, या प्लेरोमा किसी पिछली व्यवस्था की प्रतिमा के अनुसार रचा गया; और इसी प्रकार अनन्त तक।
1. परन्तु यदि वे इन निष्कर्षों में से किसी एक को भी स्वीकृति नहीं देंगे, क्योंकि उस दशा में वे हमारे द्वारा सिद्ध किए जाएँगे कि वे अपने प्लेरोमा की ऐसी उत्पत्ति का कोई कारण देने में असमर्थ हैं, तो वे आवश्यकता से इस पर बन्द हो जाएँगे--कि वे मानें कि, प्लेरोमा के ऊपर, कोई और व्यवस्था थी जो अधिक आत्मिक और अधिक सामर्थी थी, जिसकी प्रतिमा के अनुसार उनका प्लेरोमा 380
बना। क्योंकि यदि डेमियुर्ज ने अपने से ही विद्यमान सृष्टि की उस आकृति को नहीं बनाया, परन्तु ऊपर की वस्तुओं के रूप के अनुसार उसे बनाया, तो उनके बूथोस ने--जिसने, निश्चय ही, यह किया कि प्लेरोमा इस प्रकार की आकृति रखे--अपने से पहले विद्यमान वस्तुओं की आकृति किस से पाई? क्योंकि अवश्य है, या तो [सृजन की] मनसा उस देव में रही जिसने जगत बनाया, ताकि अपनी ही शक्ति से, और अपने से, उसने उसकी रचना का नमूना पाया; या, यदि इस सत्ता से कोई विचलन किया जाए, तो बार बार यह पूछने की आवश्यकता उठेगी कि उससे ऊपरवाले को बनाई गई वस्तुओं की आकृति कहाँ से आई; उत्पत्तियों की संख्या भी क्या थी; और नमूने के द्रव्य का स्वरूप क्या? यदि, तथापि, बूथोस की शक्ति में था कि वह अपने से प्लेरोमा को ऐसी आकृति दे, तो डेमियुर्ज की शक्ति में क्यों न रहा हो कि वह अपने से ऐसा जगत बनाए जैसा विद्यमान है? और तब, फिर, यदि सृष्टि उन वस्तुओं [ऊपर] की प्रतिमा है, तो हम क्यों न कहें कि वे, पलटकर, अपने ऊपर की औरों की प्रतिमाएँ हैं, और इनके ऊपर की फिर औरों की, और इस प्रकार प्रतिमाओं की असंख्य प्रतिमाएँ मानते चलें?
2. यह कठिनाई बेसिलिदेस के सामने आई जब वह सत्य को बिलकुल चूक गया था, और यह सोच रहा था कि, एक दूसरे से बनी उन सत्ताओं के अनन्त क्रम के द्वारा, वह ऐसी उलझन से बच सकता है। जब उसने प्रचार किया कि तीन सौ पैंसठ आकाश एक दूसरे के द्वारा क्रम और समानता से बनाए गए, और कि इनके [अस्तित्व का] स्पष्ट प्रमाण वर्ष के दिनों की संख्या में मिला, जैसा मैं ने पहले कहा; और कि इनके ऊपर एक सामर्थ्य थी जिसे वे नामरहित भी कहते हैं, और उसकी व्यवस्था--वह इस रीति से भी ऐसी उलझन से नहीं बचा। क्योंकि, जब पूछा जाएगा कि सब के ऊपर के उस आकाश को उसकी आकृति की प्रतिमा कहाँ से आई, जिस से वह चाहता है कि शेष को क्रम के द्वारा बना हुआ माना जाए, तो वह कहेगा, उस व्यवस्था से जो नामरहित की है। तब उसे कहना होगा, या तो अकथनीय ने उसे अपने से बनाया, या उसे मानना आवश्यक होगा कि इस सत्ता के ऊपर कोई और सामर्थ्य है, जिस से उसके नामरहित ने आकृतियों की इतनी विशाल संख्याएँ पाईं जो, उसके अनुसार, विद्यमान हैं।
3. तब, जो सत्य है उसे तुरन्त मानना कितना अधिक सुरक्षित और अधिक ठीक मार्ग है: कि यह परमेश्वर, सृष्टिकर्ता, जिसने जगत रचा, अकेला परमेश्वर है, और उसके सिवा और कोई परमेश्वर नहीं--वह स्वयं अपने से उन वस्तुओं का नमूना और आकृति पाता है जो बनाई गई हैं--इस से कि, ऐसे अधर्मी और घुमावदार वर्णन से अपने को थकाकर, हम किसी न किसी बिन्दु पर मन को किसी एक पर टिकाने को विवश हों, और मानें कि सृजी वस्तुओं की आकृति उसी से निकली।
4. वैलेन्तीनुस के अनुयायियों के उस आरोप के विषय में जो वे हम पर लगाते हैं, जब वे घोषित करते हैं कि हम उस हेब्दोमाद में बने रहते हैं जो नीचे है, मानो हम अपने मन को ऊपर नहीं उठा सकते, और न ऊपर की बातों को समझ सकते, क्योंकि हम उनके विकट दावों को स्वीकार नहीं करते: यही आरोप बेसिलिदेस के अनुयायी पलटकर उन पर लगाते हैं, क्योंकि वे (वैलेन्तीनी) नीचे की बातों के चारों ओर घूमते रहते हैं, 1ली और 2री ओगदोअद तक [जाते हुए], और क्योंकि वे अनिपुणता से कल्पना करते हैं कि, तीस एओनों के तुरन्त बाद, उन्होंने उसे पा लिया है जो सब वस्तुओं के ऊपर पिता है, अपनी जाँच को विचार में उस प्लेरोमा तक नहीं ले जाते जो तीन सौ पैंसठ आकाशों के ऊपर है, जो(1) पैंतालीस ओगदोअदों के ऊपर है। और कोई भी, फिर, उन पर वही आरोप ला सकता है, चार हजार तीन सौ अस्सी आकाशों, या एओनों, की कल्पना करके, क्योंकि वर्ष के दिनों में घण्टों की उतनी संख्या है। यदि, फिर, कोई रात्रियों को भी जोड़ता है, और इस प्रकार कही गई घण्टों को दुगुना करता है, यह कल्पना करके कि [इस रीति से] उसने ओगदोअदों की एक बड़ी भीड़, और एओनों की एक प्रकार की असंख्य मण्डली(2) पाई है, और इस प्रकार, सब वस्तुओं के ऊपर पिता के विरोध में, अपने को सब [औरों] से अधिक सिद्ध समझकर, वह सब पर वही आरोप लगाएगा, क्योंकि वे आकाशों या एओनों की ऐसी भीड़ की धारणा तक उठने में समर्थ नहीं, जैसी उसने घोषित की है, परन्तु या तो इतने न्यून हैं कि नीचे की वस्तुओं में रहें, या बीच के स्थान में बने रहें।
अध्याय सत्रह.--एओनों की उत्पत्ति की जाँच: उसकी कल्पित प्रकृति जो भी हो, वह हर रीति से असंगत है; और मिथ्या शिक्षकों की कल्पना पर, नूस और पिता स्वयं भी अज्ञान से कलंकित होते।
1. तब, वह व्यवस्था, जो उनके प्लेरोमा से सम्बन्ध रखती है, और विशेषकर उसका वह भाग जो प्राथमिक ओगदोअद से सम्बन्ध रखता है, इतने बड़े विरोधों और उलझनों से इस प्रकार लदा हुआ है, अब मैं उनकी योजना के शेष भाग की जाँच करने चलूँ। [ऐसा करते हुए] उनके उन्माद के कारण, मैं उन वस्तुओं की जाँच करूँगा जिनका वास्तविक अस्तित्व नहीं; तौभी यह करना आवश्यक है, क्योंकि इस विषय का निरूपण मुझे सौंपा गया है, और क्योंकि मैं सब मनुष्यों की
सत्य के ज्ञान तक आने की इच्छा रखता हूँ, और इसलिये भी कि तू ने स्वयं मुझ से इन मनुष्यों [के मतों] को उलटने के पूरे और सम्पूर्ण साधन पाने को कहा है।
2. तब मैं पूछता हूँ, शेष एओन किस रीति से उत्पन्न हुए? क्या इस प्रकार कि वे अपने उत्पन्न करनेवाले के साथ एक हों, जैसे सूर्य की किरणें सूर्य के साथ होती हैं; या क्या वह वास्तव में(1) और अलग था, ताकि उन में से प्रत्येक का स्वतन्त्र अस्तित्व और अपना विशेष रूप हो, जैसे एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से होता है, और एक पशु-झुंड का दूसरे से? या क्या वह अंकुरण की रीति से था, जैसे डालियाँ वृक्ष से? और क्या वे अपने उत्पन्न करनेवालों के साथ एक ही द्रव्य के थे, या उन्होंने अपना द्रव्य किसी और [प्रकार के] द्रव्य से पाया? और भी, क्या वे एक ही समय उत्पन्न हुए, ताकि समकालीन हों; या किसी क्रम के बाद, ताकि उन में से कुछ बड़े हों, और दूसरे छोटे? और, फिर, क्या वे अमिश्र और एकरूप हैं, और आपस में सर्वथा समान और सदृश, जैसे आत्मा और प्रकाश उत्पन्न होते हैं; या वे मिश्रित और भिन्न हैं, अपने अंगों में [एक दूसरे से] असदृश?
3. यदि उन में से प्रत्येक, मनुष्यों की रीति से, वास्तव में और अपनी ही उत्पत्ति के अनुसार उत्पन्न हुआ, तो या तो पिता से इस प्रकार जन्मे हुए उसके साथ एक ही द्रव्य के होंगे, और अपने कर्ता के सदृश; या यदि(2) वे असदृश दिखाई दें, तो अवश्य मानना होगा कि वे [किसी भिन्न द्रव्य से रचे गए हैं। अब, यदि पिता से जन्मी सत्ताएँ अपने कर्ता के सदृश हों, तो जो उत्पन्न हुए हैं वे सदा के लिये असम्भव बने रहें, जैसा वह है जिसने उन्हें उत्पन्न किया; परन्तु यदि, दूसरी ओर, वे भिन्न द्रव्य के हों, जो विकार के योग्य है, तो यह असदृश द्रव्य अक्षय प्लेरोमा के भीतर स्थान पाने को कहाँ से आया? और भी, इस सिद्धान्त के अनुसार, उन में से प्रत्येक को हर दूसरे से पूरी तरह अलग समझना होगा, जैसे मनुष्य एक दूसरे से मिले या एक हुए नहीं होते, परन्तु प्रत्येक का अपना भिन्न आकार है, और कर्म का निश्चित क्षेत्र, और उन में से प्रत्येक भी एक विशेष माप का बना है,--गुण जो देह के लक्षण हैं, आत्मा के नहीं। इसलिये वे अब प्लेरोमा को आत्मिक न कहें, या अपने को "आत्मिक" न कहें, यदि सचमुच उनके एओन पिता के साथ भोज करते बैठे हैं, मानो वे मनुष्य हों, और वह स्वयं ऐसी आकृति का है जैसी उसे वे प्रकट करते हैं जो उसके द्वारा उत्पन्न हुए।
4. यदि, फिर, एओन लोगोस से निकले, लोगोस नूस से, और नूस बूथोस से, जैसे दीपक एक दीपक से जलाए जाते हैं--जैसे, उदाहरण के लिये, मशालें एक मशाल से--तो वे निस्सन्देह उत्पत्ति और आकार में एक दूसरे से भिन्न हो सकते हैं; परन्तु क्योंकि वे अपनी उत्पत्ति के कर्ता के साथ एक ही द्रव्य के हैं, वे या तो सब सदा के लिये असम्भव बने रहें, या उनका पिता स्वयं विकार में भागी हो। क्योंकि जो मशाल पीछे जलाई गई है वह उससे भिन्न प्रकार का प्रकाश नहीं रख सकती जो उससे पहले थी। इसलिये उनके प्रकाश भी, जब एक में मिलाए जाते हैं, मूल एकत्व पर लौटते हैं, क्योंकि तब वह एक प्रकाश बनता है जो आदि से ही विद्यमान रहा है। परन्तु प्रकाश के विषय में ही हम यह नहीं कह सकते कि कोई भाग अपने मूल में अधिक नया है, और दूसरा अधिक प्राचीन (क्योंकि समस्त एक ही प्रकाश है); और न उन मशालों के विषय में ऐसा कह सकते हैं जिन्होंने प्रकाश पाया है (क्योंकि ये सब अपने भौतिक द्रव्य के विषय में समकालीन हैं, क्योंकि मशालों का द्रव्य एक और वही है), परन्तु केवल उसके जलाए जाने [के समय] के विषय में, क्योंकि एक थोड़ी देर पहले जलाई गई, और दूसरी अभी अभी जलाई गई है।
5. इसलिये, उस विकार की न्यूनता जिसका सम्बन्ध अज्ञान से है, या तो उनके समस्त प्लेरोमा पर समान रूप से लगेगी, क्योंकि [उसके सब अंग] एक ही द्रव्य के हैं; और प्रोपाटोर इस अज्ञान की न्यूनता में भागी होगा- -अर्थात्, अपने से अनजान होगा; या, दूसरी ओर, प्लेरोमा के भीतर के वे सब प्रकाश समान रूप से सदा के लिये निर्विकार बने रहेंगे। तब, सबसे छोटे एओन का विकार कहाँ से आता है, यदि पिता का प्रकाश वही है जिस से और सब प्रकाश बने हैं, और जो स्वभाव से निर्विकार है? और एक एओन को आपस में छोटा या बड़ा कैसे कहा जा सकता है, जब समस्त प्लेरोमा में केवल एक ही प्रकाश है? और यदि कोई उन्हें तारे कहे, तौभी वे सब एक ही प्रकृति में भागी दिखाई देंगे। क्योंकि यदि "एक तारा दूसरे तारे से महिमा में भिन्न है,"(3) परन्तु गुणों में नहीं, न द्रव्य में, न विकारग्राह्य या निर्विकार होने के तथ्य में; तो ये सब, क्योंकि वे समान रूप से पिता के प्रकाश से निकले हैं, या तो स्वभाव से असम्भव और अपरिवर्तनीय हों, या वे सब, पिता के प्रकाश के साथ, विकारग्राह्य हों, और भ्रष्टता की बदलती दशाओं के योग्य हों।
6. वही निष्कर्ष निकलेगा, यद्यपि वे दृढ़ करें कि एओनों की उत्पत्ति लोगोस से फूटी, जैसे डालियाँ वृक्ष से, क्योंकि लोगोस की उत्पत्ति उनके पिता से है। क्योंकि सब [एओन] पिता के साथ एक ही द्रव्य से बने हैं, एक दूसरे से केवल आकार में भिन्न, और प्रकृति में नहीं, और पिता की महानता को भरते हुए, जैसे उँगलियाँ com-
plete हाथ को। इसलिये यदि वह विकार और अज्ञान में विद्यमान है, तो वे एओन भी ऐसे ही हों जो उसके द्वारा जन्मे हैं। परन्तु यदि सब के पिता पर अज्ञान और विकार आरोपित करना अधर्म है, तो वे उसके द्वारा उत्पन्न एओन को विकारग्राह्य कैसे बता सकते हैं; और जब वे परमेश्वर की बुद्धि (सोफिया) पर वही अधर्म आरोपित करते हैं, तो वे अपने को अब भी धर्मवान् मनुष्य कैसे कह सकते हैं?
7. यदि, फिर, वे घोषित करें कि उनके एओन ऐसे ही भेजे गए जैसे किरणें सूर्य से निकलती हैं, तो, क्योंकि सब एक ही द्रव्य के हैं और एक ही स्रोत से फूटे हैं, सब या तो अपने उत्पन्न करनेवाले के साथ विकार के योग्य हों, या सब सदा के लिये निर्विकार बने रहेंगे। क्योंकि वे अब यह नहीं मान सकते कि, इस प्रकार उत्पन्न सत्ताओं में से, कुछ निर्विकार हैं और दूसरी विकारग्राह्य। यदि, तब, वे सब को निर्विकार घोषित करें, तो वे स्वयं अपनी ही युक्ति को नाश करते हैं। क्योंकि सबसे छोटा एओन विकार कैसे सह सकता था यदि सब निर्विकार थे? यदि, दूसरी ओर, वे घोषित करें कि सब इस विकार में भागी हुए, जैसा सचमुच उन में से कुछ मानने का साहस करते हैं, तो, क्योंकि वह लोगोस से उतरा,(1) परन्तु सोफिया तक आगे बह गया, वे इस प्रकार विकार को लोगोस तक पीछे ले जाने में दोषी ठहरेंगे, जो इस प्रोपाटोर का(2) नूस है, और इस प्रकार प्रोपाटोर के नूस और पिता स्वयं ने विकार का अनुभव किया यह मानेंगे। क्योंकि सब का पिता एक प्रकार की मिश्र सत्ता नहीं माना जाना है, जो अपने नूस (मन) से अलग किया जा सके, जैसा मैं ने पहले ही दिखाया है; परन्तु नूस पिता है, और पिता नूस। इसलिये अवश्य निकलता है, वह जो उससे लोगोस के रूप में फूटता है, या बल्कि नूस स्वयं, क्योंकि वह लोगोस है, सिद्ध और निर्विकार हो, और वे उत्पत्तियाँ जो उससे निकलती हैं, क्योंकि वे उसके साथ एक ही द्रव्य की हैं, सिद्ध और निर्विकार हों, और अपने उत्पन्न करनेवाले के सदृश सदा बनी रहें।
8. इसलिये अब यह नहीं माना जा सकता, जैसा ये मनुष्य सिखाते हैं, कि लोगोस, उत्पत्ति में 3रा स्थान रखता हुआ, पिता से अनजान था। ऐसी बात मनुष्यों की उत्पत्ति के विषय में शायद सम्भव मानी जा सकती है, क्योंकि ये प्रायः अपने माता-पिता के विषय में कुछ नहीं जानते; परन्तु पिता के लोगोस के विषय में यह सर्वथा असम्भव है। क्योंकि यदि, पिता में विद्यमान होकर, वह उसे जानता है जिस में वह विद्यमान है--अर्थात्, अपने से अनजान नहीं है--तो वे उत्पत्तियाँ जो उससे निकलती हैं, उसकी सामर्थ्यें (शक्तियाँ) होकर, और सदा उसके साथ उपस्थित रहकर, अपने उत्सर्जक से अनजान नहीं होंगी, किरणों से अधिक नहीं [माना जा सकता] जितना वे सूर्य से। इसलिये असम्भव है कि परमेश्वर की सोफिया (बुद्धि), वह जो प्लेरोमा के भीतर है, क्योंकि वह ऐसी रीति से उत्पन्न हुई है, विकार के प्रभाव में पड़ी हो, और ऐसा अज्ञान गर्भ में धरे। परन्तु यह सम्भव है कि वह सोफिया (बुद्धि) जो वैलेन्तीनुस की [योजना] से सम्बन्ध रखती है, क्योंकि वह शैतान की उत्पत्ति है, हर प्रकार के विकार में पड़े, और सबसे गहरा अज्ञान दिखाए। क्योंकि जब वे स्वयं अपनी माता के विषय में यह साक्ष्य देते हैं कि वह एक भटके हुए एओन की सन्तान थी, तो हमें अब कारण ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं कि ऐसी माता के पुत्र अज्ञान की गहराइयों में सदा तैरते क्यों रहें।
9. मुझे ज्ञात नहीं कि, इन उत्पत्तियों [जिनका उल्लेख हुआ है] के अतिरिक्त, वे किसी और की बात कर सकते हैं; सचमुच, वे मुझे ज्ञात नहीं हुए (यद्यपि मैं ने इस प्रकार के रूपों के विषय में उन से बहुत बार बातचीत की है) कि उन्होंने कभी [विचार के अधीन रीति से] उत्पन्न किसी और विशेष प्रकार की सत्ता को रखा हो। केवल यह वे मानते हैं, कि इन में से प्रत्येक इस प्रकार उत्पन्न हुआ कि वह केवल उसे जानता था जिसने उसे उत्पन्न किया, और वह उससे अनजान था जो ठीक पहले था। परन्तु इस बात में वे [अपने विवरण में] किसी प्रकार के प्रमाण के साथ आगे नहीं बढ़ते कि ये किस रीति से उत्पन्न हुए, या आत्मिक सत्ताओं में ऐसी बात कैसे हो सकती थी। क्योंकि, वे जिस किसी रीति से आगे बढ़ना चुनें, वे अपने को बँधा हुआ पाएँगे (जबकि, सत्य के विषय में, वे ठीक तर्क से पूरी तरह हटते हैं(3)) इतनी दूर तक चलने को कि वे मानें कि उनका वचन, जो प्रोपाटोर के नूस से फूटता है,--मानें, मैं कहता हूँ, कि वह अधोगति की दशा में उत्पन्न हुआ। क्योंकि [वे मानते हैं] कि सिद्ध नूस, जो सिद्ध बूथोस से पहले जन्मा था, उस उत्पत्ति को सिद्ध करने में समर्थ नहीं था जो उससे निकली, परन्तु [उसे केवल उत्पन्न कर सका] पिता के ज्ञान और महानता के प्रति सर्वथा अन्धा। वे यह भी मानते हैं कि उद्धारकर्ता ने इस भेद का एक चिह्न उस मनुष्य के विषय में दिखाया जो जन्म से अन्धा था,(4) क्योंकि एओन इस रीति से मोनोजेनेस के द्वारा अन्धा उत्पन्न हुआ, अर्थात् अज्ञान में, और इस प्रकार परमेश्वर के वचन पर अज्ञान और अन्धापन झूठ से आरोपित करते हैं, जो, उनके अपने सिद्धान्त के अनुसार, प्रोपाटोर से उत्पत्ति का 2रा [स्थान] रखता है।
प्रशंसनीय कुतर्की, और अज्ञात पिता की उच्चताओं के अन्वेषक, और उन अतिस्वर्गीय भेदों के पाठक "जिन की ओर स्वर्गदूत ताकने की लालसा रखते हैं!"(5)--ताकि वे सीखें कि सब के ऊपर के उस पिता के नूस से, वचन अन्धा उत्पन्न हुआ, अर्थात्, अपने उत्पन्न करनेवाले पिता से अनजान!
10. परन्तु, हे दीन कुतर्कियो, पिता का नूस, या बल्कि पिता स्वयं, क्योंकि वह नूस है और सब बातों में सिद्ध, अपने लोगोस को एक अपूर्ण और अन्धा एओन कैसे उत्पन्न कर सकता था, जब वह उसके साथ पिता के ज्ञान को भी उत्पन्न करने में समर्थ था? जैसे तुम दृढ़ करते हो कि मसीह शेष के बाद जन्मा, और तौभी घोषित करते हो कि वह सिद्ध उत्पन्न हुआ, तो और भी अधिक लोगोस, जो आयु में उससे पहले है, उसी नूस के द्वारा उत्पन्न हो, निस्सन्देह सिद्ध, और अन्धा नहीं; और न वह, फिर, अपने से और अधिक अन्धे एओनों को उत्पन्न कर सकता था, जब तक अन्त में तुम्हारी सोफिया, सदा सर्वथा अन्धी, बुराइयों के इतने विशाल शरीर को जन्म न देती। और तुम्हारा पिता इस सारी अनिष्ट का कारण है; क्योंकि तुम अपने पिता की विशालता और सामर्थ्य को अज्ञान के कारण घोषित करते हो, उसे बूथोस के समान करते हुए, और यह नाम उसे देते हुए जो नामरहित पिता है। परन्तु यदि अज्ञान एक बुराई है, और तुम घोषित करते हो कि सब बुराइयों ने अपनी शक्ति उसी से पाई, और तुम मानते हो कि पिता की महानता और सामर्थ्य इस अज्ञान का कारण है, तो तुम उसे [सब] बुराइयों का कर्ता ठहराते हो। क्योंकि तुम बुराई का कारण यह तथ्य बताते हो, कि [कोई] उसकी महानता का ध्यान नहीं कर सकता था। परन्तु यदि पिता के लिये सचमुच असम्भव था कि वह आदि से अपने को उन [सत्ताओं] पर प्रगट करे जो उसके द्वारा बनी थीं, तो उस दशा में उसे निर्दोष मानना होगा, क्योंकि वह अपने पीछे आनेवालों के अज्ञान को दूर नहीं कर सकता था।
परन्तु यदि, पीछे के समय में, जब उसने ऐसी इच्छा की, वह उस अज्ञान को दूर कर सका जो क्रमिक उत्पत्तियों के साथ बढ़ा जब वे एक के बाद एक आईं, और इस प्रकार एओनों में गहराई से बैठ गया, तो और भी अधिक, यदि उसने ऐसी इच्छा की होती तो वह पहले उस अज्ञान को, जो अभी नहीं था, अस्तित्व में आने से रोक सकता था।
11. इसलिये, ज्योंही उसने ऐसी प्रसन्नता की, वह केवल एओनों पर ही नहीं, परन्तु इन मनुष्यों पर भी ज्ञात हुआ जो इन अन्तिम समयों में रहे; परन्तु, क्योंकि उसे आदि से ज्ञात होने की ऐसी प्रसन्नता नहीं थी, वह अज्ञात रहा--अज्ञान का कारण, तुम्हारे अनुसार, पिता की इच्छा है। क्योंकि यदि उसने पहले से जाना कि ये बातें भविष्य में ऐसी रीति से होंगी, तो उसने इन सत्ताओं के अज्ञान से उन में स्थान पाने से पहले क्यों नहीं बचाव किया, इसके बजाय कि पीछे, मानो पश्चात्ताप के प्रभाव में, मसीह की उत्पत्ति के द्वारा उससे व्यवहार करे? क्योंकि वह ज्ञान जो मसीह के द्वारा उसने सब को पहुँचाया, वह बहुत पहले लोगोस के द्वारा दे सकता था, जो मोनोजेनेस का 1ला-जनित भी था। या यदि, उन्हें पहले से जानकर, उसने चाहा कि ये बातें हों [जैसा वे हुई हैं], तो अज्ञान के काम सदा बने रहें, और कभी मिटें नहीं। क्योंकि जो वस्तुएँ तुम्हारे प्रोपाटोर की इच्छा के अनुसार बनाई गई हैं वे उसकी इच्छा के साथ बनी रहें जिसने उनकी इच्छा की; या यदि वे मिटती हैं, तो उसकी इच्छा भी मिटेगी जिसने ठहराया कि उनका अस्तित्व हो। और एओनों ने विश्राम क्यों पाया और सिद्ध ज्ञान क्यों पहुँचे यह सीखकर [अन्त में] कि पिता सर्वथा(2) अगम् है? वे निश्चय यह ज्ञान विकार में फँसने से पहले रख सकते थे; क्योंकि पिता की महानता को आदि से घटती नहीं हुई, ताकि ये जानें(3) कि वह सर्वथा अगम् था।
क्योंकि यदि, अपनी अनन्त महानता के कारण, वह अज्ञात रहा, तो उसे अपनी अनन्त प्रेम के कारण भी उन को निर्विकार रखना चाहिए था जो उसके द्वारा उत्पन्न हुए, क्योंकि कुछ भी बाधा नहीं था, और हित बल्कि यह माँगता था, कि वे आदि से जानें कि पिता सर्वथा अगम् था।
अध्याय अठारह.--सोफिया सचमुच कभी अज्ञान या विकार में नहीं थी; उसकी एन्थ्यूमेसिस अपने से अलग नहीं हो सकती थी, या अपनी विशेष प्रवृत्तियाँ नहीं दिखा सकती थी।
1. इसे असंगत के अतिरिक्त और कैसे माना जा सकता है, कि वे भी इस सोफिया (बुद्धि) को अज्ञान, और अधोगति, और विकार में फँसी हुई दृढ़ करते हैं? क्योंकि ये बातें बुद्धि से परायी और विपरीत हैं, और वे कभी उसके गुण नहीं हो सकतीं। क्योंकि जहाँ पूर्वदृष्टि की कमी है, और लाभ के मार्ग का अज्ञान है, वहाँ बुद्धि विद्यमान नहीं। इसलिये वे अब इस दुःख भोगनेवाले एओन को सोफिया न कहें, परन्तु या उसका नाम छोड़ दें या उसके दुःख। और वे, और भी, अपने समस्त प्लेरोमा को आत्मिक न कहें, यदि इस एओन का उस में स्थान था जब वह विकार के ऐसे कोलाहल में फँसी थी। क्योंकि एक बलवन्त प्राण भी, आत्मिक द्रव्य की तो बात ही क्या, ऐसे किसी अनुभव से नहीं गुजरता।
2. और, फिर, उसकी एन्थ्यूमेसिस, विकार के साथ [उससे] निकलकर, अलग अस्तित्व कैसे बन सकती थी? क्योंकि एन्थ्यूमेसिस (विचार) किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में समझी जाती है, और अपने आप अलग अस्तित्व कभी नहीं रख सकती। क्योंकि एक बुरी एन्थ्यूमेसिस एक अच्छी के द्वारा नाश और लीन हो जाती है, जैसे रोग की दशा स्वास्थ्य के द्वारा। तब, विकार वाली से पहले कौन सी एन्थ्यूमेसिस थी? [यह थी]: पिता के [स्वभाव की] जाँच करना, और उसके
महानता। परन्तु वह पीछे किस बात पर मनाई गई, और इस प्रकार स्वास्थ्य को लौटी? [यह, अर्थात्], कि पिता अगम् है, और कि वह खोज से परे है। तब, यह उचित भाव नहीं था कि वह पिता को जानना चाहती थी, और इस कारण वह विकारग्राह्य हुई; परन्तु जब वह मनाई गई कि वह अगम्य है, वह स्वास्थ्य को लौटी। और नूस स्वयं भी, जो पिता के [स्वभाव की] जाँच कर रहा था, उनके अनुसार, अपनी खोज जारी रखना छोड़ दिया, यह जानकर कि पिता अगम् है।
3. तब एन्थ्यूमेसिस अलग से विकारों को कैसे गर्भ में धर सकती थी, जो स्वयं भी उसके भाव थे? क्योंकि भाव अवश्य एक व्यक्ति से जुड़ा है: वह अपने आप अलग होकर उत्पन्न या विद्यमान नहीं हो सकता। यह मत [उनका], तथापि, केवल अस्थिर ही नहीं, परन्तु हमारे प्रभु के द्वारा कही गई बात के भी विरुद्ध है: "ढूँढ़ो, और तुम पाओगे।"(1) क्योंकि प्रभु अपने शिष्यों को पिता को ढूँढ़ने और पाने से सिद्ध करता है; परन्तु उनका वह मसीह, जो ऊपर है, उन्हें इस तथ्य से सिद्ध किया है कि उसने एओनों को पिता को न ढूँढ़ने की आज्ञा दी, उन्हें मनाते हुए कि, यद्यपि वे कठिन परिश्रम करें, वे उसे नहीं पाएँगे। और वे(2) घोषित करते हैं कि वे स्वयं सिद्ध हैं, इस तथ्य से कि वे मानते हैं कि उन्होंने अपना बूथोस पा लिया है; जबकि एओन [सिद्ध किए गए हैं] इस के द्वारा, कि वह अगम्य है जिसकी उन्होंने जाँच की थी।
4. इसलिये, क्योंकि एन्थ्यूमेसिस स्वयं एओन से अलग विद्यमान नहीं हो सकती थी, [यह स्पष्ट है कि] वे उसके विकार के विषय में और भी बड़ा झूठ आगे लाते हैं, जब वे आगे उसे उससे बाँटने और अलग करने को बढ़ते हैं, और घोषित करते हैं कि वह पदार्थ का द्रव्य था। मानो परमेश्वर प्रकाश न हो, और मानो कोई वचन विद्यमान न हो जो उन्हें दोषी ठहरा सके, और उनकी दुष्टता को उलट सके। क्योंकि यह निश्चय सत्य है, कि एओन ने जो सोचा, वही उसने सहा; और जो उसने सहा, वही उसने सोचा। और उसकी एन्थ्यूमेसिस, उनके अनुसार, उस सोचनेवाले के विकार के सिवा और कुछ नहीं थी कि वह अगम् को कैसे समझे। और इस प्रकार एन्थ्यूमेसिस (विचार) विकार ही थी; क्योंकि वह असम्भव बातों को सोच रही थी। तब भाव और विकार एन्थ्यूमेसिस से कैसे अलग किए जाकर अलग रखे जा सकते थे, ताकि इतनी विशाल भौतिक सृष्टि का द्रव्य बनें, जब एन्थ्यूमेसिस स्वयं विकार थी, और विकार एन्थ्यूमेसिस? इसलिये, न एओन से अलग एन्थ्यूमेसिस, न एन्थ्यूमेसिस से अलग भाव, अलग से द्रव्य रख सकते हैं; और इस प्रकार एक बार फिर उनकी व्यवस्था टूटती है और नाश होती है।
5. परन्तु यह कैसे हुआ कि एओन [अपने अंगों में] विलीन भी हुई, और विकार के अधीन भी हुई? वह निस्सन्देह प्लेरोमा के समान द्रव्य की थी; परन्तु समस्त प्लेरोमा पिता का था। अब, कोई भी द्रव्य, जब सदृश प्रकृति वाले के सम्पर्क में लाया जाता है, शून्य में विलीन नहीं होगा, और न नाश के संकट में होगा, परन्तु बल्कि बना रहेगा और बढ़ेगा, जैसे अग्नि में अग्नि, आत्मा में आत्मा, और जल में जल; परन्तु जो एक दूसरे से विपरीत प्रकृति के हैं, [जब वे मिलते हैं,] दुःख पाते हैं और बदलते हैं और नाश होते हैं। और, उसी रीति से, यदि प्रकाश की उत्पत्ति होती, वह विकार नहीं सहती, या अपने समान प्रकाश में कोई संकट फिर नहीं लाती, परन्तु बल्कि अधिक चमक से चमकती, और बढ़ती, जैसे दिन सूर्य से [बढ़ती प्रभा से] बढ़ता है; क्योंकि वे मानते हैं कि बूथोस [स्वयं] उनके पिता(3) (सोफिया) की प्रतिमा था। जो भी पशु एक दूसरे से पराये [आदतों में] और अपरिचित हैं, या प्रकृति में परस्पर विरोधी हैं, [मिलने पर] संकट में पड़ते हैं, और नाश होते हैं; जबकि, दूसरी ओर, जो एक दूसरे के अभ्यस्त हैं, और सामञ्जस्यपूर्ण स्वभाव के हैं, एक ही स्थान में साथ होने से कोई आपत्ति नहीं सहते, परन्तु ऐसे तथ्य से सुरक्षा और जीवन दोनों को स्थिर करते हैं। इसलिये, यदि यह एओन प्लेरोमा के द्वारा उसके समस्त के समान द्रव्य से उत्पन्न हुई, तो वह कभी परिवर्तन नहीं पा सकती थी, क्योंकि वह अपने सदृश और परिचित सत्ताओं के साथ रह रही थी, आत्मिकों के बीच एक आत्मिक सार।
क्योंकि भय, आतंक, विकार, विलय, और ऐसे ही, शायद हमारे जैसे प्राणियों में विरोधी बातों के संघर्ष से हो सकते हैं, जो देह रखते हैं; परन्तु आत्मिक सत्ताओं में, और उन में जिन के बीच प्रकाश फैला है, ऐसी विपत्तियाँ सम्भवतः नहीं हो सकतीं। परन्तु ये मनुष्य मुझे ऐसे दिखाई देते हैं कि उन्होंने अपने एओन को वह [उसी प्रकार का] विकार दिया है जो हास्य कवि मेनुन्डर की उस पात्र का है,(4) जो स्वयं गहरे प्रेम में था, परन्तु [अपनी प्रेमिका के लिये] घृणा का विषय। क्योंकि जिन्होंने ऐसे मत गढ़े हैं उन्होंने मनुष्यों में किसी दुःखी प्रेमी का विचार और मानसिक धारणा रखी है, किसी आत्मिक और दिव्य द्रव्य की धारणा से अधिक।
6. और भी, सिद्ध पिता के [स्वभाव] में कैसे खोजें इस पर ध्यान करना, और उस में विद्यमान होने की इच्छा रखना, और उसकी [महानता] का बोध रखना, अज्ञान या विकार का कलंक नहीं ला सकता था, और वह एक आत्मिक एओन पर; परन्तु बल्कि [उत्पन्न करता] सिद्धता, और निर्विकारता, और सत्य। क्योंकि वे यह नहीं कहते कि वे भी, यद्यपि वे केवल मनुष्य हैं, उस पर ध्यान करके जो उन से पहले था
उन्हें,--और अब, मानो, सिद्ध को समझते हुए, और उसके ज्ञान के भीतर रखे जाकर,--इस प्रकार उलझन के विकार में फँसे हैं ऐसा नहीं, परन्तु बल्कि सत्य के ज्ञान और बोध तक पहुँचते हैं। क्योंकि वे दृढ़ करते हैं कि उद्धारकर्ता ने अपने शिष्यों से कहा, "ढूँढ़ो, और तुम पाओगे," इस दृष्टि से, कि वे उसे ढूँढ़ें जो, कल्पना के द्वारा, उनके द्वारा सब के कर्ता के ऊपर माना गया है--अकथनीय बूथोस; और वे चाहते हैं कि वे स्वयं "सिद्ध" माने जाएँ; क्योंकि उन्होंने सिद्ध को ढूँढ़ा और पाया है, जब वे अभी पृथ्वी पर हैं। तौभी वे घोषित करते हैं कि वह एओन जो प्लेरोमा के भीतर थी, एक पूरी तरह आत्मिक सत्ता, प्रोपाटोर को ढूँढ़कर, और उसकी महानता के भीतर स्थान पाने का यत्न करके, और पिता के सत्य का बोध पाने की इच्छा करके, विकार [के सहने] में गिर पड़ी, और ऐसा विकार कि, यदि वह उस सामर्थ्य से न मिलती जो सब को सम्भालती है, तो वह [एओनों के] सामान्य द्रव्य में विलीन हो जाती, और इस प्रकार अपने [व्यक्तिगत] अस्तित्व के अन्त को पहुँचती।
7. ऐसी धारणा असंगत है, और सचमुच सत्य से सर्वथा रहित मनुष्यों का मत। क्योंकि, यह कि यह एओन उन से श्रेष्ठ है, और अधिक प्राचीन है, वे स्वयं मानते हैं, अपनी ही व्यवस्था के अनुसार, जब वे दृढ़ करते हैं कि वे उस एओन की एन्थ्यूमेसिस के फल हैं जिसने विकार सहा, ताकि यह एओन उनकी माता का पिता है, अर्थात् उनका अपना पितामह। और उन्हें, पीछे के पौत्रों को, पिता की खोज, जैसा वे मानते हैं, सत्य, और सिद्धता, और स्थापना, और अस्थिर पदार्थ से छुटकारा, और पिता से मेल लाती है; परन्तु उनके पितामह पर यही खोज अज्ञान, और विकार, और आतंक, और उलझन लाई, जिन [विघ्नों] से वे यह भी घोषित करते हैं कि पदार्थ का द्रव्य बना। इसलिये यह कहना, कि सिद्ध पिता की खोज और जाँच, और उसके साथ सहभाग और एकता की इच्छा, उनके लिये अत्यन्त लाभदायक बातें थीं, परन्तु एक एओन के लिये, जिस से वे अपना मूल भी पाते हैं, ये बातें विलय और नाश का कारण थीं, ऐसे दावे सर्वथा असंगत, मूर्ख, और तर्कहीन के रूप में देखे जाने के अतिरिक्त और कैसे देखे जा सकते हैं? वे भी, जो इन शिक्षकों को सुनते हैं, सचमुच अपने को अन्धा करते हैं, और अन्धे मार्गदर्शकों को रखते हुए, न्याय से [छोड़ दिए जाकर] उनके साथ उस अज्ञान की खाई में गिरते हैं जो उनके नीचे है।
अध्याय उन्नीस.--अपने ही मूल के विषय में मिथ्या शिक्षकों की असंगतियाँ: डेमियुर्ज के विषय में उनके मत समान रूप से अस्थिर और हास्यास्पद दिखाए गए।
1. परन्तु उनके बीज के विषय में यह भी कैसी बात है--कि वह माता के द्वारा उन दूतों की आकृति के अनुसार गर्भ में धरा गया जो उद्धारकर्ता की सेवा करते हैं,--आकारहीन, रूपरहित, और अपूर्ण; और कि वह डेमियुर्ज में उसके ज्ञान के बिना रखा गया, ताकि उसके साधन से वह उस प्राण में सिद्धता और रूप पाए जिसे उसने, [यूँ कहें,] बीज से भरा था? यह, 1वें स्थान पर, यह दृढ़ करना है कि वे दूत जो उनके उद्धारकर्ता की सेवा करते हैं अपूर्ण हैं, और आकृति या रूप के बिना; यदि सचमुच जो उनकी दिखाई के अनुसार गर्भ में धरा गया वह ऐसी किसी प्रकार की सत्ता जन्मा [जैसा वर्णन हुआ है]।
2. तब, अगले स्थान पर, उनके इस कहने के विषय में कि सृष्टिकर्ता उस बीज-निक्षेप से अनजान था जो उस में हुआ, और फिर, उस बीज-दान से जो उसके द्वारा मनुष्य को किया गया, उनकी बातें व्यर्थ और खोखली हैं, और किसी रीति से प्रमाण के योग्य नहीं। क्योंकि वह उससे अनजान कैसे हो सकता था, यदि उस बीज में कोई द्रव्य और विशेष गुण होते? यदि, दूसरी ओर, वह द्रव्य के बिना और गुण के बिना था, और इस प्रकार सचमुच कुछ नहीं था, तो, स्वभावतः, वह उससे अनजान था। क्योंकि जिन वस्तुओं की अपनी कोई गति है, और गुण, या तो गर्मी का, या तीव्रता का, या मिठास का, या जो चमक में औरों से भिन्न हैं, वे मनुष्यों की दृष्टि से भी नहीं बचतीं, क्योंकि वे मानवीय कर्म के क्षेत्र में मिलती हैं: वे इस ब्रह्माण्ड के कर्ता परमेश्वर [से छिपी] तो और भी कम हो सकती हैं। तथापि कारण के साथ, [कहा जाता है,] उनका बीज उसे ज्ञात नहीं था, क्योंकि उस में सामान्य लाभ का कोई गुण नहीं, और किसी कर्म के लिये आवश्यक द्रव्य नहीं, और वह, वास्तव में, शुद्ध शून्य है।
मुझे सचमुच ऐसा लगता है कि, ऐसे मतों की दृष्टि से, प्रभु ने अपने को इस प्रकार कहा: "जो भी निकम्मी बात मनुष्य बोलते हैं, उसके विषय में वे न्याय के दिन लेखा देंगे।"(1) क्योंकि इन के समान स्वभाव के सब शिक्षक, जो मनुष्यों के कान निकम्मी बात से भरते हैं, जब वे न्याय के सिंहासन के पास खड़े होंगे, उन बातों का लेखा देंगे जिन्हें उन्होंने व्यर्थ कल्पना की और प्रभु के विरुद्ध झूठ से कहा, और वे इतनी धृष्टता की ऊँचाई तक बढ़े कि अपने विषय में घोषित करें कि, अपने बीज के द्रव्य के कारण, वे आत्मिक प्लेरोमा से परिचित हैं, क्योंकि वह मनुष्य जो भीतर रहता है उन्हें सच्चे पिता को प्रगट करता है; प्राणी-स्वभाव को इन्द्रियों के द्वारा अनुशासित होना आवश्यक था(2)। परन्तु [वे मानते हैं] डेमियुर्ज, इस बीज के समस्त को अपने में लेते हुए, माता के द्वारा उस में रखे जाने से, तौभी सब बातों से सर्वथा अनजान रहा, और प्लेरोमा से सम्बन्धित किसी बात की समझ नहीं रखता था।
3. और यह कि वे सचमुच "आत्मिक" हैं, क्योंकि ब्रह्माण्ड के पिता का एक कण उनके प्राणों में रखा गया है, क्योंकि, उनके दावों के अनुसार, उनके प्राण डेमियुर्ज स्वयं के समान द्रव्य से बनी हैं, तौभी वह, यद्यपि उसने माता से, एक ही बार, समस्त [दिव्य] बीज पाया, और उसे अपने में रखा, फिर भी प्राणी-स्वभाव का रहा, और ऊपर की बातों की रत्ती भर समझ नहीं रखता था, जिन बातों का वे घमण्ड करते हैं कि वे स्वयं समझते हैं, जब वे अभी पृथ्वी पर हैं;-- क्या यह सम्भव असंगति की सब को मुकुट नहीं पहनाता? क्योंकि यह कल्पना करना कि वही बीज इन मनुष्यों के प्राणों को ज्ञान और सिद्धता पहुँचाया, जबकि उसने उन्हें बनानेवाले परमेश्वर में केवल अज्ञान को जन्म दिया, ऐसा मत है जो केवल सर्वथा उन्मत्त, और सामान्य बुद्धि से सर्वथा रहित लोगों के द्वारा माना जा सकता है।
4. और भी, उनके लिये यह कहना भी अत्यन्त असंगत और निराधार बात है कि बीज, इस प्रकार रखे जाने से, रूप में लाया गया और बढ़ा, और इस प्रकार सिद्ध तर्कबुद्धि के सब ग्रहण के लिये तैयार किया गया। क्योंकि उस में पदार्थ का मिश्रण होगा--वह द्रव्य जिसे वे अज्ञान और न्यूनता से निकला मानते हैं; [और यह अपने को प्रमाणित करेगा] उनके पिता के प्रकाश से अधिक योग्य और उपयोगी, यदि सचमुच, जन्मते समय, उस [प्रकाश] के ध्यान के अनुसार, वह रूप या आकृति के बिना था, परन्तु इस [पदार्थ] से रूप, और दिखाई, और वृद्धि, और सिद्धता पाई। क्योंकि यदि वह प्रकाश जो प्लेरोमा से निकलता है एक आत्मिक सत्ता के लिये कारण था कि उसके पास न रूप था, न दिखाई, न अपनी विशेष विशालता, जबकि इस जगत में उसका अवतरण इन सब बातों को उस में जोड़ता था, और उसे सिद्धता तक लाता था, तो यहाँ का निवास (जिसे वे अन्धकार भी कहते हैं) उनके पिता के प्रकाश से बहुत अधिक प्रभावशाली और उपयोगी प्रतीत होगा। परन्तु इसे हास्यास्पद के अतिरिक्त और कैसे माना जा सकता है, यह दृढ़ करना कि उनकी माता पदार्थ में लगभग बुझ जाने के संकट में पड़ी, और उसके द्वारा नाश होने के लगभग बिन्दु पर थी, यदि वह तब कठिनाई से अपने को बाहर न खींचती, और अपने से, [मानो,] छलाँग न मारती, पिता से सहायता पाकर; परन्तु उसका बीज इसी पदार्थ में बढ़ा, और रूप पाया, और सिद्ध तर्कबुद्धि के ग्रहण के योग्य बनाया गया; और यह भी, अपने से असदृश और अपरिचित द्रव्यों के बीच "उबलते हुए", उनकी अपनी घोषणा के अनुसार कि पार्थिव आत्मिक का विरोधी है, और आत्मिक पार्थिव का?
तब, "एक छोटा कण,"(1) जैसा वे कहते हैं, अपने विपरीत और अपरिचित द्रव्यों के बीच, कैसे बढ़ सकता था, और आकार पा सकता था, और सिद्धता तक पहुँच सकता था?
5. परन्तु और भी, कही गई बात के अतिरिक्त, प्रश्न उठता है, क्या उनकी माता, जब उसने दूतों को देखा, बीज को एक ही बार सब को जन्म दिया, या केवल एक एक करके [क्रम से]? यदि उसने समस्त को एक साथ और एक ही बार जन्म दिया, तो जो इस प्रकार उत्पन्न हुआ अब शिशु-स्वभाव का नहीं हो सकता: इसलिये अब विद्यमान उन मनुष्यों में उसका अवतरण अनावश्यक होगा।(2) परन्तु यदि एक एक करके, तो उसने अपनी गर्भाधान उन दूतों की आकृति के अनुसार नहीं बनाया जिन्हें उसने देखा; क्योंकि, उन सब का एक साथ, और एक ही बार ध्यान करके, ताकि उन से गर्भ धरे, उसे एक ही बार उनकी सन्तान को जन्म देना चाहिए था जिनके रूपों से उसने एक ही बार गर्भ धरा था।
6. यह भी क्यों था कि, उद्धारकर्ता के साथ दूतों को देखकर, उसने सचमुच उनकी प्रतिमाओं को गर्भ में धरा, परन्तु उद्धारकर्ता की नहीं, जो उन से बहुत अधिक सुन्दर है? क्या वह उसे नहीं भाया; और क्या उसने, उस कारण, उसकी समानता के अनुसार गर्भ नहीं धरा?(3) यह भी कैसे था कि डेमियुर्ज, जिसे वे एक प्राणी-सत्ता कह सकते हैं, जैसा वे मानते हैं, अपनी विशेष विशालता और आकृति रखता हुआ, अपने द्रव्य के विषय में सिद्ध उत्पन्न हुआ; जबकि जो आत्मिक है, जिसे प्राणी-सम्बन्धी से अधिक प्रभावशाली होना भी चाहिए, अपूर्ण भेजा गया, और उसे एक प्राण में उतरना आवश्यक था, ताकि उस में वह रूप पाए, और इस प्रकार सिद्ध होकर, सिद्ध तर्क के ग्रहण के योग्य बनाया जाए? यदि, तब, वह केवल पार्थिव और प्राणी-मनुष्यों में रूप पाता है, तो अब यह नहीं कहा जा सकता कि वह उन दूतों की समानता के अनुसार है जिन्हें वे प्रकाश कहते हैं, परन्तु [समानता के अनुसार] उन मनुष्यों की जो यहाँ नीचे हैं। क्योंकि उस दशा में वह दूतों की समानता और दिखाई नहीं रखेगा, परन्तु उन प्राणों की जिन में वह आकार भी पाता है; जैसे जल जब एक पात्र में डाला जाता है तो उस पात्र का रूप लेता है, और यदि किसी अवसर पर वह उस में जम जाए, तो वह उस पात्र का रूप पाएगा जिस में वह इस प्रकार जमा है, क्योंकि प्राण स्वयं देह की आकृति(4) रखते हैं [जिस में वे रहते हैं]; क्योंकि वे स्वयं उस पात्र के अनुकूल किए गए हैं [जिस में वे विद्यमान हैं], जैसा मैं ने पहले कहा है। यदि, तब, वह बीज [जिसका उल्लेख है] यहाँ ठोस होकर निश्चित आकार में बनता है, तो वह एक मनुष्य की आकृति रखेगा। और दूतों का रूप नहीं। इसलिये यह कैसे सम्भव है कि वह बीज दूतों की प्रतिमाओं के अनुसार हो, जब उसने मनुष्यों की समानता के अनुसार रूप पाया है?
फिर, क्यों, क्योंकि वह आत्मिक प्रकृति का था, उसे देह में उतरने की कोई आवश्यकता क्यों थी? क्योंकि जो शारीरिक है वह आत्मिक की आवश्यकता में है, यदि सचमुच
उसका उद्धार होना है, ताकि उस में वह पवित्र किया जाए और सब अशुद्धता से छुड़ाया जाए, और जो मर्त्य है वह अमरता से निगल लिया जाए;(1) परन्तु जो आत्मिक है उसे यहाँ नीचे की वस्तुओं की कोई भी आवश्यकता नहीं। क्योंकि हम उसे लाभ नहीं पहुँचाते, परन्तु वह हमें सुधारता है।
7. उनके बीज के विषय में उनकी वह बात और भी स्पष्ट रूप से झूठी सिद्ध होती है, और इस रीति से कि वह हर एक को प्रत्यक्ष हो, इस तथ्य से कि वे उन प्राणों को, जिन्होंने माता से बीज पाया है, सब से श्रेष्ठ घोषित करते हैं; इसलिये वे डेमियुर्ज के द्वारा भी आदर पाए, और प्रधान, और राजा, और याजक ठहराए गए। क्योंकि यदि यह सत्य होता, तो महायाजक कैफा, और हन्ना, और शेष मुख्य याजक, arid व्यवस्था के उपदेशक, और प्रजा के शासक, उस सम्बन्ध के विषय में सहमत होते हुए(2), प्रभु पर विश्वास करने वाले 1ले होते; और उनसे भी पहले राजा हेरोद होता। परन्तु न तो वह, न मुख्य याजक, न शासक, न प्रजा के प्रतिष्ठित लोग उसकी ओर [विश्वास में] फिरे, वरन इसके विपरीत, जो राजमार्ग के किनारे भीख माँगते बैठे थे, वे बहरे, और अन्धे, जब वह औरों के द्वारा ठुकराया और तुच्छ जाना गया, जैसा पौलुस घोषित करता है, "क्योंकि अपने बुलाए जाने को देखो, भाइयो, कि तुम में बहुतेरे ज्ञानवान नहीं, बहुतेरे कुलीन नहीं, बहुतेरे सामर्थी नहीं; परन्तु जगत की तुच्छ की हुई वस्तुओं को परमेश्वर ने चुन लिया।"(3) इसलिये ऐसे प्राण औरों से श्रेष्ठ नहीं थे उस बीज के कारण जो उन में रखा गया था, और न इस कारण वे डेमियुर्ज के द्वारा आदर पाए।
8. तो, इस बात पर कि उनकी पद्धति निर्बल और अस्थिर है तथा पूरी तरह काल्पनिक है, काफी कहा जा चुका है। क्योंकि, एक साधारण कहावत काम में लाएँ, तो जिसको यह जानना है कि उसका जल खारा है, उसके लिये समुद्र पी जाना आवश्यक नहीं। परन्तु, जैसे मिट्टी की एक मूर्ति के विषय में, जो बाहर से रंगी गई है कि वह सोने की समझी जाए, जब कि वह सच में मिट्टी की है, जो कोई उस में से एक छोटा कण निकालता है, और इस प्रकार उसे खोलकर मिट्टी दिखाता है, वह सत्य के खोजी लोगों को झूठी राय से छुड़ाएगा; उसी प्रकार मैंने (केवल एक छोटा भाग नहीं, वरन उनकी पद्धति के अत्यन्त महत्वपूर्ण अनेक शीर्षकों को उघाड़कर) जितने जान बूझकर बहकाए जाना नहीं चाहते उन सभों को दिखाया है, कि वैलेन्तीनियों के मत से, और उन अन्य सब मिथ्यावादियों से जो इस जगत के गढ़ने वाले और बनाने वाले डेमियुर्ज के विषय में दुष्ट रायें प्रचार करते हैं(4), कौन सी बात दुष्ट, छलपूर्ण, मोहक, और विनाशकारी जुड़ी है, और वह वास्तव में एकमात्र सच्चा परमेश्वर है--दिखाते हुए, [जैसा मैंने किया है,] कि उनके विचार कितनी सहजता से गिराए जाते हैं।
9. क्योंकि कौन, जिस में कुछ बुद्धि है, और सत्य का थोड़ा ही अंश है, उन्हें सह सकता है, जब वे दृढ़ करते हैं कि सृष्टिकर्ता के ऊपर दूसरा परमेश्वर है; और कि एक दूसरा मोनोजेनेस है तथा परमेश्वर का दूसरा वचन भी, जिसे वे [क्षीण अवस्था में] उत्पन्न हुआ भी वर्णन करते हैं; और दूसरा मसीह, जिसके विषय में वे कहते हैं कि वह पवित्र आत्मा के साथ, शेष एओनों से पीछे गढ़ा गया; और दूसरा उद्धारकर्ता, जो, वे कहते हैं, सब के पिता से नहीं निकला, वरन उन एओनों की एक प्रकार की संयुक्त उत्पत्ति था जो [क्षीण अवस्था में] गढ़े गए, और कि वह इसी क्षीणता के कारण आवश्यकता से उत्पन्न हुआ? उनकी राय इस प्रकार है कि, यदि एओन अज्ञान और क्षीणता की दशा में न होते, तो न मसीह, न पवित्र आत्मा, न होरोस, न उद्धारकर्ता, न दूत, न उनकी माता, न उसका बीज, न जगत की शेष रचना बिलकुल उत्पन्न होते; वरन विश्व मरुभूमि होता, और उन अनेक अच्छी वस्तुओं से रहित होता जो उस में हैं। इसलिये वे केवल सृष्टिकर्ता के विरुद्ध अभक्ति के दोषी नहीं, उसे न्यूनता का फल घोषित करते हुए, वरन मसीह और पवित्र आत्मा के विरुद्ध भी, यह दृढ़ करते हुए कि वे उस न्यूनता के कारण उत्पन्न हुए; और, उसी रीति से, कि उद्धारकर्ता [उत्पन्न हुआ] उस न्यूनता [के अस्तित्व] के बाद। और उनकी व्यर्थ बात का शेष कौन सहेगा, जिसे वे चतुराई से दृष्टान्तों के अनुकूल बैठाने का यत्न करते हैं, और इस रीति से अपने आप को भी, और जो उन पर भरोसा करते हैं उन्हें भी, अभक्ति की गहरी से गहरी गहराइयों में डुबो दिया है?
अध्याय 20.--दृष्टान्तों से, यहूदा के विश्वासघात से, और हमारे उद्धारकर्ता के दुःख से, 12वीं एओन के दुःखों को दिखाने के लिये जोड़े गए तर्कों की व्यर्थता।
1. कि वे प्रभु के दृष्टान्तों और कामों दोनों को अपनी झूठ से गढ़ी पद्धति पर अनुचित और तर्कहीन रीति से लगाते हैं, मैं इस प्रकार सिद्ध करता हूँ: उदाहरण के लिये, वे उस दुःख को, जो वे कहते हैं 12वीं एओन के विषय में हुआ, इस तथ्य से दिखाने का यत्न करते हैं, कि उद्धारकर्ता का दुःख 12वें प्रेरित के द्वारा लाया गया, और 12वें महीने में हुआ। क्योंकि वे मानते हैं कि उसने अपने बपतिस्मा के बाद [केवल] एक वर्ष प्रचार किया। वे यह भी स्थिर रखते हैं कि वही बात उस स्त्री के विषय में स्पष्ट रखी गई जो रक्तस्राव से दुःख उठाती थी। क्योंकि स्त्री बारह वर्ष तक दुःख उठाती रही, और
उद्धारकर्ता के वस्त्र के छोर को छूने के द्वारा वह उस सामर्थ्य से चंगी की गई जो उद्धारकर्ता से निकली, और जिसका, वे दृढ़ करते हैं, पहले से अस्तित्व था। क्योंकि वह सामर्थ्य जो दुःख उठाती थी अपने को बाहर तान रही थी और अपरिमितता में बह रही थी, यहाँ तक कि वह [एओनों के] सामान्य पदार्थ में घुल जाने के खतरे में थी; परन्तु तब, आदि टेट्राड को छूकर, जो वस्त्र के छोर के द्वारा चित्रित है, वह रोकी गई, और अपने दुःख से चुकी।
2. फिर, फिर से, यह कि 12वीं एओन का दुःख यहूदा के आचरण के द्वारा सिद्ध हुआ, उनकी बात के विषय में, यह कैसे सम्भव है कि यहूदा [इस एओन के साथ] उसकी निशानी के रूप में तुलना किया जाए--वह जो बारह की संख्या से निकाल दिया गया,(1) और अपने स्थान पर कभी नहीं लौटाया गया? क्योंकि वह एओन, जिसका रूप वे यहूदा को घोषित करते हैं, अपनी एन्थुमेसिस से अलग होने के बाद, लौटाई गई या [अपने पूर्व स्थान पर] बुलाई गई; परन्तु यहूदा [अपने पद से] वंचित किया गया, और निकाल दिया गया, जब कि मत्तियाह उसके स्थान पर ठहराया गया, जैसा लिखा है, "उसका अध्यक्षपद दूसरा ले ले।"(2) इसलिये उन्हें स्थिर रखना चाहिए कि 12वीं एओन प्लेरोमा से निकाल दी गई, और दूसरी उत्पन्न हुई, या उसके स्थान को भरने को बाहर भेजी गई; अर्थात्, यदि वह यहूदा में इंगित की जाती है। इसके अतिरिक्त, वे हमें बताते हैं कि दुःख उठाने वाली एओन स्वयं थी, परन्तु यहूदा विश्वासघाती था, [और दुःख उठाने वाला नहीं।] वे स्वयं भी मानते हैं कि दुःख उठाने वाला मसीह था, यहूदा नहीं, जो [दुःख के सहने] को आया। तो फिर, यहूदा, जिसने हमारे उद्धार के लिये दुःख उठाने वाले को पकड़वाया, उस एओन का रूप और प्रतिमा कैसे हो सकता था जो दुःख उठाई?
3. परन्तु, सच में, मसीह का दुःख न तो एओन के दुःख के समान था, और न वह समान परिस्थितियों में हुआ। क्योंकि एओन ने विघटन और विनाश का दुःख उठाया, यहाँ तक कि जो दुःख उठाती थी वह नाश होने के खतरे में भी थी। परन्तु प्रभु, हमारा मसीह, एक वैध दुःख उठाया, केवल(3) आकस्मिक दुःख नहीं; वह स्वयं नाश होने के खतरे में न केवल नहीं था, वरन उसने गिरे हुए मनुष्य को(4) अपनी सामर्थ्य से स्थिर भी किया, और उसे अविनाश की ओर फिर बुलाया। फिर, एओन ने दुःख उठाया जब वह पिता को खोज रही थी, और उसे पाने के लिये उल्लेखनीय थी; परन्तु प्रभु ने दुःख उठाया कि जो पिता से भटक गए हैं उन्हें ज्ञान और उसकी सहभागिता की ओर लौटाए। पिता की महानता में खोज उसके लिये विनाश की ओर ले जाने वाला दुःख बन गई; परन्तु प्रभु ने, दुःख उठाकर, और पिता का ज्ञान देकर, हमें उद्धार प्रदान किया। उसका दुःख, जैसा वे घोषित करते हैं, एक स्त्री सन्तान को जन्म दिया, निर्बल, रोगी, बिना रूप, और निष्फल; परन्तु उसके दुःख ने बल और सामर्थ्य को जन्म दिया। क्योंकि प्रभु ने, दुःख के द्वारा, "ऊँचे स्थान पर चढ़कर, बन्दी को बन्दी बनाया, मनुष्यों को दान दिए,"(5) और जो उस पर विश्वास करते हैं उन्हें "साँपों और बिच्छुओं को, और शत्रु की सारी सामर्थ्य को कुचलने" की शक्ति प्रदान की,(6) अर्थात्, धर्मत्याग के अगुवे की। हमारे प्रभु ने अपने दुःख के द्वारा मृत्यु का नाश किया, भ्रम को तितर बितर किया, भ्रष्टता को समाप्त किया, और अज्ञान का नाश किया, जब कि उसने जीवन प्रगट किया और सत्य प्रकट किया, और अविनाश का दान दिया। परन्तु उनकी एओन ने, जब वह दुःख उठा चुकी, अज्ञान को स्थिर किया,(7) और बिना आकार का पदार्थ उत्पन्न किया, जिस से सब भौतिक काम उत्पन्न हुए हैं--मृत्यु, भ्रष्टता, भ्रम, और ऐसी बातें।
4. तो, यहूदा, चेलों के क्रम में 12वाँ, दुःख उठाने वाली एओन का रूप नहीं था, और न, फिर, प्रभु का दुःख था; क्योंकि ये दो बातें हर प्रकार से परस्पर भिन्न और असंगत दिखाई गई हैं। यह केवल उन बातों के विषय में नहीं है जिन का मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ, वरन संख्या के विषय में भी। क्योंकि यह कि विश्वासघाती यहूदा क्रम में 12वाँ है, सब मानते हैं, सुसमाचार में नाम लेकर बारह प्रेरित कहे गए हैं। परन्तु यह एओन 12वीं नहीं, वरन 30वीं है; क्योंकि, विचाराधीन विचारों के अनुसार, पिता की इच्छा से केवल बारह एओन उत्पन्न नहीं हुए, और न वह क्रम में 12वीं बाहर भेजी गई: वे उसे, [इसके विपरीत,] 30वें स्थान में उत्पन्न हुई गिनते हैं। तो फिर, क्रम में 12वाँ यहूदा, उस एओन का रूप और प्रतिमा कैसे हो सकता है जो 30वें स्थान को रखती है?
5. परन्तु यदि वे कहते हैं कि यहूदा नाश होते हुए उसकी एन्थुमेसिस का प्रतिरूप था, तो इस रीति से भी प्रतिरूप उस सत्य से कोई सादृश्य नहीं रखेगा जो [कल्पना के अनुसार] उसके अनुरूप है। क्योंकि एन्थुमेसिस एओन से अलग होकर, और पीछे मसीह से रूप पाकर,(8) तब उद्धारकर्ता के द्वारा बुद्धि की भागी बनाई जाकर, और प्लेरोमा के भीतर की वस्तुओं के प्रतिरूप के अनुसार प्लेरोमा के बाहर की सब वस्तुओं को गढ़कर, अन्त में उनके द्वारा प्लेरोमा में ग्रहण की गई कही जाती है, और संयोग [के सिद्धान्त] के अनुसार, उस उद्धारकर्ता से मिलाई गई जो सब में से गढ़ा गया था। परन्तु यहूदा एक ही बार निकाल दिए जाने पर, कभी नहीं लौटता
चेलों की संख्या में; नहीं तो उसके स्थान को भरने के लिये दूसरा व्यक्ति नहीं चुना जाता। इसके अलावा, प्रभु ने भी उसके विषय में घोषित किया, "उस मनुष्य पर हाय जिसके द्वारा मनुष्य का पुत्र पकड़वाया जाएगा;" (1) और, "उसके लिये भला होता कि वह कभी न जन्मा होता;"(2) और वह उसके द्वारा "विनाश का पुत्र"(3) कहलाया। यदि, तौभी, वे कहते हैं कि यहूदा एन्थुमेसिस का रूप था, एओन से अलग हुई के रूप में नहीं, वरन उसके साथ गुँथे दुःख का, तो इस रीति से भी बारह की संख्या तीन की संख्या का [उपयुक्त] रूप नहीं मानी जा सकती। क्योंकि एक दशा में यहूदा निकाल दिया गया, और मत्तियाह उसके बदले ठहराया गया; परन्तु दूसरी दशा में एओन विघटन और विनाश के खतरे में कही जाती है, और [वहाँ हैं] उसकी एन्थुमेसिस और दुःख: क्योंकि वे एन्थुमेसिस को दुःख से स्पष्ट रूप से अलग करते हैं; और वे एओन को लौटाई हुई, और एन्थुमेसिस को रूप पाती हुई दिखाते हैं, परन्तु दुःख को, जब इन से अलग किया गया, पदार्थ बनता हुआ। इसलिये, जब इस प्रकार ये तीन हैं, एओन, उसकी एन्थुमेसिस, और उसका दुःख, यहूदा और मत्तियाह, केवल दो होने से, उनके रूप नहीं हो सकते।
अध्याय 21.--बारह प्रेरित एओनों के रूप नहीं थे।
1. यदि, फिर, वे स्थिर रखते हैं कि बारह प्रेरित केवल उस बारह एओनों के समूह के रूप थे जिसे एन्थ्रोपोस ने एक्लेसिया के साथ संयोग में उत्पन्न किया, तो वे उन शेष दस एओनों के रूप के लिये और दस प्रेरित निकालें, जो, जैसा वे घोषित करते हैं, लोगोस और जोए के द्वारा उत्पन्न हुए। क्योंकि यह मानना अयुक्तियुक्त है कि छोटे, और इस कारण निम्न एओन, प्रेरितों के चुने जाने के द्वारा उद्धारकर्ता के द्वारा दिखाए गए, जब कि उनके बड़े, और इस कारण उनके श्रेष्ठ, इस प्रकार पहले नहीं दिखाए गए; क्योंकि उद्धारकर्ता (अर्थात्, यदि उसने इस दृष्टि से प्रेरितों को चुना, कि उनके द्वारा वह प्लेरोमा में के एओनों को दिखाए) और दस प्रेरित भी चुन सकता था, और इसी प्रकार इनसे पहले और आठ, कि इस प्रकार वह मूल और आदिम ओग्दोअद को दिखाता। वह,(4) 2री [दुओ] देकाद के विषय में, प्रेरितों की संख्या [पहले से] एक रूप ठहराई होने के द्वारा [उसका कोई चिह्न] नहीं दिखा सका। क्योंकि [उसने चेलों की ऐसी और कोई संख्या नहीं चुनी; परन्तु] बारह प्रेरितों के बाद, हमारा प्रभु अपने आगे और सत्तर को भेजता पाया जाता है।(5) अब सत्तर किसी प्रकार ओग्दोअद, देकाद, या त्रिआकोन्ताद का रूप नहीं हो सकता। तो फिर कारण क्या है, कि निम्न एओन, जैसा मैंने कहा, प्रेरितों के द्वारा चित्रित हैं; परन्तु श्रेष्ठ, जिन से पूर्व वाले भी अपनी सत्ता पाए, बिलकुल पहले चित्रित नहीं हैं? परन्तु यदि(6) बारह प्रेरित इस उद्देश्य से चुने गए, कि बारह एओनों की संख्या उनके द्वारा सूचित हो, तो सत्तर भी सत्तर एओनों के रूप होने को चुने जाने चाहिए थे; और उस दशा में, उन्हें दृढ़ करना होगा कि एओन अब तीस नहीं, वरन बयासी की संख्या में हैं।
क्योंकि जिसने प्रेरितों को इसलिये चुना कि वे प्लेरोमा में विद्यमान उन एओनों के रूप हों, वह उन्हें कभी कुछ के रूप ठहराता और औरों के नहीं; वरन प्रेरितों के द्वारा वह उन एओनों का प्रतिरूप बनाए रखने और एक रूप दिखाने का यत्न करता जो प्लेरोमा में हैं।
2. इसके अतिरिक्त हमें पौलुस के विषय में चुप नहीं रहना चाहिए, वरन उन से माँगना चाहिए कि वह प्रेरित किस एओन के रूप के अनुसार हमें सौंपा गया है, जब तक कि कदाचित् [वे दृढ़ न करें कि वह प्रतिनिधि है] उन [सब] में से गढ़े उद्धारकर्ता का, जिसने अपनी सत्ता समग्र के इकट्ठे दानों से पाई, और जिसे वे सब कुछ कहते हैं, क्योंकि वह उन सब में से गढ़ा गया था। इस सत्ता के विषय में कवि हेसिओड ने अपने को तीक्ष्ण रूप से व्यक्त किया है, उसे पंडोरा कहकर--अर्थात्, "सब की देन"--इस कारण, कि सब के पास की उत्तम देन उस में केन्द्रित थी। इन दानों का वर्णन करते हुए यह वृत्तान्त दिया जाता है: हेर्मेस (इस प्रकार(7) वह यूनानी भाषा में कहलाता है), A<greek>imulious</greek>(8) <greek>te</greek> <greek>logous</greek> <greek>kai</greek> <greek>epiklopon</greek> <greek>hqos</greek> <greek>autaus</greek> K<greek>atqeto</greek> (या इसे अंग्रेजी(9) भाषा में व्यक्त करने को), "उनके मनों में छल और कपट की बातें, और चोरी की आदतें रोप दीं," मूर्ख मनुष्यों को बहकाने के लिये, कि ऐसे उनके झूठ पर विश्वास करें। क्योंकि उनकी माता--अर्थात्, लेतो(10)- -गुप्त रूप से उन्हें उकसाया (जिस से वह लेतो,(11) भी कहलाती है, यूनानी शब्द के अर्थ के अनुसार, क्योंकि उसने गुप्त रूप से मनुष्यों को उकसाया), डेमियुर्ज की जानकारी के बिना, खुजली करते कानों को गहरे और अकथनीय भेद देने को।(12) और केवल उनकी माता ने यह नहीं किया कि यह भेद हेसिओड के द्वारा घोषित हो; वरन बहुत निपुणता से गीत-कवि पिंडार के द्वारा भी, जब वह डेमियुर्ज को(13) वर्णन करता है
पेलोप्स के विषय को, जिसका मांस पिता के द्वारा टुकड़ों में काटा गया, और तब सब देवताओं के द्वारा इकट्ठा किया गया और जोड़ा गया, और नए सिरे से जड़ा गया,(1) क्या उसने इस रीति से पंडोरा को सूचित किया, और ये मनुष्य जिनकी विवेक उसकी ओर से दाग दी गई हैं(2), जैसा वे स्थिर रखते हैं, वही बातें घोषित करते हुए, औरों के समान कुल और आत्मा के [सिद्ध] हैं।
अध्याय 22.--तीस एओन इस तथ्य से चित्रित नहीं होते कि मसीह ने अपने 30वें वर्ष में बपतिस्मा लिया: उसने अपने बपतिस्मा के बाद 12वें महीने में दुःख नहीं उठाया, वरन जब वह मरा तब पचास वर्ष से अधिक आयु का था।
1. मैंने दिखाया है कि तीस की संख्या हर प्रकार से उन्हें चूकती है; बहुत कम एओन, जैसा वे उन्हें चित्रित करते हैं, एक समय प्लेरोमा के भीतर पाए जाते हैं, और फिर [उस संख्या से मेल खाने को] बहुत अधिक। इसलिये, तीस एओन नहीं हैं, और न उद्धारकर्ता बपतिस्मा लेने को आया जब वह तीस वर्ष का था, इस कारण, कि वह उनकी पद्धति के तीस मौन(3) एओनों को दिखाए, नहीं तो उन्हें 1ले [उद्धारकर्ता] स्वयं को सब के प्लेरोमा से अलग करके निकालना होगा। इसके अतिरिक्त, वे दृढ़ करते हैं कि उसने 12वें महीने में दुःख उठाया, ताकि वह अपने बपतिस्मा के बाद एक वर्ष प्रचार करता रहा; और वे इस बात को भविष्यद्वक्ता से स्थिर करने का यत्न करते हैं (क्योंकि लिखा है, "प्रभु के स्वीकार्य वर्ष का, और बदला के दिन का प्रचार करने को"(4)), होते हुए
सच में अन्धे, इसलिये कि वे दृढ़ करते हैं कि उन्होंने बूथोस के भेद पा लिए हैं, तौभी वह नहीं समझते जिसे यशायाह प्रभु का स्वीकार्य वर्ष कहता है, और न बदला का दिन। क्योंकि भविष्यद्वक्ता न तो ऐसे दिन के विषय में बोलता है जो बारह घंटों का स्थान समेटता है, और न ऐसे वर्ष के विषय में जिसकी लम्बाई बारह महीने है। क्योंकि वे स्वयं भी मानते हैं कि भविष्यद्वक्ताओं ने बहुत बार अपने को दृष्टान्तों और रूपकों में व्यक्त किया है, और [वे] शब्दों की मात्र ध्वनि के अनुसार [समझे न जाएँ]।
2. तब, वह बदला का दिन कहलाया जिस में प्रभु हर एक को उसके कामों के अनुसार- -अर्थात्, न्याय चुकाएगा। प्रभु का स्वीकार्य वर्ष, फिर, यह वर्तमान समय है, जिस में जो उस पर विश्वास करते हैं वे उसके द्वारा बुलाए जाते हैं, और परमेश्वर को स्वीकार्य होते हैं--अर्थात्, उसके आगमन से [सब वस्तुओं की] समाप्ति तक का सारा समय, जिस में वह बचाए हुओं को [दया की योजना के] फलों के रूप में अपने लिये प्राप्त करता है। क्योंकि, भविष्यद्वक्ता की शब्दावली के अनुसार, बदला का दिन [स्वीकार्य] वर्ष के पीछे आता है; और भविष्यद्वक्ता झूठ का दोषी सिद्ध होगा यदि प्रभु ने केवल एक वर्ष प्रचार किया, और यदि वह उसके विषय में बोलता है। क्योंकि बदला का दिन कहाँ है? क्योंकि वर्ष बीत गया, और बदला का दिन अभी नहीं आया; परन्तु वह अभी भी "भलों पर और बुरों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मियों और अधर्मियों पर मेंह भेजता है।"(5) और धर्मी सताव सहते हैं, क्लेश पाते हैं, और मारे जाते हैं, जब कि पापी बहुतायत से भरे हैं, और "वीणा और सारंगी के शब्द के साथ पीते हैं, परन्तु प्रभु के कामों की सुधि नहीं लेते।"(6) परन्तु, [भविष्यद्वक्ता की] भाषा के अनुसार, उन्हें जोड़ा जाना चाहिए, और बदला का दिन [स्वीकार्य] वर्ष के पीछे आना चाहिए। क्योंकि शब्द ये हैं, "प्रभु के स्वीकार्य वर्ष का, और बदला के दिन का प्रचार करने को।" इसलिये यह वर्तमान समय, जिस में मनुष्य प्रभु के द्वारा बुलाए और बचाए जाते हैं, उचित रीति से "प्रभु का स्वीकार्य वर्ष" के द्वारा सूचित समझा जाता है; और इस पर "बदला का दिन" आता है, अर्थात्, न्याय।
और इस प्रकार सूचित समय केवल "एक वर्ष" नहीं कहलाता, वरन भविष्यद्वक्ता के द्वारा और पौलुस के द्वारा "एक दिन" भी नाम पाता है, जिन में से प्रेरित, पवित्रशास्त्र को स्मरण करते हुए, रोमियों के नाम पत्री में कहता है, "जैसा लिखा है, तेरे निमित्त हम दिन भर मारे जाते हैं, हम वध की भेड़ों के समान गिने जाते हैं।"(7) परन्तु यहाँ "दिन भर" यह अभिव्यक्ति इस सारे समय के लिये रखी गई है जिस में हम सताव सहते हैं, और भेड़ों के समान मारे जाते हैं। जैसे तब यह दिन उस एक को नहीं सूचित करता जो बारह घंटों का है, वरन वह सारा समय जिस में मसीह पर विश्वास करने वाले उसके निमित्त दुःख उठाते और मार डाले जाते हैं, वैसे ही वहाँ कहा वर्ष उस एक को नहीं सूचित करता जो बारह महीनों का है, वरन विश्वास का सारा समय जिस में मनुष्य सुसमाचार के प्रचार को सुनते और विश्वास करते हैं, और जो अपने को उससे मिलाते हैं वे परमेश्वर को स्वीकार्य होते हैं।
3. परन्तु यह बड़ा आश्चर्य है, यह कैसे हुआ कि, परमेश्वर के भेद पा लेने का दृढ़ दावा करते हुए, उन्होंने सुसमाचारों को यह जानने को नहीं जाँचा कि अपने बपतिस्मा के बाद प्रभु कितनी बार फसह के समय यरूशलेम को गया, यहूदियों की रीति के अनुसार हर देश से, और हर वर्ष, कि वे इस अवधि में यरूशलेम में इकट्ठे हों, और वहाँ फसह का पर्व मनाएँ। सबसे 1ले, जब उसने गलील के काना में जल को दाखरस किया, वह फसह के पर्व के दिन को गया, जिस अवसर पर लिखा है, "क्योंकि बहुतों ने उस पर विश्वास किया, जब उन्होंने वे चिह्न देखे जो उसने किए,"(8)
जैसा प्रभु के चेले यूहन्ना लिखता है। तब, फिर, [यहूदिया से] अपने को हटाते हुए, वह सामरिया में पाया जाता है; जिस अवसर पर भी, वह सामरी स्त्री के साथ एकत्र हुआ, और दूरी पर रहते हुए, एक शब्द से सूबेदार के पुत्र को चंगा किया, यह कहकर, "जा, तेरा पुत्र जीवित है।"(1) इसके बाद वह गया, 2री बार, यरूशलेम में फसह के पर्व के दिन को मानने(2); जिस अवसर पर उसने लकवे के रोगी को चंगा किया, जो कुण्ड के पास अड़तीस वर्ष पड़ा रहा था, उसे आज्ञा दी कि उठ, अपनी खाट उठा, और चल। फिर, वहाँ से तिबेरियास की झील के उस पार हटते हुए,(3) वहाँ एक बड़ी भीड़ को देखकर जो उसके पीछे हो ली थी, उस सारी भीड़ को पाँच रोटियों से खिलाया, और टुकड़ों की बारह टोकरियाँ ऊपर से बची रहीं। तब, जब उसने लाजर को मरे हुओं में से जिलाया, और फरीसियों के द्वारा उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचे गए, वह एप्रैम नामक नगर को हट गया; और उस स्थान से, जैसा लिखा है "वह फसह से छह दिन पहले बैतनिय्याह को आया,"(4) और बैतनिय्याह से यरूशलेम को जाते हुए, वहाँ उसने फसह खाया, और अगले दिन दुःख उठाया। अब, कि फसह के ये तीन अवसर एक वर्ष के भीतर नहीं आते, हर कोई व्यक्ति मान ही लेगा। और कि वह विशेष महीना जिस में फसह मनाया जाता था, और जिस में प्रभु ने भी दुःख उठाया, 12वाँ नहीं, वरन 1ला था, वे मनुष्य जो सब कुछ जानने का घमण्ड करते हैं, यदि यह न जानें, तो मूसा से सीख सकते हैं। इसलिये वर्ष की और 12वें महीने की उनकी व्याख्या झूठी सिद्ध हुई है, और उन्हें या अपनी व्याख्या या सुसमाचार को ठुकराना चाहिए; नहीं तो [यह अनुत्तर प्रश्न उन पर थोपता है], यह कैसे सम्भव है कि प्रभु ने केवल एक वर्ष प्रचार किया?
4. जब वह बपतिस्मा लेने को आया तब तीस वर्ष का होकर, और तब गुरु की पूरी आयु रखता हुआ,(5) वह यरूशलेम को आया, ताकि वह सब के द्वारा गुरु के रूप में ठीक से माना जाए।(6) क्योंकि वह एक वस्तु जान पड़ता और दूसरी नहीं था, जैसा वे दृढ़ करते हैं जो उसे केवल दिखने में मनुष्य बताते हैं; वरन वह जो था, वही वह जान भी पड़ा। इसलिये गुरु होकर, उसने गुरु की आयु भी रखी, मनुष्यत्व की किसी दशा को तुच्छ न जानते और न टालते हुए, और न अपने में उस नियम को हटाते हुए जिसे उसने मानव जाति के लिये ठहराया था,(7) वरन हर आयु को पवित्र करते हुए, उस अवधि के द्वारा जो उसके अनुरूप थी और स्वयं उसकी थी। क्योंकि वह अपने द्वारा सब को बचाने को आया--सब को, मैं कहता हूँ, जो उसके द्वारा परमेश्वर के लिये नए सिरे से जन्मे हैं(8)--शिशु,(9) और बच्चे, और बालक, और जवान, और बूढ़े। इसलिये वह हर आयु से होकर गया, शिशुओं के लिये शिशु बनकर, इस प्रकार शिशुओं को पवित्र करता हुआ; बच्चों के लिये बच्चा, इस प्रकार इस आयु के लोगों को पवित्र करता हुआ, और उसी समय उनके लिये भक्ति, धर्म, और आज्ञाकारिता का उदाहरण ठहराया जाता हुआ; जवानों के लिये जवान, जवानों के लिये उदाहरण बनता हुआ, और इस प्रकार उन्हें प्रभु के लिये पवित्र करता हुआ। इसी प्रकार वह बूढ़ों के लिये बूढ़ा था, कि वह सब के लिये सिद्ध गुरु हो, केवल सत्य के प्रगट करने के विषय में ही नहीं, वरन आयु के विषय में भी, उसी समय वृद्धों को भी पवित्र करता हुआ, और उनके लिये भी उदाहरण बनता हुआ। तब, अन्त में, वह मृत्यु तक ही आया, कि वह "मरे हुओं में से 1ला जन्मा हो, कि सब बातों में उसी को प्रधानता हो,"(10) जीवन का प्रधान,(11) सब से पहले विद्यमान, और सब से आगे चलने वाला।(12)
5. वे, तौभी, "प्रभु के स्वीकार्य वर्ष का प्रचार करने को" जो लिखा है उसके विषय में अपनी झूठी राय को स्थिर करने को, स्थिर रखते हैं कि उसने केवल एक वर्ष प्रचार किया, और तब 12वें महीने में दुःख उठाया। [इस प्रकार बोलते हुए], वे अपने ही नुकसान के लिये भूल जाते हैं, उसके सारे काम का नाश करते हुए, और उस आयु को उससे छीनते हुए जो और किसी से अधिक आवश्यक और अधिक आदरणीय है; उस अधिक आगे बढ़ी आयु को, मेरा अर्थ है, जिस में शिक्षक के रूप में भी वह और सब से बढ़ गया। क्योंकि यदि वह न सिखाता तो उसके चेले कैसे होते? और यदि वह गुरु की आयु तक न पहुँचा होता तो वह कैसे सिखाता? क्योंकि जब वह बपतिस्मा लेने को आया, उसने अपना 30वाँ वर्ष अभी पूरा नहीं किया था, वरन लगभग तीस वर्ष की आयु का होना आरम्भ कर रहा था (क्योंकि लूका ने, जिसने उसके वर्ष कहे हैं, इसे इस प्रकार व्यक्त किया है: "यीशु, मानो, तीस वर्ष का होना आरम्भ कर रहा था,"(13) जब वह बपतिस्मा पाने को आया); और, [इन मनुष्यों के अनुसार,] उसने अपने बपतिस्मा से गिनकर केवल एक वर्ष प्रचार किया। अपना 30वाँ वर्ष पूरा करने पर उसने दुःख उठाया, वास्तव में अभी जवान होकर, और जिसने आगे बढ़ी आयु को किसी प्रकार नहीं पहुँचा था। अब, वह 1ला
आरम्भिक जीवन की अवस्था तीस वर्ष समेटती है,(1) और कि यह 40वें वर्ष तक आगे बढ़ती है, हर एक मानेगा; परन्तु 40वें और 50वें वर्ष से मनुष्य वृद्धावस्था की ओर झुकना आरम्भ करता है, जिसे हमारा प्रभु रखता था जब वह अभी शिक्षक का पद पूरा कर रहा था, जैसा सुसमाचार और सब प्राचीन गवाही देते हैं; जो एशिया में प्रभु के चेले यूहन्ना के साथ परिचित थे, [यह दृढ़ करते हुए] कि यूहन्ना ने उन्हें वह सूचना पहुँचाई।(2) और वह त्राजन के समय तक उनके बीच रहा। (3) उन में से कुछ ने, इसके अतिरिक्त, केवल यूहन्ना को नहीं, वरन अन्य प्रेरितों को भी देखा, और उन से वही वृत्तान्त सुना, और उस कथन की [मान्यता के] विषय में गवाही देते हैं। तो फिर हमें किस पर अधिक विश्वास करना चाहिए? क्या ऐसे मनुष्यों पर, या टोलेमायुस पर, जिसने प्रेरितों को कभी नहीं देखा, और जो अपने स्वप्नों में भी किसी प्रेरित का लेशमात्र चिह्न नहीं पहुँचा?
6. परन्तु, इसके अलावा, वे यहूदी जिन्होंने तब प्रभु यीशु मसीह से विवाद किया, उसी बात को अत्यन्त स्पष्ट रूप से सूचित कर चुके हैं। क्योंकि जब प्रभु ने उन से कहा, "तुम्हारे पिता अब्राहम ने मेरा दिन देखने के लिये आनन्द किया; और उसने उसे देखा, और हर्षित हुआ," उन्होंने उसे उत्तर दिया, "तू अभी पचास वर्ष का नहीं, और क्या तूने अब्राहम को देखा है?"(4) अब, ऐसी भाषा उस पर ठीक लगती है जो चालीस की आयु पहले ही पार कर चुका है, अभी अपना 50वाँ वर्ष नहीं पहुँचा, तौभी इस पिछली अवधि से दूर नहीं है। परन्तु जो केवल तीस वर्ष का है उससे निस्सन्देह कहा जाता, "तू अभी चालीस वर्ष का नहीं।" क्योंकि जो उसे झूठ का दोषी ठहराना चाहते थे वे उसके वर्षों की संख्या को उस आयु से बहुत आगे नहीं बढ़ाते जिसे वे देखते थे कि उसने पाई है; वरन उन्होंने उसके निकट की एक अवधि कही
वास्तविक आयु को, चाहे उन्होंने इसे सार्वजनिक पंजी की प्रविष्टि से सच में जाना हो, या केवल जो उन्होंने देखा उस से अनुमान किया हो कि वह चालीस वर्ष से ऊपर था, और कि वह निश्चय ही केवल तीस वर्ष की आयु का एक नहीं था। क्योंकि यह बिलकुल अयुक्तियुक्त है कि वे बीस वर्ष चूके, जब वे उसे अब्राहम के समय से छोटा सिद्ध करना चाहते थे। क्योंकि जो उन्होंने देखा, वही उन्होंने व्यक्त भी किया; और जिसे उन्होंने देखा वह मात्र माया रूप नहीं था, वरन मांस और लोहू का वास्तविक प्राणी।(5) वह तब पचास वर्ष का होने को अधिक wont नहीं करता था;(6) और, उस तथ्य के अनुसार, उन्होंने उससे कहा, "तू अभी पचास वर्ष का नहीं, और क्या तूने अब्राहम को देखा है?" इसलिये उसने केवल एक वर्ष प्रचार नहीं किया, और न वर्ष के 12वें महीने में दुःख उठाया। क्योंकि 30वें और 50वें वर्ष के बीच समाई अवधि कभी एक वर्ष नहीं मानी जा सकती, जब तक कि, सच में, उनके एओनों में, जो प्लेरोमा में बूथोस के साथ अपनी पंक्तियों में बैठते हैं उन्हें इतने लम्बे वर्ष दिए गए हों; जिन प्राणियों के विषय में कवि होमर ने भी कहा है, निस्सन्देह उनकी [पद्धति की] भ्रान्ति की माता से प्रेरित होकर:--
<greek>i</greek> <greek>de</greek> <greek>qeoi</greek> <greek>par</greek>
<greek>hni</greek> <greek>kaqhmenoi</greek> <greek>hgorownto</greek> X<greek>rusew</greek>
<greek>en</greek> <greek>dapedw</greek>:(7)
जिसे हम अंग्रेजी में इस प्रकार अनूदित कर सकते हैं:(8)--
"देवता चारों ओर बैठे, जब जोव ऊपर अध्यक्षता करता था, और सुनहरी फर्श पर बातचीत हुई।"
अध्याय 23.--रक्तस्राव से दुःख उठाने वाली स्त्री दुःख उठाने वाली एओन का रूप नहीं थी।
1. इसके अतिरिक्त, उस स्त्री के विषय में उनका अज्ञान स्पष्ट ज्योति में बाहर आता है, जो रक्तस्राव से दुःख उठाती हुई प्रभु के वस्त्र के छोर को छूई, और इस प्रकार चंगी हुई; क्योंकि वे स्थिर रखते हैं कि उसके द्वारा वह 12वीं सामर्थ्य दिखाई गई जो दुःख उठाकर अपरिमितता की ओर बही, अर्थात्, 12वीं एओन। [उनका यह अज्ञान दिखाई देता है] 1ले, क्योंकि, जैसा मैंने दिखाया है, उनकी अपनी पद्धति के अनुसार, वह 12वीं एओन नहीं थी। परन्तु यह बात [इतने में] उन्हें देने पर भी, बारह एओन होने से, इन में से ग्यारह दुःख से अछूते रहे कहे जाते हैं, जब कि 12वीं ने दुःख उठाया; परन्तु स्त्री, दूसरी ओर, 12वें वर्ष में चंगी होती हुई, यह प्रकट है कि वह ग्यारह वर्ष तक दुःख उठाती रही, और 12वें में चंगी हुई। यदि सच में वे कहते कि ग्यारह एओन दुःख में फँसी थीं, परन्तु 12वीं चंगी हुई, तो यह कहना युक्तियुक्त होता कि स्त्री इन का रूप थी। परन्तु जब वह ग्यारह वर्ष तक दुःख उठाती रही, और [उस सारे समय] चंगाई न पाई, वरन 12वें वर्ष में चंगी हुई, तो वह एओनों में से 12वीं का रूप कैसे हो सकती है, जिन में से ग्यारह, [कल्पना के अनुसार,] बिलकुल दुःख नहीं उठाईं, वरन केवल 12वीं ने दुःख में भाग लिया? क्योंकि रूप और चिह्न, सन्देह नहीं, कभी कभी [सूचित] सत्य से पदार्थ और तत्व में भिन्न होता है; परन्तु उसे, सामान्य रूप और लक्षणों में, बनाए रखना चाहिए
[जो चित्रित है उसके साथ] सादृश्य, और इस रीति से वर्तमान वस्तुओं के द्वारा उन को छाया रूप में दिखाने को जो अभी आने वाली हैं।
2. और केवल इस स्त्री के विषय में ही उसके रोग के वर्ष (जिन्हें वे अपनी कल्पना से मेल खाते दृढ़ करते हैं) नहीं कहे गए हैं, वरन, देखो! एक और स्त्री भी चंगी हुई, अठारह वर्ष तक उसी प्रकार दुःख उठाने के बाद; जिसके विषय में प्रभु ने कहा, "क्या अब्राहम की इस बेटी को, जिसे शैतान ने अठारह वर्ष बाँधा है, सब्त के दिन छुड़ाया न जाना चाहिए?"(1) यदि, तब, पहली स्त्री दुःख उठाने वाली 12वीं एओन का रूप थी, तो पिछली भी दुःख में 18वीं एओन का रूप होनी चाहिए। परन्तु वे यह स्थिर नहीं रख सकते; नहीं तो उनकी आदिम और मूल ओग्दोअद उन एओनों की संख्या में आ जाएगी जिन्होंने साथ दुःख उठाया। इसके अतिरिक्त, एक और व्यक्ति(2) भी प्रभु के द्वारा चंगा किया गया, जब वह आठ-और-तीस वर्ष दुःख उठा चुका था: इसलिये उन्हें दृढ़ करना चाहिए कि जो एओन 38वें स्थान को रखती है उसने दुःख उठाया। क्योंकि यदि वे कहते हैं कि प्रभु के किए काम प्लेरोमा में जो हुआ उसके रूप थे, तो रूप को सर्वत्र बनाए रखना चाहिए। परन्तु वे न तो उसे अपनी कल्पित पद्धति के अनुकूल बैठा सकते हैं जो अठारह वर्ष बाद चंगी हुई, और न उसे जो अड़तीस वर्ष बाद चंगा हुआ। अब, यह हर प्रकार से असंगत और बेमेल है कि उद्धारकर्ता ने कुछ बातों में रूप बनाए रखा, जब कि औरों में ऐसा नहीं किया। इसलिये, स्त्री का रूप, [रक्तस्राव वाली], उनकी एओनों की पद्धति से कोई सादृश्य नहीं रखता दिखाया गया है।(3)
अध्याय 24.--संख्याओं, अक्षरों, और अक्षर-समूहों से मिथ्यावादियों के द्वारा निकाले गए तर्कों की मूर्खता।
1. यही बात भी उनकी राय को झूठा, और उनकी कल्पित पद्धति को अस्थिर और आगे दिखाती है, कि वे उसके प्रमाण कभी संख्याओं और नामों के अक्षर-समूहों के द्वारा, कभी अक्षर-समूहों के अक्षर के द्वारा भी, और फिर उन संख्याओं के द्वारा आगे लाना चाहते हैं जो यूनानियों की रीति के अनुसार [विभिन्न] अक्षरों में समाई हैं;--[यह, मैं कहता हूँ,] उनकी पराजय या घबराहट को,(4) तथा उनके [कथित] ज्ञान के अस्थिर और टेढ़े स्वभाव को अत्यन्त स्पष्ट रीति से दिखाता है। क्योंकि, यीशु नाम को, जो दूसरी भाषा का है, यूनानियों की गणना में ले जाकर, वे कभी उसे "Episemon,"(5) कहते हैं, छह अक्षरों वाला होने से, और अन्य समय "ओग्दोअदों की पूर्णता," आठ सौ अट्ठासी की संख्या रखने से। परन्तु उसका [अनुरूप] यूनानी नाम, जो "Soter," है, अर्थात्, उद्धारकर्ता, क्योंकि वह उनकी पद्धति से न तो संख्या-मूल्य के विषय में और न अपने अक्षरों के विषय में मेल खाता है, वे उसे चुपचाप छोड़ देते हैं। तौभी निश्चय, यदि वे प्रभु के नामों को, पिता के पहले से ठहराए उद्देश्य के अनुसार, अपने संख्या-मूल्य और अक्षरों के द्वारा, प्लेरोमा में संख्या सूचित करने वाले मानते हैं, तो Soter को, यूनानी नाम होने से, अपने अक्षरों और [इनके द्वारा व्यक्त] संख्याओं के द्वारा, यूनानी होने के कारण, प्लेरोमा के भेद को दिखाना चाहिए। परन्तु बात ऐसी नहीं है, क्योंकि वह पाँच अक्षरों का शब्द है, और उसका संख्या-मूल्य एक हजार चार सौ आठ है।(6) परन्तु ये बातें उनकी प्लेरोमा से किसी प्रकार मेल नहीं खातीं; इसलिये, प्लेरोमा में के कार्यों का जो वृत्तान्त वे देते हैं वह सत्य नहीं हो सकता।
2. इसके अतिरिक्त, यीशु, जो इब्रियों की अपनी जीभ का शब्द है, जैसा उन में विद्वान घोषित करते हैं, दो अक्षर और आधा रखता है,(7) और उस प्रभु को सूचित करता है जो स्वर्ग और पृथ्वी को रखता है;(8) क्योंकि प्राचीन इब्री भाषा में यीशु का अर्थ "स्वर्ग" है, जब कि फिर "पृथ्वी" sura usser शब्दों के द्वारा व्यक्त होती है।(9) इसलिये, जो शब्द स्वर्ग और पृथ्वी को रखता है वह यीशु ही है। तब, Episemon की उनकी व्याख्या झूठी है, और उनकी संख्या-गणना भी स्पष्ट रूप से गिरा दी गई है। क्योंकि, उनकी अपनी भाषा में, Soter पाँच अक्षरों का यूनानी शब्द है; परन्तु, दूसरी ओर, इब्री जीभ में, यीशु केवल दो अक्षर और आधा रखता है। जो योग वे जोड़ते हैं, अर्थात्, आठ सौ अट्ठासी, इसलिये भूमि पर गिरता है। और सर्वत्र, इब्री अक्षर यूनानी अक्षरों से संख्या में मेल नहीं खाते, यद्यपि ये विशेष रूप से, अधिक प्राचीन और अपरिवर्तनीय होने से, नामों से जुड़ी गणना को सम्भालने चाहिए। क्योंकि इब्रियों के ये प्राचीन, मूल, और सामान्यतः पवित्र कहे जाने वाले अक्षर(10) दस की संख्या में हैं (परन्तु वे पंद्रह(11) के द्वारा लिखे जाते हैं), अन्तिम अक्षर
1ले से जोड़ा जाता हुआ। और इस प्रकार वे इन अक्षरों में से कुछ को उनके सहज क्रम के अनुसार लिखते हैं, जैसा हम करते हैं, परन्तु औरों को उलटी दिशा में, दाहिने हाथ से बाईं ओर, इस प्रकार अक्षरों को पीछे की ओर खींचते हुए। मसीह नाम भी उनकी प्लेरोमा के एओनों के साथ सामंजस्य में जोड़ा जा सकना चाहिए, क्योंकि, उनके कथनों के अनुसार, वह उनकी प्लेरोमा की स्थापना और सुधार के लिये उत्पन्न हुआ था। पिता को भी, उसी रीति से, अक्षरों और संख्या-मूल्य दोनों के द्वारा, उन एओनों की संख्या को रखना चाहिए जो उसके द्वारा उत्पन्न हुए; बूथोस को, उसी प्रकार, और मोनोजेनेस को कम नहीं; परन्तु सब से अधिक उस नाम को जो और सब से ऊपर है, जिस से परमेश्वर पुकारा जाता है, और जो इब्री जीभ में Baruch,(1) के द्वारा व्यक्त होता है, [एक शब्द] जो भी ढाई अक्षर रखता है। इसलिये इस तथ्य से, कि अधिक महत्वपूर्ण नाम, इब्री और यूनानी दोनों भाषाओं में, न तो अक्षरों की संख्या के विषय में और न उन से निकाली गणना के विषय में उनकी पद्धति के अनुकूल होते हैं, शेष के विषय में उनकी गणनाओं का जबरदस्ती का स्वभाव स्पष्ट रूप से प्रगट होता है।
3. क्योंकि, व्यवस्था में से जो बातें उनकी पद्धति में अपनाई संख्या से मेल खाती हैं उन्हें चुनकर, वे इस प्रकार उसकी मान्यता के प्रमाण पाने को बलपूर्वक परिश्रम करते हैं। परन्तु यदि सच में उनकी माता का, या उद्धारकर्ता का, उद्देश्य था, डेमियुर्ज के द्वारा, उन वस्तुओं के रूप रखना जो प्लेरोमा में हैं, तो उन्हें ध्यान रखना चाहिए था कि रूप अधिक ठीक मेल खाने वाली और अधिक पवित्र वस्तुओं में पाए जाएँ; और, सब से ऊपर, वाचा के सन्दूक के विषय में, जिसके कारण साक्षी का सारा तम्बू बनाया गया। अब वह इस प्रकार बनाया गया था: उसकी लम्बाई(2) दो हाथ और आधा थी, उसकी चौड़ाई एक हाथ और आधा, उसकी ऊँचाई एक हाथ और आधा; परन्तु हाथों की ऐसी संख्या उनकी पद्धति से किसी प्रकार मेल नहीं खाती, तौभी उसके द्वारा रूप, और हर वस्तु से बढ़कर, स्पष्ट रखा जाना चाहिए था। प्रायश्चित का ढकना(3) भी उसी प्रकार उनकी व्याख्याओं से बिलकुल मेल नहीं खाता। इसके अतिरिक्त, भेंट की रोटी की मेज(4) लम्बाई में दो हाथ थी, जब कि उसकी ऊँचाई एक हाथ और आधा थी। ये परमपवित्र स्थान के सामने खड़ी थीं, तौभी उन में एक भी संख्या ऐसी मात्रा की नहीं है जो टेट्राड, या ओग्दोअद, या उनकी प्लेरोमा के शेष का संकेत रखती हो। दीवट(5) का क्या, जिस की सात(6) शाखाएँ और सात दीपक थे? जब कि, यदि ये रूप के अनुसार बनाई जातीं, तो उस की आठ शाखाएँ और उतने ही दीपक होने चाहिए थे, आदिम ओग्दोअद के रूप के अनुसार, जो एओनों के बीच प्रधानता से चमकती है, और सारी प्लेरोमा को प्रकाशित करती है। उन्होंने पर्दों को(7) दस गिनकर सावधानी से गिना है, इन्हें दस एओनों का रूप घोषित करते हुए; परन्तु वे चमड़े के आवरणों को गिनना भूल गए, जो ग्यारह(8) की संख्या में थे।
और न, फिर, उन्होंने इन पर्दों के माप को नापा है, प्रत्येक पर्दा(9) लम्बाई में eightand-twenty हाथ। और वे खम्भों की लम्बाई को दस हाथ रखते हैं, एओनों की देकाद के संकेत के साथ। "परन्तु प्रत्येक खम्भे की चौड़ाई एक हाथ और आधा थी;"(10) और इसे वे नहीं समझाते, न खम्भों की सारी संख्या को और न उनकी बेंड़ों को, क्योंकि वह तर्क के अनुकूल नहीं है। परन्तु अभिषेक के तेल(11) का क्या, जिसने सारे तम्बू को पवित्र किया? कदाचित् वह उद्धारकर्ता की दृष्टि से बच गया, या, जब उनकी माता सो रही थी, डेमियुर्ज ने स्वयं उसके भार के विषय में आज्ञा दी; और इस कारण वह उनकी प्लेरोमा के साथ मेल नहीं खाता, वह,(12) जैसा था, गन्धरस के पाँच सौ शेकेल, कैसिया के पाँच सौ, दालचीनी के दो सौ पचास, कलामोस के दो सौ पचास, और साथ में तेल, ताकि वह पाँच सामग्रियों से बना था। धूप(13) भी, उसी प्रकार, [बना था] स्तक्ते, ओनीका, गल्बनुम, पुदीना, और लोबान से, ये सब न तो अपने मिश्रण के विषय में और न भार के विषय में उनकी दलील से किसी प्रकार मेल खाते हैं। इसलिये यह अयुक्तियुक्त और बिलकुल असंगत है [स्थिर रखना] कि रूप व्यवस्था के ऊँचे और अधिक भव्य नियमों में नहीं रखे गए; परन्तु अन्य बातों में, जब कोई संख्या उनके कथनों से मिलती है, यह दृढ़ करना कि वह प्लेरोमा की वस्तुओं का रूप था; [सत्य यह है, कि] हर संख्या पवित्रशास्त्र में अत्यन्त विविधता से आती है, ताकि, यदि कोई चाहे, वह पवित्रशास्त्र से केवल एक ओग्दोअद, और एक देकाद, और एक दुओदेकाद ही नहीं, वरन जिस प्रकार की संख्या चाहे वह बना सकता है, और तब स्थिर रख सकता है कि यह उसके द्वारा गढ़ी भ्रान्ति की पद्धति का रूप था।
4. परन्तु कि यह बात सत्य है, कि वह संख्या जिसे पाँच कहा जाता है, जो उनकी दलील से किसी प्रकार मेल नहीं खाती, और उनकी पद्धति से सामंजस्य नहीं रखती, और न प्लेरोमा की वस्तुओं के रूपक प्रगट होने के योग्य है, [तौभी उसका व्यापक प्रचलन है,(14)] पवित्रशास्त्र से इस प्रकार सिद्ध होगा। Soter एक नाम है, उसके
पाँच अक्षरों का; Pater भी पाँच अक्षर रखता है; Agape (प्रेम) भी पाँच अक्षरों का है; और हमारे प्रभु ने, पाँच रोटियों को आशीष देकर(1), उन से पाँच हजार मनुष्यों को खिलाया। पाँच कुँवारियाँ(2) प्रभु के द्वारा बुद्धिमान कहलाईं; और, उसी प्रकार, पाँच मूर्ख कहलाईं। फिर, पाँच मनुष्य प्रभु के साथ थे कहा जाता है जब उसने पिता से गवाही(3) पाई,--अर्थात्, पतरस, और याकूब, और यूहन्ना, और मूसा, और एलियास। प्रभु भी, 5वें व्यक्ति के रूप में, मरी कुँवारी के कमरे में प्रवेश किया, और उसे फिर जिलाया; क्योंकि, [पवित्रशास्त्र] कहता है, "उसने पतरस और याकूब,(4) और कुँवारी के पिता और माता को छोड़, किसी मनुष्य को भीतर जाने न दिया।"(5) अधोलोक में(6) धनवान ने घोषित किया कि उसके पाँच भाई हैं, जिन के पास वह चाहता था कि मरे हुओं में से उठने वाला एक जाए। वह कुण्ड जिस से प्रभु ने लकवे के रोगी को अपने घर जाने की आज्ञा दी, उसके पाँच ओसारे थे। क्रूस का रूप भी पाँच सिरे रखता है,(7) लम्बाई में दो, चौड़ाई में दो, और बीच में एक, जिस [अन्तिम] पर वह व्यक्ति टिकता है जो कीलों से जड़ा है। हमारे हर हाथ की पाँच उँगलियाँ हैं; हमारी पाँच इन्द्रियाँ भी हैं; हमारे भीतरी अंग भी पाँच गिने जा सकते हैं, अर्थात्, हृदय, यकृत, फेफड़े, तिल्ली, और गुर्दे। इसके अतिरिक्त, सारा व्यक्ति भी इस संख्या [के भागों] में बाँटा जा सकता है,--सिर, छाती, पेट, जाँघें, और पाँव। मानव जाति पाँच आयुओं से होकर जाती है, 1ली शैशवावस्था, तब बाल्यावस्था, तब यौवन, तब परिपक्वता,(8) और तब वृद्धावस्था। मूसा ने प्रजा को पाँच पुस्तकों में व्यवस्था दी। जो हर पटिया उसने परमेश्वर से पाई उस में पाँच(9) आज्ञाएँ थीं। परमपवित्र स्थान को ढाँकने वाले(10) परदे के पाँच खम्भे थे।
होमबलि की वेदी भी चौड़ाई में पाँच हाथ थी।(11) जंगल में पाँच याजक चुने गए,--अर्थात्, हारून,(12) नादाब, अबीऊद, एलीआजर, ईतामार। एपोद और चपरास, और अन्य याजकीय वस्त्र, पाँच(13) सामग्रियों से बनाए गए; क्योंकि वे अपने में सोना, और नीला, और बैंगनी, और लाल, और मलमल मिलाते थे। और एमोरियों के पाँच(14) राजा थे, जिन्हें नून के पुत्र यहोशू ने एक गुफा में बन्द किया, और प्रजा को आज्ञा दी कि उनके सिरों को रौंदें। कोई भी, सच में, इसी प्रकार की और कई हजार बातें इकट्ठी कर सकता है, इस संख्या के विषय में भी और जिस और किसी पर वह ठहरना चाहे उसके विषय में भी, या तो पवित्रशास्त्र से, या अपनी दृष्टि के नीचे पड़ी प्रकृति के कामों से।(15) परन्तु यद्यपि बात ऐसी है, हम इसलिये यह दृढ़ नहीं करते कि डेमियुर्ज के ऊपर पाँच एओन हैं; और न हम पेप्टाद को पवित्र करते हैं, मानो वह कोई दिव्य वस्तु हो; और न हम अस्थिर बातों को, और न [जैसी वे करते हैं] बकवास को, उस व्यर्थ प्रकार के परिश्रम के द्वारा स्थिर करने को यत्न करते हैं; और न हम परमेश्वर के द्वारा [जिन उद्देश्यों की सेवा होनी थी उनके लिये] अच्छी तरह अनुकूल की गई सृष्टि को, जिन वस्तुओं का वास्तविक अस्तित्व नहीं उनके रूपों में अपने को बदलने को, टेढ़े ढंग से बाध्य करते हैं; और न हम अभक्तिपूर्ण और घृणित शिक्षाओं को आगे लाना चाहते हैं, जिन का पता लगाना और गिरा देना बुद्धि रखने वाले सब के लिये सहज है।
5. क्योंकि कौन उन्हें यह स्वीकार कर सकता है कि वर्ष में केवल तीन सौ पैंसठ दिन हैं, ताकि बारह एओनों के रूप के अनुसार तीस दिन के बारह महीने हों, जब रूप वास्तव में [प्रतिरूप के साथ] बिलकुल मेल से बाहर है? क्योंकि, एक दशा में, एओनों में से प्रत्येक सारी प्लेरोमा का 30वाँ भाग है, जब कि दूसरी में वे घोषित करते हैं कि महीना वर्ष का 12वाँ भाग है। यदि, सच में, वर्ष तीस भागों में बाँटा जाता, और महीना बारह में, तो उनकी कल्पित पद्धति के लिये उपयुक्त रूप पाया गया माना जा सकता था। परन्तु, इसके विपरीत, जैसा मामला सच में है, उनकी प्लेरोमा तीस भागों में बँटी है, और उसका एक अंश बारह में; जब कि फिर सारा वर्ष बारह भागों में बँटा है, और उसका एक निश्चित अंश तीस में। इसलिये उद्धारकर्ता ने महीने को सारी प्लेरोमा का रूप ठहराकर, परन्तु वर्ष को केवल उस दुओदेकाद का रूप ठहराकर जो प्लेरोमा में है, अविवेक से काम किया; क्योंकि वर्ष को तीस भागों में बाँटना अधिक योग्य था, जैसे सारी प्लेरोमा बँटी है, परन्तु महीने को बारह में, जैसे एओन उनकी प्लेरोमा में हैं। इसके अतिरिक्त, वे सारी प्लेरोमा को तीन भागों में बाँटते हैं,--अर्थात्, एक ओग्दोअद, एक देकाद, और एक दुओदेकाद में। परन्तु हमारा वर्ष चार भागों में बँटा है,--अर्थात्, वसन्त, ग्रीष्म, शरद, और शीत। और फिर, महीने भी, जिन्हें वे त्रिआकोन्ताद का रूप स्थिर रखते हैं, ठीक तीस दिन के नहीं होते, वरन कुछ अधिक रखते हैं और कुछ कम, क्योंकि पाँच दिन उनके पास अधिक के रूप में बचे रहते हैं।(16) दिन भी सदा ठीक बारह घंटों का नहीं होता, वरन नौ(17) से पंद्रह तक चढ़ता है, और तब पंद्रह से नौ तक फिर गिरता है। इसलिये यह नहीं माना जा सकता कि तीस दिन के महीने [चित्रित करने] के निमित्त इस प्रकार बनाए गए थे
एओनों को; क्योंकि, उस दशा में, वे ठीक तीस दिन के होते: और न, फिर, इन महीनों के दिन, कि बारह घंटों के द्वारा वे बारह एओनों का प्रतीक बनें; क्योंकि, उस दशा में, वे सदा ठीक बारह घंटों के होते।
6. परन्तु और आगे, वे भौतिक द्रव्यों को "बाएँ हाथ की ओर" कहते हैं, और मानते हैं कि जो वस्तुएँ इस प्रकार बाएँ हाथ की ओर हैं वे अवश्य नाश में पड़ती हैं, और वे यह भी दृढ़ करते हैं कि उद्धारकर्ता खोई हुई भेड़ के पास आया, कि उसे दाहिने हाथ की ओर, अर्थात् उन निन्यानवे भेड़ों की ओर, जो सुरक्षा में थीं, और नष्ट नहीं हुईं, पर भेड़शाला के भीतर बनी रहीं, ले जाए, तो भी वे बाएँ हाथ की थीं,(1) इससे निकलता है कि उन्हें मानना होगा कि विश्राम का भोग(2) उद्धार का अर्थ नहीं रखता था। और जिस में उसी रीति से वही संख्या नहीं, उसे वे बाएँ हाथ की, अर्थात् नाश की, मानने को विवश होंगे। तब यह यूनानी शब्द अगापे (प्रेम), यूनानियों के अक्षरों के अनुसार, जिन के द्वारा उनके बीच गणना चलती है, तिरानवे,(3) की संख्यात्मक कीमत रखता हुआ, उसी रीति से बाएँ हाथ की ओर विश्राम के स्थान को दिया गया है। अलेथेइया (सत्य) भी, उसी रीति से, ऊपर बताए हुए नियम के अनुसार, चौंसठ,(4) की संख्यात्मक कीमत रखती हुई, भौतिक द्रव्यों के बीच है। और इस प्रकार, अन्त में, वे मानने को विवश होंगे कि वे सब पवित्र नाम जो सौ की संख्यात्मक कीमत तक नहीं पहुँचते, पर केवल बाएँ हाथ से जोड़ी गई संख्याएँ रखते हैं, नाशवान् और भौतिक हैं।
अध्याय पच्चीस.--परमेश्वर अक्षरों, अक्षरखण्डों, और संख्याओं के द्वारा न खोजा जाए; ऐसी जाँचों में दीनता की आवश्यकता।
1. यदि कोई, तथापि, इन बातों के उत्तर में कहे, तो क्या? क्या यह निरर्थक और आकस्मिक बात है, कि नामों के स्थान, और प्रेरितों का चुनाव, और प्रभु का कार्य, और सृजी हुई वस्तुओं की व्यवस्था, जैसी हैं वैसी हैं?--हम उन्हें उत्तर देते हैं: निश्चय नहीं; पर बड़ी बुद्धि और यत्न से, सब वस्तुएँ स्पष्ट रूप से परमेश्वर द्वारा बनाई गई हैं, [अपने विशेष प्रयोजनों के लिये] ठीक और तैयार की गईं; और उसके वचन ने प्राचीन वस्तुओं को भी और अन्तिम कालों की वस्तुओं को भी रचा; और मनुष्यों को उन वस्तुओं को तीस की संख्या से,(5) नहीं जोड़ना चाहिए, पर जो वास्तव में है उसके साथ, या fight विवेक के साथ, उन्हें मेल में लाना चाहिए। और वे परमेश्वर के विषय में संख्याओं, अक्षरखण्डों, और अक्षरों के द्वारा जाँच चलाना न चाहें। क्योंकि यह अनिश्चित चाल है, उनकी नाना और भिन्न पद्धतियों के कारण, और क्योंकि हर प्रकार की कल्पना आज उसी रीति से किसी के द्वारा रची जा सकती है(6); इसलिये(7) वे इन्हीं सिद्धान्तों से सत्य के विरुद्ध युक्तियाँ निकाल सकते हैं, क्योंकि वे अनेक भिन्न दिशाओं में फेरी जा सकती हैं। पर, इसके विपरीत, उन्हें संख्याओं को ही, और जो वस्तुएँ रची गई हैं उन्हें, अपने आगे पड़े हुए सत्य सिद्धान्त के अनुकूल करना चाहिए। क्योंकि पद्धति(8) संख्याओं से नहीं निकलती, पर संख्याएँ पद्धति से निकलती हैं; और परमेश्वर अपनी सत्ता बनी हुई वस्तुओं से नहीं पाता, पर बनी हुई वस्तुएँ परमेश्वर से निकलती हैं। क्योंकि सब वस्तुएँ एक ही परमेश्वर से निकलती हैं।
2. परन्तु सृजी हुई वस्तुएँ नाना और अनेक हैं, वे सचमुच सारी सृष्टि के लिये भली भाँति ठीक और अनुकूल हैं; तो भी, अलग अलग देखी जाएँ, तो परस्पर विपरीत और बेमेल हैं, ठीक वीणा की ध्वनि के समान, जो अनेक और विपरीत स्वरों से बनी है, और उस अन्तर के द्वारा जिससे प्रत्येक दूसरे से अलग है, एक अटूट राग उत्पन्न करती है। इसलिये सत्य का प्रेमी प्रत्येक स्वर के बीच के अन्तर से धोखा न खाए, और न यह कल्पना करे कि एक एक कलाकार और रचयिता का था और दूसरा दूसरे का, और न कि एक व्यक्ति ने ऊँचे तार जोड़े, दूसरे ने नीचे, और एक और ने मध्य तार; पर वह माने कि एक ही व्यक्ति ने [सारा रचा], कि सारे काम में और [नमूने] की बुद्धि में दिखाई हुई विवेक, भलाई, और निपुणता प्रमाणित हो। जो राग सुनते हैं, उन्हें भी कलाकार की स्तुति और बड़ाई करनी चाहिए, कुछ स्वरों के खिंचाव की सराहना करनी चाहिए, औरों की कोमलता पर ध्यान देना चाहिए, इन दोनों छोरों के बीच औरों की ध्वनि पकड़नी चाहिए, और औरों के विशेष स्वभाव पर विचार करना चाहिए, कि प्रत्येक किस की ओर है, और उनकी विविधता का कारण क्या है, यह पूछने के लिये, हमारे नियम को कभी न छोड़ते हुए, [एक(9)] कलाकार को न छोड़ते हुए, न उस एक परमेश्वर पर का विश्वास फेंकते हुए जिस ने सब कुछ रचा, न अपने सृष्टिकर्ता की निन्दा करते हुए।
3. यदि, तथापि, कोई उन सब बातों का कारण न पाए जो जाँच के विषय बनती हैं, तो वह विचार करे कि मनुष्य परमेश्वर से अनन्त रीति से छोटा है; कि उस ने अनुग्रह केवल अंश में पाया है, और अभी अपने बनानेवाले के बराबर या उसके समान नहीं है; और, इसके अतिरिक्त, कि वह सब वस्तुओं का अनुभव नहीं कर सकता और न उनकी धारणा बना सकता है
परमेश्वर के समान; पर जिस अनुपात में वह जो आज ही रचा गया, और जिस ने अपनी सृष्टि का आरम्भ पाया, उस से छोटा है जो अरचित है, और जो सदा वही है, उसी अनुपात में वह, ज्ञान के विषय में और सब वस्तुओं के कारणों की जाँच की faculity के विषय में, उस से छोटा है जिस ने उसे बनाया। क्योंकि तू, हे मनुष्य, अरचित प्राणी नहीं है, और न तू सदा परमेश्वर के साथ सह-अस्तित्व में था(1), जैसा उसका अपना वचन था; पर अब, उसकी श्रेष्ठ भलाई के द्वारा, अपनी सृष्टि का आरम्भ पाकर, तू वचन से क्रमशः उस परमेश्वर के प्रबन्ध सीखता है जिस ने तुझे बनाया।
4. इसलिये अपने ज्ञान की उचित क्रम को सुरक्षित रख, और वास्तव में अच्छी वस्तुओं को न जानते हुए परमेश्वर ही से ऊपर उठना न चाह, क्योंकि वह बढ़ाया नहीं जा सकता; और सृष्टिकर्ता से ऊपर किसी को न खोज, क्योंकि तू ऐसा नहीं पाएगा, क्योंकि तेरा रचनेवाला सीमाओं में समाया नहीं जा सकता; और यद्यपि तू इस [विश्व] को सब नाप ले, और उसकी सारी सृष्टि में से होकर जाए, और उसकी सारी गहराई, और ऊँचाई, और लम्बाई पर विचार करे, तो भी पिता ही से ऊपर किसी और की धारणा न कर सकेगा। क्योंकि तू उसे पूरी रीति से सोच नहीं सकेगा, पर अपनी प्रकृति के विरुद्ध विचार-पंक्तियों में लगकर, तू अपने आप को मूर्ख प्रमाणित करेगा; और यदि तू ऐसे मार्ग पर दृढ़ रहे, तो तू पूरे उन्माद में गिरेगा, जब कि तू अपने आप को अपने सृष्टिकर्ता से ऊँचा और बड़ा समझे, और कल्पना करे कि तू उसकी प्रभुता से आगे घुस सकता है।
अध्याय छब्बीस.--"ज्ञान फुलाता है, परन्तु प्रेम बढ़ाता है।"
1. इसलिये सरल और अशिक्षित वर्ग का होना, और प्रेम के द्वारा परमेश्वर के निकट पहुँचना, अच्छा और अधिक लाभदायक है, इस से कि हम अपने आप को विद्वान् और निपुण कल्पना करके, अपने ही परमेश्वर के विरुद्ध निन्दा करनेवालों [के बीच] पाए जाएँ, क्योंकि वे पिता के रूप में दूसरे परमेश्वर को खड़ा करते हैं। इस कारण पौलुस ने पुकारा, "ज्ञान फुलाता है, परन्तु प्रेम बढ़ाता है:"(2) यह नहीं कि वह परमेश्वर के सच्चे ज्ञान के विरुद्ध बोलना चाहता था, क्योंकि उस दशा में वह अपने आप पर दोष लगाता; पर, क्योंकि वह जानता था कि कुछ लोग, ज्ञान के दिखावे से फूलकर, परमेश्वर के प्रेम से गिर जाते हैं, और कल्पना करते हैं कि वे स्वयं सिद्ध हैं, इस कारण कि वे एक अपूर्ण सृष्टिकर्ता को प्रदर्शित करते हैं, इस प्रकार के ज्ञान के कारण जो गर्व वे अनुभव करते हैं उसे समाप्त करने की दृष्टि से, वह कहता है, "ज्ञान फुलाता है, परन्तु प्रेम बढ़ाता है।" अब इस से बड़ा अहंकार नहीं हो सकता, कि कोई कल्पना करे कि वह उस से अच्छा और अधिक सिद्ध है जिस ने उसे बनाया और गढ़ा, और उसे जीवन की श्वास दी, और इसी वस्तु को अस्तित्व में आने की आज्ञा दी। इसलिये अच्छा है, जैसा मैं ने कहा है, कि किसी को सृष्टि में एक वस्तु क्यों बनाई गई इसके किसी एक कारण का कुछ भी ज्ञान न हो, पर वह परमेश्वर पर विश्वास करे, और उसके प्रेम में बना रहे, इस से(3) कि, इस प्रकार के ज्ञान से फूलकर, वह उस प्रेम से गिर जाए जो मनुष्य का जीवन है; और कि वह यीशु मसीह, परमेश्वर के पुत्र, जो हमारे लिये क्रूस पर चढ़ाया गया, [के ज्ञान] को छोड़ और कोई ज्ञान न खोजे, इस से कि सूक्ष्म प्रश्नों और बाल की खाल निकालने वाली बातों से वह अभक्ति में गिरे।(4)
2. क्योंकि कैसा होगा, यदि कोई, कही हुई प्रकार के प्रयत्नों से क्रमशः फूलकर, इसलिये कि प्रभु ने कहा कि "तुम्हारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं,"(5) प्रत्येक के सिर पर बालों की संख्या की जाँच करने लगे, और उस कारण को खोजने का यत्न करे जिस से एक मनुष्य के इतने हैं, और दूसरे के इतने, क्योंकि सब की संख्या बराबर नहीं, पर अनेक हजारों पर हजारों और भी बदलती संख्याओं के साथ पाए जाते हैं, इस कारण कि कुछ के सिर बड़े और औरों के छोटे हैं, कुछ के बाल घने हैं, औरों के पतले, और औरों के बाल प्रायः हैं ही नहीं,--और तब जो कल्पना करते हैं कि उन्होंने बालों की संख्या पा ली है, उसे अपनी कल्पना की हुई बात को अपनी ही शाखा की प्रशंसा पर लगाना चाहें? या फिर, यदि कोई, सुसमाचार में आने वाली इस बात के कारण, "क्या दो गौरैया एक पैसे में नहीं बिकतीं? और उन में से एक भी तुम्हारे पिता की इच्छा बिना भूमि पर नहीं गिरती,"(6) प्रतिदिन पकड़ी गई गौरैयों की संख्या गिनने का अवसर ले, चाहे सारे जगत पर या किसी विशेष क्षेत्र में, और इस कारण की जाँच करे कि कल इतनी पकड़ी गईं, परसों इतनी, और इस दिन फिर इतनी, और तब गौरैयों की संख्या को अपनी [विशेष] कल्पना से जोड़ दे, तो क्या वह उस दशा में अपने आप को बिलकुल भटका न देगा, और जो उस से सहमत हों उन्हें पूर्ण उन्माद में न ढकेल देगा, क्योंकि मनुष्य ऐसी बातों में सदा अपने गुरुओं से अधिक असाधारण कुछ पा लेने वाले समझे जाने के इच्छुक रहते हैं?(7)
3. पर यदि कोई हम से पूछे कि क्या बनी हुई और बनती हुई सब वस्तुओं की हर संख्या परमेश्वर को ज्ञात है, और क्या इन [संख्याओं] में से प्रत्येक ने, उसकी पूर्वदृष्टि के अनुसार, वह विशेष मात्रा पाई है जो उस में है; और हमारे सहमत होने पर
कि बात ऐसी ही है, और मानते हुए कि जो बातें हुई हैं, या हैं, या बनाई जाएँगी, उन में से एक भी परमेश्वर के ज्ञान से नहीं बचती, पर उसकी पूर्वदृष्टि के द्वारा उन में से प्रत्येक को अपना स्वभाव, और पद, और संख्या, और विशेष मात्रा मिली है, और कि कुछ भी व्यर्थ या आकस्मिक रीति से न हुआ है और न उत्पन्न होता है, पर [अभिप्रेत प्रयोजन के] अत्यन्त अनुकूल होने के साथ, और उत्कृष्ट ज्ञान के प्रयोग में, और कि वह एक आश्चर्यजनक और सचमुच ईश्वरीय बुद्धि(1) थी जो ऐसी पद्धति के उचित कारणों को अलग भी कर सकती थी और आगे भी ला सकती थी: यदि, [मैं कहता हूँ,] कोई, हमारी स्वीकृति और सम्मति पाकर, पृथ्वी की रेत और कंकर, वरन् समुद्र की लहरें और आकाश के तारे भी गिनने चले, और जिस संख्या को वह अपने आप ने पा लिया समझता है उसके कारण सोच निकालना चाहे, तो क्या उसका परिश्रम व्यर्थ न होगा, और क्या ऐसा मनुष्य सब सामान्य बुद्धिवालों द्वारा ठीक ही उन्मत्त, और विवेक से रहित, घोषित न होगा? और वह इस प्रकार के प्रश्नों में औरों से जितना अधिक अपने आप को लगाता है, और औरों से परे जितना अधिक पा लेने की कल्पना करता है, उन्हें अनिपुण, अज्ञानी, और प्राणमय प्राणी कहकर, क्योंकि वे उसके इतने निष्फल परिश्रम में नहीं प्रवेश करते, उतना ही वह [वास्तव में] उन्मत्त, मूर्ख, मानो वज्र से मारा हुआ है, क्योंकि वह किसी एक बात में भी अपने आप को परमेश्वर से छोटा नहीं मानता; पर, जिस ज्ञान को वह अपने आप ने पा लिया कल्पना करता है, उस से वह परमेश्वर ही को बदल देता है, और सृष्टिकर्ता की महानता से ऊपर अपनी ही राय को ऊँचा करता है।
अध्याय सत्ताईस.--दृष्टान्तों और पवित्रशास्त्र के अस्पष्ट अंशों की व्याख्या का उचित प्रकार।
1. स्वस्थ मन, और जो अपने धारक को संकट में न डाले, और जो भक्ति और सत्य के प्रेम को समर्पित हो, उन बातों पर उत्सुकता से ध्यान करेगा जिन्हें परमेश्वर ने मनुष्यजाति की शक्ति में रखा है, और हमारे ज्ञान के अधीन किया है, और उन में उन्नति करेगा, प्रतिदिन के अध्ययन के द्वारा उनके ज्ञान को अपने लिये सहज बनाते हुए। ये बातें ऐसी हैं जो हमारे अवलोकन के [स्पष्ट] अधीन आती हैं, और पवित्र शास्त्र में स्पष्ट और असंदिग्ध शब्दों में रखी गई हैं। इसलिये दृष्टान्तों को संदिग्ध बातों के अनुकूल न किया जाए। क्योंकि, यदि यह न किया जाए, तो जो उन्हें समझाए वह बिना संकट के ऐसा करेगा, और दृष्टान्तों को सब से एक सी व्याख्या मिलेगी, और सत्य की देह(2) अपनी पूरी बनी रहेगी, अपने अंगों के मेलयुक्त अनुकूलन के साथ, और [अपने कई भागों के] टकराव के बिना। पर जो बातें स्पष्ट या प्रत्यक्ष नहीं, उन्हें दृष्टान्तों की व्याख्याओं पर लगाना, जैसी प्रत्येक अपने झुकाव के अनुसार अपने लिये खोजता है, [असंगत है।(3)] क्योंकि इस रीति से कोई सत्य का नियम नहीं रखेगा; पर जितने व्यक्ति दृष्टान्तों को समझाएँगे, उतनी सत्य की नाना पद्धतियाँ पाई जाएँगी, परस्पर विरोध में, और विरोधी शिक्षाएँ प्रस्तुत करती हुईं, अन्यजाति दार्शनिकों के बीच चलने वाले प्रश्नों के समान।
2. इसलिये इस चाल के अनुसार, मनुष्य सदा पूछता रहेगा पर कभी न पाएगा, क्योंकि उस ने खोज की विधि ही को ठुकरा दिया है। और जब दूल्हा(4) आता है, जिस का दीपक साधा नहीं गया, और स्थिर प्रकाश की चमक से नहीं जल रहा, वह उन में गिना जाता है जो दृष्टान्तों की व्याख्याओं को धुँधला करते हैं, उस को छोड़कर जो अपनी स्पष्ट घोषणाओं से सब आनेवालों को उदारता से वरदान देता है, और उसकी विवाह-कक्ष से बाहर कर दिया जाता है। इसलिये, क्योंकि सारा पवित्रशास्त्र, भविष्यद्वक्ता, और सुसमाचार, सब के द्वारा स्पष्ट, असंदिग्ध, और मेल से समझे जा सकते हैं, यद्यपि सब उन पर विश्वास नहीं करते; और(5) क्योंकि वे प्रचार करते हैं कि केवल एक ही परमेश्वर ने, और सब को छोड़कर, अपने वचन से सब कुछ रचा, चाहे दृश्य हो या अदृश्य, स्वर्गीय या पार्थिव, जल में या पृथ्वी के नीचे, जैसा मैं ने पवित्रशास्त्र के शब्दों ही से दिखाया है(6); और क्योंकि सृष्टि की वही पद्धति जिस की हम हैं, जो हमारे ध्यान में आता है उस से गवाही देती है कि एक सत्ता ने उसे बनाया और उसे चलाती है,--वे व्यक्ति सचमुच मूर्ख दिखेंगे जो ऐसी स्पष्ट सिद्धि पर अपनी आँखें अन्धी कर लेते हैं, और [उन से की गई] घोषणा के प्रकाश को नहीं देखेंगे; पर वे अपने ऊपर बेड़ियाँ डालते हैं, और उन में से प्रत्येक, दृष्टान्तों की अपनी अस्पष्ट व्याख्याओं के द्वारा, कल्पना करता है कि उस ने अपना ही एक परमेश्वर पा लिया है।
क्योंकि विरोधी मत रखनेवालों के द्वारा कल्पित पिता के विषय में पवित्रशास्त्र के किसी भाग में खुले रूप से, स्पष्ट रूप से, और बिना विवाद कुछ भी नहीं कहा गया, इसकी वे स्वयं गवाही देते हैं, जब वे मानते हैं कि उद्धारकर्ता ने ये ही बातें एकान्त में सब को नहीं, पर अपने चेलों में से केवल कुछ को सिखाईं जो उन्हें ग्रहण कर सकते थे, और जिन्होंने युक्तियों, पहेलियों, और दृष्टान्तों के द्वारा समझा कि उस ने क्या चाहा था। वे, [अन्त में,] इस पर आते हैं, कि वे मानते हैं कि एक सत्ता है जो परमेश्वर कही जाती है, और दूसरी पिता, वह जो दृष्टान्तों और पहेलियों के द्वारा ऐसा प्रदर्शित किया जाता है।
3. परन्तु क्योंकि दृष्टान्त अनेक व्याख्याएँ मानते हैं, सत्य का कौन प्रेमी नहीं मानेगा, कि उनके लिये यह कहना कि परमेश्वर इन्हीं में से खोजा जाए, जब कि वे निश्चित, निःसंदिग्ध, और सत्य को छोड़ देते हैं, उन मनुष्यों का भाग है जो उत्सुकता से अपने आप को संकट में डालते हैं, और ऐसे चलते हैं मानो विवेक से रहित हों? और क्या ऐसी चाल अपना घर चट्टान(1) पर न बनाना है जो दृढ़, बलवन्त, और खुले स्थान पर रखी है, पर खिसकती बालू पर? इसलिये ऐसी इमारत का गिरना सहज बात है।
अध्याय सत्ताईस.--सिद्ध ज्ञान वर्तमान जीवन में नहीं पाया जा सकता: अनेक प्रश्न दीनता से परमेश्वर के हाथों में छोड़ देने चाहिए।
1. इसलिये सत्य ही को अपना नियम और परमेश्वर के विषय की गवाही को स्पष्ट रूप से अपने आगे रखकर, हमें प्रश्नों के अनेक और नाना उत्तरों के पीछे दौड़कर परमेश्वर के दृढ़ और सच्चे ज्ञान को फेंक नहीं देना चाहिए। पर यह कहीं अधिक उचित है कि हम, अपनी जाँच को इस प्रकार चलाते हुए, जीवित परमेश्वर के भेद और प्रबन्ध की खोज में अपने आप को अभ्यास करें, और उस के प्रेम में बढ़ें जिस ने हमारे लिये इतने बड़े काम किए हैं, और अभी करता है; पर उस विश्वास से कभी न गिरें जिस से सबसे स्पष्ट प्रचार होता है कि यही सत्ता ही सचमुच परमेश्वर और पिता है, जिस ने इस जगत को भी रचा, मनुष्य को गढ़ा, और अपनी ही सृष्टि को बढ़ने की शक्ति दी, और उसे छोटी बातों से उन बड़ी बातों की ओर ऊपर बुलाया जो उसकी अपनी उपस्थिति में हैं, जैसा वह गर्भ में गर्भित शिशु को सूर्य के प्रकाश में लाता है, और डंठल पर पूरी सामर्थ्य देने के बाद गेहूँ को खत्ते में रखता है। पर एक ही सृष्टिकर्ता है जिस ने गर्भ को भी गढ़ा और सूर्य को रचा; और एक ही प्रभु है जिस ने अन्न की डंठल को भी पाला, गेहूँ को बढ़ाया और बहुत किया, और खत्ता तैयार किया।
2. यदि, तथापि, पवित्रशास्त्र की उन सब बातों की व्याख्या हम नहीं खोज सकते जो जाँच का विषय बनाई जाती हैं, तो भी इस कारण उस से अलग किसी और परमेश्वर को न खोजें जो वास्तव में है। क्योंकि यही सबसे बड़ी अभक्ति है। उस स्वभाव की बातें हमें बनानेवाले परमेश्वर पर छोड़ दें, सबसे उचित रीति से निश्चय करके कि पवित्रशास्त्र सचमुच सिद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के वचन और उसकी आत्मा के द्वारा बोले गए; पर हम, क्योंकि हम परमेश्वर के वचन और उसकी आत्मा से छोटे हैं, और अस्तित्व में पीछे हैं, उसी कारण(2) उसके भेदों के ज्ञान से रहित हैं। और आश्चर्य का कोई कारण नहीं यदि आत्मिक और स्वर्गीय बातों के विषय में, और ऐसी बातों के विषय में जिन्हें प्रकाशन से हमें जानना पड़ता है, हमारे साथ ऐसा हो, क्योंकि उन बातों में से भी बहुत सी जो हमारे पाँवों ही पर पड़ी हैं (मेरा अर्थ ऐसी बातों से है जो इस जगत की हैं, जिन्हें हम छूते, और देखते, और जिन के निकट सम्पर्क में हैं) बाहर के ज्ञान से आगे बढ़ जाती हैं, इसलिये इन्हें भी हमें परमेश्वर पर छोड़ना है। क्योंकि उचित है कि वह सब से [ज्ञान में] बढ़े। क्योंकि बात कैसी है, उदाहरण के लिये, यदि हम नील के बढ़ने का कारण समझाने का यत्न करें? हम विषय पर बहुत कुछ कह सकते हैं, युक्तियुक्त या अन्यथा; पर जो उसके विषय में सत्य, निश्चित, और निर्विवाद है, वह केवल परमेश्वर का है। फिर, पक्षियों का निवास-स्थान--उनका, मेरा अर्थ है, जो वसन्त में हमारे पास आते हैं, पर शरद के निकट फिर उड़ जाते हैं--यद्यपि यह इस जगत से जुड़ी बात है, हमारे ज्ञान से बच जाता है। फिर, समुद्र के बहाव और भाटे की हम क्या व्याख्या दे सकते हैं, यद्यपि हर एक मानता है कि [इन दृश्यों का] कोई निश्चित कारण होना चाहिए?
या जो बातें उस से आगे पड़ी हैं उनके स्वभाव के विषय में हम क्या कह सकते हैं?(3) फिर, वर्षा, बिजली, गरज, बादलों के इकट्ठे होने, भाप, पवनों के फूट निकलने, और ऐसी बातों के बनने के विषय में हम क्या कह सकते हैं; हिम, ओले, और ऐसी और बातों के भण्डारों के विषय में tell के रूप में? [हम क्या जानते हैं] बादल तैयार करने के लिये आवश्यक दशाओं के विषय में, या आकाश में भाप का वास्तविक स्वभाव क्या है? चन्द्रमा के बढ़ने और घटने के कारण के विषय में क्या, या नाना जलों, धातुओं, पत्थरों, और ऐसी बातों के बीच स्वभाव के भेद के कारण के विषय में क्या? इन सब बातों पर हम उनके कारण खोजते हुए सचमुच बहुत कुछ कह सकते हैं, पर केवल परमेश्वर जिस ने उन्हें बनाया उनके विषय में सत्य बता सकता है।
3. इसलिये, यदि सृष्टि के विषय में भी कुछ बातें [का ज्ञान] केवल परमेश्वर की हैं, और और बातें हमारे अपने ज्ञान की सीमा में के साथ भीतर आती हैं, तो शिकायत का क्या आधार है, यदि उन बातों के विषय में जिन की हम पवित्रशास्त्र में जाँच करते हैं (जो सर्वत्र आत्मिक हैं), हम परमेश्वर के अनुग्रह से उन में से कुछ को समझा सकते हैं, जब कि औरों को परमेश्वर के हाथों में छोड़ना है, और वह केवल वर्तमान जगत में नहीं, पर उस में भी जो आनेवाला है, ताकि परमेश्वर सदा सिखाए, और मनुष्य सदा परमेश्वर से सिखाई बातें सीखे? जैसा प्रेरित ने इस बात पर कहा है, कि जब और बातें मिटा दी जाएँगी, तब ये तीन, "विश्वास, आशा, और प्रेम, बने रहेंगे।"(4) क्योंकि विश्वास, जो हमारे स्वामी का आदर रखता है, अपरिवर्तनीय रीति से बना रहता है(5)
हमें निश्चय दिलाते हुए, कि केवल एक ही सच्चा परमेश्वर है, और कि हमें उसे सदा सचमुच प्रेम करना चाहिए, क्योंकि वही हमारा पिता है; जब कि हम परमेश्वर से और अधिक पाते जाने की आशा रखते हैं, और उस से सीखने की, क्योंकि वह भला है, और असीम धन, अन्तहीन राज्य, और ऐसी शिक्षा रखता है जो कभी समाप्त नहीं होती। इसलिये, यदि उस नियम के अनुसार जो मैं ने कहा है, हम कुछ प्रश्न परमेश्वर के हाथों में छोड़ दें, तो हम अपना विश्वास अहानि रखेंगे, और बिना संकट बने रहेंगे; और सारा पवित्रशास्त्र, जो परमेश्वर ने हमें दिया है, हमारे द्वारा पूरी रीति से मेल खाता हुआ पाया जाएगा; और दृष्टान्त उन अंशों से मेल खाएँगे जो पूरी रीति से स्पष्ट हैं; और वे कथन जिन का अर्थ स्पष्ट है, दृष्टान्तों को समझाएँगे; और [पवित्रशास्त्र की] अनेक विविध उक्तियों के द्वारा हम में एक मेलयुक्त राग सुनाई देगा(1), उस परमेश्वर की स्तुति भजनों में करते हुए जिस ने सब कुछ सृजा। यदि, उदाहरण के लिये, कोई पूछे, "जगत बनाने से पहले परमेश्वर क्या कर रहा था?" हम उत्तर देते हैं कि ऐसे प्रश्न का उत्तर परमेश्वर ही के पास है। क्योंकि यह जगत परमेश्वर द्वारा सिद्ध(2) रचा गया, समय में आरम्भ पाकर, यह पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है; पर कोई पवित्रशास्त्र हमें नहीं बताता कि इस घटना से पहले परमेश्वर किस काम में लगा था। इसलिये उस प्रश्न का उत्तर परमेश्वर के पास रहता है, और हमारे लिये उचित नहीं(3) कि मूर्ख, उतावली, और निन्दापूर्ण कल्पनाओं को [उस के उत्तर में] आगे लाने का यत्न करें; ताकि, कोई यह कल्पना करके कि उस ने पदार्थ का मूल पा लिया है, वास्तव में उस परमेश्वर ही को अलग कर दे जिस ने सब कुछ बनाया।
4. क्योंकि विचार करो, तुम सब जो ऐसी रायें गढ़ते हो, क्योंकि पिता ही अकेला परमेश्वर कहलाता है, जिस का वास्तविक अस्तित्व है, पर जिसे तुम डेमियुर्ज कहते हो; क्योंकि, इसके अतिरिक्त, पवित्रशास्त्र उसी को अकेला परमेश्वर मानता है; और फिर, क्योंकि प्रभु उसी को अकेला अपना पिता मानता है, और किसी और को नहीं जानता, जैसा मैं उसके शब्दों ही से दिखाऊँगा,--जब तुम इसी सत्ता को न्यूनता का फल, और अज्ञान की सन्तान कहते हो, और उसे उन बातों से अनजान वर्णन करते हो जो उस से ऊपर हैं, और उसके विषय में तुम जो और नाना आरोप लगाते हो,--उस भयानक निन्दा पर विचार करो [जिस के तुम इस प्रकार दोषी हो] जो सचमुच परमेश्वर है उसके विरुद्ध। तुम गम्भीरता और ईमानदारी से काफी कहते दिखते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो; पर तब, क्योंकि तुम किसी और परमेश्वर को प्रकट करने में बिलकुल असमर्थ हो, तुम इसी सत्ता को, जिस पर विश्वास करने का दावा करते हो, न्यूनता का फल और अज्ञान की सन्तान घोषित करते हो। अब यह अन्धापन और मूर्ख बात इस तथ्य से तुम तक बहती है, कि तुम परमेश्वर के लिये कुछ नहीं रखते, पर तुम परमेश्वर ही की, उसकी एनोइया की, उसके लोगोस की, और जीवन की, और मसीह की उत्पत्ति और उत्पत्ति दोनों को प्रचार करना चाहते हो; और तुम इन की कल्पना केवल मानवीय अनुभव के अतिरिक्त और कहीं से नहीं बनाते; न समझते हुए, जैसा मैं ने पहले कहा, कि मनुष्य के विषय में, जो एक संयुक्त प्राणी है, मनुष्य के मन और मनुष्य के विचार के विषय में इस प्रकार बोलना सम्भव है; और कहना कि विचार (एनोइया) मन (सेन्सस) से निकलता है, अभिप्राय (एन्थ्यूमेसिस) फिर विचार से, और शब्द (लोगोस) अभिप्राय से (पर कौन सा लोगोस?(4) क्योंकि यूनानियों में एक लोगोस है जो सोचने वाला सिद्धान्त है, और दूसरा जो वह साधन है जिस से विचार व्यक्त होता है); और [कहना] कि मनुष्य कभी विश्राम में और मौन रहता है, और कभी बोलता है और क्रियाशील होता है।
पर क्योंकि परमेश्वर(5) सब मन, सब बुद्धि, सब क्रियाशील आत्मा, सब प्रकाश है, और सदा एक और वही अस्तित्व रखता है, जैसा हमारे लिये परमेश्वर के विषय में सोचना लाभदायक है, और जैसा हम पवित्रशास्त्र से उसके विषय में सीखते हैं, ऐसे भाव और [कार्य के] विभाग उचित रीति से उस पर नहीं डाले जा सकते। क्योंकि हमारी जीभ, मांसल होने के कारण, मानवीय मन की तीव्रता की सेवा के लिये पर्याप्त नहीं, क्योंकि वह आत्मिक स्वभाव का है, इस कारण हमारा शब्द हमारे भीतर रोका रहता है(6), और मन ने जैसी धारणा की वैसा तुरन्त व्यक्त नहीं होता, पर क्रमशः प्रयत्नों से बोला जाता है, जैसा जीभ उसकी सेवा कर सकती है।
5. पर परमेश्वर सब मन, और सब लोगोस होकर, ठीक वही बोलता है जो वह सोचता है, और ठीक वही सोचता है जो वह बोलता है। क्योंकि उसका विचार लोगोस है, और लोगोस मन है, और सब कुछ ग्रहण करने वाला मन पिता ही है। इसलिये, जो परमेश्वर के मन की बात करता है, और उसे अपना अलग मूल देता है, उसे संयुक्त सत्ता घोषित करता है, मानो परमेश्वर एक वस्तु हो, और मूल मन दूसरी। फिर, लोगोस के विषय में भी, जब कोई उसे पिता से उत्पत्ति के तीसरे(7) स्थान पर रखता है; जिस कल्पना पर वह उसकी महानता से अनजान है; और इस प्रकार लोगोस परमेश्वर से बहुत दूर अलग कर दिया गया है। भविष्यद्वक्ता के विषय में, वह उसके विषय में घोषणा करता है, "उसकी उत्पत्ति का वर्णन कौन करेगा?"(8) पर तुम पिता से उसकी उत्पत्ति प्रदर्शित करने का ढोंग करते हो, और मनुष्यों के शब्द की उस उत्पत्ति को, जो जीभ के द्वारा होती है, परमेश्वर के वचन पर लगाते हो, और इस प्रकार अपने ही द्वारा धर्म से उघाड़े जाते हो
अपने आप को, न मानवीय बातें जाननेवाले और न ईश्वरीय।
6. पर, विवेक से परे [अपनी ही बुद्धि से] फूले हुए, तुम ढिठाई से मानते हो कि तुम परमेश्वर के अकथनीय भेदों से परिचित हो; जब कि प्रभु भी, परमेश्वर का पुत्र ही, मान गया कि न्याय का वही दिन और घड़ी केवल पिता जानता है, जब वह स्पष्ट घोषित करता है, "पर उस दिन और उस घड़ी को कोई नहीं जानता, न पुत्र, केवल पिता।"(1) यदि, तब, पुत्र को उस दिन का ज्ञान केवल पिता को देने में लज्जा न हुई, पर उस ने विषय के विषय में जो सत्य था वह घोषित किया, तो हम भी उन बड़े प्रश्नों को परमेश्वर के लिये रखने में लज्जित न हों जो हमें सूझें। क्योंकि कोई मनुष्य अपने स्वामी से श्रेष्ठ नहीं।(2) इसलिये यदि कोई हम से कहे, "तो पुत्र पिता से कैसे उत्पन्न हुआ?" हम उसे उत्तर देते हैं, कि कोई मनुष्य उस उत्पत्ति, या जन्म, या बुलाहट, या प्रकाशन, या जिस नाम से कोई उसकी उत्पत्ति का वर्णन करे, को नहीं समझता, जो वास्तव में पूरी रीति से अवर्णनीय है। न वैलेन्तीनुस, न मार्कियोन, न सैटर्निनुस, न बेसिलिडेस, न दूत, न प्रधानदूत, न प्रधानताएँ, न सामर्थ्य [यह ज्ञान रखते हैं], पर केवल पिता जिस ने जन्म दिया, और पुत्र जो जन्मा। इसलिये क्योंकि उसकी उत्पत्ति अकथनीय है, जो पीढ़ियाँ और उत्पत्तियाँ प्रदर्शित करने का यत्न करते हैं वे अपनी सही बुद्धि में नहीं हो सकते, क्योंकि वे अवर्णनीय बातों का वर्णन करने का भार उठाते हैं। क्योंकि विचार और मन की आज्ञा पर एक शब्द बोला जाता है, यह सब मनुष्य सचमुच भली भाँति समझते हैं।
इसलिये, जिन्होंने उत्सर्जनों [के सिद्धान्त] को सोच निकाला है, उन्होंने कुछ बड़ा नहीं खोजा, और न कोई गूढ़ भेद प्रकट किया, जब उन्होंने वह जो सब समझते हैं केवल परमेश्वर के एकलौते वचन पर लगा दिया; और जब कि वे उसे अकथनीय और नामरहित कहते हैं, तो भी वे उसकी पहली उत्पत्ति की उत्पत्ति और रचना प्रदर्शित करते हैं, मानो उन्होंने स्वयं उसके जन्म पर सहायता की हो, इस प्रकार उसे उत्सर्जनों से बने मनुष्यजाति के शब्द के समान बनाते हुए।
7. पर हम गलत न होंगे यदि पदार्थ के सार के विषय में भी यही बात कहें, कि परमेश्वर ने उसे उत्पन्न किया। क्योंकि हम ने पवित्रशास्त्र से सीखा है कि परमेश्वर सब बातों पर प्रभुता रखता है। पर वह उसे कहाँ से या किस प्रकार उत्पन्न किया, न पवित्रशास्त्र ने कहीं घोषित किया है; और न हमारे लिये अनुमान लगाना शोभा देता है, ताकि अपनी ही रायों के अनुसार परमेश्वर के विषय में अन्तहीन अनुमान बनाएँ, पर ऐसा ज्ञान हमें परमेश्वर ही के हाथों में छोड़ना चाहिए। उसी प्रकार, हमें यह कारण भी छोड़ना है कि, जब सब वस्तुएँ परमेश्वर द्वारा बनाई गईं, तब उसकी सृष्टि में से कुछ ने पाप किया और परमेश्वर की अधीनता की दशा से बलवा किया, और औरों ने, सचमुच महान बहुमत ने, दृढ़ता की, और अभी भी दृढ़ता करते हैं, अपने रचनेवाले की [इच्छापूर्ण] अधीनता में, और यह भी कि जिन्होंने पाप किया वे किस स्वभाव के हैं, और जो दृढ़ रहते हैं वे किस स्वभाव के हैं,--[इन बातों का कारण, मैं कहता हूँ, छोड़ना है] परमेश्वर और उसके वचन पर, जिस से केवल उस ने कहा, "मेरे दाहिने हाथ बैठ, जब तक मैं तेरे शत्रुओं को तेरा पावदान न बनाऊँ।"(3) पर हम, अभी पृथ्वी पर रहते हैं, और अभी उसके सिंहासन पर नहीं बैठे। क्योंकि यद्यपि उस में जो उद्धारकर्ता की आत्मा है "सब बातें जाँचती है, वरन् परमेश्वर की गहरी बातें भी,"(4) तो भी हमारे विषय में "वरदानों की विविधताएँ, सेवाओं के भेद, और कार्यों की विविधताएँ हैं;"(5) और हम, पृथ्वी पर रहते हुए, जैसा पौलुस भी घोषित करता है, "अंश में जानते हैं, और अंश में भविष्यद्वाणी करते हैं।"(6) इसलिये, क्योंकि हम केवल अंश में जानते हैं, हमें हर प्रकार के [कठिन] प्रश्न उसके हाथों में छोड़ने चाहिए जो कुछ मात्रा में, [और केवल वही,] हम पर अनुग्रह देता है। वह अनन्त आग, [उदाहरण के लिये,] पापियों के लिये तैयार की गई है, यह प्रभु ने स्पष्ट घोषित किया है, और शेष पवित्रशास्त्र दिखाता है।
और यह कि परमेश्वर ने पहले से जान लिया था कि यह होगा, पवित्रशास्त्र उसी प्रकार दिखाता है, क्योंकि उस ने आरम्भ से अनन्त आग उन के लिये तैयार की जो [पीछे] [उसकी आज्ञाओं का] उल्लंघन करनेवाले थे; पर ऐसे उल्लंघन करनेवालों के स्वभाव का कारण ही न किसी पवित्रशास्त्र ने हमें बताया है, न किसी प्रेरित ने हमें कहा है, न प्रभु ने हमें सिखाया है। इसलिये, इस बात का ज्ञान परमेश्वर पर छोड़ना हमें शोभा देता है, जैसा प्रभु [न्याय के] दिन और घड़ी का करता है, और संकट के ऐसे छोर पर न दौड़ना, कि हम परमेश्वर के हाथों में कुछ न छोड़ें, यद्यपि हम ने [इस जगत में उस से] अनुग्रह की केवल एक मात्रा पाई है। पर जब हम उन बातों की जाँच करते हैं जो हम से ऊपर हैं, और जिन के विषय में हम सन्तोष तक नहीं पहुँच सकते, [असंगत है(7)] कि हम ढिठाई का ऐसा छोर दिखाएँ कि परमेश्वर को, और जो बातें अभी नहीं खोजी गईं,(8) खोल दें, मानो उत्सर्जनों की व्यर्थ बात से हम पहले ही पा चुके हों, सब वस्तुओं के सृष्टिकर्ता परमेश्वर ही को, और यह ठहराएँ कि उस ने अपना सार धर्मत्याग और अज्ञान से पाया, ताकि परमेश्वर के विरोध में एक अभक्त कल्पना गढ़ें।
8. इसके अतिरिक्त, उनके पास अपनी पद्धति का कोई प्रमाण नहीं, जो उनके द्वारा हाल ही में गढ़ी गई है, कभी कुछ संख्याओं पर टिकती हुई, कभी अक्षरखण्डों पर, और कभी, फिर, नामों पर; और अवसर भी हैं, जब,
उन अक्षरों के द्वारा जो अक्षरों में समाए हैं, ठीक न समझे गए दृष्टान्तों के द्वारा, या कुछ [निराधार] अनुमानों के द्वारा, वे उस कल्पित कथा को स्थिर करने का यत्न करते हैं जिसे उन्होंने गढ़ा है। क्योंकि यदि कोई यह कारण पूछे कि पिता, जो पुत्र के साथ सब बातों में सहभागी है, [न्याय की] घड़ी और दिन को जाननेवाला केवल प्रभु द्वारा क्यों घोषित किया गया, तो वह इस समय इस से अधिक उचित, या शोभनीय, या सुरक्षित कारण नहीं पाएगा (क्योंकि, सचमुच, प्रभु ही एकमात्र सच्चा स्वामी है), कि हम उसके द्वारा सीखें कि पिता सब बातों से ऊपर है। क्योंकि "पिता," वह कहता है, "मुझ से बड़ा है।"(1) इसलिये, ज्ञान के विषय में पिता बढ़कर है, यह हमारे प्रभु द्वारा घोषित किया गया है; इस कारण, कि हम भी, जब तक इस जगत की वस्तुओं की योजना से जुड़े हैं, सिद्ध ज्ञान, और [जो कही गई हैं] ऐसे प्रश्न, परमेश्वर पर छोड़ दें, और किसी संयोग से, पिता के उच्च स्वभाव की जाँच चाहते हुए, इस प्रश्न को उठाने के संकट में न पड़ें कि क्या परमेश्वर से ऊपर दूसरा परमेश्वर है।(2)
9. पर यदि कोई झगड़े का प्रेमी मेरी कही बात का, और प्रेरित की पुष्टि का भी, विरोध करे, कि "हम अंश में जानते हैं, और अंश में भविष्यद्वाणी करते हैं,"(3) और कल्पना करे कि उस ने जो है उस सब का आंशिक नहीं, पर सार्वत्रिक ज्ञान पा लिया है,--ऐसा एक होकर जैसा वैलेन्तीनुस, या टॉलेमेयुस, या बेसिलिडेस, या उन में से कोई और जो मानते हैं कि उन्होंने परमेश्वर की गहरी(4) बातें खोज ली हैं,--वह (व्यर्थ महिमा पहनकर) यह डींग न मारे कि उन बातों के विषय में जो अदृश्य हैं, या हमारे अवलोकन के अधीन नहीं रखी जा सकतीं, उस ने औरों से बड़ा ज्ञान पा लिया है; पर वह, यत्न से जाँच करके, और पिता से सूचना पाकर, उन बातों के कारण (जो हम नहीं जानते) हमें बताए जो इस जगत में हैं,--जैसे, उसके अपने सिर पर बालों की संख्या, और गौरैयाएँ जो दिन प्रतिदिन पकड़ी जाती हैं, और ऐसी और बातें जिन से हम पहले परिचित नहीं,--ताकि अधिक महत्वपूर्ण बातों के विषय में भी हम उसे विश्वास दें। पर यदि जो सिद्ध हैं वे उन बातों को भी अभी नहीं समझते जो उनके हाथों में, और उनके पाँवों पर, और उनकी आँखों के आगे, और पृथ्वी पर हैं, और विशेष कर उनके सिर के बालों के विषय में अपनाया गया नियम, तो आत्मिक बातों, और अति-स्वर्गीय बातों,(5) और उन बातों के विषय में जिन्हें वे व्यर्थ भरोसे से परमेश्वर से ऊपर बताते हैं, हम उन्हें कैसे विश्वास करें? इतना, तब, मैं ने संख्याओं, और नामों, और अक्षरखण्डों, और ऐसी बातों के प्रश्नों के विषय में कहा है जो हमारी समझ से ऊपर हैं, और दृष्टान्तों की उनकी अनुचित व्याख्याओं के विषय में: [इन बातों पर मैं और नहीं जोड़ता,] क्योंकि तू स्वयं उन्हें बढ़ा सकता है।
अध्याय उनतीस.--प्राण और देह की भावी गति के विषय में मिथ्याशिक्षकों की रायों का खण्डन।
1. तथापि, हम उनकी पद्धति के शेष बिन्दुओं पर लौटें। क्योंकि जब वे घोषित करते हैं(6) कि, सब बातों की समाप्ति पर, उनकी माता प्लेरोमा में फिर प्रवेश करेगी, और उद्धारकर्ता को अपना सहचारी पाएगी; कि वे स्वयं, आत्मिक होने के कारण, जब वे अपने प्राणमय प्राणों से छुटकारा पाएँगे, और बौद्धिक आत्माएँ बनेंगे, आत्मिक दूतों के सहचारी होंगे; पर डेमियुर्ज, क्योंकि वे उसे प्राणमय कहते हैं, माता के स्थान में जाएगा; कि धर्मियों के प्राण मध्य स्थान में प्राणमय रीति से विश्राम करेंगे;--जब वे घोषित करते हैं कि समान समान के पास इकट्ठा होगा, आत्मिक बातें आत्मिक बातों के पास, जब कि भौतिक बातें भौतिक बातों के बीच बनी रहेंगी, वे वास्तव में अपने आप का विरोध करते हैं, क्योंकि वे अब नहीं मानते कि प्राण अपने स्वभाव के कारण मध्य स्थान में उन द्रव्यों के पास जाते हैं जो उनके समान हैं, पर [कि वे ऐसा करते हैं] [देह में] किए गए कामों के कारण, क्योंकि वे दृढ़ करते हैं कि धर्मियों के प्राण [उस निवास में] जाते हैं, पर अभक्तों के प्राण आग में बने रहते हैं। क्योंकि यदि उनके स्वभाव के कारण सब प्राण भोग के स्थान तक पहुँचते हैं,(7) और सब केवल इसलिये मध्य स्थान के हैं कि वे प्राण हैं, इस प्रकार उसके साथ एक ही स्वभाव के होने के कारण, तो निकलता है कि विश्वास बिलकुल व्यर्थ है, जैसा उद्धारकर्ता का [इस जगत में] अवतरण(8) भी था। दूसरी ओर, यदि उनकी धार्मिकता के कारण [वे ऐसे विश्राम के स्थान तक पहुँचते हैं], तो यह अब इसलिये नहीं कि वे प्राण हैं पर इसलिये कि वे धर्मी हैं।
पर यदि प्राण नष्ट हो जाते(9) जब तक वे धर्मी न होते, तो धार्मिकता में देहों को भी बचाने की सामर्थ्य होनी चाहिए [जिन में ये प्राण रहे]; क्योंकि वह उन्हें क्यों न बचाए, क्योंकि वे भी धार्मिकता में सहभागी हुए? क्योंकि यदि स्वभाव और द्रव्य उद्धार के साधन हैं, तो सब प्राण बचाए जाएँगे; पर यदि धार्मिकता और विश्वास, तो ये उन देहों को क्यों न बचाएँ जो, प्राणों के समान ही, भीतर प्रवेश करेंगी(10)
अमरत्व में? क्योंकि इस प्रकार की बातों में धार्मिकता या तो निर्बल या अन्यायपूर्ण दिखाई देगी, यदि वह उस में सहभागिता के द्वारा कुछ द्रव्यों को बचाए, पर औरों को नहीं।
2. क्योंकि प्रकट है कि जो काम धर्मी गिने जाते हैं वे देहों में किए जाते हैं। इसलिये, या तो सब प्राण अवश्य मध्य स्थान में जाएँगे, और कभी न्याय नहीं होगा; या वे देह भी, जिन्होंने धार्मिकता में भाग लिया, भोग के स्थान तक पहुँचेंगी, उन प्राणों के साथ जिन्होंने उसी प्रकार भाग लिया, यदि सचमुच धार्मिकता उन द्रव्यों को वहाँ लाने के लिये पर्याप्त सामर्थी है जिन्होंने उस में भाग लिया। और तब देहों के पुनरुत्थान के विषय की शिक्षा जिस पर हम विश्वास करते हैं, [उनकी पद्धति से] सत्य और निश्चित निकल आएगी; क्योंकि, [जैसा हम मानते हैं,] परमेश्वर, जब वह हमारी मर्त्य देहों को जिलाएगा जिन्होंने धार्मिकता रखी, उन्हें अविनाशी और अमर बनाएगा। क्योंकि परमेश्वर स्वभाव से श्रेष्ठ है, और अपने में [कृपा दिखाने का] स्वभाव रखता है, क्योंकि वह भला है; और ऐसा करने की सामर्थ्य, क्योंकि वह शक्तिमान है; और अपने उद्देश्य को पूरी रीति से पूरा करने की शक्ति, क्योंकि वह धनी और सिद्ध है।
3. पर ये मनुष्य सब बातों में अपने आप से असंगत हैं, जब वे निश्चय करते हैं कि सब प्राण मध्य स्थान में प्रवेश नहीं करते, पर केवल धर्मियों के। क्योंकि वे मानते हैं कि, स्वभाव और द्रव्य के अनुसार, माता द्वारा तीन प्रकार [के प्राणी] उत्पन्न हुए: पहला, जो उलझन, और थकावट, और भय से निकला--अर्थात् भौतिक द्रव्य; दूसरा वेग(1) से--अर्थात् प्राणमय द्रव्य; पर जिसे वह उन दूतों के दर्शन के बाद उत्पन्न करती है जो मसीह की सेवा में रहते हैं, वह आत्मिक द्रव्य है। यदि, तब, वह द्रव्य(2) जिसे वह उत्पन्न करती है हर प्रकार से प्लेरोमा में प्रवेश करेगा क्योंकि वह आत्मिक है, जब कि जो भौतिक है वह नीचे रहेगा क्योंकि वह भौतिक है, और उस आग से पूरी रीति से भस्म हो जाएगा जो उस में bums है, तो सारा प्राणमय द्रव्य मध्य स्थान में क्यों न जाए, जिस में वे डेमियुर्ज को भी भेजते हैं? पर वह क्या है जो उनके प्लेरोमा के भीतर प्रवेश करेगा? क्योंकि वे मानते हैं कि प्राण मध्य स्थान में बने रहेंगे, जब कि देहें, क्योंकि वे भौतिक द्रव्य रखती हैं, जब वे पदार्थ में गल जाएँगी, उस आग से भस्म होंगी जो उस में है; पर उनकी देह इस प्रकार नष्ट होकर, और उनका प्राण मध्य स्थान में रहकर, मनुष्य का कोई भाग अब प्लेरोमा के भीतर प्रवेश करने के लिये नहीं बचेगा। क्योंकि मनुष्य की बुद्धि--उसका मन, विचार, मानसिक अभिप्राय, और ऐसी बातें--उसके प्राण के अतिरिक्त और कुछ नहीं; पर प्राण के भाव और कार्य स्वयं प्राण से अलग कोई द्रव्य नहीं रखते। तब उन में से कौन सा भाग अभी प्लेरोमा में प्रवेश करने के लिये रहेगा? क्योंकि वे स्वयं, जहाँ तक वे प्राण हैं, मध्य स्थान में रहते हैं; जब कि, जहाँ तक वे देह हैं, शेष पदार्थ के साथ भस्म हो जाएँगे।
अध्याय तीस.--उनका अपने आप को आत्मिक कहना असंगत है, जब कि डेमियुर्ज प्राणमय घोषित किया जाता है।
1. बात की दशा ऐसी होने पर, ये मूढ़ मनुष्य घोषित करते हैं कि वे सृष्टिकर्ता (डेमियुर्ज) से ऊपर उठते हैं; और, क्योंकि वे अपने आप को उस परमेश्वर से श्रेष्ठ प्रचार करते हैं जिस ने आकाशों को, और पृथ्वी को, और उन में की सब वस्तुओं को बनाया और सजाया, और मानते हैं कि वे स्वयं आत्मिक हैं, जब कि वे इतनी बड़ी अभक्ति के कारण वास्तव में लज्जा से मांसल हैं,--यह दृढ़ करते हुए कि वह, जिस ने अपने दूतों को(3) आत्माएँ बनाया है, और प्रकाश को वस्त्र के समान पहिना है, और पृथ्वी के वृत्त को,(4) मानो, अपने हाथ में रखता है, जिस की दृष्टि में उसके निवासी टिड्डियों के समान गिने जाते हैं, और जो सब आत्मिक द्रव्य का सृष्टिकर्ता और प्रभु है, प्राणमय स्वभाव का है,--वे निःसंदेह और सचमुच अपना ही उन्माद प्रकट करते हैं; और, मानो सचमुच वज्र से मारे गए हों, उन दानवों से भी अधिक जिन की [अन्यजाति] कथाओं में बात है, वे परमेश्वर के विरुद्ध अपनी रायें उठाते हैं, व्यर्थ ढिठाई और अस्थिर महिमा से फूले हुए,--ऐसे मनुष्य जिन के शुद्धिकरण के लिये पृथ्वी पर का सारा हेलेबोर(5) पर्याप्त न होगा, कि वे अपनी तीव्र मूर्खता से छुटकारा पाएँ।
2. श्रेष्ठ व्यक्ति अपने कामों से प्रमाणित होना है। तो किस प्रकार वे अपने आप को सृष्टिकर्ता से श्रेष्ठ दिखा सकते हैं (कि मैं भी, हाथ के तर्क की आवश्यकता के द्वारा, उनकी अभक्ति के स्तर तक उतरूँ, परमेश्वर और मूर्ख मनुष्यों के बीच तुलना करते हुए, और उनके तर्क पर उतरकर, उनकी ही शिक्षाओं से उन्हें बार बार खण्डित करूँ; पर ऐसा करते हुए परमेश्वर मुझ पर दयालु हो, क्योंकि मैं इन कथनों पर साहस करता हूँ, उसे उन से तुलना करने की दृष्टि से नहीं, पर उनकी उन्मत्त रायों को दोषी ठहराकर गिरा देने की दृष्टि से)--वे, जिन की इतनी बड़ी प्रशंसा अनेक मूर्ख व्यक्ति करते हैं, मानो, सचमुच, वे उन से सत्य ही से अधिक मूल्यवान कुछ सीख सकते हों! पवित्रशास्त्र की वह उक्ति, "ढूँढ़ो, तो पाओगे,"(6) वे इस दृष्टि से कही हुई समझते हैं, कि वे अपने आप को सृष्टिकर्ता से ऊपर पाएँ, अपने आप को परमेश्वर से बड़ा और अच्छा कहते हुए, और अपने आप को आत्मिक, पर सृष्टिकर्ता को प्राणमय कहते हुए; और [दृढ़ करते हुए] कि इस कारण वे परमेश्वर से ऊपर चढ़ते हैं, इसलिये कि
वे प्लेरोमा के भीतर प्रवेश करते हैं, जब कि वह मध्य स्थान में रहता है। तो वे अपने कामों से अपने आप को सृष्टिकर्ता से श्रेष्ठ प्रमाणित करें; क्योंकि श्रेष्ठ व्यक्ति कही हुई बात से नहीं, पर जिस का वास्तविक अस्तित्व है उस से प्रमाणित होना चाहिए।
3. तो वे कौन सा काम, हमारे चारों ओर के सब के नियन्ता द्वारा उत्पन्न किए गए कामों से, अपने द्वारा उद्धारकर्ता के द्वारा या अपनी माता द्वारा पूरा हुआ बताएँगे, जो बड़ा, या अधिक महिमामय, या बुद्धि से अधिक सजा हुआ हो? उन्होंने कौन से आकाश स्थापित किए हैं? कौन सी पृथ्वी डाली है? कौन से तारे अस्तित्व में बुलाए हैं? या आकाश की कौन सी ज्योतियाँ उन्होंने चमकाई हैं? फिर किन वृत्तों में उन्होंने उन्हें बाँधा है? या, ऋतु के योग्य, और हर विशेष जलवायु के योग्य, कौन सी वर्षा, या पाला, या हिम, उन्होंने पृथ्वी पर लाए हैं? और फिर, इन के विरोध में, कौन सी गर्मी या सूखा उन्होंने उनके सामने रखा है? या, कौन सी नदियाँ उन्होंने बहाई हैं? कौन से सोते निकाले हैं? किन फूलों और वृक्षों से उन्होंने इस चन्द्र के नीचे के जगत को सजाया है? या, जानवरों की कौन सी भीड़ उन्होंने बनाई है, कुछ विवेकी, और और तर्कहीन, पर सब सौन्दर्य से सजे हुए? और कौन एक एक कर उन शेष वस्तुओं को गिन सकता है जो परमेश्वर की सामर्थ्य से ठहराई गई हैं, और उसकी बुद्धि से चलाई जाती हैं? या कौन उस परमेश्वर की महानता खोज सकता है जिस ने उन्हें बनाया? और उन अस्तित्वों के विषय में क्या कहा जा सकता है जो आकाश से ऊपर हैं, और जो मिटते नहीं, जैसे दूत, प्रधानदूत, सिंहासन, प्रभुताएँ, और अगणित सामर्थ्य? तो इन कामों में से किस एक के विरुद्ध वे अपने आप को खड़ा करते हैं? उनके पास दिखाने के लिये क्या समान है, जो अपने द्वारा, या अपने से, बनाया गया हो, क्योंकि वे भी इस [सृष्टिकर्ता] की कारीगरी और सृष्टि हैं?
क्योंकि चाहे उद्धारकर्ता ने या उनकी माता ने (उनकी अपनी बातें काम में लाने के लिये, उन्हीं शब्दों के द्वारा उन्हें झूठा प्रमाणित करते हुए जिन्हें वे स्वयं काम में लाते हैं) इस सत्ता को, जैसा वे मानते हैं, उन बातों की प्रतिमा बनाने के लिये काम में लाया जो प्लेरोमा के भीतर हैं, और उन सब प्राणियों की जिन को उसने उद्धारकर्ता की सेवा करते देखा, उस ने उसे (डेमियुर्ज) अपने से [एक अर्थ में] श्रेष्ठ, और उसके साधन के द्वारा अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिये अधिक योग्य होकर काम में लाया; क्योंकि वह ऐसी महत्वपूर्ण सत्ताओं की प्रतिमाएँ किसी निकृष्ट के द्वारा किसी प्रकार न बनाती, पर एक श्रेष्ठ कर्ता के द्वारा।
4. क्योंकि, [ध्यान दिया जाए,] वे स्वयं, अपनी ही घोषणाओं के अनुसार, तब अस्तित्व में थे, पंडोरा के चारों ओर उपग्रहों के रूप में रखे हुए उन प्राणियों के ध्यान के फलस्वरूप, एक आत्मिक धारणा के रूप में। और वे सचमुच निष्फल बने रहे, माता ने उनके साधन के द्वारा कुछ नहीं किया,(1)--एक निष्क्रिय धारणा, अपना अस्तित्व उद्धारकर्ता के ऋणी, किसी काम के योग्य नहीं, क्योंकि उनके द्वारा एक वस्तु भी की हुई नहीं दिखती। पर वह परमेश्वर जो, उनके अनुसार, उत्पन्न हुआ, जब कि, जैसा वे तर्क करते हैं, उन से निकृष्ट था (क्योंकि वे मानते हैं कि वह प्राणमय स्वभाव का है), तो भी सब बातों में क्रियाशील कर्ता था, समर्थ, और किए जाने वाले काम के योग्य, ताकि उसके द्वारा सब वस्तुओं की प्रतिमाएँ बनाई गईं; और केवल ये दृश्य वस्तुएँ ही उसके द्वारा नहीं बनीं, पर अदृश्य सब वस्तुएँ भी, दूत, प्रधानदूत, प्रभुताएँ, सामर्थ्य, और शक्तियाँ,--[उसके द्वारा, मैं कहता हूँ,] श्रेष्ठ होकर, और उसकी इच्छा की सेवा करने के योग्य। पर जान पड़ता है कि माता ने उनके साधन के द्वारा कुछ भी नहीं बनाया, जैसा वे स्वयं मानते हैं; ताकि कोई उन्हें अपनी माता की पीड़ाभरी प्रसव-वेदना से उत्पन्न गर्भपात ठीक ही गिन सके। क्योंकि किसी धाई ने उस पर अपना काम नहीं किया, इसलिये वे गर्भपात के रूप में फेंक दिए गए, किसी काम के योग्य नहीं, और माता का कोई काम पूरा करने के लिये नहीं बनाए गए। तो भी वे अपने आप को उस से श्रेष्ठ वर्णन करते हैं जिस के द्वारा इतने विशाल और आश्चर्यजनक काम पूरे और व्यवस्थित हुए हैं, यद्यपि अपने ही तर्क से वे इतने दयनीय रूप से निकृष्ट पाए जाते हैं!
5. यह ऐसा है मानो दो लोहे के औजार, या साधन, हों, जिन में से एक सदा कारीगर के हाथों में और निरन्तर उपयोग में रहता, और जिस के उपयोग से वह जो चाहता वह बनाता, और अपनी कला और निपुणता दिखाता, पर दूसरा निष्क्रिय और निष्फल पड़ा रहता, कभी कार्य में न बुलाया जाता, कारीगर उस से कुछ बनाता कभी न दिखता, और अपने किसी परिश्रम में उसका उपयोग न करता; और तब कोई माने कि यह निष्फल, और निष्क्रिय, और बेरोज़गार औजार स्वभाव और मूल्य में उस से श्रेष्ठ है जिसे कारीगर ने अपने काम में लगाया, और जिस के द्वारा उस ने अपनी कीर्ति पाई। ऐसा मनुष्य, यदि ऐसा कोई पाया जाए, ठीक ही बुद्धिहीन, और अपनी सही बुद्धि में नहीं, गिना जाएगा। और वैसे ही उनका न्याय होना चाहिए जो अपने आप को आत्मिक और श्रेष्ठ कहते हैं, और सृष्टिकर्ता को प्राणमय स्वभाव का बताते हैं, और मानते हैं कि इस कारण वे ऊपर चढ़ेंगे, और प्लेरोमा के भीतर अपने पतियों तक घुसेंगे (क्योंकि, उनकी अपनी कथनों के अनुसार, वे स्वयं स्त्रीलिंग हैं), पर कि परमेश्वर [सृष्टिकर्ता] निकृष्ट स्वभाव का है, और इसलिये मध्य स्थान में रहता है, जब कि वे इन कथनों के कोई प्रमाण आगे नहीं लाते: क्योंकि अच्छा मनुष्य अपने कामों से दिखाया जाता है, और सब काम सृष्टिकर्ता द्वारा पूरे हुए हैं; पर वे, अपने द्वारा उत्पन्न हुई दिखाने के लिये विवेक के योग्य कोई वस्तु न रखकर, हैं
सब से बड़े और सब से असाध्य उन्माद के नीचे परिश्रम कर रहे हैं।
6. यदि, तथापि, वे यह बनाए रखने का श्रम करें कि आकाश जैसी सब भौतिक वस्तुएँ, और उसके नीचे जो समस्त जगत है, निश्चय ही डेमियुर्ज द्वारा रची गई थीं, परन्तु इनसे अधिक आत्मिक स्वभाव की सब वस्तुएँ,-- अर्थात् वे जो आकाशों के ऊपर हैं, जैसे आधिपत्य, सामर्थ्य, दूत, प्रधान दूत, प्रभुता, बल,--एक आत्मिक जन्म-क्रम द्वारा उत्पन्न की गईं (जिन्हें वे अपने ही रूप में घोषित करते हैं), तब, 1 स्थान में, हम प्रामाणिक पवित्रशास्त्र(1) से सिद्ध करते हैं कि कही हुई सब वस्तुएँ, दृश्य और अदृश्य, एक ही परमेश्वर द्वारा बनाई गई हैं। क्योंकि ये मनुष्य पवित्रशास्त्र से अधिक भरोसे योग्य नहीं हैं; और हमें प्रभु, मूसा, और शेष भविष्यद्वक्ताओं की घोषणाओं को नहीं छोड़ना चाहिए, जिन्होंने सत्य का प्रचार किया, और उन्हें विश्वास नहीं देना चाहिए, जो निश्चय ही समझदार स्वभाव की कुछ भी नहीं बोलते, परन्तु अस्थिर मतों के विषय में बकते हैं। और, अगले स्थान में, यदि आकाशों के ऊपर की वे वस्तुएँ सचमुच उनके साधन द्वारा बनाई गई थीं, तो वे हमें बताएँ कि अदृश्य वस्तुओं का स्वभाव क्या है, दूतों की संख्या गिनें, प्रधान दूतों की श्रेणियाँ बताएँ, सिंहासनों के रहस्यों को प्रकट करें, और प्रभुताओं, आधिपत्यों, सामर्थ्यों, और बलों के बीच के भेद हमें सिखाएँ। परन्तु वे उनके विषय में कुछ नहीं कह सकते; इसलिए ये प्राणी उनके द्वारा नहीं बनाए गए। यदि, दूसरी ओर, ये सृष्टिकर्ता द्वारा बनाए गए, जैसा सचमुच हुआ था, और आत्मिक तथा पवित्र स्वभाव के हैं, तो इससे निकलता है कि जिसने आत्मिक प्राणियों को उत्पन्न किया वह स्वयं पशु-स्वभाव का नहीं है, और इस प्रकार उनकी भयानक निन्दा की व्यवस्था उलट जाती है।
7. क्योंकि आकाशों में आत्मिक प्राणी हैं, यह सब पवित्रशास्त्र ऊँचे शब्द से प्रचार करते हैं; और पौलुस स्पष्ट गवाही देता है कि आत्मिक बातें हैं, जब वह बताता है कि वह 3 आकाश में उठा लिया गया,(2) और फिर, कि वह परमदेश को ले जाया गया, और ऐसे अकथनीय वचन सुने जिन्हें मनुष्य के बोलना उचित नहीं। परन्तु उससे उसे क्या लाभ हुआ, चाहे परमदेश में उसका प्रवेश हो या 3 आकाश में उसका उठाया जाना, क्योंकि ये सब बातें अभी भी केवल डेमियुर्ज के अधिकार के अधीन हैं, यदि, जैसा कुछ लोग मानने का साहस करते हैं, वह उन रहस्यों का दर्शक और श्रोता बनना पहले ही से आरम्भ कर चुका था(3) जो डेमियुर्ज के ऊपर बताए जाते हैं? क्योंकि यदि यह सच है कि वह उस वस्तु-क्रम से परिचित हो रहा था जो डेमियुर्ज के ऊपर है, तो वह किसी प्रकार डेमियुर्ज के क्षेत्रों में न रहता, और ऐसा भी नहीं कि इनका भी पूरा अन्वेषण न करे (क्योंकि, उनकी बोलने की रीति के अनुसार, यदि वह डेमियुर्ज के निकट जाता, तो चार आकाश(4) अभी उसके आगे पड़े रहते, और इस प्रकार अपने नीचे पड़े हुए सब सात को वह देखता); परन्तु वह शायद बीच के स्थान में, अर्थात् माता की उपस्थिति में, प्रवेश पाता, ताकि प्लेरोमा के भीतर की बातों की शिक्षा उससे पाए। क्योंकि वह भीतरी मनुष्य जो उसमें था, और उसमें बोलता था, जैसा वे कहते हैं, अदृश्य होते हुए भी, केवल 3 आकाश तक नहीं, वरन् उनकी माता की उपस्थिति तक भी पहुँच सकता था। क्योंकि यदि वे मानते हैं कि वे स्वयं, अर्थात् उनका [भीतरी] मनुष्य, तुरन्त डेमियुर्ज के ऊपर चढ़ता है, और माता के पास चला जाता है, तो यह प्रेरित के [भीतरी] मनुष्य को और भी अधिक होकर रहना चाहिए था; क्योंकि डेमियुर्ज उसे न रोकता, जैसा वे दृढ़ता से कहते हैं, वह स्वयं पहले ही से उद्धारकर्ता के अधीन था।
परन्तु यदि वह उसे रोकने का प्रयत्न करता, तो वह प्रयत्न व्यर्थ चला जाता। क्योंकि यह सम्भव नहीं कि वह पिता के पूर्वविधान से अधिक बलवान ठहरे, और वह तब जब tuner मनुष्य डेमियुर्ज से भी अदृश्य कहा जाता है। परन्तु क्योंकि उसने (पौलुस) अपने को 3 आकाश तक उठाए जाने को एक बड़ी और श्रेष्ठ बात के रूप में वर्णित किया है, यह नहीं हो सकता कि ये मनुष्य 7 आकाश के ऊपर चढ़ें, क्योंकि वे निश्चय ही प्रेरित से श्रेष्ठ नहीं हैं। यदि वे मानते हैं कि वे उससे उत्तम हैं, तो अपने कामों से अपने को ऐसा सिद्ध करें, क्योंकि उन्होंने कभी [जो उसने अपने साथ घटित होने के रूप में वर्णित किया है उसके] समान किसी बात का ढोंग नहीं किया। और इस कारण उसने जोड़ा, "शरीर में हो, या शरीर से बाहर हो, परमेश्वर जानता है,"(5) ताकि शरीर उस दर्शन का भागी न समझा जाए,(6) मानो वह उन बातों में सम्मिलित हो सकता था जिन्हें उसने देखा और सुना था; और न, फिर, कोई यह कहे कि शरीर के भार के कारण वह और ऊपर नहीं ले जाया गया; परन्तु इसलिए शरीर के बिना भी यहाँ तक अनुमति है, उन आत्मिक रहस्यों को देखने की, जो उस परमेश्वर की क्रियाएँ हैं जिसने आकाश और पृथ्वी बनाए, और मनुष्य को रचा, और उसे परमदेश में रखा, ताकि उनके दर्शक वे हों जो, प्रेरित के समान, परमेश्वर के प्रेम में सिद्धता की ऊँची अवस्था तक पहुँचे हैं।
8. इसलिए इस सत्ता ने आत्मिक बातें भी बनाईं, जिनमें से, 3 आकाश तक, प्रेरित दर्शक बनाया गया, और सुना un-
बोलने योग्य वचन, क्योंकि वे आत्मिक हैं, जिन्हें मनुष्य के बोलना सम्भव नहीं; और वह स्वयं, जैसा झुकाव उसे प्रेरित करता है, योग्य लोगों पर [दान] देता है, क्योंकि परमदेश उसका है; और वह सचमुच परमेश्वर का आत्मा है, पशु डेमियुर्ज नहीं, नहीं तो वह आत्मिक बातें कभी न रचता। परन्तु यदि वह सचमुच पशु-स्वभाव का है, तो वे हमें बताएँ कि आत्मिक बातें किसके द्वारा बनाई गईं। उनके पास कोई प्रमाण नहीं जिसे वे दे सकें friar यह उनकी माता की प्रसव-वेदना के द्वारा किया गया, जिन्हें वे अपने ही रूप में घोषित करते हैं। क्योंकि, आत्मिक बातों की बात छोड़ें, ये मनुष्य एक मक्खी, या एक मच्छर, या और कोई छोटा और तुच्छ जीव भी नहीं रच सकते, उस नियम को देखे बिना जिसके द्वारा आदि से जीव परमेश्वर के द्वारा स्वाभाविक रूप से रहे हैं और उत्पन्न किए जाते हैं--एक ही जाति वालों में बीज रखे जाने के द्वारा। और माता अकेली से कुछ भी नहीं रचा गया; [क्योंकि] वे कहते हैं कि यह डेमियुर्ज उसके द्वारा उत्पन्न किया गया, और वह सारी सृष्टि का प्रभु (कर्ता) था। और वे मानते हैं कि जो रची हुई सब वस्तुओं का सृष्टिकर्ता और प्रभु है वह पशु-स्वभाव का है, जब वे दृढ़ता से कहते हैं कि वे स्वयं आत्मिक हैं,--वे जो किसी एक काम के न कर्ता हैं और न प्रभु, केवल उन बातों के नहीं जो उनसे बाहर हैं, वरन् अपने ही शरीरों के भी नहीं! और फिर, ये मनुष्य, जो अपने को आत्मिक कहते हैं, और सृष्टिकर्ता से श्रेष्ठ, अपनी इच्छा के विरुद्ध बहुत बार देह की पीड़ा सहते हैं।
9. इसलिए न्याय के साथ हम उन्हें दोषी ठहराते हैं कि वे सत्य से दूर और व्यापक रूप से हट गए हैं। क्योंकि यदि उद्धारकर्ता ने बनाई हुई वस्तुओं को उसके (डेमियुर्ज) द्वारा रचा, तो उस दशा में वह उनसे निकृष्ट नहीं वरन् श्रेष्ठ सिद्ध होता है, क्योंकि वह उनके भी रचयिता पाया जाता है; क्योंकि उनका भी स्थान रची हुई वस्तुओं में है। तो फिर कैसे तर्क किया जा सकता है कि ये मनुष्य तो आत्मिक हैं, परन्तु जिसके द्वारा वे रचे गए वह पशु-स्वभाव का है? या, फिर, यदि (जो निश्चय ही एकमात्र सत्य कल्पना है, जैसा मैंने अत्यन्त स्पष्ट स्वभाव के अनेक तर्कों से दिखाया है) उसने (सृष्टिकर्ता) सब कुछ स्वतन्त्रता से, और अपनी ही सामर्थ्य से, बनाया, और उन्हें व्यवस्थित किया और पूरा किया, और उसकी इच्छा सब वस्तुओं का द्रव्य(2) है, तो वह एकमात्र परमेश्वर पाया जाता है जिसने सब कुछ रचा, जो अकेला सर्वशक्तिमान है, और जो अकेला पिता है, दृश्य और अदृश्य, ऐसी जो हमारी इन्द्रियों से ग्रहण हो सकती हैं और ऐसी जो नहीं हो सकतीं, स्वर्गीय और पार्थिव, सब वस्तुओं को rounding करते और रचते हुए, "अपने सामर्थ्य के वचन से;"(3) और उसने अपनी बुद्धि से सब वस्तुओं को ठीक किया और व्यवस्थित किया, जब वह सब वस्तुओं को धारण करता है, परन्तु उसे कोई धारण नहीं कर सकता: वह रचयिता है, वह निर्माता है, वह खोजनेवाला है, वह सृष्टिकर्ता है, वह सब का प्रभु है; और उसके सिवा कोई नहीं, या उसके ऊपर कोई नहीं, न उसकी कोई माता है, जैसा वे झूठ से उसके विषय में लगाते हैं; न 2 परमेश्वर है, जैसा मार्सियोन ने कल्पना की है; न तीस एओनों का प्लेरोमा है, जो व्यर्थ कल्पना सिद्ध हो चुकी है; न बूथोस या प्रोआर्के जैसा कोई प्राणी है; न आकाशों की कोई शृंखला है; न कुँवारी ज्योति है,(4) न नाम न रखने योग्य एओन है, और निश्चय ही, उन बातों में से कोई भी नहीं है जिनका इनके द्वारा, और सब मिथ्या शिक्षकों द्वारा, पागलपन से स्वप्न देखा जाता है।
परन्तु एक ही परमेश्वर है, सृष्टिकर्ता--वह जो हर आधिपत्य, और सामर्थ्य, और प्रभुता, और बल के ऊपर है: वह पिता है, वह परमेश्वर है, वह संस्थापक है, वह बनानेवाला है, वह सृष्टिकर्ता है, जिसने उन वस्तुओं को अपने आप से बनाया, अर्थात् अपने वचन के द्वारा और अपनी बुद्धि के द्वारा--आकाश और पृथ्वी, और समुद्र, और जो कुछ उनमें है: वह न्यायी है; वह भला है; वही है जिसने मनुष्य को रचा, जिसने परमदेश को लगाया, जिसने जगत को बनाया, जिसने जलप्रलय को उठाया, जिसने नूह को बचाया; वह अब्राहम का परमेश्वर है, और इसहाक का परमेश्वर है, और याकूब का परमेश्वर है, जीवितों का परमेश्वर है: वही है जिसका व्यवस्था प्रचार करती है, जिसका भविष्यद्वक्ता प्रचार करते हैं, जिसे मसीह प्रकट करता है, जिसे प्रेरित हमें s बताते हैं, और जिस पर कलीसिया विश्वास करती है। वह हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता है: अपने वचन के द्वारा, जो उसका पुत्र है, उसके द्वारा वह उन सब पर प्रकट और प्रगट होता है जिन पर वह प्रकट होता है; क्योंकि वे [केवल] उसे जानते हैं जिन पर पुत्र ने उसे प्रकट किया है। परन्तु पुत्र, पिता के साथ सदा सह-अस्तित्व में रहते हुए, प्राचीन काल से, हाँ, आदि से, सदा पिता को दूतों, प्रधान दूतों, सामर्थ्यों, बलों, और उन सब पर प्रकट करता है जिन पर वह चाहता है कि परमेश्वर प्रकट हो।
अध्याय इकतीस.--पूर्ववर्ती तर्कों का सार और प्रयोग।
1. तो, वैलेन्तीनस की पाठशाला के लोग उलट दिए जाने पर, मिथ्या शिक्षकों की सारी भीड़ भी निश्चय ही उलट जाती है। क्योंकि उनके प्लेरोमा के विरुद्ध, और उसके परे की बातों के विषय में, मैंने जो सब तर्क आगे रखे हैं, यह दिखाते हुए कि सब का पिता उसके परे की वस्तु से बन्द और घेरा हुआ है (यदि, निश्चय ही, उसके परे कुछ हो), और कैसे [उनके सिद्धान्त पर] अनेक पिताओं, और अनेक प्लेरोमाओं, और जगतों की अनेक सृष्टियों को, एक समूह से आरम्भ करके दूसरे पर समाप्त होते हुए, हर ओर विद्यमान मानने की पूर्ण आवश्यकता है; और कि [जिन प्राणियों का उल्लेख है] वे सब अपने अपने क्षेत्रों में बने रहते हैं, और दूसरों में कुतूहल से हस्तक्षेप नहीं करते, क्योंकि निश्चय ही उनके बीच न कोई सामान्य हित है और न कोई सहभागिता; और कि कोई दूसरा नहीं है
सब का परमेश्वर, परन्तु वह नाम केवल सर्वशक्तिमान का है;--[ये सब तर्क, मैं कहता हूँ,] उसी प्रकार मार्सियोन, और शमौन, और मीआन्दर की पाठशाला के लोगों के विरुद्ध लगेंगे, या और जो कोई ऐसे हों जो, उनके समान, उस सृष्टि को पिता से काट देते हैं जिससे हम जुड़े हैं। फिर, वे तर्क जिन्हें मैंने उनके विरुद्ध प्रयोग किया है जो मानते हैं कि सब का पिता निःसन्देह सब कुछ धारण करता है, परन्तु जिस सृष्टि से हम सम्बन्ध रखते हैं वह उसके द्वारा नहीं, वरन् किसी और सामर्थ्य द्वारा, या प्रोपाटोर को न जानने वाले दूतों द्वारा रची गई, जो ब्रह्माण्ड के अपार विस्तार से केन्द्र के समान घिरा है, जैसे दाग [चारों ओर के] वस्त्र से घिरा रहता है; जब मैंने दिखाया कि यह सम्भाव्य कल्पना नहीं कि सब के पिता को छोड़ कोई और प्राणी उस सृष्टि को रचे जिससे हम सम्बन्ध रखते हैं,--ये ही तर्क सातुर्निनस, बासिलिदेस, कार्पोक्रातेस के अनुयायियों के विरुद्ध, और शेष ग्नोस्तिकों के विरुद्ध लगेंगे, जो ऐसे ही मत प्रकट करते हैं। फिर, वे कथन जो उत्सर्जनों के विषय में, और एओनों के विषय में, और [कल्पित अवस्था] अधोगति के विषय में, और उनकी माता के अस्थिर स्वभाव के विषय में किए गए हैं, बासिलिदेस को, और उन सब को जो झूठ से ग्नोस्तिक कहलाते हैं, समान रूप से उलट देते हैं, जो निश्चय ही भिन्न नामों के नीचे उन्हीं मतों को दोहराते हैं, परन्तु पूर्ववर्तियों से अधिक विस्तार में,(1) सत्य के बाहर(2) पड़ी बातों को अपनी ही शिक्षा की व्यवस्था में ले जाते हैं। और संख्याओं के विषय में मैंने जो टिप्पणियाँ की हैं वे भी उन सब के विरुद्ध लगेंगी जो इस प्रकार की व्यवस्था के सहारे के लिए सत्य की वस्तुओं का दुरुपयोग करते हैं।
और सृष्टिकर्ता (डेमियुर्ज) के विषय में जो कुछ कहा गया है, यह दिखाने के लिए कि वही अकेला परमेश्वर और सब का पिता है, और आगे की पुस्तकों में जो टिप्पणियाँ अभी की जा सकती हैं, उन्हें मैं मिथ्या शिक्षकों पर सामान्य रूप से लगाता हूँ। उनमें जो अधिक संयमी और बुद्धिमान हैं उन्हें तू मोड़ेगा और समझाएगा, ताकि वे आगे अपने सृष्टिकर्ता, और बनानेवाले, और पालन करनेवाले, और प्रभु की निन्दा न करें, और न उसके मूल को न्यूनता और अज्ञान पर डालें; परन्तु क्रूर, और भयानक, और निर्बुद्धि [उनमें से] तू अपने से दूर भगाएगा, ताकि तुझे आगे उनकी व्यर्थ बातूनी सहनी न पड़े।
2. और वे भी इस प्रकार खण्डित होंगे जो शमौन और कार्पोक्रातेस के हैं, और यदि और कोई हों जिनके विषय में कहा जाता है कि वे आश्चर्यकर्म करते हैं--जो जो कुछ करते हैं उसे न परमेश्वर की सामर्थ्य से करते हैं, न सत्य के सम्बन्ध में, न मनुष्यों की भलाई के लिए, वरन् जादुई छल के द्वारा, और सर्वव्यापी ठगने के साथ, मनुष्यजाति को नष्ट करने और भटकाने के लिए, इस प्रकार उन पर जो उन पर विश्वास करते हैं, उस बात के विषय में जिस पर वे उन्हें भटकाते हैं, भलाई से अधिक हानि लाते हैं। क्योंकि वे न अन्धों को दृष्टि दे सकते हैं, न बहिरों को सुनना, न सब प्रकार के दुष्टात्माओं को भगा सकते हैं--[कोई भी, निश्चय,] उनको छोड़ जिन्हें वे स्वयं दूसरों में भेजते हैं, यदि वे इतना भी कर सकें। न वे निर्बलों को, या लंगड़ों को, या लकवाग्रस्तों को, या शरीर के किसी और भाग में पीड़ितों को चंगा कर सकते हैं, जैसा शारीरिक अनन्तता के विषय में अक्सर किया गया है। न वे उन बाहरी दुर्घटनाओं के लिए प्रभावशाली उपचार दे सकते हैं जो हो सकती हैं। और मरे हुओं को जिलाने से वे इतने दूर हैं, जैसा प्रभु ने उन्हें जिलाया, और प्रेरितों ने प्रार्थना के द्वारा किया, और जैसा किसी आवश्यकता के कारण भाईचारे में बार बार किया गया है--उस विशेष स्थान की सारी कलीसिया बहुत उपवास और प्रार्थना के साथ [वर] की विनती करते हुए, मरे हुए मनुष्य की आत्मा लौट आई है, और वह पवित्र लोगों की प्रार्थनाओं के उत्तर में दिया गया है--कि वे यह भी नहीं मानते कि यह सम्भव रूप से किया जा सकता है, [और मानते हैं] कि मरे हुओं में से पुनरुत्थान(3) केवल उस सत्य से परिचय है जिसका वे प्रचार करते हैं।
3. इसलिए, क्योंकि उनके बीच भ्रम और भटकाने वाले प्रभाव हैं, और जादुई भ्रम मनुष्यों के सामने अभक्ति से किए जाते हैं; परन्तु कलीसिया में, मनुष्यजाति की सहायता और प्रोत्साहन के लिए, सहानुभूति, और करुणा, और स्थिरता, और सत्य, केवल शुल्क या प्रतिफल के बिना दिखाए नहीं जाते(4), वरन् हम स्वयं दूसरों के लाभ के लिए अपने ही साधन खर्च करते हैं; और क्योंकि जो चंगे होते हैं वे बहुत बार वे वस्तुएँ नहीं रखते जिनकी उन्हें आवश्यकता है, वे उन्हें हम से पाते हैं;--[क्योंकि ऐसी दशा है,] ये मनुष्य इस प्रकार निःसन्देह ईश्वरीय स्वभाव से, परमेश्वर की भलाई से, और सब आत्मिक उत्तमता से पूर्ण अन्य सिद्ध होते हैं। परन्तु वे हर प्रकार के छल से, धर्मत्यागी प्रेरणा से, दुष्टात्मों के काम से, और मूर्तिपूजा के भ्रम-रूपों से पूरी तरह भरे हैं, और वास्तव में उस अजगर(5) के पूर्वगामी हैं, जो उसी प्रकार के छल के द्वारा अपनी पूँछ से तारों के 3 भाग को उनके स्थान से गिराएगा, और उन्हें पृथ्वी पर डालेगा। हमें उन से ऐसे भागना चाहिए जैसे हम उस से भागते; और जितने बड़े प्रदर्शन के साथ वे [अपने आश्चर्य] करते कहे जाते हैं, उतनी ही सावधानी से हमें उन्हें देखना चाहिए, क्योंकि उन्हें दुष्टता की बड़ी आत्मा दी गई है। यदि कोई उक्त भविष्यवाणी पर, और इन मनुष्यों के प्रतिदिन के कामों पर, विचार करेगा, तो वह पाएगा कि
उनकी चाल का ढंग दुष्टात्माओं के साथ एक और वही है।
अध्याय बत्तीस.--मिथ्या शिक्षकों की दुष्ट और निन्दापूर्ण शिक्षाओं का और अधिक उद्घाटन।
1. और फिर, कामों के विषय में उनकी यह अभक्त राय--अर्थात् कि उन पर हर प्रकार के कामों का, यहाँ तक कि अत्यन्त घृणित कामों का भी, अनुभव करना अनिवार्य है--प्रभु की शिक्षा से खण्डित होती है, जिसके यहाँ केवल व्यभिचारी ही अस्वीकार नहीं किया जाता, वरन् वह मनुष्य भी जो व्यभिचार करना चाहता है;(1) और केवल वास्तविक हत्यारा ही दूसरे को मारकर अपनी ही दण्डावस्था का दोषी नहीं ठहराया जाता, वरन् वह मनुष्य भी जो अपने भाई पर बिना कारण क्रोध करता है: जिसने [अपने शिष्यों को] आज्ञा दी कि वे केवल मनुष्यों से बैर न रखें, वरन् अपने शत्रुओं से भी प्रेम करें; और उन्हें आज्ञा दी कि वे केवल झूठी शपथ न खाएँ, वरन् शपथ ही न खाएँ; और केवल अपने पड़ोसियों की बुराई न बोलें, वरन् किसी को "राका" और "मूर्ख" भी न कहें; [यह घोषित करते हुए] कि नहीं तो वे नरक की आग के खतरे में हैं; और केवल न मारें, वरन्, जब वे स्वयं मारे जाएँ, तब दूसरा गाल [उनके सामने रखें जिन्होंने उनके साथ बुरा व्यवहार किया]; और केवल दूसरों की सम्पत्ति देने से इनकार न करें, वरन् यदि उनकी अपनी भी ले ली जाए, तो लेनेवालों से उसे फिर माँगें नहीं; और केवल अपने पड़ोसियों को हानि न पहुँचाएँ, और न उनके साथ कोई बुराई करें, वरन्, जब उनके साथ स्वयं दुष्टता से व्यवहार किया जाए, तब दीर्घसहिष्णु रहें, और [जिन्होंने उन्हें हानि पहुँचाई] उनके प्रति दया दिखाएँ, और उनके लिए प्रार्थना करें, ताकि मन फिराव के द्वारा वे उद्धार पाएँ--ताकि हम किसी बात में दूसरों के घमण्ड, अभिलाषा, और गर्व की नकल न करें।
इसलिए, जिसे ये मनुष्य अपने गुरु के रूप में बड़ाई करते हैं, और जिसके विषय में वे दृढ़ता से कहते हैं कि उसकी प्राण औरों से बहुत अच्छी और अधिक ऊँचे स्वर की थी, उसने निश्चय ही, बहुत गम्भीरता से, कुछ बातें अच्छी और उत्तम होने के कारण करने की आज्ञा दी, और कुछ बातों से न केवल उनके वास्तविक करने में, वरन् उन विचारों में भी जो उनके करने तक ले जाते हैं, दुष्ट, नाशकारी, और घृणित होने के कारण रुकने की आज्ञा दी,--तो फिर वे उलझन में डाले जाने से कैसे बच सकते हैं, जब वे दृढ़ता से कहते हैं कि ऐसा गुरु [आत्मा में] औरों से अधिक ऊँचे स्वर का और बेहतर था, और फिर भी स्पष्ट रूप से उसकी शिक्षा के सर्वथा विरुद्ध प्रकार की शिक्षा देते हैं? और, फिर, यदि भला और बुरा जैसी कोई बात सचमुच न होती, परन्तु कुछ बातें धर्मी, और कुछ अधर्मी, केवल मानव राय में मानी जातीं, तो वह अपनी शिक्षा में अपने को इस प्रकार कभी न बताता: "धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य के समान चमकेंगे;"(2) परन्तु वह अधर्मियों को, और जो धर्म के काम नहीं करते उन्हें, "अनन्त आग में भेजेगा, जहाँ उनका कीड़ा न मरेगा, और आग न बुझेगी।"(3)
2. जब वे और आगे मानते हैं कि हर प्रकार(4) के काम और चाल का अनुभव उन पर cumbent है, ताकि, यदि सम्भव हो, इस जीवन में एक प्रकटीकरण में सब कुछ पूरा करके, वे [तुरन्त] सिद्धता की दशा में पार हो जाएँ, तो वे संयोग से भी उन बातों को करने का प्रयत्न करते नहीं पाए जाते जो सद्गुण के साथ रहती हैं, और श्रमसाध्य, महिमामय, और कुशल हैं,(5) जो अच्छी होने के कारण सर्वत्र स्वीकृत भी हैं। क्योंकि यदि हर काम और हर प्रकार की क्रिया से गुजरना आवश्यक है, तो उन्हें, 1 स्थान में, सब कलाएँ सीखनी चाहिए: उन सब को, [मैं कहता हूँ,] चाहे वे सिद्धान्त की हों या व्यवहार की, चाहे वे आत्म-त्याग से प्राप्त हों, या श्रम, अभ्यास, और दृढ़ता के द्वारा साधी गई हों; उदाहरण के लिए, हर प्रकार का संगीत, अंकगणित, ज्यामिति, खगोलविद्या, और ऐसी सब जो बौद्धिक अनुसन्धान में लगी हैं: फिर, फिर से, चिकित्सा का सारा अध्ययन, और पौधों का ज्ञान, ताकि मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए तैयार किए गए पौधों से परिचय हो; चित्रकला और मूर्तिकला, पीतल और संगमरमर का काम, और सम्बद्ध कलाएँ: और फिर, [उन्हें अध्ययन करना है] हर प्रकार का गाँव का श्रम, पशु-चिकित्सा की कला, गोपालन के व्यवसाय, कुशल श्रम के विभिन्न प्रकार, जिनके विषय में कहा जाता है कि वे [मानव] परिश्रम के सारे घेरे में फैले हैं; फिर, समुद्री जीवन से जुड़े हुए, व्यायाम, शिकार, सैन्य और राजकीय उद्यम, और और जितने हों, जिनमें से, अत्यन्त श्रम के साथ, वे अपने सारे जीवन के क्रम में 10 भाग, या 1000 भाग भी, नहीं सीख सकते।
वास्तव में बात यह है कि वे इनमें से कुछ भी सीखने का प्रयत्न नहीं करते, यद्यपि वे मानते हैं कि हर प्रकार के काम का अनुभव उन पर अनिवार्य है; परन्तु विषयसुख की ओर, और अभिलाषा की ओर, और घृणित कामों की ओर मुड़कर, जब वे अपनी ही शिक्षा से परखे जाते हैं तब वे स्वयं दोषी ठहरते हैं। क्योंकि, चूँकि वे उन सब [सद्गुणों] से रहित हैं जिनका उल्लेख हुआ है, वे [अनिवार्य रूप से] आग के नाश में प्रवेश करेंगे। ये मनुष्य, यीशु को अपना गुरु कहकर बड़ाई करते हुए, वास्तव में एपिकूरस के दर्शन और सिनिकों की उदासीनता का अनुकरण करते हैं, [यीशु को अपना गुरु कहते हुए,] जिसने अपने शिष्यों को केवल बुरे कामों से नहीं, वरन् [दुष्ट] वचनों और विचारों से भी फेर दिया, जैसा मैं पहले ही दिखा चुका हूँ।
3. फिर, जब वे दृढ़ता से कहते हैं कि उनके पास यीशु के समान ही मण्डल से प्राण हैं, और वे उसके समान हैं, कभी कभी यह भी मानते हुए कि वे श्रेष्ठ हैं; जब [वे दृढ़ता से कहते हैं कि वे] उसके समान, इसके लिए उत्पन्न किए गए
मनुष्यजाति के लाभ और स्थापना की ओर झुकने वाले कामों का पूरा करना, वे [उसके कामों के साथ] उसी या मिलते जुलते प्रकार का कुछ भी करते नहीं पाए जाते, और न ऐसा कुछ जो किसी बात में उनसे तुलना में लाया जा सके। और यदि उन्होंने जादू के द्वारा [उल्लेखनीय] कुछ भी सचमुच पूरा किया है, तो वे [इस प्रकार] छल से मूर्ख लोगों को भटकाने का प्रयत्न करते हैं, क्योंकि जिन पर वे घोषित करते हैं कि वे दिखाते हैं] अलौकिक] सामर्थ्य, उन पर वे कोई वास्तविक लाभ या आशीष नहीं देते; परन्तु, केवल बालकों को(1) [उन विषयों के रूप में जिन पर वे अभ्यास करते हैं] आगे लाकर, और उनकी दृष्टि को छलते हुए, जब वे ऐसे भ्रम-रूप दिखाते हैं जो तुरन्त मिट जाते हैं, और एक क्षण समय भी नहीं ठहरते,(2) वे यीशु हमारे प्रभु के समान नहीं, वरन् जादूगर शमौन के समान सिद्ध होते हैं। यह भी निश्चित है,(3) इस बात से कि प्रभु 3 दिन को मरे हुओं में से जी उठा, और अपने को अपने शिष्यों पर प्रगट किया, और उनकी दृष्टि में आकाश में उठा लिया गया, कि, क्योंकि ये मनुष्य मरते हैं, और फिर नहीं जी उठते, और न अपने को किसी पर प्रगट करते हैं, वे ऐसे प्राण रखने वाले सिद्ध होते हैं जो किसी बात में यीशु के प्राण के समान नहीं।
4. यदि, तथापि, वे मानते हैं कि प्रभु ने भी ऐसे काम केवल दिखावे में किए, तो हम उन्हें भविष्यद्वाणी के लेखों की ओर ले जाएँगे, और इनसे दोनों बातें सिद्ध करेंगे कि उसके विषय में सब बातें इस प्रकार(4) पहले से कही गई थीं, और निःसन्देह हुईं, और वह परमेश्वर का एकलौता पुत्र है। इसलिए, जो सचमुच उसके शिष्य हैं, वे भी, उससे अनुग्रह पाकर, उसके नाम में [आश्चर्यकर्म] करते हैं, ताकि और मनुष्यों की भलाई बढ़े, उस दान के अनुसार जो प्रत्येक ने उससे पाया है। क्योंकि कुछ लोग निश्चय और सचमुच दुष्टात्माओं को निकालते हैं, ताकि जो इस प्रकार दुष्ट आत्माओं से शुद्ध किए गए हैं वे बार बार [मसीह पर] विश्वास भी करते हैं, और अपने को कलीसिया से जोड़ते हैं। औरों को आने वाली बातों का पूर्वज्ञान है: वे दर्शन देखते हैं, और भविष्यद्वाणी के वचन बोलते हैं। और भी अन्य, बीमारों पर अपने हाथ रखकर उन्हें चंगा करते हैं, और वे स्वस्थ हो जाते हैं। हाँ, और फिर, जैसा मैंने कहा है, मरे हुए भी जिलाए गए हैं, और अनेक वर्ष हमारे बीच रहे(5)। और मैं और क्या कहूँ? सारे जगत में [छितरी] कलीसिया ने, पुन्तियुस पीलातुस के अधीन क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु मसीह के नाम में, परमेश्वर से जो दान पाए हैं उनकी संख्या बताना सम्भव नहीं, जिन्हें वह अन्यजातियों के लाभ के लिए प्रतिदिन काम में लाती है, न किसी पर छल करती है, न उनसे कोई प्रतिफल(6) लेती है Ion ऐसे आश्चर्यकारी मध्यस्थताओं के कारण]। क्योंकि जैसा उसने परमेश्वर से सेंतमेंत(7) पाया है, वैसे ही सेंतमेंत वह [दूसरों की] सेवा भी करती है।
5. और वह न दूतों के आह्वान(8) के द्वारा, न मन्त्रों के द्वारा, न किसी और दुष्ट जिज्ञासा की कला के द्वारा कुछ करती है; परन्तु, अपनी प्रार्थनाओं को प्रभु की ओर मोड़कर, जिसने सब कुछ बनाया, शुद्ध, सच्ची, और सीधी आत्मा में, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम को पुकारकर, उसने मनुष्यजाति के लाभ के लिए आश्चर्यकर्म करने की(9) आदत डाली है, उन्हें भ्रम में ले जाने के लिए नहीं। इसलिए, हमारे प्रभु यीशु मसीह का नाम अभी भी [मनुष्यों पर] लाभ देता है, और जो कहीं भी उस पर विश्वास करते हैं उन सब को पूरी तरह और प्रभाव से चंगा करता है, परन्तु शमौन का, या मेनान्दर का, या कार्पोक्रातेस का, या और किसी भी मनुष्य का नाम नहीं, यह प्रकट है कि. जब वह मनुष्य बनाया गया, तब उसने अपनी ही सृष्टि के साथ सहभागिता रखी, और(10) सब के पिता की इच्छा के अनुसार, परमेश्वर की सामर्थ्य के द्वारा सब कुछ सचमुच किया, जैसा भविष्यद्वक्ताओं ने पहले से कहा था। परन्तु ये बातें क्या थीं, यह भविष्यद्वाणी के लेखों में मिलने वाले प्रमाणों को लेते हुए वर्णित किया जाएगा।
अध्याय तैंतीस.--प्राणों के देहान्तरण की शिक्षा की असंगति।
1. हम देह से देह में गमन के विषय में उनकी शिक्षा को इस तथ्य से उलट सकते हैं, कि प्राण अपनी पूर्व अस्तित्व की दशाओं में घटी घटनाओं में से कुछ भी स्मरण नहीं रखते। क्योंकि यदि वे इस उद्देश्य से भेजे गए कि उन्हें हर प्रकार के काम का अनुभव हो, तो उन्हें पहले पूरे किए गए कामों की स्मृति अवश्य रखनी चाहिए, ताकि वे उनको भरें जिनमें वे अभी न्यून थे, और बिना विराम के सदा उन्हीं कार्यों के चारों ओर मंडराते हुए, अपना श्रम दयनीय रूप से व्यर्थ न खर्च करें (क्योंकि देह का [एक प्राण के साथ] मिलना मात्र उन बातों की स्मृति और ध्यान को पूरी तरह बुझा नहीं सकता था जिनका पहले अनुभव हुआ था(11)), और विशेषकर क्योंकि वे इसी उद्देश्य के लिए [जगत में] आए थे। क्योंकि, जब देह सोई और विश्राम में है, जो कुछ प्राण अपने आप देखती है, और दर्शन में करती है, स्मरण करते हुए
इनमें से बहुतों को, वह देह को भी बताती है; और जैसा होता है कि, जब कोई जागता है, शायद लंबे समय के बाद, वह बताता है कि उसने स्वप्न में क्या देखा, वैसे ही वह निःसन्देह उन बातों को स्मरण रखता जिन्हें उसने इस विशेष देह में आने से पहले किया था। क्योंकि यदि जो केवल बहुत थोड़े समय के लिए देखा जाता है, या केवल एक भ्रम-रूप में सोचा गया है, और केवल प्राण के द्वारा, स्वप्न के माध्यम से, वह देह के साथ फिर मिल जाने के बाद, और सब अंगों में फैल जाने के बाद, स्मरण किया जाता है, तो वह उन बातों को और भी अधिक स्मरण रखती जिनके साथ वह इतने लंबे समय तक रही, यहाँ तक कि बीते हुए जीवन की सारी अवधि भर।
2. इन आपत्तियों के विषय में, प्लेटो, वह प्राचीन एथेंसवासी, जिसने इस मत को प्रवेश भी कराने वाला 1(1) था, जब वह उन्हें हटा नहीं सका, तब विस्मृति के प्याले की [कल्पना] गढ़ ली, यह कल्पना करते हुए कि इस प्रकार वह इस कठिनाई के पुत्र से बच निकलेगा। उसने [अपनी कल्पना का] किसी प्रकार का प्रमाण नहीं आजमाया, वरन् केवल [प्रश्न की आपत्ति को] हठ से उत्तर दिया, कि जब प्राण इस जीवन में प्रवेश करते हैं, तो उनके प्रवेश की [जगत में] रखवाली करने वाले उस दुष्टात्मा के द्वारा उन्हें विस्मृति पिलाई जाती है, इससे पहले कि वे देहों में प्रवेश करें
[जो उन्हें ठहराई गईं]। उससे यह छूट गया, कि [इस प्रकार बोलकर] वह दूसरी बड़ी उलझन में पड़ गया। क्योंकि यदि विस्मृति का प्याला, पी लिए जाने के बाद, किए गए सब कामों की स्मृति को मिटा सकता है, तो, हे प्लेटो, तू इस तथ्य का ज्ञान कैसे पाता है (क्योंकि तेरा प्राण अब देह में है), कि, देह में प्रवेश करने से पहले, दुष्टात्मा के द्वारा उसे विस्मृति कराने वाली औषध पिलाई गई? क्योंकि यदि तुझे दुष्टात्मा की, और प्याले की, और [जीवन में] प्रवेश की स्मृति है, तो तुझे और बातों से भी परिचय होना चाहिए; परन्तु यदि, दूसरी ओर, तू उन्हें नहीं जानता, तो दुष्टात्मा की कथा में सत्य नहीं, और न कला से तैयार किए गए विस्मृति के प्याले में।
3. फिर, जो दृढ़ता से कहते हैं कि देह ही विस्मृति की औषध है, उनके विरोध में यह टिप्पणी की जा सकती है: तो फिर कैसे होता है कि प्राण अपने ही साधन से जो कुछ देखती है, स्वप्नों में भी और विचार या गम्भीर मानसिक श्रम से भी, जब देह निष्क्रिय है, उसे स्मरण रखती है, और अपने पड़ोसियों को बताती है? परन्तु, फिर, यदि देह ही विस्मृति [का कारण] होती, तो देह में स्थित प्राण उन बातों को भी स्मरण नहीं रख सकती थी जो बहुत पहले आँखों या कानों के द्वारा ग्रहण की गई थीं; परन्तु, ज्यों ही आँख देखी हुई वस्तुओं से फेर दी जाती, उनकी स्मृति भी निःसन्देह नष्ट हो जाती। क्योंकि विस्मृति [के कारण] में ही स्थित प्राण को, वर्तमान क्षण में उसने जो देखा केवल उसके सिवा और किसी बात का ज्ञान नहीं हो सकता था। वह ईश्वरीय बातों से कैसे परिचित हो सकती थी, और देह में रहते हुए उनकी स्मृति कैसे रख सकती थी, क्योंकि, जैसा वे मानते हैं, देह ही विस्मृति [का कारण] है? परन्तु भविष्यद्वक्ता भी, जब वे पृथ्वी पर थे, अपनी सामान्य मनःस्थिति में लौटने पर,(2) स्वर्गीय वस्तुओं के दर्शनों में आत्मिक रूप से जो कुछ उन्होंने देखा या सुना उसे भी स्मरण रखा, और उसे औरों को बताया। इसलिए, देह प्राण को उन बातों को भुलाती नहीं जो आत्मिक रूप से देखी गई हैं; वरन् प्राण देह को सिखाती है, और जो आत्मिक दर्शन उसने भोगा है उसे उसके साथ बाँटती है।
4. क्योंकि देह के पास प्राण से बड़ी सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि निश्चय ही देह प्राण के द्वारा प्रेरित की जाती है, और जिलाई जाती है, और बढ़ाई जाती है, और इकट्ठी रखी जाती है; परन्तु प्राण देह को रखती है(3) और उस पर राज्य करती है। वह निःसन्देह अपनी गति में धीमी की जाती है, ठीक उसी अनुपात में जिसमें देह उसकी गति में भाग लेती है; परन्तु वह उस ज्ञान को कभी नहीं खोती जो उचित रूप से उसका है। क्योंकि देह की तुलना एक यन्त्र से की जा सकती है; परन्तु प्राण के पास कारीगर की बुद्धि है। इसलिए, जैसे कारीगर एक काम की कल्पना को अपने मन में तेजी से उबलते पाता है, परन्तु यन्त्र के द्वारा उसे धीरे ही पूरा कर सकता है, जिस पदार्थ पर काम होता है उसमें पूर्ण लचक की कमी के कारण, और इस प्रकार उसकी मानसिक क्रिया की तेजी, यन्त्र की धीमी क्रिया के साथ मिलकर, [विचार किए हुए अन्त की ओर] एक मध्यम प्रकार की गति को जन्म देती है; वैसे ही प्राण भी, अपनी देह के साथ मिली होने से, किसी माप में रुकी होती है, उसकी तेजी देह की धीमी गति के साथ मिल जाती है। फिर भी वह अपनी विशेषता की शक्तियों को पूरी तरह नहीं खोती; परन्तु, देह के साथ जीवन बाँटती हुई सी, वह स्वयं जीना नहीं छोड़ती। इस प्रकार भी, और बातें देह को बताते हुए, वह न उनका ज्ञान खोती है, और न उन बातों की स्मृति जो देखी गई हैं।
5. इसलिए, यदि प्राण पूर्व अस्तित्व की दशा में जो हुआ उसे कुछ भी स्मरण नहीं रखती,(4) परन्तु यहाँ की बातों का बोध रखती है, तो इससे निकलता है कि वह और देहों में कभी नहीं रही, और न ऐसी बातें कीं जिनका उसे ज्ञान नहीं, और न [एक बार] ऐसी बातें जानीं जिन पर वह [अब मानसिक रूप से] ध्यान नहीं कर सकती। परन्तु, जैसे हम में से प्रत्येक अपनी देह को कुशल के द्वारा पाता है
परमेश्वर के काम के द्वारा, वैसे ही वह अपना प्राण भी रखता है। क्योंकि परमेश्वर इतना निर्धन या साधनों में दरिद्र नहीं है, कि वह प्रत्येक व्यक्ति की देह को उसका अपना उचित प्राण न दे सके, जैसा वह उसे उसका विशेष स्वभाव भी देता है। और इसलिए, जब [ठहराई हुई] संख्या पूरी हो जाती है, [वह संख्या] जिसे उसने अपनी ही युक्ति में पहले से ठहराया था, जीवन [अनन्त] के लिए लिखे गए सब shah फिर जी उठेंगे, अपनी अपनी देह रखते हुए, और अपने अपने प्राण भी रखते हुए, और अपनी अपनी आत्मा रखते हुए, जिनमें उन्होंने परमेश्वर को प्रसन्न किया था। दूसरी ओर, जो दण्ड के योग्य हैं, वे उसमें चले जाएँगे, वे भी अपने अपने प्राण और अपनी अपनी देह रखते हुए, जिनमें वे परमेश्वर के अनुग्रह से अलग खड़े रहे। तब दोनों वर्ग आगे जन्म देने और जन्म लेने से, विवाह करने और विवाह में दिए जाने से रुक जाएँगे; ताकि मनुष्यजाति की संख्या, परमेश्वर की पूर्व-नियुक्ति के अनुसार, पूरी होकर, पिता की बनाई हुई योजना को पूरी तरह निभा सके।(1)
अध्याय चौंतीस.--प्राण अलग दशा में पहचाने जा सकते हैं, और वे अमर हैं यद्यपि उनका एक बार आरम्भ हुआ था।
1. प्रभु ने बहुत बड़ी पूर्णता के साथ सिखाया है, कि प्राण केवल अस्तित्व में बने नहीं रहते, देह से देह में जाने के द्वारा नहीं, वरन् वे वही रूप(2) [अपनी अलग दशा में] बनाए रखते हैं जो उस देह का था जिसके लिए वे अनुकूल किए गए थे, और वे उन कामों को स्मरण रखते हैं जो उन्होंने इस अस्तित्व की दशा में किए, और जिनसे वे अब रुक गए हैं,--उस वर्णन में जो धनवान के विषय में और उस लाजर के विषय में लिखा है जिसने अब्राहम की गोद में विश्राम पाया। इस वृत्तान्त में वह बताता है(3) कि दीवेस ने मृत्यु के बाद लाजर को जाना, और अब्राहम ने वैसे ही जाना, और इन व्यक्तियों में से प्रत्येक अपनी ही उचित स्थिति में बना रहा, और [दीवेस] ने विनती की कि लाजर उसे राहत देने भेजा जाए--[लाजर], जिस पर उसने [पहले] अपनी मेज से [गिरे] टुकड़े भी नहीं दिए। [वह हमें] अब्राहम के दिए हुए उत्तर के विषय में भी [बताता है], जो न केवल अपने विषय की बातों से परिचित था, वरन् दीवेस से भी, और जिसने उनको आज्ञा दी जो उस यातना के स्थान में आना नहीं चाहते थे कि वे मूसा और भविष्यद्वक्ताओं पर विश्वास करें, और उसके प्रचार को ग्रहण करें(4) जो मरे हुओं में से जी उठनेवाला(5) था। इन बातों से, तब, स्पष्ट घोषित होता है कि प्राण अस्तित्व में बने रहते हैं कि वे देह से देह में नहीं जाते, कि वे मनुष्य का रूप रखते हैं, ताकि वे पहचाने जाएँ, और इस जगत की बातों की स्मृति रखते हैं; और फिर, कि भविष्यवाणी का दान अब्राहम के पास था, और प्राणों का प्रत्येक वर्ग] न्याय से पहले भी ऐसा निवास पाता है जैसा उसने अर्जित किया है।
2. परन्तु यदि कोई लोग इस स्थान पर मानें कि वे प्राण, जिन्होंने थोड़ी ही देर पहले अस्तित्व आरम्भ किया, किसी लम्बे समय तक नहीं ठहर सकते; परन्तु वे, एक ओर, या तो अजन्मे होने चाहिए, ताकि वे अमर हों, या यदि उनका जन्म के मार्ग से आरम्भ हुआ है, तो उन्हें देह के साथ ही मर जाना चाहिए--तो वे सीखें कि केवल परमेश्वर, जो सब का प्रभु है, आदि और अन्त से रहित है, सचमुच और सदा वही रहते हुए, और सदा वही अपरिवर्तनीय सत्ता बने रहते हुए। परन्तु जो कुछ उससे निकलता है, जो कुछ बनाया गया है, और बनाया जाता है, वे निश्चय ही अपनी उत्पत्ति का अपना आरम्भ पाते हैं, और इस कारण उन्हें बनानेवाले से निकृष्ट हैं, क्योंकि वे अजन्मे नहीं हैं। फिर भी वे ठहरते हैं, और अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर की इच्छा के अनुसार युगों की लम्बी शृंखला में अपना अस्तित्व बढ़ाते हैं; ताकि वह उन्हें यह दे कि वे आरम्भ में इस प्रकार रचे जाएँ, और इसके बाद वे इस प्रकार अस्तित्व में रहें।
3. क्योंकि जैसा हमारे ऊपर का आकाश, आकाशमण्डल, सूर्य, चन्द्रमा, शेष तारे, और उनकी सारी महिमा, यद्यपि उनका पहले अस्तित्व नहीं था, अस्तित्व में बुलाए गए, और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार लम्बे समय के क्रम भर बने रहते हैं, वैसे ही जो कोई प्राणों और आत्माओं के विषय में, और निश्चय ही सब रची हुई वस्तुओं के विषय में, इस प्रकार सोचता है, वह किसी प्रकार दूर नहीं भटकेगा, क्योंकि जो कुछ बनाया गया है उसका आरम्भ तब हुआ जब वह रचा गया, परन्तु वह तब तक ठहरता है जब तक परमेश्वर चाहता है कि उनका अस्तित्व और निरन्तरता हो। भविष्यद्वाणी की आत्मा इन मतों की गवाही देती है, जब वह घोषित करता है, "क्योंकि उसने कहा, और वे बन गए; उसने आज्ञा दी, और वे सृजे गए: उसने उन्हें सदा के लिए, हाँ, युगानुयुग स्थिर किया है।"(6) और फिर, वह मनुष्य के उद्धार के विषय में इस प्रकार बोलता है: "उसने तुझ से जीवन माँगा, और तूने उसे युगानुयुग दिनों की लम्बाई दी;"(7) यह सूचित करते हुए कि सब का पिता ही है जो बचाए हुओं पर युगानुयुग की निरन्तरता देता है। क्योंकि जीवन हम से नहीं उठता, और न हमारे अपने स्वभाव से; वरन् वह परमेश्वर के अनुग्रह के अनुसार दिया जाता है। और इसलिए जो उस पर दिए हुए जीवन की रक्षा करेगा, और जिसने उसे दिया उसके प्रति धन्यवाद देगा, वह युगानुयुग दिनों की लम्बाई भी पाएगा। परन्तु जो उसे ठुकराएगा, और अपने बनानेवाले के प्रति कृतघ्न ठहरेगा, क्योंकि वह रचा गया है, और उसने उसे नहीं पहचाना, जो
[उस पर दान] दिया, वह युगानुयुग की निरन्तरता [के अधिकार] से अपने को वंचित करता है।(1) और, इस कारण, प्रभु ने उनसे कहा जिन्होंने अपने को उसके प्रति कृतघ्न दिखाया: "यदि तुम थोड़े में विश्वासयोग्य नहीं रहे, तो बड़ा तुम्हें कौन देगा?"(2) यह सूचित करते हुए कि जो इस संक्षिप्त कालिक जीवन में, उसे देनेवाले के प्रति अपने को कृतघ्न दिखाते हैं, वे उससे युगानुयुग दिनों की लम्बाई न्याय के साथ नहीं पाएँगे।
4. परन्तु जैसे पशु-देह निश्चय ही स्वयं प्राण नहीं है, फिर भी जब तक परमेश्वर चाहता है प्राण के साथ सहभागिता रखती है; वैसे ही प्राण स्वयं जीवन नहीं है,(3) वरन् परमेश्वर के द्वारा उस पर दिए हुए उस जीवन में भाग लेती है। इसलिए भविष्यद्वाणी का वचन भी 1 पहले रचे गए मनुष्य के विषय में घोषित करता है, "वह जीवित प्राण हो गया,"(4) हमें सिखाते हुए कि जीवन में भाग लेने से प्राण जीवित हो गई; ताकि प्राण, और जो जीवन उसके पास है, अलग अस्तित्वों के रूप में समझे जाएँ। इसलिए जब परमेश्वर जीवन और निरन्तर अवधि देता है, तब होता है कि वे प्राण भी जो पहले अस्तित्व में नहीं थीं आगे [सदा] ठहरें, क्योंकि परमेश्वर ने दोनों चाहा है कि वे अस्तित्व में हों, और अस्तित्व में बनी रहें। क्योंकि परमेश्वर की इच्छा को सब बातों में शासन और राज्य करना चाहिए, जब और सब बातें उसे मार्ग देती हैं, अधीन हैं, और उसकी सेवा को अर्पित हैं। यहाँ तक, तब, प्राण की सृष्टि और निरन्तर अवधि के विषय में मुझे बोलने दो।
अध्याय पैंतीस.--बासिलिदेस का खण्डन, और इस मत का कि भविष्यद्वक्ताओं ने भिन्न देवताओं की प्रेरणा के अधीन अपनी भविष्यवाणियाँ कहीं।
1. और फिर, जो कहा जा चुका है उसके अतिरिक्त, बासिलिदेस स्वयं, अपने ही सिद्धान्तों के अनुसार, यह मानना आवश्यक पाएगा कि न केवल तीन सौ पैंसठ आकाश एक के बाद एक के द्वारा क्रम से बनाए गए हैं, वरन् आकाशों की एक अपार और अगण्य भीड़ सदा बनाए जाने की प्रक्रिया में रही है, और बनाई जा रही है, और बनाई जाती रहेगी, ताकि इस प्रकार के आकाशों का निर्माण कभी न रुके। क्योंकि यदि 1 आकाश के उत्सर्जन(5) से 2 उसके सदृश बनाया गया, और 3 2 के सदृश, और शेष बाद के सब के साथ भी ऐसा ही, तो आवश्यकता की बात के रूप में निकलता है कि हमारे आकाश के उत्सर्जन से, जिसे वह निश्चय ही अन्तिम कहता है, एक और उसके समान रचा जाए, और उससे फिर एक 3; और इस प्रकार न तो पहले से बनाए गए उन आकाशों से उत्सर्जन की प्रक्रिया कभी रुक सकती है, न [नए] आकाशों का निर्माण, वरन् कार्य अनन्त तक चलना चाहिए, और आकाशों की ऐसी संख्या को जन्म देना चाहिए जो पूरी तरह अनिश्चित होगी।
2. जो झूठ से ग्नोस्तिक कहलाते हैं उनमें शेष लोग, और जो मानते हैं कि भविष्यद्वक्ताओं ने भिन्न देवताओं की प्रेरणा के अधीन अपनी भविष्यवाणियाँ कहीं, इस तथ्य से सहज ही उलट दिए जाएँगे, कि सब भविष्यद्वक्ताओं ने एक ही परमेश्वर और प्रभु का प्रचार किया, और आकाश और पृथ्वी का, और जो कुछ उनमें है उसका, बनानेवाले का ही; जब उन्होंने उसके पुत्र के आगमन का भी समाचार दिया, जैसा मैं आगे की पुस्तकों में पवित्रशास्त्र से ही दिखाऊँगा।
3. यदि, तथापि, कोई आपत्ति करे कि, इब्रानी भाषा में, पवित्रशास्त्र में [परमेश्वर को सूचित करने के लिए] भिन्न वाक्यांश आते हैं, जैसे सबाओत, एलोए, अदोनाई, और ऐसी और सब पद, इनसे सिद्ध करने का श्रम करते हुए कि भिन्न सामर्थ्य और देवता हैं, तो वे सीखें कि इस प्रकार के सब वाक्यांश एक ही सत्ता की घोषणाएँ और पुकारें मात्र हैं। क्योंकि यहूदी भाषा में एलोए पद परमेश्वर को सूचित करता है, जब इब्रानी भाषा में एलोईम(6) और एलोऊथ "वह जो सब कुछ धारण करता है" को सूचित करते हैं। अदोनाई की पुकार के विषय में, कभी वह नाम रखने योग्य(7) और प्रशंसनीय को सूचित करता है; परन्तु अन्य समय, जब उसमें दालेथ अक्षर दुगुना किया जाता है, और शब्द एक आरम्भिक(8) कण्ठ-ध्वनि पाता है--इस प्रकार अद्दोनाई--[वह सूचित करता है], "वह जो भूमि को जल से बाँधता और अलग करता है," ताकि जल बाद में(9) भूमि को न डुबोए। उसी प्रकार भी, सबाओत,(10) जब वह [अन्तिम अक्षर में यूनानी ओमेगा से लिखा जाता है [सबाओत], "एक स्वेच्छाकारी कर्ता" को सूचित करता है; परन्तु जब वह यूनानी ओमिक्रॉन से लिखा जाता है--उदाहरण के लिए, सबाओत--वह "1 आकाश" को व्यक्त करता है। उसी प्रकार भी, याओथ शब्द,(11) जब अन्तिम अक्षर लम्बा और महाप्राण बनाया जाता है,
"एक पहले से ठहराई हुई माप" को सूचित करता है; परन्तु जब वह यूनानी अक्षर ओमिक्रॉन से संक्षेप में लिखा जाता है, अर्थात् याओथ, वह "वह जो बुराइयों को भगाता है" को सूचित करता है। और सब वाक्यांश भी उसी प्रकार एक ही सत्ता के पद को बाहर लाते हैं(1); उदाहरण के लिए (अंग्रेज़ी में(2)), शक्तियों का प्रभु, सब का पिता, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, सर्वोच्च, सृष्टिकर्ता, बनानेवाला, और ऐसे ही। ये भिन्न सत्ताओं की एक शृंखला के नाम और पद नहीं हैं, वरन् एक ही के, जिनके द्वारा एक ही परमेश्वर और पिता प्रकट होता है, वह जो सब कुछ धारण करता है, और सब को अस्तित्व का वर देता है।
4. अब, प्रेरितों का प्रचार, प्रभु की प्रामाणिक शिक्षा, भविष्यद्वक्ताओं की घोषणाएँ, प्रेरितों के लिखवाए हुए वचन,(3) और व्यवस्था की सेवा--ये सब एक ही सत्ता की, सब के परमेश्वर और पिता की, स्तुति करते हैं, अनेक भिन्न सत्ताओं की नहीं, न उसकी जो भिन्न देवताओं या सामर्थ्यों से अपना द्रव्य पाता है, वरन् [घोषित करते हैं] कि सब बातें [रची गईं] एक ही पिता के द्वारा (जो फिर भी जिस पदार्थ पर काम होता है उसके स्वभावों और झुकावों के अनुसार this works] को अनुकूल करता है), दृश्य और अदृश्य, और संक्षेप में, जो कुछ बनाया गया है वह सब [रचा गया] न दूतों के द्वारा, न किसी और सामर्थ्य के द्वारा, वरन् केवल परमेश्वर, पिता के द्वारा--ये सब हमारे कथनों के साथ एक हैं, यह, मुझे लगता है, पर्याप्त रूप से सिद्ध हो चुका है, जब इन भारी तर्कों से दिखाया गया है कि एक ही परमेश्वर है, सब वस्तुओं का बनानेवाला। परन्तु ताकि मैं यह न समझा जाऊँ कि मैं प्रभु के पवित्रशास्त्र से निकलने वाले प्रमाणों की उस शृंखला से बचता हूँ (क्योंकि, निश्चय ही, ये पवित्रशास्त्र इसी बात को बहुत अधिक स्पष्ट और साफ प्रचार करते हैं), कम से कम उनके लाभ के लिए जो उन पर भ्रष्ट मन नहीं लाते, मैं उक्त पवित्रशास्त्र के लिए एक विशेष पुस्तक अर्पित करूँगा, जो उनका न्याय से अनुसरण करेगी [और उन्हें समझाएगी], और इन दैवी पवित्रशास्त्र से मैं सत्य के सब प्रेमियों को [सन्तुष्ट करने वाले] प्रमाण स्पष्ट रखूँगा।(4)
इरेनायुस विधर्मों के विरुद्ध
पुस्तक तीन।
प्रस्तावना.
तू ने मुझ पर निश्चय ही आज्ञा दी है, मेरे अति प्रिय मित्र, कि मैं वैलेन्तीनस की शिक्षाओं को उजागर करूँ, जो उनके उपासकों की कल्पना के अनुसार छिपी हैं; कि मैं उनकी विविधता दिखाऊँ, और उनके खण्डन में एक ग्रन्थ रचूँ। इसलिए मैंने यह कार्य लिया है--यह दिखाते हुए कि वे सब मिथ्या शिक्षकों के पिता शमौन से निकलती हैं--उनकी शिक्षाओं और उत्तराधिकारों दोनों को दिखाने के लिए, और उन सब के विरुद्ध तर्क रखने के लिए। इसलिए, क्योंकि इन मनुष्यों का दोषसिद्धि और उनका उद्घाटन अनेक बातों में एक ही काम है, मैंने तुझे [कुछ] पुस्तकें भेजी हैं, जिनमें 1 इन सब मनुष्यों की रायों को समेटती है, और उनके रीति-रिवाज, और उनके व्यवहार का स्वभाव दिखाती है। 2 में, फिर, उनकी टेढ़ी शिक्षाएँ गिराई और उलट दी जाती हैं, और, जैसी वे सचमुच हैं, खोली और दृष्टि के लिए खोल दी जाती हैं। परन्तु इसमें, 3 पुस्तक में, मैं पवित्रशास्त्र से प्रमाण लाऊँगा, ताकि जो तू ने आज्ञा दी है उसमें मैं किसी बात में पीछे न रहूँ; हाँ, जो तू ने गिना था उससे ऊपर भी, तू मुझ से उन साधनों को पा सके जिनसे उनसे लड़ा जाए और उन्हें जीता जाए जो, जिस किसी प्रकार से, झूठ फैला रहे हैं। क्योंकि परमेश्वर का प्रेम, धनी और बिना कंजूसी के होते हुए, माँगनेवाले को उससे अधिक देता है जितना वह उससे माँग सकता है। तब स्मरण कर, उन बातों को जो मैंने पिछली दो पुस्तकों में कही हैं, और इन्हें उनके साथ जोड़कर, तेरे पास मुझ से सब मिथ्या शिक्षकों का बहुत विस्तृत खण्डन होगा; और विश्वास के साथ और बल के साथ तू उनका विरोध करेगा, उस एकमात्र सच्चे और जीवन देनेवाले विश्वास की रक्षा में, जिसे कलीसिया ने प्रेरितों से पाया और अपने पुत्रों को दिया है।
क्योंकि सब के प्रभु ने अपने प्रेरितों को सुसमाचार की सामर्थ्य दी, जिनके द्वारा हम ने भी सत्य को जाना है, अर्थात् परमेश्वर के पुत्र की शिक्षा; जिनसे प्रभु ने यह भी कहा: "जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है; और जो तुम्हारा तिरस्कार करता है, वह मेरा तिरस्कार करता है, और मेरे भेजनेवाले का।"(1)
अध्याय एक.--प्रेरितों ने पवित्र आत्मा के वरदानों और सामर्थ्य से सम्पन्न किए जाने तक सुसमाचार का प्रचार आरम्भ नहीं किया, और न किसी बात को लेख पर रखा। उन्होंने एक ही परमेश्वर का प्रचार किया, आकाश और पृथ्वी के बनानेवाले का।
1. हम ने अपनी उद्धार की योजना और किसी से नहीं सीखी, उन से छोड़कर जिनके द्वारा सुसमाचार हमारे पास पहुँचा है, जिसे उन्होंने एक समय में खुले में प्रचार किया, और, पीछे के समय में, परमेश्वर की इच्छा से, पवित्रशास्त्र में हमें सौंप दिया, कि वह हमारे विश्वास का आधार और खम्भा हो.(2) क्योंकि यह अवैध है कि वे "सिद्ध ज्ञान" पाने से पहले प्रचार करते थे, ऐसा कहना, जैसा कुछ कहने का साहस भी करते हैं, अपने आप को प्रेरितों के सुधारक बताकर घमण्ड करते हुए। क्योंकि, हमारे प्रभु के मरे हुओं में से जी उठने के बाद, [प्रेरितों] को ऊपर से सामर्थ्य दी गई जब पवित्र आत्मा [उन पर] उतरा, वे [उसके वरदानों] सब से भरे गए, और उन्हें सिद्ध ज्ञान था: वे पृथ्वी की छोर तक गए, परमेश्वर की ओर से हमें [भेजी गई] अच्छी वस्तुओं की शुभ समाचार का प्रचार करते हुए, और मनुष्यों को स्वर्ग की शान्ति का प्रचार करते हुए, जो सचमुच सब समान रूप से और अलग अलग परमेश्वर के सुसमाचार को रखते हैं। मत्ती ने भी इब्रानियों के बीच(3) उनकी अपनी बोली में एक लिखित सुसमाचार निकाला, जब पतरस और पौलुस रोम में प्रचार कर रहे थे, और कलीसिया की नींव रख रहे थे। उनके चले जाने के बाद, मरकुस, पतरस का चेला और भाष्यकार, ने भी जो पतरस ने प्रचार किया था उसे लेख में हमें सौंप दिया। लूका ने भी, पौलुस का साथी, उसके द्वारा प्रचार किए गए सुसमाचार को एक पुस्तक में लिखा। इसके बाद, प्रभु के चेले यूहन्ना ने, जो उसकी छाती पर झुका भी था, एशिया में इफिसुस में अपने निवास के समय आप एक सुसमाचार प्रकाशित किया।
2. इन सब ने हमें यह घोषित किया है कि एक ही परमेश्वर है, आकाश और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता, घोषित
व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा; और एक ही मसीह, परमेश्वर का पुत्र। यदि कोई इन सत्यों को न माने, तो वह प्रभु के साथियों को तुच्छ जानता है; वरन्, वह प्रभु मसीह को आप तुच्छ जानता है; हाँ, वह पिता को भी तुच्छ जानता है, और अपने ही दण्ड के अधीन खड़ा रहता है, अपने ही उद्धार का विरोध और सामना करता हुआ, जैसा सब मिथ्या शिक्षकों की दशा है।
अध्याय 2.--मिथ्या शिक्षक न पवित्रशास्त्र का अनुसरण करते हैं न परम्परा का।
1. परन्तु, जब वे पवित्रशास्त्र से खण्डित किए जाते हैं, तो वे पलटकर इन्हीं पवित्रशास्त्रों पर दोष लगाते हैं, मानो वे सही नहीं, न अधिकारयुक्त, और [कहते हैं] कि वे अस्पष्ट हैं, और जो परम्परा से अनजान हैं वे उन से सत्य नहीं निकाल सकते। क्योंकि [वे आरोप लगाते हैं] कि सत्य लिखित पत्रों के द्वारा नहीं सौंपा गया, परन्तु जीवित वाणी से: इस कारण पौलुस ने भी घोषित किया, "परन्तु हम सिद्धों के बीच ज्ञान बोलते हैं, इस जगत का ज्ञान नहीं।"(1) और इस ज्ञान को उन में से हर एक अपनी ही कल्पना का गढ़ना बताता है, सचमुच; ताकि, उनकी कल्पना के अनुसार, सत्य ठीक एक समय वैलेन्तीनुस में, दूसरे समय मार्कियन में, दूसरे समय केरिन्थुस में रहता है, फिर पीछे बसिलिदेस में, या किसी और विरोधी में भी उदासीनता से रहा है,(2) जो उद्धार से सम्बन्धित कुछ भी नहीं बोल सकता था। क्योंकि इन मनुष्यों में से हर एक, पूरी रीति से टेढ़ी प्रवृत्ति का होकर, सत्य की व्यवस्था को बिगाड़ता है, और अपना प्रचार करने में लज्जित नहीं होता।
2. परन्तु, फिर, जब हम उन्हें उस परम्परा की ओर ले जाते हैं जो प्रेरितों से निकलती है, [और] जो कलीसियाओं में प्राचीनों की परम्परा के द्वारा सुरक्षित है, तो वे परम्परा पर आपत्ति करते हैं, यह कहते हुए कि वे आप केवल प्राचीनों से नहीं, प्रेरितों से भी अधिक बुद्धिमान हैं, क्योंकि उन्होंने मिलावट रहित सत्य पा लिया है। क्योंकि [वे मानते हैं] कि प्रेरितों ने व्यवस्था की बातों को उद्धारकर्ता के वचनों के साथ मिला दिया; और कि केवल प्रेरित ही नहीं, प्रभु आप भी, एक समय डेमियुर्ज से, दूसरे समय बीच के स्थान से, और फिर प्लेरोमा से बोले, परन्तु वे आप, निस्सन्देह, निर्मल रीति से, और शुद्ध रीति से, छिपे भेद का ज्ञान रखते हैं: यह, सचमुच, अत्यन्त निर्लज्ज रीति से अपने सृष्टिकर्ता की निन्दा करना है! इसलिये बात यहाँ आती है, कि ये मनुष्य अब न पवित्रशास्त्र को मानते हैं न परम्परा को।
3. ऐसे हैं वे विरोधी जिन से हमें निपटना है, मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र, फिसलने वाले साँपों के समान हर बात में बच निकलने का यत्न करते हुए। इस कारण उनका हर बात में सामना करना है, कदाचित, उनके पीछे हटने का मार्ग काटकर, हम उन्हें सत्य की ओर फेरने में सफल हों। क्योंकि, यद्यपि भूल के प्रभाव के अधीन एक प्राण के लिये मन फिराना सहज बात नहीं, तौभी, दूसरी ओर, जब सत्य उसके पास लाया जाता है तब भूल से निकलना सर्वथा असम्भव नहीं।
अध्याय 3.--मिथ्या शिक्षकों का खण्डन, इस तथ्य से, कि विविध कलीसियाओं में, अध्यक्षों की निरन्तर परम्परा बनाए रखी गई।
1. इसलिये, हर कलीसिया में, जो सत्य को देखना चाहे, हर एक की शक्ति में है, कि सारे जगत में प्रकट प्रेरितों की परम्परा को स्पष्ट रूप से ध्यान से देखे; और हम उन को गिनने की स्थिति में हैं, जिन्हें प्रेरितों ने कलीसियाओं में अध्यक्ष ठहराया, और [दिखाने के लिये] इन मनुष्यों की परम्परा को अपने ही समय तक; वे न सिखाते थे न जानते थे [इन मिथ्या शिक्षकों] के प्रलाप जैसी कोई बात। क्योंकि यदि प्रेरित छिपे भेद जानते, जिन्हें वे शेष लोगों से अलग और गुप्त रूप से "सिद्धों" को देने के अभ्यस्त थे, तो वे उन्हें विशेष कर उन को सौंपते जिन्हें वे कलीसियाओं को भी सौंप रहे थे। क्योंकि वे चाहते थे कि ये मनुष्य सब बातों में बहुत सिद्ध और निर्दोष हों, जिन्हें वे अपने उत्तराधिकारी करके छोड़ भी रहे थे, अपना शासन-स्थान इन मनुष्यों को सौंपते हुए; ये मनुष्य, यदि अपना काम सच्चाई से निभाते, [कलीसिया के लिये] बड़ा वरदान होते, परन्तु यदि वे गिर जाते, तो सबसे भयंकर विपत्ति।
2. तौभी, इस प्रकार के ग्रन्थ में, सब कलीसियाओं की परम्पराओं को गिनना बहुत थकाऊ होता, इसलिये हम उन सब को घबराहट में डालते हैं, जो किसी भी रीति से, चाहे दुष्ट आत्म-प्रसन्नता से, चाहे व्यर्थ महिमा से, या अन्धेपन और टेढ़ी राय से, बिना अधिकार की सभाओं में इकट्ठे होते हैं; [हम यह करते हैं, मैं कहता हूँ,] प्रेरितों से आई उस परम्परा को दिखाकर, जो उस अति महान, अति प्राचीन, और सर्वत्र ज्ञात कलीसिया की है, जो दो अति महिमावान प्रेरितों, पतरस और पौलुस, द्वारा रोम में स्थापित और व्यवस्थित हुई; तथा [दिखाकर] मनुष्यों को प्रचारित विश्वास को, जो अध्यक्षों की परम्पराओं के द्वारा हमारे समय तक उतरता है। क्योंकि यह आवश्यक बात है कि हर कलीसिया इस कलीसिया से सहमत हो, उसके प्रमुख अधिकार के कारण,(3) अर्थात्, विश्वासी every-
जहाँ, इसलिये कि प्रेरितीय परम्परा उन [विश्वासयोग्य मनुष्यों] के द्वारा लगातार सुरक्षित रही है जो हर जगह हैं।
3. तब धन्य प्रेरितों ने, कलीसिया की नींव रखकर उसे बनाकर, अध्यक्ष-पद का कार्य लीनुस के हाथों में सौंप दिया। इस लीनुस का उल्लेख पौलुस तीमुथियुस को पत्रियों में करता है। उसके बाद अनाक्लेतुस उत्तराधिकारी हुआ; और उसके बाद, प्रेरितों से 3रे स्थान में, क्लेमेंट को अध्यक्षता दी गई। यह मनुष्य, क्योंकि उसने धन्य प्रेरितों को देखा था, और उनसे परिचित रहा था, उसके विषय में कहा जा सकता है कि प्रेरितों का प्रचार अभी भी [उसके कानों में] गूँज रहा था, और उनकी परम्पराएँ उसकी आँखों के सामने थीं। न वह अकेला [इसमें] था, क्योंकि बहुत से और भी शेष थे जिन्होंने प्रेरितों से शिक्षा पाई थी। इस क्लेमेंट के समय, कुरिन्थ में भाइयों के बीच छोटी नहीं कलह उत्पन्न हुई, तब रोम की कलीसिया ने कुरिन्थियों को एक अत्यन्त बलवन्त पत्र भेजा, उन्हें शान्ति के लिये उभारते हुए, उनके विश्वास को नया करते हुए, और उस परम्परा को घोषित करते हुए जो उसे हाल ही में प्रेरितों से मिली थी, एक ही परमेश्वर का प्रचार करते हुए, सर्वशक्तिमान, आकाश और पृथ्वी का कर्ता, मनुष्य का सृष्टिकर्ता, जिसने जलप्रलय लाया, और अब्राहम को बुलाया, जिसने लोगों को मिस्र देश से निकाला, मूसा से बातें कीं, व्यवस्था दी, भविष्यद्वक्ताओं को भेजा, और जिसने शैतान और उसके दूतों के लिये आग तैयार की है। इस लेख से, जो कोई ऐसा करना चाहे, सीख सकता है कि वह, हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता, कलीसियाओं द्वारा प्रचारित हुआ, और कलीसिया की प्रेरितीय परम्परा को भी समझ सकता है, क्योंकि यह पत्र उन मनुष्यों से पुरानी तारीख का है जो अब झूठ फैला रहे हैं, और जो सृष्टिकर्ता और अस्तित्व में सब वस्तुओं के कर्ता से परे दूसरे परमेश्वर को अस्तित्व में मन्त्रवत् बुलाते हैं। इस क्लेमेंट के बाद एवारिस्तुस उत्तराधिकारी हुआ।
एवारिस्तुस के बाद अलेक्जेंडर आया; तब, प्रेरितों से 6वाँ, सिक्स्तुस नियुक्त हुआ; उसके बाद, तेलेफोरुस, जो महिमा के साथ शहीद हुआ; तब हाइगिनुस; उसके बाद, पियुस; तब उसके बाद, अनिकेतुस। सोरेर अनिकेतुस का उत्तराधिकारी होकर, एल्यूथेरियुस अब, प्रेरितों से 12वें स्थान में, अध्यक्षता की विरासत को धारण करता है। इस क्रम में, और इस परम्परा से, प्रेरितों से कलीसियाई परम्परा, और सत्य का प्रचार, हमारे पास उतरा है। और यह अत्यन्त भरपूर प्रमाण है कि एक ही और वही जीवनदायी विश्वास है, जो प्रेरितों से अब तक कलीसिया में सुरक्षित रहा है, और सत्य में सौंपा गया है।
4. परन्तु पॉलीकार्प भी केवल प्रेरितों से शिक्षा पाकर नहीं रहा, और बहुतों से बातें कीं जिन्होंने मसीह को देखा था, वरन् एशिया में प्रेरितों द्वारा, स्मुरना की कलीसिया का अध्यक्ष भी ठहराया गया, जिसे मैं ने भी अपनी आरम्भिक युवावस्था में देखा, क्योंकि वह [पृथ्वी पर] बहुत लम्बे समय तक ठहरा, और, बहुत बूढ़ा होकर, महिमा के साथ और अत्यन्त उत्तम रीति से शहादत सहकर,(1) इस जीवन से चला गया, उन बातों को सदा सिखाता रहा जो उसने प्रेरितों से सीखी थीं, और जिन्हें कलीसिया ने सौंपा है, और जो अकेली सत्य हैं। इन बातों की एशिया की सब कलीसियाएँ गवाही देती हैं, वैसे ही वे मनुष्य भी जो पॉलीकार्प के बाद आज तक उत्तराधिकारी हुए हैं,--एक मनुष्य जो वैलेन्तीनुस, और मार्कियन, और शेष मिथ्या शिक्षकों से बहुत अधिक भारवाला, और सत्य का अधिक स्थिर गवाह था।
वही था, जो अनिकेतुस के समय रोम आकर, उक्त मिथ्या शिक्षकों से बहुतों को परमेश्वर की कलीसिया की ओर फेर दिया, यह प्रचार करते हुए कि उसे यह एक और अकेला सत्य प्रेरितों से मिला है,--अर्थात्, जो कलीसिया द्वारा सौंपा जाता है.(2) वे भी हैं जिन्होंने उससे सुना कि यूहन्ना, प्रभु का चेला, इफिसुस में स्नान करने गया, और केरिन्थुस को भीतर देखकर, बिना स्नान किए स्नान-गृह से बाहर दौड़ा, यह चिल्लाते हुए, "हम उड़ चलें, कहीं स्नान-गृह भी गिर न पड़े, क्योंकि केरिन्थुस, सत्य का शत्रु, भीतर है।" और पॉलीकार्प ने आप मार्कियन को उत्तर दिया, जो एक अवसर पर उससे मिला, और बोला, "क्या तू मुझे जानता है?" "मैं तुझे जानता हूँ, शैतान का 1ला-जेठा।" ऐसा ही भय प्रेरितों और उनके चेलों को सत्य के किसी भी बिगाड़नेवाले के साथ मौखिक बातचीत रखने तक के विरुद्ध था; जैसा पौलुस भी कहता है, "जो मनुष्य मिथ्या शिक्षक है, 1ली और 2री चेतावनी के बाद, उसे अस्वीकार कर; यह जानकर कि जो ऐसा है वह उलट गया है, और पाप करता है, अपने ही से दण्डित होकर।"(3) पॉलीकार्प की एक बहुत बलवन्त(4) पत्री भी है, जो फिलिप्पियों को लिखी गई, जिससे जो ऐसा करना चाहें, और अपने उद्धार की चिन्ता रखते हों, उसके विश्वास का स्वरूप, और सत्य का प्रचार सीख सकते हैं। फिर, इफिसुस की कलीसिया, जो पौलुस द्वारा स्थापित हुई, और जिसमें यूहन्ना त्राजन के समय तक स्थायी रूप से उनके बीच रहा, प्रेरितों की परम्परा की सच्ची गवाह है।
अध्याय 4.--सत्य कैथोलिक कलीसिया को छोड़ और कहीं नहीं मिलता, जो प्रेरितीय शिक्षा का एकमात्र निक्षेप-स्थान है। मिथ्या शिक्षाएँ हाल की रचना की हैं, और अपना मूल प्रेरितों तक नहीं खोज सकतीं।
1. इसलिये जब हमारे पास ऐसे प्रमाण हैं, तो सत्य को औरों के बीच खोजना आवश्यक नहीं, जिसे कलीसिया से पाना सहज है; क्योंकि प्रेरितों ने, एक धनी मनुष्य के समान [अपना धन] कोष में [जमा करते हुए], उसके हाथों में सत्य से सम्बन्धित सब बातें अत्यन्त भरपूर रीति से रख दीं: ताकि हर मनुष्य, जो चाहे, उससे खींच सके उस
जीवन का जल.(1) क्योंकि वह जीवन का प्रवेश है; और सब चोर और डाकू हैं। इस कारण हम उन्हें छोड़ने को बाध्य हैं, परन्तु कलीसिया से सम्बन्धित बात को अत्यन्त यत्न से चुनने को, और सत्य की परम्परा को पकड़ने को। क्योंकि बात कैसी है? मान लो हमारे बीच किसी महत्वपूर्ण प्रश्न(2) के विषय में विवाद उठे, तो क्या हम उन अति प्राचीन कलीसियाओं की शरण न लें जिनसे प्रेरितों ने निरन्तर बातचीत रखी, और उनसे सीखें कि वर्तमान प्रश्न के विषय में क्या निश्चित और स्पष्ट है? क्योंकि यदि प्रेरितों ने आप हमें लेख न छोड़े होते तो कैसा होता? क्या [उस दशा में,] उस परम्परा के मार्ग पर चलना आवश्यक न होता जिसे उन्होंने उन को सौंपा जिन्हें उन्होंने कलीसियाएँ सौंपी थीं?
2. इस मार्ग को उन अनार्यों की बहुत सी जातियाँ मानती हैं जो मसीह पर विश्वास करती हैं, आत्मा के द्वारा अपने हृदयों में उद्धार लिखा हुआ पाकर, कागज या स्याही के बिना, प्राचीन परम्परा को(3) यत्न से सुरक्षित रखते हुए, एक ही परमेश्वर पर विश्वास करते हुए, आकाश और पृथ्वी और उनमें की सब वस्तुओं के सृष्टिकर्ता पर, मसीह यीशु के द्वारा, जो परमेश्वर का पुत्र है; जिसने, अपनी सृष्टि के प्रति अपने अति उत्तम प्रेम के कारण, कुँवारी से जन्म लेने को झुकना स्वीकार किया, वह आप मनुष्य को अपने द्वारा परमेश्वर से जोड़ता हुआ, और पुन्तियुस पीलातुस के अधीन दुःख उठाकर, और फिर जी उठकर, और तेज में ऊपर ग्रहण किए जाकर, महिमा में आएगा, बचाए हुओं का उद्धारकर्ता, और जिनका न्याय होता है उनका न्यायी, और जो सत्य को बदलते हैं, और उसके पिता और उसके आगमन को तुच्छ जानते हैं उन्हें अनन्त आग में भेजता हुआ। जिन्होंने, लिखित पत्रों के अभाव में,(4) इस विश्वास पर विश्वास किया है, वे अनार्य हैं, हमारी भाषा के विषय में; परन्तु शिक्षा, चाल, और जीवन की धारा के विषय में, वे, विश्वास के कारण, सचमुच बहुत बुद्धिमान हैं; और वे परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं, सब धर्म, शील, और बुद्धि में अपनी चाल को व्यवस्थित करते हुए। यदि कोई इन मनुष्यों को मिथ्या शिक्षकों की कल्पनाओं का प्रचार करे, उनसे उनकी अपनी भाषा में बोलते हुए, तो वे तुरन्त अपने कान बन्द कर लेंगे, और जितना सम्भव हो उतना दूर भाग जाएँगे, निन्दापूर्ण सम्बोधन को सुनना भी न सहते हुए। इस प्रकार, प्रेरितों की उस प्राचीन परम्परा के द्वारा, वे अपने मन को इन शिक्षकों की अद्भुत भाषा [द्वारा सुझाई गई शिक्षाओं] में से कुछ भी गर्भ में धारण करने नहीं देते, जिनके बीच न कलीसिया न शिक्षा कभी स्थापित हुई है।
3. क्योंकि, वैलेन्तीनुस से पहले, जो वैलेन्तीनुस के पीछे चलते हैं उनका अस्तित्व नहीं था; न मार्कियन से पहले मार्कियन से निकले लोग थे; संक्षेप में, उन दुर्बुद्धि लोगों में से किसी का भी, जिन्हें मैं ने ऊपर गिना है, उनकी टेढ़ी चाल के आरम्भ करनेवालों और गढ़नेवालों से पहले कोई होना नहीं था। क्योंकि वैलेन्तीनुस हाइगिनुस के समय रोम आया, पियुस के अधीन फला, और अनिकेतुस तक रहा। केर्डोन भी, मार्कियन का पूर्ववर्ती, आप हाइगिनुस के समय पहुँचा, जो 9वाँ अध्यक्ष था.(5) बार बार कलीसिया में आकर, और खुला अंगीकार करके, वह इस प्रकार रहा, एक समय गुप्त में सिखाता, और फिर खुला अंगीकार करता; परन्तु अन्त में, भ्रष्ट शिक्षा के लिये दोषी ठहराए जाकर, वह भाइयों की सभा से अलग किया गया(6)। तब मार्कियन, उसका उत्तराधिकारी होकर, अनिकेतुस के अधीन फला, जिसने अध्यक्षता का 10वाँ स्थान धारण किया। परन्तु शेष, जो ग्नोस्टिक कहलाते हैं, मेनान्दर से, शमौन के चेले से, उदय होते हैं, जैसा मैं ने दिखाया है; और उन में से हर एक उस शिक्षा का पिता भी और महायाजक भी दिखाई दिया जिसमें वह प्रवेश कराया गया है। परन्तु ये सब (मार्कोसियन) अपने धर्मत्याग में बहुत पीछे फूट पड़े, कलीसिया के बीच के काल में भी।
अध्याय 5. -- मसीह और उसके प्रेरितों ने, बिना किसी छल, धोखे, या कपट के, प्रचार किया कि एक ही परमेश्वर, पिता, सब वस्तुओं का संस्थापक था। उन्होंने अपनी शिक्षा को अपने श्रोताओं के पूर्वग्रहों के अनुकूल नहीं किया।
1. इसलिये, क्योंकि प्रेरितों की परम्परा इस प्रकार कलीसिया में है, और हमारे बीच स्थायी है, हम उन प्रेरितों के दिए Scrip-rural प्रमाण की ओर लौटें, जिन्होंने सुसमाचार भी लिखा, जिसमें उन्होंने परमेश्वर के विषय की शिक्षा लिखी, यह दिखाते हुए कि हमारा प्रभु यीशु मसीह सत्य है,(7) और उसमें कोई झूठ नहीं। जैसा दाऊद भी कहता है, कुँवारी से उसके जन्म की, और मरे हुओं में से जी उठने की भविष्यद्वाणी करते हुए, "सत्य भूमि से अंकुरित हुआ है।"(8) प्रेरित भी, सत्य के चेले होकर, सब झूठ से ऊपर हैं; क्योंकि झूठ का सत्य के साथ कोई संग नहीं, जैसा अन्धकार का उजियाले के साथ नहीं, परन्तु एक की उपस्थिति दूसरे को बाहर कर देती है। इसलिये हमारा प्रभु, सत्य होकर, झूठ नहीं बोला; और जिसे वह जानता था कि उसने de-feet से उत्पत्ति ली है, उसे वह कभी परमेश्वर नहीं मानता, सब का परमेश्वर भी, सर्वोच्च राजा भी, और अपना पिता भी, एक अपूर्ण को पूर्ण के रूप में, एक प्राणमय को आत्मिक के रूप में, जो प्लेरोमा से बाहर था उसे जो उसके भीतर था उसके रूप में।
न उसके चेलों ने किसी और परमेश्वर का उल्लेख किया, या किसी और प्रभु का नाम लिया, उसको छोड़कर, जो सचमुच सब का परमेश्वर और प्रभु था, जैसा ये अत्यन्त व्यर्थ तर्कवादी दृढ़ करते हैं कि प्रेरितों ने कपट से अपनी शिक्षा अपने श्रोताओं की क्षमता के अनुसार गढ़ी, और अपने प्रश्न करनेवालों की रायों के अनुसार उत्तर दिए,--अन्धों के लिये उनकी अन्धाई के अनुसार अन्धी बातें गढ़ते हुए; मन्दों के लिये उनकी मन्दता के अनुसार; भूल में पड़े लोगों के लिये उनकी भूल के अनुसार। और जिन्होंने कल्पना की कि केवल डेमियुर्ज ही परमेश्वर है, उन्हें उन्होंने उसका प्रचार किया; परन्तु जो अनाम पिता को ग्रहण करने के योग्य हैं, उन्हें उन्होंने दृष्टान्तों और पहेलियों के द्वारा अकथनीय भेद घोषित किया: ताकि प्रभु और प्रेरितों ने शिक्षक का पद सत्य के काम को आगे बढ़ाने को नहीं, वरन् कपट में भी, और जैसा हर व्यक्ति उसे ग्रहण कर सकता था, निभाया!
5. ऐसी [चाल] उन की नहीं जो चंगा करते हैं, या जो जीवन देते हैं: वह बल्कि उन की है जो रोग लाते हैं, और अज्ञान बढ़ाते हैं; और इन मनुष्यों से बहुत अधिक सत्य व्यवस्था पाई जाएगी, जो हर एक को शापित ठहराती है जो अन्धे को मार्ग में भटकाता है। क्योंकि प्रेरित, जो भटकनेवालों को ढूँढ़ने को, और जो नहीं देखते उन्हें दृष्टि होने को, और निर्बलों को औषधि होने को नियुक्त थे, निश्चय ही उन्हें उस समय की उनकी राय के अनुसार सम्बोधित नहीं करते थे, परन्तु प्रकट सत्य के अनुसार। क्योंकि किसी भी प्रकार के व्यक्ति ठीक न चलते, यदि वे अन्धे मनुष्यों को, जो खड़ी चट्टान से गिरने ही वाले हों, अपना अत्यन्त खतरनाक मार्ग जारी रखने की सलाह दें, मानो वह सही हो, और मानो वे सुरक्षा में आगे जा सकते हों। या कौन सा वैद्य, जो रोगी को चंगा करने की चिन्ता रखता हो, रोगी की सनक के अनुसार लिखेगा, और आवश्यक औषधि के अनुसार नहीं? परन्तु यह कि प्रभु रोगियों का वैद्य होकर आया, वह आप घोषित करता है, यह कहते हुए, "जो ठीक हैं उन्हें वैद्य की आवश्यकता नहीं, परन्तु जो रोगी हैं; मैं धर्मियों को बुलाने नहीं आया, परन्तु पापियों को मन फिराव के लिये।"(1) तो रोगी कैसे बलवन्त होंगे, या पापी मन फिराव तक कैसे आएँगे? क्या उन्हीं मार्गों में ही दृढ़ रहकर? या, इसके विपरीत, क्या अपने पहले के जीवन के ढंग के बड़े परिवर्तन और उलट से, जिसके द्वारा उन्होंने अपने ऊपर थोड़ी नहीं बीमारी, और बहुत पाप लाए हैं? परन्तु अज्ञान, इन सब की माता, ज्ञान से बाहर निकाला जाता है। इस कारण प्रभु अपने चेलों को ज्ञान दिया करता था, जिसके द्वारा भी उसका अभ्यास था कि दुःख उठानेवालों को चंगा करे, और पापियों को पाप से पीछे रोके।
इसलिये उसने उन्हें उनके पुराने विचारों के अनुसार सम्बोधित नहीं किया, न अपने प्रश्न करनेवालों की राय के मेल में उन्हें उत्तर दिया, परन्तु उद्धार की ओर ले जानेवाली शिक्षा के अनुसार, बिना कपट या व्यक्ति का पक्ष लिए।
3. यह प्रभु के वचनों से भी स्पष्ट होता है, जिसने सचमुच खतना किए हुओं को परमेश्वर के पुत्र को प्रकट किया--उसे जिसकी भविष्यद्वक्ताओं ने मसीह के रूप में पहले से भविष्यद्वाणी की थी; अर्थात्, उसने अपने आप को रखा, जिसने स्वतन्त्रता मनुष्यों को लौटाई, और उन्हें अविनाशिता को मीरास दी। और फिर, प्रेरितों ने अन्यजातियों को सिखाया कि वे व्यर्थ ठूँठों और पत्थरों को छोड़ें, जिन्हें वे देवता समझते थे, और सच्चे परमेश्वर की आराधना करें, जिसने सारे मानव कुल को रचा और बनाया, और, अपनी सृष्टि के द्वारा, उन्हें पालता, बढ़ाता, बल देता, और अस्तित्व में सुरक्षित रखता था; और कि वे उसके पुत्र यीशु मसीह की बाट देखें, जिसने अपने ही लोहू से धर्मत्याग से हमें छुड़ाया, ताकि हम भी एक पवित्र किया हुआ लोग हों, -- जो अपने पिता की सामर्थ्य में स्वर्ग से भी उतरेगा, और सब पर न्याय करेगा, और जिन्होंने उसकी आज्ञाओं को माना होगा उन्हें परमेश्वर की अच्छी वस्तुएँ सेंतमेंत देगा। वह, इन अन्तिम समयों में प्रकट होकर, मुख्य कोने का पत्थर, दूर के लोगों को और निकट के लोगों को एक में इकट्ठा किया, और जोड़ा है;(2) अर्थात्, खतना और खतनारहित को, येपेत को बढ़ाकर, और उसे शेम के निवास में रखता हुआ.(3)
अध्याय 6 -- पवित्र आत्मा ने, पूरे पुराने नियम के पवित्रशास्त्र में, किसी और परमेश्वर या प्रभु का उल्लेख नहीं किया, उसको छोड़कर जो सच्चा परमेश्वर है।
1. इसलिये न प्रभु, न पवित्र आत्मा, न प्रेरित, कभी उसको परमेश्वर कहकर, निश्चित और पूर्ण रीति से, नाम देते जो परमेश्वर नहीं था, जब तक वह सचमुच परमेश्वर न हो; न वे किसी को उसके अपने व्यक्ति में प्रभु कहते, सब पर राज्य करनेवाले परमेश्वर पिता को छोड़कर, और उसके पुत्र को, जिसने अपने पिता से सारी सृष्टि पर प्रभुता पाई है, जैसा इस अंश में है: "प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, तू मेरे दाहिने बैठ, जब तक मैं तेरे शत्रुओं को तेरे चरणों की चौकी न कर दूँ।"(4) यहाँ [पवित्रशास्त्र] हमें पिता को पुत्र से बातें करते हुए दिखाता है; जिसने उसे अन्यजातियों का उत्तराधिकार दिया, और उसके सब शत्रुओं को उसके अधीन किया। इसलिये, क्योंकि पिता सचमुच प्रभु है, और पुत्र सचमुच प्रभु है, पवित्र आत्मा ने उन्हें प्रभु की उपाधि से योग्य रीति से निर्दिष्ट किया है। और फिर, सदोमियों के नाश की ओर संकेत करते हुए, पवित्रशास्त्र कहता है, "तब प्रभु ने सदोम पर और अमोरा पर स्वर्ग से प्रभु की ओर से आग और गन्धक बरसाया।"(5) क्योंकि यहाँ यह दिखाता है कि पुत्र, जो अब्राहम से बातें भी कर रहा था, सदोमियों का न्याय करने की सामर्थ्य पा चुका था
उनकी दुष्टता के लिये। और यह [पीछे का पाठ] वही सत्य घोषित करता है: "तेरा सिंहासन, हे परमेश्वर; युगानुयुग है; तेरे राज्य का राजदण्ड धर्म का राजदण्ड है। तू ने धर्म से प्रेम किया, और अधर्म से बैर किया: इसलिये परमेश्वर, तेरे परमेश्वर, ने तुझे अभिषेक किया है।"(1) क्योंकि आत्मा दोनों [को] परमेश्वर के नाम से निर्दिष्ट करता है -- पुत्र के रूप में अभिषिक्त को भी, और अभिषेक करनेवाले को भी, अर्थात् पिता को। और फिर: "परमेश्वर देवताओं की मण्डली में खड़ा हुआ, वह देवताओं के बीच न्याय करता है।"(2) वह [यहाँ] पिता और पुत्र की, और जिन्होंने दत्तक-ग्रहण पाया है उनकी ओर संकेत करता है; परन्तु ये कलीसिया हैं। क्योंकि वह परमेश्वर की सभा है, जिसे परमेश्वर--अर्थात् पुत्र आप--ने अपने द्वारा इकट्ठा किया है। जिनके विषय में वह फिर कहता है: "देवताओं का परमेश्वर, प्रभु ने कहा है, और पृथ्वी को बुलाया है।"(3) परमेश्वर से कौन अभिप्रेत है? वह जिसके विषय में उसने कहा है, "परमेश्वर खुले रूप में आएगा, हमारा परमेश्वर, और चुप न रहेगा; "(4) अर्थात् पुत्र, जो मनुष्यों के पास प्रकट होकर आया, जिन्होंने कहा, "मैं ने उन्हें खुले रूप में दर्शन दिया जो मुझे नहीं खोजते।"(5) परन्तु किन देवताओं के विषय में [वह बोलता है]? [उनके विषय में] जिनसे वह कहता है, "मैं ने कहा, तुम देवता हो, और सब सर्वोच्च के पुत्र।"(6) निस्सन्देह उन से, जिन्होंने "दत्तक-ग्रहण, जिसके द्वारा हम पुकारते हैं, अब्बा पिता."(7) का अनुग्रह पाया है.
2. इस कारण, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, और कोई परमेश्वर कहकर नहीं कहा जाता, या प्रभु नहीं पुकारा जाता, उसको छोड़कर जो सब का परमेश्वर और प्रभु है, जिसने मूसा से भी कहा, "मैं जो हूँ सो हूँ। और तू इस्राएल की सन्तान से यों कहना: जो है, उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है;"(8) और उसका पुत्र यीशु मसीह हमारा प्रभु, जो उसके नाम पर विश्वास करनेवालों को परमेश्वर के पुत्र बनाता है। और फिर, जब पुत्र मूसा से बोलता है, वह कहता है, "मैं इस लोगों को छुड़ाने को उतरा हूँ।"(9) क्योंकि वही मनुष्यों के उद्धार के लिये उतरा और चढ़ा। इसलिये परमेश्वर पुत्र के द्वारा घोषित किया गया है, जो पिता में है, और अपने में पिता को रखता है -- जो है, पिता पुत्र की गवाही देता हुआ, और पुत्र पिता की घोषणा करता हुआ। -- जैसा एसायास भी कहता है, "मैं भी साक्षी हूँ," वह घोषित करता है, "प्रभु परमेश्वर कहता है, और पुत्र जिसे मैं ने चुना है, ताकि तुम जानो, और विश्वास करो, और समझो कि मैं हूँ।"(10)
3. परन्तु, जब पवित्रशास्त्र उन्हें [देवता] कहता है जो देवता नहीं हैं, तो वह, जैसा मैं पहले टिप्पणी कर चुका हूँ, उन्हें हर अर्थ में देवता घोषित नहीं करता, परन्तु एक निश्चित जोड़ और संकेत के साथ, जिससे वे दिखाए जाते हैं कि वे बिलकुल देवता नहीं हैं। जैसा दाऊद के साथ: "अन्यजातियों के देवता दुष्टात्माओं की मूर्तियाँ हैं;"(11) और, "तुम और देवताओं के पीछे न चलना"(12) क्योंकि इसमें कि वह कहता है "अन्यजातियों के देवता"-- परन्तु अन्यजाति सच्चे परमेश्वर से अनजान हैं -- और उन्हें "और देवता" कहता है, वह उनके दावे को [देखे जाने के लिये] देवता के रूप में बिलकुल रोकता है। परन्तु वे अपने ही व्यक्ति में क्या हैं, वह उनके विषय में बोलता है; "क्योंकि वे हैं," वह कहता है, "दुष्टात्माओं की मूर्तियाँ।" और एसायास: "वे लज्जित हों, सब जो परमेश्वर की निन्दा करते हैं, और निकम्मी वस्तुएँ तराशते हैं;(13) मैं ही साक्षी हूँ, परमेश्वर कहता है।"(14) वह उन्हें देवताओं [की श्रेणी] से हटाता है, परन्तु वह केवल शब्द का उपयोग करता है, इस [उद्देश्य] के लिये, कि हम जानें वह किसके विषय में बोलता है। यिर्मयाह भी वही कहता है: "वे देवता जिन्होंने आकाश और पृथ्वी नहीं बनाए, आकाश के नीचे की पृथ्वी से नाश हों।"(15) क्योंकि, उनका नाश पीछे जोड़ देने के तथ्य से, वह दिखाता है कि वे बिलकुल देवता नहीं हैं। एलियास भी, जब सारा इस्राएल कर्मेल पर्वत पर इकट्ठा था, उन्हें मूर्तिपूजा से फेरना चाहता हुआ, उनसे कहता है, "तुम दो रायों के बीच कब तक लँगड़ाते रहोगे?(16) यदि प्रभु परमेश्वर है,(17) उसके पीछे चलो।"(18) और फिर, होमबलि पर, वह मूर्तिपूजक याजकों को इस प्रकार सम्बोधित करता है: "तुम अपने देवताओं के नाम पर पुकारना, और मैं अपने परमेश्वर प्रभु के नाम पर पुकारूँगा; और जो प्रभु आग से सुने,(19) वही परमेश्वर है।" अब, भविष्यद्वक्ता के ये वचन कहने के तथ्य से, वह सिद्ध करता है कि ये देवता, जो उन मनुष्यों के बीच ऐसे गिने जाते थे, बिलकुल देवता नहीं हैं।
उसने उन्हें उस परमेश्वर की ओर चलाया जिस पर वह विश्वास करता था, और जो सचमुच परमेश्वर था; उसे पुकारते हुए, उसने पुकारा, "अब्राहम के परमेश्वर प्रभु, इसहाक के परमेश्वर, और याकूब के परमेश्वर, आज मेरी सुन, और यह सारी प्रजा जाने कि तू ही इस्राएल का परमेश्वर है।"(20)
4. इस कारण मैं भी तुझे पुकारता हूँ, अब्राहम के परमेश्वर प्रभु, और इसहाक के परमेश्वर, और याकूब और इस्राएल के परमेश्वर, तू हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता है, वह परमेश्वर, जिसने अपनी दया की बहुतायत के द्वारा, हम पर कृपा की है, कि हम तुझे जानें, तू ने आकाश और पृथ्वी बनाए हैं, तू सब पर राज्य करता है, तू अकेला और सच्चा परमेश्वर है, जिसके ऊपर और कोई परमेश्वर नहीं; दे, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, पवित्र आत्मा की शासन करनेवाली सामर्थ्य; इस पुस्तक के हर पाठक को तुझे जानने दे, कि तू अकेला परमेश्वर है, तुझ में दृढ़ किए जाने को, और हर मिथ्या, और परमेश्वर-रहित, और अधर्मी शिक्षा से बचने को।
5. और प्रेरित पौलुस भी, यह कहते हुए, "क्योंकि यद्यपि तुम ने उनकी सेवा की जो परमेश्वर नहीं हैं; अब तुम परमेश्वर को जानते हो, या बल्कि, परमेश्वर से जाने गए हो,"(1) ने जो [देवता] नहीं थे उन्हें और जो परमेश्वर है उसे अलग किया है। और फिर, मसीह-विरोधी के विषय में बोलते हुए, वह कहता है, "जो विरोध करता है और अपने आप को सब से ऊपर उठाता है जो परमेश्वर कहलाता है, या जिसकी आराधना की जाती है।"(2) वह यहाँ उन्हें दिखाता है जो देवता कहलाते हैं, ऐसे लोगों द्वारा जो परमेश्वर को नहीं जानते, अर्थात् मूर्तियाँ। क्योंकि सब का पिता परमेश्वर कहलाता है, और है भी; और मसीह-विरोधी उसके ऊपर नहीं, परन्तु उनके ऊपर उठाया जाएगा जो सचमुच देवता कहलाते हैं, परन्तु हैं नहीं। और पौलुस आप कहता है कि यह सत्य है: "हम जानते हैं कि मूर्ति कुछ नहीं है, और कि एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं। क्योंकि यद्यपि देवता कहलानेवाले हैं, चाहे स्वर्ग में या पृथ्वी पर; तौभी हमारे लिये एक ही परमेश्वर है, पिता, जिस से सब वस्तुएँ हैं, और हम उसके द्वारा; और एक प्रभु यीशु मसीह, जिसके द्वारा सब वस्तुएँ हैं, और हम उसके द्वारा।"(3) क्योंकि उसने भेद किया है, और जिन्होंने सचमुच देवता कहलाकर कुछ नहीं हैं उन्हें एक परमेश्वर पिता से अलग किया है, जिस से सब वस्तुएँ हैं, और, उसने अत्यन्त निश्चय की रीति से अपने ही व्यक्ति में एक प्रभु यीशु मसीह को माना है।
परन्तु इस [खण्ड] में, "चाहे स्वर्ग में या पृथ्वी पर," वह जगत के रचयिताओं के विषय में नहीं बोलता, जैसा ये [शिक्षक] उसकी व्याख्या करते हैं; परन्तु उसका अर्थ मूसा के अर्थ के समान है, जब कहा जाता है, "तू अपने लिये परमेश्वर के निमित्त कोई प्रतिमा न बनाना, जो कुछ वस्तुएँ ऊपर स्वर्ग में हैं, जो कुछ नीचे पृथ्वी पर है, और जो कुछ पृथ्वी के नीचे जल में है।"(4) और वह स्वर्ग की वस्तुओं का अर्थ इस प्रकार समझाता है: "कहीं ऐसा न हो," वह कहता है, "कि स्वर्ग की ओर देखकर, और सूर्य, और चन्द्रमा, और तारों, और स्वर्ग के सारे शृंगार को ध्यान से देखकर, भूल में पड़कर, तू उनकी आराधना और सेवा करे।"(5) और मूसा आप, परमेश्वर का मनुष्य होकर, सचमुच फिरौन के सामने देवता के रूप में दिया गया;(6) परन्तु वह उचित रीति से प्रभु नहीं कहा जाता, न भविष्यद्वक्ताओं द्वारा परमेश्वर पुकारा जाता है, परन्तु आत्मा द्वारा "मूसा, परमेश्वर का विश्वासयोग्य मन्त्री और दास,"(7) कहा जाता है, जो वह था भी।
अध्याय 7. -- पवित्र पौलुस के वचनों पर आधारित आपत्ति का उत्तर (2 कुरिन्थियों 4. 5 (वास्तव में 2 कुरिन्थियों 4:4editor)). पवित्र पौलुस कभी कभी शब्दों को उनके व्याकरण, क्रम में नहीं करता।
1. उनके इस दृढ़ करने के विषय में कि पौलुस ने कुरिन्थियों को 2री [पत्री] में स्पष्ट कहा, "जिसमें इस जगत के देवता ने अविश्वासियों के मनों को अन्धा कर दिया है,"(8) और यह मानने के विषय में कि इस जगत का सचमुच एक देवता है, परन्तु दूसरा है जो सब प्रधानता, और आदि, और सामर्थ्य से परे है, हम दोषी नहीं ठहरेंगे यदि वे, जो कहते हैं कि वे आप परमेश्वर से परे भेद जानते हैं, पौलुस को पढ़ना नहीं जानते। क्योंकि यदि कोई अंश को इस प्रकार पढ़े--पौलुस की रीति के अनुसार, जैसा मैं और कहीं दिखाता हूँ, और बहुत उदाहरणों से, कि वह शब्दों का स्थानान्तरण करता है --"जिसमें परमेश्वर," तब उसे विराम देकर, और थोड़ा अन्तराल बनाकर, और उसी समय शेष [वाक्य] को भी एक [खण्ड] में पढ़े, "इस जगत के अविश्वासियों के मनों को अन्धा कर दिया है," तो वह सच्चा [अर्थ] पाएगा; कि वह इस अभिव्यक्ति में है, "परमेश्वर ने इस जगत के अविश्वासियों के मनों को अन्धा कर दिया है।" और यह छोटे अन्तराल [खण्डों के बीच] के द्वारा दिखाया जाता है। क्योंकि पौलुस नहीं कहता, "इस जगत का परमेश्वर," मानो उसके परे किसी और को मानता हो; परन्तु उसने परमेश्वर को सचमुच परमेश्वर माना। और वह कहता है, "इस जगत के अविश्वासी," क्योंकि वे अविनाशिता के आनेवाले युग के वारिस नहीं होंगे। मैं पौलुस से ही दिखाऊँगा, यह कैसे है कि परमेश्वर ने अविश्वासियों के मनों को अन्धा किया है, इस काम के क्रम में, कि हम अभी हाथ के विषय से अपना मन, [भटकते हुए] विस्तृत रूप से, न हटाएँ।
2. बहुत और उदाहरणों से भी, हम जान सकते हैं कि प्रेरित अपने वाक्यों में बार बार उलटे क्रम का उपयोग करता है, अपने प्रवचनों की तीव्रता के कारण, और उसमें जो आत्मा है उसके वेग के कारण। एक उदाहरण गलातियों को [पत्री] में आता है, जहाँ वह अपने आप को इस प्रकार प्रकट करता है: "तो फिर कर्मों की व्यवस्था क्यों?(9) वह जोड़ दी गई, जब तक वह वंश न आए जिससे प्रतिज्ञा की गई थी; दूतों द्वारा एक मध्यस्थ के हाथ में ठहराई गई।"(10) क्योंकि शब्दों का क्रम इस प्रकार चलता है: "तो फिर कर्मों की व्यवस्था क्यों? दूतों द्वारा एक मध्यस्थ के हाथ में ठहराई गई, वह जोड़ दी गई जब तक वह वंश न आए जिससे प्रतिज्ञा की गई थी," -- मनुष्य इस प्रकार प्रश्न पूछता हुआ, और आत्मा उत्तर देता हुआ। और फिर, थिस्सलुनीकियों को 2री में, मसीह-विरोधी के विषय में बोलते हुए, वह कहता है, "और तब वह दुष्ट प्रगट होगा, जिसे प्रभु यीशु मसीह(11) अपने मुँह की आत्मा से मार डालेगा, और उसे(11) अपने आने के प्रकटीकरण से नाश करेगा; [उसे भी] जिसका आना शैतान के कार्य के अनुसार है, सब सामर्थ्य, और चिह्नों, और झूठे अद्भुत कामों के साथ।"(12) अब इन [वाक्यों] में शब्दों का क्रम यह है: "और तब वह दुष्ट प्रगट होगा, जिसका आना शैतान के कार्य के अनुसार है, सब सामर्थ्य, और चिह्नों, और झूठे अद्भुत कामों के साथ, जिसे
प्रभु यीशु अपने मुँह की आत्मा से मार डालेगा, और अपने आने के प्रकटीकरण से नाश करेगा।" क्योंकि उसका अर्थ यह नहीं कि प्रभु का आना शैतान के कार्य के बाद है; परन्तु दुष्ट का आना, जिसे हम भी मसीह-विरोधी कहते हैं। तो, यदि कोई [अंश] के [उचित] पठन पर ध्यान न दे, और यदि वह होनेवाले श्वास के अन्तरालों को न दिखाए, तो केवल असंगतियाँ ही नहीं होंगी, वरन्, पढ़ते समय, वह निन्दा बोलेगा, मानो प्रभु का आगमन शैतान के कार्य के अनुसार हो सकता हो। इसलिये ऐसे अंशों में, पद-व्यतिक्रम पठन द्वारा दिखाया जाना चाहिए, और प्रेरित का अर्थ आगे चलता हुआ, सुरक्षित रहना चाहिए; और इस प्रकार हम उस अंश में नहीं पढ़ते, "इस जगत का देवता," परन्तु, "परमेश्वर," जिसे हम सचमुच परमेश्वर कहते हैं; और हम [यह घोषित] सुनते हैं इस जगत के अविश्वासियों और अन्धे किए हुओं के विषय में, कि वे आनेवाले जीवन के जगत के वारिस नहीं होंगे।
अध्याय 8. -- एक आपत्ति का उत्तर, जो मसीह के वचनों से उठती है (मत्ती 6. 24). केवल परमेश्वर ही सचमुच परमेश्वर और प्रभु कहा जाना है, क्योंकि वह आदि और अन्त से रहित है।
1. तब, इन मनुष्यों की यह निन्दा, दबा दिए जाने के बाद, स्पष्ट सिद्ध होता है कि न भविष्यद्वक्ताओं ने न प्रेरितों ने कभी दूसरे परमेश्वर का नाम लिया, या [उसे] प्रभु कहा, सच्चे और अकेले परमेश्वर को छोड़कर। और भी अधिक [यह प्रभु आप के विषय में होता], जिसने हमें यह भी सिखाया, "कैसर की वस्तुएँ कैसर को, और परमेश्वर की वस्तुएँ परमेश्वर को दो;"(1) कैसर को सचमुच कैसर कहकर, परन्तु परमेश्वर को परमेश्वर मानकर। उसी प्रकार भी, वह [पाठ] जो कहता है, "तुम दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकते,"(2) वह आप उसकी व्याख्या करता है, यह कहते हुए, "तुम परमेश्वर और मम्मोन की सेवा नहीं कर सकते;" परमेश्वर को सचमुच परमेश्वर मानते हुए, परन्तु मम्मोन का उल्लेख करते हुए, एक वस्तु जिसका अस्तित्व भी है। वह मम्मोन को प्रभु नहीं कहता जब वह कहता है, "तुम दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकते;" परन्तु वह अपने चेलों को, जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, सिखाता है कि मम्मोन के अधीन न हों, न उससे शासित हों। क्योंकि वह कहता है, "जो पाप करता है वह पाप का दास है।"(3) तो, क्योंकि वह पाप की सेवा करनेवालों को "पाप के दास" कहता है, परन्तु पाप को आप निश्चय ही परमेश्वर नहीं कहता, वैसे ही वह मम्मोन की सेवा करनेवालों को "मम्मोन के दास" कहता है, मम्मोन को परमेश्वर नहीं कहता। क्योंकि मम्मोन, यहूदी भाषा के अनुसार, जिसे सामरी भी उपयोग करते हैं, एक लोभी मनुष्य है, और जो अपने पास होना चाहिए उससे अधिक रखना चाहता है। परन्तु इब्री के अनुसार, वह एक अक्षर-समूह के जोड़ से (योजक) मामुएल कहलाता है,(4) और गुलोसुम का संकेत करता है, अर्थात्, जिसका गला अतृप्त है। इसलिये, इन दोनों बातों के अनुसार जो सूचित हैं, हम परमेश्वर और मम्मोन की सेवा नहीं कर सकते।
2. परन्तु यह भी, जब उसने शैतान को बलवन्त कहा, सर्वथा ऐसा नहीं, परन्तु हमारे साथ तुलना में, प्रभु ने अपने आप को हर दृष्टि से और सचमुच बलवन्त दिखाया, यह कहते हुए कि कोई और किसी रीति से "बलवन्त की सम्पत्ति लूट नहीं सकता, यदि वह पहले बलवन्त को आप न बाँधे, और तब वह उसका घर लूटेगा।"(5) अब हम इस [बलवन्त] के पात्र और घर थे जब हम धर्मत्याग की दशा में थे; क्योंकि उसने हमें जिस उपयोग में चाहा उसमें लगाया, और अशुद्ध आत्मा हमारे भीतर रहा। क्योंकि वह बलवन्त नहीं था, उसके विरोध में जिसने उसे बाँधा, और उसका घर लूटा; परन्तु उन व्यक्तियों के विरुद्ध जो उसके औजार थे, क्योंकि उसने उनकी चिन्ता को परमेश्वर से भटका दिया: इन्हें प्रभु ने उसकी पकड़ से छीन लिया। जैसा यिर्मयाह भी घोषित करता है, "प्रभु ने याकूब को छुड़ाया है, और जो उससे बलवन्त था उसके हाथ से उसे छीन लिया है।"(6) तो, यदि उसने उसे न दिखाया होता जो बाँधता और उसकी सम्पत्ति लूटता है, परन्तु केवल उसे बलवन्त कहकर बोलता, तो बलवन्त अजेय रहता। परन्तु उसने उसे भी पीछे जोड़ा जो अधिकार पाता और रखता है; क्योंकि जो बाँधता है वह पकड़ता है, परन्तु जो बँधा है वह पकड़ा जाता है। और यह उसने बिना किसी तुलना के किया, ताकि, पतित दास जैसा वह था, वह प्रभु से तुलना न किया जाए: क्योंकि न केवल वह, परन्तु सृजी और अधीन वस्तुओं में से एक भी, कभी परमेश्वर के वचन से तुलना नहीं की जाएगी, जिसके द्वारा सब वस्तुएँ बनीं, जो हमारा प्रभु यीशु मसीह है।
3. क्योंकि यह कि सब वस्तुएँ, चाहे दूत, या प्रधान दूत, या सिंहासन, या प्रभुताएँ, सब पर परमेश्वर के द्वारा, उसके वचन के द्वारा, स्थापित भी की गईं और रची भी गईं, यूहन्ना ने इस प्रकार दिखाया है। क्योंकि जब उसने परमेश्वर के वचन के विषय में कहा कि वह पिता में था, तो उसने जोड़ा, "सब वस्तुएँ उसके द्वारा बनीं, और उसके बिना कुछ नहीं बना।"(7) दाऊद भी, जब उसने [उसकी] स्तुतियाँ गिनाईं, तो जो कुछ मैं ने उल्लेख किया है सब को नाम से पीछे जोड़ता है, आकाशों को और उनमें की सब शक्तियों को: "क्योंकि उसने आज्ञा दी, और वे सृजे गए; उसने कहा, और वे बन गए।" तो, उसने किसे आज्ञा दी? वचन को, निस्सन्देह, "जिसके द्वारा," वह कहता है, "आकाश स्थिर किए गए, और उनकी सारी शक्ति उसके मुँह की श्वास से।"(8) परन्तु यह कि उसने किया Him-
स्वयं सब वस्तुओं को स्वतंत्रता से बनाता है, और जैसी उसकी इच्छा हुई, फिर दाऊद कहता है, "परन्तु हमारा परमेश्वर ऊपर आकाशों में है, और पृथ्वी पर; उसने जो कुछ चाहा सब बनाया है।"(1) परन्तु स्थापित वस्तुएँ उसे जिसने उन्हें स्थापित किया है उससे भिन्न हैं, और जो बनाई गई हैं उसे जिसने उन्हें बनाया है उससे भिन्न हैं। क्योंकि वह आप अरचित है, आदि और अन्त दोनों से रहित, और जिसे कुछ घटी नहीं। वह आप अपने लिये पर्याप्त है; और आगे भी, वह और सब को यही बात देता है, अस्तित्व; परन्तु जो वस्तुएँ उसके द्वारा बनाई गई हैं उन्होंने आदि पाया है। परन्तु जिन वस्तुओं का आदि था, और जो विघटन के योग्य हैं, और जो उन्हें बनानेवाले के अधीन हैं और उसकी घटी रखती हैं, उन्हें सब बातों में अवश्य भिन्न पद [उन पर लगाया जाना] होना चाहिए, उन लोगों द्वारा भी जिनकी ऐसी बातों को परखने की मध्यम क्षमता ही है; ताकि जिसने सब वस्तुएँ बनाईं वही अकेला, अपने वचन के साथ, उचित रीति से परमेश्वर और प्रभु कहा जा सके: परन्तु जो वस्तुएँ बनाई गई हैं उन पर यह पद नहीं लगाया जा सकता, न उन्हें उचित रीति से वह उपाधि लेनी चाहिए जो सृष्टिकर्ता की है।
अध्याय 9. -- एक ही और वही परमेश्वर, आकाश और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता, वही है जिसकी भविष्यद्वक्ताओं ने पहले से भविष्यद्वाणी की, और जो सुसमाचार द्वारा घोषित हुआ। इसका प्रमाण, आरम्भ में, पवित्र मत्ती के सुसमाचार से।
1. इसलिये, यह यहाँ स्पष्ट दिखाए जाने के बाद (और यह अभी और भी स्पष्ट ऐसे होगा), कि न भविष्यद्वक्ताओं ने, न प्रेरितों ने, न प्रभु मसीह ने अपने ही व्यक्ति में, किसी और प्रभु या परमेश्वर को माना, सर्वोच्च परमेश्वर और प्रभु को छोड़कर: भविष्यद्वक्ता और प्रेरित पिता और पुत्र को मानते हुए; परन्तु किसी और को परमेश्वर कहे बिना, और किसी और को प्रभु माने बिना: और प्रभु आप अपने चेलों को सौंपते हुए, कि वह, पिता, अकेला परमेश्वर और प्रभु है, जो अकेला परमेश्वर और सब का शासक है; -- हम पर यह है कि हम, यदि हम सचमुच उनके चेले हैं, इस प्रभाव की उनकी गवाहियों के पीछे चलें। क्योंकि मत्ती प्रेरित -- जानते हुए, एक ही और वही परमेश्वर के रूप में, उसे जिसने अब्राहम से प्रतिज्ञा की थी, कि वह उसके वंश को आकाश के तारों के समान करेगा,(2) और उसे, जिसने अपने पुत्र मसीह यीशु के द्वारा, पत्थरों की आराधना से अपने ज्ञान की ओर हमें बुलाया है, ताकि जो लोग नहीं थे वे लोग बनाए गए, और जो प्रेम की नहीं थी वह प्रेम की हुई(3) --घोषित करता है कि यूहन्ना ने, मसीह के लिये मार्ग तैयार करते हुए, उनसे कहा जो शरीर के अनुसार [अब्राहम से] सम्बन्ध पर घमण्ड कर रहे थे, परन्तु जिनका मन हर प्रकार की बुराई से रँगा और भरा था, उस मन-फिराव का प्रचार करते हुए जो उन्हें उनके बुरे कामों से वापस बुलाए, कहा, "हे साँपों की सन्तान, आनेवाले क्रोध से भागना तुम्हें किसने दिखाया? इसलिये मन-फिराव के योग्य फल लाओ।
और अपने में यह कहने की न सोचो, हमारा अब्राहम [हमारा] पिता है: क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि परमेश्वर इन पत्थरों से अब्राहम के लिये सन्तान उठा सकता है।"(4) इसलिये उसने उन्हें दुष्टता से मन-फिराव का प्रचार किया, परन्तु उसने उन्हें दूसरे परमेश्वर की घोषणा नहीं की, उसे छोड़कर जिसने अब्राहम से प्रतिज्ञा की; वह, मसीह का अग्रदूत, जिसके विषय में मत्ती फिर कहता है, और लूका भी, "क्योंकि यही वह है जिसके विषय में प्रभु की ओर से भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया, जंगल में पुकारनेवाले की वाणी, प्रभु का मार्ग तैयार करो, हमारे परमेश्वर के पथ सीधे करो। हर घाटी भरी जाएगी, और हर पहाड़ और पहाड़ी नीची की जाएगी; और टेढ़ा सीधा किया जाएगा, और ऊबड़ समतल मार्गों में; और सब प्राणी परमेश्वर के उद्धार को देखेंगे।"(5) इसलिये एक ही और वही परमेश्वर है, हमारे प्रभु का पिता, जिसने यह भी, भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, प्रतिज्ञा की कि वह अपना अग्रदूत भेजेगा; और उसका उद्धार -- अर्थात् उसका वचन -- उसने सब प्राणियों को दृश्य करवाया, [वचन] आप देहधारी होकर, ताकि सब बातों में उनका राजा प्रकट हो। क्योंकि यह आवश्यक है कि जिन [सत्ताओं] का न्याय होता है वे न्यायी को देखें, और उसे जानें जिस से उन्हें न्याय मिलता है; और यह भी उचित है, कि जो महिमा की ओर आगे चलती हैं वे उसे जानें जो उन्हें महिमा का दान देता है।
2. तब फिर मत्ती, दूत के विषय में बोलते हुए, कहता है, "प्रभु का दूत यूसुफ को नींद में दिखाई दिया।"(6) किस प्रभु का, वह आप व्याख्या करता है: "जो प्रभु की ओर से भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया वह पूरा हो, मिस्र से मैं ने अपने पुत्र को बुलाया है।"(7) "देख, एक कुँवारी गर्भवती होगी, और एक पुत्र जनेगी, और वे उसका नाम इम्मानुएल रखेंगे; जिसका अर्थ है, परमेश्वर हमारे साथ।"(8) दाऊद भी उसके विषय में बोलता है, जो कुँवारी से इम्मानुएल है: "अपने अभिषिक्त का मुख न फेर। प्रभु ने दाऊद से एक सत्य की शपथ खाई है, और उससे न फिरेगा। तेरी देह के फल में से मैं तेरी गद्दी पर बैठाऊँगा।"(9) और फिर: "यहूदिया में परमेश्वर जाना गया है; उसका स्थान शान्ति में बनाया गया है, और उसका निवास सिय्योन में।"(10) इसलिये एक ही और वही परमेश्वर है, जो भविष्यद्वक्ताओं द्वारा प्रचारित हुआ और सुसमाचार द्वारा बताया गया; और उसका पुत्र, जो दाऊद की देह के फल से था, अर्थात् दाऊद [के घर] की कुँवारी से, और इम्मानुएल; जिसके तारे की बिलाम ने इस प्रकार भविष्यद्वाणी की: "याकूब से एक तारा निकलेगा, और एक
प्रधान इस्राएल में उठेगा।"(1) परन्तु मत्ती कहता है कि मागी, पूर्व से आकर, पुकारे "क्योंकि हम ने पूर्व में उसका तारा देखा है, और उसे प्रणाम करने आए हैं;"(2) और कि, तारे के द्वारा याकूब के घर में इम्मानुएल के पास ले जाए जाकर, उन्होंने इन भेंटों से दिखाया जो उन्होंने चढ़ाईं, कि आराधना किया हुआ कौन था; गन्धरस, क्योंकि वही था जिसे मरना और गाड़ा जाना था मर्त्य मानव मिला के लिये; सोना, क्योंकि वह राजा था, "जिसके राज्य का अन्त नहीं;"(3) और लोबान, क्योंकि वह परमेश्वर था, जो "यहूदिया में जाना भी गया,"(4) और "उनको घोषित किया गया जो उसे नहीं खोजते थे।"(5)
3. और तब, [उसके] बपतिस्मा [के विषय में बोलते हुए], मत्ती कहता है, "आकाश खुल गए, और उसने परमेश्वर की आत्मा को, कबूतर के समान, अपने ऊपर आते देखा: और देखो स्वर्ग से एक वाणी, यह कहती हुई, यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिस से मैं प्रसन्न हूँ।"(6) क्योंकि मसीह उस समय यीशु पर नहीं उतरा, न मसीह एक था और यीशु दूसरा: परन्तु परमेश्वर का वचन--जो सब का उद्धारकर्ता है, और आकाश और पृथ्वी का शासक, जो यीशु है, जैसा मैं पहले दिखा चुका हूँ, जिसने देह भी अपने ऊपर ली, और पिता की ओर से आत्मा के द्वारा अभिषिक्त हुआ--यीशु मसीह बनाया गया, जैसा एसायास भी कहता है, "यिशै की जड़ से एक अंकुर निकलेगा, और उसकी जड़ से एक फूल उठेगा; और परमेश्वर की आत्मा उस पर ठहरेगी: बुद्धि की आत्मा और समझ की आत्मा, युक्ति की आत्मा और पराक्रम की आत्मा, ज्ञान की आत्मा और भक्ति की आत्मा, और परमेश्वर के भय की आत्मा, उसे भर देगी। वह महिमा के अनुसार न्याय न करेगा,(7) न वचन की रीति के अनुसार उलाहना देगा; परन्तु वह दीन मनुष्य को न्याय देगा, और पृथ्वी के घमण्डियों को उलाहना देगा।"(8) और फिर एसायास, उसके अभिषेक को पहले दिखाते हुए, और वह कारण कि वह अभिषिक्त क्यों हुआ, आप कहता है, "परमेश्वर की आत्मा मुझ पर है, क्योंकि उसने मुझे अभिषेक किया है: उसने मुझे दीनों को सुसमाचार प्रचार करने को भेजा है, हृदय में टूटे हुए ऊपर को चंगा करने को, बन्दियों को छुटकारा, और अन्धों को दृष्टि प्रचार करने को; प्रभु का ग्रहणयोग्य वर्ष, और पलटा लेने का दिन सुनाने को; सब शोक करनेवालों को शान्ति देने को।"(9) क्योंकि परमेश्वर का वचन यिशै की जड़ से मनुष्य था, और अब्राहम का पुत्र, इस बात में परमेश्वर की आत्मा उस पर ठहरी, और उसे दीनों को सुसमाचार प्रचार करने को अभिषेक किया। परन्तु क्योंकि वह परमेश्वर था, उसने महिमा के अनुसार न्याय नहीं किया, न वचन की रीति के अनुसार उलाहना दिया।
क्योंकि "उसे इसकी आवश्यकता नहीं थी कि कोई मनुष्य के विषय में उसकी गवाही दे,(10) क्योंकि वह आप जानता था कि मनुष्य में क्या था।"(11) क्योंकि उसने सब शोक करनेवाले मनुष्यों को बुलाया; और जिन्होंने अपने पापों के द्वारा बन्दीगृह में ले जाए गए थे उन्हें क्षमा देकर, उसने उनकी जंजीरें खोलीं, जिनके विषय में सुलैमान कहता है, "हर एक अपनी ही पापों की रस्सियों से बँधा रहेगा।"(12) इसलिये परमेश्वर की आत्मा उस पर उतरी, [आत्मा] उसकी, जिसने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा प्रतिज्ञा की थी कि वह उसे अभिषेक करेगा, ताकि हम, उसके अभिषेक की बहुतायत से पाकर, बचाए जाएँ। ऐसा, तब, मत्ती [की गवाही] है।
अध्याय 10.--पूर्वोक्त बातों के प्रमाण, मरकुस और लूका के सुसमाचारों से लिए गए।
1. लूका भी, प्रेरितों का अनुयायी और चेला, जकर्याह और एलीशिबा की ओर संकेत करते हुए, जिन से, प्रतिज्ञा के अनुसार, यूहन्ना जन्मा, कहता है: "और वे दोनों परमेश्वर के साम्हने धर्मी थे, और प्रभु की सब आज्ञाओं और विधियों में निर्दोष चलते थे।"(13) और फिर, जकर्याह के विषय में कहते हुए: "और यों हुआ, कि जब वह अपनी पारी के क्रम में, याजक के काम की रीति के अनुसार, परमेश्वर के साम्हने याजक का काम कर रहा था, तो धूप जलाना उसके चिट्ठी पर पड़ा; "(14) और वह बलि चढ़ाने आया, "प्रभु के मन्दिर में प्रवेश करते हुए।"(15) जिसका दूत गब्रिएल भी, जो प्रभु की उपस्थिति में प्रमुख रूप से खड़ा रहता है, उसने यरूशलेम को चुननेवाले को, और याजकीय पद को ठहरानेवाले को, अपने ही व्यक्ति में परमेश्वर और प्रभु के रूप में साधारण, पूर्ण, और निश्चय के साथ माना। क्योंकि वह उसके ऊपर किसी और को नहीं जानता था; क्योंकि, यदि उसके सिवा किसी और अधिक सिद्ध परमेश्वर और प्रभु का ज्ञान उसके वश में होता, तो वह निश्चय कभी--जैसा मैं पहले ही दिखा चुका हूँ--उसे नहीं मानता, जिसे वह न्यूनता का फल जानता था, पूर्ण रूप से और सर्वथा परमेश्वर और प्रभु। और तब, यूहन्ना के विषय में कहते हुए, वह यों कहता है: "क्योंकि वह प्रभु की दृष्टि में महान होगा, और इस्राएल की सन्तान में से बहुतों को वह उनके परमेश्वर प्रभु की ओर फेरेगा। और वह एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ में उसके आगे चलेगा, प्रभु के लिये तैयार की हुई प्रजा को तैयार करने को।"(16) तो उसने किस के लिये प्रजा को तैयार किया, और किस प्रभु की दृष्टि में वह महान किया गया? सचमुच उस की, जिसने कहा कि यूहन्ना में "भविष्यद्वक्ता से भी बढ़कर" कुछ था,(17) और कि "स्त्रियों से जन्मे लोगों में यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले से बड़ा कोई नहीं;" जिसने प्रभु के आगमन के लिये प्रजा को तैयार भी किया, अपने सह-सेवकों को चेतावनी देकर, और उन्हें मनफिराव का प्रचार करके, कि
वे प्रभु से क्षमा पाएँ जब वह उपस्थित हो, उसके पास बुलाए जाकर, जिस से वे पापों और अपराधों के कारण अलग हो गए थे। जैसा दाऊद भी कहता है, "अलग किए हुए गर्भ से पापी हैं: वे जन्मते ही भटक जाते हैं।"(1) और इसी कारण उसने, उन्हें उनके प्रभु की ओर फेरते हुए, एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ में, प्रभु के लिये एक सिद्ध प्रजा तैयार की।
2. और फिर, दूत के विषय में कहते हुए, वह कहता है: "परन्तु उस समय गब्रिएल दूत परमेश्वर की ओर से भेजा गया, जिसने कुमारी से भी कहा, मत डर, मरियम; क्योंकि तू ने परमेश्वर के यहाँ अनुग्रह पाया है।"(2) और वह प्रभु के विषय में कहता है: "वह महान होगा, और सर्वोच्च का पुत्र कहलाएगा: और प्रभु परमेश्वर उसे उसके पिता दाऊद का सिंहासन देगा: और वह याकूब के घर पर सदा राज्य करेगा; और उसके राज्य का अन्त न होगा।"(3) क्योंकि और कौन है जो याकूब के घर पर सदा बिना रुकावट राज्य कर सके, सिवाय हमारे प्रभु यीशु मसीह के, सर्वोच्च परमेश्वर के पुत्र के, जिसने व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा प्रतिज्ञा की कि वह अपना उद्धार सब प्राणियों पर दृश्य करेगा; ताकि वह इस उद्देश्य से मनुष्य का पुत्र बने, कि मनुष्य भी परमेश्वर का पुत्र बन सके? और मरियम, इस कारण उल्लसित होकर, कलीसिया की ओर से भविष्यद्वाणी करती हुई पुकारी, "मेरा प्राण प्रभु की बड़ाई करता है, और मेरी आत्मा मेरे उद्धारकर्ता परमेश्वर में आनन्दित हुई है। क्योंकि उसने अपनी दया की सुधि लेकर अपने बालक इस्राएल को उठा लिया, जैसा उसने हमारे पितरों से, अब्राहम से और उसके वंश से सदा के लिये कहा।"(4) इन से और ऐसी [पदों] से सुसमाचार दिखाता है कि पितरों से बोलनेवाला परमेश्वर ही था; कि वही था जिसने, मूसा के द्वारा, व्यवस्थानुसार प्रबन्ध ठहराया, जिस व्यवस्था देने से हम जानते हैं कि उसने पितरों से बातें कीं। यही परमेश्वर,. अपनी बड़ी भलाई के बाद, हम पर अपनी करुणा उण्डेल दी, जिस करुणा के द्वारा "ऊपर से उदय की किरण ने हम पर दृष्टि की, और अन्धकार में और मृत्यु की छाया में बैठनेवालों पर प्रकट हुई, और हमारे पाँवों को शान्ति के मार्ग में ले चली है;"(5) जैसा जकर्याह भी, अविश्वास के कारण जो गूँगापन उसे हुआ था उस से चंगा होकर, एक नई आत्मा से भरा जाकर, नए ढंग से परमेश्वर को धन्य कहा।
क्योंकि सब बातें एक नई दशा में प्रवेश कर चुकी थीं, वचन देह में आगमन को नए ढंग से व्यवस्थित कर रहा था, कि वह उस मानव स्वभाव को (hominem) जो परमेश्वर से दूर हो गया था परमेश्वर की ओर फिर जीत ले(6); और इसलिये मनुष्यों को नए रीति से परमेश्वर की आराधना सिखाई गई, पर दूसरे ईश्वर की नहीं, क्योंकि सचमुच "एक ही परमेश्वर है, जो खतना किए हुओं को विश्वास से धर्मी ठहराता है, और खतना रहितों को विश्वास के द्वारा।"(7) परन्तु जकर्याह भविष्यद्वाणी करता हुआ पुकारा, "इस्राएल का प्रभु परमेश्वर धन्य है; क्योंकि उसने अपनी प्रजा की सुधि ली और उसे छुड़ाया, और अपने दास दाऊद के घर में हमारे लिये उद्धार का एक सींग उठाया; जैसा उसने अपने पवित्र भविष्यद्वक्ताओं के मुख से कहा, जो जगत के आदि से होते आए हैं; हमारे शत्रुओं से, और हम से बैर रखनेवालों सब के हाथ से उद्धार; हमारे पितरों पर [प्रतिज्ञा की हुई] दया पूरी करने को, और अपनी पवित्र वाचा को स्मरण करने को, उस शपथ को जो उसने हमारे पिता अब्राहम से खाई, कि वह हमें यह देगा, कि हम, अपने शत्रुओं के हाथ से छुड़ाए जाकर, भय बिना, पवित्रता और धर्म में उसके साम्हने, अपनी सब आयु उसके सेवा करें।"(8) तब वह यूहन्ना से कहता है: "और तू, बालक, सर्वोच्च का भविष्यद्वक्ता कहलाएगा: क्योंकि तू प्रभु के मुख के आगे उसके मार्ग तैयार करने को चलेगा; उसकी प्रजा को उद्धार का ज्ञान देने को, उनके पापों की क्षमा के लिये।"(9) क्योंकि उद्धार का यही ज्ञान उन्हें नहीं था, परमेश्वर के पुत्र का, जिसे यूहन्ना ने प्रगट किया, यह कहते हुए, "देखो परमेश्वर का मेम्ना, जो जगत का पाप उठा ले जाता है।
यही वह है जिसके विषय में मैं ने कहा, मेरे पीछे एक मनुष्य आता है जो मुझ से पहले बना;(10) क्योंकि वह मुझ से पहले था: और उसकी पूर्णता में से हम सब ने पाया।"(11) इसलिये, यही उद्धार का ज्ञान था; पर [वह नहीं था] दूसरे परमेश्वर में, न दूसरे पिता में, न बाइथुस में, न तीस एओनों के प्लेरोमा में, न (निचली) ओगदोअद की माता में: पर उद्धार का ज्ञान परमेश्वर के पुत्र का ज्ञान था, जो बुलाया भी जाता है और सचमुच है भी, उद्धार, और उद्धारकर्ता, और उद्धारकारी। उद्धार, सचमुच, इस प्रकार: "मैं ने तेरे उद्धार की बाट जोही है, हे प्रभु।"(12) और फिर, उद्धारकर्ता: "देखो मेरा परमेश्वर, मेरा उद्धारकर्ता, मैं उस पर अपना भरोसा रखूँगा।"(13) पर उद्धार लाते हुए के रूप में, यों: "परमेश्वर ने अन्यजातियों की दृष्टि में अपना उद्धार (salutare) प्रगट किया है।"(14) क्योंकि वह सचमुच उद्धारकर्ता है, परमेश्वर का पुत्र और वचन होने के कारण; पर उद्धारकारी, क्योंकि [वह] आत्मा है; क्योंकि वह कहता है: "हमारे मुख की आत्मा, मसीह प्रभु।"(15) पर उद्धार, देह होने के कारण: क्योंकि "वचन देहधारी हुआ, और हमारे बीच डेरा किया।"(16) इसलिये उद्धार का यह ज्ञान यूहन्ना ने मन फिराते हुओं को, और जगत का पाप उठानेवाले परमेश्वर के मेम्ने पर विश्वास करनेवालों को, दिया।
3. और प्रभु का दूत, वह कहता है,
चरवाहों को दिखाई दिया, उन्हें आनन्द सुनाते हुए: "क्योंकि(1) दाऊद के घर में एक उद्धारकर्ता जन्मा है, जो मसीह प्रभु है। तब [प्रकट हुई] स्वर्गीय सेना की एक भीड़, परमेश्वर की स्तुति करती हुई, और कहती हुई, सर्वोच्च में परमेश्वर की महिमा, और पृथ्वी पर शान्ति, सुमति के मनुष्यों के लिये।" (2) झूठे नाम वाले ज्ञानवादी कहते हैं कि ये दूत ओगदोअद से आए, और श्रेष्ठ मसीह के अवतरण को प्रगट किया। पर वे फिर भूल में हैं, जब कहते हैं कि ऊपर का मसीह और उद्धारकर्ता जन्मा नहीं, पर यह भी, कि व्यवस्था के यीशु के बपतिस्मा के बाद, वह, [प्लेरोमा का मसीह,] कबूतर के समान उस पर उतरा। इसलिये, इन मनुष्यों के अनुसार, ओगदोअद के दूतों ने झूठ कहा, जब उन्होंने कहा, "क्योंकि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्मा है, जो मसीह प्रभु है।" क्योंकि उनके लेखे उस समय न मसीह जन्मा न उद्धारकर्ता; पर वह था, व्यवस्था का यीशु, जो जगत के रचयिता का है, [डेमियुर्ज], और जिस पर, उसके बपतिस्मा के बाद, अर्थात् तीस वर्ष [के बीतने] के बाद, वे मानते हैं कि ऊपर का उद्धारकर्ता उतरा। पर [दूतों ने] "दाऊद के नगर में" क्यों जोड़ा, यदि उन्होंने दाऊद से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा के पूरे होने का सुसमाचार नहीं सुनाया, कि उसकी देह के फल से एक अनन्त राजा होगा? क्योंकि सारे ब्रह्माण्ड के रचयिता [डेमियुर्ज] ने दाऊद से प्रतिज्ञा की, जैसा दाऊद आप ही कहता है: "मेरी सहायता परमेश्वर से है, जिसने आकाश और पृथ्वी बनाए;"(3) और फिर: "उसके हाथ में पृथ्वी के छोर हैं, और पहाड़ों की ऊँचाइयाँ उसकी हैं। क्योंकि समुद्र उसका है, और उसने आप ही उसे बनाया; और उसके हाथों ने सूखी भूमि की नींव डाली।
आओ, हम उसकी आराधना करें और उसके साम्हने गिरें, और हम को बनानेवाले प्रभु की उपस्थिति में रोएँ; क्योंकि वह प्रभु हमारा परमेश्वर है।"(4) पवित्र आत्मा दाऊद के द्वारा सुननेवालों से स्पष्ट रूप से यों कहता है, कि ऐसे लोग होंगे जो उस का तिरस्कार करें जिसने हमें रचा, और जो अकेला परमेश्वर है। इसलिये उसने आगे की बातें भी कहीं, यह कहने के अर्थ में: देखो कि तुम भटक न जाओ; उसके सिवा या उसके ऊपर और कोई परमेश्वर नहीं, जिस की ओर तुम बल्कि [अपने हाथ] बढ़ाओ, इस प्रकार हमें उसके प्रति भक्त और कृतज्ञ बनाते हुए जिसने हमें बनाया, स्थिर किया, और [अब भी] पालता है। तो उन पर क्या होगा जो अपने सृष्टिकर्ता के विरुद्ध इतनी निन्दा के कर्ता हुए हैं ? यही सत्य वह भी था जिसे दूतों ने [प्रचार किया]। क्योंकि जब वे पुकारते हैं, "सर्वोच्च में परमेश्वर की महिमा, और पृथ्वी पर शान्ति," तो उन्होंने इन. शब्दों से उस की महिमा की जो सर्वोच्च का, अर्थात् आकाश से ऊपर की वस्तुओं का, सृष्टिकर्ता है, और पृथ्वी पर हर वस्तु का संस्थापक: जिसने अपनी ही कारीगरी को, अर्थात् मनुष्यों को, स्वर्ग से अपने उद्धार का आशीष भेजा है। इसलिये वह जोड़ता है: "चरवाहे लौट गए, जो कुछ उन्होंने सुना और देखा उस सब के लिये परमेश्वर की महिमा करते हुए, जैसा उन से कहा गया था।"(5) क्योंकि इस्राएली चरवाहों ने दूसरे ईश्वर की महिमा नहीं की, पर उस की जिस की घोषणा व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं ने की थी, सब वस्तुओं के बनानेवाले की, जिस की महिमा दूतों ने भी की। पर यदि ओगदोअद के दूत किसी और की महिमा करने के अभ्यस्त होते, उस से भिन्न जिस की [आराधना] चरवाहों ने की, तो ओगदोअद के ये दूत उनके पास सत्य नहीं भूल लाए।
4. और लूका प्रभु के विषय में और भी कहता है: "जब शुद्धीकरण के दिन पूरे हुए, तो वे उसे यरूशलेम ले गए, कि उसे प्रभु के साम्हने उपस्थित करें, जैसा प्रभु की व्यवस्था में लिखा है, कि गर्भ खोलनेवाला हर नर प्रभु के लिये पवित्र कहलाएगा; और कि वे एक बलि चढ़ाएँ, जैसा प्रभु की व्यवस्था में कहा गया है, एक जोड़ी पंडुक, या कबूतर के दो बच्चे:"(6) अपने ही व्यक्ति में उसे अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रभु कहता हुआ, जिसने व्यवस्थानुसार प्रबन्ध ठहराया। पर "शमौन," वह यह भी कहता है, "परमेश्वर को धन्य कहा, और कहा, हे प्रभु, अब तू अपने दास को शान्ति से विदा करता है; क्योंकि मेरी आँखों ने तेरा उद्धार देखा है, जिसे तू ने सब लोगों के मुख के साम्हने तैयार किया है; अन्यजातियों के प्रकाशन के लिये ज्योति, और तेरी प्रजा इस्राएल की महिमा।"(7) और "हन्ना"(8) भी, "भविष्यद्वक्तिन," वह कहता है, उसी प्रकार परमेश्वर की महिमा की जब उसने मसीह को देखा, "और यरूशलेम के छुटकारे की बाट जोहनेवाले सब लोगों से उसके विषय में बातें कीं।"(9) अब इन सब से एक ही परमेश्वर दिखाया जाता है, जो अपने पुत्र के नए आगमन के द्वारा मनुष्यों पर स्वतन्त्रता का नया प्रबन्ध, वाचा, प्रगट करता है।
5. इसलिये मरकुस भी, पतरस का भाष्यकार और अनुयायी, अपनी सुसमाचार कथा यों आरम्भ करता है: "परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ; जैसा भविष्यद्वक्ताओं में लिखा है, देख, मैं अपने दूत को तेरे मुख के आगे भेजता हूँ, जो तेरा मार्ग तैयार करेगा।(10) जंगल में पुकारनेवाले की वाणी, प्रभु का मार्ग तैयार करो, पथों को
हमारे परमेश्वर के साम्हने सीधा करो।" सुसमाचार का आरम्भ स्पष्ट रूप से पवित्र भविष्यद्वक्ताओं के वचन उद्धृत करता है, और तुरन्त उसे दिखाता है, जिसे उन्होंने परमेश्वर और प्रभु माना; उसे, हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता को, जिसने उस से यह प्रतिज्ञा भी की, कि वह अपने पुत्र के मुख के आगे अपना दूत भेजेगा, जो यूहन्ना था, जंगल में पुकारता हुआ, "एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ में,"(1)"me प्रभु का मार्ग तैयार करो, हमारे परमेश्वर के साम्हने पथ सीधे करो।" क्योंकि भविष्यद्वक्ताओं ने एक को और mother परमेश्वर को नहीं सुनाया, पर एक ही को; rations पहलुओं के अधीन, तौभी, और बहुत सी उपाधियाँ। क्योंकि पिता गुण में विविध और धनी है, जैसा मैं ने इस से पहले(2) की पुस्तक में पहले ही दिखाया है; और इस ग्रन्थ के आगे के क्रम में भविष्यद्वक्ताओं से ही [वही सत्य] दिखाऊँगा। और, अपने सुसमाचार के अन्त की ओर, मरकुस कहता है: "तो, प्रभु यीशु उन से बातें करने के बाद, स्वर्ग पर उठा लिया गया, और परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठता है; "(3) भविष्यद्वक्ता के कहे हुए को दृढ़ करता हुआ: "प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, तू मेरे दाहिने बैठ, जब तक मैं तेरे शत्रुओं को तेरी पाँव की चौकी न कर दूँ।"(4) इस प्रकार परमेश्वर और पिता सचमुच एक ही हैं; वह जिस की घोषणा भविष्यद्वक्ताओं ने की, और जिसे सच्चे सुसमाचार ने सौंपा; जिस की हम मसीही पूरे हृदय से आराधना और प्रेम करते हैं, आकाश और पृथ्वी का, और उन में की सब वस्तुओं का बनानेवाला जानकर।
अध्याय ग्यारह--जारी प्रमाण, पवित्र यूहन्ना के सुसमाचार से निकाले गए। सुसमाचार संख्या में चार हैं, अधिक नहीं और कम नहीं। इसके रहस्यमय कारण।
1. यूहन्ना, प्रभु का चेला, इस विश्वास का प्रचार करता है, और सुसमाचार की घोषणा के द्वारा उस भूल को हटाना चाहता है जो केरिन्थुस ने मनुष्यों में फैलाई थी, और बहुत पहले उन से भी जिन्हें नीकुलैती कहा गया, जो उस "ज्ञान" की एक टहनी हैं जो झूठे नाम से ऐसा कहलाता है, कि वह उन्हें लज्जित करे, और उन्हें मनाए कि एक ही परमेश्वर है, जिसने अपने वचन से सब वस्तुएँ बनाईं; और नहीं, जैसा वे आरोप लगाते हैं, कि सृष्टिकर्ता एक था, पर प्रभु का पिता दूसरा; और कि सृष्टिकर्ता का पुत्र, सचमुच, एक था, पर ऊपर का मसीह दूसरा, जो असंभव बना रहा, सृष्टिकर्ता के पुत्र यीशु पर उतरा, और अपने प्लेरोमा में फिर उड़ गया; और कि मोनोगेनेस आदि था, पर लोगोस मोनोगेनेस का सच्चा पुत्र था; और कि यह सृष्टि जिस की हम हैं 1ले परमेश्वर ने नहीं बनाई, पर किसी ऐसी सामर्थ ने जो उस से बहुत नीचे है, और अदृश्य और अकथनीय वस्तुओं की सहभागिता से बन्द है। इसलिये प्रभु का चेला ऐसी सब शिक्षाओं को समाप्त करना चाहता हुआ, और कलीसिया में सत्य के नियम को स्थिर करना चाहता हुआ, कि एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, जिसने अपने वचन से दृश्य और अदृश्य सब वस्तुएँ बनाईं; साथ ही दिखाते हुए, कि जिस वचन के द्वारा परमेश्वर ने सृष्टि बनाई, उसी के द्वारा उसने सृष्टि में सम्मिलित मनुष्यों को उद्धार भी दिया; सुसमाचार में अपनी शिक्षा यों आरम्भ की: "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था। वही आदि में परमेश्वर के साथ था। सब वस्तुएँ उसके द्वारा बनीं, और उसके बिना कुछ नहीं बना।(5) जो बना वह उस में जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था।
और ज्योति अन्धकार में चमकती है, और अन्धकार ने उसे ग्रहण नहीं किया।"(6) "सब वस्तुएँ," वह कहता है, "उसके द्वारा बनीं;" इसलिये "सब वस्तुओं" में हमारी यह सृष्टि [सम्मिलित] है, क्योंकि हम इन मनुष्यों को यह नहीं दे सकते कि [शब्द] "सब वस्तुएँ" उनके प्लेरोमा के भीतर की वस्तुओं के विषय में कहे गए हैं। क्योंकि यदि उनका प्लेरोमा सचमुच इन्हें रखता है, तो यह सृष्टि, ऐसी होने के कारण, बाहर नहीं है, जैसा मैं ने पिछली पुस्तक में दिखाया है;(7) पर यदि वे प्लेरोमा के बाहर हैं, जो सचमुच असंभव जान पड़ा, तो उस दशा में यह निकलता है कि उनका प्लेरोमा "सब वस्तुएँ" नहीं हो सकता: इसलिये यह विशाल सृष्टि [प्लेरोमा] के बाहर नहीं है।
2. तौभी यूहन्ना आप ही इस बात को हमारी ओर से सब विवाद के परे रखता है, जब वह कहता है, "वह इस जगत में था, और जगत उसके द्वारा बना, और जगत ने उसे नहीं जाना। वह अपनी [वस्तुओं] के पास आया, और उसके अपने [लोगों] ने उसे ग्रहण नहीं किया।"(8) पर मार्कीयन के अनुसार, और उसके समान लोगों के अनुसार, न जगत उसके द्वारा बना; न वह अपनी वस्तुओं के पास आया, पर दूसरे की वस्तुओं के पास। और, कुछ ज्ञानवादियों के अनुसार, यह जगत दूतों ने बनाया, परमेश्वर के वचन ने नहीं। पर वैलेन्टिनुस के अनुयायियों के अनुसार, जगत उसने नहीं बनाया, पर डेमियुर्ज ने। क्योंकि उसने (सोतेर) ऊपर की वस्तुओं के नमूने पर ऐसी समानताएँ बनवाईं, जैसा वे आरोप लगाते हैं; पर डेमियुर्ज ने सृष्टि का काम पूरा किया। क्योंकि वे कहते हैं कि वह, सृष्टि की योजना का प्रभु और सृष्टिकर्ता, जिस के द्वारा वे मानते हैं कि यह जगत बना, माता से उत्पन्न हुआ; जबकि सुसमाचार स्पष्ट रूप से दृढ़ करता है, कि वचन के द्वारा, जो आदि में परमेश्वर के साथ था, सब वस्तुएँ बनीं, जिस वचन के विषय में, वह कहता है, "देहधारी हुआ, और हमारे बीच डेरा किया।"(9)
3. पर, इन मनुष्यों के अनुसार, न वचन देहधारी हुआ, न मसीह, न उद्धारकर्ता (सोतेर), जो [संयुक्त con-
tributions of] सब [एओनों] से उत्पन्न हुआ। क्योंकि वे यह चाहेंगे, कि वचन और मसीह इस जगत में कभी नहीं आए; कि उद्धारकर्ता भी कभी देहधारी नहीं हुआ, न दुख उठा, पर वह कबूतर के समान व्यवस्था के यीशु पर उतरा; और कि, ज्योंही उसने अज्ञात पिता की घोषणा की, वह फिर प्लेरोमा में चढ़ गया। कुछ, तौभी, यह दृढ़ करते हैं, कि यह व्यवस्था का यीशु देहधारी हुआ, और दुख उठा, जिसे वे ऐसे दिखाते हैं कि वह मरियम में से ऐसे निकल गया जैसे पानी नली में से; पर दूसरे उसे डेमियुर्ज का पुत्र बताते हैं, जिस पर व्यवस्था का यीशु उतरा; जबकि दूसरे, फिर, कहते हैं कि यीशु यूसुफ और मरियम से जन्मा, और ऊपर का मसीह उस पर उतरा, देह बिना, और भाव-रहित। पर किसी भी मिथ्या शिक्षक की राय के अनुसार परमेश्वर का वचन देहधारी नहीं हुआ। क्योंकि यदि कोई उन सब की पद्धतियों को ध्यान से जाँचे, तो वह पाएगा कि परमेश्वर का वचन उन सब के द्वारा देहधारी न हुआ (sine carne) और भाव-रहित लाया जाता है, जैसा ऊपर का मसीह भी है। दूसरे मानते हैं कि वह एक रूपान्तरित मनुष्य के रूप में प्रगट हुआ; पर वे मानते हैं कि वह न जन्मा न देहधारी हुआ; जबकि दूसरे [मानते हैं] कि उसने मनुष्य का रूप बिल्कुल नहीं लिया, पर, कबूतर के समान, वह उस यीशु पर उतरा जो मरियम से जन्मा। इसलिये प्रभु का चेला, उन सब को झूठे साक्षी दिखाते हुए, कहता है, "और वचन देहधारी हुआ, और हमारे बीच डेरा किया।"(1)
4. और इसलिये कि हमें यह न पूछना पड़े, वचन किस परमेश्वर का देहधारी हुआ ? वह आप ही पहले हमें सिखाता है, यह कहते हुए, "परमेश्वर की ओर से एक मनुष्य भेजा गया, जिसका नाम यूहन्ना था। वह साक्षी होने को आया, कि उस ज्योति की साक्षी दे। वह वह ज्योति नहीं था, पर [आया] कि ज्योति की साक्षी दे।"(2) तो किस परमेश्वर ने यूहन्ना को, आगे चलनेवाले को, जो ज्योति की साक्षी देता है, [जगत में] भेजा? सचमुच उसी ने, जिसका दूत गब्रिएल है, जिसने उसके जन्म का सुसमाचार भी सुनाया: [वह परमेश्वर] जिसने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा यह भी प्रतिज्ञा की कि वह अपने पुत्र के मुख के आगे अपना दूत भेजेगा,(3) जो उसका मार्ग तैयार करे, अर्थात् कि वह एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ में उस ज्योति की साक्षी दे।(4) पर, फिर, एलिय्याह किस परमेश्वर का सेवक और भविष्यद्वक्ता था? उस का जिसने आकाश और पृथ्वी बनाए,(5) जैसा वह आप ही मानता है। इसलिये यूहन्ना, इस जगत के संस्थापक और बनानेवाले के द्वारा भेजा जाकर, उस ज्योति की साक्षी कैसे दे सकता था, जो अकथनीय और अदृश्य वस्तुओं से उतरी? क्योंकि सब मिथ्या शिक्षकों ने निश्चय किया है कि डेमियुर्ज अपने ऊपर की उस सामर्थ से अनजान था, जिसका साक्षी और घोषणा करनेवाला यूहन्ना पाया जाता है। इसलिये प्रभु ने कहा कि उसने उसे "भविष्यद्वक्ता से बढ़कर" गिना।(6) क्योंकि और सब भविष्यद्वक्ताओं ने पिता की ज्योति के आगमन का प्रचार किया, और उसे देखने के योग्य होने की इच्छा की जिसका वे प्रचार करते थे; पर यूहन्ना ने दूसरों के समान पहले ही [आगमन] सुनाया, और जब वह आया तब सचमुच उसे देखा, और उसे दिखाया, और बहुतों को उस पर विश्वास करने को मनाया, ताकि वह आप ही भविष्यद्वक्ता और प्रेरित दोनों का स्थान रखे। क्योंकि भविष्यद्वक्ता से बढ़कर होना यही है, क्योंकि, "1ले प्रेरित, 2रे रूप से भविष्यद्वक्ता; "(7) पर सब बातें एक ही उसी परमेश्वर से आप।
5. वह दाखरस,(8) जिसे परमेश्वर ने दाखबारी में उत्पन्न किया, और जो 1ले पिया गया, अच्छा था। उसे पीनेवालों में से किसी ने(9) उस में दोष नहीं निकाला; और प्रभु ने भी उस में भाग लिया। पर वह दाखरस उत्तम था जिसे वचन ने जल से बनाया, उसी क्षण, और केवल उन के उपयोग के लिये जो विवाह में बुलाए गए थे। क्योंकि यद्यपि प्रभु के पास भोज करनेवालों को दाखरस देने की सामर्थ थी, किसी रची हुई वस्तु के बिना, और भूखों को भोजन से भरने की, उसने यह मार्ग नहीं लिया; पर, पृथ्वी की उपजाई रोटियाँ लेकर, धन्यवाद करके,(10) और दूसरे अवसर पर जल को दाखरस बनाकर, उसने [मेज पर] टिके हुओं को तृप्त किया, और विवाह में बुलाए हुओं को पान दिया; यह दिखाते हुए कि परमेश्वर जिसने पृथ्वी बनाई, और उसे फल लाने की आज्ञा दी, जिसने जलों को स्थिर किया, और सोते निकाले, वही था जिसने इन अन्तिम समयों में अपने पुत्र के द्वारा मनुष्यजाति को भोजन का आशीष और पान का अनुग्रह दिया: अगम्य [यों करता हुआ] गम्य के द्वारा, और अदृश्य दृश्य के द्वारा; क्योंकि उसके परे कोई नहीं, पर वह पिता की गोद में है।
6. क्योंकि "किसी मनुष्य ने," वह कहता है, "कभी परमेश्वर को नहीं देखा," सिवाय इसके कि "परमेश्वर का एकलौता पुत्र, जो पिता की गोद में है, उसने [उसे] प्रगट किया।"(11) क्योंकि वह, पुत्र जो उसकी गोद में है, अदृश्य पिता को सब पर प्रगट करता है। इसलिये वे उसे जानते हैं जिस पर पुत्र उसे प्रगट करता है; और फिर, पिता, पुत्र के द्वारा, अपने पुत्र का ज्ञान उन को देता है जो उससे प्रेम करते हैं। जिस के द्वारा नतनएल भी, सिखाया जाकर, [उसे] पहचान गया, जिस के विषय में प्रभु ने भी साक्षी दी, कि वह "सचमुच इस्राएली है, जिस में छल नहीं।"(12) वह
इस्राएली ने अपने राजा को पहचाना, इसलिये उसने उससे पुकारकर कहा, "रब्बी, तू परमेश्वर का पुत्र है, तू इस्राएल का राजा है।" जिस के द्वारा पतरस भी, सिखाया जाकर, मसीह को जीवते परमेश्वर का पुत्र पहचान गया, जब [परमेश्वर] ने कहा, "देखो मेरा प्रिय पुत्र, जिस से मैं प्रसन्न हूँ: मैं अपनी आत्मा उस पर रखूँगा, और वह अन्यजातियों पर न्याय दिखाएगा। वह न झगड़ा करेगा, न चिल्लाएगा; और कोई मनुष्य सड़कों पर उसकी वाणी न सुनेगा। कुचले हुए नरकट को वह न तोड़ेगा, और धुएँ वाली सन को वह न बुझाएगा, जब तक वह न्याय को विवाद में न भेज दे ;(1) और उसके नाम पर अन्यजाति भरोसा रखेंगे।"(2)
7. तो, सुसमाचार के 1ले सिद्धान्त ये हैं: कि एक ही परमेश्वर है, इस ब्रह्माण्ड का बनानेवाला; वह जिस की घोषणा भविष्यद्वक्ताओं ने भी की, और जिसने मूसा के द्वारा व्यवस्था का प्रबन्ध रखा,--[सिद्धान्त] जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता की घोषणा करते हैं, और उसके सिवा किसी और परमेश्वर या पिता को नहीं गिनते। जिस भूमि पर ये सुसमाचार टिके हैं वह इतनी दृढ़ है, कि मिथ्या शिक्षक आप ही उन की साक्षी देते हैं, और इन्हीं [लेखों] से आरम्भ करके, उन में से हर एक अपनी अलग शिक्षा स्थिर करने का यत्न करता है। क्योंकि एबियोनी, जो केवल मत्ती के सुसमाचार(3) का उपयोग करते हैं, प्रभु के विषय में झूठी कल्पनाएँ करते हुए, इसी से ही खण्डित होते हैं। पर मार्कीयन, लूका के अनुसार उस को काटता हुआ, जो [पद] वह अब भी रखता है उन से, एकमात्र विद्यमान परमेश्वर का निन्दक सिद्ध होता है। वे, फिर, जो यीशु को मसीह से अलग करते हैं, यह आरोप लगाते हुए कि मसीह भाव-रहित रहा, पर दुख यीशु ने उठाया, मरकुस के सुसमाचार को पसन्द करते हुए, यदि वे उसे सत्य के प्रेम से पढ़ें, तो उनकी भूलें सुधारी जा सकती हैं। और वे, जो वैलेन्टिनुस के पीछे चलते हैं, अपनी जोड़ियों को समझाने को यूहन्ना के अनुसार उस का बहुत उपयोग करते हुए, इसी सुसमाचार के द्वारा पूरी तरह भूल में सिद्ध होंगे, जैसा मैं ने 1ली पुस्तक में दिखाया है। इसलिये, जब हमारे विरोधी हमारी साक्षी देते हैं, और इन [लेखों] का उपयोग करते हैं, तो उन से निकाला गया हमारा प्रमाण दृढ़ और सत्य है।
8. यह संभव नहीं कि सुसमाचार जितने हैं उन से अधिक या कम संख्या में हों। क्योंकि, चूँकि जिस जगत में हम रहते हैं उसके चार क्षेत्र हैं, और चार मुख्य हवाएँ,(4) जबकि कलीसिया सारे जगत में बिखरी हुई है, और कलीसिया का "खम्भा और नींव"(5) सुसमाचार और जीवन की आत्मा है; उचित है कि उसके चार खम्भे हों, हर ओर अमरता की साँस छोड़ते हुए, और मनुष्यों को नए सिरे से जिलाते हुए। जिस तथ्य से यह स्पष्ट है कि वचन, सब का शिल्पी, जो करूबों पर बैठा है, और सब वस्तुओं को रखता है, जो मनुष्यों पर प्रगट हुआ, उसने हमें चार पहलुओं के अधीन सुसमाचार दिया है, पर एक आत्मा से बँधा हुआ। जैसा दाऊद भी कहता है, उसके प्रगट होने की विनती करते हुए, "हे करूबों के बीच बैठनेवाले, चमक।"(6) क्योंकि करूब भी चार मुख वाले थे, और उनके मुख परमेश्वर के पुत्र के प्रबन्ध के प्रतिरूप थे। क्योंकि, [जैसा पवित्रशास्त्र] कहता है, "1ला जीव सिंह के समान था,"(7) उसके प्रभावशाली काम, उसके नेतृत्व, और राजकीय सामर्थ का चिह्न; 2रा [जीव] बछड़े के समान था, [उसके] बलि और याजकीय क्रम का संकेत; पर "3रे का, मानो, मनुष्य का मुख था,"--मनुष्य के रूप में उसके आगमन का स्पष्ट वर्णन; "4था उड़ते उकाब के समान था," कलीसिया पर अपने पंखों से मँडराती आत्मा के वरदान को दिखाता हुआ। और इसलिये सुसमाचार इन बातों से मेल खाते हैं, जिन के बीच मसीह यीशु बैठा है।
क्योंकि यूहन्ना के अनुसार वह पिता से उसकी मूल, प्रभावशाली, और महिमामय उत्पत्ति कहता है, यों घोषणा करता हुआ, "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।"(8) और, "सब वस्तुएँ उसके द्वारा बनीं, और उसके बिना कुछ नहीं बना।" इसी कारण वह सुसमाचार सब भरोसे से भरा है, क्योंकि उसका व्यक्ति ऐसा है।(9) पर लूका के अनुसार वह, [उसके] याजकीय स्वभाव को लेकर, परमेश्वर को बलि चढ़ाते याजक जकर्याह से आरम्भ हुआ। क्योंकि अब पलता हुआ बछड़ा तैयार किया गया, छोटे पुत्र के फिर पाने(10) के लिये बलि होने को। मत्ती, फिर, मनुष्य के रूप में उसकी उत्पत्ति कहता है, यह कहते हुए, "यीशु मसीह की वंशावली की पुस्तक, दाऊद का पुत्र, अब्राहम का पुत्र;"(11) और, "यीशु मसीह का जन्म इस प्रकार हुआ।" तो, यह उसकी मानवता का सुसमाचार है;(12) इसी कारण यह भी है कि दीन और नम्र मनुष्य का [स्वभाव] सारे सुसमाचार में बनाए रखा गया है। मरकुस, दूसरी ओर, ऊपर से मनुष्यों पर उतरती भविष्यद्वाणी की आत्मा [के संकेत] से आरम्भ करता है, यह कहते हुए, "यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ, जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता में लिखा है,"-- सुसमाचार के पंख वाले पहलू की ओर संकेत करते हुए; और इस कारण उसने संक्षिप्त और शीघ्र वर्णन किया, क्योंकि भविष्यद्वाणी का स्वभाव ऐसा है। और परमेश्वर का वचन आप मूसा से पहले के पितरों से बातें किया करता था, के अनुसार अपनी di-
vinity और महिमा; पर व्यवस्था के अधीन लोगों के लिये उसने याजकीय और आराधना की सेवा ठहराई।(1) इसके बाद, हमारे लिये मनुष्य बनकर, उसने सारी पृथ्वी पर स्वर्गीय आत्मा का वरदान भेजा, अपने पंखों से हमारी रक्षा करता हुआ। तो, जैसा परमेश्वर के पुत्र का चला मार्ग था, वैसा ही जीवों का रूप भी था; और जैसा जीवों का रूप था, वैसा ही सुसमाचार का स्वभाव भी था।(2) क्योंकि जीव चार रूप वाले हैं, और सुसमाचार चार रूप वाला है, जैसा प्रभु का चला मार्ग भी है। इसी कारण मनुष्य जाति को चार मुख्य (<greek>kaqolikai</greek>) वाचाएँ दी गईं:(3) एक, जलप्रलय से पहले, आदम के अधीन; 2री, जलप्रलय के बाद की, नूह के अधीन; 3री, व्यवस्था का दिया जाना, मूसा के अधीन; 4थी, जो मनुष्य को नया करती है, और सुसमाचार के द्वारा सब वस्तुओं को अपने में समेटती है, मनुष्यों को स्वर्गीय राज्य पर उठाती और ढोती हुई।
9. ये बातें ऐसी होने से, जो सुसमाचार के रूप को नष्ट करते हैं वे सब व्यर्थ, अशिक्षित, और धृष्ट भी हैं; [मेरा अर्थ,] जो सुसमाचार के पहलुओं को उपर्युक्त से अधिक संख्या में, या, दूसरी ओर, कम दिखाते हैं। पहला वर्ग [यों करता है], कि वे सत्य में जो है उस से अधिक पाए हुए जान पड़ें; पीछे वाले, कि वे परमेश्वर के प्रबन्धों को एक ओर रख दें। क्योंकि मार्कीयन, सारे सुसमाचार को ठुकराकर, हाँ बल्कि, अपने को सुसमाचार से काटकर, यह डींग मारता है कि सुसमाचार [के आशीषों] में उसका भाग है।(4) दूसरे, फिर (मोन्टानी), कि वे आत्मा के वरदान को व्यर्थ ठहराएँ, जो अन्तिम समयों में पिता की प्रसन्नता से मनुष्य जाति पर उण्डेला गया है, यूहन्ना के सुसमाचार के दिखाए [सुसमाचारी प्रबन्ध] के उस पहलू को नहीं मानते, जिस में प्रभु ने प्रतिज्ञा की कि वह पराक्लेत को भेजेगा;(5) पर सुसमाचार और भविष्यद्वाणी की आत्मा दोनों को तुरन्त एक ओर रख देते हैं। सचमुच दयनीय मनुष्य! जो झूठे भविष्यद्वक्ता होना चाहते हैं, सचमुच, पर कलीसिया से भविष्यद्वाणी के वरदान को एक ओर रख देते हैं; उन (एन्क्राती)(6) के समान चलते हुए, जो कपट से भीतर आनेवालों के कारण, भाइयों की सहभागिता से अपने को दूर रखते हैं। और, हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि ये मनुष्य (मोन्टानी) प्रेरित पौलुस को भी नहीं मान सकते। क्योंकि, कुरिन्थियों के नाम अपनी पत्री में,(7) वह भविष्यद्वाणी के वरदानों की स्पष्ट बातें कहता है, और कलीसिया में भविष्यद्वाणी करनेवाले पुरुषों और स्त्रियों को मानता है। इसलिये, इन सब बातों में, परमेश्वर की आत्मा के विरुद्ध पाप करते हुए,(8) वे अक्षमा पाप में गिरते हैं। पर जो वैलेन्टिनुस की ओर से हैं, दूसरी ओर, बिलकुल असावधान होकर, अपनी ही रचनाएँ निकालते हुए, डींग मारते हैं कि उनके पास वास्तव में जितने हैं उन से अधिक सुसमाचार हैं।
सचमुच, वे धृष्टता की ऐसी चोटी पर पहुँच गए हैं, कि अपनी अपेक्षा हाल की रचना को "सत्य का सुसमाचार" नाम देते हैं, यद्यपि वह प्रेरितों के सुसमाचारों से किसी बात में मेल नहीं खाती, ताकि उनके पास सचमुच कोई सुसमाचार नहीं जो निन्दा से भरा न हो। क्योंकि यदि जो उन्होंने प्रकाशित किया वह सत्य का सुसमाचार है, और तौभी उन से बिलकुल भिन्न है जो प्रेरितों से हमें सौंपे गए हैं, तो जो चाहे सीख सकता है, जैसा पवित्रशास्त्रों से ही दिखाया गया है, कि जो प्रेरितों से सौंपा गया है वह अब सत्य का सुसमाचार नहीं गिना जा सकता। पर कि केवल ये सुसमाचार सत्य और विश्वसनीय हैं, और उपर्युक्त संख्या की न वृद्धि मानते हैं न घटती, मैं ने इतने और ऐसे [तर्कों] से सिद्ध किया है। क्योंकि, चूँकि परमेश्वर ने सब वस्तुओं को उचित अनुपात और अनुकूलता में बनाया, यह भी उचित था कि सुसमाचार का बाहरी रूप भली भाँति व्यवस्थित और सुसंगत हो। इसलिये, जिन मनुष्यों ने सुसमाचार हमें सौंपा उनकी राय, उनकी ही स्रोतों से, जाँची जाकर, हम शेष प्रेरितों की ओर भी बढ़ें, और परमेश्वर के विषय में उनकी शिक्षा की जाँच करें; तब, उचित क्रम में हम प्रभु के ही वचनों को सुनेंगे।
अध्याय बारह. --शेष प्रेरितों की शिक्षा।
1. इसलिये प्रेरित पतरस, प्रभु के पुनरुत्थान के बाद, और स्वर्ग में उसके उठाए जाने के बाद, बारह प्रेरितों की संख्या पूरी करना चाहता हुआ, और यहूदा के स्थान में परमेश्वर के चुने हुए किसी स्थानापन्न को चुनते हुए, उपस्थित लोगों से यों बोला: "पुरुषों [और] भाइयों, इस पवित्रशास्त्र का पूरा होना अवश्य था, जिसे पवित्र आत्मा ने दाऊद के मुख से यहूदा के विषय में पहले कहा, जो यीशु को पकड़नेवालों का अगुवा बना। क्योंकि वह हमारे साथ गिना गया था:(9) ... उसका निवास उजाड़ पड़े,
और उस में कोई मनुष्य न बसे;(1) और, उसका bishop-rick दूसरा ले ले;"(2)--इस प्रकार प्रेरितों की पूर्ति की ओर ले चलते हुए, दाऊद के कहे वचनों के अनुसार। फिर, जब पवित्र आत्मा चेलों पर उतरा, कि वे सब भविष्यद्वाणी करें और भाषाओं से बोलें, और कुछ ने उनकी हँसी की, मानो नए दाखरस से मतवाले हों, तो पतरस ने कहा कि वे मतवाले नहीं, क्योंकि दिन का 3रा घंटा था; पर यह वही था जो भविष्यद्वक्ता ने कहा था: "अन्तिम दिनों में यों होगा, परमेश्वर कहता है, मैं अपना आत्मा सब प्राणियों पर उण्डेलूँगा, और वे भविष्यद्वाणी करेंगे।"(3) इसलिये, वह परमेश्वर, जिसने भविष्यद्वक्ता के द्वारा प्रतिज्ञा की, कि वह अपना आत्मा सारी मनुष्य जाति पर भेजेगा, वही था जिसने भेजा; और पतरस के द्वारा परमेश्वर आप ही अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करनेवाला सुनाया जाता है।
2. क्योंकि पतरस ने कहा, "इस्राएल के पुरुषों, मेरी बातें सुनो; नासरत का यीशु, एक मनुष्य जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे बीच सामर्थ्यों, और आश्चर्यकर्मों, और चिह्नों से प्रमाणित किया, जिन्हें परमेश्वर ने उसके द्वारा तुम्हारे बीच किए, जैसा तुम आप भी जानते हो: उसे, परमेश्वर की ठहराई हुई सम्मति और पहले के ज्ञान से सौंपे हुए को, दुष्ट मनुष्यों के हाथों तुम ने घात किया, [क्रूस पर] जड़ते हुए: जिसे परमेश्वर ने जिलाया, मृत्यु की पीड़ाओं को खोलकर; क्योंकि यह संभव नहीं था कि वह उन से बँधा रहे। क्योंकि दाऊद उसके विषय में कहता है,(4) मैं ने प्रभु को सदा अपने मुख के आगे देखा; क्योंकि वह मेरे दाहिने है, कि मैं विचलित न होऊँ: इसलिये मेरा हृदय आनन्दित हुआ, और मेरी जीभ मगन हुई; और यह भी, मेरा शरीर आशा में विश्राम करेगा: क्योंकि तू मेरे प्राण को अधोलोक में न छोड़ेगा, न अपने पवित्र जन को सड़ाहट देखने देगा।"(5) तब वह कुलपति दाऊद के विषय में उन से हियाव के साथ कहने लगता है, कि वह मर गया और गाड़ा गया, और उसकी कब्र आज तक उनके साथ है। उसने कहा, "पर चूँकि वह भविष्यद्वक्ता था, और जानता था कि परमेश्वर ने शपथ खाकर उससे शपथ की है, कि उसकी देह के फल में से एक उसके सिंहासन पर बैठेगा; यह पहले देखकर, उसने मसीह के पुनरुत्थान की बात कही, कि वह अधोलोक में नहीं छोड़ा गया, न उसकी देह ने सड़ाहट देखी। इस यीशु को," उसने कहा, "परमेश्वर ने जिलाया, जिसके हम सब साक्षी हैं: जो, परमेश्वर के दाहिने हाथ से ऊँचा किया जाकर, पिता से पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा पाकर, इस वरदान को(6) उण्डेल चुका है जिसे तुम अब देखते और सुनते हो। क्योंकि दाऊद स्वर्ग पर नहीं चढ़ा; पर वह आप कहता है, प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, तू मेरे fight हाथ पर बैठ, जब तक मैं तेरे शत्रुओं को तेरी पाँव की चौकी न कर दूँ।
इसलिये इस्राएल का सारा घराना निश्चय जान ले, कि परमेश्वर ने [उसी यीशु को, जिसे तुम ने क्रूस पर चढ़ाया, प्रभु भी और मसीह भी बनाया।"(7) और जब भीड़ पुकारी, "तो हम क्या करें?" पतरस उन से कहता है, "मन फिराओ, और तुम में से हर एक पापों की क्षमा के लिये यीशु के नाम में बपतिस्मा ले, और तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे।"(8) इस प्रकार प्रेरितों ने दूसरे परमेश्वर का, या दूसरी पूर्णता का, प्रचार नहीं किया; न यह, कि दुख उठानेवाला और फिर जी उठनेवाला मसीह एक था, जबकि जो ऊपर उड़ गया वह दूसरा था, और असंभव बना रहा; पर कि एक ही परमेश्वर पिता था, और मसीह यीशु जो मरे हुओं में से जी उठा; और उन्होंने उस पर विश्वास का प्रचार किया, उन से जो परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास नहीं करते थे, और भविष्यद्वक्ताओं से उन्हें समझाया, कि जिस मसीह को परमेश्वर ने भेजने की प्रतिज्ञा की, उसे उसने यीशु में भेजा, जिसे उन्होंने क्रूस पर चढ़ाया और परमेश्वर ने जिलाया।
3. फिर, जब पतरस, यूहन्ना के साथ, जन्म से लंगड़े मनुष्य को देखा, मन्दिर के उस फाटक के आगे जिसे सुन्दर कहा जाता है, बैठा हुआ और भीख माँगता हुआ, तो उसने उससे कहा, "चाँदी और सोना मेरे पास नहीं; पर जो मेरे पास है वह तुझे देता हूँ: नासरत के यीशु मसीह के नाम में उठ और चल। और तुरन्त उसकी टाँगों और पाँवों ने बल पाया; और वह चला, और उनके साथ मन्दिर में प्रवेश किया, चलता, और कूदता, और परमेश्वर की स्तुति करता हुआ।"(9) तब, जब इस अनपेक्षित काम के कारण चारों ओर से भीड़ उनके चारों ओर इकट्ठी हुई, पतरस ने उन से कहा: "इस्राएल के पुरुषों, तुम इस पर क्यों अचम्भा करते हो; या हम पर ऐसी लगन से क्यों देखते हो, मानो अपनी ही सामर्थ से हम ने इस मनुष्य को चलने योग्य किया हो? अब्राहम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर, हमारे पितरों का परमेश्वर, अपने पुत्र की महिमा कर चुका है, जिसे तुम ने न्याय के लिये सौंप दिया,(10) और पिलातुस के साम्हने नकार दिया, जब वह उसे छोड़ना चाहता था। पर तुम पवित्र जन और धर्मी के विरुद्ध कटुता से खड़े थे(10), और चाहते थे कि एक हत्यारा तुम्हें दिया जाए; पर तुम ने जीवन के प्रधान को घात किया, जिसे परमेश्वर ने मरे हुओं में से जिलाया, जिसके हम साक्षी हैं। और उसके नाम के विश्वास में, जिसे तुम देखते और जानते हो, उसके नाम ने बलवान किया है; हाँ, जो विश्वास उसके द्वारा है, उसने तुम सब के साम्हने उसे यह पूरा चंगापन दिया है। और अब, भाइयों, मैं जानता हूँ कि अज्ञान से तुम ने यह दुष्टता की।(10) ... पर जो बातें परमेश्वर ने सब भविष्यद्वक्ताओं के मुख से पहले दिखा दी थीं, कि उसका मसीह दुख उठाए, उन्हें उसने यों पूरा किया है। इसलिये मन फिराओ, और फिरो, कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएँ, और कि(11) समयों के refresh-
ing प्रभु की उपस्थिति से तुम्हारे पास आएँ; और वह यीशु मसीह को भेजेगा, जो तुम्हारे लिये पहले से तैयार किया गया है,(1) जिसे स्वर्ग को सचमुच ग्रहण करना अवश्य है जब तक सब वस्तुओं की व्यवस्था(2) के समय न आएँ, जिन की परमेश्वर ने अपने पवित्र भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें की हैं। क्योंकि मूसा ने सचमुच हमारे पितरों से कहा, तुम्हारा प्रभु परमेश्वर तुम्हारे भाइयों में से मेरे समान एक भविष्यद्वक्ता तुम्हारे लिये उठाएगा; जो कुछ वह तुम से कहे सब बातों में उसकी सुनना। और यों होगा, कि हर प्राण, जो उस भविष्यद्वक्ता की न सुनेगा, प्रजा में से नाश किया जाएगा। और शमूएल से [भविष्यद्वक्ता] सब, और इसके बाद, जितनों ने बातें की हैं, उन्होंने इन दिनों की भी पहले से कही है। तुम भविष्यद्वक्ताओं की सन्तान हो, और उस वाचा की जिसे परमेश्वर ने हमारे पितरों से बाँधी, अब्राहम से यह कहते हुए, और तेरे वंश में पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँगे। तुम पर 1ले, परमेश्वर ने, अपने पुत्र को जिलाकर, उसे भेजा तुम्हें आशीष देता हुआ, कि हर एक अपनी बुराइयों से फिरे।"(3) पतरस ने, यूहन्ना के साथ, उन्हें यह स्पष्ट सुसमाचार सुनाया, कि पितरों से परमेश्वर की की हुई प्रतिज्ञा यीशु के द्वारा पूरी हुई है; निश्चय दूसरे ईश्वर का प्रचार नहीं करते हुए, पर परमेश्वर के पुत्र का, जो मनुष्य भी बना, और दुख उठा; इस प्रकार इस्राएल को ज्ञान में ले चलते हुए, और यीशु के द्वारा मरे हुओं के पुनरुत्थान का प्रचार करते हुए,(4) और दिखाते हुए, कि मसीह के दुख के विषय में भविष्यद्वक्ताओं ने जो कुछ प्रचार किया था, उसे परमेश्वर ने पूरा किया।
4. इसी कारण, जब महायाजक इकट्ठे हुए, पतरस ने, हियाव से भरा हुआ, उन से कहा, "प्रजा के हाकिमों, और इस्राएल के पुरनियों, यदि हम आज तुम से इस अच्छे काम के विषय में जाँचे जाएँ जो निर्बल मनुष्य पर किया गया, कि वह किस उपाय से चंगा किया गया है; तो तुम सब को, और इस्राएल की सारी प्रजा को, मालूम हो, कि नासरत के यीशु मसीह के नाम से, जिसे तुम ने क्रूस पर चढ़ाया, जिसे परमेश्वर ने मरे हुओं में से जिलाया, उसी के द्वारा cloth यह मनुष्य तुम्हारे साम्हने यहाँ चंगा खड़ा है। यही वह पत्थर है जिसे तुम राजमिस्त्रियों ने तुच्छ जाना, जो कोने का सिर-पत्थर बन गया है। [और किसी और में उद्धार नहीं: क्योंकि] स्वर्ग के नीचे मनुष्यों को दिया गया और कोई नाम नहीं, जिस से हमारा उद्धार होना अवश्य है:"(5) इस प्रकार प्रेरितों ने परमेश्वर को नहीं बदला, पर प्रजा को प्रचार किया कि मसीह क्रूस पर चढ़ाया हुआ यीशु था, जिसे उसी परमेश्वर ने जिसने भविष्यद्वक्ताओं को भेजा था, परमेश्वर आप होकर, जिलाया, और उस में मनुष्यों को उद्धार दिया।
5. इसलिये वे घबरा गए, चंगाई के इस उदाहरण से ("क्योंकि वह मनुष्य चालीस वर्ष से ऊपर था जिस पर चंगाई का यह आश्चर्यकर्म हुआ"(6)), और प्रेरितों की शिक्षा से, और भविष्यद्वक्ताओं की व्याख्या से, जब महायाजकों ने पतरस और यूहन्ना को विदा किया। [ये पीछे वाले] अपने साथी fellowapostles और प्रभु के चेलों के पास लौटे, अर्थात् कलीसिया के पास, और जो हुआ उसे बताया, और यीशु के नाम में उन्होंने कितने हियाव से काम किया। तब कहा जाता है, सारी कलीसिया ने, "यह सुनकर, एक चित्त होकर परमेश्वर की ओर शब्द ऊँचा किया, और कहा, हे प्रभु, तू परमेश्वर है, जिसने आकाश, और पृथ्वी, और समुद्र, और जो कुछ उन में है बनाया है; जिसने, पवित्र आत्मा के द्वारा,(7) हमारे पिता दाऊद, तेरे दास, के मुख से कहा, अन्यजाति क्यों क्रोधित हुईं, और लोगों ने व्यर्थ बातें क्यों सोचीं? पृथ्वी के राजा खड़े हुए, और हाकिम प्रभु के विरुद्ध, और उसके मसीह के विरुद्ध, इकट्ठे हुए। क्योंकि सचमुच, इस नगर में,(8) तेरे पवित्र पुत्र यीशु के विरुद्ध, जिसका तू ने अभिषेक किया, हेरोदेस और पुन्तियुस पिलातुस दोनों, अन्यजातियों के साथ, और इस्राएल की प्रजा के साथ, इकट्ठे हुए, कि जो कुछ तेरे हाथ और तेरी सम्मति ने पहले से करने को ठहराया था उसे करें।"(9) ये कलीसिया की वाणियाँ हैं जिन से हर कलीसिया का मूल हुआ; ये नई वाचा के नागरिकों की राजधानी की वाणियाँ हैं; ये प्रेरितों की वाणियाँ हैं; ये प्रभु के चेलों की वाणियाँ हैं, सचमुच सिद्ध, जो प्रभु के उठाए जाने के बाद आत्मा से सिद्ध किए गए, और उस परमेश्वर को पुकारा जिसने आकाश, और पृथ्वी, और समुद्र बनाया,--जिस की घोषणा भविष्यद्वक्ताओं ने की,--और उसके पुत्र यीशु मसीह को, जिसका परमेश्वर ने अभिषेक किया, और जो और किसी [परमेश्वर] को नहीं जानता था।
क्योंकि उस समय और स्थान में न वैलेन्टिनुस था, न मार्कीयन, न [सत्य के] इन उलटनेवालों में से शेष, और उनके अनुयायी। इसलिये परमेश्वर, सब वस्तुओं का बनानेवाला, ने उन्हें सुना। क्योंकि कहा गया है, "वह स्थान हिल गया जहाँ वे इकट्ठे थे; और वे सब पवित्र आत्मा से भर गए, और उन्होंने परमेश्वर का वचन हियाव से कहा"(10) हर एक से जो विश्वास करना चाहता था।(11) "और बड़ी सामर्थ से," यह जोड़ा गया है, "प्रेरितों ने प्रभु यीशु के पुनरुत्थान की साक्षी दी,"(12) उन से कहते हुए, "हमारे पितरों के परमेश्वर ने यीशु को जिलाया, जिसे तुम ने पकड़कर घात किया, काठ की शहतीर पर [उसे] लटकाते हुए: उसे परमेश्वर ने अपने दाहिने हाथ से(13) प्रधान और उद्धारकर्ता होने को जिलाया है, इस्राएल को मनफिराव देने को, और
पापों की क्षमा। और हम इन वचनों के साक्षी हैं; जैसा पवित्र आत्मा भी है, जिसे परमेश्वर ने उस पर विश्वास करनेवालों को दिया है।"(1) "और प्रतिदिन," कहा गया है, "मन्दिर में, और घर घर, वे मसीह यीशु को सिखाना और प्रचार करना न छोड़ते थे,"(2) परमेश्वर के पुत्र को। क्योंकि यही उद्धार का ज्ञान था, जो उसके पुत्र के आगमन को माननेवालों को परमेश्वर की ओर सिद्ध करता है।
6. पर जब इनमें से कुछ निर्लज्जता से दृढ़ करते हैं कि प्रेरित, यहूदियों के बीच प्रचार करते समय, उस के सिवा दूसरा ईश्वर उन्हें नहीं बता सकते थे जिस पर वे (उनके सुननेवाले(3)) विश्वास करते थे, हम उन से कहते हैं, कि यदि प्रेरित लोगों से उस राय के अनुसार बातें करते थे जो पुराने समय से उन में डाली गई थी, तो किसी ने उन से सत्य नहीं सीखा, और, बहुत पहले की तारीख में, प्रभु से भी नहीं; क्योंकि वे कहते हैं कि उसने आप उसी ढंग से बातें कीं। इसलिये ये मनुष्य आप भी सत्य नहीं जानते; पर चूँकि परमेश्वर के विषय में उनकी राय ऐसी थी, उन्होंने वैसी ही शिक्षा पाई जैसी वे सुन सकते थे। इस बोलने के ढंग के अनुसार, इसलिये, सत्य का नियम किसी के पास नहीं हो सकता; पर सब सीखनेवाले यह चाल सब [शिक्षकों] पर डालेंगे, कि जैसा हर व्यक्ति सोचता था, और जहाँ तक उसकी सामर्थ पहुँचती थी, वैसी ही भाषा भी उससे कही गई। पर प्रभु का आगमन व्यर्थ और निष्फल जान पड़ेगा, यदि वह सचमुच इस अभिप्राय से आया कि हर मनुष्य में पुराने समय से जमी परमेश्वर के विषय की उसकी कल्पना को सहे और बनाए रखे। इसके सिवा भी, यह बहुत भारी काम था, कि जिसे यहूदियों ने मनुष्य के रूप में देखा था, और क्रूस पर जड़ा था, उसे परमेश्वर का पुत्र मसीह, उनका अनन्त राजा, प्रचार किया जाए। तौभी चूँकि यह ऐसा था, उन्होंने निश्चय उन से उनके पुराने विश्वास के अनुसार बातें नहीं कीं। क्योंकि, जिन्होंने उनके मुँह पर कहा कि वे प्रभु के हत्यारे हैं, वे आप भी डेमियुर्ज से ऊपर के पिता का बहुत अधिक हियाव से प्रचार करते, और नहीं वह जो हर व्यक्ति अपने आप को [परमेश्वर के विषय] मानने को कहता; और पाप बहुत कम होता, यदि उन्होंने श्रेष्ठ उद्धारकर्ता को (जिस के पास उन्हें चढ़ना चाहिए था) क्रूस पर न जड़ा होता, क्योंकि वह भाव-रहित था।
क्योंकि, जैसा उन्होंने अन्यजातियों से उनकी कल्पनाओं के अनुसार बातें नहीं कीं, पर हियाव से उन से कहा कि उनके देवता देवता नहीं, पर दुष्टात्माओं की मूर्तियाँ हैं; वैसे ही वे यहूदियों को भी प्रचार करते, यदि वे किसी और बड़े या अधिक सिद्ध पिता को जानते, परमेश्वर के विषय इन मनुष्यों की असत्य राय को न पालते न दृढ़ करते। और, अन्यजातियों की भूल को नष्ट करते हुए, और उन्हें उनके देवताओं से दूर ले जाते हुए, उन्होंने निश्चय उन पर दूसरी भूल नहीं डाली; पर, जो देवता नहीं थे उन्हें हटाकर, उन्होंने उसे दिखाया जो अकेला परमेश्वर और सच्चा पिता था।
7. इसलिये पतरस की उन बातों से, जो उस ने कैसरिया में सूबेदार कुरनेलियुस से, और उसके साथ के उन अन्यजातियों से कहीं, जिन को परमेश्वर का वचन 1ली बार सुनाया गया, हम समझ सकते हैं कि प्रेरित क्या प्रचार करते थे, उनके प्रचार का स्वभाव क्या था, और परमेश्वर के विषय में उनका विचार क्या था। क्योंकि यह कुरनेलियुस, कहा जाता है, "भक्त पुरुष था, और अपने सारे घराने समेत परमेश्वर से डरता था, और लोगों को बहुत दान देता था, और नित्य परमेश्वर से प्रार्थना करता था। उस ने दिन के लगभग 9वें घंटे परमेश्वर का एक दूत अपने पास आते और यह कहते देखा, तेरे दान परमेश्वर के साम्हने स्मरण के लिये पहुँच गए हैं। इसलिये शमौन के पास भेज, जो पतरस कहलाता है।"(4) परन्तु जब पतरस ने वह दर्शन देखा, जिस में स्वर्ग से यह शब्द उस से कहा, "जो परमेश्वर ने शुद्ध किया है, उसे तू साधारण मत कह,"(5) यह [उसे सिखाने के लिये] हुआ, कि जिस परमेश्वर ने व्यवस्था के द्वारा शुद्ध और अशुद्ध के बीच भेद किया था, वही अपने पुत्र के लोहू के द्वारा अन्यजातियों को शुद्ध करनेवाला था--जिस की कुरनेलियुस भी आराधना करता था; उसके पास पतरस भीतर आकर बोला, "मैं सचमुच जानता हूँ कि परमेश्वर पक्षपात नहीं करता: परन्तु हर जाति में जो उस से डरता और धर्म का काम करता है, वह उसे ग्रहण होता है।"(6) वह इस प्रकार स्पष्ट दिखाता है, कि जिस से कुरनेलियुस पहले परमेश्वर की नाई डरता था, जिस का समाचार उस ने व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा सुना था, जिस के लिये वह दान भी देता था, वही सचमुच परमेश्वर है। पुत्र का ज्ञान, परन्तु, उसे नहीं था; इसलिये [पतरस] ने जोड़ा, "वह वचन तुम जानते हो, जो यूहन्ना के प्रचार किए हुए बपतिस्मा के बाद, गलील से आरम्भ होकर, सारे यहूदिया में प्रचार किया गया, नासरत का यीशु, परमेश्वर ने उसे पवित्र आत्मा से और सामर्थ से कैसे अभिषेक किया; वह भलाई करता और शैतान से सताए हुए सब को चंगा करता फिरा; क्योंकि परमेश्वर उसके साथ था।
और हम उन सब बातों के साक्षी हैं जो उस ने यहूदियों के देश में और यरूशलेम में कीं; जिस को उन्होंने काठ की शहतीर पर लटकाकर घात किया: उसे परमेश्वर ने 3रे दिन जिलाया, और खुल्लमखुल्ला दिखाया; सब लोगों को नहीं, परन्तु हम को, जो परमेश्वर की ओर से पहले से चुने हुए साक्षी हैं, हम मुर्दों में से पुनरुत्थान के बाद उसके साथ खाते पीते रहे। और उस ने हमें आज्ञा दी कि लोगों को प्रचार करें, और गवाही दें कि वही है जो परमेश्वर ने जीवितों और मरे हुओं का न्यायी ठहराया। सब भविष्यद्वक्ता उसे गवाही देते हैं, कि उसके नाम के द्वारा, जो कोई उस पर विश्वास करता है वह पापों की क्षमा पाता है।"(7) इसलिये प्रेरितों ने परमेश्वर के पुत्र का प्रचार किया, जिस को मनुष्य नहीं जानते थे; और उसके आगमन का, उन लोगों तक
जो परमेश्वर के विषय में पहले ही से सिखाए जा चुके थे; परन्तु वे दूसरे ईश्वर को नहीं लाए। क्योंकि यदि पतरस ऐसी कोई बात जानता, तो वह अन्यजातियों को स्वतन्त्रता से प्रचार करता, कि यहूदियों का परमेश्वर सचमुच एक है, परन्तु मसीहियों का ईश्वर दूसरा; और वे सब, निस्सन्देह, दूत के दर्शन के कारण भय से चकित होकर, जो कुछ वह उन्हें बताता उस पर विश्वास करते। परन्तु पतरस की बातों से प्रकट है कि उस ने उस परमेश्वर को सचमुच अभी भी रखा जो उन्हें पहले से ज्ञात था; परन्तु उस ने उन्हें यह भी गवाही दी कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, जीवितों और मरे हुओं का न्यायी, और उस ने उन्हें आज्ञा भी दी कि पापों की क्षमा के लिये उस में बपतिस्मा लें; और केवल यही नहीं, परन्तु उस ने गवाही दी कि यीशु आप ही परमेश्वर का पुत्र है, जो पवित्र आत्मा से अभिषिक्त होकर भी यीशु मसीह कहलाता है। और वही व्यक्ति है जो मरियम से जन्मा, जैसा पतरस की गवाही सूचित करती है। क्या सचमुच हो सकता है कि पतरस उस समय अभी तक उस सिद्ध ज्ञान का अधिकारी नहीं था जिसे इन मनुष्यों ने बाद में पाया? इसलिये उनके अनुसार, पतरस अपूर्ण था, और शेष प्रेरित अपूर्ण थे; और इस प्रकार उचित होता कि वे, फिर जीवन में आकर, इन मनुष्यों के चेले बनें, ताकि वे भी सिद्ध किए जाएँ। परन्तु यह सचमुच हास्यास्पद है। ये मनुष्य, वस्तुतः, प्रेरितों के चेले नहीं, अपनी ही दुष्ट धारणाओं के चेले सिद्ध होते हैं। इसी कारण उनके बीच जो विभिन्न विचार हैं वे भी हैं, क्योंकि हर एक ने भूल को वैसे ही अपनाया जैसा वह समर्थ था(1) [उसे ग्रहण करने के लिये]। परन्तु सारे जगत में कलीसिया, प्रेरितों से finn उत्पत्ति रखकर, परमेश्वर और उसके पुत्र के विषय में एक ही विचार पर बनी रहती है।
8. परन्तु फिर: फिलिप्पुस ने इथियोपियों की रानी के खोजे को किस का प्रचार किया, जो यरूशलेम से लौट रहा था, और भविष्यद्वक्ता एसैया को पढ़ रहा था, जब वह और यह मनुष्य अकेले इकट्ठे थे? क्या वह वही नहीं था जिस के विषय में भविष्यद्वक्ता ने कहा: "वह भेड़ की नाई वध के लिये ले जाया गया, और ऊन कतरनेवाले के साम्हने गूँगे मेम्ने की नाई, इस प्रकार उस ने month को नहीं खोला?" "परन्तु उसके जन्म का वर्णन कौन करेगा? क्योंकि उसका जीवन पृथ्वी पर से उठा लिया जाएगा।"(2) [फिलिप्पुस ने प्रचार किया] कि यह यीशु है, और पवित्रशास्त्र उस में पूरा हुआ; वैसा ही विश्वास करनेवाले खोजे ने आप भी किया: और तुरन्त बपतिस्मा माँगकर, उस ने कहा, "मैं विश्वास करता हूँ कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है।"(3) यह मनुष्य इथियोपिया के प्रदेशों में भी भेजा गया, कि जो उस ने आप विश्वास किया था उसका प्रचार करे, कि भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा प्रचार किया हुआ एक ही परमेश्वर है, परन्तु इस [परमेश्वर] का पुत्र मनुष्य-स्वभाव में (सेकुन्दुम होमिनम) पहले ही [अपना] प्रकटन कर चुका था, और भेड़ की नाई वध के लिये ले जाया गया था; और भविष्यद्वक्ताओं ने उसके विषय में जो और सब बातें कहीं।
9. पौलुस आप भी--जब प्रभु ने स्वर्ग में से उस से बातें कीं, और उसे दिखाया कि अपने चेलों को सताते हुए वह अपने ही प्रभु को सता रहा है, और अननियास को उसके पास भेजा कि वह अपनी दृष्टि फिर पाए, और बपतिस्मा ले- "प्रचार किया," कहा जाता है, "दमिश्क की आराधनालयों में यीशु का, पूरे साहस से, कि यही परमेश्वर का पुत्र है, मसीह।"(4) यही वह भेद है जो वह कहता है प्रकाशन के द्वारा उसे जानाया गया, कि जो पुन्तियुस पीलातुस के अधीन दुख उठा, वही सब का प्रभु है, और राजा, और परमेश्वर, और न्यायी, सब के परमेश्वर से अधिकार पाकर, क्योंकि वह "मृत्यु तक, वरन् क्रूस की मृत्यु तक आज्ञाकारी हुआ।"(5) और क्योंकि यह सत्य है, [अथेनियों को अरियुपगुस पर प्रचार करते हुए--जहाँ, कोई यहूदी उपस्थित न होने से, साहस की स्वतन्त्रता से परमेश्वर का प्रचार करना उसकी शक्ति में था--उस ने उन से कहा: "परमेश्वर, जिस ने जगत और उस में की सब वस्तुएँ बनाईं, वह स्वर्ग और पृथ्वी का प्रभु होकर हाथों से बनाए हुए मन्दिरों में नहीं रहता; न वह मनुष्यों के हाथों से छुआ जाता(6), मानो उसे किसी वस्तु की आवश्यकता हो, क्योंकि वह सब को जीवन, और श्वास, और सब वस्तुएँ देता है; जिस ने एक ही लोहू से मनुष्यों की सारी जाति को सारी पृथ्वी के मुख पर बसने के लिये बनाया,(7) उनके निवास की सीमा के अनुसार समयों को पहले से ठहराते हुए, कि वे देवत्व को खोजें, यदि किसी उपाय से वे उसका पीछा करके उसे पा सकें, या उसे पा सकें, यद्यपि वह हम में से हर एक से दूर नहीं। क्योंकि उस में हम जीवित रहते, और चलते, और अस्तित्व रखते हैं, जैसा तुम में से कितनों ने कहा है, क्योंकि हम भी उसकी सन्तान हैं। इसलिये, जब तक हम परमेश्वर की सन्तान हैं, हमें नहीं सोचना चाहिए कि देवत्व सोने या चाँदी के समान है, या कला से या मनुष्य की युक्ति से खोदी हुई पत्थर के समान है।
इसलिये परमेश्वर, अज्ञान के समयों से आँखें मूँदकर, अब हर जगह सब मनुष्यों को आज्ञा देता है कि मन फिराव के साथ उसकी ओर फिरें; क्योंकि उस ने एक दिन ठहराया है, जिस में जगत का यीशु नामक मनुष्य के द्वारा धर्म से न्याय किया जाएगा; जिस की उस ने मरे हुओं में से जिलाकर, उसे आश्वासन दिया है।"(8) अब इस अंश में वह उन्हें केवल जगत के सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर नहीं बताता, कोई यहूदी उपस्थित न होने पर, परन्तु यह भी कि उस ने मनुष्यों की एक ही जाति को सारी पृथ्वी पर बसने के लिये बनाया; जैसा मूसा ने भी कहा: "जब परमप्रधान ने जातियों को बाँटा, जब उस ने आदम के पुत्रों को तितर-बितर किया, तब उस ने परमेश्वर के दूतों की संख्या के अनुसार जातियों की सीमाएँ ठहराईं;"(9) परन्तु
कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे अब दूतों के अधिकार के अधीन नहीं, प्रभु के [शासन] के अधीन हैं। "क्योंकि उसकी प्रजा याकूब प्रभु का भाग ठहरी, इस्राएल उसकी मीरास की डोरी।"(1) और फिर, लुकिया के लुस्त्रा में (लुकाओनिया), जब पौलुस बरनबास के साथ था, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से उस ने एक मनुष्य को चलाया जो जन्म से लंगड़ा था, और जब भीड़ उस अद्भुत काम के कारण उन्हें देवताओं की नाई आदर देना चाहती थी, तब उस ने उन से कहा: "हम तुम्हारे समान मनुष्य हैं, तुम्हें परमेश्वर का प्रचार करते हैं, कि तुम इन व्यर्थ मूर्तियों से फिरकर जीवित परमेश्वर की [सेवा] करो, जिस ने स्वर्ग, और पृथ्वी, और समुद्र, और जो कुछ उन में है सब बनाया; जिस ने बीते समयों में सब जातियों को अपने अपने मार्गों पर चलने दिया, यद्यपि उस ने अपने आप को साक्षी बिना नहीं छोड़ा, भलाई के काम करते हुए, तुम्हें स्वर्ग से वर्षा और फलवन्त ऋतुएँ देते हुए, भोजन और आनन्द से तुम्हारे मन भरते हुए।"(2) परन्तु उसकी सब पत्रियाँ इन घोषणाओं के अनुकूल हैं, मैं, प्रेरित का व्याख्यान करते समय, ठीक स्थान पर पत्रियों से ही दिखाऊँगा। परन्तु जब मैं इन प्रमाणों से पवित्रशास्त्र की सच्चाइयों को निकालता हूँ, और जो बातें विभिन्न रीतियों से कही गई हैं उन्हें संक्षेप में और सार रूप में रखता हूँ, तब तू भी धीरज से उन पर ध्यान दे, और उन्हें लम्बा मत समझ; इस बात को ध्यान में रखकर, कि पवित्रशास्त्र में जो [बातें] हैं उनके प्रमाण पवित्रशास्त्र से ही के सिवा नहीं दिखाए जा सकते।
10. और अभी और, स्तिफनुस, जो प्रेरितों के द्वारा 1ला सेवक चुना गया, और जो सब मनुष्यों में से प्रभु की शहीदी के पदचिह्नों पर 1ला चलनेवाला था, मसीह को मानने के कारण मारा जानेवाला 1ला होकर, लोगों के बीच साहस से बोलते और उन्हें सिखाते हुए, कहता है: "महिमा के परमेश्वर ने हमारे पिता अब्राहम को दर्शन दिया, ... और उस से कहा, अपने देश से, और अपने कुटुम्ब से निकल, और उस देश में आ जिसे मैं तुझे दिखाऊँगा; ... और उस ने उसे इस देश में ले आया, जिस में तुम अब बसते हो। और उस ने उसे उस में कोई मीरास नहीं दी, पाँव रखने भर भी नहीं; तौभी उस ने प्रतिज्ञा की कि वह उसे अधिकार के लिये देगा, और उसके बाद उसके वंश को। ... और परमेश्वर ने इस रीति से कहा, कि उसका वंश परदेश में परदेशी रहेगा, और दासत्व में लाया जाएगा, और चार सौ वर्ष बुरा व्यवहार पाया जाएगा; और जिस जाति की वे सेवा करेंगे उस का मैं न्याय करूँगा, प्रभु कहता है। और उसके बाद वे निकलेंगे, और इस स्थान में मेरी सेवा करेंगे। और उस ने उसे खतने की वाचा दी: और इस प्रकार [अब्राहम] ने इसहाक को जन्मा।"(3) और उसकी शेष बातें उसी परमेश्वर की घोषणा करती हैं, जो यूसुफ के साथ और कुलपतियों के साथ था, और जिस ने मूसा से बातें कीं।
11. और यह कि प्रेरितों की शिक्षा का सारा विस्तार एक ही परमेश्वर की घोषणा करता था, जिस ने अब्राहम को हटाया, जिस ने उसे मीरास की प्रतिज्ञा की, जिस ने उचित समय में उसे खतने की वाचा दी, जिस ने उसके वंश को मिस्र से बुलाया, बाहर से खतने के द्वारा सुरक्षित--क्योंकि उस ने उसे चिह्न के रूप में दिया, कि वे मिस्रियों के समान न हों--कि वह सब वस्तुओं का बनानेवाला था, कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता था, कि वह महिमा का परमेश्वर था,--जो चाहें वे प्रेरितों की बातों और कामों से ही सीख सकते हैं, और इस तथ्य पर ध्यान कर सकते हैं कि यह परमेश्वर एक है, जिस के ऊपर और कोई नहीं। परन्तु यदि उसके ऊपर दूसरा ईश्वर भी होता, तो हम कहते, [हर एक के किए हुए काम] की मात्रा की तुलना [करके], कि पीछेवाला पहलेवाले से श्रेष्ठ है। क्योंकि कामों से अच्छा मनुष्य प्रकट होता है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ;(4) और, क्योंकि इन मनुष्यों के पास अपने पिता के कोई काम दिखाने को नहीं, पीछेवाला अकेला परमेश्वर दिखाया जाता है। परन्तु यदि कोई, "प्रश्नों पर मोहित होकर,"(5) कल्पना करे कि प्रेरितों ने परमेश्वर के विषय में जो कहा है उसे रूपक बनाया जाए, तो वह मेरी पूर्व बातों पर विचार करे, जिन में मैं ने एक ही परमेश्वर को सब वस्तुओं का संस्थापक और बनानेवाला ठहराया, और उनके आरोपों को नष्ट किया और खोल दिया; और वह shah उन्हें प्रेरितों की शिक्षा के अनुकूल पाएगा, और इस प्रकार जो वे सिखाते थे, और जिस के विषय में वे मने हुए थे, उसे बनाए रखने के लिये, कि एक ही परमेश्वर है, सब वस्तुओं का बनानेवाला। और जब वह अपने मन को ऐसी भूल से, और उस से सूचित परमेश्वर के विरुद्ध निन्दा से, उतार लेगा, तब वह आप ही कारण पाएगा यह मानने का कि मूसा की व्यवस्था और नई वाचा का अनुग्रह, दोनों [जिन समयों पर वे दिए गए] उन समयों के योग्य होकर, मनुष्य जाति के लाभ के लिये एक ही परमेश्वर के द्वारा दिए गए।
12. क्योंकि जितने टेढ़े मन के हैं, मूसा की व्यवस्था के विरुद्ध रखे जाकर, उसे सुसमाचार की शिक्षा से असमान और विपरीत ठहराकर, हर वाचा के भेद के कारणों की जाँच पर अपने को नहीं लगाया है। इसलिये, वे पितृ-प्रेम से त्यागे जाकर, और शैतान से फुलाए जाकर, सीमोन मागुस की शिक्षा की ओर लाए जाकर, अपनी धारणाओं में उस से धर्मत्याग कर गए जो परमेश्वर है, और कल्पना की कि प्रेरितों से अधिक उन्होंने आप ही पाया है, दूसरा ईश्वर निकालकर; और [माना] कि प्रेरितों ने सुसमाचार को अभी भी कुछ यहूदी धारणाओं के प्रभाव में प्रचार किया, परन्तु वे आप प्रेरितों से [शिक्षा में] अधिक शुद्ध, और अधिक बुद्धिमान हैं। इसलिये मार्कियन और उसके अनुयायी भी पवित्रशास्त्र को काटने पर उतर आए हैं, कुछ पुस्तकों को न मानते हुए
बिल्कुल भी नहीं; और लूका के अनुसार सुसमाचार को और पौलुस की पत्रियों को घटाकर, वे दृढ़ करते हैं कि ये ही प्रामाणिक हैं, जिन्हें उन्होंने आप इस प्रकार छोटा किया है। दूसरी पुस्तक में,(1) परन्तु, मैं, परमेश्वर [मुझे बल] दे तो, उन्हीं से जिन्हें वे अभी भी रखते हैं, उनका खण्डन करूँगा। परन्तु शेष सब, "ज्ञान" के झूठे नाम से फूले हुए, पवित्रशास्त्र को निश्चय ही पहचानते हैं; परन्तु व्याख्याओं को बिगाड़ते हैं, जैसा मैं ने 1ली पुस्तक में दिखाया है। और, सचमुच, मार्कियन के अनुयायी सृष्टिकर्ता की सीधे निन्दा करते हैं, उसे बुराइयों का सृष्टिकर्ता बताते हुए, उसकी उत्पत्ति के विषय में अधिक सहनीय(2) सिद्धान्त रखते हुए, [और] मानते हुए कि दो सत्ताएँ हैं, स्वभाव से ईश्वर, एक दूसरे से भिन्न,--एक अच्छा, परन्तु दूसरा बुरा। वैलेन्टिनुस की ओर से आनेवाले, परन्तु, अधिक आदरणीय प्रकार के नामों का प्रयोग करते हुए, और यह रखते हुए कि जो सृष्टिकर्ता है वह पिता भी है, और प्रभु, और परमेश्वर, अपने सिद्धान्त या सम्प्रदाय को और plasphemous कर देते हैं, यह मानकर कि वह प्लेरोमा के भीतर के उन एयोन में से किसी से उत्पन्न नहीं हुआ, परन्तु उस न्यूनता से जो प्लेरोमा के पार निकाल दी गई थी। पवित्रशास्त्र की और परमेश्वर की व्यवस्था की अज्ञानता ने ये सब बातें उन पर लाई हैं। और इस पुस्तक के क्रम में मैं एक ओर वाचाओं के भेद का कारण, और दूसरी ओर उनकी एकता और सामंजस्य छुऊँगा।
13. परन्तु यह कि प्रेरितों और उनके चेलों दोनों ने वैसे ही सिखाया जैसा कलीसिया प्रचार करती है, और ऐसा सिखाते हुए सिद्ध किए गए, इसलिये वे उस की ओर भी बुला लिए गए जो सिद्ध है--स्तिफनुस, इन सच्चाइयों को सिखाते हुए, जब वह अभी पृथ्वी पर था, परमेश्वर की महिमा को, और उसकी दाहिनी ओर यीशु को देखा, और पुकारा, "देखो, मैं स्वर्ग को खुला हुआ, और परमेश्वर की दाहिनी ओर मनुष्य के पुत्र को खड़ा हुआ देखता हूँ।"(3) ये बातें उस ने कहीं, और पत्थरवाह किया गया; और इस प्रकार उस ने सिद्ध शिक्षा को पूरा किया, हर बात में शहीदी के अगुवे का अनुकरण करते हुए, और जो उसे घात कर रहे थे उनके लिये प्रार्थना करते हुए, इन शब्दों में: "हे प्रभु, यह पाप उन पर मत लगा।" इस प्रकार वे सिद्ध किए गए जो एक ही परमेश्वर को जानते थे, जो आदि से अन्त तक विभिन्न व्यवस्थाओं में मनुष्य जाति के साथ उपस्थित था; जैसा भविष्यद्वक्ता होशे घोषणा करता है: "मैं ने दर्शनों को भर दिया है, और भविष्यद्वक्ताओं के हाथों से उपमाएँ उपयोग की हैं।"(4) इसलिये, जिन्हों ने मसीह के सुसमाचार के लिये अपने प्राण मृत्यु को सौंप दिए--वे पुरानी स्थापित धारणा के अनुसार मनुष्यों से कैसे बातें कर सकते थे? यदि यही मार्ग उन्होंने अपनाया होता, तो वे दुख न उठाते; परन्तु क्योंकि उन्होंने उन लोगों के विपरीत बातें प्रचार कीं जो सत्य को न मानते थे, इस कारण उन्होंने दुख उठाया। इसलिये प्रकट है कि उन्होंने सत्य नहीं छोड़ा, परन्तु पूरे साहस से यहूदियों और यूनानियों को प्रचार किया। यहूदियों को, सचमुच, [उन्हों ने प्रचार किया] कि जो यीशु उनके द्वारा क्रूस पर चढ़ाया गया वह परमेश्वर का पुत्र है, जीवितों और मरे हुओं का न्यायी, और कि उस ने अपने पिता से इस्राएल में अनन्त राज्य पाया है, जैसा मैं ने दिखाया है; परन्तु यूनानियों को उन्होंने एक ही परमेश्वर का प्रचार किया, जिस ने सब वस्तुएँ बनाईं, और उसके पुत्र यीशु मसीह का।
14. यह प्रेरितों की उस पत्री से और भी स्पष्ट प्रकाश में दिखाया जाता है, जिसे उन्होंने न यहूदियों को, न यूनानियों को, परन्तु उन को भेजा जो अन्यजातियों में से मसीह पर विश्वास करते थे, उनके विश्वास को दृढ़ करते हुए। क्योंकि जब कुछ मनुष्य यहूदिया से अन्ताकिया को उतर आए--जहाँ, सबसे 1ले, प्रभु के चेले मसीही कहलाए, मसीह पर उनके विश्वास के कारण--और प्रभु पर विश्वास करनेवालों को समझाना चाहा कि खतना करवाएँ, और व्यवस्था के पालन के अनुसार और बातें करें; और जब इस प्रश्न के कारण पौलुस और बरनबास यरूशलेम को प्रेरितों के पास चढ़ गए, और सारी कलीसिया इकट्ठी हुई, तब पतरस ने उन से इस प्रकार कहा: "हे भाइयो, तुम जानते हो कि पुराने दिनों से परमेश्वर ने तुम में से चुनाव किया, कि अन्यजाति मेरे मुँह से सुसमाचार का वचन सुनें, और विश्वास करें। और मन के जाँचनेवाले परमेश्वर ने उन्हें गवाही दी, उन्हें पवित्र आत्मा देकर, जैसा हमें भी; और हमारे और उनके बीच कोई भेद नहीं रखा, विश्वास से उनके मन को शुद्ध करते हुए। इसलिये अब तुम परमेश्वर की परीक्षा क्यों करते हो, चेलों की गर्दन पर एक जूआ रखने को, जिसे न हमारे पूर्वज, न हम उठा सके? परन्तु हम विश्वास करते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह के द्वारा हम उद्धार पाएँगे, जैसा वे भी।"(5) उसके बाद याकूब ने इस प्रकार कहा: "हे भाइयो, शमौन ने बताया है कि परमेश्वर ने कैसे ठाना कि अन्यजातियों में से अपने नाम के लिये एक प्रजा ले।
और इस प्रकार(6) भविष्यद्वक्ताओं की बातें मेल खाती हैं, जैसा लिखा है, इसके बाद मैं लौटूँगा, और दाऊद के गिरे हुए तम्बू को फिर बनाऊँगा; और उसके खण्डहरों को बनाऊँगा, और उसे खड़ा करूँगा: कि शेष मनुष्य प्रभु को खोजें, और सब अन्यजाति, जिन के बीच मेरा नाम पुकारा गया है, प्रभु कहता है, ये काम करते हुए।(7) उसका काम अनन्त काल से परमेश्वर को ज्ञात है। इसलिये मैं अपनी ओर से न्याय देता हूँ, कि हम उन्हें कष्ट न दें जो अन्यजातियों में से परमेश्वर की ओर फिरे हैं: परन्तु उन्हें आज्ञा दी जाए, कि वे
मूर्तियों की व्यर्थ बातों से, और व्यभिचार से, और लोहू से अलग रहें; और जो कुछ(1) वे नहीं चाहते कि अपने साथ किया जाए, उसे वे औरों के साथ न करें।"(2) और जब ये बातें कही गईं, और सब ने अपनी सम्मति दी, तब उन्होंने उन्हें इस रीति से लिखा: "प्रेरित, और प्राचीन, [और] भाई, उन भाइयों को जो अन्यजातियों में से अन्ताकिया, और सीरिया, और किलिकिया में हैं, नमस्कार: क्योंकि हम ने सुना है कि हम में से निकलकर गए कुछ लोगों ने बातों से तुम्हें कष्ट दिया है, तुम्हारे प्राणों को उलटते हुए, यह कहते हुए, तुम्हें खतना करवाना और व्यवस्था माननी अवश्य है; जिन को हम ने ऐसी कोई आज्ञा नहीं दी: हमें अच्छा लगा, एक मन होकर इकट्ठे हुए, चुने हुए मनुष्यों को हमारे प्रिय बरनबास और पौलुस के साथ तुम्हारे पास भेजना; मनुष्य जिन्हों ने हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम के लिये अपना प्राण सौंप दिया है। इसलिये हम ने यहूदा और सीलास को भेजा है, कि वे मुँह की बात से हमारी सम्मति बताएँ। क्योंकि पवित्र आत्मा को और हमें अच्छा लगा, कि इन आवश्यक बातों से बड़ा भार तुम पर न रखें; कि तुम मूर्तियों पर चढ़ाए हुए भोजन से, और लोहू से, और व्यभिचार से अलग रहो; और जो कुछ तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे साथ किया जाए, वह तुम औरों के साथ मत करो: जिन से अपने को बचाकर, तुम भला करोगे, पवित्र आत्मा में चलते हुए(3)।" इन सब अंशों से, तब, प्रकट है कि उन्होंने दूसरे पिता का अस्तित्व नहीं सिखाया, परन्तु स्वतन्त्रता की नई वाचा उन को दी जिन्हों ने हाल ही में पवित्र आत्मा के द्वारा परमेश्वर पर विश्वास किया था। परन्तु उन्होंने स्पष्ट दिखाया, उन के द्वारा विवादित विषय के स्वभाव से, कि चेलों का खतना करना अभी भी आवश्यक है या नहीं, कि उन्हें दूसरे ईश्वर का कोई विचार नहीं था।
15. [उस दशा में] न तो वे 1ली वाचा के विषय में ऐसी चाल रखते, कि अन्यजातियों के साथ खाने तक के लिये तैयार न होते। क्योंकि पतरस भी, यद्यपि उन्हें सिखाने को भेजा गया था, और उस प्रभाव के लिये एक दर्शन से विवश किया गया था, तौभी थोड़े नहीं संकोच के साथ बोला, उन से कहता हुआ: "तुम जानते हो कि यह अन्याय की बात है कि एक यहूदी मनुष्य दूसरी जाति के किसी के साथ संगति रखे, या उसके पास आए; परन्तु परमेश्वर ने मुझे दिखाया है कि मैं किसी मनुष्य को साधारण या अशुद्ध न कहूँ। इसलिये मैं बिना विरोध के आया;"(4) इन बातों से सूचित करते हुए, कि यदि उसे आज्ञा न दी गई होती तो वह उनके पास न आता। न, ऐसे ही कारण से, वह उन्हें इतनी शीघ्रता से बपतिस्मा देता, यदि उस ने उन्हें भविष्यद्वाणी करते न सुना होता जब पवित्र आत्मा उन पर ठहरा। और इसलिये उस ने पुकारा, "क्या कोई मनुष्य पानी को मना कर सकता है, कि ये बपतिस्मा न लें, जिन्हों ने पवित्र आत्मा हम ही की नाई पाया है?"(5) उस ने, उसी समय, अपने साथ के लोगों को मनाया, और दिखाया कि यदि पवित्र आत्मा उन पर न ठहरा होता, तो कोई ऐसा हो सकता था जो उनके बपतिस्मा पर आपत्ति उठाता। और याकूब के साथ जो प्रेरित थे उन्होंने अन्यजातियों को स्वतन्त्रता से चलने दिया, हमें परमेश्वर की आत्मा के हाथ सौंपते हुए। परन्तु वे आप, उसी परमेश्वर को जानते हुए, प्राचीन रीतियों में बने रहे; यहाँ तक कि पतरस भी, इस डर से कि कहीं वह उनकी डाँट का भागी न हो, यद्यपि पहले अन्यजातियों के साथ खाता था, दर्शन के कारण, और उस आत्मा के कारण जो उन पर ठहरा था, तौभी, जब याकूब की ओर से कुछ लोग आए, अपने आप को हटा लिया, और उनके साथ नहीं खाया।
और पौलुस ने कहा कि बरनबास ने भी वही काम किया।(6) प्रेरितों ने इस प्रकार किया, जिन्हें प्रभु ने हर काम का और हर शिक्षा का साक्षी बनाया--क्योंकि हर अवसर पर हम पतरस, और याकूब, और यूहन्ना को उसके साथ उपस्थित पाते हैं--मूसा की व्यवस्था के प्रबन्ध के अनुसार सावधानी से चले, यह दिखाते हुए कि वह एक ही परमेश्वर की ओर से थी; जिसे वे निश्चय कभी न करते, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, यदि उन्होंने प्रभु से सीखा होता [कि अस्तित्व में है] दूसरा पिता उस के सिवा जिस ने व्यवस्था के प्रबन्ध को ठहराया।
अध्याय तेरह.--उस विचार का खण्डन, कि पौलुस ही एकमात्र प्रेरित था जिस को सत्य का ज्ञान था।
1. उन (मार्कियनों) के विषय में जो कहते हैं कि केवल पौलुस सत्य को जानता था, और उसे भेद प्रकाशन के द्वारा प्रगट हुआ, पौलुस आप ही उन्हें दोषी ठहराए, जब वह कहता है, कि एक ही परमेश्वर ने पतरस में खतने के प्रेरिताई के लिये, और अपने में अन्यजातियों के लिये काम किया।(7) इसलिये पतरस उसी परमेश्वर का प्रेरित था जिसका पौलुस भी था; और जिस को पतरस ने खतना किए हुओं के बीच परमेश्वर के रूप में प्रचार किया, और वैसे ही परमेश्वर के पुत्र को, उसे पौलुस ने भी अन्यजातियों के बीच [प्रचार किया]। क्योंकि हमारे प्रभु कभी केवल पौलुस को बचाने नहीं आए, न परमेश्वर साधनों में इतना सीमित है, कि उसके पास एक ही प्रेरित हो जो उसके पुत्र की व्यवस्था को जानता हो। और फिर, जब पौलुस कहता है, "उन के पाँव कितने सुन्दर हैं जो अच्छी बातों की शुभ समाचार लाते हैं, और मेल के सुसमाचार का प्रचार करते हैं,"(8) वह स्पष्ट दिखाता है कि केवल एक नहीं, परन्तु बहुत थे जो सत्य का प्रचार करते थे। और फिर, कुरिन्थियों की पत्री में, जब उस ने उन सब को गिना जिन्हों ने पुनरुत्थान के बाद परमेश्वर(9) को देखा था, वह
जारी रखते हुए कहता है, "परन्तु चाहे मैं था या वे, हम ऐसा ही प्रचार करते हैं, और तुम ने ऐसा ही विश्वास किया, "(1) उन सब के प्रचार को एक और वही मानते हुए, जिन्हों ने मरे हुओं में से पुनरुत्थान के बाद परमेश्वर(2) को देखा।
2. और फिर, प्रभु ने फिलिप्पुस को उत्तर दिया, जो पिता को देखना चाहता था, "मैं इतने लम्बे समय से तुम्हारे साथ हूँ, और तौभी तू ने मुझे नहीं जाना, फिलिप्पुस? जो मुझे देखता है, वह पिता को भी देखता है; तब तू कैसे कहता है, हमें पिता को दिखा? क्योंकि मैं पिता में हूँ, और पिता मुझ में है; और अब से तुम उसे जानते हो, और उसे देख चुके हो।" (3) इसलिये इन मनुष्यों को प्रभु ने गवाही दी, कि अपने में उन्होंने पिता को जाना भी और देखा भी (और पिता सत्य है)। तब, यह कहना कि ये मनुष्य सत्य को नहीं जानते थे, झूठे साक्षियों का, और मसीह की शिक्षा से अलग किए हुओं का भाग निभाना है। क्योंकि यदि ये मनुष्य सत्य को नहीं जानते थे, तो प्रभु ने बारह प्रेरितों को इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास क्यों भेजा,(4)? सत्तर ने कैसे प्रचार किया, जब तक उन्होंने आप पहले उस सत्य को न जाना हो जिसका प्रचार हुआ? या पतरस अज्ञान में कैसे हो सकता था, जिस को प्रभु ने गवाही दी, कि माँस और लोहू ने उसे प्रगट नहीं किया, परन्तु पिता, जो स्वर्ग में है?(5) तब, ठीक वैसे, जैसा" पौलुस [था] प्रेरित, मनुष्यों का नहीं, न मनुष्य के द्वारा, परन्तु यीशु मसीह के द्वारा, और पिता परमेश्वर के द्वारा,"(6) [शेष के साथ ऐसा ही;] (7) पुत्र सचमुच उन्हें पिता के पास ले जाता हुआ, परन्तु पिता उन्हें पुत्र को प्रगट करता हुआ।
3. परन्तु यह कि पौलुस ने उन की [विनती] मानी जिन्हों ने उसे प्रेरितों के पास बुलाया, उठे हुए प्रश्न के कारण, और उनके पास चढ़ गया, बरनबास के साथ, यरूशलेम को, बिना कारण नहीं, परन्तु इसलिये कि अन्यजातियों की स्वतन्त्रता उनके द्वारा दृढ़ हो, वह आप कहता है, गलातियों की पत्री में: "तब, चौदह वर्ष बाद, मैं बरनबास के साथ फिर यरूशलेम को चढ़ गया, तीतुस को भी साथ लेते हुए। परन्तु मैं प्रकाशन के द्वारा चढ़ गया, और उन्हें उस सुसमाचार को बताया जिसे मैं अन्यजातियों में प्रचार करता था।"(8) और फिर वह कहता है, "एक घंटे के लिये हम ने अधीनता को स्थान दिया,(9) कि सुसमाचार की सच्चाई तुम्हारे साथ बनी रहे।" तब, यदि कोई, प्रेरितों के कामों से, उस समय को ध्यान से जाँचे जिस के विषय में लिखा है कि वह पहले कही गई प्रश्न के कारण यरूशलेम को चढ़ गया, तो वह पाएगा कि पौलुस के बताए हुए वे वर्ष उसके साथ मेल खाते हैं। इस प्रकार पौलुस का कथन प्रेरितों के विषय में लूका की गवाही के साथ मेल खाता है, और, मानो, उसके समान है।
अध्याय चौदह.--यदि पौलुस ऐसे भेद जानता जो दूसरे प्रेरितों पर प्रगट नहीं हुए, तो लूका, उसका नित्य साथी और सहयात्री, उन से अनजान नहीं रह सकता था; न सत्य सम्भवतः उस से छिपा रह सकता था, जिस के द्वारा ही हम सुसमाचार के इतिहास की बहुत सी और अति महत्वपूर्ण बातें सीखते हैं।
1. परन्तु यह कि यह लूका पौलुस से अविभाज्य था, और सुसमाचार में उसका सहकर्मी, वह आप स्पष्ट दिखाता है, घमण्ड की बात के रूप में नहीं, परन्तु सत्य ने ही उसे ऐसा करने को बाध्य किया। क्योंकि वह कहता है कि जब बरनबास, और यूहन्ना जो मरकुस कहलाता था, पौलुस से अलग हो गए, और कुप्रुस को जहाज से गए, "हम त्रोआस आए;"(10) और जब पौलुस ने स्वप्न में मकिदुनिया के एक मनुष्य को देखा, जो कहता था, "पौलुस, मकिदुनिया में आकर हमारी सहायता कर," "तुरन्त," वह कहता है, "हम ने मकिदुनिया में जाने का यत्न किया, यह समझकर कि प्रभु ने हमें उन्हें सुसमाचार सुनाने को बुलाया है। इसलिये, त्रोआस से जहाज चलकर, हम ने अपने जहाज का मार्ग समोत्राकिया की ओर किया।" और तब वह फिलिप्पी तक उनकी यात्रा के शेष सब को ध्यान से सूचित करता है, और उन्होंने अपना 1ला सम्बोधन कैसे दिया: "क्योंकि, बैठकर," वह कहता है, "हम ने उन स्त्रियों से बातें कीं जो इकट्ठी हुई थीं;"(11) और कितनों ने विश्वास किया, बहुतों ने भी। और फिर वह कहता है, "परन्तु हम अखमीरी रोटी के दिनों के बाद फिलिप्पी से जहाज चले, और त्रोआस आए, जहाँ हम सात दिन रहे।"(12) और पौलुस के साथ अपने मार्ग के शेष सब [विवरण] वह बताता है, पूरे परिश्रम से स्थानों, और नगरों, और दिनों की संख्या को सूचित करते हुए, जब तक वे यरूशलेम को चढ़े; और वहाँ पौलुस पर क्या बीता,(13) वह बन्धनों में रोम को कैसे भेजा गया; उस सूबेदार का नाम जिस ने उसे अपने भार में लिया;(14) और जहाजों के चिह्न, और उन्होंने जहाज कैसे तोड़ा;(15) और वह द्वीप जिस पर वे बच निकले, और वहाँ उन्होंने दया कैसे पाई, पौलुस ने उस द्वीप के मुख्य मनुष्य को चंगा किया; और वे वहाँ से पुतियोली को कैसे जहाज चले, और वहाँ से रोम पहुँचे; और किस अवधि तक वे रोम में रहे।
क्योंकि लूका इन सब घटनाओं में उपस्थित था, उस ने उन्हें लिखकर ध्यान से अंकित किया, ताकि वह झूठ या घमण्ड का दोषी न ठहराया जा सके, क्योंकि ये सब [बातें] दोनों सिद्ध करती थीं कि वह उन सब से पूर्व था जो अब अन्यथा सिखाते हैं, और कि वह सत्य से अनजान नहीं था। कि वह
केवल अनुयायी नहीं, परन्तु प्रेरितों का सहकर्मी भी था, परन्तु विशेष करके पौलुस का, पौलुस ने आप भी पत्रियों में घोषणा की है, यह कहते हुए: "देमास ने मुझे छोड़ दिया है, ... और थिस्सलुनीके को चला गया है; क्रिस्केंस गलातिया को, तीतुस दलमतिया को। केवल लूका मेरे साथ है।"(1) इससे वह दिखाता है कि वह सदा उसके साथ लगा और उससे अविभाज्य था। और फिर वह कुलुस्सियों की पत्री में कहता है: "लूका, प्रिय चिकित्सक, तुम्हें नमस्कार करता है।"(2) परन्तु निश्चय यदि लूका, जो सदा पौलुस के संग प्रचार करता था, और उसके द्वारा "प्रिय" कहलाता है, और उसके साथ सुसमाचार प्रचारक का काम करता था, और हमें एक सुसमाचार सौंपने को सौंपा गया था, उस (पौलुस) से भिन्न कुछ नहीं सीखा, जैसा उसकी बातों से दिखाया गया है, तो ये मनुष्य, जो कभी पौलुस के साथ लगे नहीं थे, कैसे घमण्ड कर सकते हैं कि उन्होंने छिपे और अकथनीय भेद सीखे हैं?
2. परन्तु यह कि पौलुस ने जो जाना उसे सरलता से सिखाया, न केवल उन को जो उसके साथ [काम में] थे, परन्तु उन को भी जो उसे सुनते थे, वह आप प्रगट करता है। क्योंकि जब इफिसुस और लगे हुए दूसरे नगरों से आए हुए अध्यक्ष और प्राचीन मिलेतुस में इकट्ठे हुए, क्योंकि वह आप पिन्तेकुस्त मानने को यरूशलेम की ओर शीघ्रता कर रहा था, उन को बहुत बातों की गवाही देकर, और बताकर कि यरूशलेम में उसके साथ क्या होना चाहिए, उस ने जोड़ा: "मैं जानता हूँ कि तुम अब से मेरा मुख नहीं देखोगे। इसलिये मैं आज तुम्हें गवाह ठहराता हूँ, कि मैं सब के लोहू से शुद्ध हूँ। क्योंकि मैं ने परमेश्वर की सारी सम्मति तुम्हें बताने से नहीं झिझका। इसलिये अपने विषय में, और उस सारे झुण्ड के विषय में चौकस रहो जिस पर पवित्र आत्मा ने तुम्हें अध्यक्ष ठहराया है, प्रभु की कलीसिया पर शासन करने को,(3) जिसे उस ने अपने ही लोहू के द्वारा अपने लिये प्राप्त किया है।"(4) तब, उन बुरे शिक्षकों की ओर संकेत करते हुए जो उठनेवाले थे, उस ने कहा: "मैं जानता हूँ कि मेरे जाने के बाद भयंकर भेड़िये तुम्हारे पास आएँगे, झुण्ड को न छोड़ेंगे। तुम में से भी मनुष्य उठेंगे, टेढ़ी बातें बोलते हुए, चेलों को अपने पीछे खींचने को।" "मैं ने नहीं झिझका," वह कहता है, "परमेश्वर की सारी सम्मति तुम्हें बताने से।" प्रेरितों ने इस प्रकार सरलता से, और पक्षपात बिना, सब को वह सौंप दिया जो उन्होंने आप प्रभु से सीखा था। लूका भी इस प्रकार, पक्षपात बिना, हमें वह सौंपता है जो उस ने उन से सीखा था, जैसा उस ने आप गवाही दी है, यह कहते हुए, "जैसा उन्होंने उन्हें हमें सौंप दिया, जो आदि से प्रत्यक्षदर्शी और वचन के सेवक थे।"(5)
3. अब यदि कोई मनुष्य लूका को एक ओर रखे, सत्य को न जाननेवाले के रूप में, तो वह, [ऐसा करने से,] स्पष्ट रूप से उस सुसमाचार को अस्वीकार करेगा जिसका चेला होने का वह दावा करता है। क्योंकि उसके द्वारा हम सुसमाचार के बहुत से और महत्वपूर्ण भागों से परिचित हुए हैं; उदाहरण के लिये, यूहन्ना का जन्म, जकर्याह का इतिहास, मरियम के पास दूत का आना, इलीशिबा की पुकार, चरवाहों के पास दूतों का उतरना, उनके द्वारा कही गई बातें, मसीह के विषय में हन्ना और शिमोन की गवाही, और कि बारह वर्ष की आयु में वह यरूशलेम में पीछे छोड़ दिया गया; और यूहन्ना का बपतिस्मा, प्रभु के वर्षों की संख्या जब वह बपतिस्मा लिया गया, और कि यह तिबेरियुस कैसर के 15वें वर्ष में हुआ।
और अपने शिक्षक के पद में उस ने धनवानों से यही कहा है: "हाय तुम पर जो धनवान हो, क्योंकि तुम अपनी शान्ति पा चुके हो;"(6) और "हाय तुम पर जो तृप्त हो, क्योंकि तुम भूखे रहोगे; और तुम जो अब हँसते हो, क्योंकि तुम रोओगे;" और, "हाय तुम पर जब सब मनुष्य तुम्हारी प्रशंसा करेंगे: क्योंकि तुम्हारे पूर्वजों ने झूठे भविष्यद्वक्ताओं के साथ ऐसा ही किया।" इस प्रकार की सब बातें हम ने केवल लूका के द्वारा जानी हैं (और प्रभु के अनेक काम हम ने उसके द्वारा सीखे हैं, जिन्हें सब [सुसमाचार लेखक] भी ध्यान देते हैं): मछलियों की वह भीड़ जिसे पतरस के साथियों ने घेरा, जब प्रभु की आज्ञा पर उन्होंने जाल डाले;(7) वह स्त्री जो अठारह वर्ष तक दुख उठाती रही, और सब्त के दिन चंगी की गई;(8) वह मनुष्य जिसे जलोदर था, जिसे प्रभु ने सब्त को चंगा किया, और उस ने उस दिन चंगाई का काम करने के कारण अपनी रक्षा कैसे की; उस ने अपने चेलों को कैसे सिखाया कि मुख्य स्थानों की लालसा न करें; हम कंगालों और निर्बलों को कैसे बुलाएँ, जो हमें बदला नहीं दे सकते; वह मनुष्य जो रोटियाँ पाने को रात में खटखटाया, और अपनी हठ की अत्यावश्यकता के कारण उन्हें पाया;(9) जब [हमारा प्रभु] एक फरीसी के साथ भोजन पर बैठा था, एक पापिनी स्त्री ने उसके पाँव चूमे, और उन्हें इत्र से अभिषेक किया, दो देनदारों के विषय में उसके पक्ष में प्रभु ने शमौन से क्या कहा;(10) उस धनवान के दृष्टान्त के विषय में भी जिस ने अपने पास आए हुए धन को जमा किया, जिस से यह भी कहा गया, "इसी रात वे तेरा प्राण तुझ से माँगेंगे; तब वे वस्तुएँ किस की होंगी जिन्हें तू ने तैयार किया है?"(11) और इसके समान, उस धनवान का, जो बैंगनी वस्त्र पहने था और ठाठ से खाता था, और कंगाल लाजर;(12) और वह उत्तर भी जो उस ने अपने चेलों को दिया जब उन्होंने कहा, "हमारा विश्वास बढ़ा;"(13) और चुंगी लेनेवाले जक्कई के साथ उसकी बातचीत भी;(14) और भी के विषय में
फरीसी और चुंगी लेनेवाले के विषय में, जो एक ही समय मन्दिर में प्रार्थना कर रहे थे;(1) उन दस कोढ़ियों के विषय में भी, जिन्हें उस ने मार्ग में एक साथ शुद्ध किया;(2) और उस ने कैसे आज्ञा दी कि लंगड़ों और अन्धों को गलियों और सड़कों से विवाह में इकट्ठा किया जाए;(3) और उस न्यायी का दृष्टान्त भी जो परमेश्वर से नहीं डरता था, जिसे विधवा की हठ ने उसके मुकद्दमे का पलटा लेने को ले गया;(4) और दाखबारी में उस अंजीर के वृक्ष के विषय में जिस ने फल नहीं दिया। और भी बहुत सी बातें केवल लूका के द्वारा कही हुई मिलती हैं, जिन का मार्कियन और वैलेन्टिनुस दोनों उपयोग करते हैं। और इन सब के सिवा, [वह लिखता है] पुनरुत्थान के बाद मार्ग में [मसीह] ने अपने चेलों से क्या कहा, और रोटी तोड़ने में उन्होंने उसे कैसे पहचाना।(5)
4. तब, अवश्य ही, यह निकलता है कि इन मनुष्यों को या तो उसकी कथा का शेष भाग ग्रहण करना होगा, या इन भागों को भी अस्वीकार करना होगा। क्योंकि सामान्य बुद्धि के कोई व्यक्ति उन्हें अनुमति नहीं दे सकते कि वे लूका की कही हुई कुछ बातों को सत्य मानकर ग्रहण करें, और औरों को एक ओर रखें, मानो वह सत्य को नहीं जानता था। और यदि सचमुच मार्कियन के अनुयायी इन्हें अस्वीकार करें, तो उनके पास कोई सुसमाचार नहीं रहेगा; क्योंकि, लूका के अनुसार उसे घटाकर, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, वे [जो शेष रहता है उस में] सुसमाचार रखने का घमण्ड करते हैं। परन्तु वैलेन्टिनुस के अनुयायियों को अपनी पूरी व्यर्थ बात छोड़नी होगी; क्योंकि उन्होंने उस [सुसमाचार] से अपनी कल्पनाओं के लिये बहुत अवसर लिए हैं, जो उस ने भली भाँति कहा है उस पर बुरी व्याख्या रखने को। दूसरी ओर, यदि वे शेष भागों को भी ग्रहण करने को विवश अनुभव करें, तब, सिद्ध सुसमाचार का, और प्रेरितों की शिक्षा का अध्ययन करके, वे पश्चात्ताप करना आवश्यक पाएँगे, कि [जिस के वे भागी हैं] उस खतरे से बचाए जाएँ।
अध्याय पंद्रह.--इबियोनी का खण्डन, जिन्हों ने सन्त पौलुस के अधिकार को छोटा किया, सन्त लूका की लेखों से, जिन्हें समग्र रूप में ग्रहण करना अवश्य है। ग्नोस्तिकों के कपट, छल, और घमण्ड का प्रकटन। प्रेरितों और उनके चेलों ने एक ही परमेश्वर को जाना और प्रचार किया, जो जगत का सृष्टिकर्ता है।
1. परन्तु फिर, हम उन्हीं के विरुद्ध वही कहते हैं जो पौलुस को प्रेरित नहीं मानते: कि वे या तो सुसमाचार की उन और बातों को अस्वीकार करें जिन्हें हम केवल लूका के द्वारा जानने को आए हैं, और उनका उपयोग न करें; या, यदि वे ये सब ग्रहण करते हैं, तो उन्हें पौलुस के विषय में उस गवाही को भी अवश्य मानना होगा, जब वह (लूका) हमें बताता है कि प्रभु ने 1ले स्वर्ग से उस से कहा: "शाऊल, शाऊल, तू मुझे क्यों सताता है? मैं यीशु मसीह हूँ, जिसे तू सताता है; "(6) और तब अननियास से, उसके विषय में यह कहते हुए: "तू जा; क्योंकि वह मेरे लिये चुना हुआ पात्र है, अन्यजातियों, और राजाओं, और इस्राएल की सन्तान के बीच मेरे नाम को उठाने को। क्योंकि मैं उसे, इस समय से, दिखाऊँगा कि मेरे नाम के लिये उसे कितनी बड़ी बातें सहनी होंगी।"(7) इसलिये, जो उसे [शिक्षक के रूप में] नहीं ग्रहण करते, जो इस उद्देश्य के लिये परमेश्वर के द्वारा चुना गया था, कि वह साहस से उसका नाम उठाए, पहले कही गई जातियों के पास भेजा हुआ होकर, वे परमेश्वर के चुनाव का तिरस्कार करते हैं, और अपने को प्रेरितों की संगति से अलग करते हैं। क्योंकि न वे यह वाद कर सकते हैं कि पौलुस प्रेरित नहीं था, जब वह इस उद्देश्य के लिये चुना गया था; न वे लूका को झूठ का दोषी सिद्ध कर सकते हैं, जब वह पूरे परिश्रम से हमें सत्य का प्रचार करता है। सचमुच हो सकता है, कि इसी दृष्टि से परमेश्वर ने लूका के साधन द्वारा बहुत सी सुसमाचार की सच्चाइयाँ रखीं, जिन का उपयोग सब आवश्यक समझें, ताकि सब लोग, उसकी बाद की गवाही का अनुसरण करते हुए, जो प्रेरितों के कामों और शिक्षा पर है, और सत्य के मिलावट रहित नियम को थामे हुए, उद्धार पाएँ। इसलिये उसकी गवाही सत्य है, और प्रेरितों की शिक्षा खुली और स्थिर है, कुछ भी छिपाए नहीं रखती; न उन्होंने एकान्त में शिक्षाओं का एक समूह सिखाया, और सार्वजनिक में दूसरा।
2. क्योंकि यह झूठे व्यक्तियों, बुरे बहकानेवालों, और कपटियों की कपट-चाल है, जैसे वे करते हैं जो वैलेन्टिनुस की ओर से हैं। ये मनुष्य भीड़ से कलीसिया के लोगों के विषय में बातें करते हैं, जिन्हें वे आप "साधारण," और "कलीसियाई" कहते हैं।(8) इन बातों से वे अधिक सीधे लोगों को फँसाते हैं, और उन्हें ललचाते हैं, हमारी भाषा का अनुकरण करते हुए, कि ये [ठगे हुए] उन को और अधिक बार सुनें; और तब ये हम से पूछे जाते हैं(9), कैसे, कि जब वे हमारी जैसी शिक्षाएँ रखते हैं, हम, बिना कारण, अपनी संगति से अपने को अलग रखते हैं; और [कैसे,] जब वे वही बातें कहते हैं, और वही शिक्षा रखते हैं, हम उन्हें मिथ्या शिक्षक कहते हैं? जब उन्होंने इस प्रकार, प्रश्नों के द्वारा, किसी के विश्वास को गिरा दिया है, और उन्हें अपने ही के निर्विरोध श्रोता बना दिया है, तब वे एकान्त में उन्हें अपने प्लेरोमा के अकथनीय भेद का वर्णन करते हैं। परन्तु वे पूरे धोखे में हैं, जो कल्पना करते हैं कि वे मिथ्या शिक्षकों के द्वारा लाए हुए पवित्रशास्त्र के अंशों से वह [शिक्षा] सीख सकते हैं जिसे उनकी बातें युक्तिसंगत रूप से सिखाती हैं।(10) क्योंकि भ्रम युक्तिसंगत है, और एक re-
समानता सत्य से रखता है, परन्तु उसे छिपाना आवश्यक है; जबकि सत्य बिना छिपाने के है, और इसलिये बालकों को सौंपा गया है। और यदि उनके श्रोताओं में से कोई सचमुच स्पष्टीकरण माँगे, या उन पर आपत्ति उठाए, तो वे दृढ़ करते हैं कि वह सत्य को ग्रहण करने के योग्य नहीं, और ऊपर से अपनी माता से [आया] बीज नहीं रखता; और इस प्रकार सचमुच उसे कोई उत्तर नहीं देते, परन्तु केवल घोषणा करते हैं कि वह बीच के प्रदेशों का है, अर्थात् पशु-स्वभावों से सम्बन्ध रखता है। परन्तु यदि कोई छोटे मेम्ने की नाई अपने को उनके हाथ सौंप दे, और उनकी रीति का, और उनके "छुटकारे" का अनुसरण करे, तो ऐसा व्यक्ति इस सीमा तक फुलाया जाता है, कि वह सोचता है कि वह न स्वर्ग में है न पृथ्वी पर, परन्तु प्लेरोमा के भीतर प्रवेश कर चुका है; और अपने दूत को पहले ही आलिंगन करके, वह अकड़ती चाल और तिरस्कारपूर्ण मुख के साथ चलता है, मुर्गे का सारा आडम्बर रखता हुआ। उन में ऐसे हैं जो दृढ़ करते हैं कि ऊपर से आनेवाले उस मनुष्य को अच्छी चाल चलनी चाहिए; इसलिये वे कुछ तिरस्कार के साथ [चाल-चलन की] गम्भीरता का नाटक भी करते हैं। परन्तु बहुसंख्यक, ठट्ठा करनेवाले भी बनकर, मानो पहले ही सिद्ध हों, और [दिखावे की] चिन्ता बिना जीवन बिताते हुए, हाँ, [जो अच्छा है उसके] तिरस्कार में, अपने को "आत्मिक" कहते हैं, और कहते हैं कि वे उस विश्राम के स्थान से पहले ही परिचित हो चुके हैं जो उनके प्लेरोमा के भीतर है।
3. परन्तु [अब तक चलाए गए] उसी तर्क की रेखा पर हम लौटें। क्योंकि जब स्पष्ट घोषणा हो चुकी है, कि जो सत्य के प्रचारक और स्वतन्त्रता के प्रेरित थे उन्होंने और किसी को परमेश्वर नहीं कहा, न उसे प्रभु नाम दिया, केवल सच्चे परमेश्वर पिता को छोड़कर, और उसके वचन को, जो सब बातों में श्रेष्ठता रखता है; तब स्पष्ट सिद्ध होगा, कि उन्होंने (प्रेरितों ने) उस को प्रभु परमेश्वर माना जो स्वर्ग और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता था, जिस ने मूसा से भी बातें कीं, उसे व्यवस्था का प्रबन्ध दिया, और जिस ने पूर्वजों को बुलाया; और कि वे और किसी को नहीं जानते थे। इसलिये प्रेरितों की, और उन (Marks और लूका) की जो उनकी बातों से सीखे, परमेश्वर के विषय में सम्मति प्रगट हो चुकी है।
अध्याय सोलह.--प्रेरितीय लेखों से प्रमाण, कि यीशु मसीह एक और वही था, परमेश्वर का एकलौता पुत्र, सिद्ध परमेश्वर और सिद्ध मनुष्य।
1. परन्तु(1) कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि यीशु केवल मसीह का पात्र था, जिस पर मसीह, कबूतर की नाई, ऊपर से उतरा, और कि जब उस ने अनाम पिता की घोषणा कर दी तब वह अगम्य और अदृश्य रीति से प्लेरोमा में प्रवेश कर गया: क्योंकि वह ग्रहण नहीं किया गया, केवल मनुष्यों से नहीं, परन्तु उन अधिकारों और सामर्थियों से भी नहीं जो स्वर्ग में हैं, और कि यीशु पुत्र था, परन्तु(2) मसीह पिता था, और मसीह का पिता परमेश्वर; जबकि और लोग कहते हैं कि वह केवल बाहरी रूप में दुख उठा, स्वभाव से दुःखरहित होकर। वैलेन्टिनी फिर मानते हैं कि व्यवस्था-सम्बन्धी यीशु वही था जो मरियम में से होकर निकला, जिस पर उस अधिक ऊँचे [स्थान] से वह उद्धारकर्ता उतरा, जो पान,(3) भी कहलाया, क्योंकि वह उन सब के नाम (वोकाबुला) रखता था जिन्हों ने उसे उत्पन्न किया था; परन्तु [यह पीछेवाला] उसके साथ, व्यवस्था-सम्बन्धी के साथ, अपनी सामर्थ और अपना नाम बाँटता था; ताकि उसके साधन से मृत्यु मिटाई जाए, परन्तु पिता उस उद्धारकर्ता के द्वारा जाना जाए जो ऊपर से उतरा था, जिसे वे यह भी कहते हैं कि वह आप मसीह का और सारे प्लेरोमा का पात्र है; मुँह से सचमुच एक मसीह यीशु को मानते हुए, परन्तु [वास्तविक] सम्मति में विभाजित होकर: क्योंकि, जैसा मैं पहले देख चुका हूँ, इन मनुष्यों की रीति यह कहने की है कि एक मसीह था, जो मोनोजेनेस के द्वारा उत्पन्न हुआ, प्लेरोमा की पुष्टि के लिये; परन्तु दूसरा, उद्धारकर्ता, पिता की महिमा के लिये [बाहर] भेजा गया; और अभी दूसरा, व्यवस्था-सम्बन्धी, और जिसे वे दुख उठानेवाला चित्रित करते हैं, जो [अपने में] मसीह को भी उठाए हुए था, वह उद्धारकर्ता जो प्लेरोमा में लौट गया।
इसलिये मैं न्याय करता हूँ कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में प्रेरितों के सारे मन को ध्यान में लेना आवश्यक है, और यह दिखाना कि उन्होंने न केवल उसके विषय में ऐसी कोई सम्मति कभी नहीं रखी; परन्तु, और भी, कि उन्होंने पवित्र आत्मा के द्वारा घोषणा की, कि जो ऐसी शिक्षाएँ सिखाएँ वे शैतान के कारिन्दे हैं, कुछ लोगों के विश्वास को उलटने के लिये, और उन्हें जीवन से खींच लेने के लिये भेजे हुए।
2. कि यूहन्ना परमेश्वर के एक और उसी वचन को जानता था, और कि वह एकलौता था, और कि वह हमारे उद्धार के लिये देहधारी हुआ, हमारे प्रभु यीशु मसीह, मैं ने यूहन्ना की ही बात से पर्याप्त प्रमाण दिया है। और मत्ती भी, एक और उसी यीशु मसीह को पहचानते हुए, कुँवारी से मनुष्य के रूप में उसका जन्म दिखाते हुए,(4) जैसा परमेश्वर ने दाऊद से प्रतिज्ञा की थी कि वह उसकी देह के फल से एक अनन्त राजा उठाएगा, बहुत समय पहले अब्राहम से वही प्रतिज्ञा करके, कहता है: "यीशु मसीह की वंशावली की पुस्तक, दाऊद का पुत्र, अब्राहम का पुत्र"(5) तब, कि वह यूसुफ के विषय में सन्देह से हमारे मन को छुड़ाए, वह कहता है: "परन्तु मसीह(6) का जन्म इस
रीति से। जब उसकी माता यूसुफ से ब्याही गई थी, उनके इकट्ठे होने से पहले, वह पवित्र आत्मा से गर्भवती पाई गई।" तब, जब यूसुफ मरियम को छोड़ देने की सोच में था, क्योंकि वह गर्भवती सिद्ध हुई, [मत्ती हमें बताता है] परमेश्वर का दूत उसके पास खड़ा होकर, और यह कहता हुआ: "अपनी पत्नी मरियम को अपने पास ले आने से मत डर: क्योंकि जो उस में गर्भ में है वह पवित्र आत्मा से है। और वह एक पुत्र जनेगी, और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपनी प्रजा को उनके पापों से बचाएगा। अब यह इसलिये हुआ, कि जो प्रभु के विषय में भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था वह पूरा हो: देखो. एक कुँवारी गर्भवती होगी, और एक पुत्र जनेगी, और वे उसका नाम इम्मानुएल रखेंगे, जिसका अर्थ है, परमेश्वर हमारे साथ;" स्पष्ट सूचित करते हुए कि पितरों से की गई प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी थी, कि परमेश्वर का पुत्र एक कुँवारी से जन्मा, और कि वह आप वह मसीह उद्धारकर्ता था जिस की भविष्यद्वक्ताओं ने पहले से बात कही थी; नहीं, जैसा ये मनुष्य दृढ़ करते हैं, कि यीशु वह था जो मरियम से जन्मा, परन्तु मसीह वह था जो ऊपर से उतरा। मत्ती निश्चय कह सकता था, "अब यीशु का जन्म इस रीति से था;" परन्तु पवित्र आत्मा, [सत्य के] बिगाड़नेवालों को पहले से देखकर, और उनकी ठगी के विरुद्ध पहले से रक्षा करते हुए, मत्ती के द्वारा कहता है, "परन्तु मसीह का जन्म इस रीति से था;" और कि वह इम्मानुएल है, कहीं ऐसा न हो कि हम उसे केवल मनुष्य समझें: क्योंकि "न शरीर की इच्छा से न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर की इच्छा से वचन देहधारी हुआ;"(1) और कि हम यह कल्पना न करें कि यीशु एक था, और मसीह दूसरा, परन्तु उन्हें एक और वही जानें।
3. पौलुस, रोमियों को लिखते हुए, इसी बात को समझा चुका है: "पौलुस, यीशु मसीह का प्रेरित, परमेश्वर के सुसमाचार के लिये पूर्वनिर्धारित, जिसकी प्रतिज्ञा उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्र पवित्रशास्त्रों में की थी, अपने पुत्र के विषय में, जो शरीर के अनुसार दाऊद के वंश से उसके लिये बनाया गया, जो पवित्रता की आत्मा के द्वारा सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहराया गया, हमारे प्रभु यीशु मसीह के मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा।"(2) और फिर, इस्राएल के विषय में रोमियों को लिखते हुए, वह कहता है: "जिनके पिता हैं, और जिन में से शरीर के अनुसार मसीह है, जो सब के ऊपर परमेश्वर है, युगानुयुग धन्य।"(3) और फिर, गलातियों के नाम अपनी पत्री में, वह कहता है: "परन्तु जब समय की पूर्णता आई, तो परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा, जो स्त्री से जन्मा, और व्यवस्था के अधीन जन्मा, कि व्यवस्था के अधीन वालों को मोल ले, कि हम लेपालकपन पाएँ; "(4) स्पष्ट रूप से एक ही परमेश्वर को दिखाते हुए, जिसने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पुत्र की प्रतिज्ञा की, और एक ही यीशु मसीह हमारे प्रभु को, जो मरियम से अपने जन्म के अनुसार दाऊद के वंश का था; और यह कि यीशु मसीह पवित्रता की आत्मा के अनुसार, मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा, सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहराया गया, सारी सृष्टि में 1 पहले जन्मे हुए के रूप में;(5) परमेश्वर का पुत्र मनुष्य का पुत्र बनाया गया, कि उसके द्वारा हम लेपालकपन पाएँ,--मानवता(6) परमेश्वर के पुत्र को सम्भालती, और ग्रहण करती, और गले लगाती हुई।
इसलिये मरकुस भी कहता है: "यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ, परमेश्वर का पुत्र; जैसा भविष्यद्वक्ताओं में लिखा है।"(7) एक ही परमेश्वर के पुत्र, यीशु मसीह को जानते हुए, जिसकी भविष्यद्वक्ताओं ने घोषणा की, जो दाऊद की देह के फल से इम्मानुएल था, "'पिता की महान युक्ति का दूत;" जिसके द्वारा परमेश्वर ने भोर और धर्मी को दाऊद के घराने के लिये उदय किया, और उसके लिये उद्धार का एक सींग उठाया, "और याकूब में एक साक्षी स्थिर किया;"(9) जैसा दाऊद उसके जन्म के कारणों पर बात करते हुए कहता है: "और उसने इस्राएल में एक व्यवस्था ठहराई, कि दूसरी पीढ़ी [उसे] जाने, वे बालक जो इन से he जन्म लेंगे, और वे उठकर अपने बालकों को स्वयं बताएँगे, कि वे परमेश्वर पर अपनी आशा रखें, और उसकी आज्ञाओं को खोजें।"(10) और फिर, स्वर्गदूत ने मरियम को शुभ समाचार लाते हुए कहा: "वह he महान होगा, और सर्वोच्च का पुत्र कहलाएगा; और प्रभु उसे उसके पिता दाऊद का सिंहासन देगा;"(11) यह मानते हुए कि जो सर्वोच्च का पुत्र है, वही स्वयं दाऊद का पुत्र भी है। और दाऊद, आत्मा के द्वारा इस व्यक्ति के आगमन की व्यवस्था को जानकर, जिसके द्वारा वह सब जीवितों और मरे हुओं पर सर्वोपरि है, उसे प्रभु मानकर अंगीकार किया, सर्वोच्च पिता के दाहिने हाथ पर बैठे हुए।(12)
4. परन्तु शमौन भी--जिसे पवित्र आत्मा से सूचना मिली थी कि जब तक वह 1 पहले मसीह यीशु को न देख ले, वह मृत्यु न देखेगा--कन्या के 1 पहले जन्मे हुए को अपने हाथों में लेकर, परमेश्वर को धन्य कहा, और कहा, "हे प्रभु, अब अपने वचन के अनुसार अपने दास को शान्ति से विदा कर: क्योंकि मेरी आँखों ने तेरा उद्धार देखा है, जिसे तू ने सब लोगों के सामने तैयार किया है; अन्यजातियों को ज्योति देने वाली ज्योति, और तेरी प्रजा इस्राएल की महिमा;"(13) इस प्रकार अंगीकार करते हुए, कि वह बालक जिसे वह अपने हाथों में पकड़े हुए था, यीशु, मरियम से जन्मा, स्वयं मसीह था, परमेश्वर का पुत्र, सब की ज्योति, स्वयं इस्राएल की महिमा,
और सोए हुओं की शान्ति और शीतलता। क्योंकि वह पहले ही से मनुष्यों को लूट रहा था, उनका अज्ञान हटाकर, उन्हें अपना ही ज्ञान देकर, और जिन्होंने उसे पहचाना उन्हें तितर-बितर करके, जैसा यशायाह कहता है: "उसका नाम रखो, शीघ्र लूटो, वेग से बाँटो।"(1) अब ये मसीह के काम हैं। इसलिए वह स्वयं मसीह था, जिसे शमौन [अपनी बाँहों में] उठाए हुए सर्वोच्च को धन्य कह रहा था; जिसे देखकर गड़रिये ने परमेश्वर की महिमा की; जिसे यूहन्ना ने, अभी अपनी माता के गर्भ में रहते हुए, और वह (मसीह) मरियम के गर्भ में, प्रभु जानकर, उछलकर नमस्कार किया; जिसे मागी लोगों ने देखा, और दण्डवत् किया, और अपने दान [उसे] चढ़ाए, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, और अनन्त राजा को दण्डवत् करके, दूसरे मार्ग से चले गए, अब अश्शूरियों के मार्ग से न लौटते हुए। "क्योंकि इससे पहले कि बालक पिता या माता कहकर पुकारने का ज्ञान पाए, वह दमिश्क की सामर्थ्य, और सामरिया की लूट, अश्शूरियों के राजा के विरुद्ध ले लेगा;"(2) निश्चय ही रहस्यमय रीति से, परन्तु बल के साथ, यह घोषित करते हुए कि प्रभु ने छिपी हुई हाथ से अमालेक के विरुद्ध युद्ध किया।(3) इसी कारण, उसने दाऊद के घराने के उन बालकों को अचानक हटा दिया, जिनका भाग्य ऐसा सुखी था कि वे उस समय जन्मे थे, कि वह उन्हें अपने राज्य में आगे भेज दे; उसने, क्योंकि वह स्वयं एक शिशु था, यह ऐसा व्यवस्थित किया कि मानव शिशु शहीद हों, पवित्रशास्त्र के अनुसार मारे गए, मसीह के लिये, जो यहूदा के बेतलेहेम में, दाऊद के नगर में जन्मा था।(4)
5. इसलिए प्रभु ने भी पुनरुत्थान के बाद अपने चेलों से कहा, "हे निर्बुद्धि लोगों, और हृदय से मन्द, कि भविष्यद्वक्ताओं ने जो कुछ कहा है उस सब पर विश्वास करो! क्या मसीह को ये बातें सहनी, और अपनी महिमा में प्रवेश करना आवश्यक न था?"(5) और फिर वह उनसे कहता है: "ये वे वचन हैं जो मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए तुम से कहे थे, कि मूसा की व्यवस्था में, और भविष्यद्वक्ताओं में, और भजनों में, मेरे विषय में जो कुछ लिखा है, वह सब पूरा होना अवश्य है। तब उसने उनकी समझ खोली, कि वे पवित्रशास्त्र समझें, और उनसे कहा, यों लिखा है, और यों मसीह का दुख उठाना, और मरे हुओं में से जी उठना आवश्यक था, और उसके नाम से सब जातियों में पापों की क्षमा के लिये मन फिराव का प्रचार किया जाए।"(6) अब यही वह है जो मरियम से जन्मा; क्योंकि वह कहता है: "मनुष्य के पुत्र को बहुत बातें सहनी, और ठुकराया जाना, और क्रूस पर चढ़ाया जाना, और 3 दिन जी उठना अवश्य है।"(7) इसलिए सुसमाचार, मरियम के उस मनुष्य के पुत्र को छोड़ और किसी मनुष्य के पुत्र को नहीं जानता, जिसने दुख भी उठाया; और ऐसे मसीह को नहीं जानता जो दुख-भोग से पहले यीशु से उड़ गया; परन्तु जो जन्मा उसे वह परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह जानता है, और यह कि यही दुख उठाया और फिर जी उठा, जैसा प्रभु का चेला यूहन्ना verities, कहता है: "परन्तु ये इसलिये लिखे गए हैं कि तुम विश्वास करो कि यीशु ही मसीह है, परमेश्वर का पुत्र, और विश्वास करते हुए उसके नाम से अनन्त जीवन पाओ,"(8)--इन निन्दापूर्ण व्यवस्थाओं को पहले से देखते हुए जो प्रभु को बाँटती हैं, जहाँ तक उनकी शक्ति में है, यह कहते हुए कि वह दो भिन्न द्रव्यों से रचा गया। इसी कारण उसने अपनी पत्री में हमें इस प्रकार गवाही दी है: "हे बालकों, यह अन्तिम समय है; और जैसा तुम ने सुना है कि मसीह-विरोधी आता है, अब बहुत से मसीह-विरोधी प्रकट हो गए हैं; इस से हम जानते हैं कि यह अन्तिम समय है।
वे हम में से निकल गए, पर वे हमारे नहीं थे; क्योंकि यदि वे हमारे होते, तो हमारे साथ बने रहते: परन्तु [वे चले गए], कि यह प्रगट हो कि वे हमारे नहीं हैं। इसलिये जानो, कि हर झूठ बाहर से है, और सत्य का नहीं है। झूठा कौन है, सिवाय उसके जो यह इन्कार करता है कि यीशु ही मसीह है? यही मसीह-विरोधी है।"(9)
6. परन्तु ऊपर कहे गए वे सब, यद्यपि वे निश्चय ही अपनी जीभ से एक ही यीशु मसीह को मानते हैं, अपने को मूर्ख बनाते हैं, एक बात सोचते और दूसरी कहते हुए;(10) क्योंकि उनकी कल्पनाएँ बदलती हैं, जैसा मैं पहले दिखा चुका हूँ, यह आरोप लगाते हुए, [जैसा वे करते हैं,] कि एक सत्ता ने दुख उठाया और जन्म लिया, और यह यीशु था; परन्तु दूसरा था जो उस पर उतरा, और यह मसीह था, जो फिर ऊपर भी चढ़ा; और वे तर्क करते हैं, कि जो डेमियुर्ज से निकला, या जो व्यवस्था-सम्बन्धी था, या जो यूसुफ से उत्पन्न हुआ, वही दुख के अधीन सत्ता था; परन्तु पीछे वाले पर अदृश्य और अकथनीय [स्थानों] से आगे वाला उतरा, जिसे वे अग्राह्य, अदृश्य, और दुख न उठाने योग्य ठहराते हैं: वे इस प्रकार सत्य से भटकते हैं, क्योंकि उनकी शिक्षा सचमुच परमेश्वर से हट जाती है, यह न जानते हुए कि उसका एकलौता वचन, जो सर्वदा मानव जाति के साथ उपस्थित है, पिता की प्रसन्नता के अनुसार अपनी ही सृष्टि से जुड़ा और मिला हुआ, और जो देहधारी हुआ, स्वयं यीशु मसीह हमारा प्रभु है, जिसने हमारे लिये दुख भी उठाया, और हमारी ओर से फिर जी उठा, और जो अपने पिता की महिमा में फिर आएगा, सब देह को जगाने के लिये, और उद्धार के प्रकटीकरण के लिये, और उसके द्वारा बनाए गए सब पर न्यायपूर्ण न्याय का नियम लगाने के लिये। इसलिए, जैसा मैं ने दिखाया है, एक ही परमेश्वर पिता है, और एक ही मसीह यीशु, जो समस्त व्यवस्था-सम्बन्धी प्रबन्धों [उस से जुड़े हुए] के द्वारा आया, और gath-
ered अपने में सब वस्तुओं को इकट्ठा किया।(1) परन्तु हर प्रकार से भी, वह मनुष्य है, परमेश्वर की रचना; और इस प्रकार उसने मनुष्य को अपने में उठा लिया, अदृश्य दृश्य हुआ, अग्राह्य ग्राह्य बनाया गया, दुख न उठाने योग्य दुख उठाने के योग्य हुआ, और वचन मनुष्य बनाया गया, इस प्रकार अपने में सब वस्तुओं का सार लेते हुए: कि जैसे अति-स्वर्गीय, आत्मिक, और अदृश्य बातों में परमेश्वर का वचन सर्वोपरि है, वैसे ही दृश्य और देहधारी बातों में भी वह प्रधानता रखे, और प्रधानता को अपने पर लेते हुए, तथा अपने को कलीसिया का सिर ठहराते हुए, वह उचित समय पर सब वस्तुओं को अपनी ओर खींचे।
7. उसके साथ कुछ भी अधूरा या उचित समय से बाहर नहीं है, जैसे पिता के साथ कुछ भी बेमेल नहीं है। क्योंकि ये सब बातें पिता के द्वारा पहले से जानी गई थीं; परन्तु पुत्र उन्हें उचित समय पर पूर्ण क्रम और अनुक्रम में पूरा करता है। यही कारण था कि जब मरियम दाखमधु के अद्भुत चमत्कार को [करने] के लिये [उसे] उकसा रही थी, और समय से पहले प्रतीकात्मक अर्थ के कटोरे में भाग लेना(2) चाहती थी, तब प्रभु ने उसकी असमय जल्दी को रोककर कहा, "हे नारी, मुझ को तुझ से क्या? मेरी घड़ी अभी नहीं आई"(3)--उस घड़ी की बाट जोहते हुए जो पिता के द्वारा पहले से जानी गई थी। यही कारण है कि जब मनुष्य बार बार उसे पकड़ना चाहते थे, कहा जाता है, "किसी ने उस पर हाथ न रखा, क्योंकि उसके पकड़े जाने की घड़ी अभी नहीं आई थी;"(4) न उसके दुख-भोग का समय, जो पिता के द्वारा पहले से जाना गया था; जैसा भविष्यद्वक्ता हबक्कूक भी कहता है, "इस से तू जाना जाएगा जब वर्ष निकट आएँगे; समय आने पर तू प्रगट किया जाएगा; क्योंकि मेरा प्राण क्रोध से घबराया है, तू अपनी दया को स्मरण करेगा।"(5) पौलुस भी कहता है: "परन्तु जब समय की पूर्णता आई, तो परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा।"(6) जिस से यह प्रगट होता है, कि पिता के द्वारा पहले से जानी गई सब बातों को हमारे प्रभु ने उनके क्रम, ऋतु, और घड़ी में पूरा किया, जो पहले से जानी हुई और योग्य थीं, निश्चय ही एक और वही होते हुए, परन्तु धनी और महान। क्योंकि वह अपने पिता की उदार और व्यापक इच्छा को पूरा करता है, क्योंकि वह स्वयं बचाए हुओं का उद्धारकर्ता है, और अधिकार के अधीन वालों का प्रभु है, और रची हुई उन सब वस्तुओं का परमेश्वर है, पिता का एकलौता, घोषित किया गया मसीह, और परमेश्वर का वचन, जो समय की पूर्णता आने पर देहधारी हुआ, जिस समय परमेश्वर के पुत्र को मनुष्य का पुत्र होना था।
8. इसलिए सब [मसीही] व्यवस्था के बाहर हैं, जो ज्ञान के बहाने यह समझते हैं कि यीशु एक था, और मसीह दूसरा, और एकलौता दूसरा, जिस से फिर वचन है, और यह कि उद्धारकर्ता दूसरा है, जिसे भूल के ये चेले उन लोगों की उत्पत्ति बताते हैं जो अवनति की दशा में एओन बनाए गए थे। ऐसे मनुष्य बाहर से भेड़ हैं; क्योंकि वे हम से मिलते जुलते दिखाई देते हैं, जो वे सार्वजनिक रूप से कहते हैं, वही वचन दोहराते हुए जो हम कहते हैं; परन्तु भीतर वे भेड़िये हैं। उनकी शिक्षा हत्यारी है, क्योंकि वह अनेक देवताओं को खड़ा करती है, और अनेक पिताओं का स्वांग रचती है, परन्तु परमेश्वर के पुत्र को अनेक रीतियों से नीचा करती और बाँटती है। ये वे हैं जिन के विषय में प्रभु ने हमें पहले से सावधान किया है; और उसका चेला, अपनी पहले कही गई पत्री में, हमें उन से दूर रहने की आज्ञा देता है, जब वह कहता है: "क्योंकि बहुत से बहकानेवाले जगत में आ गए हैं, जो यह नहीं मानते कि यीशु मसीह देह में आया है। यह बहकानेवाला और मसीह-विरोधी है। उन से सावधान रहो, कि जो कुछ तुम ने किया है उसे खो न दो।"(7) और फिर वह पत्री में कहता है: "बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता जगत में निकल गए हैं। इस से परमेश्वर के आत्मा को जानो: जो आत्मा यह मानता है कि यीशु मसीह देह में आया है वह परमेश्वर का है; और जो आत्मा यीशु मसीह को अलग करता है वह परमेश्वर का नहीं, परन्तु मसीह-विरोधी का है।"(8) ये वचन सुसमाचार में कही गई बात से मेल खाते हैं, कि "वचन देहधारी हुआ, और हमारे बीच डेरा किया।" इसलिये वह फिर अपनी पत्री में पुकारता है, "जो कोई विश्वास करता है कि यीशु ही मसीह है, वह परमेश्वर से जन्मा है;"(9) यीशु मसीह को एक और वही जानते हुए, जिसके लिये स्वर्ग के फाटक खोले गए, क्योंकि उसने देह को अपने ऊपर लिया: जो उसी देह में भी आएगा जिस में उसने दुख उठाया, पिता की महिमा को प्रगट करते हुए।
9. इन कथनों से सहमत होते हुए, पौलुस, रोमियों से बात करते हुए, घोषणा करता है: "और भी अधिक वे जो [अनन्त] जीवन के लिये अनुग्रह और धर्म की बहुतायत पाते हैं, एक ही के द्वारा राज्य करेंगे, मसीह यीशु।"(10) इस से यह निकलता है, कि वह उस मसीह को कुछ नहीं जानता था जो यीशु से उड़ गया; न ऊपर के उद्धारकर्ता को, जिसे वे दुख न उठाने योग्य मानते हैं। क्योंकि यदि, में
सत्य में, एक ने दुख उठाया, और दूसरा दुख उठाने में असमर्थ रहा, और एक जन्मा, पर दूसरा उस पर उतरा जो जन्मा था, और उसे छोड़ गया gain, तो एक नहीं, परन्तु दो, प्रगट होते हैं। परन्तु यह कि प्रेरित उसे एक जानता था, जो जन्मा भी और जिसने दुख उठाया भी, अर्थात् मसीह यीशु, वह फिर उसी पत्री में कहता है: "क्या तुम नहीं जानते, कि हम में से जितनों ने मसीह यीशु में बपतिस्मा लिया, वे उसकी मृत्यु में बपतिस्मा लिए गए? कि जैसे मसीह मरे हुओं में से जी उठा, वैसे हम भी जीवन की नई चाल में चलें।"(1) परन्तु फिर, यह दिखाते हुए कि मसीह ने दुख उठाया, और स्वयं परमेश्वर का पुत्र था, जो हमारे लिये मरा, और पहले से ठहराए हुए समय पर अपने लोहू से हमें मोल लिया, वह कहता है: "क्योंकि यह कैसे है, कि मसीह, जब हम अभी निर्बल थे, ठीक समय पर अभक्तियों के लिये मरा? परन्तु परमेश्वर हमारे प्रति अपना प्रेम इस में प्रगट करता है, कि जब हम अभी पापी ही थे, मसीह हमारे लिये मरा। तो और भी अधिक, अब उसके लोहू से धर्मी ठहरकर, हम उसके द्वारा क्रोध से बचाए जाएँगे।
क्योंकि यदि, जब हम शत्रु थे, हम उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा परमेश्वर से मेल कर लिए गए; तो और भी अधिक, मेल हो जाने पर, हम उसके जीवन के द्वारा बचाए जाएँगे।"(2) वह सबसे स्पष्ट रीति से घोषणा करता है, कि वही सत्ता जो पकड़ी गई, और दुख से गुज़री, और हमारे लिये अपना लोहू बहाया, मसीह भी थी और परमेश्वर का पुत्र भी, जो फिर जी भी उठा, और स्वर्ग में उठा लिया गया, जैसा वह स्वयं [पौलुस] कहता है: "परन्तु उसी समय, [वह, है] मसीह [जो] मरा, वरन् जो फिर जी उठा, जो परमेश्वर के fight हाथ पर भी है।"(3) और फिर, "यह जानते हुए कि मसीह, मरे हुओं में से जी उठकर, फिर नहीं मरता:"(4) क्योंकि, स्वयं आत्मा के द्वारा पहले से देखते हुए, दुष्ट शिक्षकों के उपविभागों को [प्रभु के व्यक्ति के विषय में], और उन से झगड़े का हर अवसर काट देना चाहते हुए, वह वह कहता है जो पहले कहा जा चुका है, [और यह भी घोषित करता है:] "परन्तु यदि उसकी आत्मा जिसने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में बसती है, तो जिसने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया वह तुम्हारी मरनहार देहों को भी जिलाएगा।"(5) यह वह केवल उन से नहीं कहता जो सुनना चाहते हैं: भूल न करो, [वह सब से कहता है:] यीशु मसीह, परमेश्वर का पुत्र, एक और वही है, जिसने दुख उठाकर हमें परमेश्वर से मेल कराया, और मरे हुओं में से जी उठा; जो पिता के दाहिने हाथ पर है, और सब बातों में सिद्ध है; "जिसने, जब वह मारा गया, बदले में न मारा; जिसने, जब दुख उठाया, धमकी न दी;"(6) और जब उसने अत्याचार सहा, तो अपने पिता से प्रार्थना की कि वह उन को क्षमा करे जिन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया था। क्योंकि उसने स्वयं सचमुच उद्धार को भीतर लाया: क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर का वचन है, स्वयं पिता का एकलौता, मसीह यीशु हमारा प्रभु।
अध्याय सत्रह.--प्रेरित सिखाते हैं कि न मसीह और न उद्धारकर्ता, परन्तु पवित्र आत्मा, यीशु पर उतरा। इस उतरने का कारण।
1. प्रेरितों की शक्ति में निश्चय ही यह घोषित करना था कि मसीह यीशु पर उतरा, या तथाकथित श्रेष्ठ उद्धारकर्ता व्यवस्था-सम्बन्धी पर [उतरा], या जो अदृश्य स्थानों से है वह डेमियुर्ज से उस पर उतरा; परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ न जाना और न कहा: क्योंकि, यदि वे इसे जानते, तो वे इसे निश्चय ही कहते भी। परन्तु जो सचमुच बात थी, उसे उन्होंने लिखा, [अर्थात्,] कि परमेश्वर का आत्मा कबूतर के समान उस पर उतरा; यह आत्मा, जिसके विषय में यशायाह ने घोषणा की, "और परमेश्वर का आत्मा उस पर ठहरेगा,"(7) जैसा मैं पहले कह चुका हूँ। और फिर: "प्रभु का आत्मा मुझ पर है, क्योंकि उसने मेरा अभिषेक किया है।"(8) वही आत्मा है जिसके विषय में प्रभु घोषणा करता है, "क्योंकि तुम नहीं बोलते, परन्तु तुम्हारे पिता का आत्मा तुम में बोलता है।"(9) और फिर, चेलों को परमेश्वर में नया जन्म पाने की शक्ति देते हुए,(10) उसने उनसे कहा," जाओ और सब जातियों को सिखाओ, उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा देते हुए।"(11) क्योंकि [परमेश्वर] ने प्रतिज्ञा की, कि अन्तिम समयों में वह उसे [आत्मा को] [अपने] दासों और दासियों पर उण्डेलेगा, कि वे भविष्यद्वाणी करें; इसलिये वह परमेश्वर के पुत्र पर भी उतरा, जो मनुष्य का पुत्र बनाया गया, उसके साथ संगति में मनुष्य जाति में बसने का अभ्यस्त होते हुए, मनुष्यों के साथ ठहरने, और परमेश्वर की कारीगरी में बसने के लिये, उन में पिता की इच्छा को पूरा करते हुए, और उन्हें उनकी पुरानी आदतों से मसीह की नई चाल में नया करते हुए।
2. इस आत्मा को दाऊद ने मानव जाति के लिये माँगा, यह कहते हुए, "और अपने सर्व-शासक आत्मा से मुझे स्थिर कर;"(12) जो, जैसा लूका कहता है, पिन्तेकुस्त के दिन प्रभु के स्वर्गारोहण के बाद चेलों पर उतरा, सब जातियों को जीवन के प्रवेश में, और नई वाचा के खुलने में, पहुँचाने की शक्ति रखते हुए; जिस से भी, सब भाषाओं में एक मन से, उन्होंने परमेश्वर की स्तुति की, आत्मा दूर के गोत्रों को एकता में लाता हुआ, और सब जातियों के 1 फल पिता को चढ़ाता हुआ। इसलिये प्रभु ने सहायक को भेजने की प्रतिज्ञा भी की,(13) जो हमें परमेश्वर से जोड़े। क्योंकि सूखे गेहूँ से गूँथे आटे की एक ठोस लोई नहीं बन सकती
तरल पदार्थ के बिना, और न एक रोटी एकता रख सकती है, वैसे ही, उसी रीति से, हम भी, बहुत होते हुए, स्वर्ग के जल के बिना मसीह यीशु में एक नहीं बनाए जा सकते थे। और जैसे सूखी भूमि नहीं उपजाती जब तक वह नमी न पाए, उसी रीति से हम भी, मूल रूप से एक सूखा वृक्ष होते हुए, ऊपर से स्वेच्छा की वर्षा के बिना जीवन के लिये फल कभी न ला सकते थे। क्योंकि हमारी देहों ने अपने बीच एकता उस layer के द्वारा पाई है जो अविनाश की ओर ले जाती है; परन्तु हमारे प्राण, आत्मा के द्वारा। इसलिये दोनों आवश्यक हैं, क्योंकि दोनों परमेश्वर के जीवन की ओर योगदान करते हैं, हमारे प्रभु ने उस भटकी हुई सामरी स्त्री पर दया की(1)--जो एक पति के साथ न रही, परन्तु [बाँधकर] बहुत विवाहों के द्वारा व्यभिचार किया--उसे दिखाकर, और जीवित जल की प्रतिज्ञा करके, कि वह फिर प्यासी न हो, और न परिश्रम से पाए हुए शीतल जल को प्राप्त करने में लगी रहे, अपने में अनन्त जीवन तक उबलता हुआ जल रखती हुई। प्रभु, इसे अपने पिता से दान रूप में पाकर, स्वयं भी इसे अपने सहभागी लोगों पर देता है, सारी पृथ्वी पर पवित्र आत्मा को भेजते हुए।
3. गिदोन,(2) वह इस्राएली जिसे परमेश्वर ने चुना, कि वह इस्राएल की प्रजा को परदेशियों की शक्ति से बचाए, इस अनुग्रह के दान को पहले से देखकर, अपनी माँग बदल दी, और भविष्यद्वाणी की कि ऊन के रोम पर सूखा होगा (प्रजा का एक चिह्न), जिस पर अकेले 1 पहले ओस पड़ी थी; इस प्रकार दिखाते हुए कि उन्हें आगे परमेश्वर की ओर से पवित्र आत्मा न रहेगा, जैसा यशायाह कहता है, "मैं मेघों को भी आज्ञा दूँगा, कि वे उस पर मेंह न बरसाएँ,"(3) परन्तु ओस, जो परमेश्वर का आत्मा है, जो प्रभु पर उतरा, सारी पृथ्वी पर फैल जाए, "बुद्धि का आत्मा और समझ का आत्मा, मन्त्रणा का आत्मा और पराक्रम का आत्मा, ज्ञान का आत्मा और भक्ति का आत्मा, परमेश्वर के भय का आत्मा।"(4) इस आत्मा को, फिर, उसने कलीसिया पर दिया, सारे जगत में स्वर्ग से सहायक को भेजते हुए, जहाँ से प्रभु हमें बताता है कि शैतान, बिजली के समान, नीचे गिरा दिया गया।(5) इसलिये हमें परमेश्वर की ओस की आवश्यकता है, कि हम आग से भस्म न हों, और न निष्फल ठहराए जाएँ, और जहाँ हमारा दोष लगानेवाला है वहाँ हमारा एक अधिवक्ता भी हो,(6) प्रभु अपने मनुष्य को,(7) पवित्र आत्मा को सौंपते हुए, जो डाकुओं के बीच पड़ा था,(8) जिस पर उसने स्वयं दया की, और उसके घाव बाँधे, दो राजकीय दीनारिया देते हुए; कि हम, आत्मा के द्वारा पिता और पुत्र की छाप और ऊपर की लिखावट पाकर, हमें सौंपे गए दीनारियम को फलवन्त करें, बढ़ती [उसकी] प्रभु को गिनकर।(9)
4. इसलिए आत्मा, पूर्वनिर्धारित व्यवस्था के अधीन उतरते हुए, और परमेश्वर का पुत्र, एकलौता, जो पिता का वचन भी है, समय की पूर्णता में आते हुए, मनुष्य के लिये मनुष्य में देहधारी होकर, और मानव स्वभाव की सब शर्तों को पूरा करते हुए, हमारा प्रभु यीशु मसीह एक और वही होते हुए, जैसा प्रभु स्वयं गवाही देता है, जैसा प्रेरित अंगीकार करते हैं, और जैसा भविष्यद्वक्ता घोषणा करते हैं,--इन मनुष्यों की सब शिक्षाएँ जिन्होंने कल्पित ओग्दोअड और टेट्राड गढ़े हैं, और [प्रभु के व्यक्ति के] उपविभागों की कल्पना की है, झूठ सिद्ध हो चुकी हैं। ये(10) मनुष्य, निश्चय ही, आत्मा को बिलकुल अलग कर देते हैं; वे समझते हैं कि मसीह एक था और यीशु दूसरा; और वे सिखाते हैं कि एक मसीह नहीं था, परन्तु बहुत। और यदि वे उन्हें एकजुट कहते हैं, तो वे उन्हें फिर अलग करते हैं: क्योंकि वे दिखाते हैं कि एक ने निश्चय ही दुख उठाए, परन्तु दूसरा दुख न उठाने योग्य रहा; कि एक सचमुच प्लेरोमा तक चढ़ा, परन्तु दूसरा मध्य स्थान में रहा; कि एक सचमुच अदृश्य और सब नाम से ऊपर के स्थानों में भोज करता और आनन्द मनाता है, परन्तु दूसरा डेमियुर्ज के साथ बैठा है, उसे सामर्थ्य से खाली करता हुआ।
इसलिये यह तुझ पर, और उन सब पर जो इस लेख पर ध्यान देते हैं, और अपने उद्धार के विषय में चिन्तित हैं, अनिवार्य होगा, कि जब वे बाहर इन मनुष्यों के भाषण सुनें तो सहज ही सहमति न जताएँ: क्योंकि, विश्वासियों की [शिक्षा] से मिलती जुलती बातें कहते हुए, जैसा मैं पहले देख चुका हूँ, वे न केवल भिन्न मत रखते हैं, परन्तु बिलकुल विपरीत, और सब बातों में निन्दा से भरे हुए, जिन से वे उन लोगों को नष्ट करते हैं जो, वचनों की समानता के कारण, ऐसा विष पीते हैं जो उनकी देह-रचना से नहीं मेल खाता, जैसे कोई, दूध के बदले पानी में मिला चूना देकर, रंग की समानता से बहकाए; जैसा मुझ से श्रेष्ठ एक मनुष्य" ने कहा है, उन सब के विषय में जो किसी भी रीति से परमेश्वर की बातों को बिगाड़ते हैं और सत्य में मिलावट करते हैं, "चूना दुष्टता से परमेश्वर के दूध में मिलाया गया है।"
अध्याय अठारह.--पूर्ववर्ती तर्क का क्रम। पवित्र पौलुस के लेखों से, और हमारे प्रभु के वचनों से, प्रमाण, कि मसीह और यीशु को भिन्न सत्ताएँ नहीं माना जा सकता; न यह आरोप लगाया जा सकता है कि परमेश्वर का पुत्र केवल दिखावे में मनुष्य बना, परन्तु कि उसने सचमुच और वास्तव में ऐसा किया।
1.(12) जैसा स्पष्ट रूप से दिखाया जा चुका है कि
वचन, जो आदि में परमेश्वर के साथ था, जिसके द्वारा सब कुछ बनाया गया, जो सर्वदा मनुष्य जाति के साथ उपस्थित भी था, इन अन्तिम दिनों में, पिता के द्वारा ठहराए हुए समय के अनुसार, अपनी ही कारीगरी से जुड़ गया, क्योंकि वह दुख के योग्य मनुष्य बना, [इस से निकलता है] कि उनका हर आक्षेप हट जाता है जो कहते हैं, "यदि हमारा प्रभु उस समय जन्मा, तो मसीह की पहले कोई सत्ता न थी।" क्योंकि मैं ने दिखाया है कि परमेश्वर के पुत्र ने तब अस्तित्व आरम्भ नहीं किया, आदि से पिता के साथ होते हुए; परन्तु जब वह देहधारी हुआ, और मनुष्य बनाया गया, तो उसने मनुष्यों की लम्बी पंक्ति को नए सिरे से आरम्भ किया(1), और संक्षिप्त, व्यापक रीति से हमें उद्धार दिया; कि जो हम ने आदम में खोया था--अर्थात् परमेश्वर के स्वरूप और समानता के अनुसार होना--उसे हम मसीह यीशु में फिर पाएँ।
2. क्योंकि जैसा यह सम्भव न था कि वह मनुष्य जो एक ही बार जीत लिया गया था, और जो आज्ञा न मानने से नाश हो गया था, अपने को सुधारे, और जय का पुरस्कार पाए; और जैसा यह भी असम्भव था कि वह उद्धार तक पहुँचे जो पाप की शक्ति के अधीन गिर गया था,--पुत्र ने ये दोनों बातें पूरी कीं, परमेश्वर का वचन होते हुए, पिता से उतरते हुए, देहधारी होते हुए, मृत्यु तक भी झुकते हुए, और हमारे उद्धार की व्यवस्थित योजना को पूरा करते हुए, जिसके विषय में [पौलुस], हमें बिना हिचकिचाहट विश्वास करने के लिये समझाते हुए, फिर कहता है, "कौन स्वर्ग पर चढ़ेगा? अर्थात् मसीह को नीचे लाने के लिये; या कौन गहरे में उतरेगा? अर्थात् मसीह को मरे हुओं में से फिर छुड़ाने के लिये।"(2) तब वह आगे कहता है, "यदि तू अपने मुँह से प्रभु यीशु को मान लेगा, और अपने हृदय में विश्वास करेगा कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया है, तो तू बचाया जाएगा।"(3) और वह कारण देता है कि परमेश्वर के पुत्र ने ये बातें क्यों कीं, यह कहते हुए, "क्योंकि इसी लिये मसीह जिया भी, और मरा भी, और फिर जी उठा, कि वह जीवितों और मरे हुओं पर राज्य करे।"(4) और फिर, कुरिन्थियों को लिखते हुए, वह घोषणा करता है, "परन्तु हम क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह यीशु का प्रचार करते हैं;"(5) और जोड़ता है, "आशीष का कटोरा जिसे हम आशीष देते हैं, क्या वह मसीह के लोहू की सहभागिता नहीं?"(6)
3. परन्तु वह कौन है जिसने भोजन के विषय में हमारे साथ सहभागिता की? क्या वह है जिसे वे ऊपर का मसीह समझते हैं, जिसने होरोस के द्वारा अपने को फैलाया, और उनकी माता को एक रूप दिया; या वह है जो कन्या से है, इम्मानुएल, जिसने मक्खन और मधु खाया,(7) जिसके विषय में भविष्यद्वक्ता ने घोषणा की, "वह मनुष्य भी है, और उसे कौन जानेगा?"(8) उसका प्रचार पौलुस ने भी इसी प्रकार किया: "क्योंकि मैं ने सौंपा," वह कहता है, "तुम्हें सब से 1 पहले, कि मसीह हमारे पापों के लिये मरा, पवित्रशास्त्र के अनुसार; और कि वह गाड़ा गया, और 3 दिन फिर जी उठा, पवित्रशास्त्र के अनुसार।"(9) तब यह स्पष्ट है, कि पौलुस उसके सिवा और किसी मसीह को नहीं जानता था, जिसने दुख भी उठाया, और गाड़ा भी गया, और gain जी उठा, जो जन्मा भी, और जिसे वह मनुष्य कहता है।
क्योंकि यह टिप्पणी करने के बाद, "परन्तु यदि मसीह का प्रचार किया जाता है, कि वह मरे हुओं में से जी उठा,"(10) वह आगे कहता है, उसके देहधारण का कारण देते हुए, "क्योंकि जब मनुष्य के द्वारा मृत्यु आई, तो मनुष्य के द्वारा [आई] मरे हुओं का पुनरुत्थान भी।" और हर जगह, जब [संकेत करते हुए] हमारे प्रभु के दुख-भोग की, और उसके मानव स्वभाव की, और मृत्यु के अधीन उसके होने की बात होती है, वह मसीह का नाम काम में लाता है, जैसे उस अनुच्छेद में: "अपने भोजन से उसे नाश न कर जिसके लिये मसीह मरा।"(11) और फिर: "परन्तु अब, मसीह में, तुम जो कभी दूर थे मसीह के लोहू के द्वारा निकट कर दिए गए हो।"(12) और फिर: "मसीह ने हमें व्यवस्था के शाप से मोल लिया है, हमारे लिये शाप बनकर: क्योंकि लिखा है, जो कोई वृक्ष पर लटकाया जाता है वह शापित है।"(13) और फिर: "और तेरे ज्ञान के द्वारा वह निर्बल भाई नाश होगा, जिसके लिये मसीह मरा;"(14) यह दिखाते हुए कि दुख न उठाने योग्य मसीह यीशु पर नहीं उतरा, परन्तु कि वह स्वयं, क्योंकि वह यीशु मसीह था, हमारे लिये दुख उठाया; वह, जो कब्र में पड़ा, और फिर जी उठा, जो उतरा और चढ़ा,--परमेश्वर का पुत्र मनुष्य का पुत्र बनाया गया, जैसा नाम स्वयं घोषित करता है। क्योंकि मसीह के नाम में निहित है, वह जो अभिषेक करता है, वह जो अभिषिक्त है, और स्वयं वह अभिषेक जिस से वह अभिषिक्त है। और पिता है जो अभिषेक करता है, परन्तु पुत्र है जो आत्मा के द्वारा अभिषिक्त है, जो अभिषेक है, जैसा वचन यशायाह के द्वारा घोषित करता है, "प्रभु का आत्मा मुझ पर है, क्योंकि उसने मेरा अभिषेक किया है,"(15)--अभिषेक करनेवाले पिता को, अभिषिक्त पुत्र को, और अभिषेक को, जो आत्मा है, दोनों को दिखाते हुए।
4. प्रभु स्वयं भी प्रगट करता है कि दुख उठानेवाला कौन था; क्योंकि जब उसने चेलों से पूछा, "लोग मुझे, मनुष्य के पुत्र को, क्या कहते हैं?"(16) और जब पतरस ने उत्तर दिया, "तू मसीह है, जीवते परमेश्वर का पुत्र;" और जब वह उसके द्वारा [इन वचनों में] सराहा गया, "कि माँस और लोहू ने यह उसे प्रगट नहीं किया, परन्तु पिता जो स्वर्ग में है," तब उसने स्पष्ट किया कि वह, मनुष्य का पुत्र, जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है। "क्योंकि उस समय से," कहा जाता है, "वह अपने चेलों को दिखाने लगा, कि उसे यरूशलेम जाना अवश्य है,
और याजकों से बहुत दुख उठाए, और ठुकराया जाए, और क्रूस पर चढ़ाया जाए, और 3 दिन फिर जी उठे।"(1) जिसे पतरस ने मसीह माना, जिसने उसे धन्य कहा क्योंकि पिता ने जीवते परमेश्वर के पुत्र को उसे प्रगट किया था, उसने कहा कि उसे स्वयं बहुत दुख उठाने, और क्रूस पर चढ़ाए जाने अवश्य हैं; और तब उसने पतरस को डाँटा, जिसने कल्पना की थी कि वह मसीह है जैसा मनुष्यों की सामान्य धारणा मानती थी(2) [कि मसीह होना चाहिए], और उसके दुख उठाने के विचार से विमुख था, [और] चेलों से कहा, "यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आपे का इन्कार करे, और अपना क्रूस उठाए, और मेरे पीछे हो ले। क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिये उसे खोएगा वह उसे बचाएगा।"(3) क्योंकि ये बातें मसीह ने खुले रूप से कहीं, वह स्वयं उन लोगों का उद्धारकर्ता होते हुए जिन्हें उसके अंगीकार के कारण मृत्यु के हाथ सौंपा जाना था, और जो अपने प्राण खोएँगे।
5. यदि, तथापि, उसे स्वयं दुख न उठाना था, परन्तु यीशु से उड़ जाना था, तो उसने अपने चेलों को क्रूस उठाने और अपने पीछे होने के लिये क्यों समझाया,--वह क्रूस जिसे ये मनुष्य ऐसा चित्रित करते हैं कि उसने उसे नहीं उठाया, परन्तु [उसके विषय में कहते हैं] कि उसने दुख की व्यवस्था को छोड़ दिया? क्योंकि यह कि उसने यह ऊपर के स्तौरॉस (क्रूस) के अंगीकार के विषय में नहीं कहा, जैसा उन में से कुछ व्याख्या करने का साहस करते हैं, परन्तु उस दुख के विषय में जिसे उसे स्वयं सहना था, और जिसे उसके चेलों को सहना था, वह संकेत करता है जब वह कहता है, "क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई खोएगा, वह उसे पाएगा। और यह कि उसके चेलों को उसके लिये दुख उठाना अवश्य है, उसने [जब उसने संकेत किया] यहूदियों से कहा, "देखो, मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्ताओं, और बुद्धिमानों, और शास्त्रियों को भेजता हूँ: और उन में से कुछ को तुम मारोगे और क्रूस पर चढ़ाओगे।"(4) और चेलों से वह कहा करता था, "और तुम मेरे लिये हाकिमों और राजाओं के सामने खड़े होगे; और वे तुम में से कुछ को कोड़े मारेंगे, और तुम्हें घात करेंगे, और नगर से नगर तक सताएँगे।"(5) इसलिए वह जानता था, उन दोनों को जो सताव सहेंगे, और वह जानता था उन को जिन्हें उसके कारण कोड़े खाकर मारे जाना होगा; और उसने किसी और क्रूस की बात नहीं की, परन्तु उस दुख की जिसे उसे स्वयं 1 पहले सहना था, और उसके चेलों को पीछे। इसी उद्देश्य से उसने उन्हें यह समझाई दी: "उन से मत डरना जो देह को घात करते हैं, परन्तु प्राण को घात नहीं कर सकते; परन्तु उससे डरना जो प्राण और देह दोनों को नरक में डाल सकता है;"(6) [इस प्रकार उन्हें समझाते हुए] कि वे उन विश्वास के अंगीकारों को दृढ़ता से पकड़े रहें जो उन्होंने उसके विषय में किए थे।
क्योंकि उसने प्रतिज्ञा की कि जो उसके नाम को मनुष्यों के सामने मानेंगे उन्हें वह अपने पिता के सामने मानेगा; परन्तु घोषित किया कि जो उसका इन्कार करेंगे उनका वह इन्कार करेगा, और जो उसे मानने में लज्जित होंगे उन से वह लज्जित होगा। और यद्यपि ये बातें ऐसी हैं, इन मनुष्यों में से कुछ इतनी धृष्टता तक बढ़ गए हैं, कि वे शहीदों पर भी तुच्छता उण्डेलते हैं, और उन को बुरा-भला कहते हैं जो प्रभु के अंगीकार के कारण मारे जाते हैं, और जो प्रभु के द्वारा पहले कही गई सब बातें सहते हैं, और जो इस विषय में प्रभु के दुख-भोग के पदचिह्नों पर चलने का यत्न करते हैं, दुख उठानेवाले के शहीद बनकर; इन्हें हम शहीदों के साथ ही लिखते भी हैं। क्योंकि, जब उनके लोहू के लिये जाँच की जाएगी,(7) और वे महिमा तक पहुँचेंगे, तब सब मसीह के द्वारा लज्जित होंगे, जिन्होंने उनकी शहादत पर कलंक लगाया है। और इस तथ्य से, कि उसने क्रूस पर पुकारा, "हे पिता, उन्हें क्षमा कर, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या करते हैं,"(8) मसीह की दीर्घसहिष्णुता, धीरज, करुणा, और भलाई प्रगट होती है, क्योंकि उसने दुख भी उठाया, और जिन्होंने उसके साथ बुरा व्यवहार किया उन्हें स्वयं निर्दोष ठहराया। क्योंकि परमेश्वर का वचन, जिसने हम से कहा, "अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, और जो तुम से बैर रखते हैं उनके लिये प्रार्थना करो,"(9) स्वयं क्रूस पर यही बात की; मानव जाति से इतनी प्रीति रखते हुए, कि जिन्होंने उसे मृत्यु दी उनके लिये भी प्रार्थना की। यदि, तथापि, कोई, इस कल्पना पर चलते हुए कि दो[मसीह] हैं, उनके विषय में निर्णय बनाए, तो वह [मसीह] कहीं अधिक अच्छा, और अधिक धीरजवाला, और सचमुच भला पाया जाएगा, जिसने अपने ही घावों और कोड़ों के बीच, और उस पर किए गए अन्य [क्रूरताओं] के बीच, उपकार किया, और उस पर किए गए अन्यायों को भुला दिया, उस से जो उड़ गया, और न चोट सही न अपमान।
6. यह उन लोगों के [मामले] को भी इसी प्रकार पूरा करता है जो मानते हैं कि उसने केवल दिखावे में दुख उठाया। क्योंकि यदि उसने सचमुच दुख न उठाया, तो उसका कोई धन्यवाद नहीं, क्योंकि दुख था ही नहीं; और जब हम वास्तव में दुख उठाना आरम्भ करेंगे, तो वह हमें बहकाता हुआ लगेगा, हमें buffering सहने, और दूसरा(10) गाल फेरने के लिये समझाते हुए, यदि उसने स्वयं हम से पहले वास्तव में वही दुख न उठाया हो; और जैसा उसने उन्हें यह दिखकर बहकाया कि वह वह नहीं था जो उन्हें लगा, वैसे ही वह हमें भी बहकाता है, हमें वह सहने के लिये समझाकर जो उसने स्वयं न सहा। [उस दशा में] हम गुरु से भी ऊपर होंगे, क्योंकि हम वह सहते और सम्भालते हैं जिसे हमारे गुरु ने कभी न उठाया और न सहा। परन्तु जैसा हमारा प्रभु अकेला सचमुच गुरु है, वैसे परमेश्वर का पुत्र सचमुच भला और धीरजवाला है, पिता परमेश्वर का वचन मनुष्य का पुत्र बनाया गया। क्योंकि उसने लड़ाई की और जय पाई; क्योंकि वह पितरों के लिये लड़ता हुआ मनुष्य था,(11) और
आज्ञाकारिता के द्वारा आज्ञा न मानने को पूरी रीति से मिटाते हुए: क्योंकि उसने बलवान को बाँधा,(1) और निर्बल को छुड़ाया, और पाप को नाश करके अपनी ही कारीगरी को उद्धार से सम्पन्न किया। क्योंकि वह अति पवित्र और दयालु प्रभु है, और मानव जाति से प्रेम करता है।
7. इसलिए, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, उसने मनुष्य (मानव स्वभाव) को परमेश्वर से चिपटने और एक होने दिया। क्योंकि यदि मनुष्य ने मनुष्य के शत्रु को न जीता होता, तो शत्रु न्यायसंगत रीति से पराजित न होता। और फिर: यदि परमेश्वर ने स्वतन्त्रता से उद्धार न दिया होता, तो हम उसे कभी सुरक्षित रूप से न रख सकते। और यदि मनुष्य परमेश्वर से न जोड़ा गया होता, तो वह अविनाशिता का सहभागी कभी न बन सकता। क्योंकि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ पर यह अनिवार्य था, दोनों से अपने सम्बन्ध के द्वारा, दोनों को मित्रता और मेल में लाए, और मनुष्य को परमेश्वर के सामने रखे, जब वह मनुष्य को परमेश्वर को प्रगट करता था।(2) क्योंकि, किस रीति से हम पुत्रों के लेपालकपन के भागी हो सकते, यदि हम ने उससे पुत्र के द्वारा वह संगति न पाई होती जो उसके अपने विषय में है, यदि उसका वचन, देहधारी होकर, हमारे साथ सहभागिता में न आया होता? इसलिये वह जीवन की हर अवस्था से भी गुज़रा, सब को परमेश्वर के साथ सहभागिता लौटाते हुए। इसलिए, जो यह दृढ़ता से कहते हैं कि वह कल्पित रूप से दिखाई दिया, और न देह में जन्मा और न सचमुच मनुष्य बनाया गया, वे अभी पुरानी दण्डाज्ञा के अधीन हैं, पाप को आश्रय देते हुए; क्योंकि, उनके दिखाने के अनुसार, मृत्यु पराजित नहीं हुई है, जिसने "आदम से लेकर मूसा तक राज्य किया, उन पर भी जिन्होंने आदम के अपराध की समानता के अनुसार पाप न किया था।"(3) परन्तु व्यवस्था आकर, जो मूसा के द्वारा दी गई, और पाप के विषय में गवाही देती हुई कि वह पापी है, सचमुच उसका (मृत्यु का) राज्य छीन लिया, यह दिखाते हुए कि वह राजा नहीं, परन्तु डाकू था; और उसे हत्यारा प्रगट किया। तथापि इसने मनुष्य पर भारी बोझ रखा, जिसके भीतर पाप था, यह दिखाते हुए कि वह मृत्यु के योग्य था। क्योंकि व्यवस्था आत्मिक थी, इसलिये इसने पाप को केवल उभरा कर दिया, परन्तु उसे नाश नहीं किया। क्योंकि पाप का आत्मा पर अधिकार न था, परन्तु मनुष्य पर था।
क्योंकि उसे, जिसे पाप को नाश करना था, और मृत्यु की शक्ति के अधीन मनुष्य को मोल लेना था, उचित था कि वह स्वयं वही वस्तु बनाया जाए जो वह था, अर्थात् मनुष्य; जो पाप के द्वारा दासत्व में खींचा गया था, परन्तु मृत्यु के द्वारा पकड़ा हुआ था, कि पाप मनुष्य के द्वारा नाश हो, और मनुष्य मृत्यु से बाहर निकले। क्योंकि जैसे उस एक मनुष्य की आज्ञा न मानने से जो मूल रूप से कुँवारी मिट्टी से गढ़ा गया था, बहुत लोग पापी ठहराए गए,(4) और जीवन खो बैठे; वैसे यह आवश्यक था कि, एक मनुष्य की आज्ञाकारिता से, जो मूल रूप से एक कन्या से जन्मा, बहुत लोग धर्मी ठहरें और उद्धार पाएँ। इस प्रकार, तब, परमेश्वर का वचन मनुष्य बनाया गया, जैसा मूसा भी कहता है: "परमेश्वर, उसके काम सच्चे हैं।"(5) परन्तु यदि, देह न बनाए जाकर, वह ऐसा दिखाई दिया जैसे देह हो, तो उसका काम सच्चा न था। परन्तु जो वह दिखाई दिया, वही वह था भी: परमेश्वर ने अपने में मनुष्य की प्राचीन रचना का सार लिया, कि वह पाप को मार डाले, मृत्यु को उसकी शक्ति से वंचित करे, और मनुष्य को जिलाए; और इसलिये उसके काम सच्चे हैं।
अध्याय उन्नीस.--यीशु मसीह केवल मनुष्य नहीं था, प्रकृति के साधारण क्रम में यूसुफ से जन्मा हुआ, परन्तु सचमुच परमेश्वर था, सर्वोच्च पिता से जन्मा, और सचमुच मनुष्य, कन्या से जन्मा'।
1. परन्तु फिर, जो यह दृढ़ता से कहते हैं कि वह केवल एक साधारण मनुष्य था, यूसुफ से जन्मा, पुरानी आज्ञा न मानने की दासता में रहते हुए, मृत्यु की दशा में हैं, अभी तक पिता परमेश्वर के वचन से न जुड़े हुए, और न पुत्र के द्वारा स्वतन्त्रता पाते हुए, जैसा वह स्वयं घोषित करता है: "यदि पुत्र तुम्हें स्वतन्त्र करेगा, तो तुम सचमुच स्वतन्त्र होगे।"(6) परन्तु, उसे न जानते हुए जो कन्या से इम्मानुएल है, वे उसके दान से वंचित हैं, जो अनन्त जीवन है;(7) और अविनाशी वचन को न पाकर, वे मरनहार देह में रहते हैं, और मृत्यु के देनदार हैं, जीवन की औषधि न पाते हुए। जिन से वचन कहता है, अपने अनुग्रह के दान का उल्लेख करते हुए: "मैं ने कहा, तुम सब सर्वोच्च के पुत्र हो, और देवता; परन्तु तुम मनुष्यों के समान मरोगे।"(8) वह निस्सन्देह ये वचन उन से कहता है जिन्होंने लेपालकपन का दान नहीं पाया, परन्तु जो परमेश्वर के वचन की शुद्ध उत्पत्ति के देहधारण को तुच्छ जानते हैं,(9) मानव स्वभाव को परमेश्वर में ऊँचाई से वंचित करते हैं, और अपने को परमेश्वर के वचन के प्रति कृतघ्न सिद्ध करते हैं, जो उनके लिये देहधारी हुआ। क्योंकि इसी उद्देश्य से परमेश्वर का वचन मनुष्य बनाया गया, और जो परमेश्वर का पुत्र था वह मनुष्य का पुत्र बना, कि मनुष्य, वचन में लिया जाकर, और लेपालकपन पाकर, परमेश्वर का पुत्र बन सके। क्योंकि और किसी साधन से हम अविनाशिता और अमरता तक न पहुँच सकते, यदि हम अविनाशिता और अमरता से न जोड़े गए होते। परन्तु हम अविनाशिता और अमरता से कैसे जुड़ सकते, यदि, 1 पहले, अविनाशिता और अमरता ने
वह बन जाए जो हम भी हैं, कि नाशवान अविनाशिता से निगल लिया जाए, और मरनहार अमरता से, कि पुत्रों का लेपालकपन पाए?
2. इसी कारण [यह ,कहा गया है], "उसकी उत्पत्ति को कौन बताएगा?"(1) क्योंकि "वह मनुष्य है, और उसे कौन पहचानेगा?"(2) परन्तु जिसे स्वर्ग में रहनेवाले पिता ने उसे प्रगट किया है,(3) वह उसे जानता है, कि वह समझता है कि जो "न शरीर की इच्छा से, और न मनुष्य की इच्छा से जन्मा,"(4) वही मनुष्य का पुत्र है, यही मसीह है, जीवते परमेश्वर का पुत्र। क्योंकि मैं ने पवित्रशास्त्र से दिखाया है,(5) कि आदम के पुत्रों में से कोई भी हर बात में, और पूर्ण रूप से, परमेश्वर नहीं कहलाता, या प्रभु नहीं नाम पाता। परन्तु यह कि वह स्वयं अपने ही अधिकार से, जितने मनुष्य कभी जिए उन सब से परे, परमेश्वर, और प्रभु, और अनन्त राजा, और देहधारी वचन है, सब भविष्यद्वक्ताओं, प्रेरितों, और आत्मा स्वयं के द्वारा घोषित, यह उन सब को दिखाई दे सकता है जो सत्य के छोटे भाग तक भी पहुँचे हैं। अब, पवित्रशास्त्र उसके विषय में ये बातें गवाही न देता, यदि, औरों के समान, वह केवल मनुष्य होता। परन्तु यह कि उसके पास, और सब से परे, अपने में वह श्रेष्ठ जन्म था जो सर्वोच्च पिता से है, और उसने वह श्रेष्ठ उत्पत्ति भी अनुभव की जो कन्या से है,(6) ईश्वरीय पवित्रशास्त्र दोनों बातों में उसके विषय में गवाही देता है: यह भी, कि वह सुन्दरता रहित मनुष्य था, और दुख के योग्य;(7) कि वह गदही के बच्चे पर बैठा;(8) कि उसने पीने के लिये सिरका और पित्त पाया;(9) कि वह लोगों के बीच तुच्छ जाना गया, और मृत्यु तक अपने को दीन किया, और यह कि वह पवित्र प्रभु है, आश्चर्यकारी, युक्ति करनेवाला, रूप में सुन्दर, और सामर्थी परमेश्वर,(10) सब मनुष्यों के न्यायी के रूप में बादलों पर आता हुआ;(11)--ये सब बातें पवित्रशास्त्र ने उसके विषय में भविष्यद्वाणी कीं।
3. क्योंकि जैसे वह परीक्षा सहने के लिये मनुष्य बना, वैसे ही वह वचन था कि उसकी महिमा हो; वचन शान्त रहता हुआ, कि वह परीक्षा में पड़ सके, अपमानित हो, क्रूस पर चढ़ाया जाए, और मृत्यु सह सके, परन्तु मानव स्वभाव उस में (ईश्वरीय में) निगल लिया जाए, जब उसने जय पाई, और [बिना झुके] सहा, और कृपा के काम किए, और फिर जी उठा, और [स्वर्ग में] उठा लिया गया। इसलिए वह, परमेश्वर का पुत्र, हमारा प्रभु, पिता का वचन होते हुए, और मनुष्य का पुत्र, क्योंकि उसकी मानव स्वभाव के विषय में मरियम से उत्पत्ति थी--जो मनुष्य जाति से उतरी थी, और जो स्वयं एक मनुष्य थी--मनुष्य का पुत्र बनाया गया।(12) इसलिये प्रभु ने स्वयं भी हमें एक चिह्न दिया, नीचे गहराई में, और ऊपर ऊँचाई में, जिसे मनुष्य ने नहीं माँगा, क्योंकि उसने कभी आशा न की थी कि एक कन्या गर्भवती हो सकती है, या यह सम्भव है कि कन्या बनी रहनेवाली एक पुत्र को जन्म दे, और इस प्रकार जो जन्मा वह हो" हमारे साथ परमेश्वर," और पृथ्वी के नीचे की उन बातों पर उतरे, खोई हुई भेड़ को खोजते हुए, जो निश्चय ही उसकी अपनी विशेष कारीगरी थी, और ऊपर की ऊँचाई पर चढ़े, पाई हुई उस मानव प्रकृति (hominem) को अपने पिता को चढ़ाते और सौंपते हुए, अपने ही व्यक्ति में मनुष्य के पुनरुत्थान के 1 फल बनाते हुए; कि, जैसे सिर मरे हुओं में से जी उठा, वैसे ही देह का शेष pan भी--[अर्थात्, देह] हर उस मनुष्य की जो जीवन में पाई जाती है--जब उस दण्डाज्ञा का समय पूरा हो जो आज्ञा न मानने के कारण थी, उठ सके, जोड़ों और बन्धनों के द्वारा(13) एक साथ मिलाकर और दृढ़ होकर परमेश्वर की बढ़ती से, देह के हर अंग का देह में अपना उचित और योग्य स्थान होते हुए।
क्योंकि पिता के घर में बहुत से घर हैं,(14) क्योंकि देह में भी बहुत से अंग हैं।
अध्याय बीस.--परमेश्वर ने अपने को दिखाया, मनुष्य के पतन के द्वारा, धीरजवाला, उदार, दयालु, बचाने में सामर्थी। इसलिए मनुष्य अति कृतघ्न है, यदि, अपनी अपनी दशा को, और उसे दी गई भलाई को भूलकर, वह ईश्वरीय अनुग्रह को न माने।
1. इसलिए परमेश्वर दीर्घसहिष्णु था, जब मनुष्य चूकनेवाला हुआ, उस जय को पहले से देखते हुए जो वचन के द्वारा उसे दी जानी थी। क्योंकि, जब निर्बलता में बल सिद्ध किया गया,(15) तो इसने परमेश्वर की दया और उत्तम सामर्थ्य को दिखाया। क्योंकि जैसे उसने धीरज से योना को मछली के द्वारा निगले जाने दिया, यह नहीं कि वह निगल लिया जाए और बिलकुल नाश हो, परन्तु कि, फिर बाहर फेंका जाकर, वह परमेश्वर के और अधिक अधीन हो, और उसे और अधिक महिमा दे जिसने उसे ऐसी अनपेक्षित मुक्ति दी थी, और नीनवेवासियों को स्थायी मन-फिराव में लाए, कि वे प्रभु की ओर इकट्ठे किए जाएँ, जो उन्हें मृत्यु से छुड़ाएगा, उस चिह्न से भयभीत होकर जो योना के विषय में किया गया था, जैसा पवित्रशास्त्र उनके विषय में कहता है, "और वे हर एक अपनी बुरी चाल से, और अपने हाथों में जो अधर्म था उस से लौटे, यह कहते हुए, कौन जाने कि परमेश्वर पछताए, और अपना क्रोध हम से फेर ले, और हम नाश न हों?"(16)--वैसे ही, आदि से, परमेश्वर ने मनुष्य को होने दिया
अपराध के कर्ता उस बड़ी मछली द्वारा निगल लिया गया, ताकि इस प्रकार निगले जाने पर वह सर्वथा नाश हो जाए, ऐसा नहीं; परन्तु, उद्धार की युक्ति को व्यवस्थित करते और तैयार करते हुए, जो वचन के द्वारा पूरी हुई, योना के चिह्न के द्वारा, उन लोगों के लिये जो प्रभु के विषय में योना के समान वही मत रखते थे, और जिन्होंने अंगीकार करके कहा, "मैं प्रभु का दास हूँ, और मैं स्वर्ग के प्रभु परमेश्वर की आराधना करता हूँ, जिसने समुद्र और सूखी भूमि बनाई है।"(1) [यह किया गया] ताकि मनुष्य, परमेश्वर से अप्रत्याशित उद्धार पाकर, मरे हुओं में से जी उठे, और परमेश्वर की महिमा करे, और उस वचन को दोहराए जो योना द्वारा भविष्यद्वाणी में कहा गया था: "मैंने अपने क्लेश के कारण अपने परमेश्वर प्रभु की दोहाई दी, और उसने अधोलोक के पेट में से मेरी सुनी;"(2) और वह उस उद्धार के लिये जो उसने उससे पाया है, निरन्तर परमेश्वर की महिमा करता रहे, और बिना रुके धन्यवाद देता रहे, "ताकि कोई शरीर प्रभु के सामने घमण्ड न करे;"(3) और मनुष्य परमेश्वर के विषय में कभी विपरीत मत न अपनाए, यह मानकर कि जो अविनाशिता उसकी है वह स्वभाव से उसकी अपनी है, और इस प्रकार सत्य को न पकड़कर, खोखले अहंकार से घमण्ड करे, मानो वह स्वभाव से परमेश्वर के समान हो। क्योंकि उसने (शैतान) इस प्रकार उसे (मनुष्य) अपने सृष्टिकर्ता के प्रति और अधिक कृतघ्न बना दिया, उस प्रेम को छिपा दिया जो परमेश्वर का मनुष्य के प्रति था, और उसके मन को अन्धा कर दिया कि वह न समझे कि परमेश्वर के योग्य क्या है, अपने आप को परमेश्वर से तुलना करते हुए, और अपने आप को परमेश्वर के बराबर ठहराते हुए।
2. इसलिए, यह परमेश्वर के धीरज का [उद्देश्य] था, कि मनुष्य, सब बातों में से गुजरकर, और नैतिक अनुशासन का ज्ञान प्राप्त करके, फिर मरे हुओं में से पुनरुत्थान तक पहुँचकर, और अनुभव से सीखकर कि उसके छुटकारे का स्रोत क्या है, प्रभु के प्रति कृतज्ञता की दशा में सदा जीवित रहे, उससे अविनाशिता का दान पाकर, कि वह उसे और अधिक प्रेम करे; क्योंकि "जिसको अधिक क्षमा किया गया है, वह अधिक प्रेम करता है:"(4) और वह अपने आप को जाने, वह कितना मरणशील और निर्बल है; और वह परमेश्वर के विषय में भी समझे, कि वह अमर है और इतना सामर्थी है कि मरणशील पर अमरता, और कालिक पर अनन्तता प्रदान करे; और अपने प्रति प्रदर्शित परमेश्वर के अन्य गुणों को भी समझे, जिनके द्वारा शिक्षा पाकर वह ईश्वरीय महानता के अनुसार परमेश्वर के विषय में विचार करे। क्योंकि मनुष्य की महिमा [है] परमेश्वर, परन्तु [उसके] काम परमेश्वर की [महिमा]; और समस्त का आश्रय उसकी. बुद्धि और सामर्थ्य [है] मनुष्य। जैसा वैद्य अपने रोगियों से सिद्ध होता है, वैसे ही परमेश्वर भी मनुष्यों के द्वारा प्रगट होता है। और इसलिए पौलुस घोषणा करता है, "क्योंकि परमेश्वर ने सब को अविश्वास में बन्द कर दिया है, कि वह सब पर दया करे;"(5) यह आत्मिक एयोन के विषय में नहीं कहता, परन्तु मनुष्य के विषय में, जो परमेश्वर का आज्ञा न मानने वाला था, और अमरता से निकाल दिया गया, तब दया पाया, परमेश्वर के पुत्र के द्वारा उस दत्तक-ग्रहण को पाते हुए जो उसके द्वारा [पूरा किया जाता है].
क्योंकि जो सृजी हुई वस्तुओं और सृष्टिकर्ता के विषय में, जो सब का सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, और जिसने सब को अस्तित्व दिया है, सच्चा गौरव (मत) घमण्ड और डींग के बिना पकड़े रहता है; [ऐसा व्यक्ति,] उसके प्रेम(6) और अधीनता में बने रहकर, और धन्यवाद देते हुए, उससे पदोन्नति की और बड़ी महिमा भी पाएगा,(7) उस समय की ओर देखते हुए जब वह उसके समान हो जाएगा जिसने उसके लिये मृत्यु सही, क्योंकि वह भी, "पापमय शरीर की समानता में बनाया गया,"(8) पाप को दोषी ठहराने के लिये, और उसे, अब दोषी ठहराई हुई वस्तु के रूप में, शरीर के पार फेंक देने के लिये, परन्तु यह कि वह मनुष्य को अपनी समानता में बुलाए, उसे परमेश्वर के लिये [अपना] अनुकरण करने वाला ठहराते हुए, और उस पर अपने पिता की व्यवस्था थोपते हुए, कि वह परमेश्वर को देखे, और पिता को ग्रहण करने की सामर्थ्य उसे देते हुए; [होते हुए](9) परमेश्वर का वचन जो मनुष्य में वास किया, और मनुष्य का पुत्र बना, कि वह मनुष्य को परमेश्वर को ग्रहण करने का, और परमेश्वर को मनुष्य में वास करने का अभ्यास कराए, पिता की सुइच्छा के अनुसार।
3. इस कारण, इसलिए, प्रभु स्वयं,(10) जो कुँवारी से इम्मानुएल है,(11) हमारे उद्धार का चिह्न है, क्योंकि उन्हें बचाने वाला प्रभु स्वयं था, क्योंकि वे अपने ही साधन से बचाए नहीं जा सकते थे; और, इसलिए, जब पौलुस मनुष्य की दुर्बलता को रखता है, वह कहता है: "क्योंकि मैं जानता हूँ कि मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु नहीं बसती,"(12) यह दिखाते हुए कि हमारे उद्धार की "अच्छी वस्तु" हम से नहीं, परन्तु परमेश्वर से है। और फिर: "मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ, इस मृत्यु की देह से मुझे कौन छुड़ाएगा?"(13) तब वह छुड़ाने वाले को प्रवेश करता है, [कहते हुए,] "हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह।" और यशायाह भी यह घोषित करता है, [जब वह कहता है:] "हे झुकी हुई भुजाओं, तुम दृढ़ किए जाओ, और हे निर्बल घुटनों; हे निर्बल मन वालों, तुम ढाढ़स पाओ; शान्ति पाओ, मत डरो: देखो, हमारे परमेश्वर ने बदले के साथ न्याय दिया है, और बदला देगा: वह स्वयं आएगा, और हमें बचाएगा।"(14) यहाँ हम देखते हैं, कि अपने आप से नहीं, परन्तु परमेश्वर की सहायता से, हमें बचाया जाना है।
4. फिर, यह कि हमें बचाने वाला केवल मनुष्य न हो, और न [कोई] शरीर के बिना--क्योंकि दूत शरीर के बिना हैं--[वही
भविष्यद्वक्ता] ने प्रचार किया, कहते हुए: "न eider,(1) न दूत, परन्तु प्रभु स्वयं उन्हें बचाएगा क्योंकि वह उनसे प्रेम करता है, और उन पर दया करेगा वह स्वयं उन्हें स्वतन्त्र करेगा।"(2) और यह कि वह स्वयं निज मनुष्य बने, दृश्य, जब वह उद्धार देने वाला वचन हो, यशायाह फिर sap: "देख, सिय्योन नगर: तेरी आँखें हमारे उद्धार को देखेंगी।"(3) और यह कि हमारे लिये मरने वाला केवल मनुष्य नहीं था, यशायाह कहता है: "और पवित्र प्रभु ने अपने मरे हुए इस्राएल को स्मरण किया, जो कब्र की भूमि में सोया था; और वह उनको अपना उद्धार प्रचार करने के लिये उतरा, कि वह उन्हें बचाए।"(4) और आमोस (मीका) भविष्यद्वक्ता वही घोषित करता है: "वह फिर लौटेगा, और हम पर करुणा करेगा: वह हमारे अधर्मों को नष्ट करेगा, और हमारे पापों को समुद्र की गहराइयों में डालेगा।"(5) और फिर, उसके आगमन के स्थान को निर्दिष्ट करते हुए, वह कहता है: "प्रभु ने सिय्योन से बातें की हैं, और उसने यरूशलेम से अपनी वाणी सुनाई है।"(6) और यह कि यहूदा के निज भाग के दक्षिण की ओर जो प्रदेश है वहाँ से परमेश्वर का पुत्र आएगा, जो परमेश्वर है, और जो बेथलेहेम से था, जहाँ प्रभु जन्मा [और] सारी पृथ्वी में अपनी स्तुति भेजेगा, इस प्रकार(7) भविष्यद्वक्ता हबक्कूक कहता है: "परमेश्वर दक्षिण से आएगा, और पवित्र जन पर्वत से, एफ्रेम। उसकी सामर्थ्य ने आकाशों को ढाँप लिया, और पृथ्वी उसकी स्तुति से भरी है। उसके मुख के आगे वचन निकलेगा, और उसके पाँव मैदानों में आगे बढ़ेंगे।"(8) इस प्रकार वह स्पष्ट शब्दों में संकेत करता है कि वह परमेश्वर है, और उसका आगमन बेथलेहेम में [होना था], और एफ्रेम पर्वत से, जो निज भाग के दक्षिण की ओर है, और यह कि [वह] मनुष्य है। क्योंकि वह कहता है, "उसके पाँव मैदानों में आगे बढ़ेंगे:" और यह मनुष्य के योग्य संकेत है।(9)
अध्याय इक्कीस.--यशायाह (7. 14) की भविष्यद्वाणी का समर्थन, थियोडोशन, अकीला, एबियोनी, और यहूदियों की गलत व्याख्याओं के विरुद्ध। सप्तति अनुवाद का अधिकार। प्रमाण में तर्क कि मसीह एक कुँवारी से जन्मा।
1. तब, परमेश्वर मनुष्य बनाया गया, और प्रभु ने स्वयं हमें बचाया, हमें कुँवारी का चिह्न देते हुए। परन्तु जैसा कुछ लोग आरोप लगाते हैं, वैसा नहीं, जो अब पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने का साहस करते हैं, [इस प्रकार:] "देख, एक युवती गर्भवती होगी, और एक पुत्र जनेगी,"(10) जैसा इफिसुस के थियोडोशन ने अनुवाद किया है, और पुन्तुस के अकीला ने,(11) दोनों यहूदी मत-परिवर्तित। एबियोनी, इनका अनुसरण करते हुए, दृढ़ करते हैं कि वह यूसुफ से उत्पन्न हुआ; इस प्रकार, जितना उन में है, परमेश्वर की ऐसी अद्भुत प्रबन्ध को नष्ट करते हुए, और भविष्यद्वक्ताओं की उस गवाही को हटाते हुए जो परमेश्वर से निकली। क्योंकि सचमुच यह भविष्यवाणी लोगों के बाबुल को हटाए जाने से पहले कही गई थी; अर्थात्, मादियों और फारसियों द्वारा प्राप्त प्रधानता से पहले। परन्तु यह यहूदियों द्वारा ही यूनानी भाषा में अनुवादित हुई, हमारे प्रभु के आगमन के काल से बहुत पहले, कि सन्देह न रहे कि कदाचित् यहूदियों ने, हमारी रुचि के अनुसार, इन शब्दों पर यह व्याख्या रखी। वे निश्चय ही, यदि हमारी भावी सत्ता को, और यह कि हम पवित्रशास्त्र से इन प्रमाणों का उपयोग करेंगे, जानते होते, तो स्वयं अपने पवित्रशास्त्र को जलाने में कभी संकोच न करते, जो घोषित करते हैं कि अन्य सब जातियाँ [अनन्त] जीवन में भागी होती हैं, और दिखाते हैं कि जो अपने आप को याकूब का घर और इस्राएल की प्रजा होने का घमण्ड करते हैं, am परमेश्वर के अनुग्रह से निज भाग से निकाले गए हैं।
2. क्योंकि रोमियों के अपने राज्य को अपने अधिकार में करने से पहले,(12) जब तक मकिदोनिया वाले एशिया को थामे हुए थे, लागस का पुत्र टॉलेमी, सिकन्दरिया में जो पुस्तकालय उसने स्थापित किया था उसे, सब मनुष्यों की लेखों के संग्रह से, जो योग्यता की [रचनाएँ] थीं, सजाने के लिये उत्सुक होकर, यरूशलेम के लोगों से विनती की, कि वे अपने पवित्रशास्त्र का यूनानी भाषा में अनुवाद करवाएँ। और उन्होंने--क्योंकि उस समय वे अभी मकिदोनिया वालों के अधीन थे--टॉलेमी के पास अपने प्राचीनों में से सत्तर को भेजा, जो पवित्रशास्त्र में और दोनों भाषाओं में पूरी तरह निपुण थे, जो उसने चाहा था उसे पूरा करने के लिये।(13) परन्तु उसने, उन्हें अलग-अलग परखना चाहकर, और डरकर कि कहीं वे आपस में सम्मति लेकर, अपनी व्याख्या द्वारा पवित्रशास्त्र में के सत्य को छिपा न दें, उन्हें एक दूसरे से अलग किया, और उन सब को वही अनुवाद लिखने की आज्ञा दी। उसने सब पुस्तकों के विषय में यह किया। परन्तु जब वे टॉलेमी के सामने उसी स्थान में एकत्र हुए, और
उनमें से प्रत्येक ने अपनी व्याख्या को हर दूसरे की व्याख्या से मिलाया, परमेश्वर सचमुच महिमा पाया, और पवित्रशास्त्र सचमुच ईश्वरीय माने गए। क्योंकि उन सब ने साझे अनुवाद को [जो उन्होंने तैयार किया था] ठीक उन्हीं शब्दों में और ठीक उन्हीं नामों में, आदि से अन्त तक, पढ़ा, यहाँ तक कि उपस्थित अन्यजाति भी समझ गए कि पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से अनुवादित हुए थे।(1) और परमेश्वर के यह करने में कुछ आश्चर्य की बात नहीं थी,--वह, जिसने, जब नबूकदनेस्सर के अधीन लोगों की बन्धुआई में, पवित्रशास्त्र बिगड़ गए थे, और जब, सत्तर वर्ष के बाद, यहूदी अपने देश को लौट आए, तब, फारसियों के राजा अर्तहशस्त के समय में, लेवी के गोत्र के याजक एज्रा को प्रेरित किया, पूर्व भविष्यद्वक्ताओं के सब वचनों को फिर ढालने के लिये(2), और लोगों के साथ मूसा की व्यवस्था को फिर स्थापित करने के लिये।
3. इसलिए, क्योंकि पवित्रशास्त्र ऐसी विश्वसनीयता से, और परमेश्वर के अनुग्रह से, अनुवादित हुए हैं, और क्योंकि इन से परमेश्वर ने अपने पुत्र के प्रति हमारे विश्वास को फिर तैयार किया और रचा है, और मिस्र में हमें मिलावट रहित पवित्रशास्त्र को सुरक्षित रखा है, जहाँ याकूब का घर फला-फूला, कनान में अकाल से भागते हुए; जहाँ हमारा प्रभु भी सुरक्षित रहा जब वह हेरोदेस द्वारा चलाई गई सताहट से भागा; और [क्योंकि] इन पवित्रशास्त्रों की यह व्याख्या हमारे प्रभु के [पृथ्वी पर] उतरने से पहले की गई, और मसीहियों के प्रकट होने से पहले अस्तित्व में आई--क्योंकि हमारा प्रभु औगुस्तुस के राज्य के लगभग 41वें वर्ष में जन्मा; परन्तु टॉलेमी बहुत पहले का था, जिसके अधीन पवित्रशास्त्र अनुवादित हुए;--[क्योंकि ये बातें ऐसी हैं, मैं कहता हूँ,] सचमुच ये मनुष्य निर्लज्ज और धृष्ट सिद्ध होते हैं, जो अब भिन्न अनुवाद करने की इच्छा दिखाना चाहते हैं, जब हम इन पवित्रशास्त्रों से उनका खण्डन करते हैं, और उन्हें परमेश्वर के पुत्र के आगमन पर विश्वास करने के लिये बन्द कर देते हैं। परन्तु हमारा विश्वास स्थिर, कपट रहित, और एकमात्र सच्चा है, इन पवित्रशास्त्रों से स्पष्ट प्रमाण रखता है, जो मेरे बताए हुए ढंग से अनुवादित हुए; और कलीसिया का प्रचार मिलावट रहित है। क्योंकि प्रेरित, क्योंकि वे इन [विधर्मी] सब से अधिक प्राचीन काल के हैं, इस पूर्वोक्त अनुवाद से सहमत हैं; और अनुवाद प्रेरितों की परम्परा से मेल खाता है। क्योंकि पतरस, और यूहन्ना, और मत्ती, और पौलुस, और शेष क्रम से, तथा उनके अनुयायी, सब भविष्यद्वाणी [announce-merits] को रख गए, जैसा(3) प्राचीनों की व्याख्या उन्हें रखती है।
4. क्योंकि एक ही और वही परमेश्वर का आत्मा, जिसने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा प्रचार किया कि प्रभु का आगमन क्या और कैसा होगा, इन प्राचीनों के द्वारा सचमुच भविष्यद्वाणी की हुई बात की न्यायसंगत व्याख्या दी; और उसने स्वयं, प्रेरितों के द्वारा, घोषणा की कि दत्तक-ग्रहण के समयों की पूर्णता आ गई है, कि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है, और कि वह उन में वास कर रहा है जो उस पर विश्वास करते हैं जो कुँवारी से इम्मानुएल जन्मा। इस भाव पर वे गवाही देते हैं, [कहते हुए,] कि यूसुफ के मरियम के साथ इकट्ठा होने से पहले, जब वह इसलिये कुँवारीपन में रही, "वह पवित्र आत्मा से गर्भवती पाई गई;"(4) और कि दूत गब्रिएल ने उससे कहा, "पवित्र आत्मा तुझ पर आएगा, और सर्वोच्च की सामर्थ्य तुझ पर छाया करेगी; इसलिये जो पवित्र वस्तु तुझ से जन्मेगी वह परमेश्वर का पुत्र कहलाएगी;"(5) और कि दूत ने यूसुफ से स्वप्न में कहा, "अब यह इसलिये हुआ, कि जो यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था वह पूरा हो, देख, एक कुँवारी गर्भवती होगी।"(6) परन्तु प्राचीनों ने एसाय के कहे हुए को इस प्रकार अनुवाद किया है: "और प्रभु ने, और भी, आहाज से कहा, अपने लिये अपने परमेश्वर प्रभु से नीचे की गहराई में से, या ऊपर की ऊँचाई से, एक चिह्न माँग। और आहाज ने कहा, मैं नहीं माँगूँगा, और मैं प्रभु की परीक्षा नहीं करूँगा। और उसने कहा, मनुष्यों को थकाना तुम्हारे लिये छोटी बात नहीं है(7); और प्रभु उन्हें कैसे थकाता है? इसलिये प्रभु स्वयं तुम्हें एक चिह्न देगा; देख, एक कुँवारी गर्भवती होगी, और एक पुत्र जनेगी; और तुम उसका नाम इम्मानुएल रखोगे।
वह मक्खन और मधु खाएगा: इससे पहले कि वह बुरी वस्तुओं को जाने या चुन ले, वह उन्हें अच्छी वस्तु के लिये बदल देगा; क्योंकि बच्चे के भले या बुरे को जानने से पहले, वह बुराई को स्वीकृति नहीं देगा, कि वह वह चुन ले जो भला है।"(8) सावधानी से, तब, पवित्र आत्मा ने, कही हुई बात के द्वारा, कुँवारी से उसके जन्म को, और उसके सार को, यह कि वह परमेश्वर है, दिखाया है (क्योंकि इम्मानुएल नाम यह संकेत करता है)। और वह दिखाता है कि वह मनुष्य है, जब वह कहता है, "वह मक्खन और मधु खाएगा;" और इसमें कि वह उसे बालक भी कहता है, [कहते हुए,] "इससे पहले कि वह भले और बुरे को जाने;" क्योंकि ये सब मानव शिशु के चिह्न हैं। परन्तु यह कि वह "बुराई को स्वीकृति नहीं देगा, कि वह वह चुन ले जो भला है,"--यह परमेश्वर के योग्य है; इस तथ्य से, कि वह मक्खन और मधु खाएगा, हमें यह न समझना चाहिए कि वह केवल मनुष्य मात्र है, और न, दूसरी ओर, इम्मानुएल नाम से, उसे शरीर रहित परमेश्वर होने का सन्देह करना चाहिए।
5. और जब वह कहता है, "सुन, हे दाऊद के घराने,"(9) उसने एक के भाग का काम किया indi-
cating कि जिसे परमेश्वर ने दाऊद से प्रतिज्ञा की थी कि वह उसके पेट (ventris) के फल से एक अनन्त राजा को उठाएगा, वही है जो कुँवारी से जन्मा, वह स्वयं दाऊद के वंश की। इस कारण भी, उसने प्रतिज्ञा की कि राजा "उसके पेट के फल से" होगा, जो गर्भ धारण करने वाली कुँवारी के लिये उपयुक्त [प्रयोग करने का शब्द] था, और "उसकी कटि के फल से" नहीं, और न "उसकी कमर के फल से," जो अभिव्यक्ति उत्पन्न करने वाले पुरुष के, और पुरुष से गर्भ धारण करने वाली स्त्री के योग्य है। इस प्रतिज्ञा में, इसलिए, पवित्रशास्त्र ने सब पुरुष-प्रभाव को निकाल दिया; तौभी यह निश्चय ही नहीं कहा गया है कि जो जन्मा वह मनुष्य की इच्छा से नहीं था। परन्तु इसने "पेट के फल" को स्थिर किया और स्थापित किया, कि वह उसकी उत्पत्ति को घोषित करे जो कुँवारी से [जन्म लेने] वाला था, जैसा इलीशिबा ने पवित्र आत्मा से भरी होने पर गवाही दी, मरियम से कहती हुई, "तू स्त्रियों में धन्य है, और तेरे पेट का फल धन्य है;"(1) पवित्र आत्मा सुनने के इच्छुक लोगों को दिखाते हुए, कि वह प्रतिज्ञा जो परमेश्वर ने की थी, [दाऊद के] पेट के फल से एक राजा को उठाने की, कुँवारी से जन्म में पूरी हुई, अर्थात् मरियम से। इसलिए, जो यशायाह के अनुच्छेद को इस प्रकार बदलते हैं, "देख, एक युवती गर्भवती होगी," और जो उसे यूसुफ का पुत्र मानना चाहते हैं, वे उस प्रतिज्ञा के रूप को भी बदलें जो दाऊद को दी गई थी, जब परमेश्वर ने उससे प्रतिज्ञा की कि उसके पेट के फल से, राजा मसीह के सींग को उठाए। परन्तु उन्होंने नहीं समझा, नहीं तो वे इस अनुच्छेद को भी बदलने का साहस करते।
6. परन्तु यशायाह ने जो कहा, "ऊपर की ऊँचाई से, या नीचे की गहराई से,"(2) यह संकेत करने के लिये था, कि "जो उतरा वही है जो ऊपर भी चढ़ा।"(3) परन्तु इसमें कि उसने कहा, "प्रभु स्वयं तुम्हें एक चिह्न देगा," उसने उसकी उत्पत्ति के विषय में एक अप्रत्याशित बात घोषित की, जो सब के प्रभु परमेश्वर के द्वारा छोड़ और किसी प्रकार पूरी नहीं हो सकती थी, परमेश्वर स्वयं दाऊद के घराने में एक चिह्न देते हुए। क्योंकि इसमें कौन सी बड़ी बात या कौन सा चिह्न होता, कि एक युवती पुरुष से गर्भ धारण करके जने,--एक बात जो सन्तान उत्पन्न करने वाली सब स्त्रियों को होती है? परन्तु क्योंकि मनुष्यों के लिये परमेश्वर की सहायता के द्वारा अप्रत्याशित उद्धार दिया जाना था, वैसे ही कुँवारी से अप्रत्याशित जन्म पूरा हुआ; परमेश्वर यह चिह्न देते हुए, परन्तु मनुष्य उसे कार्य में नहीं लाता।
7. इस कारण भी, दानिय्येल,(4) उसके आगमन को पहले से देखकर, कहा कि एक पत्थर, हाथों के बिना काटा गया, इस जगत में आया। क्योंकि "हाथों के बिना" का अर्थ यह है, कि इस जगत में उसका आना मनुष्य के हाथों के कार्य द्वारा नहीं था, अर्थात् उन मनुष्यों के द्वारा नहीं जो पत्थर काटने के अभ्यस्त हैं; अर्थात्, यूसुफ उसके विषय में कोई भाग नहीं लेता, परन्तु मरियम अकेली पूर्व-व्यवस्थित युक्ति के साथ सहयोग करती है। क्योंकि पृथ्वी से यह पत्थर परमेश्वर की सामर्थ्य और बुद्धि दोनों से अस्तित्व पाता है। इसलिये यशायाह भी कहता है: "प्रभु यों कहता है, देख, मैं सिय्योन की नींव में एक पत्थर रखता हूँ, बहुमूल्य, चुना हुआ, प्रधान, कोने का, आदर में रखे जाने के लिये।"(5) तो, तब, हम समझते हैं कि मनुष्य-स्वभाव में उसका आगमन एक मनुष्य की इच्छा से नहीं, परन्तु परमेश्वर की इच्छा से था।
8. इसलिये मूसा भी एक प्रतिरूप देते हुए, अपनी लाठी को भूमि पर डाल दिया,(6) ताकि वह, शरीर बनकर, मिस्रियों के सब विरोध को उघाड़े और निगल जाए, जो परमेश्वर की पूर्व-व्यवस्थित युक्ति के विरुद्ध अपने आप को उठा रहा था;(7) कि मिस्री स्वयं गवाही दें कि लोगों के लिये उद्धार का काम करने वाली परमेश्वर की उँगली है, यूसुफ का पुत्र नहीं। क्योंकि यदि वह यूसुफ का पुत्र होता, तो वह सुलैमान से बड़ा, of योना से बड़ा,(8) या दाऊद से बड़ा कैसे हो सकता था,(9) जब वह उसी बीज से उत्पन्न हुआ था, और इन मनुष्यों का वंशज था? और यह भी कैसे हुआ कि उसने पतरस को धन्य कहा, क्योंकि उसने उसे जीवते परमेश्वर का पुत्र माना ?(10)
9. परन्तु इसके अलावा, यदि सचमुच वह यूसुफ का पुत्र होता, तो वह, यिर्मयाह के अनुसार, न राजा हो सकता था और न वारिस। क्योंकि यूसुफ यहोयाकीम और यकोन्याह का पुत्र दिखाया जाता है, जैसा मत्ती भी अपनी वंशावली में रखता है।(11) परन्तु यकोन्याह, और उसकी सारी सन्तान, राज्य से निज भाग से निकाली गई; यिर्मयाह यों घोषित करते हुए, "मैं जीवित हूँ, प्रभु कहता है, यदि यहूदा के राजा यहोयाकीम का पुत्र यकोन्याह मेरे दाहिने हाथ की मुहर बनाया गया होता, तो मैं उसे वहाँ से उखाड़ देता, और उसे तेरे प्राण के खोजी के हाथ में सौंप देता।"(12) और फिर: "यकोन्याह निकम्मे बर्तन के समान अपमानित है, क्योंकि वह उस देश में डाल दिया गया है जिसे वह नहीं जानता था। हे पृथ्वी, प्रभु का वचन सुन: इस मनुष्य को निज भाग से निकाला हुआ व्यक्ति लिख; क्योंकि उसके बीज में से कोई, दाऊद के सिंहासन पर बैठकर, सफल न होगा, और न यहूदा में प्रधान होगा।"(13) और फिर, परमेश्वर उसके पिता यहोयाकीम के विषय में कहता है: "इसलिये प्रभु यहूदिया के राजा उसके पिता यहोयाकीम के विषय में यों कहता है, दाऊद के सिंहासन पर बैठने वाला उस से कोई न होगा: और उसकी लोथ दिन की धूप में, और रात के पाला में, बाहर डाल दी जाएगी। और मैं उस पर दृष्टि करूँगा, और पर
उसके पुत्रों पर, और उन पर लाऊँगा, और यरूशलेम के निवासियों पर, यहूदा के देश पर, वे सब विपत्तियाँ जो मैंने उनके विरुद्ध कह दी हैं।"(1) इसलिए, जो कहते हैं कि वह यूसुफ से उत्पन्न हुआ, और कि उन्हें उस में आशा है, वे अपने आप को राज्य से निज भाग से निकला हुआ कर लेते हैं, यकोन्याह और उसके बीज के विरुद्ध दिए गए शाप और डाँट tinder असफल होते हुए। क्योंकि इस कारण ये बातें यकोन्याह के विषय में कही गई हैं, [पवित्र] आत्मा दुष्ट शिक्षकों की शिक्षाओं को पहले से जानते हुए; कि वे सीखें कि उसके बीज से-- अर्थात् यूसुफ से--वह जन्म लेने वाला नहीं था परन्तु, परमेश्वर की प्रतिज्ञा के अनुसार, दाऊद के पेट से अनन्त राजा उठाया जाता है, जो सब बातों को अपने में समेटता है, और प्राचीन रचना को [मनुष्य की] अपने में इकट्ठा किया है।(2)
10. क्योंकि जैसे एक मनुष्य की आज्ञा-उल्लंघन से पाप प्रवेश किया, और मृत्यु ने पाप के द्वारा [एक स्थान] पाया; वैसे ही एक मनुष्य की आज्ञाकारिता से, धार्मिकता प्रवेश कराई जाकर, उन व्यक्तियों में जीवन को फलवन्त करेगी जो बीते समयों में मरे हुए थे।(3) और जैसे प्रथम-रचित स्वयं आदम, को अपनी सत्ता अजोती और अभी तक कुँवारी मिट्टी से मिली ("क्योंकि परमेश्वर ने अभी वर्षा नहीं भेजी थी, और मनुष्य ने भूमि नहीं जोती थी"(4)), और परमेश्वर के हाथ से रचा गया, अर्थात् परमेश्वर के वचन से, क्योंकि "सब वस्तुएँ उसके द्वारा बनाई गईं,"(5) और प्रभु ने पृथ्वी से धूलि ली और मनुष्य को रचा; वैसे ही वह जो वचन है, आदम को अपने में समेटते हुए, ठीक से एक जन्म पाया, जो उसे आदम को [अपने में] इकट्ठा करने के योग्य बनाए, मरियम से, जो अभी तक कुँवारी थी। यदि, तब, 1 आदम का पिता एक मनुष्य होता, और वह मानव बीज से जन्मा होता, तो यह कहना उचित होता कि 2 आदम यूसुफ से उत्पन्न हुआ। परन्तु यदि पूर्व वाला धूलि से लिया गया, और परमेश्वर उसका बनाने वाला था, तो यह आवश्यक था कि बाद वाला भी, अपने में समेटते हुए, पूर्व वाले के साथ अपनी उत्पत्ति के विषय में समानता रखने के लिये, परमेश्वर द्वारा मनुष्य के रूप में रचा जाए। तो, परमेश्वर ने फिर धूलि क्यों नहीं ली, परन्तु ऐसा किया कि रचना मरियम से बने? यह इसलिये था कि दूसरी रचना अस्तित्व में न बुलाई जाए, और न कोई और जिसे बचाया [जाना आवश्यक हो], परन्तु वही रचना समेटी जाए [मसीह में जैसी आदम में थी], समानता सुरक्षित रखकर।
अध्याय बाईस.--मसीह ने वास्तविक शरीर धारण किया, कुँवारी से गर्भ में आया और जन्मा।
1. इसलिए, जो आरोप लगाते हैं कि उसने कुँवारी से कुछ नहीं लिया वे बहुत भूल करते हैं, [क्योंकि,] शरीर के निज भाग को फेंक देने के लिये, वे [उसके और आदम के बीच] समानता को भी अस्वीकार करते हैं। क्योंकि यदि पृथ्वी से [निकला] एक को सचमुच परमेश्वर के हाथ और कारीगरी दोनों से रचना और सत्ता मिली, परन्तु दूसरे को परमेश्वर के हाथ और कारीगरी से नहीं, तो जो पूर्व वाले के स्वरूप और समानता के अनुसार बनाया गया उसने, उस दशा में, मनुष्य की समानता नहीं रखी, और वह असंगत रचना का टुकड़ा प्रतीत होना चाहिए, जिसके पास वह अपनी बुद्धि दिखाए उसके पास कुछ नहीं। परन्तु यह कहना है, कि वह मनुष्य न होते हुए भी कल्पित रूप से मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, और कि वह मनुष्य से कुछ न लेते हुए मनुष्य बनाया गया। क्योंकि यदि उसने एक मानव से शरीर की सत्ता नहीं पाई, तो वह न मनुष्य बना और न मनुष्य का पुत्र; और यदि वह वह नहीं बनाया गया जो हम थे, तो उसने जो सहा और सहन किया उस में उसने कोई बड़ी बात नहीं की। परन्तु हर एक मानेगा कि हम पृथ्वी से लिए गए शरीर, और परमेश्वर से आत्मा पाने वाले प्राण [से बने] हैं। इसलिए, परमेश्वर का वचन यह बनाया गया, अपनी कारीगरी को अपने में समेटते हुए; और इस कारण वह अपने आप को मनुष्य का पुत्र मानता है, और "नम्र लोगों को" आशीष देता है, "क्योंकि वे पृथ्वी के वारिस होंगे।"(6) प्रेरित पौलुस, और भी, गलातियों की पत्री में, स्पष्ट घोषणा करता है, "परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा, जो स्त्री से जन्मा।"(7) और फिर, रोमियों की उस में, वह कहता है, "उसके पुत्र के विषय में, जो शरीर के अनुसार दाऊद के बीज से जन्मा, जो सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहराया गया, पवित्रता की आत्मा के अनुसार, मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा, हमारे प्रभु यीशु मसीह।"(8)
2.(9) उस दशा में मरियम में उसका उतरना भी व्यर्थ है; क्योंकि यदि वह उस से कुछ न लेना होता तो वह उस में क्यों उतरा? और भी, यदि उसने मरियम से कुछ नहीं लिया होता, तो वह पृथ्वी से निकले उन प्रकार के भोजन का कभी उपयोग न करता, जिन से वह शरीर पोषित होता है जो पृथ्वी से लिया गया है; और न वह भूखा होता, उन चालीस दिनों का उपवास करते हुए, मूसा और एलियाह के समान, जब तक उसका शरीर अपने उचित पोषण की लालसा न करता; और न, फिर, उसका शिष्य यूहन्ना, उसके विषय में लिखते हुए, कहता, "परन्तु यीशु, यात्रा से थककर, [विश्राम के लिये] बैठा था;"(10) और न दाऊद उसके विषय में पहले से प्रचार करता, "उन्होंने मेरे घावों के दुःख को बढ़ा दिया है;"(11) और न वह लाजर पर रोता, और न रक्त की बड़ी बूँदें पसीजता; और न घोषित करता, "मेरा प्राण अत्यन्त उदास है;"(12) और न, जब उसकी पसली बेधी गई, वहाँ होता
रक्त और जल निकल आया होता। क्योंकि ये सब उस शरीर के चिह्न हैं जो पृथ्वी से लिया गया था, जिसे उसने अपने में समेटा था, अपनी कारीगरी के लिये उद्धार लाते हुए।
3. इसलिये लूका दिखाता है कि वह वंशावली जो हमारे प्रभु की उत्पत्ति को आदम तक पीछे ले जाती है बहत्तर पीढ़ियाँ रखती है, अन्त को आदि से जोड़ते हुए, और यह संकेत करते हुए कि वही है जिसने आदम से नीचे छिटके सब जातियों को, और मनुष्यों की सब भाषाओं और पीढ़ियों को, आदम स्वयं के साथ, अपने में समेटा है। इस से भी आदम स्वयं पौलुस द्वारा "उसका प्रतिरूप जो आने वाला था" कहा गया,(1) क्योंकि वचन, सब वस्तुओं का बनाने वाला, मानव जाति की भावी प्रबन्ध को, जो परमेश्वर के पुत्र से जुड़ी थी, अपने लिये पहले से रच चुका था; परमेश्वर ने पहले से ठहराया कि 1 मनुष्य पशु-स्वभाव का हो, इस दृष्टि से, कि वह आत्मिक जन द्वारा बचाया जाए। क्योंकि जब उसका उद्धार करने वाले प्राणी के रूप में पूर्व-अस्तित्व था, तो यह आवश्यक था कि जो बचाया जा सके वह भी अस्तित्व में बुलाया जाए, कि बचाने वाला प्राणी व्यर्थ न रहे।
4. इस युक्ति के अनुसार, कुँवारी मरियम आज्ञाकारी पाई जाती है, कहती हुई, "देख प्रभु की दासी; तेरे वचन के अनुसार मेरे लिये हो।"(2) परन्तु हव्वा आज्ञा-उल्लंघन करने वाली थी; क्योंकि जब वह अभी कुँवारी थी तब उसने आज्ञा नहीं मानी। और जैसे वह, सचमुच पति आदम को रखती हुई, तौभी अभी कुँवारी थी (क्योंकि अदन में "वे दोनों नंगे थे, और लजाते नहीं थे,"(3) क्योंकि वे, थोड़े समय पहले रचे गए, सन्तान उत्पन्न करने को नहीं समझते थे: क्योंकि यह आवश्यक था कि वे पहले वयस्क आयु को आएँ,(4) और तब उस समय से आगे बढ़ें), आज्ञा-उल्लंघन करने वाली होकर, मृत्यु का कारण बनाई गई, अपने लिये भी और समस्त मानव जाति के लिये भी; वैसे ही मरियम ने भी, एक पुरुष को [अपने से] मंगनी किया हुआ रखती हुई, और तौभी कुँवारी होकर, आज्ञा मानकर, उद्धार का कारण बनी, अपने लिये भी और समस्त मानव जाति के लिये भी। और इस कारण व्यवस्था एक पुरुष से मंगनी की हुई स्त्री को, जिसने उससे मंगनी की उसकी पत्नी कहती है, यद्यपि वह अभी कुँवारी थी; इस प्रकार मरियम से हव्वा की ओर पीछे के संकेत को दिखाते हुए, क्योंकि जो जोड़ा गया है वह और प्रकार से अलग नहीं किया जा सकता था, सिवाय उस क्रम के उलटने से जिस से ये एकता के बन्धन उत्पन्न हुए थे; s ताकि पहले के बन्धन बाद वाले से रद्द हों, कि बाद वाला पहले वाले को फिर स्वतन्त्र करे।
और सचमुच यह हुआ है कि 1 वाचा 2 बन्धन से छूटती है, परन्तु 2 बन्धन रद्द किए गए 1 के स्थान को लेता है।(6) इस कारण प्रभु ने घोषित किया कि 1 सचमुच अन्तिम होगा, और अन्तिम 1 होगा।(7) और भविष्यद्वक्ता भी वही संकेत करता है, कहता हुआ, "पिताओं के स्थान पर, सन्तान तेरे लिये जन्मी हैं।"(8) क्योंकि प्रभु, "मरे हुओं में से 1जा" जन्म लेकर,(9) और प्राचीन पिताओं को अपनी गोद में लेते हुए, उन्हें परमेश्वर के जीवन में नया जन्म दिया है, वह स्वयं जीवितों का आदि बना है, जैसे आदम मरने वालों का आदि बना।(10) इसलिये लूका ने भी, वंशावली को प्रभु से आरम्भ करके, उसे आदम तक पीछे ले गया, यह दिखाते हुए कि वही था जिसने उन्हें जीवन के सुसमाचार में नया जन्म दिया, वे उसे नहीं। और इस प्रकार यह भी हुआ कि हव्वा की आज्ञा-उल्लंघन की गाँठ मरियम की आज्ञाकारिता से खुल गई। क्योंकि जो कुँवारी हव्वा ने अविश्वास के द्वारा कसकर बाँधा था, उसे कुँवारी मरियम ने विश्वास के द्वारा स्वतन्त्र किया।
अध्याय तेईस.--तातियान के विरोध में तर्क, यह दिखाते हुए कि ईश्वरीय न्याय और दया के अनुकूल था कि 1 आदम उस उद्धार में पहले भागी हो जो मसीह द्वारा सब को अर्पित है।
1. इसलिए यह आवश्यक था, कि प्रभु, खोई हुई भेड़ के पास आकर, और इतनी व्यापक प्रबन्ध का समेटना करते हुए, और अपनी कारीगरी को ढूँढ़ते हुए, उसी मनुष्य को बचाए जो उसके स्वरूप और समानता के अनुसार रचा गया था, अर्थात् आदम को, उसकी निन्दा के समयों को पूरा करते हुए, जो आज्ञा-उल्लंघन के द्वारा लगी थी,--[समय] "जिन्हें पिता ने अपनी सामर्थ्य में रखा था।"(11) [यह आवश्यक था,] यह भी, क्योंकि मनुष्य के विषय में उद्धार की समस्त व्यवस्था पिता की सुइच्छा के अनुसार हुई, कि परमेश्वर जीता न जाए, और न उसकी बुद्धि घटाई जाए, [उसकी सृष्टि के अनुमान में।] क्योंकि यदि मनुष्य, जो जीने के लिये परमेश्वर द्वारा रचा गया था, जीवन खोने के बाद, उस सर्प द्वारा घायल होकर जिसने उसे बिगाड़ा था, फिर जीवन को न लौटता, परन्तु मृत्यु के लिये सर्वथा [और सदा के लिये] छोड़ दिया जाता, तो परमेश्वर [उस दशा में] जीत लिया गया होता, और सर्प की दुष्टता परमेश्वर की इच्छा पर प्रबल होती। परन्तु क्योंकि परमेश्वर अजेय और धीरजवन्त है, उसने सचमुच मनुष्य के सुधार और सब की परीक्षा के विषय में अपने आप को धीरजवन्त दिखाया, जैसा मैं पहले ही
देख चुका हूँ; और 2 मनुष्य के द्वारा उसने बलवान को बाँधा, और उसका माल लूट लिया,(1) और मृत्यु को मिटा दिया, उस मनुष्य को जीवित करते हुए जो मृत्यु की दशा में था। क्योंकि पहले आदम उसके (शैतान के) अधिकार में एक पात्र बन गया, जिसे उसने अपनी शक्ति के अधीन भी रखा, अर्थात्, उस पर अन्याय से पाप लाकर, और अमरता के बहाने उस पर मृत्यु लादते हुए। क्योंकि, यह प्रतिज्ञा करते हुए कि वे देवताओं के समान होंगे, जो उसके लिये किसी प्रकार सम्भव नहीं था, उसने उन में मृत्यु उत्पन्न की: इसलिये जिसने मनुष्य को बन्दी बनाया, वह अपनी बारी में परमेश्वर द्वारा न्याय से बन्दी बनाया गया; परन्तु मनुष्य, जो बन्दी बनाया गया था, दण्ड के बन्धनों से छुड़ाया गया।
2. परन्तु यह आदम है, यदि सत्य कहा जाए, 1 रचा गया मनुष्य, जिसके विषय में पवित्रशास्त्र कहता है कि प्रभु ने कहा, "हम मनुष्य को अपने स्वरूप और समानता के अनुसार बनाएँ;"(2) और हम सब उसी से हैं: और क्योंकि हम उसी से हैं, इसलिये हम सब ने उसकी पदवी का उत्तराधिकार पाया है। परन्तु क्योंकि मनुष्य बचाया जाता है, यह उचित है कि जो मूल मनुष्य रचा गया वह बचाया जाए। क्योंकि यह बहुत असंगत है मानना, कि जो शत्रु से इतना गहरा घायल हुआ, और बन्दी होने वाला 1 था, वह उस से नहीं छुड़ाया गया जिसने शत्रु को जीता, परन्तु उसके बच्चे छुड़ाए गए,- -जिन्हें उसने उसी बन्दी दशा में जना था। और न शत्रु अभी तक जीता हुआ प्रतीत होता, यदि पुरानी लूट उसके पास रहती। एक दृष्टान्त देने के लिये: यदि एक शत्रु बल ने कुछ [शत्रुओं] को जीत लिया होता, उन्हें बाँधा होता, और बन्दी ले गया होता, और बहुत समय तक दासत्व में रखा होता, कि वे उन में सन्तान जनें; और कोई, दास बनाए गए लोगों पर करुणा करके, इसी शत्रु बल को जीत लेता; वह निश्चय ही न्याय से न चलता, यदि वह बन्दी ले जाए गए लोगों के बच्चों को, उनके पिताओं को दास बनाने वालों के वश से, छुड़ाता, परन्तु इन बाद वालों को, जिन्होंने बन्दी होने का कार्य सहा, उनके शत्रुओं के अधीन छोड़ देता,--वे भी, जिनके ही कारण वह इस प्रतिशोध पर चला था,-- बच्चे अपने पिताओं के कारण के बदले के द्वारा स्वतन्त्रता पाते हुए, परन्तु नहीं(3) कि उनके पिता, जिन्होंने बन्दी होने का कार्य स्वयं सहा, [दासत्व में] छोड़ दिए जाएँ। क्योंकि परमेश्वर न सामर्थ्य से रहित है और न न्याय से, जिसने मनुष्य को सहायता दी है, और उसे अपनी स्वतन्त्रता को लौटाया है।
3. इस कारण भी, आदम के अपराध करने के तुरन्त बाद, जैसा पवित्रशास्त्र बताता है, उसने आदम पर व्यक्तिगत रूप से कोई शाप नहीं कहा, परन्तु भूमि पर, उसके कामों के विषय में, जैसा पूर्वजों में से एक व्यक्ति ने देखा है: "परमेश्वर ने सचमुच शाप को पृथ्वी पर डाल दिया, कि वह मनुष्य में न रहे।"(4) परन्तु मनुष्य ने, अपने अपराध के दण्ड के रूप में, पृथ्वी जोतने का श्रमसाध्य काम पाया, और अपने मुख के पसीने में रोटी खाना, और उस धूलि को लौटना जहाँ से वह लिया गया था। वैसे ही स्त्री ने भी [पाया] श्रम, और कष्ट, और कराह, और प्रसव की पीड़ा, और अधीनता की दशा, अर्थात्, कि वह अपने पति की सेवा करे; ताकि वे परमेश्वर के शाप दिए जाने पर सर्वथा नाश न हों, और न, बिना डाँटे रहकर, परमेश्वर को तुच्छ जानने को ले जाएँ। परन्तु शाप अपनी सारी पूर्णता में उस सर्प पर पड़ा, जिसने उन्हें बहकाया था। "और परमेश्वर," घोषित है, "ने सर्प से कहा: क्योंकि तूने यह किया है, cubed तू है सब पशुओं से, और पृथ्वी के सब जन्तुओं से ऊपर।"(5) और यही बात प्रभु सुसमाचार में भी कहता है, जो बाएँ हाथ पर पाए जाते हैं उन से: "मुझ से चले जाओ, हे शापितों, सदा: बने रहने वाली आग में, जिसे मेरे पिता ने शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार किया है;"(6) यह दिखाते हुए कि अनन्त आग मूल में मनुष्य के लिये तैयार नहीं की गई थी, परन्तु उसके लिये जिसने मनुष्य को बहकाया, और उसे अपराध कराया--उसके लिये, मैं कहता हूँ, जो धर्मत्याग का प्रधान है, और उन दूतों के लिये जो उसके साथ धर्मत्यागी हुए; जिसे [आग को], निश्चय ही, वे भी न्याय से अनुभव करेंगे, जो उसके समान, दुष्टता के कामों में दृढ़ रहते हैं, मन फिराव के बिना, और अपने पाँव पीछे हटाए बिना।
4. [ये करते हैं](7) जैसे कैन [ने किया, जो], जब उसे परमेश्वर द्वारा शान्त रहने की सम्मति दी गई, क्योंकि उसने उस भाग का न्यायपूर्ण बँटवारा नहीं किया था जिसका उसके भाई को अधिकार था, परन्तु डाह और बैर से सोचा कि वह उस पर प्रभुता कर सकता है, न केवल सहमत नहीं हुआ, परन्तु पाप पर पाप भी जोड़ दिया, अपने काम से अपनी मनःस्थिति दिखाते हुए। क्योंकि जो उसने योजना की थी, उसे उसने व्यवहार में भी रखा: उसने उस पर अत्याचार किया और उसे घात किया; परमेश्वर ने धर्मी को अधर्मी के अधीन किया, कि पूर्व वाला अपने सहे हुए से धर्मी सिद्ध हो, और बाद वाला अपने किए हुए से अधर्मी पकड़ा जाए। और वह इससे भी नरम नहीं हुआ, और न उस बुरे काम पर रुक गया; परन्तु पूछे जाने पर कि उसका भाई कहाँ है, उसने कहा, "मैं नहीं जानता; क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?" अपने उत्तर से [अपनी] दुष्टता को बढ़ाते और भारी करते हुए। क्योंकि यदि भाई को घात करना दुष्ट है, तो इससे बहुत बुरा है सर्वज्ञ परमेश्वर को इस प्रकार ढिठाई और अनादर से उत्तर देना मानो वह उससे युद्ध कर सकता हो। और इसके लिये उसने स्वयं अपने साथ एक शाप उठाया, क्योंकि उसने मुफ्त में लाया
पाप की एक भेंट, परमेश्वर के प्रति कोई श्रद्धा न रखकर, और न भाई-हत्या के काम से लज्जित होकर।(1)
5. आदम का मामला, तथापि, इस से कोई समानता नहीं रखता था, परन्तु सर्वथा भिन्न था। क्योंकि, अमरता के बहाने दूसरे के द्वारा बहकाए जाकर, वह तुरन्त भय से पकड़ लिया जाता है, और अपने आप को छिपाता है; ऐसा नहीं कि वह परमेश्वर से बच निकल सकता था; परन्तु, उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने पर लज्जा की दशा में, वह परमेश्वर के सामने आने और उससे बातचीत करने के अयोग्य अनुभव करता है। अब, "प्रभु का भय ज्ञान का आरम्भ है;"(2) पाप की चेतना मन फिराव की ओर ले जाती है, और परमेश्वर पश्चात्ताप करने वालों पर अपनी करुणा देता है। क्योंकि [आदम] ने अपने आचरण से अपना पश्चात्ताप दिखाया, कमरबन्द [जिसका उसने उपयोग किया] के द्वारा, अंजीर के पत्तों से अपने आप को ढाँपते हुए, जबकि और बहुत पत्ते थे, जो उसके शरीर को कम मात्रा में चुभोते। तथापि उसने, अपनी आज्ञा-उल्लंघन के अनुरूप वस्त्र अपनाया, परमेश्वर के भय से डरते हुए; और अपने शरीर की भटकती, कामुक प्रवृत्ति का विरोध करते हुए (क्योंकि उसने अपना स्वाभाविक स्वभाव और बालक-सा मन खो दिया था, और बुरी वस्तुओं के ज्ञान को आ गया था), उसने अपने और अपनी पत्नी पर संयम की लगाम बाँधी, परमेश्वर से डरते हुए, और उसके आने की बाट जोहते हुए, और मानो, कुछ ऐसी बात [इस प्रकार] दिखाते हुए: क्योंकि, वह कहता है, मैंने आज्ञा-उल्लंघन से पवित्रता का वह वस्त्र खो दिया जो मुझे आत्मा से मिला था, मैं अब यह भी मानता हूँ कि मैं इस स्वभाव के आवरण के योग्य हूँ, जो कोई सुख नहीं देता, परन्तु जो कुतरता है इस वस्त्र को सदा रखे रहे हैं, इस प्रकार अपने आप को दीन करते हुए, यदि परमेश्वर, जो दयालु है, उन्हें अंजीर के पत्तों के स्थान पर खाल के अंगरखे न पहनाता। इस उद्देश्य से भी, वह उन से पूछताछ करता है, कि दोष स्त्री पर पड़े; और फिर, वह उससे पूछताछ करता है, कि वह दोष को सर्प पर डाले। क्योंकि उसने जो हुआ था उसे बताया।
"सर्प," वह कहती है, "ने मुझे बहकाया, और मैंने खाया।"(3) परन्तु उसने सर्प से कोई प्रश्न नहीं किया; क्योंकि वह जानता था कि वह दोषी काम में मुख्य चलाने वाला था; परन्तु उसने 1 अवसर में उस पर शाप कहा, कि वह मनुष्य पर घटी हुई डाँट के साथ पड़े। क्योंकि परमेश्वर ने उसे घृणा की जिसने मनुष्य को भटकाया, परन्तु क्रम से, और थोड़ा थोड़ा करके, उसने बहकाए गए पर करुणा दिखाई।
6. इसलिये उसने उसे अदन से निकाल दिया, और जीवन के वृक्ष से उसे दूर हटा दिया, इसलिये नहीं कि उसने जीवन के वृक्ष के विषय में उससे डाह की, जैसा कुछ लोग दृढ़ करने का साहस करते हैं, परन्तु क्योंकि उसने उस पर तरस खाया, [और नहीं चाहा] कि वह सदा पापी बना रहे, और न कि जो पाप उसे घेरे था वह अमर हो, और बुराई अन्तहीन और असाध्य हो। परन्तु उसने उसके [दशा के] पाप पर एक सीमा रखी, मृत्यु को बीच में रखकर, और इस प्रकार पाप को रुकवाते हुए,(4) शरीर के गलने से उसे अन्त देते हुए, जो पृथ्वी में होना था, ताकि मनुष्य, अन्त में पाप के लिये जीना छोड़कर, और उसके लिये मरकर, परमेश्वर के लिये जीना आरम्भ करे।
7. इस अन्त के लिये उसने सर्प और स्त्री और उसके बीज के बीच बैर डाला, वे उसे परस्पर बनाए रखते हुए: वह, जिसके पाँव का तलवा डसा जाए, शत्रु के सिर पर लात मारने की सामर्थ्य भी रखता है; परन्तु दूसरा काटता, मारता, और मनुष्य के पाँवों को रोकता रहा, जब तक वह बीज न आया जो उसके सिर को रौंदने के लिये ठहराया गया था,--जो मरियम से जन्मा, जिसके विषय में भविष्यद्वक्ता कहता है: "तू नाग और बसिलिस्क पर लात मारेगा; तू सिंह और अजगर को रौंदेगा;"(3)--यह दिखाते हुए कि पाप, जो मनुष्य के विरुद्ध खड़ा किया गया और फैलाया गया, और जिसने उसे मृत्यु के अधीन किया, अपनी सामर्थ्य से वंचित हो, मृत्यु के साथ, जो [मनुष्यों पर] राज्य करती है; और कि सिंह, अर्थात् मसीह-विरोधी, अन्तिम दिनों में मानव जाति के विरुद्ध उग्र, उसके द्वारा रौंदा जाए; और कि वह "अजगर को, उस पुराने सर्प को"(6) बाँधे और उसे मनुष्य की शक्ति के अधीन करे, जो जीता गया था(7) ताकि उसकी सारी शक्ति रौंदी जाए। अब आदम जीता गया था, सारा जीवन उस से ले लिया गया था: इसलिये, जब शत्रु अपनी बारी में जीता गया, आदम ने नया जीवन पाया; और अन्तिम शत्रु, मृत्यु, नाश होती है,(8) जिसने पहले मनुष्य को अधिकार में लिया था। इसलिए, जब मनुष्य छुड़ाया गया है, "जो लिखा है वह होगा, मृत्यु जय में निगल ली गई है। हे मृत्यु डंक?"(9) यह न्याय के साथ नहीं कहा जा सकता था, यदि वह मनुष्य, जिस पर मृत्यु ने पहले प्रभुता पाई, स्वतन्त्र न किया जाता। क्योंकि उसका उद्धार मृत्यु का नाश है। इसलिए जब प्रभु मनुष्य को जीवित करता है, अर्थात् आदम को, मृत्यु उसी समय नाश होती है।
8. इसलिए सब झूठ बोलते हैं जो उसके (आदम के) उद्धार को नहीं मानते, अपने आप को सदा के लिये जीवन से बाहर बन्द करते हुए, इस में कि वे विश्वास नहीं करते कि जो भेड़ खो गई थी वह पाई गई है।(10) क्योंकि यदि वह नहीं पाई गई है, तो समस्त मानव जाति अभी भी विनाश की दशा में पकड़ी हुई है। इसलिए झूठा है वह, मनुष्य जिसने पहले यह विचार आरम्भ किया, या बल्कि, यह अज्ञान और अन्धापन--तातियान।(11)
जैसा मैं पहले ही दिखा चुका हूँ, इस मनुष्य ने अपने आप को सब विधर्मियों के साथ फँसा लिया।(1) यह मत, तथापि, उसी के द्वारा गढ़ा गया है, कि, शेष से स्वतन्त्र रूप से, कुछ नया प्रवेश कराके, और व्यर्थ बोलकर। वह अपने लिये विश्वास से रहित सुनने वालों को प्राप्त करे, शिक्षक माना जाने का दिखावा करते हुए, और समय-समय पर पौलुस द्वारा प्रायः [प्रयोग किए गए] इस प्रकार के कथनों का प्रयोग करने का यत्न करते हुए: "आदम में हम सब मरते हैं;"(2) तथापि अज्ञानी, कि "जहाँ पाप बढ़ा, वहाँ अनुग्रह और भी अधिक बढ़ा।"(3) क्योंकि यह, तब, स्पष्ट दिखाया गया है, उसके सब शिष्य लज्जित हों, और वे आदम के विषय में झगड़ें(4), मानो उन्हें कुछ बड़ा लाभ मिलेगा यदि वह न बचाया जाए; जब वे [उस से] और कुछ लाभ नहीं पाते, जैसे सर्प भी मनुष्य को [पाप करने को] समझाते समय लाभ नहीं पाया, इस फल को छोड़कर, कि उसने उसे अपराधी सिद्ध किया, मनुष्य को अपनी धर्मत्याग के 1 फल के रूप में पाते हुए।(5) परन्तु वह परमेश्वर की सामर्थ्य को नहीं जानता था।(6) वैसे ही जो आदम के उद्धार को नहीं मानते वे कुछ नहीं पाते, इसे छोड़कर, कि वे अपने आप को सत्य से विधर्मी और धर्मत्यागी बनाते हैं, और अपने आप को सर्प और मृत्यु के पक्षधर दिखाते हैं।
अध्याय चौबीस.--ग्नोस्टिक अभक्ति के विरुद्ध उसके सब पक्षों के अधीन जोड़े गए विभिन्न तर्कों का समेटना। विधर्मी, शिक्षा के हर झोंके से उछाले जाते हुए, कलीसिया की एकरूप शिक्षा से विरोध पाते हैं, जो सदा वैसी ही रहती है, और अपने साथ मेल रखती है।
1. इस प्रकार, तब, ये सब मनुष्य उघाड़े गए हैं, जो हमारे बनाने वाले और रचने वाले के विषय में अभक्त शिक्षाएँ लाते हैं, जिसने इस जगत को भी रचा। और जिसके ऊपर और कोई परमेश्वर नहीं है और वे अपने ही तर्कों से उलट दिए गए हैं जो हमारे प्रभु के तत्व के विषय में, और उस प्रबन्ध के विषय में जो उसने अपनी सृष्टि मनुष्य के लिये पूरी की, झूठ सिखाते हैं। परन्तु [दूसरी ओर, दिखाया गया है], कि कलीसिया का प्रचार हर जगह मेल खाता है, और सम मार्ग में चलता रहता है, और भविष्यद्वक्ताओं, प्रेरितों, और सब शिष्यों से गवाही पाता है--जैसा मैंने सिद्ध किया है--आदि, मध्य, और अन्त [में वालों] के द्वारा,(7) और परमेश्वर की समस्त प्रबन्ध के द्वारा, और उस सुस्थापित व्यवस्था के द्वारा जो मनुष्य के उद्धार की ओर झुकती है(8), अर्थात् हमारा विश्वास; जिसे, कलीसिया से पाकर, हम सुरक्षित रखते हैं, और जो सदा, परमेश्वर के आत्मा के द्वारा, अपनी जवानी को नया करता है, मानो उत्तम पात्र में कोई बहुमूल्य धरोहर हो, उसे रखने वाले पात्र को भी अपनी जवानी नया करने देता है। क्योंकि परमेश्वर का यह दान कलीसिया को सौंपा गया है, जैसे श्वास 1 रचे गए मनुष्य को सौंपी गई थी,(9) इस उद्देश्य से, कि उसे पाने वाले सब अंग जीवित हों; और मसीह के साथ सहभागिता का [साधन] उस में सब ओर बाँटा गया है, अर्थात् पवित्र आत्मा, अविनाश का बयाना, हमारे विश्वास को दृढ़ करने का साधन, और परमेश्वर तक चढ़ने की सीढ़ी। "क्योंकि कलीसिया में," कहा गया है, "परमेश्वर ने प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, शिक्षक ठहराए हैं,"(10) और अन्य सब साधन जिन के द्वारा आत्मा काम करता है; जिन में वे सब भागी नहीं होते जो अपने आप को कलीसिया से नहीं जोड़ते, परन्तु अपनी टेढ़ी मतों और कुख्यात चाल से अपने आप को जीवन से वंचित करते हैं।
क्योंकि जहाँ कलीसिया है, वहाँ परमेश्वर का आत्मा है; और जहाँ परमेश्वर का आत्मा है, वहाँ कलीसिया है, और हर प्रकार का अनुग्रह; परन्तु आत्मा सत्य है। इसलिए, जो उस में भागी नहीं होते, वे न माता के स्तनों से जीवन में पोषित होते हैं, और न उस अति स्वच्छ सोते का आनन्द लेते हैं जो मसीह की देह से निकलता है; परन्तु वे अपने लिये पृथ्वी की खाइयों से फूटे हौज(11) खोदते हैं, और कीचड़ से सड़ी जल पीते हैं, कलीसिया के विश्वास से भागते हुए कि वे दोषी न ठहराए जाएँ; और आत्मा को अस्वीकार करते हुए, कि वे शिक्षा न पाएँ।
2. इस प्रकार सत्य से अलग किए गए, वे योग्य रीति से सब भ्रम में लोटते हैं, उससे इधर-उधर उछाले जाते हुए, भिन्न समयों में उन्हीं बातों के विषय में भिन्न विचार करते हुए, और कभी सुस्थापित ज्ञान तक न पहुँचते हुए, सत्य के शिष्य होने से अधिक शब्दों के कुतर्कवादी होने के लिये उत्सुक। क्योंकि वे एक चट्टान पर नहीं, परन्तु बालू पर स्थापित हुए हैं, जिसमें अपने में पत्थरों की भीड़ है। इसलिये वे बहुत से देवताओं की भी कल्पना करते हैं, और उन्हें सदा [सत्य के] पीछे खोजने का बहाना रहता है (क्योंकि वे अन्धे हैं), परन्तु उसे पाने में कभी सफल नहीं होते। क्योंकि वे सृष्टिकर्ता की निन्दा करते हैं, जो सचमुच परमेश्वर है, जो [सत्य को] पाने की सामर्थ्य भी देता है; यह कल्पना करते हुए कि उन्होंने परमेश्वर के परे दूसरा देव, या दूसरा प्लेरोमा, या दूसरी प्रबन्ध पा ली है। इसलिये जो प्रकाश परमेश्वर से है वह भी उन्हें प्रकाशित नहीं करता, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का अनादर और तिरस्कार किया है, उसे तुच्छ गिनते हुए, क्योंकि, अपने प्रेम और अनन्त कृपा के द्वारा, वह मानव ज्ञान की पहुँच में आ गया है (ज्ञान, तथापि, उसकी महानता के विषय में नहीं, · या उसके सार के विषय में--क्योंकि उसके पास नहीं
मनुष्य से नापा या छुआ गया--परन्तु इस प्रकार: कि हम जानें कि जिसने बनाया, और रचा, और उनमें जीवन की श्वास फूँकी, और सृष्टि के द्वारा हमें पालता है, अपने वचन से सब को स्थिर करता है, और अपनी बुद्धि से(1) उन्हें बाँधता है--यही वह है जो एकमात्र सच्चा परमेश्वर है); परन्तु वे उसके ऊपर एक अस्तित्वहीन प्राणी का स्वप्न देखते हैं, ताकि वे उस बड़े परमेश्वर को पा लेनेवाले गिने जाएँ, जिसे कोई, [वे मानते हैं,] मनुष्यजाति के साथ बातचीत करता हुआ, या सांसारिक बातों को चलाता हुआ पहचान नहीं सकता: अर्थात् वे एपिकूरस के परमेश्वर को पा लेते हैं, जो न अपने लिए और न दूसरों के लिए कुछ करता है; अर्थात् वह किसी प्रकार का कोई प्रबन्ध नहीं करता।
अध्याय पच्चीस.--यह जगत एक परमेश्वर के प्रबन्ध से राज्य किया जाता है, जो दुष्टों को दण्ड देने के लिए अनन्त न्याय से, और भक्तों को आशीष देकर उन्हें उद्धार बाँटने के लिए अनन्त भलाई से, दोनों से सम्पन्न है।
1. परमेश्वर फिर भी सब बातों पर प्रबन्ध करता है, और इसलिये वह सम्मति भी देता है; और सम्मति देते समय वह उनके साथ रहता है जो नैतिक अनुशासन पर ध्यान देते हैं।(2) तब यह स्वयं ही निकलता है, कि जिन वस्तुओं की चौकसी और शासन होता है वे अपने शासक को जानें; वे वस्तुएँ निर्बुद्धि या व्यर्थ नहीं हैं, परन्तु उनमें परमेश्वर के प्रबन्ध से आई हुई समझ है। और इसी कारण अन्यजातियों में से कुछ, जो [इन्द्रिय] लालसाओं और भोगविलास के कम अधीन थे, और मूर्तियों के विषय में अन्धविश्वास की ऐसी मात्रा तक नहीं खींचे गए थे, उसके प्रबन्ध से थोड़ा ही सही, परन्तु चलाई गईं, फिर भी इस बात पर विश्वास कर गईं कि उन्हें इस जगत के बनानेवाले को पिता कहना चाहिए, जो सब बातों पर प्रबन्ध करता है, और हमारे जगत के कामों को व्यवस्थित करता है।
2. फिर, कि वे पिता से डाँटने और न्याय करने की शक्ति हटा दें, उसे परमेश्वर के अयोग्य गिनकर, और यह सोचकर कि उन्होंने एक ऐसा परमेश्वर पा लिया है जो क्रोध से रहित और [केवल] भला है, उन्होंने कहा है कि एक [परमेश्वर] न्याय करता है, परन्तु दूसरा उद्धार करता है, अनजाने दोनों देवताओं की बुद्धि और न्याय को हटाते हुए। क्योंकि यदि न्याय करनेवाला भला भी न हो, कि योग्य लोगों पर अनुग्रह रखे, और जिन्हें डाँट चाहिए उनके विरुद्ध डाँट को चलाए, तो वह न तो न्यायप्रिय और न बुद्धिमान न्यायी दिखाई देगा। दूसरी ओर, भला परमेश्वर, यदि वह केवल भला हो, और वह न हो जो उनको परखता है जिन पर वह अपनी भलाई भेजेगा, तो वह न्याय और भलाई की सीमा से बाहर होगा; और उसकी भलाई अधूरी दिखाई देगी, क्योंकि वह सब का उद्धार नहीं करती; [क्योंकि उसे ऐसा करना चाहिए,] यदि वह न्याय के साथ न हो।
3. इसलिये मार्कियन स्वयं, परमेश्वर को दो में बाँटकर, एक को भला और दूसरे को न्याय करनेवाला ठहराकर, वास्तव में दोनों ओर देवत्व को समाप्त कर देता है। क्योंकि जो न्याय करनेवाला है, यदि वह भला न हो, तो वह परमेश्वर नहीं है, क्योंकि जिससे भलाई अनुपस्थित है वह बिलकुल परमेश्वर नहीं है; और फिर, जो भला है, यदि उसमें न्याय की शक्ति न हो, तो वह भी पूर्ववाले के समान [हानि] सहता है, अपने देवत्व के स्वरूप से वंचित होकर। और वे सब के पिता को बुद्धिमान कैसे कह सकते हैं, यदि वे उसे न्याय की क्षमता नहीं देते? क्योंकि यदि वह बुद्धिमान है, तो वह [औरों को] परखनेवाला भी है; परन्तु न्याय की शक्ति उसे है जो परखता है, और न्याय न्याय की क्षमता के पीछे आता है, कि वह न्यायपूर्ण निष्कर्ष तक पहुँचे; न्याय निर्णय को बुलाता है, और निर्णय, जब वह न्याय के साथ पूरा किया जाता है, बुद्धि तक चला जाएगा। इसलिये पिता बुद्धि में सब मनुष्य और स्वर्गदूत की बुद्धि से बढ़कर होगा, क्योंकि वह प्रभु है, और न्यायाधीश है, और धर्मी है, और सब पर शासक है। क्योंकि वह भला है, और दयालु है, और धीरजवाला है, और जिसका उद्धार करना चाहिए उसका उद्धार करता है; और न्याय के काम में(3) भलाई उसे नहीं छोड़ती, और न उसकी बुद्धि घटती है; क्योंकि वह उनका उद्धार करता है जिनका उद्धार करना चाहिए, और न्याय के योग्य लोगों का न्याय करता है। वह अपने को निर्दय न्यायप्रिय भी नहीं दिखाता; क्योंकि उसकी भलाई, निःसन्देह, आगे चलती है, और प्रथम स्थान लेती है।
4. इसलिये वह परमेश्वर, जो कृपा से अपना सूर्य सब पर उदय करता है,(4) और धर्मी और अधर्मी पर वर्षा भेजता है, उनका न्याय करेगा, जिन्होंने उसकी समान रीति से बाँटी हुई कृपा का आनन्द लेकर, उसके दान की महिमा के योग्य जीवन नहीं बिताया; परन्तु जिन्होंने उसकी कृपा के विरोध में, लम्पटता और विलास में अपने दिन बिताए, और इसके सिवा, जिसने उन पर इतने बड़े उपकार किए उसकी निन्दा भी की।
5. प्लेटो इन मनुष्यों से अधिक धर्मनिष्ठ ठहरता है, क्योंकि उसने माना कि वही परमेश्वर न्यायी और भला दोनों है, सब बातों पर अधिकार रखता है, और स्वयं न्याय करता है, इस प्रकार कहते हुए, "और परमेश्वर निश्चय, जैसा कि वह प्राचीन वचन भी है, सब विद्यमान वस्तुओं का आदि, अन्त, और मध्य रखता है, उनकी प्रकृति के अनुसार उनके चारों ओर चलते हुए सब कुछ ठीक करता है; परन्तु बदला देनेवाला न्याय सदा उसके पीछे रहता है उन लोगों के विरुद्ध जो ईश्वरीय व्यवस्था से हट जाते हैं।"(5) फिर, वह दिखाता है कि जगत का बनानेवाला और रचनेवाला भला है। "और भले के विषय में," वह कहता है, "किसी भी बात के विषय में डाह कभी नहीं उपजती;"(6) इस प्रकार परमेश्वर की भलाई को जगत की सृष्टि का आरम्भ और कारण ठहराता है, परन्तु अज्ञान को नहीं, और न भटकते एयोन को, और न उस
न्यूनता का परिणाम, और न रोती और विलाप करती माता, और न दूसरा परमेश्वर या पिता।
6. उनकी माता उन पर विलाप करे, यह ठीक है, क्योंकि वे ऐसी बातें गर्भ में धरने और गढ़ने में समर्थ हैं उन्होंने अपने ही विरुद्ध यह झूठ योग्य रीति से कहा है, कि उनकी माता प्लेरोमा से परे है, अर्थात् परमेश्वर के ज्ञान से परे, और कि उनकी सारी भीड़(1) एक निराकार और कच्चा गर्भपात हो गई: क्योंकि वह सत्य में से कुछ नहीं पकड़ती; वह शून्य और अन्धकार में गिरती है: क्योंकि उनकी बुद्धि (सोफिया) शून्य थी, और अन्धकार में लिपटी हुई थी; और होरोस ने उसे प्लेरोमा में प्रवेश करने न दिया: क्योंकि आत्मा (अकामोट) ने उन्हें ताजगी के स्थान में ग्रहण नहीं किया। क्योंकि उनके पिता ने, अज्ञान को जन्म देकर, उनमें मृत्यु की पीड़ाएँ उत्पन्न कीं। इन बातों पर [उनके विचारों को] हम गलत नहीं बताते; परन्तु वे स्वयं पुष्टि करते हैं, वे स्वयं सिखाते हैं, वे उनमें गर्व करते हैं, वे अपनी माता के विषय में एक ऊँचा [भेद] कल्पना करते हैं, जिसे वे पिता के बिना जन्मी हुई बताते हैं, अर्थात् परमेश्वर के बिना, एक स्त्री से स्त्री,(2) अर्थात् भ्रम से भ्रष्टता।
7. हम निश्चय प्रार्थना करते हैं कि ये मनुष्य उसी गड्ढे में न रहें जिसे उन्होंने स्वयं खोदा है, परन्तु इस प्रकार की माता से अपने को अलग करें, और बूथुस से निकल जाएँ, और शून्य से दूर खड़े हों, और छाया को छोड़ दें; और कि वे, परमेश्वर की कलीसिया की ओर फिरकर, विधि के अनुसार जन्में, और मसीह उनमें रूप ले, और वे इस जगत के रचनेवाले और बनानेवाले को, एकमात्र सच्चे परमेश्वर और सब के प्रभु को जानें। हम उनकी ओर से इन बातों के लिए प्रार्थना करते हैं, और उनसे अधिक उन्हें प्रेम करते हैं जितना वे अपने को प्रेम करते दिखाई देते हैं। क्योंकि हमारा प्रेम, क्योंकि वह सच्चा है, उनके लिए उद्धार करनेवाला है, यदि वे उसे ग्रहण ही करें। उसकी तुलना एक कड़ी औषध से की जा सकती है, जो घाव के गर्वीले और सड़ते मांस को उखाड़ देती है; क्योंकि वह उनके गर्व और अहंकार को समाप्त करती है। इसलिये हमें थकान न होगी, कि अपनी सारी शक्ति से उनकी ओर हाथ बढ़ाने का यत्न करें। जो पहले ही कहा जा चुका है उसके ऊपर, मैंने प्रभु के वचन लाने के लिए अगली पुस्तक पर टाल दिया है; यदि, मसीह की शिक्षा के द्वारा ही उनमें से कुछ को समझाकर, मैं उन्हें ऐसी भ्रान्ति छोड़ने, और अपने सृष्टिकर्ता की निन्दा करना बन्द करने के लिए समझाने में सफल होऊँ, जो अकेला परमेश्वर भी है, और हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता भी। आमीन।
स्पष्टीकरण
इस अमेरिकी श्रृंखला का सम्पादक सामान्य रूप से अपने को ऐसी यदाकदा और बहुत संक्षिप्त टिप्पणियों तक सीमित रखता है जो विद्यार्थियों और अन्यों को वे व्यावहारिक दृष्टि सुझा सकें जो पिछले युगों के लिए लिखनेवाले लेखकों की स्पष्ट समझ के लिए आवश्यक हैं; एक प्रकार और दशा के मनुष्यों के लिए जो अब नहीं रहे, जिनका एक वर्ग के रूप में लुप्त होना निश्चय ही बहुत कुछ इन लेखों के कारण है। परन्तु उसने प्रत्यक्ष भूलों को सुधारने का अधिकार अपने लिए रखा, विशेषकर उन बातों में जो हमारे अपने समय के प्रश्नों पर असर डालती हैं।
कि हमारे विद्वान अनुवादकों ने पुस्तक तीन. अध्याय तीन. खण्ड 2 के निर्णायक अनुच्छेद का बहुत गलत अनुवाद अकारण मान लिया है, यह मैंने उस स्थान की पादटिप्पणी में दिखाया है। यह स्पष्ट है,(1) क्योंकि वे स्वयं उससे सन्तुष्ट नहीं हैं, और(2) क्योंकि मैंने उसे एक लेखक के अधिक अक्षरशः अनुवाद के साथ अगल-बगल रखा है, जो उनकी पाठ को पसन्द करता यदि वह आलोचना की परीक्षा सह सकता।
अब, लातीनी अनुवाद(1) के रचयिताओं ने वह अस्पष्टता जानबूझकर रची होगी जो अल्ट्रामोन्टेन पक्ष को एक दिखाई देनेवाला लाभ देती है; परन्तु वह ऐसा लाभ है जो जाँचते ही मिट जाता है, इसलिये मैं उसे जैसा है वैसा लेने से सन्तुष्ट हूँ। इरेनायुस के मूल यूनानी के विषय में नाना अनुमान किए गए हैं; परन्तु लातीनी लेखक के तर्क के हर प्रयोजन को पूरा करती है, और पोपपद के दावों के लिए घातक है। मुझे एक रोमन कैथोलिक से, उसी स्थान पर, दिए गए अनुवाद पर लौटने दो, और यह तुरन्त दिखाई देगा। क्योंकि वह इसे इस प्रकार अनुवाद करता है:--
1. इस कलीसिया में, "सदा, जो हर ओर हैं उनके द्वारा, वह परम्परा सुरक्षित रही है
जो प्रेरितों से है।" ऐसी बात वाटिकन महासभा में नवे पियुस को कैसी सुनाई देती? विश्वास उनसे सुरक्षित रहता है जो रोम आते हैं, वहाँ अध्यक्षता करनेवाले बिशप से नहीं।
2. "क्योंकि इस कलीसिया के पास, अधिक बलवन्त प्रधानता के कारण,(1) हर कलीसिया (अर्थात् जो हर ओर विश्वासयोग्य हैं) का आना आवश्यक है।" रोम की महानता, अर्थात् साम्राज्य की राजधानी होने के कारण, स्थानीय कलीसिया को ऊँची प्रतिष्ठा देती है, लियोन से भी, या किसी दूसरी महानगरीय कलीसिया से भी तुलना में। हर कोई रोम जाता है: इसलिये वहाँ तुम्हें हर ओर से (सब कलीसियाओं से) विश्वासयोग्य साक्षी मिलते हैं; और उनकी संयुक्त गवाही ही है जो रोम में शुद्ध प्रेरितीय परम्पराओं को सुरक्षित रखती है।
लातीनी, एक निष्कपट रोमन कैथोलिक द्वारा इस प्रकार अनूदित, पोपपद की सारी व्यवस्था को उलट देती है। नवे पियुस ने अपने बिशपों को, पिछली महासभा में, बताया कि वे अपनी गवाही देने के लिए नहीं बुलाए गए, परन्तु उसकी अचूक आज्ञा सुनने के लिए; "हमें घटाते हुए," पेरिस के महाबिशप ने कहा, "सहायकों की एक सभा तक।"
इन दृष्टियों को कुछ पादटिप्पणियों से सम्भालते हुए, मैं(1) अपना अक्षरशः अनुवाद जोड़ता हूँ, और तब(2) उसी का एक अर्थानुवाद, लातीनी पाठ की कठिन रुकावटों से तर्क को निकालते हुए। तो, इरेनायुस यह कहता है: (a) "क्योंकि हर कलीसिया (अर्थात् सब भागों से विश्वासयोग्य) का इस कलीसिया में इकट्ठा होना आवश्यक है, ऊँचे न्याय-अधिकार के कारण; जिस कलीसिया में, सब स्थानों से आए लोगों के द्वारा, प्रेरितों की परम्परा सुरक्षित रही है।" अथवा, अधिक स्वतन्त्र अनुवाद में: (b) "प्रधान न्याय-अधिकार(2) [साम्राज्य के] के कारण, सब भागों से विश्वासयोग्य, हर कलीसिया का प्रतिनिधित्व करते हुए, रोम जाने और वहाँ इकट्ठा होने के लिए बाध्य हैं; ताकि [इस कलीसिया का यह विशेष गुण है कि], उसमें, प्रेरितों की परम्परा सब कलीसियाओं में से इकट्ठा हुए मसीहियों के द्वारा सुरक्षित रही है।" तब हमारे लेखक के पूरे तर्क को प्रसंग के साथ लेने पर, वह इस पर आता है: "हमें स्थानीय नहीं, सार्वभौमिक, गवाही माँगनी चाहिए। अब, प्रेरितों से स्थापित हर कलीसिया में उनकी परम्पराएँ सौंपी गई हैं; परन्तु, उन सब को इकट्ठा करना थकाऊ काम होगा, यह पर्याप्त हो। उस कलीसिया को लो (जो निकटतम है, और पश्चिम की एकमात्र प्रेरितीय कलीसिया है), रोम की बड़ी और महिमामय कलीसिया, जो वहाँ दो प्रेरितों पतरस और पौलुस के द्वारा स्थापित हुई। उसमें सब कलीसियाओं की परम्पराएँ सुरक्षित रही हैं, क्योंकि हर किसी को साम्राज्य की गद्दी पर जाने के लिए विवश किया जाता है: और इसलिये, सारी कैथोलिक कलीसिया के इन प्रतिनिधियों के द्वारा, प्रेरितीय परम्पराएँ सब रोम में इकट्ठी की गई हैं:(3) और वहाँ जो सुरक्षित है उसमें तुम्हें सब कलीसियाओं का एक समग्र दृश्य मिलता है।" यदि आधुनिक पोपपद की दृष्टियाँ कभी इरेनायुस के मन में आई होतीं, तो यह सारा तर्क कितनी असंगति होता।
वह कहता, "और कहीं जो इकट्ठा हो, उसकी कोई बात नहीं; क्योंकि रोम का बिशप सब कैथोलिक सत्य का अचूक वचन है, और तुम उसे सदा उसके मुख से पाओगे।" यह ध्यान देना चाहिए कि वहाँ सनातन विश्वास निश्चय सुरक्षित रहा, उतने ही समय तक जब तक रोम ने दूसरी कलीसियाओं को इरेनायुस के सिद्धान्त पर अपनी गवाही जोड़ने दी, और इस प्रकार उसे सब कैथोलिक परम्परा का कोष बनाया, जैसा कि "सब के द्वारा, सर्वत्र, और आदि से" गवाही दी गई है। परन्तु यह सब आधुनिक रोमवाद से उलटा दिया गया है। किसी दूसरी कलीसिया को सुना या माना न जाए; परन्तु रोम सब को अपनी शक्ति में ले लेती है, और सब कलीसियाओं को यह ठहरा सकती है कि वे क्या विश्वास करें, चाहे वह कितना भी नया हो, या अपने संस्थापकों और सब पिछले समय के बड़े शिक्षकों की शिक्षाओं में प्राचीनता की धारा के विरुद्ध हो।
इरेनायुस विधर्मों के विरुद्ध
पुस्तक चार।
प्रस्तावना.
1. मेरे अति प्रिय मित्र, मिथ्या ज्ञान का [शीर्षक] पकड़ना और खण्डन नामक इस कार्य की यह चौथी पुस्तक तुझे पहुँचाकर, मैं, जैसा मैंने वचन दिया है, प्रभु के वचनों के द्वारा, जो मैं पहले ही आगे रख चुका हूँ उसमें भार जोड़ूँगा; ताकि तू भी, जैसा तूने माँगा है, मुझ से सर्वत्र सब मिथ्या शिक्षकों का खण्डन करने का उपाय पाए, और उन्हें, हर बात में पीछे हटाए गए, भूल की गहराई में और आगे निकलने न दे, और न अज्ञान के समुद्र में डूबने दे; परन्तु तू, उन्हें सत्य के बन्दरगाह में मोड़कर, उन्हें अपना उद्धार पाने दे।
2. परन्तु जो मनुष्य उनका परिवर्तन अपने ऊपर ले, उसे उनकी पद्धतियों या शिक्षा की योजनाओं का ठीक ज्ञान होना चाहिए। क्योंकि किसी के लिए रोगियों को चंगा करना असम्भव है, यदि उसे रोगियों की बीमारी का ज्ञान न हो। यही कारण था कि मेरे पूर्ववर्ती--मुझ से बहुत श्रेष्ठ मनुष्य भी--फिर भी वैलेन्तीनियों का सन्तोषजनक खण्डन न कर सके, क्योंकि वे इन मनुष्यों की पद्धति से अनजान थे;(1) जिसे मैंने पूरी सावधानी से पहली पुस्तक में तुझे सौंप दिया है, जिसमें मैंने यह भी दिखाया है कि उनकी शिक्षा सब मिथ्या शिक्षकों का सार है। इसी कारण, दूसरी में, दर्पण के समान, हमें उनकी पूरी पराजय का दृश्य मिला। क्योंकि जो सही विधि से इन मनुष्यों (वैलेन्तीनियों) का विरोध करते हैं, वे [इससे] सब दुष्ट मनवालों का विरोध करते हैं; और जो उन्हें उलट देते हैं, वे वास्तव में हर प्रकार की मिथ्या शिक्षा को उलट देते हैं।
3. क्योंकि उनकी पद्धति सबसे [औरों से] अधिक निन्दापूर्ण है, क्योंकि वे बताते हैं कि बनानेवाला और रचनेवाला, जो एक परमेश्वर है, जैसा मैंने दिखाया है, एक न्यूनता या धर्मत्याग से उत्पन्न हुआ। वे हमारे प्रभु के विरुद्ध भी निन्दा बोलते हैं, यीशु को मसीह से काटकर अलग करके, और मसीह को उद्धारकर्ता से, और फिर उद्धारकर्ता को वचन से, और वचन को एकलौते से। और क्योंकि वे कहते हैं कि सृष्टिकर्ता एक न्यूनता या धर्मत्याग से निकला, वैसे ही उन्होंने यह भी सिखाया कि मसीह और पवित्र आत्मा इस न्यूनता के कारण निकाले गए, और कि उद्धारकर्ता उन एयोनों का फल था जो एक न्यूनता से उत्पन्न हुए; ताकि उनके बीच निन्दा के सिवा कुछ न मिले। तब, पिछली पुस्तक में, इन सब बातों के विषय में प्रेरितों के विचार रखे गए हैं, [इस फल के लिए] कि केवल वे ही नहीं, "जो आदि से वचन के प्रत्यक्षदर्शी और सेवक थे"(2) सत्य के, ऐसी धारणाएँ नहीं रखते थे, परन्तु उन्होंने हमें इन शिक्षाओं से बचना भी प्रचार किया,(3) आत्मा के द्वारा उन निर्बल मनवालों को पहले से देखकर जो बहकाए जाएँगे।(4)
4. क्योंकि जैसा सर्प ने हव्वा को बहकाया, उसे वह वचन देकर जो उसके पास स्वयं न था,(5) वैसे ही ये मनुष्य भी, ऊँचा ज्ञान [रखने का] ढोंग करके, और अकथनीय भेदों से [परिचित होने का] ढोंग करके; और उस प्रवेश का वचन देकर जिसे वे प्लेरोमा के भीतर होना कहते हैं, उन पर विश्वास करनेवालों को मृत्यु में डुबो देते हैं, और उन्हें उसके धर्मत्यागी बनाते हैं जिसने उन्हें बनाया। और उस समय निश्चय, धर्मत्यागी दूत, सर्प के द्वारा मनुष्यजाति की आज्ञा-उल्लंघन को पूरा करके, यह सोचता था कि वह प्रभु की दृष्टि से बच गया; इसलिये परमेश्वर ने उसे रूप(6) और [सर्प का] नाम ठहराया। परन्तु अब, क्योंकि अन्तिम काल [हम पर आए हैं], मनुष्यों में बुराई फैल गई है, जो उन्हें केवल धर्मत्यागी ही नहीं करती, परन्तु बहुत युक्तियों से [शैतान] निन्दकों को खड़ा करता है उसके विरुद्ध उस
सृष्टिकर्ता के, अर्थात्, पहले बताए गए सब मिथ्या शिक्षकों के द्वारा। क्योंकि ये सब, यद्यपि वे भिन्न प्रदेशों से निकलते हैं, और भिन्न [विचार] प्रचार करते हैं, फिर भी उसी निन्दापूर्ण योजना में मिलते हैं, [मनुष्यों को] मृत्यु तक घायल करते हुए, हमारे बनानेवाले और सम्भालनेवाले परमेश्वर के विरुद्ध निन्दा सिखाकर, और मनुष्य के उद्धार को घटाकर। अब मनुष्य प्राण और देह की मिली हुई रचना है, जो परमेश्वर की समानता पर रचा गया, और उसके हाथों से, अर्थात् पुत्र और पवित्र आत्मा से, गढ़ा गया, जिनसे उसने यह भी कहा, "हम मनुष्य को बनाएँ।"(1) तो, यह उसके उद्देश्य है जो हमारे जीवन से डाह करता है, कि मनुष्यों को अपने उद्धार में अविश्वासी, और सृष्टिकर्ता परमेश्वर के विरुद्ध निन्दक बनाए। क्योंकि सब मिथ्या शिक्षक अत्यन्त गम्भीरता से जो कुछ भी आगे रखें, वे अन्त में इस पर आते हैं, कि वे सृष्टिकर्ता की निन्दा करते हैं, और परमेश्वर की कारीगरी के उद्धार को नहीं मानते, जो निश्चय देह ही है; जिसके पक्ष में मैंने अनेक प्रकार से प्रमाणित किया है कि परमेश्वर के पुत्र ने [दया का] सारा आयोजन पूरा किया, और दिखाया है कि पवित्रशास्त्र के द्वारा परमेश्वर कहलानेवाला और कोई नहीं, सब का पिता, और पुत्र, और जो लेपालकपन रखते हैं उनके सिवा।
अध्याय एक.--प्रभु ने एक ही परमेश्वर और पिता को माना।
1. इसलिये, क्योंकि यह निश्चित और स्थिर है, कि आत्मा के द्वारा कोई दूसरा परमेश्वर या प्रभु नहीं बताया गया, उसके सिवा जो, परमेश्वर होकर, सब पर राज्य करता है, अपने वचन के साथ, और जो लेपालकपन की आत्मा पाते हैं उनके साथ,(2) अर्थात् जो एक और सच्चे परमेश्वर पर, और परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं; और वैसे ही कि प्रेरितों ने स्वयं किसी और को परमेश्वर नहीं कहा, या [किसी और को] प्रभु नाम नहीं दिया; और, जो बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, [क्योंकि यह सच है] कि हमारे प्रभु [ने भी ऐसा ही किया], जिसने हमें यह भी आज्ञा दी कि आकाश में रहनेवाले को छोड़ किसी को पिता न मानें, जो एक परमेश्वर और एक पिता है;--वे बातें स्पष्ट रूप से झूठी दिखाई जाती हैं जिन्हें ये ठग और अत्यन्त टेढ़े तार्किक आगे रखते हैं, यह मानते हुए कि जिसे उन्होंने स्वयं गढ़ा है वह स्वभाव से परमेश्वर और पिता दोनों है; परन्तु कि I डेमियुर्ज स्वभाव से न परमेश्वर है और न पिता, परन्तु केवल शिष्टाचार से (वेर्बो तेनुस) ऐसा कहा जाता है, क्योंकि वह सृष्टि पर राज्य करता है, ये टेढ़े कल्पनाकार कहते हैं, अपनी विचारधारा परमेश्वर के विरुद्ध रखकर; और मसीह की शिक्षा को किनारे कर, स्वयं झूठ गढ़कर, वे परमेश्वर के सारे आयोजन के विरुद्ध विवाद करते हैं। क्योंकि वे मानते हैं कि उनके एयोन, और देवता, और पिता, और प्रभु, अपनी माता के साथ और भी आकाश कहलाते हैं, जिसे वे "पृथ्वी" और "यरूशलेम" भी कहते हैं, और उसे और भी बहुत नाम देते हैं।
2. अब यह किसके लिए स्पष्ट नहीं, कि यदि प्रभु बहुत पिताओं और देवताओं को जानता, तो वह अपने शिष्यों को [केवल] एक परमेश्वर जानना,(3) और केवल उसे पिता कहना न सिखाता? परन्तु उसने उन लोगों को, जो केवल वचन से (वेर्बो तेनुस) देवता कहलाते हैं, उससे अलग किया जो सचमुच परमेश्वर है, कि वे उसकी शिक्षा के विषय में न भटकें, और न एक को दूसरे के [भूल से] समझें। और यदि उसने हमें एक सत्ता को पिता और परमेश्वर कहना सिखाया, जबकि वह समय-समय पर स्वयं उसी अर्थ में दूसरे पिताओं और देवताओं को मानता है, तो वह अपने शिष्यों को अपने से भिन्न मार्ग की आज्ञा देता दिखाई देगा। ऐसा आचरण, फिर, अच्छे गुरु का चिह्न नहीं, परन्तु बहकानेवाले और डाह रखनेवाले का। प्रेरित भी, इन मनुष्यों के दिखावे के अनुसार, आज्ञा के उल्लंघनकर्ता ठहरते हैं, क्योंकि वे सृष्टिकर्ता को परमेश्वर, और प्रभु, और पिता मानते हैं, जैसा मैंने दिखाया है--यदि वह अकेला परमेश्वर और पिता नहीं है। इसलिये यीशु उनके लिए ऐसे उल्लंघन का रचयिता और गुरु होगा, क्योंकि उसने आज्ञा दी कि एक सत्ता पिता कही जाए,(4) और इस प्रकार उन पर सृष्टिकर्ता को अपना पिता मानने की आवश्यकता रखी, जैसा दिखाया जा चुका है।
अध्याय दो.--मूसा की और अन्य भविष्यद्वक्ताओं की स्पष्ट गवाही से प्रमाण, जिनके वचन मसीह के वचन हैं, कि एक ही परमेश्वर है, जगत का संस्थापक, जिसका हमारे प्रभु ने प्रचार किया, और जिसे उसने अपना पिता कहा।
1. इसलिये मूसा, सृष्टिकर्ता (डेमियुर्ज) से मिली सारी व्यवस्था का सार करते हुए, व्यवस्थाविवरण में इस प्रकार कहता है: "हे आकाश, कान लगा, और मैं बोलूँगा; और हे पृथ्वी, मेरे मुख के वचन सुन।"(5) फिर, दाऊद यह कहते हुए कि उसकी सहायता प्रभु से आई, दृढ़ता से कहता है: "मेरी सहायता प्रभु से है, जिसने आकाश और पृथ्वी बनाए।"(6) और यशायाह मानता है कि वचन परमेश्वर के द्वारा बोले गए, जिसने आकाश और पृथ्वी बनाए, और उन पर शासन करता है। वह कहता है: "हे आकाश, सुन; और हे पृथ्वी, कान लगा: क्योंकि प्रभु ने कहा है।"(7) और फिर: "प्रभु परमेश्वर यों कहता है, जिसने आकाश को बनाया, और उसे तान दिया; जिसने पृथ्वी को स्थिर किया, और उसमें की वस्तुओं को; और जो उस पर के लोगों को श्वास देता है, और उसमें चलनेवालों को आत्मा देता है।"(8)
2. फिर, हमारे प्रभु यीशु मसीह इसी सत्ता को अपना पिता मानते हैं, जहाँ वह कहते हैं: "मैं
तुझे मानता हूँ, हे पिता, आकाश और पृथ्वी के प्रभु।"(1) वे मनुष्य [इन वचनों से] हमें किस पिता को समझना चाहेंगे, जो पान्डोरा के अत्यन्त टेढ़े तार्किक हैं? क्या वह बूथुस होगा, जिसे उन्होंने अपने से कल्पित किया है; या उनकी माता; या एकलौता? या वह होगा जिसे मार्कियनी या औरों ने परमेश्वर गढ़ा है (जिसे मैंने निश्चय पूरा दिखा दिया है कि वह बिलकुल परमेश्वर नहीं); या वह होगा (जो वास्तव में बात है) आकाश और पृथ्वी का बनानेवाला, जिसका भविष्यद्वक्ताओं ने भी प्रचार किया,--जिसे मसीह भी अपना पिता मानता है,--जिसका व्यवस्था भी यह कहते हुए प्रचार करती है: "हे इस्राएल, सुन; तेरा प्रभु परमेश्वर एक ही परमेश्वर है?"(2)
3. परन्तु क्योंकि मूसा की लेख (लितेरा) मसीह के वचन हैं, वह स्वयं यहूदियों से कहता है, जैसा यूहन्ना ने सुसमाचार में लिखा है: "यदि तुम मूसा पर विश्वास करते, तो मुझ पर भी विश्वास करते: क्योंकि उसने मेरे विषय में लिखा। परन्तु यदि तुम उसकी लेखों पर विश्वास नहीं करते, तो मेरे वचन भी नहीं मानोगे।"(3) इस प्रकार वह सबसे स्पष्ट रीति से संकेत करता है कि मूसा की लेख उसके वचन हैं। तब, यदि मूसा के [विषय में यह बात है], तो निःसन्देह, अन्य भविष्यद्वक्ताओं के वचन भी उसके [वचन] हैं, जैसा मैंने दिखाया है। और फिर, प्रभु स्वयं अब्राहम को धनवान से कहते हुए दिखाता है, उन सब के विषय में जो अभी जीवित थे: "यदि वे मूसा और भविष्यद्वक्ताओं की नहीं मानते, तो यदि कोई मरे हुओं में से जी उठे और उनके पास जाए, तो भी वे उसकी प्रतीति न करेंगे।"(4)
4. अब, उसने हमें एक कंगाल और एक धनवान की कथा केवल सुनाई नहीं; परन्तु उसने हमें सिखाया, पहले तो, कि कोई विलासी जीवन न बिताए, और न, सांसारिक सुखों और नित्य भोजों में रहकर, अपनी लालसाओं का दास बने, और परमेश्वर को भूल जाए। "क्योंकि एक धनवान था," वह कहता है, "जो बैंगनी वस्त्र और मलमल पहने था, और भव्य भोजों से अपने को आनन्दित करता था।"(5)
ऐसे लोगों के विषय में भी आत्मा ने यशायाह के द्वारा कहा है: "वे वीणा, और पटी, और सारंगी, और बाँसुरी के [साथ] दाखरस पीते हैं; परन्तु वे परमेश्वर के कामों पर ध्यान नहीं देते, और न उसके हाथों के काम को विचारते हैं।"(6) इसलिये, कि हम इन मनुष्यों के समान दण्ड न पाएँ, प्रभु उनका अन्त [हमें] प्रकट करता है; और उसी समय दिखाता है, कि यदि वे मूसा और भविष्यद्वक्ताओं की मानते, तो वे उस पर विश्वास करते जिसका इन्होंने प्रचार किया, परमेश्वर के पुत्र पर, जो मरे हुओं में से जी उठा, और हमें जीवन देता है; और वह दिखाता है कि सब एक ही सार से हैं, अर्थात् अब्राहम, और मूसा, और भविष्यद्वक्ता, और प्रभु स्वयं भी, जो मरे हुओं में से जी उठा, जिस पर खतना किए हुओं में से बहुत लोग विश्वास करते हैं, जो मूसा और भविष्यद्वक्ताओं को भी सुनते हैं, जो परमेश्वर के पुत्र के आने का प्रचार करते हैं। परन्तु जो [सत्य की] हँसी उड़ाते हैं वे कहते हैं कि ये मनुष्य दूसरे सार से थे, और वे मरे हुओं में से पहिलौठे को नहीं जानते; मसीह को एक अलग सत्ता समझते हुए, जो ऐसा बना रहा मानो वह दुःख न सह सकता, और यीशु को, जिसने दुःख सहा, [उससे] बिलकुल अलग।
5. क्योंकि वे पिता से पुत्र का ज्ञान नहीं पाते; और न पुत्र से सीखते हैं कि पिता कौन है, जो स्पष्ट रूप से और दृष्टान्तों के बिना उसे सिखाता है जो सचमुच परमेश्वर है। वह कहता है: "सर्वथा शपथ न खाना; न स्वर्ग की, क्योंकि वह परमेश्वर का सिंहासन है; न पृथ्वी की, क्योंकि वह उसके पाँवों की चौकी है; न यरूशलेम की, क्योंकि वह बड़े राजा की नगरी है।"(7) क्योंकि ये वचन स्पष्ट रूप से सृष्टिकर्ता के विषय में बोले गए हैं, जैसा यशायाह भी कहता है: "स्वर्ग मेरा सिंहासन है, पृथ्वी मेरे पाँवों की चौकी है।"(8) इस सत्ता के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं; नहीं तो वह प्रभु के द्वारा "परमेश्वर" या "बड़ा राजा" न कहलाता; क्योंकि जो सत्ता ऐसे वर्णित हो सकती है वह न तो किसी दूसरी सत्ता को अपने साथ तुलना में और न अपने ऊपर रखी हुई को मानती है। क्योंकि जिसके ऊपर कोई बड़ा है, और जो दूसरे की शक्ति के अधीन है, वह सत्ता कभी "परमेश्वर" या "बड़ा राजा" नहीं कही जा सकती।
6. परन्तु ये मनुष्य यह न कह सकेंगे कि ऐसे वचन व्यंग्य में बोले गए, क्योंकि वचनों से ही उन्हें प्रमाणित होता है कि वे गम्भीर थे। क्योंकि जिसने उन्हें बोला वह सत्य था, और अपने घर को सचमुच बचाया, उसमें से रुपये बदलनेवालों को निकालकर, जो खरीद और बेच रहे थे, उनसे कहकर: "लिखा है, मेरा घर प्रार्थना का घर कहलाएगा; परन्तु तुमने उसे डाकुओं की गुफा बना दिया है।"(9) यदि वह दूसरे परमेश्वर का प्रचार करता, तो ऐसा करने और कहने, और अपने घर को बचाने का उसके पास क्या कारण था? परन्तु [उसने ऐसा किया], कि वह अपने पिता की व्यवस्था के उल्लंघनकर्ताओं को दिखाए; क्योंकि उसने न घर पर कोई दोष लगाया, और न व्यवस्था को दोष दिया, जिसे पूरा करने वह आया था; परन्तु उसने उनको डाँटा जो उसके घर का अनुचित उपयोग कर रहे थे, और जो व्यवस्था का उल्लंघन कर रहे थे। और इसलिये शास्त्री और फरीसी भी, जिन्होंने व्यवस्था के समय से परमेश्वर को तुच्छ जानना आरम्भ किया था, उसके वचन को नहीं ग्रहण किया, अर्थात् वे मसीह पर विश्वास न किए। इनके विषय में यशायाह कहता है: "तेरे हाकिम बलवाइए हैं, और चोरों के साथी, घूस के प्रेमी, इनाम के पीछे चलनेवाले, अनाथों का न्याय नहीं करते, और विधवाओं के मुकद्दमे की उपेक्षा करते हैं।"(10) और यिर्मयाह भी उसी प्रकार:
"वे," वह कहता है, "जो मेरी प्रजा पर राज्य करते हैं मुझे नहीं जानते; वे निर्बुद्धि और अविवेकी बालक हैं; बुराई करने में वे बुद्धिमान हैं, परन्तु भलाई करने का उन्हें ज्ञान नहीं।"(1)
7. परन्तु जितने परमेश्वर से डरते थे, और उसकी व्यवस्था के विषय में उत्सुक थे, वे मसीह की ओर दौड़े, और सब उद्धार पाए। क्योंकि उसने अपने शिष्यों से कहा: "इस्राएल के घराने की भेड़ों के पास जाओ,(2) जो नाश हो गई हैं।" और कहा जाता है कि और भी बहुत सामरी, जब प्रभु उनके बीच. दो दिन ठहरे, "उसके वचनों के कारण विश्वास किया, और स्त्री से कहा, अब हम विश्वास करते हैं, तेरी बात के कारण नहीं, क्योंकि हमने स्वयं [उसे] सुना है, और जानते हैं कि यह मनुष्य सचमुच जगत का उद्धारकर्ता है।"(3) और पौलुस भी घोषणा करता है, "और इस प्रकार सारा इस्राएल उद्धार पाएगा;"(4) परन्तु उसने यह भी कहा है, कि व्यवस्था हमें यीशु मसीह तक पहुँचानेवाली बालशिक्षिका थी।(5) इसलिये वे कुछ लोगों के [उनमें से] अविश्वास को व्यवस्था पर न डालें। क्योंकि व्यवस्था ने उन्हें परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करने से कभी नहीं रोका; नहीं, परन्तु उसने उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित भी किया,(6) यह कहते हुए(7) कि मनुष्य सर्प के पुराने घाव से और किसी प्रकार उद्धार नहीं पा सकते, उसके सिवा जो पापमय देह की समानता में, पृथ्वी से साक्ष्य के वृक्ष पर ऊँचा किया जाता है, और सब को अपनी ओर खींचता है,(8) और मरे हुओं को जिलाता है।
अध्याय तीन.--ग्नोस्टिकों की आक्षेपों का उत्तर। हमें यह न समझना चाहिए कि सच्चा परमेश्वर बदला जा सकता है, या अन्त को आ सकता है, क्योंकि आकाश, जो उसका सिंहासन है, और पृथ्वी, उसकी पाँवों की चौकी, मिट जाएँगे।
1. फिर, उनके दुष्टता से यह कहने के विषय में, कि यदि आकाश निश्चय परमेश्वर का सिंहासन है, और पृथ्वी उसकी पाँवों की चौकी, और यदि घोषित है कि आकाश और पृथ्वी मिट जाएँगे, तब जब ये मिटेंगे तो ऊपर बैठा परमेश्वर भी मिट जाएगा, और इसलिये वह सब के ऊपर का परमेश्वर नहीं हो सकता; पहले तो, वे नहीं जानते कि उस बात का क्या अर्थ है, कि आकाश [उसका] सिंहासन है और पृथ्वी [उसकी] पाँवों की चौकी। क्योंकि वे नहीं जानते कि परमेश्वर क्या है, परन्तु कल्पना करते हैं कि वह मनुष्य की रीति पर बैठता है, और सीमाओं में समाया है, परन्तु समाता नहीं। और वे आकाश और पृथ्वी के मिटने [के अर्थ] से भी अनजान हैं; परन्तु पौलुस उससे अनजान न था जब उसने घोषणा की, "क्योंकि इस जगत का रूप मिटता जाता है।"(9) इसके बाद, दाऊद उनके प्रश्न को समझाता है, क्योंकि वह कहता है कि जब इस जगत का रूप मिटेगा, केवल परमेश्वर ही नहीं रहेगा, उसके सेवक भी, 101वें भजन में इस प्रकार कहते हुए: "आदि में, तू; हे प्रभु, ने पृथ्वी की नींव डाली, और आकाश तेरे हाथों के काम हैं। वे नाश होंगे, परन्तु तू बना रहेगा, और सब वस्त्र के समान पुराने हो जाएँगे; और वस्त्र के समान तू उन्हें बदल देगा, और वे बदल जाएँगे: परन्तु तू वही है, और तेरे वर्ष नहीं टलेंगे। तेरे दासों के बच्चे बने रहेंगे, और उनका वंश सदा स्थिर किया जाएगा;"(10))स्पष्ट रूप से दिखाते हुए कि कौन सी बातें मिटती हैं, और कौन है जो सदा बना रहता है, परमेश्वर, अपने सेवकों के साथ। और यशायाह भी इसी प्रकार कहता है: "अपनी आँखें आकाश की ओर उठाओ, और नीचे की पृथ्वी को देखो; क्योंकि आकाश धुएँ के समान जमाया गया है, और पृथ्वी वस्त्र के समान पुरानी होगी, और उसमें रहनेवाले उसी प्रकार मरेंगे।
परन्तु मेरा उद्धार सदा रहेगा, और मेरा धर्म मिटेगा नहीं।"(11)
अध्याय चार.--एक और आपत्ति का उत्तर, यह दिखाते हुए कि यरूशलेम का नाश, जो बड़े राजा की नगरी थी, परमेश्वर की सर्वोच्च महिमा और सामर्थ्य में से कुछ भी न घटाया, क्योंकि यह नाश उसी परमेश्वर की अत्यन्त बुद्धिमान सम्मति से पूरा किया गया।
1. और आगे, यरूशलेम और प्रभु के विषय में, वे यह कहने का साहस करते हैं, कि यदि वह "बड़े राजा की नगरी"(12) होती, तो वह उजाड़ न होती।(13) यह ऐसा ही है मानो कोई कहे, कि यदि भूसा परमेश्वर की सृष्टि होता, तो वह गेहूँ से कभी अलग न होता; और दाखलता की डालियाँ, यदि परमेश्वर की बनाई होतीं, कभी काटी न जातीं और गुच्छों से वंचित न होतीं। परन्तु ये [दाखलता की डालियाँ] पहले अपने लिए नहीं बनाई गईं, परन्तु उन पर उगनेवाले फल के लिए, जो पककर ले लिया जाता है, तब वे पीछे छोड़ दी जाती हैं, और जो फलने में सहायक नहीं वे बिलकुल काट दी जाती हैं; वैसे ही [हुआ] यरूशलेम के साथ, जिसने अपने में दासत्व का जूआ उठाया था (जिसके नीचे मनुष्य घटाया गया था, जो पहले समय में परमेश्वर के अधीन न था जब मृत्यु राज्य कर रही थी, और वश में आकर, स्वतन्त्रता के योग्य हुआ), जब स्वतन्त्रता का फल आ चुका, और पक चुका, और काटा जाकर खत्ते में रखा जा चुका, और जब फल उत्पन्न करने की शक्तिवाले उसके पास से [अर्थात्, यरूशलेम से] ले जाए जा चुके, और सारे जगत में तितर-बितर किए जा चुके। जैसा यशायाह भी कहता है, "सन्तान
याकूब जड़ पकड़ेगा, और इस्राएल फूलेगा, और सारा जगत उसके फल से भर जाएगा।"(1) इसलिये फल सारे जगत में बोया जा चुका, तब वह (यरूशलेम) योग्य रीति से छोड़ दी गई, और जो पहले बहुतायत से फल लाती थीं वे ले ली गईं; क्योंकि इन्हीं में से, देह के अनुसार, मसीह और प्रेरित फल ला सके। परन्तु अब ये फल लाने के लिए उपयोगी नहीं रहीं। क्योंकि जिन सब बातों का समय में आरम्भ है उनका समय में अन्त भी होना ही चाहिए।
2. तब, क्योंकि व्यवस्था मूसा से आरम्भ हुई, वह आवश्यक परिणाम के रूप में यूहन्ना पर समाप्त हुई। मसीह उसे पूरा करने आया था: इसलिये "व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता" उनके साथ "यूहन्ना तक" थे।(2) और इसलिये यरूशलेम, दाऊद से अपना आरम्भ लेकर,(3) और अपने समयों को पूरा करके, जब नई वाचा प्रकट हुई तब व्यवस्थापन का अन्त पाना ही था।(4) क्योंकि परमेश्वर सब कुछ माप से और क्रम में करता है; उसके यहाँ कुछ भी बिना माप नहीं, क्योंकि कुछ भी क्रम से बाहर नहीं। ठीक बोला उसने, जिसने कहा कि नाप से बाहर पिता स्वयं पुत्र में माप के अधीन हुआ; क्योंकि पुत्र पिता का माप है, क्योंकि वह भी उसे समाए हुए है। परन्तु कि उनका (यहूदियों का) प्रबन्ध अस्थायी था, यशायाह कहता है: "और सिय्योन की बेटी दाख की बारी में झोपड़ी के समान, और ककड़ी के बगीचे में मचान के समान छोड़ दी जाएगी।"(5) और ये कब पीछे छोड़ दी जाएँगी? क्या तब नहीं जब फल ले लिया जाएगा, और केवल पत्ते रह जाएँगे, जिनमें अब फल उत्पन्न करने की शक्ति नहीं?
3. परन्तु हम यरूशलेम की बात क्यों करें, क्योंकि निश्चय सारे जगत का रूप भी मिटना है, जब उसके मिटने का समय आ गया हो, ताकि फल तो खत्ते में इकट्ठा किया जाए, परन्तु भूसी, पीछे छोड़ी हुई, आग से भस्म हो? "क्योंकि प्रभु का दिन धधकती भट्ठी के समान आता है, और सब पापी ठूंठ होंगे, जो बुराई करते हैं, और वह दिन उन्हें जला देगा।"(6) अब, यह प्रभु कौन है जो ऐसा दिन लाता है, बपतिस्मा देनेवाला यूहन्ना दिखाता है, जब वह मसीह के विषय में कहता है, "वह तुम्हें पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देगा, अपना सूप अपने हाथ में लिए अपनी खलिहान को साफ करने के लिए; और वह अपना फल खत्ते में इकट्ठा करेगा, परन्तु भूसी को वह न बुझनेवाली आग से जलाएगा।"(7) क्योंकि जो भूसी बनाता है और जो गेहूँ बनाता है वे भिन्न व्यक्ति नहीं, परन्तु एक ही है, जो उनका न्याय करता है, अर्थात् उन्हें अलग करता है। परन्तु गेहूँ और भूसी, निर्जीव और निर्बुद्धि होकर, स्वभाव से ऐसे बनाए गए हैं। परन्तु मनुष्य, बुद्धि से सम्पन्न, और इस बात में परमेश्वर के समान, अपनी इच्छा में स्वतन्त्र बनाया गया, और अपने ऊपर अधिकार रखता हुआ, स्वयं अपने लिए कारण है, कि कभी वह गेहूँ बनता है, और कभी भूसी। इसलिये वह न्याय से दण्डित भी होगा, क्योंकि, बुद्धिमान प्राणी बनाया जाकर, उसने सच्ची बुद्धि खो दी, और निर्बुद्धि होकर जीता रहा, परमेश्वर की धार्मिकता का विरोध किया, अपने को हर पार्थिव आत्मा के सौंपकर, और सब लालसाओं की सेवा करता हुआ; जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है, "मनुष्य, आदर में होकर, न समझा: वह निर्बुद्धि पशुओं के समान कर दिया गया, और उनके जैसा बना दिया गया।"(8)
अध्याय पाँच.--लेखक अपने पहले तर्क पर लौटता है, और दिखाता है कि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा एक ही परमेश्वर बताया गया, जिसे मसीह अपना पिता मानता है, और जिसने, अपने वचन के द्वारा, उसके साथ एक जीवते परमेश्वर होकर, दोनों वाचाओं में अपने को मनुष्यों पर प्रगट किया।
1. इसलिये परमेश्वर एक ही है, जो आकाश को पुस्तक के समान लपेटता है, और पृथ्वी के मुख को नया करता है; जिसने समय की वस्तुएँ बनाईं। मनुष्य के लिए, कि उनमें परिपक्व होकर वह अमरता का फल उत्पन्न करे; और जो, अपनी कृपा से, [उसे] अनन्त बातें भी देता है, "कि आनेवाले युगों में वह अपने अनुग्रह का अति बड़ा धन दिखाए;"(9) जिसका व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं ने प्रचार किया, जिसे मसीह ने अपना पिता माना। अब वह सृष्टिकर्ता है, और वही सब के ऊपर परमेश्वर है, जैसा यशायाह कहता है, "मैं साक्षी हूँ, प्रभु परमेश्वर कहता है, और मेरा दास जिसे मैंने चुना है, कि तुम जानो, और विश्वास करो, और समझो कि मैं हूँ। मुझ से पहले कोई दूसरा परमेश्वर न था, और न मेरे बाद होगा। मैं परमेश्वर हूँ, और मेरे सिवा कोई उद्धारकर्ता नहीं। मैंने प्रचार किया, और मैंने उद्धार किया।"(10) और फिर: "मैं स्वयं पहला परमेश्वर हूँ, और मैं आनेवाली बातों के ऊपर हूँ।"(11) क्योंकि वह ये बातें न अस्पष्ट, न अभिमानी, और न डींग के ढंग से कहता है; परन्तु क्योंकि परमेश्वर के बिना परमेश्वर के ज्ञान तक आना असम्भव था, वह अपने वचन के द्वारा मनुष्यों को परमेश्वर को जानना सिखाता है। इसलिये, जो इन बातों से अनजान हैं, और इसी कारण कल्पना करते हैं कि उन्होंने दूसरा पिता पा लिया है, उनसे कोई ठीक कहता है, "तुम भूलते हो, न पवित्रशास्त्र को जानते, न परमेश्वर की सामर्थ्य को।"(12)
2. क्योंकि हमारे प्रभु और गुरु ने, उस उत्तर में जो उसने सदूकियों को दिया, जो कहते हैं कि पुनरुत्थान नहीं है, और जो इसलिये
परमेश्वर का अनादर करते हैं, और व्यवस्था की प्रतिष्ठा को घटाते हैं, उसने पुनरुत्थान भी दिखाया, और परमेश्वर को प्रगट किया, उनसे कहकर, "तुम भूलते हो, न पवित्रशास्त्र को जानते, न परमेश्वर की सामर्थ्य को।" "क्योंकि, मरे हुओं के पुनरुत्थान के विषय में," वह कहता है, "क्या तुमने नहीं पढ़ा जो परमेश्वर के द्वारा कहा गया, कि मैं अब्राहम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर हूँ?(1) और उसने जोड़ा, "वह मरे हुओं का परमेश्वर नहीं, परन्तु जीवितों का है; क्योंकि सब उसके लिए जीवित हैं।" इन तर्कों से उसने निःसन्देह स्पष्ट किया, कि जिसने झाड़ी में से मूसा से बात की, और अपने को पूर्वजों का परमेश्वर बताया, वह जीवितों का परमेश्वर है। क्योंकि जीवितों का परमेश्वर कौन है, वह नहीं जो परमेश्वर है, और जिसके ऊपर कोई दूसरा परमेश्वर नहीं? जिसका दानिय्येल भविष्यद्वक्ता ने भी, जब फारसियों के राजा कुस्रू ने उससे कहा, "तू बेल को क्यों नहीं पूजता?"(2) प्रचार किया, कहते हुए, "क्योंकि मैं हाथों से बनी मूर्तियों को नहीं पूजता, परन्तु जीवते परमेश्वर को, जिसने आकाश और पृथ्वी को स्थिर किया और सब देह पर अधिकार रखता है।" फिर उसने कहा, "मैं अपने प्रभु परमेश्वर की आराधना करूँगा, क्योंकि वह जीवता परमेश्वर है।" तो, जिसकी भविष्यद्वक्ताओं ने जीवते परमेश्वर के रूप में आराधना की, वह जीवितों का परमेश्वर है; और उसका वचन वह है जिसने मूसा से भी बात की, जिसने सदूकियों को चुप भी कराया, जिसने पुनरुत्थान का वरदान भी दिया, इस प्रकार अन्धों पर [दोनों] सत्यों को प्रगट करते हुए, अर्थात् पुनरुत्थान और परमेश्वर [उसके सच्चे स्वरूप में]। क्योंकि यदि वह मरे हुओं का परमेश्वर नहीं, परन्तु जीवितों का है, फिर भी सोते हुए पूर्वजों का परमेश्वर कहलाया, तो वे निःसन्देह परमेश्वर के लिए जीवित हैं, और अस्तित्व से बाहर नहीं गए, क्योंकि वे पुनरुत्थान की सन्तान हैं।
परन्तु हमारा प्रभु स्वयं पुनरुत्थान है, जैसा वह स्वयं घोषणा करता है, "मैं पुनरुत्थान और जीवन हूँ।"(3) परन्तु पूर्वज उसकी सन्तान हैं; क्योंकि भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया है: "तेरे पितरों के स्थान पर तेरी सन्तान तेरे लिए बनाई गई हैं।"(4) इसलिये मसीह स्वयं, पिता के साथ, जीवितों का परमेश्वर है, जिसने मूसा से बात की, और जो पूर्वजों पर भी प्रगट हुआ।
3. और यही बात सिखाते हुए, उसने यहूदियों से कहा: "तुम्हारे पिता अब्राहम ने मेरा दिन देखने के लिए आनन्द किया; और उसने उसे देखा, और आनन्दित हुआ।"(5) अभिप्राय क्या है? "अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और वह उसके लिए धार्मिकता गिना गया।"(6) पहले तो, [उसने विश्वास किया] कि वह आकाश और पृथ्वी का बनानेवाला है, एकमात्र परमेश्वर; और फिर, कि वह उसके वंश को आकाश के तारों के समान बनाएगा। यही पौलुस का अर्थ है, [जब वह कहता है,] "जगत में ज्योतियों के समान।"(7) इसलिये धार्मिकता से, अपने पार्थिव कुटुम्ब को छोड़कर, वह परमेश्वर के वचन के पीछे चला, वचन के साथ यात्री की नाईं चलता हुआ, कि [पीछे] उसका निवास वचन के साथ हो।
4. धार्मिकता से प्रेरितों ने भी, अब्राहम के वंश के होकर, नाव और अपने पिता को छोड़ दिया, और वचन के पीछे चले। धार्मिकता से हम भी, अब्राहम का वही विश्वास रखते हुए, और क्रूस को उठाकर जैसे इसहाक ने लकड़ी उठाई? उसके पीछे चलते हैं। क्योंकि अब्राहम में मनुष्य ने पहले से सीखा था, और परमेश्वर के वचन के पीछे चलने का अभ्यास कर लिया था। क्योंकि अब्राहम ने, अपने विश्वास के अनुसार, परमेश्वर के वचन की आज्ञा का पालन किया, और तैयार मन से, परमेश्वर के लिए बलि करके, अपने एकलौते और प्रिय पुत्र को सौंप दिया, ताकि परमेश्वर भी अपने सारे वंश के लिए अपने प्रिय और एकलौते पुत्र को, हमारे छुटकारे के लिए बलि करके, चढ़ाने को प्रसन्न हो।
5. इसलिये, क्योंकि अब्राहम भविष्यद्वक्ता था और उसने आत्मा में प्रभु के आने का दिन, और उसके दुःख के आयोजन को देखा, जिसके द्वारा वह स्वयं और सब जो, उसके विश्वास के उदाहरण पर चलकर, परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, उद्धार पाएँगे, वह अत्यन्त आनन्दित हुआ। इसलिये प्रभु अब्राहम से अज्ञात न था, जिसका दिन वह देखना चाहता था;(9) और न, फिर, प्रभु का पिता अज्ञात था, क्योंकि उसने प्रभु के वचन से सीखा, और उस पर विश्वास किया; इसलिये वह प्रभु के द्वारा उसके लिए धार्मिकता गिना गया। क्योंकि परमेश्वर की ओर विश्वास मनुष्य को धर्मी ठहराता है; और इसलिये उसने कहा, "मैं अपना हाथ सर्वोच्च परमेश्वर की ओर बढ़ाऊँगा, जिसने आकाश और पृथ्वी बनाए।"(10) फिर भी ये सब सत्य, टेढ़ी धारणाएँ रखनेवाले एक अंश के कारण उलटने का यत्न करते हैं, जिसे वे निश्चय सही नहीं समझते।
अध्याय छह.--मसीह के वचनों की व्याख्या, "पिता को पुत्र के सिवा कोई नहीं जानता," इत्यादि; जिन वचनों की मिथ्या शिक्षक गलत व्याख्या करते हैं। प्रमाण कि, पिता के पुत्र को प्रगट करने से, और पुत्र के प्रगट होने से, पिता कभी अज्ञात न था।
1. क्योंकि प्रभु, अपने शिष्यों पर अपने को प्रगट करते हुए, कि वह स्वयं वचन है, जो पिता का ज्ञान देता है, और यहूदियों को डाँटते हुए, जो यह कल्पना करते थे कि उनके पास परमेश्वर [का ज्ञान] है, फिर भी उसके वचन को ठुकराते थे, जिसके द्वारा परमेश्वर जाना जाता है, घोषित किया, "पुत्र को पिता के सिवा कोई नहीं जानता; और न कोई पिता को जानता है, पुत्र के सिवा, और वह जिसे पुत्र ने [उसे] प्रगट करना चाहा है।"(11) इस प्रकार मत्ती ने उसे रखा
नीचे, और लूका उसी प्रकार, और मरकुस(1) वही; क्योंकि यूहन्ना इस अंश को छोड़ देता है। परन्तु, जो प्रेरितों से अधिक बुद्धिमान होना चाहते हैं, [वचन को] इस प्रकार लिखते हैं: "पिता को पुत्र के सिवा कोई नहीं जानता था; और न पुत्र को, पिता के सिवा, और वह जिसे पुत्र ने [उसे] प्रगट करना चाहा है;" और वे इसकी व्याख्या ऐसे करते हैं मानो सच्चा परमेश्वर हमारे प्रभु के आगमन से पहले किसी को ज्ञात न था; और उस परमेश्वर को, जिसका भविष्यद्वक्ताओं ने प्रचार किया, वे मसीह का पिता नहीं बताते।
a. परन्तु यदि मसीह ने तब [ही] अस्तित्व पाना आरम्भ किया जब वह मनुष्य होकर [जगत में] आया, और [यदि] पिता ने तिबेरियुस कैसर के समय [ही] मनुष्यों [की आवश्यकताओं] के लिए प्रबन्ध करना स्मरण किया, और उसका वचन अपनी सृष्टि के साथ सदा सह-अस्तित्व में न दिखाया गया; [यह कहा जा सकता है कि] तब भी दूसरे परमेश्वर का प्रचार आवश्यक न था, परन्तु [बल्कि] उसकी ओर इतनी बड़ी असावधानी और उपेक्षा के कारण जाँच का विषय बनाए जाएँ। क्योंकि उचित है कि ऐसा कोई प्रश्न न उठे, और इतनी शक्ति न बाँधे, कि वह निश्चय परमेश्वर को बदल दे, और उस सृष्टिकर्ता पर हमारे विश्वास को नाश करे जो अपनी सृष्टि के द्वारा हमें सम्भालता है। क्योंकि जैसे हम अपना विश्वास पुत्र की ओर करते हैं, वैसे ही हमें पिता की ओर दृढ़ और अटल प्रेम रखना चाहिए। मार्कियन के विरुद्ध अपनी पुस्तक में, युस्टीन(2) ठीक कहता है: "मैं स्वयं प्रभु पर विश्वास न करता, यदि वह हमारे रचनेवाले, बनानेवाले, और पालनेवाले से किसी और का प्रचार करता। परन्तु क्योंकि एकलौता पुत्र एक परमेश्वर से हमारे पास आया, जिसने यह जगत भी बनाया और हमें रचा, और सब को थामे और चलाता है, अपनी कारीगरी को अपने में समेटते हुए, उसकी ओर मेरा विश्वास स्थिर है, और पिता की ओर मेरा प्रेम अटल है, परमेश्वर दोनों हमें देता है।"
3. क्योंकि कोई पिता को नहीं जान सकता, परमेश्वर के वचन के द्वारा नहीं तो, अर्थात् पुत्र के [उसे] प्रगट करने से नहीं तो; और न उसे पुत्र का ज्ञान हो सकता है, पिता की अच्छी इच्छा के द्वारा नहीं तो। परन्तु पुत्र पिता की अच्छी इच्छा को पूरा करता है; क्योंकि पिता भेजता है, और पुत्र भेजा जाता है, और आता है। और उसका वचन जानता है कि उसका पिता, हमारे विषय में, अदृश्य और अनन्त है; और क्योंकि वह [किसी और के द्वारा] बताया नहीं जा सकता, वह स्वयं उसे हम पर बताता है; और दूसरी ओर, अपने वचन को केवल पिता ही जानता है। और इन दोनों सत्यों को हमारे प्रभु ने घोषित किया है। इसलिये पुत्र अपनी प्रगटीकरण के द्वारा पिता के ज्ञान को प्रगट करता है। क्योंकि पुत्र का प्रगटीकरण पिता का ज्ञान है; क्योंकि सब बातें वचन के द्वारा प्रगट होती हैं। इसलिये, कि हम जानें कि जो पुत्र आया है वही उस पर विश्वास करनेवालों को पिता का ज्ञान देता है, उसने अपने शिष्यों से कहा:(3) "पुत्र को पिता के सिवा कोई नहीं जानता, और न पिता को पुत्र के सिवा, और जिन्हें भी पुत्र उसे प्रगट करेगा;" इस प्रकार अपने को और पिता को ऐसा दिखाते हुए जैसा वह [वास्तव में] है, कि हम कोई दूसरा पिता न ग्रहण करें, उसके सिवा जो पुत्र के द्वारा प्रगट किया जाता है।
4. परन्तु यह [पिता] स्वर्ग और पृथ्वी का बनानेवाला है, जैसा उसके वचन से दिखाया जाता है; और वह नहीं, वह झूठा पिता, जो मार्कियन द्वारा, या वैलेन्तीनुस द्वारा, या बसिलिदेस द्वारा, या कार्पोक्रातेस द्वारा, या शमौन द्वारा, या शेष "ग्नोस्टिकों" द्वारा, जो झूठ से ऐसे कहलाते हैं, गढ़ा गया है। क्योंकि इन में से कोई परमेश्वर का पुत्र नहीं था; परन्तु यीशु मसीह हमारा प्रभु [था], जिनके विरुद्ध वे अपनी शिक्षा खड़ी करते हैं, और एक अज्ञात परमेश्वर का प्रचार करने का साहस रखते हैं। परन्तु उन्हें अपने विरुद्ध [यह] सुनना चाहिए: वह अज्ञात कैसे है, जो उनके द्वारा जाना जाता है? क्योंकि, जो थोड़े लोगों द्वारा भी जाना जाता है, वह अज्ञात नहीं। परन्तु प्रभु ने नहीं कहा कि पिता और पुत्र दोनों बिलकुल नहीं जाने जा सकते (in tatum), क्योंकि उस दशा में उसका आगमन व्यर्थ होता। क्योंकि वह यहाँ क्यों आया? क्या इसलिये कि वह हम से कहे, "परमेश्वर को खोजने की चिन्ता न करो; क्योंकि वह अज्ञात है, और तुम उसे न पाओगे;" जैसा वैलेन्तीनुस के चेले भी झूठ से घोषित करते हैं कि मसीह ने उनकी एओनों से कहा? परन्तु यह निश्चय ही व्यर्थ है। क्योंकि प्रभु ने हमें सिखाया कि कोई मनुष्य परमेश्वर को जानने में समर्थ नहीं, जब तक वह परमेश्वर से न सिखाया जाए; अर्थात्, परमेश्वर के बिना परमेश्वर जाना नहीं जा सकता: परन्तु यह पिता की स्पष्ट इच्छा है, कि परमेश्वर जाना जाए। क्योंकि पुत्र ने जिन्हें उसे प्रगट किया है वे उसे जानेंगे(4)।
5. इस उद्देश्य के लिये पिता ने पुत्र को प्रगट किया, कि उसके साधन द्वारा वह सब को प्रगट हो, और जो धर्मी उस पर विश्वास करते हैं उन्हें अविनाशिता में और अनन्त आनन्द में ग्रहण करे (अब, उस पर विश्वास करना उसकी इच्छा को करना है); परन्तु जो विश्वास नहीं करते, और इस कारण उसके प्रकाश से बचते हैं, उन्हें उसने उस अन्धकार में धर्म के साथ बन्द करेगा जिसे उन्होंने अपने लिये चुना है। इसलिये पिता ने अपने वचन को सब को दृश्य बनाकर अपने को सब पर प्रगट किया है; और, इसके उल्टे, वचन ने सब को पिता और पुत्र को घोषित किया है, क्योंकि वह सब को दृश्य हो गया है। और इसलिये परमेश्वर का धर्मी न्याय [पड़ेगा] उन सब पर जो, समान
दूसरों ने, देखा, परन्तु, दूसरों के समान, विश्वास नहीं किया।
6. क्योंकि सृष्टि के द्वारा ही, वचन सृष्टिकर्ता परमेश्वर को प्रगट करता है; और जगत के द्वारा [वह घोषित करता है] जगत के बनानेवाले प्रभु को; और [मनुष्य की] रचना के द्वारा उस शिल्पी को जिसने उसे रचा; और पुत्र के द्वारा उस पिता को जिसने पुत्र को जन्मा: और ये बातें निश्चय ही सब मनुष्यों को एक ही रीति से सम्बोधित करती हैं, परन्तु सब एक ही रीति से उन पर विश्वास नहीं करते। परन्तु व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा वचन ने अपने को और पिता को समान रूप से [सब को] प्रचार किया; और सब लोग ने उसे समान रूप से सुना, परन्तु सब ने समान रूप से विश्वास नहीं किया। और स्वयं वचन के द्वारा, जो दृश्य और स्पर्श योग्य बनाया गया था, पिता दिखाया गया, यद्यपि सब ने उस पर समान रूप से विश्वास नहीं किया; परन्तु सब ने पुत्र में पिता को देखा: क्योंकि पिता पुत्र का अदृश्य है, परन्तु पुत्र पिता का दृश्य। और इस कारण सब ने मसीह के साथ बातें कीं जब वह [पृथ्वी पर] उपस्थित था, और उन्होंने उसे परमेश्वर नाम दिया। हाँ, दुष्टात्माओं ने भी पुत्र को देखकर पुकारा: "हम तुझे जानते हैं तू कौन है, परमेश्वर का पवित्र जन।"' शैतान ने उसे देखकर, और उसकी परीक्षा करके, कहा: "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है;"(2)--इस प्रकार सब निश्चय ही पुत्र और पिता को देखकर और उनके विषय में बोलकर, परन्तु सब [उन पर] विश्वास न करके।
7. क्योंकि यह योग्य था कि सत्य सब से गवाही पाए, और विश्वास करनेवालों के उद्धार के लिये निश्चय ही, परन्तु विश्वास न करनेवालों की दण्डाज्ञा के लिये, न्याय का [साधन] बने; कि सब का न्याय ठीक रीति से हो, और पिता और पुत्र पर विश्वास सब के द्वारा स्वीकृत हो, अर्थात्, वह सब के द्वारा [उद्धार के एकमात्र साधन के रूप में] स्थिर किया जाए, सब से गवाही पाता हुआ, उससे सम्बन्ध रखनेवालों से भी, क्योंकि वे उसके मित्र हैं, और उससे कोई सम्बन्ध न रखनेवालों द्वारा भी, यद्यपि वे उसके शत्रु हैं। क्योंकि वह गवाही सत्य है, और उसका खण्डन नहीं हो सकता, जो अपने विरोधियों से भी अपनी ओर striking a testimonies निकलवाती है; वे हाथ के विषय के विषय में अपने ही स्पष्ट ध्यान से आश्वस्त होकर, और उसकी गवाही देते हुए, और उसे घोषित करते हुए।(4) परन्तु कुछ काल के बाद वे बैर में फूट पड़ते हैं, और [जिसको उन्होंने स्वीकृत किया था उसके] दोष लगानेवाले बन जाते हैं, और चाहते हैं कि उनकी अपनी गवाही सत्य [न मानी जाए]। इसलिये, जो जाना गया, वह उससे भिन्न प्राणी नहीं था जिसने घोषित किया "कोई पिता को नहीं जानता," परन्तु एक ही और वही, पिता सब कुछ उसे अधीन करता हुआ; जब उसने सब से गवाही पाई कि वह सचमुच मनुष्य है, और वह सचमुच परमेश्वर है, पिता से, आत्मा से, स्वर्गदूतों से, सृष्टि से ही, मनुष्यों से, भ्रष्ट आत्माओं और दुष्टात्माओं से, शत्रु से, और सबसे अन्त में, मृत्यु से ही। परन्तु पुत्र, पिता के लिये सब कुछ सम्भालता हुआ, आरम्भ से अन्त तक कार्य करता है, और उसके बिना कोई मनुष्य परमेश्वर के ज्ञान तक नहीं पहुँच सकता।
क्योंकि पुत्र पिता का ज्ञान है; परन्तु पुत्र का ज्ञान पिता में है, और पुत्र के द्वारा प्रगट किया गया है; और यही कारण था कि प्रभु ने घोषित किया: "पुत्र को पिता को छोड़ कोई नहीं जानता; न पिता को, पुत्र को छोड़, और जिन्हें पुत्र [उसे] प्रगट करे।"(5) क्योंकि "प्रगट करेगा" केवल भविष्य के विषय में नहीं कहा गया, मानो [केवल] तब वचन ने पिता को प्रगट करना आरम्भ किया जब वह मरियम से जन्मा, परन्तु यह सारे समय में समान रूप से लागू होता है। क्योंकि पुत्र, आरम्भ से अपनी ही हाथ की कारीगरी के साथ उपस्थित होकर, सब को पिता को प्रगट करता है; जिन्हें वह चाहता है, और जब वह चाहता है, और जैसा पिता चाहता है। इसलिये, तब, सब बातों में, और सब बातों के द्वारा, एक ही परमेश्वर है, पिता, और एक वचन, और एक पुत्र, और एक आत्मा, और एक उद्धार उन सब के लिये जो उस पर विश्वास करते हैं।
अध्याय 7.--पूर्व तर्क का पुनः सार, यह दिखाते हुए कि अब्राहम ने, वचन के प्रकाशन के द्वारा, पिता को जाना, और परमेश्वर के पुत्र के आगमन को जाना। इस कारण, जब उससे की गई प्रतिज्ञाएँ पूरी होनी थीं, उसने मसीह के दिन को देखने की लालसा से आनन्द किया। इस आनन्द का फल सन्तान तक बहा है, अर्थात्, अब्राहम के विश्वास में भागी होनेवालों तक, परन्तु उन यहूदियों तक नहीं जो परमेश्वर के वचन को ठुकराते हैं।
1. इसलिये अब्राहम ने भी, वचन के द्वारा the. पिता को जानकर, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी बनाए, उसे परमेश्वर मानकर अंगीकार किया; और [उससे की गई] एक घोषणा के द्वारा सीखकर, कि परमेश्वर का पुत्र मनुष्यों के बीच एक मनुष्य होगा, जिसके आगमन से उसका वंश स्वर्ग के तारों के समान होगा, उस दिन को देखने की लालसा की, ताकि वह आप भी मसीह को गले लगाए; और भविष्यवाणी की आत्मा के द्वारा उसे देखकर, वह आनन्दित हुआ।(6) इस कारण शमौन ने भी, उसके वंशजों में से एक ने, कुलपति के आनन्द को पूरी रीति से पूरा किया, और कहा: "हे प्रभु, अब अपने दास को शान्ति से विदा कर। क्योंकि मेरी आँखों ने तेरा उद्धार देखा है, जिसे तूने pre-
pared सब लोगों के मुख के सामने: अन्यजातियों के प्रकाशन के लिये ज्योति,(1) और इस्राएल की प्रजा की महिमा।"(2) और स्वर्गदूतों ने, उसी रीति से, रात को पहर देनेवाले चरवाहों को बड़े आनन्द का समाचार सुनाया।(3) और, मरियम ने कहा, "मेरा प्राण प्रभु की बड़ाई करता है, और मेरी आत्मा मेरे उद्धार परमेश्वर में आनन्दित हुई है;"(4)--अब्राहम का आनन्द उन पर उतरता हुआ जो उससे उत्पन्न हुए,--अर्थात्, जो पहर दे रहे थे, और जिन्होंने मसीह को देखा, और उस पर विश्वास किया; जबकि, दूसरी ओर, एक पारस्परिक आनन्द था जो बालकों से अब्राहम की ओर पीछे लौटा, जिसने मसीह के आगमन के दिन को देखने की लालसा भी की थी। तब ठीक ही, हमारे प्रभु ने उसके विषय में गवाही दी, यह कहते हुए, "तुम्हारे पिता अब्राहम ने मेरा दिन देखने की लालसा से आनन्द किया; और उसने उसे देखा, और हर्षित हुआ।"
2. क्योंकि केवल अब्राहम के कारण उसने ये बातें नहीं कहीं, परन्तु यह भी दिखाने के लिये कि जितनों ने आरम्भ से परमेश्वर को जाना है, और मसीह के आगमन की भविष्यवाणी की है, उन्होंने स्वयं पुत्र से प्रकाशन पाया है; जो अन्तिम कालों में भी दृश्य और पारगम्य बनाया गया, और मानव जाति के साथ बोला, कि वह पत्थरों से अब्राहम के लिये सन्तान उठाए, और उस प्रतिज्ञा को पूरा करे जो परमेश्वर ने उसे दी थी, और उसके वंश को स्वर्ग के तारों के समान बनाए,(5) जैसा यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला कहता है: "क्योंकि परमेश्वर इन पत्थरों से अब्राहम के लिये सन्तान उठा सकता है।"(6) अब, इस यीशु ने हमें पत्थरों के धर्म से खींचकर, और कठोर और निष्फल विचारनाओं से हमें लाकर, और हम में अब्राहम के समान विश्वास स्थिर करके, यह किया। जैसा पौलुस भी गवाही देता है, यह कहते हुए कि हमारे विश्वास की समानता के कारण, और निज भाग की प्रतिज्ञा के कारण, हम अब्राहम की सन्तान हैं।(7)
3. इसलिये वह एक ही और वही परमेश्वर है, जिसने अब्राहम को बुलाया और उसे प्रतिज्ञा दी। परन्तु वह सृष्टिकर्ता है, जो मसीह के द्वारा जगत में ज्योतियाँ भी तैयार करता है, [अर्थात्] वे जो अन्यजातियों में से विश्वास करते हैं। और वह कहता है, "तुम जगत की ज्योति हो;"(8) अर्थात्, स्वर्ग के तारों के समान। इसलिये, मैंने ठीक ही दिखाया है कि उसे पुत्र को छोड़ कोई मनुष्य नहीं जानता, और जिन्हें पुत्र उसे प्रगट करे। परन्तु पुत्र पिता को उन सब पर प्रगट करता है जिनके लिये वह चाहता है कि वह जाना जाए; और पिता की सुइच्छा के बिना, और पुत्र के कार्य के बिना, कोई मनुष्य परमेश्वर को नहीं जान सकता। इस कारण प्रभु ने अपने चेलों से कहा, "मैं ही मार्ग, सत्य, और जीवन हूँ और मेरे सिवा कोई पिता के पास नहीं आता। यदि तुम ने मुझे जाना होता, तो मेरे पिता को भी जानते: और अब से तुम ने उसे जाना भी है, और उसे देखा भी है।"(9) इन वचनों से स्पष्ट है, कि वह पुत्र के द्वारा जाना जाता है, अर्थात्, वचन के द्वारा।
4. इसलिये यहूदी परमेश्वर से हट गए हैं, उसका वचन ग्रहण न करके, परन्तु यह कल्पना करके कि वे पिता को [अलग] अपने आप, वचन के बिना, अर्थात् पुत्र के बिना, जान सकते हैं; वे उस परमेश्वर से अनजान हैं जो अब्राहम से मानवीय रूप में बोला,(10) और फिर मूसा से, यह कहते हुए, "मैंने निश्चय अपने लोगों के क्लेश को मिस्र में देखा है, और उन्हें छुड़ाने के लिये उतर आया हूँ।"(11) क्योंकि पुत्र, जो परमेश्वर का वचन है, ने इन बातों को आरम्भ से पहले से व्यवस्थित किया, पिता को स्वर्गदूतों की कुछ भी आवश्यकता न होकर, कि वह सृष्टि को अस्तित्व में बुलाए, और मनुष्य को रचे, जिसके लिये सृष्टि भी बनाई गई; और फिर, रची हुई वस्तुओं के गढ़ने के लिये, या मनुष्य से सम्बन्ध रखनेवाली बातों के क्रम के लिये, किसी साधन की आवश्यकता न रहकर; जबकि, [उसी समय,] उसके पास सेवकों की विशाल और अकथनीय संख्या है। क्योंकि उसकी सन्तान और उसकी समानता(12) हर प्रकार से उसकी सेवा करती हैं; अर्थात्, पुत्र और पवित्र आत्मा, वचन और बुद्धि; जिनकी सब स्वर्गदूत सेवा करते हैं, और जिनके वे अधीन हैं। इसलिये व्यर्थ हैं, ark वे, जो उस घोषणा के कारण, "पिता को पुत्र को छोड़ कोई नहीं जानता,"(13) एक और अज्ञात पिता को प्रवेश कराते हैं।
अध्याय 8.--मार्कियन और उसके अनुयायियों के व्यर्थ प्रयत्न, जो अब्राहम को उस उद्धार से निकालते हैं जो मसीह ने दिया, जिसने केवल अब्राहम को नहीं, परन्तु अब्राहम के वंश को भी छुड़ाया, विश्रामदिन को चंगा करते समय व्यवस्था को नष्ट न करके पूरी करके।
1. व्यर्थ भी है मार्कियन और उसके अनुयायियों का [प्रयत्न] जब वे निज भाग से अब्राहम को निकालना [चाहते हैं], जिसके विषय में आत्मा बहुत मनुष्यों के द्वारा, और अब पौलुस के द्वारा, गवाही देती है, कि "उसने परमेश्वर पर विश्वास किया, और वह उसके लिये धर्म गिना गया।"(14) और प्रभु [भी उसके विषय में गवाही देता है,] 1ले स्थान में निश्चय ही, पत्थरों से उसके लिये सन्तान उठाकर, और उसके वंश को स्वर्ग के तारों के समान बनाकर, यह कहते हुए, "वे पूर्व से और पश्चिम से, उत्तर से और दक्षिण से आएँगे, और स्वर्ग के राज्य में अब्राहम, और इसहाक, और याकूब के साथ झुकेंगे;"(15) और फिर यहूदियों से यह कहकर, "जब तुम अब्राहम, और इसहाक, और याकूब, और सब भविष्यद्वक्ताओं को स्वर्ग के राज्य में देखोगे, परन्तु तुम
तुम आप बाहर निकाल दिए जाओगे।"(1) तब, यह स्पष्ट बात है, कि जो उसके उद्धार को अस्वीकार करते हैं, और अब्राहम से प्रतिज्ञा करनेवाले उसके सिवा एक और परमेश्वर की कल्पना गढ़ते हैं, वे परमेश्वर के राज्य से बाहर हैं, और अविनाशिता [के दान] से निज भाग से वंचित हैं, परमेश्वर को तुच्छ जानते और उसकी निन्दा करते हुए, जो यीशु मसीह के द्वारा अब्राहम को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कराता है, और उसके वंश को, अर्थात् कलीसिया को, जिस पर अब्राहम से प्रतिज्ञा किया गया लेपालकपन और निज भाग भी दिया जाता है।
2. क्योंकि प्रभु ने अब्राहम की सन्तान का न्याय किया, उन्हें बन्धन से छुड़ाकर और उद्धार के लिये बुलाकर, जैसा उसने उस स्त्री के विषय में किया जिसे उसने चंगा किया, उन से खुलकर कहकर जिनका विश्वास अब्राहम के समान नहीं था, "हे कपटी लोगो,(2) क्या तुम में से हर एक विश्रामदिनों में अपने बैल या गदहे को नहीं खोलता, और उसे पानी पिलाने नहीं ले जाता? और अब्राहम की बेटी इस स्त्री को, जिसे शैतान ने ये अठारह वर्ष बाँधा है, विश्रामदिनों में इस बन्धन से छूटना न चाहिए?"(3) इसलिये स्पष्ट है, कि उसने उन्हें छुड़ाया और जिलाया जो उस पर विश्वास करते हैं जैसा अब्राहम ने किया, विश्रामदिन को चंगा करते समय व्यवस्था के विरुद्ध कुछ नहीं किया। क्योंकि व्यवस्था ने मनुष्यों को विश्रामदिनों में चंगा होने से मना नहीं किया; [इसके विपरीत,] उसने उसी दिन उनका खतना भी किया, और आज्ञा दी कि याजक लोगों के लिये सेवाएँ करें; हाँ, उसने गूंगे पशुओं के चंगा होने को भी अस्वीकार नहीं किया। शीलोआम में भी और पीछे के बार बार(4) अवसरों पर भी, उसने विश्रामदिन को चंगाई की; और इस कारण बहुत लोग विश्रामदिनों में उसके पास आया करते थे। क्योंकि व्यवस्था ने उन्हें हर दासत्व के काम से, अर्थात् व्यापार से और अन्य सांसारिक काम से कमाए धन के पीछे दौड़ने से, रुकने की आज्ञा दी; परन्तु प्राण के अभ्यासों की ओर ध्यान देने को उभारा, जो ध्यान में हैं, और अपने पड़ोसियों के लाभ के लिये लाभदायक बातों की ओर। और इसलिये प्रभु ने उनको डांटा जो विश्रामदिनों में चंगा करने के कारण अन्याय से उसे दोष देते थे।
क्योंकि उसने व्यवस्था को व्यर्थ नहीं किया, परन्तु पूरी की, महायाजक के कार्य करके, मनुष्यों के लिये परमेश्वर को प्रसन्न करके, कोढ़ियों को शुद्ध करके, रोगियों को चंगा करके, और आप मृत्यु सहकर, कि निर्वासित मनुष्य दण्डाज्ञा से बाहर निकले, और भय के बिना अपनी निज भाग की ओर लौटे।
3. और फिर, व्यवस्था ने विश्रामदिनों में भूखों को हाथ में तैयार पड़ा भोजन लेने से मना नहीं किया: उसने, तथापि, काटने और खत्ते में इकट्ठा करने से मना किया। और इसलिये प्रभु ने उन से कहा जो उसके चेलों को दोष देते थे क्योंकि उन्होंने गेहूँ की बालें तोड़कर अपने हाथों में मलकर खाईं, "क्या तुम ने यह नहीं पढ़ा, दाऊद ने क्या किया, जब वह आप भूखा था; वह परमेश्वर के घर में कैसे गया, और भेंट की रोटियाँ खाईं, और अपने साथ वालों को दीं; जिन्हें याजकों को छोड़ खाना उचित नहीं?"(5) व्यवस्था के वचनों से अपने चेलों को निर्दोष ठहराते हुए, और दिखाते हुए कि याजकों के लिये स्वतन्त्रता से कार्य करना उचित था। क्योंकि दाऊद परमेश्वर द्वारा याजक ठहराया गया था, यद्यपि शाऊल ने उसे सताया। क्योंकि सब धर्मी याजकीय पद रखते हैं।(6) और प्रभु के सब प्रेरित याजक हैं, जो यहाँ न भूमि और न घर निज भाग में पाते हैं, परन्तु परमेश्वर और वेदी की निरन्तर सेवा करते हैं। जिनके विषय में मूसा भी व्यवस्थाविवरण में कहता है, लेवी को आशीष देते समय, "जिसने अपने पिता और अपनी माता से कहा, मैं ने तुझे नहीं जाना; और उसने अपने भाइयों को नहीं माना, और अपने पुत्रों को निज भाग से वंचित किया: उसने तेरी आज्ञाओं को माना, और तेरी वाचा को देखा।"(7) परन्तु वे कौन हैं जिन्होंने पिता और माता को छोड़ दिया है, और परमेश्वर के वचन और उसकी वाचा के कारण अपने सब पड़ोसियों को विदा कहा है, प्रभु के चेलों को छोड़?
जिनके विषय में मूसा फिर कहता है, "उनका कोई निज भाग न होगा, क्योंकि प्रभु आप उनका निज भाग है।"(8) और फिर, "याजक लेवियों का लेवी के सारे गोत्र में कोई भाग न होगा, न इस्राएल के साथ सम्पत्ति; उनकी सम्पत्ति प्रभु की भेंटें (फल) हैं: इन्हें वे खाएँगे।"(9) इस कारण पौलुस भी कहता है, "मैं दान नहीं खोजता, परन्तु फल खोजता हूँ।"(10) अपने चेलों से उसने कहा, जिनके पास प्रभु का याजकपद था,(11) जिनके लिये भूखे होने पर गेहूँ की बालें खाना उचित था,(12) "क्योंकि मजदूर अपनी भोजन के योग्य है।"(13) और मन्दिर के याजकों ने विश्रामदिन को अपवित्र किया, और निर्दोष थे। तो, वे निर्दोष क्यों थे? क्योंकि मन्दिर में वे सांसारिक कामों में नहीं, परन्तु प्रभु की सेवा में लगे थे, व्यवस्था को पूरा करते हुए, परन्तु उसके आगे नहीं बढ़ते हुए, जैसा उस मनुष्य ने किया, जिसने अपनी इच्छा से carded सूखी लकड़ी को परमेश्वर की छावनी में, और न्याय से पत्थरवाह होकर मारा गया।(14) "क्योंकि जो जो वृक्ष अच्छा फल नहीं लाता वह काटा जाएगा, और आग में डाला जाएगा;"(15) और "जो कोई परमेश्वर के मन्दिर को अशुद्ध करेगा, उसे परमेश्वर अशुद्ध करेगा।"(16)
अध्याय 9.--दोनों वाचाओं का एक ही रचयिता, और एक ही अन्त है।
1. इसलिये सब वस्तुएँ एक ही और उसी द्रव्य की हैं, अर्थात् एक ही और उसी परमेश्वर से; जैसा प्रभु चेलों से कहता है "इसलिये हर शास्त्री, जो स्वर्ग के राज्य के लिये सिखाया गया है, उस गृहस्वामी के समान है जो अपनी निधि से नई और पुरानी वस्तुएँ निकालता है।"(1) उसने नहीं सिखाया कि पुरानी निकालनेवाला एक था, और नई निकालनेवाला दूसरा; परन्तु कि वे एक ही और वही थे। क्योंकि प्रभु घर का भला मनुष्य है, जो अपने पिता के tire घर पर शासन करता है; और जो दासों के लिये और जो अभी अनुशासनहीन हैं उनके लिये उपयुक्त व्यवस्था देता है; और जो स्वतन्त्र हैं, और विश्वास से धर्मी ठहराए गए हैं, उन्हें योग्य आज्ञाएँ देता है, और जो पुत्र हैं उनके लिये अपनी निज भाग खोल देता है। और उसने अपने चेलों को "शास्त्री" और "स्वर्ग के राज्य के शिक्षक" कहा; जिनके विषय में वह और कहीं यहूदियों से कहता है: "देखो, मैं तुम्हारे पास ज्ञानियों, और शास्त्रियों, और शिक्षकों को भेजता हूँ; और उन में से कुछ को तुम मारोगे, और नगर से नगर तक सताओगे।"(2) अब, बिना विरोध, निधि से निकाली गई नई और पुरानी वस्तुओं से वह दो वाचाओं का अर्थ करता है; पुरानी, वह व्यवस्था का दिया जाना जो पहले हुआ; और नई के रूप में वह उस जीवन की रीति को दिखाता है जिसे सुसमाचार माँगता है, जिसके विषय में दाऊद कहता है, "प्रभु के लिये एक नया गीत गाओ;"(3) और एसैया, "प्रभु के लिये एक नया स्तुतिगीत गाओ। उसका आरम्भ (initium), उसका नाम पृथ्वी की ऊँचाई से महिमामय है: वे द्वीपों में उसकी शक्तियाँ प्रचार करते हैं।"(4) और यिर्मयाह कहता है: "देखो, मैं एक नई वाचा बाँधूँगा, जैसी मैं ने तुम्हारे पितरों से नहीं बाँधी"(5) होरेब पर्वत पर।
परन्तु एक ही और उसी गृहस्वामी ने दोनों वाचाएँ उत्पन्न कीं, परमेश्वर का वचन, हमारा प्रभु यीशु मसीह, जिसने अब्राहम और मूसा दोनों से बातें कीं, और जिसने हमें नए सिरे से स्वतन्त्रता की ओर लौटाया है, और उस अनुग्रह को बढ़ाया है जो उससे है।
2. वह घोषित करता है: "क्योंकि इस स्थान में मन्दिर से बड़ा एक है।"(6) परन्तु बड़ा और छोटा [शब्द] उन वस्तुओं पर नहीं लगाए जाते जिनके बीच कुछ भी समान नहीं, और जो विपरीत स्वभाव की हैं, और परस्पर विरोधी हैं; परन्तु उन्हीं के विषय में काम में आते हैं जो उसी द्रव्य की हैं, और समान गुण रखती हैं, परन्तु केवल संख्या और माप में भिन्न हैं; जैसे जल से जल, और प्रकाश से प्रकाश, और अनुग्रह से अनुग्रह। इसलिये बड़ी है वह व्यवस्था जो स्वतन्त्रता के लिये दी गई है, उस से जो दासत्व के लिये दी गई; और इसलिये वह एक जाति [ही] में नहीं, परन्तु सारे जगत पर फैलाई गई है। क्योंकि एक ही और वही प्रभु, जो मन्दिर से बड़ा है, सुलैमान से बड़ा है, और योना से बड़ा है, मनुष्यों को दान देता है, अर्थात् अपनी ही उपस्थिति, और मरे हुओं में से जी उठना; परन्तु वह परमेश्वर को नहीं बदलता, और न दूसरे पिता का प्रचार करता है, परन्तु उसी को, जिसके पास अपने घर के लोगों के लिये नापने को सदा और अधिक है। और जैसे परमेश्वर की ओर उनकी प्रीति बढ़ती है, वह अधिक और बड़े [दान] देता है; जैसा प्रभु ने अपने चेलों से कहा: "तुम इन से बड़ी बातें देखोगे।"(7) और पौलुस घोषित करता है: "यह नहीं कि मैं पहले ही पहुँच गया हूँ, या कि मैं धर्मी ठहरा हूँ, या पहले ही सिद्ध बनाया गया हूँ।
क्योंकि हम अंश में जानते हैं, और अंश में भविष्यवाणी करते हैं; परन्तु जब वह आए जो सिद्ध है, तो जो अंश में हैं वे मिट जाएँगे।"(8) इसलिये, जब वह आए जो सिद्ध है, हम दूसरे पिता को नहीं देखेंगे, परन्तु उसे जिसे अब देखने की लालसा करते हैं (क्योंकि "धन्य हैं वे जिनके हृदय शुद्ध हैं: क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे"(9)); और न हम दूसरे मसीह और परमेश्वर के पुत्र को खोजेंगे, परन्तु उसे जो कुमारी मरियम [से जन्मा], जिसने दुःख भी सहा, जिस पर भी हम भरोसा करते हैं, और जिसे हम प्रेम करते हैं; जैसा एसैया कहता है: "और उस दिन वे कहेंगे, देखो हमारा प्रभु परमेश्वर, जिस पर हम ने भरोसा किया है, और हम ने अपने उद्धार में आनन्द किया है;"(10) और पतरस अपनी पत्री में कहता है: "जिसे, न देखते हुए, तुम प्रेम करते हो; जिस पर, यद्यपि अब तुम उसे नहीं देखते, विश्वास किया है, तुम अनिर्वचनीय आनन्द से आनन्दित होगे;"(11) और न हम अपने साथ रहनेवाले उसके सिवा, और जो पुकारता है, "अब्बा, पिता," किसी और पवित्र आत्मा को पाते हैं;(12) और हम उन्हीं बातों में [जैसी अब हैं] बढ़ेंगे, और आगे बढ़ेंगे, कि अब दर्पण के द्वारा, या पहेलियों के द्वारा नहीं, परन्तु आमने सामने, हम परमेश्वर के दानों का आनन्द लेंगे;--ऐसे ही अब भी, मन्दिर से अधिक, और सुलैमान से अधिक, अर्थात् परमेश्वर के पुत्र का आगमन, पाकर, हम सब के रचनेवाले और बनानेवाले के सिवा, जो आरम्भ से हमें दिखाया गया है, किसी और परमेश्वर की शिक्षा नहीं पाए हैं; और न भविष्यद्वक्ताओं द्वारा पहले से कहे गए उसके सिवा किसी और मसीह, परमेश्वर के पुत्र, की।
3. क्योंकि नई वाचा भविष्यद्वक्ताओं द्वारा जानी और प्रचार की गई होने से, वह भी प्रचार किया गया जिसे पिता की सुइच्छा के अनुसार उसे पूरा करना था; जैसा परमेश्वर ने चाहा मनुष्यों पर प्रगट किया गया; कि वे उस पर विश्वास करने के द्वारा सदा आगे बढ़ें, और [क्रमशः] वाचाओं के द्वारा,
क्रम से सिद्ध उद्धार तक पहुँचना चाहिए।(1) क्योंकि एक उद्धार है और एक परमेश्वर; परन्तु मनुष्य को गढ़नेवाली आज्ञाएँ अनेक हैं, और जो सीढ़ियाँ मनुष्य को परमेश्वर तक ले जाती हैं वे थोड़ी नहीं। एक पार्थिव और कालिक राजा के लिये, यद्यपि वह [केवल] मनुष्य है, अपने प्रजाजनों को समय समय पर बड़े लाभ देना उचित है: तो क्या यह परमेश्वर के लिये उचित न होगा, क्योंकि वह [सदा] वही है, और मानव जाति पर बड़े [मात्रा का] अनुग्रह देना सदा चाहता है, और जो उसे प्रसन्न करते हैं उन्हें बहुत दानों से निरन्तर आदर देना? परन्तु यदि आगे बढ़ना यही हो, [अर्थात्,] आरम्भ से प्रचार किए गए उसके सिवा दूसरे पिता को पाना; और फिर, जो 2रे स्थान में पाया गया कल्पना किया जाता है उसके सिवा, एक 3सरा अन्य पाना,--तब इस मनुष्य की आगे बढ़त इसमें होगी कि वह भी 3सरे से 4थे की ओर चले; और इससे फिर, एक और और एक और की ओर: और इस प्रकार जो सोचता है कि वह सदा ऐसी आगे बढ़त कर रहा है, वह एक परमेश्वर में कभी विश्राम न करेगा। क्योंकि, जो सचमुच [परमेश्वर] है उससे दूर किए जाकर, और पीछे की ओर पलटा जाकर, वह सदा खोजता रहेगा, तौभी परमेश्वर को कभी न पाएगा;(2) परन्तु सीमा रहित अथाह में निरन्तर तैरता रहेगा, जब तक, मन फिराव से लौटाया जाकर, वह उस स्थान की ओर न लौटे जहाँ से वह निकाल दिया गया था, एक परमेश्वर, पिता, सृष्टिकर्ता को अंगीकार करते हुए, और उस [पर] विश्वास करते हुए जो व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं द्वारा घोषित किया गया, जिसकी मसीह ने गवाही दी, जैसा उसने आप उन से घोषित किया जो उसके चेलों पर दोष लगा रहे थे कि वे प्राचीनों की परम्परा नहीं मानते: "तुम अपनी परम्परा के कारण परमेश्वर की व्यवस्था को क्यों व्यर्थ करते हो?
क्योंकि परमेश्वर ने कहा, अपने पिता और माता का आदर कर; और, जो कोई पिता या माता को श्राप दे, वह मृत्यु से मरे।"(3) और फिर, वह 2री बार उन से कहता है: "और तुम ने अपनी परम्परा के कारण परमेश्वर के वचन को(4) व्यर्थ किया है;" मसीह सबसे स्पष्ट रीति से उसे पिता और परमेश्वर मानकर अंगीकार करता है, जिसने व्यवस्था में कहा, "अपने पिता और माता का आदर कर; कि तेरा भला हो।"(5) क्योंकि सच्चे परमेश्वर ने व्यवस्था की आज्ञा को परमेश्वर का वचन माना, और अपने पिता के सिवा किसी और को परमेश्वर नहीं कहा।
अध्याय 10. -- पुराने नियम के पवित्रशास्त्र, और विशेष करके जो मूसा ने लिखे, सर्वत्र परमेश्वर के पुत्र का उल्लेख करते हैं, और उसके आगमन और दुःखभोग की भविष्यवाणी करते हैं। इस तथ्य से यह निकलता है कि वे एक ही और उसी परमेश्वर से प्रेरित थे।
1. इस कारण यूहन्ना भी ठीक रीति से बताता है कि प्रभु ने यहूदियों से कहा: "तुम पवित्रशास्त्रों को खोजते हो, जिन में तुम सोचते हो कि अनन्त जीवन है; ये ही हैं जो मेरी गवाही देते हैं। और तुम मेरे पास आना नहीं चाहते, कि तुम्हें जीवन मिले।"(6) तो पवित्रशास्त्रों ने उसके विषय में कैसे गवाही दी, यदि वे एक ही और उसी पिता से न थे, मनुष्यों को उसके पुत्र के आगमन के विषय में पहले से सिखाते हुए, और उसके द्वारा लाए गए उद्धार की भविष्यवाणी करते हुए? "क्योंकि यदि तुम मूसा पर विश्वास करते, तो मुझ पर भी विश्वास करते; क्योंकि उसने मेरे विषय में लिखा;"(7) [यह कहते हुए,] निःसन्देह, क्योंकि परमेश्वर का पुत्र उसकी लिखाइयों में सर्वत्र रोपा गया है: एक समय निश्चय ही, अब्राहम से बातें करते हुए, जब उसके साथ खाने पर था; दूसरे समय नूह के साथ, उसे [सन्दूक के] माप देते हुए; दूसरे समय; आदम को पूछते हुए; दूसरे समय, सदोमियों पर न्याय उतारते हुए; और फिर, जब वह दृश्य होता है,(8) और याकूब को उसकी यात्रा पर चलाता है, और झाड़ी से मूसा से बातें करता है।(9) और [उन अवसरों को] गिनना अन्त रहित होगा जिन पर परमेश्वर का पुत्र मूसा द्वारा दिखाया जाता है। उसके दुःखभोग के दिन के विषय में भी वह अनजान नहीं था; परन्तु फसह को दिए गए नाम के द्वारा, रूपक की रीति से, उसकी भविष्यवाणी की;(10) और उसी पर्व पर, जो मूसा द्वारा इतने लम्बे समय पहले ऐसा प्रचार किया गया था, हमारे प्रभु ने दुःख सहा, इस प्रकार फसह को पूरा किया। और उसने केवल दिन का वर्णन नहीं किया, परन्तु स्थान का भी, और दिन के उस समय का जब दुःख थमे,(11) और सूर्य के अस्त होने के चिह्न का, यह कहते हुए: "तू फसह का बलिदान अपनी उन नगरियों में से किसी और में न चढ़ाए जो प्रभु परमेश्वर तुझे देता है; परन्तु उस स्थान में जिसे प्रभु तेरा परमेश्वर चुने कि उसका नाम वहाँ लिया जाए, तू सायंकाल को, सूर्य के अस्त होने की ओर, फसह का बलिदान चढ़ाएगा।"(12)
2. और वह पहले ही उसके आगमन को भी घोषित कर चुका था, यह कहते हुए, "यहूदा में एक प्रधान नहीं चूकेगा, न उसकी कटि से एक नेता, जब तक वह न आए जिसके लिये यह रखा गया है, और वह जातियों की आशा है; अपने बच्चे गदहे को दाखलता से बाँधता हुआ, और अपने गदहे के बच्चे को रेंगती लता से। वह अपनी चोगा को दाखरस में धोएगा, और अपने ऊपर के वस्त्र को
दाख के रक्त में; उसकी आँखें दाखरस से अधिक आनन्दित होंगी,(1) और उसके दाँत दूध से अधिक श्वेत।"(2) क्योंकि, जिनकी सब कुछ जाँचने की कीर्ति है, वे पूछें कि यहूदा से एक प्रधान और नेता किस समय चूका, और जातियों की आशा कौन है, दाखलता भी कौन है, गदहे का बच्चा क्या था जो [उसका कहा गया], वस्त्र क्या, आँखें क्या, दाँत क्या, और दाखरस क्या, और इस प्रकार वे उल्लेखित हर बात की जाँच करें; और वे पाएँगे कि हमारे प्रभु, यीशु मसीह, के सिवा और कोई घोषित नहीं किया गया। इस कारण मूसा ने, लोगों की कृतघ्नता को झिड़कते समय, कहा, "हे मोहित लोगों, और निर्बुद्धि, क्या तुम प्रभु को इस प्रकार बदला देते हो?"(3) और फिर, वह दिखाता है कि जिसने आरम्भ से उन्हें स्थापित किया और रचा, वचन, जो अन्तिम कालों में हमें छुड़ाता और जिलाता भी है, वृक्ष पर लटका हुआ दिखाया जाता है, और वे उस पर विश्वास न करेंगे। क्योंकि वह कहता है, "और तेरा जीवन तेरी आँखों के सामने लटका रहेगा, और तू अपने जीवन पर विश्वास न करेगा।"(4) और फिर, "क्या इसी ने, तेरे पिता ने, तुझे अपनाया नहीं, और तुझे बनाया नहीं, और तुझे रचा नहीं?"(5)
अध्याय 11. --पुराने भविष्यद्वक्ता और धर्मी जन मसीह के आगमन को पहले से जानते थे, और उसे देखने और सुनने की गहरी लालसा रखते थे, वह पवित्र आत्मा के द्वारा पवित्रशास्त्रों में अपने को प्रगट करता है, अपने में किसी परिवर्तन के बिना, मनुष्यों को दिन प्रतिदिन लाभों से धनी करता है, परन्तु उन्हें पूर्व पीढ़ियों से अधिक बाद की पीढ़ियों पर बड़ी बहुतायत से देता है।
1. परन्तु यह कि केवल भविष्यद्वक्ता और बहुत धर्मी जन ही नहीं, जिन्होंने पवित्र आत्मा के द्वारा उसके आगमन को पहले देखकर, प्रार्थना की कि वे उस काल तक पहुँचें जिस में वे अपने प्रभु को आमने सामने देखें, और उसके वचन सुनें, प्रभु ने इसे प्रगट किया है, जब वह अपने चेलों से कहता है, "बहुत भविष्यद्वक्ताओं और धर्मियों ने वे बातें देखने की लालसा की जो तुम देखते हो, और उन्हें नहीं देखा; और वे बातें सुनने की जो तुम सुनते हो, और उन्हें नहीं सुना।"(6) तो उन्होंने सुनने और देखने दोनों की लालसा कैसे की, यदि उन्हें उसके भावी आगमन का पूर्वज्ञान न होता? परन्तु वे उसे पहले कैसे जान सकते थे, यदि उन्होंने पहले से स्वयं उससे पूर्वज्ञान न पाया होता? और पवित्रशास्त्र उसके विषय में कैसे गवाही देते हैं, यदि सब बातें सदा एक ही और उसी परमेश्वर द्वारा वचन के द्वारा विश्वासियों पर प्रगट और दिखाई न गई होतीं; वह एक समय अपनी सृष्टि से बातें करता हुआ, और दूसरे समय pro-pounding अपनी व्यवस्था; फिर एक समय झिड़कता हुआ, दूसरे समय उभारता हुआ, और तब अपने दास को छुड़ाता हुआ, और उसे पुत्र के रूप में ग्रहण करता हुआ (in filium); और, उचित समय पर, अविनाशी निज भाग देता हुआ, मनुष्य को सिद्धता तक लाने के उद्देश्य से? क्योंकि उसने उसे बढ़ने और बढ़ोतरी के लिये रचा, जैसा पवित्रशास्त्र कहता है: "बढ़ो और बहुतायत में हो।"(7)
2. और इस बात में परमेश्वर मनुष्य से भिन्न है, कि परमेश्वर निश्चय बनाता है, परन्तु मनुष्य बनाया जाता है; और सचमुच, जो बनाता है वह सदा वही है; परन्तु जो बनाया जाता है उसे आरम्भ, और मध्य, और जोड़, और बढ़ोतरी दोनों पाने चाहिए। और परमेश्वर निश्चय कुशल रीति से रचता है, जबकि, मनुष्य [के विषय में], वह कुशलता से रचा जाता है। परमेश्वर भी सब बातों में सचमुच सिद्ध है, आप अपने तुल्य और अपने समान, क्योंकि वह सब प्रकाश है, और सब मन, और सब द्रव्य, और सब भलाई का सोता; परन्तु मनुष्य परमेश्वर की ओर उन्नति और बढ़ोतरी पाता है। क्योंकि जैसा परमेश्वर सदा वही है, वैसे ही मनुष्य भी, जब परमेश्वर में पाया जाए, सदा परमेश्वर की ओर चलेगा। क्योंकि परमेश्वर किसी समय मनुष्य पर लाभ देना, या उसे धनी करना, नहीं छोड़ता; और न मनुष्य लाभ पाना, और परमेश्वर द्वारा धनी किए जाना, कभी छोड़ता है। क्योंकि उसकी भलाई का पात्र, और उसकी महिमा का साधन, वह मनुष्य है जो अपने बनानेवाले का कृतज्ञ है; और फिर, उसके न्यायपूर्ण न्याय का पात्र कृतघ्न मनुष्य है, जो अपने बनानेवाले को तुच्छ जानता है और उसके वचन के अधीन नहीं; जिसने प्रतिज्ञा की है कि वह सदा फल लानेवालों को बहुत देगा, और प्रभु का धन रखनेवालों को [और और] अधिक। "शाबाश," वह कहता है, "भले और विश्वासयोग्य दास: क्योंकि तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुओं पर ठहराऊँगा; अपने प्रभु के आनन्द में प्रवेश कर।"(8) प्रभु आप इस प्रकार बहुत प्रतिज्ञा करता है।
3. इसलिये, उसने अब फल लानेवालों को बहुत देने की प्रतिज्ञा की है, अपने अनुग्रह के दान के अनुसार, परन्तु "ज्ञान" की बदलनेवाली प्रकृति के अनुसार नहीं; क्योंकि प्रभु वही रहता है, और वही पिता प्रगट किया जाता है; इस प्रकार, इसलिये, एक ही और उसी प्रभु ने, अपने आगमन के द्वारा, बाद के काल के लोगों को अनुग्रह का बड़ा दान दिया है, उस से जो उसने पुराने नियम की व्यवस्था के अधीन लोगों को दिया था। क्योंकि वे निश्चय [उसके] सेवकों के द्वारा सुनते थे, कि राजा आएगा, और किसी सीमा तक आनन्दित होते थे, क्योंकि वे उसके आने की आशा रखते थे; परन्तु जिन्होंने उसे सचमुच उपस्थित देखा है, और स्वतन्त्रता पाई है, और उसके दानों के भागी हुए हैं, उनके पास अनुग्रह की बड़ी मात्रा है, और उल्लास की ऊँची डिग्री, राजा के आगमन के कारण आनन्द करते हुए: जैसा
दाऊद भी कहता है, "मेरा प्राण प्रभु में आनन्द करेगा; वह उसके उद्धार में हर्षित होगा।"(1) और इस कारण, यरूशलेम में उसके प्रवेश पर, मार्ग में जितने थे(2) सब ने उसके प्राण के शोक में अपने राजा दाऊद को पहचाना, और अपने वस्त्र उसके लिये बिछाए, और हरी डालियों से मार्ग को सजाया, बड़े आनन्द और हर्ष से पुकारते हुए, "दाऊद के पुत्र को होशन्ना; धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है: सर्वोच्च में होशन्ना।"(3) परन्तु डाह करनेवाले दुष्ट भण्डारियों से, जिन्होंने अपने अधीन लोगों को धोखा दिया, और जिनकी बड़ी बुद्धि नहीं थी उन पर राज्य किया,(4) और इस कारण नहीं चाहते थे कि राजा आए, और जिन्होंने उससे कहा, "क्या तू सुनता है ये क्या कहते हैं?" प्रभु ने उत्तर दिया, "क्या तुम ने कभी नहीं पढ़ा, बच्चों और दूधपिउओं के मुख से तू ने स्तुति सिद्ध की है?"(5)--इस प्रकार दिखाते हुए कि परमेश्वर के पुत्र के विषय में दाऊद द्वारा जो घोषित हुआ था, वह उसके अपने व्यक्ति में पूरा हुआ; और संकेत करते हुए कि वे निश्चय पवित्रशास्त्र के अर्थ और परमेश्वर की व्यवस्था से अनजान थे; परन्तु घोषित करते हुए कि वही वह था जो भविष्यद्वक्ताओं द्वारा मसीह के रूप में सुनाया गया, जिसका नाम सारी पृथ्वी पर स्तुति किया जाता है, और जो बच्चों और दूधपिउओं के मुख से अपने पिता के लिये स्तुति सिद्ध करता है; इस कारण उसकी महिमा आकाशों के ऊपर उठाई गई है।
4. इसलिये, यदि वही व्यक्ति उपस्थित है जो भविष्यद्वक्ताओं द्वारा सुनाया गया, हमारा प्रभु यीशु मसीह, और यदि उसके आगमन ने उसे पानेवालों के लिये पूरा [माप] अनुग्रह और बड़े दान लाए हैं, तो स्पष्ट है कि पिता भी आप वही है जो भविष्यद्वक्ताओं द्वारा प्रचार किया गया, और कि पुत्र ने, अपने आने पर, दूसरे पिता का ज्ञान नहीं फैलाया, परन्तु उसी का जो आरम्भ से प्रचार किया गया; जिससे उसने उन के लिये स्वतन्त्रता भी उतारी है, जो उचित रीति से, और इच्छा वाले मन से, और सारे हृदय से, उसकी सेवा करते हैं; जबकि ठट्ठा करनेवालों के लिये, और जो परमेश्वर के अधीन नहीं, परन्तु मनुष्यों की प्रशंसा के लिये बाहरी शुद्धियों के पीछे चलते हैं (वे रीतियाँ आनेवाली बातों के रूप के रूप में दी गई थीं, -- व्यवस्था, मानो, कुछ बातों को छाया में रूप देती हुई, और कालिक वस्तुओं द्वारा अनन्त वस्तुओं को, पार्थिव द्वारा स्वर्गीय को, खींचती हुई), और जो यह बहाना करते हैं कि वे आप निर्धारित से अधिक मानते हैं, मानो अपनी उत्साह को स्वयं परमेश्वर से अधिक पसन्द करते हुए, जबकि भीतर वे कपट, और लोभ, और सब दुष्टता से भरे हैं, -- [ऐसों के लिये] उसने उन्हें जीवन से काटकर अनन्त नाश ठहराया है।
अध्याय 12.--यह स्पष्ट दिखाई देता है कि पुरानी और नई दोनों व्यवस्था का एक ही रचयिता था, इस तथ्य से, कि मसीह ने पूर्व के विरुद्ध परम्पराओं और रीतियों को दोषी ठहराया, जबकि उसकी सबसे महत्वपूर्ण आज्ञाओं को पक्का किया, और सिखाया कि वह आप मूसा की व्यवस्था का अन्त है।
1. क्योंकि प्राचीनों की परम्परा आप, जिसे वे व्यवस्था से मानने का बहाना करते थे, मूसा द्वारा दी गई व्यवस्था के विरुद्ध थी। इस कारण एसैया भी घोषित करता है: "तेरे व्यापारी दाखरस को पानी से मिलाते हैं,"(6) दिखाते हुए कि प्राचीन परमेश्वर की सीधी आज्ञा के साथ पानी मिली परम्परा को मिलाने के आदी थे; अर्थात्, उन्होंने एक कूटी व्यवस्था खड़ी की, और उस[सच्ची] व्यवस्था के विरुद्ध एक; जैसा प्रभु ने भी स्पष्ट किया, जब उसने उन से कहा, "तुम अपनी परम्परा के निमित्त परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन क्यों करते हो?"(7) क्योंकि केवल वास्तविक उल्लंघन से ही उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्था को तुच्छ नहीं जाना, दाखरस को पानी से मिलाते हुए; परन्तु उन्होंने उसके विरुद्ध अपनी ही व्यवस्था भी खड़ी की, जो आज तक भी फरीसियों की कही जाती है। इस [व्यवस्था] में वे कुछ बातों को दबाते हैं, औरों को जोड़ते हैं, और औरों का फिर, जैसा उन्हें उचित लगता है, अर्थ करते हैं, जिन्हें उनके शिक्षक हर एक विशेष रूप से काम में लाते हैं; और इन परम्पराओं को थामे रहना चाहकर, वे परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन होना नहीं चाहते थे, जो उन्हें मसीह के आने के लिये तैयार करती है। परन्तु उन्होंने विश्रामदिनों में चंगा करने के लिये प्रभु को भी दोष दिया, जिसे, जैसा मैं पहले ही देख चुका हूँ, व्यवस्था ने मना नहीं किया। क्योंकि उन्होंने आप, एक अर्थ में, विश्रामदिन को चंगाई के काम किए, जब उन्होंने एक मनुष्य का [उस दिन] खतना किया; परन्तु परम्परा के द्वारा और ऊपर कही फरीसियों की व्यवस्था के द्वारा परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करने के लिये, और व्यवस्था की आज्ञा को न मानने के लिये, जो परमेश्वर का प्रेम है, उन्होंने अपने को दोष नहीं दिया।
2. परन्तु कि यह 1ली और बड़ी आज्ञा है, और अगली [प्रेम के विषय में है] हमारे पड़ोसी की ओर, प्रभु ने सिखाया है, जब वह कहता है कि सारी व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता इन दो आज्ञाओं पर टिके हैं। और, उसने आप [स्वर्ग से] इस से बड़ी कोई और आज्ञा नहीं उतारी, परन्तु इसी को अपने चेलों के लिये नया किया, जब उसने उन्हें आज्ञा दी कि परमेश्वर को सारे हृदय से प्रेम करें, और औरों को अपने समान। परन्तु यदि वह दूसरे पिता से उतरा होता, तो वह व्यवस्था की 1ली और बड़ी आज्ञा को कभी काम में न लाता; परन्तु वह निःसन्देह हर उपाय से सिद्ध पिता से इस से बड़ी एक को उतारने का यत्न करता, ताकि दिए गए उस को काम में न लाए, के द्वारा
व्यवस्था का परमेश्वर। और पौलुस उसी रीति से घोषित करता है, "प्रेम व्यवस्था की पूर्ति है:"(1) और [वह घोषित करता है] कि जब और सब बातें नष्ट हो जाएँगी, तब "विश्वास, आशा, और प्रेम बना रहेगा; परन्तु सब में बड़ा प्रेम है;"(2) और कि परमेश्वर के प्रेम से अलग, न ज्ञान कुछ काम आता है,(3) न भेदों की समझ, न विश्वास, न भविष्यवाणी, परन्तु प्रेम के बिना सब खोखले और व्यर्थ हैं; और, कि प्रेम मनुष्य को सिद्ध करता है; और जो परमेश्वर से प्रेम करता है वह सिद्ध है, इस जगत में भी और आनेवाले में भी। क्योंकि हम परमेश्वर से प्रेम करना कभी नहीं छोड़ते; परन्तु जितना हम उसका ध्यान करते रहते हैं, उतना ही अधिक हम उससे प्रेम करते हैं।
3. इसलिये व्यवस्था में, और सुसमाचार में [भी], 1ली और बड़ी आज्ञा है, प्रभु परमेश्वर को सारे हृदय से प्रेम करना, और तब उसके समान एक आज्ञा आती है, अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना; व्यवस्था और सुसमाचार का रचयिता एक ही और वही दिखाया जाता है। क्योंकि पूर्ण सिद्ध जीवन की आज्ञाएँ, क्योंकि वे हर नियम में वही हैं, उसी परमेश्वर को [हमारे लिये] दिखा चुकी हैं, जिसने निश्चय हर एक के लिये उपयुक्त विशेष व्यवस्थाएँ प्रचार की हैं; परन्तु अधिक प्रमुख और बड़ी [आज्ञाएँ], जिनके बिना उद्धार [नहीं पाया जा सकता], उसने दोनों में वही [मानने के लिये हमें] उभारा है।
4. प्रभु भी इस [परमेश्वर] को नहीं हटाता, जब वह दिखाता है कि व्यवस्था दूसरे परमेश्वर से नहीं निकली, अपने को उन से इस प्रकार व्यक्त करते हुए जो उससे सिखाए जा रहे थे, भीड़ से और अपने चेलों से: "शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठते हैं। इसलिये जो कुछ वे तुम्हें मानने को कहें, वह मानो और करो; परन्तु उनके कामों के अनुसार न करो: क्योंकि वे कहते हैं, और करते नहीं। क्योंकि वे भारी बोझ बाँधते हैं, और उन्हें मनुष्यों के कंधों पर रखते हैं; परन्तु वे आप उन्हें उँगली से भी नहीं हिलाएँगे।"(4) इसलिये उसने उस व्यवस्था पर दोष नहीं डाला जो मूसा द्वारा दी गई थी, जब उसने उसे मानने को उभारा, यरूशलेम अभी कुशल में होते हुए; परन्तु उसने उन व्यक्तियों पर दोष डाला, क्योंकि उन्होंने व्यवस्था के वचन तो निश्चय दोहराए, तौभी प्रेम के बिना थे। और इस कारण वे परमेश्वर के विषय में अधर्मी, और अपने पड़ोसियों के विषय में अधर्मी, माने गए। जैसा यशायाह भी कहता है: "ये लोग अपने होठों से मेरा आदर करते हैं, परन्तु उनका हृदय मुझ से दूर है: तौभी वे व्यर्थ मेरी आराधना करते हैं, मनुष्यों की शिक्षाएँ और आज्ञाएँ सिखाते हुए।"(5) वह मूसा द्वारा दी गई व्यवस्था को मनुष्यों की आज्ञाएँ नहीं कहता, परन्तु eiders की अपनी परम्पराएँ जिन्हें उन्होंने गढ़ा था, और जिन्हें थामने में उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्था को निष्फल किया, और इस कारण भी उसके वचन के अधीन न हुए। क्योंकि इन मनुष्यों के विषय में पौलुस यह कहता है: "क्योंकि वे, परमेश्वर के धर्म से अनजान होकर, और अपनी ही धर्म को स्थिर करने को घूमते हुए, परमेश्वर के धर्म के अधीन नहीं हुए। क्योंकि मसीह हर एक के लिये जो विश्वास करता है धर्म के लिये व्यवस्था का अन्त है।"(6) और मसीह व्यवस्था का अन्त कैसे है, यदि वह उसका अन्तिम कारण भी न हो?
क्योंकि जिसने अन्त को लाया है उसी ने आरम्भ को भी किया है; और वही है जो मूसा से आप कहता है, "मैंने निश्चय अपने लोगों के क्लेश को देखा है जो मिस्र में है, और उन्हें छुड़ाने के लिये मैं उतर आया हूँ;"(7) क्लेश में पड़े हुओं को बचाने के उद्देश्य से चढ़ना और उतरना परमेश्वर के वचन के लिये आरम्भ से रीति रहा है।
5. अब, कि व्यवस्था ने पहले से मानवजाति को मसीह के पीछे चलने की आवश्यकता सिखाई, वह आप प्रगट करता है, जब उसने उससे इस प्रकार उत्तर दिया जिसने पूछा कि अनन्त जीवन का निज भाग पाने के लिये वह क्या करे: "यदि तू जीवन में प्रवेश करना चाहे, तो आज्ञाओं को मान।"(8) परन्तु दूसरे के पूछने पर "कौन सी?"" फिर प्रभु उत्तर देता है: "व्यभिचार न कर, हत्या न कर, चोरी न कर, झूठी गवाही न दे, पिता और माता का आदर कर, और तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करेगा,"--उसके पीछे चलना चाहनेवालों के सामने चढ़ती श्रृंखला के रूप में (velut gradus) व्यवस्था की आज्ञाओं को रखते हुए, जीवन में प्रवेश के रूप में; और जो उसने तब एक से कहा वह सब से कहा। परन्तु जब पहले वाले ने कहा, "ये सब मैं ने किए हैं" (और अधिक सम्भव है कि उसने उन्हें नहीं माना था, क्योंकि उस दशा में प्रभु उससे "आज्ञाओं को मान" न कहता), प्रभु ने, उसका लोभ खोलकर, उससे कहा, "यदि तू सिद्ध होना चाहे, जा, जो कुछ तेरा है सब बेच, और कंगालों को बाँट दे; और आकर, मेरे पीछे हो ले;" जो ऐसा करेंगे उन्हें प्रेरितों का भाग (apostolorum partem) प्रतिज्ञा करते हुए। और उसने अपने पीछे चलनेवालों को व्यवस्था द्वारा आरम्भ से प्रचार किए गए उसके सिवा दूसरे परमेश्वर पिता का प्रचार नहीं किया; न दूसरे पुत्र का; न माता का, एओन की एन्थुमेसिस, जो दुःख और धर्मत्याग में थी; न तीस एओनों के प्लेरोमा का, जो व्यर्थ, और विश्वास किए जाने में असमर्थ, सिद्ध किया गया है; न उस कथा का जिसे और मिथ्या शिक्षकों ने गढ़ा। परन्तु उसने सिखाया कि वे उन आज्ञाओं को मानें जिन्हें परमेश्वर ने आरम्भ से आज्ञा दी, और अच्छे कामों से अपने पूर्व लोभ को दूर करें,(9) और मसीह के पीछे चलें। परन्तु यह कि
कंगालों को बाँटी गई सम्पत्ति पूर्व लोभ को मिटा देती है, यह जक्कई ने स्पष्ट किया, जब उसने कहा, "देख, अपनी सम्पत्ति का आधा मैं कंगालों को देता हूँ; और यदि मैं ने किसी को धोखा दिया है, तो चौगुना फेर देता हूँ।"(1)
अध्याय 13.--मसीह ने व्यवस्था की स्वाभाविक आज्ञाओं को रद्द नहीं किया, परन्तु उन्हें पूरा किया और बढ़ाया। उसने पुरानी व्यवस्था के जूए और बन्धन को हटाया, कि मानवजाति, अब स्वतन्त्र की जाकर, उस भरोसे वाली भक्ति से परमेश्वर की सेवा करे जो पुत्रों को शोभा देती है।
1. और कि प्रभु ने व्यवस्था की स्वाभाविक [आज्ञाओं] को रद्द नहीं किया, जिनसे मनुष्य(2) धर्मी ठहरता है, जिन्हें विश्वास से धर्मी ठहराए गए लोग, और जिन्होंने परमेश्वर को प्रसन्न किया, व्यवस्था दिए जाने से पहले मानते थे, परन्तु कि उसने उन्हें बढ़ाया और पूरा किया, यह उसके वचनों से दिखाया जाता है। "क्योंकि," वह कहता है, "पुराने समय में उन से कहा गया था, व्यभिचार न करना। परन्तु मैं तुम से कहता हूँ, कि हर एक जिसने किसी स्त्री को उस पर लालसा करने को देखा है, वह अपने हृदय में उसके साथ पहले ही व्यभिचार कर चुका है।"(3) और फिर: "कहा गया है, तू हत्या न करेगा। परन्तु मैं तुम से कहता हूँ, हर एक जो अपने भाई पर बिना कारण क्रोध करता है, न्याय के डर में होगा।"(4) और, "कहा गया है, तू झूठी शपथ न खाएगा। परन्तु मैं तुम से कहता हूँ, बिलकुल शपथ न खाना; परन्तु तुम्हारी बात हाँ, हाँ, और नहीं, नहीं हो।"(5) और ऐसी ही और बातें। क्योंकि ये सब बीती [आज्ञाओं] के विरोध और उलटने को नहीं रखतीं या सूचित नहीं करतीं, जैसा मार्कियन के अनुयायी जोर से मानते हैं; परन्तु उनकी पूर्ति और बढ़ाव को [दिखाती हैं], जैसा वह आप घोषित करता है: "यदि तुम्हारा धर्म शास्त्रियों और फरीसियों के धर्म से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करोगे।"(6) क्योंकि सूचित की गई बढ़त का क्या अर्थ था? 1ले स्थान में, [हमें] केवल पिता पर ही नहीं, परन्तु अब प्रगट किए गए उसके पुत्र पर भी विश्वास करना चाहिए; क्योंकि वही मनुष्य को परमेश्वर के साथ संगति और एकता में ले जाता है। अगले स्थान में, [हमें] केवल कहना नहीं, परन्तु करना चाहिए; क्योंकि उन्होंने कहा, परन्तु किया नहीं। और [हमें] केवल बुरे कामों से नहीं, परन्तु उनकी लालसाओं से भी रुकना चाहिए। अब उसने ये बातें हमें व्यवस्था के विरुद्ध होने के रूप में नहीं सिखाईं, परन्तु व्यवस्था को पूरा करने, और व्यवस्था के विविध धर्म को हम में रोपने के रूप में।
वह व्यवस्था के विरुद्ध होता, यदि उसने अपने चेलों को वह कुछ करने की आज्ञा दी होती जिसे व्यवस्था ने मना किया था। परन्तु यह जो उसने आज्ञा दी--अर्थात्, केवल व्यवस्था द्वारा मना की गई बातों से नहीं, परन्तु उनकी लालसा से भी रुकना--[व्यवस्था] के विरुद्ध नहीं है, जैसा मैं ने कहा है, और न यह व्यवस्था को नष्ट करनेवाले की उक्ति है, परन्तु पूरा करनेवाले, बढ़ानेवाले, और उसे बड़ा विस्तार देनेवाले की।
2. क्योंकि व्यवस्था, जो बन्धन में पड़े हुओं के लिये ठहराई गई थी, उन शारीरिक वस्तुओं के द्वारा प्राण को सिखाती थी जो बाहरी स्वभाव की थीं, उसे एक बन्धन की नाई अपनी आज्ञाओं के मानने के लिये खींचती हुई, कि मनुष्य परमेश्वर की सेवा करना सीखे। परन्तु वचन ने प्राण को स्वतन्त्र किया, और सिखाया कि उसके द्वारा देह स्वेच्छा से शुद्ध की जाए। यह पूरा हो जाने पर, स्वाभाविक रीति से यह हुआ, कि दासत्व के बन्धन हटाए जाएँ, जिन के मनुष्य अब अभ्यस्त हो चुका था, और वह बेड़ियों के बिना परमेश्वर के पीछे चले: और यह भी, कि स्वतन्त्रता की व्यवस्थाएँ बढ़ाई जाएँ, और राजा के प्रति अधीनता बढ़े, ताकि बुलाया हुआ कोई भी उसे अयोग्य न ठहरे जिस ने उसे स्वतन्त्र किया, परन्तु घर के स्वामी के प्रति देय भक्ति और आज्ञाकारिता सेवक और सन्तान दोनों समान रूप से अर्पित करें; जबकि सन्तान [सेवकों से] अधिक भरोसा रखती है, क्योंकि स्वतन्त्रता का कार्य उस आज्ञाकारिता से बड़ा और अधिक महिमामय है जो [दासत्व की दशा में] अर्पित की जाती है।
3. इसी कारण प्रभु ने उस [आज्ञा] के बदले, "तू व्यभिचार न करना," कामना तक को मना किया; और जो इस प्रकार चलती है उसके बदले, "तू हत्या न करना," उस ने क्रोध को निषिद्ध किया; और दशमांश देने की आज्ञा देनेवाली व्यवस्था के बदले, [उस ने हमें कहा] अपनी सारी सम्पत्ति कंगालों के साथ बाँटने को(7); और केवल अपने पड़ोसियों से नहीं, अपने शत्रुओं से भी प्रेम करने को; और केवल उदार दाता और देनेवाले नहीं, वरन् यह भी कि जो हमारी वस्तुएँ ले जाते हैं उन्हें हम निःशुल्क दान दें। क्योंकि "जो तेरा कुरता ले ले," वह कहता है, "उसे अपनी चादर भी दे; और जो तेरी वस्तुएँ ले ले, उन से उन्हें फिर न माँग; और जैसा तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, वैसा तुम उनके साथ करो:"(8) ताकि हम उन की नाई शोक न करें जो ठगे जाना नहीं चाहते, परन्तु उन की नाई आनन्द करें जो स्वेच्छा से दे चुके हैं, और आवश्यकता के आगे झुकने से बढ़कर अपने पड़ोसियों पर उपकार करनेवालों की नाई। "और यदि कोई," वह कहता है, "तुझे एक मील [चलने को] विवश करे, उसके साथ दो चल;"(9) ताकि तू उसके पीछे दास की नाई न चले, परन्तु स्वतन्त्र मनुष्य की नाई उसके आगे चले, हर बात में अपने को कृपालु और अपने पड़ोसी के लिये उपयोगी दिखाते हुए, उनकी बुरी नीयत पर दृष्टि न रखकर, अपनी दयालु सेवाएँ करते हुए, अपने को पिता के समान बनाते हुए, "जो अपनी धूप को बुरों और भलों पर उदय करता है, और भेजता है
वर्षा धर्मियों और अधर्मियों पर।"(1) अब ये सब [आज्ञाएँ], जैसा मैं पहिले ही कह चुका हूँ, व्यवस्था को मिटानेवाले की आज्ञाएँ] नहीं थीं, परन्तु उसे हमारे बीच पूरा करनेवाले, बढ़ानेवाले, और चौड़ी करनेवाले की थीं; जैसा कोई कहे, कि स्वतन्त्रता का अधिक विस्तृत कार्य यह सूचित करता है कि हमारे छुड़ानेवाले के प्रति अधिक पूर्ण अधीनता और स्नेह हमारे भीतर बोया गया था। क्योंकि उस ने हमें इस उद्देश्य से स्वतन्त्र नहीं किया, कि हम उस से दूर चले जाएँ (कोई भी, सचमुच, जब तक प्रभु के उपकारों की पहुँच से बाहर रखा हो, अपने लिये उद्धार के साधन प्राप्त करने की शक्ति नहीं रखता), परन्तु यह कि हम उसका अनुग्रह जितना अधिक पाएँ, उतना अधिक उससे प्रेम करें। अब हम ने उससे जितना अधिक प्रेम किया है, पिता की उपस्थिति में निरन्तर रहते हुए हम उस से उतनी ही अधिक महिमा पाएँगे।
4. इसलिये, जब सब स्वाभाविक आज्ञाएँ हम को और उन्हें (यहूदियों को) सामान्य हैं, तो उन में सचमुच आरम्भ और उत्पत्ति थी; परन्तु हम में उन्होंने बढ़ती और पूर्णता पाई है। क्योंकि परमेश्वर को स्वीकृति देना, और उसके वचन के पीछे चलना, और उसे सब से अधिक प्रेम करना, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना (अब मनुष्य मनुष्य का पड़ोसी है), और हर बुरे काम से बचना, और वैसी ही प्रकृति की और सब बातें जो दोनों [वाचाओं] को सामान्य हैं, एक ही परमेश्वर को प्रगट करती हैं। परन्तु यह हमारा प्रभु है, परमेश्वर का वचन, जिस ने 1ले अवसर पर निश्चय दासों को परमेश्वर की ओर खींचा, परन्तु बाद में उस ने उन को स्वतन्त्र किया जो उसके अधीन थे, जैसा वह अपने चेलों से आप ही कहता है: "अब मैं तुम्हें दास नहीं कहूँगा, क्योंकि दास नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करता है; परन्तु मैं ने तुम्हें मित्र कहा है, क्योंकि जो कुछ मैं ने अपने पिता से सुना है वह सब मैं ने तुम्हें बता दिया है।"(2) क्योंकि जो वह कहता है, "अब मैं तुम्हें दास नहीं कहूँगा," उस में वह अत्यन्त स्पष्ट रीति से सूचित करता है कि वही था जिस ने पहिले मनुष्यों के लिये व्यवस्था के द्वारा परमेश्वर के विषय में वह बन्धन ठहराया, और तब बाद में उन्हें स्वतन्त्रता दी। और जो वह कहता है, "क्योंकि दास नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करता है," उस में वह अपने ही आगमन के द्वारा एक दास-दशा की प्रजा की अज्ञानता दिखाता है।
परन्तु जब वह अपने चेलों को "परमेश्वर के मित्र" कहता है, तब वह स्पष्ट घोषणा करता है कि वह आप परमेश्वर का वचन है, जिस के पीछे अब्राहम भी स्वेच्छा से और बिना विवशता के (सिने विन्कुलिस) चला, अपने विश्वास के उत्तम स्वभाव के कारण, और इस प्रकार "परमेश्वर का मित्र" बना।(3) परन्तु परमेश्वर के वचन ने अब्राहम की मित्रता को इस प्रकार ग्रहण नहीं किया मानो उसे उसकी आवश्यकता हो, क्योंकि वह आदि से सिद्ध था ("अब्राहम के होने से पहिले," वह कहता है, "मैं हूँ"(4)), परन्तु यह कि वह अपनी भलाई में अब्राहम को ही अनन्त जीवन दे, क्योंकि परमेश्वर की मित्रता उसे ग्रहण करनेवालों को अमरता देती है।
अध्याय चौदह.--यदि परमेश्वर मनुष्य से आज्ञाकारिता माँगता है, यदि उस ने मनुष्य को रचा, उसे बुलाया और उसे व्यवस्थाओं के अधीन रखा, तो यह केवल मनुष्य के कल्याण के लिये था; यह नहीं कि परमेश्वर को मनुष्य की आवश्यकता थी, परन्तु यह कि उस ने अनुग्रह से हर सम्भव रीति से मनुष्य पर अपने अनुग्रह प्रदान किए।
1. इसलिये आदि में परमेश्वर ने आदम को रचा, मानो उसे मनुष्य की आवश्यकता हो ऐसा नहीं, परन्तु यह कि उसे [कोई] हो जिस पर वह अपने उपकार प्रदान करे। क्योंकि केवल आदम से पहिले ही नहीं, सारी सृष्टि से पहिले भी, वचन ने अपने पिता की महिमा की, उस में रहते हुए; और पिता के द्वारा आप महिमा पाई, जैसा उस ने आप कहा, "हे पिता, उस महिमा से मेरी महिमा कर जो जगत के होने से पहिले तेरे साथ मेरी थी।"(5) और जब उस ने हमें अपने पीछे चलने की आज्ञा दी तब उसे हमारी सेवा की आवश्यकता नहीं थी; परन्तु उस ने इस प्रकार हम पर ही उद्धार प्रदान किया। क्योंकि उद्धारकर्ता के पीछे चलना उद्धार का भागी होना है, और ज्योति के पीछे चलना ज्योति पाना है। परन्तु जो ज्योति में हैं वे आप ज्योति को प्रकाशित नहीं करते, परन्तु उसके द्वारा प्रकाशित और प्रगट किए जाते हैं: वे निश्चय उसे कुछ नहीं देते, परन्तु उपकार पाकर ज्योति से प्रकाशित होते हैं। इसी प्रकार, परमेश्वर की [की गई] सेवा परमेश्वर को सचमुच कुछ लाभ नहीं करती, और परमेश्वर को मानवीय आज्ञाकारिता की आवश्यकता नहीं; परन्तु वह अपने पीछे चलनेवालों और अपनी सेवा करनेवालों को जीवन और अविनाशिता और अनन्त महिमा देता है, [उस की] सेवा करनेवालों पर उपकार करते हुए, क्योंकि वे उसकी सेवा करते हैं, और उसके पीछे चलनेवालों पर, क्योंकि वे उसके पीछे चलते हैं; परन्तु उन से कोई उपकार नहीं लेता: क्योंकि वह धनी है, सिद्ध है, और किसी वस्तु का मोहताज नहीं। परन्तु इसी कारण परमेश्वर मनुष्यों से सेवा माँगता है, ताकि वह भला और दयालु होने से अपनी सेवा में बने रहनेवालों का उपकार करे। क्योंकि जितना परमेश्वर किसी वस्तु का मोहताज नहीं, उतना ही मनुष्य को परमेश्वर की संगति की आवश्यकता है। क्योंकि मनुष्य की महिमा यही है, कि वह परमेश्वर की सेवा में निरन्तर और स्थायी रूप से बना रहे।
इसलिये प्रभु ने अपने चेलों से भी कहा, "तुम ने मुझे नहीं चुना, परन्तु मैं ने तुम्हें चुना है;"(6) यह सूचित करते हुए कि जब वे उसके पीछे चले तब उन्होंने उसकी महिमा नहीं की; परन्तु परमेश्वर के पुत्र के पीछे चलते हुए वे उसके द्वारा महिमा पाए। और फिर, "मैं चाहता हूँ कि जहाँ मैं हूँ वहाँ वे भी हों, कि वे मेरी महिमा देखें;"(7) इस कारण व्यर्थ घमण्ड नहीं करते हुए, परन्तु यह चाहते हुए कि उसके चेले उसकी महिमा में भागी हों: जिन के विषय में एसैया भी कहता है, "मैं तेरे वंश को पूर्व से लाऊँगा, और तुझे से इकट्ठा करूँगा
पश्चिम; और मैं उत्तर से कहूँगा, दे दे; और दक्षिण से, रोक न रख: मेरे पुत्रों को दूर से, और मेरी पुत्रियों को पृथ्वी के छोरों से लाओ; सब, जितने मेरे नाम में बुलाए गए हैं: क्योंकि अपनी महिमा में मैं ने उसे तैयार किया, और रचा, और बनाया है।"(1) इसलिये, "जहाँ लोथ है, वहाँ उकाब भी इकट्ठे होंगे,"(2) के अनुसार हम प्रभु की महिमा में भागी होते हैं, जिस ने हमें रचा भी है, और इसके लिये हमें तैयार किया है, कि जब हम उसके साथ हों, तब उसकी महिमा के भागी हों।
2. इसी प्रकार यह भी हुआ, कि परमेश्वर ने 1ले में मनुष्य को रचा, अपनी उदारता के कारण; परन्तु उनके उद्धार के निमित्त कुलपतियों को चुना; और पहिले से एक प्रजा को तैयार किया, हठीलों को परमेश्वर के पीछे चलना सिखाते हुए; और पृथ्वी पर भविष्यद्वक्ताओं को उठाया, मनुष्य को अपनी पवित्र आत्मा को [अपने भीतर] धारण करने और परमेश्वर के साथ संगति रखने का अभ्यस्त करते हुए: वह आप, सचमुच, किसी वस्तु का मोहताज न होकर, परन्तु जिन को उसकी आवश्यकता थी उन्हें अपने साथ संगति देते हुए, और एक शिल्पी की नाई, जो उसे भाते थे उन के लिये उद्धार की रूपरेखा खींचते हुए। और मिस्र में जो उसे नहीं देखते थे उन को उस ने आप ही मार्गदर्शन दिया, जब कि जंगल में जो निरंकुश हो गए उन के लिये [उन की दशा के] बहुत योग्य व्यवस्था प्रचारित की। तब, जो प्रजा अच्छे देश में प्रवेश हुई उस पर उस ने एक उत्तम मीरास दी; और पिता की ओर फिरे हुओं के लिये पलता हुआ बछड़ा काटा, और उन्हें उत्तम वस्त्र पहनाया।(3) इस प्रकार, अनेक रीतियों से, उस ने मनुष्यजाति को उद्धार के साथ मेल में लगाया। इसी कारण यूहन्ना भी प्रकाशितवाक्य में कहता है, "और उसका शब्द बहुत जलों के शब्द के समान।"(4) क्योंकि [परमेश्वर की] पवित्र आत्मा सचमुच बहुत जलों [के समान] है, क्योंकि पिता धनी भी है और महान भी है। और वचन, उन [मनुष्यों] सब में से होकर, अपनी प्रजा पर उदारता से उपकार करता रहा, [उन में] हर वर्ग के अनुकूल और लागू व्यवस्था को लेख में रचकर।
3. इसी प्रकार उस ने [यहूदी] प्रजा पर निवास का बनाना, मन्दिर का बनाना, लेवियों का चुनना, बलिदान भी, और अर्पण, व्यवस्था की चेतावनियाँ, और व्यवस्था की और सब सेवा रखी। उसे आप सचमुच इन में से किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह सदा सब भलाई से पूर्ण है, और मूसा के होने से पहिले भी अपने में कृपा की सारी सुगन्ध, और सुगन्धित गन्धों का हर इत्र रखता था। और भी, जो प्रजा मूर्तियों की ओर मुड़ने को प्रवृत्त थी, उस ने उसे सिखाया, बार बार बिनती करके उन्हें स्थिर रहने और परमेश्वर की सेवा करने की शिक्षा देते हुए, गौण बातों के द्वारा उन्हें प्रधान महत्व की बातों की ओर बुलाते हुए; अर्थात्, रूपक बातों के द्वारा वास्तविक बातों की ओर; और कालिक बातों के द्वारा अनन्त की ओर; और शारीरिक के द्वारा आत्मिक की ओर; और पार्थिव के द्वारा स्वर्गीय की ओर; जैसा मूसा से भी कहा गया, "जो वस्तुएँ तू ने पर्वत पर देखीं, उन के नमूने के अनुसार तू सब वस्तुएँ बनाएगा।"(5) क्योंकि चालीस दिन वह परमेश्वर के वचन, और स्वर्गीय नमूने, और आत्मिक प्रतिमाएँ, और आनेवाली बातों के रूपकों को [अपनी स्मृति में] रखना सीख रहा था; जैसा पौलुस भी कहता है: "क्योंकि उन्होंने उस चट्टान से पिया जो उनके पीछे पीछे चली: और वह चट्टान मसीह थी।"(6) और फिर, व्यवस्था में जो बातें हैं उनका 1ले में उल्लेख करके, वह आगे कहता है: "अब ये सब बातें उन पर रूपक में हुईं; परन्तु वे हमारी चेतावनी के लिये लिखी गईं, जिन पर युगों का अन्त आ पहुँचा है।" क्योंकि रूपकों के द्वारा उन्होंने परमेश्वर का भय मानना, और उसकी सेवा के प्रति समर्पित बने रहना सीखा।
अध्याय पन्द्रह.--1ले में परमेश्वर ने स्वाभाविक व्यवस्था, अथवा दस आज्ञाओं को, मनुष्यों के हृदयों पर लिखना पर्याप्त समझा; परन्तु बाद में उस ने यह आवश्यक पाया कि मूसा की व्यवस्था के जूए से उन यहूदियों की अभिलाषाओं को लगाम दे जो अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग कर रहे थे; और उनके हृदयों की कठोरता के कारण कुछ विशेष आज्ञाएँ भी जोड़ दे।
1. इसलिये उन्हें (यहूदियों को) एक व्यवस्था, एक अनुशासन का क्रम, और आनेवाली बातों की भविष्यद्वाणी थी। क्योंकि परमेश्वर ने 1ले में, सचमुच, स्वाभाविक आज्ञाओं के द्वारा उन्हें चेतावनी देते हुए, जिन्हें आदि से उस ने मनुष्यजाति में बोया था, अर्थात् दस आज्ञाओं के द्वारा (जिन्हें यदि कोई नहीं मानता, तो उसे उद्धार नहीं), तब उन से और कुछ नहीं माँगा। जैसा मूसा व्यवस्थाविवरण में कहता है, "ये वे सब बातें हैं जो प्रभु ने पर्वत पर इस्राएल के पुत्रों की सारी सभा से कहीं, और उस ने और कुछ नहीं जोड़ा; और उस ने उन्हें पत्थर की दो पटियाओं पर लिखकर मुझे दिया।"(7) इस कारण [उस ने ऐसा किया], कि जो उसके पीछे चलने को तैयार हैं वे इन आज्ञाओं को मानें। परन्तु जब वे बछड़ा बनाने को मुड़े, और अपने मन में मिस्र की ओर लौट गए, स्वतन्त्र मनुष्यों के बदले दास होना चाहते हुए, वे भविष्य के लिये अपनी इच्छा के योग्य दासत्व की दशा में रखे गए,--[एक दासत्व] जो सचमुच उन्हें परमेश्वर से काटता नहीं था, परन्तु उन्हें बन्धन के जूए के अधीन करता था; जैसा भविष्यद्वक्ता यहेजकेल, ऐसी व्यवस्था देने के कारण बताते हुए, कहता है: "और उनकी आँखें उनके हृदय की अभिलाषा के पीछे थीं; और मैं ने उन्हें ऐसी विधि दी जो अच्छी नहीं थी, और ऐसे नियम जिन में वे जीवित न रहेंगे।"(8)
लूका ने भी लिखा है कि स्तिफनुस, जो प्रेरितों के द्वारा सेवा-कार्य में 1ला चुना गया,(1) और जो मसीह की गवाही के लिये 1ला मारा गया, मूसा के विषय में इस प्रकार बोला: "इस मनुष्य ने सचमुच जीवते परमेश्वर की आज्ञाएँ हमें देने के लिये पाईं, जिन की तुम्हारे बापों ने आज्ञा नहीं मानी, परन्तु [उसे उन से] ठेल दिया, और अपने हृदयों में फिर मिस्र की ओर लौट गए, हारून से कहकर, हमारे आगे चलने के लिये हमारे लिये देवता बना; क्योंकि हम नहीं जानते कि [इस] मूसा को क्या हुआ, जो हमें मिस्र देश से निकाल ले आया। और उन दिनों में उन्होंने एक बछड़ा बनाया, और मूर्ति को बलिदान चढ़ाए, और अपने हाथों के कामों में आनन्द कर रहे थे। परन्तु परमेश्वर मुड़ा, और उन्हें स्वर्ग के गणों की पूजा करने को सौंप दिया; जैसा भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तक में लिखा है:(2) हे इस्राएल के घराने, क्या तुम ने जंगल में चालीस वर्ष मुझे बलिदान और अर्पण चढ़ाए? और तुम ने मोलेक का तम्बू, और देवता रेम्फान(3) का तारा उठा लिया, वे आकृतियाँ जिन्हें तुम ने उनकी पूजा करने के लिये बनाईं;"(4) स्पष्ट दिखाते हुए, कि ऐसी होने से व्यवस्था उन्हें दूसरे परमेश्वर के द्वारा नहीं दी गई, परन्तु उनकी दासत्व की दशा के अनुकूल, [हम जिस की आराधना करते हैं उसी परमेश्वर] से [उद्भव हुई]। इसलिये वह निर्गमन में भी मूसा से कहता है: "मैं अपने दूत को तेरे आगे भेजूँगा; क्योंकि मैं तेरे साथ ऊपर नहीं जाऊँगा, क्योंकि तू हठीली गर्दनवाली प्रजा है।"(5)
2. और केवल यही नहीं, परन्तु प्रभु ने यह भी दिखाया कि कुछ आज्ञाएँ मूसा के द्वारा उन के लिये ठहराई गईं, उन की [हृदय की] कठोरता के कारण, और आज्ञाकारी होने की उन की अनिच्छा के कारण, जब उन्होंने उस से कहा, "तो मूसा ने त्यागपत्र देकर पत्नी को छोड़ देने की आज्ञा क्यों दी?" तब उस ने उन से कहा, "तुम्हारे हृदयों की कठोरता के कारण उस ने ये बातें तुम्हें करने दीं; परन्तु आदि से ऐसा नहीं था;"(6) इस प्रकार मूसा को विश्वासयोग्य सेवक के रूप में निर्दोष ठहराते हुए, परन्तु एक ही परमेश्वर को मानते हुए, जिस ने आदि से नर और नारी को बनाया, और उन्हें कठोर हृदय और आज्ञा न माननेवाले ठहराकर डाँटते हुए। और इसलिये ही उन्होंने मूसा से त्याग की यह व्यवस्था पाई, जो उनके कठोर स्वभाव के अनुकूल थी। परन्तु पुराने नियम के विषय में मैं ये बातें क्यों कहूँ?
क्योंकि नये में भी प्रेरित यही काम करते पाए जाते हैं, जिस आधार का उल्लेख हुआ है उस पर, पौलुस स्पष्ट कहता है, परन्तु ये बातें मैं कहता हूँ, प्रभु नहीं।"(7) और फिर: "परन्तु यह मैं अनुमति से कहता हूँ, आज्ञा से नहीं।"(8) और फिर: "अब, कुँवारियों के विषय में, प्रभु की ओर से मुझे कोई आज्ञा नहीं; तौभी मैं अपना निर्णय देता हूँ, प्रभु की दया पाकर विश्वासयोग्य रहनेवाले की नाई।"(9) और आगे, दूसरे स्थान पर वह कहता है: "ताकि शैतान तुम्हारे असंयम के कारण तुम्हें परीक्षा में न डाले।"(10) इसलिये, यदि नयी वाचा में भी प्रेरित मानवीय दुर्बलता को ध्यान में रखकर कुछ आज्ञाएँ देते पाए जाते हैं, कुछ के असंयम के कारण, कहीं ऐसा न हो कि ऐसे लोग कठोर होकर, और अपने उद्धार से सर्वथा निराश होकर, परमेश्वर से धर्मत्यागी हो जाएँ,- -तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए, यदि पुराने नियम में भी वही परमेश्वर अपनी प्रजा के लाभ के लिये ऐसी ही छूट देता रहा, पहिले कही हुई विधियों के द्वारा उन्हें खींचते हुए, ताकि वे उन के द्वारा उद्धार का दान पाएँ, जब तक वे दस आज्ञाओं को मानते रहे, और उसके द्वारा रोके जाकर मूर्तिपूजा की ओर न लौटें, और न परमेश्वर से धर्मत्याग करें, परन्तु पूरे हृदय से उससे प्रेम करना सीखें।
और यदि कुछ लोग, आज्ञा न माननेवाले और नाश हुए इस्राएलियों के कारण, यह दृढ़ करते हैं कि व्यवस्था देनेवाला (दोक्तोर) सामर्थ में सीमित था, तो वे हमारी व्यवस्था में पाएँगे, कि "बहुत बुलाए जाते हैं, परन्तु थोड़े चुने जाते हैं;"(11) और यह कि ऐसे लोग हैं जो भीतर से भेड़िए हैं, तौभी जगत की दृष्टि में (फोरिस) भेड़ का भेष धारण करते हैं; और यह कि परमेश्वर ने मनुष्य में स्वतन्त्रता और स्वशासन की शक्ति सदा रखी है,(12) और उसी समय उस ने अपनी ही उपदेश दिए, ताकि जो उसकी आज्ञा नहीं मानते वे धर्म से न्याय पाएँ (दोषी ठहराए जाएँ) क्योंकि उन्होंने उसकी आज्ञा नहीं मानी; और जिन्होंने आज्ञा मानी और उस पर विश्वास किया वे अमरता से आदर पाएँ।
अध्याय सोलह.--सिद्ध धर्म न खतने से और न किसी और व्यवस्था की विधि से दिया गया। दस आज्ञाएँ, परन्तु, मसीह के द्वारा रद्द नहीं की गईं, परन्तु सदा प्रबल हैं: मनुष्य उसकी आज्ञाओं से कभी छूटे नहीं।
1. और भी, हम पवित्रशास्त्र से ही सीखते हैं, कि परमेश्वर ने खतना दिया, धर्म को पूरा करनेवाले के रूप में नहीं, परन्तु चिह्न के रूप में, कि अब्राहम की सन्तान पहचानी जाती रहे। क्योंकि वह कहता है: "परमेश्वर ने अब्राहम से कहा, तुम में हर नर का खतना होगा; और तुम अपनी अग्रत्वचा के मांस का खतना करोगे, मेरे और तुम्हारे बीच वाचा के चिह्न के लिये।"(13) यही भविष्यद्वक्ता यहेजकेल सब्तों के विषय में कहता है: "मैं ने उन्हें अपने सब्त भी दिए, मेरे और उनके बीच चिह्न होने के लिये, कि वे जानें कि मैं प्रभु हूँ, जो उन्हें पवित्र करता हूँ।"(14) और निर्गमन में, परमेश्वर कहता है
मूसा: "और तुम मेरे सब्त मानोगे; क्योंकि वह तुम्हारी पीढ़ियों के लिये मेरे और तुम्हारे बीच चिह्न होगा।"(1) तब ये बातें चिह्न के लिये दी गईं; परन्तु चिह्न रूपक-रहित नहीं थे, अर्थात् न अर्थहीन और न निष्प्रयोजन, क्योंकि वे एक बुद्धिमान शिल्पी के द्वारा दिए गए; परन्तु मांस के अनुसार खतना उस खतने का रूपक था जो आत्मा के अनुसार है। क्योंकि "हम," प्रेरित कहता है, "हाथों से न किए हुए खतने से खतना पाए हैं।"(2) और भविष्यद्वक्ता कहता है, "अपने हृदय की कठोरता का खतना करो।"(3) परन्तु सब्तों ने सिखाया कि हम दिन प्रतिदिन परमेश्वर की सेवा में बने रहें।(4) "क्योंकि हम गिने गए हैं," प्रेरित पौलुस कहता है, "वध की भेड़ों की नाई दिन भर;"(5) अर्थात्, [परमेश्वर के लिये] पवित्र किए हुए, और अपने विश्वास की निरन्तर सेवा करते हुए, और उस में स्थिर रहकर, और सब लोभ से बचकर, और पृथ्वी पर धन न कमाते और न रखते हुए।(6) और भी, परमेश्वर का सब्त (रेक्विएतियो देई), अर्थात् राज्य, सृजी हुई वस्तुओं के द्वारा मानो सूचित किया गया; जिस [राज्य] में, जो मनुष्य परमेश्वर की सेवा में स्थिर रहेगा (देओ अस्सिस्तेरे) वह विश्राम की दशा में परमेश्वर की मेज का भागी होगा।
2. और यह कि मनुष्य इन बातों से धर्मी नहीं ठहराया गया, परन्तु वे प्रजा को चिह्न के रूप में दी गईं, यह तथ्य दिखाता है,--कि अब्राहम आप, खतने के बिना और सब्त मानने के बिना, "परमेश्वर पर विश्वास किया, और वह उसके लिये धर्म गिना गया; और वह परमेश्वर का मित्र कहलाया।"(7) तब, फिर, लूत, खतने के बिना, सदोम से बाहर लाया गया, परमेश्वर से उद्धार पाते हुए। वैसे ही नूह ने भी, परमेश्वर को भाते हुए, यद्यपि वह खतना-रहित था, 2री जाति [के मनुष्यों] के जगत की [सन्दूक की] मापें पाईं। हनोक ने भी, परमेश्वर को भाते हुए, खतने के बिना, यद्यपि वह मनुष्य था, दूतों के पास परमेश्वर के दूत का पद निबाहा, और उठा लिया गया, और अब तक परमेश्वर के धर्ममय न्याय के साक्षी के रूप में रखा गया है, क्योंकि दूत जब अपराध कर चुके तब न्याय के लिये पृथ्वी पर गिरे, परन्तु जो मनुष्य [परमेश्वर को] भाया वह उद्धार के लिये उठा लिया गया।(8) और भी, अब्राहम से पहिले रहनेवाले उन धर्मियों की भीड़ में से शेष सब, और मूसा से पहिले के कुलपति, ऊपर कही बातों से स्वतन्त्र, और मूसा की व्यवस्था के बिना, धर्मी ठहराए गए। जैसा मूसा आप भी व्यवस्थाविवरण में प्रजा से कहता है: "तेरे परमेश्वर प्रभु ने होरेब में एक वाचा बाँधी। प्रभु ने यह वाचा तुम्हारे बापों से नहीं, तुम्हारे लिये बाँधी।"(9)
3. तो प्रभु ने बापों के लिये वाचा क्यों नहीं बाँधी? क्योंकि "व्यवस्था धर्मियों के लिये नहीं ठहराई गई।"(10) परन्तु धर्मी बापों के हृदयों और प्राणों में दस आज्ञाओं का अर्थ लिखा था,(11) अर्थात्, उन्होंने उस परमेश्वर से प्रेम किया जिस ने उन्हें बनाया, और अपने पड़ोसी को हानि नहीं पहुँचाई। इसलिये कोई अवसर नहीं था कि वे निषेधात्मक आज्ञाओं से (कोरेप्तोरिइस लितेरिस),(12) सावधान किए जाएँ, क्योंकि उन में व्यवस्था की धार्मिकता थी। परन्तु जब यह धार्मिकता और परमेश्वर के प्रति प्रेम विस्मृति में चला गया, और मिस्र में मिट गया, तब परमेश्वर ने अवश्य, मनुष्यों के प्रति अपनी बड़ी सद्भावना के कारण, वाणी से अपने आप को प्रगट किया, और प्रजा को सामर्थ से मिस्र से निकाल ले गया, ताकि मनुष्य फिर परमेश्वर का चेला और अनुयायी बने; और उस ने आज्ञा न माननेवालों को दुख दिया, कि वे अपने सृष्टिकर्ता को तुच्छ न जानें; और उन को मन्ना से खिलाया, कि वे अपने प्राणों के लिये भोजन पाएँ (उति रातिओनालेम अच्चिपेरेंत एस्कम); जैसा मूसा व्यवस्थाविवरण में भी कहता है: "और तुझे मन्ना से खिलाया, जिसे तेरे बाप नहीं जानते थे, कि तू जाने कि मनुष्य cloth केवल रोटी से नहीं जीता; परन्तु उसके मुँह से निकलनेवाले परमेश्वर के हर वचन से मनुष्य जीता है।"(13) और उस ने परमेश्वर के प्रति प्रेम की आज्ञा दी, और हमारे पड़ोसी के प्रति न्यायपूर्ण व्यवहार सिखाया, कि हम न अन्यायी हों और न परमेश्वर के अयोग्य, जो दस आज्ञाओं के माध्यम से मनुष्य को अपनी मित्रता के लिये तैयार करता है, और वैसे ही उसके पड़ोसी के साथ मेल के लिये,-- वे बातें निश्चय मनुष्य का ही लाभ करती थीं; परमेश्वर, परन्तु, मनुष्य से किसी वस्तु का मोहताज न रहकर।
4. और इसलिये पवित्रशास्त्र कहता है, "ये बातें प्रभु ने पर्वत पर इस्राएल की सन्तानों की सारी सभा से कहीं, और उस ने और कुछ नहीं जोड़ा;"(14) क्योंकि, जैसा मैं पहिले ही कह चुका हूँ, उसे उन से किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं थी। और फिर मूसा कहता है: "और अब, हे इस्राएल, तेरा परमेश्वर प्रभु तुझ से क्या cloth माँगता है, सिवाय इसके कि तू अपने परमेश्वर प्रभु का भय माने, उसके सब मार्गों पर चले, और उससे प्रेम करे, और अपने परमेश्वर प्रभु की सेवा अपने सारे हृदय से, और अपने सारे प्राण से करे?"(15) अब इन बातों ने सचमुच मनुष्य को महिमामय किया, जो उसे नहीं था उसे पूरा करके, अर्थात् परमेश्वर की मित्रता; परन्तु वे परमेश्वर को कुछ लाभ नहीं करती थीं, क्योंकि परमेश्वर बिलकुल नहीं
मनुष्य के प्रेम का मोहताज था। क्योंकि परमेश्वर की महिमा मनुष्य को नहीं थी, जिसे वह परमेश्वर की सेवा करने के सिवा और किसी रीति से नहीं पा सकता था। और इसलिये मूसा उन से फिर कहता है: "जीवन को चुन, कि तू जीवित रहे, और तेरा वंश, अपने परमेश्वर प्रभु से प्रेम करने, उसकी वाणी सुनने, उससे लिपटे रहने के लिये; क्योंकि यही तेरा जीवन है, और तेरे दिनों की लम्बाई।"(1) मनुष्य को इस जीवन के लिये तैयार करते हुए, प्रभु आप ही अपने ही व्यक्ति में सब को समान रूप से दस आज्ञाओं की बातें बोला; और इसलिये, उसी रीति से, वे हमारे साथ स्थायी रूप से रहती हैं,(2) मांस में उसके आगमन के द्वारा विस्तार और बढ़ती पाती हुई, परन्तु निरसन नहीं।
5. बन्धन की व्यवस्थाएँ, परन्तु, मूसा के द्वारा प्रजा को एक एक करके प्रचारित की गईं, उनकी शिक्षा के अथवा उनकी दण्ड के योग्य, जैसा मूसा आप ने कहा: "और प्रभु ने उस समय मुझे आज्ञा दी कि मैं तुम्हें विधि और नियम सिखाऊँ।"(3) इसलिये ये बातें, जो बन्धन के लिये, और उन्हें चिह्न के लिये दी गई थीं, उस ने स्वतन्त्रता की नयी वाचा के द्वारा रद्द कीं। परन्तु उस ने उन व्यवस्थाओं को बढ़ाया और चौड़ी किया जो स्वाभाविक, और उत्तम, और सब को सामान्य हैं, मनुष्यों को ग्रहण-पुत्रत्व के द्वारा बड़े रूप में और बिना कुढ़न के यह देते हुए, कि वे परमेश्वर पिता को जानें, और पूरे हृदय से उससे प्रेम करें, और उसके वचन के पीछे अटल चलें, जब वे केवल बुरे कामों से नहीं, वरन् उन की अभिलाषा से भी बचते हैं। परन्तु उस ने आदर के भाव को भी बढ़ाया; क्योंकि पुत्रों को दासों से अधिक सम्मान, और अपने पिता के प्रति अधिक प्रेम रखना चाहिए। और इसलिये प्रभु कहता है, "मनुष्य जो भी निकम्मी बात बोलें, न्याय के दिन वे उसका लेखा देंगे।"(4) और, "जो किसी स्त्री पर बुरी दृष्टि डालकर उसे चाहता है, वह अपने हृदय में उस से व्यभिचार कर ही चुका है;"(5) और, "जो अपने भाई पर अकारण क्रोध करता है, वह न्याय के जोखिम में होगा।"(6) [यह सब कहा जाता है,] कि हम जानें कि हम परमेश्वर को केवल कामों का नहीं, दासों की नाई, वरन् बातों और विचारों का भी लेखा देंगे, उन की नाई जिन्होंने सचमुच स्वतन्त्रता की सामर्थ पाई है, जिस [दशा] में मनुष्य अधिक कठोरता से जाँचा जाता है, कि वह प्रभु का आदर करेगा, और डर मानेगा, और प्रेम करेगा या नहीं। और इसी कारण पतरस कहता है "कि हमारे पास दुष्टता के ओढ़ने के रूप में स्वतन्त्रता नहीं है,"(7) परन्तु विश्वास को जाँचने और प्रमाणित करने के साधन के रूप में।
अध्याय सत्रह.--प्रमाण कि परमेश्वर ने लेवीय प्रबन्ध अपने निमित्त नहीं ठहराया, अथवा ऐसी सेवा की आवश्यकता के रूप में नहीं; क्योंकि वह, वस्तुतः, मनुष्यों से कुछ नहीं चाहता।
1. और भी, भविष्यद्वक्ता पूरी रीति से सूचित करते हैं कि परमेश्वर को उनकी दास-आज्ञाकारिता की आवश्यकता नहीं थी, परन्तु अपने ही कारण उस ने व्यवस्था में कुछ विधियाँ ठहराईं। और फिर, कि परमेश्वर को उनके अर्पण की आवश्यकता नहीं थी, परन्तु [केवल उसे माँगा], उसे चढ़ानेवाले मनुष्य के कारण ही, प्रभु ने स्पष्ट सिखाया, जैसा मैं बता चुका हूँ। क्योंकि जब उस ने उन्हें धर्म की उपेक्षा करते, और परमेश्वर के प्रेम से दूर रहते, और यह कल्पना करते देखा कि परमेश्वर बलिदानों और और रूपक विधियों से प्रसन्न किया जाएगा, तब शमूएल ने उन से यहाँ तक इस प्रकार कहा: "परमेश्वर पूर्ण होमबलि और बलिदान नहीं चाहता, परन्तु वह चाहता है कि उसकी वाणी सुनी जाए। देख, तैयार आज्ञाकारिता बलिदान से उत्तम है, और सुनना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है।"(8) दाऊद भी कहता है: "बलिदान और अर्पण तू ने नहीं चाहा, परन्तु मेरे कानों को तू ने सिद्ध किया है;(9) पाप के लिये होमबलि भी तू ने नहीं माँगी।"(10) वह इस प्रकार उन्हें सिखाता है कि परमेश्वर आज्ञाकारिता चाहता है, जो उन्हें सुरक्षित करती है, बलिदानों और होमबलियों से बढ़कर, जो धर्म की ओर उन्हें कुछ काम नहीं आतीं; और [इस घोषणा से] वह उसी समय नयी वाचा की भविष्यद्वाणी करता है। और भी स्पष्ट वह 50वें भजन में इन बातों को कहता है: "क्योंकि यदि तू बलिदान चाहता, तो मैं उसे देता: तू होमबलियों से प्रसन्न नहीं होगा। परमेश्वर का .बलिदान टूटी हुई आत्मा है; टूटे और पिसे हुए हृदय को प्रभु तुच्छ नहीं जानेगा।"(11) इसलिये, क्योंकि परमेश्वर किसी वस्तु का मोहताज नहीं, वह पिछले भजन में कहता है: "मैं तेरे घर से बछड़े नहीं लूँगा, और न तेरे बाड़े से बकरे। क्योंकि पृथ्वी के सब पशु मेरे हैं, पहाड़ों पर के झुण्ड और बैल: मैं आकाश के सब पक्षियों को जानता हूँ, और मैदान के विभिन्न गोत्र(12) मेरे हैं।
यदि मैं भूखा होता, तो तुझे न बताता: क्योंकि जगत मेरा है, और उसकी परिपूर्णता भी। क्या मैं बैलों का मांस खाऊँ, अथवा बकरों का लोहू पीऊँ?"(13) तब, कहीं ऐसा न समझा जाए कि उस ने अपने क्रोध में ये बातें ठुकराईं, वह आगे कहता है, उसे (मनुष्य को) सम्मति देते हुए: "परमेश्वर को स्तुति का बलिदान चढ़ा, और परमप्रधान के लिये अपनी मन्नतें पूरी कर; और संकट के दिन मुझे पुकार, मैं तुझे छुड़ाऊँगा, और तू मेरी महिमा करेगा;"(14) सचमुच उन बातों को ठुकराते हुए जिन से पापी कल्पना करते थे कि वे परमेश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं, और दिखाते हुए कि वह आप किसी वस्तु का मोहताज नहीं; परन्तु वह उन्हें उन की ओर उपदेश और सम्मति देता है।
बातें जिन से मनुष्य धर्मी ठहरता और परमेश्वर के निकट आता है। यही घोषणा एसैया करता है: "तुम्हारे बलिदानों की बहुतायत मुझ से किस काम की? प्रभु कहता है। मैं भर गया हूँ।"(1) और जब उस ने होमबलियों, और बलिदानों, और अर्पणों को, वैसे ही नए चाँद, और सब्त, और पर्व, और इन के साथ की शेष सब सेवाओं को ठुकरा दिया, तब वह आगे कहता है, उन्हें उद्धार से सम्बन्धित बात की ओर उभारते हुए: "धो लो, अपने को शुद्ध करो, मेरी आँखों के साम्हने से अपने हृदयों से दुष्टता दूर करो: अपने बुरे मार्गों से रुक जाओ, भलाई करना सीखो, न्याय को खोजो, सताए हुए को छुड़ाओ, अनाथ का न्याय करो, विधवा की पैरवी करो; आओ, हम आपस में वाद-विवाद करें, प्रभु कहता है।"
2. क्योंकि उस ने मनुष्य की नाई क्रोधित होकर उनके बलिदान नहीं ठुकराए, जैसा बहुत लोग कहने का साहस करते हैं; परन्तु उनकी अन्धापन पर करुणा से, और उन्हें सच्चा बलिदान सुझाने के विचार से, जिसे चढ़ाकर वे परमेश्वर को प्रसन्न करेंगे, कि वे उस से जीवन पाएँ। जैसा वह और कहीं कहता है: "परमेश्वर के लिये बलिदान दुखी हृदय है: परमेश्वर के लिये मीठी सुगन्ध वह हृदय है जो उसे बनानेवाले की महिमा करता है।"(2) क्योंकि यदि क्रोधित होकर उस ने उनके इन बलिदानों को ठुकराया होता, मानो वे उसकी करुणा पाने के अयोग्य हों, तो वह निश्चय इन्हीं बातों को उन पर नहीं डालता जिन से वे उद्धार पा सकते थे। परन्तु परमेश्वर दयालु है, इसलिये उस ने उन्हें अच्छी सम्मति से नहीं काटा। क्योंकि यिर्मयाह के द्वारा कहने के बाद, "शेबा से धूप, और दूर देश से दालचीनी, तुम मेरे पास क्यों लाते हो? तुम्हारे पूर्ण होमबलि और बलिदान मुझे ग्रहण नहीं;"(3) वह आगे कहता है: "हे सारे यहूदा, प्रभु का वचन सुनो। ये बातें इस्राएल का परमेश्वर प्रभु कहता है, अपने मार्गों और अपने कामों को सीधा करो, और मैं तुम्हें इस स्थान में स्थिर करूँगा। झूठी बातों पर भरोसा न रखो, क्योंकि वे तुम्हें कुछ भी लाभ नहीं देंगी, यह कहते हुए, प्रभु का मन्दिर, प्रभु का मन्दिर, यह [यहाँ] है।"(4)
3. और फिर, जब वह दिखाता है कि उस ने उन्हें मिस्र से इसलिये नहीं निकाला कि वे उसे बलिदान चढ़ाएँ, परन्तु यह कि मिस्रियों की मूर्तिपूजा को भूलकर वे प्रभु की वाणी सुन सकें, जो उनके लिये उद्धार और महिमा थी, तब वह इसी यिर्मयाह के द्वारा कहता है: "प्रभु यों कहता है; अपने होमबलियों को अपने बलिदानों के साथ इकट्ठा करो और मांस खाओ। क्योंकि जिस दिन मैं उन्हें मिस्र से निकाल लाया उस दिन मैं ने तुम्हारे बापों से होमबलियों या बलिदानों के विषय में न कहा और न आज्ञा दी: परन्तु यह वचन मैं ने उन्हें आज्ञा दी, यह कहते हुए, मेरी वाणी सुनो, और मैं तुम्हारा परमेश्वर होऊँगा, और तुम मेरी प्रजा होगे; और मेरे सब मार्गों पर चलो जो कुछ मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, कि तुम्हारा भला हो। परन्तु उन्होंने न माना, और न सुना; परन्तु अपने बुरे हृदय की कल्पनाओं में चले, और पीछे की ओर गए, आगे की ओर नहीं।"(5) और फिर, जब वह उसी मनुष्य के द्वारा कहता है, "परन्तु जो घमण्ड करे वह इस में घमण्ड करे, कि समझे और जाने कि मैं प्रभु हूँ, जो पृथ्वी पर करुणा, और धर्म, और न्याय करता हूँ;"(6) वह जोड़ता है, "क्योंकि इन्हीं बातों से मैं प्रसन्न हूँ, प्रभु कहता है," परन्तु बलिदानों से नहीं, न होमबलियों से, न अर्पणों से।
क्योंकि प्रजा ने इन आज्ञाओं को प्रधान महत्व की (प्रिन्सिपालितेर) नहीं पाई, परन्तु गौण के रूप में, और पहिले बताए हुए कारण से, जैसा यशायाह फिर कहता है: "तू ने मुझे अपने होमबलि की भेड़ [नहीं लाया], और न अपने बलिदानों में तू ने मेरी महिमा की: तू ने बलिदानों में मेरी सेवा नहीं की, और न लोबान [के विषय] में तू ने कुछ परिश्रम किया; और न तू ने मेरे लिये द्रव्य से धूप मोल लिया, और न मैं ने तेरे बलिदानों की चर्बी चाही; परन्तु तू मेरे साम्हने अपने पापों में और अपने अधर्म में खड़ा रहा।"(7) इसलिये वह कहता है, "इस मनुष्य पर मैं दृष्टि करूँगा, वरन् उस पर जो दीन, और नम्र है, और जो मेरे वचनों से काँपता है।"(8) "क्योंकि चर्बी और चर्बीयुक्त मांस तुझ से तेरा अधर्म नहीं हटाएँगे।"(9) "यह वह उपवास है जिसे मैं ने चुना है, प्रभु कहता है। दुष्टता के हर बन्धन को खोल, बलपूर्वक ठहराए हुए करारों के सम्बन्ध तोड़, हिलाए हुओं को विश्राम दे, और हर अन्याय के पत्र को रद्द कर। अपनी रोटी भूखे को स्वेच्छा से दे, और छत-रहित परदेशी को अपने घर में ले चल। यदि तू ने नंगे को देखा हो, तो उसे ढाँप, और तू अपने ही मांस और लोहू के लोगों को तुच्छ न जानेगा (दोमेस्तिकोस सेमिनिस तुई)। तब तेरा भोर का प्रकाश फूट निकलेगा, और तेरा स्वास्थ्य और शीघ्रता से फूटेगा; और धर्म तेरे आगे चलेगा, और प्रभु की महिमा तुझे घेरेगी: और जब तक तू an अभी बोल रहा है, मैं कहूँगा, देख, मैं यहाँ हूँ।"(10) और जकर्याह भी, बारह भविष्यद्वक्ताओं में, प्रजा को परमेश्वर की इच्छा दिखाते हुए, कहता है: "ये बातें सर्वशक्तिमान प्रभु कहता है: सच्चा न्याय करो, और हर एक अपने भाई पर दया और करुणा दिखाए।
और विधवा, और अनाथ, और प्रवासी, और कंगाल पर अन्धेर न करना; और कोई अपने भाई के विरुद्ध अपने हृदय में बुराई न सोचे।"(11) और फिर, वह कहता है: "ये वे बातें हैं जिन्हें तुम
बोलोगे। हर मनुष्य अपने पड़ोसी से सत्य बोलो, और अपने फाटकों में शान्ति का न्याय करो, और तुम में से कोई अपने भाई के विरुद्ध अपने हृदय में बुराई न सोचे, और तुम झूठी शपथ से प्रेम न करोगे: क्योंकि ये सब बातें मैं घृणा करता हूँ, सर्वशक्तिमान प्रभु कहता है।"(1) और भी, दाऊद भी उसी रीति से कहता है: "कौन मनुष्य है जो जीवन चाहता है, और अच्छे दिन देखना चाहता है? अपनी जीभ को बुराई से, और अपने होंठों को रख कि वे छल न बोलें। बुराई से बच, और भलाई कर: मेल खोज, और उसके पीछे चल।"(2)
4. इन सब से प्रकट है कि परमेश्वर ने उन से बलिदान और होमबलि नहीं माँगे, परन्तु विश्वास, और आज्ञाकारिता, और धर्म, उनके उद्धार के कारण। जैसा परमेश्वर ने, भविष्यद्वक्ता होशे में उन्हें अपनी इच्छा सिखाते हुए, कहा, "मैं बलिदान से बढ़कर दया चाहता हूँ, और होमबलियों से बढ़कर परमेश्वर के ज्ञान को।"(3) और भी, हमारे प्रभु ने भी उन्हें उसी फल की ओर उभारा, जब उस ने कहा, "परन्तु यदि तुम जानते कि [इस] का अर्थ क्या है, मैं दया चाहता हूँ, बलिदान नहीं, तो तुम निर्दोषों को दोषी न ठहराते।"(4) इस प्रकार वह भविष्यद्वक्ताओं की गवाही देता है, कि उन्होंने सत्य का प्रचार किया; परन्तु इन मनुष्यों पर (उसके सुननेवालों पर) यह आरोप लगाता है कि वे अपनी ही गलती से मूर्ख हैं।
5. फिर, अपने चेलों को आज्ञा देते हुए कि वे परमेश्वर को उसकी अपनी सृजी हुई वस्तुओं के 1ले फल(5) चढ़ाएँ--मानो उसे उनकी आवश्यकता हो ऐसा नहीं, परन्तु यह कि वे आप न निष्फल हों और न कृतघ्न--उस ने उस सृजी हुई वस्तु, रोटी, को लिया, और धन्यवाद किया, और कहा, "यह मेरी देह है।"(6) और कटोरे को भी वैसे ही, जो उस सृष्टि का भाग है जिस के हम हैं, उस ने अपना लोहू माना, और नयी वाचा के नये अर्पण को सिखाया; जिसे कलीसिया प्रेरितों से पाकर, सारे जगत में परमेश्वर को चढ़ाती है, उसे जो नये नियम में अपने ही दानों के 1ले फल हमें जीविका के साधन के रूप में देता है, जिस के विषय में मलाकी ने, बारह भविष्यद्वक्ताओं में, पहिले इस प्रकार कहा: "मुझे तुम से प्रसन्नता नहीं, सर्वशक्तिमान प्रभु कहता है, और मैं तुम्हारे हाथों से बलिदान ग्रहण न करूँगा। क्योंकि सूर्य के उदय से [उसके] अस्त तक, अन्यजातियों में मेरा नाम महिमा पाता है, और हर स्थान में मेरे नाम के लिये धूप चढ़ाया जाता है, और शुद्ध बलिदान; क्योंकि अन्यजातियों में मेरा नाम महान है, सर्वशक्तिमान प्रभु कहता है;"(7)--इन बातों से अत्यन्त स्पष्ट रीति से सूचित करते हुए, कि पहिली प्रजा [यहूदी] सचमुच परमेश्वर को अर्पण करना बन्द करेगी, परन्तु हर स्थान में उसे बलिदान चढ़ाया जाएगा, और वह शुद्ध; और उसका नाम अन्यजातियों में महिमा पाता है।(8)
6. परन्तु अन्यजातियों में महिमा पानेवाला और कौन सा नाम है हमारे प्रभु के नाम से बढ़कर, जिस के द्वारा पिता की महिमा होती है, और मनुष्य की भी? और क्योंकि यह उसके अपने पुत्र का [नाम] है, जो उसके द्वारा मनुष्य बनाया गया, वह इसे अपना कहता है। जैसा एक राजा, यदि वह आप अपने पुत्र की समानता चित्रित करे, इस समानता को अपनी कहने में ठीक है, इन दोनों कारणों से, क्योंकि यह उसके पुत्र की [समानता] है, और क्योंकि यह उसकी अपनी रचना है; वैसे ही पिता भी यीशु मसीह के नाम को, जो सारे जगत में कलीसिया में महिमा पाता है, अपना मानता है, दोनों इसलिये कि यह उसके पुत्र का है, और इसलिये कि जो इसे इस प्रकार बताता है उस ने उसे मनुष्यों के उद्धार के लिये दिया। इसलिये, क्योंकि पुत्र का नाम पिता का है, और क्योंकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में कलीसिया यीशु मसीह के द्वारा अर्पण करती है, वह इन दोनों आधारों पर ठीक कहता है, "और हर स्थान में मेरे नाम के लिये धूप चढ़ाया जाता है, और शुद्ध बलिदान।" अब यूहन्ना, प्रकाशितवाक्य में, कहता है कि "धूप" "पवित्र लोगों की प्रार्थनाएँ" हैं।(9)
अध्याय अठारह.--बलिदानों और अर्पणों के विषय में, और उन के विषय में जो उन्हें सचमुच चढ़ाते हैं।
1. इसलिये कलीसिया का अर्पण, जिसे प्रभु ने सारे जगत में चढ़ाए जाने की आज्ञा दी, परमेश्वर के निकट शुद्ध बलिदान गिना जाता है, और उसे ग्रहण है; यह नहीं कि उसे हम से बलिदान की आवश्यकता है, परन्तु यह कि चढ़ानेवाला आप उस में महिमा पाता है जो वह चढ़ाता है, यदि उसका दान ग्रहण हो। क्योंकि दान के द्वारा राजा के प्रति आदर और स्नेह दोनों दिखाए जाते हैं; और प्रभु, यह चाहते हुए कि हम उसे पूरी सरलता और निर्दोषता से चढ़ाएँ, अपने को इस प्रकार कहा: "इसलिये, जब तू अपनी भेंट वेदी पर चढ़ाए, और स्मरण करे कि तेरे भाई की तेरे विरुद्ध कुछ बात है, तो अपनी भेंट वेदी के साम्हने छोड़, और जा; 1ले अपने भाई से मेल कर, और तब लौटकर अपनी भेंट चढ़ा।"(10) इसलिये हम परमेश्वर को उसकी सृष्टि के 1ले फल चढ़ाने के लिये बद्ध हैं, जैसा मूसा भी कहता है, "तू अपने परमेश्वर प्रभु के साम्हने खाली दिखाई न देना;"(11) ताकि मनुष्य कृतज्ञ गिना जाए, और जिन बातों में उस ने अपनी कृतज्ञता दिखाई है उन के द्वारा, वह उस आदर को पाए जो उस से बहता है।(12)
2. और अर्पणों का वर्ग सामान्य रूप से हटाया नहीं गया है; क्योंकि अर्पण दोनों थे
वहाँ [यहूदियों में], और यहाँ [मसीहियों में] अर्पण हैं। प्रजा में बलिदान थे; कलीसिया में भी बलिदान हैं: परन्तु केवल जाति बदली है, क्योंकि अर्पण अब दासों के द्वारा नहीं, स्वतन्त्र मनुष्यों के द्वारा किया जाता है। क्योंकि प्रभु [सदा] एक ही और वही है; परन्तु दास-अर्पण का स्वरूप [अपने में] अलग है, जैसा स्वतन्त्र मनुष्यों का भी है, ताकि अर्पणों के द्वारा ही स्वतन्त्रता का संकेत दिखाया जाए। क्योंकि उसके साथ कुछ भी निष्प्रयोजन नहीं, न संकेत-रहित, न अभिप्राय-रहित। और इसी कारण उन्हें (यहूदियों को) सचमुच अपनी वस्तुओं के दशमांश उसके लिये पवित्र किए हुए थे, परन्तु जिन्होंने स्वतन्त्रता पाई है वे अपनी सारी सम्पत्ति प्रभु के उद्देश्यों के लिये अलग रखते हैं, अपनी सम्पत्ति के कम मूल्य के भाग नहीं, आनन्द से और स्वतन्त्रता से देते हुए, क्योंकि उन्हें उत्तम बातों की [आगे] आशा है; जैसा उस कंगाल विधवा ने किया जिस ने अपनी सारी जीविका परमेश्वर के भण्डार में डाल दी।(1)
3. क्योंकि आदि में परमेश्वर ने हाबिल के दानों पर दृष्टि की, क्योंकि उस ने एकचित्तता और धर्म से चढ़ाया; परन्तु उस ने कैन के अर्पण पर दृष्टि नहीं की, क्योंकि उसका हृदय डाह और बैर से बँटा था, जिसे वह अपने भाई के विरुद्ध पालता था, जैसा परमेश्वर उसकी छिपी [बातों] को डाँटते हुए कहता है, "यदि तू ठीक चढ़ाए, तौभी यदि तू ठीक न बाँटे, तो क्या तू ने पाप नहीं किया? चुप रह;"(2)
क्योंकि परमेश्वर बलिदान से प्रसन्न नहीं होता। क्योंकि यदि कोई केवल बाहरी रूप से, निर्दोष रीति से, उचित क्रम में, और नियुक्ति के अनुसार बलिदान चढ़ाने का यत्न करे, जब कि अपने प्राण में वह अपने पड़ोसी को उसके साथ वह संगति नहीं देता जो ठीक और उचित है, और न परमेश्वर के भय के अधीन है;--जो इस प्रकार गुप्त पाप पालता है वह उस बलिदान से परमेश्वर को धोखा नहीं देता जो बाहरी रूप से ठीक चढ़ाया जाता है; और ऐसा अर्पण उसे कुछ लाभ न देगा, परन्तु [केवल] उस बुराई को छोड़ना जो उसके भीतर गर्भित हुई है, ताकि पाप कपट के काम के द्वारा और अधिक उसे अपने ही नाश करनेवाला न बनाए।(3) इसलिये प्रभु ने भी कहा: "हे शास्त्रियों और फरीसियों, कपटियों, तुम पर हाय, क्योंकि तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो। क्योंकि कब्र बाहर से सुन्दर दिखाई देती है, परन्तु भीतर वह मरे हुओं की हड्डियों और सब अशुद्धता से भरी है; वैसे ही तुम भी बाहर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर तुम दुष्टता और कपट से भरे हो।"(4) क्योंकि जब तक वे बाहरी रूप तक ठीक चढ़ाते समझे जाते थे, उन में कैन के समान डाह थी; इसलिये उन्होंने धर्मी को घात किया, वचन की सम्मति को तुच्छ जानकर, जैसा कैन ने भी किया। क्योंकि [परमेश्वर] ने उस से कहा, "चुप रह;" परन्तु वह नहीं माना। अब "चुप रहना" और क्या है, ठहराई हुई हिंसा को छोड़ना? और इन मनुष्यों से ऐसी ही बातें कहते हुए, वह कहता है: "हे अन्धे फरीसी, कटोरे के भीतर को शुद्ध कर, कि बाहर भी शुद्ध हो।"(5) और उन्होंने उसकी नहीं सुनी।
क्योंकि यिर्मयाह कहता है, "देख, न तेरी आँखें और न तेरा हृदय अच्छा है; परन्तु [वे मुड़े हैं] तेरे लोभ की ओर, और निर्दोष लोहू बहाने को, और अन्याय के लिये, और मनुष्य-वध के लिये, कि तू उसे करे।"(6) और फिर यशायाह कहता है, "तुम ने सम्मति ली, परन्तु मुझ से नहीं; और वाचाएँ बाँधीं, [परन्तु] मेरी पवित्र आत्मा से नहीं।"(7) इसलिये, कि उनकी भीतरी इच्छा और विचार, प्रकाश में लाए जाकर, दिखाएँ कि परमेश्वर निर्दोष है, और बुराई नहीं करता--वह परमेश्वर जो छिपी बात को [हृदय में] प्रगट करता है, परन्तु जो बुराई नहीं करता--जब कैन किसी प्रकार चुप नहीं था, तब वह उस से कहता है: "उसकी अभिलाषा तेरी ओर होगी, और तू उस पर प्रभुता करेगा।"(8) इसी प्रकार उस ने पीलातुस से कहा: "मेरे विरुद्ध तेरा कुछ भी अधिकार न होता, यदि वह ऊपर से तुझे न दिया गया होता;"(9) परमेश्वर सदा धर्मी को [इस जीवन में दुख के लिये] सौंपता है, कि वह, जो उस ने सहा और सहन किया उससे जाँचा जाकर, [अन्त में] ग्रहण हो; परन्तु बुराई करनेवाला, जो काम उस ने किए हैं उन से न्याय पाकर, ठुकराया जाए। इसलिये बलिदान मनुष्य को पवित्र नहीं करते, क्योंकि परमेश्वर को बलिदान की आवश्यकता नहीं; परन्तु चढ़ानेवाले का विवेक बलिदान को पवित्र करता है जब वह शुद्ध हो, और इस प्रकार परमेश्वर को मित्र की ओर से [अर्पण] ग्रहण करने को प्रेरित करता है। "परन्तु पापी," वह कहता है, "जो मेरे लिये एक बछड़े को [बलि में] मारता है, वह ऐसा है मानो कुत्ते को मारे।"(10)
4. इसलिये, जब कलीसिया एकचित्तता से चढ़ाती है, उसका दान परमेश्वर के निकट ठीक रीति से शुद्ध बलिदान गिना जाता है। जैसा पौलुस भी फिलिप्पियों से कहता है, "मैं भर गया हूँ, इपफ्रुदितुस से तुम्हारी ओर से भेजी हुई वस्तुएँ पाकर, सुगन्ध की मीठी गन्ध, ग्रहणयोग्य बलिदान, परमेश्वर को भाता हुआ।"(11) क्योंकि हमें परमेश्वर को अर्पण करना चाहिए, और हर बात में अपने बनानेवाले परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ पाए जाना चाहिए, शुद्ध मन में, कपट-रहित विश्वास में, अच्छी नींववाली आशा में, उत्साही प्रेम में, उसकी अपनी सृजी हुई वस्तुओं के 1ले फल चढ़ाते हुए। और केवल कलीसिया यह शुद्ध अर्पण सृष्टिकर्ता को चढ़ाती है, धन्यवाद देते हुए, उसकी सृष्टि से [ली हुई वस्तुओं को] उसे चढ़ाती हुई। परन्तु यहूदी इस प्रकार नहीं चढ़ाते: क्योंकि उनके हाथ लोहू से भरे हैं; क्योंकि उन्होंने वचन को नहीं पाया,
जिस के द्वारा वह परमेश्वर को चढ़ाया जाता है।(1) और फिर, मतान्तरियों की कोई सभा (सिनेगॉग) [इसे नहीं चढ़ाती]। क्योंकि कुछ, यह मानकर कि पिता सृष्टिकर्ता से भिन्न है, जब वे उसे हमारी इस सृष्टि की वस्तु चढ़ाते हैं, तब उसे दूसरे की सम्पत्ति का लालची, और जो उसका अपना नहीं उसे चाहनेवाला ठहराते हैं। फिर, जो यह मानते हैं कि हमारे चारों ओर की वस्तुएँ धर्मत्याग, अज्ञान, और वासना से उत्पन्न हुईं, वे उसे अज्ञान, वासना, और धर्मत्याग के फल चढ़ाते हुए, अपने पिता के विरुद्ध पाप करते हैं, उसे धन्यवाद देने से बढ़कर उसका अपमान करते हुए। परन्तु वे अपने साथ कैसे मेल रख सकते हैं, [जब वे कहते हैं] कि जिस रोटी पर धन्यवाद किया गया है वह उनके प्रभु की देह है,(2) और कटोरा उसका लोहू, यदि वे उसे आप जगत के सृष्टिकर्ता का पुत्र नहीं कहते, अर्थात् उसका वचन, जिस के द्वारा वृक्ष फलता है, और सोते उबलते हैं, और पृथ्वी देती है "1ले अंकुर, तब बाल, तब बाल में भरा अन्न।"(3)
5. तब, फिर, वे कैसे कह सकते हैं कि देह, जो प्रभु की देह से और उसके लोहू से पालित होती है, नाश की ओर जाती है, और जीवन की भागी नहीं होती? इसलिये वे या तो अपनी धारणा बदलें, या अभी कही हुई वस्तुओं को चढ़ाना छोड़ें।(4) परन्तु हमारी धारणा यूखरिस्त के अनुसार है, और यूखरिस्त पलटकर हमारी धारणा को स्थिर करता है। क्योंकि हम उसे उसका अपना चढ़ाते हैं, देह और पवित्र आत्मा की संगति और एकता को लगातार प्रचार करते हुए।(5) क्योंकि जैसी रोटी, जो पृथ्वी से उत्पन्न होती है, जब वह परमेश्वर के आह्वान को पाती है, तब सामान्य रोटी नहीं रहती,(6) परन्तु यूखरिस्त, दो वास्तविकताओं से बनी, पार्थिव और स्वर्गीय; वैसे ही हमारी देहें, जब वे यूखरिस्त को पाती हैं, तब नाशवान नहीं रहतीं, अनन्तकाल के लिये पुनरुत्थान की आशा रखती हुईं।
6. अब हम उसे भेंट चढ़ाते हैं, ऐसा नहीं कि वह उसकी आवश्यकता में खड़ा हो, पर उसके दान के लिए धन्यवाद देते हुए,(7) और इस प्रकार सृजी हुई वस्तु को पवित्र करते हुए। क्योंकि जैसे परमेश्वर को हमारी सम्पत्ति की आवश्यकता नहीं, वैसे ही हमें परमेश्वर को कुछ भेंट चढ़ाने की आवश्यकता है; जैसा सुलैमान कहता है: "जो निर्धन पर दया करता है, वह प्रभु को उधार देता है।"(8) क्योंकि परमेश्वर, जिसे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, हमारे भले कामों को इस उद्देश्य से अपने पास लेता है, कि वह हमें अपनी भली वस्तुओं का प्रतिफल दे, जैसा हमारा प्रभु कहता है: "आओ, मेरे पिता के धन्य लोगो, तुम्हारे लिये तैयार किए हुए राज्य को लो। क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को दिया: मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पीने को दिया: मैं परदेशी था, और तुम ने मुझे अपने यहाँ लिया: नंगा था, और तुम ने मुझे कपड़े पहिनाए; बीमार था, और तुम ने मुझे देखा; बन्दीगृह में था, और तुम मेरे पास आए।"(9) इसलिये, जैसे वह इन [सेवाओं] की आवश्यकता में खड़ा नहीं, तौभी चाहता है कि हम अपने ही लाभ के लिये उन्हें चढ़ाएँ, कहीं हम निष्फल न रहें; वैसे ही वचन ने लोगों को अर्पण करने की वही आज्ञा दी, यद्यपि वह उनकी आवश्यकता में न खड़ा था, कि वे परमेश्वर की सेवा करना सीखें: इसलिये यह भी उसकी इच्छा है कि हम भी वेदी पर भेंट चढ़ाएँ, बार बार और बिना अन्तर के। तब वेदी स्वर्ग में है(10) (क्योंकि उसी स्थान की ओर हमारी प्रार्थनाएँ और अर्पण चलाए जाते हैं); मन्दिर भी [वहीं है], जैसा यूहन्ना प्रकाशितवाक्य में कहता है, "और परमेश्वर का मन्दिर खुल गया:"(11) निवास भी: "क्योंकि, देखो," वह कहता है, "परमेश्वर का निवास, जिसमें वह मनुष्यों के साथ वास करेगा।"
अध्याय उन्नीस.--पृथ्वी की वस्तुएँ स्वर्ग की वस्तुओं का प्रतिरूप हो सकती हैं, परन्तु स्वर्गीय वस्तुएँ और भी श्रेष्ठ और अज्ञात अन्य वस्तुओं के प्रतिरूप नहीं हो सकतीं; और हम, पूर्ण उन्माद के बिना, यह नहीं मान सकते कि परमेश्वर हमें केवल एक और भी अज्ञात और श्रेष्ठ सत्ता के प्रतिरूप के रूप में जाना जाता है।
1. अब भेंटें, अर्पण, और सब बलि, लोगों ने एक रूप में पाईं, जैसा पहाड़ पर मूसा को दिखाया गया, एक ही परमेश्वर से, जिसका नाम अब सब जातियों के बीच कलीसिया में महिमामय है। पर यह उचित है कि वे पार्थिव वस्तुएँ, जो हमारे चारों ओर फैली हैं, सचमुच स्वर्गीय वस्तुओं के प्रतिरूप हों, [दोनों] तौभी उसी परमेश्वर के द्वारा सृजी हुई। क्योंकि और किसी रीति से वह आत्मिक वस्तुओं की प्रतिमा को [हमारी समझ के अनुकूल] नहीं मिला सकता था। पर यह आरोप लगाना कि जो वस्तुएँ स्वर्ग से ऊपर और आत्मिक हैं, और जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, अदृश्य और अकथनीय हैं, वे अपनी बारी में स्वर्गीय के प्रतिरूप हैं
वस्तुओं के और दूसरे प्लेरोमा के, और [कहना] कि परमेश्वर दूसरे पिता की प्रतिमा है, सत्य से भटकनेवालों की और पूर्णतया मूर्ख और मन्दबुद्धि व्यक्तियों की दोनों भूमिका निभाना है। क्योंकि, जैसा मैं ने बार बार दिखाया है, ऐसे व्यक्तियों को नित्य प्रतिरूपों के प्रतिरूप और प्रतिमाओं की प्रतिमाएँ खोजते रहना आवश्यक लगेगा, और वे कभी [सकेंगे] एक और सच्चे परमेश्वर पर अपने मन को स्थिर करना। क्योंकि उनकी कल्पनाएँ परमेश्वर से आगे बढ़ जाती हैं, उन्होंने अपने हृदय में स्वयं स्वामी को पार कर लिया है, विचार में तो [उससे] ऊपर उन्नत और ऊँचे किए हुए, पर वास्तव में सच्चे परमेश्वर से मुँह मोड़ते हुए।
2. इन व्यक्तियों से कोई न्याय से कह सकता है (जैसा पवित्रशास्त्र स्वयं सुझाता है), परमेश्वर से कितनी दूरी ऊपर तुम अपनी कल्पनाओं को उठाते हो, हे उतावली से उन्नत मनुष्यों? तुम ने सुना है "कि आकाश [उसके] हाथ की हथेली में नापे गए हैं:"(1) मुझे माप बताओ, और हाथों की अनन्त भीड़ गिनो, मुझे भराव, चौड़ाई, लम्बाई, ऊँचाई, माप का आरम्भ और अन्त समझाओ,--वे बातें जिन्हें मनुष्य का हृदय नहीं समझता, और न उन्हें ग्रहण करता है। क्योंकि स्वर्गीय भण्डार निश्चय बड़े हैं: परमेश्वर हृदय में नापा नहीं जा सकता, और मन में वह अगम्य है; जो पृथ्वी को अपने हाथ की खोह में रखता है। उसके दाहिने हाथ का माप कौन देखता है? उसकी उँगली को कौन जानता है? या उसके हाथ को कौन समझता है,--वह हाथ जो असीमता को नापता है; वह हाथ जो अपने ही माप से आकाशों का माप फैलाता है, और जो अपनी खोह में पृथ्वी को अथाहों समेत समेटता है; जो अपने में सारी सृष्टि की चौड़ाई, और लम्बाई, और नीचे की गहराई, और ऊपर की ऊँचाई को रखता है; जो देखा जाता है, जो सुना और समझा जाता है, और जो अदृश्य है? इस कारण परमेश्वर "प्रत्येक प्रधानता, और सामर्थ्य, और प्रभुता, और प्रत्येक नाम जो रखा जाता है,"(2) उन सब से ऊपर है, जो सृजी और स्थापित की गई हैं। वही आकाशों को भरता है, और अथाहों को देखता है, जो हम में से प्रत्येक के साथ भी उपस्थित है। क्योंकि वह कहता है, "क्या मैं निकट का परमेश्वर हूँ, और दूर का परमेश्वर नहीं? यदि कोई गुप्त स्थानों में छिपा हो, तो क्या मैं उसे न देखूँगा?"(3) क्योंकि उसका हाथ सब वस्तुओं को पकड़ता है, और वही आकाशों को प्रकाशित करता है, और आकाश के नीचे की वस्तुओं को भी उजाला देता है, और गुर्दों और हृदयों को जाँचता है, छिपी वस्तुओं में भी उपस्थित है, और हमारे गुप्त [विचारों] में, और खुले रूप से हमें पालता और सुरक्षित रखता है।
3. पर यदि मनुष्य उसके हाथ के भराव और महिमा को नहीं ग्रहण करता, तो कोई इतने बड़े परमेश्वर को अपने हृदय में कैसे समझ या जान सकेगा? तौभी, मानो उन्होंने अब उसे नाप लिया और पूरी रीति से जाँच लिया, और हर ओर उसे टटोल लिया? वे कल्पना करते हैं कि उसके परे AEons का दूसरा प्लेरोमा है, और दूसरा पिता; निश्चय स्वर्गीय वस्तुओं की ओर नहीं देखते, पर सचमुच उन्माद की गहरी खाई (बूथुस) में उतरते हैं; यह मानते हुए कि उनका पिता केवल उन वस्तुओं की सीमा तक फैलता है जो प्लेरोमा से परे हैं, पर दूसरी ओर, डेमियुर्ज प्लेरोमा तक नहीं पहुँचता; और इस प्रकार वे दोनों में से किसी को भी सिद्ध और सब कुछ समेटनेवाला नहीं दिखाते। क्योंकि पहला प्लेरोमा के बाहर रचे गए सारे जगत के विषय में अपूर्ण होगा, और दूसरा उस [आदर्श] जगत के विषय में जो प्लेरोमा के भीतर रचा गया; और [इसलिये] इनमें से कोई भी सब का परमेश्वर नहीं हो सकता। पर यह कि कोई भी उसके बनाए हुए पदार्थों से परमेश्वर की भलाई को पूरी रीति से बता नहीं सकता, सब के लिये स्पष्ट बात है। और यह कि उसकी महानता अपूर्ण नहीं, पर सब वस्तुओं को समेटे है, और हम तक भी फैली है, और हमारे साथ है, प्रत्येक मानेगा जो परमेश्वर के विषय में योग्य धारणाएँ रखता है।
अध्याय बीस.--कि एक परमेश्वर ने वचन के द्वारा और पवित्र आत्मा के द्वारा जगत की सब वस्तुएँ रचीं: और यद्यपि वह इस जीवन में हमारे लिये अदृश्य और अगम्य है, तौभी वह अज्ञात नहीं; क्योंकि उसके काम उसे प्रगट करते हैं, और उसके वचन ने दिखाया है कि अनेक प्रकारों से वह देखा और जाना जा सकता है।
1. इसलिये उसकी महानता के विषय में परमेश्वर को जानना सम्भव नहीं, क्योंकि पिता नापा नहीं जा सकता; पर उसकी प्रेम के विषय में (क्योंकि यही है जो उसके वचन के द्वारा हमें परमेश्वर तक ले जाता है), जब हम उसकी आज्ञा मानते हैं, हम सदा सीखते हैं कि इतना बड़ा परमेश्वर है, और वही है जिसने स्वयं सब वस्तुओं को स्थापित किया, और चुना, और सजाया, और समेटे है; और सब वस्तुओं में हम भी और यह हमारा जगत भी। तब हम भी उन्हीं वस्तुओं के साथ बनाए गए जो उसके द्वारा समेटी हुई हैं। और यही वह है जिसके विषय में पवित्रशास्त्र कहता है, "और परमेश्वर ने मनुष्य को रचा, पृथ्वी की मिट्टी लेकर, और उसके मुख में जीवन की श्वास फूँकी।"(5) इसलिये स्वर्गदूतों ने हमें नहीं बनाया, और न हमें रचा, और न स्वर्गदूतों को परमेश्वर की प्रतिमा बनाने की सामर्थ्य थी, और न किसी और को, प्रभु के वचन को छोड़कर, और न किसी ऐसी शक्ति को जो सब वस्तुओं के पिता से दूर हो। क्योंकि परमेश्वर को इन [प्राणियों] की आवश्यकता न थी, उस काम को पूरा करने के लिये जिसे उसने स्वयं अपने साथ पहले से ठान लिया था कि किया जाए, मानो उसके अपने हाथ न होते। क्योंकि उसके साथ सदा वचन और बुद्धि, पुत्र और आत्मा उपस्थित थे, जिनके द्वारा और जिनमें,
स्वतन्त्रता से और अपने आप, उसने सब वस्तुएँ बनाईं, जिनसे वह यह भी कहकर बात करता है, "हम मनुष्य को अपनी प्रतिमा और समानता के अनुसार बनाएँ;"(1) वह अपने में से [रचे गए] प्राणियों का तत्व, बनाई गई वस्तुओं का नमूना, और जगत के सब अलंकारों का प्रतिरूप लेते हुए।
2. तब सचमुच पवित्रशास्त्र ने घोषणा की, जो कहता है, "सब से पहले(2) विश्वास करो कि एक ही परमेश्वर है, जिसने सब वस्तुओं को स्थापित किया, और उन्हें पूरा किया, और यह किया कि जो अस्तित्व में न था, उससे सब वस्तुएँ अस्तित्व में आएँ:" वह जो सब वस्तुओं को समेटे है, और स्वयं किसी के द्वारा समेटा नहीं जाता। ठीक ही मलाकी ने भी भविष्यद्वक्ताओं के बीच कहा है: "क्या एक ही परमेश्वर ने हमें स्थापित नहीं किया? क्या हम सब का एक ही पिता नहीं?"(3) इसी के अनुसार प्रेरित भी कहता है, "एक ही परमेश्वर है, पिता, जो सब के ऊपर है, और हम सब में है।"(4) वैसे ही प्रभु भी कहता है: "सब वस्तुएँ मेरे पिता के द्वारा मुझे सौंपी गई हैं;"(5) स्पष्टतः उसके द्वारा जिसने सब वस्तुएँ बनाईं; क्योंकि उसने उसे दूसरे की वस्तुएँ नहीं सौंपीं, पर अपनी ही।
पर सब वस्तुओं में [यह ध्वनित है कि] कुछ भी [उससे] रोक नहीं रखा गया, और इस कारण वही व्यक्ति जीवितों और मरे हुओं का न्यायी है; "दाऊद की कुंजी लिए हुए: वह खोलेगा, और कोई बन्द न करेगा: वह बन्द करेगा, और कोई न खोलेगा।"(6) क्योंकि कोई भी, न स्वर्ग में, न पृथ्वी पर, न पृथ्वी के नीचे, पिता की पुस्तक को खोलने, या उसे देखने में समर्थ न था, उस मेम्ने को छोड़कर जो वध किया गया, और जिसने अपने ही लहू से हमें छुड़ाया, सब वस्तुओं पर अधिकार उसी परमेश्वर से पाकर जिसने वचन के द्वारा सब वस्तुएँ बनाईं, और [अपनी] बुद्धि के द्वारा उन्हें सजाया, जब "वचन देहधारी हुआ;" कि जैसे परमेश्वर के वचन का स्वर्ग में आधिपत्य था, वैसे ही उसका पृथ्वी पर भी आधिपत्य हो, क्योंकि [वह] धर्मी मनुष्य था, "जिसने पाप नहीं किया, और न उसके मुख में छल पाया गया;"(7) और कि पृथ्वी के नीचे की वस्तुओं पर उसका प्रधानता हो, वह स्वयं "मरे हुओं में पहिलौठा" बनाया गया;(8) और कि सब वस्तुएँ, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, अपने राजा को देखें; और कि पितृ-प्रकाश हमारे प्रभु की देह से मिले और उस पर ठहरे, और उसकी चमकती देह से हमारे पास आए, और इस प्रकार मनुष्य अमरता तक पहुँचे, पितृ-प्रकाश से आच्छादित होकर।
3. मैं ने यह भी बहुत विस्तार से दिखाया है, कि वचन, अर्थात् पुत्र, सदा पिता के साथ था; और बुद्धि भी, जो आत्मा है, सारी सृष्टि से पहले उसके साथ उपस्थित थी, वह सुलैमान के द्वारा घोषित करता है: "परमेश्वर ने बुद्धि के द्वारा पृथ्वी की नींव डाली, और समझ के द्वारा उसने आकाश को स्थिर किया। उसके ज्ञान से गहिराइयाँ फूट निकलीं, और बादलों ने ओस टपकाई।"(9) और फिर: "प्रभु ने अपने काम में अपने मार्गों का आरम्भ करके मुझे रचा: उसने मुझे अनन्तकाल से, आरम्भ में, खड़ा किया, पृथ्वी बनाने से पहले, गहिराइयों को स्थिर करने से पहले, और जल के सोतों के फूट निकलने से पहले; पहाड़ों के दृढ़ किए जाने से पहले, और सब पहाड़ियों से पहले, उसने मुझे उत्पन्न किया।"(10) और फिर: "जब उसने आकाश को तैयार किया, मैं उसके साथ थी, और जब उसने अथाह के सोते स्थिर किए; जब उसने पृथ्वी की नींव दृढ़ की, मैं [उन्हें] तैयार करती हुई उसके साथ थी। मैं वही थी जिसमें वह आनन्दित हुआ, और सारे समय मैं प्रतिदिन उसके मुख के आगे हर्षित रही, जब वह जगत की समाप्ति पर आनन्दित हुआ, और मनुष्यों के पुत्रों में प्रसन्न हुआ।"(11)
4. इसलिये एक ही परमेश्वर है, जिसने वचन और बुद्धि के द्वारा सब वस्तुओं को रचा और व्यवस्थित किया; पर यही सृष्टिकर्ता (डेमियुर्ज) है जिसने यह जगत मानव जाति को दिया है, और जो, अपनी महानता के विषय में, अपने बनाए हुओं सब के लिये सचमुच अज्ञात है (क्योंकि किसी मनुष्य ने उसकी ऊँचाई नहीं खोजी, न उन प्राचीन लोगों में जो विश्राम को चले गए, और न अब जीवितों में से किसी ने); पर अपनी प्रेम के विषय में, वह सदा उसके द्वारा जाना जाता है जिसके साधन से उसने सब वस्तुओं को ठहराया। अब यही उसका वचन है, हमारा प्रभु यीशु मसीह, जो अन्तिम समयों में मनुष्यों के बीच मनुष्य बनाया गया, कि वह अन्त को आरम्भ से जोड़े, अर्थात् मनुष्य को परमेश्वर से। इसलिये भविष्यद्वक्ताओं ने, उसी वचन से भविष्यद्वाणी का वरदान पाकर, देह के अनुसार उसके आगमन का सन्देश दिया, जिसके द्वारा परमेश्वर और मनुष्य का मिलन और संगति पिता की सुइच्छा के अनुसार हुई, परमेश्वर का वचन आरम्भ से यह पहले बताते हुए कि परमेश्वर मनुष्यों के द्वारा देखा जाए, और पृथ्वी पर उनसे बातचीत करे, उनसे सम्मति करे, और अपनी ही सृष्टि के साथ उपस्थित हो, उसे बचाते हुए, और उसके द्वारा देखे जाने के योग्य होते हुए, और हमें सब के हाथों से छुड़ाते हुए जो हम से बैर रखते हैं, अर्थात् दुष्टता की प्रत्येक आत्मा से; और हमें अपने सब दिनों में पवित्रता और धर्म में उसकी सेवा करवाते हुए,(12) इसलिये कि मनुष्य, परमेश्वर के आत्मा को ग्रहण करके, पिता की महिमा में प्रवेश करे।
5. इन बातों को भविष्यद्वक्ताओं ने भविष्यद्वाणी की रीति से रखा; पर उन्होंने, जैसा कुछ लोग आरोप लगाते हैं, [यह प्रचार नहीं किया] कि जो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा देखा गया वह भिन्न [परमेश्वर] था, पिता का
सब का अदृश्य होना। तौभी यही वे [मिथ्या शिक्षक] घोषित करते हैं, जो भविष्यद्वाणी के स्वभाव से सर्वथा अनजान हैं। क्योंकि भविष्यद्वाणी आनेवाली वस्तुओं की पूर्वकथन है, अर्थात् उन वस्तुओं को पहले से रखना जो बाद में होंगी। तब भविष्यद्वक्ताओं ने पहले संकेत किया कि परमेश्वर मनुष्यों के द्वारा देखा जाए; जैसा प्रभु भी कहता है, "धन्य हैं वे जो हृदय के शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।"(1) पर उसकी महानता के विषय में, और उसकी अद्भुत महिमा के विषय में, "कोई मनुष्य परमेश्वर को देखकर जीवित न रहेगा,"(2) क्योंकि पिता अगम्य है; पर उसकी प्रेम, और कृपा के विषय में, और उसकी अनन्त सामर्थ्य के विषय में, यही भी वह उन्हें देता है जो उससे प्रेम करते हैं, अर्थात् परमेश्वर को देखना, जिस बात की भविष्यद्वक्ताओं ने भी भविष्यद्वाणी की। "क्योंकि जो बातें मनुष्यों से असम्भव हैं, वे परमेश्वर से सम्भव हैं।"(3) क्योंकि मनुष्य अपनी ही शक्तियों से परमेश्वर को नहीं देखता; पर जब वह चाहता है वह मनुष्यों के द्वारा देखा जाता है, जिनके द्वारा वह चाहता है, और जब वह चाहता है, और जैसे वह चाहता है। क्योंकि परमेश्वर सब बातों में सामर्थी है, उस समय सचमुच आत्मा के द्वारा भविष्यद्वाणी की रीति से देखा गया, और पुत्र के द्वारा दत्तक की रीति से भी देखा गया; और वह स्वर्ग के राज्य में पिता की रीति से भी देखा जाएगा, आत्मा सचमुच मनुष्य को परमेश्वर के पुत्र(4) में तैयार करता है, और पुत्र उसे पिता के पास ले जाता है, और पिता भी [उसे] अनन्त जीवन के लिये अविनाशिता देता है, जो प्रत्येक को इस तथ्य से मिलती है कि वह परमेश्वर को देखता है। क्योंकि जैसे जो ज्योति को देखते हैं वे ज्योति के भीतर हैं, और उसकी चमक में भागी होते हैं; वैसे ही, जो परमेश्वर को देखते हैं वे परमेश्वर में हैं, और उसकी कान्ति में से पाते हैं। पर [उसकी] कान्ति उन्हें जीवित करती है; इसलिये जो परमेश्वर को देखते हैं, वे जीवन पाते हैं।
और इस कारण, वह, [यद्यपि] समझ से परे, और असीम और अदृश्य, अपने आप को दृश्य, और ग्राह्य, और विश्वास करनेवालों की सामर्थ्य के भीतर कर दिया, कि वह उन्हें जीवित करे जो विश्वास के द्वारा उसे ग्रहण करते और देखते हैं।(5) क्योंकि जैसे उसकी महानता ढूँढ़े जाने से परे है, वैसे ही उसकी भलाई वर्णन से परे है; जिसके द्वारा देखा जाकर, वह देखनेवालों को जीवन देता है। जीवन से अलग जीवित रहना सम्भव नहीं, और जीवन का साधन परमेश्वर की संगति में मिलता है; पर परमेश्वर की संगति परमेश्वर को जानना, और उसकी भलाई का आनन्द लेना है।
6. इसलिये मनुष्य परमेश्वर को देखेंगे, कि वे जीवित रहें, उस दर्शन से अमर बनाए जाकर, और परमेश्वर तक भी पहुँचते हुए; जिस बात को, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, भविष्यद्वक्ताओं ने रूपक से घोषित किया, कि परमेश्वर उन मनुष्यों के द्वारा देखा जाए जो उसकी आत्मा [उनमें] लिए रहते हैं, और उसके आने की सदा धीरज से बाट जोहते हैं। जैसा मूसा भी व्यवस्थाविवरण में कहता है, "उस दिन हम देखेंगे कि परमेश्वर मनुष्य से बातें करेगा, और वह जीवित रहेगा।"(6) क्योंकि इन मनुष्यों में से कुछ भविष्यद्वाणी की आत्मा को और उसके कार्यशील प्रभावों को देखते थे, जो सब प्रकार के वरदानों के लिये उण्डेले गए; औरों ने फिर [देखा] प्रभु के आगमन को, और उस प्रबन्ध को जो आरम्भ से चलता था, जिसके द्वारा उसने पिता की इच्छा को स्वर्गीय और पार्थिव दोनों वस्तुओं के विषय में पूरा किया; और औरों ने [देखा] समयों के अनुकूल पितृ-महिमाओं को, और तब उन्हें देखनेवालों और सुननेवालों के लिये, और बाद में उन्हें सुननेवाले सब के लिये। इस प्रकार, इसलिये, परमेश्वर प्रगट हुआ; क्योंकि परमेश्वर पिता इन सब [कार्यों] के द्वारा दिखाया जाता है, आत्मा सचमुच कार्य करता हुआ, और पुत्र सेवा करता हुआ, जब पिता स्वीकृति दे रहा था, और मनुष्य का उद्धार पूरा हो रहा था। जैसा वह होशे भविष्यद्वक्ता के द्वारा भी घोषित करता है: "मैं ने," वह कहता है, "दर्शनों को बढ़ाया, और भविष्यद्वक्ताओं की सेवा (इन मानिबुस) के द्वारा उपमाएँ उपयोग कीं।"(7) पर प्रेरित ने इसी अनुच्छेद की व्याख्या की, जब उसने कहा, "अब वरदानों की विविधताएँ हैं, पर वही आत्मा; और सेवाओं के भेद हैं, पर वही प्रभु; और कार्यों की विविधताएँ हैं, पर वही परमेश्वर है जो सब में सब कुछ करता है।
पर आत्मा का प्रगटीकरण प्रत्येक मनुष्य को लाभ के लिये दिया जाता है।"(8) पर जैसा वह जो सब में सब कुछ करता है परमेश्वर है, [इन बातों के विषय में] कि वह कैसा स्वभाव और कितना बड़ा है, [परमेश्वर] अपने बनाए हुए सब पदार्थों के लिये अदृश्य और वर्णनातीत है, पर वह किसी प्रकार अज्ञात नहीं: क्योंकि सब वस्तुएँ उसके वचन के द्वारा सीखती हैं कि एक ही परमेश्वर पिता है, जो सब वस्तुओं को समेटे है, और जो सब को अस्तित्व देता है, जैसा सुसमाचार में लिखा है: "किसी ने कभी परमेश्वर को नहीं देखा, onlybegotten पुत्र को छोड़कर, जो पिता की गोद में है; उसने [उसे] प्रगट किया है।"(9)
7. इसलिये पिता का पुत्र आरम्भ से [उसे] प्रगट करता है, क्योंकि वह आरम्भ से पिता के साथ था, जिसने मानव जाति को भविष्यद्वाणी के दर्शन, और वरदानों की विविधताएँ, और अपनी ही सेवाएँ, और पिता की महिमा, नियमित क्रम और सम्बन्ध में, [मानव जाति के] लाभ के लिये उचित समय पर दिखाए। क्योंकि जहाँ नियमित उत्तराधिकार है, वहाँ स्थिरता भी है; और जहाँ स्थिरता है, वहाँ काल के अनुकूलता है; और जहाँ अनुकूलता है, वहाँ उपयोगिता भी है। इस कारण वचन मनुष्यों के लाभ के लिये पितृ-अनुग्रह का बाँटनेवाला हुआ, जिनके लिये उसने ऐसे बड़े प्रबन्ध किए, सचमुच मनुष्यों को परमेश्वर को प्रगट करते हुए, पर मनुष्य को परमेश्वर के सामने रखते हुए, और उसी समय पिता की अदृश्यता को सुरक्षित रखते हुए, कहीं मनुष्य किसी समय परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाला न बन जाए, और कि वह
सदा कुछ ऐसा रखे जिसकी ओर वह आगे बढ़ सके; पर दूसरी ओर, अनेक प्रबन्धों के द्वारा मनुष्यों को परमेश्वर को प्रगट करते हुए, कहीं मनुष्य, परमेश्वर से सर्वथा विफल होकर दूर होते हुए, अस्तित्व खोना न छोड़ दे। क्योंकि परमेश्वर की महिमा जीवित मनुष्य है; और मनुष्य का जीवन परमेश्वर को देखने में है। क्योंकि यदि परमेश्वर का वह प्रगटीकरण जो सृष्टि के द्वारा होता है, पृथ्वी पर जीवित सब को जीवन देता है, तो बहुत अधिक वह पिता का प्रकाशन जो वचन के द्वारा आता है, परमेश्वर को देखनेवालों को जीवन देता है।
8. तब, क्योंकि परमेश्वर की आत्मा ने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा आनेवाली बातें दिखाईं, हमें परमेश्वर के अधीन किए जाने के लिये पहले से बनाते और ढालते हुए, पर यह अभी भविष्य की बात थी कि मनुष्य, पवित्र आत्मा की सुइच्छा के द्वारा, [परमेश्वर] को देखे, यह आवश्यक था कि वे परमेश्वर को देखें जिनके साधन से आनेवाली बातें बताई गईं, जिसे उन्होंने मनुष्यों के द्वारा देखा जानेवाला बताया; इसलिये कि परमेश्वर, और परमेश्वर का पुत्र, और पुत्र, और पिता, केवल भविष्यद्वाणी से ही न बताए जाएँ, पर वह उसके सब अंगों के द्वारा भी देखा जाए जो पवित्र किए गए और की बातों में सिखाए गए हैं
परमेश्वर, कि मनुष्य पहले से अनुशासित हो और उस महिमा में ग्रहण के लिये पहले से अभ्यास करे जो बाद में परमेश्वर से प्रेम करनेवालों में प्रगट होगी। क्योंकि भविष्यद्वक्ता केवल वचन में भविष्यद्वाणी नहीं करते थे, पर दर्शनों में भी, और अपनी जीवन-रीति में, और उन कामों में जो उन्होंने आत्मा के संकेत के अनुसार किए। इस अदृश्य रीति से, इसलिये, उन्होंने परमेश्वर को देखा, जैसा यशायाह भी कहता है, "मैं ने अपनी आँखों से राजा को, सेनाओं के प्रभु को देखा है,"(1) यह दिखाते हुए कि मनुष्य अपनी आँखों से परमेश्वर को देखे, और उसकी वाणी सुने। इस रीति से, इसलिये, उन्होंने परमेश्वर के पुत्र को भी मनुष्यों से बातचीत करता हुआ मनुष्य देखा, होनेवाली बात की भविष्यद्वाणी करते हुए, यह कहते हुए कि जो अभी तक नहीं आया था वह उपस्थित है, दुःख न सहनेवाले को भी दुःख के अधीन प्रचार करते हुए, और यह घोषित करते हुए कि जो तब स्वर्ग में था वह मृत्यु की धूलि में उतरा।(2) और, [के विषय में] उस सार-संग्रह के अन्य प्रबन्ध जिन्हें वह करनेवाला था, इनमें से कुछ को उन्होंने दर्शनों के द्वारा देखा, औरों को वचन से प्रचार किया, और औरों को [बाहरी] काम के द्वारा प्रतिरूप से संकेत किया, देखी जानेवाली वस्तुओं को दृश्य रूप से देखते हुए; सुनी जानेवाली वस्तुओं को मुख के वचन से घोषित करते हुए; और काम से होनेवाली बात को वास्तविक कार्य से करते हुए; पर [उसी समय] सब को भविष्यद्वाणी से घोषित करते हुए। इसलिये मूसा ने भी घोषित किया कि परमेश्वर सचमुच व्यवस्था का उल्लंघन करनेवाले लोगों के लिये भस्म करनेवाली आग(3) (इग्नेयुम) था, और धमकी दी कि परमेश्वर उन पर आग का दिन लाएगा; पर जिन में परमेश्वर का भय था उन से उसने कहा, "प्रभु परमेश्वर दयालु और अनुग्रहकारी है, और धीरजवन्त, और बड़ी करुणा का, और सत्य, और हजारों के लिये न्याय और दया रखता है, अधर्म, और अपराध, और पाप क्षमा करता है।"(4)
9. और वचन ने मूसा से बात की, उसके सामने प्रकट होकर, "जैसे कोई अपने मित्र से बात करे।"(5) पर मूसा उसे खुले रूप से देखना चाहता था जो उससे बात कर रहा था, और इस प्रकार सम्बोधित हुआ: "चट्टान के गहरे स्थान में खड़ा रह, और अपने हाथ से मैं तुझे ढाँपूँगा। पर जब मेरी कान्ति निकल जाएगी, तब तू मेरी back pans देखेगा, पर मेरा मुख तू न देखेगा: क्योंकि कोई मेरे मुख को देखकर जीवित न रहेगा।"(6) दो तथ्य इस प्रकार संकेत किए जाते हैं: कि मनुष्य के लिये परमेश्वर को देखना असम्भव है; और कि, परमेश्वर की बुद्धि के द्वारा, मनुष्य अन्तिम समयों में, चट्टान की गहराई में, अर्थात् मनुष्य के रूप में उसके आने में, उसे देखेगा। इस कारण उसने [प्रभु ने] पहाड़ की चोटी पर उसके साथ आमने-सामने सम्मति की, एलिय्याह भी उपस्थित था, जैसा सुसमाचार बताता है,(7) वह इस प्रकार अन्त में प्राचीन प्रतिज्ञा को पूरा करते हुए।
10. इसलिये भविष्यद्वक्ताओं ने परमेश्वर के वास्तविक मुख को खुले रूप से नहीं देखा, पर [उन्होंने देखा] उन प्रबन्धों और भेदों को जिनके द्वारा मनुष्य बाद में परमेश्वर को देखे। जैसा एलिय्याह से भी कहा गया: "तू कल निकलकर प्रभु के साम्हने खड़ा रहना; और देख, एक बड़ी और प्रबल वायु, जो पहाड़ों को फाड़ेगी, और प्रभु के आगे चट्टानों को टुकड़े टुकड़े करेगी। और प्रभु वायु में [न था]; और वायु के बाद भुईंडोल, पर प्रभु भुईंडोल में [न था]; और भुईंडोल के बाद आग, पर प्रभु आग में [न था]; और आग के बाद एक मुश्किल से सुनाई देनेवाली वाणी" (वोक्स औरे तेन्युइस).(8) क्योंकि ऐसे साधनों से भविष्यद्वक्ता--लोगों के अपराध और भविष्यद्वक्ताओं के वध के कारण बहुत क्रोधित--और कोमल रीति से काम करना सिखाया गया; और मनुष्य के रूप में प्रभु का आगमन दिखाया गया, कि वह उस व्यवस्था के बाद हो जो मूसा के द्वारा दी गई, कोमल और शान्त, जिसमें वह न कुचले हुए नरकट को तोड़ेगा, और न धुआँ देती सन को बुझाएगा।(9) उसके राज्य का कोमल और शान्त विश्राम भी संकेत किया गया। क्योंकि, पहाड़ों को फाड़नेवाली वायु के बाद, और भुईंडोल के बाद, और आग के बाद, उसके राज्य के शान्त और शान्तिपूर्ण समय आते हैं, जिनमें परमेश्वर की आत्मा अति कोमल रीति से मानव जाति को जीवित करती और बढ़ाती है। यह भी यहेजकेल के द्वारा और स्पष्ट किया गया, कि proph-
ets ने परमेश्वर के प्रबन्धों को अंश में देखा, पर वास्तव में स्वयं परमेश्वर को नहीं। क्योंकि जब इस मनुष्य ने परमेश्वर का दर्शन(1), और करूबों को, और उनके पहियों को देखा, और जब उसने उस सारी गति के भेद को बताया, और उनके ऊपर सिंहासन की समानता को देखा, और सिंहासन पर मनुष्य की आकृति के समान एक समानता, और उसकी कमर पर की वस्तुएँ अम्बर की आकृति के समान, और नीचे का भाग आग के दृश्य के समान, और जब उसने सिंहासनों के दर्शन का शेष सब रखा, कहीं कोई यह न समझे कि उन [दर्शनों] में उसने वास्तव में परमेश्वर को देखा, उसने जोड़ा: "यह परमेश्वर की महिमा की समानता का रूप था।"(2)
11. तब, यदि न मूसा, न एलिय्याह, न यहेजकेल, जिन सब को बहुत स्वर्गीय दर्शन हुए, परमेश्वर को देखा; पर यदि उन्होंने जो देखा वह प्रभु की कान्ति की उपमाएँ थीं, और आनेवाली वस्तुओं की भविष्यद्वाणियाँ; तो स्पष्ट है कि पिता सचमुच अदृश्य है, जिसके विषय में प्रभु ने भी कहा, "किसी ने कभी परमेश्वर को नहीं देखा।"(3) पर उसके वचन ने, जैसा उसने स्वयं चाहा, और देखनेवालों के लाभ के लिये, पिता की ज्योति दिखाई, और उसके अभिप्रायों को समझाया (जैसा प्रभु ने भी कहा: "एकजात परमेश्वर,(4) जो पिता की गोद में है, उसने [उसे] प्रगट किया है;" और वह स्वयं भी पिता के वचन को धनी और बड़ा बताता है); न एक आकृति में, न एक स्वरूप में, वह देखनेवालों को प्रकट हुआ, पर अपने प्रबन्धों में लक्षित कारणों और फलों के अनुसार, जैसा दानिय्येल में लिखा है। क्योंकि एक समय वह हनन्याह, अजर्याह, मीशाएल के आस पास वालों के साथ देखा गया, आग की भट्ठी में उनके साथ उपस्थित, जलन में, और उन्हें आग [के प्रभावों] से बचाते हुए: "और चौथे का रूप," कहा जाता है, "परमेश्वर के पुत्र के समान था।"(5) दूसरे समय [वह दिखाया जाता है] "पहाड़ से बिना हाथ काटी गई पत्थर,"(6) के रूप में, और सब कालिक राज्य को मारता हुआ, और उन्हें उड़ाता हुआ (वेन्टिलान्स एआ), और स्वयं सारी पृथ्वी को भरता हुआ। तब भी यही व्यक्ति मनुष्य के पुत्र के रूप में देखा जाता है, स्वर्ग के बादलों में आता हुआ, और प्राचीनकाल वाले के समीप जाता हुआ, और उससे सब सामर्थ्य और महिमा, और एक राज्य पाता हुआ। "उसका आधिपत्य," कहा जाता है, "सनातन आधिपत्य है, और उसका राज्य नष्ट न होगा।"(7) यूहन्ना भी, प्रभु का चेला, उसके राज्य के याजकीय और महिमामय आगमन को देखते हुए, प्रकाशितवाक्य में कहता है: "मैं ने उस वाणी को देखने के लिये मुड़ा जो मुझ से बातें करती थी।
और, मुड़कर, मैं ने सात सोने की दीवटें देखीं; और दीवटों के बीच मनुष्य के पुत्र के समान एक, पाँवों तक पहुँचनेवाला वस्त्र पहने, और छाती के चारों ओर सोने के पटुके से कसे हुए; और उसका सिर और उसके बाल श्वेत थे, ऊन के समान श्वेत, और हिम के समान; और उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं; और उसके पाँव उत्तम पीतल के समान, मानो वह भट्ठी में जल रहा हो। और उसकी वाणी [थी] जलों की वाणी के समान; और उसके दाहिने हाथ में सात तारे थे; और उसके मुख से एक तेज दोधारी तलवार निकली; और उसका मुख अपनी शक्ति में चमकते सूर्य के समान था।"(8) क्योंकि इन वचनों में वह अपने पिता से [जो उसे मिली है] महिमा में से कुछ रखता है, जैसे सिर [जहाँ वह उसका उल्लेख करता है]; याजकीय पद के विषय में भी कुछ, पाँवों तक पहुँचनेवाले लम्बे वस्त्र के विषय में जैसे। यही कारण था कि मूसा ने महायाजक को इस प्रकार वस्त्र पहनाए। कुछ अन्त [सब वस्तुओं के] की ओर भी संकेत करता है, जैसे [जहाँ वह कहता है] आग में जलता उत्तम पीतल, जो विश्वास की सामर्थ्य को, और प्रार्थना में लगातार लगे रहने को दर्शाता है, क्योंकि भस्म करनेवाली आग समय के अन्त में आनेवाली है।
पर जब यूहन्ना उस दृश्य को सह न सका (क्योंकि वह कहता है, "मैं उसके पाँवों पर मरे हुए के समान गिर पड़ा;"(9) कि जो लिखा था वह पूरा हो: "कोई परमेश्वर को देखकर जीवित न रहेगा"(10)), और वचन ने उसे जिलाकर, और उसे स्मरण दिलाकर कि वही था जिसकी गोद पर उसने भोज में सिर टिकाया था, जब उसने प्रश्न किया कि कौन उसे पकड़वाएगा, घोषित किया: "मैं पहिला और अन्तिम हूँ, और जो जीवित है, और मरा था, और देख मैं युगानुयुग जीवित हूँ, और मृत्यु और अधोलोक की कुंजियाँ मेरे पास हैं।" इन बातों के बाद, दूसरे दर्शन में उसी प्रभु को देखकर, वह कहता है: "क्योंकि मैं ने सिंहासन के बीच, और चार जीवित प्राणियों के बीच, और प्राचीनों के बीच, एक मेम्ना खड़ा देखा, जैसे वह वध किया गया हो, सात सींग और सात आँखें लिए, जो परमेश्वर की सात आत्माएँ हैं, सारी पृथ्वी में भेजी गईं।"(11) और फिर, वह इसी मेम्ने के विषय में कहता है: "और देखो एक श्वेत घोड़ा; और जो उस पर बैठा था वह विश्वासयोग्य और सच्चा कहलाता है; और वह धर्म से न्याय और युद्ध करता है। और उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं, और उसके सिर पर बहुत से मुकुट थे; एक लिखा हुआ नाम लिए, जिसे उसके सिवा कोई नहीं जानता: और वह लहू से छिड़के हुए वस्त्र से कमर कसे था: और उसका नाम परमेश्वर का वचन कहलाता है। और स्वर्ग की सेनाएँ श्वेत घोड़ों पर उसके पीछे चलीं, शुद्ध श्वेत मलमल पहने। और उसके मुख से एक तेज तलवार निकलती है, कि उससे वह जातियों को मारे; और वह
उन्हें लोहे की छड़ से राज्य करेगा (पास्केट): और वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के क्रोध की उग्रता के दाखरस के कुण्ड को रौंदता है। और उसके वस्त्र पर और उसकी जाँघ पर एक नाम लिखा है, राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु।"(1) इस प्रकार परमेश्वर का वचन आनेवाली वस्तुओं की रूपरेखाओं को, मानो, सदा सुरक्षित रखता है, और मनुष्यों को पिता के प्रबन्धों के विविध रूप (स्पीसीस), मानो, दिखाता है, हमें परमेश्वर से सम्बन्धित बातें सिखाते हुए।
12. तौभी, केवल देखे गए दर्शनों के द्वारा नहीं, और प्रचारित वचनों के द्वारा नहीं, पर वास्तविक कामों में भी, वह भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा देखा गया, कि उनके द्वारा वह आनेवाली घटनाओं को पहले से प्रतिरूप करे और दिखाए। इस कारण होशे भविष्यद्वक्ता ने "व्यभिचारों की पत्नी" ली, काम के द्वारा भविष्यद्वाणी करते हुए, "कि व्यभिचार करने में पृथ्वी प्रभु से व्यभिचार करे,"(2) अर्थात्, जो मनुष्य पृथ्वी पर हैं; और इस प्रकार के मनुष्यों में से परमेश्वर की सुइच्छा एक कलीसिया को बाहर निकालने(3) की होगी, जो उसके पुत्र की संगति से पवित्र की जाएगी, जैसे वह स्त्री भविष्यद्वक्ता के साथ समागम से पवित्र हुई। इस कारण पौलुस घोषित करता है कि "अविश्वासी पत्नी विश्वासी पति से पवित्र होती है।"(4) फिर, भविष्यद्वक्ता अपने बच्चों के नाम रखता है, "दया न पाई," और "प्रजा नहीं,"(5) इसलिये कि, जैसा प्रेरित कहता है, "जो प्रजा न थी वह प्रजा बने; और जिसने दया न पाई वह दया पाए। और ऐसा होगा, कि जिस स्थान में कहा गया, यह प्रजा नहीं है, वहाँ वे जीवते परमेश्वर की सन्तान कहलाएँगे।"(6) जो भविष्यद्वक्ता के द्वारा उसके कामों से प्रतिरूप में किया गया था, प्रेरित सिद्ध करता है कि वह कलीसिया में मसीह के द्वारा सचमुच किया गया। वैसे ही मूसा ने भी एक इथियोपियाई स्त्री को पत्नी किया, जिसे उसने इस प्रकार इस्राएली बनाया, पहले से दिखाते हुए कि जंगली जैतून का पेड़ खेतिहर जैतून में कलम लगाया जाता है, और उसकी चिकनाई में भागी बनाया जाता है।
क्योंकि जैसे वह जो देह के अनुसार मसीह जन्मा, लोगों के द्वारा मारा जाने के लिये सचमुच खोजा जाना था, पर मिस्र में, अर्थात् अन्यजातियों के बीच, छुड़ाया जाना था, कि वहाँ शैशव की दशा में रहनेवालों को पवित्र करे, जिन में से उसने उस स्थान में अपनी कलीसिया को भी सिद्ध किया (क्योंकि मिस्र आरम्भ से अन्यजाति था, जैसा इथियोपिया भी); इस कारण, मूसा के विवाह के द्वारा, वचन का विवाह दिखाया गया;(7) और इथियोपियाई दुल्हन के द्वारा, अन्यजातियों में से ली गई कलीसिया प्रगट हुई; और जो उसे घटाते, दोष लगाते, और ठट्ठा करते हैं, वे शुद्ध न होंगे। क्योंकि वे कोढ़ से भरे होंगे, और धर्मियों की छावनी से निकाले जाएँगे। वैसे ही राहाब वेश्या ने, अपने आप को दोषी ठहराते हुए, क्योंकि वह अन्यजाति थी, सब पापों की दोषी, तौभी तीन गुप्तचरों को ग्रहण किया,(8) जो सारी भूमि की टोह ले रहे थे, और उन्हें अपने घर में छिपाया; [जो तीन] निस्सन्देह [एक प्रतिरूप थे] पिता और पुत्र, पवित्र आत्मा के साथ। और जब वह सारा नगर जिसमें वह रहती थी सात तुरहियों के शब्द पर खण्डहर हो गया, राहाब वेश्या सुरक्षित रही, जब सब समाप्त हो गया [इन उल्टिमिस], अपने सारे घर समेत, लाल चिह्न के विश्वास के द्वारा; जैसा प्रभु ने भी उन से कहा जिन्होंने उसके आगमन को ग्रहण नहीं किया,--फरीसी, निस्सन्देह, लाल धागे के चिह्न को व्यर्थ करते हैं, जिसका अर्थ फसह था, और लोगों का छुटकारा और मिस्र से निकलना,-- जब उसने कहा, "महसूल लेनेवाले और वेश्याएँ तुम से पहले स्वर्ग के राज्य में जाती हैं।"(9)
अध्याय इक्कीस.--अब्राहम का विश्वास हमारे विश्वास के समान था; यह विश्वास प्राचीन कुलपतियों के वचनों और कामों के द्वारा पहले से प्रतिरूप किया गया।
1. पर यह कि हमारा विश्वास भी अब्राहम में पहले से प्रतिरूप किया गया, और वह हमारे विश्वास का कुलपति था, और, मानो, उसका भविष्यद्वक्ता, प्रेरित ने बहुत पूरी रीति से सिखाया है, जब वह गलातियों की पत्री में कहता है: "इसलिये जो तुम्हें आत्मा की सेवा करता है, और तुम्हारे बीच चमत्कार करता है, [क्या वह यह करता है] व्यवस्था के कामों से, या विश्वास के सुनने से? जैसा अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और वह उसके लिये धर्म गिना गया। इसलिये जान लो, कि जो विश्वास से हैं, वे ही अब्राहम की सन्तान हैं। पर पवित्रशास्त्र ने, पहले से देखकर कि परमेश्वर अन्यजातियों को विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराएगा, अब्राहम को पहले से बता दिया, कि उसमें सब जातियाँ आशीष पाएँगी। तो जो विश्वास से हैं वे विश्वासयोग्य अब्राहम के साथ आशीष पाएँगे।"(10) जिस [कारण से प्रेरित ने] घोषित किया कि यह मनुष्य केवल विश्वास का भविष्यद्वक्ता ही नहीं, पर उन लोगों का पिता भी जो अन्यजातियों में से यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं, क्योंकि उसका विश्वास और हमारा एक ही है: क्योंकि उसने आनेवाली बातों पर विश्वास किया, मानो वे पहले ही पूरी हो चुकी हों, परमेश्वर की प्रतिज्ञा के कारण; और वैसे ही हम भी, परमेश्वर की प्रतिज्ञा के कारण, विश्वास के द्वारा उस मीरास को देखते हैं [जो हमारे लिये रखी गई है] [आनेवाले] राज्य में।
2. इसहाक का इतिहास भी, एक के बिना नहीं है
प्रतीकात्मक स्वभाव। क्योंकि रोमियों की पत्री में प्रेरित घोषित करता है: "और, जब रिबका एक से, अर्थात् हमारे पिता इसहाक से, गर्भवती हुई," उसने वचन से उत्तर पाया(1), "कि परमेश्वर का अभिप्राय चुनाव के अनुसार स्थिर रहे, कामों से नहीं, पर बुलानेवाले से, उससे कहा गया, दो जातियाँ तेरे गर्भ में हैं, और दो प्रकार के लोग तेरे शरीर में हैं; और एक लोग दूसरे पर जय पाएगा, और eider छोटे की सेवा करेगा।"(2) जिससे स्पष्ट है, कि केवल कुलपतियों की भविष्यद्वाणियाँ [न थीं], पर रिबका के जन्माए हुए बालक भी दो जातियों की पूर्वकथन थे; और कि एक सचमुच बड़ा हो, पर दूसरा छोटा; कि एक दासत्व के अधीन भी हो, पर दूसरा स्वतन्त्र; पर [कि दोनों हों] एक ही पिता के। हमारा परमेश्वर, एक ही, उनका परमेश्वर भी है, जो छिपी बातों को जानता है, जो सब बातों को उनके होने से पहले जानता है; इस कारण उसने कहा है, "याकूब से मैं ने प्रेम किया, पर एसाव से मैं ने बैर रखा।"(3)
3. यदि कोई फिर याकूब के कामों को देखे, तो वे अर्थ से रहित न मिलेंगे, पर प्रबन्धों के विषय में अर्थ से भरे। इस प्रकार, पहले स्थान पर, उसके जन्म पर, क्योंकि उसने अपने भाई की एड़ी पकड़ी,(4) वह याकूब कहलाया, अर्थात् स्थान छीननेवाला--जो पकड़ता है, पर पकड़ा नहीं जाता; पाँवों को बाँधता है, पर बँधा नहीं जाता; संघर्ष करके जय पाता है; अपने हाथ में अपने विरोधी की एड़ी को, अर्थात् जय को, पकड़ता है। क्योंकि इसी अन्त के लिये प्रभु जन्मा, जिसके जन्म का प्रतिरूप उसने पहले रखा, जिसके विषय में यूहन्ना भी प्रकाशितवाक्य में कहता है: "वह जय प्राप्त करता हुआ निकला, कि वह जय पाए।"(5) फिर, [याकूब] ने जेठे के अधिकार पाए, जब उसके भाई ने उन्हें तुच्छ जाना; वैसे ही छोटी जाति ने भी उसे, मसीह को, पहिलौठे को, ग्रहण किया, जब बड़ी जाति ने उसे ठुकराया, यह कहकर, "कैसर को छोड़ हमारे पास कोई राजा नहीं।"(6) पर मसीह में हर आशीष [समेटी गई है], इसलिये पिछली प्रजा ने पहली की आशीषें पिता से छीन लीं, जैसे याकूब ने इस एसाव की आशीष ले ली। जिस कारण उसके भाई ने भाई की कपट योजनाओं और सताव को सहा, जैसे कलीसिया यह वही बात यहूदियों से सहती है। परदेश में बारह गोत्र उत्पन्न हुए, इस्राएल की जाति, क्योंकि मसीह को भी, एक अपरिचित देश में, कलीसिया की बारह-खम्भों की नींव उत्पन्न करनी थी।
विविध रंग की भेड़ें इस याकूब को उसकी मजदूरी के रूप में दी गईं; और मसीह की मजदूरी मनुष्य हैं, जो विविध और भिन्न जातियों से विश्वास के एक दल में इकट्ठे आते हैं, जैसा पिता ने उससे प्रतिज्ञा की, यह कहकर, "मुझ से माँग, और मैं तुझे अन्यजातियों को तेरी मीरास कर दूँगा, पृथ्वी की छोरों को तेरी निज भूमि।"(7) और जैसे उसके पुत्रों की भीड़ से प्रभु के भविष्यद्वक्ता [बाद में] उठे, यह हर आवश्यकता थी कि याकूब दो बहनों से पुत्र उत्पन्न करे, जैसे मसीह ने एक ही पिता की दो व्यवस्थाओं से किया; और वैसे ही दासी से भी, यह संकेत करते हुए कि मसीह परमेश्वर के पुत्रों को उठाएगा, स्वतन्त्रों से भी और देह के अनुसार दासों से भी, सब पर, उसी रीति से, आत्मा का वह दान देते हुए जो हमें जीवित करता है।(8) पर उसने (याकूब) सब कुछ छोटी के लिये किया, जिसके सुन्दर नेत्र थे,(9) राहेल, जिसने कलीसिया को पहले से प्रतिरूप किया, जिसके लिये मसीह ने धीरज से सहा; जिसने उस समय सचमुच, अपने कुलपतियों और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, आनेवाली बातों को पहले से प्रतिरूप किया और घोषित किया, परमेश्वर के प्रबन्धों में पहले से अपना भाग पूरा करते हुए, और अपनी मीरास को परमेश्वर की आज्ञा मानने का, और तीर्थयात्रा की दशा में जगत से होकर निकलने का, उसके वचन का अनुसरण करने का, और आनेवाली बातों को पहले संकेत करने का अभ्यास कराते हुए। क्योंकि परमेश्वर के साथ कुछ भी बिना उद्देश्य या योग्य संकेत के नहीं है।
अध्याय बाईस.--मसीह केवल एक युग के मनुष्यों के लिये नहीं आया, पर उन सब के लिये जो, धर्म और भक्ति से जीवित रहकर, उस पर विश्वास कर चुके थे; और उनके लिये भी, जो विश्वास करेंगे।
1 अब अन्तिम दिनों में, जब स्वतन्त्रता के समय की पूर्णता आ पहुँची, वचन ने स्वयं अपने आप "सिय्योन की बेटियों की मैल को धो डाला,"(10) जब उसने अपने ही हाथों से चेलों के पाँव धोए।(11) क्योंकि यह परमेश्वर का उत्तराधिकारी होनेवाली मानव जाति का अन्त है; कि जैसे आरम्भ में, हमारे पहले [माता-पिता] के द्वारा, हम सब दासत्व में लाए गए, मृत्यु के अधीन किए जाकर; वैसे अन्त में, नये मनुष्य के द्वारा, सब जो आरम्भ से [उसके] चेले थे, मृत्यु से सम्बन्धित बातों से शुद्ध और धोए जाकर, परमेश्वर के जीवन में आएँ। क्योंकि जिसने चेलों के पाँव धोए उसने सारी देह को पवित्र किया, और उसे शुद्ध किया। इस कारण भी, उसने उन्हें लेटे हुए आसन में भोजन दिया, यह संकेत करते हुए कि जो पृथ्वी में पड़े थे वे ही थे जिनके पास वह जीवन देने आया। जैसा यिर्मयाह घोषित करता है, "पवित्र प्रभु ने अपने मरे हुए इस्राएल को स्मरण किया, जो कब्र की भूमि में सोया था; और वह उनके पास उतरा, कि उन्हें अपना
उद्धार बताए, कि वे बचाए जाएँ।"(1) इस कारण भी चेलों की आँखें भारी हो गईं जब मसीह का दुःख समीप आ रहा था; और जब, पहले अवसर पर, प्रभु ने उन्हें सोते पाया, उसने उसे जाने दिया,-- इस प्रकार उस नींद की दशा के विषय में परमेश्वर के धीरज को संकेत करते हुए जिसमें मनुष्य पड़े थे; पर दूसरी बार आकर, उसने उन्हें जगाया, और उन्हें खड़ा किया, इस चिह्न में कि उसका दुःख उसके सोते चेलों को जगाना है, जिनके कारण "वह पृथ्वी के निचले भागों में भी उतरा,"(2) कि अपनी आँखों से उन लोगों की दशा को देखे जो अपने परिश्रम से विश्राम कर रहे थे,(3) जिनके विषय में उसने चेलों से भी कहा: "बहुत से भविष्यद्वक्ताओं और धर्मियों ने वह देखने और सुनने की लालसा की जो तुम देखते और सुनते हो।"(4)
2. क्योंकि मसीह केवल उनके लिये नहीं आया जिन्होंने तिबेरियुस कैसर के समय में उस पर विश्वास किया, और न पिता ने केवल अब जीवित मनुष्यों के लिये अपना प्रबन्ध किया, पर उन सब मनुष्यों के लिये, जिन्होंने आरम्भ से, अपनी सामर्थ्य के अनुसार, अपनी पीढ़ी में परमेश्वर का भय माना और उससे प्रेम किया, और अपने पड़ोसियों के प्रति न्याय और भक्ति की, और मसीह को देखने और उसकी वाणी सुनने की गम्भीर लालसा की। इसलिये वह, अपने दूसरे आगमन पर, पहले इस प्रकार के सब व्यक्तियों को उनकी नींद से जगाएगा, और उन्हें उठाएगा, और शेष को भी जिनका न्याय होगा, और उन्हें अपने राज्य में स्थान देगा। क्योंकि सचमुच "एक ही परमेश्वर है जो" कुलपतियों को अपने प्रबन्धों की ओर ले गया, और "जिसने खतना को विश्वास से धर्मी ठहराया, और खतनारहित को विश्वास के द्वारा।"(5) क्योंकि जैसे पहले में हमारा प्रतिरूप था, वैसे ही, दूसरी ओर, वे हम में दिखाए जाते हैं, अर्थात् कलीसिया में, और उन बातों का प्रतिफल पाते हैं जिन्हें उन्होंने पूरा किया।
अध्याय तेईस.--कुलपतियों और भविष्यद्वक्ताओं ने मसीह के आगमन को दिखाकर, उससे, मानो, वंशजों के मार्ग को मसीह के विश्वास के लिये दृढ़ किया; और इस प्रकार प्रेरितों के परिश्रम घट गए, क्योंकि उन्होंने औरों के परिश्रम के फल समेटे।
1. इस कारण प्रभु ने चेलों से कहा: "देखो, मैं तुम से कहता हूँ, अपनी आँखें उठाओ, और क्षेत्रों (रेगियोनेस) पर दृष्टि करो, क्योंकि वे कटनी के लिये श्वेत हैं [पहले से]। क्योंकि काटनेवाला मजदूरी पाता है, और अनन्त जीवन के लिये फल बटोरता है, कि बोनेवाला और काटनेवाला दोनों मिलकर आनन्द करें। क्योंकि इसमें यह कहावत सत्य है, कि एक बोता है और दूसरा काटता है। क्योंकि मैं ने तुम्हें आगे भेजा है कि उसको काटो जिस पर तुम ने परिश्रम नहीं किया; और लोगों ने परिश्रम किया है, और तुम उनके परिश्रम में प्रवेश कर चुके हो।"(6) तो, वे कौन हैं जिन्होंने परिश्रम किया, और परमेश्वर के प्रबन्धों को आगे बढ़ाया? स्पष्ट है कि वे कुलपति और भविष्यद्वक्ता हैं, जिन्होंने हमारे विश्वास को भी पहले से प्रतिरूप किया, और पृथ्वी भर परमेश्वर के पुत्र के आगमन को फैलाया, कि वह कौन और क्या होगा: कि वंशज, परमेश्वर का भय रखते हुए, भविष्यद्वक्ताओं से सिखाए जाकर, मसीह के आगमन को सहज से ग्रहण करें। इस कारण ही, जब यूसुफ ने जाना कि मरियम गर्भवती है, और उसे चुपके से छोड़ने का मन किया, स्वर्गदूत ने नींद में उससे कहा: "मरियम को अपनी पत्नी करके लेने से मत डर; क्योंकि जो उसके गर्भ में है वह पवित्र आत्मा की ओर से है। क्योंकि वह एक पुत्र जनेगी, और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपनी प्रजा को उनके पापों से बचाएगा।"(7) और उसे [इसके लिये] समझाते हुए, उसने जोड़ा: "अब यह सब इसलिये हुआ है, कि वह पूरा हो जो प्रभु की ओर से भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया, कि देखो, एक कुमारी गर्भवती होगी, और एक पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा;" इस प्रकार भविष्यद्वक्ता के वचनों से उसे प्रभावित करते हुए, और मरियम से दोष को दूर करते हुए, यह दिखाते हुए कि वही वह कुमारी थी जिसका यशायाह ने पहले उल्लेख किया, जो इम्मानुएल को जन्म देगी।
इसलिये, जब यूसुफ सब सन्देह से परे विश्वास दिलाया गया, उसने मरियम को भी लिया, और मसीह की शेष सारी शिक्षा के विषय में आनन्द से आज्ञा मानी, मिस्र की यात्रा और वापसी उठाकर, और फिर नासरत को प्रस्थान। [इस कारण,] जिन्होंने न पवित्रशास्त्र को जाना, न परमेश्वर की प्रतिज्ञा को, न मसीह के प्रबन्ध को, उन्होंने अन्त में उसे बालक का पिता कहा। इस कारण भी, प्रभु ने स्वयं कफरनहूम में यशायाह की भविष्यद्वाणियाँ पढ़ीं:(8) "प्रभु का आत्मा मुझ पर है, क्योंकि उसने मुझे अभिषेक किया है; कंगालों को सुसमाचार प्रचार करने को उसने मुझे भेजा है, टूटे मनवालों को चंगा करने, बन्दियों को छुटकारे का, और अन्धों को दृष्टि का प्रचार करने को।"(9) उसी समय, यह दिखाते हुए कि वही वह था जिसकी यशायाह भविष्यद्वक्ता ने पहले भविष्यद्वाणी की थी, उसने उन से कहा: "आज यह पवित्रशास्त्र तुम्हारे कानों में पूरा हुआ है।"
2. इस कारण भी, फिलिप्पुस, जब उसने इथियोपियों की रानी के खोजे को ये लिखे हुए वचन पढ़ते पाया: "वह भेड़ के समान वध के लिये ले जाया गया; और जैसे मेम्ना ऊन कतरनेवाले के सामने गूँगा है, वैसे उसने अपना मुँह न खोला: उसके दीन होने में उसका न्याय उठा लिया गया;"(10) और शेष सब जिसे भविष्यद्वक्ता सम्बन्ध में बताने चला
उसकी पीड़ा की ओर और देह में उसके आने की ओर, और जिन्होंने उस पर विश्वास न किया उन्होंने उसे कैसे अपमानित किया; उसे उस पर विश्वास करने के लिये सहज ही मना लिया, कि वह मसीह यीशु था, जो पुन्तियुस पिलातुस के अधीन क्रूस पर चढ़ाया गया, और भविष्यद्वक्ता ने जो कुछ पहले कहा था उसे सहा, और वह परमेश्वर का पुत्र था, जो मनुष्यों को अनन्त जीवन देता है। और तुरन्त जब [फिलिप्पु] ने उसे बपतिस्मा दिया, वह उसके पास से चला गया। क्योंकि भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पहले से सिखाए हुए को [बपतिस्मा के सिवा] और कुछ घटी न थी: वह पिता परमेश्वर से अनजान न था, और न जीवन की [उचित] रीति के नियमों से, पर केवल परमेश्वर के पुत्र के आगमन से अनजान था, जिससे जब वह परिचित हुआ, थोड़े समय में, वह आनन्द करता हुआ अपने मार्ग पर चला, इथियोपिया में मसीह के आगमन का सन्देशवाहक होने के लिये। इसलिए फिलिप्पु को इस मनुष्य के विषय में बड़ा परिश्रम नहीं करना पड़ा, क्योंकि वह भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा परमेश्वर के भय में पहले से तैयार था। इस कारण प्रेरितों ने भी, इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों को इकट्ठा करके, और पवित्रशास्त्र से उन से बातें करके, सिद्ध किया कि यह क्रूस पर चढ़ाया गया यीशु मसीह था, जीवते परमेश्वर का पुत्र; और उन्होंने एक बड़ी भीड़ को मना लिया, जो, तथापि, [पहले से] परमेश्वर का भय रखती थी। और एक ही दिन में तीन, और चार, और पाँच हजार मनुष्य बपतिस्मा पाए।(1)
अध्याय चौबीस.--अन्यजातियों का परिवर्तन यहूदियों के परिवर्तन से अधिक कठिन था; इसलिए जो प्रेरित पहले वाले काम में लगे, उनके परिश्रम उन से बड़े थे जिन्होंने पीछे वाले काम को अपने ऊपर लिया।
I. इसलिए पौलुस भी, क्योंकि वह अन्यजातियों का प्रेरित था, कहता है, "मैं ने उन सब से अधिक परिश्रम किया।"(2) क्योंकि पहले वालों की, [अर्थात्, यहूदियों की,] शिक्षा सहज काम था, क्योंकि वे पवित्रशास्त्र से प्रमाण दे सकते थे, और क्योंकि वे, जो मूसा और भविष्यद्वक्ताओं को सुनने के अभ्यस्त थे, मरे हुओं के Firstbegotten को, और परमेश्वर के जीवन के प्रधान को भी सहज ही ग्रहण करते थे,--उसे, जिसने हाथ फैलाने से अमालेक को नाश किया, और सर्प के घाव से मनुष्य को जिलाया, उसके प्रति [किए गए] विश्वास के द्वारा। जैसा मैं ने पिछली पुस्तक में दिखाया है, प्रेरित ने, पहले स्थान में, अन्यजातियों को मूर्तियों के अन्धविश्वास से हटने, और एक परमेश्वर की, जो स्वर्ग और पृथ्वी का सृजनहार है, और सारी सृष्टि का रचयिता है, आराधना करने की शिक्षा दी; और यह कि उसका पुत्र उसका वचन था, जिसके द्वारा उसने सब वस्तुओं की नींव डाली; और यह कि वह, अन्तिम कालों में, मनुष्यों के बीच मनुष्य बनाया गया; कि उसने मानवजाति को सुधारा, पर मनुष्य के शत्रु को नाश किया और जीता, और अपनी हाथ की कारीगरी को विरोधी के विरुद्ध जय दी। पर यद्यपि खतने वाले अब भी परमेश्वर के वचनों की आज्ञा न मानते थे, क्योंकि वे तुच्छ जाननेवाले थे, तौभी उन्हें पहले से शिक्षा मिली थी कि व्यभिचार न करें, न वेश्याकर्म, न चोरी, न छल; और जो कुछ हमारे पड़ोसियों की हानि के लिये किया जाता है, वह बुरा था, और परमेश्वर से घृणित। इसलिए वे इन बातों से अलग रहने को सहज ही राजी हुए, क्योंकि उन्हें इस प्रकार शिक्षा मिली थी।
2. पर उन्हें अन्यजातियों को भी यही बात सिखानी थी, कि ऐसी प्रकृति के काम दुष्ट, हानिकारक, और निष्फल थे, और उनमें लगे हुओं के लिये नाशकारी। इसलिए जिसने अन्यजातियों के लिये प्रेरितपद पाया,(3) उसने उन से अधिक परिश्रम किया जो खतने वालों के बीच परमेश्वर के पुत्र का प्रचार करते थे। क्योंकि उन्हें पवित्रशास्त्र से सहायता मिली, जिसे प्रभु ने दृढ़ किया और tiff-filled किया, जैसा वह घोषित हुआ था वैसा आकर; पर यहाँ, [अन्यजातियों के विषय में,] एक विदेशी विद्या थी, और एक नई शिक्षा [ग्रहण की जानेवाली, अर्थात्], कि जातियों के देवता न केवल देवता हैं ही नहीं, पर दुष्टात्माओं की मूर्तियाँ भी; और यह कि एक ही परमेश्वर है, जो "प्रत्येक प्रधानता, और प्रभुता, और सामर्थ्य, और प्रत्येक नाम जो रखा जाता है, उन से ऊपर" है;(4) और यह कि उसका वचन, स्वभाव से अदृश्य, मनुष्यों के बीच छूने योग्य और दृश्य बनाया गया, और "मृत्यु तक, वरन् क्रूस की मृत्यु तक" उतरा;(5) यह भी, कि जो उस पर विश्वास करते हैं वे अविनाशी और दुख के अधीन न होंगे, और स्वर्ग का राज्य पाएँगे। ये बातें भी अन्यजातियों को वचन से प्रचार की गईं, पवित्रशास्त्र की [सहायता] बिना: इसलिए, अन्यजातियों के बीच प्रचार करनेवालों ने बड़ा परिश्रम उठाया। पर, दूसरी ओर, अन्यजातियों का विश्वास अधिक श्रेष्ठ प्रकार का सिद्ध होता है, क्योंकि उन्होंने [पवित्र] लेखों से [निकली] शिक्षा के बिना परमेश्वर के वचन का अनुसरण किया (सीने इन्स्ट्रुक्तियोने लितेरारुम)।
अध्याय पच्चीस.--दोनों वाचाएँ अब्राहम में और तामार के परिश्रम में पहले से प्रतिरूपित थीं; तथापि, प्रत्येक वाचा के लिये एक ही वही परमेश्वर था..
I. क्योंकि अब्राहम के पुत्रों को [ऐसा होना चाहिए था], जिन्हें परमेश्वर ने पत्थरों में से उसके लिये उठाया,(6) और उसे स्थान लेने दिया जो हमारे विश्वास का प्रधान और अग्रदूत बनाया गया (जिसने खतने की वाचा भी पाई, उस विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के बाद जो उसे मिला था, जब वह अभी खतनारहित था, ताकि उस में दोनों वाचाएँ पहले से प्रतिरूपित हों, कि वह हो
परमेश्वर के वचन के पीछे चलनेवालों सब का पिता, और जो इस जगत में तीर्थयात्रा का जीवन सहते हैं उनका, अर्थात् खतने वालों में से और खतनारहित लोगों में से विश्वास करनेवालों का, जैसा "मसीह(1) मुख्य कोने का पत्थर है" जो सब कुछ सम्भालता है); और उसने दोनों वाचाओं में से परमेश्वर की रचना के योग्य लोगों को अब्राहम के एक ही विश्वास में इकट्ठा किया। पर खतनारहित दशा में का यह विश्वास, अन्त को आरम्भ से जोड़ता हुआ, [दोनों] पहला और अन्तिम बनाया गया है। क्योंकि, जैसा मैं ने दिखाया है, वह खतने से पहले अब्राहम में था, जैसा वह शेष धर्मियों में भी था जिन्होंने परमेश्वर को प्रसन्न किया: और इन अन्तिम कालों में, वह प्रभु के आने से मनुष्यों के बीच फिर उगा। पर खतना और कर्मों की व्यवस्था बीच के समय को घेरे रही।(2)
2. यह बात निश्चय और भी बहुत [घटनाओं] से रखी गई है, पर नमूने के रूप में थामार, यहूदा की बहू की [इतिहास] से।(3) क्योंकि जब उसने जुड़वाँ गर्भ धारण किए, उन में से एक ने अपना हाथ पहले बाहर निकाला; और दाई ने समझा कि वह जेठा है, उसने उसके हाथ पर लाल चिह्न बाँधा। पर यह हो चुकने के बाद, और उसने अपना हाथ पीछे खींच लिया, तब उसका भाई पेरेस पहले बाहर आया; फिर, उसके बाद, जेरह, जिस पर लाल डोरी थी, [जन्मा] दूसरा: पवित्रशास्त्र स्पष्ट दिखाता है उस लोगों को जिनके पास लाल चिह्न था, अर्थात् खतने की दशा में विश्वास, जो पहले से निश्चय कुलपतियों में पहले दिखाया गया; पर उसके बाद हटा लिया गया, कि उसका भाई जन्म ले; और वैसे ही, उसे भी जो बड़ा था, दूसरे स्थान में जन्मा हुआ, [उसे] जिस पर लाल चिह्न [बाँधा गया] था, अर्थात् धर्मी की पीड़ा, जो आरम्भ से हाबिल में प्रतिरूपित हुई, और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा वर्णित हुई, पर अन्तिम कालों में परमेश्वर के पुत्र में पूरी हुई।
3. क्योंकि कुछ बातें पितरों के द्वारा पितृ रीति से पहले घोषित होनी थीं, और और बातें भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा व्यवस्था की रीति से प्रतिरूपित, पर और बातें, मसीह के रूप के अनुसार, गोद लिए हुओं के द्वारा वर्णित; और एक ही परमेश्वर में सब कुछ दिखाया जाता है। क्योंकि यद्यपि अब्राहम एक था, उसने अपने में दोनों वाचाओं को प्रतिरूपित किया, जिनमें कुछ ने निश्चय बोया, और औरों ने काटा; क्योंकि कहा गया है, "इस में यह बात सच है, कि एक 'लोग' बोते हैं, पर दूसरा काटेगा;"(4) पर एक ही परमेश्वर दोनों को उचित वस्तुएँ देता है--बोनेवाले को बीज, पर काटनेवाले के खाने के लिये रोटी। जैसा एक है जो रोपता है, और दूसरा जो सींचता है, पर एक ही परमेश्वर है जो बढ़ाता है।(5) क्योंकि कुलपतियों और भविष्यद्वक्ताओं ने मसीह [के विषय] वचन बोया, पर कलीसिया ने काटा, अर्थात् फल पाया। इस कारण ये ही मनुष्य (भविष्यद्वक्ता) उस में वासस्थान पाने के लिये भी प्रार्थना करते हैं, जैसा यिर्मयाह कहता है, "जंगल में अन्तिम वासस्थान मुझे कौन देगा?"(6) ताकि बोनेवाला और काटनेवाला दोनों मसीह के राज्य में एक साथ आनन्द करें, जो उन सब के साथ उपस्थित है जो आरम्भ से परमेश्वर की ओर से स्वीकृत थे, जिसने उन्हें अपना वचन उनके साथ उपस्थित होने के लिये दिया।(7)
अध्याय छब्बीस.--पवित्रशास्त्र में छिपा धन मसीह है; पवित्रशास्त्र की सच्ची व्याख्या केवल कलीसिया में मिलती है।
1. इसलिए यदि कोई पवित्रशास्त्र को ध्यान से पढ़े, वह उन में मसीह का वृत्तान्त, और नई बुलाहट (वोकातिओनिस्) की पूर्वछाया पाएगा। क्योंकि मसीह वह धन है जो खेत में छिपा था,(8) अर्थात् इस जगत में (क्योंकि "खेत जगत है"(9)); पर पवित्रशास्त्र में छिपा धन मसीह है, क्योंकि वह नमूनों और दृष्टान्तों के द्वारा दिखाया गया। इसलिए उसका मानवीय स्वभाव, उन बातों के पूरे होने से पहले जो पहले कही गई थीं, अर्थात् मसीह के आगमन से पहले, समझा(10) नहीं जा सकता था। और इसलिए दानिय्येल भविष्यद्वक्ता से कहा गया: "वचन बन्द कर, और पुस्तक पर पूरी होने के समय तक मुहर लगा, जब तक बहुत लोग सीखें, और ज्ञान पूरा हो। क्योंकि उस समय, जब तितर-बितर होना पूरा होगा, वे ये सब बातें जानेंगे।"(11) पर यिर्मयाह भी कहता है, "अन्तिम दिनों में वे ये बातें समझेंगे।"(12) क्योंकि प्रत्येक भविष्यवाणी, अपने पूरे होने से पहले, मनुष्यों के लिये [भरी हुई] पहेलियाँ और सन्देह है। पर जब समय आ जाता है, और भविष्यवाणी घटित हो जाती है, तब भविष्यवाणियों की स्पष्ट और निश्चित व्याख्या होती है। और इस कारण निश्चय, जब इस वर्तमान समय में व्यवस्था यहूदियों को पढ़ी जाती है, वह एक कथा के समान है; क्योंकि उनके पास परमेश्वर के पुत्र के आगमन से सम्बन्धित सब बातों की व्याख्या नहीं, जो मानवीय स्वभाव में हुआ; पर जब वह मसीहियों के द्वारा पढ़ी जाती है, वह एक धन है, खेत में निश्चय छिपा हुआ, पर मसीह के क्रूस के द्वारा उजियाले में लाया गया, और
समझाया गया, मनुष्यों की समझ को धनी करता भी, और परमेश्वर की बुद्धि को दिखाता, और मनुष्य के विषय में उसकी व्यवस्थाओं को प्रगट करता, और मसीह के राज्य को पहले से रचता, और पवित्र यरूशलेम के उत्तराधिकार का पहले से प्रचार करता, और पहले से बताता कि जो मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करता है वह ऐसी उत्कृष्टता तक पहुँचेगा कि परमेश्वर को भी देखे, और उसका वचन सुने, और उसकी बात सुनने से ऐसी सीमा तक महिमा पाए, कि और लोग उसके मुख की महिमा को न देख सकें, जैसा दानिय्येल ने कहा: "जो समझते हैं, वे आकाशमण्डल के तेज के समान चमकेंगे, और धर्मियों में से बहुत से(1) सितारों के समान युगानुयुग.''(2) इस प्रकार, तब, मैं ने दिखा दिया है कि वह ऐसा है,(3) यदि कोई पवित्रशास्त्र पढ़े। क्योंकि इस प्रकार प्रभु ने मरे हुओं में से अपने जी उठने के बाद चेलों के साथ, बातें कीं, पवित्रशास्त्र ही से उन्हें सिद्ध करते हुए "कि मसीह को दुख उठाना है, और अपनी महिमा में प्रवेश करना है, और उसके नाम से पापों की क्षमा सारे जगत में प्रचार की जानी है।"(4) और चेला सिद्ध होगा, और घर के स्वामी के समान [बनाया जाएगा], "जो अपने भण्डार से नई और पुरानी वस्तुएँ निकालता है।"(5)
2. इसलिए कलीसिया में के प्रेस्बिटेरों की आज्ञा मानना अवश्य है,--जो, जैसा मैं ने दिखाया है, प्रेरितों से परम्परा रखते हैं; जिन्होंने, एपिस्कोपल पद की परम्परा के साथ, पिता की सुइच्छा के अनुसार सत्य का निश्चित वरदान पाया है। पर [यह भी अवश्य है] औरों को सन्देह में रखना जो आदि परम्परा से हटते हैं, और किसी भी स्थान में अपने आप को इकट्ठा करते हैं, [उन्हें देखते हुए] या तो टेढ़ी बुद्धि के मिथ्याशिक्षकों के रूप में, या फूले हुए और अपनी ही प्रसन्नता चाहनेवाले फूट डालनेवालों के रूप में, या फिर कपटियों के रूप में, जो लाभ और व्यर्थ महिमा के लिये ऐसा करते हैं। क्योंकि ये सब सत्य से गिर गए हैं। और मिथ्याशिक्षक निश्चय, जो परमेश्वर की वेदी पर पराई आग लाते हैं--अर्थात् पराई शिक्षाएँ--स्वर्ग से आग के द्वारा जलाए जाएँगे, जैसा नादाब और अबीउद जलाए गए।(6) पर जो सत्य के विरोध में उठते हैं, और परमेश्वर की कलीसिया के विरुद्ध औरों को उकसाते हैं, वे अधोलोक में वालों के बीच [रहेंगे] (अपुद इन्फेरोस), भूकम्प के द्वारा निगले जाकर, जैसा वे जो कोरे, दातान, और अबीरोन के साथ थे।(7) पर जो फाड़ते हैं, और कलीसिया की एकता को अलग करते हैं, वे परमेश्वर से वही दण्ड [पाएँगे] जो यारोबाम ने पाया।(8)
3. पर जो बहुतों के द्वारा प्रेस्बिटेर माने जाते हैं, पर अपनी ही अभिलाषाओं की सेवा करते हैं, और अपने हृदयों में परमेश्वर के भय को सर्वोच्च नहीं रखते, पर औरों के प्रति तुच्छता से चलते हैं, और मुख्य आसन रखने के गर्व से फूले हैं, और गुप्त में बुरे काम करते हैं, कहते हुए, "कोई हमें नहीं देखता," वे वचन के द्वारा दोषी ठहराए जाएँगे, जो बाहरी रूप के अनुसार न्याय नहीं करता (सेकुन्दुम ग्लोरियम), और न मुख को देखता है, पर हृदय को; और वे वे वचन सुनेंगे, जो दानिय्येल भविष्यद्वक्ता में मिलते हैं: "हे कनान के वंश, यहूदा के नहीं, सुन्दरता ने तुझे धोखा दिया, और अभिलाषा ने तेरे हृदय को बिगाड़ दिया।(9) दुष्ट दिनों में बूढ़ा हुआ तू, अब तेरे पाप जो तू ने पहले किए हैं उजियाले में आ गए हैं; क्योंकि तू ने झूठे न्याय सुनाए हैं, और निर्दोष को दोषी ठहराने का, और दोषी को छोड़ देने का अभ्यास किया है, यद्यपि प्रभु कहता है, निर्दोष और धर्मी को तू न मार।"(10) जिन के विषय प्रभु ने भी कहा: "पर यदि वह बुरा दास अपने हृदय में कहे, मेरा स्वामी अपने आने में देर करता है, और दासों और दासियों को मारना आरम्भ करे, और खाए पिए और मतवाला हो; उस दास का स्वामी ऐसे दिन आएगा जिस में वह उसकी बाट नहीं देखता, और ऐसी घड़ी में जिस की उसे खबर नहीं, और उसे दो टुकड़े करेगा, और अविश्वासियों के साथ उसका भाग ठहराएगा।"(11)
4. ऐसे सब व्यक्तियों से इसलिए, हमें दूर रहना be-bores, पर उन से लगे रहना जो, जैसा मैं ने पहले कहा है, प्रेरितों की शिक्षा को पकड़े रहते हैं, और जो याजकता के क्रम के साथ (प्रेस्बितेरीई ओर्दिने), औरों की पुष्टि और सुधार के लिये खरी बात और निर्दोष चाल दिखाते हैं।(12) इस रीति से, मूसा, जिसे ऐसी अगुवाई सौंपी गई थी, अच्छे विवेक पर भरोसा करके, परमेश्वर के सामने अपने को निर्दोष ठहराया, कहते हुए, "मैं ने लोभ से इन मनुष्यों में से किसी की वस्तु नहीं ली, और न मैं ने उन में से किसी से बुराई की है।"(13) इस रीति से भी, शमूएल, जिसने इतने वर्ष लोगों का न्याय किया, और बिना किसी गर्व के इस्राएल पर राज्य किया, अन्त में अपने को निर्दोष ठहराया, कहते हुए, "मैं अपने बचपन से इस दिन तक तुम्हारे सामने चला हूँ: परमेश्वर की दृष्टि में, और उसके अभिषिक्त के सामने (क्रिस्ती एयुस) मुझे उत्तर दो; तुम में से किसका बैल या किसका गदहा मैं ने लिया, या किस पर मैं ने अत्याचार किया, या किस को मैं ने सताया? या यदि मैं ने किसी के हाथ से घूस या [इतना भी] एक जूता लिया हो, बोल उठो
मेरे विरुद्ध, और मैं उसे तुम्हें लौटा दूँगा।"(1) और जब लोगों ने उस से कहा, "तू ने अत्याचार नहीं किया, और न तू ने हमें सताया और न तू ने किसी मनुष्य के हाथ से कुछ लिया," उसने प्रभु को साक्षी बुलाया, कहते हुए, "प्रभु साक्षी है, और उसका अभिषिक्त इस दिन साक्षी है, कि तुम ने मेरे हाथ में कुछ नहीं पाया। और उन्होंने उस से कहा, वह साक्षी है।" इसी ढब से प्रेरित पौलुस भी, क्योंकि उसका विवेक अच्छा था, कुरिन्थियों से कहा: "क्योंकि हम बहुतों के समान नहीं, जो परमेश्वर के वचन को बिगाड़ते हैं: पर सच्चाई से, पर परमेश्वर से, परमेश्वर की दृष्टि में मसीह में हम बोलते हैं;"(2) "हम ने किसी को हानि नहीं पहुँचाई, किसी को बिगाड़ा नहीं, किसी को छल से नहीं घेरा।"(3)
5. ऐसे प्रेस्बिटेरों को कलीसिया पालती है, जिन के विषय भविष्यद्वक्ता भी कहता है: "मैं तेरे हाकिमों को मेल में, और तेरे अध्यक्षों को धर्म में दूँगा।"(4) जिन के विषय प्रभु ने भी कहा, "तब विश्वासयोग्य भण्डारी (आक्टोर) कौन होगा, अच्छा और बुद्धिमान, जिसे प्रभु अपने घर पर ठहराता है, कि उन्हें ठीक समय पर उनका भोजन दे? धन्य है वह दास जिसे उसका प्रभु, जब वह आए, ऐसा करते पाए।"(5) तब पौलुस, हमें सिखाते हुए कि ऐसे कहाँ मिल सकते हैं, कहता है, "परमेश्वर ने कलीसिया में रखा, पहले, प्रेरितों को; दूसरे, भविष्यद्वक्ताओं को; तीसरे, शिक्षकों को।"(6) इसलिए, जहाँ प्रभु के वरदान रखे गए हैं, वहाँ हमें सत्य सीखना चाहिए, [अर्थात्,] उन से जिनके पास प्रेरितों से आई हुई कलीसिया की वह परम्परा है? और जिनके बीच चाल में वह है जो खरी और निर्दोष है, और वचन में वह भी जो मिलावट रहित और अक्षय है। क्योंकि ये भी एक ही परमेश्वर में हमारे इस विश्वास को सुरक्षित रखते हैं जिसने सब कुछ सृजा; और परमेश्वर के पुत्र के प्रति [हमारी] उस प्रेम को बढ़ाते हैं, जिसने हमारे लिये ऐसी अद्भुत व्यवस्थाएँ पूरी कीं: और वे हमें बिना खतरे के पवित्रशास्त्र समझाते हैं, न परमेश्वर की निन्दा करते, न कुलपतियों का अपमान करते, न भविष्यद्वक्ताओं को तुच्छ जानते।
अध्याय सत्ताईस.--प्राचीन काल के मनुष्यों के पाप, जिन से परमेश्वर की अप्रसन्नता हुई, उसकी प्रोविडेन्स के द्वारा लेख में सौंपे गए, कि हम उन से शिक्षा पाएँ, और गर्व से न भर जाएँ। इसलिए हमें यह न निकालना चाहिए कि मसीह ने जिस का प्रचार किया उस से दूसरा परमेश्वर था; हमें डरना चाहिए, कहीं वही एक परमेश्वर, जिसने प्राचीन लोगों पर दण्ड दिया, हम पर और भारी दण्ड न ले आए।
I. जैसा मैं ने एक प्रेस्बिटेर से सुना,(8) जिसने यह उन से सुना जिन्होंने प्रेरितों को देखा था, और उन से जो उनके चेले थे, पवित्रशास्त्र में [कहा गया] दण्ड प्राचीन लोगों के लिये काफी था, उन कामों के विषय में जो उन्होंने आत्मा की अगुवाई के बिना किए। क्योंकि परमेश्वर पक्षपाती नहीं, उसने उसे अप्रसन्न करनेवाले कामों पर उचित दण्ड दिया। दाऊद के विषय में जैसा,(9) जब उसने धर्म के कारण शाऊल से सताव सहा, और राजा शाऊल से भाग गया, और अपने शत्रु का पलटा न लेना चाहा, उसने मसीह के आगमन का गीत गाया, और जातियों को बुद्धि में सिखाया, और आत्मा की अगुवाई के अनुसार सब कुछ किया, और परमेश्वर को प्रसन्न किया। पर जब उसकी अभिलाषा ने उसे ऊरिय्याह की पत्नी बतशेबा को लेने को उकसाया, पवित्रशास्त्र ने उसके विषय कहा, "अब, जो बात (सेर्मो) दाऊद ने की थी वह प्रभु की दृष्टि में दुष्ट दिखाई दी;"(10) और नातान भविष्यद्वक्ता उसके पास भेजा जाता है, उसे उसका अपराध दिखाते हुए, कि वह अपने पर दण्ड सुनाकर और अपने को दोषी ठहराकर, मसीह से दया और क्षमा पाए: "और [नातान] ने उस से कहा, एक नगर में दो मनुष्य थे; एक धनी, और दूसरा कंगाल। धनी के पास बहुत अधिक भेड़ें और गाय-बैल थे; पर कंगाल के पास कुछ न था, एक छोटी मादा मेम्ना को छोड़, जिसे वह रखता था, और पालता था; और वह उसके और उसके बच्चों के साथ रहती थी: वह उसकी अपनी रोटी खाती थी, और उसके कटोरे से पीती थी, और उसके लिये बेटी के समान थी। और धनी के पास एक अतिथि आया; और उसने अतिथि का सत्कार करने के लिये अपनी मादा मेमनों के झुण्ड में से, और अपने बैलों के झुण्ड में से लेने को छोड़ दिया; पर उसने कंगाल की मादा मेम्ना को ले लिया, और उसे उस मनुष्य के आगे रखा जो उसके पास आया था।
और दाऊद का क्रोध उस मनुष्य पर बहुत भड़का; और उसने नातान से कहा, प्रभु के जीवन की शपथ, जिस मनुष्य ने यह बात की है वह निश्चय मरेगा (फीलियुस मोर्तिस एस्त): और वह मेम्ना को चौगुना लौटाएगा, क्योंकि उसने यह बात की है, और क्योंकि उसे कंगाल पर दया न थी। और नातान ने उस से कहा, तू ही वह मनुष्य है जिसने यह किया है।"(11) और फिर वह [वृत्तान्त के] शेष के साथ आगे बढ़ता है, उसे झिड़कते हुए, और उसके प्रति परमेश्वर के उपकारों को गिनते हुए, और [उसे दिखाते हुए] कि उसकी चाल ने प्रभु को कितना अप्रसन्न किया। क्योंकि [उसने प्रगट किया] कि ऐसी प्रकृति के काम परमेश्वर को प्रसन्न न थे, पर बड़ा क्रोध उसके घर पर लटका हुआ था। पर दाऊद इस heating पर पश्चात्ताप से मारा गया, और पुकारा, "मैं ने प्रभु के विरुद्ध पाप किया है;" और उसने एक पश्चात्ताप का भजन गाया, प्रभु के आने की बाट जोहते हुए, जो उस मनुष्य को धोता और शुद्ध करता है जिसने
पाप [की जंजीर] से कसा बँधा हुआ था। वैसे ही सुलैमान के विषय में, जब तक वह सीधा न्याय करता रहा, और परमेश्वर की बुद्धि को प्रगट करता रहा, और सत्य के नमूने के रूप में मन्दिर बनाया, और परमेश्वर की महिमाएँ रखीं, और जातियों पर आनेवाली शान्ति को बताया, और मसीह के राज्य को प्रतिरूपित किया, और प्रभु के आगमन के विषय में तीन हजार दृष्टान्त बोले, और पाँच हजार गीत, परमेश्वर की स्तुति गाते हुए, और सृष्टि में परमेश्वर की बुद्धि को समझाया, प्रत्येक वृक्ष के स्वभाव के विषय में, प्रत्येक औषधि के विषय में, और सब पक्षियों, चौपायों, और मछलियों के विषय में [बातें करते हुए]; और उसने कहा, "क्या परमेश्वर, जिसे आकाश नहीं समेट सकते, सचमुच पृथ्वी पर मनुष्यों के साथ वास करेगा?"(1) और उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया, और सब का आश्चर्य था; और पृथ्वी के सब राजाओं ने उस से भेंट माँगी (क्वेरेबन्त फाकियेम एयुस) कि वे वह बुद्धि सुनें जो परमेश्वर ने उस पर दी थी।(2) दक्षिण की रानी भी, पृथ्वी के छोरों से उसके पास आई, उस में की बुद्धि को जानने के लिये:(3) जिसे प्रभु ने भी उसके रूप में बताया जो उन मनुष्यों की जातियों के साथ न्याय में उठेगी जो उसके वचन सुनते हैं और उस पर विश्वास नहीं करते, और उन्हें दोषी ठहराएगी, क्योंकि उसने अपने को उस बुद्धि के अधीन किया जो परमेश्वर के सेवक के द्वारा बताई गई, जब कि ये मनुष्य उस बुद्धि को तुच्छ जानते थे जो सीधे परमेश्वर के पुत्र से निकली। क्योंकि सुलैमान एक सेवक था, पर मसीह निश्चय परमेश्वर का पुत्र है, और सुलैमान का प्रभु।
इसलिए, जब तक उसने बिना दोष परमेश्वर की सेवा की, और उसकी व्यवस्थाओं की सेवा की, तब तक वह महिमामय हुआ: पर जब उसने सब जातियों से स्त्रियाँ लीं, और उन्हें इस्राएल में मूर्तियाँ खड़ी करने दिया, पवित्रशास्त्र ने उसके विषय इस प्रकार कहा: "और राजा सुलैमान स्त्रियों का प्रेमी था, और उसने पराई स्त्रियाँ अपने पास लीं; और जब सुलैमान बूढ़ा हुआ, तब यह हुआ, उसका हृदय अपने परमेश्वर प्रभु के साथ सिद्ध न था। और पराई स्त्रियों ने उसका हृदय पराए देवताओं के पीछे फेर दिया। और सुलैमान ने प्रभु की दृष्टि में बुराई की: वह प्रभु के पीछे न चला, जैसा उसके पिता दाऊद ने किया। और प्रभु सुलैमान पर क्रोधित हुआ; क्योंकि उसका हृदय प्रभु के साथ सिद्ध न था, जैसा उसके पिता दाऊद का हृदय था।"(4) पवित्रशास्त्र ने उसे इस प्रकार काफी डाँटा है, जैसा प्रेस्बिटेर ने कहा, ताकि कोई देह प्रभु की दृष्टि में घमण्ड न करे।
2. इस कारण प्रभु पृथ्वी के नीचे के क्षेत्रों में भी उतरा, वहाँ भी अपने आगमन का प्रचार करते हुए, और [प्रगट करते हुए] उन के द्वारा पाई हुई पापों की क्षमा को जो उस पर विश्वास करते हैं।(5) अब वे सब उस पर विश्वास करते थे जिनकी उस की ओर आशा थी, अर्थात् जिन्होंने उसके आगमन का प्रचार किया, और उसकी व्यवस्थाओं के अधीन हुए, धर्मी मनुष्य, भविष्यद्वक्ता, और कुलपति, जिन को उसने पाप क्षमा किए, जैसी रीति से उसने हमें किए, जिन पापों को हमें उन पर नहीं लगाना चाहिए, यदि हम परमेश्वर के अनुग्रह को तुच्छ न जानना चाहें। क्योंकि जैसे इन मनुष्यों ने हमारे (अन्यजातियों के) अपराध हम पर नहीं लगाए, जो हम ने मसीह के हमारे बीच प्रगट होने से पहले किए, वैसे ही यह ठीक नहीं कि हम उन पर दोष लगाएँ जिन्होंने मसीह के आने से पहले पाप किया। क्योंकि "सब मनुष्य परमेश्वर की महिमा से रहित हैं,"(6) और अपने आप से धर्मी नहीं ठहरते, पर प्रभु के आगमन से,--वे जो यत्न से अपनी आँखें उसके प्रकाश की ओर फेरे रहते हैं। और हमारी शिक्षा के लिये उनके काम लेख में सौंपे गए हैं, कि हम जानें, पहले स्थान में, कि हमारा परमेश्वर और उनका एक ही है, और पाप उसे प्रसन्न नहीं करते यद्यपि प्रसिद्ध मनुष्यों के द्वारा किए गए हों; और दूसरे स्थान में, कि हम दुष्टता से दूर रहें। क्योंकि यदि ये प्राचीन काल के मनुष्य, जो [उन पर दी गई] वरदानों में हम से आगे चले, और जिन के लिये परमेश्वर के पुत्र ने अभी दुख नहीं उठाया था, जब उन्होंने कोई पाप किया और शारीरिक अभिलाषाओं की सेवा की, ऐसे अपमान के पात्र बनाए गए, तो वर्तमान दिन के मनुष्य क्या सहेंगे, जिन्होंने प्रभु के आने को तुच्छ जाना, और अपनी ही अभिलाषाओं के दास हो गए?
और सचमुच प्रभु की मृत्यु पहले वालों के लिये चंगाई और पापों की क्षमा का [साधन] हुई, पर जो अब पाप करते हैं उनके लिये मसीह फिर न मरेगा, क्योंकि मृत्यु फिर उस पर प्रभुता न करेगी; पर पुत्र पिता की महिमा में आएगा, अपने भण्डारियों और बाँटनेवालों से वह धन माँगते हुए जिसे उसने उन्हें सौंपा था, ब्याज समेत; और जिन को उसने सबसे अधिक दिया उन से वह सबसे अधिक माँगेगा। इसलिए हमें, जैसा वह प्रेस्बिटेर कहता है, फूलना नहीं चाहिए, और न प्राचीन काल के लोगों पर कठोर होना चाहिए, पर हमें स्वयं डरना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि, मसीह की पहचान [हमारे पहुँचने] के बाद, यदि हम परमेश्वर को अप्रसन्न करनेवाली बातें करें, तो हमें पापों की और क्षमा न मिले, पर उसके राज्य से बाहर कर दिए जाएँ।(6) और इसलिए पौलुस ने कहा, "क्योंकि यदि [परमेश्वर] ने स्वाभाविक डालियों को न छोड़ा, [चौकस रह] कहीं वह तुझे भी न छोड़े, तू जब जंगली जैतून का वृक्ष था, जैतून के वृक्ष की चिकनाई में लगाया गया, और उसकी चिकनाई का भागी बनाया गया।"(7)
3. तू यह भी देखेगा, कि साधारण लोगों के अपराध वैसे ही वर्णित किए गए हैं, उन के निमित्त नहीं जिन्होंने तब अपराध किया, पर हमारे लिये शिक्षा के साधन के रूप में, और कि हम समझें कि एक ही वही परमेश्वर है जिसके विरुद्ध ये
मनुष्यों ने पाप किया, और जिसके विरुद्ध अब कुछ लोग उन में से अपराध करते हैं जो मानते हैं कि उन्होंने उस पर विश्वास किया है। पर यह भी, [जैसा प्रेस्बिटेर कहता है,] पौलुस ने कुरिन्थियों की पत्री में सबसे स्पष्ट प्रगट किया है, जब वह कहता है, "हे भाइयो, मैं नहीं चाहता कि तुम अनजान रहो, कि हमारे सब पिता बादल के नीचे थे, और सब ने समुद्र में मूसा के लिये बपतिस्मा पाया, और सब ने वही आत्मिक भोजन खाया, और सब ने वही आत्मिक पेय पिया: क्योंकि उन्होंने उस आत्मिक चट्टान से पिया जो उनके पीछे चली; और वह चट्टान मसीह था। पर उन में से बहुतों से परमेश्वर प्रसन्न न हुआ, क्योंकि वे जंगल में गिरा दिए गए। ये बातें हमारे उदाहरण के लिये थीं (इन फिगूरम नोस्त्री), इस उद्देश्य से कि हम बुरी वस्तुओं की लालसा न करें, जैसा उन्होंने भी लालसा की; और न तुम मूर्तिपूजक बनो, जैसा उन में से कुछ थे, जैसा लिखा है:(1) लोग खाने और पीने को बैठ गए, और खेलने को उठे। और न हम वेश्याकर्म करें, जैसा उन में से कुछ ने भी किया, और एक ही दिन में तेईस हजार गिर पड़े। और न हम मसीह को परखें, जैसा उन में से कुछ ने भी परखा, और साँपों से नाश किए गए। और न तुम कुड़कुड़ाओ, जैसा उन में से कुछ ने कुड़कुड़ाया, और नाश करनेवाले से नाश किए गए। पर ये सब बातें उन्हें एक रूप में हुईं, और हमारी चेतावनी के लिये लिखी गईं, जिन पर जगत (सैकुलोरुम) का अन्त आ पहुँचा है। इसलिए जो समझता है कि मैं खड़ा हूँ, वह चौकस रहे कि गिर न पड़े।"(2)
4. इसलिए, सब सन्देह और विरोध से परे, प्रेरित दिखाता है कि एक ही वही परमेश्वर है, जिसने इन पहले की बातों के साथ न्याय में प्रवेश किया, और जो वर्तमान समय की बातों की जाँच करता है, और दिखाता है कि ये बातें लेख में क्यों सौंपी गई हैं; ये सब मनुष्य अशिक्षित और धृष्ट, हाँ, सामान्य बुद्धि से भी रहित पाए जाते हैं, जो, प्राचीन काल के लोगों के अपराधों के कारण, और उन में से एक विशाल संख्या की अवज्ञा के कारण, आरोप लगाते हैं कि इन मनुष्यों का निश्चय एक परमेश्वर था, और वह जगत का बनानेवाला था, और क्षय की दशा में था; पर मसीह के द्वारा दूसरा पिता प्रगट किया गया, और यह सत्ता वही है जिसे उन में से प्रत्येक के मन ने गर्भ में धारण किया है; यह न समझते हुए कि जैसे, पहले वाले विषय में, परमेश्वर ने पाप करनेवालों के प्रति many stances में अपने को अप्रसन्न दिखाया, वैसे ही पीछे वाले विषय में भी, "बहुत बुलाए जाते हैं, पर थोड़े चुने जाते हैं।"(3) तब जैसे अधर्मी, मूर्तिपूजक, और व्यभिचारी नाश हुए, वैसे ही अब भी है: क्योंकि प्रभु प्रगट करता है, कि ऐसे व्यक्ति अनन्त आग में भेजे जाते हैं;(4) और प्रेरित कहता है, "क्या तुम नहीं जानते कि अधर्मी परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे?
धोखा न खाओ: न व्यभिचारी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, स्त्रीस्वभाव वाले नहीं, न पुरुषों के साथ अपने आप का दुरुपयोग करनेवाले, न चोर, न लोभी, न पियक्कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर से लेनेवाले, परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे।"(5) और उसने ये बातें उन से नहीं कहीं जो बाहर हैं, पर हम से, कहीं हम कोई ऐसी बात करके परमेश्वर के राज्य से बाहर न डाले जाएँ। वह कहने को आगे बढ़ता है, "और ऐसे निश्चय तुम थे; पर तुम धोए गए हो, पर तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम में पवित्र किए गए हो, और हमारे परमेश्वर की आत्मा के द्वारा।" और जैसा तब, जो दुराचारी जीवन बिताते थे, और और लोगों को भटकाते थे, दोषी ठहराए गए और निकाल दिए गए, वैसे ही अब भी ठोकर खानेवाली आँख उखाड़ी जाती है, और पाँव और हाथ, कहीं शेष देह वैसे ही नाश न हो।(6) और हमारे पास आज्ञा है: "यदि कोई मनुष्य जो भाई कहलाता है व्यभिचारी हो, या लोभी, या मूर्तिपूजक, या गाली देनेवाला, या पियक्कड़, या अन्धेर से लेनेवाला, ऐसे के साथ खाना भी न।"(7) और फिर प्रेरित कहता है, "कोई तुम्हें व्यर्थ बातों से धोखा न दे; क्योंकि इन बातों के कारण परमेश्वर का क्रोध अविश्वास के पुत्रों पर आता है।
इसलिए तुम उनके साथ par-takers न बनो।"(8) और जैसा तब पापियों का दण्ड औरों तक फैला जिन्होंने उन्हें स्वीकृत किया, और उनकी संगति में जुड़े; वैसे ही अब भी है, कि "थोड़ा खमीर सारे गूँधे हुए आटे को खमीर करता है।"(9) और जैसा परमेश्वर का क्रोध तब अधर्मियों पर उतरा, यहाँ भी प्रेरित वैसे ही कहता है: "क्योंकि परमेश्वर का क्रोध स्वर्ग से प्रगट होगा उन मनुष्यों के सब अभक्ति और अधर्म के विरुद्ध जो अधर्म में सत्य को रोक रखते हैं।"(10) और जैसा, उन समयों में, मिस्रियों पर परमेश्वर से पलटा आया जो इस्राएल को अन्यायपूर्ण दण्ड के अधीन कर रहे थे, वैसे ही अब भी है, प्रभु सचमुच प्रगट करते हुए, "और क्या परमेश्वर अपने चुने हुओं का पलटा न लेगा, जो रात दिन उसे पुकारते हैं? मैं तुम से कहता हूँ, कि वह उनका पलटा शीघ्र लेगा।"(11) प्रेरित वैसे ही कहता है, थिस्सलुनीकियों की पत्री में: "क्योंकि परमेश्वर के यहाँ यह धर्म की बात है, कि तुम्हें क्लेश देनेवालों को क्लेश का बदला दे; और तुम क्लेश पानेवालों को हमारे साथ विश्राम, स्वर्ग से अपने शक्तिशाली दूतों के साथ हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रगट होने पर, और आग की ज्वाला में, उन से पलटा लेने के लिये जो परमेश्वर को नहीं जानते, और जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार की आज्ञा नहीं मानते: जो प्रभु की उपस्थिति से, और उसकी सामर्थ्य की महिमा से अनन्त विनाश के साथ भी दण्ड पाएँगे; जब वह महिमा पाने के लिये आएगा
अपने पवित्र लोगों में, और उन सब में आश्चर्य के योग्य होने के लिये जिन्होंने उस पर विश्वास किया है।"(1)
अध्याय अट्ठाईस.--वे व्यक्ति अपने को निर्बुद्धि सिद्ध करते हैं जो मसीह की दया को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं, पर न्याय के विषय चुप रहते हैं, और केवल नई वाचा के अधिक भरपूर अनुग्रह को देखते हैं; पर, जो बड़ी सिद्धता की मात्रा वह हम से माँगती है उसे भूलकर, वे दिखाने का यत्न करते हैं कि जगत के सृजनहार से परे दूसरा परमेश्वर है।
1. तब, क्योंकि दोनों वाचाओं में परमेश्वर का वही धर्म [दिखाया गया] है जब परमेश्वर पलटा लेता है, एक विषय में निश्चय नमूने के रूप में, थोड़े समय के लिये, और अधिक संयम से; पर दूसरे में, सचमुच, टिककर, और अधिक कठोरता से: क्योंकि आग अनन्त है, और परमेश्वर का वह क्रोध जो हमारे प्रभु के मुख से स्वर्ग से प्रगट होगा (जैसा दाऊद भी कहता है, "पर प्रभु का मुख बुराई करनेवालों के विरुद्ध है, कि पृथ्वी से उनकी स्मृति काट डाले"(2)), उन पर भारी दण्ड लाता है जो उसे अपने ऊपर लेते हैं,--ciders ने दिखाया, कि वे मनुष्य बुद्धि से रहित हैं, जो, [वाद करते हुए] उस से जो पहले परमेश्वर की आज्ञा न माननेवालों पर हुआ, दूसरा पिता भीतर लाने का यत्न करते हैं, [इन दण्डों] के सामने रखते हुए कि प्रभु ने अपने आने पर उन्हें बचाने के लिये कितनी बड़ी बातें कीं जिन्होंने उसे ग्रहण किया, उन पर दया करते हुए; जब कि वे उसके न्याय के विषय चुप रहते हैं; और वे सब बातें जो ऐसे लोगों पर आएँगी जिन्होंने उसके वचन सुने, पर उन्हें नहीं किया, और कि उनके लिये भला होता यदि वे जन्मे न होते,(3) और कि सदोम और गोमोर्रा के लिये न्याय में उस नगर से अधिक सहने योग्य होगा जिसने उसके चेलों के वचन को ग्रहण न किया।(4)
2. क्योंकि, जैसे नई वाचा में, परमेश्वर में [रखा जानेवाला] मनुष्यों का विश्वास बढ़ाया गया है, [पहले से प्रगट हुई बात के] अतिरिक्त परमेश्वर के पुत्र को पाते हुए, कि मनुष्य भी परमेश्वर का भागी हो; वैसे ही जीवन में हमारी चाल अधिक चौकस होना माँगी जाती है, जब हम केवल बुरे कामों से नहीं, पर बुरे विचारों से भी, निकम्मी बातों से, खोखली बातचीत से, और अश्लील भाषा से अलग रहने को चलाए जाते हैं:(5) इस प्रकार उन का दण्ड भी बढ़ता है जो परमेश्वर के वचन पर विश्वास नहीं करते, और उसके आगमन को तुच्छ जानते हैं, और पीछे की ओर फेर दिए जाते हैं; केवल थोड़े समय का नहीं, पर अनन्त भी किया जाकर। क्योंकि जिस किसी से प्रभु कहेगा, "मुझ से चले जाओ, हे शापितों, अनन्त आग में,"(6) ये सर्वदा दण्ड पाएँगे; और जिस किसी से वह कहेगा, "आओ, मेरे पिता के धन्य लोगो, उस राज्य के वारिस हो जो अनन्त काल के लिये तुम्हारे लिये तैयार किया गया है,"(7) ये राज्य को सर्वदा पाते हैं, और उस में निरन्तर आगे बढ़ते हैं; क्योंकि एक ही वही परमेश्वर पिता है, और उसका वचन, जो विभिन्न व्यवस्थाओं के द्वारा निश्चय मानवजाति के साथ सदा उपस्थित रहा है, और बहुत सी बातें पूरी की हैं, और आरम्भ से बचाए जानेवालों को बचाया है, (क्योंकि ये ही वे हैं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, और जिस वर्ग के वे हैं उसके अनुसार परमेश्वर के वचन के पीछे चलते हैं,) और जिन का न्याय होता है उनका न्याय किया है, अर्थात् जो परमेश्वर को भूलते हैं, और निन्दा करनेवाले हैं, और उसके वचन के अपराधी हैं।
3. क्योंकि हमारे द्वारा पहले बताए गए sesame मिथ्याशिक्षक अपने आप से गिर गए हैं, प्रभु पर दोष लगाकर, जिस पर वे कहते हैं कि वे विश्वास करते हैं। क्योंकि वे बातें जिन की ओर वे ध्यान बुलाते हैं उस परमेश्वर के विषय में जिसने तब अविश्वासियों को थोड़े समय के दण्ड दिए, और मिस्रियों को मारा, जब कि उसने आज्ञा माननेवालों को बचाया; ये वही [तथ्य, मैं कहता हूँ,] तौभी प्रभु में अपने आप को दोहराएँगे, जो जिन का वह न्याय करता है उनका अनन्त काल के लिये न्याय करता है, और जिन को वह छोड़ देता है उन्हें अनन्त काल के लिये छोड़ देता है: और वह [इस प्रकार] पाया जाएगा, इन मनुष्यों की भाषा के अनुसार, उन के सबसे घोर पाप का कारण रहा जिन्होंने उस पर हाथ डाले, और उसे बेधा। क्योंकि यदि वह ऐसे न आया होता, तो यह निकलता है कि ये मनुष्य अपने प्रभु के मारनेवाले नहीं बन सकते थे; और यदि उसने उनके पास भविष्यद्वक्ता न भेजे होते, तो वे निश्चय उन्हें मार नहीं सकते थे, और न प्रेरितों को। इसलिए, जो हम पर आक्रमण करते हैं, और कहते हैं, यदि मिस्री मारी से पीड़ित न होते, और इस्राएल का पीछा करते हुए समुद्र में घुटकर न मरते, तो परमेश्वर अपनी प्रजा को नहीं बचा सकता था, यह उत्तर दिया जा सकता है;--तब, यदि यहूदी प्रभु के मारनेवाले न बने होते (जिसने निश्चय उन से अनन्त जीवन छीन लिया), और प्रेरितों को मारकर और कलीसिया को सताकर क्रोध की खाई में न गिरे होते, तो हम नहीं बचाए जा सकते थे। क्योंकि जैसे वे मिस्रियों के अन्धकार के द्वारा बचाए गए, वैसे ही हम भी यहूदियों के अन्धकार के द्वारा; निश्चय, यदि प्रभु की मृत्यु उन का दण्ड है जिन्होंने उसे क्रूस पर जकड़ा, और जिन्होंने उसके आगमन पर विश्वास न किया, पर उन का उद्धार है जो उस पर विश्वास करते हैं।
क्योंकि प्रेरित कुरिन्थियों की दूसरी [पत्री] में भी कहता है: "क्योंकि हम परमेश्वर के लिये मसीह की सुगन्ध हैं, बचाए जानेवालों में, और नाश होनेवालों में: एक के लिये निश्चय मृत्यु तक मृत्यु की सुगन्ध,
पर दूसरे के लिये जीवन तक जीवन की सुगन्ध।" तब, मृत्यु तक मृत्यु की सुगन्ध किस के लिये है, उन को छोड़ जो विश्वास नहीं करते और न परमेश्वर के वचन के अधीन हैं? और वे कौन थे जिन्होंने तब भी अपने को मृत्यु के लिये सौंप दिया? वे मनुष्य, सन्देह नहीं, जो विश्वास नहीं करते, और न अपने को परमेश्वर के अधीन करते हैं। और फिर, वे कौन हैं जो बचाए गए और उत्तराधिकार पाए? वे, सन्देह नहीं, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और जो उसके प्रेम में बने रहे; जैसा कालेब यपुन्ने [का पुत्र] और यहोशू नून [का पुत्र] ने किया,(2) और निर्दोष बालक,(3) जिन को बुराई का बोध नहीं था। पर अब बचाए जानेवाले और अनन्त जीवन पानेवाले कौन हैं? क्या वे नहीं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, और जो उसकी प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करते हैं, और जो "दुर्भाव में छोटे बालकों के समान हो गए हैं?"(4)
अध्याय उनतीस.--मार्किओनी के तर्कों का खण्डन, जिन्होंने दिखाने का यत्न किया कि परमेश्वर पाप का कर्ता था, क्योंकि उसने फ़िरौन और उसके सेवकों को अन्धा किया।
1. "पर," वे कहते हैं, "परमेश्वर ने फ़िरौन के हृदय को और उसके सेवकों के हृदय को कठोर किया।"(5) तब, जो ऐसे कठिन प्रश्न लगाते हैं, वे सुसमाचार में उस अंश को नहीं पढ़ते जहाँ प्रभु ने चेलों को उत्तर दिया, जब उन्होंने उस से पूछा, "तू उन से दृष्टान्तों में क्यों बोलता है?"--"क्योंकि स्वर्ग के राज्य का भेद जानना तुम्हें दिया गया है; पर to thorn मैं दृष्टान्तों में बोलता हूँ, कि वे देखकर न देखें, और सुनकर न सुनें, समझकर न समझें; कि उनके विषय यशायाह की भविष्यवाणी fulfil leading हो, इस लोगों के हृदय को मोटा कर और उनके कानों को सुस्त कर, और उनकी आँखों को अन्धा कर। पर धन्य हैं तुम्हारी आँखें, जो वे बातें देखती हैं जिन्हें तुम देखते हो; और तुम्हारे कान, जो वह सुनते हैं जिसे तुम सुनते हो।(6) क्योंकि एक ही वही परमेश्वर [जो औरों को आशीष देता है] उन पर अन्धापन डालता है जो विश्वास नहीं करते, पर जो उसे तुच्छ जानते हैं; जैसा सूर्य, जो उसकी सृष्टि है, [करता है] उन के विषय में जो आँखों की किसी निर्बलता के कारण उसकी ज्योति नहीं देख सकते; पर जो उस पर विश्वास करते हैं और उसके पीछे चलते हैं, उन्हें वह मन की और अधिक पूर्ण और बड़ी ज्योति देता है।
इस वचन के अनुसार इसलिए प्रेरित कहता है, कुरिन्थियों की दूसरी the] में: "जिस में the this जगत ने अविश्वासियों के मनों को अन्धा कर दिया है, कहीं मसीह के महिमामय सुसमाचार की ज्योति [उन पर] न चमके।"(7) और फिर, रोमियों की उस में: "और जैसा उन्होंने परमेश्वर को अपनी जानकारी में रखना उचित न समझा, परमेश्वर ने उन्हें निकम्मे मन के वश में कर दिया, कि वे अनुचित बातें करें।"(8) मसीहविरोधी के विषय बोलते हुए भी, वह थिस्सलुनीकियों की दूसरी में स्पष्ट कहता है: "और इस कारण परमेश्वर उन्हें भ्रम का काम भेजेगा, कि वे झूठ पर विश्वास करें; कि वे सब दोषी ठहराए जाएँ जिन्होंने सत्य पर विश्वास नहीं किया, पर अधर्म को स्वीकृति दी।"(9)
2. इसलिए, यदि वर्तमान समय में भी, परमेश्वर, उन की संख्या जानकर जो विश्वास न करेंगे, क्योंकि वह सब कुछ पहले से जानता है, उन्हें अविश्वास के वश कर दिया है, और इस प्रकार के मनुष्यों से अपना मुख फेर लिया है, उन्हें उस अन्धकार में छोड़कर जिसे उन्होंने अपने लिये आप चुना है, तो क्या आश्चर्य है यदि उसने उस समय भी फ़िरौन को, जो कभी विश्वास न करता, अपने साथ वालों समेत, उनके अविश्वास के वश कर दिया? जैसा वचन ने झाड़ी से मूसा से कहा: "और मैं निश्चय जानता हूँ कि मिस्र का राजा तुम्हें जाने न देगा, बलवन्त हाथ के बिना।"(10) और इस कारण कि प्रभु ने दृष्टान्तों में कहा, और इस्राएल पर अन्धापन लाया, कि वे देखकर न देखें, क्योंकि वह उन में अविश्वास [की आत्मा] को जानता था, उसी कारण उसने फ़िरौन के हृदय को कठोर किया; कि, यह देखते हुए भी कि लोगों को बाहर ले जानेवाली परमेश्वर की उँगली थी, वह विश्वास न करे, पर अविश्वास के समुद्र में गिरा दिया जाए, इस धारणा में टिका रहे कि इन [इस्राएलियों] का निकलना जादुई शक्ति से पूरा हुआ, और यह कि लाल समुद्र ने लोगों को मार्ग परमेश्वर की क्रिया से नहीं दिया, पर यह केवल स्वाभाविक कारणों से हुआ (सेद नातुरालितेर सिक् से हबेरे)।
अध्याय तीस.--मार्किओनी के द्वारा जोड़े गए एक और तर्क का खण्डन, कि परमेश्वर ने इब्री लोगों को मिस्रियों को लूटने की आज्ञा दी।
I. फिर, जो छिद्रान्वेषण करते हैं और दोष निकालते हैं क्योंकि लोगों ने, परमेश्वर की आज्ञा पर, अपने प्रस्थान की सन्ध्या को, मिस्रियों से सब प्रकार के पात्र और वस्त्र ले लिए," और इस प्रकार चले गए, जिन [लूट के माल] से भी, जंगल में निवास बनाया गया, वे परमेश्वर के धर्ममय व्यवहारों के और उसकी व्यवस्थाओं के विषय अपने को अज्ञानी सिद्ध करते हैं; जैसा प्रेस्बिटेर ने भी कहा: क्योंकि यदि परमेश्वर ने नमूने के निर्गमन में यह न दिया होता, तो अब कोई हमारे सच्चे निर्गमन में नहीं बचाया जा सकता; अर्थात्, उस विश्वास में जिसमें हम स्थिर किए गए हैं, और जिसके द्वारा हम अन्यजातियों की संख्या के बीच से बाहर लाए गए हैं। क्योंकि कुछ दशाओं में एक छोटा, और औरों में एक बड़ा हमारे पीछे चलता है
सम्पत्ति की मात्रा, जिसे हम ने अधर्म के धन से प्राप्त किया है। क्योंकि हम जिन घरों में रहते हैं, जिन वस्त्रों को पहनते हैं, जिन पात्रों को काम में लाते हैं, और जो और हर वस्तु हमारे प्रतिदिन के जीवन की सेवा करती है, उसे हम किस स्रोत से पाते हैं, उन वस्तुओं से छोड़कर जिन्हें, जब हम अन्यजाति थे, हम ने लोभ से कमाया, या अपने अन्यजाति माता-पिता, सम्बन्धियों, या मित्रों से पाया, जिन्होंने उन्हें अधर्म से प्राप्त किया?--यह कहे बिना कि अब भी हम ऐसी वस्तुएँ कमाते हैं जब हम विश्वास में हैं। क्योंकि कौन है जो बेचता है, और खरीदनेवाले से लाभ नहीं करना चाहता? या कौन कुछ खरीदता है, और बेचनेवाले से अच्छा मूल्य नहीं पाना चाहता? या कौन है जो व्यापार करता है, और ऐसा इसलिए नहीं करता कि उससे जीविका पाए? और राजभवन में के विश्वास करनेवालों के विषय में, क्या वे अपने काम के पात्र उस सम्पत्ति से नहीं पाते जो कैसर की है; और जिनके पास नहीं, क्या इन [मसीहियों] में से प्रत्येक अपनी सामर्थ्य के अनुसार नहीं देता? मिस्री [यहूदी] लोगों के देनदार थे, केवल सम्पत्ति के विषय में नहीं, पर उनके प्राणों के विषय में भी, पूर्वकाल में कुलपति यूसुफ की दया के कारण; पर अन्यजाति किस रीति से हमारे देनदार हैं, जिन से हम लाभ और मुनाफा दोनों पाते हैं? जो कुछ वे परिश्रम से इकट्ठा करते हैं, इन वस्तुओं को हम बिना परिश्रम के काम में लाते हैं, यद्यपि हम विश्वास में हैं।
2. उस समय तक लोगों ने सबसे नीच दासता में मिस्रियों की सेवा की, जैसा पवित्रशास्त्र कहता है: "और मिस्रियों ने इस्राएल की सन्तान पर अपनी शक्ति कठोरता से चलाई; और उन्होंने गारे में और ईंट में कठिन परिश्रम से, और खेत में की हर प्रकार की सेवा में जो उन्होंने की, उन सब कामों में जिन से उन्होंने उन्हें कठोरता से सताया, उनके जीवन को कड़वा किया।"(1) और अपार परिश्रम से उन्होंने उनके लिये गढ़वाले नगर बनाए, दीर्घ वर्षों के पूरे क्रम में इन मनुष्यों की सम्पत्ति बढ़ाते हुए, और हर प्रकार की दासता के द्वारा; जब कि ये [स्वामी] उनके प्रति केवल कृतघ्न न थे, पर उनके पूरे नाश को विचार में रखते थे। तब, [इस्राएली] किस रीति से अन्याय करते, यदि बहुत वस्तुओं में से उन्होंने थोड़ी लीं, वे जो बहुत सम्पत्ति रख सकते थे यदि उन्होंने उनकी सेवा न की होती, और धनी होकर निकल सकते थे, जब कि वास्तव में, अपनी भारी दासता का बहुत तुच्छ बदला ही पाकर, वे कंगाल चले गए? यह ऐसा ही है जैसे कोई स्वतन्त्र मनुष्य, दूसरे के द्वारा बलपूर्वक ले जाया जाए, और बहुत वर्ष उसकी सेवा करे, और उसकी सम्पत्ति बढ़ाए, और जब वह अन्त में कुछ सहारा पाए, तो समझा जाए कि उसके [स्वामी की] सम्पत्ति का कोई छोटा भाग उसके पास है, पर वास्तव में वह चला जाए, अपने ही बड़े परिश्रमों के फल के रूप में थोड़ा ही पाकर, और कमाई गई विशाल सम्पत्तियों में से, और यह किसी के द्वारा उसके विरुद्ध दोषारोपण का विषय बनाया जाए, मानो उसने ठीक नहीं किया।(2) वह (दोष लगानेवाला) उसके विरुद्ध अन्यायपूर्ण न्यायी दिखाई देगा जो बलपूर्वक दासता में ले जाया गया था।
तब, इस प्रकार के ये मनुष्य भी हैं, जो लोगों पर दोष लगाते हैं, क्योंकि उन्होंने बहुत वस्तुओं में से थोड़ी ले लीं, पर उन पर कोई दोष नहीं लाते जिन्होंने उन्हें उनके पितरों की सेवाओं का उचित बदला नहीं दिया; नहीं, पर उन्हें सबसे कष्टदायक दासता तक घटाकर भी, उन से सबसे ऊँचा लाभ पाया। और [ये आपत्तिकर्ता] आरोप लगाते हैं, कि [इस्राएलियों] ने बेईमानी से काम किया, क्योंकि, for-sooth, उन्होंने अपने परिश्रमों के बदले के लिये ले लिया, जैसा मैं ने देखा है, कुछ पात्रों में बिना ठप्पे का सोना और चाँदी; जब कि वे कहते हैं कि वे स्वयं (क्योंकि lot सत्य कहा जाए, यद्यपि कुछ को यह हास्यास्पद लगे) ईमानदारी से काम करते हैं, जब वे औरों के परिश्रमों से अपनी कमरबन्दों में गढ़ा हुआ सोना, और चाँदी, और पीतल ले जाते हैं, जिस पर कैसर का लेख और प्रतिमा है।
3. यदि, तथापि, हमारे और उनके बीच तुलना की जाए, [मैं पूछूँगा] कौन सा पक्ष [अपनी सांसारिक वस्तुओं को] अधिक न्यायपूर्ण रीति से पाया हुआ दिखेगा? क्या वह [यहूदी] लोग होंगे, [जिन्होंने लिया] मिस्रियों से, जो हर बात में उनके देनदार थे; या हम, [जो सम्पत्ति पाते हैं] रोमियों और अन्य जातियों से, जो हमारे प्रति ऐसी कोई बाध्यता नहीं रखते? हाँ, और भी, उनके साधन से संसार मेल में है, और हम राजमार्गों पर भय के बिना चलते हैं, और जहाँ चाहें वहाँ जहाज से जाते हैं.(3) इसलिए, इस प्रकार के मनुष्यों के विरुद्ध (अर्थात्, मिथ्याशिक्षकों के विरुद्ध) प्रभु का वचन लागू होता है, जो कहता है: "हे कपटी, पहले अपनी आँख का शहतीर निकाल, तब तू अपने भाई की आँख का तिनका निकालने के लिये स्पष्ट देखेगा."(4) क्योंकि यदि वह जो ये बातें तेरे ऊपर लगाता है, और अपनी बुद्धि पर घमण्ड करता है, अन्यजातियों की संगति से अलग किया गया है, और दूसरों की वस्तुओं से [निकली हुई] कुछ भी नहीं रखता, पर सचमुच नंगा है, और नंगे पाँव है, और पहाड़ों के बीच बेघर रहता है, जैसा घास खानेवाले उन पशुओं में से कोई करता है, वह क्षमा किया हुआ खड़ा होगा [ऐसी भाषा के प्रयोग में], हमारे जीवन की रीति की आवश्यकताओं से अनजान होने के कारण. पर यदि वह उस में भागी होता है जो मनुष्यों की राय में दूसरों की सम्पत्ति है, और यदि [उसी समय] वह उनके नमूने को नीचा दिखाता है,(5) तो वह सिद्ध करता है him-
वह स्वयं अत्यन्त अन्यायी, इस प्रकार के दोषारोपण को अपने ही ऊपर फेरता हुआ. क्योंकि वह अपनी न होनेवाली सम्पत्ति को लिए फिरता हुआ, और अपनी न होनेवाली वस्तुओं की लालसा करता हुआ पाया जाएगा. इसलिए प्रभु ने कहा: "दोष मत लगाओ, कि तुम दोषी न ठहराए जाओ: क्योंकि जिस न्याय से तुम न्याय करोगे, उसी से तुम्हारा न्याय किया जाएगा."(1) [अर्थ] निश्चय यह नहीं कि हम पापियों पर दोष न लगाएँ, और न यह कि हम दुष्टता से चलनेवालों को सम्मति दें; पर यह कि हम परमेश्वर की व्यवस्थाओं पर अन्यायपूर्ण न्याय न सुनाएँ, क्योंकि उसने स्वयं प्रबन्ध किया है कि सब बातें भलाई के लिये निकलें, न्याय के अनुसार एक रीति से. क्योंकि, यह जानकर कि हम उस सम्पत्ति का अच्छा उपयोग करेंगे जिसे हम दूसरे से पाकर रखेंगे, वह कहता है, "जिसके पास दो वस्त्र हैं, वह जिसके पास नहीं है उसे दे; और जिसके पास भोजन है, वह भी वैसा ही करे."(2) और, "क्योंकि मैं भूखा था, और तुमने मुझे भोजन दिया; मैं प्यासा था, और तुमने मुझे पीने को दिया; मैं नंगा था और तुमने मुझे कपड़े पहनाए."(3) और, "जब तू दान करे, तो तेरा बायाँ हाथ न जाने कि तेरा दायाँ हाथ क्या करता है."(4) और जो कुछ और हम भला करते हैं उससे हम धर्मी ठहरते हैं, अपनी सम्पत्ति को पराये हाथों से, मानो, छुड़ाते हुए.
पर मैं इस प्रकार कहता हूँ, "पराये हाथों से," मानो संसार परमेश्वर की सम्पत्ति न हो, ऐसा नहीं, पर इस प्रकार के वर हमारे पास हैं, और हम उन्हें दूसरों से पाते हैं, जिस रीति से इन मनुष्यों ने उन्हें उन मिस्रियों से पाया जो परमेश्वर को नहीं जानते थे; और इन्हीं के द्वारा हम अपने में परमेश्वर का तम्बू खड़ा करते हैं: क्योंकि जो सीधे चलते हैं उन में परमेश्वर वास करता है, जैसा प्रभु कहता है: "अधर्म के धन से अपने लिये मित्र बना लो, कि जब तुम भगाए जाओ, वे,"(5) तुम्हें अनन्त तम्बुओं में ग्रहण करें."(6) क्योंकि जब हम अन्यजाति थे तब अधर्म से हमने जो कुछ प्राप्त किया, विश्वासी हो जाने पर, उसे प्रभु के लाभ के लिये लगाकर हम धर्मी ठहरते हैं.
4. इसलिए स्वभावतः, ये बातें पहले एक नमूने में की गईं, और उन से परमेश्वर का तम्बू बनाया गया; उन व्यक्तियों ने उन्हें न्याय से पाया, जैसा मैं ने दिखाया है, और उन में हम पहले से दिखाए गए,--[हम] जो बाद में दूसरों की वस्तुओं से परमेश्वर की सेवा करेंगे. क्योंकि मिस्र से लोगों का सारा निकलना, जो ईश्वरीय अगुवाई के अधीन हुआ,(7) अन्यजातियों के बीच से होनेवाले कलीसिया के निकलने का नमूना और प्रतिमा था;(8) और इस कारण वह अन्त में इसे इस संसार से अपनी निज मीरास में ले चलता है, जिसे परमेश्वर के दास मूसा ने [नहीं दिया], पर जिसे परमेश्वर का पुत्र यीशु मीरास करके देगा. और यदि कोई अन्त [के समय] के विषय में भविष्यद्वक्ताओं की कही बातों पर, और उन बातों पर जिन्हें प्रभु के चेले यूहन्ना ने अपोकैलिप्स में देखा, एक dose ध्यान लगाए,(9) तो वह पाएगा कि जातियाँ सर्वत्र वही विपत्तियाँ पाएँगी, जैसी मिस्र ने तब विशेष रूप से पाईं.
अध्याय इकतीस.--प्राचीन काल के मनुष्यों पर, जिन कामों को पवित्रशास्त्र ने दोषी नहीं ठहराया, उन्हें अपराधों के रूप में जल्दी से न लगाएँ, पर उन में आनेवाली बातों के नमूने खोजें: लूत के किए हुए रक्तसंबंधी व्यभिचार में इसका एक उदाहरण.
I. प्राचीन काल के लोगों के विषय में इस प्रकार की कुछ बातें बताते हुए, [पहले कथित] प्रेस्बिटेर हमें सिखाने की आदत रखता था, और कहता था: "उन बुरे कामों के विषय में जिन के लिये पवित्रशास्त्र स्वयं कुलपतियों और भविष्यद्वक्ताओं को दोष देते हैं, हमें उन पर आक्रमण नहीं करना चाहिए, और न हाम के समान होना चाहिए, जिसने अपने पिता की लज्जा का उपहास किया, और इस प्रकार शाप के अधीन पड़ा; पर हमें उनकी ओर से [बरोबर] परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए, क्योंकि हमारे प्रभु के आगमन के द्वारा उनके पाप उन्हें क्षमा किए गए हैं; क्योंकि उसने कहा कि उन्होंने [हमारे लिये] धन्यवाद किया, और हमारे उद्धार पर घमण्ड किया.' फिर, उन कामों के विषय में जिन पर पवित्रशास्त्र कोई निन्दा नहीं करते, पर जो केवल [हुए हुए] लिख दिए गए हैं, हमें [उन्हें करनेवालों के] दोष लगानेवाले नहीं बनना चाहिए, क्योंकि हम परमेश्वर से अधिक सटीक नहीं हैं, और न अपने गुरु से श्रेष्ठ हो सकते हैं; पर हमें एक नमूना खोजना चाहिए [theme में. क्योंकि जिन बातों में से एक भी, जो दोषी ठहराए बिना पवित्रशास्त्र में लिखी गई है, बिना अर्थ की नहीं है." लूत के विषय में एक उदाहरण मिलता है, जिसने अपनी बेटियों को सदोम से बाहर निकाला, और ये तब अपने ही पिता से गर्भवती हुईं; और जिसने [देश की] सीमाओं के भीतर अपनी पत्नी को छोड़ दिया, [जो] आज तक नमक की खम्भा बनी रहती है. क्योंकि लूत ने, अपनी ही इच्छा के आवेग से काम न करते हुए, और न शारीरिक अभिलाषा के उकसावे पर, और न इस प्रकार की किसी बात का ज्ञान या विचार रखते हुए, [वास्तव में] [आनेवाली घटनाओं का] एक नमूना पूरा किया. जैसा पवित्रशास्त्र कहता है: "और उस रात eider भीतर गई
और अपने पिता के साथ लेट गई; और लूत न जानता था कि वह कब लेटी, और न कब उठी."(1) और छोटी के विषय में वही बात हुई: "और वह नहीं जानता था," कहा गया है, "कि वह कब उसके साथ सोई, और न कब उठी."(2) इसलिए, क्योंकि लूत [जो उसने किया] नहीं जानता था, और न [अपने कामों में] वासना का दास था, [परमेश्वर का ठहराया] प्रबन्ध पूरा हुआ, जिस से दो बेटियाँ (अर्थात्, दो कलीसियाएँ(3)), जिन्होंने एक ही पिता से जन्मे बच्चों को जन्म दिया, शरीर की वासना [के प्रभाव] से अलग दिखा दी गईं. क्योंकि, [जैसा उन्होंने समझा], कोई दूसरा व्यक्ति नहीं था जो उन्हें जीवित करनेवाला बीज, और बच्चों को जन्म देने का साधन दे सकता, जैसा लिखा है: "और बड़ी ने छोटी से कहा, और पृथ्वी पर कोई पुरुष नहीं है जो सारी पृथ्वी की रीति के अनुसार हमारे पास आए: आ, हम अपने पिता को दाखमधु से मतवाला करें, और उसके साथ लेटें, और अपने पिता से वंश उठाएँ."(4)
2. इस प्रकार, अपनी सरलता और निर्दोषता के बाद, [लूत की] इन बेटियों ने ऐसा कहा, यह समझकर कि सारी मनुष्यजाति नष्ट हो गई है, जैसा सदोमियों के साथ हुआ था, और परमेश्वर का क्रोध सारी पृथ्वी पर उतर आया है. इसलिए वे क्षम्य मानी जाएँ, क्योंकि उन्होंने समझा कि मनुष्यजाति की रक्षा के लिये केवल वे ही, अपने पिता के साथ, रह गई हैं; और इसी कारण उन्होंने अपने पिता को धोखा दिया. और, उनके द्वारा प्रयुक्त वचनों से यह तथ्य दिखाया गया--कि बड़ी और छोटी कलीसिया को बच्चों को जन्म देने की [शक्ति] देनेवाला हमारे पिता को छोड़ और कोई नहीं है. अब मनुष्यजाति का पिता परमेश्वर का वचन है, जैसा मूसा दिखाता है जब वह कहता है, "क्या वह तेरा पिता नहीं जिसने तुझे [जन्म से] प्राप्त किया, और तुझे रचा, और तुझे सृजा?" तब, किस समय उसने मनुष्यजाति पर जीवन देनेवाला बीज उण्डेला--अर्थात्, पापों की क्षमा का आत्मा, जिसके साधन से हम जिलाए जाते हैं? क्या तब नहीं, जब वह मनुष्यों के साथ खा रहा था, और पृथ्वी पर? दाखमधु पी रहा था? क्योंकि कहा गया है, "मनुष्य का पुत्र खाते और पीते आया;(6) और जब वह लेट गया, वह सो गया, और विश्राम लिया. जैसा वह स्वयं दाऊद में कहता है, "मैं सो गया, और विश्राम लिया."(7) और क्योंकि वह हमारे बीच रहता और जीता हुआ ऐसा करता था, वह फिर कहता है, "और मेरी नींद मेरे लिये मीठी हो गई."(8) अब यह सारी बात लूत के द्वारा दिखाई गई, कि सबके पिता का बीज-- अर्थात्, परमेश्वर के आत्मा का, जिस से सब कुछ बनाया गया--मांस के साथ मिलाया और एक किया गया--अर्थात्, उसकी अपनी कारीगरी के साथ; जिस मिश्रण और एकता से दो आराधनालय--अर्थात्, दो कलीसियाएँ--अपने ही पिता से जीवते परमेश्वर के लिये जीवते पुत्र उत्पन्न हुए.
3. और जब ये बातें हो रही थीं, उसकी पत्नी सदोम [के क्षेत्र] में रह गई, अब नाशवान मांस नहीं, पर नमक की एक खम्भा जो सदा बनी रहती है;(9) और मनुष्यजाति से सम्बन्ध रखनेवाली उन स्वाभाविक प्रक्रियाओं के द्वारा(10) यह दिखाते हुए कि कलीसिया भी, जो पृथ्वी का नमक है,(11) पृथ्वी की सीमाओं के भीतर पीछे छोड़ दी गई है, और मानवीय दुखों के अधीन है; और जब पूरे अंग प्रायः उस से अलग कर लिए जाते हैं, नमक की खम्भा फिर भी बनी रहती है,(12) इस प्रकार उस विश्वास की नींव का नमूना दिखाती है जो दृढ़ करती है, और बच्चों को उनके पिता की ओर आगे भेजती है.
अध्याय बत्तीस.--कि दोनों वाचाओं का कर्ता एक ही परमेश्वर था, यह उन प्रेरितों से सिखाए हुए एक प्रेस्बिटेर के अधिकार से दृढ़ होता है.
I.. इसी रीति से एक प्रेस्बिटेर ने भी,(13) जो प्रेरितों का चेला था, दोनों वाचाओं के विषय में तर्क किया, यह सिद्ध करते हुए कि दोनों सचमुच एक ही परमेश्वर से थीं. क्योंकि [उसने दृढ़ किया] कि हमें बनाने और रचनेवाले को छोड़ कोई दूसरा परमेश्वर नहीं, और उन मनुष्यों के प्रवचन का कोई आधार नहीं जो कहते हैं कि यह हमारा संसार या तो स्वर्गदूतों से, या किसी और सामर्थ्य से, या दूसरे परमेश्वर से बनाया गया. क्योंकि यदि कोई मनुष्य एक बार सब के सृजनहार से हटा दिया जाए, और यदि वह मान ले कि यह सृष्टि जिस की हम हैं किसी और से या किसी और के द्वारा [एक परमेश्वर को छोड़] रची गई, तो उसे अवश्य बहुत असंगति में, और इस प्रकार के अनेक विरोधों में पड़ना होगा; जिन के लिये वह दे सकेगा
न तो सम्भव और न सत्य मानी जा सकनेवाली कोई व्याख्या. और, इसी कारण, जो अन्य शिक्षाएँ लाते हैं वे परमेश्वर के विषय में अपनी ही राय हम से छिपाते हैं, क्योंकि वे अपनी शिक्षा की अस्थिर और असंगत प्रकृति जानते हैं, और डरते हैं कि यदि वे हार जाएँ तो भाग निकलने में उन्हें कुछ कठिनाई होगी. पर यदि कोई [केवल] एक परमेश्वर पर विश्वास करे, जिसने वचन के द्वारा सब कुछ बनाया, जैसा मूसा भी कहता है, "परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: और उजियाला हो गया;"(2) और जैसा हम सुसमाचार में पढ़ते हैं, "सब कुछ उसके द्वारा बना; और उसके बिना कुछ भी नहीं बना;"(3) और प्रेरित पौलुस [कहता है] इसी रीति, "एक ही प्रभु, एक ही विश्वास, एक ही बपतिस्मा, एक ही परमेश्वर और पिता, जो सब के ऊपर, और सब के मध्य से, और हम सब में है"(4)--यह मनुष्य पहले "उस सिर को थामे रहेगा, जिस से सारी देह जुड़ती और बँधती है, और हर एक जोड़ के द्वारा, हर एक अंग की सेवा की मात्रा के अनुसार, प्रेम में अपनी उन्नति के लिये देह की बढ़ती करती है."(5) और तब हर वचन भी उसे सुसंगत दिखेगा,(6) यदि वह अपनी ओर से कलीसिया के प्रेस्बिटेरों के साथ पवित्रशास्त्र को यत्न से पढ़े, जिन के बीच प्रेरितीय शिक्षा है, जैसा मैं ने दिखाया है.
2. क्योंकि सब प्रेरितों ने सिखाया कि दोनों लोगों के बीच सचमुच दो वाचाएँ थीं; पर दोनों को ठहरानेवाला एक ही परमेश्वर था, उन मनुष्यों के लाभ के लिये (जिन के(7) कारण वाचाएँ दी गईं) जो परमेश्वर पर विश्वास करनेवाले थे, यह मैं ने तीसरी पुस्तक में प्रेरितों की शिक्षा से ही सिद्ध किया है; और यह कि पहली वाचा बिना कारण, या बिना प्रयोजन, या आकस्मिक रीति से नहीं दी गई; पर उसने जिन्हें दी गई उन्हें परमेश्वर की सेवा के अधीन किया,(8) उनके लाभ के लिये (क्योंकि परमेश्वर को मनुष्यों की सेवा की आवश्यकता नहीं), और स्वर्गीय बातों का एक नमूना दिखाया, क्योंकि मनुष्य अभी तक सीधे दर्शन के द्वारा परमेश्वर की बातें देखने के योग्य नहीं था;(9) और कलीसिया में [अब वास्तव में] विद्यमान उन बातों की प्रतिमाओं की पूर्वछाया दी, ताकि हमारा विश्वास दृढ़ रहे;(10) और आनेवाली बातों की भविष्यद्वाणी रखी, ताकि मनुष्य सीखे कि परमेश्वर को सब बातों का पूर्वज्ञान है.
अध्याय तैंतीस.--जो कोई मानता है कि दोनों वाचाओं का कर्ता एक ही परमेश्वर है, और कलीसिया के प्रेस्बिटेरों के साथ यत्न से पवित्रशास्त्र पढ़ता है, वह सच्चा आत्मिक चेला है; और वह मसीह के विषय में और नई वाचा की स्वतन्त्रता के विषय में भविष्यद्वक्ताओं ने जो कुछ कहा है उसे ठीक समझेगा और व्याख्या करेगा.
I. इस प्रकार का आत्मिक चेला सचमुच परमेश्वर के आत्मा को पाता है, जो आदि से था, परमेश्वर की सब व्यवस्थाओं में मनुष्यजाति के साथ उपस्थित रहा, आनेवाली बातें बताईं, वर्तमान बातें प्रकट कीं, और बीती बातें वर्णन कीं--[ऐसा मनुष्य] सचमुच "सब मनुष्यों का न्याय करता है, पर स्वयं किसी मनुष्य से न्याय नहीं पाता."(11) क्योंकि वह अन्यजातियों का न्याय करता है, "जो सृष्टिकर्ता से अधिक सृष्टि की सेवा करते हैं,"(12) और निकम्मी बुद्धि से अपना सारा परिश्रम व्यर्थ पर खर्च करते हैं.
और वह यहूदियों का भी न्याय करता है, जो स्वतन्त्रता के वचन को ग्रहण नहीं करते, और न स्वतन्त्र होकर बाहर जाना चाहते हैं, यद्यपि एक छुड़ानेवाला [उनके साथ] उपस्थित है; पर वे, [ऐसे आचरण के] अनुचित समय में, व्यवस्था [की माँग से] आगे [रीतियों के साथ], उस परमेश्वर की सेवा करने का बहाना करते हैं जिसे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, और मसीह के उस आगमन को नहीं पहचानते जिसे उसने मनुष्यों के उद्धार के लिये पूरा किया, और न समझना चाहते हैं कि सब भविष्यद्वक्ताओं ने उसके दो आगमन बताए: एक, निश्चय, जिस में वह कोड़ों के अधीन मनुष्य बना, और निर्बलता सहना क्या है यह जानता था,(13) और गधी के बच्चे पर बैठा,(14) और राजमिस्त्रियों का त्यागा हुआ पत्थर था,(15) और वध के लिये भेड़ के समान ले जाया गया,(16) और अपने हाथ फैलाकर अमालेक को नाश किया;(17) और पृथ्वी के छोरों से तितर-बितर बच्चों को अपने पिता के भेड़शाला में इकट्ठा किया,(18) और अपने उन मरे हुओं को स्मरण किया जो पहले सो गए थे,(19) और उन्हें छुड़ाने के लिये उनके पास उतरा: पर दूसरा, जिस में वह बादलों पर आएगा,(20) उस दिन को लाते हुए जो भट्ठी के समान जलता है?(21) और अपने मुख के वचन से पृथ्वी को मारते हुए?(22) और अपने होठों की श्वास से अभक्तों को घात करते हुए, और अपने हाथों में सूप लिए, और अपना खलिहान शुद्ध करते हुए, और गेहूँ को तो अपने खत्ते में इकट्ठा करते हुए, पर भूसे को न बुझनेवाली आग से जलाते हुए.(23)
2. और भी, वह इसकी भी जाँच करेगा doc-
मार्किओन की trine की, [यह पूछते हुए] कि वह कैसे मानता है कि दो परमेश्वर हैं, जो एक दूसरे से अनन्त दूरी से अलग हैं.(1) वह कैसे भला हो सकता है जो अपने न होनेवाले मनुष्यों को उनके बनानेवाले से खींच ले जाता है, और उन्हें अपने राज्य में बुलाता है? और उसकी भलाई, जो सब को [इस प्रकार] नहीं बचाती, क्यों दोषपूर्ण है? और भी, वह मनुष्यों के विषय में भला क्यों दिखता है, पर मनुष्यों के बनानेवाले के विषय में अत्यन्त अन्यायी, क्योंकि वह उसकी सम्पत्ति उससे छीन लेता है? और, यदि प्रभु दूसरे पिता का होता, तो किसी न्याय से, उस सृष्टि से जिससे हम हैं रोटी लेकर, उसे अपनी देह मानता, और मिले हुए कटोरे को अपना लहू ठहराता?(2) और यदि वह उस जन्म से नहीं गुजरा जो मनुष्य का है, तो उसने अपने को मनुष्य का पुत्र क्यों माना? और वह उन पापों को हमें कैसे क्षमा कर सकता था जिन के लिये हम अपने बनानेवाले और परमेश्वर के प्रति उत्तरदायी हैं? और फिर, यह मानकर कि वह मांस नहीं था, पर केवल दिखावे में मनुष्य था, वह कैसे क्रूस पर चढ़ाया जा सकता था, और उसकी बेधी हुई पसली से लहू और पानी कैसे निकल सकते थे?(3) और, वह कौन सा शरीर था जिसे गाड़नेवालों ने कब्र को सौंपा? और वह क्या था जो मरे हुओं में से जी उठा?
3. [यह आत्मिक मनुष्य] वैलेंटाइनस के सब अनुयायियों का भी न्याय करेगा, क्योंकि वे जीभ से सचमुच एक परमेश्वर पिता को मानते हैं, और यह कि सब वस्तुएँ उसी से अस्तित्व पाती हैं, पर उसी समय यह भी मानते हैं कि सब को रचनेवाला एक धर्मत्याग या दोष का फल है. [वह उनका भी न्याय करेगा, क्योंकि] वे इसी रीति जीभ से एक प्रभु यीशु मसीह को, परमेश्वर के पुत्र को मानते हैं, पर अपनी शिक्षा [की पद्धति] में एकलौते को उसकी अपनी उत्पत्ति, वचन को भी उसकी अपनी, मसीह को दूसरी, और उद्धारकर्ता को और दूसरी ठहराते हैं; ताकि, उनके अनुसार, ये सब प्राणी सचमुच [पवित्रशास्त्र में] मानो एक कहे जाते हैं; [जबकि वे मानते हैं], तथापि, कि उन में से हर एक को [शेष से] अलग [विद्यमान] समझा जाए, और अपनी विशेष संयोगता के अनुसार उसका अपना विशेष मूल [रहा हो]. तब(4) [प्रकट होता है] कि केवल उनकी जीभों ने ही, सचमुच, [परमेश्वर की] एकता मान ली है, जबकि उनकी [वास्तविक] राय और उनकी समझ (गहराइयों की खोज की उनकी आदत से) एकता [की इस शिक्षा] से गिर गई है, और अनेक देवताओं की धारणा उठा ली है,--[यह, मैं कहता हूँ, प्रकट होगा] जब वे अपनी गढ़ी हुई [शिक्षा के] मुद्दों पर मसीह से जाँचे जाएँगे. उसे भी वे बाद के समय में एयोनों के प्लेरोमा से जन्मा ठहराते हैं, और यह कि उसकी उत्पत्ति एक अधःपतन या धर्मत्याग [के होने] के बाद हुई; और वे मानते हैं कि सोफिया को हुए दुख के कारण वे स्वयं जन्म को लाए गए. पर उनका अपना विशेष भविष्यद्वक्ता होमर, जिस की सुनकर उन्होंने ऐसी शिक्षाएँ गढ़ी हैं, स्वयं उन्हें डांटेगा, जब वह अपने को इस प्रकार कहता है:--
"मुझे वह मनुष्य हेडीस के फाटकों के समान घृणित है,
जो एक बात सोचता है, और दूसरी कहता है."(5)
[यह आत्मिक मनुष्य] टेढ़े ज्ञानवादियों के व्यर्थ वचनों का भी न्याय करेगा, यह दिखाकर कि वे शमौन मागुस के चेले हैं.
4. वह एबियोनियों का भी न्याय करेगा; [क्योंकि] यदि पृथ्वी पर? उनका उद्धार करनेवाला परमेश्वर न था, तो वे कैसे बचाए जा सकते हैं? या यदि परमेश्वर [पहले] मनुष्य में नहीं आया, तो मनुष्य परमेश्वर में कैसे आएगा? और (मनुष्य) मृत्यु के अधीन जन्म से कैसे बचेगा, यदि एक नए जन्म के द्वारा(6) नहीं, जो परमेश्वर ने अद्भुत और अनपेक्षित रीति से दिया (पर उद्धार के चिह्न के रूप में)--[मेरा अर्थ है] वह नया जन्म जो कुँवारी से विश्वास के द्वारा बहता है?(7) यदि वे इस [प्रकार के] जन्म में रहें, जो इस संसार में मनुष्य के स्वभाव में है, तो वे परमेश्वर से लेपालकपन कैसे पाएँगे? और (मसीह) सुलैमान से बड़ा कैसे हो सकता था,(8) या योना से बड़ा, या दाऊद का प्रभु कैसे हो सकता था,(9) जो उन्हीं के सार का था? और वह कैसे उसे वश में कर सकता था(10) जो मनुष्यों से बलवान था,(11) जिसने न केवल मनुष्य को जीता, पर उसे अपनी शक्ति के अधीन भी रखा, और जीतनेवाले को जीता, जबकि उसने जीती हुई मनुष्यजाति को छुड़ाया, यदि वह उस मनुष्य से बड़ा न होता जो इस प्रकार हारा गया था? पर और कौन उस मनुष्य से श्रेष्ठ और अधिक प्रसिद्ध है जो परमेश्वर की समानता पर रचा गया, परमेश्वर के पुत्र को छोड़, जिस की प्रतिमा पर मनुष्य सृजा गया? और इसी कारण उसने इन अन्तिम दिनों में(12) समानता दिखाई; [क्योंकि] परमेश्वर का पुत्र मनुष्य बनाया गया, [अपने हाथों की] प्राचीन उत्पत्ति को अपने स्वभाव में लेते हुए,(13) जैसा मैं ने ठीक पहलेवाली पुस्तक में दिखाया है.
5. वह उनका भी न्याय करेगा जो मसीह को केवल [मानव] राय में [मनुष्य बना] बताते हैं. क्योंकि जब उनका गुरु केवल एक कल्पित प्राणी था, तो वे कैसे कल्पना कर सकते हैं कि वे स्वयं वास्तविक बातचीत चला रहे हैं? या यदि वह केवल कल्पित प्राणी था, सत्य नहीं, तो वे उस से कोई स्थिर वस्तु कैसे पा सकते हैं? और यदि वह जिस पर वे विश्वास करने का दावा करते हैं अपने को केवल कल्पित प्राणी के रूप में प्रकट किया, तो ये मनुष्य सचमुच उद्धार के भागी कैसे हो सकते हैं? इसलिए, इन मनुष्यों से जुड़ी हर बात अवास्तविक है, और सत्य [के स्वभाववाली] कोई वस्तु नहीं; और, इन परिस्थितियों में, यह प्रश्न किया जा सकता है कि (क्योंकि, सम्भव है, वे स्वयं भी इसी रीति मनुष्य नहीं, केवल गूँगे पशु हैं) वे, अधिकतर बातों में, केवल मनुष्यता की छाया दिखाते हैं या नहीं.(1)
6. वह झूठे भविष्यद्वक्ताओं का भी न्याय करेगा, जो परमेश्वर से भविष्यद्वाणी का वर पाए बिना, और परमेश्वर का भय रखे बिना, पर या तो व्यर्थ महिमा के लिये, या किसी व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि से, या दुष्ट आत्मा के प्रभाव में किसी और रीति से काम करते हुए, भविष्यद्वाणियाँ बोलने का बहाना करते हैं, जबकि उस सारे समय वे परमेश्वर के विरुद्ध झूठ बोलते हैं.
7. वह उनका भी न्याय करेगा जो फूट उत्पन्न करते हैं, जो परमेश्वर के प्रेम से रहित हैं, और जो कलीसिया की एकता से अधिक अपने विशेष लाभ को देखते हैं; और जो तुच्छ कारणों से, या उनके मन में आनेवाले किसी भी प्रकार के कारण से, मसीह की बड़ी और महिमामय देह को टुकड़े करके बाँटते हैं, और जहाँ तक उन में है, [निश्चय] उसे नाश करते हैं,--वे मनुष्य जो मेल की बातें करते हैं जबकि फूट से युद्ध उठाते हैं, और सचमुच मच्छर को छानते हैं, पर ऊँट को निगल जाते हैं.(2) क्योंकि उनके द्वारा इतना बड़े महत्व का कोई सुधार नहीं किया जा सकता, जो उनकी फूट से उठनेवाली हानि की भरपाई करे. वह उन सब का भी न्याय करेगा जो सत्य की सीमा से परे हैं, अर्थात्, जो कलीसिया के बाहर हैं; पर वह स्वयं किसी से न्याय नहीं पाएगा. क्योंकि उसके लिये सब बातें सुसंगत हैं: उसे सर्वशक्तिमान एक परमेश्वर पर पूरा विश्वास है, जिस से सब कुछ है; और परमेश्वर के पुत्र पर, हमारे प्रभु यीशु मसीह पर, जिस के द्वारा सब कुछ है, और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं पर, जिन के साधन से परमेश्वर का पुत्र मनुष्य बना; और परमेश्वर के आत्मा पर दृढ़ विश्वास, जो हमें सत्य का ज्ञान देता है, और पिता और पुत्र की व्यवस्थाओं को सामने रखा है, जिन के बल से वह पिता की इच्छा के अनुसार मनुष्यों की हर पीढ़ी के साथ वास करता है,(3)
8. सच्चा ज्ञान(4) [वह है जो] प्रेरितों की शिक्षा में, और सारे संसार में कलीसिया की प्राचीन रचना में,(5) और बिशपों के उत्तराधिकारों के अनुसार मसीह की देह(6) के विशेष प्रकटीकरण में है, जिन के द्वारा उन्होंने उस कलीसिया को सौंपा है जो हर स्थान में है, और हमारे तक भी पहुँची है, पवित्रशास्त्र की कोई कल्पना किए बिना सुरक्षित और रखी हुई,(7) शिक्षा की एक बहुत पूरी पद्धति के द्वारा,(8) और न कुछ जोड़ पाती है और न [जिन सत्यों पर वह विश्वास करती है उन में] कटौती [सहती है]; और [वह] बिना मिलावट [परमेश्वर के वचन को] पढ़ने में, और पवित्रशास्त्र के साथ मेल खाती हुई वैध और यत्नशील व्याख्या में है, बिना खतरे और बिना निन्दा के; और [सब से ऊपर, वह] प्रेम के श्रेष्ठ वर में है,(9) जो ज्ञान से अधिक अनमोल है, भविष्यद्वाणी से अधिक महिमामय है, और [परमेश्वर के] अन्य सब वरों से बढ़कर है.
9. इसलिए कलीसिया हर स्थान में, परमेश्वर के प्रति उस प्रेम के कारण जिसे वह रखती है, सारे समय पिता की ओर शहीदों की एक भीड़ आगे भेजती है; जबकि और सब(10) न केवल अपने बीच इस प्रकार की कोई बात दिखाने को नहीं रखते, पर यह भी मानते हैं कि ऐसा गवाही देना बिलकुल आवश्यक नहीं, क्योंकि उनकी शिक्षाओं की पद्धति [मसीह के लिये] सच्ची गवाही है, शायद इसके सिवा कि उन में से एक या दो, प्रभु के पृथ्वी पर प्रकट होने से बीते सारे समय में, कभी कभी, हमारे शहीदों के साथ, नाम की निन्दा सह गए हैं (मानो वह भी [मिथ्याशिक्षक] दया पा गया हो), और उनके साथ [मृत्यु को] ले जाए गए हैं, मानो उन्हें दिया गया एक प्रकार का साथ. क्योंकि केवल कलीसिया ही पवित्रता से उनकी निन्दा सहती है जो धर्म के कारण सताव सहते हैं, और हर प्रकार की दण्ड सहते हैं, और परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम के कारण, और उसके पुत्र को मानने के कारण मार डाले जाते हैं; प्रायः सचमुच निर्बल होकर, फिर भी तुरन्त अपने सदस्यों को बढ़ाती हुई, और फिर पूरी हो जाती है, उसी रीति से जैसे उसका नमूना," लूत की पत्नी, जो नमक की खम्भा बन गई. इस प्रकार भी, [वह एक अनुभव से गुजरती है] प्राचीन भविष्यद्वक्ताओं के अनुभव के समान, जैसा प्रभु घोषित करता है, "क्योंकि उन्होंने ऐसा सताया
तुम से पहले के भविष्यद्वक्ताओं को;", क्योंकि वह सचमुच, एक नई रीति से, उन से सताव सहती है जो परमेश्वर का वचन ग्रहण नहीं करते, जबकि वही आत्मा उस पर ठहरता है(2) [जैसे इन प्राचीन भविष्यद्वक्ताओं पर].
10. और सचमुच भविष्यद्वक्ताओं ने, और बातों के साथ जिन की उन्होंने भविष्यद्वाणी की, यह भी पहले कहा, कि जिन सब पर परमेश्वर का आत्मा ठहरेगा, और जो पिता के वचन को मानेंगे, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसकी सेवा करेंगे, वे सताव सहेंगे, और पत्थरवाह किए जाएँगे और मार डाले जाएँगे. क्योंकि भविष्यद्वक्ताओं ने अपने में ये सब बातें पहले रूप दीं, परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम के कारण, और उसके वचन के कारण. क्योंकि वे स्वयं मसीह के अंग थे, प्रत्येक; एक ने उन में से अपने स्थान में अंग होकर, इसके अनुसार, [उसे सौंपी गई] भविष्यद्वाणी को सामने रखा; वे सब, यद्यपि बहुत, केवल एक की पूर्वछाया देते हुए, और एक से सम्बन्ध रखनेवाली बातें प्रचार करते हुए. क्योंकि जैसा हमारे अंगों के द्वारा सारी देह का काम दिखाया जाता है, जबकि एक पूरे मनुष्य का आकार एक अंग से नहीं, पर सब को साथ लेकर उनके द्वारा दिखाया जाता है, वैसे ही सब भविष्यद्वक्ताओं ने एक [मसीह] की पूर्वछाया दी; और उन में से हर एक ने, अंग के रूप में अपने विशेष स्थान में, इसके अनुसार, ठहराई हुई व्यवस्था को पूरा किया, और उस अंग से जुड़ी मसीह की उस विशेष क्रिया की पहले से छाया दी.
11.
उन में से कुछ, उसे महिमा में देखते हुए, पिता के दाहिने हाथ(3) उसका महिमामय जीवन (conversationem) देखा; औरों ने उसे मनुष्य के पुत्र के रूप में बादलों पर आते देखा;(4) और जिन्होंने उसके विषय में कहा, "वे उसे देखेंगे जिसे उन्होंने बेधा है,"(5) उन्होंने उसके [दूसरे] आगमन को दिखाया, जिसके विषय में वह स्वयं कहता है, "क्या तू समझता है कि जब मनुष्य का पुत्र आएगा, तो वह पृथ्वी पर विश्वास पाएगा?''(6) पौलुस भी इस घटना को सूचित करता है जब वह कहता है, "यदि, तथापि, परमेश्वर के यहाँ यह धर्म की बात है कि तुम्हें क्लेश देनेवालों को क्लेश का बदला दे, और क्लेश पाते तुम्हें हमारे साथ विश्राम, प्रभु यीशु के स्वर्ग से प्रकटीकरण में, उसके सामर्थी स्वर्गदूतों के साथ, और आग की ज्वाला में."(7) और फिर, जो उसे न्यायी कहकर बोलते थे, और [संकेत करते थे], मानो जलती भट्ठी हो, प्रभु के दिन को, जो "गेहूँ को अपने खत्ते में इकट्ठा करता है, पर भूसे को न बुझनेवाली आग से जलाएगा,''(8) वे अविश्वासियों को धमकाने के अभ्यस्त थे, जिन के विषय में प्रभु स्वयं भी घोषित करता है, "शापितों, मेरे पास से चले जाओ, अनन्त आग में, जिसे मेरे पिता ने शैतान और उसके स्वर्गदूतों के लिये तैयार किया है."(9) और प्रेरित इसी रीति [उन के विषय में] कहता है, "जो प्रभु के मुख से, और उसकी सामर्थ्य की महिमा से अनन्त मृत्यु की दण्ड पाएँगे, जब वह अपने पवित्र लोगों में महिमा पाने को, और उन में जो उस पर विश्वास करते हैं प्रशंसा पाने को आएगा."(10) उन में से कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं, "तू मनुष्यों के पुत्रों से सुन्दर है;"(11) और, "परमेश्वर, तेरे परमेश्वर, ने तेरे साथियों से अधिक आनन्द के तेल से तुझे अभिषेक किया है;"(12) और, "हे अति सामर्थी, अपनी तलवार अपनी जाँघ पर बाँध, अपनी सुन्दरता और अपने रूप के साथ, और आगे बढ़ और सफलता से चल; और सत्य के कारण, और नम्रता के कारण, और धर्म के कारण तू राज्य कर."(13) और उसके विषय में इसी प्रकार की और जो बातें कही गई हैं, उन्होंने उसके राज्य में रहनेवाली सुन्दरता और चमक को दिखाया, उसके अधीन सब पर [की] उस अतीत और श्रेष्ठ ऊँचाई के साथ, ताकि सुननेवाले वहाँ पाए जाने की इच्छा करें, ऐसी बातें करते हुए जो परमेश्वर को भाती हैं.
फिर, ऐसे लोग हैं जो कहते हैं, "वह मनुष्य है, और उसे कौन जानेगा?"(14) और, "मैं भविष्यद्वक्तिन के पास आया, और उसने पुत्र को जन्म दिया, और उसका नाम अद्भुत, युक्ति करनेवाला, सामर्थी परमेश्वर रखा गया;"(15) और उन में से जिन्होंने उसे इम्मानुएल प्रचार किया, कुँवारी [से जन्मा], उन्होंने परमेश्वर के वचन का अपनी कारीगरी के साथ मिलन दिखाया, [यह कहते हुए] कि वचन देह बनेगा, और परमेश्वर का पुत्र मनुष्य का पुत्र (निर्मल जन उस निर्मल गर्भ को निर्मल रीति से खोलता है, जो मनुष्यों को परमेश्वर की ओर नया जन्म देता है, और जिसे उसने स्वयं निर्मल किया); और यह होकर जो हम भी हैं, वह [तथापि] सामर्थी परमेश्वर है, और एक ऐसा जन्म रखता है जो बताया नहीं जा सकता. और उन में से कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं, "प्रभु ने सिय्योन में बातें की हैं, और यरूशलेम से अपनी वाणी सुनाई है;"(16) और, "यहूदा में परमेश्वर जाना जाता है;"(17)--इन्होंने यहूदिया में हुए उसके आगमन को दिखाया. फिर, जिन्होंने कहा कि "परमेश्वर दक्षिण से आता है, और घने पत्तोंवाले पहाड़ से,"(18) उन्होंने बेतलेहेम में उसके आगमन को बताया, जैसा मैं ने पिछली पुस्तक में दिखाया है.(19) उस स्थान से भी, जो राज्य करता है, और जो अपने पिता की प्रजा को चराता है, वह आया है. फिर, जिन्होंने कहा कि उसके आने पर "लँगड़ा हरिण के समान कूदेगा, और गूँगे की जीभ
[बोलेगी] स्पष्ट रूप से, और अन्धे की आँखें खुल जाएँगी, और बहरे के कान सुनेंगे,"(1) और यह कि "झुके हुए हाथ, और निर्बल घुटने, दृढ़ किए जाएँगे,"(2) और यह कि "कब्र में के मरे हुए जी उठेंगे,"(3) और यह कि वह स्वयं" हमारी निर्बलताओं को [अपने ऊपर] लेगा, और हमारे शोकों को सहेगा,"(4)--[इन सब ने] उन चंगाई के कामों को प्रचार किया जो उसके द्वारा पूरे हुए.
12. और उन में से कुछ--[जब उन्होंने पहले कहा कि] एक निर्बल और बिना महिमा का मनुष्य होकर, और निर्बलता सहना क्या है यह जाननेवाले होकर,(5) और गधी के बच्चे पर बैठकर,(6) वह यरूशलेम आएगा; और अपनी पीठ कोड़ों को देगा,(7) और अपने गालों को [उसे मारनेवाली] हथेलियों को देगा; और वध के लिये भेड़ के समान ले जाया जाएगा;(8) और उसे पीने को सिरका और पित्त दिया जाएगा;(9) और वह अपने मित्रों और अपने निकटतम लोगों से त्यागा जाएगा;(10) और वह दिन भर अपने हाथ फैलाएगा;(11) और उसे देखनेवालों से ठट्ठा और निन्दा सहेगा;(12) और उसके वस्त्र बाँटे जाएँगे, और उसके कपड़े पर चिट्ठियाँ डाली जाएँगी;(13) और वह मृत्यु की धूल में उतारा जाएगा? ऐसी ही [अन्य] सब बातों के साथ--उन्होंने मनुष्य के स्वरूप में उसके आने की भविष्यद्वाणी की जब वह यरूशलेम में प्रवेश करता था, जिस में अपने दुख और क्रूस के द्वारा उसने कही गई सब बातें सहीं. फिर औरों ने, जब उन्होंने कहा, "पवित्र प्रभु ने अपने उन मरे हुओं को स्मरण किया जो धूल में सोए थे, और उन्हें जगाने के लिये उनके पास उतरा, कि उन्हें बचाए,"(15) हमें वह कारण दिया जिस के कारण उसने ये सब बातें सहीं. और, जिन्होंने कहा, "उस दिन, प्रभु कहता है, सूर्य दोपहर को अस्त होगा, और उजले दिन में पृथ्वी पर अन्धकार होगा; और मैं तुम्हारे पर्व के दिनों को विलाप में बदलूँगा, और तुम्हारे सब गीतों को रोना में,"(16) उन्होंने स्पष्ट रूप से सूर्य के उस अन्धकार को बताया जो उसके क्रूस के समय छठी घड़ी से हुआ, और यह कि इस घटना के बाद, वे दिन जो व्यवस्था के अनुसार उनके पर्व थे, और उनके गीत, जब वे अन्यजातियों को सौंपे गए तब शोक और विलाप में बदल जाएँगे.
यिर्मयाह भी इस बात को और स्पष्ट करता है, जब वह यरूशलेम के विषय में इस प्रकार कहता है: "जिसने [सात] को जन्म दिया है वह मुरझाती है; उसका प्राण थक गया है; उसका सूर्य अभी दोपहर होते ही अस्त हो गया है; वह लज्जित हुई है, और निन्दा सही है: उन में से बचे हुओं को मैं उनके शत्रुओं की दृष्टि में तलवार को दूँगा."(17)
13. और उन में से जिन्होंने कहा कि वह ऊँघकर सो गया, और प्रभु ने उसे सम्भाला इसलिये वह फिर जी उठा,(18) और जिन्होंने स्वर्ग की प्रधानताओं को आज्ञा दी कि अनन्त द्वार खोल दें, ताकि महिमा का राजा भीतर आए,(19) उन्होंने पिता की सामर्थ्य के द्वारा मरे हुओं में से उसके जी उठने को, और स्वर्ग में उसके ग्रहण को पहले प्रचार किया. और जब उन्होंने अपने को इस प्रकार कहा, "उसका निकलना स्वर्ग की ऊँचाई से है, और उसका लौटना सर्वोच्च स्वर्ग तक भी; और कोई नहीं जो उसकी गर्मी से अपने को छिपा सके,"(20) उन्होंने यही सत्य बताया कि वह फिर उस स्थान को उठा लिया गया जहाँ से वह उतरा, और यह कि कोई नहीं जो उसके धर्ममय न्याय से बच सके.
जिन्होंने कहा, "प्रभु ने राज्य किया है; लोग क्रोधित हों: [वही] जो करूबों पर बैठा है; पृथ्वी डोल उठे,"(21) वे इस प्रकार कुछ तो उस क्रोध की भविष्यद्वाणी कर रहे थे जो उसके स्वर्गारोहण के बाद सब जातियों से उन पर आया जो उस पर विश्वास करते थे, कलीसिया के विरुद्ध सारी पृथ्वी की हलचल के साथ; और कुछ इस तथ्य की, कि जब वह अपने सामर्थी स्वर्गदूतों के साथ स्वर्ग से आएगा, सारी पृथ्वी हिल जाएगी, जैसा वह स्वयं घोषित करता है, "एक बड़ा भूकम्प होगा, जैसा आदि से नहीं हुआ."(22) और फिर, जब एक कहता है, "जो न्याय पाए, वह सामने खड़ा हो; और जो धर्मी ठहरे, वह परमेश्वर के दास(23) के पास आए;"(24) और, "तुम पर हाय, क्योंकि तुम वस्त्र के समान पुराने हो जाओगे, और कीड़ा तुम्हें खा जाएगा;" और, "सब प्राणी दीन किया जाएगा, और केवल प्रभु सर्वोच्च में ऊँचा किया जाएगा,"(25)--इस प्रकार दिखाया जाता है कि, उसके दुख और स्वर्गारोहण के बाद, परमेश्वर अपने विरोधियों सब को अपने पाँवों के नीचे गिराएगा, और वह सब से ऊपर ऊँचा किया जाएगा, और कोई नहीं जो उसके साथ धर्मी ठहराया जा सके या उसकी तुलना की जा सके.
14. और उन में से जिन्होंने कहा कि परमेश्वर मनुष्यों के साथ एक नई वाचा(26) बाँधेगा, वैसी नहीं जैसी उसने होरेब पर्वत पर पितरों के साथ बाँधी, और मनुष्यों को नया हृदय और नई आत्मा देगा;" और फिर, "और पुरानी बातें स्मरण न करो: देखो, मैं
अब उठनेवाली नई बातें बनाऊँगा, और तुम उसे जानोगे; और जंगल में मार्ग, और सूखी भूमि में नदी बनाऊँगा, मेरी चुनी हुई प्रजा को, मेरी उस प्रजा को जिसे मैं ने प्राप्त किया है, पीने को देने के लिये, कि वे मेरी स्तुति दिखाएँ,"(1)- -स्पष्ट रूप से उस स्वतन्त्रता को बताया जो नई वाचा को अलग करती है, और उस नए दाखमधु को जो नई मशकों में डाला जाता है,(2) [अर्थात्], मसीह में के विश्वास को, जिस से उसने जंगल में उगी धर्म की मार्ग को प्रचार किया, और सूखी भूमि में पवित्र आत्मा की धाराओं को, परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा को जल देने के लिये, जिन्हें उसने प्राप्त किया, कि वे उसकी स्तुति दिखाएँ, पर यह नहीं कि वे उसे निन्दा करें जिसने ये बातें बनाईं, अर्थात्, परमेश्वर को.
15. और वे अन्य सब बातें जिन्हें मैं ने भविष्यद्वक्ताओं से इतनी लम्बी पवित्रशास्त्र की श्रृंखला के द्वारा कही हुई दिखाया है, जो सचमुच आत्मिक है वह उनकी व्याख्या करेगा, कही हुई हर एक बात के विषय में यह दिखाते हुए कि प्रभु की व्यवस्था के किस विशेष मुद्दे को वह संकेत करती है, और [इस प्रकार] परमेश्वर के पुत्र के काम की सारी पद्धति को [दिखाते हुए], सदा उसी परमेश्वर को जानते हुए, और सदा उसी परमेश्वर के वचन को मानते हुए, यद्यपि वह [केवल] अब हमें प्रकट हुआ है; और हर समय उसी परमेश्वर के आत्मा को भी मानते हुए, यद्यपि इन अन्तिम समयों में वह नई रीति से हम पर उण्डेला गया है, [यह जानते हुए कि वह उतरता है] जगत की सृष्टि से उसके अन्त तक भी मनुष्यजाति पर केवल ऐसी ही, जिन से जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और उसके वचन को मानते हैं उस से बहनेवाले उस उद्धार को पाते हैं. दूसरी ओर, जो उस से हटते हैं, और उसकी आज्ञाओं को तुच्छ जानते हैं, और अपने कामों से अपने बनानेवाले का अपमान करते हैं, और अपनी रायों से अपने पालन करनेवाले की निन्दा करते हैं, वे अपने पर अत्यन्त धर्ममय न्याय का ढेर लगाते हैं.(3) इसलिए वह (अर्थात्, आत्मिक मनुष्य) उन सब को छाँटता और परखता है, पर वह स्वयं किसी मनुष्य से परखा नहीं जाता:(4) वह न अपने पिता की निन्दा करता है, न उसकी व्यवस्थाओं को हटाता है, न पितरों पर आक्रमण करता है, न भविष्यद्वक्ताओं का अपमान करता है, यह मानकर कि वे [उस परमेश्वर से] दूसरे परमेश्वर से [भेजे गए] थे [जिस की वह आराधना करता है], या फिर, कि उनकी भविष्यद्वाणियाँ भिन्न स्रोतों से आई थीं.(5)
अध्याय चौंतीस.--मार्किओनीयों के विरुद्ध प्रमाण, कि भविष्यद्वक्ताओं ने अपनी सब भविष्यद्वाणियों में हमारे मसीह को संकेत किया.
1. अब मैं सरलता से कहूँगा, सब मिथ्याशिक्षकों के विरोध में, और मुख्यतः मार्किओन के अनुयायियों के विरोध में, और उनके समान लोगों के विरोध में, जो मानते हैं कि time भविष्यद्वक्ता दूसरे परमेश्वर से थे [उस से जो सुसमाचार में प्रचार किया गया है], उस सुसमाचार को उत्साह से यत्नपूर्वक पढ़ो जो प्रेरितों के द्वारा हमें पहुँचाया गया है, और भविष्यद्वक्ताओं को उत्साह से यत्नपूर्वक पढ़ो, और तुम पाओगे कि हमारे प्रभु का सारा आचरण, और सारी शिक्षा, और सारे दुख उनके द्वारा पहले कहे गए थे. पर यदि इस प्रकार का विचार तब तुम्हारे मन में आए, यह कहने को, तो प्रभु ने अपने आगमन से हमें क्या लाया?--जान लो कि उसने सब [सम्भव] नयापन लाया, अपने को लाकर जो प्रचार किया गया था. क्योंकि यही बात पहले प्रचार की गई थी, कि मनुष्यजाति को नया करने और जिलाने के लिये एक नयापन आए. क्योंकि राजा का आगमन उन दासों से पहले बताया जाता है जो [उस से पहले] भेजे जाते हैं, उन मनुष्यों की तैयारी और साज के लिये जो अपने प्रभु का आदर-सत्कार करेंगे. पर जब राजा वास्तव में आ चुका है, और जो उसके प्रजाजन हैं वे उस आनन्द से भर गए हैं जो पहले प्रचार किया गया था, और उस स्वतन्त्रता तक पहुँच गए हैं जो वह देता है, और उसके दर्शन में भागी हुए हैं, और उसके वचन सुन लिए हैं, और उसके दिए वरों को भोग लिया है, तब बुद्धि रखनेवालों में से कोई नहीं पूछेगा कि राजा ने उसके आने का समाचार देनेवालों [के प्रचार] से आगे कौन सी नई बात लाई है. क्योंकि उसने अपने को लाया है, और मनुष्यों को वे अच्छी बातें दी हैं जो पहले बताई गई थीं, जिन बातों को स्वर्गदूत झाँककर देखना चाहते थे.(6)
2. पर दास तब झूठे ठहरते, और प्रभु से नहीं भेजे हुए, यदि मसीह अपने आगमन पर, पहले बताए हुए के ठीक अनुसार पाया जाकर, उनके वचनों को पूरा न करता. इसलिए उसने कहा, "यह न समझो कि मैं व्यवस्था या भविष्यद्वक्ताओं को मिटाने आया हूँ; मैं मिटाने नहीं, पर पूरा करने आया हूँ. क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूँ, जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, एक मात्रा या एक बिन्दु व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं से नहीं टलेगा, जब तक सब पूरा न हो."(7) क्योंकि अपने आगमन से उसने स्वयं सब कुछ पूरा किया, और कलीसिया में व्यवस्था की कही हुई नई वाचा को अभी पूरा करता है, [सब बातों की] समाप्ति तक. इसी फल के लिये पौलुस भी, उसका प्रेरित, रोमियों की पत्री में कहता है, "पर अब,(8) व्यवस्था के बिना, परमेश्वर की धार्मिकता प्रगट हुई है, जिस की गवाही व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता देते हैं; क्योंकि धर्मी विश्वास से जीवित रहेगा."(9) पर यह तथ्य, कि धर्मी विश्वास से जीवित रहेगा, भविष्यद्वक्ताओं से पहले बताया गया था.(10)
3. पर भविष्यद्वक्ता राजा के आगमन की भविष्यद्वाणी करने की सामर्थ्य कहाँ से पा सकते थे, और उस स्वतन्त्रता को पहले प्रचार करने की जो थी be-
stowed उसके द्वारा, और मसीह के किए हुए सब को पहले बताने की, उसके वचन, उसके काम, और उसके दुख, और नई वाचा की भविष्यद्वाणी करने की, यदि उन्होंने दूसरे परमेश्वर से भविष्यद्वाणी की प्रेरणा पाई होती [उस से जो सुसमाचार में प्रगट है], जबकि वे, जैसा तुम कहते हो, अवर्णनीय पिता से, उसके राज्य से, और उसकी व्यवस्थाओं से अनजान थे, जिन्हें परमेश्वर के पुत्र ने इन अन्तिम समयों में पृथ्वी पर आकर पूरा किया? और न तुम यह कहने की स्थिति में हो कि ये बातें एक प्रकार के संयोग से हुईं, मानो वे भविष्यद्वक्ताओं से किसी और व्यक्ति के विषय में कही गई थीं, जबकि ऐसी ही घटनाएँ प्रभु को हुईं. क्योंकि सब भविष्यद्वक्ताओं ने ये ही बातें भविष्यद्वाणी कीं, पर वे प्राचीन लोगों में से किसी के विषय में पूरी नहीं हुईं. क्योंकि यदि ये बातें पुराने समय के उन में से किसी मनुष्य को हुई होतीं, तो बाद में जीवित उन [भविष्यद्वक्ताओं] ने निश्चय यह भविष्यद्वाणी न की होती कि ये घटनाएँ अन्तिम समयों में होंगी. और, वास्तव में पितरों में, न भविष्यद्वक्ताओं में, न प्राचीन राजाओं में, किसी के विषय में इन बातों में से कोई ठीक और विशेष रूप से नहीं हुई. क्योंकि सब ने सचमुच मसीह के दुखों की भविष्यद्वाणी की, पर वे स्वयं भविष्यद्वाणी के समान दुख सहने से दूर रहे. और प्रभु के दुख से जुड़ी बातें, जो पहले कही गई थीं, किसी और विषय में पूरी नहीं हुईं.
क्योंकि प्राचीन लोगों में किसी मनुष्य की मृत्यु पर न सूर्य दोपहर को अस्त हुआ, न मन्दिर का पर्दा फटा, न पृथ्वी काँपी, न चट्टानें फटीं, न मरे हुए जी उठे, न इन [पुराने] मनुष्यों में से कोई तीसरे दिन उठाया गया, न स्वर्ग में ग्रहण किया गया, न उसके उठाए जाने पर आकाश खुले, न जातियों ने किसी और के नाम पर विश्वास किया; और न उन में से किसी ने, मरकर और फिर जी उठकर, स्वतन्त्रता की नई वाचा को खोल दिया. इसलिए भविष्यद्वक्ताओं ने और किसी के विषय में नहीं, प्रभु के विषय में कहा, जिस में ये ऊपर कही हुई सब निशानियाँ एकत्र हुईं.
4. यदि कोई, तथापि, यहूदियों का पक्ष लेकर, यह मानता रहे कि यह नई वाचा उस मन्दिर के खड़े करने में थी जो बाबुल को देशनिकाले के बाद जरुब्बाबेल के अधीन बनाया गया, और सत्तर वर्ष बीतने के बाद वहाँ से लोगों के निकल जाने में, तो वह जान ले कि पत्थरों से बना मन्दिर सचमुच तब फिर बनाया गया (क्योंकि अभी तक वह व्यवस्था मानी जाती थी जो पत्थर की पटियाओं पर बनाई गई थी), तौभी कोई नई वाचा नहीं दी गई, पर वे प्रभु के आने तक मूसा की व्यवस्था को काम में लाते रहे; पर प्रभु के आगमन से, नई वाचा जो मेल को लौटा लाती है, और व्यवस्था जो जीवन देती है, सारी पृथ्वी पर निकल गई है, जैसा भविष्यद्वक्ताओं ने कहा: "क्योंकि सिय्योन से व्यवस्था निकलेगी, और यरूशलेम से प्रभु का वचन; और वह बहुत लोगों को डांटेगा; और वे अपनी तलवारों को हल के फाल तोड़ डालेंगे, और अपने भालों को छँटाई के हँसिये, और वे फिर लड़ना न सीखेंगे."(1) इसलिए यदि यरूशलेम से निकलती हुई दूसरी व्यवस्था और वचन, उसे (वचन को) पानेवाली अन्यजातियों के बीच ऐसा मेल [का राज्य] ले आई, और उनके द्वारा, बहुत जाति को उसकी मूर्खता के विषय में निरुत्तर किया, तब [ही] यह दिखता है कि भविष्यद्वक्ताओं ने किसी और व्यक्ति के विषय में कहा. पर यदि स्वतन्त्रता की व्यवस्था, अर्थात् परमेश्वर का वचन, प्रेरितों के द्वारा (जो यरूशलेम से निकले) सारी पृथ्वी पर प्रचार किया जाकर, बातों की दशा में ऐसा परिवर्तन लाई, कि इन [जातियों] ने तलवारों और युद्ध के भालों को हल के फाल बनाए, और उन्हें अन्न काटने के छँटाई के हँसियों में बदल दिया, [अर्थात्], शान्ति के कामों के औजारों में, और वे अब लड़ने की आदत से रहित हैं, पर मारे जाने पर दूसरा गाल भी आगे करते हैं,(2) तब भविष्यद्वक्ताओं ने ये बातें किसी और व्यक्ति के विषय में नहीं, उस के विषय में कही हैं जिसने उन्हें किया.
यह व्यक्ति हमारा प्रभु है, और उस में वह घोषणा पूरी होती है; क्योंकि वही है जिसने हल बनाया है, और छँटाई का हँसिया लगाया है, अर्थात्, मनुष्य की पहली बुवाई, जो आदम में दिखाई गई सृष्टि थी,(3) और अन्तिम समयों में वचन के द्वारा उपज का बटोरा जाना; और, इसी कारण, क्योंकि उसने आदि को अन्त से जोड़ा, और दोनों का प्रभु है, उसने अन्त में हल को दिखाया, इस में कि लकड़ी लोहे से जोड़ी गई है, और I ने इस प्रकार अपनी भूमि को शुद्ध किया है, क्योंकि वचन देह से दृढ़ता से एक होकर, और अपनी रचना में कीलों से जड़ा जाकर,(4) जंगली पृथ्वी को फिर वश में ले आया है. आदि में, उसने हाबिल के द्वारा छँटाई के हँसिये का आकार दिया, यह दिखाते हुए कि मनुष्यों की एक धर्मी जाति का बटोरा होना चाहिए. वह कहता है, "क्योंकि देखो धर्मी कैसे नष्ट होता है, और कोई उस पर ध्यान नहीं करता; और धर्मी लोग उठा लिए जाते हैं, और कोई उसे मन में नहीं रखता."(5) ये बातें हाबिल में पहले की गईं, भविष्यद्वक्ताओं से भी पहले कही गईं, पर प्रभु के व्यक्ति में पूरी हुईं; और वही [अभी सत्य है] हमारे विषय में, देह सिर के उदाहरण पर चलती हुई.
5. ऐसे हैं उचित(6) तर्क, उन के विरोध में [काम में लाने के] जो मानते हैं कि भविष्यद्वक्ता [प्रेरित हुए] भिन्न परमेश्वर से, और हमारा प्रभु दूसरे पिता से [आया], यदि कदाचित् [ये मिथ्याशिक्षक] अन्त में de-
sist ऐसी चरम मूर्खता से. इन पवित्रशास्त्रीय प्रमाणों को लाते हुए मेरा उत्साहपूर्ण उद्देश्य यह है कि, जहाँ तक मुझ में है, इन्हीं वचनों से उन्हें निरुत्तर करके, मैं उन्हें ऐसी बड़ी निन्दा से, और बहुत से देवताओं को उन्मत्त रीति से गढ़ने से रोकूँ.
अध्याय 35.--अत्यन्त उच्च के प्रेरण से कुछ भविष्यद्वाणियाँ भविष्यद्वक्ताओं ने कहीं, और कुछ डेमियुर्ज से कहीं, ऐसा आरोप करनेवालों का खण्डन. इन्हीं भविष्यद्वाणियों के विषय वैलेंटिनियनों के आपस के मतभेद.
1. फिर, वैलेंटिनियनों के विरोध में, और अन्य ग्नोस्टिकों के विरोध में, जो झूठ से ऐसे कहलाते हैं, जो मानते हैं कि शास्त्र के कुछ भाग एक समय प्लेरोमा से (a summitate) उस स्थान से [निकले] बीज के द्वारा कहे गए, पर दूसरे समय मध्य निवास से धृष्ट माता प्रुनिका के द्वारा, पर बहुत से जगत को बनानेवाले के कारण हैं, जिस से भविष्यद्वक्ताओं को भी उनकी भेजाई मिली, हम कहते हैं कि ब्रह्माण्ड के पिता को ऐसी तंगी में उतारना बिलकुल बुद्धिहीन है, कि उसके पास अपने निज उचित साधन न हों, जिन से प्लेरोमा की बातें सिद्ध रीति से प्रचारित हों. क्योंकि वह किस से डरा, कि अधोगति और अज्ञान की दशा में उत्पन्न होकर अस्तित्व में आई उस आत्मा से उलझे बिना, वह अपनी इच्छा को अपने निज मार्ग से स्वतन्त्र रूप से, स्वतन्त्रता से प्रगट न करे? क्या वह इसलिये डरा कि जब अधिक लोग मिलावट रहित सत्य को सुनेंगे तब बहुत से लोग उद्धार पाएँगे? या, दूसरी ओर, क्या वह अपने लिये उन्हें तैयार करने में असमर्थ था जो उद्धारकर्ता के आगमन की घोषणा करें?
2. पर यदि, जब उद्धारकर्ता इस पृथ्वी पर आया, उसने अपने प्रेरितों को जगत में भेजा कि वे उसके आगमन को ठीक ठीक प्रचार करें, और पिता की इच्छा सिखाएँ, अन्यजातियों की शिक्षा से या यहूदियों की शिक्षा से कुछ भी सामान्य न रखते हुए, तो और भी अधिक, अभी प्लेरोमा में रहते हुए, वह अपने निज घोषणा करनेवालों को नियुक्त करता कि वे इस जगत में उसके भावी आगमन को प्रचार करें, और डेमियुर्ज से निकली उन भविष्यद्वाणियों से कुछ भी सामान्य न रखते हुए. पर यदि, प्लेरोमा के भीतर रहते हुए, उसने उन भविष्यद्वक्ताओं का उपयोग किया जो व्यवस्था के अधीन थे, और उनके साधन के द्वारा अपनी निज बातें घोषित कीं; तो यहाँ पहुँचने पर वह और भी अधिक इन्हीं शिक्षकों का उपयोग करता, और उनके द्वारा हमें सुसमाचार सुनाता. इसलिये वे अब और यह न ठहराएँ कि पतरस और पौलुस और अन्य प्रेरितों ने सत्य का प्रचार किया, पर कि शास्त्री और फरीसी, और अन्य, जिनके द्वारा व्यवस्था रखी गई. पर यदि, अपने आगमन पर, उसने अपने निज प्रेरितों को सत्य की आत्मा में भेजा, और भ्रम की आत्मा में नहीं, तो उसने भविष्यद्वक्ताओं के विषय में भी वही किया; क्योंकि परमेश्वर का वचन सदा वही था: और यदि प्लेरोमा से आई आत्मा, इन मनुष्यों की पद्धति के अनुसार, ज्योति की आत्मा, सत्य की आत्मा, सिद्धता की आत्मा, और ज्ञान की आत्मा थी, जबकि डेमियुर्ज से आई अज्ञान, अधोगति, और भ्रम की आत्मा थी, और अन्धकार की सन्तान; तो कैसे हो सकता है कि एक ही और उसी सत्ता में सिद्धता और दोष, ज्ञान और अज्ञान, भ्रम और सत्य, ज्योति और अन्धकार रहे?
पर यदि भविष्यद्वक्ताओं के विषय में ऐसा होना असम्भव था, क्योंकि उन्होंने एक ही परमेश्वर से प्रभु का वचन प्रचार किया, और उसके पुत्र के आगमन की घोषणा की, तो और भी अधिक प्रभु स्वयं कभी वचन न कहता, एक अवसर पर ऊपर से, पर दूसरे अवसर पर नीचे की अधोगति से, इस प्रकार एक ही साथ ज्ञान का और अज्ञान का शिक्षक बनते हुए; और न वह कभी एक समय जगत के संस्थापक को पिता के रूप में महिमा देता, और दूसरे समय इस से ऊपर वाले को, जैसा वह स्वयं घोषित करता है: "कोई मनुष्य नए वस्त्र का टुकड़ा पुराने पर नहीं रखता, और न वे नई दाखरस पुरानी मशकों में डालते हैं."(1) इसलिये ये मनुष्य या तो भविष्यद्वक्ताओं से, पूर्वजों के समान, कुछ भी सम्बन्ध न रखें, और अब और यह आरोप न करें कि ये मनुष्य, डेमियुर्ज के द्वारा पहले से भेजे जाकर, प्लेरोमा से सम्बन्धित उस नए प्रभाव के अधीन कुछ बातें बोले; या, दूसरी ओर, जब हमारा प्रभु घोषित करता है कि नई दाखरस पुरानी मशकों में नहीं डाली जा सकती, तब वे उसके द्वारा समझाए जाएँ.
3. पर उनकी माता की सन्तान प्लेरोमा के भीतर के भेदों का अपना ज्ञान, और उनके विषय भाषण करने की शक्ति किस स्रोत से पा सकता था? मान लो कि माता ने, प्लेरोमा के परे रहते हुए, इसी सन्तान को जना; पर प्लेरोमा के परे जो है उसे वे ज्ञान की सीमा के परे बताते हैं, अर्थात् अज्ञान. तब, अज्ञान में गर्भ धारण किया गया वह बीज ज्ञान को घोषित करने की शक्ति कैसे रख सकता था ? या माता स्वयं, एक निराकार और अनिर्धारित सत्ता, गर्भपात के समान द्वार के बाहर फेंकी हुई, प्लेरोमा के भीतर के भेदों का ज्ञान कैसे पाई, वह जो उसके बाहर संगठित की गई और वहाँ रूप दी गई, और होरोस के द्वारा भीतर प्रवेश करने से रोकी गई, और समाप्ति तक [सब बातों की] प्लेरोमा के बाहर रहती है, अर्थात् ज्ञान की सीमा के परे? फिर, जब वे कहते हैं कि प्रभु की पीड़ा ऊपर के मसीह के विस्तार का एक चिह्न है, जिसे उसने होरोस के द्वारा किया, और इस प्रकार उनकी माता को रूप दिया, तो वे [प्रभु की पीड़ा के] अन्य विवरणों में खण्डित होते हैं, क्योंकि दिखाने के लिये एक चिह्न की समानता उनके पास नहीं है के विषय में
उन पर. क्योंकि ऊपर के मसीह को सिरका और पित्त पीने को कब दिया गया? या उसका वस्त्र कब बाँटा गया? या वह कब बेधा गया, और लहू और पानी निकला? या उसने लहू की बड़ी बूँदें कब पसीजीं? और [वही माँगा जा सकता है] उन अन्य बातों के विषय में जो प्रभु को हुईं, जिनके विषय भविष्यद्वक्ताओं ने कहा है. तब, कहाँ से माता ने या उसकी सन्तान ने उन बातों को पहले से जाना जो अभी नहीं हुई थीं, पर जो पीछे घटेंगी?
4. वे दृढ़ करते हैं कि इनके अतिरिक्त कुछ बातें अभी भी प्लेरोमा से कही गईं, पर वे उन बातों से खण्डित होते हैं जो शास्त्र में मसीह के आगमन पर लगनेवाली कही गई हैं. पर ये कौन सी हैं [जो प्लेरोमा से कही गईं] इस पर वे सहमत नहीं, पर उनके विषय भिन्न उत्तर देते हैं. क्योंकि यदि कोई, उनकी परीक्षा करना चाहकर, किसी अंश के विषय उनके प्रधान पुरुषों से एक एक करके प्रश्न करे, तो वह उन में से एक को उस अंश को प्रोपेटर पर--अर्थात् बैथस पर--डालते पाएगा; दूसरे को उसे आर्के पर--अर्थात् एकजात पर--डालते; दूसरे को सब के पिता पर--अर्थात् वचन पर; जबकि दूसरा, फिर, कहेगा कि वह उस एक iron के विषय कहा गया जो प्लेरोमा के एयोन की [संयुक्त देनों से रचा गया] था;(1) अन्य [अंश को] मसीह के विषय [मानेंगे], जबकि दूसरा [उसे] उद्धारकर्ता पर [डालेगा]. फिर, इन से अधिक निपुण एक,(2) बहुत देर तक चले मौन के बाद, घोषित करता है कि वह होरोस के विषय कहा गया; दूसरा कि वह प्लेरोमा के भीतर की सोफिया को सूचित करता है; दूसरा कि वह प्लेरोमा के बाहर की माता की घोषणा करता है; जबकि दूसरा जगत को बनानेवाले परमेश्वर (डेमियुर्ज) का उल्लेख करेगा. एक [अंश] के विषय उन में विद्यमान भेद ऐसे हैं, उन्हीं शास्त्रों के विषय विरोध के विचार रखते हुए; और जब वही अंश पढ़ा जाता है, वे सब अपनी भौंहें सिकोड़ना आरम्भ करते हैं, और अपने सिर हिलाते हैं, और कहते हैं कि वे सचमुच अत्यन्त ऊँचा प्रवचन कह सकते हैं, पर उस विचार की महानता को जो उसमें गर्भित है सब नहीं समझ सकते; और इसलिये ज्ञानियों में मुख्य बात मौन है. क्योंकि ऊपर की सिगे (मौन) उस मौन के द्वारा रूपायित होनी चाहिए जिसे वे रखते हैं.
इस प्रकार वे, जितने हैं, सब [एक दूसरे से] अलग हो जाते हैं, एक बात के विषय इतनी धारणाएँ रखते हुए, और अपनी चतुर कल्पनाओं को अपने भीतर गुप्त रूप से लिए फिरते हैं. इसलिये जब वे शास्त्र में पहले से कही गई बातों के विषय आपस में सहमत हो जाएँगे, तब वे हमारे द्वारा भी खण्डित होंगे. क्योंकि, गलत धारणाएँ रखते हुए भी, इस बीच वे अपने आप को दोषी ठहराते हैं, क्योंकि उन्हीं वचनों के विषय वे एक मन के नहीं हैं. पर हम अपने शिक्षक के लिये एकमात्र सच्चे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और उसके वचनों को सत्य के नियम के रूप में रखते हैं, इसलिये हम सब उन्हीं बातों के विषय एक समान बोलते हैं, केवल एक परमेश्वर को जानते हुए, इस ब्रह्माण्ड के सृजनहार को, जिसने भविष्यद्वक्ताओं को भेजा, जिसने मिस्र देश से लोगों को बाहर निकाला, जिसने इन अन्तिम समयों में अपने निज पुत्र को प्रगट किया, कि वह अविश्वासियों को घबराहट में डाले, और धर्म का फल खोजे.
अध्याय 36.--भविष्यद्वक्ता उसी एक पिता से भेजे गए जिस से पुत्र भेजा गया.
1. जिस [परमेश्वर] को प्रभु अस्वीकार नहीं करता, और न वह कहता है कि भविष्यद्वक्ता [बोले] उसके पिता से अन्य किसी परमेश्वर से; न किसी अन्य सार से, पर एक ही और उसी पिता से; और न कि किसी अन्य सत्ता ने जगत की वस्तुओं को बनाया, उसके निज पिता को छोड़, जब वह अपनी शिक्षा में इस प्रकार कहता है: "एक गृहस्वामी था, और उसने एक दाखबारी लगाई, और उसके चारों ओर बाड़ा बाँधा, और उसमें एक दाखरस का कोलहू खोदा, और एक गुम्मट बनाया, और उसे किसानों को सौंप दिया, और दूर देश को चला गया: और जब फल का समय निकट आया, उसने अपने दासों को किसानों के पास भेजा, कि वे उसके फल ले लें. और किसानों ने उसके दासों को पकड़ा: एक को टुकड़े टुकड़े काटा, दूसरे को पत्थरवाह किया, और दूसरे को मार डाला. फिर उसने 1ले से अधिक अन्य दास भेजे: और उन्होंने उन से भी वैसा ही किया. पर सब के अन्त में उसने अपने एकलौते पुत्र को उनके पास भेजा, यह कहकर, कदाचित् वे मेरे पुत्र का आदर करेंगे. पर जब किसानों ने पुत्र को देखा, उन्होंने आपस में कहा, यह वारिस है; आओ, हम उसे मार डालें, और उसकी मीरास हमारी हो जाएगी. और उन्होंने उसे पकड़ा, और दाखबारी के बाहर फेंका, और उसे मार डाला. इसलिये जब दाखबारी का स्वामी आएगा, वह इन किसानों से क्या करेगा? वे उससे कहते हैं, वह इन दुष्टों को दुःख से नाश करेगा, और अपनी दाखबारी अन्य किसानों को सौंपेगा, जो अपने समय में उसे फल देंगे."(3) फिर प्रभु कहता है: "क्या तुम ने कभी नहीं पढ़ा, वह पत्थर जिसे राजमिस्त्रियों ने अस्वीकार किया, वही comer का सिर हो गया: यह प्रभु का किया है, और यह हमारी आँखों में अद्भुत है?
इसलिये मैं तुम से कहता हूँ, कि परमेश्वर का राज्य तुम से ले लिया जाएगा, और एक ऐसी जाति को दिया जाएगा जो उसके फल लाए."(4) इन वचनों से वह अपने चेलों को एक ही और उसी गृहस्वामी को स्पष्ट दिखाता है--अर्थात् एक परमेश्वर पिता, जिसने सब कुछ अपने आप से बनाया; और साथ ही [वह दिखाता है] कि किसान विविध हैं, कुछ हठीले, और अभिमानी, और निकम्मे, और प्रभु के घात करनेवाले, पर अन्य जो पूरी आज्ञाकारिता से उसे फल देते हैं
अपने समयों में; और कि वही गृहस्वामी है जो एक समय अपने दासों को, दूसरे समय अपने पुत्र को भेजता है. इसलिये उस पिता से, जिस से पुत्र उन किसानों के पास भेजा गया जिन्होंने उसे मार डाला, उसी से दास भी [भेजे गए]. पर पुत्र, पिता से सर्वोच्च अधिकार के साथ (principali auctoritate) आते हुए, अपने आप को इस प्रकार व्यक्त करता था: "पर मैं तुम से कहता हूँ."(1) दास, फिर, [जो आए] अपने प्रभु की ओर से, दासों की रीति से बोले, [एक सन्देश देते हुए]; और इसलिये वे कहा करते थे, "प्रभु यों कहता है."
5. इसलिये इन मनुष्यों ने अविश्वासियों को प्रभु के रूप में जिस का प्रचार किया, उसी को मसीह ने उन को सिखाया जो उसकी आज्ञा मानते हैं; और जिस परमेश्वर ने पूर्व प्रबन्ध के लोगों को बुलाया था, वही है जिसने बाद के लोगों को ग्रहण किया है. दूसरे शब्दों में, जिसने 1ले उस व्यवस्था का उपयोग किया जो दासत्व लाती है, वही है जिसने बाद के समयों में दत्तक ग्रहण के द्वारा [अपनी प्रजा को बुलाया]. क्योंकि परमेश्वर ने मानवजाति की दाखबारी लगाई जब उसने 1ली बार आदम को रचा और पितरों को चुना; तब उसने उसे किसानों को सौंपा जब उसने मूसा के प्रबन्ध को स्थापित किया: उसने उसके चारों ओर बाड़ा बाँधा, अर्थात्, उनकी आराधना के विषय विशेष आज्ञाएँ दीं: उसने एक गुम्मट बनाया, [अर्थात्], उसने यरूशलेम को चुना: उसने एक दाखरस का कोलहू खोदा, अर्थात्, उसने भविष्यद्वाणी की आत्मा का एक पात्र तैयार किया. और इस प्रकार उसने बाबुल को बन्धुआई से पहले भविष्यद्वक्ताओं को भेजा, और उस घटना के बाद फिर पूर्ववालों से अधिक संख्या में औरों को, फल खोजने को, उन से (यहूदियों से) यों कहकर: "प्रभु यों कहता है, अपने मार्गों और अपने कामों को शुद्ध करो, न्यायपूर्ण न्याय करो, और हर एक अपने भाई पर दया और करुणा से देखे: न विधवा पर अन्धेर करो न अनाथ पर, न मतान्तरित पर न कंगाल पर, और तुम में से कोई अपने हृदय में अपने भाई के विरुद्ध बुराई न संचित करे, और झूठी शपथ को प्रेम न करो. धो लो, अपने आप को शुद्ध करो, अपने हृदयों से बुराई को दूर करो, भला करना सीखो, न्याय को खोजो, सताए हुए की रक्षा करो, पिताहीन का न्याय करो (purillo), विधवा के लिये विनती करो; और आओ, हम मिलकर विवाद करें, प्रभु कहता है."(2) और फिर: "अपनी जीभ को बुराई से रोक, और अपने होठों को कि वे छल न बोलें; बुराई से हट, और भला कर; शान्ति को खोज, और उसका पीछा कर."(3) इन बातों का प्रचार करते हुए, भविष्यद्वक्ताओं ने धर्म के फल खोजे.
पर सब के अन्त में उसने उन अविश्वासियों के पास अपने निज पुत्र, हमारे प्रभु यीशु मसीह को भेजा, जिसे दुष्ट किसानों ने मार डालने के बाद दाखबारी से बाहर फेंक दिया. इस कारण प्रभु परमेश्वर ने उसे (अब और बाड़ा न बाँधा हुआ, पर सारे जगत में खोल दिया हुआ) अन्य किसानों को सौंप दिया, जो अपने समयों में फल देते हैं,--सुन्दर चुना हुआ गुम्मट भी सर्वत्र उठाया जा रहा है. क्योंकि प्रसिद्ध कलीसिया [अब] सर्वत्र है, और सर्वत्र I दाखरस का कोलहू खोदा गया है: क्योंकि जो आत्मा को पाते हैं वे सर्वत्र हैं. क्योंकि पूर्ववालों ने परमेश्वर के पुत्र को अस्वीकार किया, और उसे मार डालने पर दाखबारी से बाहर फेंका, इसलिये परमेश्वर ने उन को न्याय से अस्वीकार किया, और दाखबारी के बाहर की अन्यजाति को उसकी खेती के फल दिए. यह यिर्मयाह के कहने के अनुसार है, "प्रभु ने उस जाति को अस्वीकार किया और छोड़ दिया जो ये काम करती है; क्योंकि यहूदा की सन्तान ने मेरी दृष्टि में बुरा किया है, प्रभु कहता है."(4) और फिर इसी रीति यिर्मयाह कहता है: "मैं ने तुम्हारे ऊपर पहरूए बैठाए; तुरही के शब्द को सुनो; और उन्होंने कहा, हम न सुनेंगे. इसलिये अन्यजातियों ने सुना है, और जो उन में झुण्डों को चराते हैं."(5) इसलिये एक ही और वही पिता है जिसने दाखबारी लगाई, जिसने लोगों को बाहर निकाला, जिसने भविष्यद्वक्ताओं को भेजा, जिसने अपने निज पुत्र को भेजा, और जिसने दाखबारी उन अन्य किसानों को दी जो अपने समय में फल देते हैं.
3. और इसलिये प्रभु ने अपने चेलों से कहा, कि हमें अच्छे कारीगर बनाए: "अपने विषय में चौकस रहो, और हर अवसर पर निरन्तर पहरा दो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे हृदय अतिभोजन और मतवालेपन से, और इस जीवन की चिन्ताओं से भारी हो जाएँ, और वह दिन तुम पर अनजाने आ पड़े; क्योंकि वह फन्दे के समान पृथ्वी के मुख पर रहनेवाले सब पर आ पड़ेगा."(6) "इसलिये तुम्हारी कमर कसी रहे, और तुम्हारे दीये जलते रहें, और तुम उन मनुष्यों के समान जो अपने प्रभु की बाट जोहते हैं, जब वह ब्याह से लौटे."(7) "क्योंकि जैसे नोए के दिनों में हुआ, उन्होंने खाया और पिया, उन्होंने मोल लिया और बेचा, उन्होंने ब्याह किया और ब्याह में दिए गए, और उन्होंने न जाना, जब तक नोए जहाज में न गया, और जलप्रलय आकर उन सब को नाश कर गया; जैसे लूत के दिनों में भी हुआ, उन्होंने खाया और पिया, उन्होंने मोल लिया और बेचा, उन्होंने लगाया और बनाया, उस समय तक जब लूत सदोम से बाहर गया; स्वर्ग से आग बरसी, और उन सब को नाश कर गई: मनुष्य के पुत्र के आने पर भी ऐसा ही होगा."(8) "इसलिये पहरा दो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारा प्रभु किस दिन आएगा."(9) [इन अंशों में] वह एक ही और उसी प्रभु को घोषित करता है, जिसने नूह के समयों में mews की अनाज्ञाकारिता के कारण जलप्रलय लाया, और जिसने लूत के दिनों में सदोमियों में पापियों की भीड़ के कारण स्वर्ग से आग बरसाई, और जो इसी अनाज्ञाकारिता और ऐसे ही पापों के कारण न्याय के दिन को लाएगा अन्त के
समय (in novissimo); जिस दिन वह घोषित करता है कि उस नगर और घर से, जो उसके प्रेरितों का वचन ग्रहण न करेगा, सदोम और अमोरा के लिये अधिक सहने योग्य होगा. "और तू, कफरनहूम," उसने कहा, "क्या तू स्वर्ग पर ऊँचा किया जाएगा?(1) तू नरक में उतर जाएगा. क्योंकि जो बल के काम तुझ में किए गए यदि सदोम में किए गए होते, तो वह आज के दिन तक बना रहता. सचमुच मैं तुम से कहता हूँ, कि न्याय के दिन सदोम के लिये तुझ से अधिक सहने योग्य होगा."(2)
4. क्योंकि परमेश्वर का पुत्र सदा एक ही और वही है, वह उस पर विश्वास करनेवालों को पानी का एक कुआँ(3) [उबलता हुआ] अनन्त जीवन के लिये देता है, पर फलहीन अंजीर के वृक्ष को तुरन्त सुखा देता है; और नूह के दिनों में उसने उस समय की अत्यन्त कुख्यात मानवजाति को बुझाने के लिये न्याय से जलप्रलय लाया, जो परमेश्वर के लिये फल नहीं ला सकती थी, क्योंकि पाप करनेवाले स्वर्गदूत उन से मिल गए थे, और [उसने जैसा किया] इन मनुष्यों के पापों पर रोक लगाने के लिये, पर [उसी समय] वह आद्यरूप को,(4) आदम की रचना को सुरक्षित रखे. और वही है जिसने लूत के दिनों में सदोम और अमोरा पर स्वर्ग से आग और गन्धक बरसाया, "परमेश्वर के धर्मी न्याय का एक उदाहरण,"(5) कि सब जानें, "कि हर वृक्ष जो अच्छा फल नहीं लाता काटा जाएगा, और आग में डाला जाएगा."(6) और वही है जो [वचन] उपयोग करता है, कि सामान्य न्याय में उन से, जिन्होंने उसके अद्भुत काम देखे, और उस पर विश्वास न किया, न उसकी शिक्षा ग्रहण की, सदोम के लिये अधिक सहने योग्य होगा? क्योंकि जैसे उसने अपने आगमन के द्वारा उन को बड़ा अधिकार दिया जो उस पर विश्वास करते हैं, और जो उसकी इच्छा करते हैं, वैसे ही उसने दिखाया कि जो उस पर विश्वास नहीं करते वे न्याय में अधिक कठोर दण्ड पाएँ; इस प्रकार सब पर समान न्याय फैलाते हुए, और जिन को वह अधिक देता है उन से अधिक लेने को होते हुए; अधिक, तौभी, इसलिये नहीं कि वह दूसरे पिता का ज्ञान प्रगट करता है, जैसा मैं ने इतने पूरे रूप से और इतनी बार दिखाया है, पर इसलिये कि उसने अपने आगमन के द्वारा मानवजाति पर पितृ अनुग्रह का बड़ा दान उण्डेला है.
5. यदि, तौभी, जो मैं ने कहा है वह किसी को यह समझाने को पर्याप्त न हो कि भविष्यद्वक्ता एक ही और उसी पिता से भेजे गए, जिस से हमारा प्रभु भी भेजा गया, तो ऐसा कोई अपने हृदय का मुख खोलकर, और गुरु, यीशु मसीह प्रभु को पुकारकर, जब वह कहे तब उसे सुने, "स्वर्ग का राज्य उस राजा के समान है जिसने अपने पुत्र के लिये ब्याह किया, और उसने अपने दासों को भेजा कि बुलाए हुए लोगों को ब्याह में बुलाएँ." और जब उन्होंने आज्ञा न मानी, वह आगे कहता है, "फिर उसने अन्य दास भेजे, यह कहकर, बुलाए हुओं से कहो, आओ, मैं ने अपना भोज तैयार किया है; मेरे बैल और सब fallings मारे गए हैं, और सब कुछ तैयार है; ब्याह में आओ. पर उन्होंने उसे हल्का जाना, और अपने मार्ग चले गए, कुछ अपने खेत को, और दूसरे अपने व्यापार को; पर शेष ने उसके दासों को पकड़ा, और कुछ का अपमान किया, जबकि औरों को उन्होंने मार डाला. पर जब राजा ने यह सुना, वह क्रोधित हुआ, और अपनी सेनाएँ भेजकर इन हत्यारों को नाश किया, और उनके नगर को जला दिया, और अपने दासों से कहा, ब्याह तो तैयार है, पर जो बुलाए गए थे वे योग्य न थे. इसलिये सड़कों पर निकल जाओ, और जितनों को पाओ, ब्याह में इकट्ठा करो. सो दास बाहर गए, और जितनों को पाया, बुरे और अच्छे, इकट्ठा किया, और ब्याह अतिथियों से भर गया. पर जब राजा अतिथियों को देखने भीतर आया, उसने वहाँ एक मनुष्य को देखा जिसने ब्याह का वस्त्र नहीं पहिना था; और उससे कहा, मित्र, तू यहाँ कैसे आया, ब्याह का वस्त्र न पहिने हुए? पर वह चुप रहा. तब राजा ने अपने दासों से कहा, उसे हाथ और पाँव बाँधकर ले जाओ, और बाहर के अन्धकार में डाल दो: वहाँ रोना और दाँत पीसना होगा.
क्योंकि बहुत बुलाए जाते हैं, पर थोड़े चुने जाते हैं."(8) अब, अपने इन वचनों से, प्रभु [ये सब बातें, अर्थात्,] स्पष्ट दिखाता है, कि एक राजा और प्रभु है, सब का पिता, जिसके विषय उसने पहले कहा था, "तू यरूशलेम की भी शपथ न खाना, क्योंकि वह बड़े राजा का नगर है;"(9) और कि उसने आरम्भ से अपने पुत्र के लिये ब्याह तैयार किया था, और अत्यन्त दया से, अपने दासों के साधन के द्वारा, पूर्व प्रबन्ध के मनुष्यों को ब्याह के भोज में बुलाता था; और जब उन्होंने आज्ञा न मानी, उसने अन्य दास भेजकर फिर भी उन्हें निमन्त्रण दिया, तौभी तब भी उन्होंने उसकी आज्ञा न मानी, पर निमन्त्रण का सन्देश लानेवालों को पत्थरवाह किया और मार डाला. इसलिये उसने अपनी सेनाएँ भेजकर उन्हें नाश किया, और उनके नगर को जला दिया; पर सब सड़कों से, अर्थात् सब जातियों से, अपने पुत्र के ब्याह के भोज में [अतिथियों को] इकट्ठा किया, जैसा वह यिर्मयाह के द्वारा भी कहता है: "मैं ने अपने दास भविष्यद्वक्ताओं को भी तुम्हारे पास भेजा है कि कहें, अब लौट आओ, हर मनुष्य, से
अपना अत्यन्त बुरा मार्ग, और अपने कामों को सुधारो."(1) और फिर वह उसी भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहता है: "मैं ने दिन भर और उजियाले से पहले भी अपने दास भविष्यद्वक्ताओं को तुम्हारे पास भेजा; तौभी उन्होंने मेरी आज्ञा न मानी, और न मेरे पास अपने कान झुकाए. और तू यह वचन उन से कहेगा
यह एक ऐसी प्रजा है जो प्रभु के शब्द की आज्ञा नहीं मानती, और न ताड़ना ग्रहण करती; उनके मुख से विश्वास नाश हो गया है."(2) इसलिये, जिस प्रभु ने प्रेरितों के द्वारा हमें सर्वत्र बुलाया है, वही है जिसने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पूर्वकाल के लोगों को बुलाया, जैसा प्रभु के वचनों से प्रगट होता है; और यद्यपि उन्होंने विविध जातियों को प्रचार किया, भविष्यद्वक्ता एक परमेश्वर से नहीं थे, और प्रेरित दूसरे से; पर, एक ही और उसी से [चलकर], उन में से कुछ ने प्रभु की घोषणा की, दूसरों ने पिता का प्रचार किया, और दूसरों ने फिर परमेश्वर के पुत्र के आगमन को पहले से कहा, जबकि औरों ने उसे उन को जो तब दूर थे पहले से ही उपस्थित बताकर घोषित किया.
6. और आगे भी उसने यह प्रगट किया, कि बुलाए जाने के बाद हमें धर्म के कामों से भी सज्जित होना चाहिए, कि परमेश्वर की आत्मा हम पर विश्राम करे; क्योंकि यही ब्याह का वस्त्र है, जिसके विषय प्रेरित भी कहता है, "यह नहीं कि हम वस्त्ररहित हों, पर ऊपर से वस्त्र पहिनें, कि मरणशीलता अमरता से निगल ली जाए."(3) पर जो परमेश्वर के भोज में सचमुच बुलाए गए हैं, तौभी अपनी दुष्ट चाल के कारण पवित्र आत्मा को नहीं पाए, "बाहर के अन्धकार में डाले जाएँगे," वह घोषित करता है.(4) इस प्रकार वह स्पष्ट दिखाता है कि वही राजा जिसने सब दिशाओं से विश्वासियों को अपने पुत्र के ब्याह में इकट्ठा किया, और जो उन्हें अक्षय भोज देता है, [भी] उस मनुष्य को बाहर के अन्धकार में डालने की आज्ञा देता है जिसने ब्याह का वस्त्र नहीं पहिना, अर्थात् जो उसे तुच्छ जानता है. क्योंकि जैसे पूर्व वाचा में, "उन में से बहुतों से वह प्रसन्न न हुआ;"(5) वैसे ही यहाँ भी है, कि "बहुत बुलाए जाते हैं, पर थोड़े चुने जाते हैं."(6) तब, एक परमेश्वर नहीं है जो न्याय करता है, और दूसरा पिता जो हमें उद्धार के लिये इकट्ठा बुलाता है; और न एक, सचमुच, जो अनन्त ज्योति देता है, पर दूसरा जो ब्याह का वस्त्र न पहिननेवालों को बाहर के अन्धकार में भेजने की आज्ञा देता है. पर वह एक ही और वही परमेश्वर है, हमारे प्रभु का पिता, जिस से भविष्यद्वक्ताओं को भी उनकी भेजाई मिली, जो अपनी अनन्त दया के द्वारा अयोग्यों को सचमुच बुलाता है; पर बुलाए हुओं की परीक्षा करता है, [जानने को] कि क्या उन्होंने अपने पुत्र के ब्याह के योग्य और उचित वस्त्र पहिना है, क्योंकि कोई अनुचित या बुरी बात उसे नहीं भाती.
यह उस बात के अनुसार है जो प्रभु ने चंगे किए हुए मनुष्य से कही: "देख, तू चंगा किया गया है; फिर पाप न कर, कहीं तुझ पर कोई बुरी बात न आ पड़े."(7) क्योंकि जो भला, और धर्मी, और शुद्ध, और निष्कलंक है, वह अपनी ब्याह की कोठरी में कोई बुरी, या अन्यायी, या घृणित बात न सहेगा. यही हमारे प्रभु का पिता है, जिसकी विधान से सब बातें ठहरी हैं, और सब उसकी आज्ञा से चलाए जाते हैं; और वह उन पर अपने उदार दान देता है जिन्हें [उन्हें पाना] चाहिए; पर अत्यन्त धर्मी बदला देनेवाला कृतघ्नों को और उसकी दया को न समझनेवालों को उनकी योग्यता के अनुसार, अत्यन्त योग्य रीति [दण्ड] नापता है; और इसलिये वह कहता है, "उसने अपनी सेनाएँ भेजीं, और उन हत्यारों को नाश किया, और उनके नगर को जला दिया."(8) वह यहाँ कहता है, "उसकी सेनाएँ," क्योंकि सब मनुष्य परमेश्वर की सम्पत्ति हैं. क्योंकि "पृथ्वी प्रभु की है, और उसकी परिपूर्णता; जगत, और जो कुछ उसमें बसता है."(9) इस कारण प्रेरित पौलुस भी रोमियों के नाम पत्री में कहता है, "क्योंकि परमेश्वर को छोड़ कोई अधिकार नहीं; जो अधिकार हैं वे परमेश्वर के ठहराए हुए हैं. जो कोई अधिकार का विरोध करता है, वह परमेश्वर की विधि का विरोध करता है; और जो विरोध करते हैं वे अपने ऊपर दण्ड लाएँगे. क्योंकि हाकिम अच्छे काम के लिये भय नहीं, पर बुरे के लिये. तो क्या तू अधिकार से न डरेगा? जो भला है उसे कर, और तू उसी से प्रशंसा पाएगा; क्योंकि वह तेरे लिये भलाई के निमित्त परमेश्वर का सेवक है. पर यदि तू वह करे जो बुरा है, तो डर; क्योंकि वह तलवार व्यर्थ नहीं धारण करता: क्योंकि वह परमेश्वर का सेवक है, बुरा करनेवाले पर क्रोध का पलटा लेनेवाला. इसलिये अवश्य है कि तुम अधीन रहो, केवल क्रोध के कारण नहीं, पर विवेक के कारण भी.
इस कारण कर भी दो; क्योंकि वे परमेश्वर के सेवक हैं, इसी बात पर निरन्तर लगे रहते हैं."(10) तब प्रभु भी, और प्रेरित भी, एकमात्र परमेश्वर पिता की घोषणा करते हैं, उसे जिसने व्यवस्था दी, जिसने भविष्यद्वक्ताओं को भेजा, जिसने सब कुछ बनाया; और इसलिये वह कहता है, "उसने अपनी सेनाएँ भेजीं," क्योंकि हर मनुष्य, जितना वह मनुष्य है, उसकी रचना है, यद्यपि वह अपने परमेश्वर को न जानता हो. क्योंकि वह सब को अस्तित्व देता है; वह, "जो अपने सूर्य को बुरों और भलों पर उदय करता है, और धर्मियों और अधर्मियों पर मेंह भेजता है."(11)
7. और केवल कही गई बात से नहीं, पर दो पुत्रों के दृष्टान्त से भी, जिन में छोटा वेश्याओं के साथ विलास से रहकर अपनी सम्पत्ति खा गया, प्रभु ने एक ही और उसी पिता की शिक्षा दी, जिसने अपने बड़े पुत्र को एक बकरी का बच्चा भी न दिया; पर जो खो गया था, [अर्थात्] अपने छोटे पुत्र के लिये, उसने पाले हुए बछड़े को मारने की आज्ञा दी, और उसे उत्तम वस्त्र दिया.(12)
दिन के भिन्न समयों में दाखबारी में भेजे गए मजदूरों के दृष्टान्त के द्वारा भी, एक ही और वही परमेश्वर घोषित होता है(1), जिसने आरम्भ में कुछ को बुलाया, जब जगत 1ली बार सृजा गया; पर औरों को पीछे, और औरों को मध्य काल में, औरों को दीर्घ समय बीतने के बाद, और औरों को फिर lime के अन्त में; इसलिये उनकी पीढ़ियों में बहुत मजदूर हैं, पर केवल एक गृहस्वामी है जो उन्हें इकट्ठा बुलाता है. क्योंकि केवल एक दाखबारी है, क्योंकि केवल एक धर्म भी है, और एक बाँटनेवाला, क्योंकि एक ही परमेश्वर की आत्मा है जो सब कुछ व्यवस्थित करती है; और इसी रीति एक ही मजदूरी है, क्योंकि उन सब ने हर मनुष्य एक पैसा पाया, जिस पर [अङ्कित] राजकीय मूर्ति और लेख था, परमेश्वर के पुत्र का ज्ञान, जो अमरता है. और इसलिये उसने उन को मजदूरी देना आरम्भ किया जो [लगे थे] अन्त में, क्योंकि अन्तिम समयों में, जब 'प्रभु प्रगट हुआ उसने अपने आप को सब के सामने [उनके प्रतिफल के रूप में] रखा.
8. तब, चुँगी लेनेवाले के विषय में, जिसने प्रार्थना में फरीसी को ex celled किया, [हम पाते हैं] कि यह इसलिये नहीं था कि उसने दूसरे पिता की आराधना की कि उसने प्रभु से यह गवाही पाई कि वह [दूसरे से] अधिक धर्मी ठहराया गया; पर इसलिये कि बड़ी दीनता से, सब डींग और अभिमान से अलग, उसने उसी परमेश्वर के सामने अंगीकार किया.(2) दो पुत्रों का दृष्टान्त भी: जो दाखबारी में भेजे गए, जिन में से एक ने सचमुच अपने पिता का विरोध किया, पर पीछे पछताया, जब पछतावा उसे कुछ लाभ न हुआ; दूसरा, तौभी, जाने का वचन दिया, तुरन्त अपने पिता को आश्वासन देते हुए, पर वह नहीं गया (क्योंकि "हर मनुष्य झूठा है;"(3) "चाहना उसके पास है, पर करने का उपाय वह नहीं पाता"(4)),--[यह दृष्टान्त, मैं कहता हूँ], एक ही और उसी पिता को दिखाता है. तब, फिर, यह सत्य अंजीर के वृक्ष के दृष्टान्त से स्पष्ट दिखाया गया, जिसके विषय प्रभु कहता है, "देख, अब ये तीन वर्ष मैं इस अंजीर के वृक्ष पर फल ढूँढ़ता हुआ आता हूँ, पर मैं कुछ नहीं पाता"(5) (भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, अपने आगमन की ओर दिखाते हुए, जिनके द्वारा वह समय समय पर आया, उन से धर्म का फल ढूँढ़ते हुए, जिसे उसने नहीं पाया), और उस बात से भी कि, पहले कही गई कारण से, अंजीर का वृक्ष काटा जाए. दृष्टान्त का उपयोग किए बिना, प्रभु ने यरूशलेम से कहा, 'हे यरूशलेम, यरूशलेम, तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मारती है, और जो तेरे पास भेजे जाते हैं उन्हें पत्थरवाह करती है; मुर्गी अपने चूजों को trader अपने पंख कितनी बार मैं ने तेरी सन्तान को इकट्ठा करना चाहा, और तुम ने न चाहा!
देख, तुम्हारा घर तुम्हारे लिये उजाड़ छोड़ दिया जाएगा."(6) क्योंकि जो दृष्टान्त में कहा गया था, "देख, तीन वर्ष मैं फल ढूँढ़ता हुआ आता हूँ," और स्पष्ट वचनों में, फिर, [जहाँ वह कहता है]," मैं ने तेरी सन्तान को कितनी बार इकट्ठा करना चाहा," वह झूठ [पाया जाएगा], यदि हम उसके आगमन को न समझें, जो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा [घोषित] है--यदि, वास्तव में, वह उनके पास केवल एक बार आया, और तब 1ली बार. पर जिसने कुलपतियों को और [1ली वाचा के अधीन रहनेवालों] को चुना, वही परमेश्वर का वचन है जिसने भविष्यद्वाणी की आत्मा के द्वारा उन से भेंट की, और हम से भी भेंट की जो उसके आगमन के द्वारा सब दिशाओं से इकट्ठा बुलाए गए हैं; पहले कही गई बात के अतिरिक्त, उसने सचमुच घोषित किया, "बहुत लोग पूर्व से और पश्चिम से आएँगे, और अब्राहम, और इसहाक, और याकूब के साथ स्वर्ग के राज्य में झुकेंगे. पर राज्य की सन्तान बाहर के अन्धकार में चली जाएगी; वहाँ रोना और दाँत पीसना होगा."(7) यदि, तब, जो उसके प्रेरितों के प्रचार के द्वारा पूर्व और पश्चिम में उस पर विश्वास करते हैं वे अब्राहम, इसहाक, और याकूब के साथ स्वर्ग के राज्य में झुकेंगे, उन के साथ [स्वर्गीय] भोज में भागी होकर, तो एक ही और वही परमेश्वर रखा जाता है, जिसने कुलपतियों को सचमुच चुना, प्रजा से भी भेंट की, और अन्यजाति को बुलाया.
अध्याय 37.--मनुष्य स्वतन्त्र इच्छा के अधिकारी हैं, और चुनने की शक्ति से सम्पन्न हैं. इसलिये यह सत्य नहीं कि कुछ स्वभाव से अच्छे हैं, और दूसरे बुरे.
1. [हमारे प्रभु की] यह उक्ति, "मैं ने तेरी सन्तान को कितनी बार इकट्ठा करना चाहा, और तू ने न चाहा,"(8) मनुष्य की स्वतन्त्रता की प्राचीन व्यवस्था को रखती है, क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को आरम्भ से स्वतन्त्र [कर्ता] बनाया, अपनी निज शक्ति का अधिकारी, जैसे वह अपने निज प्राण का है, कि परमेश्वर की आज्ञाओं का (ad utendum sententia) स्वेच्छा से पालन करे, और परमेश्वर के बलात्कार से नहीं. क्योंकि परमेश्वर के साथ कोई बलात्कार नहीं, पर [हमारी ओर] एक अच्छी इच्छा उसके पास निरन्तर है. और इसलिये वह सब को अच्छी सलाह देता है. और मनुष्य में, और स्वर्गदूतों में भी, उसने चुनने की शक्ति रखी है (क्योंकि स्वर्गदूत बुद्धिमान सत्ताएँ हैं), कि जिन्होंने आज्ञा मानी उन्होंने भलाई को न्याय से रखे, जो सचमुच परमेश्वर के द्वारा दी गई, पर अपने आप से सुरक्षित रखी गई. दूसरी ओर, जिन्होंने आज्ञा नहीं मानी वे न्याय के साथ भलाई के अधिकार में न पाए जाएँगे, और योग्य दण्ड पाएँगे: क्योंकि परमेश्वर ने उन पर भलाई को दया से दिया; पर उन्होंने स्वयं उसे यत्न से नहीं रखा, और न उसे कुछ अनमोल समझा, पर उसकी अति उत्तम भलाई पर तुच्छ ज्ञान उण्डेल दिया. इसलिये भलाई को अस्वीकार करके, और मानो उसे उगलकर, वे सब योग्य रीति से पाएँगे
परमेश्वर के न्यायपूर्ण न्याय को, जिस की गवाही प्रेरित पौलुस रोमियों के नाम अपनी पत्री में देता है, जहाँ वह कहता है, "पर क्या तू उसकी भलाई, और धीरज, और दीर्घसहन के धन को तुच्छ जानता है, यह न जानते हुए कि परमेश्वर की भलाई तुझे मन फिराव की ओर ले जाती है? पर अपनी कठोरता और मन न फिरानेवाले हृदय के अनुसार, तू अपने लिये क्रोध के दिन के विरुद्ध, और परमेश्वर के धर्मी न्याय के प्रगटीकरण के विरुद्ध, क्रोध संचित करता है." "पर महिमा और आदर," वह कहता है, "हर एक को जो भला करता है."(1) इसलिये परमेश्वर ने वह दिया है जो भला है, जैसा प्रेरित इस पत्री में हम से कहता है, और जो उसे करते हैं वे महिमा और आदर पाएँगे, क्योंकि उन्होंने वह किया जो भला है जब उनके अधिकार में था कि वे उसे न करें; पर जो उसे नहीं करते वे परमेश्वर का न्यायपूर्ण न्याय पाएँगे, क्योंकि उन्होंने भला नहीं किया जब उनके अधिकार में था कि ऐसा करें.
2. पर यदि कुछ स्वभाव से बुरे बनाए गए होते, और दूसरे अच्छे, तो ये पीछे वाले अच्छे होने के लिये स्तुति के योग्य न होते, क्योंकि वे ऐसे सृजे गए थे; और न पहले वाले निन्दनीय होते, क्योंकि वे [मूल में] ऐसे बनाए गए थे. पर क्योंकि सब मनुष्य एक ही स्वभाव के हैं, भलाई को पकड़े रहने और उसे करने दोनों में समर्थ; और, दूसरी ओर, उसे अपने से फेंक देने और उसे न करने की शक्ति भी रखते हुए,--कुछ अच्छी व्यवस्थाओं के अधीन मनुष्यों में भी न्याय से स्तुति पाते हैं (और परमेश्वर से और भी अधिक), और सामान्य रूप से भलाई के अपने चुनाव की, और उसमें स्थिर रहने की, योग्य गवाही पाते हैं; पर दूसरे निन्दित होते हैं, और न्यायपूर्ण दण्ड पाते हैं, क्योंकि उन्होंने जो उचित और भला है उसे अस्वीकार किया. और इसलिये भविष्यद्वक्ता मनुष्यों को भलाई की, न्याय से चलने की और धर्म करने की मनाने को कहते थे, जैसा मैं ने इतने विस्तार से दिखाया है, क्योंकि ऐसा करना हमारे अधिकार में है, और क्योंकि अति लापरवाही से हम भूल सकते थे, और इस प्रकार उस अच्छी सलाह के आवश्यकता में पड़ते, जिसे भले परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा हमें जानने को दिया है.
3. इस कारण प्रभु ने भी कहा, "तुम्हारा प्रकाश मनुष्यों के सामने ऐसा चमके, कि वे तुम्हारे अच्छे कामों को देखें, और तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है महिमा करें."(2) और, "अपने विषय में चौकस रहो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे हृदय अतिभोजन से, और मतवालेपन से, और संसार की चिन्ताओं से भारी हो जाएँ."(3) और, "तुम्हारी कमर कसी रहे, और तुम्हारे दीये जलते रहें, और तुम उन मनुष्यों के समान जो अपने प्रभु की बाट जोहते हैं, जब वह ब्याह से लौटे, कि जब वह आए और खटखटाए, वे उसके लिये खोलें. धन्य है वह दास जिसे उसका प्रभु, जब वह आए, ऐसा करते पाए."(4) और फिर, "जो दास अपने प्रभु की इच्छा को जानता है, और उसे नहीं करता, वह बहुत मार से पीटा जाएगा."(5) और, "तुम मुझे, प्रभु, प्रभु, क्यों कहते हो, और जो बातें मैं कहता हूँ उन्हें नहीं करते?"(6) और फिर, "पर यदि दास अपने हृदय में कहे, प्रभु देर करता है, और अपने सहदासियों को पीटना आरम्भ करे, और खाने, और पीने,
और मतवाला होने को, उसका प्रभु उस दिन आएगा जिस दिन वह उसकी आशा नहीं करता, और उसे दो टुकड़े करेगा, और कपटियों के साथ उसका भाग ठहराएगा."(7) ऐसे सब अंश मनुष्य की स्वतन्त्र इच्छा को(8) दिखाते हैं, और उसी समय वह सलाह जिसे परमेश्वर उसके पास पहुँचाता है, जिस से वह हमें अपने अधीन होने को मनाना चाहता है, और हमें उसके विरुद्ध [पाप के] अविश्वास से फेरना चाहता है, तौभी किसी रीति हमें बलात्कार किए बिना.
4. निस्सन्देह, यदि कोई सुसमाचार का ही अनुसरण करना नहीं चाहता, तो यह उसके अधिकार में है [उसे अस्वीकार करना], पर यह लाभदायक नहीं. क्योंकि परमेश्वर की आज्ञा न मानना, और भलाई को खो देना मनुष्य के अधिकार में है; पर [ऐसी चाल] थोड़ी नहीं हानि और बुराई लाती है. इस कारण पौलुस कहता है, "सब बातें मेरे लिये उचित हैं, पर सब बातें लाभदायक नहीं;"(9) मनुष्य की स्वतन्त्रता दोनों को सूचित करते हुए, जिस बात में "सब बातें उचित हैं," परमेश्वर उसके विषय में कोई बलात्कार नहीं करता; और [उक्ति के द्वारा] "लाभदायक नहीं" यह दिखाते हुए कि हम "अपनी स्वतन्त्रता को दुष्टता के आवरण के रूप में उपयोग न करें,.(10) क्योंकि यह लाभदायक नहीं. और फिर वह कहता है, "हर मनुष्य अपने पड़ोसी के साथ सत्य बोलो."(11) और, "तुम्हारे मुख से कोई सड़ी बात न निकले, न अशुद्धता, न मूर्ख बातें, न गाली, जो उचित नहीं, पर धन्यवाद देना."(12) और, "क्योंकि तुम कभी अन्धकार थे, पर अब प्रभु में ज्योति हो; ज्योति की सन्तान के समान सच्चाई से चलो, न लीला और मतवालेपन में, न शय्या के काम और लम्पटता में, न क्रोध और डाह में. और तुम में से कुछ ऐसे ही थे; पर तुम धोए गए हो, पर तुम हमारे प्रभु के नाम में पवित्र किए गए हो."(13) यदि तब इन बातों को करना या न करना हमारे अधिकार में न होता, तो प्रेरित को, और बहुत अधिक प्रभु को स्वयं, हमें कुछ बातें करने की और और बातों से रुकने की सलाह देने का क्या कारण था? पर क्योंकि मनुष्य आरम्भ से स्वतन्त्र इच्छा का अधिकारी है, और परमेश्वर स्वतन्त्र इच्छा का अधिकारी है, जिसकी समानता में मनुष्य सृजा गया, उसे सदा सलाह दी जाती है कि भलाई को दृढ़ता से पकड़े रहे, जो बात परमेश्वर की आज्ञाकारिता के द्वारा की जाती है.
5. और केवल कामों में नहीं, विश्वास में भी, परमेश्वर ने मनुष्य की इच्छा को स्वतन्त्र और उसके निज अधिकार में सुरक्षित रखा है, यह कहकर, "तेरे विश्वास के अनुसार
तेरे लिये हो; "(1) इस प्रकार दिखाते हुए कि मनुष्य का विशेष रूप से एक विश्वास है, क्योंकि उसका विशेष रूप से अपना एक विचार है. और फिर, "जो विश्वास करता है उसके लिये सब कुछ सम्भव है;"(2) और, "अपने मार्ग जा; और जैसा तू ने विश्वास किया है, वैसा ही तेरे लिये किया जाए."(3) अब ऐसी सब उक्तियाँ दिखाती हैं कि विश्वास के विषय में मनुष्य अपनी निज शक्ति में है. इस कारण, "जो उस पर विश्वास करता है उसके पास अनन्त जीवन है, जबकि जो पुत्र पर विश्वास नहीं करता उसके पास अनन्त जीवन नहीं, पर परमेश्वर का क्रोध उस पर बना रहेगा."(4) इसलिये इसी रीति प्रभु ने, अपनी निज भलाई दिखाते हुए, और सूचित करते हुए कि मनुष्य अपनी निज स्वतन्त्र इच्छा में और अपनी निज शक्ति में है, यरूशलेम से कहा, "मुर्गी अपने चूजों को अपने पंखों के तले [इकट्ठा करती है] जैसे मैं ने कितनी बार तेरी सन्तान को इकट्ठा करना चाहा, और तुम ने न चाहा! इस कारण तुम्हारा घर तुम्हारे लिये उजाड़ छोड़ दिया जाएगा."(5)
6. फिर, जो इन ['निष्कर्षों] के विपरीत को मानते हैं, वे स्वयं प्रभु को शक्तिरहित रख देते हैं, मानो, सचमुच, वह जो चाहता था उसे पूरा करने में असमर्थ हो; या, दूसरी ओर, यह न जानते हुए कि वे स्वभाव से "भौतिक" थे, जैसा ये मनुष्य कहते हैं, और ऐसे जो उसकी अमरता को ग्रहण नहीं कर सकते. "पर उसे," वे कहते हैं, "ऐसे स्वभाव के स्वर्गदूत नहीं बनाने चाहिए थे जो उल्लंघन के योग्य हों, और न ऐसे मनुष्य जो तुरन्त उसके प्रति कृतघ्न सिद्ध हुए; क्योंकि वे बुद्धिमान सत्ताएँ बनाई गईं, परीक्षा करने और न्याय करने की शक्ति से सम्पन्न, और अबुद्धि की वस्तुओं के समान या [केवल] पशु स्वभाव की वस्तुओं के समान [नहीं रची गईं], जो अपनी निज इच्छा से कुछ नहीं कर सकतीं, पर आवश्यकता और बलात्कार से भलाई की ओर खिंची जाती हैं, जिन वस्तुओं में एक ही मन और एक ही रीति है, एक ही नाली में यन्त्र के समान काम करती हैं (inflexibiles el sine judicio), जो अपने सृजे जाने के अतिरिक्त और कुछ होने में असमर्थ हैं." पर इस कल्पना पर, भलाई उनके लिये कृतज्ञता के योग्य न होती, न परमेश्वर के साथ संगति अनमोल होती, न भलाई बहुत खोजने योग्य होती, जो उनके निज उचित यत्न, देखरेख, या अध्ययन के बिना अपने आप को दिखाती, पर अपनी इच्छा से और उनकी चिन्ता के बिना रोप दी जाती. इस प्रकार होता कि उनका भला होना कोई महत्व न रखता, क्योंकि वे इच्छा से नहीं स्वभाव से ऐसे थे, और भलाई के स्वतः अधिकारी हैं, चुनाव से नहीं; और इस कारण वे इस तथ्य को न समझते कि भलाई एक सुन्दर बात है, और न उसमें आनन्द लेते. क्योंकि जो भलाई को नहीं जानते वे उसका आनन्द कैसे ले सकते हैं? या जिन्होंने उसकी ओर निशाना नहीं साधा उन्हें क्या श्रेय? और जिन्होंने उसका पीछा नहीं किया, प्रतियोगिता में जय पानेवालों के समान, उन्हें कौन सा मुकुट?
7. इस कारण भी, प्रभु ने ठहराया कि स्वर्ग का राज्य "हिंसकों" का भाग था; और वह कहता है, "हिंसक उसे बल से ले लेते हैं;"(6) अर्थात्, जो बल और गम्भीर यत्न से उस क्षण पर उसे छीन लेने को पहरा देते axe हैं. इस कारण पौलुस प्रेरित भी कुरिन्थियों से कहता है, "क्या तुम नहीं जानते, कि जो दौड़ के मैदान में दौड़ते हैं, वे सब सचमुच दौड़ते हैं, पर एक पुरस्कार पाता है? वैसे दौड़ो, कि तुम पाओ. जो कोई प्रतियोगिता में लगता है वह भी सब बातों में संयमी है: अब ये मनुष्य ऐसा इसलिये करते हैं कि वे नाशवान मुकुट पाएँ, पर हम अविनाशी. पर मैं ऐसे दौड़ता हूँ, अनिश्चितता के समान नहीं; मैं लड़ता हूँ, हवा पीटनेवाले एक के समान नहीं; पर मैं अपने शरीर को नीला करता हूँ, और उसे वश में लाता हूँ, कहीं ऐसा न हो कि औरों को प्रचार करते हुए, मैं स्वयं निकाला हुआ ठहरूँ."(7) इसलिये यह समर्थ पहलवान हमें अमरता के संघर्ष के लिये मनाना चाहता है, कि हम मुकुट पाएँ, और मुकुट को अनमोल समझें, अर्थात् वह जो हमारे संघर्ष से प्राप्त होता है, पर जो अपनी इच्छा से हमें घेरता नहीं (sed non ultro coalitam). हम जितना कठिन यत्न करते हैं, उतना ही वह अधिक मूल्यवान है; और वह जितना अधिक मूल्यवान है, उतना ही अधिक हमें उसका आदर करना चाहिए. और सचमुच जो बातें स्वतः आती हैं वे axe इतना आदर नहीं पातीं, जितना वे जो बहुत चिन्ताभरी देखरेख से पहुँची जाती हैं. क्योंकि, तब, यह शक्ति हमें दी गई है, प्रभु ने सिखाया है और प्रेरित ने हमें आज्ञा दी है कि हम परमेश्वर को और अधिक प्रेम करें, कि इसके पीछे लगकर इस [पुरस्कार] को अपने लिये हम स्वयं पहुँचें. नहीं तो, निस्सन्देह, यह हमारी भलाई [वास्तव में] बुद्धिहीन होती, क्योंकि परीक्षा का फल नहीं.
और, देखने की शक्ति इतनी चाहने योग्य न दिखाई देती, यदि हम न जानते कि दृष्टि से रहित होना कितनी हानि है; और स्वास्थ्य भी, रोग के परिचय से और अधिक आदरणीय किया जाता है; ज्योति भी, उसे अन्धकार से मिलाने से; और जीवन मृत्यु से. ठीक इसी रीति स्वर्ग का राज्य उन के लिये आदरणीय है जिन्होंने पृथ्वी के राज्य को जाना है. पर जितना वह अधिक आदरणीय है, उतना ही अधिक हम उसका मूल्य करते हैं; और यदि हम ने उसका अधिक मूल्य किया है, तो हम परमेश्वर की उपस्थिति में और अधिक महिमावान होंगे. इसलिये प्रभु ने हमारी ओर से ये सब बातें सहीं, कि उन सब के द्वारा शिक्षा पाकर हम आने वाले समय के लिये सब बातों में चौकस रहें, और बुद्धि से परमेश्वर से प्रेम करना सिखाए जाकर, हम उसके सिद्ध प्रेम में बने रहें: क्योंकि मनुष्य के धर्मत्याग के विषय में परमेश्वर ने दीर्घसहन दिखाया है; मनुष्य उसके द्वारा शिक्षा पाया है, जैसा भविष्यद्वक्ता भी कहता है, "तेरा निज धर्मत्याग तुझे चंगा करेगा;"(8) परमेश्वर इस प्रकार सब बातों को पहले से ठहराते हुए उस के लिये
मनुष्य को सिद्धता तक लाने के लिये, उसकी उन्नति के लिये, और अपने प्रबन्धों के प्रगटीकरण के लिये, कि भलाई प्रगट भी हो, और धर्म सिद्ध हो, और कलीसिया उसके पुत्र की समानता पर गढ़ी जाए, और मनुष्य अन्त में किसी भावी समय में परिपक्वता तक लाया जाए, ऐसे अधिकारों के द्वारा परमेश्वर को देखने और समझने को पकता हुआ.(1)
अध्याय 38.--मनुष्य आरम्भ से सिद्ध क्यों नहीं बनाया गया.
1. यदि, तौभी, कोई कहे, "तो क्या? क्या परमेश्वर मनुष्य को आरम्भ से सिद्ध दिखा नहीं सकता था?" वह जाने कि, क्योंकि परमेश्वर अपने विषय में सचमुच सदा वही और अजन्मा है, सब कुछ उसके लिये सम्भव है. पर सृजी हुई वस्तुएँ अपने सृजनहार से निकृष्ट होनी चाहिए, उनकी बाद की उत्पत्ति के तथ्य से ही; क्योंकि हाल में सृजी वस्तुओं का असृष्ट होना सम्भव न था. पर क्योंकि वे असृष्ट नहीं हैं, इसी कारण वे सिद्ध से कम आती हैं. क्योंकि, ये वस्तुएँ बाद की तिथि की हैं, इसलिये वे शिशुवत हैं; सिद्ध अनुशासन की आदी नहीं, और उसमें अनभ्यस्त. क्योंकि अपने शिशु को दृढ़ भोजन देना निश्चय माता के अधिकार में है, [पर वह ऐसा नहीं करती], क्योंकि बालक अभी अधिक ठोस पोषण ग्रहण करने में असमर्थ है; वैसे ही परमेश्वर के लिये स्वयं मनुष्य को 1ले से सिद्ध बनाना सम्भव था, पर मनुष्य इस [सिद्धता] को ग्रहण नहीं कर सकता था, अभी शिशु होने से. इस कारण इन अन्तिम समयों में हमारा प्रभु, सब कुछ अपने में समेट लेने के बाद, हमारे पास आया, जैसा वह आ सकता था वैसा नहीं, जैसा हम उसे देख सकते थे वैसा. वह अपनी अमर महिमा में हमारे पास सहज आ सकता था, पर उस दशा में हम महिमा की महानता को कभी सह नहीं सकते थे; और इसलिये वह, जो पिता की सिद्ध रोटी था, अपने आप को हमें दूध के समान अर्पण किया, [क्योंकि हम] शिशु थे. उसने यह तब किया जब वह मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, कि हम, मानो, उसकी देह के स्तन से पोषित होकर, और दूध के पोषण के ऐसे क्रम से परमेश्वर के वचन को खाने और पीने के आदी होकर, अमरता की रोटी को भी अपने में रख सकें, जो पिता की आत्मा है.
2. इसी कारण पौलुस कुरिन्थियों से प्रगट करता है, "मैं ने तुम्हें दूध पिलाया है, माँस से नहीं, क्योंकि अब तक तुम उसे सहने के योग्य न थे."(2) अर्थात्, तुम ने सचमुच हमारे प्रभु के आगमन को मनुष्य के रूप में सीखा है; तौभी, तुम्हारी दुर्बलता के कारण, पिता की आत्मा अभी तक तुम पर विश्राम नहीं की है. "क्योंकि जब डाह और झगड़ा," वह कहता है, "और फूट तुम में हैं, तो क्या तुम शारीरिक नहीं, और मनुष्यों की नाईं चलते हो?"(3) अर्थात्, पिता की आत्मा अभी उन के साथ नहीं थी, उन की अपूर्णता के कारण और उन के जीवन की चाल की कमियों के कारण. इसलिये, जैसे प्रेरित के पास उन्हें दृढ़ भोजन देने की शक्ति थी--क्योंकि जिन पर प्रेरितों ने हाथ रखे उन्होंने पवित्र आत्मा को पाया, जो जीवन [अनन्त] का भोजन है--पर वे उसे ग्रहण करने के योग्य न थे, क्योंकि परमेश्वर से सम्बन्धित बातों के अभ्यास में प्राण की ग्रहण करनेवाली शक्तियाँ अभी निर्बल और अनियन्त्रित थीं; वैसे ही, परमेश्वर के पास आरम्भ में मनुष्य को सिद्धता देने की शक्ति थी; पर वह हाल ही में सृजा गया था, इसलिये वह उसे पा ही नहीं सकता था, या यदि उसने उसे पा भी लिया होता, तो क्या वह उसे धारण कर सकता था, या धारण करके, क्या वह उसे रख सकता था. इसी कारण परमेश्वर का पुत्र, यद्यपि वह सिद्ध था, शेष मानवजाति के साथ बाल्यावस्था की दशा से होकर गया, इस प्रकार उसमें भाग लेना अपने निज लाभ के लिये नहीं, पर मनुष्य के अस्तित्व की बाल्यावस्था के लिये, कि मनुष्य उसे ग्रहण कर सके. इसलिये परमेश्वर में कुछ भी असम्भव नहीं था और न्यून नहीं था, [इस तथ्य में गर्भित] कि मनुष्य एक असृष्ट सत्ता नहीं था; पर यह केवल उस पर लागू हुआ जो हाल ही में सृजा गया, [अर्थात्] मनुष्य.
3. परमेश्वर के पास एक साथ शक्ति, बुद्धि, और भलाई दिखाई देती है. उसकी शक्ति और भलाई इसमें [दिखती है], कि अपनी निज इच्छा से उसने पूर्व अस्तित्व न रखनेवाली वस्तुओं को अस्तित्व में बुलाया और रचा; उसकी बुद्धि [दिखाई जाती है] इस में कि उसने सृजी हुई वस्तुओं को एक सामंजस्यपूर्ण और सुसंगत समग्र के भाग बनाया; और वे वस्तुएँ जो, उसकी अत्यन्त श्रेष्ठ दया के द्वारा, वृद्धि और दीर्घ काल का अस्तित्व पाती हैं, असृष्ट की महिमा को, उस परमेश्वर की महिमा को प्रतिबिम्बित करती हैं जो भलाई को बिना डाह के देता है. क्योंकि इन्हीं वस्तुओं के सृजे जाने के तथ्य से ही, [यह निकलता है] कि वे असृष्ट नहीं हैं; पर युगों के दीर्घ क्रम भर अस्तित्व में बने रहने से, वे असृष्ट की एक सामर्थ्य पाएँगी, परमेश्वर के द्वारा उन पर अनन्त अस्तित्व के उदार दान के द्वारा. और इस प्रकार सब बातों में परमेश्वर की प्रधानता है, जो अकेला असृष्ट है, सब वस्तुओं में पहला है, और सब के अस्तित्व का मूल कारण है, जबकि अन्य सब बातें परमेश्वर की अधीनता में रहती हैं. पर परमेश्वर के अधीन रहना अमरता में बने रहना है, और अमरता असृष्ट की महिमा है. इस प्रबन्ध से, और इन सामंजस्यों से, और इस स्वभाव के क्रम से, मनुष्य, एक सृजी हुई और संगठित सत्ता, असृष्ट परमेश्वर के स्वरूप और समानता के अनुसार बनाया जाता है, -पिता सब कुछ भली रीति सोचता और अपनी आज्ञाएँ देता हुआ, पुत्र इन्हें भीतर exe-
cution और सृष्टि का काम करता हुआ, और आत्मा [बनाई हुई वस्तु को] पोषित करती और बढ़ाती हुई, पर मनुष्य दिन प्रतिदिन उन्नति करता हुआ, और सिद्ध की ओर चढ़ता हुआ, अर्थात् असृष्ट के निकट आता हुआ. क्योंकि असृष्ट सिद्ध है, अर्थात् परमेश्वर. अब आवश्यक था कि मनुष्य पहिले उदाहरण में सृजा जाए; और सृजे जाने के बाद, वृद्धि पाए; और वृद्धि पाकर, दृढ़ किया जाए; और दृढ़ किए जाने के बाद, बहुतायत में हो; और बहुतायत में होकर, [पाप की बीमारी से] चंगा हो; और चंगा होकर, महिमा पाए; और महिमा पाकर, अपने प्रभु को देखे. क्योंकि परमेश्वर वही है जो अभी देखा जाना है, और परमेश्वर का दर्शन अमरता को उत्पन्न करता है, पर अमरता मनुष्य को परमेश्वर के निकट कर देती है.
4. इसलिये हर प्रकार से बुद्धिहीन हैं वे जो वृद्धि के समय की बाट नहीं जोहते, पर अपनी प्रकृति की दुर्बलता को परमेश्वर पर डालते हैं. ऐसे लोग न परमेश्वर को जानते हैं न अपने आप को, अतृप्त और कृतघ्न होते हुए, आरम्भ में वह होने को अनिच्छुक जो वे सृजे भी गए हैं--विकारों के अधीन मनुष्य; पर वे मानवजाति की विधि को लाँघ जाते हैं, और मनुष्य बनने से पहले, वे अभी भी अपने सृजनहार परमेश्वर के समान होना चाहते हैं, और जो गूंगे पशुओं से भी अधिक बुद्धि से रहित हैं वे [ज़ोर देते हैं] कि असृष्ट परमेश्वर और मनुष्य, जो आज की सृष्टि है, के बीच कोई भेद नहीं है. क्योंकि ये, [गूंगे पशु], परमेश्वर पर यह दोष नहीं लगाते कि उसने उन्हें मनुष्य नहीं बनाया; पर हर एक, जैसा वह सृजा गया है, धन्यवाद करता है कि वह सृजा गया है. क्योंकि हम उस पर दोष डालते हैं, क्योंकि हम आरम्भ से ईश्वर नहीं बनाए गए, पर पहिले केवल मनुष्य, फिर अन्त में ईश्वर; यद्यपि परमेश्वर ने यह मार्ग अपनी निर्मल कृपा से अपनाया है, कि कोई उस पर डाह या कंजूसी न डाले. वह घोषित करता है, "मैं ने कहा, तुम ईश्वर हो; और तुम सब सर्वोच्च के पुत्र हो."(1) पर क्योंकि हम देवत्व की शक्ति को सह नहीं सके, वह जोड़ता है, "पर तुम मनुष्यों की नाईं मरोगे," दोनों सत्यों को रखते हुए--उसके उदार दान की दया को, और हमारी दुर्बलता को, और यह भी कि हम अपने ऊपर अधिकार रखते थे.
क्योंकि अपनी बड़ी दया के बाद उसने अनुग्रह से भलाई [हम पर] दी, और मनुष्यों को अपने समान बनाया, [अर्थात्] उनकी निज शक्ति में; और उसी समय अपनी पूर्वज्ञान से उसने मनुष्यों की दुर्बलता को, और उन परिणामों को जो उस से बहेंगे, जाना; पर [अपने] प्रेम और [अपनी] शक्ति के द्वारा, वह सृष्ट प्रकृति के तत्त्व को जीत लेगा.(2) क्योंकि आवश्यक था, पहिले, कि प्रकृति दिखाई जाए; तब, उसके बाद, कि जो मर्त्य है वह अमरता से जीता जाए और निगल लिया जाए, और नाशवान अविनाशिता से, और मनुष्य भले और बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के स्वरूप और समानता के अनुसार बनाया जाए.
अध्याय XXXIX.--मनुष्य भले और बुरे को अलग करने की सामर्थ्य से सम्पन्न है; इसलिये, बिना बाध्यता के, उसके पास अपनी निज इच्छा और चुनने से परमेश्वर की आज्ञाओं को पूरा करने की शक्ति है, जिन्हें करने से वह उन बुराइयों से बचता है जो बलवाइयों के लिये तैयार की गई हैं.
1. मनुष्य ने भले और बुरे का ज्ञान पाया है. परमेश्वर की आज्ञा मानना, और उस पर विश्वास करना, और उसकी आज्ञा को मानना भला है, और यही मनुष्य का जीवन है; जैसे परमेश्वर की आज्ञा न मानना बुरा है, और यही उसकी मृत्यु है. इसलिये क्योंकि परमेश्वर ने [मनुष्य को] ऐसी मानसिक शक्ति दी (magnanimitatem) मनुष्य ने आज्ञाकारिता के भले को और अनाज्ञाकारिता के बुरे को दोनों को जाना, कि मन की आँख, दोनों का अनुभव पाकर, विवेक से उत्तम बातों को चुन ले; और वह परमेश्वर की आज्ञा के विषय कभी आलसी या उपेक्षा करनेवाला न हो; और अनुभव से सीखकर कि वह बुरी बात है जो उसे जीवन से वंचित करती है, अर्थात् परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता, उसे कभी प्रयत्न ही न करे, पर यह जानकर कि जो उसके जीवन की रक्षा करता है, अर्थात् परमेश्वर की आज्ञाकारिता, भला है, वह उसे सारी लगन से यत्नपूर्वक रखे. इस कारण उसने दोहरा अनुभव भी पाया है, दोनों प्रकार का ज्ञान रखते हुए, कि अनुशासन से वह उत्तम बातों को चुन ले. पर यदि उसे विपरीत का ज्ञान न होता, तो वह भली बात में शिक्षा कैसे पाता? क्योंकि इस प्रकार हमें सौंपी गई बातों की अधिक निश्चय और सन्देहरहित समझ है, उन के विषय एक मत से उठनेवाले केवल अनुमान से.
क्योंकि जैसे जीभ चखने के द्वारा मीठे और कड़वे का अनुभव पाती है, और आँख दृष्टि के द्वारा काले और सफेद में भेद करती है, और कान सुनने के द्वारा ध्वनियों के भेदों को पहचानता है; वैसे ही मन, दोनों के अनुभव के द्वारा जो भला है उसके ज्ञान को पाकर, परमेश्वर की आज्ञा में चलने से उसकी रक्षा को और दृढ़ता से पकड़ता है: पहिले स्थान में, मन फिराव के द्वारा, अनाज्ञाकारिता को, अप्रिय और घिनौनी वस्तु के रूप में, फेंक देता है; और पीछे यह समझ में आता है कि वह सचमुच क्या है, कि वह भलाई और मिठास के विपरीत है, कि मन परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता को चखने का प्रयत्न भी कभी न करे. पर यदि कोई इन दोनों प्रकार की बातों के ज्ञान को, और ज्ञान के दोहरे बोध को त्याग दे, तो वह अनजाने अपने आप को मनुष्य के स्वभाव से उतार देता है.
2. तब, जो अभी तक मनुष्य नहीं बनाया गया, वह परमेश्वर कैसे होगा? या जो हाल ही में सृजा गया वह सिद्ध कैसे हो सकता है? फिर, जो अपनी मर्त्य प्रकृति में
अपने बनानेवाले की आज्ञा नहीं मानी? क्योंकि अवश्य है कि तू, आरम्भ में, मनुष्य का स्थान रखे, और तब पीछे परमेश्वर की महिमा में भागी हो. क्योंकि तू परमेश्वर को नहीं बनाता, पर परमेश्वर तुझे बनाता है. यदि, तब, तू परमेश्वर की कारीगरी है, तो अपने बनानेवाले के हाथ की बाट जोह, जो ठीक समय में सब कुछ रचता है; ठीक समय में जितना तेरा सम्बन्ध है, जिसकी सृष्टि चलाई जा रही है.(1) अपना हृदय कोमल और झुकनेवाली दशा में उसे अर्पण कर, और उस रूप को सुरक्षित रख जिसमें सृजनहार ने तुझे गढ़ा है, अपने में नमी रखते हुए, कहीं कठोर होकर तू उसकी उँगलियों की छापें न खो दे. पर ढाँचे को सुरक्षित रखकर तू उस तक चढ़ेगा जो सिद्ध है, क्योंकि जो गीली मिट्टी तुझ में है वह परमेश्वर की कारीगरी से [वहाँ] छिपी है. उसके हाथ ने तेरे तत्त्व को गढ़ा; वह तुझे भीतर और बाहर शुद्ध सोने और चाँदी से ढाँप देगा [भी], और वह तुझे इस मात्रा तक सजाएगा, कि "राजा स्वयं तेरे सौन्दर्य से प्रसन्न होगा."(2) पर यदि तू, हठ से कठोर होकर, उसकी निपुणता के काम को अस्वीकार करता है, और उसके प्रति अपने को कृतघ्न दिखाता है, क्योंकि तू केवल [मनुष्य] सृजा गया था, इस प्रकार परमेश्वर के प्रति कृतघ्न होकर, तू ने एक साथ उसकी कारीगरी और जीवन दोनों खो दिए हैं. क्योंकि सृष्टि करना परमेश्वर की भलाई का गुण है पर सृजा जाना मानव प्रकृति का है. यदि तब, तू उसे वह सौंपेगा जो तेरा है, अर्थात्, उसके प्रति विश्वास और अधीनता, तो तू उसकी कारीगरी पाएगा, और परमेश्वर का सिद्ध काम होगा.
3. यदि, तौभी, तू उस पर विश्वास न करेगा, और उसके हाथों से भाग जाएगा, तो अपूर्णता का कारण तुझ में होगा जिसने आज्ञा नहीं मानी, पर उस में नहीं जिसने [तुझे] बुलाया. क्योंकि उसने [सन्देशवाहकों को] लोगों को ब्याह में बुलाने को नियुक्त किया, पर जिन्होंने उसकी आज्ञा नहीं मानी उन्होंने अपने आप को राजकीय भोज से वंचित किया.(3) इसलिये परमेश्वर की निपुणता दोषयुक्त नहीं है, क्योंकि पत्थरों में से अब्राहम के लिये सन्तान उठाने की शक्ति उसके पास है;(4) पर जो मनुष्य उसे नहीं पाता वह अपनी अपूर्णता का अपने लिये कारण है. और न, [इसी रीति], ज्योति उन के कारण चूकती है जिन्होंने अपने आप को अन्धा किया है; पर वह सदा वही बनी रहती है, और जो [इस प्रकार] अन्धे किए गए हैं वे अन्धकार में फँसे हैं के द्वारा. अपने ही दोष से. ज्योति कभी आवश्यकता से किसी को दास नहीं बनाती; और न, फिर, परमेश्वर किसी पर बाध्यता करता है जो उसकी निपुणता के प्रयोग को स्वीकार करने का अनिच्छुक है. इसलिये, वे लोग जिन्होंने पिता की दी हुई ज्योति से धर्मत्याग किया है, और स्वतन्त्रता की व्यवस्था का उल्लंघन किया है, उन्होंने अपने ही दोष से ऐसा किया है, क्योंकि वे स्वतन्त्र कर्ता बनाए गए हैं, और अपने ऊपर अधिकार रखते हैं.
4. पर परमेश्वर, सब बातों को पहले से जानकर, दोनों के लिये योग्य निवास तैयार किए, अविनाशिता की ज्योति को खोजनेवालों पर और उसके पास जानेवालों पर उस ज्योति को दया से देता हुआ जिसकी वे लालसा करते हैं; पर तिरस्कार करनेवालों और ठट्ठा करनेवालों के लिये जो इस ज्योति से बचते हैं और अपने आप को उससे फेर लेते हैं, और जो मानो अपने आप को अन्धा कर लेते हैं, उसने ज्योति का विरोध करनेवाले लोगों के योग्य अन्धकार तैयार किया है, और उसने उन पर उचित दण्ड डाला है जो उसके अधीन होने से बचने का प्रयत्न करते हैं. परमेश्वर के अधीन होना अनन्त विश्राम है, इसलिये जो ज्योति से बचते हैं उनके पास अपनी पलायन के योग्य स्थान है; और जो अनन्त विश्राम से भागते हैं, उनके पास अपनी भागने के अनुसार निवास है. अब, क्योंकि सब भली बातें परमेश्वर के पास हैं, जो अपनी निज निश्चय से परमेश्वर से भागते हैं, वे अपने आप को सब भली बातों से वंचित करते हैं; और परमेश्वर के विषय सब भली बातों से [इस प्रकार] वंचित किए जाने पर, वे परिणामस्वरूप परमेश्वर के न्यायपूर्ण न्याय के अधीन पड़ेंगे. क्योंकि जो विश्राम से बचते हैं वे न्याय से दण्ड पाएँगे, और जो ज्योति से बचते हैं वे न्याय से अन्धकार में बसेंगे. क्योंकि इस कालिक ज्योति के विषय में, जो उससे बचते हैं वे अपने आप को अन्धकार के हाथ सौंप देते हैं, इसलिये वे अपने लिये स्वयं कारण बन जाते हैं कि वे ज्योति से रहित हैं, और अन्धकार में बसते हैं; और, जैसा मैं ने पहले ही देखा है, ज्योति उनके लिये ऐसी [अशुभ.] अस्तित्व की दशा का कारण नहीं है; वैसे जो परमेश्वर की अनन्त ज्योति से भागते हैं, जो अपने में सब भली बातों को रखती है, वे अनन्त अन्धकार में बसने के, सब भली बातों से रहित, अपने लिये स्वयं कारण हैं, [अपने सौंपे जाने के] उस निवास के अपने लिये कारण बन गए हैं
अध्याय XL.--एक ही और वही परमेश्वर पिता निन्दितों पर दण्ड डालता है, और चुने हुओं पर प्रतिफल देता है.
1. इसलिये एक ही और वही परमेश्वर पिता है जिसने अपनी संगति की लालसा करनेवालों के लिये, और जो उसके अधीन बने रहते हैं उनके लिये, अपने पास भली बातें तैयार की हैं; और जिस के पास धर्मत्याग के सरगना, शैतान, और जो उसके साथ विद्रोह कर उठे उनके लिये अनन्त आग है, जिस [आग] में प्रभु(5) ने घोषित किया है कि वे मनुष्य भेजे जाएँगे जो अपने आप से उसकी बाईं ओर अलग किए गए हैं. और यही है जो भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया है, "मैं जलन रखनेवाला परमेश्वर हूँ, मेल बनाता हूँ, और बुरी वस्तुओं को रचता हूँ;"(6) इस प्रकार जो मन फिराते हैं और उसकी ओर फिरते हैं उन से मेल और मित्रता बनाते हुए, और [उन्हें] एकता में लाते हुए, पर मन न फिरानेवालों के लिये, जो ज्योति से बचते हैं, अनन्त आग और बाहर का अन्धकार तैयार करते हुए, जो उन लोगों के लिये सचमुच बुराइयाँ हैं जो उन में पड़ते हैं.
2. यदि, तौभी, सचमुच एक पिता होता जो विश्राम देता है, और दूसरा परमेश्वर जिसने आग तैयार की है, तो उनके पुत्र भी समान रूप से भिन्न होते [एक दूसरे से]; एक, सचमुच, [मनुष्यों को] पिता के राज्य में भेजता, पर दूसरा अनन्त आग में. पर क्योंकि एक ही और उसी प्रभु ने दिखाया है कि सारी मानवजाति न्याय पर बाँटी जाएगी, "जैसे चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग करता है,"(1) और कि कुछ से वह कहेगा, "आओ, मेरे पिता के धन्य लोगों, वह राज्य लो जो तुम्हारे लिये तैयार किया गया है,"(2) पर औरों से, "मुझ से चले जाओ, शापित लोगों, अनन्त आग में, जिसे मेरे पिता ने शैतान और उसके स्वर्गदूतों के लिये तैयार किया है,"(3) एक ही और वही पिता स्पष्ट घोषित होता है [इस अंश में], "मेल बनाता और बुरी वस्तुओं को रचता हुआ," दोनों के लिये योग्य बातें तैयार करता हुआ; जैसे एक ही न्यायी भी है जो दोनों को योग्य स्थान में भेजता है, जैसा प्रभु जंगली घास और गेहूँ के दृष्टान्त में रखता है, जहाँ वह कहता है, "इसलिये जैसे जंगली घास इकट्ठी की जाती है, और आग में जलाई जाती है, वैसे ही जगत के अन्त में होगा. मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके राज्य से हर वह वस्तु जो ठोकर खिलाती है, और जो अन्याय करते हैं, इकट्ठी करेंगे, और उन्हें आग की भट्ठी में भेजेंगे: वहाँ रोना और दाँत पीसना होगा. तब धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य के समान चमकेंगे."(4) इसलिये, जिस पिता ने धर्मियों के लिये राज्य तैयार किया है, जिस में पुत्र ने उसके योग्य लोगों को ग्रहण किया है, वही है जिसने आग की भट्ठी भी तैयार की है, जिस में मनुष्य के पुत्र के द्वारा नियुक्त ये स्वर्गदूत उन लोगों को भेजेंगे जो उसके योग्य हैं, परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार.
3. प्रभु ने, सचमुच, अपने निज खेत में अच्छा बीज बोया;(5) और वह कहता है, "खेत जगत है." पर जब मनुष्य सो रहे थे, शत्रु आया, और "गेहूँ के बीच जंगली घास बोकर, चला गया."(6) इस से हम सीखते हैं कि यह धर्मत्यागी स्वर्गदूत और शत्रु था, क्योंकि वह परमेश्वर की कारीगरी से डाह रखता था, और इस [कारीगरी] को परमेश्वर के साथ शत्रुता बनाने का हाथ उठाया. इसी कारण परमेश्वर ने अपनी उपस्थिति से उसे निकाल दिया जिसने अपनी इच्छा से चुपके से जंगली घास बोई, अर्थात् उसे जिसने अपराध को उत्पन्न किया;(7) पर उसने मनुष्य पर दया की, जो, निस्सन्देह सावधानी की कमी से, तौभी [दूसरे की ओर से] दुष्ट रीति से, अनाज्ञाकारिता में फँस गया; और उसने उस शत्रुता को, जिस से [शैतान] ने [मनुष्य] को परमेश्वर का शत्रु बनाने की युक्ति की थी, उसके कर्ता के विरुद्ध फेर दिया, अपना क्रोध मनुष्य से हटाकर, उसे दूसरी दिशा में फेरकर, और उसके बदले सर्प पर भेजकर. जैसा शास्त्र भी हमें बताता है कि परमेश्वर ने सर्प से कहा, "और मैं तेरे और स्त्री के बीच, और तेरे वंश और उसके वंश के बीच बैर रखूँगा. वह(8) तेरे सिर को कुचलेगा, और तू उसकी एड़ी को कुचलेगा."(9) और प्रभु ने इस बैर को अपने में समेट लिया, जब वह स्त्री से मनुष्य बनाया गया, और उसके [सर्प के] सिर को कुचला, जैसा मैं ने पिछली पुस्तक में दिखाया है.
अध्याय XLI.--वे लोग जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, पर जो अनाज्ञाकारी हैं, शैतान के स्वर्गदूत और पुत्र हैं, सचमुच स्वभाव से नहीं, पर अनुकरण से. इस पुस्तक का अन्त, और आनेवाली पुस्तक का विस्तार.
1. क्योंकि प्रभु ने कहा है कि कुछ स्वर्गदूत हैं, शैतान के [अर्थात् वे], जिन के लिये अनन्त आग तैयार की गई है; और फिर, वह जंगली घास के विषय घोषित करता है, "जंगली घास दुष्ट की सन्तान हैं,"(10) यह दृढ़ करना अवश्य है कि उसने धर्मत्याग के सब को उस पर डाला है जो इस अपराध का सरगना है. पर उसने न स्वर्गदूतों को न मनुष्यों को स्वभाव से ऐसा बनाया. क्योंकि हम नहीं पाते कि शैतान ने कुछ भी रचा, क्योंकि वह स्वयं अन्य स्वर्गदूतों के समान परमेश्वर की सृष्टि है. क्योंकि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया, जैसा दाऊद भी इस प्रकार की सब बातों के विषय कहता है: "क्योंकि उसने वचन कहा, और वे बन गईं; उसने आज्ञा दी, और वे सृजी गईं."(11)
2. इसलिये, क्योंकि सब बातें परमेश्वर के द्वारा बनाई गईं, और क्योंकि शैतान अपने और औरों के लिये धर्मत्याग का कारण हो गया है, शास्त्र न्याय से सदा उन्हें "शैतान के पुत्र" और "दुष्ट के स्वर्गदूत" कहता है जो धर्मत्याग की दशा में बने रहते हैं (maligni). क्योंकि [शब्द] "पुत्र," जैसा मुझ से पहले एक ने देखा है, का दोहरा अर्थ है: एक [पुत्र है] प्रकृति के क्रम में, क्योंकि वह पुत्र होकर जन्मा; दूसरा, इस में कि वह ऐसा बनाया गया, पुत्र गिना जाता है, यद्यपि ऐसा जन्म लेने और ऐसा बनाए जाने में भेद है. क्योंकि पहला सचमुच जिस व्यक्ति का उल्लेख है उससे जन्मा है; पर दूसरा उसके द्वारा ऐसा बनाया जाता है, चाहे उसकी सृष्टि के विषय में हो या उसकी शिक्षा की शिक्षा से. क्योंकि जब कोई व्यक्ति दूसरे के मुख से सिखाया गया है, वह उसे सिखानेवाले का पुत्र कहा जाता है, और बादवाला [कहा जाता है] उसका पिता. तब प्रकृति के अनुसार -अर्थात्, सृष्टि के अनुसार, यों कहें--हम सब परमेश्वर के पुत्र हैं, क्योंकि हम सब परमेश्वर के द्वारा सृजे गए हैं. पर आज्ञाकारिता के विषय में
और शिक्षा के विषय हम सब परमेश्वर के पुत्र नहीं हैं: केवल वे ही ऐसे हैं जो उस पर विश्वास करते हैं और उसकी इच्छा करते हैं. और जो विश्वास नहीं करते, और उसकी इच्छा की आज्ञा नहीं मानते, वे शैतान के पुत्र और स्वर्गदूत हैं, क्योंकि वे शैतान के काम करते हैं. और कि ऐसा ही है उसने यशायाह में घोषित किया है: "मैं ने बालकों को जना और पाला है, पर उन्होंने मेरे विरुद्ध बलवा किया है."(1) और फिर, जहाँ वह कहता है कि ये बालक पराये हैं: "अनजाने बालकों ने मुझ से झूठ बोला है."(2) तब प्रकृति के अनुसार, वे [उसके] बालक हैं, क्योंकि वे ऐसे सृजे गए हैं; पर उनके कामों के विषय, वे उसके बालक नहीं हैं.
3. क्योंकि जैसे, मनुष्यों में, वे पुत्र जो अपने पितरों की आज्ञा नहीं मानते, मीरास से निकाले जाकर, प्रकृति के क्रम में अभी उनके पुत्र हैं, पर व्यवस्था से मीरास से निकाले जाते हैं, क्योंकि वे अपने स्वाभाविक माता-पिता के वारिस नहीं बनते; वैसे ही परमेश्वर के साथ भी है,--जो उसकी आज्ञा नहीं मानते वे उसके द्वारा मीरास से निकाले जाकर, उसके पुत्र रहना छोड़ चुके हैं. इस कारण वे उसकी मीरास नहीं पा सकते: जैसा दाऊद कहता है, "पापी गर्भ से अलग किए गए हैं; उनका क्रोध साँप की समानता पर है."(3) और इसलिये प्रभु ने उन्हें जिन्हें वह मनुष्यों की सन्तान जानता था "साँपों की सन्तान" कहा;(4) क्योंकि इन पशुओं की रीति वे चालाकी से फिरते हैं, और औरों को हानि पहुँचाते हैं. क्योंकि उसने कहा, "फरीसियों के खमीर से और सदूकियों के खमीर से चौकस रहो."(5) हेरोदेस के विषय भी बोलते हुए, वह कहता है, "जाओ और उस लोमड़ी से कहो,"(6) उसकी दुष्ट चतुराई और छल पर निशाना साधते हुए. इस कारण भविष्यद्वक्ता दाऊद कहता है, "मनुष्य, आदर में रखा जाकर, पशुओं के समान बनाया जाता है."(7) और फिर यिर्मयाह कहता है, "वे घोड़ों के समान हो गए हैं, मादाओं के विषय क्रोधित; हर एक अपने पड़ोसी की पत्नी के पीछे हिनहिनाया."(8) और यशायाह, यहूदिया में प्रचार करते हुए, और इस्राएल से विवाद करते हुए, उन्हें "सदोम के हाकिम" और "अमोरा की प्रजा" कहा;(9) यह सूचित करते हुए कि वे दुष्टता में सदोमियों के समान थे, और पापों का वही वर्णन उन में फैला था, उनकी चाल की समानता के कारण उन्हें उसी नाम से पुकारते हुए. और क्योंकि वे स्वभाव से परमेश्वर के द्वारा ऐसे सृजे नहीं गए थे, पर ठीक काम करने की शक्ति भी रखते थे, उसी व्यक्ति ने उन से, उन्हें अच्छी सलाह देते हुए, कहा, "धो लो, अपने आप को शुद्ध करो; मेरी आँखों के सामने अपने प्राणों से अन्याय को दूर करो; अपनी बुराइयों से रुक जाओ."(10) इसलिये, सन्देह नहीं, क्योंकि उन्होंने उसी रीति अपराध किया और पाप किया, वैसे ही उन्होंने वही ताड़ना पाई जैसी सदोमियों ने पाई.
पर जब वे फिरें और मन फिराव में आएँ, और बुराई से रुकें, तब उनके पास परमेश्वर के पुत्र बनने की, और अमरता की वह मीरास पाने की शक्ति होनी चाहिए जो उसके द्वारा दी जाती है. इस कारण, इसलिये, उसने उन्हें "शैतान के स्वर्गदूत," और "दुष्ट की सन्तान,"(11) कहा है जो शैतान की ओर ध्यान देते हैं, और उसके काम करते हैं. पर ये, उसी समय, सब एक ही और उसी परमेश्वर के द्वारा सृजे गए हैं. जब, तौभी, वे विश्वास करते हैं और परमेश्वर के अधीन होते हैं, और आगे बढ़कर उसकी शिक्षा को मानते हैं, वे परमेश्वर के पुत्र हैं; पर जब उन्होंने धर्मत्याग किया है और अपराध में गिरे हैं, वे अपने प्रधान, शैतान पर डाले जाते हैं--उस पर जो पहिले अपने लिये धर्मत्याग का कारण बना, और पीछे औरों के लिये.
4. क्योंकि प्रभु के वचन अनेक हैं, और वे सब एक ही और उसी पिता को, इस जगत के सृजनहार को प्रचार करते हैं, इसलिये उन के निज कारण, बहुत भूलों में फँसे लोगों को बहुत [तर्कों] से खण्डित करना मुझ पर भी भार था, यदि किसी रीति, जब वे बहुत [प्रमाणों] से खण्डित हों, वे सत्य की ओर फिरें और उद्धार पाएँ. पर इस रचना के साथ, आगे आनेवाले में, प्रभु के वचनों के बाद पौलुस की शिक्षा को भी जोड़ना आवश्यक है, इस मनुष्य की धारणा की परीक्षा करने को, प्रेरित को समझाने को, और जो [अंश] पाखण्डियों से अन्य अर्थ पा चुके हैं उन्हें समझाने को, जिन्होंने पौलुस की कही बात को बिलकुल गलत समझा है, और उनकी उन्मत्त धारणाओं की मूर्खता दिखाने को; और उसी पौलुस से, जिस की [रचनाओं] से वे हम पर प्रश्न दबाते हैं, यह सिद्ध करने को कि वे सचमुच झूठ बोलनेवाले हैं, पर प्रेरित सत्य का प्रचारक था, और उसने सत्य के प्रचार के अनुकूल सब बातें सिखाईं; [इस फल के लिये] कि एक ही परमेश्वर पिता था जिसने अब्राहम से बात की, जिसने व्यवस्था दी, जिसने भविष्यद्वक्ताओं को पहले से भेजा, जिसने अन्तिम समयों में अपने पुत्र को भेजा, और अपनी निज कारीगरी पर उद्धार दिया--अर्थात्, देह का तत्त्व. तब, दूसरी पुस्तक में व्यवस्था करते हुए, प्रभु के शेष वचनों को, जो उसने पिता के विषय दृष्टान्तों से नहीं, पर उनके स्पष्ट अर्थ में ली गई उक्तियों से सिखाए (sed simpliciter ipsis dictionibus), और धन्य प्रेरित की पत्रियों की व्याख्या को, मैं, परमेश्वर की सहायता से, झूठ से ज्ञान कहलानेवाले के उजागर करने और खण्डन की पूरी रचना तुझे दूँगा; इस प्रकार सब पाखण्डियों का विरोध रखने के लिये [इन] पाँच पुस्तकों में अपने आप को और तुझे अभ्यास कराते हुए.
इरेनायुस विधर्मों के विरुद्ध
पुस्तक V.
प्रस्तावना.
पिछली चार पुस्तकों में, मेरे अति प्रिय मित्र, जिन्हें मैं ने तेरे लिये रखा, सब पाखण्डी उजागर किए गए हैं, और उनकी शिक्षाएँ ज्योति में लाई गई हैं, और ये मनुष्य खण्डित किए गए हैं जिन्होंने अधर्म के विचार गढ़े हैं. [मैं ने यह उद्धृत करके पूरा किया है] इन मनुष्यों में से हर एक की निज शिक्षा से कुछ, जिसे उन्होंने अपनी रचनाओं में छोड़ा है, और साथ ही अधिक सामान्य स्वभाव के, और उन सब पर लागू होनेवाले तर्कों का उपयोग करके.(1) तब मैं ने सत्य को दिखाया है, और कलीसिया के प्रचार को दिखाया है, जिस की भविष्यद्वक्ताओं ने घोषणा की (जैसा मैं ने पहले ही सिद्ध किया है), पर जिसे मसीह ने सिद्ध किया, और प्रेरितों ने सौंप दिया, जिन से कलीसिया, [इन सत्यों को] पाकर, और सारे जगत में अकेली उन्हें उनकी अखण्डता में सुरक्षित रखकर (bene), उन्हें अपने पुत्रों को सौंप चुकी है.
तब भी--पाखण्डियों के हमारे आगे रखे सब प्रश्नों को निपटाकर, और प्रेरितों की शिक्षा को समझाकर, और उन बहुत सी बातों को स्पष्ट रखकर जो प्रभु ने दृष्टान्तों में कहीं और कीं--मैं, झूठ से ज्ञान कहलानेवाले के उजागर करने और खण्डन के विषय इस पूरी रचना की इस पाँचवीं पुस्तक में, प्रभु की शेष शिक्षा से और प्रेरितीय पत्रियों से प्रमाण दिखाने का यत्न करूँगा: [इस प्रकार] तेरी माँग को पूरा करते हुए, जैसा तू ने मुझ से माँगा (क्योंकि सचमुच मुझे वचन की सेवा में एक स्थान दिया गया है); और पाखण्डियों के विरोधों के विरुद्ध तुझे बड़ा सहाय देने को अपनी शक्ति के हर उपाय से परिश्रम करते हुए, और साथ ही भटकनेवालों को लौटाकर उन्हें परमेश्वर की कलीसिया में फेरने को, उसी समय नए चेलों के मनों को दृढ़ करने को, कि वे पाए हुए विश्वास को स्थिर रखें, जो कलीसिया के द्वारा उसकी अखण्डता में सुरक्षित है, कि वे किसी भी रीति उन से न बिगाड़े जाएँ जो उन्हें झूठी शिक्षाएँ सिखाने का यत्न करते हैं, और उन्हें सत्य से दूर ले जाते हैं. तौभी तुझ पर, और जितने इस लेख को पढ़ने पाएँ उन सब पर, यह भार होगा कि मैं ने पहले ही कही बात को बड़ी ध्यान से पढ़े, कि तू उन विषयों का ज्ञान पाए जिन के विरुद्ध मैं संघर्ष कर रहा हूँ. क्योंकि इस प्रकार तू उन का न्यायसंगत रीति से विरोध करेगा, और उन के विरुद्ध लाए प्रमाणों को ग्रहण करने को तैयार होगा, स्वर्गीय विश्वास के द्वारा उनकी शिक्षाओं को मैल के समान फेंकते हुए; पर एकमात्र सच्चे और स्थिर शिक्षक का अनुसरण करते हुए, परमेश्वर के वचन का, हमारे प्रभु यीशु मसीह का, जिसने अपने अति उत्तम प्रेम के द्वारा वह बन गया जो हम हैं, कि वह हमें वही बनाए जो वह स्वयं है.
अध्याय I.--दैवी बातों को सिखाने और हमें छुड़ाने में केवल मसीह समर्थ है: वही, उसी ने, कुँवारी मरियम से देह ली, केवल दिखावे में नहीं, पर वास्तव में, पवित्र आत्मा की क्रिया से, हमें नया बनाने को. वैलेंटिनुस और एबियन की कल्पनाओं पर आक्षेप.
1. क्योंकि किसी और रीति हम परमेश्वर की बातें नहीं सीख सकते थे, जब तक हमारा गुरु, वचन के रूप में रहते हुए, मनुष्य न बन जाता. क्योंकि किसी और सत्ता के पास पिता की बातों को हम पर प्रगट करने की शक्ति नहीं थी, उसके निज उचित वचन को छोड़. क्योंकि और कौन व्यक्ति "प्रभु की मनसा को जानता था," या और कौन "उसका मन्त्री बना है?"(2) फिर, हम अपने शिक्षक को देखने, और अपने कानों से उसकी वाणी सुनने के सिवा किसी और रीति नहीं सीख सकते थे, कि, उसके कामों के अनुकरण करनेवाले और उसके वचनों के करनेवाले बनकर, हम उसकी संगति रखें, सिद्ध से, और जो सारी सृष्टि से पहले है उससे वृद्धि पाते हुए. हम--जो केवल उत्तम और भली सत्ता के द्वारा, और उसके द्वारा भी जिसके पास अमरता का दान है, हाल ही में सृजे गए थे, पश्चात् बनाए गए
उसकी समानता (पहले से ठहराए गए, पिता की पूर्वज्ञान के अनुसार, कि हम, जिन का अभी अस्तित्व नहीं था, अस्तित्व में आएँ), और सृष्टि के प्रथम फल बनाए गए(1)--पहले से जानें हुए समयों में, [उद्धार के आशीष] पाए हैं, वचन की सेवा के अनुसार, जो सब बातों में सिद्ध है, सामर्थी वचन के रूप में, और सचमुच मनुष्य, जिसने हमें अपने निज लहू से बुद्धि के अनुकूल रीति छुड़ाकर, अपने आप को उन के लिये छुटकारा दिया जो बन्धुआई में ले जाए गए थे. और क्योंकि धर्मत्याग ने हम पर अन्याय से अत्याचार किया, और, यद्यपि हम स्वभाव से सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सम्पत्ति थे, हमें स्वभाव के विरुद्ध अलग किया, हमें अपने निज चेले बनाते हुए, परमेश्वर का वचन, सब बातों में सामर्थी, और अपने निज न्याय के विषय दोषरहित, उस धर्मत्याग के विरुद्ध धर्म से फिर गया, और उस से अपनी निज सम्पत्ति को छुड़ाया, बल के उपायों से नहीं, जैसा [धर्मत्याग] ने आरम्भ में हम पर प्रभुता पाई थी, जब उसने जो उसका नहीं था उसे अतृप्त होकर छीन लिया, पर समझाने के द्वारा, जैसा एक मन्त्रणा के परमेश्वर को शोभा देता है, जो जो वह चाहता है उसे पाने को बल के उपाय नहीं करता; कि न न्याय का उल्लंघन हो, न परमेश्वर की प्राचीन कारीगरी नाश को जाए. क्योंकि प्रभु ने इस प्रकार अपने निज लहू के द्वारा हमें छुड़ाया है, हमारी प्राणों के लिये अपनी प्राण देकर, और हमारी देह के लिये अपनी देह,(2) और परमेश्वर और मनुष्य के मेल और संगति के लिये पिता की आत्मा को भी उण्डेला है, आत्मा के द्वारा सचमुच मनुष्यों को परमेश्वर देता हुआ, और दूसरी ओर, अपने निज देहधारण के द्वारा मनुष्य को परमेश्वर से जोड़ता हुआ, और अपने आने पर हमें परमेश्वर की संगति के द्वारा अमरता को स्थायी और सच्ची रीति देता हुआ,--पाखण्डियों की सब शिक्षाएँ नाश को गिरती हैं.
2. सचमुच व्यर्थ हैं वे जो आरोप करते हैं कि वह केवल दिखावे में दिखाई दिया. क्योंकि ये बातें केवल दिखावे में नहीं की गईं, पर वास्तविक सत्य में. पर यदि वह मनुष्य के रूप में दिखाई दिया, जब वह मनुष्य नहीं था, तो पवित्र आत्मा उस पर विश्राम नहीं कर सकती थी,--एक घटना जो सचमुच हुई--क्योंकि आत्मा अदृश्य है; और न, [उस दशा में], उस में सत्य की कोई मात्रा थी, क्योंकि वह वह नहीं था जो वह दिखता था. पर मैं पहले ही टिप्पणी कर चुका हूँ कि अब्राहम और अन्य भविष्यद्वक्ताओं ने उसे भविष्यद्वाणी की रीति से देखा, दर्शन में जो होनेवाला था उसे पहले कहकर. यदि, तब, ऐसी सत्ता अब उस से भिन्न बाहरी रूप में दिखाई दी है जो वह वास्तव में था, तो मनुष्यों को एक भविष्यद्वाणी का दर्शन दिया गया है; और उसके दूसरे आगमन की बाट जोहनी होगी, जिस में वह ऐसा होगा जैसा वह अब भविष्यद्वाणी की रीति से देखा गया है. और मैं पहले ही सिद्ध कर चुका हूँ, कि यह कहना कि वह केवल बाहरी दिखावे में दिखाई दिया, और [यह दृढ़ करना] कि उसने मरियम से कुछ नहीं पाया, एक ही बात है. क्योंकि वह सचमुच देह और लहू रखनेवाला नहीं होता, जिन से उसने हमें छुड़ाया, जब तक उसने आदम की प्राचीन रचना को अपने में समेट न लिया होता. इसलिये वैलेंटिनुस के चेले व्यर्थ हैं जो यह मत रखते हैं, कि वे देह को उद्धार से निकाल दें, और जो परमेश्वर ने गढ़ा है उसे फेंक दें.
3. एबियोनी भी व्यर्थ हैं, जो विश्वास से अपनी प्राण में परमेश्वर और मनुष्य के मेल को ग्रहण नहीं करते, पर जो [स्वाभाविक] जन्म के पुराने खमीर में बने रहते हैं, और जो समझना नहीं चुनते कि पवित्र आत्मा मरियम पर आया, और परमप्रधान की सामर्थ्य ने उस पर छाया की:(3) इस कारण जो उत्पन्न हुआ वह पवित्र वस्तु है, और सब के पिता परमप्रधान परमेश्वर का पुत्र, जिसने इस सत्ता का देहधारण किया, और एक नई [प्रकार की] उत्पत्ति को दिखाया; कि जैसे पूर्व उत्पत्ति से हम ने मृत्यु की मीरास पाई, वैसे इस नई उत्पत्ति से हम जीवन की मीरास पाएँ. इसलिये ये मनुष्य स्वर्गीय दाखरस के मिश्रण को अस्वीकार करते हैं,(4) और चाहते हैं कि वह केवल जगत का जल हो, परमेश्वर को ऐसा ग्रहण नहीं करते कि उस से मेल हो, पर वे उस आदम में बने रहते हैं जो जीता गया था और परमदेश से निकाला गया था: यह नहीं विचारते कि जैसे, आदम में हमारी रचना के आरम्भ में, परमेश्वर से निकली वह जीवन की श्वास, गढ़ी हुई वस्तु से मिलकर, मनुष्य को सजीव किया, और उसे बुद्धि से सम्पन्न सत्ता के रूप में प्रगट किया; वैसे ही, अन्त [के समयों] में, पिता का वचन और परमेश्वर की आत्मा, आदम की रचना के प्राचीन तत्त्व से मिलकर, मनुष्य को जीवित और सिद्ध बनाया, सिद्ध पिता को ग्रहण करनेवाला, कि जैसे स्वाभाविक [आदम] में हम सब मरे थे, वैसे आत्मिक में हम सब जिलाए जाएँ.(5) क्योंकि किसी भी समय आदम परमेश्वर की हानियों(6) से नहीं बचा, जिस से पिता ने बोलकर कहा, "आओ, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता पर बनाएँ." और इसी कारण अन्तिम समयों में (fine), देह की इच्छा से नहीं, न मनुष्य की इच्छा से, पर पिता की सुइच्छा से,(7) उसके हाथों ने एक जीवित मनुष्य को गढ़ा, कि आदम परमेश्वर के स्वरूप और समानता के अनुसार [फिर] सृजा जाए.
अध्याय II.--जब मसीह ने अपने अनुग्रह में हमें देखा, वह उस वस्तु के पास नहीं आया जो उसकी नहीं थी: और, हमारे लिये अपना सच्चा लहू बहाकर, और यूखरिस्त में हमें अपनी सच्ची देह दिखाकर, उसने हमारी देह को उद्धार की सामर्थ्य दी.
1. और वैसे ही व्यर्थ हैं वे जो कहते हैं कि
परमेश्वर उन वस्तुओं के पास आया जो उसकी नहीं थीं, मानो दूसरे की सम्पत्ति का लोभी; कि वह उस मनुष्य को, जो दूसरे के द्वारा सृजा गया था, उस परमेश्वर को सौंप दे जिसने न कुछ बनाया न गढ़ा, पर जो आरम्भ से ही मनुष्यों की अपनी निज उचित रचना से वंचित भी था. इसलिये, जिस को ये मनुष्य औरों की वस्तुओं के पास आता बताते हैं उसका आगमन धर्मी नहीं था; और न उसने अपने निज लहू से हमें सचमुच छुड़ाया, यदि वह सचमुच मनुष्य नहीं बना, अपनी निज कारीगरी को वह लौटाते हुए जो आरम्भ में [उसके विषय] कहा गया था, कि मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप और समानता के अनुसार बनाया गया; दूसरे की सम्पत्ति को युक्ति से छीनते हुए नहीं, पर अपनी निज वस्तु को धर्मी और अनुग्रहपूर्ण रीति अपने अधिकार में लेते हुए. धर्मत्याग की ओर से, सचमुच, वह अपने निज लहू से हमें उससे धर्म से छुड़ाता है; पर हमारे विषय में जो छुड़ाए गए हैं, [वह यह करता है] अनुग्रह से. क्योंकि हम ने उसे पहले कुछ नहीं दिया, और न वह हम से कुछ चाहता है, मानो उसे उसकी आवश्यकता हो; पर हमें उसकी संगति की आवश्यकता है. और इसी कारण उसने अनुग्रह से अपने आप को उण्डेला, कि वह हमें पिता की गोद में इकट्ठा करे.
2. पर हर प्रकार से व्यर्थ हैं वे जो परमेश्वर के सारे प्रबन्ध को तुच्छ जानते हैं, और देह के उद्धार को नहीं मानते, और उसके नए जन्म को तुच्छ जानते हैं, यह मानकर कि वह अविनाशिता के योग्य नहीं. पर यदि यह सचमुच उद्धार न पाए, तो न प्रभु ने अपने लहू से हमें छुड़ाया, न यूखरिस्त का कटोरा उसके लहू की संगति है, न वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं उसके शरीर की संगति है.(1) क्योंकि लहू केवल नसों और मांस से आ सकता है, और जो कुछ और मनुष्य के तत्त्व को बनाता है, जैसा परमेश्वर का वचन सचमुच बनाया गया. अपने निज लहू से उसने हमें छुड़ाया, जैसा उसका प्रेरित भी घोषित करता है, "जिस में हमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा मिला है, अर्थात् पापों की क्षमा."(2) और जैसे हम उसके अंग हैं, वैसे ही हम सृष्टि के द्वारा भी पोषित होते हैं (और वह स्वयं हमें सृष्टि देता है, क्योंकि वह अपने सूर्य को उदय करता है, और जब वह चाहता है वर्षा भेजता है(3)). उसने कटोरे को (जो सृष्टि का एक भाग है) अपने निज लहू के रूप में माना है, जिस से वह हमारे लहू को सींचता है; और रोटी को (सृष्टि का एक भाग भी) उसने अपने निज शरीर के रूप में स्थिर किया है, जिस से वह हमारे शरीरों को वृद्धि देता है.(4)
3. इसलिये, जब मिलाया हुआ कटोरा और बनाई हुई रोटी परमेश्वर के वचन को पाती है, और मसीह के लहू और शरीर का यूखरिस्त बनता है,(5) जिन वस्तुओं से हमारी देह का तत्त्व बढ़ता और सम्भाला जाता है, वे कैसे दृढ़ कर सकते हैं कि देह परमेश्वर के दान को, जो अनन्त जीवन है, ग्रहण करने में असमर्थ है, जो [देह] प्रभु के शरीर और लहू से पोषित होती है, और उसकी एक अंग है?--जैसा धन्य पौलुस इफिसियों के नाम अपनी पत्री में घोषित करता है, कि "हम उसके शरीर के, उसके मांस के, और उसकी हड्डियों के अंग हैं."(6) वह ये वचन किसी आत्मिक और अदृश्य मनुष्य के विषय नहीं कहता, क्योंकि आत्मा के न हड्डियाँ हैं न मांस;(7) पर [वह संकेत करता है] उस प्रबन्ध की ओर [जिस से प्रभु बना] एक वास्तविक मनुष्य, मांस, और स्नायुओं, और हड्डियों से बना,- -वह [मांस] जो उसके लहू रूपी कटोरे से पोषित होता है, और उसकी देह रूपी रोटी से वृद्धि पाता है.
और जैसे दाखलता से काटा हुआ टुकड़ा भूमि में लगाया जाकर अपने समय में फलता है, या जैसे गेहूँ का एक दाना भूमि में गिरकर सड़ जाता है, और सब कुछ धारण करनेवाली परमेश्वर की आत्मा के द्वारा बहुत वृद्धि के साथ उठता है, और तब, परमेश्वर की बुद्धि के द्वारा, मनुष्यों के उपयोग में आता है, और परमेश्वर का वचन पाकर, यूखरिस्त बन जाता है, जो मसीह का शरीर और लहू है; वैसे ही हमारे शरीर, उससे पोषित होकर, और भूमि में रखे जाकर, और वहाँ सड़न सहकर, अपने ठहराए समय पर उठेंगे, परमेश्वर का वचन उन्हें परमेश्वर की महिमा के लिये, पिता के लिये भी, पुनरुत्थान देता हुआ, जो इस मर्त्य को अमरता, और इस नाशवान को अविनाशिता उदारता से देता है,(8) क्योंकि परमेश्वर का बल निर्बलता में सिद्ध होता है,(9) कि हम कभी फूल न जाएँ, मानो हमें अपने आप से जीवन मिला हो, और परमेश्वर के विरुद्ध ऊँचे होकर, हमारे मन कृतघ्न हो जाएँ; पर अनुभव से सीखकर कि हम इस सत्ता की उत्तम शक्ति से अनन्त स्थिरता रखते हैं, अपनी निज प्रकृति से नहीं, हम न उस महिमा को कम जानें जो परमेश्वर को जैसा वह है घेरे रहती है, न अपनी प्रकृति से अनजान रहें, पर यह जानें कि परमेश्वर क्या कर सकता है, और मनुष्य कौन से लाभ पाता है, और इस प्रकार बातों के जैसा वे हैं सच्चे ज्ञान से कभी न भटकें, अर्थात् परमेश्वर के विषय में भी और मनुष्य के विषय में भी. और क्या ऐसा न हो, कदाचित्, जैसा मैं पहले ही देख चुका हूँ, कि इसी उद्देश्य से परमेश्वर ने हमें मरणशीलता की सामान्य धूलि में गल जाने दिया,(10) कि हम हर रीति से सिखाए जाकर, भविष्य के लिये सब बातों में ठीक हों, न परमेश्वर से अनजान और न अपने आप से?
अध्याय III.--परमेश्वर की शक्ति और महिमा मानव देह की निर्बलता में चमकती है, क्योंकि वह हमारे शरीर को पुनरुत्थान और अमरता का भागी बनाएगा, यद्यपि उसने उसे पृथ्वी की धूलि से गढ़ा है; वह उस पर अमरता के भोग को भी देगा, जैसे वह उसे प्राण के साथ यह छोटा जीवन देता है.
1. प्रेरित पौलुस ने, और भी, अत्यन्त स्पष्ट रीति से दिखाया है कि मनुष्य अपनी निज दुर्बलता के हाथ सौंपा गया है, कहीं वह ऊँचा होकर सत्य से गिर न जाए. इस प्रकार वह कुरिन्थियों के नाम दूसरी [पत्री] में कहता है: "और कहीं प्रकटीकरणों की ऊँचाई से मैं फूल न जाऊँ, मुझे देह में एक काँटा दिया गया, शैतान का दूत कि मुझे घूँसे मारे. और इस पर मैं ने प्रभु से तीन बार विनती की, कि वह मुझ से दूर हो जाए. पर उसने मुझ से कहा, मेरा अनुग्रह तेरे लिये पर्याप्त है; क्योंकि बल निर्बलता में सिद्ध होता है. इसलिये मैं आनन्द से दुर्बलताओं पर और भी घमण्ड करूँगा, कि मसीह की सामर्थ्य मुझ में वास करे."(1) तो क्या? (जैसा कुछ लोग पुकार सकते हैं:) क्या प्रभु ने, उस दशा में, चाहा कि उसके प्रेरित इस प्रकार घूँसे सहें, और वह ऐसी दुर्बलता सहे? ऐसा ही हुआ; वचन यह कहता है. क्योंकि बल निर्बलता में सिद्ध होता है, उसे बेहतर मनुष्य बनाते हुए जो अपनी दुर्बलता के द्वारा परमेश्वर की सामर्थ्य को जान लेता है. क्योंकि मनुष्य कैसे सीखता कि वह स्वयं दुर्बल है, और स्वभाव से मर्त्य, पर परमेश्वर अमर और सामर्थी है, जब तक उसने अनुभव से न सीखा होता कि दोनों में क्या है? क्योंकि सहन से अपनी दुर्बलताओं को सीखने में कुछ बुरा नहीं; हाँ, बल्कि, इसका यह लाभ भी है कि वह अपनी प्रकृति के विषय अनुचित मत न बनाए (non aberrare in natura sua). पर परमेश्वर के विरुद्ध ऊँचा होना, और उसकी महिमा को अपने लिये लेना, मनुष्य को कृतघ्न बनाते हुए, उस पर बहुत बुराई लाया है. [और इस प्रकार, मैं कहता हूँ, मनुष्य को दोनों बातें अनुभव से सीखनी चाहिए], कि वह अपने प्रति या अपने सृजनहार के प्रति सत्य और प्रेम से रहित न रहे.(2) पर दोनों का अनुभव उसे परमेश्वर और मनुष्य के विषय सच्चा ज्ञान देता है, और परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बढ़ाता है.
अब, जहाँ प्रेम की वृद्धि है, वहाँ जो उससे प्रेम करते हैं उनके लिये परमेश्वर की सामर्थ्य से बड़ी महिमा रची जाती है.
2. इसलिये वे मनुष्य परमेश्वर की सामर्थ्य को अलग रखते हैं, और वचन जो घोषित करता है उस पर विचार नहीं करते, जब वे देह की दुर्बलता पर टिकते हैं, पर उसे मरे हुओं में से जिलानेवाले की सामर्थ्य को विचार में नहीं लेते. क्योंकि यदि वह जो मर्त्य है उसे जिलाता नहीं, और नाशवान को अविनाशिता में वापस नहीं लाता, तो वह सामर्थ्य का परमेश्वर नहीं है. पर कि वह इन सब बातों में सामर्थी है, हमें अपने मूल से देखना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ने पृथ्वी से धूलि लेकर मनुष्य को गढ़ा. और निश्चय यह बहुत अधिक कठिन और अविश्वसनीय है, अस्तित्वहीन हड्डियों, और स्नायुओं, और शिराओं, और मनुष्य के शेष संगठन से, यह सब होने देना, और मनुष्य को सजीव और बुद्धिमान सृष्टि बनाना, उस से जो सृजा जाकर पीछे मिट्टी में गल गया था उसे फिर जोड़ना (पहले कही गई कारणों से), इस प्रकार उन [तत्त्वों] में जा चुका होने के बाद जिन से मनुष्य, जिसका पहले अस्तित्व नहीं था, गढ़ा गया. क्योंकि जिसने आरम्भ में उसे अस्तित्व दिया जिसका अभी अस्तित्व नहीं था, जब उसे अच्छा लगा, वह और भी अधिक उन्हें फिर स्थापित करेगा जिन का पूर्व अस्तित्व था, जब उसकी इच्छा हो [कि वे] उसके दिए जीवन को [मीरास में पाएँ]. और वह देह भी परमेश्वर की सामर्थ्य को पाने के योग्य और समर्थ पाई जाएगी, जिसने आरम्भ में परमेश्वर की निपुण स्पर्शों को पाया; इसलिये एक भाग देखने के लिये आँख बना; दूसरा, सुनने के लिये कान; दूसरा, छूने और काम करने के लिये हाथ; दूसरा, सर्वत्र तनी हुई नसें, और अंगों को एक साथ पकड़े हुए; दूसरा, धमनियाँ और शिराएँ, लहू और वायु के मार्ग;(3) दूसरा, विविध भीतरी अंग; दूसरा, लहू, जो प्राण और शरीर के बीच एकता का बन्ध है. पर [इस ढँग में] आगे क्यों चलें?
मानव ढाँचे के भागों की बहुलता को व्यक्त करने को संख्याएँ चूक जाएँगी, जो परमेश्वर की बड़ी बुद्धि के सिवा किसी और रीति नहीं बनाया गया. पर जो वस्तुएँ परमेश्वर की निपुणता और बुद्धि में भागी होती हैं, वे उसकी सामर्थ्य में भी भागी होती हैं.
3. इसलिये देह परमेश्वर की रचना की बुद्धि और सामर्थ्य में [भागी होने से] रहित नहीं है. पर यदि जीवन देनेवाले की सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है--अर्थात् देह में--तो वे हमें बताएँ, जब वे देह को परमेश्वर के दिए जीवन को पाने में असमर्थ मानते हैं, क्या वे ये बातें इस समय जीवित मनुष्यों के रूप में, और जीवन के भागी होकर कहते हैं, या मानते हैं कि, जीवन में कुछ भी भाग न रखते हुए, वे इस वर्तमान क्षण में मरे हुए मनुष्य हैं. और यदि वे सचमुच मरे हुए मनुष्य हैं, तो वे कैसे घूमते हैं, और बोलते हैं, और वे अन्य कार्य करते हैं जो मरे हुओं के काम नहीं, पर जीवितों के? पर यदि वे अब जीवित हैं, और यदि उनका सारा शरीर जीवन में भागी है, तो वे यह दावा करने का साहस कैसे कर सकते हैं कि देह quali-
fled जीवन का भागी होने के योग्य, जब वे मानते हैं कि इस वर्तमान क्षण में उनके पास जीवन है? यह ऐसा ही है मानो कोई पानी से भरा स्पन्ज, या जलती मशाल उठाए, और घोषित करे कि स्पन्ज पानी में भागी नहीं हो सकता, या मशाल आग में. इसी रीति वे मनुष्य, यह आरोप करके कि वे जीवित हैं और अपने अंगों में जीवन लिए फिरते हैं, पीछे अपने आप का विरोध करते हैं, जब वे इन अंगों को जीवन [पाने] के योग्य नहीं बताते हैं. पर यदि वर्तमान कालिक जीवन, जो अनन्त जीवन से इतना निकृष्ट स्वभाव का है, तौभी इतना कर सकता है कि हमारे मर्त्य अंगों को जिलाए, तो अनन्त जीवन, इस से बहुत अधिक सामर्थी होकर, देह को क्यों न जिलाए, जिसने पहले ही जीवन से बातचीत की है, और जीवन को सहने की आदत डाली है? क्योंकि देह सचमुच जीवन में भागी हो सकती है, यह उसके तथ्य से दिखता है; जीवित होने से; क्योंकि वह जीवित रहती है, जब तक परमेश्वर का उद्देश्य है कि वह ऐसा करे. यह भी प्रगट है कि परमेश्वर के पास उस पर जीवन देने की शक्ति है, क्योंकि वह हमें जो अस्तित्व में हैं जीवन देता है. और, इसलिये, क्योंकि प्रभु के पास जो उसने गढ़ा है उस में जीवन भरने की शक्ति है, और क्योंकि देह जिलाई जाने के योग्य है, उसकी अविनाशिता में भागी होने को रोकने को क्या शेष है, जो परमेश्वर का दिया हुआ आनन्दपूर्ण और कभी न अन्त होनेवाला जीवन है?
अध्याय IV.--वे लोग धोखा खाते हैं जो जगत के सृजनहार के अतिरिक्त दूसरे परमेश्वर पिता का बहाना करते हैं; क्योंकि वह दुर्बल और निकम्मा रहा होगा, नहीं तो दुष्ट और डाह से भरा, यदि वह हमारी देहों को बाहरी जीवन बढ़ाने में या असमर्थ है या अनिच्छुक.
1. जो व्यक्ति सृजनहार से परे दूसरे पिता के अस्तित्व का ढोंग करते हैं, और उसे अच्छा परमेश्वर कहते हैं, वे अपने आप को धोखा देते हैं; क्योंकि वे उसे दुर्बल, निकम्मा, और लापरवाह प्राणी बनाकर भीतर लाते हैं, दुष्ट और डाह से भरा हुआ तो कहें ही नहीं, क्योंकि वे दृढ़ करते हैं कि हमारी देहें उसके द्वारा नहीं जिलाई जातीं। क्योंकि जब वे उन वस्तुओं के विषय कहते हैं जिन का सब को प्रगट है कि वे अमर बनी रहती हैं, जैसे आत्मा और प्राण, और ऐसी और वस्तुएँ, कि वे पिता के द्वारा जिलाई जाती हैं, पर दूसरी वस्तु [अर्थात् देह], जो परमेश्वर के उसे [जीवन] देने से भिन्न रीति से नहीं जिलाई जाती, जीवन से छोड़ दी जाती है,--[उन्हें मानना होगा] कि यह उनके पिता को दुर्बल और शक्तिहीन सिद्ध करता है, या फिर डाह करनेवाला और दुष्ट। क्योंकि सृजनहार यहाँ भी हमारी मर्त्य देहों को जिलाता है, और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उन्हें पुनरुत्थान की प्रतिज्ञा करता है, जैसा मैं ने दिखाया है; [उस दशा में] कौन अधिक सामर्थी, बलवान, या सचमुच अच्छा दिखाया जाता है? क्या वह सृजनहार है जो पूरे मनुष्य को जिलाता है, या उनका पिता, जो झूठ से ऐसा कहलाता है? वह उन वस्तुओं को जिलानेवाले का ढोंग करता है जो स्वभाव से अमर हैं, जिन वस्तुओं के पास जीवन उनके ही स्वभाव से सदा रहता है; पर जो वस्तुएँ जीवित रहने के लिये उसकी सहायता माँगती थीं उन्हें वह कृपा से नहीं जिलाता, पर उन्हें लापरवाही से मृत्यु के अधिकार में गिरने देता है। तब क्या ऐसा है कि उनका पिता, जब उसके पास ऐसा करने की शक्ति है, उन्हें जीवन नहीं देता, या यह कि उसके पास शक्ति नहीं? यदि, एक ओर, यह इस कारण है कि वह कर नहीं सकता, तो उस कल्पना पर वह सामर्थी प्राणी नहीं, और न वह सृजनहार से अधिक सिद्ध है; क्योंकि सृजनहार, जैसा हमें समझना है, वह देता है जो उनका पिता दे नहीं सकता।
पर यदि, दूसरी ओर, [वह यह नहीं देता] जब उसके पास ऐसा करने की शक्ति है, तब वह अच्छा नहीं, पर डाह करनेवाला और दुष्ट पिता सिद्ध होता है।
2. यदि, फिर, वे कोई कारण बताएँ जिस के कारण उनका पिता देहों को जीवन नहीं देता, तब वह कारण अवश्य पिता से श्रेष्ठ दिखाई दे, क्योंकि वह उसे उसकी कृपा के काम से रोकता है; और उसकी कृपा इस प्रकार दुर्बल सिद्ध होगी, उस कारण के कारण जिसे वे आगे लाते हैं। अब प्रत्येक को समझना है कि देहें जीवन पाने के योग्य हैं। क्योंकि वे उतने तक जीवित रहती हैं जितना परमेश्वर चाहता है कि वे जीवित रहें; और ऐसा होने पर, [मिथ्याशिक्षक] यह नहीं रख सकते कि [ये देहें] जीवन पाने से सर्वथा असमर्थ हैं। इसलिए, यदि आवश्यकता के कारण और किसी और कारण से, वे [देहें] जो जीवन में भागी होने के योग्य हैं जिलाई नहीं जातीं, तो उनका पिता आवश्यकता और उस कारण का दास होगा, और इसलिए स्वतन्त्र कर्ता नहीं, जिसकी इच्छा उसके अपने वश में हो।
अध्याय पाँच.--प्राचीनों की दीर्घ आयु, एलिय्याह का और हनोक का अपनी ही देहों में उठाया जाना, तथा योना का, शद्रक, मेशक, और अबेदनगो का घोर संकट के बीच सुरक्षित रहना, स्पष्ट प्रमाण हैं कि परमेश्वर हमारी देहों को अनन्त जीवन के लिये उठा सकता है।
1. [जानने के लिये] कि देहें दीर्घ काल तक अस्तित्व में बनी रहीं, जब तक परमेश्वर की सुइच्छा थी कि वे फूलें, [ये मिथ्याशिक्षक] पवित्रशास्त्र पढ़ें, और वे पाएँगे कि हमारे पूर्वज सात सौ, आठ सौ, और नौ सौ वर्ष की आयु से आगे बढ़े; और उनकी देहें उनके दिनों की लम्बी अवधि के साथ चलती रहीं, और जब तक परमेश्वर ने चाहा कि वे जीवित रहें तब तक जीवन में भागी रहीं। पर मैं इन मनुष्यों का उल्लेख क्यों करूँ? क्योंकि हनोक, जब उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया, उसी देह में उठा लिया गया जिस में उसने उसे प्रसन्न किया था, इस प्रकार धर्मियों के उठाए जाने को पहले से दिखाते हुए। एलिय्याह भी, [जब वह अभी] [स्वाभाविक] रूप के पदार्थ में था, ऊपर उठा लिया गया; इस प्रकार भविष्यवाणी में दिखाते हुए उस
आत्मिक लोगों के ऊपर उठाए जाने को, और यह कि उनकी देह के उठाए जाने और ऊपर उठा लिए जाने के मार्ग में कुछ न रुका। क्योंकि उन्हीं हाथों के द्वारा जिन से वे आरम्भ में गढ़े गए थे, उन्होंने यह उठाया जाना और ऊपर लिया जाना पाया। क्योंकि आदम में परमेश्वर के हाथ अपनी ही कारीगरी को क्रम में रखने, उस पर राज्य करने, और उसे सम्भालने, और उसे ले जाकर जहाँ वे चाहते थे वहाँ रखने के अभ्यस्त हो गए थे। तब, पहला मनुष्य कहाँ रखा गया? निश्चय परमदेश में, जैसा पवित्रशास्त्र प्रगट करता है "और परमेश्वर ने अदन में पूर्व की ओर एक बारी [परदीसुम] लगाई, और वहाँ उसने उस मनुष्य को रखा जिसे उसने रचा था।"(1) और फिर बाद में जब [मनुष्य] अवज्ञाकारी सिद्ध हुआ, वह वहाँ से इस जगत में निकाल दिया गया। इसलिए प्रेरितों के चेले जो प्राचीन थे हम से कहते हैं कि जो उठाए गए वे उस स्थान को पहुँचाए गए (क्योंकि परमदेश धर्मियों के लिये तैयार किया गया है, ऐसे जिनके पास आत्मा है; जिस स्थान में पौलुस प्रेरित भी, जब वह ऊपर उठा लिया गया, ऐसे वचन सुने जो हमारी वर्तमान दशा में हमारे विषय में अकथनीय हैं(2)), और जो उठाए लिए गए हैं वे [सब वस्तुओं के] पूरा होने तक वहाँ रहेंगे, अमरता के एक पूर्व रूप के रूप में।
2. यदि, तथापि, कोई कल्पना करे कि मनुष्यों का इतनी लम्बी अवधि तक जीवित रहना असम्भव है, और एलियास देह में ऊपर नहीं उठाया गया, पर उसकी देह आग के रथ में भस्म हो गई, तो वह विचार करे कि योना, जब वह गहरे में डाल दिया गया, और मछली के पेट में निगल लिया गया, परमेश्वर की आज्ञा से फिर भूमि पर सुरक्षित बाहर फेंक दिया गया।(3) और फिर, जब अननियास, अजर्यास, और मीशाएल सात गुना तपाई हुई आग की भट्ठी में डाले गए, उन्हें कुछ भी हानि न हुई, और न उन पर आग की गन्ध जानी गई। इसलिए, जैसे परमेश्वर का हाथ उनके साथ था, उनके विषय में अद्भुत बातें कर रहा था--[बातें] मनुष्य के स्वभाव से [पूरी होना] असम्भव--क्या आश्चर्य था, यदि उन के विषय में भी जो उठाए गए उसने कुछ अद्भुत किया, परमेश्वर की, वरन् पिता की, इच्छा के अधीन काम करते हुए? अब यह परमेश्वर का पुत्र है, जैसा पवित्रशास्त्र राजा नबूकदनेस्सर को कहते हुए दिखाता है, "क्या हम ने तीन मनुष्यों को बान्धकर भट्ठी में नहीं डाला? और देखो, मैं आग के बीच चार को चलते देखता हूँ, और चौथा परमेश्वर के पुत्र के समान है।"(4) इसलिए न किसी सृजी हुई वस्तु का स्वभाव, न देह की दुर्बलता, परमेश्वर की इच्छा पर प्रबल हो सकती है। क्योंकि परमेश्वर सृजी हुई वस्तुओं के अधीन नहीं, पर सृजी हुई वस्तुएँ परमेश्वर के अधीन हैं; और सब वस्तुएँ उसकी इच्छा की आज्ञा मानती हैं।
इसलिए प्रभु भी प्रगट करता है, "जो बातें मनुष्यों से असम्भव हैं, वे परमेश्वर से सम्भव हैं।"(5) इसलिए, जैसे वर्तमान दिन के मनुष्यों को, जो परमेश्वर की नियुक्ति को नहीं जानते, यह अविश्वसनीय और असम्भव बात लग सकती है कि कोई मनुष्य इतने वर्ष जीवित रहे, तौभी जो हम से पहले थे वे [ऐसी आयु तक] जीवित रहे, और जो उठाए गए वे आनेवाले दिनों की लम्बाई के बयाने के रूप में जीवित हैं; और [जैसे यह भी असम्भव लग सकता था] कि मछली के पेट से और आग की भट्ठी से मनुष्य बिना चोट बाहर निकले, तौभी वे ऐसे ही निकले, मानो परमेश्वर के हाथ से बाहर निकाले गए, उसकी सामर्थ्य को प्रगट करने के लिये: वैसे ही अब, यद्यपि कुछ लोग, परमेश्वर की सामर्थ्य और प्रतिज्ञा को न जानते हुए, अपने ही उद्धार का विरोध कर सकते हैं, यह असम्भव समझते हुए कि परमेश्वर, जो मरे हुओं को जिलाता है, उन्हें अनन्त अवधि देने की शक्ति रखे, तौभी इस प्रकार के मनुष्यों का सन्देह परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को व्यर्थ नहीं करेगा।
अध्याय छह.--परमेश्वर मनुष्य के पूरे स्वभाव पर उद्धार देगा, जो देह और प्राण की घनिष्ठ एकता से बना है, क्योंकि वचन ने उसे अपने ऊपर लिया, और पवित्र आत्मा के वरदानों से सजाया गया, जिसके मन्दिर हमारे शरीर हैं, और मन्दिर कहलाते हैं।
1. अब परमेश्वर अपनी हाथ की कारीगरी में महिमा पाएगा, उसे अपने ही पुत्र के अनुरूप और उसके नमूने पर गढ़ा हुआ बनाने के योग्य करके। क्योंकि पिता के हाथों से, अर्थात् पुत्र से और पवित्र आत्मा से, मनुष्य, और [केवल] मनुष्य का एक भाग नहीं, परमेश्वर की समानता में बनाया गया। अब प्राण और आत्मा निश्चय मनुष्य का एक भाग हैं, पर निश्चय मनुष्य नहीं; क्योंकि सिद्ध मनुष्य उस प्राण के मिलन और एकता में है जो पिता का आत्मा पाता है, और उस मांसल स्वभाव के मिश्रण में है जो परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार गढ़ा गया। इस कारण प्रेरित प्रगट करता है, "सिद्धों के बीच हम ज्ञान की बातें करते हैं,"(6) उन व्यक्तियों को "सिद्ध" कहता है जिन्होंने परमेश्वर का आत्मा पाया है, और जो परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सब भाषाओं में बोलते हैं, जैसा वह आप भी बोलता था। वैसे ही हम कलीसिया में बहुत भाइयों को भी सुनते हैं, जिनके पास भविष्यवाणी के वरदान हैं, और जो आत्मा के द्वारा सब प्रकार की भाषाएँ बोलते हैं, और मनुष्यों की छिपी बातों को सामान्य लाभ के लिये उजियाले में लाते हैं, और परमेश्वर के भेद प्रगट करते हैं, जिन्हें प्रेरित "आत्मिक" भी कहता है, वे आत्मिक हैं क्योंकि वे आत्मा में भागी हैं, और इस कारण नहीं कि उनकी देह उतारकर हटा दी गई है, और वे केवल आत्मिक हो गए हैं। क्योंकि यदि कोई उस sub-
stance मांस का, अर्थात्, [परमेश्वर की] हाथ की कारीगरी का, हटाए, और जो केवल आत्मिक है उसे समझे, तो ऐसा आत्मिक मनुष्य न होगा, पर मनुष्य की आत्मा होगा, या परमेश्वर का आत्मा। पर जब यहाँ प्राण के साथ मिली हुई आत्मा [परमेश्वर की] हाथ की कारीगरी से जुड़ती है, आत्मा के उण्डेले जाने के कारण मनुष्य आत्मिक और सिद्ध बनाया जाता है, और यही वह है जो परमेश्वर के स्वरूप और समानता में बनाया गया। पर यदि आत्मा प्राण को न हो, जो ऐसा है वह निश्चय पशु-स्वभाव का है, और मांसल छोड़ दिया जाकर, एक अपूर्ण प्राणी होगा, अपनी गढ़ाई में (इन प्लास्माते) [परमेश्वर का] स्वरूप तो रखता है, पर आत्मा के द्वारा समानता नहीं पाता; और इस प्रकार यह प्राणी अपूर्ण है। इस प्रकार भी, यदि कोई स्वरूप को हटाए और हाथ की कारीगरी को एक ओर रखे, तब वह इसे मनुष्य के रूप में नहीं समझ सकता, पर या तो मनुष्य का कोई भाग, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, या मनुष्य से कुछ और। क्योंकि जो मांस गढ़ा गया है वह अपने आप में सिद्ध मनुष्य नहीं, पर मनुष्य की देह, और मनुष्य का भाग। प्राण भी, अपने आप अलग गिना जाए, मनुष्य नहीं; पर वह मनुष्य का प्राण है, और मनुष्य का भाग। आत्मा भी मनुष्य नहीं, क्योंकि वह आत्मा कहलाता है, मनुष्य नहीं; पर इन सब का मिलना और एक होना सिद्ध मनुष्य को बनाता है।
और इस कारण प्रेरित, अपने को समझाते हुए, यह स्पष्ट करता है कि बचाया हुआ मनुष्य पूरा मनुष्य भी है और आत्मिक मनुष्य भी; थिस्सलुनीकियों के नाम पहली पत्री में इस प्रकार कहते हुए, "अब शान्ति का परमेश्वर तुम्हें सिद्ध (पेर्फेक्तोस) पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा, और प्राण, और देह प्रभु यीशु मसीह के आने तक शिकायत के बिना पूरी सुरक्षित रहें।"(1) अब इन तीनों के--अर्थात्, प्राण, देह, और आत्मा--प्रभु के आने तक सुरक्षित रहने के लिये प्रार्थना करने में उसका उद्देश्य क्या था, जब तक वह तीनों के [आनेवाले] फिर से जुड़ने और एक होने को न जानता हो, और [यह कि वे] एक ही उद्धार के [वारिस हों]? इस कारण वह यह भी प्रगट करता है कि वे "सिद्ध" हैं जो तीन [घटक भागों] को अपराध के बिना प्रभु के आगे रखते हैं। तब, वे सिद्ध हैं जिन में परमेश्वर का आत्मा बना रहा है, और जिन्होंने अपने प्राण और देह निर्दोष सुरक्षित रखे हैं, परमेश्वर के विश्वास को दृढ़ पकड़े हुए, अर्थात् वह विश्वास जो परमेश्वर की ओर [फेरा गया] है, और अपने पड़ोसियों के प्रति धर्मी व्यवहार बनाए हुए।
2. इसी से वह यह भी कहता है कि यह हाथ की कारीगरी "परमेश्वर का मन्दिर" है, इस प्रकार प्रगट करते हुए: "क्या तुम नहीं जानते कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है? इसलिए यदि कोई मनुष्य परमेश्वर के मन्दिर को अशुद्ध करेगा, उसे परमेश्वर नाश करेगा: क्योंकि परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, जो [मन्दिर] तुम हो।"(2) यहाँ वह स्पष्ट प्रगट करता है कि देह वह मन्दिर है जिस में आत्मा वास करता है। जैसा प्रभु अपने विषय में भी कहता है, "इस मन्दिर को गिरा दो, और तीन दिन में मैं उसे उठाऊँगा। पर उसने यह कहा," कहा गया है, "अपनी देह के मन्दिर के विषय में।"(3) और वह (प्रेरित) केवल हमारी देहों को मन्दिर नहीं मानता, वरन् मसीह का मन्दिर भी, कुरिन्थियों से इस प्रकार कहते हुए, "क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी देहें मसीह के अंग हैं? तो क्या मैं मसीह के अंगों को लेकर उन्हें एक वेश्या के अंग बनाऊँ?"(4) वह ये बातें किसी और आत्मिक मनुष्य के विषय में नहीं कहता; क्योंकि ऐसे स्वभाव का प्राणी वेश्या से कुछ लेना-देना नहीं रख सकता: पर वह प्रगट करता है कि "हमारी देह," अर्थात् वह मांस जो पवित्रता और शुद्धता में बनी रहती है, "मसीह के अंग" है; पर जब वह एक वेश्या के साथ एक हो जाती है, वह वेश्या के अंग हो जाती है। और इस कारण उसने कहा, "यदि कोई मनुष्य परमेश्वर के मन्दिर को अशुद्ध करे, उसे परमेश्वर नाश करेगा।" तब यह कैसे अत्यन्त निन्दा नहीं कि कहा जाए, परमेश्वर का मन्दिर, जिस में पिता का आत्मा वास करता है, और मसीह के अंग, उद्धार में भागी नहीं होते, पर नाश में घटा दिए जाते हैं? यह भी, कि हमारी देहें अपने ही पदार्थ से नहीं, पर परमेश्वर की सामर्थ्य से उठाई जाती हैं, वह कुरिन्थियों से कहता है, "अब देह व्यभिचार के लिये नहीं, पर प्रभु के लिये है, और प्रभु देह के लिये। पर परमेश्वर ने प्रभु को भी जिलाया है, और अपनी ही सामर्थ्य से हमें जिलाएगा।"(5)
अध्याय सात.--क्योंकि मसीह हमारी देह में जी उठा, इससे निकलता है कि हम भी उसी में उठाए जाएँगे; क्योंकि हमें किया गया पुनरुत्थान का वचन स्वभाव से अमर आत्माओं पर नहीं लगाया जाना चाहिए, पर अपने आप में मर्त्य देहों पर।
1. इसलिए, उसी रीति से, जैसे मसीह मांस के पदार्थ में जी उठा, और अपने चेलों को कीलों का चिह्न और अपनी पसली में का छेद दिखाया(6) (ये उस मांस के चिह्न हैं जो मरे हुओं में से जी उठा), "वैसे वह भी," कहा गया है, "अपनी ही सामर्थ्य से हमें जिलाएगा।"(7) और फिर रोमियों से वह कहता है, "पर यदि उसका आत्मा जिसने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में वास करे, तो जिसने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया वह तुम्हारी मर्त्य देहों को भी जिलाएगा।"(8) तब, मर्त्य देहें क्या हैं? क्या वे प्राण हो सकते हैं? नहीं, क्योंकि मर्त्य देहों से तुलना करने पर प्राण अशरीरी हैं; क्योंकि परमेश्वर ने "मनुष्य के मुख में जीवन का श्वास फूँका, और मनुष्य जीवित प्राण बन गया।" अब जीवन का श्वास एक अशरीरी
वस्तु है। और निश्चय वे यह नहीं रख सकते कि जीवन का श्वास ही मर्त्य है। इसलिए दाऊद कहता है, "मेरा प्राण भी उसके लिये जीवित रहेगा,"(1) मानो उसका पदार्थ अमर हो। दूसरी ओर, वे यह भी नहीं कह सकते कि आत्मा मर्त्य देह है। इसलिए "मर्त्य देह" शब्द को लगाने के लिये क्या शेष है, वह वस्तु छोड़ जो गढ़ी गई, अर्थात् मांस, जिसके विषय यह भी कहा गया है कि परमेश्वर उसे जिलाएगा? क्योंकि यही वह है जो मरता और सड़ता है, प्राण या आत्मा नहीं। क्योंकि मरना जीवन-शक्ति को खोना है, और इसके बाद श्वासरहित, निर्जीव, और गतिरहित हो जाना, और उन [घटक भागों] में पिघल जाना जिन से [उसके] पदार्थ का आरम्भ भी निकला। पर यह घटना न प्राण को होती है, क्योंकि वह जीवन का श्वास है; न आत्मा को, क्योंकि आत्मा सरल है और मिला हुआ नहीं, इसलिए वह विघटित नहीं हो सकता, और वही उन का जीवन है जो उसे पाते हैं। इसलिए हमें निश्चय करना है कि मृत्यु मांस के विषय में कही गई है; जो [मांस], प्राण के चले जाने के बाद, श्वासरहित और निर्जीव हो जाता है, और धीरे-धीरे उस मिट्टी में सड़ जाता है जिस से वह लिया गया था। तब, यही मर्त्य है। और इसी के विषय वह यह भी कहता है, "वह तुम्हारी मर्त्य देहों को भी जिलाएगा।" और इसलिए उसके विषय वह कुरिन्थियों के नाम पहली [पत्री] में कहता है: "मरे हुओं का पुनरुत्थान भी ऐसा ही है: वह नाश में बोया जाता है, अविनाश में जी उठता है।"(2) क्योंकि वह प्रगट करता है, "जो तू बोता है वह नहीं जिलाया जा सकता, जब तक पहले वह न मरे।"(3)
2. पर वह क्या है जो, गेहूँ के दाने के समान, मिट्टी में बोया जाता है और सड़ता है, वे देहें छोड़ जो मिट्टी में रखी जाती हैं, जिन में बीज भी डाले जाते हैं? और इस कारण उसने कहा, "वह अनादर में बोया जाता है, महिमा में जी उठता है।"(4) क्योंकि मरे हुए मांस से अधिक नीच क्या है? या, दूसरी ओर, जब वही उठता है और अविनाश में भागी होता है तब उससे अधिक महिमामय क्या है? "वह निर्बलता में बोया जाता है, सामर्थ्य में उठाया जाता है:"(5) निश्चय अपनी ही निर्बलता में, क्योंकि मिट्टी होने से वह मिट्टी को जाता है; पर परमेश्वर की सामर्थ्य से [वह जिलाया जाता है], जो उसे मरे हुओं में से उठाता है। "वह प्राणिक देह होकर बोया जाता है, आत्मिक देह होकर जी उठता है।"(6) उसने, सब सन्देह से परे, सिखाया है कि ऐसी भाषा उसके द्वारा न प्राण के विषय में, न आत्मा के विषय में काम में लाई गई, पर उन देहों के विषय में जो शव बन गई हैं। क्योंकि ये प्राणिक देहें हैं, अर्थात् [देहें] जो जीवन में भागी हैं, जिसे जब वे खो देती हैं, मृत्यु के वश हो जाती हैं; फिर, आत्मा के साधन से उठकर, वे आत्मिक देहें बन जाती हैं, ताकि आत्मा के द्वारा वे नित्य जीवन रखें। "क्योंकि अब," वह कहता है, "हम थोड़ा जानते हैं, और थोड़ा भविष्यवाणी करते हैं, पर तब आमने-सामने।"(7) और यही वह है जो पतरस ने भी कहा है: "जिस को तुम ने नहीं देखा, उस से प्रेम करते हो; जिस पर अब भी, न देखते हुए, विश्वास करते हो; और विश्वास करते हुए, अकथनीय आनन्द से आनन्द करोगे।"(8) क्योंकि हमारा मुख प्रभु का मुख देखेगा? और अकथनीय आनन्द से आनन्द करेगा,--अर्थात्, जब वह अपने ही आनन्द को देखेगा।
अध्याय आठ.--पवित्र आत्मा के वरदान जो हम पाते हैं हमें अविनाश के लिये तैयार करते हैं, हमें आत्मिक बनाते हैं, और हमें मांसल मनुष्यों से अलग करते हैं। ये दो वर्ग व्यवस्था के प्रबन्ध में शुद्ध और अशुद्ध पशुओं के द्वारा सूचित हैं।
1. पर अब हम उसकी आत्मा का एक भाग पाते हैं, सिद्धता की ओर झुकता हुआ, और हमें अविनाश के लिये तैयार करता हुआ, थोड़ा थोड़ा करके परमेश्वर को पाने और सहने का अभ्यस्त होता हुआ; जिसे प्रेरित "बयाना" भी कहता है, अर्थात् उस सम्मान का एक भाग जिस की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने हम से की है, जहाँ वह इफिसियों के नाम पत्री में कहता है, "जिस में तुम भी, सत्य का वचन, अपने उद्धार का सुसमाचार, सुनकर, जिस पर विश्वास करते हुए हम प्रतिज्ञा के पवित्र आत्मा से मुहरबन्द किए गए हैं, जो हमारी मीरास का बयाना है।"(10) इसलिए यह बयाना, इस प्रकार हम में वास करता हुआ, अब भी हमें आत्मिक बनाता है, और मर्त्य अमरता के द्वारा निगल लिया जाता है।(11) "क्योंकि तुम," वह प्रगट करता है, "देह में नहीं, पर आत्मा में हो, यदि परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करे।"(12) पर यह देह को फेंक देने से नहीं होता, पर आत्मा के दिए जाने से। क्योंकि जिन को वह लिख रहा था वे देह के बिना न थे, पर वे थे जिन्होंने परमेश्वर का आत्मा पाया था, "जिस से हम पुकारते हैं, अब्बा, पिता।"(13) इसलिए, यदि इस वर्तमान समय में, बयाना रखकर, हम पुकारते हैं, "अब्बा, पिता," तो क्या होगा जब, फिर जी उठकर, हम उसे आमने-सामने देखेंगे; जब सब अंग जय के निरन्तर गीत में फूट पड़ेंगे, उसे महिमा देते हुए जिसने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया, और अनन्त जीवन का वरदान दिया? क्योंकि यदि बयाना, मनुष्य को अपने में समेटकर, अब भी उसे पुकारने देता है, "अब्बा, पिता," तो आत्मा का पूरा अनुग्रह क्या करेगा, जो मनुष्यों को परमेश्वर के द्वारा दिया जाएगा? वह हमें उसके समान बनाएगा, और पिता की इच्छा(14) को पूरा करेगा; क्योंकि वह मनुष्य को परमेश्वर के स्वरूप और समानता के अनुसार बनाएगा।
2. तब, उन व्यक्तियों को, जिनके पास आत्मा का बयाना है, और जो देह की अभिलाषाओं के दास नहीं, पर आत्मा के अधीन हैं, और जो सब बातों में बुद्धि के प्रकाश के अनुसार चलते हैं, प्रेरित उचित रीति से "आत्मिक" कहता है, क्योंकि परमेश्वर का आत्मा उन में वास करता है। अब, आत्मिक मनुष्य अशरीरी आत्माएँ नहीं होंगे; पर हमारा पदार्थ, अर्थात् देह और आत्मा का मेल, परमेश्वर का आत्मा पाकर, आत्मिक मनुष्य को बनाता है। पर जो निश्चय आत्मा की सलाह को ठुकराते हैं, और मांसल अभिलाषाओं के दास हैं, और बुद्धि के विरुद्ध जीवन बिताते हैं, और जो, बिना रोक के, अपनी ही इच्छाओं में सिर के बल कूदते हैं, ईश्वरीय आत्मा की लालसा न रखते हुए, वे सूअरों और कुत्तों की रीति से जीवित रहते हैं; इन मनुष्यों को, [मैं कहता हूँ], प्रेरित बहुत उचित रीति से "मांसल" कहता है, क्योंकि उन्हें मांसल बातों को छोड़ और किसी बात का विचार नहीं।
3. उसी कारण भविष्यद्वक्ता भी उन्हें निर्बुद्धि पशुओं से तुलना करते हैं, उनकी चाल की निर्बुद्धिता के कारण, कहते हुए, "वे मादाओं के लिये भड़के घोड़ों के समान हो गए हैं; उन में से प्रत्येक अपने पड़ोसी की पत्नी के पीछे हिनहिनाता है।"(1) और फिर, "मनुष्य, जब वह सम्मान में था, पशुओं के समान बनाया गया।"(2) यह सूचित करता है कि, अपनी ही गलती से, वह पशुओं के समान गिना जाता है, उनके निर्बुद्धि जीवन से होड़ करके। और हम भी, जैसा रिवाज है, इस प्रकार के मनुष्यों को पशु और निर्बुद्धि जानवर कहते हैं।
4. अब व्यवस्था ने इन सब को रूपक से पहले कहा है, मनुष्य को [नाना] पशुओं के द्वारा चित्रित करते हुए:(3) इन में से जिन के, [पवित्रशास्त्र] कहता है, दो खुर हों और जो जुगाली करें, उन्हें वह शुद्ध प्रगट करती है; पर उन में से जिन के पास इन [गुणों] में से एक या दूसरा नहीं, उन्हें वह अशुद्ध जानकर b अपने आप को एक ओर रखती है। तब शुद्ध कौन हैं? वे जो विश्वास से स्थिरता के साथ पिता और पुत्र की ओर अपना मार्ग बनाते हैं; क्योंकि यह उन के स्थिर रहने से सूचित है जो खुर को बाँटते हैं; और वे परमेश्वर के वचनों पर दिन रात ध्यान करते हैं,(4) कि वे अच्छे कामों से सजे रहें: क्योंकि जुगाली करनेवालों का अर्थ यही है। पर अशुद्ध वे हैं जो न खुर बाँटते हैं न जुगाली करते हैं; अर्थात् वे व्यक्ति जिन का न परमेश्वर पर विश्वास है, न वे उसके वचनों पर ध्यान करते हैं: और अन्यजातियों की घृणा ऐसी ही है। पर उन पशुओं के विषय जो निश्चय जुगाली तो करते हैं, पर दो खुर नहीं रखते, और आप अशुद्ध हैं, उन में हमें यहूदियों का रूपक वर्णन मिलता है, जिन के मुख में निश्चय परमेश्वर के वचन हैं, पर जो पिता में और पुत्र में अपनी जड़ की स्थिरता नहीं जमाते; इसलिए वे एक अस्थिर पीढ़ी हैं। क्योंकि जिन पशुओं का खुर एक ही टुकड़े में है वे सहज फिसलते हैं; पर जिन का खुर बँटा है वे अधिक पक्के पाँव के हैं, वे आगे बढ़ते समय उनके कटे खुर एक के बाद एक आते हैं, और एक खुर दूसरे को सम्भालता है।
वैसे ही, वे भी अशुद्ध हैं जिन के दो खुर हैं पर जो जुगाली नहीं करते: यह स्पष्ट सब मिथ्याशिक्षकों का, और उन का संकेत है जो परमेश्वर के वचनों पर ध्यान नहीं करते, और न धर्म के कामों से सजे हैं; जिन से प्रभु भी कहता है, "तुम मुझे प्रभु, प्रभु, क्यों कहते हो, और जो बातें मैं तुम से कहता हूँ उन्हें नहीं करते?"(5) क्योंकि इस प्रकार के मनुष्य निश्चय कहते हैं कि वे पिता और पुत्र पर विश्वास करते हैं, पर वे परमेश्वर की बातों पर जैसा चाहिए कभी ध्यान नहीं करते, और न धर्म के कामों से सजे हैं; पर, जैसा मैं पहले देख चुका हूँ, उन्होंने सूअरों और कुत्तों के जीवन अपना लिए हैं, अपने को गन्दगी, पेटूपन, और हर प्रकार की लापरवाही के सौंपते हुए। इसलिए न्याय से, प्रेरित ने ऐसे सब को "मांसल" और "प्राणिक" कहा,(6)--[अर्थात् वे सब], जो अपने ही अविश्वास और विलास से ईश्वरीय आत्मा को नहीं पाते, और अपनी नाना अवस्थाओं में अपने से जीवन देनेवाले वचन को east बाहर निकालते हैं, और अपनी ही अभिलाषाओं के पीछे मूर्खता से चलते हैं: भविष्यद्वक्ताओं ने भी, उनके विषय बोझ के पशुओं और वन-पशुओं के रूप में कहा; रिवाज ने भी उन्हें पशुओं और निर्बुद्धि प्राणियों की दृष्टि से देखा है; और व्यवस्था ने उन्हें अशुद्ध ठहराया है।
अध्याय नौ.--दिखाते हुए कि प्रेरित का वह अंश जिसे मिथ्याशिक्षक बिगाड़ते हैं, कैसे समझा जाए; अर्थात्, "मांस और लहू परमेश्वर के राज्य को नहीं रखेंगे।"
1. प्रेरित के द्वारा प्रगट की गई और [सच्चाइयों] के बीच, यह भी है, "कि मांस और लहू परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं हो सकते।"(7) यही [वह अंश] है जिसे सब मिथ्याशिक्षक अपनी मूर्खता के सहारे लाते हैं, हमें सताने के यत्न के साथ, और यह दिखाने के लिये कि परमेश्वर की हाथ की कारीगरी बचाई नहीं जाती। वे इस बात को विचार में नहीं लेते कि तीन वस्तुएँ हैं जिन से, जैसा मैं ने दिखाया है, पूरा मनुष्य बना है--मांस, प्राण, और आत्मा। इन में से एक निश्चय [मनुष्य को] सुरक्षित रखता और गढ़ता है--यह आत्मा है; और दूसरे के विषय वह जुड़ा और रचा जाता है--वह मांस है; फिर [आती है] जो इन दोनों के बीच है--वह प्राण है, जो कभी निश्चय, जब वह आत्मा के पीछे चलता है, उसके द्वारा ऊपर उठाया जाता है, पर कभी वह मांस के साथ सहानुभूति करता है, और मांसल अभिलाषाओं में गिरता है। तब, वे, जितने भी हों, जिनके पास वह नहीं जो [हमें] [अनन्त] जीवन में बचाता और गढ़ता है, वे [केवल] मांस और लहू होंगे, और कहलाएँगे; क्योंकि ये ही वे हैं
जिनके अपने में परमेश्वर का आत्मा नहीं। इसलिए इस प्रकार के मनुष्य प्रभु के द्वारा "मरे हुए" कहे जाते हैं; क्योंकि, वह कहता है, "मरे हुओं को अपने मरे हुओं को गाड़ने दो,"(1) क्योंकि उनके पास वह आत्मा नहीं जो मनुष्य को जिलाता है।
2. दूसरी ओर, जितने परमेश्वर से डरते हैं और उसके पुत्र के आगमन पर भरोसा रखते हैं, और जो विश्वास के द्वारा अपने हृदयों में परमेश्वर के आत्मा को स्थिर करते हैं,--ऐसे मनुष्य उचित रीति से "शुद्ध," और "आत्मिक," और "परमेश्वर के लिये जीवित" कहलाएँगे, क्योंकि वे पिता का आत्मा रखते हैं, जो मनुष्य को शुद्ध करता है, और उसे परमेश्वर के जीवन तक उठाता है। क्योंकि जैसे प्रभु ने गवाही दी है कि "मांस दुर्बल है," वैसे [वह यह भी कहता है] कि "आत्मा तैयार है।"(2) क्योंकि यह पिछला अपनी ही सलाह को पूरा करने के योग्य है। इसलिए, यदि कोई आत्मा के तैयार झुकाव को मांस की दुर्बलता के लिये मानो एक उत्तेजना के रूप में मिलाए, तो अवश्य निकलता है कि जो बलवान है वह दुर्बल पर प्रबल होगा, ताकि मांस की दुर्बलता आत्मा के बल में समा जाए; और जिस मनुष्य में यह होता है वह उस दशा में मांसल नहीं हो सकता, पर आत्मिक, आत्मा की संगति के कारण। इसलिए ऐसा ही है कि शहीद अपनी गवाही देते हैं, और मृत्यु को तुच्छ जानते हैं, मांस की दुर्बलता के अनुसार नहीं, पर आत्मा की तैयारी के कारण। क्योंकि जब मांस की दुर्बलता समा ली जाती है, वह आत्मा को सामर्थी दिखाती है; और फिर, जब आत्मा [मांस की] दुर्बलता को अपने में समेटता है, वह मांस को अपने में मीरास के रूप में रखता है, और इन दोनों से एक जीवित मनुष्य बनता है,--निश्चय जीवित, क्योंकि वह आत्मा में भागी है, पर मनुष्य, मांस के पदार्थ के कारण।
3. इसलिए मांस, जब वह परमेश्वर के आत्मा से रहित है, मरा हुआ है, जीवन न रखता, और परमेश्वर के राज्य को नहीं रख सकता: [वह] निर्बुद्धि लहू है, भूमि पर उण्डेले हुए जल के समान। और इसलिए वह कहता है, "जैसा मिट्टी का है, वैसे ही मिट्टी के हैं।"(3) पर जहाँ पिता का आत्मा है, वहाँ जीवित मनुष्य है; [वहाँ है] बुद्धिमान लहू, [उसे बहानेवालों के] पलटा लेने के लिये परमेश्वर के द्वारा सुरक्षित; [वहाँ है] आत्मा के वश का मांस, निश्चय अपनी वस्तु को भूलता हुआ, और आत्मा के गुण को अपनाता हुआ, परमेश्वर के वचन के अनुरूप बनाया जाता हुआ। और इस कारण वह (प्रेरित) प्रगट करता है, "जैसे हम ने मिट्टी के स्वरूप को पहना है, वैसे ही स्वर्ग से आनेवाले के स्वरूप को भी पहनेंगे।"(4) इसलिए, मिट्टी का क्या है? जो गढ़ा गया। और स्वर्ग का क्या है? आत्मा। इसलिए जैसे वह कहता है, जब हम स्वर्गीय आत्मा से रहित थे, हम पहले के समयों में मांस के पुरानेपन में चले, परमेश्वर की आज्ञा न मानते हुए; वैसे अब हम, आत्मा को पाकर, जीवन की नई रीति में चलें, परमेश्वर की आज्ञा मानते हुए। इसलिए, क्योंकि परमेश्वर के आत्मा के बिना हम बचाए नहीं जा सकते, प्रेरित विश्वास और पवित्र चाल के द्वारा परमेश्वर के आत्मा को सुरक्षित रखने के लिये हमें उकसाता है, कहीं ऐसा न हो कि, ईश्वरीय आत्मा में भागी न रहकर, हम स्वर्ग का राज्य खो दें; और वह पुकारता है, कि मांस अपने आप में, और लहू, राज्य परमेश्वर को नहीं रख सकते।
4. यदि, तथापि, हमें कड़ाई से बोलना है, [हम कहेंगे कि] मांस वारिस नहीं होता, पर वारिस किया जाता है; जैसा प्रभु भी प्रगट करता है, "धन्य हैं नम्र, क्योंकि वे पृथ्वी को मीरास करके रखेंगे;"(5) मानो [आनेवाले] राज्य में, वह पृथ्वी, जहाँ से हमारे मांस का पदार्थ है, मीरास करके रखी जानी है। मन्दिर (अर्थात्, मांस) के शुद्ध रहने की उसकी इच्छा का कारण यही है, कि परमेश्वर का आत्मा उस में आनन्द करे, जैसे दूल्हा दुल्हन के साथ। इसलिए, जैसे दुल्हन विवाह करती [कही नहीं जा सकती], पर उसका विवाह होता है, जब दूल्हा आता है और उसे ले लेता है, वैसे ही मांस अपने आप परमेश्वर के राज्य को मीरास करके नहीं रख सकता; पर वह परमेश्वर के राज्य में मीरास के लिये लिया जा सकता है। क्योंकि एक जीवित व्यक्ति मृतक की सम्पत्ति का वारिस होता है; और वारिस होना एक बात है, वारिस किया जाना दूसरी। पहला राज्य करता है, और वारिस की हुई वस्तुओं पर अधिकार चलाता है, और अपनी इच्छा से उन्हें क्रम देता है; पर पिछली वस्तुएँ अधीन दशा में हैं, क्रम के अधीन हैं, और उस के द्वारा राज्य की जाती हैं जिसने मीरास पाई है। इसलिए, जीवित क्या है? निस्सन्देह परमेश्वर का आत्मा। फिर, मृतक की सम्पत्तियाँ क्या हैं? निश्चय मनुष्य के नाना भाग, जो पृथ्वी में सड़ते हैं। पर ये आत्मा के द्वारा वारिस किए जाते हैं जब वे स्वर्ग के राज्य में पहुँचाए जाते हैं। इस कारण मसीह भी मरा। कि सुसमाचार की वाचा प्रगट होकर सारे जगत को जान पड़े, पहले स्थान में उसके दासों को स्वतन्त्र करे; और फिर बाद में, जैसा मैं पहले दिखा चुका हूँ, जब आत्मा उन्हें मीरास करके रखे, उन्हें उसकी सम्पत्ति के वारिस ठहराए। क्योंकि जो जीवित है वह वारिस होता है, पर मांस वारिस किया जाता है।
कि हम उस आत्मा को खोकर जीवन न खो दें जो हमें रखता है, प्रेरित, हमें आत्मा की सहभागिता के लिये उकसाते हुए, बुद्धि के अनुसार, पहले उद्धृत उन वचनों में कहा है, "कि मांस और लहू परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं हो सकते।" मानो वह कहे, "भूल न करना; क्योंकि जब तक परमेश्वर का वचन तुम्हारे साथ न वास करे, और पिता का आत्मा तुम में न हो, और यदि तुम हलके और लापरवाह जीवन बिताओगे मानो तुम केवल यही हो, अर्थात् केवल मांस और लहू, तुम परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं हो सकते।"
अध्याय दस.--जंगली जैतून के वृक्ष से खींची गई तुलना के द्वारा, जिस की कलम से गुण बदलता है पर स्वभाव नहीं, वह अधिक महत्वपूर्ण बातें सिद्ध करता है; वह यह भी दिखाता है कि मनुष्य आत्मा के बिना फल लाने, या परमेश्वर के राज्य के वारिस होने के योग्य नहीं।
1. इसलिए यह सत्य, [वह प्रगट करता है], कि हम मांस को पालते हुए आत्मा की कलम को न ठुकराएँ। "पर तू, जंगली जैतून का वृक्ष होकर," वह कहता है, "अच्छे जैतून में कलम लगाया गया है, और जैतून की चिकनाई में भागी बनाया गया है।" इसलिए, जब जंगली जैतून कलम लगाया गया हो, यदि वह अपनी पहिले की दशा में रहे, अर्थात् जंगली जैतून, वह "काटा जाता है, और आग में डाला जाता है;"(2) पर यदि वह कलम को प्रसन्नता से ले, और अच्छे जैतून में बदल जाए, वह फलवाला जैतून बन जाता है, मानो राजा की वाटिका में (परदीसो) लगाया गया: वैसे ही मनुष्य, यदि वे सचमुच विश्वास से अच्छी बातों की ओर आगे बढ़ें, और परमेश्वर का आत्मा पाएँ, और उसका फल लाएँ, आत्मिक होंगे, परमेश्वर के परमदेश में लगाए हुए होकर। पर यदि वे आत्मा को निकाल दें, और अपनी पहिले की दशा में रहें, आत्मा के होने से अधिक मांस के होने की इच्छा रखते हुए, तब इस प्रकार के मनुष्यों के विषय में बहुत न्याय से कहा जाता है, "कि मांस और लहू परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे;"(3) मानो कोई कहे कि जंगली जैतून परमेश्वर के परमदेश में ग्रहण नहीं किया जाता। इसलिए प्रेरित मांस और लहू और जंगली जैतून के विषय अपनी बात में हमारी प्रकृति को, और परमेश्वर की सार्वभौमिक नियुक्ति को, अति उत्तम रीति से दिखाता है। क्योंकि जैसे अच्छा जैतून, कुछ समय के लिये उपेक्षित रहे, जंगली होकर बढ़ने को छोड़ दिया जाए और I लकड़ी की ओर दौड़े, तो वह आप जंगली जैतून बन जाता है; या फिर, यदि जंगली जैतून यत्न से पाला जाए और कलम लगाया जाए, वह स्वभाव से अपनी पहिले की फलवाली दशा को लौटता है: वैसे ही मनुष्य भी, जब वे लापरवाह हो जाते हैं, और लकड़ी की उपज के समान मांस की अभिलाषाओं को फल लाते हैं, अपनी ही गलती से, धर्म में निष्फल बनाए जाते हैं।
क्योंकि जब मनुष्य सोते हैं, शत्रु जंगली दानों का पदार्थ बोता है;(4) और इस कारण प्रभु ने अपने चेलों को जागते रहने की आज्ञा दी।(5) और फिर, वे व्यक्ति जो धर्म के फल नहीं ला रहे, और मानो झाड़ियों में ढककर खो गए हैं, यदि वे यत्न करें, और परमेश्वर के वचन को कलम के रूप में ग्रहण करें,(6) मनुष्य की आदि प्रकृति तक पहुँचते हैं--वह जो परमेश्वर के स्वरूप और समानता के अनुसार सृजी गई थी।
2. पर कलम लगाया हुआ जंगली जैतून निश्चय अपनी लकड़ी का पदार्थ नहीं खोता, पर अपने फल का गुण बदलता है, और दूसरा नाम पाता है, अब जंगली जैतून नहीं, पर फलवाला जैतून होकर, और ऐसा कहलाता है; वैसे ही, जब मनुष्य विश्वास से कलम लगाया जाता है और परमेश्वर का आत्मा पाता है, वह निश्चय मांस का पदार्थ नहीं खोता, पर [लाए हुए, अर्थात्,] अपने कामों के फल का गुण बदलता है, और दूसरा नाम पाता है,(7) दिखाते हुए कि वह भले के लिये बदल गया है, अब [केवल] मांस और लहू नहीं, पर आत्मिक मनुष्य होकर, और ऐसा कहलाता है। फिर, जैसे जंगली जैतून, यदि कलम न लगाया जाए, अपनी लकड़ी के गुण के कारण अपने स्वामी के लिये निष्फल रहता है, और फल न लानेवाले वृक्ष के समान काटा जाता है, और आग में डाला जाता है; वैसे ही मनुष्य भी, यदि वह विश्वास के द्वारा आत्मा की कलम न पाए, अपनी पुरानी दशा में रहता है, और [केवल] मांस और लहू होकर, वह परमेश्वर के राज्य का वारिस नहीं हो सकता। इसलिए प्रेरित ठीक प्रगट करता है, "मांस और लहू परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं हो सकते;"(8) और, "जो देह में हैं वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते:"(9) [इन वचनों से] मांस के पदार्थ को न ठुकराते हुए, पर दिखाते हुए कि उस में आत्मा उण्डेला जाना चाहिए।(10) और इस कारण, वह कहता है, "इस मर्त्य को अमरता पहननी है, और इस नाशवान को अविनाश पहनना है।"(11) और फिर वह प्रगट करता है, "पर तुम देह में नहीं, पर आत्मा में हो, यदि परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करे।"(12) वह इसे और भी स्पष्ट रखता है, जहाँ वह कहता है, "देह निश्चय पाप के कारण मरी हुई है; पर आत्मा जीवन है, धर्म के कारण।
पर यदि उसका आत्मा जिसने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में वास करे, तो जिसने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया वह तुम्हारी मर्त्य देहों को भी जिलाएगा, क्योंकि उसका आत्मा तुम में वास करता है।"(13) और फिर वह कहता है, रोमियों के नाम पत्री में, "क्योंकि यदि तुम देह के अनुसार जीवित रहो, तो मरोगे।"(14) [अब इन वचनों से] वह उन्हें देह में अपना जीवन बिताने से मना नहीं करता, क्योंकि जब उसने उन्हें लिखा तब वह आप देह में था; पर वह देह की उन अभिलाषाओं को काट देता है, जो मनुष्य पर मृत्यु लाती हैं। और इस कारण वह आगे कहते हुए कहता है, "पर यदि तुम आत्मा के द्वारा देह के कामों को मारोगे, तो जीवित रहोगे। क्योंकि जितने परमेश्वर के आत्मा के द्वारा चलाए जाते हैं, वे परमेश्वर के पुत्र हैं।"
अध्याय ग्यारह.--मांसल और आत्मिक व्यक्तियों के कामों पर विचार करता है; यह भी, कि आत्मिक शुद्धता हमारी देहों के पदार्थ पर नहीं, पर हमारे पहले के जीवन की रीति पर लगाई जानी है।
1. [प्रेरित], अविश्वासियों के दुष्ट भाषणों को पहले देखकर, विस्तार किया है उन
कामों का जिन्हें वह मांसल कहता है; और वह अपने को समझाता है, कहीं उसके अर्थ को बेईमानी से बिगाड़नेवालों के लिये सन्देह का स्थान न रह जाए, गलातियों के नाम पत्री में इस प्रकार कहते हुए: "अब देह के काम प्रगट हैं, जो हैं व्यभिचार, वेश्याकर्म, अशुद्धता, विलास, मूर्तिपूजा, टोना,(1) बैर, झगड़े डाह, क्रोध, होड़, शत्रुता, चिढ़ की बातें, फूट, मिथ्याशिक्षाएँ, डाह करना, पियक्कड़पन, लीलाक्रीड़ा, और ऐसी ही बातें; जिन के विषय मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ, जैसा मैं ने तुम्हें चेतावनी भी दी है, कि ऐसे काम करनेवाले परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे।"(2) इस प्रकार वह अपने सुननेवालों को अधिक स्पष्ट रीति से दिखाता है कि वह क्या है [जब वह प्रगट करता है], "मांस और लहू परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।" क्योंकि जो ये काम करते हैं, क्योंकि वे निश्चय देह के पीछे चलते हैं, उनके पास परमेश्वर के लिये जीवित रहने की शक्ति नहीं। और फिर, वह हमें उन आत्मिक कामों को बताने आगे बढ़ता है जो मनुष्य को जिलाते हैं, अर्थात् आत्मा की कलम; इस प्रकार कहते हुए, "पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज, भलाई, कृपा, विश्वास, नम्रता, संयम, पवित्रता है: इन के विरुद्ध कोई व्यवस्था नहीं।"(3) इसलिए, जैसे जो अच्छी बातों की ओर आगे बढ़ा है, और आत्मा का फल लाया है, आत्मा की सहभागिता के कारण सर्वथा बचाया जाता है; वैसे ही जो ऊपर कही हुई देह की कामों में बना रहा, सचमुच मांसल गिना जाकर, क्योंकि उसने परमेश्वर का आत्मा नहीं पाया, वह स्वर्ग के राज्य का वारिस होने की शक्ति न रखेगा। फिर, वही प्रेरित गवाही देता है, कुरिन्थियों से कहते हुए, "क्या तुम नहीं जानते कि अधर्मी परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे?
भूल न करना," वह कहता है: "न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न व्यभिचारी, न स्त्रैण, न अपने आप को पुरुषों के साथ दुरुपयोग करनेवाले, न चोर, न लोभी, न गाली देनेवाले, न अपहारी, परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे। और ये निश्चय तुम थे; पर तुम धोए गए हो, पर तुम पवित्र किए गए हो, पर तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम में, और हमारे परमेश्वर के आत्मा में धर्मी ठहराए गए हो।"(4) वह अति स्पष्ट रीति से दिखाता है कि किन बातों के द्वारा मनुष्य नाश को जाता है, यदि वह देह के अनुसार जीवित रहना जारी रखे; और फिर, दूसरी ओर, [वह दिखाता है] किन बातों के द्वारा वह बचाया जाता है। अब वह कहता है कि बचानेवाली बातें हमारे प्रभु यीशु मसीह का नाम, और हमारे परमेश्वर का आत्मा हैं।
2. इसलिए, क्योंकि उस अंश में वह देह के उन कामों को गिनता है जो आत्मा के बिना हैं, जो [उनके करनेवालों पर] मृत्यु लाते हैं, उसने अपनी पत्री के अन्त में पुकारा, जो वह पहले प्रगट कर चुका था उसके अनुसार, "और जैसे हम ने मिट्टी के स्वरूप को पहना है, वैसे ही स्वर्ग से आनेवाले के स्वरूप को भी पहनेंगे। क्योंकि यह मैं कहता हूँ, हे भाइयो, कि मांस और लहू परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं हो सकते।"(5) अब जो वह कहता है, "जैसे हम ने मिट्टी के स्वरूप को पहना है," वह प्रगट की हुई बात के समान है, "और ऐसे निश्चय तुम थे; पर तुम धोए गए हो, पर तुम पवित्र किए गए हो, पर तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में, और हमारे परमेश्वर के आत्मा में धर्मी ठहराए गए हो।" इसलिए, हम ने मिट्टी के स्वरूप को कब पहना? निस्सन्देह जब वे काम जो "देह के काम" कहे गए हम में किए जा रहे थे। और फिर, स्वर्गीय का स्वरूप [हम कब पहनते हैं]? निस्सन्देह जब वह कहता है, "तुम धोए गए हो," प्रभु के नाम पर विश्वास करते हुए, और उसका आत्मा पाते हुए। अब हम ने धो डाला है, हमारी देह के पदार्थ को नहीं, न हमारी [पहली] गढ़ाई के स्वरूप को, पर पहले की व्यर्थ चाल को। इसलिए इन्हीं अंगों में, जिन में हम नाश के काम करके नाश को जा रहे थे, इन्हीं अंगों में आत्मा के काम करके हम जिलाए जाते हैं।
अध्याय बारह.--जीवन और मृत्यु के बीच के भेद के विषय में; जीवन के श्वास और जिलानेवाली आत्मा के विषय में: यह भी कि देह का वह पदार्थ कैसे फिर जीवित होता है जो एक बार मरा था।
1. क्योंकि जैसे देह नाश के योग्य है, वैसे ही वह अविनाश के भी योग्य है; और जैसे वह मृत्यु के योग्य है, वैसे ही वह जीवन के भी योग्य है। ये दोनों एक दूसरे को स्थान देते हैं; और दोनों एक ही स्थान में नहीं रह सकते, पर एक दूसरे के द्वारा निकाल दिया जाता है, और एक की उपस्थिति दूसरे की उपस्थिति को नाश करती है। तब, यदि मृत्यु जब मनुष्य को वश में करती है, जीवन को उसके पास से भगा देती है, और उसे मरा हुआ सिद्ध करती है, तो जीवन, जब उसने मनुष्य पर अधिकार पा लिया है, मृत्यु को निकालकर, उसे परमेश्वर के लिये जीवित करके लौटाता है, यह कितना अधिक है। क्योंकि यदि मृत्यु मर्त्यता लाती है, तो जीवन, जब वह आता है, मनुष्य को क्यों न जिलाए? जैसा एसैयास भविष्यद्वक्ता कहता है, "मृत्यु ने निगल लिया जब वह प्रबल हुई।"(6) और फिर, "परमेश्वर ने हर मुख से हर आँसू पोंछ दिया है।" इस प्रकार वह पहला जीवन निकाल दिया जाता है, क्योंकि वह आत्मा के द्वारा नहीं दिया गया था, पर श्वास के द्वारा।
2. क्योंकि जीवन का श्वास, जिसने मनुष्य को प्राणवाला प्राणी भी बनाया, एक है, और जिलानेवाली आत्मा दूसरी, जिसने उसे आत्मिक भी बनाया। और इस कारण यशायाह ने कहा, "प्रभु यों कहता है, जिसने स्वर्ग को बनाया और उसे स्थिर किया, जिसने पृथ्वी और उस में की वस्तुओं की नींव डाली, और लोगों को श्वास दिया
उस पर, और उस पर चलनेवालों को आत्मा;"(1) इस प्रकार हमें बताते हुए कि श्वास निश्चय पृथ्वी पर सब लोगों को सामान्य रूप से दिया जाता है, पर आत्मा उन्हीं का है जो पृथ्वी की इच्छाओं को रौंदते हैं। और इसलिए यशायाह आप, पहले कही हुई बातों को अलग करते हुए, फिर पुकारता है, "क्योंकि आत्मा मेरे पास से निकलेगा, और मैं ने हर श्वास को बनाया है।"(2) इस प्रकार वह आत्मा को परमेश्वर का विशेष ठहराता है, जिसे अन्तिम कालों में वह पुत्रों की गोद के द्वारा मानवजाति पर उण्डेलता है; पर [वह दिखाता है] कि श्वास सारी सृष्टि में सामान्य था, और उसे सृजी हुई वस्तु के रूप में दिखाता है। अब जो बनाया गया है वह उससे भिन्न है जो उसे बनाता है। तब, श्वास कालिक है, पर आत्मा अनन्त। श्वास भी, थोड़े समय के लिये [बल में] बढ़ता है, और कुछ समय तक बना रहता है; उसके बाद वह चला जाता है, अपने पहले के निवास को श्वास से रहित छोड़कर। पर जब आत्मा मनुष्य को भीतर और बाहर व्यापता है, क्योंकि वह वहाँ बना रहता है, वह उसे कभी नहीं छोड़ता। "पर जो आत्मिक है वह पहला नहीं," प्रेरित कहता है, यह ऐसे कहता हुआ मानो हमारे मानव प्राणियों के विषय में; "पर जो प्राणिक है वह पहला है, उसके बाद जो आत्मिक है,"(3) बुद्धि के अनुसार। क्योंकि आवश्यकता थी कि, पहले स्थान में, एक मानव प्राणी गढ़ा जाए, और जो गढ़ा गया वह प्राण पाए; बाद में वह इस प्रकार आत्मा की सहभागिता पाए। इसलिए "पहला आदम" प्रभु के द्वारा "जीवित प्राण बनाया गया, दूसरा आदम जिलानेवाली आत्मा।"(4) तब, जैसे जो जीवित प्राण बनाया गया वह जीवन खो बैठा जब वह बुराई की ओर मुड़ा, वैसे ही, दूसरी ओर, वही व्यक्ति, जब वह भलाई की ओर लौटता है, और जिलानेवाली आत्मा को पाता है, जीवन पाएगा।
3. क्योंकि एक वस्तु नहीं जो मरती है और दूसरी जो जिलाई जाती है, जैसे एक वस्तु नहीं जो खोती है और दूसरी जो मिलती है, पर प्रभु उसी भेड़ को ढूँढ़ने आया जो खो गई थी। तब, जो मरा था वह क्या था? निस्सन्देह वह देह का पदार्थ था; वही भी, जिसने जीवन का श्वास खो दिया था, और श्वासरहित और मरा हुआ हो गया था। इसलिए यही वह था जिसे प्रभु जिलाने आया, कि जैसे आदम में हम सब मरते हैं, प्राणिक स्वभाव के होकर, मसीह में हम सब जीवित रहें, आत्मिक होकर, परमेश्वर की हाथ की कारीगरी को एक ओर न रखते हुए, पर देह की अभिलाषाओं को, और पवित्र आत्मा को पाते हुए; जैसा प्रेरित कुलुस्सियों के नाम पत्री में कहता है: "इसलिए अपने अंगों को मार डालो जो पृथ्वी पर हैं।" और ये क्या हैं वह आप समझाता है: "व्यभिचार, अशुद्धता, अनुचित भाव, बुरी लालसा; और लोभ, जो मूर्तिपूजा है।"(5) इन्हीं को एक ओर रखना वह है जिसका प्रेरित प्रचार करता है; और वह प्रगट करता है कि जो ऐसे काम करते हैं, केवल मांस और लहू होकर, स्वर्ग के राज्य के वारिस नहीं हो सकते। क्योंकि उनका प्राण, जो बुरा है उसकी ओर झुकता हुआ, और पृथ्वी की अभिलाषाओं की ओर उतरता हुआ, उसी नाम में भागी हो गया है जो इन [अभिलाषाओं का है, अर्थात्, "पृथ्वी का"], जिन्हें जब प्रेरित हमें एक ओर रखने की आज्ञा देता है, वह उसी पत्री में कहता है, "पुराने मनुष्य को उसके कामों समेत उतार फेंको।"(6) पर जब उसने यह कहा, वह [मनुष्य की] प्राचीन गढ़ाई को हटाता नहीं; क्योंकि उस दशा में आत्महत्या करके उसकी संगति से अपने को छुड़ाना हम पर अनिवार्य होता।
4. पर प्रेरित स्वयं भी, जो गर्भ में रचा गया था, और वहाँ से निकला था, हमें लिखा, और फिलिप्पियों के नाम अपनी पत्री में माना कि "शरीर में जीवित रहना [उसके] काम का फल था;"(7) इस प्रकार अपने आप को व्यक्त करते हुए. अब आत्मा के काम का अन्तिम फल शरीर का उद्धार है.(8) क्योंकि अदृश्य आत्मा का और कौन सा दृश्य फल है, शरीर को परिपक्व और अक्षयता के योग्य बनाने से बढ़कर? तब यदि [वह कहता है], "शरीर में जीवित रहना, यही मेरे लिये परिश्रम का फल है," तो उस अंश में जहाँ उसने कहा, "पुराने मनुष्य को उसके कामों समेत उतार डालो,"(9) उसने शरीर के सार को निश्चय तुच्छ न जाना; पर वह दिखाता है कि हमें अपनी पूर्व चाल को, जो पुरानी होती जाती है और सड़ जाती है, अलग रख देना चाहिए; और इस कारण वह आगे कहता है, "और नए मनुष्य को पहिन लो, जो ज्ञान में नया किया जाता है, उसे सृजनेवाले के स्वरूप के अनुसार." इसलिये इसमें, कि वह कहता है, "जो ज्ञान में नया किया जाता है," वह दिखाता है कि वही मनुष्य जो बीते समयों में अज्ञान में था, अर्थात् परमेश्वर के अज्ञान में, उस ज्ञान से नया किया जाता है जिसका सम्बन्ध उस से है. क्योंकि परमेश्वर का ज्ञान मनुष्य को नया करता है. और जब वह कहता है, "सृजनहार के स्वरूप के अनुसार," वह उसी मनुष्य के पुनःसंग्रह को रखता है, जो आरम्भ में परमेश्वर की समानता के अनुसार बनाया गया था.
5. और यह कि वह, प्रेरित, वही व्यक्ति था जो गर्भ से जन्मा था, अर्थात् मांस के प्राचीन सार का, वह स्वयं गलातियों के नाम पत्री में घोषित करता है: "पर जब परमेश्वर को, जिसने मुझे मेरी माता के गर्भ से अलग किया, और अपने अनुग्रह से मुझे बुलाया, अच्छा लगा कि मुझ में अपने पुत्र को प्रगट करे, कि मैं अन्यजातियों में उसका प्रचार करूँ," (10) वह, जैसा मैं पहले ही देख चुका हूँ, एक व्यक्ति नहीं था जिसने
गर्भ से जन्म लिया था, और दूसरा जिसने परमेश्वर के पुत्र का सुसमाचार प्रचार किया; पर वही व्यक्ति जो पहले अज्ञानी था, और कलीसिया को सताता था, जब उसे स्वर्ग से प्रकाशन हुआ, और प्रभु ने उसके साथ बात की, जैसा मैं ने तीसरी पुस्तक में दिखाया है,(1) पुन्तियुस पीलातुस के अधीन क्रूस पर चढ़ाए गए परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह का सुसमाचार प्रचार किया, उसका पूर्व अज्ञान उसके बाद के ज्ञान से निकाल दिया गया: जैसे जिन अन्धों को प्रभु ने चंगा किया उन्होंने निश्चय अपना अन्धापन खोया, पर अपनी आँखों का सार सिद्ध पाया, और उन्हीं आँखों में दृष्टि की शक्ति पाई जिन से वे पहले नहीं देखते थे; अन्धकार केवल दृष्टि की शक्ति से हटा दिया गया, जबकि आँखों का सार रखा गया, इसलिये कि जिन आँखों से उन्होंने नहीं देखा था, उन से दृष्टि की शक्ति को फिर काम में लाकर, वे उसे धन्यवाद दें जिसने उन्हें फिर दृष्टि दी. और इस प्रकार, जिस का सूखा हाथ चंगा हुआ, और सामान्य रूप से सब जो चंगे किए गए, उन्होंने अपने शरीर के उन अंगों को नहीं बदला जो जन्म पर गर्भ से बाहर आए थे, पर इन्हें स्वस्थ दशा में नए सिरे से पाया.
6. क्योंकि सब का बनानेवाला, परमेश्वर का वचन, जिसने आरम्भ से मनुष्य को भी रचा, जब उसने अपनी कारीगरी को दुष्टता से बिगड़ी हुई पाया, तो उस पर हर प्रकार की चंगाई की. एक समय [उसने ऐसा किया], हर अलग अंग के विषय, जैसा वह अपनी निज कारीगरी में पाया जाता है; और दूसरे समय उसने एक ही बार मनुष्य को सब बातों में स्वस्थ और पूरा फिर स्थिर किया, उसे अपने लिये पुनरुत्थान तक सिद्ध तैयार करते हुए. क्योंकि मांस के [विभिन्न] भागों को चंगा करने और उन्हें उनकी पहली दशा में फिर लाने में उसका उद्देश्य क्या था, यदि जो भाग उसके द्वारा चंगे किए गए थे वे उद्धार पाने की दशा में न होते? क्योंकि यदि जो उसने दिया वह [केवल] एक अस्थायी लाभ था, तो जिन पर उसकी चंगाई हुई उन्हें उसने महत्व की कोई बात नहीं दी. या वे कैसे मान सकते हैं कि मांस उस जीवन को पाने में असमर्थ है जो उस से बहता है, जब उसने उस से चंगाई पाई? क्योंकि जीवन चंगाई के द्वारा होता है, और जीवन के द्वारा अक्षयता. इसलिये जो चंगाई देता है, वही जीवन भी देता है; और जो जीवन [देता है], वह अपनी निज कारीगरी को अक्षयता से भी घेरता है.
अध्याय 13.--मसीह के द्वारा उठाए गए मरे हुओं में हमारे पास पुनरुत्थान का सर्वोच्च प्रमाण है; और हमारे हृदय अनन्त जीवन के योग्य दिखाए जाते हैं, क्योंकि वे अब परमेश्वर की आत्मा को पा सकते हैं.
1. हमारे विरोधी--अर्थात् जो अपने निज उद्धार के विरुद्ध बोलते हैं--हमें [इस बात के विषय] बताएँ: महायाजक की मरी हुई बेटी;(2) विधवा का मरा हुआ पुत्र, जो [नगर के] फाटक के पास [दफनाने को] बाहर ले जाया जा रहा था;(3) और लाजर, जो कब्र में चार दिन पड़ा रहा,(4)--वे किन शरीरों में फिर जी उठे? निस्सन्देह उन्हीं में, जिन में वे मरे भी थे. क्योंकि यदि उन्हीं में नहीं, तो निश्चय वे ही व्यक्ति जो मरे थे फिर नहीं जी उठे. क्योंकि [शास्त्र] कहता है, "प्रभु ने मरे हुए का हाथ पकड़ा, और उससे कहा, हे जवान, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ. और मरा हुआ बैठ गया, और उसने आज्ञा दी कि उसे कुछ खाने को दिया जाए; और उसने उसे उसकी माता को सौंप दिया."(5) फिर, उसने लाजर को "ऊँचे शब्द से पुकारा, यह कहकर, लाजर, बाहर आ; और जो मरा था वह पाँव और हाथ पट्टियों से बँधा हुआ बाहर आया." यह उस मनुष्य का चिह्न था जो पापों में बँधा था.
और इसलिये प्रभु ने कहा, "उसे खोल दो, और उसे जाने दो." इसलिये, जैसे जो चंगे किए गए वे उन अंगों में पूरे किए गए जो बीते समयों में पीड़ित रहे थे; और मरे हुए उन्हीं शरीरों में जी उठे, उनके अंगों और शरीरों ने स्वास्थ्य पाया, और वह जीवन जो प्रभु ने दिया, जो अस्थायी बातों से अनन्त बातों को पहले से दिखाता है, और दिखाता है कि वही है जो अपनी कारीगरी को चंगाई और जीवन दोनों बढ़ाने में समर्थ है, कि उसके [भावी] पुनरुत्थान के विषय उसके वचन भी विश्वास किए जाएँ; वैसे ही अन्त में, जब प्रभु "अन्तिम तुरही के द्वारा" अपना शब्द कहेगा,(6) मरे हुए उठाए जाएँगे, जैसा वह स्वयं घोषित करता है: "वह घड़ी आएगी, जिस में कब्रों में के सब मरे हुए मनुष्य के पुत्र का शब्द सुनेंगे, और बाहर निकलेंगे; जिन्होंने भला किया है वे जीवन के पुनरुत्थान के लिये, और जिन्होंने बुरा किया है वे न्याय के पुनरुत्थान के लिये."(7)
2. इसलिये व्यर्थ, और सचमुच दीन, वे हैं जो इतना प्रगट और स्पष्ट जो है उसे देखना नहीं चुनते, पर सत्य के उजियाले से बचते हैं, दुःखान्त ईदिपस के समान अपने आप को अन्धा करते हुए. और जैसे जो मल्लयुद्ध में अभ्यस्त नहीं, जब वे औरों से लड़ते हैं, [अपने प्रतिद्वन्द्वी के] शरीर के किसी भाग को दृढ़ पकड़ से पकड़कर, सचमुच उसी से गिरते हैं जिसे वे पकड़ते हैं, तौभी जब वे गिरते हैं, सोचते हैं कि वे जय पा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने आरम्भ में पकड़े हुए उस भाग को हठ से पकड़े रखा, और गिरने के साथ, बन
उपहास के पात्र होते हैं; वैसे ही विधर्मियों की उस [प्रिय] उक्ति के विषय है: "मांस और लहू परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं हो सकते;" पौलुस की दो उक्तियों को लेते हुए, प्रेरित का अर्थ न समझे, या पदों के बल की आलोचनात्मक परीक्षा न की, पर केवल उक्तियों को अपने आप में दृढ़ पकड़े हुए, वे उनके प्रभाव के कारण मरते हैं (<greek>periautas</greek>), जितना उन में है उतना परमेश्वर के सारे प्रबन्ध को उलटते हुए.
3. क्योंकि इस प्रकार वे आरोप करेंगे कि यह अंश ठीक उसी नाम के मांस की ओर है, और मांस के कामों की ओर नहीं, जैसा मैं ने दिखाया है, इस प्रकार प्रेरित को अपने आप का विरोधी बताते हुए. क्योंकि तुरन्त बाद, उसी पत्री में, वह निर्णायक रूप से कहता है, मांस के विषय इस प्रकार बोलते हुए: "क्योंकि अवश्य है कि यह नाशवान अविनाशिता को पहिने, और यह मरणशील अमरता को पहिने. सो, जब यह मरणशील अमरता को पहिन लेगा, तब वह कहावत पूरी होगी जो लिखी है, मृत्यु जय में निगल ली गई. हे मृत्यु, तेरा डंक कहाँ है? हे मृत्यु, तेरी जय कहाँ है?"(1) ये वचन उस समय योग्य रीति से कहे जाएँगे जब यह मरणशील और नाशवान मांस, जो मृत्यु के अधीन है, जो मृत्यु के एक अधिकार से भी दबा है, जीवन में उठकर, अविनाशिता और अमरता को पहिनेगा. क्योंकि तब सचमुच मृत्यु जीती जाएगी, जब वह मांस जो उसके द्वारा नीचे रखा है उसके अधिकार के नीचे से बाहर निकलेगा. और फिर, फिलिप्पियों से वह कहता है: "पर हमारी नागरिकता स्वर्ग में है, जहाँ से हम उद्धारकर्ता, प्रभु यीशु की भी बाट जोहते हैं, जो हमारी दीनता की देह को अपनी महिमा की देह के अनुरूप बदल देगा, जैसे वह समर्थ है (ita ut possit) अपनी निज शक्ति के काम के अनुसार."(2) तब, यह "दीनता की देह" कौन सी है जिसे प्रभु "अपनी महिमा की देह" के अनुरूप [होने के लिये] बदलेगा? स्पष्ट है कि यह वह देह है जो मांस से बनी है, जो सचमुच दीन होती है जब वह पृथ्वी में गिरती है. अब उसका परिवर्तन [इस प्रकार होता है], कि जब वह मरणशील और नाशवान है, वह अमर और अविनाशी हो जाता है, अपने निज सार के अनुसार नहीं, पर प्रभु के बलवान काम के अनुसार, जो मरणशील को अमरता से, और नाशवान को अविनाशिता से ढकने में समर्थ है.
और इसलिये वह कहता है,(3) "कि मरणशीलता जीवन से निगल ली जाए. जिसने हमें इसी बात के लिये सिद्ध किया है वह परमेश्वर है, जिसने हमें आत्मा की बयाना भी दी है."(4) वह इन वचनों को अत्यन्त स्पष्ट रूप से मांस के विषय में उपयोग करता है; क्योंकि प्राण मरणशील नहीं, और न आत्मा है. अब, जो मरणशील है वह जीवन से निगल लिया जाएगा, जब मांस फिर मरा नहीं रहेगा, पर जीवित और अविनाशी रहेगा, परमेश्वर की स्तुति गाते हुए, जिसने हमें इसी बात के लिये सिद्ध किया है. इसलिये, कि हम इसके लिये सिद्ध किए जाएँ, वह कुरिन्थियों से योग्य रीति कहता है, "अपनी देह में परमेश्वर की महिमा करो."(5) अब परमेश्वर वही है जो अमरता को उत्पन्न करता है.
4. कि वह इन वचनों को मांस की देह के विषय में, और किसी अन्य के विषय में नहीं, उपयोग करता है, वह कुरिन्थियों को प्रगट रूप से, निस्सन्देह, और सब अस्पष्टता से स्वतन्त्र घोषित करता है: "यीशु के मरने को अपनी देह में सदा लिए फिरते हुए,(6) कि यीशु मसीह का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो. क्योंकि यदि हम जो जीवित हैं यीशु के लिये मृत्यु को सौंपे जाते हैं, तो यह इसलिये कि यीशु का जीवन हमारी मरणशील देह में भी प्रगट हो."(7) और यह कि आत्मा मांस को पकड़ती है, वह उसी पत्री में कहता है, "कि तुम मसीह की पत्री हो, हमारी सेवा से, स्याही से नहीं, पर जीवते परमेश्वर की आत्मा से लिखी हुई, पत्थर की पटियाओं पर नहीं, पर हृदय की मांस की पटियाओं पर."(8) इसलिये, यदि वर्तमान समय में, मांस के हृदय आत्मा के सहभागी किए जाते हैं, तो क्या आश्चर्य है यदि, पुनरुत्थान में, वे उस जीवन को पाएँ जो आत्मा के द्वारा दिया जाता है? जिस पुनरुत्थान के विषय प्रेरित फिलिप्पियों के नाम पत्री में कहता है: "उसकी मृत्यु के अनुरूप किए जाकर, किसी भी उपाय से मैं मरे हुओं में से पुनरुत्थान तक पहुँचूँ."(9) इसलिये और किस मरणशील देह में जीवन प्रगट होता समझा जा सकता है, उस सार को छोड़ जिसमें परमेश्वर के विषय किए गए उस अंगीकार के कारण मृत्यु भी दी जाती है?--जैसा उसने स्वयं घोषित किया है, "यदि, मनुष्य के समान, मैं ने इफिसुस में वनपशुओं से लड़ाई की,(10) तो मुझे क्या लाभ यदि मरे हुए नहीं जी उठते? क्योंकि यदि मरे हुए नहीं जी उठते, तो मसीह भी नहीं जी उठा. अब, यदि मसीह नहीं जी उठा, तो हमारा प्रचार व्यर्थ है, और तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है. उस दशा में भी, हम परमेश्वर के लिये झूठे साक्षी पाए जाते हैं, क्योंकि हम ने गवाही दी है कि उसने मसीह को जिलाया, जिसे [उस कल्पना पर] उसने नहीं जिलाया.(11) क्योंकि यदि मरे हुए नहीं जी उठते, तो मसीह भी नहीं जी उठा.
पर यदि मसीह नहीं जी उठा, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है, क्योंकि तुम अभी अपने पापों में हो. इसलिये जो मसीह में सो गए हैं वे नाश हुए. यदि केवल इसी जीवन में हमें मसीह में आशा है, तो हम सब मनुष्यों से अधिक दीन हैं. पर अब मसीह ने
मरे हुओं में से जी उठा, सोए हुओं का पहला फल; क्योंकि जैसे मनुष्य के द्वारा [आई] मृत्यु, वैसे मनुष्य के द्वारा भी [आया] मरे हुओं का पुनरुत्थान."(1)
5. इसलिये इन सब अंशों में, जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ, इन मनुष्यों को या तो यह आरोप करना होगा कि प्रेरित उस वचन के विषय, "मांस और लहू परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं हो सकते," अपने आप का विरोध करनेवाले विचार व्यक्त करता है; या, दूसरी ओर, वे सब अंशों की टेढ़ी और कुटिल व्याख्याएँ करने को मजबूर होंगे, कि वचनों के अर्थ को उलटें और बदलें. क्योंकि यदि वे जो वह लिखता है उसे अन्यथा व्याख्या करने का यत्न करें तो वे कौन सी बुद्धि की बात कह सकते हैं: "क्योंकि अवश्य है कि यह नाशवान अविनाशिता को पहिने, और यह मरणशील अमरता को पहिने;"(2) और, "कि यीशु का जीवन हमारी मरणशील देह में प्रगट किया जाए;"(3) और अन्य सब अंश जिन में प्रेरित मांस के पुनरुत्थान और अक्षयता को प्रगट रूप से और स्पष्ट घोषित करता है? और इस प्रकार वे ऐसे अंशों पर झूठी व्याख्या रखने को मजबूर होंगे, जो एक को ठीक समझना नहीं चुनते.
अध्याय 14.--यदि मांस को उद्धार पाना न होता, तो वचन हमारे समान उसी सार का मांस अपने ऊपर न लेता: इससे यह निकलता कि हम भी उसके द्वारा मेल नहीं कराए जाते.
1. और क्योंकि प्रेरित ने मांस और लहू के सार ही के विरुद्ध यह नहीं कहा है कि वह परमेश्वर के राज्य का वारिस नहीं हो सकता, उसी प्रेरित ने प्रभु यीशु मसीह के विषय "मांस और लहू" शब्द को सर्वत्र अपनाया है, कुछ तो सचमुच उसके मानवीय स्वभाव को स्थिर करने को (क्योंकि उसने अपने आप को मनुष्य का पुत्र कहा), और कुछ कि वह हमारे मांस के उद्धार को दृढ़ करे. क्योंकि यदि मांस उद्धार पाने की दशा में न होता, तो परमेश्वर का वचन किसी रीति से मांस न होता. और यदि धर्मी का लहू पूछा न जाता, तो प्रभु के पास निश्चय [अपनी रचना में] लहू न होता. पर क्योंकि लहू आरम्भ से [जगत के] चिल्लाता है (vocalis est), जब कैन ने अपने भाई को मार डाला तब परमेश्वर ने उससे कहा, "तेरे भाई के लहू की आवाज मेरी ओर चिल्लाती है."(4) और क्योंकि उनका लहू पूछा जाएगा, उसने नूह के साथ वालों से कहा, "तुम्हारे प्राणों के लहू को मैं माँगूँगा, सब पशुओं के हाथ से [भी];"(5) और फिर, "जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा,(6) उसका लहू उसके लहू के लिये बहाया जाएगा." इसी रीति, प्रभु ने उन से भी कहा जो बाद में उसका लहू बहाएँगे, "पृथ्वी पर बहाया गया सब धर्मी लहू माँगा जाएगा, धर्मी हाबिल के लहू से लेकर बिरकिय्याह के पुत्र जकर्याह के लहू तक, जिसे तुम ने मन्दिर और वेदी के बीच मार डाला. सचमुच मैं तुम से कहता हूँ, ये सब बातें इस पीढ़ी पर आएँगी."(7) इस प्रकार वह उस पुनःसंग्रह को दिखाता है जो उसके निज व्यक्ति में आरम्भ से लहू बहने का होना चाहिए, सब धर्मियों का और भविष्यद्वक्ताओं का, और कि उसके द्वारा उनके लहू की माँग हो.
अब यह [लहू] नहीं माँगा जा सकता था जब तक उसमें भी उद्धार पाने की सामर्थ्य न होती; और न प्रभु इन बातों को अपने में समेटता, जब तक वह स्वयं मूल रचना [मनुष्य की] के मार्ग के अनुसार मांस और लहू न बना होता, अन्त में अपने निज व्यक्ति में उसे बचाते हुए जो आरम्भ में आदम में नाश हुआ था.
2. पर यदि प्रभु किसी अन्य क्रम के लिये देहधारी हुआ, और किसी अन्य सार का मांस लिया, तो उसने अपने निज व्यक्ति में मानवीय स्वभाव को नहीं समेटा, और उस दशा में वह मांस नहीं कहला सकता. क्योंकि मांस सचमुच धूल से मूल रूप से ढाले गए उस पदार्थ के एक हस्तान्तरण के [रूप में] बनाया गया है. पर यदि उसके लिये [अपनी देह का] पदार्थ दूसरे सार से खींचना आवश्यक होता, तो पिता आरम्भ में [मांस का] पदार्थ भिन्न सार से [जो उसने सचमुच किया उससे] ढालता. पर अब बात इस प्रकार है, कि वचन ने उसे बचाया जो सचमुच [रचा गया था, अर्थात्,] वह मानवता जो नाश हुई थी, अपने द्वारा वह संगति उत्पन्न करते हुए जो उसके साथ रखी जानी चाहिए, और उसके उद्धार को खोजते हुए. पर जो वस्तु नाश हुई थी उसके पास मांस और लहू था. क्योंकि प्रभु ने, पृथ्वी से धूल लेकर, मनुष्य को ढाला; और उसके पक्ष में ही प्रभु के आगमन का सारा प्रबन्ध हुआ. इसलिये उसके पास स्वयं मांस और लहू था, अपने में किसी अन्य को नहीं, पर पिता की उस मूल कारीगरी को पुनःसंग्रह करते हुए, जो वस्तु नाश हुई थी उसे खोजते हुए. और इस कारण प्रेरित, कुलुस्सियों के नाम पत्री में, कहता है, "और यद्यपि तुम पहले पराए थे, और बुरे कामों से उसके ज्ञान के शत्रु थे, तौभी अब तुम उसकी देह के शरीर में, उसकी मृत्यु के द्वारा, मेल कराए गए हो, अपने आप को उसकी दृष्टि में पवित्र और शुद्ध, और निर्दोष अर्पित करने को."(8) वह कहता है, "तुम उसकी देह के शरीर में मेल कराए गए हो," क्योंकि धर्मी मांस ने उस मांस को मेल कराया जो पाप में दासत्व में रखा जा रहा था, और उसे परमेश्वर के साथ मित्रता में लाया.
3. तब, यदि कोई इस बात में आरोप करे कि प्रभु का मांस हमारे से भिन्न था, क्योंकि उसने सचमुच पाप नहीं किया, और न
उसके प्राण में छल पाया गया, जबकि हम, दूसरी ओर, पापी हैं, वह वही कहता है जो तथ्य है. पर यदि वह यह बहाना करे कि प्रभु के पास मांस का दूसरा सार था, तो मेल के विषय की उक्तियाँ उस मनुष्य से मेल नहीं खाएँगी. क्योंकि वही मेल कराया जाता है जो पहले शत्रुता में था. अब, यदि प्रभु ने दूसरे सार से मांस लिया होता, तो ऐसा करने से उसने उसे परमेश्वर से मेल न कराया होता जो अपराध के द्वारा शत्रु हो गया था. पर अब, अपने साथ संगति के द्वारा, प्रभु ने मनुष्य को परमेश्वर पिता से मेल कराया है, अपनी निज देह के शरीर से हमें अपने से मेल कराते हुए, और अपने निज लहू से हमें छुड़ाते हुए, जैसा प्रेरित इफिसियों से कहता है, "जिस में उसके लहू के द्वारा हमें छुटकारा है, पापों की क्षमा;"(1) और फिर उसी से वह कहता है, "तुम जो पहले दूर थे मसीह के लहू में निकट लाए गए हो;"(2) और फिर, "उसकी देह में शत्रुताओं को, [अर्थात्] विधियों में [रखी] आज्ञाओं की व्यवस्था को मिटाते हुए."(3) और हर पत्री में प्रेरित स्पष्ट गवाही देता है, कि हमारे प्रभु की देह के द्वारा, और उसके लहू के द्वारा, हम उद्धार पाए हैं.
4. इसलिये, यदि मांस और लहू वे बातें हैं जो हमारे लिये जीवन प्राप्त करती हैं, तो पदों के अक्षरार्थ में (proprie) मांस और लहू के विषय यह घोषित नहीं किया गया कि वे परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं हो सकते; पर [ये वचन] उन शारीरिक कामों पर [लगते हैं] जिन का पहले उल्लेख हुआ, जो मनुष्य को पाप की ओर मोड़कर, उसे जीवन से वंचित करते हैं. और इस कारण वह, रोमियों के नाम पत्री में, कहता है: "इसलिये पाप तुम्हारी मरणशील देह में राज्य न करे, कि तुम उसके वश में रहो: और न अपने अंगों को अधर्म के हथियारों के रूप में पाप को सौंपो; पर अपने आप को परमेश्वर को सौंपो, मरे हुओं में से जीवितों के समान, और अपने अंगों को परमेश्वर के लिये धर्म के हथियारों के रूप में."(4) इसलिये इन्हीं अंगों में, जिन में हम पाप की सेवा करते थे, और मृत्यु के लिये फल लाते थे, वह चाहता है कि हम धर्म के लिये [आज्ञाकारी हों], कि हम जीवन के लिये फल लाएँ. इसलिये स्मरण रख, मेरे प्रिय मित्र, कि तू हमारे प्रभु की देह से छुड़ाया गया है, उसके लहू से फिर स्थापित किया गया है(5); और "सिर को पकड़े हुए, जिस से कलीसिया की सारी देह, जोड़ी जाकर, बढ़ती है"(6)--अर्थात्, परमेश्वर के पुत्र के देह में आगमन को, और [उसकी] दिव्यता को (deum) मानते हुए, और उसके मानवीय स्वभाव(7) (hominem) की ओर स्थिरता से देखते हुए, शास्त्र से लिए इन प्रमाणों का भी उपयोग करते हुए--जैसा मैं ने दिखाया है, तू उन विधर्मियों की सब कल्पनाओं को सहज उलट देता है जो बाद में गढ़ी गईं.
अध्याय 15.--यशायाह और यहेजकेल से पुनरुत्थान के प्रमाण; वही परमेश्वर जिसने हमें रचा हमें जिलाएगा भी.
1. अब, जिसने आरम्भ में मनुष्य को रचा, उसने पृथ्वी में विलीन होने के बाद उसे दूसरा जन्म देने की प्रतिज्ञा की, यह यशायाह इस प्रकार घोषित करता है: "मरे हुए फिर जी उठेंगे, और जो कब्रों में हैं वे उठेंगे, और जो पृथ्वी में हैं वे आनन्द करेंगे. क्योंकि जो ओस तुझ से है वह उनके लिये चंगाई है."(8) और फिर: "मैं तुम्हें शान्ति दूँगा, और तुम यरूशलेम में शान्ति पाओगे: और तुम देखोगे, और तुम्हारा हृदय आनन्द करेगा, और तुम्हारी हड्डियाँ घास के समान लहलहाएँगी; और प्रभु का हाथ उसके आराधना करनेवालों को जाना जाएगा."(9) और यहेजकेल इस प्रकार कहता है: "और प्रभु का हाथ मुझ पर आया, और प्रभु ने मुझे आत्मा में बाहर ले चला, और मैदान के बीच में मुझे बैठा दिया, और यह स्थान हड्डियों से भरा था. और उसने मुझे उनके चारों ओर से गुजारा: और देखो, मैदान की सतह पर बहुत सी अत्यन्त सूखी थीं. और उसने मुझ से कहा, हे मनुष्य के पुत्र, क्या ये हड्डियाँ जीवित हो सकती हैं ? और मैं ने कहा, हे प्रभु, तू जिसने उन्हें बनाया है जानता है. और उसने मुझ से कहा, इन हड्डियों पर भविष्यद्वाणी कर, और तू उन से कहेगा, हे सूखी हड्डियो, प्रभु का वचन सुनो. प्रभु इन हड्डियों से यों कहता है, देखो, मैं जीवन की आत्मा को तुम पर आने दूँगा, और तुम पर नसें रखूँगा, और तुम पर फिर मांस चढ़ाऊँगा, और तुम पर चमड़ा तानूँगा, और अपनी आत्मा को तुम में रखूँगा, और तुम जीवित रहोगे; और तुम जानोगे कि मैं ही प्रभु हूँ. और मैं ने भविष्यद्वाणी की जैसा प्रभु ने मुझे आज्ञा दी थी. और जब मैं भविष्यद्वाणी कर रहा था, तब ऐसा हुआ, देखो, एक भूकम्प, और हड्डियाँ इकट्ठी खिंची गईं, हर एक अपनी निज सन्धि की ओर: और मैं ने देखा, और देखो, नसें और मांस उन पर उत्पन्न हुए, और खालें उन पर चारों ओर उठीं, पर उन में साँस न थी.
और उसने मुझ से कहा, साँस से भविष्यद्वाणी कर, हे मनुष्य के पुत्र, और साँस से कह, प्रभु ये बातें कहता है, चार पवनों से (spiritibus) आ, और इन मरे हुओं पर साँस ले, कि वे जीवित रहें. सो मैं ने भविष्यद्वाणी की जैसा प्रभु ने मुझे आज्ञा दी थी, और साँस उन में प्रवेश कर गई; और वे जीवित रहे, और अपने पाँवों पर खड़े हुए, एक अत्यन्त बड़ी सभा."(10) और फिर वह कहता है, "प्रभु यों कहता है, देखो, मैं तुम्हारी कब्रें खोल रखूँगा, और तुम्हें अपनी कब्रों से बाहर आने दूँगा, और तुम्हें इस्राएल के देश में लाऊँगा; और तुम जानोगे कि मैं ही प्रभु हूँ,
जब मैं तुम्हारी कब्रें खोलूँगा, कि मैं अपनी प्रजा को कब्रों में से फिर बाहर लाऊँ: और मैं अपनी आत्मा को तुम में रखूँगा, और तुम जीवित रहोगे; और मैं तुम्हें तुम्हारे देश में रखूँगा, और तुम जानोगे कि मैं ही प्रभु हूँ. मैं ने कहा है, और मैं करूँगा, प्रभु कहता है." (1) जैसा हम तुरन्त समझते हैं कि सृजनहार (Demiurgo) इस अंश में हमारी मरी हुई देहों को जिलानेवाला, और उन्हें पुनरुत्थान की प्रतिज्ञा करनेवाला, और उनकी कब्रों और मकबरों से फिर जिलानेवाला, उन पर अमरता भी देनेवाला दिखाया गया है (वह कहता है, "क्योंकि जीवन के वृक्ष के समान, वैसे उनके दिन होंगे"(2)), वह इन बातों को पूरा करनेवाला एकमात्र परमेश्वर दिखाया जाता है, और स्वयं भला पिता, उन पर कृपा से जीवन देता हुआ जिनके पास अपने से जीवन नहीं.
2. और इस कारण प्रभु ने अपने आप को और पिता को अपने चेलों को अत्यन्त स्पष्ट प्रगट किया, कहीं ऐसा न हो कि वे उस से अन्य किसी परमेश्वर को खोजें जिसने मनुष्य को रचा, और जिसने उसे जीवन की साँस दी; और कि मनुष्य ऐसी उन्माद की सीमा तक न उठें कि सृजनहार के ऊपर दूसरा पिता गढ़ें. और इस प्रकार उसने वचन से अन्य सब को भी चंगा किया जो पाप के कारण दुर्बल दशा में थे; जिन से उसने यह भी कहा, "देख, तू चंगा किया गया है, फिर पाप न कर, कहीं तुझ पर कोई बुरी बात न आ पड़े:"(3) इससे दिखाते हुए, कि अनाज्ञाकारिता के पाप के कारण दुर्बलताएँ मनुष्यों पर आई हैं. पर उस मनुष्य को, जो जन्म से अन्धा था, उसने दृष्टि दी, वचन के द्वारा नहीं, पर एक बाहरी काम से; यह बिना उद्देश्य के नहीं, या इसलिये नहीं कि ऐसा हो गया, पर कि वह परमेश्वर का हाथ दिखाए, जिसने आरम्भ में मनुष्य को ढाला था. और इसलिये, जब उसके चेलों ने उससे पूछा कि मनुष्य किस कारण अन्धा जन्मा, क्या अपने दोष से या अपने माता-पिता के दोष से, उसने उत्तर दिया, "न इस मनुष्य ने पाप किया, न उसके माता-पिता ने, पर इसलिये कि परमेश्वर के काम उसमें प्रगट हों."(4) अब परमेश्वर का काम मनुष्य की रचना है. क्योंकि, जैसा शास्त्र कहता है, उसने एक प्रकार की प्रक्रिया से [मनुष्य] बनाया: "और प्रभु ने पृथ्वी से मिट्टी ली, और मनुष्य को रचा."(5) इस कारण प्रभु ने भी भूमि पर थूका और मिट्टी बनाई, और उसे आँखों पर लगाया, मूल रचना को [मनुष्य की] दिखाते हुए, वह कैसे हुई, और धूल से मनुष्य किस [हाथ] से रचा गया यह समझनेवालों को परमेश्वर का हाथ प्रगट करते हुए.
क्योंकि जो कारीगर, वचन, गर्भ में रचने से छोड़ गया था, [अर्थात्, अन्धे की आँखें], उसे उसने तब प्रगट रूप से पूरा किया, कि परमेश्वर के काम उसमें प्रगट हों, इसलिये कि हम दूसरा हाथ न खोजें जिस से मनुष्य रचा गया, और न दूसरा पिता; यह जानते हुए कि परमेश्वर का यह हाथ जिसने हमें आरम्भ में रचा, और जो हमें गर्भ में रचता है, उसने अन्तिम समयों में हम खोए हुओं को खोजा है, अपना निज लौटाते हुए, और खोई हुई भेड़ को अपने कन्धों पर उठाते हुए, और आनन्द से उसे जीवन के बाड़े में फिर लाते हुए.
3. अब, कि परमेश्वर का वचन हमें गर्भ में रचता है, वह यिर्मयाह से कहता है, "गर्भ में मैं ने तुझे रचने से पहले तुझे जाना; और तू पेट से बाहर जाने से पहले मैं ने तुझे पवित्र किया, और जातियों के बीच तुझे भविष्यद्वक्ता ठहराया." (6) और पौलुस भी इसी रीति कहता है, "पर जब परमेश्वर को, जिसने मुझे मेरी माता के गर्भ से अलग किया, अच्छा लगा कि मैं जातियों के बीच उसका प्रचार करूँ."(7) इसलिये, जैसे हम वचन के द्वारा गर्भ में रचे जाते हैं, इसी वचन ने जन्म से अन्धे में दृष्टि की शक्ति रची; खुलकर दिखाते हुए कि गुप्त में हमें कौन रचता है, क्योंकि वचन स्वयं मनुष्यों को प्रगट हुआ था: और आदम की मूल रचना को, और जिस रीति वह सृजा गया, और किस हाथ से वह ढाला गया, घोषित करते हुए, भाग से पूरे को सूचित करते हुए. क्योंकि जिस प्रभु ने दृष्टि की शक्तियाँ रचीं वही है जिसने पूरे मनुष्य को बनाया, पिता की इच्छा को पूरा करते हुए. और क्योंकि मनुष्य, आदम के बाद की उस रचना के विषय, अपराध में गिरकर, पुनरुत्पत्ति के स्नानपात्र का जरूरतमन्द था, [प्रभु] ने उससे [जिस पर उसने दृष्टि दी], उसकी आँखों पर मिट्टी लगाने के बाद, कहा, "शीलोअम को जा, और धो ले;"(8) इस प्रकार उसे [उसकी सिद्ध] पुष्टि, और वह पुनरुत्पत्ति जो स्नानपात्र के द्वारा होती है, दोनों फिर देते हुए. और इस कारण जब वह धोया गया तब वह देखता हुआ आया, कि वह उसे जाने जिसने उसे रचा, और मनुष्य उसे [जानना] सीखे जिसने उसे जीवन दिया है.
4. इसलिये वैलेंटिनस के सब अनुयायी अपना मुकद्दमा हारते हैं, जब वे कहते हैं कि मनुष्य इस पृथ्वी से नहीं रचा गया, पर एक तरल और फैले हुए पदार्थ से. क्योंकि, जिस पृथ्वी से प्रभु ने उस मनुष्य के लिये आँखें रचीं, उसी पृथ्वी से यह स्पष्ट है कि मनुष्य आरम्भ में भी रचा गया. क्योंकि यह मेल न खाता कि आँखें तो एक स्रोत से रची जाएँ और शरीर का शेष दूसरे से; जैसे यह भी मेल न खाता कि एक [सत्ता] ने शरीर रचा, और दूसरी ने आँखें. पर वह, वही जिसने आदम को आरम्भ में रचा, जिस से पिता ने भी बात की, [यह कहते हुए], "आओ हम मनुष्य को अपने स्वरूप और समानता के अनुसार बनाएँ,"(9) इन अन्तिम समयों में अपने आप को मनुष्यों पर प्रगट करते हुए, जन्म से अन्धे के लिये दृष्टि के अंगों को (visionem) रचा [में
उस शरीर जो उसने आदम से पाया था]. इस कारण शास्त्र भी, जो होनेवाला था उसे दिखाते हुए, कहता है, कि जब आदम अपनी अनाज्ञाकारिता के कारण अपने आप को छिपा था, प्रभु सन्ध्या को उसके पास आया, उसे बाहर बुलाया, और कहा, "तू कहाँ है?"(1) इसका अर्थ है कि अन्तिम समयों में वही परमेश्वर का वचन मनुष्य को बुलाने आया, उसके कामों की उसे याद दिलाते हुए, जिन में रहते हुए वह प्रभु से छिपा रहा था. क्योंकि जैसे उस समय परमेश्वर ने सन्ध्या को आदम से बात की, उसे खोजते हुए; वैसे अन्तिम समयों में, उसी शब्द के द्वारा, उसकी सन्तान को खोजते हुए, उसने उन से भेंट की है.
अध्याय 16.--क्योंकि हमारी देहें पृथ्वी को लौटती हैं, इससे निकलता है कि उनका सार उसी से है; और, वचन के आगमन से, हम में परमेश्वर का स्वरूप अधिक स्पष्ट ज्योति में दिखाई दिया.
1. और क्योंकि आदम इस पृथ्वी से ढाला गया जिस से हम सम्बन्ध रखते हैं, शास्त्र हमें बताता है कि परमेश्वर ने उससे कहा, "अपने मुख के पसीने में तू अपनी रोटी खाएगा, जब तक तू उस धूल को फिर न लौटे जिस से तू लिया गया था."(2) तब यदि, मृत्यु के बाद, हमारी देहें किसी अन्य सार को लौटती हैं, तो इससे निकलता है कि उसी से उनका सार भी है. पर यदि यह इसी [पृथ्वी] में है, तो यह प्रगट है कि उसी से मनुष्य का ढाँचा भी रचा गया; जैसा प्रभु ने भी स्पष्ट दिखाया, जब इसी सार से उसने उस मनुष्य के लिये आँखें रचीं [जिसे उसने दृष्टि दी]. और इस प्रकार परमेश्वर का हाथ स्पष्ट दिखाया गया, जिस से आदम ढाला गया, और हम भी रचे गए हैं; और क्योंकि एक ही और वही पिता है, जिस का शब्द आरम्भ से अन्त तक अपनी कारीगरी के साथ उपस्थित है, और जिस सार से हम रचे गए वह सुसमाचार के द्वारा स्पष्ट घोषित है, इसलिये हमें उसके सिवा दूसरा पिता नहीं खोजना चाहिए, और न [खोजना चाहिए] दूसरा सार जिस से हम रचे गए हैं, जो पहले कहा गया, और प्रभु के द्वारा दिखाया गया, उसके सिवा; और न परमेश्वर का दूसरा हाथ उसके सिवा जो, आरम्भ से अन्त तक, हमें रचता है और जीवन के लिये हमें तैयार करता है, और अपनी कारीगरी के साथ उपस्थित है, और उसे परमेश्वर के स्वरूप और समानता के अनुसार सिद्ध करता है.
2. और फिर, यह वचन प्रगट हुआ जब परमेश्वर का वचन मनुष्य बना, अपने आप को मनुष्य के समान करते हुए, और मनुष्य को अपने समान, कि पुत्र की समानता के द्वारा मनुष्य पिता के लिये अनमोल हो जाए. क्योंकि बहुत पुराने समयों में, कहा गया था कि मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार रचा गया, पर वह [वास्तव में] दिखाया नहीं गया; क्योंकि वचन अभी अदृश्य था, जिसके स्वरूप के अनुसार मनुष्य रचा गया. इस कारण उसने समानता को सहज खो दिया. पर, जब परमेश्वर का वचन देह हुआ, उसने इन दोनों को दृढ़ किया: क्योंकि उसने स्वरूप को सचमुच दिखाया, क्योंकि वह स्वयं वही हो गया जो उसका स्वरूप था; और उसने समानता को निश्चित रीति से फिर स्थापित किया, दृश्य वचन के द्वारा मनुष्य को अदृश्य पिता के समान करते हुए.
3. और केवल ऊपर कही बातों से नहीं प्रभु ने अपने आप को प्रगट किया, पर अपनी पीड़ा के द्वारा भी [उसने यह किया]. क्योंकि एक वृक्ष के अवसर से आरम्भ में हुई मनुष्य की उस अनाज्ञाकारिता [के फल] को मिटाते हुए, "वह मृत्यु तक आज्ञाकारी हुआ, वरन् क्रूस की मृत्यु तक;"(3) एक वृक्ष के कारण हुई उस अनाज्ञाकारिता को, [क्रूस के] वृक्ष पर [पूरी की गई] उस आज्ञाकारिता के द्वारा सुधारते हुए. अब यदि वह दूसरे पिता का प्रचार करता तो वह उसी [स्वरूप] के द्वारा हमारी अनाज्ञाकारिता को मिटाने न आता जो हमारे बनानेवाले के प्रति हुई थी. पर क्योंकि इन्हीं बातों से हम परमेश्वर की आज्ञा टाले, और उसके वचन पर विश्वास न किया, वैसे ही इन्हीं से उसने अपने वचन के विषय आज्ञाकारिता और सम्मति को भीतर लाया; जिन बातों से वह परमेश्वर को स्वयं स्पष्ट दिखाता है, जिसे हम ने पहले आदम में सचमुच अपराध किया था, जब उसने उसकी आज्ञा पूरी नहीं की. पर दूसरे आदम में, हम मेल कराए जाते हैं, मृत्यु तक भी आज्ञाकारी बनाए जाकर. क्योंकि हम आरम्भ में जिसकी आज्ञा का हम ने उल्लंघन किया था उसके सिवा किसी और के ऋणी नहीं थे.
अध्याय 17.--एक ही प्रभु और एक ही परमेश्वर है, सब का पिता और सृजनहार, जिसने मसीह में हम से प्रेम किया, हमें आज्ञाएँ दीं, और हमारे पाप क्षमा किए; जिसका पुत्र और वचन मसीह ने अपने आप को सिद्ध किया, जब उसने हमारे पाप क्षमा किए.
1. अब यह सत्ता सृजनहार है (Demiurgus), जो, अपने प्रेम के विषय, पिता है; पर अपनी शक्ति के विषय, वह प्रभु है; और अपनी बुद्धि के विषय, हमारा बनानेवाला और रचनेवाला; जिसकी आज्ञा का उल्लंघन करके हम उसके शत्रु हुए. और इसलिये अन्तिम समयों में प्रभु ने अपनी देहधारण के द्वारा हमें मित्रता में फिर स्थिर किया है, "परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ" बनकर;(4) हमारे लिये उस पिता को सचमुच शान्त करते हुए जिसके विरुद्ध हम ने पाप किया था, और अपनी निज आज्ञाकारिता से हमारी अनाज्ञाकारिता को मिटाते हुए (consolatus); हमारे बनानेवाले के साथ संगति और अधीनता का दान भी हम पर देते हुए. इस कारण उसने प्रार्थना में कहना भी हमें सिखाया, "और हमारे ऋण क्षमा कर;"(5) क्योंकि वह हमारा पिता है, जिसके ऋणी हम थे, उसकी आज्ञाओं का उल्लंघन करके. पर यह सत्ता कौन है? क्या वह कोई अज्ञात है, और एक पिता जो कोई com545 नहीं देता
mandment किसी को? या वह परमेश्वर है जो शास्त्र में प्रचारित है, जिसके ऋणी हम थे, उसकी आज्ञा का उल्लंघन करके? अब आज्ञा मनुष्य को वचन के द्वारा दी गई. क्योंकि आदम के विषय कहा जाता है, "उसने प्रभु परमेश्वर का शब्द सुना."(1) तब ठीक ही उसका वचन मनुष्य से कहता है, "तेरे पाप तुझे क्षमा हुए;"(2) वह, वही जिसके विरुद्ध हम ने आरम्भ में पाप किया था, अन्त में पापों की क्षमा देता है. पर यदि सचमुच हम ने किसी और की आज्ञा का उल्लंघन किया होता, जबकि कोई भिन्न सत्ता कहती, "तेरे पाप तुझे क्षमा हुए;"(2) ऐसा कोई न भला है, न सच्चा, न धर्मी. क्योंकि वह कैसे भला हो सकता है, जो अपने से नहीं देता? या वह कैसे धर्मी हो सकता है, जो दूसरे की वस्तुएँ छीन लेता है? और पाप सचमुच किस रीति क्षमा हो सकते हैं, जब तक वह जिसके विरुद्ध हम ने पाप किया है स्वयं क्षमा न दे "हमारे परमेश्वर की करुणा की कोमल अन्तर्यामी के द्वारा," जिन में "उसने हम से भेंट की"(3) अपने पुत्र के द्वारा?
2. और इसलिये, जब उसने लकवे के रोगी को चंगा किया, [सुसमाचार लिखनेवाला] कहता है "लोगों ने यह देखकर उस परमेश्वर की महिमा की, जिसने मनुष्यों को ऐसा अधिकार दिया."(4) तब, खड़े लोगों ने किस परमेश्वर की महिमा की? क्या सचमुच वह अज्ञात पिता था जिसे विधर्मियों ने गढ़ा? और वे उसकी महिमा कैसे कर सकते थे जो उन्हें बिलकुल अज्ञात था? इसलिये यह स्पष्ट है, कि इस्राएलियों ने उसकी महिमा की जो व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा परमेश्वर के रूप में प्रचारित है, जो हमारे प्रभु का पिता भी है; और इसलिये उसने उन चिह्नों के द्वारा जो उसने पूरे किए, उनकी इन्द्रियों के प्रमाण से, मनुष्यों को परमेश्वर की महिमा देना सिखाया. यदि, तौभी, वह स्वयं दूसरे पिता से आया होता, और मनुष्यों ने उसके आश्चर्यकर्म देखकर भिन्न पिता की महिमा की होती, तो वह [उस दशा में] उन्हें उस पिता के प्रति कृतघ्न कर देता जिसने चंगाई का दान भेजा था. पर क्योंकि एकलौता पुत्र मनुष्य के उद्धार के लिये उस से आया था जो परमेश्वर है, उसने उन अविश्वासियों को, जो आश्चर्यकर्म वह करता रहता था उन से, पिता की महिमा देने को जगाया; और फरीसियों से, जो उसके पुत्र के आगमन को नहीं मानते थे, और इसलिये उसके द्वारा दी गई [पापों की] क्षमा पर विश्वास नहीं करते थे, उसने कहा, "कि तुम जानो कि मनुष्य के पुत्र को पाप क्षमा करने का अधिकार है."(5) और जब उसने यह कहा, उसने लकवे के मनुष्य को आज्ञा दी कि जिस खाट पर वह पड़ा था उसे उठाए, और अपने घर में जाए. अपने इस काम से उसने अविश्वासियों को लज्जित किया, और दिखाया कि वह स्वयं परमेश्वर का शब्द है, जिस से मनुष्य ने आज्ञाएँ पाईं, जिन्हें उसने तोड़ा, और पापी हुआ; क्योंकि लकवा पापों के परिणाम के रूप में आया.
3. इसलिये, पाप क्षमा करके, उसने सचमुच मनुष्य को चंगा किया, और साथ ही अपने आप को प्रगट किया कि वह कौन था. क्योंकि यदि परमेश्वर को छोड़ कोई पाप क्षमा नहीं कर सकता, जबकि प्रभु ने उन्हें क्षमा किया और मनुष्यों को चंगा किया, तो यह स्पष्ट है कि वह स्वयं परमेश्वर का वचन था जो मनुष्य का पुत्र बनाया गया, पिता से पापों की क्षमा का अधिकार पाते हुए; क्योंकि वह मनुष्य था, और क्योंकि वह परमेश्वर था, इसलिये कि जैसे मनुष्य के रूप में उसने हमारे लिये दुख उठाया, वैसे परमेश्वर के रूप में वह हम पर दया करे, और हमारे ऋण हमें क्षमा करे, जिन में हम अपने सृजनहार परमेश्वर के ऋणी बनाए गए थे. और इसलिये दाऊद ने पहले कहा, "धन्य हैं वे जिनके अधर्म क्षमा हुए, और जिनके पाप ढाँपे गए. धन्य है वह मनुष्य जिसे प्रभु ने पाप नहीं गिना;"(6) इस प्रकार उसके आगमन के बाद आनेवाली पापों की क्षमा को दिखाते हुए, जिस से "उसने हमारे ऋण का लिखा हुआ लेख नष्ट किया," और "उसे क्रूस पर ठोंक दिया;"(7) कि जैसे एक वृक्ष के द्वारा हम परमेश्वर के ऋणी बनाए गए, [वैसे ही] एक वृक्ष के द्वारा हम अपने ऋण की क्षमा पा सकें.
3. यह तथ्य बहुत औरों के द्वारा प्रबल रूप से रखा गया है, और विशेषकर भविष्यद्वक्ता एलीशा के द्वारा. क्योंकि जब उसके साथी भविष्यद्वक्ता एक निवास के निर्माण के लिये लकड़ी काट रहे थे, और जब गँड़ासे से ढीला होकर गिरा लोहे का [फल] यरदन में गिर गया और उनके द्वारा नहीं पाया जा सका, एलीशा के उस स्थान पर आने पर, और जो हुआ था उसे जानकर, उसने कुछ लकड़ी पानी में डाली. तब, जब उसने यह किया, गँड़ासे का लोहे का भाग ऊपर तैर आया, और उन्होंने पानी की सतह से वह उठा लिया जिसे उन्होंने पहले खोया था.(8) इस काम से भविष्यद्वक्ता ने दिखाया कि परमेश्वर का निश्चित वचन, जिसे हम ने एक वृक्ष के द्वारा लापरवाही से खोया था, और फिर पाने के मार्ग में नहीं थे, एक वृक्ष के प्रबन्ध से हम नए सिरे से पाएँगे, [अर्थात्, मसीह का क्रूस]. क्योंकि परमेश्वर का वचन एक गँड़ासे के समान बताया जाता है, यह बपतिस्मा देनेवाला यूहन्ना [जब वह कहता है] उसके विषय घोषित करता है, "पर अब भी गँड़ासा वृक्षों की जड़ पर रखा गया है."(9) यिर्मयाह भी इसी आशय से कहता है: "परमेश्वर का वचन गँड़ासे के समान चट्टान को चीरता है."(10) तब यह वचन, जो हम से छिपा था, वृक्ष के प्रबन्ध ने प्रगट किया, जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ. क्योंकि जैसे हम ने उसे एक वृक्ष के द्वारा खोया, एक वृक्ष के द्वारा फिर वह सब पर प्रगट किया गया, अपने में ऊँचाई, लम्बाई, चौड़ाई, गहराई दिखाते हुए; और, जैसा हमारे पूर्वजों में एक मनुष्य ने देखा, "एक दिव्य व्यक्ति के हाथों के विस्तार के द्वारा,(11) दो प्रजाओं को एक परमेश्वर के पास इकट्ठा करते हुए."
क्योंकि ये दो हाथ थे, क्योंकि पृथ्वी के छोरों तक तितर बितर दो प्रजाएँ थीं; पर बीच में एक सिर था, जैसा एक ही परमेश्वर है, जो सब के ऊपर है, और सब के द्वारा है, और हम सब में है.
अध्याय 18.--परमेश्वर पिता और उसके वचन ने सब सृजी हुई वस्तुओं को (जिन का वे उपयोग करते हैं) अपनी निज शक्ति और बुद्धि से रचा है, दोष से या अज्ञान से नहीं. परमेश्वर का पुत्र, जिसने पिता से सब अधिकार पाया, अन्यथा कभी अपने ऊपर देह न लेता.
1. और ऐसा या इतना महत्वपूर्ण प्रबन्ध उसने औरों की सृष्टियों के द्वारा नहीं किया, पर अपनी निज के द्वारा; और न उन वस्तुओं के द्वारा जो अज्ञान और दोष से रची गईं, पर उन के द्वारा जिन का सार उसके पिता की बुद्धि और शक्ति से था. क्योंकि वह न अधर्मी था, कि वह दूसरे की सम्पत्ति की लालसा करे; न दरिद्र, कि वह अपने निज साधनों से अपनों को जीवन न दे सके, और मनुष्य के उद्धार के लिये अपनी निज सृष्टि का उपयोग न कर सके. क्योंकि सचमुच सृष्टि उसे [क्रूस पर] सम्हाल न सकती थी, यदि उसने [केवल नियुक्ति से] उसे भेजा होता जो अज्ञान और दोष का फल था. अब हम ने बार बार दिखाया है कि देहधारी परमेश्वर का वचन एक वृक्ष पर लटकाया गया, और विधर्मी स्वयं भी मानते हैं कि वह क्रूस पर चढ़ाया गया. तब, अज्ञान और दोष का फल उसे कैसे सम्हाल सकता था जो सब बातों का ज्ञान रखता है, और सच्चा और सिद्ध है? या वह सृष्टि जो पिता से छिपाई गई थी, और उस से दूर हटाई गई थी, उसके वचन को कैसे सम्हाल सकती थी? और यदि यह जगत स्वर्गदूतों के द्वारा बनाया गया होता (इस से कुछ नहीं कि हम उनका अज्ञान मानें या सर्वोच्च परमेश्वर का उनका ज्ञान), जब प्रभु ने घोषित किया, "क्योंकि मैं पिता में हूँ, और पिता मुझ में है,"(1) तो स्वर्गदूतों की यह कारीगरी एक साथ पिता और पुत्र का भार कैसे सह सकती थी? फिर, प्लेरोमा के परे की वह सृष्टि उसे कैसे रख सकती थी जो पूरे प्लेरोमा को रखता है?
तो, क्योंकि ये सब बातें असम्भव हैं और प्रमाण के अयोग्य हैं, कलीसिया का वह प्रचार ही सत्य है [जो प्रचार करता है] कि उसकी निज सृष्टि ने उसे सम्हाला, जो परमेश्वर की शक्ति, निपुणता, और बुद्धि से बनी है; जो सचमुच अदृश्य रीति से पिता के द्वारा सम्हाली जाती है, पर, इसके विपरीत, दृश्य रीति से उसने उसके वचन को सम्हाला: और यही सच्चा [वचन] है.
2. क्योंकि पिता सृष्टि को और अपने निज वचन को एक साथ सम्हालता है, और पिता के द्वारा सम्हाला गया वचन सब को आत्मा देता है जैसा पिता चाहता है.(2) कुछ को वह सृष्टि की रीति से वह देता है जो बनाया गया है;(3) पर औरों को [वह देता है] दत्तक ग्रहण की रीति से, अर्थात्, जो परमेश्वर से है, वही जन्म. और इस प्रकार एक परमेश्वर पिता घोषित होता है, जो सब के ऊपर है, और सब के द्वारा है, और सब में है. पिता सचमुच सब के ऊपर है, और वह मसीह का सिर है; पर वचन सब बातों के द्वारा है, और स्वयं कलीसिया का सिर है; जबकि आत्मा हम सब में है, और वह जीवित जल है,(4) जिसे प्रभु उन को देता है जो उस पर ठीक विश्वास करते हैं, और उससे प्रेम करते हैं, और जो जानते हैं कि "एक पिता है, जो सब के ऊपर है, और सब के द्वारा है, और हम सब में है."(5) और इन बातों की प्रभु का चेला यूहन्ना भी गवाही देता है, जब वह सुसमाचार में इस प्रकार कहता है: "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था. यह आदि में परमेश्वर के साथ था. सब कुछ उसके द्वारा बना, और उसके बिना कुछ नहीं बना."(6) और तब उसने वचन के विषय स्वयं कहा: "वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा बना, और जगत ने उसे नहीं जाना. वह अपनी निज वस्तुओं के पास आया, और उसके निज लोगों ने उसे ग्रहण नहीं किया.
तौभी, जितनों ने उसे ग्रहण किया, उन्हें उसने परमेश्वर के पुत्र होने का अधिकार दिया, उन को जो उसके नाम पर विश्वास करते हैं."(7) और फिर, उसके मानवीय स्वभाव के विषय प्रबन्ध को दिखाते हुए, यूहन्ना ने कहा: "और वचन देहधारी हुआ, और हमारे बीच रहा."(8) और आगे वह कहता है, "और हम ने उसकी महिमा देखी, जैसी पिता से एकलौते की महिमा, अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण." इस प्रकार वह सुनने को तैयार लोगों को, अर्थात् कानोंवालों को, स्पष्ट दिखाता है, कि एक परमेश्वर है, सब के ऊपर पिता, और परमेश्वर का एक वचन, जो सब के द्वारा है, जिसके द्वारा सब कुछ बना है; और कि यह जगत उसका है, और पिता की इच्छा के अनुसार उसके द्वारा बना, स्वर्गदूतों के द्वारा नहीं; और न धर्मत्याग, दोष, और अज्ञान के द्वारा; और न प्रुनिकस की किसी शक्ति के द्वारा, जिसे उन में से कुछ "माता" भी कहते हैं; और न जगत के किसी अन्य बनानेवाले के द्वारा जो पिता को नहीं जानता.
3. क्योंकि जगत का सृजनहार सचमुच परमेश्वर का वचन है: और यही हमारा प्रभु है, जो अन्तिम समयों में मनुष्य बना, इस जगत में विद्यमान, और जो अदृश्य रीति से सब सृजी हुई वस्तुओं को रखता है, और सारी सृष्टि में अन्तर्यामी है, क्योंकि परमेश्वर का वचन शासन करता है और व्यवस्थित करता है सब
बातों को; और इसलिये वह दृश्य(1) रीति से अपने निज के पास आया, और देहधारी हुआ, और वृक्ष पर लटका, कि वह सब कुछ अपने में समेटे. "और उसकी निज प्रजा ने उसे ग्रहण नहीं किया," जैसा मूसा ने प्रजा के बीच यही बात घोषित की: "और तेरा जीवन तेरी आँखों के सामने लटका रहेगा, और तू अपने जीवन पर विश्वास न करेगा."(2) इसलिये जिन्होंने उसे ग्रहण नहीं किया उन्होंने जीवन ग्रहण नहीं किया. "पर जितनों ने उसे ग्रहण किया, उन्हें उसने परमेश्वर के पुत्र होने का अधिकार दिया."(3) क्योंकि पिता से सब पर अधिकार उसी के पास है, क्योंकि वह परमेश्वर का वचन है, और सच्चा मनुष्य, बुद्धि की रीति से अदृश्य सत्ताओं के साथ संगति करता हुआ, और बाहरी इन्द्रियों को दिखाई देनेवाली व्यवस्था ठहराता हुआ, कि सब बातें अपनी अपनी व्यवस्था में बनी रहें; और वह दृश्य बातों पर और मनुष्यों से सम्बन्धित बातों पर प्रगट रूप से राज्य करता है; और सब पर न्यायपूर्ण और योग्य न्याय लाता है; जैसा दाऊद भी, इसे स्पष्ट दिखाते हुए, कहता है, "हमारा परमेश्वर खुलकर आएगा, और चुप न रहेगा."(4) तब वह उसके द्वारा लाए गए न्याय को भी दिखाता है, यह कहकर, "उसकी दृष्टि में आग जलेगी, और प्रबल आँधी उसके चारों ओर गरजेगी. वह ऊपर से स्वर्ग को, और पृथ्वी को, अपनी प्रजा का न्याय करने को बुलाएगा."
अध्याय 19.--अनाज्ञाकारिणी और पाप करनेवाली हव्वा और उसकी संरक्षिका कुँवारी मरियम के बीच तुलना की जाती है. विविध और विरोध की पाखण्डों का उल्लेख है.
1. तब प्रभु अपने निज पदार्थों के पास स्पष्ट रूप से आ रहा था, और उस सृष्टि के द्वारा उन्हें सम्भाल रहा था जो उसके ही द्वारा सम्भाली जाती है, और एक वृक्ष के सम्बन्ध में हुई उस अनाज्ञाकारिता का पुनःसंग्रह कर रहा था, उस आज्ञाकारिता के द्वारा जो एक वृक्ष पर [उसने स्वयं दिखाई जब वह टँगा] थी, उस छल के [परिणाम] भी मिटाए जा रहे थे, जिस से वह कुँवारी हव्वा, जो पहले से एक पुरुष को वाग्दत्त थी, दुर्भाग्य से बहकाई गई,--सुखद रूप से सुनाया गया, दूत के द्वारा कुँवारी मरियम से [कहे गए] सत्य के साधन से, जो [भी वाग्दत्त थी] एक पुरुष को.(5) क्योंकि जैसे पहिली एक दूत के वचन से बहकाई गई, यहाँ तक कि वह परमेश्वर के वचन का उल्लंघन करके परमेश्वर से भाग गई; वैसे ही पिछली ने, एक स्वर्गदूतीय सन्देश से, यह शुभ समाचार पाया कि वह परमेश्वर को धारण करेगी (portaret), उसके वचन की आज्ञा मानती हुई. और यदि पहिली ने परमेश्वर की आज्ञा टाली, तौभी पिछली परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिये मना ली गई, ताकि कुँवारी मरियम कुँवारी हव्वा की संरक्षिका(6) (advocata) बने. और इस प्रकार, जैसे मनुष्यजाति एक कुँवारी के द्वारा मृत्यु की दासता में पड़ी, वैसे ही वह एक कुँवारी के द्वारा छुड़ाई जाती है; कुँवारी अनाज्ञाकारिता विपरीत पलड़े में कुँवारी आज्ञाकारिता से सन्तुलित हुई. क्योंकि उसी रीति से पहले सृजे गए मनुष्य का (protoplasti) पाप प्रथमजात के सुधार से सुधार पाता है, और सर्प का आना कबूतर की निर्दोषता से जीता जाता है, वे बन्धन खुलते हुए जिन से हम मृत्यु से कसे बँधे थे.
2. मिथ्याशिक्षक सब अशिक्षित हैं और परमेश्वर की व्यवस्थाओं से अनजान हैं, और उस प्रबन्ध से परिचित नहीं जिस से उसने मानवीय स्वभाव अपने ऊपर लिया (inscii ejus quoe est secundum hominem dispensationis), क्योंकि वे सत्य के विषय में अपने को अन्धे कर लेते हैं, और वास्तव में अपने ही उद्धार के विरुद्ध बोलते हैं. उन में से कुछ सृष्टिकर्ता को छोड़ एक और पिता को प्रवेश कराते हैं; कुछ, फिर, कहते हैं कि संसार और उसका सार कुछ स्वर्गदूतों से बनाया गया; कुछ और [मानते हैं] कि यह होरोस(7) के द्वारा उससे बहुत अलग कर दिया गया जिसे वे पिता बताते हैं--कि यह अपने आप से फूटा (floruisse), और अपने ही से जन्मा. फिर, दूसरे [उन में से दृढ़ करते हैं] कि यह उन बातों में सार पाया जो पिता के द्वारा रखी हैं, दोष और अज्ञान से; और भी दूसरे, इन्द्रियों पर [प्रकट] प्रभु के आगमन को तुच्छ जानते हैं, क्योंकि वे उसके देहधारण को नहीं मानते; और दूसरे, कुँवारी से [उसके जन्म लेने की] व्यवस्था को छोड़कर, main-rain कि वह यूसुफ से जन्माया गया. और आगे भी, कुछ दृढ़ करते हैं कि न उनका प्राण और न उनका शरीर अनन्त जीवन पा सकता है, केवल भीतरी मनुष्य. और वे यह चाहते हैं कि यह [भीतरी मनुष्य] वही है जो उन में समझ (sensum) है, और जिसे वे "सिद्ध" के पास चढ़नेवाली एकमात्र वस्तु ठहराते हैं. दूसरे [मानते हैं], जैसा मैं ने पहली पुस्तक में कहा है, कि प्राण उद्धार पाता है, उनका शरीर उस उद्धार में भागी नहीं होता जो परमेश्वर से आता है; जिस [पुस्तक] में मैं ने इन सब मनुष्यों की कल्पनाएँ भी आगे रखी हैं, और दूसरी में उनकी दुर्बलता और असंगति दिखा दी है.
अध्याय बीस.--जिन रखवालों को प्रेरितों ने कलीसियाएँ सौंपीं, वे सुने जाएँ, वे उद्धार की एक ही शिक्षा रखते हैं; दूसरी ओर, मिथ्याशिक्षकों से बचना चाहिए. विश्वास के रहस्यों के विषय में हमें संयम से विचार करना चाहिए.
1. अब ये सब [मिथ्याशिक्षक] उन बिशपों से बहुत बाद के हैं जिन को प्रेरितों ने कलीसियाएँ सौंपीं; इस तथ्य को मैं ने तीसरी पुस्तक में दिखाने की पूरी चेष्टा की है. तब स्वभावतः यह निकलता है, कि ये
ऊपर कहे मिथ्याशिक्षक, क्योंकि वे सत्य के लिये अन्धे हैं, और [ठीक] मार्ग से हटते हैं, नाना राहों पर चलेंगे; इसलिए उनकी शिक्षा के पदचिह्न सहमति या सम्बन्ध के बिना इधर उधर बिखरे हैं. पर कलीसिया के लोगों का मार्ग सारे संसार को घेरता है, प्रेरितों से निश्चित परम्परा रखते हुए, और हमें यह देखने देता है कि सब का विश्वास एक ही है, क्योंकि सब एक ही पिता परमेश्वर को पाते हैं, और परमेश्वर के पुत्र के देहधारण के विषय में उसी व्यवस्था पर विश्वास करते हैं, और आत्मा के उसी वर को जानते हैं, और उन्हीं आज्ञाओं से परिचित हैं, और कलीसियाई विधान के उसी रूप को बनाए रखते हैं,(1) और प्रभु के उसी आगमन की आशा करते हैं, और सम्पूर्ण मनुष्य के उसी उद्धार की बाट जोहते हैं, अर्थात् प्राण और शरीर के उद्धार की. और निस्सन्देह कलीसिया का प्रचार सत्य और स्थिर है, जिस में उद्धार का एक ही मार्ग सारे संसार में दिखाया जाता है. क्योंकि उसे परमेश्वर का प्रकाश सौंपा गया है; इसलिए परमेश्वर की "बुद्धि," जिस के द्वारा वह सब मनुष्यों को बचाती है, "अपने निकलने में प्रचार की जाती है; वह सड़कों में विश्वासयोग्यता से [अपनी वाणी] बोलती है, दीवारों की चोटियों पर प्रचार की जाती है, और नगर के फाटकों में निरन्तर बोलती है."(3) क्योंकि कलीसिया सर्वत्र सत्य का प्रचार करती है, और वह सात शाखाओंवाला दीवट है जो मसीह का प्रकाश धारण करता है.
2. इसलिए, जो कलीसिया के प्रचार को छोड़ देते हैं, वे पवित्र प्राचीनों के ज्ञान पर सन्देह करते हैं, यह विचार में न लाते हुए कि एक धार्मिक मनुष्य, एकान्त पद में भी, निन्दा करनेवाले और निर्लज्ज सोफिस्ट से कितना अधिक महत्व रखता है.(4) अब, सब मिथ्याशिक्षक ऐसे ही हैं, और वे जो यह सोचते हैं कि उन्होंने सत्य से परे कुछ और पा लिया है, यहाँ तक कि पहले कही बातों को मानकर, अपने मार्ग पर नाना प्रकार से, असंगत रूप से, और मूर्खता से बढ़ते हुए, उन्हीं बातों के विषय में सदा वही विचार न रखते हुए, जैसे अन्धे अन्धों से चलाए जाते हैं, वे योग्य रीति से अपने मार्ग में पड़ी अज्ञान की खाई में गिरेंगे, सदा खोजते हुए और सत्य को कभी न पाते हुए.(5) इसलिए हमें उनकी शिक्षाओं से बचना चाहिए, और चौकसी से सावधान रहना चाहिए कि हम उन से कोई हानि न पाएँ; पर कलीसिया की ओर भागना चाहिए, और उसकी गोद में पाला जाना चाहिए, और प्रभु के लेखों से पोषित होना चाहिए. क्योंकि कलीसिया इस संसार में एक बारी के रूप में (paradisus) लगाई गई है; इसलिए परमेश्वर का आत्मा कहता है, "बारी के हर वृक्ष से तू स्वतन्त्रता से खा सकता है,"(6) अर्थात्, प्रभु के हर लेख से खाओ; पर तुम ऊँचे मन से न खाना, और न किसी मिथ्याशिक्षा के झगड़े को छूना. क्योंकि ये मनुष्य मानते हैं कि भले और बुरे का ज्ञान उन्हीं के पास है; और वे अपने अधर्मी मनों को उस परमेश्वर से ऊपर रखते हैं जिस ने उन्हें बनाया. इसलिए वे समझ की सीमाओं से परे जो है उस पर विचार बनाते हैं. इसी कारण प्रेरित भी कहता है, "जो ज्ञानी होना उचित है उस से आगे ज्ञानी मत बनो, पर समझदारी से ज्ञानी बनो,"(7) ताकि इन मनुष्यों के "ज्ञान" को खाने से (वह ज्ञान जो जितना जानना चाहिए उस से अधिक जानता है) हम जीवन की बारी से बाहर न फेंके जाएँ.
इस बारी में प्रभु ने उन को प्रवेश कराया जो उसकी बुलाहट मानते हैं, "स्वर्ग में की सब बातों को, और पृथ्वी पर की बातों को अपने में समेटते हुए;"(8) पर स्वर्ग की बातें आत्मिक हैं, जब कि पृथ्वी की बातें मानवीय स्वभाव में प्रबन्ध को बनाती हैं (secundum hominem est dispositio). इसलिए इन बातों को उसने अपने में पुनःसंग्रह किया: मनुष्य को आत्मा से जोड़कर, और आत्मा को मनुष्य में वास कराकर, वह आप आत्मा का सिर ठहराया गया है, और आत्मा को मनुष्य का सिर होने को देता है: क्योंकि उसके (आत्मा के) द्वारा हम देखते, और सुनते, और बोलते हैं.
अध्याय इक्कीस.--पहले कही हुई सब बातों का सिर मसीह है. यह उचित था कि सब वस्तुओं का सृष्टिकर्ता पिता उसे भेजे, मानवीय स्वभाव धारण करने को, और शैतान से उसकी परीक्षा हो, ताकि वह प्रतिज्ञाओं को पूरा करे, और एक महिमामय और सिद्ध जय ले जाए.
1. इसलिए उसने, अपने पुनःसंग्रह के काम में, सब बातों को समेटा है, हमारे शत्रु से युद्ध भी करता हुआ, और उसे कुचलता हुआ जिस ने आदि में आदम में हमें बन्दी बनाकर ले गया, और उसके सिर को रौंदता हुआ, जैसा तू उत्पत्ति में देख सकता है कि परमेश्वर ने सर्प से कहा, "और मैं तेरे और स्त्री के बीच, और तेरे वंश और उसके वंश के बीच बैर रखूँगा; वह तेरे सिर की ताक में रहेगा (observabit(9)), और तू उसकी एड़ी की ताक में रहेगा."(10) क्योंकि उस समय से, जो स्त्री से जन्म लेना था, [अर्थात्] कुँवारी से, आदम की समानता के अनुसार, सर्प के सिर की ताक में रहनेवाला प्रचार किया गया. यही वह बीज है जिस के विषय में प्रेरित गलातियों की पत्री में कहता है, "कि कर्मों की व्यवस्था तब तक स्थिर की गई जब तक वह बीज आए जिस से प्रतिज्ञा की गई थी."(11) यही बात उसी पत्री में और भी उजले प्रकाश में दिखाई जाती है, जहाँ वह इस प्रकार कहता है: "पर जब समय की पूर्णता आई, परमेश्वर
अपने पुत्र को भेजा, जो स्त्री से बना."(1) क्योंकि सचमुच शत्रु न्याय से नहीं हारा होता, यदि स्त्री से [जन्मा] एक मनुष्य उसे न जीतता. क्योंकि स्त्री के द्वारा ही उसने पहले मनुष्य पर बढ़त पाई, अपने को मनुष्य का विरोधी ठहराकर. इसलिए प्रभु अपने को मनुष्य का पुत्र मानता है, उस मूल मनुष्य को अपने में समेटे हुए जिस से स्त्री गढ़ी गई (ex quo ea quae secundum mulierem est plasmatio facta est), ताकि जैसे हमारी जाति एक हारे हुए मनुष्य के द्वारा मृत्यु तक उतरी, वैसे हम एक जयवन्त के द्वारा फिर जीवन तक चढ़ें; और जैसे एक मनुष्य के द्वारा मृत्यु ने हमारे विरुद्ध [जय की] ताड़ की डाल पाई, वैसे फिर एक मनुष्य के द्वारा हम मृत्यु के विरुद्ध ताड़ की डाल पाएँ.
2. अब प्रभु अपने में सर्प के विरुद्ध उस प्राचीन और आदि बैर का पुनःसंग्रह न करता, सृष्टिकर्ता (Demiurgi) की प्रतिज्ञा को पूरा करता, और उसकी आज्ञा को करता, यदि वह दूसरे पिता से आया होता. पर वह एक ही और वही है, जिस ने आदि में हमें रचा, और अन्त में अपने पुत्र को भेजा, प्रभु ने उसकी आज्ञा पूरी की, स्त्री से बनाया जाकर, हमारे विरोधी को नष्ट भी करके, और मनुष्य को परमेश्वर के स्वरूप और समानता के अनुसार सिद्ध करके. और इसी कारण उसने उसे भ्रम में डालने का साधन व्यवस्था के वचनों को छोड़ और किसी स्रोत से नहीं लिया, और पिता की आज्ञा को धर्मत्यागी दूत के नाश और भ्रम की ओर सहायता के रूप में काम में लिया. मूसा और एलिय्याह के समान चालीस दिन उपवास करके, वह पीछे भूखा हुआ, पहिले, ताकि हम समझें कि वह वास्तविक और ठोस मनुष्य था--क्योंकि उपवास में भूख सहना मनुष्य का है; और दूसरे, ताकि उसके विरोधी को उस पर आक्रमण का अवसर मिले. क्योंकि जैसे आदि में भोजन के द्वारा [शत्रु] ने मनुष्य को, भूख न सहते हुए भी, परमेश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन करने को मना लिया, वैसे अन्त में वह उस भूखे को उस भोजन को लेने को मनाने में सफल न हुआ जो परमेश्वर से निकला था. क्योंकि, उसे परीक्षा में डालते समय, उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो आज्ञा दे कि ये पत्थर रोटी बन जाएँ."(2) पर प्रभु ने व्यवस्था की आज्ञा से उसे हटा दिया, यह कहकर, "लिखा है, मनुष्य केवल रोटी से नहीं जीता."(3) '[उसके शत्रु के] उन वचनों के विषय में, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है," [प्रभु] ने कोई टिप्पणी न की; पर इस प्रकार अपने मानवीय स्वभाव को मानकर उसने अपने विरोधी को विफल किया, और अपने पिता के वचन के द्वारा उसके पहले आक्रमण के बल को क्षीण कर दिया.
इसलिए मनुष्य की भ्रष्टता, जो बारी में दोनों [हमारे पहले माता-पिता] के खाने से हुई, इस संसार में [प्रभु के] भोजन के अभाव से मिटा दी गई.(4) पर वह, इस प्रकार व्यवस्था से हारा हुआ, फिर अपने आप व्यवस्था की एक आज्ञा को उद्धृत करके आक्रमण करने का यत्न किया. क्योंकि, उसे मन्दिर की सबसे ऊँची चोटी पर लाकर, उसने उससे कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने को नीचे गिरा दे. क्योंकि लिखा है, कि परमेश्वर अपने दूतों को तेरे विषय में आज्ञा देगा, और वे तुझे अपने हाथों पर उठा लेंगे, कहीं ऐसा न हो कि तू अपना पाँव पत्थर से टकराए;"(5) इस प्रकार शास्त्र के भेष के नीचे झूठ को छिपाते हुए, जैसा सब मिथ्याशिक्षक करते हैं. क्योंकि वह सचमुच लिखा था, [अर्थात्], "कि उसने अपने दूतों को उसके विषय में आज्ञा दी है;" पर "यहाँ से अपने को नीचे गिरा दे" उसके विषय में किसी शास्त्र ने नहीं कहा: इस प्रकार का मनाना शैतान ने अपने ही से निकाला. इसलिए प्रभु ने व्यवस्था से उसका खण्डन किया, जब उसने कहा, "फिर लिखा है, तू अपने प्रभु परमेश्वर की परीक्षा न करना;"(6) व्यवस्था में रहे वचन से मनुष्य का कर्तव्य दिखाते हुए, कि वह परमेश्वर की परीक्षा न करे; और अपने विषय में, क्योंकि वह मानवीय रूप में दिखाई दिया, [घोषित करते हुए] कि वह अपने प्रभु परमेश्वर की परीक्षा न करेगा.(7) इसलिए जो तर्क का गर्व सर्प में था, वह [मसीह] मनुष्य में पाई गई दीनता से व्यर्थ किया गया, और अब दो बार शैतान शास्त्र से जीता गया, जब वह परमेश्वर की आज्ञा के विरुद्ध बातें सलाह देनेवाला पकड़ा गया, और अपनी सोच [की अभिव्यक्ति] से परमेश्वर का शत्रु दिखाया गया.
तब वह, इस प्रकार स्पष्ट रूप से हारा हुआ, और फिर, मानो, अपनी सेनाओं को समेटते हुए, झूठ के लिये अपनी सारी उपलब्ध शक्ति को क्रम से खड़ा करते हुए, तीसरे स्थान पर "उसे संसार के सब राज्य, और उनकी महिमा, दिखाए,"(8) जैसा लूका बताता है, यह कहकर, "ये सब मैं तुझे दूँगा,--क्योंकि वे मुझे सौंपे गए हैं; और जिस को मैं चाहूँ, उन्हें देता हूँ,--यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे." तब प्रभु, उसे उसके सच रूप में खोलते हुए, कहता है, "चला जा, शैतान; क्योंकि लिखा है, तू अपने प्रभु परमेश्वर को प्रणाम करना, और केवल उसी की सेवा करना."(9) इस नाम से उसने उसे प्रगट किया, और [उसी समय] दिखाया कि वह आप कौन है. क्योंकि इब्री शब्द "शैतान" एक धर्मत्यागी का अर्थ देता है. और इस प्रकार, उसे तीसरी बार जीतकर, उसने उसे अन्त में अपने से ठुकरा दिया, व्यवस्था से जीता हुआ मानकर; और परमेश्वर की आज्ञा का वह उल्लंघन जो आदम में हुआ था मिटा दिया गया, व्यवस्था की आज्ञा के द्वारा, जिसे मनुष्य के पुत्र ने ob-
माना, जिस ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया.
3. तो, यह प्रभु परमेश्वर कौन है जिस की मसीह साक्षी देता है, जिस की कोई मनुष्य परीक्षा न करेगा, जिस को सब को प्रणाम करना चाहिए, और केवल उसी की सेवा करनी चाहिए? वह, हर प्रकार के सन्देह से परे, वह परमेश्वर है जिस ने व्यवस्था भी दी. क्योंकि ये बातें व्यवस्था में पहले कही गई थीं, और व्यवस्था के वचनों (sententiam) से प्रभु ने दिखाया कि व्यवस्था सचमुच पिता से परमेश्वर के वचन को प्रगट करती है; और परमेश्वर का धर्मत्यागी दूत उसकी वाणी से नाश किया जाता है, अपने सच रंगों में खोला जाकर, और परमेश्वर की आज्ञा माननेवाले मनुष्य के पुत्र से जीता जाकर. क्योंकि जैसे आदि में उसने मनुष्य को उसके सृष्टिकर्ता की व्यवस्था तोड़ने को लुभाया, और इस से उसे अपने वश में कर लिया; तौभी उसका वश उल्लंघन और धर्मत्याग में है, और इन्हीं से उसने मनुष्य को [अपने साथ] बाँधा; वैसे फिर, दूसरी ओर, यह आवश्यक था कि मनुष्य ही के द्वारा वह, जब जीता जाए, उन्हीं जंजीरों से बाँधा जाए जिन से उसने मनुष्य को बाँधा था, ताकि मनुष्य, छुड़ाया जाकर, अपने प्रभु की ओर लौटे, उसे (शैतान को) वे बन्धन छोड़ दे जिन से वह आप जकड़ा गया था, अर्थात् पाप. क्योंकि जब शैतान बँधा है, मनुष्य छुड़ाया जाता है; क्योंकि "कोई बलवान के घर में घुसकर उसका माल लूट नहीं सकता, जब तक वह पहिले बलवान को आप न बाँध ले."(1) इसलिए प्रभु उसे उस परमेश्वर के वचन के विरुद्ध बोलनेवाला खोलता है जिस ने सब कुछ बनाया, और आज्ञा के द्वारा उसे वश में करता है. अब व्यवस्था परमेश्वर की आज्ञा है. मनुष्य उसे व्यवस्था से भागा हुआ और उसका उल्लंघन करनेवाला, और परमेश्वर से भी धर्मत्यागी ठहराता है. [मनुष्य के यह करने के] बाद, वचन ने उसे अपने से भागे हुए के रूप में दृढ़ता से बाँधा, और उसका माल लूट लिया,--अर्थात्, वे मनुष्य जिन को वह दासत्व में रखे था, और जिन को उसने अपने कामों के लिये अन्याय से काम में लिया.
और सचमुच न्याय से ही वह बन्दी बनाकर ले जाया जाता है, जिस ने मनुष्यों को अन्याय से दासत्व में ले गया था; जब कि मनुष्य, जो बीते समयों में बन्दी बनाकर ले जाया गया था, अपने स्वामी की पकड़ से छुड़ाया गया, पिता परमेश्वर की कोमल दया के अनुसार, जिस ने अपनी ही हाथ की कारीगरी पर तरस खाया, और उसे उद्धार दिया, वचन के द्वारा--अर्थात् मसीह के द्वारा--उसे फिर स्थापित करते हुए, ताकि मनुष्य वास्तविक प्रमाण से सीखें कि वह अविनाशिता अपने आप से नहीं, पर परमेश्वर के सेंतमेंत दान से पाता है.
अध्याय बाईस.--सच्चा प्रभु और एक परमेश्वर व्यवस्था से प्रगट किया जाता है, और उसके पुत्र मसीह से सुसमाचार में दिखाया जाता है; उसी को ही हमें दण्डवत् करना चाहिए, और सब अच्छी बातें उसी से देखनी चाहिए, शैतान से नहीं.
1. इस प्रकार प्रभु स्पष्ट दिखाता है कि सच्चा प्रभु और एक परमेश्वर वही था जो व्यवस्था से रखा गया था; क्योंकि जिस को व्यवस्था ने परमेश्वर कहकर प्रचार किया, उसी को मसीह ने पिता दिखाया, जिस की अकेली सेवा मसीह के चेले करें. व्यवस्था की बातों के द्वारा उसने हमारे विरोधी को पूरे भ्रम में डाल दिया; और व्यवस्था हमें सृष्टिकर्ता (Demiurgum) परमेश्वर की स्तुति करने, और केवल उसी की सेवा करने को चलाती है. जब यह ऐसा है, हमें उसके सिवा, या उसके ऊपर, दूसरे पिता को नहीं खोजना चाहिए, क्योंकि एक ही परमेश्वर है जो खतने को विश्वास से धर्मी ठहराता है, और खतनारहित को विश्वास के द्वारा.(2) क्योंकि यदि उसके ऊपर कोई और सिद्ध पिता होता, तो वह (मसीह) उसके वचनों और आज्ञाओं से शैतान को किसी रीति से न गिराता. क्योंकि एक अज्ञान दूसरे अज्ञान से नहीं मिट सकता, जैसे एक दोष दूसरे दोष से नहीं. इसलिए, यदि व्यवस्था अज्ञान और दोष से है, तो उस में की बातें शैतान के अज्ञान को कैसे व्यर्थ कर सकती थीं, और बलवान को कैसे जीत सकती थीं? क्योंकि बलवान न तो छोटे से और न बराबर से जीता जा सकता है, पर अधिक सामर्थ्यवाले से.
पर परमेश्वर का वचन सब से ऊपर श्रेष्ठ है, वह जो व्यवस्था में ऊँचे शब्द से प्रचार किया जाता है: "सुन, हे इस्राएल, तेरा प्रभु परमेश्वर एक ही परमेश्वर है;" और, "तू अपने प्रभु परमेश्वर से अपने सारे हृदय से प्रेम करना;" और, "उसी को तू दण्डवत् करना, और केवल उसी की सेवा करना."(3) तब सुसमाचार में, इन बातों से धर्मत्याग को गिराते हुए, उसने पिता की वाणी से बलवान को जीता, और मानता है कि व्यवस्था की आज्ञा उसके अपने भावों को कहती है, जब वह कहता है, "तू अपने प्रभु परमेश्वर की परीक्षा न करना."(4) क्योंकि उसने विरोधी को किसी और के वचन से भ्रम में नहीं डाला, पर अपने ही पिता के वचन से, और इस प्रकार बलवान को जीत लिया.
2. अपनी आज्ञा से उसने सिखाया कि हम जो छुड़ाए गए हैं, भूखे होने पर, वह भोजन लें जो परमेश्वर देता है; और कि, जब हम हर अनुग्रह [जो पाया जा सकता है] के ऊँचे स्थान पर रखे जाएँ, तो न तो धर्म के कामों पर भरोसा करके, और न अति उत्तम [वरों की] सेवा से सजे होने पर, किसी रीति से घमण्ड से ऊँचे न उठें, और न परमेश्वर की परीक्षा करें, पर सब बातों में दीनता जानें, और हाथ में तैयार रखें [यह बात], "तू अपने प्रभु परमेश्वर की परीक्षा न करना."(5) जैसा प्रेरित ने भी सिखाया, यह कहकर, "ऊँची बातों पर मन न लगाओ, पर नीची दशा की बातों से सहमत हो;"(6) कि हम न धन से, न संसारी महिमा से, न वर्तमान सनक से फँसें, पर जानें कि हमें "अपने प्रभु परमेश्वर को प्रणाम करना, और केवल उसी की सेवा करना" चाहिए, और
उस की ओर ध्यान न देने को जिस ने अपनी न होनेवाली बातों का झूठा वचन दिया, जब उसने कहा, "ये सब मैं तुझे दूँगा, यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे." क्योंकि वह आप मानता है कि उसे दण्डवत् करना, और उसकी इच्छा करना, परमेश्वर की महिमा से गिरना है. जो मनुष्य गिरा है वह किसी सुहावनी या अच्छी बात में कैसे भागी हो सकता है? या ऐसा व्यक्ति मृत्यु को छोड़ और किस बात की आशा या बाट जोह सकता है? क्योंकि मृत्यु गिरे हुए के बिल्कुल पास है. इस से यह भी निकलता है कि वह जो वचन दिया है वह न देगा. क्योंकि वह गिरे हुए को दान कैसे दे सकता है? और, क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों पर और उस पर भी राज्य करता है, और स्वर्ग में हमारे पिता की इच्छा के बिना एक गौरैया भी भूमि पर नहीं गिरती,(1) इस से निकलता है कि उसकी घोषणा, "ये सब बातें मुझे सौंपी गई हैं, और जिस को मैं चाहूँ उसे देता हूँ," उस से तब निकलती है जब वह घमण्ड से फूला होता है. क्योंकि सृष्टि उसके वश में नहीं है, क्योंकि वह आप सृजी हुई वस्तुओं में से एक है. और वह मनुष्यों पर का राज्य मनुष्यों को नहीं देगा; पर और सब बातें, और सब मानवीय काम, पिता परमेश्वर के प्रबन्ध के अनुसार व्यवस्थित हैं. इसके सिवा, प्रभु घोषित करता है कि "शैतान आरम्भ से झूठा है, और सत्य उस में नहीं."(2) यदि वह झूठा है और सत्य उस में नहीं, तो उसने निश्चय सत्य नहीं कहा, पर झूठ कहा, जब उसने कहा, "क्योंकि ये सब बातें मुझे सौंपी गई हैं, और जिस को मैं चाहूँ उसे देता हूँ."(3)
अध्याय तेईस.--शैतान झूठ में अच्छी तरह अभ्यस्त है, जिस से आदम बहकाया जाकर, सृष्टि के छठे दिन पाप किया, जिस दिन वह मसीह से नया भी किया गया है.
1. वह सचमुच पहले ही से परमेश्वर के विरुद्ध झूठ बोलने का आदी हो चुका था, मनुष्यों को बहकाने के लिये. क्योंकि आदि में, जब परमेश्वर ने मनुष्य को भोजन के लिये नाना वस्तुएँ दी थीं, और उसे केवल एक वृक्ष न खाने की आज्ञा दी थी, जैसा शास्त्र हमें बताता है कि परमेश्वर ने आदम से कहा: "बारी के हर वृक्ष से जो उस में है तू भोजन खाना; पर भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष से, इस से तुम न खाना: क्योंकि जिस दिन तुम उस में से खाओगे, उस दिन तुम मृत्यु से मरोगे;"(4) तब वह, प्रभु के विरुद्ध झूठ बोलता हुआ, मनुष्य को परीक्षा में डाले, जैसा शास्त्र कहता है कि सर्प ने स्त्री से कहा: "क्या परमेश्वर ने सचमुच यह कहा है, तुम बारी के हर वृक्ष से न खाना?"(5) और जब उसने झूठ को खोल दिया, और आज्ञा को सरलता से कह दिया, जैसा उसने कहा था, "बारी के हर वृक्ष से हम खाएँगे; पर जो वृक्ष बारी के बीच में है उसके फल के विषय में, परमेश्वर ने कहा है, तुम उस में से न खाना, और न उसे छूना, कहीं तुम मर न जाओ:"(6) जब उसने स्त्री से परमेश्वर की आज्ञा [इस प्रकार] जान ली, अपनी चतुराई को काम में लाकर, अन्त में उसने एक झूठ से उसे ठगा, यह कहकर, "तुम मृत्यु से न मरोगे; क्योंकि परमेश्वर जानता था कि जिस दिन तुम उस में से खाओगे तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम देवताओं के समान होगे, भले और बुरे को जानकर."(7) इसलिए पहिले स्थान में, परमेश्वर की बारी में उसने परमेश्वर के विषय में विवाद किया, मानो परमेश्वर वहाँ न था, क्योंकि वह परमेश्वर की महानता से अनजान था; और फिर, अगले स्थान में, स्त्री से यह जान लेने के बाद कि परमेश्वर ने कहा था कि यदि वे उक्त वृक्ष का स्वाद लें तो मर जाएँ, अपना मुँह खोलकर, उसने तीसरा झूठ बोला," तुम मृत्यु से न मरोगे." पर यह कि परमेश्वर सच्चा था, और सर्प झूठा, परिणाम से सिद्ध हुआ, मृत्यु उन पर आ पड़ी जिन्होंने खाया था.
क्योंकि फल के साथ वे मृत्यु के वश में भी पड़े, क्योंकि उन्होंने अनाज्ञाकारिता में खाया; और परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता मृत्यु लाती है. इसलिए, जब वे मृत्यु के लिये जब्त हुए, उस [क्षण] से वे उसे सौंप दिए गए.
2. इस प्रकार, जिस दिन उन्होंने खाया, उसी दिन वे मर गए, और मृत्यु के ऋणी हुए, क्योंकि वह सृष्टि का एक दिन था. क्योंकि कहा गया है, "सन्ध्या को बना, और भोर को बना, एक दिन." अब इसी दिन जब उन्होंने खाया, उसी में वे मर गए. पर दिनों के चक्र और प्रगति के अनुसार, जिस के बाद एक को पहला, दूसरे को दूसरा, और दूसरे को तीसरा कहा जाता है, यदि कोई यत्न से जानना चाहे कि सात में से किस दिन आदम मरा, तो वह प्रभु के प्रबन्ध को जाँचकर उसे पाएगा. क्योंकि आरम्भ से अन्त तक सारी मनुष्यजाति को अपने में समेटकर, उसने उसकी मृत्यु को भी समेटा है. इस से स्पष्ट है कि प्रभु ने अपने पिता की आज्ञा मानकर उस दिन मृत्यु सही जिस दिन आदम परमेश्वर की आज्ञा टालकर मरा. अब वह उसी दिन मरा जिस दिन उसने खाया. क्योंकि परमेश्वर ने कहा, "जिस दिन तुम उस में से खाओगे, उस दिन तुम मृत्यु से मरोगे." इसलिए प्रभु, इस दिन को अपने में पुनःसंग्रह करते हुए, विश्रामदिन से पहिले के दिन अपनी पीड़ाएँ सहे, अर्थात् सृष्टि के छठे दिन, जिस दिन मनुष्य सृजा गया; इस प्रकार अपनी पीड़ा के द्वारा उसे दूसरी सृष्टि देता हुआ, जो मृत्यु से निकली [सृष्टि] है. और कुछ हैं, जो आदम की मृत्यु को हजारवें वर्ष पर रखते हैं; क्योंकि "प्रभु का एक दिन हजार वर्ष के समान है,"(8) वह हजार वर्ष को लाँघ नहीं गया, उन के भीतर मरा, इस प्रकार अपने पाप की दण्डाज्ञा को पूरा करता हुआ. इसलिए, अनाज्ञाकारिता के विषय में, जो मृत्यु है; चाहे
[हम यह मानते हैं] कि, उस कारण से, वे मृत्यु को सौंप दिए गए, और उसके ऋणी बनाए गए; चाहे [इस तथ्य के विषय में कि] एक ही दिन जिस दिन उन्होंने खाया वे मर भी गए (क्योंकि वह सृष्टि का एक दिन है); चाहे [हम इस बात को मानें], कि, दिनों के इस चक्र के विषय में, वे उसी दिन मरे जिस दिन उन्होंने खाया भी, अर्थात् तैयारी का दिन], जो "शुद्ध भोज" कहा जाता है, अर्थात् पर्व का छठा दिन, जिसे प्रभु ने भी दिखाया जब वह उस दिन दुख उठाया; या [हम यह सोचें] कि वह (आदम) हजार वर्ष को लाँघ नहीं गया, पर उनकी सीमा के भीतर मरा,--इस से निकलता है कि, इन सब अर्थों के विषय में, परमेश्वर सचमुच सच्चा है. क्योंकि जो वृक्ष का स्वाद चखे वे मर गए; और सर्प झूठा और हत्यारा सिद्ध होता है, जैसा प्रभु ने उसके विषय में कहा: "क्योंकि वह आरम्भ से हत्यारा है, और सत्य उस में नहीं."(1)
अध्याय चौबीस.--शैतान के निरन्तर झूठ के विषय में, और संसार की शक्तियों और सरकारों के विषय में, जिन की हमें आज्ञा माननी चाहिए, क्योंकि वे परमेश्वर से ठहराई गई हैं, शैतान से नहीं.
1. इसलिए जैसे शैतान ने आदि में झूठ बोला, वैसे ही अन्त में भी, जब उसने कहा, "ये सब मुझे सौंपे गए हैं, और जिस को मैं चाहूँ उसे देता हूँ."(2) क्योंकि इस संसार के राज्यों को उसने नहीं ठहराया, पर परमेश्वर ने; क्योंकि "राजा का हृदय परमेश्वर के हाथ में है."(3) और वचन भी सुलैमान के द्वारा कहता है, "मुझ से राजा राज्य करते हैं, और प्रधान न्याय करते हैं. मुझ से प्रधान उठाए जाते हैं, और मुझ से राजा पृथ्वी पर राज्य करते हैं."(4) प्रेरित पौलुस भी इसी विषय पर कहता है: "तुम सब ऊँची शक्तियों के अधीन रहो; क्योंकि परमेश्वर को छोड़ कोई शक्ति नहीं: जो हैं वे परमेश्वर से ठहराई गई हैं."(5) और फिर, उनके विषय में वह कहता है, "क्योंकि वह तलवार व्यर्थ नहीं धारण करता; क्योंकि वह परमेश्वर का सेवक है, बुराई करनेवाले पर क्रोध का बदला लेनेवाला."(6) अब, उसने ये वचन स्वर्गदूतीय शक्तियों के विषय में नहीं, और न अदृश्य हाकिमों के विषय में कहे--जैसा कुछ लोग उस अंश की व्याख्या करने का साहस करते हैं-- पर वास्तविक मानवीय अधिकारियों के विषय में, [वह दिखाता है जब] वह कहता है, "इसी कारण तुम कर भी दो: क्योंकि वे परमेश्वर के सेवक हैं, इसी बात के लिये सेवा करते हुए."(7) इसे प्रभु ने भी दृढ़ किया, जब उसने वह नहीं किया जिस की परीक्षा शैतान ने उसे दी; पर उसने आज्ञा दी कि उसके और पतरस के लिये महसूल लेनेवालों को महसूल दिया जाए;(8) क्योंकि "वे परमेश्वर के सेवक हैं, इसी बात के लिये सेवा करते हुए."
2. क्योंकि मनुष्य, परमेश्वर से हटकर, ऐसे क्रोध की चोटी पर पहुँचा कि अपने भाई को भी अपना शत्रु समझने लगा, और निर्भय होकर हर प्रकार के अशान्त आचरण में, और हत्या में, और लोभ में लग गया; परमेश्वर ने मनुष्यजाति पर मनुष्य का भय रखा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के भय को नहीं माना, ताकि मनुष्यों के अधिकार के अधीन होकर, और उनकी व्यवस्थाओं से रोक में रहकर, वे कुछ न्याय तक पहुँचें, और अपनी दृष्टि में पूरी लटकी तलवार के डर से परस्पर सहन करें, जैसा प्रेरित कहता है: "क्योंकि वह तलवार व्यर्थ नहीं धारण करता; क्योंकि वह परमेश्वर का सेवक है, बुराई करनेवाले पर क्रोध का बदला लेनेवाला." और इसी कारण भी, अधिकारी आप, जब कभी वे न्याय और विधिसंगत रीति से चलें, धर्म का वस्त्र रूप व्यवस्थाएँ रखे हुए, अपने आचरण के विषय में पूछे न जाएँगे, और न दण्ड के भागी होंगे. पर जो कुछ वे न्याय के उलटने के लिये, अन्याय से, अधर्म से, विधिविरुद्ध, और अत्याचार से करते हैं, इन बातों में वे भी नाश होंगे; क्योंकि परमेश्वर का न्यायपूर्ण न्याय सब पर समान रूप से आता है, और किसी दशा में दोषयुक्त नहीं. इसलिए पार्थिव शासन जातिओं के लाभ के लिये परमेश्वर से ठहराया गया है,(9) शैतान से नहीं, जो कभी विश्राम में नहीं, वरन् जो जातिओं को शान्त रीति से चलते देखना भी नहीं चाहता, ताकि मानवीय शासन के भय के तले, मनुष्य मछलियों की नाईं एक दूसरे को न खा जाएँ; पर व्यवस्थाओं की स्थापना से, वे जातिओं में दुष्टता के अतिरेक को दबा सकें. और इस दृष्टि से देखा जाए, तो जो हम से कर लेते हैं वे "परमेश्वर के सेवक हैं, इसी प्रयोजन के लिये सेवा करते हुए."
3. तब, "जो शक्तियाँ हैं वे परमेश्वर से ठहराई गई हैं," इस से स्पष्ट है कि शैतान ने झूठ बोला जब उसने कहा, "ये मुझे सौंपी गई हैं; और जिस को मैं चाहूँ, उसे देता हूँ." क्योंकि उसी सत्ता की व्यवस्था से जो मनुष्यों को अस्तित्व में बुलाती है राजा भी ठहराए जाते हैं, उन मनुष्यों के अनुकूल जो उस समय उनकी सरकार के तले रखे हैं. इन [शासकों] में से कुछ अपनी प्रजा के सुधार और लाभ के लिये, और न्याय की रक्षा के लिये दिए जाते हैं; पर दूसरे, भय और दण्ड और डाँट के प्रयोजनों के लिये; दूसरे, जैसा [प्रजा] उसके योग्य है, छल, अपमान, और घमण्ड के लिये; जब कि परमेश्वर का न्यायपूर्ण न्याय, जैसा मैं पहले देख चुका हूँ, सब पर समान रूप से जाता है. पर शैतान, क्योंकि वह धर्मत्यागी दूत है, केवल इतनी दूर तक जा सकता है, जैसा उसने आदि में किया, [अर्थात्] मनुष्य के मन को छलकर परमेश्वर की आज्ञाओं की अनाज्ञा में बहकाने तक, और grad-
उन के हृदयों को अन्धकार करने को, जो उसकी सेवा करने का यत्न करें, सच्चे परमेश्वर को भूलने तक, पर अपने आप को परमेश्वर के रूप में दण्डवत् कराने तक.
4. जैसे यदि कोई, धर्मत्यागी होकर, शत्रु की रीति से दूसरे मनुष्य का प्रदेश छीनकर, उसके निवासियों को सताए, ताकि वह अपनी धर्मत्याग और लूट से अनजान लोगों में राजा की महिमा अपने लिये माँगे; वैसे ही शैतान भी, उन दूतों में से एक होकर जो हवा की आत्मा पर रखे हैं, जैसा प्रेरित पौलुस ने इफिसियों की अपनी पत्री में प्रगट किया है,(1) मनुष्य से डाह करके, ईश्वरीय व्यवस्था से धर्मत्यागी ठहराया गया: क्योंकि डाह परमेश्वर से पराई बात है. और क्योंकि उसकी धर्मत्याग मनुष्य से खोली गई, और मनुष्य उसकी सोचों को जाँचने का [साधन] बना (et examinatio sententioe ejus, homo factus est), उसने और भी अधिक निश्चय से अपने को इस पर लगा लिया है, मनुष्य के विरोध में, उसके जीवन से डाह करते हुए, और उसे अपनी धर्मत्यागी शक्ति में फँसाना चाहते हुए. पर परमेश्वर का वचन, सब का बनानेवाला, मानवीय स्वभाव के द्वारा उसे जीतकर, और उसे धर्मत्यागी दिखाकर, इसके विपरीत, उसे मनुष्य के वश के तले रख दिया है. क्योंकि वह कहता है, "देखो, मैं तुम्हें साँपों और बिच्छुओं को रौंदने की शक्ति, और शत्रु की सारी शक्ति, देता हूँ,"(2) ताकि, जैसे उसने धर्मत्याग से मनुष्य पर प्रभुता पाई, वैसे फिर मनुष्य के परमेश्वर की ओर फिर मुड़ने से उसकी धर्मत्याग शक्ति से रहित की जाए.
अध्याय पच्चीस.--मसीहविरोधी का छल, घमण्ड, और अत्याचारी राज्य, जैसा दानिय्येल और पौलुस ने वर्णन किया.
1. केवल पहले कही बातों से नहीं, पर मसीहविरोधी के समय में होनेवाली घटनाओं से भी दिखाया जाता है कि वह, धर्मत्यागी और लुटेरा होकर, परमेश्वर के रूप में दण्डवत् किए जाने को उत्सुक है; और कि, केवल दास होते हुए भी, वह अपने को राजा कहलाना चाहता है. क्योंकि वह (मसीहविरोधी) शैतान की सारी शक्ति से सम्पन्न होकर आएगा, न धर्मी राजा के रूप में, न विधिसंगत राजा के रूप में, [अर्थात्] परमेश्वर के अधीन एक के रूप में, पर एक अधर्मी, अन्यायी, और व्यवस्थाहीन के रूप में; धर्मत्यागी, दुष्ट, और हत्यारे के रूप में; लुटेरे के रूप में, अपने में [सारी] शैतानी धर्मत्याग को समेटते हुए, और मूर्तियों को हटाकर [मनुष्यों को] मनाने को कि वह आप परमेश्वर है, अपने को एकमात्र मूर्ति के रूप में उठाते हुए, और मूर्तिओं की नाना भ्रमों को अपने में रखे हुए. यह वह इसलिए करता है, कि जो [अब] अनेक घृणित कामों से शैतान को पूजते हैं, वे इस एक मूर्ति से उसकी सेवा करें, जिस के विषय में प्रेरित थिस्सलुनीकियों की दूसरी पत्री में इस प्रकार कहता है: "जब तक पहिले धर्मत्याग न आए, और पाप का मनुष्य प्रगट न हो, विनाश का पुत्र, जो विरोध करता है और अपने को उस सब से ऊपर बढ़ाता है जो परमेश्वर कहलाता है, या जो पूजा जाता है; यहाँ तक कि वह परमेश्वर के मन्दिर में बैठता है, अपने को ऐसा दिखाते हुए मानो वह परमेश्वर हो." इसलिए प्रेरित उसकी धर्मत्याग को स्पष्ट दिखाता है, और कि वह उस सब से ऊपर उठाया जाता है जो परमेश्वर कहलाता है, या जो पूजा जाता है-- अर्थात् हर मूर्ति से ऊपर--क्योंकि ये सचमुच मनुष्यों से ऐसे कहलाते हैं, पर [वास्तव में] देवता नहीं हैं; और कि वह अत्याचारी रीति से अपने को परमेश्वर ठहराने का यत्न करेगा.
2. और, उसने (प्रेरित ने) यह भी दिखाया जिसे मैं ने कई प्रकार से दिखाया है, कि यरूशलेम का मन्दिर सच्चे परमेश्वर के निर्देश से बनाया गया. क्योंकि प्रेरित आप, अपने ही व्यक्ति में बोलते हुए, उसे स्पष्ट रूप से परमेश्वर का मन्दिर कहा. अब मैं ने तीसरी पुस्तक में दिखाया है, कि प्रेरित अपने लिये बोलते समय किसी को परमेश्वर नहीं कहते, उसे छोड़ जो सचमुच परमेश्वर है, हमारे प्रभु का पिता, जिस के निर्देशों से यरूशलेम का मन्दिर उन प्रयोजनों के लिये बनाया गया जिन का मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ; जिस [मन्दिर] में शत्रु बैठेगा, अपने को मसीह दिखाने का यत्न करता हुआ, जैसा प्रभु भी घोषित करता है: "पर जब तुम उजाड़नेवाली घृणित वस्तु को देखो, जिस की भविष्यद्वक्ता दानिय्येल ने बात की है, पवित्र स्थान में खड़ी हुई (पढ़नेवाला समझे), तब यहूदिया में रहनेवाले पहाड़ों पर भाग जाएँ; और जो छत पर हो, वह अपने घर से कुछ लेने को नीचे न उतरे: क्योंकि तब बड़ा क्लेश होगा, जैसा जगत के आरम्भ से अब तक नहीं हुआ, और न कभी होगा."(3)
3. दानिय्येल भी, अन्तिम राज्य के अन्त की ओर देखते हुए, अर्थात् अन्तिम दस राजा, जिन में उन मनुष्यों का राज्य बाँटा जाएगा, और जिन पर विनाश का पुत्र आएगा, घोषित करता है कि पशु से दस सींग फूटेंगे, और उन के बीच एक और छोटा सींग उठेगा, और पहिले तीन उसके मुख के आगे उखाड़ दिए जाएँगे. वह कहता है: "और देखो, इस सींग में आँखें थीं, मनुष्य की आँखों के समान, और बड़ा बोलनेवाला मुँह, और उसका रूप अपने साथियों से अधिक दृढ़ था. मैं देखता रहा, और इस सींग ने पवित्र लोगों से युद्ध किया, और उन पर प्रबल हुआ, जब तक प्राचीनकाल का न आया और परमप्रधान परमेश्वर के पवित्र लोगों को न्याय न दिया, और समय आया, और पवित्र लोगों ने राज्य पाया."(4) तब, आगे, दर्शन के अर्थ में, उससे कहा गया: "चौथा पशु पृथ्वी पर चौथा राज्य होगा, जो और सब राज्यों से बढ़ेगा, और सारी पृथ्वी को निगलेगा, और उसे रौंदेगा, और उसे टुकड़े टुकड़े करेगा. और उसके दस सींग दस राजा हैं जो उठेंगे; और उन के बाद एक और उठेगा, जो बुराई के कामों में उन सब से बढ़ जाएगा जो be-
उस से पहिले, और तीन राजाओं को गिराएगा; और वह परमप्रधान परमेश्वर के विरुद्ध वचन बोलेगा, और परमप्रधान परमेश्वर के पवित्र लोगों को घिसाएगा, और समयों और व्यवस्थाओं को बदलने का विचार करेगा; और [सब कुछ] उसके हाथ में दिया जाएगा, समयों के एक समय और आधे समय तक,"(1) अर्थात्, तीन वर्ष और छह महीने, जिस समय में, जब वह आए, वह पृथ्वी पर राज्य करेगा. जिस के विषय में प्रेरित पौलुस फिर, थिस्सलुनीकियों की दूसरी [पत्री] में बोलते हुए, और उसी समय उसके आगमन का कारण प्रचार करते हुए, इस प्रकार कहता है: "और तब वह दुष्ट प्रगट होगा, जिसे प्रभु यीशु अपने मुख की आत्मा से मारेगा, और अपने आगमन की उपस्थिति से नाश करेगा; जिस का आना [अर्थात्, दुष्ट का] शैतान के कार्य के अनुसार है, सारी शक्ति में, और चिह्नों में, और झूठ के अद्भुत कामों में, और नाश होनेवालों के लिये दुष्टता के सब छल के साथ; क्योंकि उन्होंने सत्य का प्रेम ग्रहण नहीं किया, कि वे उद्धार पाएँ. और इसलिए परमेश्वर उन्हें भ्रम का कार्य भेजेगा, कि वे झूठ पर विश्वास करें; कि वे सब न्याय पाएँ जिन्होंने सत्य पर विश्वास नहीं किया, पर अधर्म को सम्मति दी,"(2)
4. प्रभु ने भी उन से जो उस पर विश्वास नहीं करते थे इस प्रकार कहा: "मैं अपने पिता के नाम से आया हूँ, और तुम ने मुझे ग्रहण नहीं किया: जब दूसरा अपने ही नाम से आएगा, उसे तुम ग्रहण करोगे,"(3) मसीहविरोधी को "दूसरा" कहते हुए, क्योंकि वह प्रभु से पराया है. यही वह अन्यायी न्यायी भी है, जिस का प्रभु ने उल्लेख किया, "जो न परमेश्वर से डरता था, न मनुष्य की सुधि लेता था,"(4) जिस के पास विधवा परमेश्वर को भूलकर भागी,--अर्थात्, पार्थिव यरूशलेम,--अपने विरोधी से बदला पाने को. जिसे वह अपने राज्य के समय में भी करेगा: वह अपना राज्य उस [नगर] में ले जाएगा, और परमेश्वर के मन्दिर में बैठेगा, जो उसे पूजते हैं उन्हें बहकाते हुए, मानो वह मसीह हो.
इस प्रयोजन के लिये दानिय्येल फिर कहता है: "और वह पवित्र स्थान को उजाड़ेगा; और पाप बलि के लिये दिया गया है,(5) और धर्म पृथ्वी में फेंक दिया गया है, और वह क्रियाशील रहा है (fecit), और सफल होता चला गया."(6) और दूत गब्रिएल, उसके दर्शन की व्याख्या करते हुए, इस व्यक्ति के विषय में कहता है: "और उनके राज्य के अन्त की ओर एक राजा उठेगा, जिसका मुख अत्यन्त क्रूर होगा, [अन्धकार] प्रश्नों को समझनेवाला, और अत्यन्त शक्तिशाली, अद्भुत कामों से भरा; और वह बिगाड़ेगा, चलाएगा, प्रभाव डालेगा (faciet), और बलवान मनुष्यों को गिराएगा, पवित्र प्रजा को भी; और उसका जूआ माला के समान [उनकी गर्दन के चारों ओर] चलाया जाएगा; छल उसके हाथ में होगा, और वह अपने हृदय में ऊँचा किया जाएगा: वह छल से बहुतों को नाश भी करेगा, और बहुतों को विनाश की ओर ले जाएगा, उन्हें अपने हाथ में अण्डों की नाईं कुचलते हुए."(7) और तब वह वह समय दिखाता है जब तक उसका अत्याचार रहेगा, जिस में पवित्र लोग भगाए जाएँगे, वे जो परमेश्वर को शुद्ध बलि चढ़ाते हैं: "और सप्ताह के बीच में," वह कहता है, "बलि और पेय चढ़ावा हटा लिया जाएगा, और उजाड़नेवाली घृणित वस्तु मन्दिर में [लाई जाएगी]: समय की समाप्ति तक उजाड़ पूरा होगा."(8) अब तीन वर्ष और छह महीने आधे सप्ताह को बनाते हैं.
5. इन सब अंशों से हमें प्रगट होता है, केवल धर्मत्याग के विवरण नहीं, और हर शैतानी भ्रम को अपने में समेटनेवाले की [करनी] भी, पर यह भी, कि एक ही और वही पिता परमेश्वर है, जो भविष्यद्वक्ताओं से प्रगट किया गया, पर मसीह से दिखाया गया. क्योंकि यदि अन्त के विषय में दानिय्येल ने जो भविष्यद्वाणी की उसे प्रभु ने दृढ़ किया, जब उसने कहा, "जब तुम उजाड़नेवाली घृणित वस्तु को देखोगे, जिस की भविष्यद्वक्ता दानिय्येल ने बात की है"(9) (और दूत गब्रिएल ने दर्शनों का अर्थ दानिय्येल को दिया, और वह सृष्टिकर्ता (Demiurgi) का प्रधान दूत है, जिस ने मरियम को मसीह के दृश्य आगमन और देहधारण का भी प्रचार किया), तब एक ही और वही परमेश्वर अत्यन्त स्पष्ट रूप से दिखाया जाता है, जिस ने भविष्यद्वक्ताओं को भेजा, और पुत्र की प्रतिज्ञा(10) की, और हमें अपने ज्ञान में बुलाया.
अध्याय छब्बीस.--यूहन्ना और दानिय्येल ने रोमी साम्राज्य के विघटन और उजाड़ की भविष्यद्वाणी की है, जो जगत के अन्त और मसीह के अनन्त राज्य से पहिले होगा. ग्नोस्टिक खण्डित होते हैं, शैतान के हथियार, जो सृष्टिकर्ता से भिन्न दूसरे पिता को गढ़ते हैं.
1. और भी उजले प्रकाश में यूहन्ना ने, प्रकाशितवाक्य में, प्रभु के चेलों को दिखाया कि अन्तिम समयों में क्या होगा, और उन दस राजाओं के विषय में जो तब उठेंगे, जिन में अब राज्य करनेवाला [पृथ्वी पर] साम्राज्य बाँटा जाएगा. वह हमें सिखाता है कि वे दस सींग क्या होंगे जो दानिय्येल ने देखे, हमें बताते हुए कि उससे इस प्रकार कहा गया था: "और जो दस सींग तू ने देखे वे दस राजा हैं, जिन्होंने अभी तक राज्य नहीं पाया, पर पशु के साथ एक घड़ी राजाओं के समान शक्ति पाएँगे. इन का एक ही मन है, और वे अपनी शक्ति और अधिकार पशु को देते हैं. ये मेम्ने से युद्ध करेंगे, और मेम्ना उन पर जय पाएगा, क्योंकि वह प्रभुओं का प्रभु और राजाओं का राजा है."(11) इसलिए प्रगट है, कि
इन [अधिकारियों] में से, आनेवाला तीन को मारेगा, और शेष को अपने वश में करेगा, और वह आप उन में आठवाँ होगा. और वे बाबुल को उजाड़ेंगे, और उसे आग से जलाएँगे, और अपना राज्य पशु को देंगे, और कलीसिया को भगाएँगे. उसके बाद वे हमारे प्रभु के आगमन से नाश किए जाएँगे. क्योंकि राज्य को बाँटा जाना चाहिए, और इस प्रकार नाश तक आना चाहिए, प्रभु [घोषित करता है जब वह] कहता है: "हर राज्य जो अपने विरुद्ध बँटा है उजाड़ तक लाया जाता है, और हर नगर या घर जो अपने विरुद्ध बँटा है स्थिर न रहेगा."(1) इसलिए होना ही चाहिए कि राज्य, नगर, और घर दस में बाँटे जाएँ; और इसी कारण उसने बाँट और विभाजन [जो होनेवाला है] को पहले ही से छाया में दिखा दिया है. दानिय्येल भी विशेष रूप से कहता है कि चौथे राज्य का अन्त उस मूर्ति के पाँव की उँगलियों में है जिसे नबूकदनेस्सर ने देखा, जिन पर बिना हाथ काटे गए पत्थर आया; और जैसा वह आप कहता है: "पाँव सचमुच एक भाग लोहा, दूसरा भाग मिट्टी थे, जब तक पत्थर बिना हाथ काटा गया, और उसने मूर्ति को लोहे और मिट्टी के पाँवों पर मारा, और उन्हें टुकड़े टुकड़े कर दिया, अन्त तक."(2) तब बाद में, इसकी व्याख्या करते हुए, वह कहता है: "और जैसा तू ने पाँव और उँगलियाँ देखीं, कुछ सचमुच मिट्टी की, और कुछ लोहे की, राज्य बाँटा जाएगा, और उस में लोहे की जड़ होगी, जैसा तू ने पकी मिट्टी में मिला लोहा देखा.
और उँगलियाँ सचमुच एक भाग लोहा, पर दूसरा भाग मिट्टी थीं."(3) इसलिए दस उँगलियाँ ये दस राजा हैं, जिन में राज्य बाँटा जाएगा, जिन में से कुछ सचमुच बलवान और क्रियाशील, या सामर्थ्यवान होंगे; दूसरे फिर, सुस्त और निकम्मे होंगे, और सहमत न होंगे; जैसा दानिय्येल भी कहता है: "राज्य का कुछ भाग बलवान होगा, और कुछ भाग उस से टूट जाएगा. जैसा तू ने पकी मिट्टी में मिला लोहा देखा, मनुष्यजाति में मिलन होंगे, पर एक का दूसरे से जुड़ना न होगा, जैसे लोहा मिट्टी के बरतन पर नहीं जोड़ा जा सकता."(4) और क्योंकि अन्त होगा, वह कहता है: "और इन राजाओं के दिनों में स्वर्ग का परमेश्वर एक राज्य उठाएगा जो कभी क्षय न होगा, और उसका राज्य दूसरी प्रजा को न छोड़ा जाएगा. वह सब राज्यों को टुकड़े टुकड़े करके चूर करेगा, और आप सदा के लिये ऊँचा किया जाएगा. जैसा तू ने देखा कि पत्थर पहाड़ से बिना हाथ काटा गया, और पकी मिट्टी, लोहे, पीतल, चाँदी, और सोने को चूर किया, परमेश्वर ने राजा को दिखाया है कि इन बातों के बाद क्या होगा; और स्वप्न सत्य है, और अर्थ विश्वासयोग्य है."(5)
2. इसलिए यदि महान परमेश्वर ने दानिय्येल के द्वारा आनेवाली बातें दिखाईं, और अपने पुत्र से उन्हें दृढ़ किया; और यदि मसीह वह पत्थर है जो बिना हाथ काटा जाता है, जो कालिक राज्यों को नाश करेगा, और एक अनन्त राज्य को प्रवेश कराएगा, जो धर्मियों का पुनरुत्थान है; जैसा वह घोषित करता है, "स्वर्ग का परमेश्वर एक राज्य उठाएगा जो कभी नाश न होगा,"--तो इस प्रकार खण्डित लोग सुबुद्धि में आएँ, जो सृष्टिकर्ता (Demiurgum) को ठुकराते हैं, और यह नहीं मानते कि भविष्यद्वक्ता उसी पिता से पहले भेजे गए जिस से प्रभु भी आया, पर जो दृढ़ करते हैं कि भविष्यद्वाणियाँ विविध शक्तियों से निकलीं. क्योंकि जिन बातों की सृष्टिकर्ता ने सब भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा समान रूप से पहले से कही थी उन्हें मसीह ने अन्त में पूरा किया, अपने पिता की इच्छा की सेवा करता हुआ, और मनुष्यजाति के विषय में उसके प्रबन्धों को पूरा करता हुआ. इसलिए वे लोग जो सृष्टिकर्ता की निन्दा करते हैं, चाहे खुले शब्दों से, जैसे मार्सियन के चेले, या [शास्त्र के] अर्थ के विकृत करने से, जैसे वैलेन्टिनुस के लोग और सब झूठे कहलाए ग्नोस्टिक, परमेश्वर को दण्डवत् करनेवालों सब से शैतान के एजेंट पहचाने जाएँ; जिन की एजेंसी से शैतान अब, और पहले नहीं, परमेश्वर के विरुद्ध बोलता देखा गया है, उसी के विरुद्ध जिस ने हर प्रकार की धर्मत्याग के लिये अनन्त आग तैयार की है. क्योंकि उसने अपने प्रभु की खुले रूप से अपने आप निन्दा करने का साहस नहीं किया; जैसे आदि में भी उसने सर्प के साधन से मनुष्य को बहकाया, मानो अपने को परमेश्वर से छिपाते हुए.
सचमुच जस्टिन ने टिप्पणी की है:(6) कि प्रभु के प्रगट होने से पहले शैतान ने कभी परमेश्वर की निन्दा करने का साहस न किया, क्योंकि वह अपना दण्ड अभी जानता न था, क्योंकि वह दृष्टान्तों और रूपकों में बन्द था; पर प्रभु के प्रगट होने के बाद, जब उसने मसीह के वचनों से और उसके प्रेरितों से स्पष्ट जान लिया कि उसके लिये अनन्त आग तैयार की गई है, क्योंकि वह अपनी स्वतन्त्र इच्छा से परमेश्वर से धर्मत्याग कर गया, और वैसे ही उन सब के लिये जो बिना पश्चात्ताप धर्मत्याग में बने रहते हैं, वह अब ऐसे मनुष्यों के द्वारा उस प्रभु की निन्दा करता है जो [उस पर] न्याय लाता है, मानो वह पहले ही दण्डित है, और अपने धर्मत्याग का दोष अपने बनानेवाले पर डालता है, अपनी स्वेच्छिक प्रवृत्ति पर नहीं. जैसा उन लोगों के साथ होता है जो व्यवस्था तोड़ते हैं, जब दण्ड उन पर आ पड़ता है: वे दोष उन पर डालते हैं जो व्यवस्था बनाते हैं, अपने ऊपर नहीं. इसी रीति से वे मनुष्य, शैतानी आत्मा से भरे हुए, हमारे सृजनहार पर असंख्य दोष लगाते हैं, जिस ने हमें जीवन की आत्मा भी दी है, और सब के योग्य एक व्यवस्था स्थापित की है; और वे मानते नहीं कि परमेश्वर का न्याय न्यायी है. इसलिये वे भी किसी और पिता की कल्पना करने लगते हैं, जो न चिन्ता करता है और न एक प्रबन्ध चलाता है
हमारे कामों पर, बल्कि एक ऐसा जो सब पापों को भी स्वीकृति देता है.
अध्याय 27.--मसीह के द्वारा होनेवाला भावी न्याय. ईश्वरीय सत्ता के साथ संगति और उससे अलग होना. अविश्वासियों का अनन्त दण्ड.
1. यदि पिता, तब, न्याय न करे, [यह निकलता है] कि न्याय उसका नहीं, या वह उन सब कामों को मान लेता है जो होते हैं; और यदि वह न्याय न करे, तो सब मनुष्य समान होंगे, और एक ही दशा में गिने जाएँगे. इसलिये मसीह का आगमन बिना उद्देश्य होगा, हाँ, निरर्थक, क्योंकि [उस दशा में] वह कोई न्याय करने की शक्ति नहीं चलाता. क्योंकि "वह आया कि मनुष्य को उसके पिता के विरुद्ध, बेटी को माता के विरुद्ध, और बहू को सास के विरुद्ध अलग करे;"(1) और जब दो एक बिछौने पर हों, एक को ले, और दूसरे को छोड़ दे; और चक्की पीसती दो स्त्रियों में से एक को ले और दूसरी को छोड़ दे:(2) [और] अन्त के समय काटनेवालों को आज्ञा दे कि पहले जंगली दानों को इकट्ठा करें, और उन्हें गट्ठरों में बाँधें, और न बुझनेवाली आग से जलाएँ, पर गेहूँ को खत्ते में समेटें;(3) और मेम्नों को उनके लिये तैयार किए हुए राज्य में बुलाए, पर बकरियों को अनन्त आग में भेजे, जो उसके पिता ने शैतान और उसके स्वर्गदूतों के लिये तैयार की है.(4) यह क्यों है? क्या वचन बहुतों के नाश के लिये और पुनरुत्थान के लिये आया है? नाश के लिये, निश्चय, उन के लिये जो उस पर विश्वास नहीं करते, जिन से उसने सदोम और अमोरा से बड़ा दण्ड न्यायदिन में धमकाया है;(5) पर विश्वासियों के पुनरुत्थान के लिये, और उन के लिये जो स्वर्ग में अपने पिता की इच्छा करते हैं.
यदि पुत्र का आगमन सचमुच सब के पास एक समान आता है, पर न्याय करने और विश्वास करनेवालों को अविश्वासियों से अलग करने के लिये है, क्योंकि जो विश्वास करते हैं वे अपनी पसन्द के अनुसार उसकी इच्छा करते हैं, और [भी] अपनी पसन्द के अनुसार आज्ञा न माननेवाले उसकी शिक्षा को स्वीकृति नहीं देते; तो यह प्रगट है कि उसके पिता ने सब को एक सी दशा में बनाया है, हर व्यक्ति की अपनी पसन्द है, और स्वतन्त्र समझ है; और वह सब बातों की सुधि रखता है, और सब पर प्रबन्ध चलाता है, "वह अपनी धूप बुरों और भलों पर उगाता है, और धर्मियों और अधर्मियों पर मेंह भेजता है."(6)
2. और जितने परमेश्वर के प्रति अपनी प्रीति में बने रहते हैं, उन्हें वह अपने साथ संगति देता है. पर परमेश्वर के साथ संगति जीवन और ज्योति है, और उन सब भलाई का भोग जिन्हें उसने रख छोड़ा है. पर जितने अपनी पसन्द के अनुसार परमेश्वर से हट जाते हैं. वह उन पर अपने से वह अलग होना डालता है जिसे उन्होंने अपनी इच्छा से चुना है. पर परमेश्वर से अलग होना मृत्यु है, और ज्योति से अलग होना अन्धकार है; और परमेश्वर से अलग होना उन सब भलाई के खोने में है जिन्हें उसने रख छोड़ा है. इसलिये जो धर्मत्याग से इन पहले कही हुई बातों को फेंक देते हैं, वास्तव में सब भलाई से खाली होकर, हर प्रकार का दण्ड भोगते हैं. तौभी परमेश्वर उन्हें तुरन्त अपने आप से दण्ड नहीं देता, पर वह दण्ड उन पर पड़ता है क्योंकि वे सब भलाई से खाली हैं. अब, भली बातें परमेश्वर के पास सदा की और अन्त रहित हैं, इसलिये इन का खोना भी सदा का और कभी न समाप्त होनेवाला है. इस बात में ऐसा ही है जैसा ज्योति की बाढ़ के विषय होता है: जिन्हों ने अपने आप को अन्धा किया, या दूसरों से अन्धे किए गए, वे ज्योति के भोग से सदा के लिये वंचित हैं. [तौभी] ऐसा नहीं कि ज्योति ने उन पर अन्धेपन का दण्ड डाला, पर अन्धापन आप ही उन पर विपत्ति लाया: और इसलिये प्रभु ने प्रगट किया, "जो मुझ पर विश्वास करता है, वह दोषी नहीं ठहरता,"(7) अर्थात्, परमेश्वर से अलग नहीं किया जाता, क्योंकि वह विश्वास के द्वारा परमेश्वर के साथ जुड़ा है. दूसरी ओर, वह कहता है, "जो विश्वास नहीं करता, वह पहले ही दोषी ठहर चुका है, क्योंकि उसने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया;" अर्थात्, उसने अपनी इच्छा से अपने आप को परमेश्वर से अलग किया. "क्योंकि दण्ड यही है, कि ज्योति इस जगत में आई है, और मनुष्यों ने ज्योति से अधिक अन्धकार को प्रिय जाना.
क्योंकि जो कोई बुराई करता है वह ज्योति से बैर रखता है, और ज्योति के पास नहीं आता, ऐसा न हो कि उसके काम उघाड़े जाएँ. पर जो सत्य करता है वह ज्योति के पास आता है, कि उसके काम प्रगट हों, कि उसने उन्हें परमेश्वर में किए हैं."
अध्याय 28.--धर्मियों और दुष्टों के बीच किया जानेवाला भेद. मसीह-विरोधी के समय में होनेवाला भावी धर्मत्याग, और जगत का अन्त.
1. इसलिये, क्योंकि इस जगत में (<greek>aiwni</greek>) कुछ लोग ज्योति की ओर चले जाते हैं, और विश्वास से अपने आप को परमेश्वर के साथ जोड़ते हैं, पर दूसरे ज्योति से बचते हैं, और अपने आप को परमेश्वर से अलग करते हैं, परमेश्वर का वचन दोनों के लिये योग्य निवास तैयार करता हुआ आता है. जो ज्योति में हैं उन के लिये सचमुच, कि वे उस से, और उस में की भली बातों से भोग पाएँ; पर जो अन्धकार में हैं उन के लिये, कि वे उसकी विपत्तियों में भागी हों. इसी कारण वह कहता है, कि दाहिनी ओर वाले स्वर्ग के राज्य में बुलाए जाते हैं, पर बाईं ओर वालों को वह अनन्त आग में भेजेगा, क्योंकि उन्होंने अपने आप को सब भलाई से वंचित कर लिया है.
2. और इस कारण प्रेरित कहता है: "Be-
cause उन्होंने परमेश्वर की प्रीति न पाई, कि वे बचाए जाएँ, इसलिये परमेश्वर उन में भ्रम की क्रिया भी भेजेगा, कि वे झूठ पर विश्वास करें, कि वे सब न्याय किए जाएँ जिन्हों ने सत्य पर विश्वास न किया, पर अधर्म को स्वीकृति दी."(1) क्योंकि जब वह (मसीह-विरोधी) आ चुका है, और अपनी इच्छा से धर्मत्याग को अपने व्यक्ति में समेटता है, और जो कुछ वह अपनी इच्छा और पसन्द के अनुसार करेगा उसे पूरा करता है, और परमेश्वर के मन्दिर में भी बैठता है, कि उसके ठगे हुए लोग उसे मसीह के रूप में पूजें; इसलिये वह योग्य रीति से "आग की झील में डाल दिया जाएगा:"(2) [यह ईश्वरीय नियुक्ति के अनुसार होगा], परमेश्वर अपनी पूर्वज्ञान से यह सब पहले देखकर, और उचित समय पर ऐसा मनुष्य भेजकर, "कि वे झूठ पर विश्वास करें, कि वे सब न्याय किए जाएँ जिन्हों ने सत्य पर विश्वास न किया, पर अधर्म को स्वीकृति दी;" जिस के आने को यूहन्ना ने प्रकाशितवाक्य में इस प्रकार वर्णित किया है: "और जो पशु मैं ने देखा था वह तेन्दुए के समान था, और उसके पाँव रीछ के से, और उसका मुँह सिंह के मुँह के समान; और अजगर ने अपनी सामर्थ्य उसे दी, और अपना सिंहासन, और बड़ा बल. और उसके सिरों में से एक मानो मृत्यु तक मारा गया था; और उसका घातक घाव चंगा हो गया, और सारा जगत उस पशु के पीछे अचम्भा करता था. और उन्होंने अजगर को दण्डवत् किया क्योंकि उसने पशु को सामर्थ्य दी; और उन्होंने पशु को दण्डवत् किया, कहते हुए, इस पशु के समान कौन है, और कौन उसके साथ लड़ने के योग्य है? और उसे बड़ा बोल बोलनेवाला मुँह दिया गया, और निन्दा और सामर्थ्य बयालीस महीने उसे दी गई. और उसने परमेश्वर के विरुद्ध निन्दा के लिये अपना मुँह खोला, कि उसके नाम की और उसके तम्बू की, और स्वर्ग में रहनेवालों की निन्दा करे. और हर गोत्र पर, और लोग पर, और भाषा पर, और जाति पर उसे सामर्थ्य दी गई.
और जितने पृथ्वी पर बसते हैं उन्होंने उसे दण्डवत् किया, [हर एक] जिसका नाम जगत की नींव से मारे गए मेम्ने की पुस्तक में लिखा न था. यदि किसी के कान हों, तो वह सुने. यदि कोई बन्धुवाई में ले जाए, तो वह बन्धुवाई में जाएगा. यदि कोई तलवार से मारे, तो उसे तलवार से मारा जाना अवश्य है. यहाँ पवित्र लोगों का धीरज और विश्वास है."(3) इसके बाद वह वैसे ही उसके हथियार ढोनेवाले का वर्णन करता है, जिसे वह झूठा भविष्यद्वक्ता भी कहता है: "वह अजगर के समान बोला, और पहले पशु की सारी सामर्थ्य उसके देखते चलाता था, और पृथ्वी को, और उस में बसनेवालों को, पहले पशु को दण्डवत् करवाता था, जिसका घातक घाव चंगा हो गया था. और वह बड़े अद्भुत काम करेगा, यहाँ तक कि मनुष्यों के देखते स्वर्ग से पृथ्वी पर आग भी उतार सकेगा, और पृथ्वी के निवासियों को भटकाएगा."(4) कोई यह कल्पना न करे कि वह ये अद्भुत काम ईश्वरीय सामर्थ्य से करता है, पर जादू के काम से. और हमें आश्चर्य न करना चाहिये, क्योंकि दुष्टात्माएँ और धर्मत्यागी आत्माएँ उसकी सेवा में हैं, वह उन के द्वारा अद्भुत काम करता है, जिन से वह पृथ्वी के निवासियों को भटकाता है. यूहन्ना और कहता है: "और वह पशु की एक मूर्ति बनवाने की आज्ञा देगा, और मूर्ति को साँस देगा, कि मूर्ति बोले; और जो उसे दण्डवत् न करेंगे उन्हें वह मरवाएगा." वह यह भी कहता है: "और वह ललाट में और fight हाथ में एक छाप [लगवाएगा], कि कोई मोल न ले सके और न बेच सके, केवल वह जिसके पास पशु के नाम की छाप या उसके नाम की संख्या हो; और संख्या छह सौ छियासठ है,"(5) अर्थात्, सौ का छह गुना, दस का छह गुना, और छह इकाइयाँ. [वह यह देता है] उन छह हजार वर्षों में हुए उस सारे धर्मत्याग के जोड़ के रूप में.
3. क्योंकि जितने दिन में यह जगत बनाया गया, उतने हजार वर्षों में वह समाप्त होगा. इसी कारण पवित्रशास्त्र कहता है: "इस प्रकार आकाश और पृथ्वी पूरे हुए, और उनका सारा श्रृंगार. और परमेश्वर ने छठवें दिन उन कामों को समाप्त किया जिन्हें उसने बनाया था; और परमेश्वर ने सातवें दिन अपने सब कामों से विश्राम किया."(6) यह पहले सृजी हुई बातों का वृत्तान्त है, और यह आनेवाली बात की भविष्यद्वाणी भी है. क्योंकि प्रभु का दिन हजार वर्ष के समान है;(7) और छह दिन में सृजी हुई बातें पूरी हुईं: इसलिये यह प्रगट है कि वे छठवें हजार वर्ष पर अन्त को आएँगी.
4. और इसलिये सारे समय में, मनुष्य, जो आरम्भ में परमेश्वर के हाथों से, अर्थात् पुत्र के और आत्मा के, गढ़ा गया, परमेश्वर के स्वरूप और समानता पर बनाया जाता है: भूसी, सचमुच, जो धर्मत्याग है, फेंक दी जाती है; पर गेहूँ, अर्थात् जो विश्वास में परमेश्वर के लिये फल लाते हैं, खत्ते में समेटा जाता है. इसी कारण बचाए जानेवालों के लिये क्लेश आवश्यक है, कि वे एक रीति से तोड़े जाकर, महीन किए जाकर, परमेश्वर के वचन के धीरज से छिड़के जाकर, और [शुद्धि के लिये] आग लगाए जाकर, राजकीय भोज के योग्य हों. जैसा हमारे लोगों में से एक मनुष्य ने कहा, जब वह परमेश्वर के विषय अपनी गवाही के कारण वनपशुओं के लिये दण्डित किया गया: "मैं मसीह का गेहूँ हूँ, और वनपशुओं के दाँतों से पीसा जाता हूँ, कि मैं परमेश्वर की शुद्ध रोटी पाया जाऊँ."(8)
अध्याय 29.--सब कुछ मनुष्य की सेवा के लिये सृजा गया है. मसीह-विरोधी के छल, दुष्टता, और धर्मत्यागी सामर्थ्य. यह जलप्रलय में पहले से चित्रित हुआ, और पीछे शद्रक, मेशक, और अबेदनगो के सताव से.
1. पिछली पुस्तकों में मैं ने वे कारण रखे हैं जिन के लिये परमेश्वर ने इन बातों के बनाए जाने की आज्ञा दी, और दिखाया है कि ऐसी सब बातें उस मानव प्रकृति के लाभ के लिये सृजी गई हैं जो बचाई जाती है, जो [अपनी] स्वतन्त्र इच्छा और अपनी सामर्थ्य रखती है उसे अमरता के लिये पकाते हुए, और परमेश्वर के प्रति अनन्त अधीनता के लिये उसे और योग्य तैयार करते और बनाते हुए. और इसलिये सृष्टि मनुष्य [की आवश्यकताओं] के योग्य है; क्योंकि मनुष्य उसके लिये नहीं बनाया गया, पर सृष्टि मनुष्य के लिये. पर वे जातियाँ, जिन्हों ने अपने आप अपनी आँखें स्वर्ग की ओर न उठाईं, न अपने बनानेवाले का धन्यवाद किया, न सत्य की ज्योति देखना चाहा, पर अज्ञान की गहराइयों में छिपे अन्धे चूहों के समान थीं, वचन उन्हें न्याय से "नाले का बेकार पानी, और तराजू का घूमता बटखरा--वास्तव में, कुछ भी नहीं" गिनता है;(1) धर्मी के लिये उतने ही उपयोगी और सेवक, जितना खूंटी गेहूँ की बढ़ती में सहायक होती है, और उसका भूसा जलने से सोना गलाने के काम आता है. और इसलिये, जब अन्त में कलीसिया इस में से अचानक उठा ली जाएगी, कहा जाता है, "ऐसा क्लेश होगा जैसा आरम्भ से नहीं हुआ, और न होगा."(2) क्योंकि यह धर्मियों की अन्तिम लड़ाई है, जिस में जब वे जीतते हैं तो अविनाश का मुकुट पाते हैं.
2. और इसलिये इस पशु में, जब वह आता है, हर प्रकार के अधर्म और हर छल का एक संग्रह किया जाता है, ताकि सारी धर्मत्यागी सामर्थ्य उस में बहकर और बन्द होकर आग की भट्ठी में भेजी जाए. इसलिये योग्य रीति से उसका नाम छह सौ छियासठ की संख्या रखेगा, क्योंकि वह जलप्रलय से पहले हुई दुष्टता की सारी मिलावट को अपने व्यक्ति में समेटता है, जो स्वर्गदूतों के धर्मत्याग के कारण हुई. क्योंकि जब जलप्रलय पृथ्वी पर आया तब नूह छह सौ वर्ष का था, विद्रोही जगत को बहा ले जाता हुआ, उस अति कुख्यात पीढ़ी के कारण जो नूह के समय में रहती थी. और [मसीह-विरोधी] जलप्रलय के बाद गढ़ी गई मूर्तियों की हर भूल को भी समेटता है, भविष्यद्वक्ताओं के वध और धर्मियों के काटे जाने के साथ. क्योंकि जो मूर्ति नबूकदनेस्सर ने खड़ी की उसकी ऊँचाई सचमुच साठ हाथ थी, और चौड़ाई छह हाथ; इसी कारण हनन्याह, अजर्याह, और मीशाएल, जब उन्होंने उसे दण्डवत् न किया, आग की भट्ठी में डाले गए, जो उन पर हुआ उसके द्वारा भविष्यद्वाणी की रीति से दिखाते हुए, अन्त [के समय] की ओर धर्मियों के विरुद्ध उठनेवाले कोप को. क्योंकि वह मूर्ति, पूरी ली जाए तो, इस मनुष्य के आने का पूर्वचित्र थी, यह ठहराते हुए कि निस्सन्देह वह अकेला ही सब मनुष्यों से पूजा जाए. इस प्रकार, तब, नूह के छह सौ वर्ष, जिस के समय धर्मत्याग के कारण जलप्रलय हुआ, और मूर्ति के हाथों की संख्या जिस के लिये ये धर्मी आग की भट्ठी में भेजे गए, उस मनुष्य के नाम की संख्या को दिखाते हैं, जिस में छह हजार वर्षों का सारा धर्मत्याग, और अधर्म, और दुष्टता, और झूठी भविष्यद्वाणी, और छल समेटा गया है; इन्हीं बातों के कारण आग का प्रलय भी [पृथ्वी पर] आएगा.
अध्याय 30.--मसीह-विरोधी के नाम की संख्या के विषय निश्चय होने पर भी, नाम के विषय हम कोई जल्दबाजी का निष्कर्ष न निकालें, क्योंकि यह संख्या बहुत से नामों पर बैठ सकती है. इस बात को पवित्र आत्मा ने रख छोड़ने के कारण. मसीह-विरोधी का राज्य और मृत्यु.
1. तब, मामला ऐसी दशा में होने से, और यह संख्या सब से मान्य और प्राचीन प्रतियों में(3) [प्रकाशितवाक्य की] पाई जाती है, और वे मनुष्य जिन्हों ने यूहन्ना को आमने-सामने देखा अपनी गवाही [उसके लिये] देते हैं; और बुद्धि भी हमें इस निष्कर्ष पर ले जाती है कि पशु के नाम की संख्या, उस में के अक्षरों [के मान] के अनुसार यूनानी गणना की रीति से [गिनने पर], छह सौ साठ और छह होगी; अर्थात्, दहाइयों की संख्या सैकड़ों के बराबर होगी, और सैकड़ों की संख्या इकाइयों के बराबर होगी (क्योंकि वह संख्या जो अंक छह [बताती है] सर्वत्र मानी जाने से, उस धर्मत्याग के संग्रहों को दिखाती है, जो उसकी पूरी सीमा में लिया गया, जो आरम्भ में हुआ, बीच के समयों में हुआ, और जो अन्त में होगा),--मुझे नहीं मालूम कि कैसे कुछ लोग साधारण बोलचाल की रीति पर चलकर भूल गए हैं, और नाम में बीच की संख्या को बिगाड़ दिया है, उस में से पचास की मात्रा घटाकर, कि छह दशकों के बदले वे मानेंगे कि केवल एक है. [मैं सोचने को झुका हूँ कि यह नकल करनेवालों के दोष से हुआ, जैसा हुआ करता है, क्योंकि संख्याएँ भी अक्षरों से लिखी जाती हैं; ताकि वह यूनानी अक्षर जो साठ की संख्या बताता है सहज ही यूनानियों के अक्षर आयोटा में बढ़ा दिया गया.](4) तब औरों ने यह read-
ing बिना जाँच पाया; कुछ ने अपनी सरलता में, और अपनी जिम्मेदारी पर, एक दशक बतानेवाली इस संख्या को काम में लाया; कुछ ने, अपने अनुभवहीन होने में, ऐसा नाम ढूँढ़ने का साहस किया जो भूलभरी और नकली संख्या रखे. अब, जिन्होंने यह सरलता से, और बुरे अभिप्राय के बिना किया, उनके विषय हम यह मानने को स्वतन्त्र हैं कि परमेश्वर उन्हें क्षमा देगा. पर जो व्यर्थ महिमा के लिये यह निश्चित करते हैं कि नकली संख्या वाले नाम मान लिए जाएँ, और दृढ़ करते हैं कि यह नाम, जो उन्होंने आप निकाला, उसके आनेवाले का है; ऐसे लोग हानि के बिना बाहर न निकलेंगे, क्योंकि उन्होंने अपने आप को भी और उन को भी भटकाया जिन्हों ने उन पर भरोसा किया. अब, पहले स्थान में, सत्य से भटकना हानि है, और जो नहीं है उसे मान लेना; फिर, जो पवित्रशास्त्र में से कुछ जोड़ता या घटाता है उस पर हल्का दण्ड [दिया जाना] न होगा,(1) उसके नीचे ऐसा व्यक्ति अवश्य गिरे. और, कोई छोटी न होनेवाली दूसरी जोखिम उन पर आएगी जो झूठ से मान लेते हैं कि वे मसीह-विरोधी का नाम जानते हैं. क्योंकि यदि ये मनुष्य एक [संख्या] मान लें, जब यह [मसीह-विरोधी] दूसरी लेकर आएगा, तो वे उससे सहज ही बहका लिए जाएँगे, यह समझकर कि वह वह अपेक्षित नहीं है, जिस से सावधान रहना है.
2. इसलिये इन मनुष्यों को [मामले की दशा सचमुच क्या है] सीखना चाहिये, और नाम की सच्ची संख्या पर लौटना चाहिये, कि वे झूठे भविष्यद्वक्ताओं में न गिने जाएँ. पर, पवित्रशास्त्र की कही हुई निश्चित संख्या को जानकर, अर्थात् छह सौ साठ और छह, वे पहले स्थान में राज्य के दस में बँटने की बाट जोहें; फिर अगले स्थान में, जब ये राजा राज्य कर रहे हों, और अपने कामों को क्रम में रखने लगें, और अपने राज्य को आगे बढ़ाएँ, [वे सीखें] यह मानना कि जो अपने लिये राज्य का दावा करके आएगा, और उन मनुष्यों को डराएगा जिन की हम बात कर रहे हैं, जिसका नाम उक्त संख्या रखता हो, वह सचमुच उजाड़नेवाली घृणित वस्तु है. इसे प्रेरित भी दृढ़ करता है: "जब वे कहेंगे, शान्ति और सुरक्षा, तब अचानक विनाश उन पर आ पड़ेगा."(2) और यिर्मयाह केवल उसके अचानक आने को नहीं दिखाता, पर वह उस गोत्र को भी बताता है जिस से वह आएगा, जहाँ वह कहता है, "हम दान से उसके वेगवान घोड़ों का शब्द सुनेंगे; उसके दौड़ते घोड़ों के हिनहिनाने के शब्द से सारी पृथ्वी हिल जाएगी: वह आएगा और पृथ्वी को, और उसकी भरपूरी को, नगर को भी, और उस में बसनेवालों को निगल जाएगा."(3) यही कारण है कि यह गोत्र प्रकाशितवाक्य में उन के साथ नहीं गिना गया जो बचाए जाते हैं.(4)
3. इसलिये भविष्यद्वाणी की पूर्ति की बाट जोहना अधिक निश्चित है, और कम जोखिमभरा, अनुमान लगाने और जो नाम सामने आएँ उन्हें ढूँढ़ने से, क्योंकि कही हुई संख्या वाले बहुत से नाम मिल सकते हैं; और वही प्रश्न, सब के बाद, अनसुलझा रह जाएगा. क्योंकि यदि इस संख्या वाले बहुत से नाम मिलें, तो पूछा जाएगा कि उन में से आनेवाला मनुष्य कौन सा नाम रखेगा. मैं यह उस नाम की संख्या वाले नामों की कमी के कारण नहीं कहता, पर परमेश्वर के भय के कारण, और सत्य के लिये उत्साह के कारण: क्योंकि नाम एवान्थस (E<greek>U</greek>AN<greek>Q</greek>A<greek>S</greek>) अपेक्षित संख्या रखता है, पर मैं उसके विषय कोई आरोप नहीं लगाता. तब लातीनोस (<greek>L</greek>ATEINO<greek>S</greek>) भी छह सौ छियासठ की संख्या रखता है; और यह बहुत सम्भव [समाधान] है, यह [दानिय्येल के देखे चार में से] अन्तिम राज्य का नाम होने से. क्योंकि लातीनी वे हैं जो अभी प्रभुता रखते हैं:(5) तौभी, मैं इस [संयोग] पर कोई डींग नहीं मारूँगा. तीतान भी, (TEITAN, पहली अक्षर-पंक्ति दो यूनानी स्वरों <greek>e</greek> और <greek>i</greek> से लिखी हुई), जो नाम हमारे बीच मिलते हैं उन सब में, विश्वास के अधिक योग्य है. क्योंकि उस में बताई हुई संख्या है, और वह छह अक्षरों से बना है, हर अक्षर-पंक्ति में तीन अक्षर हैं; और [वह शब्द आप] प्राचीन है, और साधारण प्रयोग से हटा हुआ है; क्योंकि हमारे राजाओं में इस नाम तीतान को धारण करनेवाला कोई नहीं मिलता, और न यूनानियों और अन्यजातियों में खुलेआम पूजी जानेवाली मूर्तियों में से किसी का यह नाम है. बहुत लोगों में भी यह नाम ईश्वरीय गिना जाता है, यहाँ तक कि जो अभी [प्रभुता] रखते हैं वे सूर्य को भी "तीतान" कहते हैं.
यह शब्द भी बदला लेने का एक बाहरी रूप रखता है, और योग्य दण्ड देनेवाले का रूप, क्योंकि वह (मसीह-विरोधी) यह दिखावा करता है कि वह सताए हुओं का न्याय करता है.(6) और इसके सिवा, यह प्राचीन नाम है, विश्वास के योग्य, राजकीय गरिमा का, और और भी, एक अत्याचारी का नाम. तब, क्योंकि इस नाम "तीतान" में इतनी सिफारिश है, प्रबल सम्भावना है, कि बहुत से [सुझाए गए नामों] में से हम यह निकालें, कि कदाचित् आनेवाला "तीतान" कहलाएगा. तौभी, हम मसीह-विरोधी के नाम के विषय निश्चित कहने की जोखिम न लेंगे; क्योंकि यदि आवश्यक होता कि उसका नाम इस वर्तमान समय में स्पष्ट प्रगट किया जाए, तो उसे उसने बता दिया होता जिस ने प्रकाशितवाक्य का दर्शन देखा. क्योंकि वह बहुत लम्बे समय नहीं देखा गया था
से, पर लगभग हमारे दिन में, डोमिशियन के राज्य के अन्त की ओर.
4. पर वह अब नाम की संख्या बताता है, कि जब यह मनुष्य आए तो हम उसे बचकर रहें, यह जानकर कि वह कौन है: तौभी नाम दबा रखा गया है, क्योंकि वह पवित्र आत्मा के द्वारा प्रचार किए जाने के योग्य नहीं. क्योंकि यदि वह उसके द्वारा बताया गया होता, तो वह (मसीह-विरोधी) कदाचित् लम्बे समय तक बना रहता. पर अब जैसा "वह था, और नहीं है, और अथाह कुण्ड से ऊपर आएगा, और विनाश में जाता है,"(1) एक ऐसे के समान जिस का अस्तित्व नहीं; वैसे ही उसका नाम भी नहीं बताया गया, क्योंकि जिस का अस्तित्व नहीं उसका नाम प्रचार नहीं किया जाता. पर जब यह मसीह-विरोधी इस जगत की सब बातों को उजाड़ चुकेगा, वह तीन वर्ष और छह महीने राज्य करेगा, और यरूशलेम के मन्दिर में बैठेगा; और तब प्रभु स्वर्ग से बादलों में, पिता की महिमा में आएगा, इस मनुष्य को और उसके पीछे चलनेवालों को आग की झील में भेजकर; पर धर्मियों के लिये राज्य के समय लाकर, अर्थात् विश्राम, पवित्र किया हुआ सातवाँ दिन; और अब्राहम को प्रतिज्ञा किया हुआ भाग लौटाकर, जिस राज्य में प्रभु ने प्रगट किया, कि "पूर्व से और पश्चिम से आकर बहुत लोग अब्राहम, इसहाक, और याकूब के साथ बैठेंगे."(2)
अध्याय 31.--हमारी देहों का बनाए रहना मसीह के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण से दृढ़ होता है: बीच के समय में पवित्र लोगों के प्राण उस समय की बाट जोहने की दशा में हैं, जब वे अपनी सिद्ध और पूरी महिमा पाएँगे.
1. फिर, क्योंकि कुछ जो ऑर्थोडॉक्स में गिने जाते हैं धर्मियों की ऊँचाई के लिये पहले से ठहराई हुई योजना के पार चले जाते हैं, और उन रीतियों को नहीं जानते जिन से वे अविनाश के लिये पहले से अनुशासित होते हैं, इस प्रकार वे मिथ्याशिक्षा की धारणाएँ रखते हैं. क्योंकि मिथ्याशिक्षक, परमेश्वर की हस्तकृति को तुच्छ जानकर, और अपनी देह के उद्धार को न मानते हुए, जब वे परमेश्वर की प्रतिज्ञा को भी तुच्छ जानते हैं, और जो भाव बनाते हैं उन में परमेश्वर को सर्वथा लाँघ जाते हैं, दृढ़ करते हैं कि मृत्यु पर तुरन्त वे स्वर्गों के ऊपर और डेमियुर्ज के ऊपर चले जाएँगे, और माता (अकामोट) के पास या उस पिता के पास जाएँगे जिसे उन्होंने गढ़ा है. इसलिये वे व्यक्ति, जो सारे मनुष्य को छूनेवाले पुनरुत्थान को नहीं मानते (universam reprobant resurrectionem), और जितना उन में है उतना उसे [मसीही योजना] के बीच से हटा देते हैं, यदि वे फिर पुनरुत्थान की योजना के विषय कुछ न जानें, तो उन पर आश्चर्य कैसे हो? क्योंकि वे समझना नहीं चुनते, कि यदि ये बातें जैसी वे कहते हैं वैसी हों, तो प्रभु आप, जिस पर वे विश्वास करने का अंगीकार करते हैं, तीसरे दिन जी न उठा; पर क्रूस पर प्राण छोड़ते ही, निस्सन्देह ऊपर चला गया, अपना शरीर पृथ्वी पर छोड़कर.
पर बात यह थी, कि तीन दिन वह उस स्थान में रहा जहाँ मेरे हुए थे, जैसा भविष्यद्वक्ता उसके विषय कहता है: "और प्रभु ने अपने मेरे हुए पवित्र लोगों को स्मरण किया जो पहले कब्र की भूमि में सो गए थे; और वह उन के पास उतरा, कि उन्हें छुड़ाए और बचाए."(3) और प्रभु आप कहता है, "जैसे योना मछली के पेट में तीन दिन और तीन रात रहा, वैसे मनुष्य का पुत्र पृथ्वी के हृदय में रहेगा."(4) तब प्रेरित भी कहता है, "पर जब वह ऊपर गया, तो यह क्या है कि वह पृथ्वी के निचले भागों में भी उतरा?"(5) दाऊद भी उसके विषय भविष्यद्वाणी करते हुए यह कहता है, "और तू ने मेरे प्राण को सब से नीचे के अधोलोक से छुड़ाया है;"(6) और तीसरे दिन फिर जी उठने पर, उसने मरियम से कहा, जो उसे पहले देखने और दण्डवत् करनेवाली थी, "मुझे मत छू, क्योंकि मैं अभी पिता के पास ऊपर नहीं गया; पर चेलों के पास जा, और उन से कह, मैं अपने पिता के पास और तुम्हारे पिता के पास ऊपर जाता हूँ."(7)
2. यदि, तब, प्रभु ने मरे हुओं की विधि मानी, कि वह मरे हुओं में से 1ला जन्मा बने, और "पृथ्वी के निचले भागों में" तीसरे दिन तक ठहरा;(8) फिर देह में जी उठा, यहाँ तक कि उसने कीलों का निशान अपने चेलों को दिखाया,(9) इस प्रकार वह पिता के पास ऊपर गया;--[यदि ये सब बातें हुईं, मैं कहता हूँ], तो ये मनुष्य कैसे लज्जित न हों, जो यह आरोप लगाते हैं कि "निचले भाग" हमारे इस जगत को कहते हैं, पर उनका tuner मनुष्य, शरीर को यहाँ छोड़कर, आकाश से परे के स्थान में चढ़ता है? क्योंकि जैसा प्रभु "मृत्यु की छाया के बीच चला गया,"(10) जहाँ मरे हुओं के प्राण थे, तौभी पीछे शरीर में जी उठा, और पुनरुत्थान के बाद [स्वर्ग में] उठा लिया गया, यह प्रगट है कि उसके चेलों के प्राण भी, जिन के कारण प्रभु ने ये बातें सही, परमेश्वर के बाँटे हुए अदृश्य स्थान में चले जाएँगे, और वहाँ पुनरुत्थान तक रहेंगे, उस घटना की बाट जोहते हुए; तब अपने शरीर पाकर, और अपनी सम्पूर्णता में जी उठकर, अर्थात् शारीरिक रूप से, जैसा प्रभु जी उठा, वे इस प्रकार परमेश्वर के साम्हने आएँगे. "क्योंकि कोई चेला गुरु से बड़ा नहीं, पर जो सिद्ध है हर एक अपने गुरु के समान होगा."(11) इसलिये हमारे गुरु ने तुरन्त प्रस्थान न किया, [स्वर्ग को] उड़कर, पर पिता के ठहराए हुए अपने पुनरुत्थान के समय की बाट जोही, जो योना के द्वारा भी दिखाया गया था, और तीन दिन के बाद जी उठकर [स्वर्ग में] उठा लिया गया;
वैसे ही हमें भी अपने पुनरुत्थान के समय की बाट जोहनी चाहिये जो परमेश्वर ने ठहराया और भविष्यद्वक्ताओं ने पहले कहा, और वैसे ही, जी उठकर, ऊपर उठा लिये जाएँ, जितनों को प्रभु इस [अधिकार] के योग्य गिने.(1)
अध्याय 32.--जिस देह में पवित्र लोगों ने इतने क्लेश सहे हैं, उसी में वे अपनी मेहनत के फल पाएँगे; विशेष कर क्योंकि सारी सृष्टि इसकी बाट जोहती है, और परमेश्वर इसकी प्रतिज्ञा अब्राहम और उसके वंश से करता है.
1. इसलिये, क्योंकि कुछ [ऑर्थोडॉक्स व्यक्तियों] की धारणाएँ मिथ्याशिक्षा के प्रवचनों से निकली हैं, वे परमेश्वर के प्रबन्धों को नहीं जानते, और धर्मियों के पुनरुत्थान के भेद को नहीं, और [पृथ्वी के] उस राज्य को नहीं जो अविनाश का आरम्भ है, जिस राज्य के द्वारा जो योग्य होंगे वे ईश्वरीय स्वभाव में धीरे धीरे भागी होने के अभ्यस्त हैं (capere Deum(2)); और उन्हें उन बातों के विषय कहना आवश्यक है, कि धर्मियों को पहले उस भाग की प्रतिज्ञा पाना उचित है जिस की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने पितरों से की, और उस में राज्य करना, जब वे इस नवीनीकृत सृष्टि में परमेश्वर को देखने के लिये जी उठें, और न्याय पीछे हो. क्योंकि यह न्याय है कि उसी सृष्टि में जिस में उन्होंने परिश्रम किया या क्लेश सहा, दुख से हर रीति जाँचे जाकर, वे अपने दुख का प्रतिफल पाएँ; और जिस सृष्टि में वे परमेश्वर के प्रति अपनी प्रीति के कारण मारे गए, उसी में वे फिर जिलाए जाएँ; और जिस सृष्टि में उन्होंने दासता सही, उसी में वे राज्य करें. क्योंकि परमेश्वर सब बातों में धनी है, और सब बातें उसकी हैं. इसलिये यह उचित है कि सृष्टि आप, अपनी आदि दशा को लौटाई जाकर, बिना रोक धर्मियों के अधिकार के नीचे रहे; और प्रेरित ने रोमियों की पत्री में इसे स्पष्ट किया है, जब वह इस प्रकार कहता है: "क्योंकि सृष्टि की बाट जोहना परमेश्वर के पुत्रों के प्रगट होने की बाट जोहती है. क्योंकि सृष्टि व्यर्थता के अधीन की गई है, अपनी इच्छा से नहीं, पर उसके कारण जिस ने उसी को आशा में अधीन किया; क्योंकि सृष्टि आप भी नाश की दासता से परमेश्वर के पुत्रों की महिमामय स्वतन्त्रता में छुड़ाई जाएगी."(3)
2. इस प्रकार, तब, परमेश्वर की प्रतिज्ञा, जो उसने अब्राहम को दी, स्थिर बनी रहती है. क्योंकि उसने यों कहा: "अपनी आँखें उठा, और इस स्थान से जहाँ तू अब है, उत्तर और दक्षिण की ओर, और पूर्व और पश्चिम की ओर देख. क्योंकि सारी पृथ्वी जिसे तू देखता है, मैं तुझे और तेरे वंश को दूँगा, सदा के लिये भी."(4) और फिर वह कहता है, "उठ, और देश की लम्बाई और चौड़ाई में होकर चल, क्योंकि मैं उसे तुझे दूँगा;"(5) [तौभी] उसने उस में भाग न पाया, एक पाँव भर भी नहीं, पर उस में सदा परदेशी और यात्री रहा.(6) और अपनी पत्नी सारा की मृत्यु पर, जब हित्ती उसे वह स्थान देना चाहते थे जहाँ वह उसे गाड़ सके, उसने उसे दान के रूप में ठुकराया, पर कब्र का स्थान (उसके लिये चाँदी के चार सौ तलान्त देकर) हित्ती सोहर के पुत्र एप्रोन से मोल लिया.(7) इस प्रकार उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञा की धीरज से बाट जोही, और मनुष्यों से पाने के रूप में दिखना न चाहा, जिसे परमेश्वर ने उसे देने की प्रतिज्ञा की थी, जब उसने फिर उससे इस प्रकार कहा: "मिस्र की नदी से बड़ी नदी फरात तक यह देश मैं तेरे वंश को दूँगा."(8) यदि, तब, परमेश्वर ने उसे देश के भाग की प्रतिज्ञा की, तौभी उसने वहाँ के अपने सारे निवास के समय उसे न पाया, तो यह अवश्य है, कि अपने वंश के साथ, अर्थात् जो परमेश्वर का भय मानते और उस पर विश्वास करते हैं, वह धर्मियों के पुनरुत्थान पर उसे पाएगा.
क्योंकि उसका वंश कलीसिया है, जो प्रभु के द्वारा परमेश्वर के लिये लेपालकपन पाती है, जैसा बपतिस्मा देनेवाले यूहन्ना ने कहा: "क्योंकि परमेश्वर पत्थरों से अब्राहम के लिये बालक जिला सकता है."(9) इस प्रकार प्रेरित भी गलातियों की पत्री में कहता है: "पर तुम, हे भाइयो, जैसे इसहाक था, प्रतिज्ञा की सन्तान हो."(10) और फिर, उसी पत्री में, वह स्पष्ट प्रगट करता है कि जिन्हों ने मसीह पर विश्वास किया है वे मसीह को पाते हैं, अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा यह कहते हुए, "प्रतिज्ञाएँ अब्राहम से और उसके वंश से कही गईं. अब वह यह नहीं कहता, और वंशों से, मानो [उस ने कहा] बहुतों के विषय, पर एक के विषय के समान, और तेरे वंश से, जो मसीह है."(11) और फिर, अपनी पहिली बातों को दृढ़ करते हुए, वह कहता है, "जैसे अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और वह उसके लिये धर्म गिना गया. इसलिये जान लो, कि जो विश्वास से हैं वे अब्राहम की सन्तान हैं. पर पवित्रशास्त्र, पहले से देखकर कि परमेश्वर अन्यजातियों को विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराएगा, अब्राहम से पहले प्रगट किया, कि तुझ में सब जातियाँ आशीष पाएँगी. तो जो विश्वास से हैं वे विश्वासयोग्य अब्राहम के साथ आशीष पाएँगे."(12) इस प्रकार, तब, जो विश्वास से हैं वे विश्वासयोग्य अब्राहम के साथ आशीष पाएँगे, और ये अब्राहम की सन्तान हैं. अब परमेश्वर ने अब्राहम और उसके वंश से पृथ्वी की प्रतिज्ञा की; तौभी न अब्राहम और न उसका वंश, अर्थात् जो विश्वास से धर्मी ठहराए गए हैं, अब कुछ पाते हैं
उस में भाग; पर वे उसे धर्मियों के पुनरुत्थान पर पाएँगे. क्योंकि परमेश्वर सच्चा और विश्वासयोग्य है; और इसी कारण उसने कहा, "नम्र लोग धन्य हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे."(1)
अध्याय 33.--उसी बात के और प्रमाण, उन प्रतिज्ञाओं से लिए गए जो मसीह ने कीं, जब उसने प्रगट किया कि वह अपने पिता के राज्य में अपने चेलों के साथ दाख का फल पिएगा, और उसी समय उन को सौ गुना फल देने की, और भोजों में भागी बनाने की प्रतिज्ञा की. याकूब की कही हुई आशीष ने इसे पहले ही दिखा दिया था, जैसा पापियास और प्राचीनों ने इसका अर्थ किया है.
1. इसी कारण, अपने दुख सहने को होते हुए, कि वह अब्राहम और उसके साथ वालों को भाग के खुल जाने का शुभ सन्देश प्रगट करे, [मसीह] ने, कटोरा हाथ में लिए धन्यवाद करने के बाद, और उस में से पीकर, और चेलों को देकर, उन से कहा: "तुम सब इस में से पीओ: यह नई वाचा का मेरा लोहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के लिये बहाया जाएगा. पर मैं तुम से कहता हूँ, मैं आगे को इस दाखलता के फल में से न पीऊँगा, उस दिन तक जब मैं उसे अपने पिता के राज्य में तुम्हारे साथ नया पीऊँगा."(2) इस प्रकार, तब, वह आप पृथ्वी के भाग को नया करेगा, और [अपने] पुत्रों की महिमा के भेद को फिर से व्यवस्थित करेगा; जैसा दाऊद कहता है, "जिस ने पृथ्वी के मुख को नया किया है."(3) उसने अपने चेलों के साथ दाख के फल में से पीने की प्रतिज्ञा की, इन दोनों बातों को दिखाते हुए: पृथ्वी का भाग जिस में दाख का नया फल पिया जाता है, और देह में अपने चेलों का पुनरुत्थान. क्योंकि जो नई देह फिर जी उठती है वही है जिस ने नया कटोरा भी पाया. और वह किसी रीति से यह नहीं समझा जा सकता कि वह दाख के फल में से पी रहा है जब वह अपने [चेलों] के साथ ऊपर आकाश से परे के स्थान में बैठा हो; और फिर, जो उसे पीते हैं वे देह से रहित नहीं, क्योंकि जो दाखलता से बहता है उसे पीना देह से सम्बन्ध रखता है, आत्मा से नहीं.
2. और इसी कारण प्रभु ने प्रगट किया, "जब तू दिन का भोज या रात का भोज बनाए, तो अपने मित्रों को न बुला, न अपने पड़ोसियों को, न अपने कुटुम्बियों को, ऐसा न हो कि वे तुझे बदले में बुलाएँ, और इस प्रकार तुझे चुका दें. पर लंगड़ों को, अन्धों को, और कंगालों को बुला, और तू धन्य होगा, क्योंकि वे तुझे बदला नहीं दे सकते, पर धर्मियों के पुनरुत्थान पर तुझे बदला दिया जाएगा."(4) और फिर वह कहता है, "जो कोई मेरे कारण भूमि, या घर, या माता-पिता, या भाई, या बालक छोड़ेगा, वह इस जगत में सौ गुना पाएगा, और आनेवाले में वह अनन्त जीवन का अधिकारी होगा."(5) क्योंकि इस शब्द में सौ गुना [फल] क्या हैं, कंगालों को दिए गए सत्कार, और वे भोज जिन का बदला दिया जाता है? ये राज्य के समयों में [होंगे], अर्थात् सातवें दिन, जो पवित्र किया गया है, जिस में परमेश्वर ने उन सब कामों से विश्राम किया जिन्हें उसने सृजा, जो धर्मियों का सच्चा सब्त है, जिस में वे किसी पृथ्वी के धन्धे में न लगे रहेंगे; पर परमेश्वर की तैयार की हुई मेज हाथ के पास होगी, जो उन्हें नाना प्रकार के व्यंजन देगी.
3. इसहाक की वह आशीष जिस से उसने अपने छोटे पुत्र याकूब को आशीष दी उसी अर्थ की है, जब वह कहता है, "देख, मेरे पुत्र की सुगन्ध ऐसे भरे खेत की सुगन्ध के समान है जिसे प्रभु ने आशीष दी है."(6) पर "खेत जगत है."(7) और इसलिये उसने जोड़ा, "परमेश्वर तुझे स्वर्ग की ओस से, और पृथ्वी की धन्यता से, अन्न और दाखमधु की बहुतायत दे. जातियाँ तेरी सेवा करें, और राजा तुझे दण्डवत् करें; और तू अपने भाई पर स्वामी हो, और तेरे पिता के पुत्र तुझे दण्डवत् करें: जो तुझे शाप दे वह शापित हो, और जो तुझे आशीष दे वह आशीष पाया हुआ हो."(8) यदि, तब, कोई इन बातों को ठहराए हुए राज्य की ओर संकेत करती न माने, तो उसे बहुत विरोध और उलटापन में पड़ना होगा, जैसा यहूदियों के साथ है, जो पूरे भ्रम में फँसे हैं. क्योंकि इस जीवन में जातियों ने इस याकूब की सेवा न की, केवल यही नहीं; पर आशीष पाने के बाद भी, वह आप [अपने घर से] निकलकर, अपने मामा सीरियाई लाबान की बीस वर्ष सेवा करता रहा;(9) और वह अपने भाई का स्वामी न बनाया गया, केवल यही नहीं, पर वह आप मेसोपोटामिया से अपने पिता के पास लौटने पर अपने भाई एसाव के आगे झुका, और उसे बहुत से दान चढ़ाए.(10) और, उसने यहाँ बहुत अन्न और दाखमधु किस रीति का अधिकारी हुआ, वह जो उस देश में के अकाल के कारण मिस्र को चला गया जिस में वह रह रहा था, और फिरौन के अधीन हो गया, जो तब मिस्र पर राज्य कर रहा था?
इसलिये बताई हुई आशीष निस्सन्देह राज्य के समयों की है, जब धर्मी मरे हुओं में से जी उठने पर प्रभुता रखेंगे;(11) जब सृष्टि भी, नवीनीकृत और स्वतन्त्र की जाकर, स्वर्ग की ओस से, और पृथ्वी की उर्वरता से, हर प्रकार के भोजन की बहुतायत से फलवन्त होगी: जैसा उन प्राचीनों ने कहा जिन्हों ने प्रभु के चेले यूहन्ना को देखा, कि उन्होंने सुना था
उस से कि प्रभु इन समयों के विषय कैसे सिखाया करता था, और कहता था: दिन आएँगे, जिन में दाखलताएँ बढ़ेंगी, हर एक की दस हजार डालियाँ होंगी, और हर डाली में दस हजार टहनियाँ, और हर सच्ची(1) टहनी में दस हजार कोपलें, और उन कोपलों में से हर एक में दस हजार dusters, और हर गुच्छे पर दस हजार अंगूर, और हर अंगूर दबाने पर पच्चीस मेट्रेटे दाखमधु देगा. और जब पवित्र लोगों में से कोई एक गुच्छे को पकड़े,(2) दूसरा पुकारेगा, "मैं बेहतर गुच्छा हूँ, मुझे ले; मेरे द्वारा प्रभु को धन्य कह." इसी रीति [प्रभु ने प्रगट किया] कि गेहूँ का एक दाना दस हजार बालियाँ उपजाएगा, और हर बाली में दस हजार दाने होंगे, और हर दाना दस पाउंड (quinque bilibres) साफ, शुद्ध, महीन आटा देगा; और फल देनेवाले और सब वृक्ष,(3) और बीज और घास, ऐसी ही मात्रा में उपजाएँगे (secundum congruentiam iis consequentem); और पृथ्वी की उपज पर [केवल] चरनेवाले सब पशु [उन दिनों] एक दूसरे के साथ शान्त और मेल में हो जाएँगे, और मनुष्य के पूर्ण अधीन होंगे.
4. और ये बातें यूहन्ना के सुननेवाले, और पुलिकर्पस के साथी, पापियास की चौथी पुस्तक में लेख में bone साक्षी पाती हैं; क्योंकि उसके द्वारा पाँच पुस्तकें संकलित की गई थीं (<greek>suntetagmena</greek>).(4) और वह जोड़कर कहता है, "अब ये बातें विश्वासियों के लिये विश्वसनीय हैं." और वह कहता है, "जब विश्वासघाती यहूदा ने उन्हें विश्वास न दिया, और प्रश्न रखा, 'तो जो बातें इतनी बहुतायत से फलनेवाली हैं वे प्रभु से कैसे की जा सकती हैं?' प्रभु ने प्रगट किया, 'जो इन [समयों] पर आएँगे वे देखेंगे.'" इसलिये इन समयों की भविष्यद्वाणी करते हुए, एसायस कहता है: "भेड़िया भी मेम्ने के साथ चरेगा, और तेन्दुआ बकरी के बच्चे के साथ विश्राम करेगा; बछड़ा भी, और साँड़, और सिंह साथ खाएँगे; और एक छोटा बालक उन्हें ले चलेगा. बैल और रीछ साथ चरेंगे, और उनके बच्चे आपस में मेल रखेंगे; और सिंह बैल के समान भूसा खाएगा. और दूधमुँहा बालक अपना हाथ नाग की माँद में, और करैत के बच्चों के घोंसले में भी डालेगा; और वे हानि न करेंगे, न मेरे पवित्र पर्वत पर किसी वस्तु को दुख देने की शक्ति रखेंगे." और फिर वह संग्रह में कहता है, "भेड़िये और मेम्ने तब साथ चरेंगे, और सिंह बैल के समान भूसा खाएगा, और सर्प पृथ्वी को रोटी के समान खाएगा; और वे मेरे पवित्र पर्वत पर किसी वस्तु को न दुख देंगे और न सताएँगे, प्रभु कहता है."(5) मुझे भली भाँति मालूम है कि कुछ लोग इन वचनों को क्रूर मनुष्यों के विषय लगाने का यत्न करते हैं, भिन्न जातियों और नाना आदतों के, जो विश्वास करने आते हैं, और विश्वास कर लेने पर धर्मियों के साथ मेल से चलते हैं. पर यद्यपि यह अब कुछ मनुष्यों के विषय [सत्य] है जो नाना जातियों से विश्वास के मेल में आते हैं, तौभी धर्मियों के पुनरुत्थान में [वे वचन उन पशुओं पर भी लगेंगे] जिन का उल्लेख हुआ है.
क्योंकि परमेश्वर सब बातों में non है. और यह उचित है कि जब सृष्टि लौटाई जाए, सब पशु मनुष्य की आज्ञा मानें और अधीन हों, और उस भोजन पर लौटें जो परमेश्वर ने पहले दिया था (क्योंकि वे पहले आदम की आज्ञा में अधीन किए गए थे), अर्थात् पृथ्वी की उपज. पर सिंह [तब] भूसा खाएगा, यह दिखाने के लिये कोई और अवसर है, वर्तमान नहीं, [ढूँढ़ा जाए]. और यह फलों के बड़े आकार और धनी गुण को दिखाता है. क्योंकि यदि वह पशु, सिंह, [उस समय] भूसा खाता है, तो वह गेहूँ आप कैसा गुण रखेगा जिसका भूसा सिंहों के योग्य भोजन का काम दे?
अध्याय 34.--वह अपने विचारों को पवित्र लोगों के पुनरुत्थान के बाद के कालिक और पृथ्वी के राज्य के विषय यशायाह, यहेजकेल, यिर्मयाह, और दानिय्येल की नाना साक्षियों से दृढ़ करता है; और जागते हुए सेवकों के दृष्टान्त से भी, जिन से प्रभु ने प्रतिज्ञा की कि वह सेवा करेगा.
1. तब, यशायाह आप ने भी स्पष्ट प्रगट किया है कि धर्मियों के पुनरुत्थान पर इस प्रकार का आनन्द होगा, जब वह कहता है: "मेरे हुए फिर जी उठेंगे; जो कब्रों में हैं वे भी उठेंगे, और जो पृथ्वी में हैं वे आनन्द करेंगे. क्योंकि तुझ से ओस उन के लिये स्वास्थ्य है."(6) और यह यहेजकेल भी फिर कहता है: "देख, मैं तुम्हारी कब्रें खोलूँगा, और तुम्हारी कब्रों में से तुम्हें बाहर लाऊँगा; जब मैं अपनी प्रजा को कब्रों से खींचूँगा, और मैं तुम में साँस डालूँगा, और तुम जीवित रहोगे; और मैं तुम्हें तुम्हारी अपनी भूमि पर रखूँगा, और तुम जानोगे कि मैं प्रभु हूँ."(7) और वही फिर इस प्रकार कहता है: "प्रभु ये बातें कहता है, मैं इस्राएल को उन सब जातियों से इकट्ठा करूँगा जहाँ वे खदेड़े गए हैं, और जातियों के पुत्रों के देखते मैं उन में पवित्र ठहरूँगा: और वे अपनी भूमि में बसेंगे, जो मैं ने अपने दास याकूब को दी. और वे उस में शान्ति से बसेंगे; और वे घर बनाएंगे, और दाख की बारियाँ लगाएँगे, और आशा में बसेंगे, जब मैं उन सब में न्याय गिराऊँगा जिन्हों ने उनका अनादर किया, उन में जो उन्हें चारों ओर घेरते हैं; और वे जानेंगे कि मैं प्रभु उनका परमेश्वर हूँ, और उनके पितरों का परमेश्वर."(8) अब मैं ने थोड़ी देर पहले दिखाया है कि कलीसिया अब्राहम का वंश है; और इसी कारण, कि हम जानें कि वह जो नये नियम में "पत्थरों से बालकों को जिलाता है तक
अब्राहम,"(1) वही है जो पुराने नियम के अनुसार उन को इकट्ठा करेगा जो सब जातियों में से बचाए जाएँगे, यिर्मयाह कहता है: "देख, दिन आते हैं, प्रभु कहता है, कि वे फिर न कहेंगे, प्रभु जीवित है, जिस ने इस्राएल की सन्तान को उत्तर से, और हर देश से जहाँ वे खदेड़े गए थे, निकाला; वह उन्हें उनकी अपनी भूमि पर लौटाएगा जो उसने उनके पितरों को दी."(2)
2. कि सारी सृष्टि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार बड़ी बढ़ती पाएगी, कि वह [जैसा हम ने कहा है] ऐसे फल लाए और बनाए रखे, यशायाह प्रगट करता है: "और हर ऊँचे पर्वत पर, और हर उभरी पहाड़ी पर, उस दिन चारों ओर पानी बहेगा, जब बहुत नाश होंगे, जब दीवारें गिरेंगी. और चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य के प्रकाश के समान होगा, उस दिन से सात गुना, जब वह अपनी प्रजा की पीड़ा को चंगा करेगा, और अपनी चोट के दर्द को दूर करेगा."(3) अब "चोट का दर्द" वह है जो आरम्भ में आदम में आज्ञा न माननेवाले मनुष्य पर डाला गया, अर्थात् मृत्यु; जिस [चोट] को प्रभु चंगा करेगा जब वह हमें मरे हुओं में से जिलाएगा, और पितरों का भाग लौटाएगा, जैसा यशायाह फिर कहता है: "और तू प्रभु पर भरोसा रखेगा, और वह तुझे सारी पृथ्वी के पार ले जाएगा, और तुझे तेरे पिता याकूब के भाग से खिलाएगा."(4) यही प्रभु ने प्रगट किया: "वे सेवक धन्य हैं जिन्हें प्रभु अपने आने पर जागते पाए. मैं तुम से सच कहता हूँ, कि वह कमर बाँधेगा, और उन्हें [भोजन के लिये] बैठाएगा, और निकलकर उनकी सेवा करेगा. और यदि वह साँझ की पहर में आए, और उन्हें ऐसा पाए, तो वे धन्य हैं, क्योंकि वह उन्हें बैठाएगा, और उनकी सेवा करेगा; या यदि यह दूसरी में हो, या तीसरी में हो, तो वे धन्य हैं."(5) यूहन्ना भी प्रकाशितवाक्य में यही कहता है: "धन्य और पवित्र है वह जिसे 1ले पुनरुत्थान में भाग है."(6) तब, यशायाह ने वह समय भी प्रगट किया जब ये घटनाएँ होंगी; वह कहता है: "और मैं ने कहा, प्रभु, कब तक? जब तक नगर निवासी रहित उजड़ न जाएँ, और घर मनुष्यों से रहित न हों, और पृथ्वी जंगल छोड़ न दी जाए.
और इन बातों के बाद प्रभु हम मनुष्यों को दूर हटा देगा (longe nos faciet Deus homines), और जो रह जाएँगे वे पृथ्वी पर बढ़ेंगे."(7) तब दानिय्येल भी यही बात कहता है: "और राज्य और प्रभुता, और आकाश के नीचे वालों की महिमा, परमप्रधान परमेश्वर के पवित्र लोगों को दी गई है, जिसका राज्य सदा का है, और सब प्रभुताएँ उसकी सेवा करेंगी और उसकी आज्ञा मानेंगी."(8) और नाम ली हुई प्रतिज्ञा इस समय की ओर संकेत करती समझी न जाए, इसलिये भविष्यद्वक्ता से कहा गया: "और तू आकर दिनों की समाप्ति पर अपने भाग में खड़ा हो."(9)
3. अब, प्रतिज्ञाएँ केवल भविष्यद्वक्ताओं और पितरों को ही नहीं सुनाई गईं, पर उन जातियों से इन के साथ जुड़ी कलीसियाओं को सुनाई गईं, जिन्हें पवित्र आत्मा "द्वीप" भी कहती है (इसलिये भी कि वे कोलाहल के बीच स्थिर हैं, निन्दाओं के तूफान को सहती हैं, संकट में पड़े लोगों के लिये सुरक्षा के बन्दरगाह के रूप में हैं, और ऊँचाई [स्वर्ग की] से प्रेम करनेवालों की शरण हैं, और बाइथस से, अर्थात् भ्रम की गहराई से, बचने का यत्न करती हैं), यिर्मयाह इस प्रकार प्रगट करता है: "प्रभु का वचन सुनो, हे जातियों, और दूर के द्वीपों को इसका प्रचार करो; तुम कहो, कि प्रभु इस्राएल को तितर-बितर करेगा, वह उसे इकट्ठा करेगा, और अपनी भेड़ों के झुण्ड को चरानेवाले के समान उसकी रखवाली करेगा. क्योंकि प्रभु ने याकूब को छुड़ाया है, और उससे बलवान के हाथ से उसे उबारा है. और वे आएँगे और m सिय्योन पर्वत पर आनन्द करेंगे, और जो अच्छा है उसके पास आएँगे, और गेहूँ, और दाखमधु, और फलों, पशुओं और भेड़ों के देश में आएँगे; और उनका प्राण फल देनेवाले वृक्ष के समान होगा, और वे फिर भूखे न रहेंगे. उस समय कुँवारियाँ भी जवानों की संगति में आनन्द करेंगी: बूढ़े भी प्रसन्न होंगे, और मैं उनका शोक आनन्द में बदल दूँगा; और मैं उन्हें उल्लसित करूँगा, और उन्हें बड़ा करूँगा, और लेवी के पुत्र याजकों के प्राणों को तृप्त करूँगा; और मेरी प्रजा मेरी भलाई से तृप्त होगी."(10) अब, पिछली पुस्तक(11) में मैं ने दिखाया है कि प्रभु के सब चेले लेवीय और याजक हैं, वे जो मन्दिर में सब्त को अपवित्र किया करते थे, पर निर्दोष हैं.(12) इस प्रकार की प्रतिज्ञाएँ, इसलिये, सब से स्पष्ट रीति से धर्मियों के राज्य में उस सृष्टि के भोज को दिखाती हैं, जिस की सेवा परमेश्वर आप ही करने की प्रतिज्ञा करता है.
4. फिर, यरूशलेम के, और वहाँ राज्य करनेवाले उसके विषय में कहते हुए, यशायाह प्रगट करता है, "प्रभु यों कहता है, धन्य है वह जिसके सिय्योन में सन्तान है, और यरूशलेम में सेवक हैं. देख, एक धर्मी राजा राज्य करेगा, और प्रधान न्याय के साथ प्रभुता करेंगे"(13) और जिस नींव पर वह फिर बनाया जाएगा उसके विषय में वह कहता है: "देख, मैं तेरे लिये मानिक्य पत्थर को क्रम से रखूँगा, और तेरी नींव के लिये नीलम; और मैं तेरे गढ़ों को यशब से रखूँगा, और तेरे फाटकों को स्फटिक से, और तेरी शहरपनाह को चुने हुए पत्थरों से: और तेरे सब बच्चे परमेश्वर से सिखाए जाएँगे, और तेरे बच्चों की शान्ति बड़ी होगी; और धर्म में तू बनाई जाएगी."(14) और फिर भी
वह वही बात कहता है: "देख, मैं यरूशलेम को आनन्द बनाता हूँ, और अपनी प्रजा को [आनन्द]; क्योंकि उसके भीतर रोने का शब्द फिर न सुनाई देगा, न चिल्लाने का शब्द. वहाँ कोई अपरिपक्व [एक] भी न होगा, न ऐसा बूढ़ा जो अपना समय पूरा न करे: क्योंकि जवान सौ वर्ष का होगा; और पापी सौ वर्ष की आयु में मरेगा, तौभी शापित होगा. और वे घर बनाएंगे, और उन में आप ही बसेंगे; और दाख की बारियाँ लगाएँगे, और उनका फल आप ही खाएँगे, और दाखमधु पीएँगे. और वे न बनाएँगे कि दूसरे बसें; न दाख की बारी तैयार करेंगे कि दूसरे खाएँ. क्योंकि जीवन के वृक्ष के दिन जैसे तेरे भीतर की प्रजा के दिन होंगे; क्योंकि उनके हाथों के काम बने रहेंगे."(1)
अध्याय 35.--वह यह तर्क करता है कि पहले दिए गए ये प्रमाण स्वर्गीय आशीषों के विषय रूपक रूप में नहीं समझे जा सकते, परन्तु मसीह-विरोधी के आने के बाद, और पुनरुत्थान में, पृथ्वी के यरूशलेम में इनकी पूर्ति होगी. पहले की भविष्यद्वाणियों के साथ वह यशायाह, यिर्मयाह, और यूहन्ना के प्रकाशितवाक्य से ली गई और भविष्यद्वाणियाँ जोड़ता है.
1. यदि, तौभी, कोई इस प्रकार की [भविष्यद्वाणियों] को रूपक बनाने का यत्न करेगा, तो वे सब बातों में अपने आप से मेल खाते न पाए जाएँगे, और [प्रश्न में] उन्हीं उक्तियों की शिक्षा से खण्डित होंगे. उदाहरण के लिये: अन्यजातियों के "जब नगर" "उजड़ जाएँगे, यहाँ तक कि उन में बसावट न रहे, और घर ऐसे कि उन में मनुष्य न रहें और भूमि उजाड़ छोड़ दी जाए."(2) "क्योंकि, देख," यशायाह कहता है, "प्रभु का दिन आता है, जिसका उपाय नहीं, क्रोध और कोप से भरा, पृथ्वी के नगर को उजाड़ने को, और पापियों को उस में से जड़ से उखाड़ने को."(3) और फिर वह कहता है, "वह हटा लिया जाए, कि वह परमेश्वर की महिमा को न देखे."(4) और जब ये बातें हो चुकी हों, वह कहता है, "परमेश्वर मनुष्यों को दूर हटा देगा, और जो बचे रहेंगे वे पृथ्वी में बढ़ेंगे."(5) "और वे घर बनाएंगे, और उन में आप ही बसेंगे: और दाख की बारियाँ लगाएँगे, और उन में से आप ही खाएँगे."(6) क्योंकि ये सब और अन्य वचन निस्सन्देह धर्मियों के पुनरुत्थान के विषय कहे गए थे, जो मसीह-विरोधी के आने के बाद, और उसकी प्रभुता के नीचे सब जातियों के नाश के बाद होता है; [जिन समयों में] उस [पुनरुत्थान] में धर्मी पृथ्वी पर राज्य करेंगे, प्रभु के दर्शन से और बलवन्त होते हुए: और उसके द्वारा वे पिता परमेश्वर की महिमा में भाग लेने के अभ्यस्त होंगे, और राज्य में पवित्र स्वर्गदूतों के साथ मेल और संगति का आनन्द लेंगे, और आत्मिक प्राणियों के साथ एकता का; और [उन के विषय] जिन्हें प्रभु देह में पाएगा, जो स्वर्ग से उसकी बाट जोहते हैं, और जिन्हों ने क्लेश सहा है, तथा दुष्ट के हाथों से बच निकले हैं.
क्योंकि उन्हीं के विषय भविष्यद्वक्ता कहता है: "और जो बचे रहेंगे वे पृथ्वी पर बढ़ेंगे," और भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह(7) ने दिखाया है, कि जितने विश्वासी परमेश्वर ने इस उद्देश्य के लिये तैयार किए हैं, पृथ्वी पर बचे हुओं को बढ़ाने के लिये, वे दोनों इस यरूशलेम की सेवा करने को पवित्र लोगों की प्रभुता के नीचे रहें, और [उसका] राज्य उस में हो, यह कहते हुए, "यरूशलेम, पूर्व की ओर चारों ओर देख, और उस आनन्द को देख जो परमेश्वर आप ही से तेरे पास आता है. देख, तेरे पुत्र आएँगे जिन्हें तू ने भेजा है: वे उस पवित्र के वचन से पूर्व से पश्चिम तक दल बाँधकर आएँगे, उस प्रताप में जो तेरे परमेश्वर से है आनन्द करते हुए. हे यरूशलेम, अपने विलाप और क्लेश का वस्त्र उतार, और अपने परमेश्वर से अनन्त प्रताप की उस शोभा को पहन. अपने परमेश्वर से निकलनेवाले उस धर्म के दोहरे वस्त्र से कमर बाँध; अनन्त महिमा की पगड़ी अपने सिर पर रख. क्योंकि परमेश्वर आकाश के नीचे सारी पृथ्वी को तेरी महिमा दिखाएगा. क्योंकि तेरा नाम परमेश्वर आप ही सदा पुकारेगा, धर्म की शान्ति और परमेश्वर की आराधना करनेवाले के लिये महिमा. उठ, यरूशलेम, ऊँचे पर खड़ी हो, और पूर्व की ओर देख, और सूर्योदय से लेकर पश्चिम तक अपने पुत्रों को देख, उस पवित्र के वचन से, परमेश्वर की स्मृति ही में आनन्द करते हुए. क्योंकि पैदल तेरे पास से निकल गए, जब वे शत्रु से खींचे जा रहे थे. परमेश्वर उन्हें तेरे पास ले आएगा, राज्य के सिंहासन के समान महिमा के साथ उठाए हुए. क्योंकि परमेश्वर ने ठहराया है कि हर ऊँचा पर्वत नीचा किया जाए, और सनातन पहाड़ियाँ, और तराइयाँ भर दी जाएँ, ताकि पृथ्वी का तल चिकना किया जाए, कि इस्राएल, परमेश्वर की महिमा, सुरक्षा में चल सके.
वन भी छायादार स्थान बनाएंगे, और हर सुगन्धित वृक्ष परमेश्वर की आज्ञा से इस्राएल ही के लिये होगा. क्योंकि परमेश्वर अपने प्रताप के प्रकाश में आनन्द के साथ आगे चलेगा, उस करुणा और धर्म के साथ जो उसी से निकलता है."
2. अब ये सब बातें जैसी हैं वैसी होने से, आकाश से परे की बातों के विषय नहीं समझी जा सकतीं; "क्योंकि परमेश्वर," कहा जाता है, "आकाश के नीचे की सारी पृथ्वी को तेरी महिमा दिखाएगा." पर राज्य के समयों में, पृथ्वी को मसीह ने फिर बुलाया है [उसकी मूल दशा को], और यरूशलेम ऊपर के यरूशलेम के नमूने पर फिर बनाया गया है, जिसके विषय भविष्यद्वक्ता यशायाह कहता है, "देख, मैं ने तेरी दीवारों को अपने हाथों पर चित्रित किया है, और तू सदा है में
मेरी दृष्टि,"(1) और प्रेरित भी, गलातियों को लिखते हुए, इसी रीति से कहता है, "पर ऊपर का यरूशलेम स्वतन्त्र है, जो हम सब की माता है."(2) वह यह किसी भटकते AEon की सोच से नहीं कहता, न प्लेरोमा से निकल गई किसी और सामर्थ्य की सोच से, न प्रुनिकस की, पर उस यरूशलेम की जो [परमेश्वर के] हाथों पर अंकित हुई है. और प्रकाशितवाक्य में यूहन्ना ने इस नये [यरूशलेम] को नई पृथ्वी पर उतरते देखा.(3) क्योंकि राज्य के समयों के बाद, वह कहता है, "मैं ने एक बड़ा श्वेत सिंहासन देखा, और उस पर बैठनेवाले को, जिसके मुख से पृथ्वी भाग गई, और आकाश; और उनके लिये फिर स्थान न रहा."(4) और वह सामान्य पुनरुत्थान और न्याय से जुड़ी बातों को भी रखता है, "मरे हुओं को, बड़े और छोटे" का उल्लेख करते हुए. "समुद्र ने," वह कहता है, "अपने भीतर के मरे हुओं को दे दिया, और मृत्यु और अधोलोक ने अपने भीतर के मरे हुओं को दे दिया; और पुस्तकें खोली गईं. और," वह कहता है, "जीवन की पुस्तक खोली गई, और मेरे हुए उन बातों से जो पुस्तकों में लिखी थीं, अपने कामों के अनुसार न्याय किए गए; और मृत्यु और अधोलोक आग की झील में डाले गए, 2री मृत्यु."(5) अब यही गेहन्ना कहलाती है, जिसे प्रभु ने अनन्त आग कहा.(6) "और यदि कोई," कहा जाता है, "जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ न पाया गया, तो वह आग की झील में डाल दिया गया."(7) और इसके बाद, वह कहता है, "मैं ने एक नया आकाश और एक नई पृथ्वी देखी, क्योंकि 1ला आकाश और पृथ्वी बीत गए हैं; समुद्र भी फिर न रहा. और मैं ने पवित्र नगर, नये यरूशलेम को, स्वर्ग से उतरते देखा, अपने पति के लिये सजी हुई दुल्हन के समान." "और मैं ने सुना," कहा जाता है, "सिंहासन से एक बड़ा शब्द, जो कहता था, देख, परमेश्वर का तम्बू मनुष्यों के साथ है, और वह उनके साथ निवास करेगा; और वे उसकी प्रजा होंगे, और परमेश्वर आप ही उनके परमेश्वर होकर उनके साथ रहेगा.
और वह उनकी आँखों से हर आँसू पोंछ देगा; और मृत्यु फिर न रहेगी, न शोक, न रोना, और न फिर कोई पीड़ा होगी, क्योंकि पहली बातें बीत गई हैं."(8) यशायाह भी वही प्रगट करता है: "क्योंकि एक नया आकाश और एक नई पृथ्वी होगी; और पहिले का स्मरण न रहेगा, न मन उन के विषय सोचेगा, पर वे उस में आनन्द और उल्लास पाएँगे."(9) अब यह वही है जो प्रेरित ने कहा है: "क्योंकि इस जगत की रूपरेखा मिटती जाती है."(10) उसी उद्देश्य से प्रभु ने भी प्रगट किया, "आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे."(11) इसलिये जब ये बातें पृथ्वी के ऊपर टल जाती हैं, यूहन्ना, प्रभु का चेला, कहता है कि ऊपर का नया यरूशलेम [तब] उतरेगा, अपने पति के लिये सजी हुई दुल्हन के समान; और यह परमेश्वर का तम्बू है, जिस में परमेश्वर मनुष्यों के साथ निवास करेगा. इस यरूशलेम का पहिला एक प्रतिमा है--उस पहिली पृथ्वी का वह यरूशलेम जिस में धर्मी अविनाश के लिये पहले से अनुशासित होते हैं और उद्धार के लिये तैयार किए जाते हैं. और इस तम्बू का नमूना मूसा ने पर्वत पर पाया;(12) और कुछ भी रूपक बनने के योग्य नहीं, पर सब बातें स्थिर, और सत्य, land ठोस हैं, जो परमेश्वर ने धर्मियों के भोग के लिये बनाई हैं. क्योंकि जैसा सचमुच परमेश्वर ही है जो मनुष्य को जिलाता है, वैसे ही मनुष्य सचमुच मरे हुओं में से जी उठता है, रूपक रूप में नहीं, जैसा मैं ने बार बार दिखाया है. और जैसा वह वास्तव में जी उठता है, वैसे ही वह वास्तव में अविनाश के लिये पहले से अनुशासित होगा, और राज्य के समयों में आगे बढ़ेगा और फलेगा-फूलेगा, इसलिये कि वह पिता की महिमा पाने के योग्य हो. तब, जब सब कुछ नया किया जाता है, वह सचमुच परमेश्वर के नगर में निवास करेगा. क्योंकि कहा जाता है, "जो सिंहासन पर बैठा है उसने कहा, देख, मैं सब कुछ नया करता हूँ.
और प्रभु कहता है, यह सब लिख; क्योंकि ये वचन विश्वासयोग्य और सत्य हैं. और उसने मुझ से कहा, ये हो चुके हैं."(13) और यही बात की सच्चाई है.
अध्याय 36.--मनुष्य वास्तव में जिलाए जाएँगे: जगत नष्ट न किया जाएगा; पर हर एक व्यक्ति को दिए गए पद के अनुसार पवित्र लोगों के लिये नाना निवास होंगे. सब कुछ पिता परमेश्वर के अधीन होगा, और इस प्रकार वह सब में सब कुछ होगा.
1. क्योंकि जब वास्तविक मनुष्य हैं, तो वास्तविक स्थापना भी होनी चाहिये (plantationem), कि वे अनस्तित्व वाली बातों के बीच लुप्त न हों, पर जिन का वास्तविक अस्तित्व है उन के बीच आगे बढ़ें. क्योंकि सृष्टि का न तो तत्व और न सार नष्ट किया जाता है (क्योंकि जिस ने उसे स्थापित किया वह विश्वासयोग्य और सत्य है), पर "जगत की रूपरेखा मिटती जाती है;"(14) अर्थात् वे बातें जिन के बीच अपराध हुआ है, क्योंकि मनुष्य उन में बूढ़ा हो गया है. और इसलिये यह [वर्तमान] रूपरेखा अस्थायी बनाई गई है, परमेश्वर सब कुछ पहले से जानता था; जैसा मैं ने पिछली पुस्तक में दिखाया है,(15) और इस कालिक बातों के जगत की सृष्टि का कारण भी, जितना सम्भव था, दिखाया है. पर जब यह [वर्तमान] रूपरेखा [बातों की] मिट जाती है, और मनुष्य नया किया गया है, और अविनाशी दशा में फलता-फूलता है, यहाँ तक कि बूढ़ा होने की सम्भावना रुक जाए, [तब] नया आकाश और नई पृथ्वी होगी, जिन में नया मनुष्य बना रहेगा [con-
tinually], सदा परमेश्वर के साथ नया वार्तालाप करते हुए. और क्योंकि (या, कि) ये बातें अन्त के बिना सदा बनी रहेंगी, यशायाह प्रगट करता है, "क्योंकि जैसा नया आकाश और नई पृथ्वी जिन्हें मैं बनाता हूँ, मेरी दृष्टि में बने रहते हैं, प्रभु कहता है, वैसे ही तुम्हारा वंश और तुम्हारा नाम बना रहेगा."(1) और जैसा प्रेस्बिटेर कहते हैं, तब जो स्वर्ग में निवास के योग्य गिने जाएँगे वे वहाँ जाएँगे, दूसरे परमदेश के आनन्द भोगेंगे, और दूसरे नगर के प्रताप के अधिकारी होंगे; क्योंकि सर्वत्र उद्धारकर्ता(2) देखा जाएगा, जैसा उसे देखनेवाले योग्य होंगे.
2. [वे और कहते हैं], कि सौ गुना उपजानेवालों के निवास, और साठ गुना उपजानेवालों के निवास, और तीस गुना उपजानेवालों के निवास के बीच यह भेद है: क्योंकि 1ले वाले स्वर्ग में उठा लिये जाएँगे, 2रे वाले परमदेश में बसेंगे, अन्तिम वाले नगर में निवास करेंगे; और इसी कारण प्रभु ने प्रगट किया, "मेरे पिता के घर में बहुत से निवास हैं."(3) क्योंकि सब कुछ परमेश्वर का है, जो सब को योग्य निवास-स्थान देता है; जैसा उसका वचन कहता है, कि पिता की ओर से सब को एक भाग बाँटा जाता है, जैसा हर व्यक्ति योग्य है या होगा. और यही वह खाट है जिस पर अतिथि टिकेंगे, विवाह के लिये बुलाए हुए.(4) प्रेस्बिटेर, प्रेरितों के चेले, दृढ़ करते हैं कि यही बचाए हुओं की श्रेणी और व्यवस्था है, और वे इस प्रकार की सीढ़ियों से आगे बढ़ते हैं; और वे पवित्र आत्मा के द्वारा पुत्र के पास चढ़ते हैं, और पुत्र के द्वारा पिता के पास, और उचित समय में पुत्र अपना काम पिता को सौंप देगा, जैसा प्रेरित ने कहा है, "क्योंकि जब तक वह सब शत्रुओं को अपने पाँवों के नीचे न कर ले, तब तक उसे राज्य करना अवश्य है. अन्तिम शत्रु जो नाश किया जाएगा वह मृत्यु है."(5) क्योंकि राज्य के समयों में, जो धर्मी पृथ्वी पर है वह तब मरना भूल जाएगा. "पर जब वह कहता है, सब कुछ उसके अधीन कर दिया जाएगा, तो यह प्रगट है कि उसे छोड़ दिया गया है जिस ने सब कुछ उसके अधीन कर दिया. और जब सब कुछ उसके अधीन कर दिया जाएगा, तब पुत्र आप भी उसके अधीन हो जाएगा जिस ने सब कुछ उसके अधीन कर दिया, कि परमेश्वर सब में सब कुछ हो."(6)
3. यूहन्ना ने, इसलिये, 1ले "धर्मियों के पुनरुत्थान,"(7) को और पृथ्वी के राज्य में के भाग को स्पष्ट रूप से पहले से देखा; और भविष्यद्वक्ताओं ने उसके विषय जो भविष्यद्वाणी की है वह [उसके दर्शन के साथ] मेल खाती है. क्योंकि प्रभु ने भी ये बातें सिखाईं, जब उसने प्रतिज्ञा की कि वह राज्य में अपने चेलों के साथ मिलाया हुआ कटोरा नया पाएगा. प्रेरित ने भी स्वीकार किया है कि सृष्टि नाश की दासता से स्वतन्त्र होगी, परमेश्वर के पुत्रों की स्वतन्त्रता में [प्रवेश करने के लिये].(8) और इन सब बातों में, और इन सब के द्वारा, वही पिता परमेश्वर प्रगट होता है, जिस ने मनुष्य को रचा, और पितरों को पृथ्वी के भाग की प्रतिज्ञा दी, जिस ने धर्मियों के पुनरुत्थान पर उसे (सृष्टि को) [दासता से] बाहर निकाला, और अपने पुत्र के राज्य के लिये प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है; पीछे पिता की रीति से वे बातें देता है जिन्हें न आँख ने देखा, न कान ने सुना, न [उन के विषय सोच] मनुष्य के हृदय में उठी है,(9) क्योंकि एक ही पुत्र है, जिस ने अपने पिता की इच्छा पूरी की; और एक ही मानव जाति भी है जिस में परमेश्वर के भेद किए जाते हैं, "जिन की स्वर्गदूत झाँककर देखना चाहते हैं;"(10) और वे परमेश्वर की बुद्धि को खोज नहीं सकते, जिसके द्वारा उसकी हस्तकृति, उसके पुत्र के साथ दृढ़ और मिली हुई, सिद्धता को पहुँचाई जाती है; कि उसकी सन्तान, 1ला जन्मा वचन, सृष्टि (facturam) के पास, अर्थात् जो गढ़ा गया था (plasma) उसके पास उतरे, और वह उसके द्वारा समेटा जाए; और, दूसरी ओर, सृष्टि वचन को समेटे, और उसके पास चढ़े, स्वर्गदूतों के पार जाकर, और परमेश्वर के स्वरूप और समानता पर बनाई जाए.(11)