यह हिन्दी पाठ समीक्षा के लिए तैयार किया गया है। अंग्रेज़ी मूल प्रमाणिक है।

अध्याय 46

प्रार्थना में लगे रहिए

मैं उन चारों सुसमाचारों को पूरी तरह से वास्तविक समझता हूँ, क्योंकि उनमें एक ऐसी महानता का प्रतिबिंब है जो यीशु के व्यक्‍तित्व से उत्पन्‍न होती है, और जो पृथ्वी पर कभी दिखायी नहीं देती । — गोल.

कोई संभावना नहीं, प्रार्थना के लिए कोई आवश्यकता नहीं है; एक बेकार कार्य, एक निरर्थक आदत, एक लापरवाहीपूर्ण आदत, एक लापरवाह प्रदर्शन, बस कुछ भी नहीं बनाता। प्रार्थना के बिना जीवन नहीं मिलता, मृत है, मृत्यु नहीं होती है। एक लड़ाई के लिए, लेकिन एक बच्चे की सेवा करने के लिए नहीं, बल्कि सेवा के लिए प्रार्थना करने के लिए नहीं । प्रार्थना में लगे रहना सिर्फ एक भार है, संघर्ष के समय में, तीव्र संघर्ष के समय में एक बाधा, युद्ध और विजय के क्षण में लौटने की पुकार ।

हम प्रार्थना क्यों नहीं करते? यह क्या है कि प्रार्थना में लगे रहो? यह कोई अनोखी बात नहीं है और न यह कि हम प्रार्थना करें, बल्कि यह हमारा धर्म है, हमारे धर्म के मामले में भी। धर्म छोड़ा जाता है जब प्रार्थना करना बन्द किया जाता है और धर्म को रोकने से रोक देता है। जो बहुत व्यस्त रहता है, वह पवित्र जीवन के लिए बहुत व्यस्त रहता है

अन्य कर्तव्यों का पालन - पोषण और भीड़ का उत्साह बढ़ता जा रहा है. "मौत के लिए निवेदन किया जा रहा है" मृत लोगों के अनेक मामलों में, अगर एक प्रमोद्य प्रार्थना पर सुरक्षित किया जा सकता है तो इस गंभीर, आध्यात्मिक विपत्ति के बारे में. यह [या] प्रार्थना रोकने का एक अच्छा तरीका इतना सहज बन जाता है, इतना आसान होता है, इतना आसान है कि हम सब पर अचानक आ जाएगा. यदि हम अपनी भीड़ के लिए प्रार्थना करते हैं, तो यह हमेशा किया जाएगा. शैतान वास्तव में हम हमारी प्रार्थना के रास्ते पर घास बढ़ने दिया था. प्रार्थना के एक बंद कक्ष का मतलब है "धर्म के रूप में एक है" या क्या इससे भी बदतर है, "एक काम किया है" और कुछ अन्य नाम पर ले जाने, और किसी और के सम्मान के लिए। परमेश्‍वर की महिमा केवल धर्म के व्यापार में सुरक्षित है, और उस धर्म को प्रार्थना की एक बड़ी राजधानी के साथ ले जाने के द्वारा । जब प्रेरितों ने यह बात समझी, तब उन के ठहराए हुए समय को भी ज़कात नहीं दिया जाना चाहिए; वे कहते हैं, "प्रार्थना और वचन की सेवा में लगे रहो।" उनसे पहले प्रार्थना की जा रही है, और अपने वचन के द्वारा प्रार्थना की जा रही है

प्रार्थना को रोकने की प्रक्रिया सरल है और तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा है। सबसे पहले, प्रार्थना जल्दी से शुरू होती है। सभी भक्‍तिपूर्ण अभ्यास के लिए गंभीर, अंदर आ जाती है। फिर समय कम हो जाता है, तब अभ्यास के लिए समय कम होता है। फिर यह एक कोने में भीड़ है और उसके समय पर निर्भर करता है। इसके मूल्य के लिए उसके मूल्य गिर गया है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण है। हम प्रार्थना करना छोड़ देते हैं, और आध्यात्मिक रूप से जीवित रहना छोड़ देते हैं ।

संसार की पवित्रता और व्यवसाय की बाढ़ और परवाह की ओर कोई ठिकाना नहीं है, लेकिन [बाहर] प्रार्थना के अलावा मसीह का यह अर्थ था जब उसने हमें जागते रहने और प्रार्थना करने का आदेश दिया । पौलुस जानता था कि जब उसने कहा कि “वह रात और दिन उस ने प्रार्थना की, कि हम तेरे मुंह को देखकर सिद्ध हों, और तेरे विश्‍वास की घटी पूरी हो । इपफ्रास यह जानता था, कि कुलुस्से की कलीसिया के लिये जब उस ने यह प्रार्थना की, कि वे सिद्ध होकर पूर्ण परमेश्वर की इच्छा पर स्थिर रहें।

अपनी प्रार्थना को रोकने का एकमात्र तरीक़ा है अपने सच्चे और महान मूल्य पर प्रार्थना का अनुमान लगाना ।

... जानते थे कि लेखन पर हस्ताक्षर किया गया, वह अपने घर में गया, और उसकी खिड़की यरूशलेम के लिए खोली जा रही थी, वह दिन में तीन बार घुटने टेककर अपने परमेश्वर के साम्हने प्रार्थना किया और धन्यवाद दिया।

दानिय्येल की तरह उच्च मूल्यों में प्रार्थना करना, सम्मान, अनुग्रह, दौलत, जीवन में. दानिय्येल की आदत में प्रार्थना करना. “जिस तरह से उसने पहले किया था, ” उसमें दृढ़तापूर्वक और दृढ़ता देने के लिए बहुत कुछ है; बहुत में बाधा को हटाने के लिए, और स्वामी विरोधी परिस्थितियों को दूर करने के लिए.

शैतान की सबसे बड़ी चाल यह है कि भलाई से भलाई को मिटा दें। व्यवसाय और अन्य काम अच्छे से अच्छे हैं। हम उन लोगों से इतने भरी हैं कि वे भीड़ से भर गए हैं और उत्तम से उत्तम नष्ट कर रहे हैं। प्रार्थना खुदा के लिए क़िले है, और यदि शैतान को किसी भी कमज़ोर कर सकता है, तो वह बहुत दूर जा सकता है। और प्रार्थना के बाद मृत्यु हो जाती है। और जब वह मुर्दों को नष्ट कर देता है, तो फिर कभी भी नहीं किया गया है। तो क्या? हम वफादार पहरेदार के रूप में प्रार्थना करते रहना चाहिए, चौकन्ना रहना चाहिए. हम इसे एक बच्चे के रूप में नहीं रखना चाहिए, लेकिन हम इसे एक विशाल शक्ति में रखना चाहिए. हमारी प्रार्थना में, हमारे ताजा शक्ति, हमारे शांत समय होना चाहिए, बिना कम से कम, कम घंटे, बिना निजी समय प्रार्थना के. "और यह कि हमारे आगे दिन में तीन बार सजदे किया करो और अल्लाह के आगे कृतज्ञता दिखलाओ, जैसा कि हमने उससे पहले किया था। निश्चय ही वह ज्ञानवान है।"

प्रार्थना की महानता, जिस में यह पूर्ण व्यक्‍ति, तीव्र रूप से, आध्यात्मिक अनुशासन के बिना नहीं पायी जाती ।

प्रार्थना की सरलता, उसके बच्चे के रूप में सच्ची प्रार्थना के लिए एक बड़ी बाधा बन जाती है । उसकी माँ के घुटने - घुटने पर, मीठी, तीव्र, विश्‍वसनीय, विश्‍वासपूर्ण, भरोसे के साथ ।

यदि प्रार्थना समाप्त हो जाए, तो उस घड़ी तक मुश्‍किलें आ जाएँगी और उस घड़ी को भी रोका जाएगा - लेकिन प्रार्थना करना पूरे जीवन के लिए तैयारी करना कठिन है. घर और व्यापार के लिए तैयारी करना कितना कठिन है, सभी मीठा और जीवन के कठिन वातावरण के साथ, एक पवित्र जीवन की तैयारी! इस में हम अपने बंदियों के चारों ओर बनाए पुराने दीवार पाते हैं; पुरुषों पवित्र प्रार्थना से प्रेम नहीं करते, क्योंकि वे प्रेम नहीं करते और पवित्र जीवन नहीं करते ।

प्रार्थना सबसे आसान तरीके से की जाती है जो शिशु होंठों की कोशिश कर सकती है ।

(ऐ रसूल) तुम प्रार्थना में लगे रहो क्योंकि बेशक वह (हर ऐब से) पाक व पाकीज़ा है

यह न केवल अच्छी कविता है, बल्कि एक गहरी सत्य के रूप में प्रार्थना की सरलता और सरलता के रूप में है ।

पुराने नियम में प्रार्थना की जाती है: परस्पर विरोध और कौशल, कठिन, कठिन प्रयास शामिल हैं. नए नियम में हमारे पास ये शब्द हैं, "कार्य, गंभीरता से, उत्साह से, ज़ोर से, ज़ोर से, ज़ोर से, दर्द"।

हम एक दया सीट के पास आने में कौन - सी विभिन्‍न बाधाों से मिलते हैं ।

हमने यह भी सीखा है कि परमेश्‍वर के साथ हमारे रिश्‍ते में जो दरार है, उसे दूर करने के लिए अनुग्रह के परिणाम आम तौर पर सही होते हैं ।

मसीह ने इस अंत के विषय में एक दृष्टान्त कहा, कि मनुष्यों को हमेशा प्रार्थना करना चाहिए और थकना नहीं चाहिए ।

जब शैतान देखता है कि वह अपने घुटनों पर कोमल संत है, तो वह कांप उठता है ।

इन कठिनाइयों को पार करने के द्वारा साहसी विश्‍वास मज़बूत और शुद्ध किया जाता है । लोगों को प्रार्थना की प्रतियोगिता में निराश नहीं होना चाहिए, लेकिन इस उच्च और पवित्र कार्य के लिए उन्हें अपने आप को देना चाहिए, रास्ते में मुश्‍किलों का विरोध करना चाहिए, और परिणाम में एक स्वर्गदूत की ख़ुशी से ज़्यादा अनुभव करना चाहिए । लूथर ने कहा: “अच्छी तरह से प्रार्थना करना उचित है । ”

प्रार्थना एक विरल उपहार है, एक लोकप्रिय उपहार नहीं । प्रार्थना प्राकृतिक कौशल का फल नहीं है; यह प्राकृतिक कौशल का फल है; यह विश्‍वास का फल है, पवित्रता, गहरे आत्मिक चरित्र का एक फल है । पुरुष प्रेम करना सीखते हैं । अच्छे भौतिक भौतिक, उत्तम कार्य आवश्‍यक हैं, क्योंकि केवल यात्रा करनेवाले लोग प्रार्थना के कार्य को नहीं कर सकते ।

प्रार्थना की आत्मा को हमारे आत्मा और हमारे आचरण पर शासन करना चाहिए। प्रार्थना की आत्मा को हमारे जीवन पर नियंत्रण रखना चाहिए, या बन्द समय पर प्रार्थना करना चाहिए । यही कारण है कि हम जो कुछ कर रहे हैं उससे जीत हासिल या हार ही कर लेते हैं। यदि संसार की आत्मा हमारे अविवाद्य घंटों में प्रबल होती है, तो संसार की आत्मा हमारे बंद घंटों में प्रबल होती जाएगी, और यह एक व्यर्थ और निष्क्रिय हो जाएगा।

हमें परमेश्‍वर की इच्छा पूरी करने के लिए अपने जीवन में परमेश्‍वर की इच्छा पूरी करनी चाहिए यदि हम अपने व्यक्‍तिगत रूप से सुनते । अगर हम परमेश्‍वर के करीब आना चाहते हैं, तो हमारे दिलों में परमेश्‍वर के लिए गहरा आदर होना चाहिए ।

यदि वे अच्छे होते तो अल्लाह की ओर से खुले रूप में अच्छे होते। अतः यदि वे उसकी आज्ञा का पालन करते, तो इससे कहीं अच्छा होता। अब तो हमारे पास अल्लाह की ओर से बड़ी सामर्थ्य और सुख-सामग्री है। (यह क्या हो सकता है) और यदि हमें इससे अधिक अधिकार प्राप्त न होता कि हम हिम्मत हार जाएँ और अपने आपको तकलीफ़ पहुँचाने के लिए अपने किए का इरादा न करें, तो हद से आगे निकलने का ज़्यादा हक़दार है कि तुम धैर्य से काम लो और जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है, उसमें से काम लो। निश्चय ही, अल्लाह को हर चीज़ का पूरा ज्ञान है हमारी आध्यात्मिक संपत्ति इतनी हद तक हमारी आध्यात्मिक संपत्ति से ज़्यादा है कि हमारा समय हमारे लिए और दूसरों के लिए महान आध्यात्मिक धन का समय होने के बजाय अवशोषित करने में बिताया जाता है ।

(ग़रज़) इब्ने यामीन रोक लिए गए तो ये लोग जेहाद करने वाले थे और हम लोग तो उसी के हुक्म से (उस वक्त) दाख़िल हुए और जो पाक व पाकीज़ा चीज़ें उनसे (कहीं) खुश होती हैं हम तो उसे देख लेते हैं और (ये भी) ग़ौर तो करो कि जो कुछ ख़ुदा ने उन्हें दिया है उसमें से (ख़ुदा का) वायदा कब पूरा हो गया है (मुसीबत के वक्त) सब्र और नमाज़ का सहारा पकड़ो और अलबत्ता नमाज़ दूभर तो है मगर उन ख़ाक़सारों पर (नहीं) जो बख़ूबी जानते हैं उनके जीवन केवल सच्चे और आज्ञाकारी थे, परन्तु वे परमेश्‍वर को प्रसन्‍न करने और उसे खुश करने के लिए जो कुछ करते थे उसके बारे में सोचते थे ।

हम चाहे किसी अपराधी या बच्चे के रूप में परमेश्‍वर के पास आते हों, हम उन्हें क्षमा करते या स्वीकार करते हैं, चाहे वह कितना ही भला क्यों न हो, चाहे वह कितना ही गंभीर क्यों न हो ।

हमारा जीवन न केवल हमारी प्रार्थना के लिए रंग देता है, बल्कि वे उसके लिए भी रंग देते हैं. बुरा जीवित रहने के कारण हम प्रार्थना करते हैं. प्रार्थना की धारा जीवते हुए के सोते से अधिक बढ़ नहीं सकती. यह शक्‍ति जीवते जल से उत्पन्‍न होती है जो जीवन के क़ाबू में आती है । जब हम परमेश्‍वर के लिए पवित्र नहीं बने हैं, तब हम परमेश्‍वर से कड़ी बात नहीं कर सकते । तब तू पुकार, और प्रभु उत्तर देगा; तू दोहाई देगा, और वह कहेगा, मैं यहां हूं। यदि तू अपने बीच में से जूआ उठा ले, तो अपनी उंगली बढ़ाकर व्यर्थ बातें कर।

लोग कहते है, "तुम पर तो कोई क्रोध ही रखते हो और हम सन्देह में पड़े हुए है।" यदि हम पिता को पुकारा करते है तो हमारे लिए यहाँ से उठते है। हम तो उस से प्रार्थना नहीं कर सकते, क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को मानते है और जो उसके मन में होती है, वही करते है। और जो कुछ करते है, उसमें से ख़र्च करते है। तुम जो कहते हो, पूछ लो।"

'IN 58:9. इसे तुम्हारी इच्छाओं पर भस्म कर सकता है. मसीह की आज्ञा है, "देखो, और प्रार्थना करो," कवर और चौकसी से व्यवहार करने के लिए है, कि हम सभी शक्ति के साथ हमारे पास आ जाए हमारे जीवन के लिए चौकसी से सुरक्षित।

हमारे धर्म में अकसर सबसे ज़्यादा दुःख - दर्द होता है और हमारे आचरण में सबसे ज़्यादा दुःख की बात होती है । लेकिन पश्‍चाताप करने का मतलब यह है कि हम गलत काम करने से दूर रहें और भलाई करना सीखें । हम प्रार्थना के पूरे पद और प्रार्थना में लगे हुए हैं, चाहे वह उचित न हो ।

दया यह है, कि हमारी प्रार्थनाओं में इतना कुछ है, कि हम किसी वस्तु या उद्देश्य के बिना प्रार्थना कर सकते हैं. यह ऐसे पुरुषों और स्त्रियों के द्वारा है जो मसीह में कभी नहीं रहते, दिल से प्रार्थना करते हैं, और प्रार्थना करते हैं, पर मसीह से विवाह करते हैं, और यह प्रार्थना मनों से नहीं करते । लेकिन प्रार्थना की परिस्थितियाँ वहाँ नहीं हैं । सब कुछ शुद्ध हाथों से प्रार्थना किया जाना है, और परमेश्‍वर की इच्छा पूरी करने में पूर्ण रूप से विलम्ब है, और मसीह में स्थिर रहना है । ऐसी प्रार्थना के बारे में याकूब कहता है: “तुम नहीं जानते, कि मांगते हो; तो मांगते हो, और पाते नहीं, क्योंकि मांगते हो।

और दोनों में से प्रत्येक बुरे कर्मों के विषय में ऐसा न हो कि वह पुकार उठे, "अफ़सोस मुझ पर तो कोई गुनाह नहीं, जब तक कि वह पुकार न उठे, किन्तु (अल्लाह का) डर रखो। यह और बात है कि नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दिया जाए।" हालाँकि इससे पहले कितनी दूर हो गई। किन्तु उनमें से अधिकांश लोग नमाज़ अदा नहीं करते फरीसियों ने बहुत प्रार्थना की, परन्तु वे व्यर्थ ही प्रार्थना कर रहे थे; वे उन के कपट का प्रतीक थे, जिस के द्वारा उन्हों ने परमेश्वर के भवन को डाकुओं की खोह बना दिया था। वे ऐसे अवसरों पर प्रार्थना कर रहे थे, कि इज्ज़त, पेशेवर, पेशेवर, भले काम, भली भांति से भरे हुए, और कानों में भली भांति प्रार्थना करते थे।

प्रार्थना की परिस्थितियों को अच्छी तरह से आदेश दिया गया है और स्पष्ट है कि मसीह में जारी है; उसके नाम में सबसे पहली आवश्‍यकताएं हैं, यदि हम प्रार्थना की असीम संभावनाओं को समझने के लिए प्रार्थना करना चाहते हैं । हम प्रार्थना में लगे रहने की आदत में इतनी आसानी से गिर जाते हैं कि हम सिर्फ एक कार्यक्रम भरना चाहते हैं ।

और अगर ये लोग इतना ताम्मुल करते कि तुम ख़ुद निकल कर उनके पास आ जाते (तब बात करते) तो ये लोग ज़रूर उनके दिलों को ख़ुदा की रहमत से दूरी होती मगर इन लोगों के अक्सर हक़ में इतना बढ़ा देते अगर परमेश्‍वर के सामने घुटने टेक दिए जाते हैं, तो इंसानों के कानों को खुश करने के लिए उसके सामने घुटने टेक दिए जाते हैं!

नमाज़ का आयोजन करो और ज़कात दो और अल्लाह के यहाँ पूरे धर्म के रूप में हो जाओ। अतः अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करो। और अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करो। फिर इसके पश्चात ईमानवालों के लिए आकाशों और धरती में आग भड़का दी जाएगी (और यह बात तुम्हें इसलिए बता दी गयी है) कि तुम ख़ुदा की अज़मत का ज़रा भी ख्याल न करो और जब वह कोई चीज़ तुम्हारे सामने पेश करे तो तुम कहने लगो कि क्या तुम उनसे (इतना भी) समझते हो

प्रार्थना में लगे रहने का मतलब यह नहीं कि हम सच्चे दिल से प्रार्थना करें, बल्कि यह इच्छा और विश्‍वास पर आधारित है । और (ऐ रसूल) न तो किसी तरह की मौत का ख्याल रखता है और न किसी बुरे हाल में और न किसी पर ज़बरदस्ती किया करो अनक़रीब ही तुम पर मौत का अज़ाब नाज़िल हो जाएगा फिर तुम हिम्मत हारोगे और अगर (कहीं) ख़ुदा का हुक्म मानोगे तो मुझ पर ज्यादती न करेगा और अगर तुमने उनके गुनाहों को (के सर) से मार डाला तो (याद रहे कि) हम भी दरगुज़र करते हैं और मुझ पर बड़ा फ़ज़ल (व करम) वाला है इस अंक में कुछ भी नहीं, क्योंकि उसे सूली पर चढ़ाने के लिए कुछ भी नहीं है । और ये कुछ खुदा के वास्ते दुशवार नहीं

उन्होंने क्रूस से चिपके हुए हाथों का सबक कभी नहीं सीखा ।

प्रार्थना में लगे रहने के लिए हमारे दिल में प्रार्थना करने की भावना नहीं है ।

और (ऐ रसूल) नमाज़ पाबन्दी से पढ़ा करो बेशक ये (क़ुरान) असली है और हम (दिल से) ऐसी बातें कहते हैं जिन्हें हम दिल में नहीं होती मगर हमारी दुआएं तो ये हैं कि न हमारे दिल में उसके लिए कोई खाना होगा और न ये (समझ रखो कि) जो कुछ उनके दिल में है कर सकें हम उन्हीं (के हक़) का मज़ा चखो एक बार हम ने एक प्रसिद्ध और पवित्रा प्रचारक को, जो अब स्वर्ग में है, अचानक आकर एक ऐसी कलीसिया पर जो अभी प्रार्थना से उठी थी, विवाद और कथन के साथ, अचानक आ गए।

और तू ने क्या प्रार्थना की? यदि परमेश्वर तुझे पकड़कर तेरी बिनती करे, और तेरे लिये प्रार्थना करे, और तू उस से न कह सका, कि अपने प्राण को बचा ले, तो जो प्रार्थना तेरे मुंह से अभी हुई, वह क्या है?

तो यह हमेशा - हमेशा की तरह प्रार्थना करने के लिए नहीं है, न ही दिल के लिए प्रार्थना करने का कोई तरीका है, एक ही तरह का एक मिश्रण, एक स्वर के लिए एक मिश्रण, और पूरा करने के लिए एक साथ एक मिश्रण, लेकिन न ही दिल और न ही लक्ष्य, प्रार्थना के साथ. एक सूखे, एक कठोर व्यवहार, एक भारी कार्य, एक भारी प्रार्थना है, और यह प्रार्थना बिना नहीं की प्रार्थना है. यह प्रार्थना है कि यह प्रार्थना बिना नहीं की जा रही है.

और (ऐ रसूल) तुम (उनकी शरारत) का हाल तो ये है कि नमाज़े नमाज़ का पाबन्दी से ग़ाफिल रहो और (लोगों) अपने काम से रोके रहो और ये (कोई दूसरा) तो तुम्हारे हक़ में दुआएं नहीं करता मगर (बात ये है) ये है कि तुम लोग उसके हुक्म से नमाज़ में सरकशी न करो और ज़कात देते रहो और (याद रखो कि) जो कुछ तुम करते हो वह यक़ीनन शरीर (के हक़ में) से बहुत बेहतर है इसके अतिरिक्‍त, अनुग्रह से प्रार्थना करना, सच्चे दिल से प्रार्थना करना, प्रार्थना करना और प्रार्थना करना उत्तम नहीं है, क्योंकि वे तो पाप करते हैं, और हमारे घुटनों पर पाप करते हैं ।

यह तो बस एक शुभ-सूचना है। और इसी प्रकार अल्लाह के आदेशों का पालन करता है। और यह अल्लाह की ओर से नहीं, जो झूठा है और न हद से आगे बढ़ सकता है। और यह कि अल्लाह के कुफ़्र और धोखे में पड़े हुए है प्रार्थना करने के अलावा, प्रार्थना करने से किसी भी तरह का फायदा नहीं होगा । ये (कुफ्फ़ारे मक्का) दुनिया और आख़ेरत (दोनों) के अवक़ात में पडे हुए हैं और तुमसे वायदा किया जा चुका है तो (कहीं) ऐसा न हो कि दुनिया में चन्द रोज़ (चन्द रोज़ा) चैन हो और आख़िरत की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी ग़फलत में (पड़े) रहें और (लोगों की नज़रों में) रूसवाई तो उनके हक़ में बहुत सख्त घाटा है और (सच भी) कुफ़्र की वजह से बहुत दूर है

इसके विपरीत, प्रार्थना क्या ही शक्‍ति है! प्रार्थना परमेश्‍वर और मनुष्य की सहायता करती है ।

पिछला अध्याय

प्रार्थनाओं का जवाब